यह सम्बंध अटूट

तू मेरा है, मैं तेरा हूँ,-यह सम्बंध अटूट।

सत्य यही इतना इस जग में, और-और सब झूठ!

हम पहले तो एक साथ थे, कितना अपनापन था!

मन की बात कहूँ क्या, तब तो एक हमारा तन था!!

तूने ही कौतुकवश मुझको प्रथम-प्रथम बिलगाया,

दो होकर मिलने के सुख का अद्भुत लोभ दिखाया।

खेल-खेल में तू प्रकाश बनता, बनता मैं छाया,

ब्रह्म नाम तूने अपनाया, मैं कहलाया माया!

पर वह तो था खेल, खेल में रहती इतनी छूट!

सत्य छिपाने से छिप सकता, लाख कहे जो झूठ?

बीत गया दिन अलग-विलग रह, अब रजनी की बारी,

जाने क्यों दृग भर-भर आते, मन लगता है भारी!

एक भाव फिर-फिर आता है,-सोच-सोच पछताता,

नाम-रूप-परिवर्तन उस छन मुझे तनिक चौंकाता!

किन्तु दूसरी स्निग्ध भावना करती है तल शीतल,

एकरूपता मलिन सिद्धि, मन-मिलन-साधना निर्मल।

सिद्धि लुटे, पर कहीं साधना की भी मचती लूट?

शाश्वत सत्य यही इतना और सब क्षणभंगुर, झूठ!


जीवन क्या है?

(श्री स्वामी सत्यभक्तजी वर्धा)

जीवन एक संग्राम है।

जैसे संग्राम में थोड़ी सी असावधानी घातक होती है उसी प्रकार जीवन में भी, थोड़ी सी भी असावधानी घातक होती है।

संग्राम में जैसे बहादुरी की आवश्यकता है उसी प्रकार जीवन में भी बहादुरी की आवश्यकता है।

संग्राम में जैसे विपक्षी धोखा देने की कोशिश करता है उसी प्रकार दुनिया में भी लोग धोखा देने की कोशिश करते हैं। इसलिए संग्राम में और जीवन में चौकन्ना रहने की जरूरत है।

संग्राम में जैसे संगठन और अनुशासन जरूरी है उसी प्रकार जीवन में भी संगठन और अनुशासन बहुत जरूरी है।

इन या ऐसी ही बातों के कारण जीवन संग्राम है पर जीवन की संग्रामता का यह मतलब नहीं है, कि यह मनुष्य मनुष्य का युद्ध है, वास्तव में यह मनुष्य और शैतान का युद्ध है।

जीवन एक कला है।

जैसे कलाकार थोड़ी ही सामग्री से वस्तु को सुन्दर स्वादिष्ट बना लेता है उसी प्रकार जीवन के कलाकार थोड़ी-सी ही सामग्री से जीवन को सुन्दर सफल बना लेते हैं। सफल जीवन के नाम से जिनकी ख्याति हुई है उनके जीवन में महत्ता जितनी थी कला उससे कम न थी।

बहुत-से प्राणी मोह और अहंकार के वश में होकर जीवनभर और दिन-रात कष्ट उठाते हैं सर्वस्व लगा देते हैं फिर भी सफल नहीं हो पाते यह कलाहीनता की निशानी है।

जीवन एक यात्रा है।

यह यात्रा सत्य की राह में पिछली मंजिल से आगे की मंजिल तक ले जाती है। हो सकता है कि यही अंतिम मंजिल हो, हो सकता है कि और भी मंजिलें बाकी हों पर यात्री तो आगे ही बढ़ता है।

पापी लोग बड़े अभागी हैं वे इस यात्रा में पीछे की ओर दौड़ते हैं, और इस बुरी तरह से दौड़ते हैं कि उनका जीवन खाई-खंदक में ही चिरकाल के लिये समा जाता है।

इस यात्रा में संकट तो हैं ही, पर संकट से ज्यादा प्रलोभन हैं। सच्चा यात्री न तो संकटों से डरता है न प्रलोभनों के चक्कर में पड़ता है।

स्नान के लिए निर्मल सरोवर की ओर जाने वाला आदमी अगर रास्ते की गटर में स्नान करने लगे, तो उसकी जो दुर्दशा होगी वही दुर्दशा उस जीवन-यात्री की होती है, जो प्रलोभनों में फंस जाता है।

जीवन यात्री दुनिया की चीजों को उसी नजर से देखता है जैसे एक मुसाफिर खाने को मुसाफिर। मुसाफिर को मुसाफिरखाने ही मिल सकते हैं घर मिल जाय तो यात्रा पूरी हो जाय वह मुसाफिर ही न रहे। वे मूर्ख हैं जो मुसाफिरखाने को ही घर समझ बैठते हैं।

हो सकता है कि तुम्हें यात्रा करते-करते इन आँखों से घर न दिखे फिर भी तुम्हें उसी की आशा में उसी की ओर चलना है। उस घर का नाम सत्य-लोक, बैकुण्ठ, मोक्ष, बहिश्त, स्वर्ग, निर्वाण आदि कुछ भी हो सकता है या अज्ञात या अनिर्वचनीय भी रह सकता है।

जीवन एक खेल है।

खेल जय-पराजय के लिए नहीं खेला जाता प्रसन्नता के लिए खेला जाता है, जीवन भी प्रसन्नता के लिए है इसमें हार-जीत का कोई सवाल नहीं है।

खिलाड़ी लड़ते हैं पर प्रेम नहीं तोड़ते, जीवन में लड़ो-पर प्रेम न तोड़ो।

खेल में बेईमानी करने से जो कुछ मिलता है उससे कई गुणा गुम जाता है। खेल का प्राण ही निकल जाता है जीवन में भी यही बात है।

जो जीवन को खेल समझ सकते हैं वे ही मुक्त हैं।

जीवन एक नाटक है।

नाटक के पात्र की महत्ता राजा या रंक बनने में नहीं है। किन्तु जो कुछ बनाया जाय उसका खेल अच्छी तरह कर दिखाने में है। जीवन की महत्ता कुलीनता वैभव उच्च पद आदि में नहीं है परन्तु कर्त्तव्य का खेल अच्छी तरह कर दिखाने में है।

नाटक का खिलाड़ी न विलासी बनता है न कष्ट भोगता है सिर्फ विलास या कष्ट का प्रदर्शन करता है। इसी तरह जीवन के नाटक में भी परा मनोवृत्ति को अक्षुब्ध रखना चाहिए।

जीवन एक लहर है।

जैसे लहर पिछली लहर से पैदा होकर अगली लहर को पैदा करती है उसी प्रकार जीवन भी पिछले जीवन से पैदा होकर अगले जीवन को पैदा करता है।

लहर के समान जीवन भी क्षणिक है, उस पर इतराना वृथा है।

जीवन एक बुदबुदा है।

जैसे बुदबुदे के स्थिर रहने में ही आश्चर्य है उसके फूटने में नहीं, उसी प्रकार जीवन के टिकने में ही आश्चर्य है मिटने में नहीं।

आश्चर्य यह नहीं कि मौत क्यों आती है? आश्चर्य यह है कि मौत के हजारों रूपों से दिन रात घिरा रहने पर भी यह इतने दिन तक टिका कैसा रहता है।

जीवन एक विश्व है।

क्योंकि स्वर्ग और नरक, ईश्वर और शैतान सब इसी में हैं।

भावना या मन इसी के भीतर रहकर भूत, भविष्य, वर्तमान, ऊर्ध्व, मध्य, पाताल देखता है।

जीवन के ज्ञान लेने से ही मनुष्य सर्वज्ञ या विश्रुत बन जाता है।


अपनी उत्तम कल्पनाओं को चरितार्थ कीजिए।

एक तत्ववेत्ता ने कहा था कि हर व्यक्ति काम करने के पहले हवाई किले ही बनाता है। दूसरे शब्दों में पहले पहले किले हवा में ही बनाये जाते हैं। मनुष्य कुछ भी करने के पहले सोचता है, विचारता है, कल्पना करता है और अपने कार्य की रूप रेखा तैयार करता है। क्या है यह सब कुछ, हवाई किला ही न? यदि वह अपनी इन कल्पनाओं पर न चले, अपनी बनाई हुई रूप रेखा, योजना को काम में न लाये, आकार न दे, रंग न भरे तो क्या उसे हम हवाई किला न कहेंगे। इसीलिए उस तत्ववेत्ता ने फिर कहा- ‘हमने जो किले हवा में तैयार किये हैं, हमारा काम है कि हम उनमें मिट्टी की नींव रखें। उनका आधार मजबूत कर दें। अथवा तन्मय होकर उन्हें आकार देने में लग जावें।’

संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है उसके बनने के पहले निश्चय ही वे सब पहले कर्त्ता की कल्पना में रहे होंगे। उसने कल्पना की बड़ी-बड़ी उड़ान मारी होंगी, पर क्या वे सिर्फ उड़ान मार कर ही रह गये? नहीं, यदि ऐसा होता तो शायद हमारा अस्तित्व भी इस दुनिया में न होता। उन्होंने उड़ान मारी, कल्पना को आकार दिया, रूप दिया, रंग दिया और पीछे से उन्होंने उसमें जीवन भी भर दिया।

जिधर दृष्टि डालिये, प्रत्येक में कल्पना का ही निवास मिलेगा। इसलिए कल्पना करना व्यर्थ नहीं है, बल्कि कल्पना करना जीवन की निशानी है, बशर्ते कि तुम्हारी कल्पनाओं में तुम्हारे जीवन का प्राण भरा हो। निष्प्राण कल्पना जीवनी शक्ति को बढ़ाती नहीं, बल्कि नष्ट कर देती है, मनुष्य को निष्प्राण बना देती है। इसलिए हमें सजीव कल्पना-सप्राण कल्पना करना आना चाहिए।

‘मनुष्य’ नाम की इस बड़ी भारी मशीनरी में चारों ओर प्राण ही प्राण भरा हुआ है। चारों ओर जीवन ही जीवन लहरें ले रहा है और वही तो कल्पना के रूप में बाहर निकल कर अपने अनेक रूप, आकृति, प्रकृति बनाना चाहता है। वह अपने जीवन को, अपनी सत्ता को, अपनी चेतना को चारों ओर बखेर देना चाहता है, इसीलिए तो कल्पना करता है। लेकिन उसकी सीमा कल्पना तक ही जब रह जाती है और अपनी आत्मा को, प्राण को उसमें नहीं रहने दे पाता तब वह निस्तेज हो जाता है। इसलिए तेजस्वी बनना हो तो जो कुछ तुम चाहते हो, जो भी तुमने अपने मन में सोच रखा है और जैसे भी तुमने अपने हवाई किले का ढांचा तैयार किया हो, उसे इस पृथ्वी पर उतार लाने के लिए दृढ़ संकल्प हो जाओ। जब तुम कल्पना कर सकते हो तो कौन सी शक्ति ऐसी है जो उसके पृथ्वी पर उतरने में बाधा डाले?

जानते हो, जब किसी कल्पना के आकार धारण करने में बाधा पड़ती है तो वह बाधा क्या होती है हमारी निराशा, हमारा अपने आप पर का अविश्वास, हमारी दृढ़ता की कमी, हमारा प्रसाद, हमारी चंचलता। ये ही वे तत्व हैं जो कि हमारे सामने बाधाओं के रूप में आकार धारण किए हुए दर्शन देते हैं और हम अपनी इन कमजोरियों को बाहर की चीज जानकर डर जाते हैं। इस तरह क्रमशः कल्पनाओं पर कल्पनाएं करते और उन्हें बिना पृथ्वी पर उतारे छोड़ते चले जाते हैं। हमारी कमजोरियाँ कहें या हमारी अज्ञानता फिर धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं, और हम अपनी शक्ति को, अपनी प्रवृत्ति को छोड़ते जाते, भूलते जाते हैं और तब निर्जीव से हो जाते हैं। तब जीते हुए भी मृतक के समान दिखाई देते हैं।

निष्क्रिय जीवन क्या जीवन है? बिजली से भरी हुई बैटरी या डायनेमो आदि उपयोग में नहीं आता तो उससे क्या लाभ? प्रत्येक मनुष्य एक डायनेमो है। उसमें अपरिमित शक्ति भरी हुई है। वे शक्तियाँ नित्य प्रति प्रकट होने के लिए आकुल हो रही हैं। वे बन्द नहीं रहना चाहतीं वरन् सक्रिय होना और आकार वान बनना चाहती है इसीलिए सबसे पहले वे कल्पना की शक्ल अख़्तियार करती हैं। प्रत्येक कल्पना अपनी पूरी शक्ति के साथ हवा में उड़ती है परन्तु मनुष्य प्रमाद वश कल्पना में रहने वाली शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है, वह क्षण-क्षण में कल्पनायें बदलता और नई कल्पना को जन्म देता है, इसलिए वह सिर्फ कल्पनामय ही हो जाता है। साकार बनने की नौबत ही नहीं आती। इसलिए आवश्यक यह है कि जिस समय एक कल्पना उठे तो जब तक काफी मनोयोग से उस पर विचार नहीं कर लिया जाय, तब तक दूसरी विचार कल्पना को नहीं उठने दें। और अपनी सारी शक्ति अपनी पहली कल्पना को आकार देने में लगा दें। अपनी सारी शक्ति लगा दें। यह सिर्फ व्यक्त करने की भाषा है। शक्ति लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। कल्पना तो स्वयं शक्ति भरी रहती है, बस उस शक्ति को उससे भिन्न न होने दें इतना ही काम तो करना है। इस प्रकार कल्पना को आकार देने के लिए कल्पना के प्रति तन्मय होने की आवश्यकता है।

दृढ़ विश्वास रखो कि आत्मा अपरिमित शक्ति सम्पन्न है और वही अपने आपको प्रकट होने के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ शुभ कल्पना का रूप धारण करती है। इसलिए प्रत्येक शुभ कल्पना में आकार धारण करने की पूर्ण शक्ति होती है।


मनुष्य का जन्म किसलिए?

(जोसेफ मेजिनी)

पृथ्वी पापों का प्रायश्चित करने के लिए कुछ दिन विश्राम करने की जगह नहीं है। यह वह घर है, जिसमें रहकर हमें सत्य, न्याय और दया के उस अंकुर को परिपुष्ट करना चाहिए, जिसका बीज प्रत्येक मनुष्य के हृदय क्षेत्र में बोया गया है। यह पूर्णता के उस शिखर पर पहुँचने की सीढ़ी है जिसको हम तभी प्राप्त हो सकते हैं जब कि अपने मन, वचन और कर्म से ईश्वर के प्रकाश को संसार में फैलावें और अपने आपको इस पवित्र काम के लिए समर्पित कर दें कि जहाँ तक हमारे सामर्थ्य में है, उस प्रभु की इच्छा पूर्ण करेंगे। जिस समय हमारा न्याय होगा और हमको यह व्यवस्था दी जायेगी कि हम या तो आगे बढ़ें या पीछे हटें, उस समय केवल यही देखा जायेगा कि हमने अपने भाइयों के साथ भलाई की है या बुराई? उनको अपने जीवन संग्राम में सहायता पहुँचाई है या हानि?

जितनी अधिक सहानुभूति और जितना अधिक निष्कपट प्रेम हम अपने सजातीय बाँधवों के साथ रखेंगे, उतने ही अधिक हमारी शक्ति बढ़ेंगी। हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि मनुष्य जाति एक कुटुम्ब बन जावे, जिसका प्रत्येक अंग प्रज्वलित अणु के समान धार्मिक प्रकाश की किरण बनकर दूसरों के लिए उन पर चमके। जिस प्रकार जातिगत पूर्णता पीढ़ी दर पीढ़ी अर्थात् युग−युगांतर में उन्नति करती जाती है। उसी प्रकार व्यक्तिगत पूर्णता भी जन्म जन्मान्तर में उन्नति कर रही है और करेगी।

मनुष्य जाति के सब अंगों में अधिक गहरा और अधिक फैला हुआ मेल-जोल उत्पन्न करके अपने आपको तथा दूसरों को धार्मिक उच्चभावों की सीमा तक पहुँचाना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है, बिना इसको पूरा किये हम कभी विश्राम न लेंगे।

इस पृथ्वी पर तुम इसलिए भेजे गये हो कि ईश्वर का एक नगर बसाओ। उसमें सार्वजनिक कुटुम्ब की स्थापना करो। इस महान कार्य के सम्पादन करने के लिए तुमको लगातार परिश्रम और उद्योग करने की आवश्यकता है।

जब तुममें से प्रत्येक मनुष्य मात्र को भ्रातृ दृष्टि से देखने लगेगा और सब आपस में एक कुटुम्ब लगेगा और सब आपस में एक कुटुम्ब का सा आचरण करने लगेंगे, हर एक मनुष्य दूसरों की भलाई में ही अपनी भलाई समझेगा, अपने जीवन को सबके जीवन के साथ और अपने लाभ को सबके लाभ के साथ मिलायेगा, जब हर एक मनुष्य इस संयुक्त कुटुम्ब के लिए स्वार्थ त्याग करने पर उद्यत होगा और वह कुटुम्ब किसी एक व्यक्ति को भी अपने से पृथक न समझेगा। उस समय वे बहुत सी बुराइयां जो अब मनुष्य जाति के दुःख और उद्वेग के कारण हो रही हैं, उसी प्रकार शाँत हो जावेंगी जिस प्रकार सूर्योदय के उदय होते ही निविड़ तमोराशि छिन्न-भिन्न हो जाती है। तभी ईश्वर की इच्छा पूर्ण होगी, क्योंकि उसकी यह इच्छा है कि मनुष्य जाति के बिखरे हुए अंग प्रेम के द्वारा आपस में मिलजुल कर धीरे-धीरे एक हो जायें और जिस प्रकार वह आप एक है, उसी प्रकार उसकी सन्तान भी एक ही हो जाये।


Quotation

जो किसी से द्वेष नहीं करता, जिसमें अहंकार की मात्रा नहीं और जो विषयों से निवृत्त हो चुका है वही सच्चा विवेकी पुरुष है। -एक विद्वान

*****

द्वेष करने वाला अपने भोजन को विषाक्त कर देता है और फिर उसे खाता है। -नारायण


रोटी खाना भी एक कला है।

(लेखक श्री ए. ई. पावेल)

यह तो निश्चित बात है कि, चाहे कोई काम हो उसके करने का ढंग परमावश्यक है। परन्तु यह बात बहुत आश्चर्यजनक है कि खाना चबाने के ढंग के विषय में लोगों ने चिरकाल तक प्रश्न नहीं पूछा। थोड़े काल से इस ओर ध्यान आकर्षित हुआ है। उन लोगों ने भी इस पर दृष्टि नहीं की, जो भोजन के गुण-दोष के विषय में विचार करते हैं। हम फिर इंजन का जिक्र करने को बाध्य हैं, क्योंकि विवाद ग्रस्त विषय का उससे विशेष सम्बंध है। इंजन की भट्टी में कोयला या ईंधन भरना भी एक खास काम है, जिसे हर मनुष्य ठीक रूप से नहीं कर सकता। यदि जलती आग पर होशियार और अनुभवी फायरमैन ईंधन न डाले, तो वह नष्ट हो जाती है, और हरारत (गर्मी) काफी मात्रा में पैदा नहीं होती है और इंजन पूरा काम नहीं कर सकता। इसी प्रकार पेट को भरने के लिए भी समझना चाहिए कि कौन सी खुराक किस मात्रा में और किस ढंग से खानी चाहिए, जिससे शरीर को अधिक से अधिक लाभ पहुँचे।

इस बात को ध्यान में रखो कि मुँह भी पाचन अवयवों का एक आवश्यक अंग है, जैसे आमाशय और अन्तड़ियाँ हैं। मुँह के दो बड़े काम हैं- 1. खुराक को खूब चबाना और बारीक करना। 2. मुखराल द्वारा उसे तर करना। पहली बात इतनी आवश्यक है कि उस पर बल देना व्यर्थ है, क्योंकि जब तक खुराक पिसकर खूब बारीक नहीं हो जाती, वह शरीराँश नहीं बन सकती। यदि दाँत अपना काम भली प्रकार नहीं करते, तो वह आमाशय और अन्तड़ियों को करना पड़ेगा। यदि मोटा भोजन पेट में भीतर जायेगा, तो पाचन क्रिया इतनी धीमी हो जायेगी, कि उसमें बदहजमी और सड़ाँध पैदा हो जायेगी, और मल का एक ढेर पेट के भीतर जमा हो जायेगा। जिससे स्वास्थ्य और शारीरिक शक्ति को बहुत हानि पहुँचती है।

दूसरा काम मुँह का रासायनिक है। जो पहले से भी अधिक आवश्यक है, सर हेनरी टामसन इसके विषय में लिखते हैं, ‘इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि पेट वह गड्ढा है जहाँ खुराक खूब चबा कर बारीक और राल से भली भाँति तर करके और इसी प्रकार हजम करके पेट में जानी चाहिए।’ यह बात अत्यन्त आवश्यक है और इस पर बल देना व्यर्थ है। बाज लोग कहते हैं कि मुखराल तैल का काम देता है जिससे खुराक तर होकर हलक के नीचे उतर जाती है। कड़े पदार्थ को भली-भाँति चबाना चाहिए परन्तु नर्म चीजों को यों ही खा लेना चाहिए- यथा दूध, हलुवा और दलिया खीर इत्यादि।

परन्तु यह विचार हमारे ज्ञान से बिल्कुल विपरीत है और वस्तुतः बिल्कुल उसके विरुद्ध होना चाहिए। माँस पेट में जाने से पेट के रसों द्वारा हजम होता है, इसके लिए मुखराल की कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु निज चीजों में चीनी और मैदा का अंश अधिक पाया जाता है, वह मुँह में हजम होती है या मेदे से गुजर कर अन्तड़ियों में जाकर हजम होती हैं, इसलिए मुखराल की आवश्यकता है। आजकल यह बहुत बुरी प्रथा है कि जिन चीजों की सबसे अधिक मुखराल की आवश्यकता है, उनको ऐसा बनाया जाता है कि उनको बहुत राल मिल ही न सके। इसी वास्ते डॉक्टर लोग उन्हें खुश्क चीजें जैसे रोटी के टुकड़े के साथ खाने का अनुरोध करते हैं। यही दशा प्रवाहित वस्तुओं जैसे दूध आदि की है, यह भी खुराक है और उसे मुखराल की आवश्यकता है, उसे पेय नहीं समझना चाहिए।

बल और स्वास्थ्य पर खूब चबाकर खाने का क्या प्रभाव होता है, उसका वर्णन करना व्यर्थ न होगा। इससे यह भी प्रकट हो जायेगा कि यद्यपि यह बहुत साधारण सी बात है, परन्तु उससे फल और लाभ अधिक होता है।

जो कुछ पहले वर्णन किया गया है उससे और सिद्धाँतों से भी यह भली भाँति विदित होता है, कि चबाने से पाचन शक्ति को बहुत सहायता मिलती है और उससे तमाम पाचन अवयवों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। हम नित्य ऐसी चीजें बहुत खाते हैं जिनके अन्दर मैदा बहुत होता है। इससे यह आवश्यक प्रतीत होता है कि भोजन को खूब चबाने की आदत डाली जाये, ताकि वह आमाशय में जाकर भलीभाँति हजम हो सके। बल्कि हाजमे के दरवाजे ही पर उसे खूब बारीक कर लेना चाहिये। यह भी ठीक है कि छोटी अन्तड़ी के अन्दर मैदे को हजम करने का उसके उपरान्त एक और वस्तु उत्पन्न हो जाती है, मगर यह अच्छा नहीं है कि मुँह में यह बारीक किये बिना ही उसे आमाशय में डाला जाये, जिससे यह क्रिया सुगमता से होती है। जब ग्रास मुँह में पड़े तो खूब चबाओ, यहाँ तक कि उसके अणु भाग भी पृथक-पृथक हो जायें। इससे हाजमे का काम बहुत सुगम हो जाता है।

जो चीज हम नित्य खाते हैं यदि उन्हें खूब चबाकर मेदे में डाला जाये, यहाँ तक कि वह मुँह के राल से भलीभाँति तर हो जाय, तो वह बड़ी आसानी से हजम हो जाती है। जिन चीजों के अन्दर मैदा अधिकता से होता है, यदि उन्हें खूब बारीक चबा लिया जाये यहाँ तक कि मुखराल से वह भलीभाँति तर हो जाये, तो उनका हजम करना बिल्कुल कठिन नहीं है। इस प्रकार से नई किस्म के आलू भी हजम हो जाते हैं, यद्यपि वह बहुत गरिष्ठ समझे जाते हैं।

जहाँ पाचन क्रिया बहुत अच्छी तरह होती है, वहाँ मल बहुत थोड़ा पैदा होता है और अन्तड़ियों के अन्दर सड़ने वाली गन्दगी बहुत कम पैदा होती है। यह तो कई बार देखा गया है कि गाय के गोबर, भेड़ बकरी की की मेंगनी, और घोड़े की लीद में दुर्गन्ध नहीं होती और मनुष्य के मल में यह दुर्गन्ध उससे कहीं अधिक होती है। उसकी वजह यह है कि उनकी चबाने की आदत हो गई है। जो चीज मेदे के अन्दर जाती है, वह खूब हजम हो जाती है, और गोबर, लीद इत्यादि की मात्रा भी बहुत कम होती है। उसके अन्दर बदबू नहीं होती, वह गरम बिस्कुट की बू की तरह होती है। यह बात अत्यन्त आवश्यक और विचारणीय है, क्योंकि अन्तड़ियों के अन्दर जब खुराक सड़ने लगती है, तो उससे एक प्रकार का विषैला माद्दा उत्पन्न हो जाता है, जो खून के साथ मिलकर स्वास्थ्य और बल के लिए बहुत हानिकारक प्रमाणित होता है।

मल की मात्रा बहुत कम हो जाती है जिसकी वजह से कब्ज या पेचिश होने का बहुत कम भय होता है। जो लोग खूब चबाकर भोजन खाने के अभ्यासी हो गये हैं उनमें एक बात यह देखने में आती है कि उनकी रसना शक्ति बहुत ही उत्तम हो जाती है। इससे लाभ यह है कि उन्हें खाने का विशेष स्वाद मिलता है। उसका सबब यह है कि भोजन का स्वाद मुखराल द्वारा स्वाद के दरों के अन्दर चला जाता है। लेकिन जब तक मुखराल भोजन के साथ नहीं मिलता, उसका स्वाद नहीं होता। और यह क्रिया ग्रास मुँह में जाने के चन्द सेकेंड पश्चात आरंभ हो जाती है। मैदा की खुराक लवाब लगते ही एक विशेष प्रकार की खुराक में परिवर्तित हो जाती है। इसका यही बड़ा काम है और यही सबब है कि सूखी रोटी, आलू और अन्य सादी खुराकें भी किसी-किसी समय मीठी मालूम देती हैं। जो लोग आरंभ में बारीक चबाकर ग्रास खाने का तजुरबा करते हैं उन्हें कुछ और ही स्वाद आता है, जिससे वे पहले वंचित थे। रसना शक्ति में इतनी उन्नति हो जाती है और स्वाद इतना भला मालूम होने लगता है कि मिर्च, मसाला, खटाई आदि की कोई आवश्यकता नहीं रहती। रसना शक्ति को स्वयं ही इन वस्तुओं से घृणा हो जाती है। यहाँ पर यह भी कहना उचित है कि खटाई, मिर्च, मसाले आदि में कोई आन्तरिक गुण नहीं है और न उनमें भोजन तत्व है। उनसे थोड़े देर के लिये स्वाद अधिक तेज हो जाता है, परन्तु इससे पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है, इसलिए बाज लोगों को भोजन स्वादिष्ट ही नहीं मालूम होता जब तक कि उसमें खूब मिर्च, मसाला आदि तेज चीजें न हों। इसके अतिरिक्त इन तीक्ष्ण चीजों का मेदा की नम व सुकुमार झिल्लियों पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ता है, बल्कि कभी-कभी उनके खाने से जलन (दाह) पैदा हो जाती है। जो लोग खूब चबा-चबाकर भोजन खाने का अभ्यास डालते हैं वह शीघ्र मालूम करेंगे कि उन वस्तुओं की खाने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब होते-होते रसना शक्ति बहुत सूक्ष्म हो जाती है, तो तम्बाकू, चाय और अल्कोहल इत्यादि भी सहन नहीं हो सकती।

भोजन को चबाकर खाने का एक बहुत बड़ा लाभ यह भी है कि उसके द्वारा पित्त अधिक पैदा होता है। डॉक्टर हेरी कैम्बल साहब लिखते हैं कि खुराक को चबाने का मेदे पर यह असर होता है, कि उसके पित्त बहुत पैदा होता है, इससे वह खुराक हो ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है। इसका प्रमाण बहुत सुगमता से मिल जाता है। कुत्ते की वह नली काट डालो, जो हलक से मेदा तक जाती है। कुत्ता खुराक जब खाये तो ग्रास मेदा में न जाकर, बाहर गिर पड़े। उस समय यह देखने में आयेगा बावजूद इसके कि खुराक मेद में नहीं जाती, परन्तु मेदा का लवाब अधिकता से पैदा हो जाता है। अतः यदि भलीभाँति चबाकर खुराक मेदे में न जाये तो उससे यह पित्त इतना नहीं पैदा होता। यह भी अनुमान किया जाता है, कि पित्त रसना शक्ति की तेजी के संसर्ग से पैदा होता है, अर्थात् भोजन में स्वाद आने से मन की दशा उसको अधिक उत्पन्न कर देती है, और यह उसी दशा में संभव है कि भोजन खूब चबाकर पेट में डाला जाय। यही नहीं और छोटे-छोटे लाभ भोजन को खूब चबाने से प्राप्त होते हैं। जैसे जबड़ों की गति से चेहरा और मसूड़ों की ओर रक्त का दौरा बहुत अच्छी तरह से होता है। और नाक के हिस्से की ओर भी उसका भ्रमण बहुत अच्छी तरह होने लगता है, जिससे नाक की कई बीमारियाँ आदमी को कष्ट नहीं देती हैं। जैसा कि डॉक्टर कैम्बल साहिब ने लिखा है। वही डॉक्टर साहिब यह भी लिखते हैं। ‘भोजन चबाने से हृदय की गति भी तेज हो जाती है, और उससे रक्त भ्रमण को बहुत उत्तेजना मिलती है। चाहे उसका कोई कारण हो, परन्तु इस बात को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता।’ आपका यह भी ख्याल है, कि यदि दाँतों से ग्रास चबाने का खूब से काम लिया जाय तो उससे उनकी दशा बहुत अच्छी हो जाती है, अतः आप लिखते हैं, ‘जो लोग खूब चबाकर खाते हैं उन्हें दन्तकृमि या किसी प्रकार का अन्य दन्त रोग बहुत कम होता है। परन्तु जल्दी-जल्दी रोटी खाने वाले को इन रोगों से बड़ा कष्ट होता है।

जब ग्रास मुँह में आते ही जबड़े चलने लगते हैं तो गद्दों से एक प्रकार का पानी निकलता है, इसलिए यह नियम स्थापित किया गया है कि, प्रयोग से गद्दे बढ़ते हैं और बेकारी से घटते हैं। तजुर्बे से यह प्रगट हो गया है, कि यदि खूब बारीक चबाकर ग्रास खाने की आदत पैदा की जाये तो उससे बहुत शीघ्र मुखराल अधिकता से पैदा होने लगता है और उसके संसर्ग से ग्रास बहुत ही शीघ्र मेदे में पहुँच कर हजम हो जाता है।

बहुत सावधानी से भोजन चबाया जाये तो शीघ्र मालूम हो जायेगा कि पहले की अपेक्षा भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता है। इसलिए खूब चबाकर खाने का एक बड़ा लाभ यह है कि थोड़े ही भोजन से संतोष हो जाता है। जिसने नये ढंग से भोजन चबाकर खाने की आदत पैदा की थी। उस मनुष्य के अनुभव में यह बात आ चुकी है।

जो प्रवृत्ति ईश्वर ने मनुष्य हृदय में उत्पन्न कर रखी है, यदि उन्हें प्रकट करने का पूरा अवसर मिले तो शरीर की आहारिक आवश्यकताओं को वह आपसे आप पूरा कर सकते हैं। किस प्रकार की और कितनी खुराक आवश्यक है, इसका निर्णय मनुष्य के स्वभाव से हो सकता है। इसके विषय में अरनिस्ट वेन सोमिरन कहते हैं, ‘जो लोग ग्रास खूब चबाकर खाते हैं, मैं उनको विश्वास दिलाता हूँ, कि वह बहुत शीघ्र शरीर की आहारिक आवश्यकताओं को भलीभाँति अपने-आप मालूम कर सकेंगे।’ इस बात को स्मरण रखो कि भूख इस विषय में भलीभाँति जाती नहीं है। यह इस बात से विदित है कि डॉक्टर लोग बहुत आदमियों को भोजन की मात्रा के विषय में यह उपदेश किया करते हैं कि थोड़ी भूख शेष रहने पर हाथ खींच लो। परन्तु अधिक सम्पत्ति लोगों की ऐसी ही है कि उनमें इतना साहस नहीं, कि एक दो रोटी की भूख छोड़कर चौके से उठ खड़े हों, जिसका परिणाम यह होता है, कि वह अधिक खाने के कष्ट को भोगते रहते हैं। ऐसे अधिक खाने वालों में जिनके मेदे की शक्ति बहुत अधिक है, उनकी चर्बी पैदा होती है, और वही मोटे हो जाते हैं।


विश्वास करो।

(कुमारी भारती)

विश्वास करो कि तुम जगत में महान कार्य के लिये आये हो, तुम्हारे भीतर महान आत्मा का निवास है। विश्वास करो कि तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम मृत्यु नहीं अमर हो, इसलिए तुम्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई तुम्हें विचलित नहीं कर सकता।

विश्वास करो कि तुम अकेले नहीं हो। जंगल, नदी, पर्वत और एकान्त में भी तुम अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक परमात्मा है। जब तुम सोते हो और गाढ़ निद्रा में होते को तब भी परम प्रभु तुम्हारे अंग संग होता है। तुम्हारा वह अनन्त पिता तुम्हें जीवन दे रहा है, वह तुम्हें महान और चिरायु बनाना चाहता है इसलिए किसी भी दशा में अपने आपको अकेला और असहाय न मानो, भला जब अमरत्व सहायों का भी सहाय राजाओं का भी राजा परम प्रभु तुम्हारे साथ हैं तब तुम अपने आपको निराश्रित और असहाय क्यों समझते हो। क्या हुआ यदि तुम्हारा विनाश करने के लिए सब साँसारिक शक्तियाँ एकत्र हैं। यदि परमपिता तुम्हारी रक्षा कर रहा है तो विश्वास करो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। विश्वास करो, तुम्हारा पिता तुम्हें प्यार करता है। वह तुम्हें अपने पास बुला रहा है। परन्तु तुम अपने पिता के पास न जाकर बाहर की ओर बढ़े जा रहे हो। जरा रुको, अनन्त प्रेम की प्राप्ति तुम्हें परम पिता के पास होगी।

विश्वास करो। ईश्वर तुम से बहुत उपयोगी कार्य लेना चाहता है। तुम ईश्वर का निमित्त बन कर प्रभु को आत्म समर्पण कर दो, समर्पण करने से तुम्हें बड़ी शक्ति मिलेगी।

आत्म-समर्पण का अर्थ यह नहीं कि तुम आत्मविश्वास खो बैठो। जब तुमने परम आत्मा को आत्मसमर्पण किया है। तब तुम में पूर्ण आत्म-विश्वास जागृत होना चाहिए। उस दशा में तुम महान बन गये हो, तुम्हें भय नहीं रहा ऐसा सोचो तुम महान से मिलकर महान बन गये यह विश्वास करो। विश्वास करो, तुम बलवान हो। निर्बलता पाप है। तुम अपने मन में से निर्बलता को सदा के लिये भगा दो। आत्मा और परमात्मा दोनों बल हैं। तुम्हारी निर्बल मनोवृत्ति मानसिक है। मन भी प्राकृतिक है तुम तो प्रकृति से परे हो। इसलिए मन में कभी निर्बलता को न आने दो।

विश्वास करो, तुम पवित्र और शुद्ध हो। अशुद्धता और अपवित्रता को तुम जब चाहो झाड़ सकते हो, इस लिए यदि तुम से कभी भूल भी हो गई है तो उससे अधिक चिन्तित न बनो। आगे से उस बुराई को कभी न करने के दृढ़ संकल्प के साथ बढ़ो। बढ़ते ही चलो तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। आज तक बढ़ने वाले को कोई नहीं रोक पाया। यदि तुम यह सोचो कि कोई तुम्हारा विरोध न करे तभी तुम कर सकोगे तो यह भी कभी न होगा। बहुधा तुम जीवन संघर्ष को ही विरोध मान लेते हो। विरोध के बिना तुम बढ़ने का विचार न करो। तुम विश्वास करो कि तुम सब बाधाओं पर विजयी हो सकोगे, उठो और आगे बढ़ो।

-कर्मयोग से


प्रत्येक वस्तु सुख देने वाली।

(डॉ. गोपालप्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)

इन्द्रप्रस्थ में जब राजसूर्य-यज्ञ समाप्त हो गया और सब अभ्यागत अतिथि बिदा होने लगे तो पाँडवों ने बड़े प्रेम से दुर्योधन को कुछ दिन और अपने पास ठहरा लिया और उसका पूरा आदर-सत्कार किया। एक दिन पाँडव मय दानव का बनाया हुआ सभा-भवन उसे दिखलाने लगे। सभा-भवन में एक जगह अधिक मूल्य के स्वच्छ उजले पत्थर और शीशे इतने अच्छे ढंग से जड़े थे कि वहाँ पानी बहता मालूम होता था- उद्दाम वेग से बहती हुई नदी मालूम होती थी। इस मिथ्या पानी के प्रवाह, झकोरे खाती हुई नदी को देखकर दुर्योधन भ्रम में पड़ गया। उसे लहराता हुआ जल समझ कर तैर कर पार जाने के लिए कपड़े उतारने लगा। यह देख भीमसेन और द्रौपदी आदि ठहाका मार हंस पड़े।

इसी प्रकार यह संसार माया का रचा हुआ घर है। मनुष्यों की चित्त की प्रसन्नता के लिए रंग-बिरंग के चित्रपटों से सज्जित और संवारित है। इसमें मृगतृष्णा के जल सदृश धोखे वाले विशेष अवसर भी हैं, जिनको देखकर मनुष्य घबरा उठता है कि, ‘हाय! मैं डूबा मैं मरा!’ और घबड़ा कर हाथ पैर मारने लगता है, धीरज और स्थिरता की लगाम हाथ से छोड़ देता है, संशय और भ्रम के वश में आ जाता है। उसके चेहरे का रंग उड़ने लगता है मानो वह वास्तव में किसी गहरी मुसीबत में पड़ गया है। परन्तु जब अज्ञान का परदा दूर होता है, तो लगता है कि कुछ बात ही न थी। पानी तो था ही नहीं, कपड़े व्यर्थ उतारे, बेकार ही परेशानी हुई।

यह खूब याद रखने की बात है कि दुनिया में जितनी चीजें प्रत्यक्ष में घबड़ा देने वाली मालूम होती हैं, असल में मनुष्य की प्रसन्नता और आनन्द के लिए ही प्रकृति ने उन्हें बनाया है, अज्ञानता ही से मनुष्य चक्कर में पड़ता है। संसार की सृष्टि किसी शत्रु के हाथों नहीं हुई है बल्कि यह मनुष्य की आत्मा का ही सारा विकास है। संसार की कोई वस्तु वास्तव में दुखदायी नहीं है, वरन् प्रत्येक पदार्थ मनुष्य के सुख, प्रसन्नता और आनन्द का कारण है।

कई प्रकार की परिस्थितियाँ, घटनाएं और वस्तुएं मनुष्यों को प्रिय या अप्रिय होती हैं, प्रिय की प्राप्ति में वह सुख और अप्रिय की प्राप्ति में दुख अनुभव करता है। यह रुचि, इच्छा, पसंदगी ही दुख-सुख की जननी है। वस्तुतः संसार की एक भी घटना ऐसी नहीं है जो मानव प्राणी के वास्तविक स्वार्थ के विपरीत हो, दुख-दायक या अनावश्यक हो।

एक उदाहरण लीजिए- जेल से लोग डरते हैं पर अनेकों कैदी जेलखानों में वैसी ही सुविधा पूर्वक जीवन यापन करते हैं, जैसे कि साधारण मनुष्य अपने घरों में रहते हैं। यदि जेलखाना वस्तुतः कोई भयंकर विपत्ति होती जो बाहर वालों को यह जैसे आतंकित करती है वैसी ही भीतर वालों को भी करती। पर वस्तुतः ऐसा नहीं होता। फाँसी की सजा कम होकर यदि दस वर्ष की जेल रह जाती है तो अपराधी फूला नहीं समाता। इसी प्रकार कोई कायर डरपोक युद्ध सैनिक लड़ाई के मोर्चे पर प्राण संकट देखता है और डर के मारे भाग खड़ा होता है एवं पकड़े जाने पर जेलखाने जाता है तो वह मृत्यु की अपेक्षा जेल से ही बीतने को सौभाग्य समझता है और ईश्वर को इस कृपा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद देता है। इससे प्रकट है कि जेल में सुख-दुख का कोई तत्व नहीं केवल मनुष्य की मान्यताएं ही उसका कारण हैं।

इसी प्रकार स्त्री, संतान, धन, वैभव, प्रशंसा पदवी आदि एक के लिए जीवन पूरी हैं तो दूसरे को आपदायें प्रतीत होती हैं। एक मनुष्य जिसके लिए लालायित है दूसरा उसे त्यागे फिरता है और घोर घृणा करता है। जिस परिस्थिति को पाकर एक मनुष्य शिर धुलता है, छाती पीटता है खाना सोना भूल जाता है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है दूसरा आदमी वैसी ही या उससे भी बुरी परिस्थिति में रहता हुआ संतोष पूर्वक जीवन व्यतीत करता है और धैर्य तथा साहस पूर्वक कठिनाई से लड़ता है। एक मनुष्य आज अच्छी स्थित में होते हुए भी अपने भविष्य को घोर निराशा मय, अंधकार पूर्ण सोचता है और चित्त को दुख सागर में डुबोये रहता है। दूसरा व्यक्ति आज घोर संकट में होते हुए भी भविष्य की सुनहरी कल्पना करता है और आशा की उमंगों में आनंदित रहता है। यह सब बातें बताती हैं कि वस्तुएं या परिस्थितियाँ नहीं, मनुष्य की इच्छाएं, भावनाएं, मान्यताएं और कल्पनाएं उसे दुखी या सुखी बनाती हैं।

जो लोग आनंदित जीवन बिताने के इच्छुक हैं उन्हें आनन्द के उद्गम के संबंध में सही जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। इच्छानुकूल वस्तुएं मनचाही परिस्थितियाँ पाने पर ही जो सुखी होना सोचते हैं वे जीवन भर कभी भी सुखी नहीं हो सकेंगे क्योंकि पूर्णतया अभीष्ट मनोरथ कभी किसी को प्राप्त नहीं हो सकता। हाँ, अपनी रुचि इच्छा और भावना को सुसंयत बना कर वर्तमान परिस्थितियों में भी आनन्द प्राप्त करने का स्वर्ण सुयोग प्राप्त किया जा सकता है। आध्यात्म विद्या का तत्व ज्ञान यही है। वह वस्तुओं की मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने से मना करती है और अपने दृष्टिकोण में सुधार करना सिखाती है, जिससे हर घड़ी, हर परिस्थिति में आनन्दित रहा जा सके।

संसार की प्रत्येक वस्तु परिस्थिति मनुष्य के सुधार, विकास एवं आनन्द के लिए है। दुख का एक कण भी इस विश्व में नहीं है। हमारा अज्ञान एवं दूषित दृष्टिकोण ही दुख का कारण है। उसे सुधार लिया जाए तो फिर सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है। संसार की प्रत्येक वस्तु और घटना सुख ही देने वाली है।


Quotation

जिस बात को मनुष्य अपने लिए उचित नहीं समझता है, दूसरों के साथ भी वैसा व्यवहार न करे यही वास्तविक धर्म है।

-भीष्म पितामह

दूसरों की अंधाधुँध नकल करना, छोटे मन वाले लोगों का काम है। -ग्रेवाइक


जीवन लक्ष प्राप्त करने के दो साधन

(श्री सच्चिदानन्द तिवारी, रीठी)

भगवान की प्राप्ति के लिए, गीता जी में मुख्य दो मार्ग बताये हैं। एक तो साँख्ययोग और दूसरा कर्मयोग।

1. साँख्ययोग का साधन तो यह है कि संपूर्ण संसारी पदार्थ को मृगतृष्णा के जल की भाँति अथवा स्वप्न की सृष्टि सदृश, मायामय होने से माया के कार्यरूप संपूर्ण गुण ही गुणों में बर्तते हैं, यह समझ कर मन, इन्द्रियों और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान से रहित होना तथा सर्वव्यापी सच्चिदानन्द घन परमेश्वर के स्वरूप में एकीभाव से नित्य स्थित रहते हुए श्री भगवान कृष्ण सत्-चित् आनन्द घन वासुदेव के अतिरिक्त किसी के होनेपन का भाव किंचित्मात्र अपने में न रहने देना। यह साँख्य योग साधन है।

सब कुछ भगवान श्री कृष्णचन्द्र का समझते हुए दुःख, सुख, भला, बुरा, सिद्धि, असिद्धि, हानि, लाभ में समत्वभाव रखते हुए, आसक्ति और फल की इच्छा त्याग कर भगवत् आज्ञानुसार केवल भगवान के लिए ही सब कर्मों का आचरण करना तथा भक्ति पूर्वक मन वाणी अथवा शरीर से सर्व प्रकार भगवान के शरण होकर नाम, गुण और प्रभाव सहित उनके स्वरूप का निरन्तर चिन्तन ही निष्काम कर्मयोग का साधन है।

साँख्ययोग, अ. 5 श्लोक 8, 9 तथा कर्मयोग अ. 6 श्लोक 47, अ. 5 श्लोक 10 और अ. 2 श्लोक 48 में देखने चाहिए।

उपरोक्त दोनों साधनों का परिणाम एक होने के कारण वास्तव में अभिन्न माने गये हैं। परन्तु साधन काल में अधिकारी भेद से दोनों का भेद होने के कारण दोनों मार्ग भिन्न-भिन्न बताये गये हैं इसलिए एक पुरुष एक काल में दोनों मार्गों पर उसी प्रकार नहीं चल सकता, जिस प्रकार मथुराजी के दो मार्गों से होकर एक पुरुष एक ही काल में मथुरा में नहीं पहुँच सकता। उक्त साधनों में कर्मयोग का साधन संन्यास आश्रम में नहीं बन सकता, कारण कि, संन्यास आश्रम में कर्मों के स्वरूप तक का भी त्याग बताया है और साँख्ययोग का साधन सभी आश्रमों में बन सकता है।

यदि कोई कहे कि भगवान ने साँख्य योग को संन्यास के नाम से कहा है इसलिए उसका अधिकार केवल संन्यास आश्रम में ही है, गृहस्थ में नहीं तो यह कहना उचित नहीं। इस शंका का समाधान अध्याय दो में श्लोक 11 से 30 तक, साँख्य निष्ठा के उपदेश पढ़ने से हो सकता है।

यदि गृहस्थाश्रम में साँख्ययोग का अधिकार नहीं होता तो समय-समय पर भगवान ने अर्जुन को युद्ध करने की योग्यता किस प्रकार दिखाई होती? हाँ इतनी विशेषता इसमें अवश्य है कि साँख्य मार्ग का अधिकारी देहाभिमान से रहित होना चाहिए, क्योंकि शरीर में अहंभाव के रहते हुए साँख्ययोग का साधन भली प्रकार समझना कठिन है। इसी लिए साँख्ययोग कठिन है (गीता अ. 5 श्लोक 6) और इसी कारण भगवान ने जगह-जगह अर्जुन को सदैव निरंतर अपना चिन्तन तथा निष्काम कर्मयोग का आचरण करते रहने को बताया है क्योंकि यह निष्काम कर्मयोग साधन, सांख्ययोग साधन से सुगम है।


Quotation

जो ईश्वर को जानते हैं वे नम्र होते हैं परन्तु जो अपने को जानते हैं वे भी अभिमानी नहीं हो सकते।


मनुष्य की आयु कल्पना

(ले. श्री सदानन्दजी ब्रह्मचारी)

एक समय आनन्द वन के उत्तर वरुण तट पर मनुष्य, बैल, कुत्ता, बगुला और ऊंट ये पाँचों महाशय एकत्र हो गये। वार्तालाप होने लगा। बातचीत में वे अपनी-अपनी आयु के विषय में चर्चा करने लगे। क्रमशः चारों के पूछने पर एक-एक ने कहना प्रारंभ किया। पहले मनुष्य ने अपनी आयु बीस वर्ष की बताई और फिर उन चारों ने अपनी उम्र चालीस-चालीस वर्ष की कही। अपनी कम आयु होने के कारण चिंतातुर मनुष्य से अन्य जीवों ने कहा- हे मनुष्य, तुम्हारी उम्र बहुत कम है, पर तुम इसके लिए चिंता मत करो। हम अपनी आयु के बीस-बीस वर्ष तुम को देते हैं, इससे तुम्हारी अवस्था सौ वर्ष की हो जायेगी।

मनुष्य ने कहा- आप लोगों की उदारता के लिए धन्यवाद है, आयु जैसी अमूल्य वस्तु देकर आप लोगों ने अपने आत्म-त्याग का परिचय दिया है। मैं सधन्यवाद आप लोगों की आयु को वापिस लौटाता हूँ, क्योंकि जैसे अपना जीवन मुझे प्रिय है, ऐसे ही आप लोगों को भी है। यह सुनकर उनमें से बैल और ऊंट बोले- प्रियवर, हम खुशी से यह काम कर रहे हैं, हमारी तो बीस वर्ष की आयु भी काफी है, क्योंकि हम चालीस वर्ष भी जीवित रहे तो क्या होगा? हमें तो वे आजीवन गुलामी में बिताने हैं, जब तक जीवित रहेंगे बोझा ही ढोते रहेंगे। ऐसी दशा में हमारा हजार वर्ष जीना भी खुशी की बात नहीं है। बोझा ढोना, मार खाना, भूखे प्यासे बंधे पड़े रहना ही हमारे भाग्य में लिखा है। फिर तुम ही बताओ हम लंबी आयु लेकर क्या करेंगे? तुम मनुष्य ठहरे, स्वतंत्रता से विचरते हो, चाहोगे तो अपनी बुद्धि से स्वयं सुखी रहते हुए दूसरों को भी आराम पहुँचा सकते हो। तुम्हारे पास जाकर निष्फलीभूत हमारी आयु भी सफल हो जायेगी।

कुत्ते और बगुले ने भी उक्त कथन का समर्थन करते हुए कहा कि हम अज्ञानान्धकार में पड़े हुए यदि सहस्र वर्ष पर्यन्त जीवित अवस्था भोगते रहे तो किस पुरुषार्थ की सिद्धि कर लेंगे? फिर कुत्ते और बगुले की तो लोक में कोई प्रतिष्ठा भी नहीं है। मैं (कुत्ता) रात भर जागकर नगर की रखवाली करता हूँ पर डण्डों तथा कुवाच्यों से पुरस्कृत होता हूँ। यह बगुला किसी तरह अपनी गुजर करता है, पर लोगों ने इसे ठग की उपाधि दे रखी है। अतः हम लोग भी आप को अपनी आधी आयु देकर उसे सफल बनाना चाहते हैं।

सब की हार्दिक इच्छा देखकर मनुष्य ने उनकी आयु ले ली और सौ वर्ष जीने वाला बन गया। उस आयु का उपयोग किस प्रकार होता है अब यह देखिए-

(1) जब तक उस की अपनी आयु रही यानी वह बीस वर्ष का रहा, तब तक तो विषय-वासना से रहित हो ब्रह्मचर्यादि व्रत धारण पूर्वक विद्याध्ययनादि उत्तमोत्तम कार्य करता रहा। इससे सभी को यह आशा हो गई कि महाशय मनुष्य कुछ ही दिनों में सोने के हो जायेंगे और जगत का कल्याण सम्पादन करते हुए सुवर्ण से सुगंध का सुयोग कर देंगे।

(2) अनन्तर बीस वर्ष के बाद बैल की दी हुई आयु आरंभ हुई। मनुष्य विवाहित हो गया, द्विपद के चतुष्पद, चौपाया हो खूब कमाने, खाने और पशुवत् क्रीड़ा में मस्त हो गया। ‘मनुष्यरूपेण मृगाच्छरान्त’ के अनुसार मनुष्य बैल की तरह जीवन बिताने लगा। जैसे बैल अपना हिताहित विचारने में असमर्थ है, उसी तरह मनुष्य भी विवाहित जीवन प्राप्त करके खाने कमाने को ही सब कुछ समझ कर गृहस्थी का भार ढोने में व्यग्र रहता है। वह परमार्थ को भूल जाता है, उसे यह याद नहीं रहता कि जैसे मनुष्य के लिए खाना, सो जाना आदि व्यवहार आवश्यक है, उसी तरह प्रभु चिन्तन, तथा धर्मकृत्य भी कम जरूरी नहीं हैं। इसी तरह से बीस वर्ष भी बीत गये।

(3) फिर चालीस वर्ष के बाद कुत्ते की दी हुई आयु प्रारंभ हो गई। दो चार बाल-बच्चे पैदा हो गये। बहुएँ आ गई, परिवार बढ़ गया, साथ ही अशाँति भी बढ़ गई और आवश्यकताएं भी बढ़नी ही चाहिए थीं। सभी की आय के साधन सीमित ही होते हैं, सभी कुटुम्ब के लोगों की जरूरतें पूरी करने का जिम्मा इसी के सिर पड़ गया। इससे कोई कुछ माँगता है और कोई कुछ चाहता है। जिस का कहना मान लिया या जिस की आवश्यकता पूरी कर दी तो वह पूत पतोहू आदि उसे इसलिए धन्यवाद तक नहीं देते कि इसे तो हमारा कहना करना उचित ही था, बाबा या दादा ने किया क्या? सिर्फ अपना फर्ज अदा किया है। और जिस की बात न मानी, वह नाराज होकर मुँह फुलाये बैठ जाता है। अभिप्राय यह है कि हो तो भी कुछ गिनती में नहीं, न हो तो भी वैसा ही। इससे गृहाध्यक्ष की वृत्ति झुँझलाने की हो जाती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

वह फिर कुत्ते की तरह कभी लड़कों पर खिसिया उठता है कभी स्त्री पर। कभी बहुओं को काटने दौड़ता है और कभी अन्य नौकर आदि से उलझ जाता है। ज्यादे बेटे और बहुओं के सामने इसके किये तो कुछ होता नहीं, झूठ-झूठ इन्तजामअली (प्रबंधक) बना रहता है। विलक्षणता यह है कि कुत्ते की तरह उसी देहली पर लात डण्डे खाता रहता है। उसे यह विचार नहीं होता कि कुटुम्ब में तभी तक हस्तक्षेप करना चाहिए जब तक उसके संभालने वाले जिम्मेदार लोग न तैयार हो जायं। उसे यह याद करना चाहिए कि जैसे मैंने आज तक प्रभु की विभूति समझ कर कुटुम्ब की सेवा की, अब मुझे उस की विभूति की चाहना नहीं, प्रत्युत खुद उसकी सेवा (भजन-यज्ञ-पूजन-ध्यान) करनी चाहिए। मनुष्य सारी शक्ति लगाकर लोक सेवा करे तो सर्वोत्तम काम है, पर समय पाकर उसे अपना भी उद्धार करना उचित है। समय-समय के काम सुहावने होते हैं।

(4) इसके बाद जब बगुले वाले बीस वर्ष प्रारंभ हुए, यानी आयु की गाड़ी साठ वर्ष से ऊपर की सड़क पर चलने लगी तो हाथ में माला लेकर पूरे भक्तराज बनने का यत्न होने लगा। माला हाथ में लेते ही सारी दुनिया का जंजाल सामने आ गया। जन्म भर जो पापड़ बेले थे, वे मूर्तिमान हो एक के बाद दूसरे सामने खड़े होने लगे। परमात्मा का ध्यान तो कहीं रह गया जगत की बला दृष्टिगोचर होने लगी। फिर माला हाथ में पकड़ते ही नींद नहीं तो झपकी लगने से माला हाथ से गिर पड़ी। लगे थे भजनों का ढेर लगाने, पर खुद मायाजाल के फेर में पड़ गये। जब कि जन्म भर प्रतिदिन दस मिनट भी शाँति में बैठकर राम का नाम नहीं लिया, फिर एक दम इस जर्जरीभूत अवस्था में आराम कैसे मिल सकता है? बल्कि इस आयु में कामनाएं और अधिक बढ़ जाती हैं। बगुला एक पाँव से जल में जो तप करता है, उससे वह योगिराज नहीं कहा जा सकता। अब वकवृत्ति से उद्धार होना कठिन है। इसका तो पहले से ही अभ्यास करना था।

(5) इसके बाद यह ऊंट की जिन्दगी यानी अस्सी वर्ष की आयु के ऊपर पहुँचता है तथा इसकी नाक में नकेल पड़ जाती है, यानी इस को एक आदमी आगे होकर ले चलता है। पीठ अकड़ जाती है, टाँगे सूख कर लकड़ी बन जाती हैं। ऊंची गर्दन करके रास्ता ताकता है कि प्रपोत्ररत्न पानी लेकर आता होगा। पीठ पर बोझा नहीं ढोया जाता, पर मन पर, हृदय पर इस भावना का भार अभी भी लदा रहता है कि मुन्नी की शादी अच्छे घर में मेरे सामने हो जाती तो मुझे संतोष होता।

यही मनुष्य की आयु का लेखा है। मनुष्य के लिए यह दुःख की बात होगी कि वह मनुष्य होकर पशु धर्म का अनुसरण करे। उसे तो मानवोचित कर्त्तव्य कर्मों में अपनी आयु का सदुपयोग करते हुए वास्तविक मनुष्य जीवन जीना उचित है।


भगवान महावीर की वाणी

विश्व मैत्री- मैं सब जीवात्माओं को क्षमा करता हूँ -वे भी मुझे क्षमा करें। सब जीवों से मेरी मित्रता है, मेरा किसी से बैर विरोध नहीं।


Quotation

*****

जो मनुष्य युद्ध में दस लाख सैनिकों को जीत लेता है उससे अधिक विजय का पात्र तो वह है जो अपनी आत्मा के विकारों के साथ युद्ध करके अपने मन को काबू में कर लेता है।

*****

अपनी आत्मा से ही युद्ध कर, दूसरों के साथ युद्ध करने से तुझको क्या प्रयोजन? अपनी आत्मा द्वारा अपने मन को जीत लेने पर उसे सुख प्राप्त होता है।

*****

इस संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए यह मानव शरीर नाव के समान है जिसमें बैठ कर आत्मा रूपी नाविक भव सागर को पार कर सकता है।

*****

जो ममता व आसक्ति रहित है, जिसे अहंकार नहीं है, जिसे बड़प्पन का मान नहीं है, जो छोटे-बड़े, चल-अचल सभी जीवों पर समभाव रखता है। जो लाभ-हानि में, सुख-दुख में, जीवन-मरण में, निंदा-स्तुति में व मान-अपमान में समान रूप से अविचलित है वही महापुरुष है।

*****

सिर मुंड़ाने से कोई साधु नहीं होता-न ओंकार शब्द जप लेने से ब्राह्मण होता है न वन में निवास करने से मुनि होता है न वल्कल वस्त्र पहनने से तपस्वी होता है।

*****

समभाव रखने से साधु होता है, ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने से ब्राह्मण बनता है-ज्ञानोपार्जन करने से मुनि होता है और स्वार्थ त्याग करने से तपस्वी होता है। संक्षेप में कर्म से व्यक्ति ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्री व शूद्र होता है केवल जन्म से, वेश-भूषा के आडम्बर से नहीं।

*****

गृहस्थाश्रम में रहता हुआ जो व्यक्ति सुन्दर और प्रिय भोगों की प्राप्ति होने पर भी उनसे उदासीन अलिप्त रहता है व उन्हें पीठ देता है-यही नहीं स्वाधीन होते हुए उन भोगों का परित्याग करता है वही निश्चय रूप से सच्चा त्यागी है।

=कोटेशन===========================

अच्छी शिक्षा और सच्ची सभ्यता का यह एक प्रमाण है कि हम प्राचीनता की प्रतिष्ठा करते हैं।

-सिडनी

*****

जब समाज में स्त्री का स्थान बहुत नीचा हो जाता है तब उसके साथ ही शिशुओं का स्थान भी बहुत नीचे उतर आता है। -शरद बाबू

*****

स्त्रियाँ माता की प्रतिमा हैं। जब तक उनका उद्धार न होगा, हमारे देश का उद्धार होना असंभव है।

-स्वामी विवेकानन्द


महिलाओं का कर्त्तव्य और उत्तर और दायित्व

(श्रीमती जानकी देवी बजाज)

अत्यन्त प्राचीन काल में स्त्रियों का भी उपनयन होता था और उन्हें भी ब्रह्मचर्य व्रत लेकर गुरुकुलों में विद्याध्ययन के लिए भेजा जाता था। ऋषियों का ऋण अदा करने का दायित्व जितना लड़कों पर था, उतना ही लड़कियों पर भी माना जाता था। उसके बाद एक काल ऐसा आया, जब समाज में स्त्री जीवन को गौड़ स्थान प्राप्त हुआ और केवल पुरुष की सहधर्मिणी बनकर उसके जीवन के ध्येय को सिद्ध करने में सहायक होना, नहीं यह भी नहीं, बल्कि वीर पुरुषों को जन्म देना ही स्त्रियों के जीवन का एक मात्र कर्त्तव्य माना जाने लगा। फलतः स्त्रियों का विवाह ही उनका उपनयन, ससुराल ही गुरुकुल और पति की गुरु माना गया। लड़कों का उपनयन आठ वर्ष की अवस्था में होता था। बस आठ साल की दुधमुँही बालिकायें भी ससुराल भेजी जाने लगीं। यहाँ से नारी-जीवन के अधःपतन का सूत्रपात हुआ। हमारे सुदैव से जमाने ने फिर पलटा खाया। राजाराम मोहन राय, पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे आदि श्रेष्ठ व्यक्ति इस देश में उत्पन्न हुए, जो नारी-जागरण के आद्य प्रवर्तक थे। इन्हीं महानुभावों के प्रयत्नों से देश में स्त्री-शिक्षा का आरंभ हुआ और फिर से स्त्रियों में स्वतंत्र जीवन की लालसा और अपने आत्मविकास की इच्छा जागृत हुई।

जब तक हमारी शिक्षा प्रणाली हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन के आदर्शों के अनुकूल नहीं होगी, तब तक वह उपयोगी नहीं हो सकती। जीर्ण मतवादियों के आदर्शों के अनुसार स्त्री केवल पुरुष की मददगार मानी जाती है। पुरुष चाहे कितना ही मूर्ख, निकम्मा और दुष्ट क्यों न हो, स्त्री का धर्म उसकी सेवा करना और उसकी आज्ञा मानना ही था। उसके जीवन का श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ आदर माना जाता था, वीर पुरुषों को जन्म देना ही। मैं मातृत्व की अवहेलना नहीं करना चाहती। भारतीय सभ्यता के उच्चतम आदर्श का मातृत्व एक अनूठा प्रतीक है। लेकिन यह कहना कि मातृत्व नारी-जीवन का एक मात्र या सर्वोपरि ध्येय है, मेरी राय में स्त्री की आत्मा के सम्पूर्ण विकास में बाधक होगा। वीर संतान उत्पन्न करना जितना पुरुष का धर्म है, उतना ही स्त्री का भी है। परमात्मा ने गर्भधारण का और बालकों की परवरिश का भार स्त्री जाति पर सौंपकर उनके प्रति अपना विशेष विश्वास प्रकट किया है, यह भी उनके लिए गौरव का विषय है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि स्त्री-जीवन की सफलता इसी एक कार्य में है।

पुरुष समाज का एक अंश है और स्त्री दूसरा अंश है। समाज के प्रति यदि पुरुष के कुछ कर्त्तव्य हैं, तो स्त्री के भी हैं। अपने पारिवारिक हित को समाज हित के लिए आहुति दे देना अगर पुरुष का परम धर्म है, तो स्त्री का भी है। स्त्री केवल माता ही नहीं, वह समाज की एक समस्या भी है। जो लोग यह कहते हैं कि लड़की की गुड्डी और लड़के की काठ की तलवार उन की मनोवृत्ति के द्योतक हैं, उनकी राय में शायद स्त्रियों का काम केवल पुरुषों को जन्म देना और पुरुषों का उन्हें काट डालना भले ही हो। परन्तु हमें अपनी शिक्षाप्रणाली में ऐसे आसुरी सिद्धान्तों को हरगिज दाखिल नहीं करना चाहिए। स्त्री और पुरुष की शरीर रचना और प्रकृति में भेद अवश्य है। लेकिन इसलिए यह कहना कि स्त्रियों का कार्यक्षेत्र केवल प्रसूतिगृह और पुरुषों का केवल रणभूमि है, निरी जड़ता है। स्त्रियाँ केवल सूतिकाएं नहीं और न पुरुष केवल हत्यारा है। यद्यपि दोनों में कुछ प्राकृतिक भेद है, तथापि धर्म के प्रति दोनों का उत्तरदायित्व समान है। दोनों ही मनुष्य हैं। दोनों की जाति एक है। इसलिए हर एक पुरुष किसी न किसी स्त्री की कोख से जन्म लेता है और हर एक स्त्री का जनक कोई न कोई पुरुष होता है।

स्त्री और पुरुष के प्राकृतिक भेदों पर विशेष जोर देकर उनकी इस मूलभूत एकता को भूल जाना हमारे लिए अनर्थकारी साबित होगा। स्त्री और पुरुष का आत्यन्तिक भेद काल्पनिक और कृत्रिम है। इसलिए हमें अपनी स्त्री-शिक्षा की योजना में स्त्रियों की मनुष्यता का विशेष ध्यान रखना होगा। हमारी शिक्षा ऐसी हो, जो स्त्रियों में आत्म-विश्वास पैदा करे। जिस प्रकार पुरुष का समाजसेवा का अपना आदर्श और प्रणाली हो सकती है, उसी प्रकार हर एक स्त्री की भी हो सकती है। उन आदर्शों को अपनी सारी शक्तियाँ अर्पण कर देने का और उसके लिए पारिवारिक जीवन को तिलाँजलि देने का ब्रह्मचर्य पालन का, उसे भी उतना ही अधिकार है, जितना पुरुष को है। यदि सहायता की आवश्यकता है, तो दोनों को है, अकेली स्त्री को नहीं। जब तक हमारी शिक्षा का आधार यह सिद्धाँत नहीं होगा, तब तक स्त्री को यमुना नदी का ही अभिनय करना पड़ेगा और उसका आत्मविकास शेख चिल्ली का मनोराज्य ही बना रहेगा।

स्त्री शिक्षा और स्त्री स्वतंत्रता के साथ-साथ हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन में स्त्री पुरुषों के सहयोग का बढ़ता जाना उचित ही नहीं, किन्तु आवश्यक भी है। लेकिन इस सहयोग के साथ-साथ विषयशक्ति बढ़ने का डर भी तो है। मेरी अपनी यह राय है कि जब तक स्त्रियों की रक्षा का भार पुरुषों पर ही रहेगा, तब तक उनका चरित्र उज्ज्वल हो ही नहीं सकता। आत्म-रक्षा का मूल सिद्धाँत है, अपनी इज्जत के लिए अपने प्राण देने की तैयारी इसका नाम है आत्मबल। पूर्व काल में जब स्त्रियाँ परतंत्र थीं तब उनका पुरुष से संबंध दो ही प्रकार होता था, खून का या विवाह का। पुरुष उनके चरित्र का मालिक भी था। भारतीय दन्तकथाओं में और आज भी शायद कोई विरला ही ऐसा राजा हो सकता है, जिसके एक से अधिक रानियाँ नहीं। कोई इसे सामाजिक जीवन की पवित्रता भले ही माने, मैं तो उसे वैध अपवित्रता कहने के लिए तैयार हूँ। मेरा ख्याल है कि स्त्रियों की कमजोरी की जड़ उनकी आत्मा की दुर्बलता है। हमारी स्त्री जाति में इस घृणित भ्रम ने घर कर लिया है कि विवाह के बिना स्त्री-जीवन चरितार्थ ही नहीं हो सकता। इससे बढ़कर विनाशकारी दूसरा कोई भ्रम शायद ही हो सकता हो। यह स्त्रियों की परवशता का और हमारी सामाजिक अपवित्रता का मूल है।

आत्म-रक्षा दो प्रकार की होती है-प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। आहार बनाना, आघात और आक्रमणों का प्रतिकार करना, रोग और व्याधियों का उपचार आदि बातें प्रत्यक्ष आत्म रक्षा में आती हैं। जीविका का उपार्जन करना, अपने परिश्रम से कमाना अप्रत्यक्ष आत्म-रक्षा है। इस क्षेत्र में स्त्रियों को अपनी योग्यता साबित करनी चाहिए। कोमलता और विनय हृदय के गुण हैं, न कि शरीर के वे पुरुषों को भी शोभा देते हैं और स्त्रियों के तो खास आभूषण हैं। लेकिन नजाकत एक बड़ा भारी दुर्गुण है, जो स्त्रियों को भी नहीं शोभा देता। हमारी स्त्री-शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो स्त्रियों को केवल हस्त कौशल के कामों में ही निष्णात न बनावे बल्कि उनमें शारीरिक श्रम करने की क्षमता भी प्रदान करे। अंग्रेजी शिक्षा ने पुरुषों में जिस प्रकार एक बाबू दल पैदा कर दिया, उसी प्रकार यदि स्त्रियों में भी पढ़ी लिखी सफेदपोश मेम साहबों का एक निकम्मा दल निर्माण होने वाला हो तो भगवान बचावे।

स्वतंत्रता का मूल है संयम। विलासिता और भोग-लालसा गुलामी की जननी है। निरंकुशता स्वतंत्रता की विमाता है, जिसके साथ ब्रह्मचर्य असंभव है। आज तक यह ध्येय सिर्फ पुरुषों के जीवन में होता था इसलिए ब्रह्मचर्य उनका अपना खास क्षेत्र माना जाता था। स्त्री के जीवन की सफलता विवाह में ही मानी जाती थी, क्योंकि वह केवल सहधर्मिणी थी, उसका अपना कोई ध्येय या धर्म नहीं था। अब यदि स्त्रियाँ उस क्षेत्र में उनकी बराबरी करना चाहती हैं तो उनको अपने जीवन का आदर्श निश्चित करना होगा और उसी के अनुसार अपने सारे जीवन को मोड़ना होगा। स्त्रियों को चाहिए कि वे ऐसा साथी पसन्द करें, जिसके सिद्धाँत और ध्येय उसके अनुकूल हों, तभी उनका गृह-जीवन सुखी और पवित्र होगा। समाज में गृह-जीवन जितना पवित्र होगा उतना ही वह ब्रह्मचर्य के आदर्श की ओर अग्रसर होगा। महात्मा गाँधी जी के सार्वजनिक जीवन का अब ऐसा कोई क्षेत्र नहीं रहा है जिसमें महिलाओं का प्रवेश न हो। उन सारे क्षेत्रों में जाकर अपने त्यागमय प्रेम से और फलाशा-रहित सेवा से उन्हें अधिक सुन्दर, सम्पन्न और मंगलमय बनाने की जिम्मेवारी भारत की सुशिक्षित युवतियों पर है।


चलो, स्वर्गधाम में प्रवेश करो।

(श्री स्वामी रामतीर्थ)

पुस्तकों में छपे हुए और कीड़ों का आहार होने के लिये अलमारियों में रखे हुए वेदान्त से काम न बनेगा, तुम्हें इसे आचरण में लाना होगा।

यदि वेदान्त आप की सर्दी अर्थात् तेज हीनता (निर्बलता) को दूर नहीं करता, यदि यह आपके बोझों को परे नहीं हटाता तो उसको ठुकरा कर अलग फेंक दो।

वेदान्त साधारण लोगों का ध्यान इसलिए आकर्षित करता है कि वह उनके धर्म ग्रंथ की शिक्षा है, शिक्षित हिन्दू को इसलिए आकर्षित करता है कि सूर्य के तले (संसार भर में) दर्शन शास्त्र कहलाने योग्य कोई भी ऐसा दर्शन नहीं है कि जो वेदान्तिक अद्वैतवाद का समर्थन न करे, और न ऐसा कोई शास्त्र विज्ञान ही है कि जो वेदान्त अथवा सत्य के पक्ष की सहायता तथा (उसके प्रचार की) वृद्धि न करे।

वेदान्त दर्शन के प्रचार का अत्यन्त सर्वोत्तम मार्ग इसको अपने आचरण में लाना है अन्य कोई भी शाहराह (राज्य पथ या सुगम मार्ग) नहीं है।

जिस समय आप अपने को एक ऐसी विचित्र अकथनीय भावना या कल्पना में ढाल देते हैं कि जो हम और आप दोनों से उत्तम है। उसी समय आप आत्मा को (वास्तव में) पाते हैं। वेदान्त आपको यही बतलाता है।

यदि आप किसी अर्थ या उद्देश्य की उपलब्धि चाहते हैं, यदि आप किसी भी पदार्थ को पाना चाहते हैं, तो उसकी परछांई के पीछे मत दौड़ो। अपने ही सिर को छुओ, अपने भीतर प्रवेश करो। इस तथ्य का अनुभव करो, तब आप देखेंगे कि तारागण आप के हाथों की ही कारीगरी है। आप देखेंगे कि विश्व के सारे पदार्थ, सब मोहने और लुभाने वाली चीजें केवल आपका अपना ही प्रतिबिम्ब अथवा परछांई है।

अमरपुरी (सुरलोक) आपके भीतर है, स्वर्ग अर्थात् आनन्द का धाम आपके भीतर है, और तब भी आप सुख को बाजारों में, अन्य पदार्थों में ढूँढ़ते हैं, अर्थात् इन्द्रियों के विषय में बाहर ढूँढ़ते हैं, कैसा आश्चर्य है। स्वर्ग अपने अन्दर है चलो, आसीम प्रवेश करो।


रोगी या निरोग रहना आपके अपने हाथ की बात है।

(कविराज श्री हरनामदासजी बी. ए.)

संसार के सारे काम स्वास्थ्य पर ही निर्भर हैं। केवल स्वस्थ मनुष्य ही धन कमा सकता है, जातीय, सामाजिक, नैतिक, वैयक्तिक और सब प्रकार के कर्त्तव्यों का पालन कर सकता है, जीवन और संसार के सुख उठा सकता है। रुग्ण व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। रोगी तो दूसरों पर बोझ है। उसका अपना जीवन तो निरानन्द होता ही है, वह दूसरों के जीवन को भी निरानन्द बना देता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि स्वस्थ रहने का पूरा-पूरा यत्न करे और यदि किसी कारण स्वास्थ्य में कोई दोष आ ही जाये तो उसे प्रारंभ में ही दूर करने में देरी न करें, क्योंकि रोग बढ़ जावे तो फिर कठिनाई से दूर होता है, पर नया रोग शीघ्र दब जाता है।

आजकल रोग बहुत बढ़ रहे हैं। इसका कारण एक तो यह है कि लोग दिनों दिन विषय-वासनाओं के दास होते जाते हैं। इन्द्रियाँ उनके वश में नहीं रहीं। दिन भर चरते ही रहेंगे। इसके अतिरिक्त दो समय भोजन करेंगे, उसमें भी तेज मसाले, चटनियाँ, खटाइयाँ और मिठाइयाँ होंगी। दूध और माँस, चावल और सरका, मछली और मिठाई आदि विरुद्ध आहार एक ही समय करने से परहेज न करेंगे। जुकाम ने चाहे निढाल कर रखा हो पर मलाई की बर्फ, आइसक्रीम और गोलगप्पे (पानी के बताशे) अवश्य खाएंगे। दिन भर दफ्तर में काम की अधिकता के कारण चाहे तबियत लेटने के लिए लाचार बहुत कर रही हो, पर बारह बजे तक सिनेमा अवश्य देखेंगे। विषय वासना वश में नहीं। जीवन के तत्व वीर्य को इस निर्दयता के साथ नष्ट किया जाता है कि जवानी में ही बुढ़ापे का मजा देखने के अतिरिक्त उनमें रोग का मुकाबला करने की शक्ति नहीं रहती।

तनिक सी सर्दी गर्मी या भोजन की गड़बड़ी से रोग तुरन्त आक्रमण करता है। इस प्रकार रोग दिनों दिन बढ़ रहे हैं।

रोगों के बढ़ने के उत्तरदायी किसी हद तक छात्रालय और होटल भी हैं वहाँ 8-8 दिन की सड़ी बुसी भाजी पकती हैं, रोटियों पर सूखा कच्चा आटा थोपा जाता है, प्रातः सायं उड़द की दाल ही पकती रहती हैं। बीमारियाँ बढ़ने के साथ-साथ हकीम डॉक्टर भी बढ़ते जाते हैं। परिणामतः साधारण से साधारण बातों के लिए भी लोग उनका आसरा ताकते हैं। वैद्यजी मुझे तीन छींकें इकट्ठी आ गई, औषधि दीजिये। ओह कयामत आ गई, छींकें इकट्ठी? परमात्मा ही बचाये सिर दर्द, जुकाम, थकान, कब्ज तो रोजमर्रा की बात है। जो लोग अपनी आदतें और भोजन में सुधार करने के बजाय वैद्य या डाक्टरों की मुहताजी करते हैं, वे चलते-फिरते अस्पताल बन जाते हैं और आजीवन औषधियों के चक्कर से नहीं छूटते। तबियत दवाइयों की ऐसी आदी हो जाती है कि फिर दवाई के बिना चलना कठिन हो जाता है, स्वास्थ्य और धन दोनों का सत्यानाश होता है।

प्राचीन काल में जब कि वैद्य बहुत थोड़े थे, 20-20 कोस पर कठिनता से कोई औषधालय मिलता था, उस समय लोग कम बीमार होते थे। यह नहीं कि उस समय संसार में रोग थे ही नहीं, तब लोगों के मन की दशा और थी, लोग समझते थे कि रोगी हो गये तो चिकित्सा किस से करायेंगे। इसलिए वे शरीर में कोई दोष देखते ही लंघन (उपवास) कर लेते थे, क्योंकि उपवास संसार के बहुत से रोगों की उत्तम चिकित्सा है, यदि आरंभ में ही उचित समय पर किया जाय तो आजकल परहेज कहाँ? पेट में दर्द हो रहा है, पर माँस अवश्य खाना है, हलुवा और मटर पनीर घर में पके हैं उन्हें क्यों कर छोड़ा जाय? हमारे पूर्वजों का औषधियों पर एक पैसा भी खर्चना बहुत भारी प्रतीत होता था, पर आज कल आमदनी का एक बड़ा भाग वैद्य डाक्टरों की भेंट हो जाता है। यह भी खर्च का एक आवश्यक भाग हो गया है। इस कारण लोगों को अब यह खर्च अधिक प्रतीत ही नहीं होता। कुपथ्य और कुकर्म भी करते रहते हैं और औषधियाँ खाते रहते हैं।

यह भी चालू है और वह भी चालू है। आज से 50-60 वर्ष पहले तक की बूढ़ी स्त्रियाँ उपवास, स्वेद (पसीना) और भोजन के खास-खास कड़े परहेजों से बड़ी-बड़ी बीमारियों को ठीक कर लेती थीं। वे कभी इतने लम्बे चौड़े नुस्खों की आवश्यकता नहीं समझती थीं। साधारण चीजों सोंठ, पीपील, हरड़, आँवला, सनाय, अमलतास, गुलकन्द, बाँसा, निरायता, चाकसू, गूगल, सज्जीखार, एरंडबीज, दालचीनी, लौंग, सौंफ, अजवायन, नौसादर आदि से ही प्रायः प्रत्येक रोग को आरंभ में ही जीत लेती थीं मलेरिया, हैजा (विशूचिका), मिआदी बुखार (टाइफ़ाइड, सन्निपात) जिस रोग के दिन आये, उसी की बाबत अपने नगर के वैद्य वृद्धों से बचाव की बातें पूछ कर अपने परिवार को उनसे बचाये रखती थीं। पर अब प्रायः नये जमाने के स्त्री-पुरुषों के दिमाग से ये विचार दूर होते जाते हैं। डॉक्टर वैद्य की पराधीनता लोगों को प्रतीत ही नहीं होती, यह भावना ही रोग के चंगुल से हमें मुक्त नहीं होने देती। कुछ विचारिये कुछ सोचिये।

मैं प्रायः रोगियों से घिरा रहता हूँ। मेरे कानों में प्रतिक्षण रोगियों के दुःख दर्द के किस्से पड़ते रहते हैं। रोगी की दर्द भरी कहानी, उसकी पल-पल पर बढ़ती हुई परेशानी, उनके परिवार की बेचैनी, उसके बच्चों के सहमे हुये चेहरे, धड़कते हुये दिल, उन सब की चिंता और लाचारी, उनका बार-बार अत्यन्त करुण स्वर में पूछना- क्यों कविराज जी? आपने क्या देखा है? आपने क्या समझा है? क्या यह रोगी अच्छा हो जायेगा? इस जीवन और मृत्यु की खैंच-तान को देखकर कौन पत्थर दिल होगा जो न पसीजेगा। मैं पाठकों से छिपाना नहीं चाहता, अनेक बार ऐसा दृश्य देखकर मेरा दिल भर आया, आँखों में आँसू आ गये। रोगी और उसके परिजनों से नजर बचाकर मैं किसी बहाने दूसरे कमरे में चला गया, मुँह धोकर और दिल को मजबूत करके फिर लौट आया। रोगी को विदा करते ही मैंने अनेक बार दिल में कहा मेरी भी ऐसी दशा हो सकती है। मेरे बच्चों को इसी प्रकार रोग घेर सकते हैं। परन्तु कुछ क्षणों के पश्चात ही हृदय को एक शाँति सी मिल जाती कि कोई रोग हमारी ओर से लिए हुए बिना नहीं आ सकता। रोगों के मूल कारणों की खोज करने से नब्बे प्रतिशत सिद्ध हुआ कि इनकी तह में कोई न कोई चस्का है। खाने का चस्का, पीने का चस्का और स्त्री संभोग का चसका, रंडीबाज़ी का चसका और इसी प्रकार के अनेक अन्य चस्के अदूरदर्शी और मन की मौज करने वाले लोगों को पथ-भ्रष्ट कर देते हैं। वे लोग आरंभ में प्रकृति के संकेत को समझने और अपनी भूल सुधारने से इन्कार करते हैं। परिणाम यह होता है कि रोग बढ़कर असाध्य हो जाता है और प्रकृति अपना बदला चुका लेती है।

मैंने उनको विपत्ति में फंसते देखा जो उड़द की दाल जैसी हानि रहित प्रतीत होने वाली चीज लगातार कई वर्ष तक प्रातः सायं अधिक मात्रा में और काफी घी डालकर खाते रहे। उनसे उन के पेट की मशीन ऐसी बिगड़ी कि सुधारे न सुधार सकी। माँस भक्षण में अधिकता करने वाले हजारों को मधुमेह, गठिया, जोड़ों के दर्द आदि रोगों के तरह कष्ट पाते देखा। स्त्री-संभोग में कोई दिन खाली न छोड़ने वाले लाखों जीवन से हाथ धो बैठे, नित्य सिनेमा दिखने वाले सैंकड़ों ऐसे भी नवयुवकों को जानता हूँ, जिन को अब दिन में ऊंट दिखाई नहीं देता। व्यायाम से जी चुराने वाले-जिनको आराम तलबी का चस्का कुछ हाथ पैर हिलाने नहीं देता-करोड़ों हैं, जो जीते तो हैं, पर जीवन का वह मधुर आनन्द उठाने में वंचित हैं। जो एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को प्राप्त है। किसी के विबन्ध (कब्ज) है। किसी को खाना अच्छी तरह नहीं पचता, किसी का लहू बिगड़ रहा है। किसी का जुकाम पीछा नहीं छोड़ता, किसी को चार छः मील चलते साँस फूल जाता है, किसी का शरीर चूहे जितना, किसी का कद बटेर जितना कोई मजनू की तरह दुर्बल लैला की अंगुली की तरह पतला एक से एक बढ़कर। एक अंग्रेज लेखक ने बहुत ही ठीक लिखा है- “मनुष्य मरता कभी नहीं, वरन् अपने आपको स्वयं ही मार देता है। हम वैद्य हकीम और डॉक्टर लोग इस सचाई को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। इसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं।”

इन समस्त कुपथ्यों और दुराचारों का प्रभाव इतना धीरे-धीरे होता है कि हम जान नहीं पाते कि कब और किस तरह ये हमारे स्वास्थ्य भवन की एक-एक कड़ी (शहतीरी) को, हमारे स्वास्थ्य की पुस्तक के एक-एक पृष्ठ को घुन कीड़े की तरह खा जाते हैं।

जहाँ स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करने से इतनी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है, वहाँ स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने से असंख्य सुख-सम्पत्ति से भेंट होती है। आप विपत्ति चाहते हैं या सुख-सम्पत्ति? आपका उत्तर स्वभावतः यही होगा कि ‘सुख-सम्पत्ति’। निश्चय ही आपकी यह इच्छा पूरी होनी न असंभव है और न कठिन। आज ही प्रकृति की आवाज सुनो, मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि दो चार मास में ही आप अपने स्वास्थ्य में आकाश-पाताल का अन्तर पाएंगे। परन्तु इस संसार में प्रत्येक सुखोपभोग की प्राप्ति के लिए त्याग और परिश्रम की आवश्यकता है। इसी प्रकार स्वास्थ्य भी उन्हीं को अपनाता है, जो उसकी प्राप्ति के लिए सच्चे दिल से यत्न करते हैं और चस्कों को तिलाँजलि दे देते हैं। बैठे-बैठाये न धन सम्पत्ति मिलती है और न बैठे-बैठाये स्वास्थ्य मिलता है।

मित्रो! स्वास्थ्य इस संसार में कीमती से कीमती, सुन्दर से सुन्दर और बलवान से बलवान है। धनियों की धनिकता का रहस्य, सौंदर्यशालियों के सौंदर्य का रहस्य और महावीरों की वीरता का रहस्य स्वास्थ्य है। हमें प्रतिदिन यह बात अपने परिवार के तथा संपर्क में आने वालों के दिमाग में घुसेड़नी चाहिए कि यदि हम संकल्प कर लें कि बीमार नहीं होना और संयम तथा नियम से जीवन व्यतीत करके रोग को दूर भगाए रखना है, तो निश्चय ही यह संकल्प सिद्ध होगा। दृढ़ निश्चय से विद्यार्थी पास होते हैं, दृढ़ संकल्प के स्वास्थ्य चाहने वाले मनुष्य अपने स्वास्थ्य की नैय्या को रोग के भंवर से बचाए रखते हैं।


Quotation

नारी पुरुष की अर्धांगिनी है, उसकी सबसे बड़ी मित्र है। धर्म अर्थ काम का मूल है। जो इसका अपमान करता है, काल उसे नष्ट कर देता है।

-महाभारत

****

असत्य को बार-बार प्रयोग करते रहने से उसकी आयु बढ़ जाती है। अपनी स्वार्थपरता से असत्य की आयु को बढ़ा देने के समान कोई दूसरा पाप नहीं है। -शरद बाबू

*****

झूठ बोलना कायरता का चिह्न है। -सदन

*****

तृष्णा सुख का भयंकर शत्रु है। -नारायण

*****

तृष्णा ने मनुष्य जाति पर ऐसा अधिकार जमा लिया है कि सम्पत्ति को अपने अधिकार में करने की अपेक्षा लोग सम्पत्ति के अधिकार में हो गये हैं।

-प्लीनी


गायत्री साधना से अनेकों प्रयोजनों की सिद्धि

गायत्री मंत्र सर्वोपरि मंत्र है। इससे बड़ा और कोई मंत्र नहीं। जो काम संसार के किसी अन्य मंत्र से हो सकता है वह निश्चित रूप से गायत्री द्वारा हो सकता है। दक्षिण मार्गी योग साधक वेदोक्त पद्धति से जिन जिन कार्यों के लिए अन्य किसी मंत्र से सफलता प्राप्त करते हैं वे सब प्रयोजन गायत्री से पूरे हो सकते हैं। इसी प्रकार ताँत्रिक जो कार्य तंत्र प्रणाली से किसी मंत्र के आधार पर करते हैं वह सब भी गायत्री द्वारा किये जा सकते हैं। यह एक प्रचंड शक्ति है जिसे जिधर भी लगा दिया जायेगा उधर ही चमत्कारी सफलता मिलेगी।

काम्य कर्मी के लिए, सकाम प्रयोजनों के लिए अनुष्ठान करना आवश्यक होता है। सवा लक्ष का पूर्ण अनुष्ठान, चौबीस हजार का आँशिक अनुष्ठान अपनी-अपनी मर्यादा के अनुसार फल देते हैं। जितना गुड़ डालो उतना मीठा वाली कहावत इस क्षेत्र में भी चरितार्थ होती है। साधना और तपश्चर्या द्वारा जो आत्मबल संग्रह किया गया है उसे जिस काम में भी खर्च किया जायेगा उसका प्रतिफल अवश्य मिलेगा। बन्दूक उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी, जितने बढ़िया और जितने अधिक कारतूस होंगे। गायत्री की प्रयोग विधि एक प्रकार की आध्यात्मिक बन्दूक है। तपश्चर्या और साधना द्वारा संग्रह की हुई आत्मिक शक्ति कारतूसों की पेटी है। दोनों के मिलने से ही निशाने को मार गिराया जा सकता है। कोई व्यक्ति प्रयोग विधि जानता हो पर उसके पास साधना बल न हो तो ऐसा ही परिणाम होगा जैसा खाली बन्दूक का घोड़ा बार-बार चटका कर कोई यह आशा करे कि अचूक निशाना लगेगा। इसी प्रकार जिनके पास तपोबल तो है पर उसका काम्य प्रयोजन के लिए विधिवत प्रयोग करना नहीं जानते वे वैसे हैं जैसे कोई कारतूस की पोटली बाँधे फिरे और उन्हें हाथ से फेंक-फेंक कर शत्रुओं की सेना का संहार करना चाहे। यह उपहासास्पद तरीके हैं।

आत्मबल संचय करने के लिए जितनी अधिक साधनाएं की जायं उतना ही अच्छा है पाँच प्रकार के साधक गायत्री सिद्ध समझे जाते हैं- 1. लगातार बारह वर्ष तक कम से कम एक माला नित्य जप किया हो 2. गायत्री की ब्रह्म संध्या को लगातार नौ वर्ष किया हो 3. ब्रह्मचर्य पूर्वक पाँच वर्ष तक एक हजार मंत्र नित्य जपे हों। 4. चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया हो 5. एक वर्ष तक गायत्री तप किया हो। जो व्यक्ति इन साधनाओं में कम से कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, गायत्री मंत्र का काम्य कर्म में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले या सवा लक्ष वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास है वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं।

नीचे कुछ खास-खास प्रयोजनों के लिए गायत्री के प्रयोग की विधियाँ दी जाती हैं-

रोग निवारण-

स्वयं रोगी होने पर जिस स्थिति में भी रहना पड़े उसी में मन ही मन गायत्री का जप करना चाहिए। एक मंत्र समाप्त होने और दूसरा आरंभ होने के बीच में एक बीज मंत्र का सम्पुट भी लगाते चलना चाहिए। सर्दी प्रधान (कफ) रोगों में ‘ऐ’ बीज मंत्र, गर्मी प्रधान पित्त रोगों में ‘ऐं’ अपच एवं विष प्रधान (वात) रोगों में ‘हुँ’ बीज मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। निरोग होने के लिए वृषभ वाहिनी हरितवस्त्रा गायत्री का ध्यान करना चाहिये।

दूसरों को निरोग करने के लिए भी इन्हीं बीज मंत्रों का और इसी ध्यान का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के पीड़ित अंगों पर उपरोक्त ध्यान और जप करते हुए हाथ फिराना, जल अभिमंत्रित करके रोगी पर मार्जन देना एवं छिड़कना। इन्हीं स्थितियों में तुलसी पत्र और काली मिर्च गंगाजल में पीस कर दवा के रूप में देना, यह सब उपचार ऐसे हैं जो किसी भी रोग के रोगी पर किये जायें उसे लाभ पहुँचाये बिना न रहेंगे।

विष निवारण-

सर्प, बिच्छू, बर्र, ततैया, मधुमक्खी और जहरीले जीवों के काट लेने पर बड़ी पीड़ा होती है। साथ ही शरीर में विष फैलने से मृत्यु तक हो जाने की संभावना रहती है। इस प्रकार की दुर्घटनाएं घटित होने पर गायत्री शक्ति द्वारा उपचार किया जा सकता है।

पीपल वृक्ष की समिधाओं से विधिवत हवन करके उसकी भस्म को सुरक्षित रख लेना चाहिए। अपनी नासिका का जो स्वर चल रहा है उसी हाथ पर थोड़ी सी भस्म रख कर दूसरे हाथ से उसे अभिमंत्रित करते चलो और बीच में ‘हुँ’ बीज मंत्र का संपुट लगावे तथा रक्तवर्ण, अश्वारुढ़ा गायत्री का ध्यान करते हुए उस भस्म को विषैले कीड़े के काटे हुए स्थान पर दो चार मिनट मसलें। पीड़ा में जादू के समान आराम होता है।

सर्प के काटे हुए स्थान पर रक्त चंदन से किये हुए हवन की भस्म मलनी चाहिए और अभिमंत्रित करके घृत पिलाना चाहिए। पीली सरसों को अभिमंत्रित करके उसे पीसकर दसों इन्द्रियों के द्वार पर थोड़ा लगा देना चाहिए। ऐसा करने से सर्प विष दूर हो जाता है।

बुद्धि-वृद्धि -

गायत्री प्रधानतः बुद्धि को शुद्ध, प्रखर और समुन्नत करने वाला मंत्र है। मन्द बुद्धि, स्मरण शक्ति की कमी वाले लोग इससे विशेष रूप से लाभ उठा सकते हैं। जो बालक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं, पाठ ठीक प्रकार याद नहीं कर पाते उनके लिए निम्न उपासना बड़ी उपयोगी है।

सूर्योदय के समय, प्रथम किरणों को पानी से भीगे हुए मस्तक पर पड़ने दें। पूर्व की ओर मुख करके अध खुले नेत्रों से सूर्य का दर्शन करते हुए आरंभ में तीन बार ॐ का उच्चारण करते हुए गायत्री का जप करें। कम से कम एक माला (108 मंत्र) अवश्य जपने चाहिए। पीछे दोनों हाथों का हथेली भाग सूर्य की ओर इस प्रकार करें मानों आग पर ताप रहे हैं। इस स्थिति में बारह मंत्र जप कर हथेलियों को आपस में रगड़ना चाहिए और उन उष्ण हाथों को मुख, नेत्र, नासिका, ग्रीवा, कर्ण, मस्तक, आदि समस्त शिरोभागों पर फिराना चाहिए।

राजकीय सफलता

किसी सरकारी कार्य मुकदमा, राज्य स्वीकृति, नियुक्ति आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए गायत्री का उपयोग किया जा सकता है। जिस समय अधिकारी के सम्मुख उपस्थित होना हो अथवा कोई आवेदन पत्र लिखना हो उस समय यह देखना चाहिए कि कौन सा स्वर चल रहा है। यदि दाहिना स्वर चल रहा हो तो पीत वर्ण ज्योति का मस्तिष्क में ध्यान करना चाहिए और यदि बाँया स्वर चल रहा हो तो हरे रंग के प्रकाश का ध्यान करना चाहिए। मंत्र में सप्त व्याहृतियाँ लगाते हुए ॐ भूर्भुवः स्वः तपः जनः महः सत्यम्। बारह मंत्रों का मन ही मन जप करना चाहिए। दृष्टि उस हाथ के अंगूठे के नाखून पर रखनी चाहिए, जिसका स्वर चल रहा हो। भगवती की मानसिक आराधना, प्रार्थना करते हुए राजद्वार में प्रवेश करने से सफलता मिलती है।

दरिद्रता का नाश-

दरिद्रता, हानि ऋण, बेकारी, साधन हीनता वस्तुओं का अभाव, कम आमदनी बढ़ा हुआ खर्च, कोई रुका हुआ आवश्यक कार्य आदि की अर्थ चिन्ता से मुक्ति दिलाने में गायत्री साधना बड़ी सहायक सिद्ध होती है। उससे ऐसी मनोभूमि तैयार हो जाती है। जो वर्तमान अर्थ चक्र से निकाल कर साधक को संतोष जनक स्थिति पर पहुँचा दे।

दरिद्रता नाश के लिए गायत्री की श्रीं शक्ति की उपासना करनी चाहिए। मंत्र के अन्त में तीन बार श्रीं बीज का सम्पुट लगाना चाहिए। साधन काल के लिए पीले वस्त्र, पीले पुष्प, पीला यज्ञोपवीत, पीला तिलक, पीला आसन उपयोग करना चाहिए। शरीर पर शुक्रवार को हल्दी मिले हुए तेल की मालिश करनी चाहिए और रविवार को उपवास करना चाहिए। पीताम्बर धारी, हाथी पर चढ़ी हुई गायत्री का ध्यान करना चाहिए। पीत वर्ण लक्ष्मी का प्रतीक है, भोजन में भी पीली चीजें प्रधान रूप से लेनी चाहिए। इस प्रकार की साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।

सुसन्नति की प्राप्ति-

जिनके सन्तान नहीं होती है, होकर मर जाती है, रोगी रहती है, गर्भपात हो जाते हैं, केवल कन्याएं होती हैं तो इन कारणों से माता पिता को दुख रहना स्वाभाविक है। इस प्रकार के दुखों से भगवती की कृपा द्वारा छुटकारा मिल सकता है।

इस प्रकार की साधना में स्त्री पुरुष दोनों ही सम्मिलित हो सकें तो बड़ा अच्छा, एक पक्ष के द्वारा ही पूरा भार कंधे पर लिए जाने से आँशिक सफलता ही मिलती है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख होकर साधना पर बैठें। नेत्र बन्द करके श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत किशोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में लिए हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन संपुट लगा कर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।

नासिका से साँस खींचते हुए पेडू तक ले जानी चाहिए पेडू को जितना वायु से भरा जा सके भरना चाहिए। फिर साँस रोक कर ‘यं’ बीज संपुटित गायत्री का कम से कम एक अधिक से अधिक तीन बार जप करना चाहिए। फिर धीरे-धीरे साँस को निकाल देना चाहिए। इस प्रकार पेडू में गायत्री शक्ति का आकर्षण और धारण कराने वाला यह प्राणायाम दस बार करना चाहिए। तदंतर अपने वीर्य कोष या गर्भाशय में शुभ्र वर्ण ज्योति का ध्यान करना चाहिए। यह साधन स्वस्थ, सुन्दर तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान सन्तान उत्पन्न करने के लिए है।

इस साधना के दिनों में प्रत्येक रविवार को चावल, दूध, दही आदि केवल श्वेत वस्तुओं का ही भोजन करना चाहिए।

शत्रुता का संहार -

द्वेष, कलह, मुकदमा बाजी, मनमुटाव को दूर करना और अत्याचारी अन्यायी अकारण आक्रमण करने वाली मनोवृत्ति का संहार करना, आत्मा तथा समाज में शाँति रखने के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए चार क्लीं बीज मंत्रों के संपुट समेत रक्त चंदन की माला से पश्चिमाभिमुख होकर गायत्री का जप करना चाहिए। जप काल में शिर पर यज्ञ भस्म का तिलक लगाना तथा ऊन का आसन बिछाना चाहिए। लाल वस्त्र पहने, सिंहारुढ़, खड्ग हस्ता, विकराल बदना दुर्गा वेषधारी गायत्री का ध्यान करना चाहिए।

जिन व्यक्तियों का द्वेष दुर्भाव निवारण करना हो उनका नाम पीपल के पत्ते पर रक्त चंदन की स्याही और अनार की कलम द्वारा लिखना चाहिए। इस पत्ते को उल्टा रख कर प्रत्येक मंत्र के बाद जल पात्र में से एक छोटी चमची भरके जल लेकर उस पत्ते पर डालना चाहिए। इस प्रकार 108 मंत्र नित्य जपने चाहिए। इससे शत्रु के स्वभाव का परिवर्तन होता है और उसको द्वेष कराने वाली सामर्थ्य घट जाती है।

भूत बाधा की शाँति-

कुछ मनोवैज्ञानिक कारणों, शारीरिक विकृतियों तथा प्रेतात्माओं के कोप से कई बार भूत बाधा के उपद्रव होने लगते हैं। कोई व्यक्ति उन्मादियों जैसी चेष्टा करने लगता है, उसके मस्तिष्क पर किसी दूसरी आत्मा का आधिपत्य दृष्टि गोचर होता है। इसके अतिरिक्त कोई मनुष्य या पशु ऐसी विचित्र दशा का रोगी होता है जैसा कि साधारण रोगों में नहीं होता। भयानक आकृतियाँ दिखाई पड़ना, अदृश्य मनुष्यों द्वारा की जाने जैसी क्रियाओं का देखा जाना, भूत बाधा के लक्षण हैं।

इसके लिए गायत्री हवन सर्वश्रेष्ठ है। सतोगुणी हवन सामग्री से विधि पूर्वक यज्ञ करना चाहिए और रोगी को उसके निकट बिठा लेना चाहिए। हवन की अग्नि में तपाया हुआ जल रोगी को पिलाना चाहिए। बुझी हुई यज्ञ भस्म सुरक्षित रख लेनी चाहिए। किसी रोगी को अचानक भूत बाधा हो तो उस यज्ञ भस्म को उसके हृदय, ग्रीवा मस्तक, नेत्र कर्ण, मुख नासिका आदि पर लगाना चाहिए।

दूसरों को प्रभावित करना -

जो व्यक्ति अपने प्रतिकूल हैं उन्हें अनुकूल बनाने के लिए अंतुष्टों को संतुष्ट करने के लिए, उपेक्षा करने वालों में प्रेम उत्पन्न करने के लिए गायत्री द्वारा आकर्षण क्रिया की जा सकती है। वशीकरण तो घोर ताँत्रिक क्रियाओं द्वारा ही होता है पर चुम्बकीय आकर्षण, जिससे किसी व्यक्ति का मन अपनी ओर सद्भावना पूर्वक आकर्षित हो गायत्री की दक्षिण मार्गी इस योग साधना से भी हो सकता है।

गायत्री का जप तीन प्रणव लगाकर जपना चाहिए और ऐसा ध्यान करना चाहिए कि अपनी त्रिकुटी मस्तिष्क का मध्य भाग) में से एक नील वर्ण विद्युत तेज की रस्सी जैसी शक्ति निकल कर उस व्यक्ति तक पहुँचती है जिसे आपको आकर्षित करना है और उसके चारों ओर अनेक लपेट मारकर लिपट जाती है। इस प्रकार लिपटा हुआ वह व्यक्ति अर्ध तंद्रित अवस्था में धीरे-धीरे खिंचता चला आता है और अनुकूलता की प्रसन्न मुद्रा उसके चेहरे पर छाई हुई है। आकर्षण के लिए यह ध्यान बड़ा प्रभावशाली है।

किसी के मन में मस्तिष्क में, उसके अनुचित विचार हटाकर अपने उचित विचार भरने हों तो, ऐसा करना चाहिए कि शाँत चित्त होकर उस व्यक्ति को अखिल नील आकाश में अकेला सोता हुआ ध्यान करें और भावना करें कि उसके कुविचारों को हटाकर आप उसके मन में सद्विचार भर रहे हैं। इस ध्यान साधना के समय अपना शरीर भी बिल्कुल शिथिल और नील वस्त्र से ढ़का हुआ होना चाहिए।

रक्षा-कवच-

किसी शुभ दिन उपवास रखकर, केशर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, गोरोचन इन पाँच चीजों के मिश्रण की स्याही बनाकर अनार की लकड़ी से पाँच प्रणव संयुक्त गायत्री मंत्र बिना पालिश किये हुए कागज या भोजपत्र पर लिखना चाहिए। यह कवच चाँदी के ताबीज में बन्द करके जिस किसी को धारण कराया जाय उसकी सब प्रकार रक्षा करता है। रोग, अकाल मृत्यु, शत्रु, चोर, हानि, बुरे दिन, कलह, भय, राजदंड, भूत प्रेत, अभिचार आदि से यह कवच रक्षा करता है। इसके प्रताप और प्रभाव से शारीरिक, आर्थिक और मानसिक सुख साधनों में वृद्धि होती है।

काँसे की थाली में उपरोक्त प्रकार से गायत्री मंत्र लिख कर उसे प्रसव कष्ट से पीड़ित प्रसूता को दिखाया जाय और फिर पानी से धोकर उसे पिला दिया जाय तो कष्ट दूर होकर, सुख पूर्वक शीघ्र प्रसव हो जाता है।

बुरे मुहूर्त और शकुनों का परिहार-

कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं कि कोई कार्य करना या कहीं जाना है पर उस समय कोई शकुन या मुहूर्त ऐसे उपस्थित हो रहे हैं जिनके कारण आगे कदम बढ़ाते हुए झिझक होती है। ऐसे अवसरों पर गायत्री की एक माला जपने के पश्चात कार्य आरंभ किया जा सकता है। इससे सारे अनिष्टों और आशंकाओं का समाधान हो जाता है। और किसी अनिष्ट की संभावना नहीं रहती। विवाह न बनता हो या विधिवर्ग न मिलता हो, विवाह मुहूर्त में सूर्य, बृहस्पति चन्द्रमा आदि की बाधा हो तो चौबीस हजार जप का नौ दिन वाला लघु अनुष्ठान करके विवाह कर देना चाहिए। ऐसे विवाह से किसी प्रकार का अनिष्ट होने की कोई संभावना नहीं है। वह सब प्रकार शुद्ध और ज्योतिष सम्मत विवाह के समान ही ठीक माना जाना चाहिए।

बुरे स्वप्नों के फल का नाश

कई बार ऐसे भयंकर स्वप्न दिखाई पड़ते हैं जिनसे स्वप्न काल में भी बड़ा त्रास और दुख मिलता है एवं जागने पर भी उनका स्मरण करके दिल धड़कता रहता है। ऐसे स्वप्न किसी अनिष्ट की आशंका का संकेत करते हैं। जब ऐसे स्वप्न हों तो एक सप्ताह तक प्रतिदिन दस-दस मालाएं गायत्री जप करना चाहिए और गायत्री का पूजन करना या कराना चाहिए। गायत्री सहस्र नाम या गायत्री चालीसा का पाठ भी दुःस्वप्नों के प्रभाव को नष्ट करने वाला है।

उपरोक्त पंक्तियों में कुछ थोड़े से प्रयोग और उपचारों का आभास कराया गया है। अनेक विषयों में अनेक विधियों से गायत्री का जो उपयोग हो सकता है उसका वर्णन बहुत विस्तृत है। वह ऐसे छोटे-मोटे लेखों में नहीं आ सकता। उसे तो स्वयं अनुभव करके अथवा इस मार्ग के किसी अनुभवी सफल प्रयोक्ता को पथ-प्रदर्शक नियुक्त करके ही जाना जा सकता है। गायत्री की महिमा अपार है। वह कामधेनु है। उसकी साधना उपासना करने वाला कभी भी निराश नहीं लौटता।


कृपा कर अधिक बाल बच्चे उत्पन्न न कीजिए।

(श्री गोरी शंकर महता)

राष्ट्र के स्वास्थ्य को यदि दुर्बल नहीं बनाना है- भावी सन्तान को यदि अपने पूर्वजों की भाँति हृष्ट-पुष्ट और शक्तिशाली बनाना अभीष्ट है तो वर्तमान पारिवारिक जीवन पर नियंत्रण रखकर, दिन प्रतिदिन होने वाली जनसंख्या की वृद्धि को रोकना आवश्यक है। जिनकी आमदनी बहुत थोड़ी है वे शादी ही क्यों करें? जिस जिम्मेदारी को निभाने की उनमें शक्ति नहीं उसे वे अपने दुर्बल कंधों पर लें ही क्यों? पर यहाँ तो बहुत छोटी उम्र में ही शादी कर दी जाती है और जिस उम्र में यूरोप तथा अमेरिका आदि उन्नत देशों के लोग शादी का नाम ही नहीं लेते, उसी उम्र में हमारे यहाँ के नौजवान कई बच्चों के पिता बन जाते हैं। इसका परिणाम आँखों के सामने चारों ओर दिखाई पड़ रहा है। हजारों गृह देवियाँ जवानी में ही बुढ़ापे का अनुभव करती हैं, अनेक प्रकार के भयंकर रोगों का शिकार बन जाती हैं। इनसे जो बच्चे उत्पन्न होते हैं उनकी भी दशा देखिए। किसी का पेट निकला हुआ है तो किसी के गाल पिचके हुए हैं और किसी का सिर ही सिर दिखाई पड़ता है। इसमें इन बेचारों का क्या कसूर? दुर्बल माता-पिता से हृष्ट-पुष्ट बच्चे की आशा कैसे की जा सकती है? फलतः हमारी भावी पीढ़ी और भी कमजोर होती जा रही है- शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही दृष्टियों से देखा तो आज लाखों रोगियों की मृत्यु इसलिए होती है कि वे अपनी गरीबी के कारण चिकित्सा की समुचित व्यवस्था नहीं कर सकते। कोई आदमी किसी दफ्तर में नौकरी करता है, उसी पर परिवार के भरण-पोषण का भार है। वह बीमार पड़ता है और यदि किसी प्रकार अच्छा हुआ तो भी नौकरी चले जाने के भय से पूरे समय तक विश्राम नहीं कर सकता। स्वास्थ्य अच्छी तरह सुधरा नहीं कि दफ्तर की ओर चल पड़े। परन्तु शरीर तो नौकरी की परवा नहीं करता और न रोग ही किसी की नौकरी छूट जाने से डर सकता है। परिणाम वही होता है जो ऐसी अवस्था में हो सकता है-अकाल मृत्यु, सारा परिवार दुख सागर में डूब जाता है। बहुधा कोई उनकी खोज-खबर लेने वाला भी नहीं रह जाता। यह कोरी कल्पना नहीं है, नित्य हजारों ऐसी घटनाएं हो रही हैं। जितनी आमदनी में सिर्फ दो आदमियों का गुजारा मुश्किल से हो सकता है, उतने से ही अगर आधे दर्जन संतान सहित गुजारा करना पड़े, तो इसके सिवा और दूसरा परिणाम क्या हो सकता है? अतएव वर्तमान परिस्थिति में चाहे जिस दृष्टि से देखा जाय, सन्तान निग्रह नितान्त आवश्यक हो गया है-बल्कि यह कहना चाहिये कि वर्तमान कष्टों को कम करने और दिन पर दिन बढ़ने वाली भयंकर मृत्यु संख्या को घटाने का यही एकमात्र उपाय है।

तीन सौ वर्ष पहले भारत की आबादी सिर्फ 10 करोड़ थी और आज कितनी है- 47 करोड़ से अधिक। अट्ठारहवीं सदी में भी भारत की आबादी 15 करोड़ से अधिक नहीं रही थी, लेकिन अब तो घनघोर बढ़ाव छिड़ा हुआ है। चाहे लोग मर जायें, पच्चीस वर्ष में ही, लेकिन तीन-चार बालबच्चे छोड़ ही जायेंगे। कुछ ऐसा आबादी बढ़ाने का चस्का, इस मुल्क के लोगों को पड़ गया है कि दुनिया को हैरत होती है। 1931 में आबादी 35 करोड़ 3 लाख थी और अब 47 करोड़ से अधिक है। यह बढ़ती सब जगह हुई है। यू.पी. में जनसंख्या 2 करोड़ से 5 करोड़, बिहार में 50 लाख से 2 करोड़, बंगाल में 1 करोड़ से 5 करोड़, 1 लाख हो गई है। इस तरह आप देखेंगे कि 3 करोड़ से आबादी बढ़ते-बढ़ते 12 करोड़ 50 लाख हो गई है। इतनी सब बढ़ती गंगा नदी के कछार वाले प्रदेश में ही हुई है।

और इसी के साथ-साथ नहरों और सिंचाई के नये-नये साधनों के उपलब्ध हो जाने से गंगा के कछार में खेती का रकबा और भी बढ़ गया है। पहले 75 फीसदी जमीन में ही गंगा के कछार में आबादी होती थी, लेकिन अब 95 फीसदी रकबे में खेती हो रही है। अब आप सोच लीजिये कि आखिर अगर आबादी बढ़ती गई, तो क्या होगा? सिर्फ 5 फीसदी जमीन और बाकी है, जिसमें खेती हो सकती है।

और इस 95 फीसदी जमीन को खेती के लिए कैसे प्राप्त किया गया है। जंगल काट डाले गये हैं, दलदल सुखा डाले गये हैं और जो भी तरीके हो सकते हैं, उन सब से काम लेकर खेती की गई है। लेकिन आबादी बढ़ती गई। आबादी इतना बढ़ गई है और जमीन के इतने छोटे-छोटे खण्ड हो गये हैं कि ठिकाना नहीं। इस हालत में किसान ने पेट पालने के लिये खेत में थोड़ी जमीन में ज्यादा फसल हासिल करने का बन्दोबस्त कर लिया है और ऐसा ही हो रहा है। 1924-25 से आज तक यू.पी. में 4 लाख एकड़ अधिक जमीन में दो फसल बोई जा रही हैं। हर तरह की जमीन खेती के काम में आ रही है और आसाम और बर्मा को छोड़कर शेष भारत में 95 फीसदी जमीन हल के नीचे है।

यह बतलाने की जरूरत नहीं कि गंगा के कछार के प्रदेशों में कोई गुँजाइश तो अब ऐसी नहीं दीखती कि वहाँ खेती के लिए और जगह हो, क्योंकि जब 95 फीसदी जमीन में खेती हो रही है तो फिर 5 फीसदी सड़कों और मकान, नाले, झाड़ झंखाड़ के लिए तो छोड़ना ही पड़ेगा, चाहे आप पसंद करें अथवा नहीं।

अब जरा, भारत की उपज की ओर नजर डालिये। पिछले 3 वर्षों में चावल की उपज 6 प्रतिशत बढ़ गई है। गेहूँ की फसल कम होती है, भारत में 60001 लाख टन (27 मन का एक टन) गल्ला पैदा होता है। इसके सिवाय 7 लाख टन मछली वगैरह और 11,30,000 पौण्ड (2 पौण्ड का एक सेर) दूध होता है। हिसाब लगाने से हर आदमी को दिन भर में आधसेर ही खाने को दिया जाय, तो भारत के 4 करोड़ 80 लाख व्यक्तियों को खाने का कुछ नहीं मिलेगा। इस तरह मौजूदा हिसाब से भारत की 12 फीसदी आबादी भूखों मरती है।

इसलिए हमें देखना है कि, हम अगर अपनी आबादी को खाना देना चाहते हैं, तो कहाँ पर फसल उगायें? हिन्दुस्तान में 1620 लाख एकड़ जमीन बंजर पड़ी है। अगर इस बंजर जमीन पर भी खेती करने की सोची जाए तो, 290 लाख टन फसल पैदा हो सकेगी। लेकिन यह भी न भूलना चाहिए कि आबादी भी तो बढ़ रही है। अगर पिछले 150 सालों का उन्नति का सिलसिला आगे भी चलता गया, तो इस सदी के खत्म होने तक करीब 44 करोड़ 70 लाख और नये मनुष्य इस भारतभूमि की छाती रौंदने को तैयार मिलेंगे- चाहे वे भूखे नंगे ही क्यों न मरें।

कुछ लोग कृत्रिम उपायों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं और उसे समाज के लिए हानिकर समझते हैं, परन्तु यहाँ तक तो वे भी मानने के लिए तैयार हैं कि वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि को रोकना आवश्यक है। यों तो जनसंख्या की वृद्धि और उससे होने वाले कुपरिणामों की ओर अरस्तू और प्लेटो का भी ध्यान गया था परन्तु इस ओर सबसे अधिक ध्यान देने वाला पुरुष माल्थस था। गंभीर अध्ययन के पश्चात वह इस नतीजे पर पहुँचा कि यदि जनसंख्या की वृद्धि नहीं रोकी गयी तो इसका परिणाम महामारी, युद्ध और अकाल होगा। वास्तव में माल्थस की भविष्यवाणी आज सार्थक हुई दिखलाई पड़ रही है। 11 नवम्बर 1921 को प्रथम सन्तान निग्रह-सम्मेलन के प्लेटफार्म से मिस मारगरेटि सैंगर ने संसार को चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि तुम्हें स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करना है, अपनी सभ्यता का विकास करना है और संसार को दरिद्रता तथा परिवार के बोझ से बचाना है। बढ़ती हुई अयोग्य और अस्वस्थ जनसंख्या, जो संसार की योग्य और स्वस्थ सन्तान को मिटा रही है, उनसे राष्ट्र की स्वस्थ और योग्य शक्ति को बचाना है। और व्याधि, दरिद्रता, अपराध इत्यादि को संसार से मिटाना है तो वर्तमान समय में इसका एकमात्र उपचार सन्तान निग्रह ही है। इसी से विश्व को शाँति मिल सकती है।

संतान निग्रह का अर्थ है- उच्च अभिप्राय से गर्भ निरोध के साथ दाम्पत्य कार्यों का सुधार। सन्तान-निग्रह के मुख्यतः तीन उद्देश्य हैं-

1. मातृत्व रक्षा 2. बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकना 3. और औसतन गरीबों की बहुसंख्यक बच्चों से रक्षा करना। इन्हीं तीन बातों पर विचार कर देखना है कि वास्तव में इसके लिए सन्तान-निग्रह अत्यावश्यक है या नहीं?

1- मातृत्व की रक्षा- भारतवर्ष की माताओं की दशा सबसे गयी गुजरी है। वर्तमान समय में तो बहुत थोड़ी-सी ही माताएं हैं जो स्वस्थ संतान पैदा कर सकती हैं, अधिकतर अपरिपक्व अवस्था में ही वे माता बन जाती हैं। इसका परिणाम भी बुरा ही होता है। बच्चों की मृत्यु संख्या दिनों दिन बढ़ रही है। अयोग्य और अस्वस्थ सन्तान ही देखने में आ रही हैं। बिहार को ही लीजिये, जहाँ प्रतिवर्ष बच्चों की मृत्यु संख्या प्रति सहस्र 135 थी वहाँ इस समय बढ़कर 150 हो गई। देश भर की यही दशा है। सहवास-वयस्क समिति की रिपोर्टों को देखने से पता चल जाता है कि यहाँ की अधिकतर स्त्रियाँ 13 से 15 वर्ष की अवस्था में ही संतान उत्पन्न करती हैं। 18 वर्ष की अवस्था तक तो वे चार बच्चों की माँ बन जाती हैं। ऐसी दशा में मातृत्व की रक्षा कहाँ तक हो सकती है, यह प्रत्येक आदमी विचार कर सकता है। हमारे घर की स्त्रियाँ सदा किसी न किसी रोग से पीड़ित रहती हैं परन्तु समाज की उदासीनता के कारण उनकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं है। वे सन्तान उत्पन्न करते-करते तंग आ जाती हैं। सिरदर्द अपच तथा प्रसूत तो साधारण रोग हैं। इससे शायद ही कोई स्त्री बचती है। यह दुर्भाग्य की बात है कि बहुत सी स्त्रियाँ प्रसव के लिये अस्पतालों में लाई जाती हैं और बहुत सी वहीं पर काल के गाल में चली जाती हैं। इनसे जो संतान उत्पन्न होती हैं उनमें से अधिकतर तो मर ही जाती हैं और बाकी राजयक्ष्मा, मृगी, मस्तिष्क की कमजोरी इत्यादि से पीड़ित रहती हैं। साराँश यह कि मातृत्व की रक्षा नहीं होने के कारण वैश्याओं, रोगग्रस्त और अयोग्य सन्तानों, खानदानी बीमारियों, बच्चों की मृत्यु-संख्या, गृह कलह और भिखमंगों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मातृत्व की रक्षा के लिये सन्तान-निग्रह आवश्यक हो जाता है।

2- जनसंख्या- यों तो संसार की जनसंख्या कुछ न कुछ बढ़ ही रही है परन्तु भारत की जनसंख्या जिस तीव्र गति से बढ़ रही है उसे देखकर विचार शील लोग घबरा उठे हैं। इस देश का जीवन कृषि के ऊपर ही निर्भर करता है। पर यहाँ प्रति मनुष्य कुछ ही एकड़ भूमि पड़ती है। उसको दृष्टि में रखते हुए यहाँ की बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति की समस्या दिनों दिन गंभीर होती जा रही है।

भारत की जनसंख्या की समस्या को हल करने के लिए हमारे पास दो ही साधन हैं। या तो नये-नये उपनिवेशों पर अधिकार जमायें या जनसंख्या की वृद्धि रोकी जाय। इसके अतिरिक्त तीसरा संसाधन ही दृष्टिगोचर नहीं होता। इसमें पहला साधन तो वर्तमान समय में एक स्वप्न ही है। इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज की अवस्था में दूसरा साधन ही संभव है। जनसंख्या की इस तीव्र वृद्धि को रोकने के लिए संतान निग्रह के सिवा कोई भी साधन हमारे सामने नहीं है।

3- बहुसंख्यक बच्चे- वर्तमान समय में हिन्दुस्तान के प्रत्येक मनुष्य की औसत आमदनी इतनी कम है कि अधिकाँश लोग अपनी संतान के जीवन की रक्षा का प्रबंध नहीं कर सकते? उन्हें तो स्वयं ही भरपेट भोजन नहीं मिलता। अनेकों व्यक्ति अपने बच्चों को भूख से तड़पते देख कर आत्म-हत्या करते रहते हैं। बच्चों के लिए दवादारु, शिक्षा इत्यादि का उचित प्रबंध नहीं होने के कारण वे अपने पिता तथा राष्ट्र के लिए एक बोझ बन जाते हैं। इस बोझ को ढोने की उनमें ताकत नहीं होती। ऐसी अवस्था में गरीबों को इस भार से बचाने के लिए संतान निग्रह ही अमोघ अस्त्र है। इससे वे अपनी जीवन-रक्षा कर सकते हैं।

इन बातों से पता चल जाता है कि वर्तमान समय में हमारे समाज के लिए सन्तान-निग्रह अत्यावश्यक है। वह ब्रह्मचर्य के द्वारा हो तो सोने में सुगंध है। यदि न हो तो कृत्रिम उपायों का सहारा लेना भी स्थिति की भयंकरता की तुलना में अधिक बुरा नहीं है। अविवाहित जीवन व्यतीत करना, विवाहित होने पर कम से कम सन्तान उत्पन्न करना, यह दोनों कार्य आज की स्थिति में उत्कृष्ट देशभक्ति और धर्म धारणा के समान पुण्य कार्य हैं।


है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!


है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू

(श्री. राजकुमारी भारतीय)

तू अनादि, अनन्त, शाश्वत, सत्य-चित्-आनन्द दाता।

तू सनातन, मुक्त, चेतन, विश्व का-विधि का-विधाता।

तू अजर, अविनाश, अविचल, मेदिनी की दिव्य आशा।

तू अगम्य, अलिप्त, निश्चल, दिव्यता की भव्य भाषा।

है निरंजन रूप तू ही, है अभय, अक्षय, अमर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

तू अगर चाहे पलक में रेणु को पर्वत बना दे।

तू अगर चाहे क्षणिक में, बिन्दु में सागर समा दे।

तू अगर चाहे हिला दे विश्व को निज आत्म बल से।

तू अगर चाहे मिला दे भूमि को आकाश तल से।

है अगाध, असीम, अतुलित शक्ति तेरी, वीरवर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

राम में है तू रमा और कृष्ण का भी रूप पाया।

जिन, मोहम्मद, बुद्ध, ईसा इन सबों में तू समाया।

वेद, गीता, धम्मपद, श्रुति, शास्त्र सब तेरे बनाये।

है कुरान, पुरान में तेरे हृदय के भाव छाये।

तू नियन्ता है नियति का, कौन कहता शुद्र नर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

फिर बना मूर्छित, गलित सा आज क्यों निष्प्राण तू रे।

सिंह-शावक हो बना क्यों स्वार्थ लोलुप श्वान तू रे।

रे! युगों की चेतना का क्या यही उपहार लाया?

धिक् तुझे, तूने वृथा ही है पुरुष का जन्म पाया।

ज्ञान से जी-जी अगर तू, शान से मर-मर अगर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

रे, जरा पहचान तू है कौन? तेरा कर्म क्या है?

किस लिये आया जगत में और तेरा धर्म क्या है?

है प्रभु का अति दुलारा, प्राण प्यारा पुत्र तू रे।

जो बंधा जग से, विभु से, वह सुमंगल सूत्र तू रे।

इसलिये निष्काम हो, प्रभु ध्यान धर जग ताप हर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

है जगत के मंच पर अपना तुझे अभिनय दिखाना।

रे! पुरुष से है तुझे भगवान पुरुषोत्तम कहलाना।

जान ले निज-तत्व को पहचान ले निज सत्व को रे।

मूर्छना से जाग, कर्मठ बन, दिखा अपनत्व को रे।

छोड़ दे भय भीरुता, निर्द्वन्द्व हो निर्भय विचर तू। है पुरुष, पुरुषार्थ कर तू!!

*समाप्त*