गायत्री महाविज्ञान के पाँच अनुपम ग्रंथ रत्न

गायत्री मंत्र भारतीय धर्म की आत्मा है, जड़ है। हिन्दू धर्म गंगा है तो उसका उद्गम स्त्रोत-गंगोत्री-गायत्री में है। गायत्री से चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। वेदों में जो ज्ञान है वह बीज रूप से गायत्री में मौजूद है। इसी प्रकार श्रुति, स्मृति, उपनिषद्, शास्त्र, पुराण, दर्शन आदि में जो ज्ञान भण्डार भरा हुआ है वह सब गायत्री के थोड़े से अक्षरों में मौजूद है। इसीलिए गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना गया है, और उसकी नित्य उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।

गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी करने के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि-गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया होता, जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दश वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्वसाधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है।

(1) गायत्री विज्ञान- गायत्री शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन तथा परिचय, गायत्री की सरल, सुबोध एवं नित्य करने योग्य साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना, इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं।

(2) गायत्री रहस्य- गायत्री मंत्र के एक-एक अक्षर में ज्ञान का अगाध समुद्र भरा हुआ है। इन चौबीसों अक्षरों की ऐसी विस्तृत व्याख्या, विवेचना एवं मीमाँसा की गई है कि उनके गर्भ में छिपे हुए ज्ञान भंडार का परिचय भली प्रकार प्राप्त हो जाता है। अनेकों ऋषियों ने, शास्त्रों ने, वेद भाष्यकारों ने, राक्षस राज रावण ने गायत्री के जो विभिन्न अर्थ किये हैं वे सब भी इस पुस्तक में मौजूद हैं। ‘गायत्री रामायण’ भी इसी पुस्तक में संकलित है।

(3) गायत्री के अनुभव- वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में वर्णित गायत्री की महिमा तथा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के महापुरुषों ने गायत्री के संबंध में जो अपने अनुभव और अभिमत प्रकट किये हैं उन सबका इस पुस्तक में वर्णन है। साथ ही अनेक साधकों ने गायत्री की उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये हैं, उसके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये हैं।

(4) गायत्री तंत्र- गायत्री मंत्र को “मन्त्र राज” कहा है। उससे बड़ा कोई मंत्र नहीं है। जो कार्य संसार के अन्य किसी भी मंत्र से हो सकता है वह गायत्री मंत्र से भी हो सकता है। इस पुस्तक में दक्षिण मार्गी वेदोक्त, तथा बाम मार्गी तंत्रोक्त दोनों प्रकार की विधियाँ बताई गई हैं जिनके द्वारा सात्विक, राजस और तामसिक तीनों ही प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। पुरश्चरण, अभिचार, कवच, कीलक, मारण, सम्मोहन आदि सभी साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है।

(5) गायत्री योग- गायत्री द्वारा 12 योगों की साधना हो सकती है। प्रणव-योग, विश्व-योग, ध्यान-योग, सूर्य-योग, प्राण-योग, दिव्य-योग, विभु-योग, विज्ञान-योग, लय-योग, नाद-योग, षट्चक्र-योग, ग्रन्थि-योग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह सब इस पुस्तक में बताया गया है साथ ही गायत्री उपनिषद् भी है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है।

पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ। व्यवस्थापक-’अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।

वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-2


आरोग्य का साधन-विश्राम

अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है-

खशह्द्म, ह्लद्गद्वश्चद्गह्ड्डठ्ठष्द्ग ड्डठ्ठस्र ह्द्गह्यह्ल,

ह्रद्ध ड्डद्यद्य श्चद्धब्ह्यद्बष्द्बड्डठ्ठह्य ड्डह्द्ग ह्लद्धद्ग ड्ढद्गह्यह्ल.

अर्थात् श्रम, संयम और विश्राम- संसार के चिकित्सकों में सर्वश्रेष्ठ हैं। मनुष्य खूब मौज से दिल लगाकर श्रम करे, जीवन में संयम से कार्य ले, अति न करे, और फिर विश्राम करे तो वह दीर्घजीवन लाभ कर सकता है।

परिश्रम कीजिए, आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा बैरी है। भर्तृहरि का कथन है- “आलस्यं हि मनुष्याणाँ शरीरस्थो महान् रिपुः।” गीता में भगवान ने सौ वर्ष तक कर्म करने का आदेश दिया है।

दूसरा उपाय है-संयम। संसार में अति करना बीमारियों को आमंत्रित करना है। भोग भोगिये किन्तु मर्यादा के भीतर रहकर इच्छाओं को तृप्त कीजिये। असंयम से नाना प्रकार की आधि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।

स्वस्थ जीवन के तीसरे अंग-विश्राम-पर हमें सविस्तार विचार करना है। निरंतर काम में लगे रहने से थकावट आती है। मजदूर लोग रुपये के लोभ में शरीर की कुछ परवाह न करते हुए अधिक श्रम कर डालते हैं, नाना प्रकार के कार्यों में दिन-रात जुटे रहते हैं। थकते हैं और बीमार होते हैं।

थकावट दो प्रकार की है- (1) शारीरिक थकावट (2) मानसिक थकावट। निरन्तर शरीर से काम लेने से माँस पेशियाँ तथा शरीर के कल पुर्जे थक कर चूर हो जाते हैं। थकान से ज्वर, सिरदर्द, हाथ पाँवों का टूटना, इत्यादि उत्पन्न होते हैं, जो बहुत दिनों में जाकर ठीक होते हैं।

शरीर की भाँति मन और मस्तिष्क को भी व्यायाम भोजन तथा विश्राम की आवश्यकता होती है। शरीर की भाँति मन भी थकता है। मानसिक थकावट अन्तर्द्वन्द्व और चिंता का कारण बनती है। काम में मन नहीं टिकता, सर भारी रहता है, जीवन भार प्रतीत होता है। कोई भी कार्य ठीक रीति से सम्पन्न नहीं हो पाता। प्रायः देखा गया है कि जब कोई कार्य भार समझ कर किया जाता है तो मानसिक थकावट जल्दी आती है।

शारीरिक थकावट के लिए विश्राम आवश्यक है। कार्य के पश्चात् मनोरंजन का आयोजन रखना चाहिए। जो व्यक्ति शारीरिक कार्य करते-2 थक जाय, उन्हें मानसिक मनोरंजन करना उत्तम है। इसके विपरीत मानसिक दृष्टि से थके हुए व्यक्तियों को शारीरिक मनोरंजन-खेल-कूद, तैरना, सैर सपाटा, टहलना, नृत्य, संगीत इत्यादि करना चाहिए।

मानसिक थकावट दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है-सद्विचार। आशाप्रद सद्विचारों में अपूर्व शक्ति है। थकावट काम करने से उतनी नहीं होती जितनी उसके विषय में चिन्ता त्याग करने से होती है। अतः हर प्रकार की चिन्ता त्याग देनी चाहिये। चिंता काम के प्रति अपने दृष्टिकोण को परिवर्तित कर देने पर नष्ट हो जाती है। निद्रा मानसिक और शारीरिक थकावट मिटाने का प्राकृतिक साधन है। सात घंटे की निद्रा अवश्य लेने की आदत डालनी चाहिए। निद्रा से जितनी थकावट दूर होती है, योग की समाधि अवस्था में पहुँचने से उससे कहीं अधिक थकावट दूर होती है। समाधि अवस्था सद्भावनाओं और एकाग्रता के अभ्यास से प्राप्त होती है।

वाणी को विश्राम देने के लिए शास्त्रों में मौन का बड़ा महत्व है। मनुष्य की वाचिक तथा मानसिक शुद्धि के निमित्त नियमित मौन का अभ्यास आवश्यक साधन है। मनुष्य को सप्ताह में एक दिन अथवा महीने में एक दिन बिल्कुल मौन रहना चाहिए। स्मरण रखिये अधिक बोलने से बहुत सी शक्तियों का अपव्यय हो जाता है। वाणी के असंयम से अनेक झगड़े, अशान्ति, रक्तपात और मुकदमेबाजियां होती हैं। अतः वाणी के असंयम पर विजय प्राप्त करने के लिए मौन का अभ्यास करें। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर मौन का बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है। नियमित मौन सेवन से मनुष्य को अपनी काषाय वृत्तियों-क्रोध, मान, माया, लोभ, बकझक प्रमाद पर विजय प्राप्त होती है।

मानसिक चिकित्सा -

शरीर से अधिक महत्व मानसिक रोगों का है। मानसिक रोगों को नष्ट करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने निम्न रीतियों का आविष्कार किया है-

(1) फ्रायड की रेचन विधि (मनोविश्लेषण)

(2) कूये की संकेत या सजेशन विधि (निर्देश)

(1) रेचन विधि- आधुनिक मनोविज्ञान में डॉ. फ्रायड की रेचन विधि का बड़ा महत्व है। मनोविश्लेषण का आजकल विशेष महत्व है। फ्रायड साहब रोगी के गुप्त मन में भरी हुई बातें, कटु अनुभव, भयानक स्थितियों, दलित वासनाओं का अध्ययन किए बिना चिकित्सा कभी ठीक नहीं समझते थे। उनका विचार था कि मानसिक रोग की जड़ मालूम करनी चाहिए। उसे जड़मूल से दूर करने के लिए मनोविश्लेषण का प्रयोग ही उन्हें सर्वोत्तम जंचा। इसी को रेचन विधि कहते हैं।

रेचन क्या है?

जिस प्रकार कैस्ट्रायल लेने से पेट की संचित गंदगी निकल जाती है, उसी प्रकार रेचन क्रिया से रोगी के अन्तः प्रदेश से पुराने कटु अनुभव निकाले जाते हैं। दलित मनोभाव तथा गुप्त मासिक ग्रन्थियाँ ही सब झगड़ों की जड़ हैं। उन्हीं के आधिक्य से अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न होता है। कभी-2 ये अप्रिय अनुभव पागलपन तक उत्पन्न कर देते हैं। ये कटु अनुभव तथा दलित वासनाएं हमारी बुद्धि की सतह से बहुत नीची होती हैं। हम समझ नहीं पाते कि हमारी बीमारी या अप्राकृतिक क्रियाओं का मूल कारण क्या है। मनोभावों तथा वासनाओं का दमन एक अप्राकृतिक क्रिया है। प्रकृति चाहती है कि हमारी वासनाओं को अपनी पूर्ति का मार्ग मिलता रहे किन्तु आजकल की सभ्यता तथा नैतिकता के कारण मनुष्य अपनी वासनाओं की पूर्ति नहीं कर पाता। उसके अनेक अपूर्ण और असंतुष्ट मनोभाव मानसिक विकास के निम्नतम स्तर में चले जाते हैं। रेचन की क्रिया से ये कटु अनुभूतियाँ तथा दलित मनोभाव निम्न स्तर से निकाली जाती है।

रेचन विधि से मानसिक रोग क्यों ठीक होते हैं?

रोगी अनजाने में ही अपने मन के निम्नतम स्तर में गुप्त वासनाएं तथा अपूर्ण इच्छाएं दबाये रहता है, ये अप्रिय अनुभव काँटों के समान हैं। जब तक इन्हें नहीं निकाला जायगा, तब तक ये अनेक मानसिक रोगों के रूप में प्रस्फुटित होते रहेंगे। अतः रेचन विधि द्वारा इन्हीं को चेतना के समक्ष लाया जाता है। जब रोगी का मन इन्हें स्वीकार कर लेता है, तो वह मानसिक कष्ट दूर हो जाता है। यद्यपि ये अनुभव बड़े लज्जास्पद एवं विवेक की दृष्टि से गिरे हुए होते हैं किंतु रोगी को चेतना पर लाये बिना इन्हें गुप्त मन से नहीं निकाला जा सकता। प्रत्येक मानसिक रोगी दुःखदायी अनुभवों को छिपाये हुए भी उसे भूल जाता है। इस दलित अनुभव के चेतना के सामने आते ही जब रोगी उसे स्वीकार कर लेता है, तो उसकी आत्म-स्वीकृति हो जाती है। आत्म स्वीकृति का मतलब है मानसिक रोग से मुक्ति। अतः रेचन विधि के दो मुख्य अंग हैं। इन्हें भली भाँति समझ लीजिए-

1- बातें करके गुप्त, दलित अनुभव को खोद खोदकर निम्न स्तर से निकालना। यह क्रिया बड़ी कठिन है और चिकित्सक के व्यक्तिगत अनुभव और प्रतिभा पर आश्रित है। उसे ऐसे प्रश्न पूछने पड़ते हैं। स्वप्नों, साँकेतिक चेष्टाओं, शब्द सम्बन्ध का प्रयोग, भूलों का अध्ययन, विचित्र व्यवहारों का निरीक्षण तथा हिप्नोटिज्म द्वारा पुराने अनुभवों का स्मरण कराना पड़ता है। जिनसे दलित मनोभाव चेतना के स्तर पर आ जाता है। देखा गया है कि इस दबे हुए अनुभव के चेतना के समक्ष आते ही रोग दूर हो जाता है। रेचन विधि का यह प्रमुख अंग है।

2- आत्मस्वीकृति- अर्थात् रोगी का अपने कटु अनुभव को मान लेता। प्रायः देखा गया है कि वासना, भय, क्रोध, ईर्ष्या, भर्त्सना, पीड़ा, मानहानि, इत्यादि दुःखद अनुभव मनोभावों के पीछे छिपे रहते हैं। इनसे सम्बन्धित कुछ घटनाएं होती हैं। पुरानी बातें चलाने से ये घटनाएं धीरे-धीरे स्मृति के पटल पर आ जाती हैं। जब रोगी अपनी पुरानी भूल को स्वीकार कर लेता है तब रोग दूर हो जाता है। यही फ्रायड महाशय की रेचन विधि है। इसके अनुसार पहले चिकित्सक को रोग की जानकारी प्राप्त होती है फिर अनुभव की आत्मस्वीकृति से मानसिक रोग दूर हो जाता है।

मनोविश्लेषण कैसे करें?

मन का विश्लेषण बड़ा कठिन कार्य है किन्तु अभ्यास से यह धीरे-धीरे आ जाता है। किसी भी रोगी के मन का विश्लेषण उन क्रियाओं से हो सकता है, जिन्हें वह करता है। क्रियाएं मन से सन्नद्ध हैं। मन आदेश देता है, तब हमारे अंग प्रत्यंग विविध क्रियाएं करते हैं। अतः हमें रोगी के सब कार्यों, भावों, विचारों (लिखित या उच्चरित), स्वभाव तथा आचारों का अध्ययन करना चाहिए। प्रत्येक शब्द, विचार, साँकेतिक चेष्टा, स्वप्न या विचित्र व्यवहार का सम्बन्ध मनुष्य के गुप्त मन से है। इनका अध्ययन ही गुप्त मन का कुछ ज्ञान दे सकता है। मनोविश्लेषण विधि के मुख्य साधन ये हैं। इनका प्रयोग किसी अनुभवी चिकित्सक के साथ करना चाहिए-

(1) स्वप्नों का अध्ययन- प्रत्येक स्वप्न का गूढ़ अर्थ होता है। अक्सर देखा गया है कि कामवासना अनेक स्वप्नों के रूप में नाना प्रकार के रूप धारण कर रोगी के समाने आती है। स्वप्नों का अध्ययन करने के लिए हमारी पुस्तक “हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?” ‘अखण्ड-ज्योति’ कार्यालय मथुरा से मंगाकर इस विज्ञान का विस्तृत ज्ञान प्राप्त कीजिए।

(2) साँकेतिक चेष्टाओं का अध्ययन- अनेक बार रोगी ऐसी कुचेष्टाएं करता रहता है जिनका कारण वह खुद नहीं समझता। गुप्ताँग बार-2 छूना, कान या ठोढ़ी छूना, नाक कुरेदते रहना, होठ दबाना या अनेक प्रकार की चेष्टाएं हमारे गुप्त मन की मानसिक ग्रन्थियाँ स्पष्ट करती हैं। इनका सम्बन्ध मनुष्य के दलित मनोभावों (प्रायः कामवासना, घृणा और क्रोध) से होता है।

(3) शब्दों, भूलों, गालियों का अध्ययन- अनेक प्रकार की गालियाँ लोग अनजाने में ही देने के आदी होते हैं। प्रत्येक गाली गलौज या शब्द कुछ न कुछ मानसिक अवस्था का परिचायक है, उसकी उत्पत्ति एवं निकट सम्बन्ध आन्तरिक जगत से है। ये शब्द या भूलें तभी तक होती हैं जब तक रोगी का अज्ञान अनुभव चेतना पर नहीं आता। वही भाव सामने आते ही चेतना पर पुराना दलित मनोभाव याद आ जाता है।

(4) विचित्र व्यवहारों का निरीक्षण- मानसिक रोगों का कारण अन्तर्द्वन्द्व है। इस अन्तर्द्वन्द्व का पता हमें कभी-2 रोगी के विचित्र व्यवहारों से लगता है। रोग की उत्पत्ति रोगी का अपने आपको धोखा देने के कारण होती है।

(5) हिप्नोटिज्म का प्रयोग- सम्मोहन द्वारा रोगी को बेहोश कर दिया जाता है। सम्मोहन द्वारा मनुष्य का बाह्य मन तो निष्क्रिय हो जाता है किन्तु अंतर्मन तेजी से कार्य करता रहता है। प्रायः रोगी बकने, भकने और ऊटपटाँग बातें कहने लगता है। इनमें तारतम्य स्थापित हो सकता है। इस बकवाद से गुप्त मन का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

उपरोक्त विधियों द्वारा गुप्त मन की दलित अनुभूतियों का हाल जाना जा सकता है। जानकारी प्राप्त करना बहुत कुछ चिकित्सक की योग्यता पर निर्भर है। इस क्रिया से चिकित्सक रोग का कारण जान लेता है। उसे नष्ट करने के लिए आत्म स्वीकृति आवश्यक है।

कूये साहब की संकेत विधि-

सजेशन या निर्देश विधि बहुत पुरानी है। इसका प्रयोग भारत के ऋषि मुनियों तथा यूरोप में मानस चिकित्सकों ने समान रूप से किया है। कूये साहब ने प्रथम बार इसे मनोवैज्ञानिक रूप देकर इसके वैज्ञानिक अध्ययन का प्रयत्न किया। कूये ने अपनी निर्देश विधि से हिस्टीरिया, अनिद्रा, अकारण भय आदि मानसिक रोगों को सफलता से दूर किया। कूये साहब ने रोगी के गुप्त दलित भाव को जानने की इच्छा न की, न उसका विश्लेषण किया। इसलिए उनकी क्रिया कुछ अधूरी सी रही। आधुनिक युग में फ्रायड के मनोविश्लेषण के पश्चात् कूये की निर्देश विधि के द्वारा पुनः शिक्षा का प्रयत्न किया जाता है।

संकेत विधि उन स्वीकृतियों को कहते हैं जो रोगी करता जाता है। उसका मन उन्हें स्वीकार करता जाता है। प्रत्येक आत्म स्वीकृति से कुछ न कुछ लाभ होता है। रेचन से कलुषित और गन्दे मनोभाव निकल जाते हैं, संकेत या निर्देश से शुभ विचार और हितैषी भावनाएं अंतर्मन में बिठाई जाती है। शुभ और नए पवित्र विश्वास रोगी के मन में जमाने की क्रिया को पुनः शिक्षा कहते हैं। यह एक प्रकार से रोगी के मन में नैतिक और शुभ दृष्टिकोण जमाना है। यह स्थायी स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। पुनः शिक्षण पद्धति से मानसिक अन्तर्द्वन्द्व नष्ट हो जाता है और ठोस नैतिकता की सृष्टि होती है।

निर्देश के दो भाग हैं- दूसरों को निर्देश देना तथा आत्म निर्देश अर्थात् स्वयं अपने आपको निर्देश देना। दूसरों को वहीं स्वस्थ निर्देश दे सकता है, जो स्वयं पूर्ण रूप से स्वस्थ हो। अपने आपको पूर्ण स्वस्थ बनाने के लिए आत्म निर्देश का प्रयोग किया कीजिए। आत्म निर्देश बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है। जो व्यक्ति अकल्याणकारी विचारों में लिप्त रहता है, बुरा ही सोचता है या अपने आपको रोगी समझता है, वह कैसे दूसरे को स्वस्थ करेगा?

आत्मनिर्देश किया कीजिए। शान्तिदायक पवित्र विचारों, शुभ भावनाओं, हितैषी विश्वासों में रमण करना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़ा अच्छा है। अपने आपको शक्तिशाली होने, महान बनने, पूर्ण स्वस्थ रहने के निर्देश दिया कीजिये। जैसा आप अपने आपको समझते हैं, वस्तुतः वैसे ही आप हैं। इच्छाशक्ति को अपने सौभाग्य पर केन्द्रित किया कीजिये। दूसरों के अनुचित विचारों के साथ न बहने की शक्ति से ही हम ऊंचे उठ सकते हैं। यही आत्म निर्देश का रहस्य है। प्रो. लालजीराम शुक्ल के शब्दों में, “आत्मनिर्देश की शक्ति वृद्धि के लिए इस बाह्य दृश्य संसार से मन हटाकर अपने बारे में सोचना चाहिए। मनुष्य को बाहरी क्षणिक लाभों से छोड़कर मन को वश में करने की साधना करनी चाहिए। इससे इच्छाशक्ति बलवती होती है, ऐसे व्यक्ति का आत्मनिर्देश कभी विफल नहीं जा सकता।”


अस्वस्थता निवारक यौगिक क्रियाएं

बीमारी आने पर दवादारु करने से कही अच्छा यह है कि आप बीमार ही न पड़ें। इस प्रकार रहें और दिनचर्या बनायें कि बीमारी पास न आये। हम यहाँ कुछ ऐसी क्रियाओं का उल्लेख करेंगे जिन्हें अपनाकर पाठक अपना स्वास्थ्य सहज ही स्थिर रख सकते हैं। पुनः-पुनः इन्हीं के अनुसार कार्य करने से धीरे-धीरे ये आदत बन जायेंगे। प्रारम्भ में कुछ अड़चन आ सकती है किन्तु थोड़े दिन पश्चात् आपका शरीर ऐसा सध जायगा कि वह स्वयं इन्हें करने का इच्छुक होगा।

इन क्रियाओं की मूल भित्ति व्यायाम है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए व्यायाम अति आवश्यक है। प्रकृति के आँचल में उन्मुक्त विहार करने वाला पूर्व पुरुष इतना घूमता, फिरता और दौड़ता था कि उसे पृथक् रूप से व्यायाम की आवश्यकता ही न प्रतीत होती थी। आखेट, खेती, दूर-दूर तक भागना, दौड़ना, तैरना या कूदना सर्वसाधारण के लिए खुला था। किन्तु आधुनिक युग में अधिक चलने फिरने का काम कम होता जाता है। मोटर, साइकिल इत्यादि के प्रचार से टहलना और माँसपेशियों का संचालन भी कम हो रहा है। इस कृत्रिम जीवन में स्वास्थ्य लाभ करने के लिए व्यायाम शालाओं की आवश्यकता है। श्रमजीवी व्यक्तियों को छोड़कर शेष सभी के लिए व्यायाम की जरूरत है।

व्यायाम प्राकृतिक चिकित्सा का अंग -

व्यायाम द्वारा हम आपको पहलवान बनने की सलाह नहीं देते। शरीर के सब अंगों की योग्यता और कार्यशक्ति बनाये रखने के लिए, रोगों से रक्षार्थ व्यायाम आवश्यक है। व्यायाम एक प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा का अंग है। यदि शरीर से पर्याप्त श्रम लिया जाता है, सब पुर्जे अपना-2 कार्य ठीक तरह करते हैं, तो कोई कारण नहीं कि आप बीमार पड़ जायं। हर प्रकार के स्त्री पुरुषों के लिए प्रत्येक स्थिति और अवस्था में व्यायाम की आवश्यकता है। कई बार काम न करने के कारण शरीर के कुछ अंग अपना कार्य यथोचित रीति से नहीं करते और मनुष्य बीमार पड़ जाता है। इसके विपरीत रात दिन परिश्रम करने वाले कृषक, मजदूर, कारीगर स्वस्थ रहते हैं। यह है प्राकृतिक जीवन की अद्भुत करामात।

योग, व्यायाम पुरातन भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता स्पष्ट करते हैं। योग की दीर्घ श्वासोच्छवास पद्धति फेफड़ों की मजबूती पर जोर देती है। योग व्यायामों से केवल माँस पेशियाँ ही नहीं सुधरती प्रत्युत आन्तरिक अवयवों का भी सुधार होता है, आयु लम्बी होती है और नैतिक बल भी प्राप्त होता है। यौगिक आसन तथा प्राणायाम हमारे ऋषियों की चित्त की स्थिरता और व्यायाम प्रेम के परिचायक हैं। यौगिक क्रियाओं के सम्बन्ध में कहा गया है-

युवावृद्धोऽतिवृद्धोंवा व्याधितो दुर्बलोऽपि वा।

अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति सर्वंयोगेष्वतद्रितः॥

अर्थात् “युवा, वृद्ध अथवा अतिवृद्ध, बीमार या योगी अथवा अतिदुर्बल कोई भी व्यक्ति जो आलस्य को हटाकर यौगिक क्रियाएं करता है, उसे अवश्य सफलता मिलती है।”

क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्वादक्रियस्य कधं भवेत्।

न शास्त्रपाठ मात्रेण योग सिद्धिः प्रजायते॥

अर्थात् सफलता उसी को मिलती है, जो अभ्यास में तल्लीन रहता है। केवल योग सम्बन्धी ग्रन्थों के पढ़ने से किसी को सफलता नहीं मिलती।

आसन- आसन व्यायाम पद्धति ही मनुष्य के सब आँतरिक एवं बाह्य अंग प्रत्यंगों को समान रूप से पुष्ट करती है तथा आध्यात्मिक, मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान कर सकती है। शलभ, मयूर, भुजंग, पादहस्त इत्यादि आसन करने से मनुष्य के सारे अंगों का व्यायाम हो जाता है। प्रारंभ में ध्यानात्मक व्यायाम, नासाग्र दृष्टि, भूमध्य दृष्टि, इत्यादि करने चाहिए। इन साधनों से बलात् मन को एक स्थान पर केन्द्रित किया जाता है। ध्यानात्मक आसनों से पूर्ण लाभ उठाने के लिए तीनों बंध-जड्डीथन बंध, जालंधर बंध और मूलबंध करने चाहिए। चार मुख्य ध्यानात्मक आसन ये हैं- पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन, समासन हैं। व्यायामात्मक आसन इस प्रकार हैं- शीर्षासन, सर्वांग आसन, मत्स्य आसन, हलासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुषासन, बलासन, चक्रासन, सिंहासन, मयूरासन, शवासन हैं। इनका अभ्यास किसी पुस्तक या योगी की सहायता से कर लेना चाहिए। इसके लिए दो पुस्तकें बड़ी अच्छी हैं-

(1) आसन-लेखन-डॉ. वालेश्वरप्रसाद सिंह, बादशाही मंडी, प्रयाग से प्रकाशित।

(2) आसन तथा प्राणायाम- लेखक-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ‘अखण्ड-ज्योति’ मथुरा।

प्राणायाम- प्राणायाम आसनों की क्रिया का एक मुख्य अंग है। एक के बिना दूसरा अधूरा सा है और दोनों मिलकर प्राकृतिक चिकित्सा के दाँये-बाँये हाथों के समान हैं। प्राणायाम से प्राणों की स्थिरता आती है। प्राण स्वच्छ, पवित्र, कान्ति की भूमि में अचल भाव से स्थित हो जाता है, प्राणायाम कोष और सूक्ष्म शरीर की पुष्टि होती है। इससे प्राण एवं सूक्ष्म शरीर पर मनुष्य का पूर्ण अधिकार हो जाता है। साथ ही इन्द्रियों का निरोध, इच्छा और संकल्प सिद्धि प्राप्त होती है, मनन और धारण शक्ति का विकास होता है, आत्मबल की वृद्धि होती है, विषयवासना नष्ट हो जाती है।

श्री विजय बहादुर के शब्दों में “प्राणायाम से साधक का शरीर तपाये हुए स्वर्ण जैसा कांतियुक्त हो जाता है। विधिपूर्वक उपासना से साधक को रोग, बुढ़ापा, मृत्यु आदि का भय नहीं सताता है। उसका शरीर पुष्प के समान हल्का और आरोग्यमय हो जाता है, मुख पर शान्ति एवं प्रसन्नता झलकने लगती है। उसे किसी पर पदार्थ में लोलुपता नहीं दिखती, शरीर गठित एवं पुष्ट हो जाता है। शोक, मोहादि कोसों दूर भागते हैं। वह अपने विकारों का आखेट नहीं बनता।”

इतने लाभों से युक्त इस व्यायाम (प्राणायाम) को अवश्य करना चाहिए। इसके लिए भी गुरु की आवश्यकता है। किसी जानकर से इसे सीखना चाहिए।

योगी की षट्-क्रियाएं -

हठयोग के अंतर्गत हमें षट्-क्रियाओं का वर्णन मिलता है। ये क्रियाएँ बहुत ही उपयोगी और लाभदायक हैं। फिर भी इनका अभ्यास करने के लिए बड़े सतर्क रहने की आवश्यकता है। हमारी राय तो यह है कि कोई भी योगिक क्रिया हो, किसी अनुभवी योगी अथवा समझदार व्यक्ति की देख-रेख में करनी चाहिए, तभी इनसे पूर्ण लाभ हो सकता है। कोई लेख या पुस्तक पढ़कर अपने आप क्रियाएं करने से लाभ के स्थान पर हानि की संभावना है।

हठयोग प्रदीपिका में (1) धोति (2) वस्ति (3) नेति (4) नौलि (5) कपालभाति (6) और त्राटक को षट्कर्म कहा है। कोई-कोई योगी कपालभाति, गजकरणी, बाघी, द्यौकनी और शंखप्रक्षालन-इनको भी षट्कर्म में सम्मिलित करते हैं।

(1) धोति-

मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है (1) वस्त्र धोति (2) जल धोति (3) वायु धोति। हठयोग प्रदीपिका में वस्त्रधोति इस प्रकार की जाती है-

“धोति चार अंगुल चौड़ी और 15 हाथ लम्बे महीन वस्त्र की बनाई जाती है। वस्त्र धोति करते समय इसे गर्म जल में भिगोकर थोड़ा निचोड़ कर दाँतों तले दबाकर चबाने का उपक्रम करते हुए निगलने की कोशिश करनी चाहिए। प्रतिदिन क्रमशः एक-एक हाथ कपड़ा निगलने का अभ्यास करते हुए कुछ दिन बाद सम्पूर्ण धोति निगली जा सकती है। पूरी धोती निगलते समय अन्तिम छोर दाँतों में दबा लेना चाहिए। नौलि करके दबे हुए सिरे को हाथ में लेकर बाहर खींच लेना चाहिए।” इससे उदर के विकार ठीक होते हैं।

जल धोति में पानी शीघ्रता से वमन कर दिया जाता है। गुनगुना जल लेकर उसमें कुछ नमक मिला लेना चाहिए। इच्छानुसार सेर डेढ़ सेर पानी लिया जा सकता है।

वायु धोति में नासिका के मार्ग को बन्द कर के मुँह में श्वास देते हुए वायु को पेट में इकट्ठी किया जाता है। यह वायु उड्डियान तथा नौलि क्रिया की सहायता से गुदा द्वारा शरीर से बाहर निकाल दी जाती है। वायु को जल की भाँति धीरे-धीरे कण्ठ से ध्वनि निकालते हुए पीना चाहिए।

(2) नेति-

पहले जल नेति करनी चाहिये फिर सूत नेति। जल नेति के लिए कुछ गुनगुना पानी लीजिये। गिलास को नाक के छेद से लगाकर पहले एक छिद्र से पानी ऊपर को खींचे और दूसरे नाक के छेद को बन्द कर लें। फिर दूसरे नाक के छिद्र से पानी को खींचे।

सूत नेति नाक की सफाई के लिए है। 14-16 इंच लम्बी बटे हुए सूत की मुलायम डोरी लीजिए। इसे पानी में भिगोकर थोड़ा सा सिरे पर मोड़ कर जो स्वर चलता हो उस छेद में लगावें और खूब जोर से पूरक करें। ऐसा करने से सूत का छोर गले में आ जायगा इधर-उधर खींचने से कफ दूर हो जाता है। ऐसा ही दूसरे छेद में डालकर करें। नेति कपाल का शोधन करती है, दिव्य दृष्टि देती है, मुख तथा सिर की संधि के ऊपर सारे रोगों को दूर करती है।

(3) त्राटक-

यह नेत्रों का व्यायाम है। मन को एकाग्र और केन्द्रित करने में यह बहुत फायदे की है। किसी भी वस्तु को एकाग्रता से देखना त्राटक है। श्री गुलाबचन्द जैन ने नाटक की विधि इस प्रकार लिखी है-”दीवार में एक कील गाढ़कर उस पर दर्पण टाँग दें और उस दर्पण के बीच में एक रुपये के बराबर एक गोल निशान या काले कागज का टुकड़ा चिपका दें। आइने से 2-3 फुट की दूरी पर पद्मासन लगाकर या किसी कुर्सी पर बैठ जायं। फिर अपनी आँखों को बिना पलक डुलाये, उसे गोल निशान पर केन्द्रस्थ करें। कोशिश करें कि आपका चेहरा काँच में न दिखे तथा आपकी टकटकी थोड़ी देर तक उसी पर लगी रहे।” यह अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

त्राटक नेत्रों के रोगों से मुक्त करने वाला, तन्द्रा आलस्य को रोकने वाला है।

(4) कपालभाति-

शीघ्रतापूर्वक पूरक करने को कपालभाति कहते हैं। पद्मासन या सिद्धासन पर बैठ जाइये, नेत्र मूँद लीजिए। पहले बाँये नासारन्ध्र से श्वास लें और दाँये से निकालें इसी प्रकार दूसरे छिद्र से करें। इसी प्रकार जिससे साँस निकालें, उसी से लें। इस क्रिया में फेफड़ों का अच्छा व्यायाम होता है और कपाल की शुद्धि होती है। श्वास नलिका में एकत्रित कफ जलकर भस्म हो जाता है।

(5) वस्ति-

हठयोग प्रदीपिका में लिखा गया है-”वस्तिक्रिया (अर्थात् एनिमा) के लिए गुदा मार्ग में बाँस की पतली एवं पोली नली प्रविष्ट कर पानी से भरे हुए टब या बर्तन में बैठें। पानी उसकी नाभि तक होना चाहिए। इस प्रकार गुदा मार्ग का आकुँचन करता हुआ पानी को ऊपर की ओर चढ़ाने की कोशिश करें। यही वस्तिक्रम या क्षालन कहलाता है। इसका एनिमा के अंतर्गत वर्णन किया जा चुका है। वस्तिक्रिया के प्रभाव से गुल्म, प्लीहोदर और वात पित्त, कफ से उत्पन्न अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं, मुख पर चमक आती है तथा जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है।

(6) नौलिक्रिया-

कंधों को झुकाकर, अति वेग से पेट को गोलाई में घुमाने की क्रिया को नौलि कहा गया है। हठयोग प्रदीपिका में इसके लाभों का वर्णन इस प्रकार किया गया है- “नौलि क्रिया मंदाग्नि को उत्तेजित करने वाली तथा आनन्द को देने वाली है। वह सम्पूर्ण वात, पित्त, कफादि दोष तथा अन्य रोगों का नाश करने वाली है। इस प्रकार यह हठयोग की क्रियाओं में सर्वोत्तम कही गई है। इसका अभ्यास योग्य अनुभवी व्यक्ति की संरक्षकता में करना चाहिए। अंतड़ियों की सूजन, क्षतादि दोष, पित्त प्रकोप जनित अतिसार, पेचिश, संग्रहणी में यह क्रिया वर्जित है। किसी योग्य अनुभवी की देख-रेख में ये यौगिक क्रियाएं करने से बहुत लाभ उठाया जा सकता है।

टहल कर रोग ठीक कीजिये-

प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक बरनर मैकफेडन ने टहल कर रोग दूर करने के विषय में अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी कोष में एक पूर्ण अध्याय लिखा है। यहाँ उसका भावानुवाद प्रस्तुत किया जाता है।

यदि आप अपना स्वास्थ्य ठीक रखना चाहते हैं, या खोये स्वास्थ्य को वापिस लाना चाहते हैं, तो टहलना प्रारंभ कर दीजिए, चाहे दूसरे व्यायाम आप भले ही छोड़ दें, पर इस व्यायाम, अर्थात् टहलने को आप कभी न छोड़िये। आप चाहे जो पेशा करते हों, अपने शरीर के अंग विशेषों के विकास के लिए चाहे जो दूसरी कसरतें करते हों, पर दिन में दो घंटे टहलने का नियम अवश्य रखिये। मैं इस बात को मानता हूँ कि ऐसे बहुत से व्यायाम हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभदायक हैं, पर टहलने की बात ही निराली है। मैं तो यह कहूँगा कि जो आदमी, स्त्री या पुरुष-चौबीस घंटे में कम से कम दो घंटे नहीं टहलता, वह पूर्ण स्वस्थ हो ही नहीं सकता, चाहे वह दूसरे कितने ही व्यायाम क्यों न करता रहे।

टहलने का भी एक शास्त्रीय मार्ग है। यदि आप बेढंगे रूप से टहलेंगे, तो भी उससे कुछ न कुछ शक्ति तो अवश्य बढ़ेगी, पर ढीले ढाले तरीके से टहलने से आप जल्दी थक जायेंगे और वह लाभ नहीं उठा सकेंगे, जो नियमित रूप से टहलने में होता है। जो लोग पैदल चला करते हैं, उनमें से प्रत्येक ठीक तरह टहलना नहीं जानता। टहलते समय गति में साम्य होना चाहिए और शरीर को सीधा रखना चाहिए और तभी आपके शरीर में स्फूर्ति बढ़ सकती है।

मैंने तो पिछले दस वर्षों में टहलना सीखा है। चाल में एक प्रकार की सरलता होनी चाहिए, गति में एक नियमित प्रवाह होना चाहिये और शरीर को इस प्रकार रखना चाहिए कि बिना किसी विशेष परिश्रम के उठाने वाले कदमों के साथ, आगे को बढ़ते जावें।

एक बार मैंने यह प्रयोग किया था कि प्रातःकाल में अपने काम पर जाने से पूर्व 15-20 मील टहला करता था। वह अभ्यास करते-करते मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हो गया कि सचमुच टहलना विशेष रूप से लाभदायक व्यायाम है। इतना तन्दुरुस्त मैं कभी नहीं रहा, जितना मैं उन दिनों में था, जब मैं 15-20 मील का चक्कर काटा करता था। प्रतिकूल परिस्थिति में भी यदि आप तेजी के साथ तीन चार मील टहल लें, तो उससे लाभ ही होगा पर, यदि आप तीन चार घंटे टहलें तब तो बात ही क्या है। आपके शरीर में इससे जितनी फुर्ती आवेगी उतनी दूसरे किसी भी तरीके से नहीं आ सकती। पेट, हृदय और फेफड़ों पर, जो शरीर के मुख्य अंग हैं, टहलने का बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है। शरीर के रक्त प्रवाहक अंगों में स्वास्थ्यप्रद गति पैदा हो जाती है, रक्त स्वच्छ हो जाता है, नेत्रों की ज्योति में वृद्धि होती है, रंग रूप भी निखर आता है, माँस में कुछ मजबूती आ जाती है और शरीर के अंग में शक्ति तथा दृढ़ता का संचार होने लगता है।

यक्ष्मा तथा अन्य भयंकर बीमारियों के मरीज टहलने के कारण स्वस्थ हो गये। जो व्यक्ति खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने के इच्छुक हों, अथवा जो किसी पुराने जीर्ण रोग से पीड़ित हों, उनके लिए टहलने से बढ़िया दूसरी कोई कसरत नहीं हो सकती। हाँ, साथ ही उन्हें गहरी साँस लेने का भी अभ्यास करना चाहिये। टहलना भयंकर बीमारियों के लिए इसलिए और अधिक लाभदायक है कि इसकी अति नहीं हो सकती। अपनी शक्ति से बाहर टहलना कठिन है। टहलने, थककर बैठ जाने में लाभ ही लाभ हैं। हानि कुछ भी नहीं।

ठीक प्रकार से टहलने की रीति-

मैकफेडन के अनुसार ठीक प्रकार से टहलने की रीति यह है- “प्रथम आवश्यक बात तो यह है कि आपका शरीर आगे की ओर झुका हुआ रहे, जैसे कि दौड़ने में होता है। प्रत्येक कदम ऐसा पड़ना चाहिये कि वह आपको मानो गिरने से बचावे, और आपका बदन आगे की ओर इतना काफी झुका रहना चाहिए, जिससे गति लगातार एक सी ही बनी रहे। समूचा बदन सीधा रहना चाहिये, कंधे पीछे दबे हुए, सीना आगे निकला हुआ, सिर पीछे की ओर और निगाह एक दम सामने रहनी चाहिये। हाँ, यदि रास्ता देखना हो, तो आप अवश्य नीचे की ओर देख सकते हैं। मगर मामूली तौर से नजर सामने ही रखनी चाहिए। प्रत्येक कदम में आगे की ओर बढ़ने वाली शक्ति होनी चाहिए। अगर टहलने के साथ ही साथ आप पवित्र वायु में गहरी साँस भी लेते जायं, तो उससे बहुत अधिक फायदा हो सकता है। इस प्रकार के अभ्यास से आपकी मेहनत बरदाश्त करने की शक्ति, टहलने का आनन्द और शरीर को तन्दुरुस्त रखने की ताकत कितनी अधिक बढ़ जायेगी, इसके लिए जो कहा जाय, थोड़ा है।

घास और मिट्टी पर टहलना विशेष लाभदायक है। आप चार या पाँच बजे तड़के उठें और अपना कार्य प्रारंभ करने से पूर्व एक लम्बा और आनंददायक चक्कर अवश्य लगा आया करें।

आरम्भ में चार पाँच मील चलना यथेष्ट होगा। हम कितनी दूर चल सकते हैं, इस बात की परीक्षा न लेना ही अच्छा है, टहल कर हमारा उद्देश्य अपनी संजीवनी शक्ति को बढ़ाना है, न कि दूरी को।

टहलने से यौवन स्थिर रहता है। टहलना बुढ़ापे को रोकता है। यह वृद्ध कोषाणुओं को दूर करके आप के अंग-अंग में जीवन, स्वास्थ्य और शक्ति प्रवाहित कर देता है। मैंने अपने जीवन में जितने वृद्धों को देखा है, उनमें से एक सबसे अधिक नौजवान दिखाई पड़ता था। यह पुराना टहलने वाला था। उसका कहना था कि मैं पन्द्रह बीस मील रोज टहलता हूँ। यद्यपि उसकी आयु साठ के आस-पास थी पर उसका चेहरा सोलह वर्ष की लड़की के समान था और वह 35 वर्ष से अधिक का नहीं प्रतीत होता था।


वेदों में मानसिक चिकित्सा

(श्री सुरेश चन्द्र वेदालंकार, गुरुकुल कुरुक्षेत्र)

सबल एवं सफल आश्वासन का नाम आदेश है। आदेश द्वारा किसी रोगी के रोग को दूर करना, विषैले जन्तु के विष को शान्त करना, किसी मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करना और अंधविश्वास की दृष्टि से फैले हुए भूत प्रेतादि को दूर हटाना ही मंत्रविद्या है। भारतवर्ष में इस विद्या का प्रचार बहुत अधिक और व्यापक है। साँप बिच्छू आदि के काटे हुए और तथाकथित भूतादि बाधाओं से पीड़ित व्यक्तियों को हम मंत्रादि से झड़वाते-फुँकवाते प्रायः देखते हैं। इस विचारधारा का क्या आधार है? इसमें सत्यता भी है या नहीं? इसका उत्तर हमारे विचारों में यही है कि मंत्र विद्या मानसिक चिकित्सा है और इसका आधार अथर्व वेद के कुछ मन्त्र हैं। इस मन्त्र विद्या को ही आज का शिक्षित समाज संवशीकरण या हिप्नोटिज्म के नाम से कहता है। यह वशीकरण कोई नवीन वस्तु नहीं बल्कि भारतीय योग शास्त्र का बिल्कुल प्रारंभिक अंग है। इसकी 6 शाखायें हैं जिनके नाम और विवरण निम्न प्रकार हैं-

(1) खेल- पात्र को क्षणिक निद्रा में लेजाकर उसे नाना प्रकार की अजनबी और अलौकिक बातें दिखाना।

(2) प्रश्नोत्तर- पात्र को अर्ध निद्रा एवं गंभीर निद्रा में ले जाकर देश देशान्तर और लोक लोकान्तर की सैर कराना, वहाँ का हाल उसके मुख से दूसरों को सुनाना।

(3) जीवन सुधार- किसी व्यक्ति के दुर्गुणों को दूर करने के लिए उसे अर्ध निद्रा या गंभीर निद्रा में ले जाकर उसे आदेश द्वारा या समझा-बुझाकर सन्मार्ग की और चलने के लिए प्रेरित करना।

(4) दुरुपयोग- मारण, मोहन, उच्चाटन या वशीकरण द्वारा किसी व्यक्ति को विक्षिप्त, व्याकुल, पीड़ित करना अथवा उसकी जीवन हानि कर देना।

(5) अपने किसी दूरस्थ व्यक्ति के यहाँ अपने यहाँ बैठे-2 सन्देश भेजना।

परन्तु इन पाँचों शाखाओं के विषय में हम कुछ न कहते हुये इस संवशीकरण का वैदिक रूप क्या है और इससे चिकित्सा करने की वैदिक विधि क्या है, यही पाठकों को बतायेंगे।

किसी भी रोग के कारण जहाँ शरीर में केन्द्रित विकार होते हैं वहाँ उससे बढ़कर वहम या मानसिक विचार कारण होते हैं। जहरीले साँप कभी ही काटा करते हैं परन्तु भय है हमें साँप ने काट लिया है अब हम बच नहीं सकते, इन विचारों से सैकड़ों मौतें हर साल होती हैं। रोग बहुतों को केवल वहम से हो जाता हैं। ऐसी दशा में यदि हम किसी प्रकार रोगी के दिल में यह विश्वास जमा दें कि रोग कुछ नहीं है, वह तो तुम्हें है ही नहीं, तो बहुत से रोगी बिना चिकित्सा के ठीक हो सकते हैं। इस मानसिक चिकित्सा के विषय में हम अपने अनुभव न देकर पाठकों को वैदिक प्रमाणों से इस विषय की वास्तविकता का बोध करायेंगे।

चिकित्सा प्रारम्भ करने से पूर्व मानसिक चिकित्सक को चाहिए कि वह रोगी में अपने प्रति विश्वास पैदा करे तथा उसके मन को अपनी ओर आकर्षित करे। उसे शाँतिपूर्वक सामने बैठाकर कहे कि-

यद्वो मनः परगतं यद् बद्धमिह वेह वा, तद्व आवर्तयामसि मयिषों रमताँ मनः।

अर्थात् मेरे प्यारे रोगी! जो तुम्हारा मन कहीं दूर गया हो या इधर-उधर व्यर्थ की बातों में फंसा हो उसे मैं अपनी ओर लाता हूँ-तुम मेरी बातों को ध्यान पूर्वक सुनो-मैं तुम्हारे रोग को अवश्य ही ठीक कर दूँगा। उसे चिकित्सक कहे कि-

“अहं गृह्णामि मनसा मनाँसि मम चित्तमनुचित्ते भिरेत। मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनु वर्त्मान एत॥”

मैं तुम्हारे मन को अपने मन के अनुकूल बनाता हूँ, तुम अपने चित्त को मेरे अनुकूल बनाओ और मेरी विचारधारा के अनुकूल अपनी विचारधारा करो, तुम्हारे इस शरीर और मन पर तुम्हारा अधिकार नहीं रहा, अब तो इस पर मेरा अधिकार है और मैं जैसा चाहूँगा वैसा तुम्हें चलाऊंगा। तुम मेरे आदेशों को सुनो और उन पर चलो-तुम्हें उस पर चलना पड़ेगा।

इस प्रकार इन दोनों मंत्रों से पात्र को अपने वश में करके उसके रोगों की चिकित्सा चिकित्सक को प्रारम्भ करनी चाहिए। चिकित्सा प्रारंभ करते हुए उसे अपनी वाणी के साथ ही साथ अभिमर्श क्रिया अर्थात् हाथ के हल्के स्पर्श का भी प्रयोग करना चाहिए। अभिमर्श क्रिया को अंग्रेजी में पास करना (Posses) कहते हैं अभिमर्श करते हुए रोगी को कहना चाहिए कि हे मेरे प्यारे रोगी!

“अयं में हस्तो भगवानयं में भगवत्तरः।

अयं में विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः।

अथर्व 4।13

हस्ताभ्याँ दशशाखाभ्याँ जिह्वा वाचः पुरोगवि।

अनामयित्नुभ्याँ हस्ताभ्याँ ताभ्याँ त्वाभिमृशामसि

इस अभिमर्श क्रिया में प्रयोजक के हाथ खुले और ढीले होने चाहिए और उसका स्पर्श पात्र के शरीर पर भार न डाल रहा हो। यह उसके अंगों में बिजली सी उत्पन्न करने वाला होना चाहिए। इससे शरीर को तथा मन को शान्ति तथा आराम मिलता है। इस प्रकार अभिमर्श एवं आदेश के द्वारा रोगी को अपने आधीन करने के बाद पात्र को उसके रोगों के अनुसार स्वस्थ करने का प्रयत्न करना चाहिए।

इस स्थिति में लाने के बाद रोगों को अभिमर्श और आदेश द्वारा दूर करने का स्पष्ट विधान वेद में पाया जाता है। उन्माद रोग के रोगी को आदेश देते हुए लिखा है-

अग्निष्टे निशमयतु यदि ते मन उद्यु तम्।

कृणोमि विद्वान् भेषजम् यथानुन्मदितोऽसि।

अर्थ. 6।11।2।

भावार्थ यह है कि हे मेरे प्रिय रोगी! यदि तेरा मन किसी कारण से अव्यवस्थित अथवा विक्षिप्त हो गया है तो अग्नि उसे बिल्कुल व्यवस्थित कर देवे और मैं तुझे विश्वास दिलाता हूँ कि बिल्कुल ठीक हो जायगा। मैं खूब सोच समझकर तेरी चिकित्सा कर रहा हूँ-तू अवश्य ही इस रोग से मुक्ति पा जायगा- विश्वास रख। यहाँ जो अग्नि रोग को शान्त कर देगा यह कहा गया है इसका अभिप्राय यह प्रतीत होता है कि उन्माद के रोगी को धुंआ आदि देने की जो आजकल प्रथाएँ प्रचलित हैं उनमें अवश्य ही कोई रहस्य विद्यमान है। भूत प्रेतादि से सताए जाते हुए रोगियों को मिर्च आदि का धुंआ देने और साथ ही कठोर शब्दों में आदेश देने से अक्सर लाभ होते देखा गया है। इसी प्रकार चुपचाप शान्त बैठे रोगी को कपूर चंदन इत्यादि का धुंआ देकर उन्माद को दूर करने की प्रथा आज भी प्रचलित है।

यक्ष्मा रोग से पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सा-

इस रोग के रोगी को चिकित्सा के लिए शाँत भाव से बैठाकर नीचे लिखा आदेश देना चाहिये-

अनुहूतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः

आरोहणमाक्रमणं जीवतो जीवतोयनम्।

मा विभे न मरिप्यसि जग्दिष्टं कृणोमि त्वा

निरवोचमहं यक्षमंगेभ्यो अंगज्वरं तव॥

अंगभेदो अंग ज्वरो यश्चते हृदयामयः

यक्ष्मः श्येन इव प्राप्तस्तद् वाचा साढः परस्तराम्।

इयमर्न्तवदति जिह्वा बद्धा पनिष्पदा।

त्वया यक्ष्मं निरवोचं शतं रोपीश्च तवमनः।

अर्थात् हे मेरे प्यारे रोगी! तू मेरे द्वारा आमन्त्रित होता हुआ, समझदार बनकर स्वास्थ्य को फिर प्राप्त कर। अरे आगे बढ़ना और उन्नत होना यही तो जीवन का प्रमाण है। तू जरा न डर, तू कभी मरेगा नहीं, मैं तुझे बुढ़ापे तक जीने वाला करता हूँ, तेरे अंगों से क्षय रोग को निकाल बाहर करता हूँ। सुन! अंगों को तोड़ने वाले, अंत में ज्वर करने वाले हृदय का यह रोग है। यह तेरा क्षय मेरी वाणी से मारे हुये बाज की तरह शरीर के बाहर जा गिरेगा। तू स्वस्थ होगा-अवश्य होगा। यह मेरी सुनियंत्रित और विद्युत की तरंगें फेंकती हुई वाणी अंदर से कह रही है कि तुझसे प्रेरित मैं यक्ष्मा रोग को दूर कर दूँगी और रोग के सैंकड़ों अंकुरों को हटा दूँगी।

इस प्रकार जब आदेश द्वारा जीवन के बीज व्यक्ति में आयेंगे तो वह अवश्य स्वस्थ होगा। इसी प्रकार सर्प विष को दूर करने के मंत्रों का भी उल्लेख वेद में पाया जाता है। वहाँ लिखा है स्व-

ददिर्हि मह्वयम् वरुणो दिवसः-कविर्वचोभिः रुग्रैनिरिणामि ते विषम्। खातमखातं सक्तमग्रभिरेव धन्वन्निजजास ते विषम्।

सारे जगत के पालक, वेद वाणी के कवि परमात्मा ने मेरे अंदर ऐसी वाक् शक्ति दी है कि मैं उससे तेरे उग्र विष को अवश्य ही नष्ट कर दूँगा। मैं तेरे सर्पि के दाँतों के चिह्नों को तथा सर्प के अंग से स्पर्श होने के प्रभाव को मुझ सर्प चिकित्सक ने वश में कर लिया है। अब तो तेरा विष रेत में पड़े पानी की तरह नष्ट हो जायगा। इस प्रकार रोगी को बतावें कि देखो भय मत करो, साँप के काटने से कोई मरता नहीं-आदमी तो भय से मरता है और जब मैं चिकित्सा कर रहा हूँ तब तो तुम कभी मर ही नहीं सकते। इस आश्वासन एवं हस्ताभिमर्श द्वारा साँप का विष बड़े आराम से उतारा जा सकता है।

परन्तु मंत्र द्वारा चिकित्सा करने वाले व्यक्ति को गंभीर, सत्यवादी, संयमी, संकल्प प्रधान, हितचिंतक और उदार प्रवृत्ति का होना चाहिए।

इस प्रकार वेदों में अन्य सभी रोगों की मानसिक चिकित्सा का वर्णन है। इसमें चिकित्सक को बहुत कुछ प्रयत्न करना पड़ता है। बहुत से रोगियों की हमने स्वयं चिकित्सा की है और बिच्छू का विष सिरदर्द, आधासीसी, पेट दर्द तथा स्वप्नदोष के अनेक रोगियों पर आश्चर्यजनक असर देखा है। आशा है पाठक इस पर विचार करेंगे।


Quotation

जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होते, तब तक कोई तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता। -स्वामी रामतीर्थ

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जो मनुष्य अपनी भूलों और कमजोरियों को प्रकाश में लाने से डरता है वह सत्य का पुजारी कदापि नहीं बन सकता। -जेम्स ऐलेन

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जो व्यक्तित्व को देखना छोड़ चुके हैं वे ही अनन्ता को जान सकते हैं। उन्हें सारा संसार एक परिवार की तरह दिखाई पड़ता है। -स्वामी रामतीर्थ

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निर्मल अन्तःकरण को जिस समय जो मालूम हो वही सत्य है। उस पर दृढ़ रहने से शुद्ध सत्य की प्राप्ति होती है। -महात्मा गाँधी


जीर्ण रोग-उनका कारण और निवारण।

(ले.- विट्ठलदास मोदी सम्पादक ‘आरोग्य’ एवं संचालक आरोग्य मन्दिर, गोरखपुर)

आधुनिक सभ्यता की उन्नति के साथ-साथ मनुष्य अपने स्वाभाविक जीवन से अधिकाधिक दूर होता गया है और उसका जीवन इतना अप्राकृतिक हो गया है तथा उसने अनजाने में ऐसी आदतें डाल ली हैं जिनके कारण उसका शरीर रोग का निवास बन गया है। यहाँ तक कि रोग उसे अस्वाभाविक नहीं मालूम होते। वह यह समझना भूल गया है कि शरीर का स्वभाव ही स्वस्थ रहना है।

जो स्त्री पुरुष पूर्णतया अथवा करीब-करीब स्वस्थ रहते हैं उनके जीवन का यदि निरीक्षण किया जाय तो ज्ञात होगा कि उनको इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता। मन और शरीर को जब स्वस्थ रहने की आदत पड़ जाती है तब रोग को स्थान नहीं मिलता।

यदि सजीवता और शक्ति के केन्द्र-स्वास्थ्य को लौटाया जा सके तो जिस प्रकार सूर्य की प्रकाशमान किरणों के आगमन के बाद रात्रि के अंधकार के लिए स्थान नहीं रहता, उसी प्रकार रोगों के लिए शरीर में स्थान न रहेगा।

रोगों को दूर भगाने की विधि जानने के पहले यह जान लेना चाहिए कि रोगों का कारण केवल एक है और गन्दगी को निकाल कर स्वस्थ होने का शरीर का प्रयास है। शरीर का रक्त जब शुद्ध एवं विकार हीन रहता है, कोई रोग नहीं होता, पर जब रक्त की जीवनदायिनी शक्ति क्षीण हो जाती है एवं वह मलयुक्त हो जाता है तो अनेक रोग होते हैं। रक्त में विकार तभी उत्पन्न होता है जब हमारे शरीर के विकार निकालने वाले अवयव मल, मूत्र, पसीना, श्वाँस आदि द्वारा, नित्य पैदा होने वाले विकार को पूर्णतया नहीं निकाल पाते। बचा हुआ विकार शरीर में रह जाता है और रक्त को गन्दा करता है, फिर रोग, कष्ट, दुःख का आगमन होता है। यदि रक्त के विकार युक्त हो जाने की सूचना दुःख, दर्द, पीड़ा के रूप में हमें न मिले और रक्त अधिकाधिक विकारयुक्त होता रहे तो मृत्यु अवश्यम्भावी है। अतः सर फ्रेडरिक के शब्दों में “रोग परमात्मा की एक आशीर्वादात्मक देन है, इसका स्वभाव ही रक्षा करना है। मैं जो यह कह रहा हूँ कि यदि रोग न होते तो मनुष्य जाति कभी की समाप्त हो गई होती, अपने विषय पर बहुत कम जोर डाल पा रहा हूँ।” रोगों के मित्र रूप को पहचानना चाहिए। वे प्रकृति की वह सूचना हैं जिन पर हमें तुरन्त ध्यान देना चाहिए। इस सूचना को शत्रु समझ कर उसे दबाने की कोशिश करने के बजाय हमें रोग के कारण को समझकर उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।

जब सूचना को ठीक-2 समझा नहीं जाता, उसके कारण को दूर करने के बजाय उन्हें दबाया जाता है, सूचना धीरे-2 धीमी एवं उसकी शक्ति मन्द पड़ जाती है। यही से जीर्ण राग की जड़ जमती हैं। यह सूचना हमारी जीवनी शक्ति की सूचक है जो शरीर की सफाई करने एवं रोग करने की कोशिश करती रहती है। इस शक्ति के कमजोर पड़ने का अर्थ है शरीर की सफाई की शक्ति का कमजोर पड़ना जीवनी शक्ति का दास।

जीर्ण रोग को दूर करना इसी जीवनी शक्ति को उभाड़ कर रोग को उग्र रूप में लाने की कला है। जो जितना ही उभाड़ लाने, उसे समझने की कला में निपुण होगा वह उतना ही शरीर को रोग मुक्त करने में सफल होगा।

उपचार के साधन -

प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार के साधन हैं-भोजन, जल, वायु, धूप, कसरत। इन सबका सम्मिलित सहारा बड़ी समझदारी के साथ लेना चाहिए। कभी यह न समझना चाहिए कि इनका प्रयोग जितना ही अधिक किया जायगा, लाभ उतना ही अधिक होगा। देखने में यह गलत मालूम हो सकता है पर वास्तविकता यही है। बुद्धिमानी इसी में है कि रोग और रोगी की शक्ति के अनुसार इनका प्रयोग न्यूनाधिक मात्रा में किया जाय। उपचारों का प्रयोग आरम्भ करने के पहले रोगी से उसके औषध प्रयोग का इतिहास और उसके दैनिक भोजन क्रम को अच्छी तरह जान लेना चाहिए। यदि रोगी माँसाहारी है अथवा डाक्टरी दवाओं का अधिक प्रयोग किया है तो ऐसे रोगी का उपचार करते समय बहुत सजग रहना चाहिए और चिकित्सा के साधनों का प्रयोग बहुत अल्प मात्रा से शुरू करना चाहिए। अधिकतर रोगों का कारण विकृत भोजन ही हुआ करता हैं अतः सभी रोगियों का उपचार भोजन सुधार से आरम्भ होना चाहिए।

भोजन -

भोजन जीवन देने वाला तो है ही, जीवन लेने वाला भी है। तीव्र रोगों में अधिकतर लोगों के प्राण भोजन ग्रहण करने के कारण ही जाते हैं। वैसी हालत में कुछ न करके केवल भोजन छोड़ दिया जाय तो प्रायः सभी रोग अपने आप शान्त हो जायं। जीर्ण रोग के रोगी को भी भोजन के इस गुणावगुण पर सदा ध्यान रखना चाहिए। जो भोजन उपयुक्त हो उसे भी उचित मात्रा में ही ग्रहण करना चाहिए। कभी यह न सोचना चाहिए कि जितनी सफाई का काम एक संतरा करेगा, उससे दूना दो सन्तरे। अमृत भी मात्रा से अधिक ग्रहण किया जायगा तो विष का ही काम करेगा।

भोजन को दो मोटे भागों में बाँटा जा सकता हैं। एक कफकारक दूसरा कफ निवारक। कफ निवारक भोजन हैं, कन्द को छोड़कर सभी ताजी हरी भाजियाँ और कटहल, केले को छोड़कर सभी ताजे फल। इनके अलावा सभी खाद्य-पदार्थ जैसे दाल, भात, रोटी, माँस, मछली, तेल, घी, सूखे मेवे, गुड़, चीनी, कफकारक हैं। इसमें सन्देह नहीं कि कफ निवारक भोजन ही रोग दूर करने में सहायक होते हैं पर इसका यह अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को कफकारक भोजन की आवश्यकता ही नहीं है। स्वास्थ्य की दशा में तो है ही, रोग की दशा में भी इसका यथोचित प्रयोग होना चाहिए।

अच्छे परिणाम के लिए कफ निवारक भोजन का प्रयोग खूब समझबूझ कर करना चाहिए। यदि रोगी के भोजन से सभी कफकारक खाद्य-पदार्थ एक साथ निकाल दिये जायेंगे तो सफाई का काम तेजी के साथ चलने के कारण उपद्रव इतने तीव्र एवं अधिक होंगे कि रोगी उन्हें संभाल न सकेगा। अतः सफाई का काम धीरे-2 चलाने के लिए कफकारक भोजन की मात्रा क्रमशः कम करनी चाहिए। एक हद तक सफाई हो जाने के बाद ही केवल कफनिवारक भोजन पर रोगी रह सकता है। रोगी को शक्ति के अनुसार कुछ दिन तक कफ निवारक भोजन पर रखकर फिर थोड़ा सा कफकारक भोजन देने लग जाना चाहिए। कफकारक भोजन में केवल गेहूँ की सादी रोटी और कच्चे दूध का व्यवहार उचित होगा। मान लें कि रोगी सवेरे, दोपहर, शाम अर्थात् तीन बार खाता है तो अल्पारम्भ के अनुसार पहले रोगी का जलपान केवल फलों का किया जाय फिर शाम के भोजन में फलों की और इसके बाद दोपहर के भोजन में कच्ची सब्जियों की सलाद के रूप में अधिकता की जाय। धीरे-धीरे शाम का भोजन भी कफनिवारक अर्थात् फल अथवा कच्ची या पक्की सब्जी, कर दी जाय फिर कुछ समय के लिए दोपहर के भोजन को भी कफ निवारक खाद्य-पदार्थों का कर दिया जाय। एक कार्यक्रम सा बना लेना चाहिए और उसी के अनुसार चलना चाहिए। यदि महीने भर का कार्यक्रम बनाया जाय तो इस हिसाब से एक सप्ताह या तीन-चार दिन तक केवल कफ निवारक भोजन ग्रहण किया जाय। फिर एक सप्ताह के लिए केवल दोपहर को कफकारक भोजन के रूप में रोटी जोड़ी जाय और महीने के शेष दिनों में शाम को भी कफकारक भोजन थोड़ा दूध के रूप में लिया जाय। इस तरह महीने के शेष दिनों में सवेरे फल, दोपहर को कच्ची और पक्की सब्जी और रोटी और शाम को फल और दूध होगा। ज्यों-2 शक्ति बढ़ती जाय और सफाई होती जाय, कफविहीन भोजन का समय बढ़ाते जाना चाहिए और रोग मुक्त होने पर महीने के शेष दिनों के लिए बताया गया संतुलित भोजन ग्रहण करने लग जाना चाहिए।

जल -

रोग को दूर करने के लिए दूसरा पुरअसर साधन है जल। पीने और सफाई के लिए साफ जल की आवश्यकता तो सभी को होती है पर प्राकृतिक चिकित्सा में इसका विशेष उपयोग होता है। शरीर की बड़ी गरमी शान्त करने के लिए कुछ विशेष स्नान निकाले गये हैं। इन स्नानों की संख्या बहुत बड़ी है, इसमें से घर पर चिकित्सा चलाने के लिए साधारण रोगों में लूई-कूने द्वारा बतायें हुए मेहन और पेडू नहान सर्वोत्तम हैं। पेडू नहान शरीर की बढ़ी हुई गरमी को पेडू में लाकर शान्त करता है और मेहन नहान स्नायुओं को ताकत पहुँचाता है। गरमी शान्त करने के बाद ताकत पहुँचाने का काम शुरू होना चाहिए। अतः कुछ दिन सवेरे शाम पेडू स्नान लिया जाय फिर सवेरे के पेडू-नहान के बदले मेहन नहान लिया जाय, इसके बाद दोनों समय मेहन-नहान लिया जाय।

कई लोग यह समझ कर कि यदि ये नहान अधिक देर तक लिए जायेंगे तो लाभ अधिक होगा, इन नहानों को घंटे-घंटे भर तक लेते रहते हैं। इसमें शक्ति का अपव्यय होता है, कमजोरी बढ़ती है और मनोवाँछित फल दूर होता जाता है। नहानों का प्रयोग बहुत बुद्धिमानी के साथ करना चाहिए। यदि नहानों की आवश्यकता अधिक प्रतीत हो तो दो बार के बदले तीन बार नहान लेना ठीक होगा पर एक बार में अधिक देर तक नहीं। गरमी के दिनों में ये स्नान जाड़े के दिनों से अधिक देर तक लिए जा सकते हैं, पर एक रोगी के लिए जितना समय उचित होगा दूसरे के लिए नहीं। समय का निर्धारण भी रोग और रोगी का बलावन देखकर ही निश्चित करना चाहिए। इन नहानों को पाँच सात मिनट से शुरू करके एक बार में दस-पन्द्रह मिनट तक लेना समुचित होगा।

लूईकूने के कट्टर मानने वाले इन नहानों के बाद पसीना लाने पर बहुत जोर देते हैं, यदि रोगी में कड़ी कसरत करने की ताकत नहीं तो वे आग के पास तक बैठने की राय देते हैं। यह गलत है। समझने की बात केवल इतनी ही है कि इन नहानों के लेने से जो ठंडक आती है, वह जानी चाहिए, अर्थात् नहान लेने के पूर्व की हालत हो जानी चाहिए। कहीं इतनी गरमी पड़ रही हो कि पसीना आ रहा हो तो इस नहान के बाद पसीना लाने की राय दी जा सकती है, अन्यथा नहीं। अतः नहान के बाद शक्ति के अनुसार टहलना, दौड़ना, हल्की कसरत करना काफी है। जो अशक्त हैं वे सिर को ढ़ककर नंगे बदन धूप में बैठ सकते हैं अथवा गरम कपड़े ओढ़ सकते हैं।

जिन दिनों केवल कफविहीन भोजन ग्रहण किया जा रहा हो, नहान बन्द रखने चाहिए। सफाई का दोहरा काम चलना अधिकतर रोगियों के लिए बहुत उग्र प्रमाणित होगा।

आंतों की सफाई के लिए जल का प्रयोग एनिमा द्वारा किया जाता है। उपवास रसाहार में इस प्रयोग की नित्य आवश्यकता होती है। फलाहार करते समय अथवा साधारण भोजन करने के दिनों में भी यदि पेट की सफाई अपने आप न हो तो इसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए। कुछ लोग एनिमा से इसलिए डरते हैं कि इसकी आदत पड़ जायेगी। यह भ्रम है। साल भर लगातार एनिमा लेने वाले लोगों को इसकी आदत नहीं पड़ी है।

वायु -

वायु के प्रयोग पर बहुत थोड़े चिकित्सक और रोगी ध्यान देते हैं योग में वायु के प्रयोग को प्राणायाम कहते हैं। जिसके विधिवत प्रयोग से अनेक रोग जाते हैं। वायु के सरल प्रयोग से होने वाले लाभ पर दृष्टि न रखना भारी भूल होगी, पर इसका अच्छा प्रयोग स्वच्छ वायु में ही होता हैं। स्वच्छ, साफ वायु में खड़े होकर धीरे-2 नाक द्वारा साँस लेते हुए फेफड़ों को भरना चाहिए और फिर नाक द्वारा ही पूर्ववत निकाल देना चाहिए। कई लोग साँस लेने के बाद उसे फेफड़ों में रोकने की सलाह देते हैं, वायु के फेफड़ों में पहुँचते ही उनकी संजीवनी शक्ति शरीर द्वारा ग्रहण कर ली जाती है अतः बेजान वायु को रोके रखने में कोई लाभ नहीं है।

वायु के प्रयोग की क्रिया दिन में कई बार की जा सकती है। इसका मेल कसरत और टहलने से भी मिलाया जा सकता है। यदि हर समय स्वच्छ वायु में रहने का इंतजाम किया जा सके तो रोग शीघ्रता से जायगा। अतः रोगी को बाग बगीचे अथवा गाँव में खेत के या नदी के किनारे रहना चाहिए। दिनभर शहर में काम करके शाम को स्वच्छ वायु वाले स्थान को लौट जाया जाय तो भी लाभ कम न होगा।

धूप -

लूईकूने ने रोम कूपों को खोल कर पसीना लाने के लिए भाप नहान पर बहुत जोर दिया है। पर हमारे देश में सालभर मिलने वाली धूप से यह काम बहुत मजे में लिया जा सकता है। इसके अलावा धूप की संजीवनी शक्ति का अपना प्रभाव है। उसमें मिलने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों में रोगनाश करने की बहुत अधिक शक्ति होती हैं। जाड़े में जब कभी भाप भी ली जा सकती है।

धूप-नहान के लिए दिन में किसी समय भी नंगे बदन धूप में लेटना चाहिए, केवल सिर को गीले तौलिये आदि से ढंके रहना चाहिए। धूप लेने के बाद ठंडे पानी से नहा डालना चाहिये अथवा भीगे कपड़े से बदन को पोंछ डालना चाहिए। धूप नहान शक्ति और आदत के अनुसार न्यूनाधिक मात्रा में नित्य अथवा सप्ताह में चार पाँच दिन अवश्य लेना चाहिए। गर्मी के दिनों में सप्ताह में एक बार ही यह नहान लेने से काम चल सकता है धूप बहुत तेज हो तो केले के पत्तों से ढ़क दिया जा सकता है।

कसरत -

रक्त संचालन को ठीक रखने के लिए कसरत बहुत उपयोगी है। बुढ़ापे का अर्थ ही है रक्त संचालन में कमी। अतः रोगी को रोग भगाने एवं नवीन बनने के लिए कसरत का सहारा अवश्य लेना चाहिए। कोई भी कसरत ठीक है, क्योंकि सभी कसरतें रक्त संचालन में सहायक होती हैं, अतः कसरत नहीं, शक्ति के अनुसार कसरत चुननी चाहिए। टहलना ऐसी कसरत है, जिसे सभी उम्र वाले कर सकते हैं। टहलने में बड़ी कसरतों की जो बुराइयाँ हैं, वे भी नहीं हैं। अतः रोगी की प्रधान कसरत है टहलना।

शक्ति के अनुसार सुबह शाम एक से चार मील तक टहला जा सकता है। चिकित्सालय में कसरत का सबसे अच्छा समय है नहान लेने के बाद। इस समय टहलने से कसरत तो होती ही है, नहान के बाद आवश्यक गरमी भी आती है।

ऊपर बताई विधि से कोई भी जीर्ण रोग दूर किया जा सकता है। पर यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जीर्ण रोग जाने का अर्थ है तीव्र रोग आने की शक्ति आना। जीर्ण रोग के उपचार काल में तीव्र रोग को उभाड़ के नाम से पुकारा जाता हैं। ज्यों-2 शक्ति बढ़ती जाती है, जीवनी शक्ति तीव्र हो जाती है, गन्दगी अथवा रोग के लिए शरीर में रहना कठिन हो जाता है, और वे बाहर आ जाते हैं। यही सफाई की स्वाभाविक क्रिया है। जीर्ण रोग के उपचार करते समय जो उभाड़ हो, उनका तीव्र रोग की तरह ही उपचार होना चाहिए।

कई रोगी यह देखते रहते हैं कि अभी रोग इतना गया, इतना नहीं गया। यदि इतना इतने दिन में गया तो इतना इतने दिन में जायगा। इस दृष्टिकोण के कारण प्रायः निराशा होती हैं। कई बार रोग देखने में प्रायः चला जा सकता है, कोई बाहरी लक्षण प्रतीत नहीं होता, ऐसी दशा में लोग उपचार छोड़कर फिर पुरानी आदतों को पकड़ लेते हैं। ऐसी हालत में रोग फिर होता है और प्राकृतिक उपचार को बदनाम किया जाता है। रोगी को रोग की ओर ध्यान न देकर जीवनी शक्ति को समझाने की कोशिश करनी चाहिए। जब इस हद तक शरीर की सफाई हो जाय, जीवनी शक्ति बढ़ जाय कि शरीर में गंदगी इकट्ठा होते ही शरीर उसे तीव्र रोग के कम में बाहर फेंक दे तभी रोग मुक्त हुआ समझना चाहिए।

रोग जाने के बाद -

रोग जाने के बाद कैसा जीवन-क्रम होना चाहिए, इस पर अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। जिस पथ के ग्रहण करने से रोग हुआ था उसे फिर यदि ग्रहण किया जायगा तो रोग होगा ही, इसमें संदेह नहीं। हाँ, उस रोग का नाम फिर कुछ और पड़ सकता है।

स्वास्थ्य और विचार -

इस लेख को समाप्त करने से पहले में चाहता हूँ कि पाठकगण विचार और स्वास्थ्य के सम्बन्ध को अवश्य समझ लें। रोग भगाने के लिए स्वस्थ विचारों की बड़ी आवश्यकता होती है।

रोग कितना भी भयंकर क्यों न हो, उसकी भयंकरता के सारे विचार रोगी को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए। जहाँ तक हो सके रोग को सरल समझना चाहिए। इसमें तो संदेह ही नहीं कि उचित उपचार से रोगों की भयंकरता स्वतः चली जाती है। निराशा तो कभी होनी ही नहीं चाहिए। विश्वास रखना चाहिए कि मेरा स्वस्थ होना निश्चित एवं ध्रुव है। ऐसा विश्वास करने की आवश्यकता पर जितना जोर दिया जाय थोड़ा है। इस विश्वास के बल पर रोग भगाकर स्वास्थ्य लौटाया जा सकता है और मृत्यु जीवन में परिणित की जा सकती है।

रोग दूर करने के विचारों से लाभ उठाने के लिए इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि मैं स्वस्थ हो सकता हूँ और अवश्य हो जाऊंगा। फिर इस तरह का आचरण कीजिए कि जैसे आप स्वस्थ हैं और हमेशा अपने को शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता, आशा एवं स्फूर्ति का केन्द्र समझिए। फिर ये सभी आपके पास बिना बुलाये आ जाएंगे।


दृष्टि-दोष दूर करने की सरल विधि

(ले.-डाँ. आर. एस. अग्रवाल, नेत्र विशेषज्ञ, दिल्ली)

अक्सर लोग पढ़ते समय नेत्रों में पानी आने, खुजली और जलन होने, आँख और सिर में दर्द होने आदि बातों की शिकायत किया करते है। अनेकों के लिये यह असम्भव हो जाता है कि वे बुढ़ापे में बारीक अक्षर पढ़ सकें और किताब को नजदीक रखकर देख सकें। पढ़ने में किसी प्रकार की भी दिक्कत या तकलीफ होने से डॉक्टर लोग तुरन्त चश्मा लगाने की सलाह दे देते हैं, पर चश्मा लगाने से दृष्टि कमजोर होती जाती है। जिसकी वजह से लोगों को बार-बार चश्मा बदलना पड़ता है। बहुत से रोगियों का कष्ट चश्मे से दूर नहीं होता और उन्हें बार-बार चश्मेवालों की दुकानों पर जाना पड़ता है। इस प्रकार नए-नए चश्मे खरीदते रहने के कारण उनके घर में चश्मे की एक दुकान ही बन जाती है।

यदि आप पढ़ने के नियम जान लें और उनको प्रयोग में लावें तो लिखने-पढ़ने की हर प्रकार की कठिनाई दूर हो जाय, चश्मे की आवश्यकता न रहे और आपके नेत्र जन्म भर स्वस्थ बने रहें तथा मोतियाबिन्द की बीमारी कभी न सतावे। पढ़ने की चक्षु स्वास्थ्यवर्द्धक विधि नीचे दी जाती है।

(1) पढ़ते समय आपकी किताब नीचे की ओर रहनी चाहिये, नेत्रों के बिल्कुल सामने नहीं।

(2) आप कुर्सी या जमीन पर आराम से बैठें। पढ़ते समय अपने हाथों को सिर या ठोड़ी पर न रखें। सिर को किसी एक ही विशिष्ट अवस्था में न रखकर जरा-जरा हिलाते रहें। यदि आप लेटकर पढ़ने के अभ्यासी हों तो पढ़ने के समय सिर के नीचे कोई तकिया लगाकर पढ़ना चाहिए, करवट लेटकर नहीं।

(3) पढ़ते समय ऊपर की पलकें कुछ-कुछ नेत्रों पर गिरी रहनी चाहिये, आँखों को अधिक नहीं खोलना चाहिए। पढ़ते समय पलकों को धीमे-धीमे गिराते रहना नेत्रों के लिए लाभदायक है।

(4) जाड़े की ऋतु में अक्सर लोग धूप में बैठकर भी पढ़ते है। परन्तु जो लोग धूप में पढ़ना चाहें, उन्हें अपनी किताब ऐसे स्थान पर रखनी चाहिये जिससे किताब पर धूप न पड़े। यदि चेहरे पर धूप पड़ती हो तो परवाह नहीं। परन्तु यदि धूप किताब पर पड़ेगी तो आपकी आँखों पर जोर पड़ेगा। इसलिए इससे आपको बचना चाहिये।

(5) पढ़ने के लिये रोशनी बहुत तेज नहीं होनी चाहिए। बिजली की तेज रोशनी में पढ़ना आँखों के लिए हानिकर है। मोमबत्ती, शेडदार टेबल लैम्प या दूधिया बल्ब पढ़ने के लिए उपकारी हैं। अगर सादे बल्ब से पढ़ना पड़े तो इस प्रकार से पढ़ना चाहिये कि बल्ब की किरणें कागज पर सीधी न पड़े।

(6) धीरे-धीरे पलक झपकाने से नेत्रों को आराम मिलता है। हर पंक्ति के पढ़ने में पलकों को एक या दो बार जरूर झपका लेना चाहिये और इस काम को कैसे करना होगा इसको भी आपको ठीक तौर पर जान लेना चाहिए। पलकों को ठीक तौर पर झपकाने का तरीका यह है कि ऊपर की पलकें धीरे-धीरे नीचे की ओर गिरें और फिर धीरे-धीरे ऊपर उठें। पर नीचे की पलकों को उनसे ऊपर ही ऊपर रखें, बहुत से नेत्र विकार पलक को ठीक तौर पर झपकाने से ही दूर हो जाते हैं।

(7) रोज सुबह को दस मिनट तक सूर्य की ओर नेत्र बन्द करके बैठना चाहिए और अपने सिर को साँप के फन की तरह धीरे-धीरे हिलाना चाहिये। फिर छाया में आकर ठंडे पानी से नेत्रों को धोना चाहिए। इस प्रकार नित्य सूर्य व्यायाम करने से नेत्र स्वस्थ बने रहते हैं, दृष्टि तेज होने लगती है।

(8) आमतौर पर लोग यह समझते हैं कि बारीक अक्षर पढ़ने से नेत्र कमजोर हो जाते हैं। यह विचार गलत है। बारीक अक्षरों को नित्य पढ़ने से दृष्टि ठीक बनी रहती है और नेत्र की पीड़ा भी जाती रहती है।

(9) अच्छी आँखों में यह विशेषता देखी जाती है कि पढ़ने वाले को पुस्तक के वे अक्षर जिन्हें वह पढ़ता हो औरों की अपेक्षा अधिक काले प्रतीत होते है। इसका यह अर्थ है कि उनकी आँखों में त्राटक का तेज मौजूद है। जिन लोगों को किताब के अक्षर अधिक काले नहीं मालूम होते, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि उनमें त्राटक के तेज की कमी है। इस कमी के कारण ही नेत्र पढ़ते समय थक जाते हैं। इस तेज को उन्हें बढ़ाना चाहिए।

(10) सूर्य चक्षु व्यायाम के बाद आँखों को हाथ से ढंके, नेत्रों को इस प्रकार से बन्द करें कि हाथ का दबाव आँख पर न पड़े। पाँच मिनट तक आँखों को ढंके रहें और किसी काली वस्तु का ध्यान करें। इस क्रिया को पामिंग (palming) कहते हैं। फिर हाथ हटा कर धीरे से नेत्रों को खोलें और हौले-हौले पलकों को झपकें, सिर को दाँये बांये हिलाएं और अपनी दृष्टि पुस्तक की सफेद पंक्तियों पर घुमायें। इस तरह पढ़ने की चेष्टा किये बिना ही आठ-दस पृष्ठ शेष कर दें। किताब को उल्टी रखने से यह क्रिया सुगमता से होती है, क्योंकि इससे पढ़ने की चेष्टा में कमी हो जाती है। दो-तीन दिन के बाद ऐसा महसूस करें कि सफेद पंक्तियों पर दृष्टि घुमाते समय ऊपर के अक्षर और शब्द अधिक काले प्रतीत होते हैं।

(11) सूर्य व्यायाम और पामिंग करके पलक झपकाना, सिर को जरा-जरा हिलाना और टेस्ट टाइप (Test type) पढ़ना। टेस्ट टाइप (बारीक अक्षरों की पुस्तक) को इतनी दूरी पर रखना चाहिये जहाँ से आपको साफ दिखाई दे। फिर फासला धीरे-धीरे कम करते जाना चाहिए।

इन अभ्यासों के करने से अनेक रोगियों की दृष्टि बढ़ गई है और चश्मा लगाने से उनका पिंड छूट गया है। एक साठ साल के बुड्ढ़े की दृष्टि तीन दिन के अभ्यास में बारीक अक्षर पढ़ने के योग्य हो गई थी। इन्हीं उपायों के द्वारा बहुतों ने अपनी दृष्टि स्वस्थ और उत्तम बनाई है। इन विधियों के अभ्यास से, कौड़ी खर्च किए बिना ही, हर कोई लाभ उठा सकता है।


मुख-श्री की वृद्धि के कुछ सहज उपाय

बहुत से लोग अपने नित्य-प्रति के जीवन में अपनी मुख-मुद्रा की ओर भूलकर भी ध्यान नहीं देते। वे कभी दर्पण में अपने चेहरे के प्रभावशाली केन्द्रों का निरीक्षण ही नहीं करते। अनेक व्यक्तियों के मुख मण्डल पर जो झुर्रियाँ पड़ी रहती हैं, चेहरे पर जो बराबर मायूसी सी छाई रहती है, इसका वास्तविक कारण क्या है? इस पर लोग बहुत कम विचार करते हैं। चेहरे के अवयवों पर अधिक जोर डालने से-जैसे मुँह बिचकाना, चिढ़ाना आदि-अपने आपको हर घड़ी दार्शनिक के रूप में बनाए रखने से, मुखमण्डल पर स्थायी रूप से झुर्रियाँ पड़ जाती हैं। इस तरह का मनुष्य समय आने से पहले ही वृद्ध दिखने लगता है। मुख-मण्डल मानव हृदय को प्रतिबिम्बित करने वाला उज्ज्वल दर्पण है। अमुक व्यक्ति का हृदय कितना सुन्दर अथवा असुन्दर है, यह उसके मुख-दर्पण पर दृष्टिपात करके कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ सकता है। संसार के मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य के चरित्र विश्लेषण अथवा मनोविश्लेषण को मुख-मुद्रा का प्रमुख साधन बताया है। फिर यदि यह दर्पण धुँधला ही बना रहे तो, यदि मानव की आत्मा, मानव का हृदय प्रतिबिम्बित न होता रहे, तो भला मानव-जीवन किस प्रकार सुख-परिपूर्ण एवं आनन्दमय बन सकता है?

जिस प्रकार रेशमी वस्त्र में मोड़ने या तह लगा कर रखने के कारण सिकुड़न पैदा हो जाती है और फिर बार-बार प्रयत्न करने पर भी वह दूर नहीं होती, वही बात चेहरे की झुर्रियों के भी सम्बन्ध में समझनी चाहिए। चेहरे की रंगों और नसों को किसी विशिष्ट मुद्रा में बनाए रखने, मोड़ने या सिकोड़ने की आदत पड़ जाने पर वह आसानी से दूर नहीं की जा सकती। फिर तो मनुष्य अपनी इस आदत से लाचार हो जाता है-लाख प्रयत्न करने पर भी उससे छुटकारा नहीं मिलता। ऐसे व्यक्ति यदि हंसना, खिलखिलाना अथवा उत्फुल्ल होना चाहें, तो भी उनके मुख-मण्डल पर वह रौनक नहीं आ पाती, जो वास्तव में आनी चाहिए। अपने वास्तविक मनोभावों को बरबस छिपाने और चेहरे को लगातार विद्रूप मुद्रा में बनाए रहने से मुखाकृति का बिगड़ जाना, उसकी सुन्दरता का नष्ट हो जाना सर्वथा स्वाभाविक है। निरन्तर क्रोध करने वाले व्यक्ति की आकृति भयानक हो जाती है और वह क्रोध की प्रतिमूर्ति बन जाता है। इसी प्रकार लगातार चिंता करते रहने से भी मुखश्री को भारी आघात पहुँचता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मानसिक कारणों से नष्ट हुई चेहरे की सुन्दरता की क्षति-पूर्ति बाहरी उपकरणों से उतना अधिक नहीं की जा सकती है जितनी कि प्राकृतिक साधनों से चेहरे को सुन्दर एवं प्रभावशाली बनाने के लिए दर्पण में सुतीक्ष्ण दृष्टि से अपनी मुखाकृति का अवलोकन करें। चेहरे का कौन सा अवयव अथवा अंग सुडौल अथवा समानुपातिक नहीं है, उसमें कौन-कौन से वैषम्य विद्यमान हैं, मुख मण्डल पर किन-किन मनोभावों की स्पष्ट छाप पड़ती है, इन सारी बातों का अपनी मुख-मुद्रा के द्वारा पता लगाने का प्रयत्न कीजिए। इसके लिए किंचित् अभिनय का भी अभ्यास करना चाहिये। प्रारम्भ में छोटे-छोटे मनोभावों को मुख-मण्डल पर मुद्रित करने का प्रयत्न करें और इनमें सफलता मिलने या क्रमशः अपेक्षाकृत गम्भीर मनोभावों का। उग्र मनोविकार मुख-श्री को नष्ट कर देते हैं, इस बात को सदैव ध्यान में रखते हुए अपने को भूलकर भी मानसिक उद्वेगों-शोक, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा आदि-का शिकार मत बनने दें। मन में शान्ति, आनन्द और उत्साह-वर्धक विचारों को स्थान दें। सद्विचार के स्थायित्व से ही मुखाकृति प्रभावशाली बनती है। जिसने अपने मनोविकारों पर अंकुश जमा लिया है, वह दूसरों को बड़ी आसानी से प्रभावित तथा आकर्षित कर सकता है। मन की एकाग्रता एवं अभ्यास से मनोद्वेग पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

चेहरे को सुन्दर तथा प्रभावशाली बनाने के इस मानसिक साधन को समुचित रीति से उपयोग में लाने पर ही बाह्य उपकरण भी आँगिक उपचार के तौर पर चेहरे की सुन्दरता बढ़ाने में विशेष सहायक हो सकते हैं। किन्तु उसके लिए बाजारों में आमतौर से बिकने वाली पेटेन्ट दवाइयों, क्रीम, पाउडर आदि का प्रयोग न करके प्राकृतिक उपचार करना श्रेयस्कर होगा। चेहरे की झाई, मुंहासे, झुर्रियाँ, साधारण फुँसियाँ दूर करने के लिए नींबू का प्रयोग विशेष उपयोगी होता है। दही और छाछ मलने से चेहरे की स्वाभाविक लालिमा बढ़ती है और मुख-मण्डल की त्वचा, स्वच्छ, सुकोमल और कान्तिवान बन जाती है। इसी प्रकार के अन्य प्रकार के प्राकृतिक उपचार भी हैं। जिनका बड़ी सफलतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है।


Quotation

स्त्री-धर्म का पालन वही स्त्री करती है जो पति अगर गिरता हो तो उसे बचाये, न कि उसके साथ-साथ स्वयं गिर पड़े। यदि पति बलात्कार करने आवे तो उसे थप्पड़ मारकर भी सीधा करना उसका धर्म है।

-महात्मा गाँधी

वह हिन्दू है जो ईश्वर में विश्वास करता है, आत्मा को अमर मानता है तथा पुनर्जन्म, कर्म सिद्धाँत और मोक्ष में विश्वास करता है, साथ ही अपने दैनिक जीवन में सत्य और अहिंसा का अभ्यास करने का प्रयत्न करता हैं।

-महात्मा गाँधी

कुरीति के अधीन होना पामरता है और उसका विरोध करना पुरुषार्थ।

-महात्मा गाँधी


मिट्टी में अमृत मिला हुआ है।

क्षिति जल पावक गगन समीरा।

पंच रचित यह अधम शरीरा॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँच तत्व हैं जिनसे शरीर बनता है। इन पाँचों तत्वों में से जो ज्यादा स्थूल है वह पृथ्वी तत्व है। इस में शेष चारों तत्व मौजूद हैं।

कोई भी प्राणी तब तक स्वस्थ रहता है जब तक पाँचों तत्व अपने-अपने अनुपात से मौजूद रहते हैं, जब किसी में कमी पेशी होती है तो प्राणी में विकार आ जाते हैं, यह विकार ही रोग हैं।

यों तो बीमारी के कारण मानसिक भी होते हैं लेकिन मानसिक बीमारियों को भी प्राकृतिक उपचार ठीक कर देता है। प्राकृतिक उपचार में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, इन चार तत्वों का उपयोग किया जाता है। यों अन्न और औषधियाँ भी इन तत्वों से ही भरी पड़ी हैं।

प्राकृतिक उपचार में खान-पान के संयम और पथ्य की आवश्यकता तो होती ही है पर बाहरी उपचार भी आवश्यक होता है। बाहरी उपचार अन्दर के विकारों को निकालता है और खान-पान, आहार-विहार भीतर विकार को बढ़ने से रोकता है। उपचार की सबसे बड़ी विशेषता यही होनी चाहिए। यदि बाहर बीमारी निकलती रहे और भीतर बीमारी बढ़ती रहे तो इस प्रकार स्वस्थ होना कठिन है। उसी प्रकार भीतर बीमारी अच्छी होती जाय पर विकार नष्ट न हों ऐसे उपचार भी बेकार सिद्ध होते हैं। उपयोगिता तभी है जब बीमारी पैदा भी न हो और जो बीमारी हो वह दूर भी हो जाय। इसीलिए बाहरी उपचार और खान-पान, आचार-विचार इन दोनों पर ही स्वास्थ्य निर्भर रहता है।

तत्वों के उपचार में पृथ्वी तत्व का उपचार जहाँ आसान है वहाँ वह निरापद भी है। मिट्टी की चिकित्सा से कभी हानि होती ही नहीं और छोटे से छोटे बच्चे से लेकर वृद्ध व्यक्ति तक की चिकित्सा आसानी से की जा सकती है। ऐसा कोई रोग नहीं जिस पर मिट्टी का उपयोग न किया जा सके, फिर वह चाहे कैसा ही असाध्य क्यों न हो। मरणासन्न रोगी भी इसके उपचार से अच्छे होते देखे गये हैं।

मिट्टी के उपचार में अधिकतर चिकनी मिट्टी का उपयोग किया जाता है। साथ ही वह मिट्टी साफ जगह की होनी चाहिए और होनी चाहिए शुद्ध। यों अशुद्ध मिट्टी कोई विशेष हानि तो नहीं पहुँचाती पर देर लगा देती है इसलिए जहाँ तक साफ और गन्दगी से रहित मिट्टी मिल सके वहाँ तक अन्य किसी प्रकार की मिट्टी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

मिट्टी में किसी प्रकार के कंकड़, पत्थर न होने चाहिए, हों तो उन्हें निकाल देना चाहिए। मिट्टी को बारीक पीसकर, यदि सम्भव हो तो कपड़छन कर लेना चाहिए, पर न हो तब भी काम चल सकता है। पिसी हुई मिट्टी को पानी में भिगो देना चाहिए लेकिन इतना पानी नहीं डालना चाहिए जिससे वह पतली हो जाय। न बहुत गाढ़ी और न बहुत पतली-समभाव की मिट्टी लेकर रुग्ण स्थान पर उसका एक अंगुल मोटा लेप कर देना चाहिए। इसके बाद किसी साफ कपड़े को गीला करके, उसकी तह बनाकर उस जगह रख देना चाहिए, मिट्टी गिर न पड़े या स्थानान्तरित न हो या पुछ न जावे इसके लिए उस पर पट्टी बाँध देनी चाहिए। पट्टी बांधते समय इस बात का बराबर ध्यान रखना चाहिए कि गाँठ अधिक कड़ी न हो जाय जिसके कारण रक्त बहा नाड़ियों पर दबाव पड़े या वे कस जायं और न पट्टी इतनी ढीली ही हो जिससे मिट्टी गिर पड़े। पट्टी बाँधने का उद्देश्य इतना ही है कि मिट्टी अपने स्थान पर रह सके और अपना काम करती रहे।

जुकाम की अवस्था में गले पर, सिर दर्द में सिर पर या माथे पर, आँख दर्द पर आँख बन्द करके उसके पलकों पर, दाँत दर्द की अवस्था में जबड़े पर, गले की सूजन पर या खाँसी आदि में गले पर, छाती पर, कान के दर्द में कान के चारों ओर, पेट दर्द में पेट पर, गुर्दे के दर्द में गुर्दे में, अण्डवृद्धि में अण्डकोष पर, आतिशक में इन्द्रिय पर, कमर दर्द में कमर पर, ज्वर में समस्त शरीर पर, कब्ज, अफरा आँव आदि उदर रोग सम्बन्धी समस्त विकारों में उदर पर, मिट्टी का लेप करना चाहिए। जहरीले जानवर यदि काट खायें तथा साँप, बिच्छू, बर्र आदि के काटे जाने पर काटे हुए स्थान पर मिट्टी का लेप करना चाहिए। छाजन, खाज-खुजली की अवस्था में जहाँ जिस जगह व्याधि हो, मिट्टी का लेप करना चाहिए।

आमतौर से सारे विकार उदर के कारण ही हुआ करते हैं इसलिए प्रत्येक अवस्था में पेट के ऊपर मिट्टी की पट्टी अवश्य बाँधनी चाहिए। हैजे की अवस्था में जहाँ सारे शरीर पर मिट्टी थोपी जावे वहाँ वस्ति स्थान पर भी उसे थोपना चाहिए।

थोपी हुई मिट्टी गरम होना आरंभ होती है, उस समय वह अन्दर के विकारों को निकालने में लगी रहती है। इसलिए जैसे मिट्टी का लेप सूखने लगे उसे उतार कर फिर दूसरा लगा देना चाहिए। उतारी हुई मिट्टी को फिर दुबारा न लगाना चाहिए और न गरम की हुई मिट्टी ही लगाना चाहिए।

चकते मुंहासे आदि में भी मिट्टी का लेप, मिट्टी का उबटन अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं। हृदय रोग में भी इसे लोगों ने आजमाकर देखा है और उन्हें सफलता मिली है। लकवा की हालत में तो गड्ढा खोदकर सिर को ऊपर रखकर मनुष्य को उसमें दबा देना चाहिए। उससे वात बहा नाड़ियों में गति होना आरम्भ हो जाता है और लकवा दूर हो जाता है।

मिट्टी के उपचार करते समय खाने-पीने के संयम की बात आरंभ में कह दी गई है। मसाला, खटाई, मिठाई का परहेज तो अत्यन्त आवश्यक है। सात्विक और सुपाच्य भोजन तथा हरा शाक अपनी बीमारी की अवस्था में ही नहीं स्वस्थ अवस्था में भी खाते रहना चाहिए। असंयम और अपच तो स्वस्थ शरीर को भी बीमार बना देता है, इसलिए प्रकृति के अधीन रहने की अवस्था में सब बातें अत्यन्त प्राकृतिक होनी चाहिए।


स्वास्थ्य वर्धक कुछ सरल कसरतें

अमेरिका के मि. सैनफोर्ड वैनेट ने एक महत्वपूर्ण व्यायाम पद्धति का आविष्कार किया है। वे इतने सरल और सीधे हैं कि मनुष्य उन्हें लेटा-लेटा भी कर सकता हैं। वृद्ध, युवा और बालक तथा बालिका में सभी इन व्यायामों से लाभ उठा सकते हैं। समय भी उनमें विशेष व्यय नहीं होता, 30 मिनट में ही समाप्त किये जा सकते हैं। मि. वैनेट जब 50 वर्ष के हुए उस समय अपने ही को इन व्यायामों के आजमाने का साधन बनाया और 75 वर्ष की आयु में उनके शरीर में वह परिवर्तन आया कि उनका शरीर एक 30 वर्ष के युवक जैसा दिखाई पड़ने लगा। इस व्यायाम में एक विशेषता यह है कि मनोविज्ञान के आधार पर इसकी स्थापना की गई है, यदि इसमें व्यायाम करते समय यह न सोचा जाय कि इस अमुक अंग का व्यायाम करते हुए मेरा अमुक अंग व्यायाम के कथित लाभ को प्राप्त कर रहा है तो बहुत कुछ संभव है उतना लाभ न हो जितना कहा गया है या होना चाहिये। इससे इन व्यायामों को करते समय मन में यह धारणा करनी आवश्यक है कि मैं जिस व्यायाम को जिस अंग की पुष्टि के निमित्त कर रहा हूँ। उस व्यायाम से मेरा वह अंग पूर्ण पुष्टि को प्राप्त हो रहा है और व्यायाम का लाभ मुझे पूर्ण रूपेण मिल रहा है। इस प्रकार व्यायाम करने पर एक आश्चर्यजनक लाभ होता है। अब पाठकों के समक्ष उन व्यायामों को उपस्थित करते हैं।

गले की कसरतें -

(1)प्रथम चित्त लेट जाओ, फिर कंधों के नीचे तकिया रख लो। पुनः अपने सिर को आगे की ओर झुकाकर फिर पीछे की ओर झुकाओ। इस प्रकार 5 बार से शुरू करके 100 बार तक करना ही पर्याप्त है।

इस व्यायाम से ग्रीवा की नसों में तनाव आता है इसी कारण बुढ़ापे की निशानी झुर्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। गला हृष्ट-पुष्ट होकर सुन्दर बन जाता हैं। पेट की नसों में तनाव और ढील आने से पेट को भी लाभ होता है।

(2) ग्रीवा में 2 माँस पेशियाँ हैं जो सिर के पिछले भाग से प्रारम्भ होती हैं और कन्धों में पसलियों की हड्डियों के समीप समाप्त होती हैं। जब ये पेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्दन भी कमजोर पड़ जाती है। इन पेशियों की मालिश करने और इनमें खिंचाव पैदा करने से गर्दन सुदृढ़ बन जाती है। इनके लिए नीचे लिखी विधि काम में लावें।

(अ) अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसा कर सिर के पीछे दृढ़ करके जमा लें। फिर सिर को अकड़ाकर पृष्ठ भाग की ओर अत्यन्त शक्ति से मोड़ें। इस प्रकार 5 बार से प्रारम्भ करें और सप्ताह में 2 बार बढ़ाते जायें।

(ब) एक करवट लेटकर अपनी ठोड़ी को ऊपर वाले कंधों पर छुआवें। इसी तरह दूसरे करवट से भी करें। इससे नसों में तनाव आने से और सिर के सीधा करने से नसें ढीली होने से सारी सुकड़न दूर हो जाती हैं।

कन्धों का व्यायाम -

(1) सीधे लेटकर कोहनी को जोर से तान कर बारबार वाली छाती में मारिये। 5 से 50 तक करें। इससे कमजोर और ढीले कन्धे सुडौल और दृढ़ हो जाते हैं। ग्रन्थिवात या हवा का दर्द भी इससे जाता रहता है।

(2) सीधे लेटकर एक हाथ की कोहनी दूसरे से और दूसरे की पहले से परस्पर पकड़कर मारो। इससे कंधे दृढ़ होते हैं और छाती का विस्तार होता है।

(3) सीधे लेट कन्धों को नीचे ऊपर करें। यदि पूर्व में कुछ पीड़ा जान पड़े तो घबराइये मत। 5 से प्रारम्भ करके बढ़ाते रहें। ऊंचे तथा सुदृढ़ करने का यह सर्वोत्तम साधन है।

(4) दोनों हाथों से कोहनी पकड़कर सीधे लेट जाइये फिर शनैः-2 सिर को अपनी छाती की ओर झुकाइये, पुनः पीठ को ढीला करिये और बाहुओं को तानिये तथा कन्धों का संचालन कीजिये। 5 से 15 तक आवश्यक है। इससे कमर में भी शक्ति उत्पन्न होती है।

भुजाओं का व्यायाम -

(1) लेटकर एक करवट से सो जाइये, पुनः अपने ऊपर वाले हाथ को निचले हाथ से पकड़ कर दबाइये तथा ऊपर वाले हाथ को ऊपर को खींचिये। बढ़ाते हुए 5 से 15 तक बढ़ाइये।

(2) एक हाथ से दूसरे की कलाई को पकड़िये और दूसरे में 2-21। सेर का डम्बल लेकर उसे सीधा कीजिये। 10 से 15 पर्याप्त है।

(3) एक करवट सो जाइये और ऊपर वाली कोहनी को नीचे के हाथ से पकड़िये और फिर दोनों को नीचे ऊपर हिलाइये।

(4) प्रथम करवट के सहारे लेटकर ऊपर वाली जो बाजू है उसको सीधी तान दें और मुट्ठी बाँध कर जोर से अकड़ाइये। इसके अनन्तर हाथ को बल देते हुए पीछे आगे करिये। 5 से 15 तक काफी है।

(5) एक हाथ से दूसरी बाजू का मध्य भाग पकड़िये और जिस हाथ से पकड़ा है उस करवट लेट जाइये, फिर उस पकड़े हुए हाथ को अकड़ा कर पीछे की ओर ले जाइये। 5 से 15 पर्याप्त होगा।

(6) एक डेढ़ इंच मोटी लोहे की छड़ खाट के सिरहाने गाड़ लीजिये। सीधे लेटकर उस छड़ को हाथ से पकड़ कर सारे शरीर का भार उस पर तोल कर ऊपर उठिये। उसी तरह दूसरे हाथ से करिये। फिर एक साथ दोनों हाथों से वैसा ही करें। 5 से 15 तक पर्याप्त हैं।

बगल की माँस पेशियों का व्यायाम -

तकिये पर करवट से लेटकर सिर को ऊंचा करिये। पैरों को भी साथ ही उठाते जाइए। 7 बार तक करिये।

पेडू का व्यायाम -

सीधे लेटकर क्रमशः दाँया, बाँया घुटना उठाकर छाती की तरफ झुकाइये। 15 तक पर्याप्त है।

लाभ- इस व्यायाम से मसाने में और आँतों में बल का संचार होता है विष्टम्भ (कब्जी) दूर होती है।

कमर के मसल्सों का व्यायाम -

(1) खाट पर सीधे होकर बाहुओं को छाती की ओर टेढ़ा करके घुमाओ। पुनः तकिये से सिर को उठा कर बांये-दायें मुड़िये। 5 से 15 बार तक।

(2) हाथ चूतड़ों पर रखकर सीधे खड़े हो जाइए। फिर शरीर को दोनों ओर झुकाइए।

(3) करवट से चारपाई पर लेटकर क्रमशः दोनों घुटनों को पकड़-2 कर जोर से खींचो और ढीला कर दो। 10 से 15 बहुत है।

(4) करवट के बल लेट जाइए और फिर दोनों हाथों को पकड़ लीजिए। तदनंतर उनके बीच में घुटनों को फंसा कर ऊपर की ओर तानों और ढीला कर दीजिए, दोनों तरफ ऐसा ही कीजिए। कन्धा, कमर और पीठ में शक्ति का संचार होगा।

(5) कूल्हे को करवट के बल लेटकर सामने की ओर झुकाइये तथा ऊपर की कोहनी को पीछे की ओर हटाइए। यह दोनों कार्य एक साथ ही होने चाहिए। दोनों करवटों से करिये। 5 से 10 बार।

टाँग और जाँघों का व्यायाम -

(1) खाट में पैरों की ओर डेढ़ फुट लम्बा एक रस्सा बाँध लीजिए। रस्से के दूसरे सिरे पर एक फंदा लगा लीजिए। पुनः एक करवट लेट कर ऊपर का पैर नीचे के पैर के ऊपर लाकर खाट की पाटी से छुआइये और रस्से को खींचिये और ढीला कीजिए। इसी प्रकार दूसरी करवट भी करिए इससे पिंडलियों की फूली हुई नसें ठीक हो जाती हैं और कमजोरी दूर होती है।

सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम -

हाथों को दोनों कुहनियों के ऊपर रखकर करवट से लेट जाइये। टाँगों को सीधा रखो और कुहनियों को सिर के पीछे की ओर झुकाओ। पुनः दोनों हाथों का बल कोहनियों पर देकर सम्पूर्ण शरीर को अकड़ा दीजिए और दो तीन सेकेंड भर इसी अवस्था में रहिए। एकाध सेकेंड विश्राम करके पुनः ऐसा ही करिए। ऐसा करने से एकदम पसीना आ जायेगा। शनैः-2-10 बार तक बढ़ाइये।

आँखों का व्यायाम -

सीधे लेटकर दोनों आँखों से क्रमशः दोनों ओर दूर-दूर तक देखिए। और फिर एक बार की आँखों को जोर से बन्द कर लीजिए। फिर आँख खोलकर ऊपर नीचे, तिरछे पुतलियों को वृत्ताकार दूर-दूर तक घुमाइए। इससे आँखों में ज्योति आकर चश्मा लगाने का अभ्यास छूट जाता है।

यकृत का व्यायाम -

(1) चित्त लेटकर दोनों पैरों को खड़ा कीजिए। पुनः सीधी तरफ दोनों हाथों की अंगुलियों के अग्र भागों को पसली तथा कूल्हे की हड्डी के मध्य में पेडू पर रखिये। पुनः अंगुलियों को दबाकर पसलियों से लगाये हुए ऊपर की ओर खींचिए। 20 बार इसी प्रकार नीचे से ऊपर की ओर खींच-2 कर छोड़िये। अभ्यास 100 तक कीजिए। इससे पेट दबकर पेडू की नसें ढीली होंगी और जिगर में उत्तेजना आयेगी।

(2) सीधी करवट लेटकर सीधे हाथ को नीचे सीधा फैला दो। फिर उल्टे हाथ को जिगर पर रख सिर को सामने की ओर थोड़े-2 झुका लीजिए और साथ ही घुटनों को भी थोड़ा समेट लीजिए। (इस प्रकार से नसें ढीली होकर यकृत ऊपर उठा सा दिखाई देगा) अब उस जिगर को अंगूठों से पसलियों के नीचे दबाइए।

(3) उल्टे हाथ की करवट लेटकर सिर और घुटनों को झुकाइए। उल्टे हाथ को सीधी बगल में दबाकर सीधे हाथ की मुट्ठी बाँधकर जिगर पर हौले से जल्दी-2 मारिए। 20 से प्रारम्भ कर बढ़ाते जाइए।


क्या तुम स्वस्थ हो!

तुम्हारे मन में जो विचार उठते हैं, तुम्हारे जिन विचारों को बुद्धि का समर्थन प्राप्त हो जाता है, यदि तुम्हारा शरीर उन विचारों के अनुसार काम नहीं कर सकता तो समझ लो कि तुम स्वस्थ नहीं हो। इसी प्रकार तुम्हारी बुद्धि जिस प्रकार के विचारों को प्रेरणा देती है परन्तु उस प्रकार के विचारों को तुम्हारा मन ग्रहण नहीं करता, यहाँ तक कि तुम्हारी बुद्धि और तुम्हारे मन में संघर्ष छिड़ा रहता है और तुम अपने मन के द्वारा बुद्धि को बारबार दबा डालने का प्रयत्न करते हो, यहाँ तक कि तुम उस पर हावी हो जाते हो, तब भी तुम स्वस्थ हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। स्वास्थ्य का सम्बन्ध केवल शरीर के ही साथ नहीं है, मन के साथ भी है। तुम प्रायः कहा करते हो, आज हमारा मन ठीक नहीं है, दर्द होता है, बुखार आ गया है आदि बातें स्वास्थ्य के साथ शरीर और मन दोनों को ही संयुक्त करती है।

स्वास्थ्य शब्द बड़े गूढ़ार्थ वाला हैं। ‘स्व’ का प्रयोग हमेशा आत्मा के लिए आता है। आत्मा सम्पूर्ण है, सर्व शक्तिमान है और उसमें किसी प्रकार का अभाव नहीं हैं। क्या है जो उसके पास नहीं है, कौन सा ऐसा काम है जो उसके द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता। यह संसार और संसार की सभी शक्तियाँ अकेले ‘स्व’ से ही तो प्रसूत हुई हैं। यही महान स्व इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं और उन्होंने चौबीस तत्वों से अपने लिए इस पुरी की रचना की है। यह पुरी है शरीर। इसे देवता का मन्दिर कहते हैं, इस मन्दिर के देवता हैं-आत्म देव। यही आपका स्व है। इस शरीर रूपी मंदिर का निर्माण हुआ हैं पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) पंच तन्मात्रा (गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द), पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) इन चौबीस तत्वों से। जब तक ये चौबीसों तत्व आत्मशक्ति का पूर्ण प्रकाश करते रहते हैं, उसकी शक्ति को मूर्छित नहीं होने देते बल्कि वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ जब तक प्रतिष्ठित रहती है तभी तक प्राणी स्वस्थ रहता है। इस स्व की स्थिति का यही अर्थ है। पर जैसे-जैसे स्व की आज्ञा का भंग होना आरंभ हो जाता है, घर में कूड़ा-कचरा या विकार आना आरंभ हो जाता है वैसे-वैसे ही स्व की स्थिति डांवाडोल हो जाती है और अन्त में यह बात यहाँ तक पहुँच जाती है कि स्वर्ण देव इस मन्दिर को अपने लिए जब अयोग्य समझने लगते हैं तब इसका परित्याग कर देते हैं और अपने लिए फिर दूसरा चोला तैयार कर लेते हैं।

शरीर इस ‘स्व’ देव की स्थिति का साधन है, आधार है। इसी आधार को लेकर इन्द्रियाँ और उनके विषयों से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, स्वदेव की उपासना करते हैं अथवा स्वदेव अपना अपने इन उपकरणों द्वारा विस्तार करते हैं। सीमा में रहते हुए भी वे अपनी असीमता का विस्तार करते हैं। लेकिन जिस समय ये मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आत्मदेव को भुलाकर अपने को ही प्रधान मानना आरंभ कर देते हैं, उसी समय से अस्वस्थता का बीजारोपण होता है। फिर इन्द्रियाँ स्वेच्छाचारिणी हो जाती हैं। यह स्वेच्छाचारिता यहाँ तक बढ़ती है कि जिस शरीर को आधार बनाकर उन्हें भोग भोगना होता है फिर उसे भी भुला दिया जाता है। ध्यान स्थिति का नहीं भोग का रहता है। मिथ्या आहार-विहार की बहुलता होती है और शरीर विकार ग्रस्त हो जाता है। इसलिए अस्वास्थ्य का भयंकर रूप इस स्थान पर दिखाई देता है।

शरीर जड़ है इसलिए स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उस पर नहीं पड़ती, पड़ती है मन पर। मन ही एक ऐसा प्रमुख यंत्र है जो स्वदेव के आदेशों को वहन करता है। इस मन के बुद्धि, चित्त और अहंकार तीन साथी और हैं जिनमें सबसे प्रबल साथी है अहंकार। इसलिए जब मन स्वदेव की बात न सुनकर जब अहंकार के आदेशों पर चलना आरम्भ करता है, अस्वस्थता का तभी से श्री गणेश होता है। जब तक बुद्धि पर स्वदेव की कृपा रहती है तब तक मन के कार्यों पर बुद्धि विवेचना करती है, समालोचना करती है पर जैसे-जैसे उनकी यह कृपा हटती जाती है अर्थात् बुद्धि पर भी अहंकार का प्रभाव होता जाता है वैसे-वैसे वह भी मन का समर्थन करना आरम्भ कर देती है। और तब ये सब मिलकर खेल खेलते हैं। आत्मदेव का जब तक इनके साथ संपर्क रहता है, शक्तियाँ तो इन्हें मिलती हैं क्योंकि ये लोग ज्ञान के स्रोत को बन्द कर देते हैं, शक्ति का स्रोत तो जारी रहने देते हैं लेकिन ज्ञान का स्रोत बन्द कर देने पर शक्ति का स्रोत बहुत दिनों तक जारी नहीं रह सकता, इसलिए धीरे-धीरे शक्ति का ह्रास होता रहता हैं। लोग समझते हैं कि वे अस्वस्थ होते जा रहे हैं अर्थात् ‘स्व’ के साथ सम्बन्ध विच्छेद होना आरम्भ हो गया है और फिर एक दिन आता है कि शक्ति का स्रोत भी बन्द हो जाता है तब मृत्यु हो जाती है। मृत्यु क्या है? स्व के साथ सम्बन्ध विच्छेद।

इसलिए जिन्हें अपनी अस्वस्थता का पता चल गया है वे यह न समझें कि उनका शरीर अस्वस्थ है। शरीर की अस्वस्थता का सम्बन्ध शरीर से नहीं है उसका सम्बन्ध तो अन्तःकरण के साथ है। इसलिए यदि स्वस्थ होने की कामना है और स्थायी स्वास्थ्य की आवश्यकता है तो उन्हें अपने अन्तःकरण की चिकित्सा करनी चाहिए। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के स्वस्थ हो जाने पर शरीर अपने आप स्वस्थ हो जायेगा। क्योंकि स्वदेव का निकट का घर तो मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार ही है। इसी से तो वे अपने अपने स्थूल का निर्माण करते हैं। जो लोग शरीर का उपचार कराकर स्वस्थ होने की कल्पना करते हैं वे ऊपरी टीपटाप में ही लगे रहते हैं। ऐसी मरहम पट्टी शरीर को फिर खोखला कर देती है और स्थायी रूप से स्वास्थ्य लाभ नहीं होता।

भारतीय ऋषियों ने इसीलिए अस्वस्थ व्यक्तियों के लिए कुछ अनुभूत चिकित्साएं बतलाई हैं, जिनमें से यम और नियम का विशेष महत्व है, जिसमें यम अन्तःकरण के लिए अमोघ औषधि है और नियम शरीर और मन दोनों को ही आत्मदेव के रहने लायक झाड़ बुहार कर बना देता है। ऐसे झाड़े बुहारे स्वच्छ घर में ही आत्म देव के आनन्दमय स्वरूप का निवास रहता है। लोगों का कहना है कि स्वस्थ मन में ही आत्मा का निवास होता है इसकी यही अर्थ है कि आनन्द की प्राप्ति उसे ही होती है जिसका मन आत्मा के आदेश का सर्वांगीण पालन करता है, आनन्द का अनुभव भी वे ही व्यक्ति करते हैं और यह आनन्द ही स्वास्थ्य का चिह्न है।


स्वास्थ्य का एक शत्रु-चाय

(श्री निरंजन प्रसाद गौतम, पटलौनी)

चाय पीने से स्फूर्ति आती है, सुस्ती दूर होती है और काम करने की शक्ति बढ़ जाती है, चाय पीने वालों का ऐसा अनुभव है। लेकिन इसके अलावा एक अनुभव और है वह है, वक्त पर चाय न मिले तो शरीर की सारी मशीनरी ढीली पड़कर काम करना बन्द कर देती है फिर तो आगे बढ़ने के लिए चाय के प्याले को पीने की इच्छा तीव्र रहती है और जब तक चाय का प्याला न मिल जाय, कोई भी काम किया ही नहीं जाता।

आमतौर से देखा जाता है कि मनुष्य को जो समय कि उसके भोजन का होता है, भूख लग आती है। उस समय कुछ भी खा लेने से आदमी फिर अपना काम पूर्ववत् ही करने लग जाता है। लेकिन चाय पर यह बात नहीं लगती। चाय पीने के समय पर जब मनुष्य में शिथिलता आ जाती है तो चाय के सिवाय अन्य किसी चीज का उपयोग करने पर वह शिथिलता दूर नहीं होती। उसके लिए तो चाय पीना ही आवश्यक हो जाता है।

इन सारी बातों को देखने से पता चलता है कि चाय में ऐसे पदार्थों का मिश्रण है जो कि शरीर के मज्जा तन्तुओं-ज्ञान तन्तुओं-पर तुरन्त प्रभाव डालकर मनुष्य को उसकी वास्तविक स्थिति से भुला देते हैं।

जो विज्ञान वेत्ता हैं उन्होंने चाय के सम्बन्ध में अपनी-अपनी प्रयोगशालाओं में खोज की हैं, उनका कहना है कि चाय में मादक द्रव्यों का समावेश है, साथ ही धीरे-धीरे प्रभाव डालने वाले विष भी इसमें मिले हुए हैं। ये विष शरीर पर अपना प्रभाव एकाएक नहीं करते बल्कि धीरे-धीरे शरीर के भीतरी अवयवों को घेर लेते हैं। जिनके कारण उसके विषाक्त होने का हाल तुरन्त नहीं मालूम होता।

हम जो कुछ खाते हैं वह भोजन प्रणाली द्वारा शरीर में पहुँचता है। पाचन प्रणाली में जगह-जगह छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं और खुरदरापन होता है। जिसके द्वारा अन्न रस सोख लिया जाता है और जो रक्तादि उपयोगी धातु तैयार करने के स्थान पर भेज दिया जाता है। चाय का सबसे पहला कार्य रक्त प्रणाली पर होता है। अन्न प्रणाली की ग्रन्थियाँ और खुरदरा भाग अन्न रस को चूसने में शिथिल हो जाता है। आमाशय से लेकर अंतड़ियां तक इसके कारण बेकार हो जाती हैं, यह काम चाय में रहने वाला टैनिन या टैनिन एसिड नामक विष करता है। चाय का पेपीन नामक विष भी टैनिन जैसा ही असर कारक होता हैं।

एक दूसरा विष चाय में कैफीन नाम का रहता है जो कोष्ठ बद्धता को उत्पन्न करता है। अक्सर देखा जाता है कि चाय के पीने वालों को तब तक टट्टी नहीं होती जब तक कि वे चाय न पीलें। वास्तव में चाय टट्टी नहीं करती। गरम-गरम पानी जो चाय में मिला होता है शरीर की अपान वायु को हल्का करता है और उसी के कारण मल का निस्सरण होता है, चाय पीने वाले उसे चाय का गुण समझते हैं जो कि खाम खयाली है। कैफीन का जहर दिल की धड़कन को बढ़ा देता है कभी-कभी तो दिल की धड़कन अधिक बढ़कर आदमी मर तक जाता है। इस जहर से गठिया आदि वात रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। किन्हीं-किन्हीं डाक्टरों का कहना है कि गुर्दे पर इस विष का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है। पेशाब की मात्रा में तिगुनी तक वृद्धि हो जाने का लोगों को अनुभव मिला है। चाय के अन्दर रहने वाला यह विष ही मनुष्य को चाय के लिए छटपटाते रहने के लिए बाध्य करता है, यहाँ तक कि चाय के अतिरिक्त अन्य किसी चीज द्वारा इस छटपटाहट को बन्द नहीं किया जा सकता।

चाय पीने से शरीर में स्फूर्ति का जो भान होता है उसका कारण उसमें रहने वाला थीन नामक विष है। यह पहले पहले शरीर में स्फूर्ति और ताजगी लाता है पर चूँकि वह स्वाभाविक नहीं होता, उसे तो वात से स्थान को मूर्छित करके प्राप्त किया जाता है इसलिए उसका प्रभाव कम होते ही क्रान्ति बढ़ जाती है और खुश्की पैदा हो जाना आरम्भ हो जाता है।

चक्कर आना, आवाज बदल जाना, रक्त विकार उत्पन्न हो जाना, लकवा लग जाना, वीर्य के अनेक विकार, मूर्छा आ जाना, नींद कम हो जाना आदि ऐसे रोग हैं जो चाय के अन्दर रहने वाले साइनोजेन, स्ट्रिक नाइन, साइनाइड आदि विषों के कारण उत्पन्न होते हैं।

चाय जैसी विषैली और उत्तेजक वस्तु चीन के पड़ोसी होने और अंग्रेज व्यापारियों के भारत पर शासन करने के कारण इस देश को मिली है। लार्डकर्जन ने इसके प्रचार में काफी मदद की है। अन्य रोगों की तरह भारत इस रोग से भी पीड़ित है। जो रोग से मुक्त होना चाहते हैं, उन्हें इस रोग से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए।


Quotation

जब तक हृदय में स्वार्थपरता रहती है तब तक भगवान से प्रेम नहीं हो सकता। -स्वामी विवेकानन्द


दीर्घ जीवन के रहस्य

वैजिमन, आयु 114 वर्ष-कम खाओ। अधिक चबाओ और चूस-चूस कर पेय पदार्थों- जैसे दूध, गन्ने का रस, टमाटर का रस इत्यादि को पियो, सवारी पर कम बैठों और पैरों से खूब काम लो। गाली कम दो, जिद्दी, संतप्त, उद्दण्ड तथा तामसी विचारों से बचो और खर्राटों वाली गहरी नींद लो। पेट के साथ निर्दयता न करो और शाकाहारी बने रहो-इन तत्वों द्वारा तुम मृत्यु को बहुत दूर धकेल सकते हो।

लुई क्रेमर, आयु 134 वर्ष- गत पचास वर्ष से मैं खूब घूमता रहा हूँ। गत 23 वर्ष तो मैं नित्य प्रति 30-40 मील चला हूँगा। शराब पीना मैंने बहुत वर्षों से त्याग दिया है तथा चाय, काफी, एवं तम्बाकू से मुझे अत्यन्त घृणा हो चली है। सायंकाल दूध, भाजी तथा फल मेरे लिए पर्याप्त होते हैं। मैं बिना छने आटे की रोटी खाने का अभ्यास कर रहा हूँ। पेय पदार्थों में पानी, दूध तथा फलों (नारंगी, मौसमी, अनार विशेष रूप से) का रस मुझे बड़ा प्रिय है। जो जीवन से निराश हो चुके हैं उनको मेरी सलाह है- “घूमना शुरू करो, पाँवों से मेहनत कराओ और स्वास्थ्य के उच्चतम शिखर पर आरुढ़ हो जाओ।”

एक ईरानी, उम्र 126 वर्ष- “खूब घूमिये, खूब दूध पीजिए तथा खूब प्रसन्न रहिए। बेफिक्री तथा अलमस्ती दीर्घ जीवन की कुँजियाँ हैं मनुष्य को मारने वाला चिंता जैसी पिशाचिनी के अतिरिक्त अन्य तो साधारण भ्रान्तियाँ हैं। अतः हमें अपने विचार जीवन के सुखमय पहलू पर ही केन्द्रित करने चाहिए। तुम वासनाओं के गुलाम नहीं हो, चिन्ताएं तुम्हें विवश नहीं कर सकतीं। पाप एवं अज्ञान में इतनी शक्ति नहीं कि ये तुम्हारे ऊपर शासन कर सकें। “श्रम ही पूजा है।”


‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

इन पुस्तकों की एक-एक पंक्ति, गहरे अनुभव और अनुसंधान के साथ लिखी गई हैं।

(1) मैं क्या हूँ?

(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान

(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान

(4) परकाया प्रवेश

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनने की विद्या

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार

(7) स्वर योग के दिव्य ज्ञान

(8) भोग में योग

(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय

(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?

(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना

(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?

(17) गहना कर्मणो गतिः

(18) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर प्रकाश

(19) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा

(20) शक्ति संचय के पथ पर

(21) आत्म गौरव की साधना

(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान

(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला

(24) आँतरिक उल्लास का विकास

(25) आगे बढ़ने की तैयारी

(26) अध्यात्म धर्म का अवलम्बन

(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन

(28) ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग

(29) यम और नियम

(30) आसन और प्राणायाम

(31) प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

(32) तुलसी के अमृतोपम गुण

(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

(34) मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा

(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग

(36) हस्तरेखा विज्ञान

(37) विवेक सतसई

(38) संजीवनी विद्या

(39) गायत्री की चमत्कारी साधना

(40) महान जागरण

(41) तुम महान हो

(42) गृहस्थ योग

(43) अमृत, पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति

(44) घरेलू चिकित्सा (45) बिना औषधि के कायाकल्प (46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण

(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं? (48) विचार करने की कला

(49) दीर्घ जीवन के रहस्य

(50) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?

(51) लेखन कला

(52) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार

(53) विचार संचालन विद्या

(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

(55) अध्यात्म शास्त्र

(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

(57) सफलता के तीन साधन

(58) शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य

(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति

(60) दैवी संपदाएं

(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार

(62) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

(63) सुखी अध्यात्मवाद

(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग

(65) वैज्ञानिक अध्यात्मवाद

(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं

(67) योग के नाम पर मायाचार

(68) जादूगरी या छल?

(69) सौभाग्य बढ़ाने की कला

(70) सम्मोहन विज्ञान

(71) उन्नति का मूलमंत्र

(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व

(73) प्रेम का रहस्य

(74) अमृत कण

मूल्य में कमी के लिए लिखा पढ़ी व्यर्थ है। छह रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

-व्यवस्थापक “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय, मथुरा।


जीवन संदेश!


जीवन संदेश

ले.- पं. शिवशंकर लाल जी त्रिपाठी, हसवा (फतेहपुर)

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना।

रूप रस नव गन्ध दे, उपवन सदा सुरभित बनाना॥

(1)

तोड़ता है कौन तुझको, गूँथता है कौन तुझको?

फेंकता है, कुचता है, यह कभी परवाह मतकर-

चाह ले मत झूमना तू, आह सहकर मुस्कराना।

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥

(2)

भूलना उसको नहीं, जिसने तुझे ऐसा बनाया।

फूलना मन में नहीं, परहित सदा जीवन लगाया॥

कीर्ति यश की कामना तू, भूलकर मन में न लाना।

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥

(3)

यह उसी का विश्व सारा, है तुझे जिसने बनाया।

कौन सा उपकार है, यदि तू उसी के काम आया॥

ध्यान रख कर्त्तव्य पथ, मन को कभी भी मत डिगाना।

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥

(4)

फूल ते ऐ फूल! सारे विश्व को सुरभित बना दे।

आज भूले विश्व को नव मार्ग का दर्शन करा दे॥

यह अमर संदेश अपने प्राण बन में गुनगुनाना।

नाशकारी कण्टकों में, पुष्प बनकर मुस्कराना॥

*समाप्त*