प्रयाण की बेला में-


आत्मानुभूति की सीढ़ियाँ

(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)

स्वामी विवेकानन्द ने आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 7 सीढ़ियाँ बतलायी हैं-

शम और दम।

मन को भीतर या बाहर भटकने से रोकना और इन्द्रियों को अपने केन्द्रों में लगा के रखना- इसी का नाम ‘शम और दम’ है। मन को बहिर्मुख होने से रोकना यह ‘शम’ कहलाता है और इन्द्रियों के बाहरी साधनों का निग्रह, इसी का नाम ‘दम’ है।

तितिक्षा (आदर्श सहन शीलता)।

दुख आता है तो आने दो। आये हुए दुखों को सहन करना, उन्हें रोकने या दूर करने का विचार भी न करना, तज्जन्य शोक या आवेग मन में पैदा भी न होने देना- इसी का नाम ‘तितिक्षा’ है।

उपरति।

इन्द्रियों के विषयों का विचार भी न करना।

श्रद्धा।

श्रद्धा मनुष्य का धर्म के प्रति और परमेश्वर के प्रति अमर्याद विश्वास है।

समाधान।

परमेश्वर में अपने मन को निरन्तर एकाग्र करने का अभ्यास।

मुमुक्षा।

एक रोटी के टुकड़े का, एक साँस भर हवा का, कपड़े-लत्ते का, देशाभिमान का, अपने देश का, अपने नाम का या अपनी कीर्ति का मनुष्य दास है। इनसे स्वतंत्र होने की अभिलाषा।

विषय निस्सार हैं और सुख-दुख कोई अन्त नहीं है। दुख के साथ सुख और सुख के साथ दुख लगा हुआ है। दुख के पीछे दौड़ना जिस तरह मनुष्य की कीर्ति के लिए अधःपतन है, उसी तरह सुख के पीछे दौड़ना भी अपना अधःपतन कर लेता है। मुमुक्षु को उन दोनों का ही तिरस्कार करना चाहिए।

नित्यानित्य विवेक।

प्रत्येक वस्तु अस्थिर है, यह सारा विश्व ही परिवर्तनशील पिण्ड है। बस वही एक है, जो कभी नहीं बदलता- वह है ईश्वर। और हम उसके जितने ही अधिक नजदीक जायेंगे, उतना ही कम हम में परिवर्तन या विकार होगा। और जब हम उस परमेश्वर तक पहुँच जावेंगे, उसके सामने जाकर खड़े होवेंगे तो हम प्रकृति को जीत लेंगे।

इन सात मान्यताओं को अपनी मनोभूमि में जमाने वाला, इन सात सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर उठने वाला मनुष्य आत्मानुभूति प्राप्त करता है और ईश्वर प्राप्ति का अधिकारी होता है।


Quotation

दैवी ज्ञान हुए बिना मनुष्य को अपनी कीमत नहीं मालूम होती और इसी लिए अपने विषय में वह औरों से जानना चाहता है, जब कि अपने संबंध में वह अपनी आत्मा से विश्वस्त किन्तु दृढ़ता पूर्वक जानकारी कर सकता है। साँसारिक दृश्य पर देव मोहित नहीं होते क्योंकि निरन्तर अन्तर दृष्टि रखने के कारण उन्हें अपने भीतर ही उससे अधिक महत्वपूर्ण चीजें मिल जाती हैं। -महर्षि रमण

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रेम और बलिदान को प्रधान समझना चाहिए। अगर आप उन मनुष्यों के जीवन पर दृष्टि डालेंगे जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अमर बना लिया है। आपको मालूम होगा कि उनकी सफलता का भूल कारण प्रेम और बलिदान की भावना ही है।-डॉ. एनी बीसेन्ट

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वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-8

नर-नारायण

(श्री श्रमजीवी)


काया की पूजा

नष्ट करो काया की पूजा आत्मा का आह्वान।

प्राण प्राण के विकल देवता लाये युग निर्माण।

मुगल तृषा की प्रेतात्मा, यह खंडहर से साकार-

चीन देश के राजा की पद दलित हुई दीवार!

नभ चुम्बी मीनार मिश्र के भूत-भक्ति-विज्ञापन।

कितनी अर्थी, सजीं, जगत कर आया जीवन-यापन।

दाह करो मृगतृष्णा मय मृत जीवन का अपमान॥ नष्ट करो.॥

अस्थि-चर्म मिट गया किन्तु फिर भी गाँधी अविनाशी,

ईसा की आत्मा को कोई दे सकता है फाँसी?

उठो सृजन कर्ता! नवयुग को लाओ, बंधन तोड़ो,

युग युगान्त की जीर्ण शीर्ण पिछड़ी परिपाटी छोड़ो,

कब प्रतीक में बसे भावना में बसते भगवान॥ नष्ट करो.॥

आज शिवालय की प्रतिमाएं भर लाई स्पन्दन,

ईसा, बुद्ध, मोहम्मद, जिन का जन-जन में हो वन्दन,

आज हिमालय के प्रदेश में फिर अर्चन आयोजन,

फिर विकास का नवल चरण नव मानव का अभिनन्दन

जय हो! नर-नारायण की जो समता का सोपान॥ नष्ट करो.


श्रावणी पर्व का संदेश

श्रावण सुदी पूर्णमासी को श्रावणी का त्यौहार होता है। यह ‘ज्ञान का पर्व’ है। सद्ज्ञान, विद्या, बुद्धि, विवेक और धर्म की बुद्धि के लिए इसे बनाया गया है। इसलिए इसे ब्राह्म पर्व भी कहते हैं। वेद का प्रारंभ इस त्यौहार से किया जाता है। इस दिन से लेकर भाद्रपद बदी सप्तमी तक एक सप्ताह वेद प्रचार की प्रथा चिरकाल से प्रचलित है। प्राचीन काल में इस त्यौहार के अवसर पर गुरुकुलों में नये छात्र प्रवेश होते थे। जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ, उन्हें यज्ञोपवीत दिये जाते थे। गुरु शिष्य के परम पवित्र एवं अत्यन्त आवश्यक संबंध की स्थापना होती थी। वेद मन्त्रों से मंत्रित किया हुआ रक्षा सूत्र आचार्य लोग अपने शिष्यों के हाथ में बाँधते थे, यह सूत्र उनकी रक्षा करता था। और उन्हें धर्म प्रतिज्ञा के बंधन में बाँधता था। बहिनें अपने भाइयों के हाथों राखी बाँध कर या भुजरियाँ (गेहूँ या जौ के दिन बढ़े हुए अंकुर) देकर भाइयों को यह याद दिलाती थीं कि बहिनों की रक्षा के लिए उनका क्या कर्त्तव्य है? भाई उसके बदले में उन्हें आश्वासन के रूप में कुछ उपहार देते थे, मानों वे कहते हों कि हम पूरी तरह सावधान हैं और बहिनों के ऊपर, नारी जाति के ऊपर, कोई विपत्ति आवेगी तो हम प्राण देकर भी उसका निवारण करेंगे। उस दिन नये-नये लता, पुष्प, वृक्ष आदि लगाकर संसार की शोभा और समृद्धि बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया जाता था।

प्राचीन काल में श्रावणी पर्व का यह महत्व था। पर आज तो चिह्न पूजा मात्र रह गई है। पकवान, सैंवइ, भात आदि विशेष भोजन खाना, ब्राह्मणों का घर-घर राखी बाँध कर पैसे माँगते फिरना, लोगों का श्रद्धा या अश्रद्धा से उन राखी बाँधने वालों को पैसा धेला देकर पीछा छुड़ाना, लड़कियों का भुजरियाँ बाँधना-बदले में बाप, भाई आदि द्वारा कुछ पैसे मिल जाना। बस आज तो इतनी ही चिह्न पूजा रह गई है।

सब से प्रधान, सबसे अधिक महत्वपूर्ण इस श्रावणी पर्व की ऐसी दुर्दशा होना खेदजनक है। चिह्न पूजा से काम न चलेगा, अब हमें अपने पूजनीय पूर्वजों द्वारा बड़े गंभीर सोच-विचार के साथ बनाये हुए इस त्यौहार का महत्व समझना और उनसे लाभ उठाना होगा, तभी हम अपने गौरव को पुनः प्राप्त कर सकेंगे और अज्ञान निशा को नष्ट कर सकेंगे।

(1) श्रावणी को वेद पूजा होती है। वेद का अर्थ है-धर्म पूर्ण ज्ञान। चारों वेदों में जितना ज्ञान भरा पड़ा है वह सब धर्मपूर्ण है। उसको समझने और अपनाने से जीवन सब प्रकार की सुख शाँति से भर जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों जीवन फलों की प्राप्ति होती है। मनुष्य का शरीर बहुत ही तुच्छ है, इसके हाड़ माँस आदि को बाजार में बेचा जाए तो उसकी कीमत करीब पौने पन्द्रह आना होती है। इससे तो पशुओं का शरीर कहीं अधिक मूल्यवान है। शारीरिक बल में पशु मनुष्य से अधिक बलवान होते हैं फिर भी मनुष्य सब प्राणियों से शिरोमणि है, यह उच्च स्थान उसे बुद्धि बल के कारण ही मिला है। जिसमें जितना अधिक ज्ञान है वह उतना ही बड़ा है। एक कुली और एक बैरिस्टर के शरीर में बहुत अंतर नहीं होता पर उन दोनों में जो बुद्धिबल का अंतर है उसी के कारण उनकी स्थिति में भारी अंतर रहता है। मनुष्य प्राणी में जो चमत्कारी शक्तियाँ हैं वह उसके मस्तिष्क में हैं। मस्तिष्क के द्वारा ही वह असुर या देवता, दरिद्र या धनपति, तिरस्कृत या पूजनीय, रोगी या बलवान बनता है। इसीलिए ज्ञान बल को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। इस ज्ञान के, बुद्धि, मस्तिष्क के परिमार्जन के लिए ही वेद की पूजा की जाती है। वेदों के मन्त्र-सद्ज्ञान के भण्डार हैं। उनके पढ़ने, सुनने, समझने और आचरण करने से सद्ज्ञान बढ़ता है। असद्ज्ञान तो चाहे जहाँ मिल सकता है पर सद्ज्ञान के लिए वेद का ही आश्रय लेना पड़ता है। वहाँ एक बात और भी स्मरण रखनी चाहिए कि वेद का ज्ञान परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य की आत्मा को दिया हुआ है। बिना पढ़े लोग भी अपनी अन्तरात्मा में वेद की वाणी सुन सकते हैं।

वेद पूजा से, ज्ञान की महत्ता, प्रतिष्ठा और उपयोगिता को मनुष्य समझता है और उसकी श्रद्धा ज्ञान में बढ़ती है, इसीलिए श्रावणी पर्व के अवसर पर वेद पूजा का विधान है।

(2) यज्ञोपवीत में नौ तार होते हैं यह नौ सूत, नौ गुणों के प्रतीक हैं। तीन लड़ों से प्रत्येक में तीन तार होते हैं। यह तीन लड़ें जीवन के तीन प्रधान अंगों का संदेश देती हैं। जीवन तीन भागों में विभक्त है (1) आत्मिक क्षेत्र (2) बौद्धिक क्षेत्र (3) सांसारिक क्षेत्र। यही यज्ञोपवीत की तीन लड़ें हैं। इनमें से हर एक में जो तीन-तीन तार हैं उनका तात्पर्य उन तीन-तीन गुणों से है जो इस प्रत्येक क्षेत्र के अंतर्गत होते हैं। आत्मिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ है। (1) विवेक (2) पवित्रता (3) शान्ति। बौद्धिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ है। (1) साहस (2) स्थिरता (3) कर्त्तव्य निष्ठा। सांसारिक क्षेत्र की तीन सम्पत्तियाँ हैं। (1) स्वास्थ्य (2) धन (3) सहयोग। इस प्रकार यह गुण मनुष्य के लिए आवश्यक हैं। जिसमें यह नौ गुण नहीं है जो इन नौ गुणों को प्राप्त करने की इच्छा या कोशिश भी नहीं करता वह शूद्र है। जन्म से सभी मूर्ख, नासमझ, पशुतुल्य होते हैं पर बड़े होने पर जीवन के तीन क्षेत्रों में विकास करने और प्रत्येक क्षेत्र में तीन-तीन गुण प्राप्त करने के महत्व को समझ लेता है और उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न आरंभ कर देता है तो उसका नया जन्म हुआ-दूसरा जन्म हुआ-समझा जाता है। यही द्विजत्व है। इस द्विजत्व की-नौ गुणों के विकास की जिम्मेदारी कंधे पर सदैव धारण किये रहने के चिह्न स्वरूप तीन तार का जनेऊ धारण किया जाता है।

श्रावणी के दिन पुराना यज्ञोपवीत बदल कर नया धारण करते हैं अर्थात् उस जिम्मेदारी को नये सिरे से स्मरण करते हैं। तात्पर्य यह है कि हम ऐसे ज्ञान को ग्रहण करें जिससे मानव जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक इन परम पुनीत नौ दिव्य सम्पत्तियों की प्राप्ति हो सके।

जिनका यज्ञोपवीत संस्कार पहले नहीं हुआ है उन सबको सामूहिक रूप से श्रावणी पर्व पर यज्ञोपवीत लेना चाहिए। शूद्र वे हैं जिनकी चेतना अत्यन्त जड़, पशु तुल्य है, जिनमें आत्मोन्नति के लिए कोई आकाँक्षा नहीं, ऐसे मानव पाषाणों के लिए यज्ञोपवीत का भला क्या महत्व हो सकता है? उनके लिए उसे धारण करना भी बेकार है। सूत का अनावश्यक दुरुपयोग न हो यह सोचकर हमारे धर्माचार्यों ने ऐसे जड़ बुद्धि लोगों के लिए-शूद्रों के लिए- यज्ञोपवीत धारण का निषेध कर दिया है। ऐसे लोग यदि पहनें भी तो बेचारे यज्ञोपवीत को और लजावेंगे। यज्ञोपवीत पहनते समय, बदलते समय और उसे धारण करते समय उन सब तथ्यों पर काफी मनन करना चाहिए, जो यज्ञोपवीत के साथ सन्निहित हैं।

(3) रक्षा बन्धन का तात्पर्य है गुरुजनों से आशीर्वाद प्राप्त करना। माता-पिता, गुरु तथा इनके समक्ष और भी जो गुरुजन हैं, उनकी पूजा, प्रतिष्ठा, वंदना करना, गुरु पूजा कहलाती है। चाचा, ताऊ, चाची ताई, बाबा, दादी, बड़े भाई, बड़ी भावज, बुआ, बड़ी बहिन, अध्यापक, पुरोहित, स्वामी, यह सब गुरुजन हैं। इनके निकट जाकर उनके चरण स्पर्श करना, हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता के भाव प्रकट करना, जो भूलें हुई हैं, उनके लिए क्षमा माँगना, कृपा रखने एवं आशीर्वाद देने की प्रार्थना करना। यह रक्षा बंधन की प्रार्थना है। इस प्रार्थना के प्रत्युत्तर में गुरुजन अपने सहज वात्सल्य से प्रेरित होकर प्रार्थी को आशीर्वाद देते हैं, और अपने आशीर्वाद का प्रतीक एक रक्षा सूत्र उनके दाहिने हाथ में बाँधते हैं। यह रक्षा सूत्र हाथ का कता हुआ हल्दी, रोली या केशर से रंगा हुआ होना चाहिए। बाजारू सूत से बनी हुई चमकदार राखियाँ इस कार्य के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। गुरुजनों को अपने हाथ से सूत कात कर यह राखी बनानी चाहिए। जिससे गाँधी का प्रिय चक्र सुदर्शन-चर्खा चलना वे भूलने न पावें और पवित्रतम भावनाओं के साथ स्वयं ही रक्षा सूत्र तैयार करें।

राखी बँधवाने के बदले में गुरुजनों को पैसे बाँटना आवश्यक नहीं। गुरुजन बच्चे नहीं होते जिन्हें पैसे देकर प्रसन्न किया जा सके और न वे भिक्षुक होते हैं जिन्हें किसी लोभ से रक्षा बंधन बाँधने का प्रयोजन हो। हाँ, लोक सेवी ब्रह्मकर्मा पुरोहित को अन्य पर्वों की भाँति इस पर्व पर भी दान करना चाहिए, चाहे उसे रक्षा बंधन की दक्षिणा कहा जाए या और कुछ। क्योंकि यदि लोक सेवी व्यक्तियों के निर्वाह एवं लोकहित के कार्यों के लिए मुक्त हस्त से दान देने की परम्परा कायम रखी जाएगी तो ही संसार में धर्म वृद्धि होगी, कंजूसी तो एक प्रकार की अनावृष्टि है जिसके कारण सार्वजनिक धर्म वृद्धि की, सुख शाँति की, खेती सूख जाती है।

(4) बहिनें भाइयों को राखी बाँधती हैं। अर्थात् वे स्मरण दिलाती हैं कि उनका उत्तरदायित्व केवल अपने ही बाल बच्चों की रक्षा तक सीमित नहीं है, वरन् बहिनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उनकी है। जो जाति अपनी नारियों के कष्ट को दूर करने का, उन्हें सब प्रकार सुखी बनाने का, उनकी ओर कुदृष्टि करने वालों को मजा चखाने का कर्त्तव्य पालन नहीं करती, वह जाति नष्ट हो जाती है, उसमें वर्ण संकर पैदा होते हैं और पारिवारिक सुख-शाँति मिट कर कपट, क्लेश और द्वेष का साम्राज्य छा जाता है। इसलिए बहिनों की रक्षा के लिए राखी बाँधी जाती है। यहाँ बहिन समस्त नारी जाति का प्रतिनिधित्व करती है और भाई को कर्त्तव्य बंधन में बाँधती है कि पौरुष युक्त पुष्प होने के नाते नारी जाति की ओर से भेजी हुई यह राखी-चुनौती के रूप में तुम्हारे हाथ में बाँधी जाती है। हम बहिन, बुआ या बेटी अपनी रक्षा के लिए केवल पति पक्ष पर ही निर्भर नहीं हैं वरन् भाइयों को भी अपने सुरक्षा के लिए प्रतिज्ञा बद्ध करती हैं। किसी अत्याचारी द्वारा बलात् किसी नारी पर इसलिए अत्याचार न होने पाये, चूँकि वह नारी है, अबला है, अशक्त है, अन्यायी से बदला नहीं ले सकती। तुम्हारा बल हर अबला की न्यायोचित सहायता के लिए ढाल बने यही राखी की चुनौती है।

(5) भुजरियों का आरोपण और उनकी पूजा यह वृक्षारोपण महोत्सव की चिह्न पूजा है। श्रावणी के अवसर पर वृक्ष, फल, पुष्प, पौधे लता, औषधि, घास आदि वनस्पतियों का उत्पादन संसार की कितनी बड़ी सेवा है और इससे प्राणियों का कितना बड़ा हित होता है इस पर जितना विचार किया जाय उतना ही महत्व प्रकट होता है। वायु में फैले हुए विषैले तत्व (कार्बन) को वृक्ष खाते हैं और बदले में प्राणप्रद वायु (ऑक्सीजन) हमें प्रदान करते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि वर्षा वहीं अधिक होती है जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, जिस प्रदेश में वृक्ष कम हो जाते हैं वहाँ वर्षा भी कम होने लगती है। पत्तियों की खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। लकड़ी दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तु है, हर मनुष्य जलाने में, मकान में, चारपाई में, फर्नीचर में, व्यवसायिक कार्यों में, लकड़ी खर्च करता है, यदि उस खर्च के बदले में पैदावार न बढ़ाई जाय तो धीरे-धीरे लकड़ी का अकाल पड़ने लगेगा। वृक्षों की छाया में अनेक प्राणी आराम पाते हैं, उनके फलों में प्राण पोषक विटामिन तत्व होते हैं जो स्वास्थ्य रक्षा के आवश्यक अंग है, फूलों की सुगन्ध और सौंदर्य से नेत्र और मस्तिष्क को बड़ी शीतलता मिलती है। औषधियों की जड़ी बूटियाँ तो एक प्रकार की अमृत प्रतिमा ही हैं, उनसे कितने ही रोगी, अकाल मृत्यु के मुख में जाते-जाते बच जाते हैं और कठिन बीमारियों से छुटकारा पाते हैं। छप्परों पर, दरवाजों पर वृक्षों पर छाई हुई बेलें रोते हुए, चिंता से जलते हुए मनुष्य तक को शाँति प्रदान करती हैं। सघन वृक्षों के प्रदेश में रहने वाले मनुष्य अधिक स्वस्थ, शांतचित्त और दीर्घजीवी होते हैं यह बात भली प्रकार सिद्ध हो चुकी है।

इन सब बातों पर ध्यान देते हुए श्रावणी के पुण्य पर्व पर वृक्षारोपण यज्ञ का महात्म्य माना जाता है। खेतों पर, खाली भूमियों में, बंजरों में, घर में, द्वार पर, जहाँ भी सुविधाजनक स्थान मिल सके वहाँ फलों के वृक्ष, लकड़ी के वृक्ष, फूलों के पौधे, बेलें, औषधियाँ, तरकारियाँ होनी चाहिए या उनकी पौध लगानी चाहिए। वर्षा ऋतु का समय इस कार्य के लिए बहुत सुविधाजनक होता है। इसलिए जितनी अधिक वनस्पति उत्पन्न की जाए उतना ही श्रेष्ठ है, शुभ है, पुण्य है। यह कार्य केवल पुरुष ही करें ऐसी बात नहीं हैं, स्त्रियाँ भी इस यज्ञ में अपना भाग पूरा करती हैं। वे अधिक नहीं कर सकतीं तो घर में छोटे मिट्टी के गमलों में छोटे-छोटे पौधे बोती हैं, पुष्प आदि के बीज नहीं मिलते तो घर में रखे हुए गेहूँ, जौ आदि अन्न को ही बो लेती है और उन अंकुरों की श्रावणी के दिन पूजा करती हैं। भुजरियों की पूजा का यही कारण है। कितने ही घरों में इस अवसर पर तुलसी की स्थापना या पूजा की जाती है।

श्रावणी पर्व पाँच तथ्यों का संदेश प्रतिवर्ष हमारे लिए लाता है। यदि उन संदेशों को हम सुनें और उनके अनुसार आचरण करें तो यह पर्व हमारे लिए सब प्रकार मंगल-मय हो सकता है।


मनुष्यत्व का विश्लेषण

(श्री सुरेशप्रसाद शर्मा)

मनुष्य के कार्य उसकी इच्छाओं और प्रवृत्तियों से संचालित और शासित होते हैं। इस दृष्टि से हम मनुष्य के कार्य को तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। पहली श्रेणी में उसके वे कार्य आते हैं जो उसकी बाह्य इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही किये जाते हैं। मनुष्य प्राकृतिक आवश्यकताओं के वशीभूत होकर कार्य करता है। इच्छा और कार्य के बीच समय की कोई दूरी नहीं रह जाती। इस अवस्था में मानसिक उत्तेजना की ही प्रधानता रहती है। बुद्धि जगत से कोई संबंध नहीं रहता। मनुष्य को इसका भान नहीं रहता कि उसके कार्य किस रूप में हो रहे हैं।

दूसरे दर्जे में मनुष्य के वे कार्य आते हैं जो उसके बाह्य और आन्तरिक दोनों इच्छाओं की तृप्ति के लिए किए जाते हैं, साथ ही साथ इच्छाओं और कार्यों के बीच समय की कुछ दूरी रख कर ऐसी अवस्था में मानसिक उत्तेजना और विचार दोनों समान रूप से कार्य करते हैं। इन दोनों में कभी-कभी एक तरह का द्वन्द्व भी नजर आता है। मनुष्य इस अवस्था में प्राकृतिक आवश्यकताओं पर कुछ अधिकार सा जमाया हुआ मालूम होता है। इस श्रेणी के कार्यों पर मनुष्य के ‘शक्ति’ और ‘निर्णय’ का बहुत बड़ा हाथ रहता है। इन दो शब्दों को समझ लेने से इस श्रेणी के कार्यों को समझने में आसानी होगी। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के हृदय में एक इच्छा उत्पन्न होती है किन्तु इच्छा के साथ ही साथ एक प्रश्न उसके मन में उठता है-इसको पाने की शक्ति मुझमें है या नहीं? इस प्रश्न को हल करने के बाद वह ‘निर्णय’ करता है कि आगे बढ़ें या नहीं। इसी ‘निर्णय’ के बल पर उसके कार्य संचालित होते हैं।

तीसरे विभाग में मनुष्य के वे कार्य आते हैं जो उसकी वासनाओं और इच्छाओं के पूर्ति के लिए नहीं बल्कि उसके सिद्धाँत के पूर्ति के लिए किए जाते हैं। इस अवस्था में मनुष्य अपनी इच्छाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लिए रहता है। उसकी इच्छाएं उसके सिद्धाँत की बागडोर के अंदर ही रहती हैं बहकने नहीं पातीं। उत्तेजना का इस अवस्था में लोप हो जाता है, विचार और सिद्धान्त का ही कार्यों के ऊपर प्रभुत्व रहता है। इन दोनों में भी सिद्धाँत की ही प्रधानता रहती है। सत्यवादी पुरुष को यह सोचने विचारने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि वह सत्य बोले या नहीं। एक अहिंसक जीव मारने की कल्पना नहीं कर सकता, सोचने, विचारने और निर्णय करने की उसे क्या जरूरत?

मनुष्यत्व की पहचान उसके कार्य से ही की जा सकती है। कार्यों का विश्लेषण हमने ऊपर कर लिया है। अब तदनुसार हम मनुष्यत्व का विश्लेषण कर सकते हैं। पहली श्रेणी के कार्य वाले मनुष्य में हम पशुत्व का ही अधिक अंश पाते हैं। एक पशु भी अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है और इसी श्रेणी के मनुष्य भी। विचार कर कार्य करने की क्षमता उसमें भी बहुत कम रहती है और इसमें भी शायद सृष्टि की आदिम अवस्था में मनुष्य की यही अवस्था रही होगी।

दूसरे दर्जे के कार्य वाले मनुष्य को हम देखते हैं कि पशु जगत से मानव जगत की ओर बढ़ आया है। कह सकते हैं कि पशुत्व और मनुष्यत्व के बीच की यही अवस्था है। मनुष्य कभी उत्तेजित होकर पशु तुल्य कार्य कर डालता है, कभी शाँत विचार के बाद मानवोचित कार्य। मानव समाज के इतिहास की मध्यकालीन यही अवस्था होगी। हो सकता है आज हम इसी अवस्था से होकर गुजर रहे हों।

तीसरे कार्य विभाग वाला मनुष्य एक पूर्ण मनुष्य है। मनुष्यत्व की सबसे ऊँची सीढ़ी पर उसी का स्थान है। अपनी इच्छाओं को अपने हाथ में रखकर, सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक की अनुभूतियों की आधार पर विश्व कल्याणकारी सिद्धाँत बनाकर उसी पर ही तो चलना मनुष्यत्व का लक्षण है।


विनाश के पथ पर सरपट मत दौड़िए

(श्री रमेशचन्दजी यादव, सिवनी)

हमारे अतीत और वर्तमान के बीच एक चौड़ी खाई पैदा हो गई है। कभी-कभी तो संदेह होता है कि यह वर्तमान भारत का, प्राचीन भारत से कोई संबंध भी है कि नहीं।

इतिहास साक्षी है कि प्राचीन भारत के निवासी पूर्ण स्वस्थ, सदाचारी, बलवान, निरोग, दीर्घजीवी, पराक्रमी, उदार, दूरदर्शी और तदनुसार धन-धान्य से सम्पन्न थे। उनकी महत्ता को संसार एक स्वर से सिर झुकाकर स्वीकार करता था पर आज तो इससे सर्वथा विपरीत स्थिति दृष्टिगोचर होती है। आज की भारतीय प्रजा दुर्बल, रोग ग्रस्त, अशक्त, कायर, स्वार्थी, अल्पजीवी, संकीर्ण वृत्ति होने के कारण निर्धन, निस्तेज और पतनोन्मुख हो रही है। यह कहते हुए संकोच होता है कि वर्तमान प्रजा उन प्राचीन ऋषियों और महापुरुषों की सन्तान है भी या नहीं जो आत्मिक और भौतिक शक्तियों से सुसम्पन्न होने के कारण इस भारत भूमि को ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाने में सफल हुए थे।

इस आश्चर्यजनक परिवर्तन का कारण जानने के लिए जब हम गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि विचार और आचरणों में भारी हेर-फेर हो जाने के कारण ही परिस्थितियाँ इस प्रकार उलट गई हैं। प्राचीन काल में लोगों का ईश्वर पर अटूट विश्वास होता था, धर्म के लिए वे प्राण तक देने को तैयार रहते थे, कर्मफल मिलने के ध्रुव सत्य की कोई उपेक्षा नहीं करता था, ईमानदारी और आत्म-सम्मान को जीवन का सार समझा जाता था। वचन को निबाहना, अत्याचार का मुकाबला करने में प्राण जाना सौभाग्य समझना, अन्याय का कण लेने की अपेक्षा भूखों मर जाने को श्रेष्ठ मानना, यह उस समय के लोगों की आन-बान-शान थी। संचय और भोग की वृत्तियों को यहाँ सदा तिरस्कृत किया गया है। त्याग, तप, संयम, स्वाध्याय, परमार्थ, प्रेम, संगठन और आत्मिक उन्नति को ही यहाँ सदा सम्मानित किया जाता रहा है।

इसी आध्यात्मिक दृष्टिकोण का, इसी धर्मनिष्ठा का परिणाम था कि भारतीय समाज में इतनी शाँति, सुव्यवस्था और सम्पन्नता थी कि भारत भूमि को ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहा जाता था और कहते हैं कि देवता भी यहाँ जन्म लेने के लिए ललचाते थे। संसार भर में ज्ञान का, विज्ञान का, प्रेम का, धर्म का, नेतृत्व का प्रकाश यहीं से फैलाया जाता था। चक्रवर्ती राज्य भारत माता के वीर पुत्र करते थे क्योंकि उन्हीं में वे आत्मिक योग्यताएं थीं जिनके कारण महामानवों का निर्माण होता है। उच्च विचारधारा वाले मनुष्य ही दीपक के समान स्वयं प्रकाशित होते हैं और अपने प्रकाश से, अंधकार में भटकती हुई साधारण जनता का पथ-प्रदर्शन करते हैं।

आज भी वही भारत भूमि है, वही जलवायु है, वही नदी, पर्वत हैं, उसी हाड़-माँस से बने मनुष्य हैं कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं पड़ता पर एक ही तत्व घट जाने से भारतीयों की महानता नष्ट हो गई। वह तत्व था-उच्च विचार, धार्मिक भावना, आस्तिकता, सत्य के प्रति श्रद्धा। इस तत्व का घटना एक प्रकार का मानव का पशु में परिवर्तन हो जाना है। आज नर पशुओं के झुँड इधर से उधर फिरते हैं, वे धीरे-धीरे नर पिशाच बनने के लिए अग्रसर होते जाते हैं।

हम देखते हैं कि ईश्वर भक्ति में वास्तविक तन्मयता होने के स्थान पर आडम्बर, पाखंड और विडम्बना का बोलबाला है। धर्म को ‘वाम्हनों’ के ठगने-खाने का धंधा घोषित कर दिया गया है। मार्क्सवाद के अनुसार कर्मफल के सिद्धाँत कपोल, कल्पना ठहरा दिये गये हैं। सत्य और ईमानदारी को अव्यवहारिक एवं कोरा आदर्शवाद बताकर उपेक्षित किया जा रहा है। रूप और धन पर, भोग और संचय पर, लोग बेतरह मुग्ध हैं। उचित-अनुचित का विचार करने की बजाय ‘जैसे बने वैसे’ स्वार्थ सिद्ध करने की नीति का डंका बज रहा है। स्वाध्याय को समय की बर्बादी करना कहा जाता है और उन निरुपयोगी पुस्तकों को लोग रात-रात भर जाकर घोटते हैं जो नौकरी दिलाने वाले सर्टीफिकेट के लिए आवश्यक होती हैं। तप, त्याग, संयम, परमार्थ, साधु बैरागियों के लिए छोड़ दिया गया है। आज तो कूटनीति का, डिप्लोमैसी का बोलबाला है। इन परिस्थितियों में ओछे, तुच्छ, नीच, कमीने, कायर, स्वार्थी, बदमाश, इन्द्रिय लोलुप, स्वार्थी, चोर, व्यसनी, लोभान्ध, मनुष्यों का ही निर्माण हो सकता है। यह विचार-धाराएं वैसे महापुरुषों को उत्पन्न नहीं कर सकतीं, वैसे समाज की रचना नहीं कर सकतीं, जैसा कि हमारे अतीत काल में रहा है।

विज्ञान की उन्नति ने आज मनुष्य के लिए सुख-सुविधा के अनेक साधन उपस्थित कर दिए हैं। जिनके कारण आशा तो यह की जानी चाहिए थी कि इस युग के मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ, दीर्घजीवी और पराक्रमी होंगे। पर हो बिल्कुल उलटा रहा है। क्या धनी क्या निर्धन सभी अपनी स्वास्थ्य संपत्ति से वंचित होकर बीमारी और कमजोरी को एक अमीरी फैशन बनाते जा रहे हैं। कारण यह है कि प्रकृति माता का तिरस्कार करके लोग कृत्रिमता में, फैशन में अपना बड़प्पन अनुभव करने लगे हैं। तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजनों का स्वाद लेने के लिए धान्य को कुधान्य बनाकर खाया जाता है। चाय, सिगरेट, शराब आदि मादक पदार्थों का व्यसन दिन-दिन बढ़ रहा है, रात्रि को देर तक जागना, दिन को सोना, अनावश्यक वस्त्रों से लदे रहना, वीर्यपात की अति, चटोरेपन की प्रधानता, व्यायाम और शारीरिक परिश्रम की उपेक्षा, दूषित जलवायु के स्थानों में लोभ वश पड़े रहना, आदि-आदि कारणों से स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता जाता है। नित नई बीमारियाँ उत्पन्न होती और फलती-फूलती रहती हैं। जवानी पूरी तरह आने नहीं पाती कि बुढ़ापा आरंभ हो जाता है। जो आयु किसी समय गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य समझी जाती थी आज वह मृत्यु की तैयारी की सीमा बन गई है।

इस पतनोन्मुखी प्रगति का अन्त कहाँ जाकर होगा, वह कल्पना करके ही छाती धड़कने लगती है। कुविचार और दूषित आधार ने हमारा शारीरिक और मानसिक जीवन खोखला कर दिया है। फिर भी हमारी आँखें नहीं खुलतीं और इस सड़क पर घुड़दौड़ लग रही है। यह विनाश का पथ है जिस पर प्रत्येक कदम अधिक भयंकर परिस्थितियाँ सामने उपस्थित करता चलेगा। और एक दिन सर्वनाश के गहरे गर्त में गिरा देगा।

अभी भी संभलने का समय है, यदि हम अपने प्राचीन गौरव की झाँकी पुनः करना चाहते हैं, भारतभूमि को पुनः ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाना चाहते हैं तो हमें अपने विचारों को नम्र और आचरण को प्रकृति अनुकूल बनाना होगा। सादा जीवन और उच्च विचार ही भारत की उन्नति का मूलमंत्र हो सकता है।


जीवन के तेरह रूप

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

मानव जीवन की विभिन्नता प्रसिद्ध है। आपको जिस प्रकार का जीवन पसंद है, दूसरा उसी को निम्न दृष्टि से देखता है, तीसरा उसी का मजाक उड़ाता है, चौथा उसी से प्रभावित होता है।

यहाँ हम तेरह प्रकार के जीवन का अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं। पाठक स्वयं देखें कि वे कौन सी श्रेणी में आते हैं? किस प्रकार के जीवन को कितने अंशों में पसंद करते हैं?

प्रथम रूप -

इस दृष्टिकोण के अनुसार व्यक्ति समाजिक जीवन तथा अपने इर्द-गिर्द के वातावरण में सक्रियता से भाग लेता है। अपने समुदाय तथा जाति के कार्यों में दिलचस्पी लेता है। उसके वातावरण को परिवर्तित तो करना नहीं चाहता वरन् उसे समझना, पसंद करना और मानव समुदाय ने जो सर्वोत्तम किया है, उस तक पहुँचना चाहता है। अनियंत्रित इच्छाओं का दमन तथा नियंत्रण को पसंद करता है। जीवन की सभी अभिनन्दनीय वस्तुओं का सुख क्रमानुसार प्राप्त करना चाहता है। वह जीवन में स्पष्टता, संतुलन, परिष्कार और संयम की आकाँक्षा रखता है। बेहूदगी, अत्यधिक जोश, थोथी शान, अविवेकी व्यवहार, अशाँति, वासना पूर्ति या जिह्वा तृप्ति से दूर रहता है। सबके साथ मित्रता का व्यवहार रखता है किन्तु अनेक व्यक्तियों से गहरी दोस्ती स्थापित नहीं करता। जीवन में संयम, स्पष्ट उद्देश्य, उत्तम व्यवहार तथा निश्चित क्रम अनिवार्य हैं। सामाजिक जीवन में जो परिवर्तन आयें, वे बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे होने चाहिए जिससे मानव संस्कृति को बड़ा धक्का न लगे। व्यक्ति शारीरिक और सामाजिक दृष्टि से सक्रिय बना रहे। सक्रिय जीवन में अनुशासन और बुद्धितत्त्व की प्रधानता रहे।

द्वितीय रूप -

व्यक्ति को अकेले ही अपना मार्ग निर्धारित करना चाहिए और अकेले ही उस पर चलना चाहिए मानव समाज से अपना सम्बन्ध गुप्त रखना, अपने पर ही अधिक समय देना, अपने ही जीवन को संयमित करना चाहिए। व्यक्ति को आत्म तुष्ट, चिंतन, मनन और आत्म ज्ञान में लिप्त रहना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सामाजिक झुण्डों से दूर, भौतिक वस्तुओं से विरक्त अपने आप को संयमित करने में ही अधिक समय देता है। सोचता है-अपना बाहरी जीवन सरल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए, और भौतिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं को घटाने का प्रयत्न करना चाहिए। शरीर के कार्य आत्मा के विकास, परिष्कार और प्रतीति के लिए होने चाहिए। बाह्य जीवन अर्थात् बाहरी आडम्बरों तथा झंझटों में लिप्त जीवन से कुछ अधिक नहीं हो सकता। व्यक्तियों तथा बाह्य वस्तुओं पर अत्यधिक आश्रित रहना कम करना चाहिए। जीवन का मूल केन्द्र आन्तरिक जीवन में ही प्राप्त हो सकता है।

तृतीय रूप -

सोचता है- सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार तथा दूसरों में दिलचस्पी ही जीवन का मूल अभिप्राय होना चाहिए। जीवन के मूल में प्रेम वह प्रेम दूसरों पर दबाव या अनुचित रीति से अपने स्वार्थ के लिए उनकी सेवाओं का उपयोग करना नहीं सिखलाता। यह प्रेम स्वार्थ सिद्धि से मुक्त है। बहुत सी वस्तुओं पर अधिकार, कामोत्तेजक सुखों तथा वस्तुओं व मनुष्यों पर शासन करने की आदत छोड़नी चाहिए क्योंकि इससे दूसरों के साथ सहानुभूति-पूर्ण प्रेम, विस्तृत अबाध सार्वभौमिक प्रेम की सिद्धि नहीं हो सकती, और बिना इस प्रेम प्रतीति के जीवन नीरस बालू के समान है। यदि हम हिंसक हैं, या हिंसाजन्य मानवीय दुर्बलताओं के शिकार हैं तो हम इस सहानुभूतिपूर्ण के हृदय-द्वार बंद कर रहे हैं। अतः हमें अपनी संकुचितता त्याग कर दूसरों के लिए प्रेम आदर, प्रशंसापूर्ण, सहायता से परिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

चौथे प्रकार का जीवन -

जीवन आनन्द के, मजेदारी के लिए दिया गया है-इन्द्रियों के सुख लूटने चाहिए, आमोद-प्रमोद का आनन्द उठाना चाहिए। जीवन का अभिप्राय संसार या जीवन के क्रम को रोकना नहीं, प्रयत्न जीवन को सब प्रकार के आनन्दों के लिए उन्मुक्त करना है। जीवन एक आनन्दोत्सव है, नैतिकता तथा नियंत्रण का स्कूल या धर्मालय नहीं। जैसे जीवन-प्रवाह बहता है, वैसे ही उसे चलने देना, वस्तुएं या व्यक्ति जैसे चलना चाहते हैं उन्हें वैसा ही विकसित होने देना, शिव तत्व या शुभ कार्य करने से अधिक महत्वपूर्ण है। इस प्रकार के ऐंद्रिक आनन्द के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य आत्म-केन्द्रित रहे व्यक्तिवादी बने। अतः हमें झंझटों, निमंत्रणों से दूर रहना चाहिए, अपने आनन्द के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

पाँचवें प्रकार का जीवन -

मनुष्य को केवल अपने आप ही में डूबे नहीं रहना चाहिए। न दूसरों से बचना, दूर रहना या अपने ऊपर ही केन्द्रित रहना चाहिए। इसके विपरीत उसे अपने समाज में विलीन कर देना चाहिए, अपने साथियों का सहयोग प्राप्त करना चाहिए, मित्रता द्वारा सामान्य तथा सार्वभौतिक हितों की प्राप्ति में प्रयत्नशील होना चाहिए। व्यक्ति को सामाजिक होना चाहिए और हमें सक्रियता से (आलस्य से नहीं) जीवन व्यतीत करना चाहिए। जीवन को शक्ति के वेग में लय करना चाहिए और सामूहिक आनन्द लाभ करना चाहिए। चिंतन, संयम, आत्म-निमंत्रण इत्यादि मनुष्य को सीमित बना कर जीवन का आनन्द ही नष्ट कर डालते हैं। हमें बड़े शान से, जीवन के सभी बाह्य और ऐन्द्रिय सुखों का उपभोग करते हुए दूसरों की सहायता तथा उनके सुख में सुखी होते हुए व्यतीत करना चाहिए। मानव जीवन अधिक गंभीर चीज नहीं है।

जीवन का छटा रूप -

जीवन की गति धीरे-धीरे स्थिरता और रुकावट (Stagnate) की ओर है, आराम तलब बन कर जीवन में जंग लग जाता है। इस निश्चेष्टता तथा स्थिरता के विरुद्ध हमें निरंतर उद्योग करना चाहिए और क्रिया, निरंतर कुछ न कुछ करना, शारीरिक श्रम, समस्याओं का यथार्थवादी स्पष्टीकरण, समाज तथा विश्व को नियंत्रित करने के लिए क्रियात्मक योजनाएँ बनाते रहना चाहिए। मनुष्य का भविष्य मूल रूप से इस बात पर निर्भर रहता है कि वह क्या करता है? कैसे करता है? कितना प्रयत्न और उद्योग करता है? न कि वह क्या सोचता है। सोचने से करना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि विकास की आकाँक्षा है तो परिष्कृत कार्य होने आवश्यक हैं। हम केवल प्राचीन काल के स्वप्न मात्र नहीं देख सकते न भविष्य के विषय में रंगीन कल्पनाएं ही निर्मित कर सकते हैं। हमें तो दृढ़ता और नियमितता से कार्य करना है।

जीवन का सातवाँ रूप -

भिन्न-भिन्न काल ओर समयों में हमें जीवन के क्रम, उद्देश्य एवं नीति को परिस्थिति एवं काल के अनुसार परिवर्तित करना है, किसी एक को पकड़ कर नहीं चलना है। कभी एक उद्देश्य तो कभी दूसरी नीति काम करती है। जीवन में आनंद, चिंतन एवं कार्य सभी आवश्यक तत्व हैं। जब इन में से कुछ भी कम या अधिक हो जाता है तो हम कुछ न कुछ महत्वपूर्ण चीज खो देते हैं। अतः हमें परिस्थिति के अनुसार मुड़ना या लपक (Flexibility) जाना सीखना चाहिए। अपने अंदर विभिन्नता स्वीकार करनी चाहिए, और साथ ही साथ आनन्द और कार्य में कुछ समय पृथक चिंतन के लिए भी निकालना चाहिए। जीवन का अधिकतम लाभ कार्य, चिंतन, आनन्द के क्रियाशील सामंजस्य में निहित है। अतः इन सभी का उचित उपयोग जीवन में होना चाहिए।

आठवें प्रकार का जीवन -

आनंद ही जीवन का मूल तत्व होना चाहिए। तीव्र और उद्वेगजन्य आनन्द नहीं, सरल और सहज रूप में प्राप्त हो जाने वाले आनन्द ही सर्वोत्कृष्ट है। इन आनन्दों में सीधा-साधा सात्विक आहार, आराम देने वाली परिस्थितियाँ, इष्ट मित्रों की सुखद वार्ता, विश्राम और मानसिक तनाव को कम करना है। प्रेम और सौहार्द से युक्त घर, सम्माननीय सामाजिक स्थिति, पौष्टिक भोजन से भरी हुई रसोई-ये घर को रहने योग्य बनाती हैं। शरीर विश्राम ले सके, मानसिक तन्तु तने न रहें मस्तिष्क से धीरे-धीरे काम लिया जाता रहे अनावश्यक तेजी, चिंता जल्दबाजी न रहे। सायंकाल दिन भर के कठिन परिश्रम के पश्चात विश्राम कर सकें, संसार को कृतज्ञता से आशीर्वाद दे सकें-यही जीवन सार है। आगे धकेलने वाली महत्वाकाँक्षा और योगियों जैसा कठोर संयम अतृप्त व्यक्तियों में सरल, निर्द्वन्द्व और निश्चिंत आनन्द के प्रवाह में तैरने की शक्ति नहीं है।

नवीं प्रकार का जीवन -

हमें अपने आप को शिक्षण के लिए खुला रखना चाहिए। यदि हम मन को संकीर्ण न बनावें और प्रत्येक प्रकार की शिक्षा तथा सद्ज्ञान को ग्रहण करने के लिए तैयार रहें तो हमारा जीवन स्वयं उत्तम प्रकार के रूप में आ जाएगा। जीवन में उत्तमोत्तम वस्तुएं स्वयं उत्पन्न होने लगती हैं क्योंकि हमारे जीवन का आदि स्रोत परमेश्वर है। आनन्द हमें शारीरिक इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य पाँचों प्रकार के आनन्दों से मिलने वाला नहीं है। सामाजिक जीवन की गूढ़ गुत्थियों में जकड़े रहने से सर्वोत्कृष्ट लाभ नहीं मिल सकता। न इसे दूसरे को दिया जा सकता है। इन्हें गूढ़ चिंतन द्वारा भी नहीं प्राप्त किया जा सकता। ये तो भली प्रकार का जीवन व्यतीत करते रहने से स्वयं आते हैं। हमारा जीवन धीमी गति से उन गुणों को प्रकट कर रहा है। जो आत्मा में विद्यमान है। जब हमारा शरीर आवश्यकताओं और फरमाइशों को बंद कर दे और शाँत होकर सद्ज्ञान ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत हो जाय तो वह उच्चतम दैवी नियमों के द्वारा परिचालित होने के लिए तैयार हो जाता है। इन दैवी विभूतियों से परिचालित होकर उसे वास्तविक आनन्द और शाँति मिलती है। दैवी सन्देश को ग्रहण करने के लिए प्रकृति के आँगन में शाँत बैठना और अन्तरात्मा के अनुसार जीवन पथ निर्धारित करना मूल चीज है। तब बाहर से मन के अंदर ज्ञान का पूर्ण प्रकाश होता है।

जीवन का दसवाँ स्वरूप -

आत्म-संयम मानव जीवन का मूल होना चाहिए। वह सरल आत्मसंयम नहीं जिसके कारण मनुष्य संसार से विरक्त होकर दूर चला जाता है, प्रत्युत्तर सदैव सचेत, दृढ़, पुरुषोचित, आत्म-संयम जो जीवन में रहता है, संसार की शक्ति को जानता है, और मानव जीवन की कमजोरियों को समझता है। उत्तम जीवन का निर्देशन समझदारी से होता है और उच्च आदर्शों पर मजबूती से दृढ़ रहता है। आनन्द और इच्छा मात्र से वे आदर्श नहीं झुकते। वे सामाजिक प्रतिष्ठा के भूखे नहीं होते, अंतिम पूर्ण सफलता में भी उनका पूर्ण विश्वास नहीं होता, अधिक लाभ की आकाँक्षा नहीं की जा सकती। सावधानी से चलने पर मनुष्य व्यक्तित्व पर अंकुश रख सकता है, कार्यों पर नियंत्रण कायम रख सकता है और स्वतंत्र अस्तित्व स्थिर रख सकता है। यही जीवन का मर्म है। यद्यपि इस मार्ग पर चलने से मनुष्य नष्ट हो जाता है, तथापि इस में उसका पुरुषोचित गौरव रह सकता है।

जीवन का ग्यारहवाँ स्वरूप-

चिंतन प्रधान जीवन उत्तम जीवन है। बाह्य सामाजिक जीवन मनुष्य के लिए उपयुक्त नहीं है। यह अत्यंत विस्तृत है, नीरस और स्वार्थमय है। आन्तरिक जीवन की महानता ही जीवन को जीने योग्य बनाती है। आदर्शों का आन्तरिक जीवन, कोमल भावनाओं, भावी उन्नति के सुखद स्वप्न, आत्म जिज्ञासा की तृप्ति-मनुष्य की वास्तविक सम्पत्ति है। आन्तरिक व्यक्तित्व के विकास द्वारा ही मनुष्य मानवी विभूतियों से परिपूर्ण होता है। आन्तरिक गंभीर चिंतन प्रधान जीवन से ही मनुष्य को स्थायी आनन्द की उपलब्धि होती है।

जीवन का बारहवाँ स्वरूप -

शरीर की शक्ति का अधिकतम उपयोग जीवन का पुरस्कार है। हाथों को कुछ ऐसी चीज की आवश्यकता है जिसका वे कुछ निर्माण कर सकें। लकड़ी और ईंट मकान के लिए, काटने के लिए फसल, साँचे में ढालने के लिए मिट्टी, करने के लिए कुछ काम। उसके पट्ठे और माँसपेशियाँ, विभिन्न अवयव कुछ न कुछ करने के लिए आतुर रहते हैं। जीवन का उत्साह मार्ग की अड़चनों को विजय करने में, विजयी जीवन व्यतीत करने में राज्य करने में है। क्रियात्मक, स्फूर्तिदायक, चलने फिरने से युक्त जीवन, जो जल की भाँति सदैव चलता-फिरता हिलता डुलता रहे, अग्रगामी, सचेष्ट हो वही वास्तविक जीवन का स्वरूप है।

जीवन का तेरहवाँ स्वरूप -

हमें अपने आपको दूसरे के द्वारा काम में लाये जाने देना चाहिए। दूसरा व्यक्ति अपने विकास में हमें काम में ले और हम चुपचाप बिना किसी दिखावे के उनकी सहायता करते रहें, उन्हें बढ़ावा देकर उन्नत होने में सहायक हों, जिससे वे वह कार्य पूर्ण कर सकें, जिसके लिए उनका निर्माण हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश विद्यमान है और उन पर विश्वास किया जा सकता है। हमें विनम्र, निरन्तर उद्योगशील, सत्यनिष्ठ होना चाहिए। जो प्रेम करे, उसके प्रति कृतज्ञ, जो सहायता चाहे, उसके लिए सहायक सिद्ध होना चाहिए किन्तु किसी प्रकार की माँग पेश करना अनुचित है। जनता के समीप आइए, प्रकृति के समीप आइये और क्योंकि आप समीप हैं, आप प्रत्येक भाँति सुरक्षित भी हैं। एक ऐसा गंभीर, शाँत, विशाल पात्र बनिये जिसके द्वारा सबकी इच्छा तृप्ति होती रहे।


दुश्चिंता करना एक रोग है।

(श्री रामखेलाव जी चौधरी, बी. ए.)

मनुष्य के सारे ज्ञान, विज्ञान और कला का उद्देश्य सुख और शाँति है। खेद है कि अब तक जितना पसीना मनुष्य ने इस नस की उन्नति में बहाया है, उसके बदले में बिल्कुल उल्टी चीजें उसे प्राप्त हुई हैं, वे हैं-चिन्ता, दुख, विग्रह और अशाँति। आज का साहित्य जिसका सृजन आत्म संतोष के लिए होना चाहिए था मन में प्रायः निराशा और अशाँति का बीज बोता है और विज्ञान ने, जिसकी उन्नति से सुख के अनेक साधन उपलब्ध हो सकते हैं, हमें दिया है संघर्ष की प्रवृत्ति और संहार की चेष्टा। आधुनिक सभ्यता के परिणाम स्वरूप ही मनुष्य ने अनेक शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक रोग भी प्राप्त कर लिए हैं। मानसिक रोगों में सबसे अधिक दुखदायी है-दुश्चिन्ताओं का रोग।

एक प्रसिद्ध लेखक ने दुश्चिन्ता के कारण होने वाले गंभीर परिणामों के संबंध में लिखते हुए बताया है कि वे ‘व्यवसायों को दुश्चिन्ताओं से विधि-पूर्वक लड़ना नहीं जानते, अल्पकाल में ही मर जाते हैं।’ चिन्ता मनुष्य की इतनी जीवन शक्ति का अपव्यय करती है कि थोड़े दिनों में ही वह काल का ग्रास बन जाता है।

डॉक्टर लोग ही बता सकते हैं कि दुश्चिन्ता करने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, एक साधारण व्यक्ति प्रायः यह समझता ही नहीं कि चिन्ता करने से न केवल उसका सुख नष्ट होता है, वरन् स्वास्थ्य भी नष्ट हो जाता है। चिन्ता करने से मानव शरीर पर क्या कुप्रभाव पड़ते हैं, इसकी खोज पाश्चात्य देशों में हो रही है। इस मनोरंजक किन्तु महत्वपूर्ण विषय को समझने के लिए अच्छा होगा कि प्रसिद्ध लेखक डन बर कृत- ‘मनोभाव और शारीरिक परिवर्तन’

(Emotions and bodily changes) नाम की पुस्तक को अच्छी तरह पढ़ीं जाये। उसमें अच्छी तरह लेखक ने विश्लेषण किया है कि शायद ही शरीर का कोई ऐसा अंग और प्रधान क्रिया-प्रणाली हो जिस पर मनोभावों का प्रभाव न पड़ता हो। और दुश्चिन्ता-यह सब से अधिक संवेदनात्मक मनोभाव है। इन के द्वारा उत्पन्न होने वाली शारीरिक अव्यवस्थाओं में सबसे मुख्य स्नायु-दौर्बल्य है। इसलिए हमें निम्नलिखित बातें याद रखनी चाहिए-

(1) चिन्ता करने से हृदय दुर्बल पड़ जाता है। उसकी स्वाभाविक गति नष्ट हो जाती है।

(2) रक्त-चाप की बीमारी भी अत्यधिक चिन्ता के कारण होती है।

(3) वायु प्रकोप, शूल और गठियाबाई जैसे भीषण रोग जिसे मोल लेने हों वह चिन्ता करे।

(4) अपने पेट को ठीक रखना है तो चिन्ता मत करो।

(5) चिन्ता के कारण ही जुकाम और खाँसी जैसे साधारण रोग पैदा होते रहते हैं।

(6) दुश्चिन्ता का कुप्रभाव शरीर को विकसित करने वाली ग्रन्थियों पर पड़ता है।

(7) चिन्ता के कारण भोजन में अरुचि पैदा हो जाती है और पाचन-क्रिया गड़बड़ हो जाती है।

इन सब बातों के आधार पर दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु रोग-क्षय से पीड़ित रोगियों में सबसे अधिक संख्या उनकी है जिन्होंने रात-दिन दुश्चिन्तायें करके अपने शत्रु को बुलाया है।

चिन्ता पीड़ित व्यक्ति के लक्षण -

(1) चिन्तित व्यक्ति हमेशा दुखी बना रहता है। उसके पेट में और सिर में प्रायः दर्द बना रहता है। स्वास्थ्य के मुख्य आधारभूत अंग पेट और सिर ही हैं और यह दोनों ही दुश्चिंता करने से भारी बने रहते हैं।

(2) दुश्चिंता करने वाला व्यक्ति कायर हो जाता है और कायरता की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन मौकों पर परिलक्षित होती है जब उसे बाह्य संसार की वास्तविकता का सामना करना पड़ता है। उसे सदैव भयंकर हानि का खतरा अनुभव हुआ करता है। कभी- कभी तो वह अकारण ही भयभीत हो जाया करता है।

(3) चिन्ताशील व्यक्ति में आत्म-विश्वास की कमी होती है। दूसरों के प्रति उस के मन में संदेह बना ही रहता है। चाहे जितना उसका उत्साह वर्धन किया जाय, उसे असफलता ही नजर आती है।

(4) उस में आवश्यकता से अधिक झुँझलाने की आदत पैदा हो जाती है। कभी-कभी उसके साथ अन्य लोगों का उठना-बैठना भी कठिन हो जाता है। वह अपनी अस्थिरता को छिपाने की चेष्टा करता है पर उसकी चेष्टा बेकार सिद्ध होती है। जरा-जरा सी बात पर उसका खून खौल उठता है।

(5) वह अत्यन्त अनुभूतिशील और आवश्यकता से अधिक सम्मान प्रिय होता है। इसलिए समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण गलत और अतिरंजित होता है। वह अपने ही मित्रों, प्रियजनों, परिजनों और परिवारजनों के कार्यों और कथन का उल्टा अर्थ लगाता है, कभी हर बात में वह अपना ही दोष समझता है। इस प्रकार वह अपना जीवन बहुत दुखी बना लेता है।

(6) वह प्रायः नैराश्यपूर्ण भावों से ओत-प्रोत रहता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उसे निराशा में ही आनन्द आता है, अन्यथा वह उन तामसिक भावों में इतना लीन क्यों रहता। पर चिन्ता पीड़ित व्यक्ति उन भावों से छुटकारा पाना चाहता है। वह उनसे पीछा छुड़ाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है।

इन मनोवैज्ञानिक लक्षणों के अतिरिक्त कुछ शारीरिक लक्षण भी चिन्ता ग्रस्त व्यक्ति में पाये जाते हैं।

(7) चिन्ता करने से बड़ी जल्दी थकावट आ जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि शरीर और मन दोनों थक गए हों। ऐसी थकावट हर समय बनी रहती है और यह भी हो सकता है कि थोड़ी-थोड़ी देर पर काम के बीच में भारी थकावट जान पड़े। जहाँ चिंता है, वहाँ थकावट अवश्य होगी।

(8) भोजन में भी अरुचि हो जाती है। थूक निकालने वाली और अन्य पाचक ग्रन्थियाँ अपना काम बंद कर देती हैं। अच्छे से अच्छे भोजन में स्वाद नहीं मिलता।

(9) काम-प्रवृत्ति भी कुँठित हो जाती है। चिन्तकों में रति की भावना कम ही हो जाती है। बहुतेरे चिन्तनशील अपना पुंसत्व तक खो बैठे हैं।

(10) कोष्ठबद्धता का रोग आ घेरता है। कोष्ठबद्धता से चिन्ता और चिन्ता से कोष्ठबद्धता एक दूषित चक्कर सा बन जाता है।

(11) गहरी नींद भी नहीं आती। चिंता के बोझ से मनुष्य को नींद नहीं आती और अगर वह सो भी जाय तो थोड़ी-थोड़ी देर पर आँख खुल जाती है। जहाँ नींद टूटी, दुश्चिन्तायें फिर आकर घेर लेती हैं।

(12) अव्यक्त पीड़ा भी इसका एक लक्षण है। यह पीड़ा किसी विशेष अंग में टिकाऊ नहीं होती। कभी छाती में, कभी पीठ में, कभी पेट में और कभी सिर में, भिन्न-भिन्न अंगों में चक्कर लगाया करती है।

(13) चिन्ता पीड़ित व्यक्ति हमेशा कहा करता है- ‘कुछ समझ में नहीं आता।’ उसका दिमाग हल्का जान पड़ता है। यह वह स्थिति है जब चिन्ता मस्तिष्क की स्वाभाविक क्रियाओं को अस्त-व्यस्त कर डालती है।

अब ऊपर दी हुई लक्षण-रेखाओं के आधार पर आप अपने मनोपटल पर एक चिन्ता पीड़ित व्यक्ति का चित्र अंकित करें। वह होगा दुर्बल, उत्साह हीन व्यक्ति जो जीवन को केवल भार समझ कर हो रहा होगा। उसके लंबे चेहरे, गड्ढ़े में धंसी हुई आँखें और पिचके हुए गालों पर दुश्चिन्ता के अभिशाप की छाया अंकित होगी। यह चित्र जिस प्रकार के मानव का प्रतिरूप होगा, उसे चिराग लेकर ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं, वह आज भारत के घर-घर में पाया जाता है। उसने अपने जीवन को दुखी बनाने के साथ, सारे परिवार और अपने आस- पास के पड़ौसियों को दुखी बनाया है। देश को नन्दन वन बनाने की सारी योजनाओं पर पानी फिर जाएगा। यदि इन चिन्ता पीड़ित मनुष्यों का उपचार न हुआ तो इसके लिए हमें बड़े-बड़े अस्पताल खोलने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि निम्नलिखित संदेश घर-घर पहुँचाये जायं और हर व्यक्ति से कहा जाय इन पर विचार करो और अमल करो -

(1) सुख और दुख, संतोष और असंतोष, रुचि और अरुचि-यह सब मनोदशाएं हैं। हमारे मन में यह बाहर से नहीं आकर घुसतीं, यह मानसिक हैं। इन मनोदशाओं को हम स्वयं अनुभव और अभ्यास के द्वारा पैदा करते हैं। इसलिए इन्हीं के बल पर ये दशाएं बदल सकती हैं।

(2) हमारे मनोभाव आँशिक रूप में बाह्य परिस्थितियों और उपादानों के कारण जाग्रत होते हैं। अगर हम अपनी बाहरी परिस्थितियों को बदल डालें, तो चिन्ता से बहुत कुछ मुक्ति मिल सकती है। यदि बदल न सकें, तो उन्हीं के अनुरूप अपने को अभ्यस्त बना डालें।

(3) हम चिन्ताओं, परेशानियों, दुःख और स्थायी मनस्ताप को इस प्रकार दूर भगा देंगे -

(अ) भावुकता के स्थान पर सुलझे हुए विचारों को स्थान देंगे।

(ब) अपनी परेशानियों का अच्छी तरह विश्लेषण करेंगे।

(स) अतीत की दुखदायी स्मृति को नयी और हरी करने वाली बातों से अलग रहेंगे।

(द) भावुकता को बलपूर्वक दमन करके शाँति की आराधना करेंगे।

(4) अपने परिवार के साथ अपने संबंध पर पुनः विचार हम करें और जरा-जरा सी बात पर बिगड़ना छोड़ दें।

याद रखिए, चिंता सबसे भयानक रोग है। चिंता मनुष्य के शरीर को जलाती है, चिंता शरीर और आत्मा दोनों को जीवित अवस्था में राख की ढेरी बना देती है। इससे मुक्त होने में केवल प्रयत्न की आवश्यकता है।


इन काँग्रेसियों को हो क्या गया है?

(आचार्य कृपलानी)

जब ठग नेताओं के जन्म, पालन-पोषण, शिक्षा और वातावरण की ओर देखते हैं तब तो वे जिस तेजी से नयी दिल्ली और प्राँतीय राजधानियों में भारतीय अधिकारी वर्ग के परम्परागत जीवन में समा गये हैं। उससे हमें आश्चर्य नहीं होता। जिन बंगलों में वे रहते हैं, उन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उन के वर्दीधारी नौकरों और चपरासियों की संख्या बढ़ी है। उन के भोजन की मेज विभिन्न स्वादिष्ट व्यंजनों से पूर्ण रहती है और वे उसी प्रकार अक्सर प्रीतिभोज देते रहते हैं। दिल्ली और प्राँत के गवर्नमेंट हाउसों में भालों से लेस श्वेत वर्दीधारी प्रतिष्ठा रक्षक सावधानावस्था में अब भी हर गली में मूर्तिवत् खड़े रहते हैं। शायद यह सोचा जाता है कि इससे पदवी प्रतिष्ठा बढ़ती है। लेकिन यह भुला दिया जाता है कि व्यक्तिगत मान प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए इंसान को इस प्रकार इस्तेमाल करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिष्ठा को नीचा करना है। यह सब फौजी तथा गैर फौजी सजधज विदेशी शासकों के लिए आवश्यक रही होगी, जो एक अर्थ में निरंकुश थे और शासित जनता से दूर रहते थे। जनता को आतंकित रखने और अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए उनको अपनी सत्ता का प्रदर्शन आवश्यक था, यद्यपि उसका कोई नैतिक आधार नहीं था। परंतु गरीब जनता के प्रजाताँत्रिक प्रतिनिधियों को जो केवल वैधानिक प्रधान हैं, इन सब बाहरी सजधज और प्रदर्शन की आवश्यकता पड़े, यह बात आसानी से समझ में नहीं आ सकती। हो सकता है, मनोवैज्ञानिक के पास इस प्रकार की विचित्र मनोदशा के लिए नाम हो जो ऐसा आचरण करने को बाध्य करती हो। लोग तो यही सोचेंगे कि लोकप्रिय प्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा और सम्मान का आधार वास्तविक गुण होते हैं, बाहरी प्रदर्शन नहीं। क्या काँग्रेस-नेताओं को जनता से कम सम्मान मिलता था, जब कि वे उस के बीच बिना प्रतिष्ठा संभालने वाले बाहरी उपचारों से दूर रह कर जाते थे? मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उस समय उनका केवल अधिक सम्मान ही नहीं किया जाता था, वरन् लोग उन से अत्यंत प्रेम भी करते थे। उस समय वे नीचे होते हुए भी महान थे। पर आज वे ऊंचे होते हुए भी ........?

विदेशों में जो प्रतिनिधि जाते हैं, वे चाहें यहाँ सार्वजनिक जीवन में रहे हों, चाहे ऊँचे सरकारी पदों पर, हम में से हर एक, छोटे-बड़े तक, पश्चिम की सर्वमान्य पोशाक हैट, पायजामे, भोजन, कालीन, जैकेट, पैण्ट, चमड़े के जूते इत्यादि से सुसज्जित होकर जाता है, यह जानते हुए भी कि उसके लिए एक सरकारी भारतीय पोशाक निश्चित कर दी गई है। सुना है, किसी देश में अच्छा फर्नीचर नहीं मिला तो हमारे प्रतिनिधियों ने दूसरे देशों से मंगाया है। कहा जाता है कि हमारे कुछ राजदूतों को इतने महत्वपूर्ण काम करने पड़ते हैं कि जब तक वे 50 हजार से भी अधिक कीमत वाली बेहूदी गोल्स रोयर्स कारों में चढ़कर न घूमें, तब तक ठीक तरह से काम हो ही नहीं सकता।

यद्यपि काँग्रेस मद्य निषेध के लिए वचन बद्ध हो चुकी है, फिर भी विदेशों में हमारे बहुत से प्रतिनिधि न केवल स्वयं मद्यपान करते हैं, वरन् जब वे मद्य निषेध के लिए बद्धप्रतिज्ञा हिंद की ओर से दावतें देते हैं तब उन में भी शराब का आयोजन करते हैं।

यह चीज स्वतंत्रता-दिवस जैसे पवित्र अवसर पर भी की जाती है। वास्तविकता तो वह है कि शिक्षित भारतीयों ने अपने प्रभुओं की इस हद तक बाहरी बेहूदी नकल की है कि उन्हें सब बातों में कोई असंगति दिखाई नहीं पड़ती है। आदत ने न केवल उनकी औचित्य भावनाओं को ही नष्ट कर दिया है, अपितु उनकी सौंदर्य भावना को भी कुरूप बना दिया है। वे यह भी नहीं समझते कि यह सब दौलत में लोटने वाले साम्राज्यवादी पश्चिम के लिए उचित हो सकता है, हमारे लिए तो यह अपव्यय और अशोभन वस्तु है। और हम ये सब बातें करते क्यों है? शायद प्रतिष्ठा पाने के लिए। ऐसी दुनिया में नहीं कोई इतना गरीब वहाँ कि हमारा सम्मान कर सकें।

जरा इसका उस सौंदर्य और भव्यता से मुकाबला कीजिए। जो हमारे महामानवों-विवेकानन्द, टैगोर और गाँधी जी में थी। जब उन्होंने विदेशों का भ्रमण किया था, कितने आकर्षक ये दिखाई देते थे। एक संन्यासी के वस्त्रों में थे, दूसरे कवि की भू-स्पर्शी पोशाक में और तीसरे तो दरिद्र की लंगोटी में थे वे हमारे देश के वास्तविक राजदूत थे! उन्होंने शिष्टाचार और बाहरी प्रदर्शन की अपेक्षा आन्तरिक विनम्रता से लोगों को प्रभावित किया। उनके आचरण से न केवल हमारे विचारों का, वरन् हमारे जीवन और आकार का भी सौंदर्य प्रस्फुटित हुआ। वास्तव में उन्होंने विदेशों में हमारी संस्कृति को पहुँचाया। यह सच है कि हमारे राजदूत विवेकानन्द, टैगोर और गाँधी जी की भाँति महान नहीं हो सकते, परंतु आज हम जिनको विदेशों में भेजते हैं, दुर्भाग्यवश उनमें इनकी एक धुँधली छाया भी नहीं रहती! वे तो फैशन परस्त पश्चिम के नकलची होते हैं।

जब गाँधी जी की शव यात्रा का पश्चिमी ढंग का आयोजन राज्य की ओर से किया गया तब रूढ़िवादिता चरम सीमा को पहुँच गई। शाँति, अहिंसा के देवता का शव उनके निकट अनुगामियों द्वारा नहीं ले जाया गया और न उन व्यक्तियों द्वारा ही, जिनसे उन्हें अत्यन्त प्रेम था। उनका शवाधार नौ सैनिकों द्वारा खींचा गया, जैसा शायद इंग्लैण्ड में होता है। केवल इतना ही नहीं, शवयात्रा में आगे और पीछे टैंकों, बख्तर बन्दकारों तथा अन्य फौजी प्रदर्शनों का आयोजन भी किया गया था। इस में संदेह नहीं कि गाँधीजी के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का सैनिकों को, इतना ही हक था जितना किसी दूसरे को परन्तु उनको अपने साथ घातक हथियारों को नहीं लाना चाहिए था। इससे हम वह पवित्रता और शाँत वातावरण न ला सके, जो ऐसे अवसरों पर पश्चिम में देखने को मिलता है।

मैंने काँग्रेस नेताओं के चरित्र के संबंध में काफी लिखा है, क्योंकि नेताओं का चरित्र क्राँति का पथ निर्दिष्ट करने वाले महत्वपूर्ण साधनों में से है और यह हमेशा से होता आया है। रूसी क्राँति पर उसके दो मुख्य अभिनेताओं-लेलिन और स्तालिन की प्रतिभा और चरित्र का जोरदार असर पड़ा है क्या इसमें किसी को संदेह हो सकता है कि नवनिर्मित पाकिस्तान राज्य पर उसके नेताओं के चरित्र का क्या असर पड़ेगा? इस प्रकार निकट भविष्य में हमारे राज्य तथा समाज का ढांचा तैयार करने में काँग्रेस का चरित्र और शासन स्वरूप का भी अत्यधिक प्रभाव पड़ेगा। मान लीजिए कि मेरा विश्लेषण पूर्ण रूप में ठीक नहीं, तो भी यह तय है कि वे नेता गाँधी जी के अनुरूप नवीन समाज व्यवस्था की ओर काम करने में असमर्थ रहेंगे।

जो लोग अपने को काँग्रेसी के वेश में देश के मित्र और शुभचिन्तक कह के अंदर ही अंदर ब्लैक मार्केट आदि कुकर्म करते हैं, क्या इसमें कुछ सन्देह है कि यदि ऐसी कार्यवाहियाँ जारी रहीं तो काँग्रेस की शान नहीं बढ़ेगी।

कुकर्म काँग्रेस रूपी वृक्ष को जड़मूल से उखाड़ कर फेंक देंगे और वह दिन दूर नहीं जब कि वह वृक्ष पृथ्वी पर गिर कर काँग्रेस का अस्तित्व सदा के लिए मिटा देगा।

बहुत से काँग्रेसियों का स्वयं महात्माजी के आदर्शों में भी विश्वास नहीं है। ये अहिंसा और सत्य को वास्तविक रूप देना तो दूर रहा उसे असम्भव सा ही समझते हैं। काँग्रेस में जनता की सेवा का भाव भी नहीं रहा वे पदाधिकारी होने के खेल में एक दूसरे से घुड़दौड़ कर रहे हैं। उनमें क्राँतिकारी भावना का तो अभाव हैं। यदि उन्हीं ने झूठी शान, आडम्बर, पदलालसा, धन संग्रह तथा पश्चिमी रंग-ढंग में परिवर्तन नहीं किया तो विश्व की कोई भी शक्ति काँग्रेस को नष्ट होने से नहीं बचा सकती ।


परिश्रम तथा विश्राम

(श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’)

प्रकृति में प्रत्येक वस्तु का उपयोग है। कोई भी वस्तु बिल्कुल व्यर्थ नहीं है। इसी सिद्धाँत के आधार पर विश्राम करना भी मनुष्य तथा जीवों के लिए उतना ही आवश्यक और उपयोगी है जितना कि परिश्रम करना। दो में से एक का भी निताँत अभाव था अस्वाभाविकता कभी उसे निकम्मा और रोग का घर बना देगी। परिश्रम करने से एक ओर जो शरीर के कोषाणु टूटते-फूटते हैं तथा माँस, रक्त आदि की छीजन होती है तो दूसरी ओर शरीर के अंगों को स्फूर्ति मिलती है, शरीर के अंगों में निकम्मेपन तथा आलस्य के कारण उत्पन्न जंग नहीं लगने पाती है और अंग कार्य करने के उपयुक्त और अभ्यासी रहते हैं। उसी प्रकार विश्राम करने से टूटे-फूटे कोषाणुओं की मरम्मत तथा नये कोषाणुओं का निर्माण होता है। परिश्रम द्वारा खर्च शक्ति का फिर संचय होता है। थके अवयवों को विश्राम मिलता है। जहाँ एक ओर यह लाभ वाली स्थिति होती है। वहाँ दूसरी ओर विश्राम की दशा में अवयव अकर्मण्य और शिथिल पड़ जाते है। अस्तु यह हम स्पष्ट समझ सकते हैं कि यदि अति का विश्राम या अति का परिश्रम किया गया तो शरीर का अस्वस्थ होना अनिवार्य होता। सत्य ही है ‘अति सर्वत्र् वर्जयेत्’।

आइये, साधारणतया हम देखें कि मनुष्य को दैनिक कार्य कब करना चाहिए और उस समय क्या ध्यान रखना चाहिए? लगभग चार बजे प्रातः मनुष्य को उठना चाहिए। वह दस बजे दिन तक किसी समय कार्य कर सकता है। बाद रहे 24 घंटे में 8 घंटे से अधिक कठिन परिश्रम का कार्य नहीं करना चाहिए चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक। शारीरिक और मस्तिष्क संबंधी कार्यों का सिलसिला साथ-साथ चलना चाहिए। मजदूर-किसान शारीरिक परिश्रम करने वाले टेनिस, फुटबाल, बालीबाल आदि खेलें या टहलें-दौड़ें। कहा जाता है ‘कार्य का परिवर्तन ही विश्राम है’। आफिस में कार्य करने वाले सुबह-शाम मैदान के खेल खेलें या खुले स्थान पर बागवानी आदि करें। वैसे ही किसान-मजदूर आदि भी अवकाश के समय साँझ या रात को घरेलू खेल, खेल कर तबियत बहलायें। एक विद्वान ने कहा है-खाली दिमाग शैतान का घर है। तथा ‘मनुष्य परिवर्तन-शील प्राणी होने से नित-नूतन-परिवर्तन चाहता है।’ यदि ऊपर कहीं हुई दोनों बातों का अर्थ हम ठीक से समझ कर उन्हें अपने जीवन में उतार लें तो कितना लाभ हो।

यह भी ध्यान देने की बात है कि जिस समय कार्य करने की विशेष इच्छा या रुचि हो उस समय अवश्य ही काम करना चाहिए। उदाहरणार्थ जिस समय कोई कवि या लेखक भावों से भरा हो उस समय अवश्य ही उसे अपने भाव कलम-बद्ध करने चाहिए।

कार्य कब नहीं करना चाहिए, यह जानना भी जरूरी है। (1) रोग में कठिन परिश्रम करना (2) आवश्यकता से अधिक परिश्रम करना। यह तो हम जानते ही हैं कि परिश्रम से कोषाणु नष्ट होते हैं यदि उसी अनुपात से उनका सृजन नहीं होगा, जिस अनुपात से वह नष्ट हुए हैं, तो मनुष्य धीरे-धीरे अशक्त, अस्वस्थ, क्षीण और रोगी हो जाएगा। (3) भोजन के बाद तुरंत कार्य (मानसिक या शारीरिक) न करें अन्यथा पाचन-अंगों में जो स्वाभाविक रीति से कार्य होने लगा है, उनका ध्यान बंटेगा और खून का दबाव बुद्धि या अन्य शरीर के अंगों की ओर हो जाएगा। इससे पाचन में शिथिलता हो जाएगी ओर भोजन से ठीक तत्व न बन सकेंगे। कम से कम आधे घंटे तक भोजन के बाद विश्राम करो। (4) एनीमा लेने के कम से कम 15 मिनट अवश्य लेटें अथवा कोमल और कमजोर हुई आँतों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। (5) रात के 10 बजे से 3-4 बजे प्रातःकाल तक सोवे। रात्रि ईश्वर ने विश्राम और दिन कार्य के लिए बनाया है। फैशन-परस्त लोग रात के एक-एक बजे तक थियेटर, सिनेमा, नाच-रंग, ताश तथा गप्पबाजी में लगे रहते हैं और दिन को 7-8 बजे तक सोते हैं। प्रकृति के नियमों की अवहेलना करके देर सबेर वे दण्ड पाते ही हैं। पर जिनकी रात की नौकरी हो या कभी-कभी रात की ड्यूटी पड़ती हो, जैसे रेल, पुलिस आदि की नौकरी, तो वहाँ तो लाचारी का नाम सब्र है। ऐसे आदमी दिन में विश्राम करके कमी पूरी कर सकते हैं पर अस्वाभाविकता तो आ ही जायगी। (6) क्रोध आदि मनोविकारों के समय कार्य स्थगित कर देना चाहिए अन्यथा काम बिगड़ जाने का डर होता है।

यह बात हमें विशेष रूप से जान लेनी चाहिए कि खेल और व्यायाम कब करना चाहिए और तब क्या ध्यान रखना चाहिए? (1) प्रातः और साँय का समय उनके लिए उत्तम है। प्रायः एक स्थान पर किये जाने वाले व्यायाम जैसे दण्ड बैठक, जिमनास्टिक, कुश्ती आदि तथा तैरना, घूमना और दौड़ना आदि व्यायाम भी प्रातः करना ही उत्तम है। दौड़ने वाले व्यायाम जैसे टेनिस, हाकी, फुटबाल आदि सायंकाल को अच्छे होते हैं। सूर्योदय के पूर्व सर्वोत्तम समय है, नहीं तो 7-8 बजे दिन तक। सूर्यास्त के बाद सायंकाल के खेल-व्यायाम न करें। (2) कठिन परिश्रम के बाद शरीर को ठंडा करने के लिए कुछ देर टहलना चाहिए। कठिन व्यायाम के तुरंत बाद नहाना ठीक नहीं। नाड़ी की गति के स्वाभाविक आ जाने पर शरीर की बढ़ी हुई गर्मी शाँत होने पर स्नान करें या देह अंगोछे। हो सके तो फिर कुछ देर विश्राम करें। आराम और कसरत एक के बाद एक चले तो लाभ बहुत होता है।

(3) एक समय पर बहुत से व्यायाम नहीं करना चाहिए। प्रातः स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यायाम, प्राणायाम, यौगिक क्रियायें आदि करना चाहिए और हो सके तो नहाकर, सायं को शारीरिक कम से कम व्यायाम करके खाना न खाये, आधे घंटे तक। अब यह भी देख लें कि खेल और व्यायाम कब नहीं करना चाहिए?

(1) भोजन करने के कम से कम 3-4 घंटे तक व्यायाम या कठिन शारीरिक परिश्रम न करें। (2) कठिन रोग आदि में, विशेष कर डॉक्टर आदि के मना करने पर, नाशात्मक रोगों में विशेष रूप से कठिन व्यायाम न करें। (3) एनीमा लेने के कम से कम आध घंटे तक (4) बहुत थके होने, शोक, चिंता, क्रोध आदि के समय। (5) ज्वर, दमा, खाँसी, गर्मी, सूजाक, आतशक, खूनी बवासीर और हृदय के समस्त रोगों में व्यायाम हानिकारक है। शेष रोगों में डॉक्टरों की राय के अनुसार हल्का व्यायाम करें। रोग से उठने के बाद तथा मैथुन के बाद भी व्यायाम न करें।

विश्राम करने के अनेक उपाय हैं, किन्तु उन में से प्रमुख निद्रा तथा शिथिलीकरण हैं। शिथिलीकरण पर तो एक स्वतंत्र लेख लिखूँगा, केवल निद्रा पर लिखकर यह लेख समाप्त करता हूँ। सोना कब चाहिए-यह जानना आवश्यक है। (1) 10 बजे रात तक सो जाना चाहिए। बच्चे 1-2 घंटे पहले भी सो सकते हैं। क्योंकि 10 से 12 घंटे तक दो घंटे सोने में शरीर को, पहली नींद में, जितना विश्राम मिल जाता है, बाद में 12 बजे रात के बाद चार घंटे विश्राम और नींद में भी उतना नहीं मिलता। युवक तथा प्रौढ़ को 6 घंटे और बालकों को प्रायः 8 घंटे की निद्रा पर्याप्त होती है। (2) बीमारी में दोपहर को सो सकते हैं। (3) केवल गर्मी के दिनों में, भोजन के कुछ देर बाद घंटा-आध घंटा दोपहर सो सकते हैं। (4) अधिक परिश्रम करने वाला दोपहर को घंटा-आध घंटा सो सकता है। (5) जिनकी नौकरी में नाइट ड्यूटी पड़ती है, वह लाचारी में दोपहर को सो सकते हैं। (6) स्त्री संग का आदर्श समय 12 से 2 बजे रात्रि का है। क्योंकि प्रथम निद्रा के बाद यह ठीक रहता है और स्त्री-संग के बाद कुछ सोना आवश्यक है।

अब यह समझिए कि सोना कब नहीं चाहिए? (1) प्रायः दिन में (2) भोजन के तुरन्त बाद (दिन में आध घंटा गुजर जाने के बाद, भले ही सो लें) (3) ऊषा-काल में सोना।

सोते समय या सोने के पूर्व या सोने के ठीक बाद क्या ध्यान रखना उचित होगा, यह भी हम जान लें-

(1) सोते समय बीच-बीच में जल न पियें। सोने के पहले लघु-शंका करके जल भी पी लें। सोकर उठते ही, दिन हो या रात तुरंत जल न पियें। 10-5 मिनट रुक जाय अथवा जुकाम हो जाने का भय रहता है। (2) बाँयी करवट अधिकतर सोयें क्योंकि रात को दाहिनी श्वास चलना लाभप्रद है पर करवटें बदलते रह सकते हैं। चित्त या पट्ट नहीं सोना चाहिए, सदा करवटों के बल सोएं। सर के नीचे या तो तकिया न हो, और यदि तकिया हो भी तो ऊँचा तकिया न हो। सोते समय सर नीचा हो, उठा हुआ न हो। खाट ढीली न हो। बहुत मुलायम गद्दे आदि कपड़े सोने के न हों। तख्त पर सोना इससे अधिक लाभप्रद है-विशेष कर विद्यार्थियों को। (3) सोने के पहले तथा सोकर उठने के बाद ईश्वर चिंतन तथा आत्म-संकेत करें। ऐसा करने से सोने के बाद भी शाँत नींद आती है।

इस प्रकार हमने देखा कि खूब कसकर परिश्रम करना और जी भर कर विश्राम करना यह दोनों साथ-साथ चलने वाली चीजें मनुष्य को स्वस्थ, सबल और सुँदर बनाती हैं।


मौन द्वारा शाँति साधना

(श्री गाँधी राम गुप्त, उरई)

जीवन संघर्षमय है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, विविध दिशाओं में संघर्ष करना पड़ता है। जिसके कारण गर्मी, बेचैनी और अशान्ति उत्पन्न होती रही है। यह अशान्ति थकान और उद्विग्नता पैदा करती रहती है जिससे त्राण पाने के लिए मनुष्य शान्ति की तलाश करता रहता है। जहाँ शाँति मिलती है वहीं आत्मा को चैन तथा संतोष मिलता है। ऐसी सुख-शाँति पूर्व स्थिति प्राप्त करने के लिए आत्मा सदा तरसती रहती है।

कई लोग जंगलों, पर्वतों, एकान्त स्थलों, तीर्थों, मंदिरों आदि में शाँति की तलाश करते हुए भ्रमण किया करते हैं। इन स्थानों में स्थूल और क्षणिक शाँति की झाँकी भले ही हो जाय पर पूर्ण शाँति नहीं मिल सकती। कारण यह है कि संसार का प्रत्येक परमाणु गतिशील, परिवर्तन शील और चंचल है, स्थूल जगत का कोई भी पदार्थ कोई भी अणु स्थिर नहीं, शाँत नहीं, जो वस्तु स्वयं ही शाँत नहीं वह दूसरों को शाँति कहाँ से दे सकेगी। स्थिर वस्तु एक ही है वह है-आत्मा। इसलिए आत्मा में ही शाँति है। जब हम आत्म-परायण होते हैं, आत्मा में रमण करते हैं तो स्थिर शाँति के दर्शन करते हैं, जिससे अनन्त विश्राम उपलब्ध होता है।

‘मौन’ वह साधना है जो चित्र वृत्तियों को बिखरने से बचाती है। चुप रहने से वाणी और वाणी के साथ व्यय होने वाले मस्तिष्कीय शक्तियों की क्षति होने से बचत होती है। यह बचत आत्म-चिन्तन में लगा दी जाय तो शाँति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद शीतल और स्निग्ध शाँति का आस्वादन कराती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनी शक्ति प्राप्त होती है जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।

सांसारिक दृष्टि से भी और आत्मिक दृष्टि से भी मौन एक महत्वपूर्ण साधन है। महात्मा गाँधी इतने कार्य व्यस्त और अनेक उत्तरदायित्वों को अपने कंधों पर उठाये रहने वाले महापुरुष थे। उनके पास समय का बड़ा अभाव रहता था तो भी वे सप्ताह में एक दिन मौन व्रत के लिए अवश्य निकाल लेते थे। उनका कथन था कि इससे मुझे बड़ा विश्राम मिलता है और कार्य करने के लिए नई ताजगी का अनुभव होता है।

मौन की साधना के साथ यदि मनोवृत्तियों को आत्म-चिंतन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है। जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्त भोगी ही जानते हैं। अरुणाचल के तपस्वी महर्षि रमण विगत 50 वर्षों से मौन की साधना कर रहे हैं। उनकी सिद्धावस्था संदेह से परे है। इस अकेली मौन साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती हैं जो अन्य योग साधनों से मिल सकती हैं।

मौन एक दैवी रेडियो है। साँसारिक कोलाहलों से मन को हटाकर जब हम अन्तरात्मा की सुई परमात्मा के केन्द्र पर सटा देते हैं तो ईश्वरीय वाणी सुनाई पड़ने लगती है। जो कुछ जानने लायक है, जो कुछ सुनने लायक है वह मौन के देवी रेडियो के माध्यम द्वारा जाना और सुना जा सकता है।

जो व्यक्ति आत्मोन्नति की दिशा में बढ़ना चाहते हैं और उद्विग्नता मिटाने वाली शाँति के दर्शन करना चाहते हैं उन्हें मौन साधना की ओर बढ़ना चाहिए। जिस दिन फुरसत रहती हो सप्ताह में एक रोज पूरे, आधे या दिन चौथाई मौन रहना चाहिए। यदि नित्य एक दो घंटे मौन रहा जा सके तो और भी अच्छा, किन्हीं विशेष पर्वों या अवसरों पर एक दिन या कई दिन का मौन रखना चाहिए। इस प्रकार मौन की ओर प्रवृत्ति बढ़ाते चलने से आत्मिक मार्ग में रुचि बढ़ती चलती है और शाँति के पथ पर प्रगति होने लगती है।


अपने विधाता आप स्वयं हैं।

(श्री प्रभाकर जोशी, सेगाँव)

एक प्रसिद्ध उक्ति है-

“हानि-लाभ जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।”

इस उक्ति में हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश को “विधि” के हाथ में बताया गया है। आइए, विचार करें कि यह विधि क्या है?

कई व्यक्ति इस स्थान पर भी ‘विधि’ का अर्थ “ब्रह्मा” करते हैं। वे समझते हैं कि ब्रह्मा नामक देवता के हाथ में यह सब बातें हैं। वे जिसे चाहते हैं उसे लाभ, जीवन और यश देते हैं और जिसे चाहते हैं उसे हानि, मरण और अपयश के गर्त में धकेल देते हैं। सोचने की बात है कि देवता दिव्य स्वभाव के होते हैं वे सबको समानता एवं प्रेम की दृष्टि से देखते हैं, उनका कोई स्वार्थ, पक्षपात नहीं। फिर किसी को अच्छी किसी को बुरी परिस्थिति में क्यों डालेंगे? किसी को सुख, किसी को दुख देकर अन्याय के भागी क्यों बनेंगे?

कहा जाता है कि ब्रह्मा जी भले बुरे परिणाम कर्मों के आधार पर देते हैं। अपनी ओर से वे किसी के साथ पक्षपात नहीं करते। तब यह सिद्ध हुआ कि कर्म ही प्रधान है। फल का मूल स्रोत कर्म है। फल देना चाहे ब्रह्मा के हाथ में हो, चाहे विष्णु के हाथ में, पर वह मिलता कर्म के आधार पर ही है। रुपया चाहे बैंक की मारफत भेजा जाय या मनीआर्डर से इस अंतर का कुछ महत्व नहीं। रुपया मिलेगा तभी जब पहले बैंक में या पोस्ट आफिस में जमा कर दिया जाए। बिना जमा किये न तो एक पाई बैंक से मिल सकता है न डाकखाने से। इसी प्रकार ब्रह्मा भी कर्मों के आधार पर ही जो कुछ भला बुरा देना होता है वह देते हैं।

‘विधि’ शब्द का अर्थ केवल ब्रह्मा ही नहीं होता। उस के दूसरे भी अर्थ हैं। तरकीब, रीति, प्रणाली, पद्धति क्रिया आदि के लिए भी ‘विधि’ शब्द का उपयोग होता है। किसी काम को जिस विधि से किया जाता है उसी के आधार पर फल मिलता है। यों करने को तो सभी लोग औंधे-सीधे तरीके से अपने-अपने कामों को करते रहते हैं और उनका सही गलत परिणाम भी निकलता ही रहता है। पर ध्यानपूर्वक देखा जाय तो असफलता और उल्टे परिणाम निकलने के कारणों के मूल में विधि का दोष पाया जाता है। सीधे तरीके से, समयानुकूल परिस्थितियों को देखकर, आगे-पीछे, ऊँच-नीच सोचकर, विवेकयुक्त मार्ग पर अपना कर काम किया जाय तो कुछ अपवादों को छोड़कर प्रायः आशाजनक ही परिणाम निकलता है। इसके विपरीत आवेश में बिना विचारे, देशकाल, परिस्थिति को देखे बिना जो अविवेकपूर्ण कार्य किये जाते हैं उनका परिणाम कुछ अपवादों तथा क्षणिक लाभों के अतिरिक्त सदा बुरा ही होता है।

कर्म स्थूल शब्द है। कर्म करने से फल मिलेगा यह एक मोटी बात हुई। उचित, अनुचित और निरर्थक तीन प्रकार के कर्म होते हैं। इनके परिणाम भी तीन प्रकार के होते हैं। इसलिए वह ‘कर्म करो’ इतना कह देने मात्र से काम नहीं चल सकता। कहना यह होगा कि विधिपूर्वक कर्म करो, सही रीति से, उचित मार्ग से कर्म करो। यदि विधिपूर्वक काम किया गया है तो लाभ, जीवन और यश प्राप्त होगा और अगर अविधिपूर्वक, बेढंगे तरीके से काम किया गया होगा तो हानि, मरण और अपयश मिलेगा। यही विधि का हाथ है। यह सब बातें विधि के हाथ में है। विधि का ऐसा ही महात्म्य है। उसको अपना कर मनुष्य यथेच्छ परिणाम प्राप्त कर सकता है।

विधि का उपयोग करने वाला ‘विधाता’ कहलाता है। यह लोकोक्ति है कि ‘सब कुछ विधाता की मर्जी पर निर्भर है।’ ठीक भी है विधि का उपयोग करने वाला विधाता-जैसी विधि का जैसी भली-बुरी प्रणाली का अवलम्बन करेगा। वैसा ही परिणाम होगा। मनुष्य स्वयं अपना विधाता निर्माता-वह अपने को चाहे जैसा बना सकता है। विधि का उपयोग उसके हाथ में है। विधि और विधाता के रहस्य को यदि लोग भली प्रकार समझलें तो अदृश्य की ओर ताकने की अपेक्षा उन्हें अपने पुरुषार्थ पर निर्भर रहने का सीधा-साधा मार्ग मिल जाय, पर आज तो अधिकाँश लोग पुरुषार्थ की उपेक्षा करके भाग्यवाद के अंधकार में भटक रहे हैं।


पथिक! बढ़े चलो।

(पं. शिवशंकरलाल त्रिपाठी, फतेहपुर)

जीवनोद्देश्य की यात्रा बड़ी लम्बी है। उस पर चलते-चलते अक्सर यात्री के पैरों में थकान आ जाती है। मार्ग में झाड़-झंखाड़ और कंकड़-पत्थर ऐसे आते हैं, जिनकी ठोकरों से आहत होकर पथिक का साहस टूट जाता है वह सोचता है इतना दुर्गम पथ किस प्रकार पार किया जा सकेगा? किस प्रकार इस ऊँची पहाड़ी पर चढ़ा जा सकेगा? एक बार उसका सिर चकरा जाता है और निराशा की ठंडी साँस भर कर हतोत्साह हो जाता है।

ऐसे अवसर पर उन धूमिल पथ-चिह्नों की तलाश करनी चाहिए। जिनसे पूर्व पीढ़ी के उन लोगों का पता चलता है जो उसी की भाँति इस कठिन मार्ग पर चलते हुए जीवनोद्देश्य की मंजिल को पार करने में सफल हुए थे।

ऐसे निराशाजनक अवसर पर उन सिद्धाँतों और आदर्शों का स्मरण करना चाहिए जो आत्मा की अमरता का पाठ पढ़ाते हैं और कर्त्तव्य पथ पर बढ़ते जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। सफलता असफलता का कोई विशेष महत्व नहीं। मंजिल की ओर जितने कदम बढ़ते जाते हैं उतने ही अंशों में सफलता प्राप्त हो चुकी। जो मंजिल शेष रह गई उसको एक विराट कार्य समझना चाहिए। असफलता और कुछ नहीं केवल एक कठोर विश्राम काल है, जिस पर ठहरने के पश्चात दुगने उत्साह से आगे बढ़ने का उपक्रम किया जाता है।

आज कठिनाई है, आज निराशाजनक वातावरण है तो कोई चिन्ता की बात नहीं है। रात्रि का अंधकार सदा नहीं ठहरता। उषा का प्रकाश होना निश्चित है। केवल धैर्य धारण करने और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता होती है। यह कठिनाइयाँ आज नहीं तो कल दूर होकर रहेंगी। आज के काँटे कल फूल बन कर रहेंगे, आज का ग्रीष्म कल पावस की शीतल मन्द सुगंध बनकर रहेगा।

पथिक! चले चलो, रुको मत, कठिनाइयों को देखकर रुको मत, भय मत करो, तुम आत्मा हो, आत्मा के लिए निराशा और असफलता का कोई कारण नहीं। लक्ष्य कितना ही दूर क्यों न हो, मंजिल कितनी ही कठिन क्यों न हो, पर चलते रहने वाले तो ध्येय तक पहुँच ही जाते हैं। आशा और उत्साह, श्रद्धा और विश्वास तुम्हारा संबंध है। पथिक बढ़े चलो, बढ़ना तो प्रत्यक्ष विजय है।


धर्म क्या है और अधर्म क्या है?

(ले.- पं. तुलसीराम शर्मा, उड़िया बाबा का स्थान, वृन्दावन)

धर्माधर्म की परिभाषा -

यतोऽभ्युदय निःश्रेय स सिद्धिः स धर्मः।

(वैशेषिक 1/1/2)

जिस व्यवहार से इस लोक में सुख भोगते हुए परलोक में कल्याण प्राप्त हो वह धर्म है।

यमार्याः क्रियमाणं हि शंसन्त्यागमवेदिनः।

स धर्मोयं विगर्हन्ति तमधर्मप्रचक्षते॥

(कामन्दकीय नीतिसार 6/7)

शास्त्र के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म की बढ़ाई करते हैं वह धर्म है और जिसकी निन्दा करते हैं वह अधर्म है।

आरम्भो न्याययुक्तो यःस हि धर्म इति स्मृतः।

अनाचारस्त्वधर्मेति ह्येतच्छिष्टानुशासनम्॥

(म.भा. वन. 207/77)

न्याय युक्त कार्य धर्म और अन्याय युक्त कार्य अधर्म है। यही श्रेष्ठ पुरुषों का मत है। इत्यादि धर्माधर्म की परिभाषा मिलती है इनसे भी अधिक स्पष्ट सुश्रुत के टीकाकार डल्हणाचार्य ने लिखा है-

धर्मः कायवां मनोभिः सुचरितम्।

(सुश्रुत शरीर स्थान अ. 1/18 पर डल्हणाचार्य कृत टीका)

अर्थात्- मन वाणी शरीर का जो सुँदर व्यवहार वही धर्म है।

मन वाणी शरीर के सुँदर व्यवहार कौन से हैं इसका खुलासा न्याय दर्शन 1/1/2 पर वात्सायम भाष्य में किया है-

अथ शुभाशरीरेण दानं परित्राणं ब्रह्मचर्यंच।

वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्यायं चेति।

मनसादयामस्पृहाँ श्रद्धाँ चेति मेयं धर्माय॥

दान देना, सत्पुरुषों की रक्षा करना, ब्रह्मचर्य से रहना ये शरीर के सुँदर व्यवहार हैं।

सत्य, प्रिय, हितकारी वचन बोलना और अपने धर्म ग्रन्थों का अध्ययन करना ये वाणी के सद्व्यवहार हैं।

दया (दूसरे के दुख दूर करने का यत्न करना) निस्वार्थ दूसरे का अनिष्ट चिन्तन न करना किसी के द्रव्य तथा स्त्री पर मन न चलाना, गुरु व शास्त्र के वचनों पर श्रद्धा रखना। ये मन के सुँदर चरित्र हैं। इसी के अनुकूल भ. गी. (17/14-16) में भी आता है।

अधर्म की परिभाषा देखिए-

अधर्मः कायवांमनसाँदुश्चरितम्।

(सुश्रुत सूत्रस्थान 6/19 पर डल्हणाचार्य कृत टीका)

अर्थात्- मन वाणी शरीर का जो बुरा व्यवहार है वह अधर्म है।

मन वाणी शरीर के बुरे व्यवहार कौन-कौन हैं?

इस पर देखिए-

दोषैः प्रयुक्तशरीरेण प्रवर्तमानोहिंसा स्तेय प्रतिषिद्ध मैथुनान्याचरति वाचाऽतृत पुरुष सूचना सम्बद्धानि मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्साँ नास्तिक्यंचेति सेयंपापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माच।

(न्याय. वात्सायव भाष्य 1।1।2)

हिंसा, चोरी, व्याभिचार ये शारीरिक पाप हैं। मिथ्या, रूखे वचन, चुगल खोरी, व्यर्थ की बातें करना ये वाणी के पाप हैं। दूसरे का अनिष्ट चिन्तन करना, दूसरे के द्रव्य लेने की इच्छा रखना और नास्तिकता (ईश्वर, परलोक तथा धर्म इन पर श्रद्धा न रखना) ये मानसिक पाप हैं।

इन्हीं दस प्रकार के पापों का वर्णन आदि ग्रन्थों में आता है।

साराँश यह है कि दान देना, सत्पुरुषों की रक्षा करना आदि 10 प्रकार के धर्म लक्षण हैं। हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि 10 प्रकार के अधर्म हैं इन्हीं को अनेक शास्त्रकारों ने कर्त्तव्याकर्त्तव्य माना है।


साकार और निराकार की पूजा

(गोस्वामी स्वतंत्रानन्दजी, रतनपुरा)

ईश्वर के दो रूप हैं, साकार और निराकार। जो कुछ इस संसार में इन भौतिक आँखों से दिखाई देता है, यह सब ईश्वर का साकार रूप है। किसी न किसी रूप में हमें ईश्वर के दर्शन होते ही रहते हैं। यह जो कुछ दिखाई पढ़ रहा है, ईश्वर का ही साकार दर्शन समझना चाहिए।

हमें चाहिए कि इसी साकार ईश्वर की पूजा में जनता जनार्दन की सेवा में, इस भौतिक शरीर को अर्पण कर दें। यही साकार ईश्वर की सच्ची पूजा है। यह भौतिक शरीर इसी साकार ईश्वर की अमानत है। हमारा कर्त्तव्य है कि ईश्वर की अमानत ईश्वर को सौंप दें, अन्यथा हम ईश्वर के चोर होंगे। हमें चाहिए कि इस पंच भौतिक शरीर को जनता जनार्दन की सेवा में मिटा दें, तभी हम सच्चे ईश्वर भक्त बन सकेंगे।

इस समस्त संसार में एक ही चैतन्य शक्ति व्याप्त रूप से समाई हुई है, जिसके द्वारा यह सारा संसार चेतन दिखाई देता है, प्रकृति का अणु-अणु उससे प्रेरित होकर कम्पायमान हो रहा है। हमारे अंदर भी वही आत्मा काम कर रही है जो समस्त संसार में। इस आत्मा को जान लेना ही आत्म दर्शन है। आत्म दर्शन ही निराकार ईश्वर की सच्ची पूजा है।

यदि हम निराकार प्रभु के सच्चे भक्त बनना चाहते हैं तो हमें समस्त विश्व में व्याप्त रूप से समाये हुए घट-घट वासी उस प्रभु परमात्मा को सर्वत्र व्यापक ओर सर्वशक्तिमान के रूप में सदैव देखना चाहिए। यदि साकार की उपासना करना रुचिकर हो तो संसार के प्रत्येक प्राणी एवं पदार्थ को सुँदर सुव्यवस्थित एवं सतोगुणी बनाने के लिए आत्म त्याग के साथ सेवापरायण होना चाहिए। ईश्वर को सर्वव्यापी सर्व शक्तिमान समझकर पापों से बचना और लोकहित के लिए अधिक आत्म-त्याग करना यह साकार ओर निराकार की उभय पक्षीय पूजा का संमिश्रण है।

इस प्रकार अपने विचारों और कार्यों को विशुद्ध, सेवामय, ईश्वरमय बना लेने वाला मनुष्य अपने आप को ईश्वर में स्थित समझता है और अपने अंदर ईश्वर की झाँकी करता है। ईश्वर भक्ति केवल ध्यान या जप मात्र से ही नहीं हो सकती, उसके लिए आचरण का समन्वय भी होना चाहिए। जिसका जीवन ईश्वरमय है। वही सच्चा ईश्वर भक्त है और उसे ही अपनी अन्तरात्मा में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के महातत्व का दर्शन होता है। सेवा सदाचार, प्रेम, श्रद्धा और संयम की पाँच विभूतियाँ जिसके अन्तःकरण में मौजूद हैं वह ईश्वर प्राप्ति से किसी भी प्रकार वंचित नहीं रह सकता।


Quotation

अपनी संपत्ति के सिवाय और किसी को न देखने वाला कंजूस अंधा होता है। अपने अन्त को न देखकर अपने आरंभ को ही देखने वाला अपव्ययी व्यक्ति अंधा होता है। दूसरे लोगों को रिझाने वाली स्त्री अपनी झुर्रियाँ भी नहीं देख पाती, अंधी है। अपना अज्ञान न देखने वाला विद्वान अंधा होता है। चोर को न देख सकने वाला ईमानदार अंधा है। उसी प्रकार परमात्मा को न देखने वाला चोर अंधा है।

- विक्टर ह्युगो

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तुम जो चाहो अपने को वही बना सकते हो श्रेष्ठ या नीच, पवित्र या पापी, चतुर या मूर्ख। अपने आपको बनाने वाले तुम स्वयं ही हो। अपनी जीवन रेखा को तुम स्वयं ही लिखते हो।

-डॉ. एनीबेसेन्ट


गायत्री सूक्ष्म शक्तियों का स्रोत है।

एक, अव्यय, निर्विकार, अजर, अमर पर आत्मा को ‘एक से अधिक’ हो जाने की इच्छा हुई। ब्रह्म में स्फुरण हुआ कि “एकोऽहं बहुस्यामं’ मैं अकेला हूँ, बहुत हो जाऊँ। उसकी यह इच्छा ही शक्ति बन गई। इस इच्छा, स्फुरणा या शक्ति को ही ब्रह्म पत्नी कहते हैं। इस प्रकार ब्रह्म एक से दो हो गया। अब उसे लक्ष्मीनारायण, सीताराम, राधेश्याम, उमामहेश, शक्तिशिव, मायाब्रह्म, प्रकृति परमेश्वर आदि नामों से पुकारने लगे।

इस शक्ति के द्वारा अनेक पदार्थों तथा प्राणियों का निर्माण होना था, इसलिए उसे भी तीन भागों में अपने को विभाजित कर देना पड़ा ताकि अनेक प्रकार के संमिश्रण तैयार हो सकें और विविध गुण, कर्म, स्वभाव वाले जड़ चेतन पदार्थ बन सकें। ब्रह्म शक्ति के यह तीन टुकड़े (1) सत् (2) रज (3) तम। इन तीन नामों से पुकारे जाते हैं। सत् का अर्थ है- ईश्वर दिव्य तत्व। तम का अर्थ है- निर्जीव पदार्थों में परमाणुओं का अस्तित्व। रज का अर्थ है- जड़ पदार्थों और ईश्वरीय दिव्य तत्व के संमिश्रण से उत्पन्न हुई, आनन्ददायक चैतन्यता। यह तीन तत्व स्थूल सृष्टि के मूल कारण हैं। इनके उपरान्त स्थूल उत्पादन के रूप में मिट्टी, पानी, हवा अग्नि, आकाश ये पाँच स्थूल तत्व और उत्पन्न होते हैं। इन तत्वों के परमाणुओं तथा उनकी शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श तन्मात्राओं द्वारा दृश्य सृष्टि का सारा कार्य चलता है। प्रकृति के दो भाग हैं। सूक्ष्म प्रकृति जो शक्ति प्रवाह के रूप में प्राण संचार के रूप में काम करती है। वह सत्-रज-तममयी है। स्थूल प्रकृति जिस से दृश्य पदार्थों का निर्माण एवं उपयोग होता है। परमाणुमयी है वह मिट्टी, पानी, हवा आदि स्थूल पंच तत्वों के आधार पर अपनी गतिविधि जारी रखती है।

उपरोक्त पंक्तियों से पाठक समझ गये होंगे कि पहले एक ब्रह्म या उसकी स्फुरणा से आदिशक्ति का आविर्भाव हुआ। इस आदि शक्ति का नाम ही ‘गायत्री है। जैसे ब्रह्म ने अपने दो भाग कर लिए थे वैसे ही आदि शक्ति गायत्री ने अपने तीन भाग कर लिये। (1) सत्- जिसे ‘ह्रीं’ या सरस्वती कहते हैं (2) रज- जिसे ‘श्रीं’ या लक्ष्मी कहते हैं (3) तम- जिसे ‘क्लीं’ या काली कहते हैं। वस्तुतः सत् और तम दो ही विभाग हुए थे। इन दोनों के मिलन से जो धारा उत्पन्न हुई वह रज कहलाई। जैसे गंगा जमुना दोनों जहाँ मिलती हैं वहाँ उनकी मिश्रित धारा को सरस्वती कहते हैं। सरस्वती वैसे कोई पृथक नदी नहीं है। जैसे दो नदियों के मिलन से त्रिवेणी बन गई वैसे ही सत् और तम के मिलन से रज उत्पन्न हुआ और यह विद्या प्रकृति कहलाई।

अद्वैतवाद, द्वैतवाद, त्रैतवाद का बहुत झगड़ा सुना जाता है। वस्तुतः वह समझने का अंतर मात्र है। ब्रह्म, जीव प्रकृति यह तीनों ही अस्तित्व में हैं। पहले एक ब्रह्म था यह ठीक है इसलिए अद्वैतवाद भी ठीक है पीछे ब्रह्म और शक्ति (प्रकृति) हो गए इसलिए द्वैतवाद भी ठीक है। प्रकृति और परमेश्वर के संस्पर्श से भी रसानुभूति और चैतन्यता मिश्रित रज सत्ता उत्पन्न हुई वह जीत कहलाई। इस प्रकार ईश्वर प्रकृति, तीनों का अस्तित्व मानना भी ठीक है इस प्रकार त्रैतवाद भी ठीक है। मुक्ति होने पर जीव सत्ता नष्ट हो जाती है। इस से भी स्पष्ट है कि जीवधारी की जो वर्तमान सत्ता मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के ऊपर आधारित है एक मिश्रण है मात्र है।

तत्वदर्शन के गंभीर विषय में प्रवेश करके आत्मा के सूक्ष्म विषयों पर प्रकाश डालने का यहाँ अवसर नहीं है। इन पंक्तियों में तो स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति का भेद बताना था। क्योंकि विज्ञान के दो विभाग यहीं से होते हैं, मनुष्यों को द्विधा प्रकृति यहीं से बनती है। पंच तत्वों द्वारा काम करने वाली स्थूल प्रकृति का अन्वेषण करने वाले मनुष्य भौतिक विज्ञानी कहलाते हैं। उन्होंने अपने बुद्धि बल से पंच तत्वों के भेद उपभेदों को जानकर उनसे लाभ उठाने की अनेकों परिपाटियाँ ढूँढ़ निकालीं और उनसे अनेक लाभदायक साधन प्राप्त किये। रसायन, कृषि-विद्युत, शिल्प, संगीत, भाषा, साहित्य, वाहन, गृह-निर्माण, चिकित्सा, शासन, खगोलविद्या अस्त्र-शस्त्र, दर्शन, भू-परिशोध आदि अनेक प्रकार के सुख साधन खोज निकाले और रेल, मोटर, तार, डाक, रेडियो, टेलीविजन, फोटो, घड़ी तथा विविध वस्तुएं बनाने के बड़े-बड़े यंत्र निर्माण किये। धन, सुख, सुविधा और आराम के साधन सुलभ हुए। इस मार्ग से जो लाभ मिलता है उसे शास्त्रीय भाषा में ‘प्रेम’ या भोग कहते हैं। यह विज्ञान भौतिक विज्ञान कहलाता है? यह स्थूल प्रकृति के उपयोग की विद्या है।

सूक्ष्म प्रकृति की वह जो आद्यशक्ति गायत्री से उत्पन्न होकर सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा में बंटती हैं। यह सर्वव्यापिनी शक्ति निर्झरियाँ पंच तत्वों से कहीं अधिक सूक्ष्म हैं। जैसे नदियों के प्रवाह में जल की लहरों का वायु में आघात होने के कारण ‘कल-कल’ से मिलती- जुलती ध्वनियाँ उठा करती हैं वैसे ही सूक्ष्म प्रकृति की तीन शक्ति धाराओं में तीन प्रकार की शब्द ध्वनियाँ उठती हैं। सत् प्रवाह में ह्रीं, रज प्रवाह में श्रीं और तम प्रवाह में क्लीं शब्द से मिलती जुलती-ध्वनि उत्पन्न होती है। उससे भी सूक्ष्म ब्रह्म का ॐकार ध्वनि प्रवाह है। नाद योग की साधना करने वाले ध्यान मग्न होकर इन ध्वनियों को पकड़ते हैं और उन का सहारा पकड़ते हुए सूक्ष्म प्रकृति को भी पार करते हुए ब्रह्म सायुज्य तक जा पहुँचते हैं। यह योग साधना पथ किसी उपयुक्त अवसर पर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जायेगा।

प्राचीन काल में हमारे पूजनीय पूर्वजों ने ‘ऋषि-मुनियों’ ने अपनी सुतीक्ष्ण दृष्टि से निजात के सूक्ष्म तत्व को पकड़ा था, उसी की शोध और सफलता में अपनी शक्तियों को लगाया था। फलस्वरूप वे वर्तमान काल के यशस्वी भौतिक विज्ञान की अपेक्षा अनेक गुने लाभों से लाभाँवित होने में समर्थ हुए थे। वे आद्य शक्ति के सूक्ष्म शक्ति प्रवाहों पर अपना अधिकार स्थापित करते थे। यह प्रकट तथ्य है कि मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार की सूक्ष्म विद्युत शक्तियों के केन्द्र हैं। जिन्हें जागृत करने से अनेक प्रकार की शक्तियों का आविर्भाव होता है। हमारे ऋषिगण योग साधना द्वारा शरीर के विविध भागों में छिपे पड़े हुए शक्ति केन्द्रों को, चक्रों को, ग्रन्थियों को, मातृकाओं को, ज्योतियों को, भ्रमरों को जगाते थे और उस जागरण से जो शक्ति प्रवाह उत्पन्न होता था, उसे आद्य शक्ति के त्रिविध प्रवाहों में से जिसके साथ आवश्यकता होती थी उसके साथ संबंधित कर देते थे। जैसे किसी रेडियो स्टेशन के ट्रान्समीटर यंत्र का किसी दूसरे रेडियो स्टेशन के ध्वनिक्षेपक यंत्र से संबंध स्थापित कर दिया जाता है, दोनों की विद्युत शक्तियाँ सम श्रेणी की होने के कारण आपस में संबंधित हो जाती हैं तो उन स्टेशनों के बीच आपसी वार्तालाप का, संवादों का आदान-प्रदान का सिलसिला चल पड़ता है। इसी प्रकार साधना द्वारा शरीर के अंतर्गत छिपे हुए और तन्द्रित पड़े हुए केन्द्रों का जागरण करके सूक्ष्म प्रकृति के शक्ति प्रवाहों से संबंध स्थापित हो जाता है तो मनुष्य और आद्य शक्ति आपस में संबंधित हो जाते हैं, इस संबंध के कारण मनुष्य उस आद्य शक्ति के गर्भ में भरे हुए रहस्यों को समझने लगता है और अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करके लाभाँवित हो सकता है। चूँकि संसार में जो कुछ है वह सब उस आद्यशक्ति के भीतर है इसलिए वह संबंधित व्यक्ति भी संसार के सब पदार्थों और साधनों से अपना संबंध स्थापित कर सकता है। वर्तमान काल के वैज्ञानिक पंच तत्वों की सीमा तक सीमित स्थूल प्रकृति के साथ, उसके परमाणुओं के साथ संबंध स्थापित करने के लिए बड़ी-बड़ी कीमती मशीनों का, विद्युत, वाष्प, गैस, पेट्रोल आदि का प्रयोग करके कुछ आविष्कार करते हैं और थोड़ा सा लाभ उठाते हैं। यह तरीका बड़ा श्रम साध्य कष्ट साध्य, धर्म साध्य और समय साध्य है। उसमें खराबी, टूट-फूट और परिवर्तन की खटखट भी आए दिन लगी रहती है। उन यंत्रों की स्थापना, सुरक्षा और निर्माण के लिए हर समय काम जारी रखना पड़ता है तथा उनका स्थान परिवर्तन तो और भी कठिन होता है। यह सब झंझट भारतीय योग विज्ञान के विज्ञान वेत्ताओं के सामने नहीं थे। वे बिना किसी यंत्र की सहायता के तथा बिना संचालक, विद्युत, पेट्रोल आदि के केवल अपने शरीर के शक्ति केन्द्रों का संबंध सूक्ष्म प्रकृति से संबंध स्थापित करके ऐसे ऐसे आश्चर्यजनक कार्य कर लेते थे, जिनकी संभावना तक को आज के भौतिक विज्ञानी समझने में समर्थ नहीं हो पा रहे हैं।

महाभारत और लंका युद्ध में जो अस्त्र-शस्त्र व्यवहृत हुए थे उनमें से बहुत थोड़ों का धुँधला रूप अभी सामने आया है। रेडार, गैस, बम, अश्रु बम, रोग कीटाणु बम, परमाणु बम, मृत्यु किरण आदि का धुँधला चित्र अभी तैयार हो पाया है। प्राचीन काल में मोहन शास्त्र, ब्रह्मपाश, नागपाश, वरुणास्त्र, आग्नेय बाण, शत्रु को मार कर तरकश में लौट आने वाले बाण आदि व्यवहृत होते थे। शब्द बेध का प्रचलन था। ऐसे अस्त्र शस्त्र किन्हीं कीमती मशीनों से उसे मंत्र बल से चलाए जाते थे। मंत्र बल से ‘कृत्या’ या ‘घात’ चलाई जाती थी जो शत्रु को जहाँ भी वह छिपा हो ढूँढ़कर उसका संहार करती थी। लंका में बैठा हुआ रावण और अमेरिका में बैठा हुआ अहिरावण आपस में भली प्रकार वार्त्तालाप करते थे। उन्हें किसी रेडियो यंत्र या ट्रान्समीटर की जरूरत न थी। विमान बिना पेट्रोल के उड़ते थे।

अष्ट सिद्धि और नव निद्धियों का योग शास्त्रों में जगह-जगह पर वर्णन है। अग्नि में प्रवेश करना, जल पर चलन, वायु के समान तेज दौड़ना, अदृश्य हो जाना, मनुष्य से पशु पक्षी और पशु पक्षी से मनुष्य का शरीर बदल लेना, शरीर को बहुत छोटा या बड़ा, बहुत हल्का या भारी बना लेना, शाप से अनिष्ट उत्पन्न कर देना, वरदान से उत्तम लाभों की प्राप्ति, मृत्यु को रोक लेना, पुत्रेष्टि यज्ञ, भविष्य का ज्ञान, दूसरों के अंतर की पहचान, क्षण-भर में यथेष्ट धन, ऋतु, नगर, जीव जन्तु, गण, दानव आदि उत्पन्न कर लेना, समस्त ब्रह्माण्ड की हलचलों से परिचित होना, किसी वस्तु का रूपांतर कर देना, भूख, प्यास, नींद, सर्दी, गर्मी पर विजय, आकाश में उड़ना आदि अनेकों आश्चर्य भरे कार्य केवल मंत्र बल से, योग शक्ति से, अध्यात्म विज्ञान से होते थे, और उस वैज्ञानिक, प्रयोजन के लिए किसी प्रकार की मशीन, पेट्रोल, बिजली आदि की जरूरत न पड़ती थी, यह कार्य शारीरिक विद्युत और प्रकृति के सूक्ष्म प्रवाह का संबंध स्थापित कर लेने पर बड़ी आसानी से हो जाते थे। यह भारतीय विज्ञान था जिसका आधार था- साधना।

साधना द्वारा केवल तम तत्व से संबंध रखने वाले उपरोक्त प्रकार के भौतिक चमत्कार ही नहीं होते वरन् रज और सत् क्षेत्र के लाभ एवं आनन्द भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त किये जा सकते हैं। हानि, शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विपन्न परिस्थितियों में पड़कर जहाँ साधारण मनो-भूमि के मृत्यु तुल्य मानसिक कष्ट पाते हैं वहाँ आत्म शक्तियों के उपयोग की विद्या जानने वाला व्यक्ति विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हंसते-हंसते आसानी से काट लेता है। और बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी अपने आनंद को बढ़ाने का मार्ग ढूँढ़ निकालता है। वह जीवन को इतनी, मस्ती प्रफुल्लता और मजेदारी के साथ बिताता है जैसी कि बेचारे करोड़पतियों को भी कभी नसीब नहीं हो सकती। जिसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आत्मबल के कारण ठीक बना हुआ है उसे बड़े-बड़े अमीरों से भी अधिक आनन्दमय जीवन बिताने का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है। रज शक्ति का उपयोग जानने का यह लाभ, भौतिक विज्ञान द्वारा मिलने वाले लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

‘सत्’ तत्व के लाभों का वर्णन करना तो लेखनी और वाणी दोनों की ही शक्ति से बाहर है। ईश्वरीय दिव्य तत्वों की जब आत्मा में वृद्धि होती है तो दया, करुणा, प्रेम, मैत्री, त्याग, संतोष, शाँति, सेवाभाव, आत्मीयता, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, संयम, नम्रता, पवित्रता, श्रमशीलता, धर्म परायणता आदि सद्गुणों की मात्रा दिन-दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप संसार में उसके लिए प्रशंसा, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, श्रद्धा, सहायता, सम्मान के भाव बढ़ते हैं और उसे प्रत्युपकार से संतुष्ट करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त यह सद्गुण स्वयं इतने मधुर हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहीं आत्म संतोष की शीतल निर्झरिणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग चाहे जीवित अवस्था में हों चाहे मृत अवस्था में उन्हें जीवन मुक्ति, स्वर्ग, परमानन्द-ब्रह्मानंद, आत्म दर्शन प्रभु प्राप्ति, ब्रह्म निर्वाण, तुरीयावस्था, निर्विकल्प समाधि का सुख प्राप्त होता रहता है। यही तो जीवनलक्ष्य है। इसे पाकर आत्मा परमतृप्ति के आनन्द सागर में निमग्न हो जाती है।

आत्मिक, मानसिक और सांसारिक तीनों ही प्रकार के सुख साधन, आद्य शक्ति गायत्री की सत्, रज, तममयी धाराओं तक पहुँचाने वाला साधक सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। सरस्वती, लक्ष्मी और काली की सिद्धियाँ पृथक भी की जाती हैं। पाश्चात्य देशों के भौतिक विज्ञानी ‘क्लीं’ तत्व का काली शक्ति का अन्वेषण आराधन करने में निमग्न हैं। बुद्धिजीवी, धर्मप्रचारक, सुधारवादी, गाँधीवादी, समाजसेवी, व्यापारी, श्रमिक, उद्योगी, समाजवादी, कम्युनिस्ट यह ‘श्रीं’ शक्ति की सुव्यवस्था में लक्ष्मी के आयोजन में लगे हुए हैं। योगी, ब्रह्मवेत्ता, अध्यात्मवादी, तत्वदर्शी, भक्त, दार्शनिक, परमार्थी व्यक्ति ‘ह्रीं’ तत्व की सरस्वती की आराधना कर रहे हैं। यह तीनों ही वर्ग गायत्री की आद्या शक्ति के एक-एक चरण के उपासक हैं। गायत्री को ‘त्रिपदी’ कहा है। उसके तीन चरण हैं। यह त्रिवेणी उपरोक्त तीनों ही प्रयोजनों को पूरा करने वाली है। माता बालक के सभी काम करती है, आवश्यकतानुसार वह उसके लिए मेहतर का, रसोई का, कहार का, दाई का, घोड़े का, दाता का, दर्जी का, धोबी का, चौकीदार का काम करती है, वैसे ही जो लोग आत्म शक्ति को आद्य शक्ति के साथ जोड़ने की विद्या को जानते हैं, अपने को सुसंतति सिद्ध करते हैं वे गायत्री रूपी सर्वशक्तिमान माता से यथेच्छ लाभ प्राप्त कर लेते हैं।

संसार में दुखों के तीन कारण हैं (1) अज्ञान (2) अशक्ति (3) अभाव। इन तीनों दुखों को गायत्री की सूक्ष्म प्रकृति की तीनों धाराओं के सदुपयोग से मिटाया जा सकता है। ‘ह्रीं’ अज्ञान को, भी अभाव को भी, अशक्ति को दूर करती है। भारतीय सूक्ष्म विद्या विशेषज्ञों ने सूक्ष्म प्रकृति पर अधिकार करके अभीष्ट आनन्द प्राप्त करने के लिए विज्ञान का आविष्कार किया था, वह दृष्टियों से असाधारण और महान है। उस आविष्कार का नाम है- साधना। साधना से सिद्धि मिलती है। गायत्री साधना भी अनेक सिद्धियों की जननी है।


प्रयाण की बेला में

(कुँवर हरिश्चन्द्र देव वर्मा ‘चातक’)

(1)

चलना है तो चल रे भाई! चलना है तो चल!

कितने दिवस मूँदकर आँखें चले गये चुपचाप।

कितनी रातें गई शेष इसकी क्या है कुछ छाप?

तू ही एक पड़ा सोता है अब भी हाय! सँभल!

चलना है तो चल रे भाई! चलना है तो चल!

(2)

अपनी धुन में मस्त किसी की सुनती हैं कब बात।

चलती ही जाती हैं लहरें, चलना है दिन रात।

मार थपेड़े तट से कहतीं “तू क्यों पड़ा अचल”

चलना है तो चल रे प्यारे! चलना हे तो चल!

(3)

नन्हीं सी बालिका सुरभि को जाना है उस देश।

चिन्तित सुमन पवन बोला यों करते हुये प्रवेश॥

‘मैं चलता हूँ साथ चले वह, चिंता है निष्फल’

चलना है तो चल रे! झटपट चलना है तो चल!

(4)

नभ का पथिक बढ़ाता जल्दी-जल्दी अपने पैर।

कहीं किसी से मिल कर उसको भी करनी है सैर।

उसको जाते देख घरों को पंछी चले विकल।

चलना है तो चल रे भाई! चलना है तो चल!

(5)

यह जो रूप रंग की चलती फिरती सी तस्वीर।

जिसे देख करके पैरों में पड़ जाती जंजीर॥

चला जा रहा रूप रंग यह उसका भी प्रतिफल।

चलना है तो चल रे प्यारे! चलना है तो चल॥

(6)

जब सब अपने घर जाते हैं तब तू भी घर ध्यान।

अपने घर को चल दे प्यारे! मत हो अब हैरान॥

कहीं हाथ से तेरे भी यह समय न जाय निकल।

चलना है तो चल झटपट! चलना है तो चल!

-कर्मयोग

*समाप्त*