आज तक संसार में जितनी चिकित्सा प्रणालियाँ हैं, उनके मूल में दो प्रवृत्तियां कार्य करती हैं। इन सभी अनुसंधानों का अध्ययन हम दो विभागों के अंतर्गत कर सकते हैं। एक तो यह कि मनुष्य को, जैसा कि प्रकृति चाहती है, पूर्ण स्वस्थ, निरोग, पुष्ट, दीर्घजीवी, उन्मुक्त किस प्रकार रखा जाय, अर्थात् स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए किन-2 प्राकृतिक नियमों का पालन करना चाहिये। इस विभाग के अंतर्गत उन प्राकृतिक नियमों का प्रतिपादन किया जाता है जिनसे मनुष्य प्रकृति के निकट आता है और साहचर्य द्वारा पूर्ण स्वस्थ रहता है। नियम यह है कि प्रकृति से हम जितनी दूर जायेंगे। अर्थात् प्रकृति नियमों का अतिक्रमण करेंगे, उतने ही रोगी दुःखी और दीन हीन होंगे। जितने ही प्रकृति के समीप रहेंगे, प्राकृतिक नियमों का पालन करेंगे, उतने ही स्वस्थ रहेंगे। प्रकृति के समीप रहना हमारा आदर्श है।
दूसरा विभाग है रोगी का निवारण। प्रकृति के नियमों की अवहेलना करने से यदि हम रोगी हों जायें, तो पुनः किस प्रकार स्वास्थ्य लाभ करें? इसका उत्तर होगा कि हम पुनः प्राकृतिक नियमों का पालन करने लगें, दूरी छोड़कर पुनः प्रकृति के समीप आयें। सभी चिकित्सा प्रणालियाँ किसी न किसी रूप में प्रकृति के समीप आने की चेष्टा करती है। इस अंक में पृथक-2 हमने दोनों उद्देश्यों पर विचार किया है।
प्रकृति के सभी मौसम अपने-अपने स्थान पर महत्व रखते हैं किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सर्दी या ठण्ड जीवधारियों के लिए विशेष आवश्यक है। बाह्य दृष्टि से देखें तो लोग ठण्ड के खिलाफ दिखाई देते हैं किन्तु यह केवल वहम ही है। वे सर्दी को प्राणघातक समझकर उससे बचने का यत्न करते हैं, चारों ओर से बन्द अंधेरे कमरों में रहते हैं, हाथ, मुँह, कान इत्यादि खूब ढ़क लेते हैं, पाँवों में मोजे और मोटे जूते डाल लेते हैं, घूमने से डरते हैं, समझते हैं कि सर्दी लगी कि सरदर्द, निमोनिया, खाँसी, जुकाम हो जायगा। सर्दी के लिए ऐसी भ्रमात्मक धारणाएँ बेबुनियाद हैं। उन्हें मनोजगत से निकाल देना चाहिए।
प्रकृति चाहती है कि मानव शरीर सर्दी, गर्मी, बरसात का पानी-सभी को सहने का आदी बने। ठण्डी हवा से मनुष्य का शरीर तरोताजा बनता है। जाड़ों की प्रातःकालीन मंद समीर मानव शरीर के लिए संजीवनी बूटी सदृश है। शरीर को उससे दूर रखना मानों उसे निर्जीव बनाना है। जाड़ों की इस हवा से शरीर का रंग निखर आता है। कमजोर फेफड़े सबल हो उठते हैं। काम में जी लगता है। गर्मी में मनुष्य को जो आलस्य की, केंचुल घेरे रहती है, वह उतर जाती है। वह इस सर्दी के प्रताप से दुगुना तिगुना काम अच्छी तरह कर सकता है। बड़े-बड़े लेखक तथा ग्रन्थकारों ने जाड़ों के प्रभाव में अपनी अनमोल कृतियों की रचना में कल्पनाएँ अधिक आती है। सूर्य एक विचित्र आभा से भर जाता है, मन में नव प्रेरणा जागृत होती है और प्रकृति हमें लिखने के लिए दावत देती है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्दी सबसे उत्तम मौसम है। जाड़ों में व्यायाम करने में जितना आनन्द आता है, उतना शायद कभी नहीं आता थकान जल्दी नहीं होती। सर्दी से शरीर की रग-रग में मजबूत होती है, बल और जीवन मिलता है, जठराग्नि प्रबल होती है और पुराने रोग तक थोड़ी सी देखभाल से आसानी से चले जाते हैं। ठण्ड के दिनों में मनुष्य की पाचन शक्तियाँ बढ़ जाती है। वह खूब कसरत कर अच्छी तरह भोजन पचा सकता है। गर्मियों में जो घृणित बीमारियाँ हो जाती हैं-हैजा, बदहजमी, जी मचलाना, सिरदर्द, पेट में भारीपन-इस मौसम में बिल्कुल नहीं देखे जाते। अक्सर लोग ताकत की दवाइयों से शक्तिवर्द्धन करने का प्रयत्न करते देखे जाते हैं। यदि सर्दियों में घी, मक्खन, दूध, सब्जियाँ अच्छी मात्रा में ले और कसरत करें तो खूब मजबूत और बलशाली बन सकते हैं। स्वास्थ्य शक्ति तो प्रकृति में यत्र तत्र बिखरी पड़ी है। सर्दियों में उसका वर्षभर के लिए संचय किया जा सकता है।
सर्दियों में मनुष्य बुरी तरह अपने आपको कपड़ों से लाद लेते हैं। शरीर को पर्याप्त हवा नहीं लगने देते, यह सर्वथा अनुचित है। शरीर को पूरी तरह खुला हुआ रखा जाय और शरीर को सर्दी बरदाश्त करने की आदत डाली जाय। प्रकृति के विरुद्ध अहार-विहार से अनेक घृणित रोग उत्पन्न होते हैं। सर्दी की धूप का रासायनिक महत्व है। उसमें अनेक विटामिन प्रस्तुत हैं। धूप-स्नान बच्चे, वृद्ध और युवकों के लिए समान रूप से उपयोगी है। अतः प्रातः काल की असहाय सर्दी को छोड़कर शेष समय में हमें चाहिए कि भारी जूते और मोटे कपड़े फेंककर पतले और हल्के वस्त्र पहनें। ईश्वर करे सर्दी का भय लोगों के हृदय में से निकल जाये और वे उसकी महत्ता को समझें।
प्रकृति का साहचर्य -
प्रकृति के विशाल प्रांगण में नाना जीव जन्तु, जलचर, थलचर और नभचर हैं। प्रत्येक का शरीर जटिलताओं से परिपूर्ण है। उनमें अपनी-अपनी विशेषताएं और योग्यताएं हैं, जिनके बल पर वे पुष्पित एवं फलित होते हैं, यौवन और बुढ़ापा पाते हैं, जीवन का पूर्ण सुख प्राप्त करते हैं।
पृथ्वी पर रहने वाले पशुओं का अध्ययन कीजिये। गाय, भैंस, बकरी, भेड़, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली, ऊँट इत्यादि जानवर अधिकतर प्रकृति के साहचर्य में रहते हैं, उनका भोजन सरल और स्वाभाविक रहता है, खानपान तथा विहार में संयम रहता है। घास या पेड़ पौधों की हरी ताजी पत्तियाँ फल इत्यादि उनकी क्षुधा निवारण करते हैं, सरिताओं और तालाबों के जल में वे अपनी तृष्णा निवारण करते हैं, ऋतुकाल में बिहार करते हैं। प्रकृति स्वयं उन्हें काल और ऋतु के अनुसार कुछ गुप्त आदेश दिया करती है, उनकी स्वयं वृत्तियाँ (Instinets) स्वयं उन्हें आरोग्य की ओर अग्रसर करती रहती हैं। उन्हें ठीक मार्ग पर रखने वाली प्रकृति माता ही है। यदि कभी किसी कारण से वे अस्वस्थ हो भी जाये, तो प्रकृति स्वयं अपने आप उनका उपचार भी करने लगती है। कभी पेट के विश्राम द्वारा, कभी ब्रह्मचर्य द्वारा, किसी न किसी प्रकार जीव−जंतु स्वयं ही स्वास्थ्य की ओर जाया करते हैं।
पक्षियों को देखिये। संसार में असंख्य पक्षी हैं। हम उन्हें इधर-उधर पेड़ पौधे पर उड़ते, फुदकते, चहकते, आनन्द मंगल करते देखते हैं, उनका मधुर गुंजन हमारे हृदयसरोवर को तरंगित कर देता है। उनका रंग, भाव भंगी, शरीर की बनावट हमारे मन को मोह लेती है। कौन इन्हें इतना सुन्दर, फुर्तीला, सुरीला रखता है? कौन इनके स्वास्थ्य की खैर खबर रखता है? कौन इन्हें आरोग्य के सम्बन्ध में पाठ पढ़ाता है? और जब ये बीमार पड़ते हैं तो कौन इनकी दवादारु करता है? हमने पक्षियों को बीमारी से अकाल में मरते नहीं देखा। अधिकाँश को अन्य पक्षी या मनुष्य मार कर खाते हैं। वे स्वयं अपनी मूर्खता से बीमारी बुला कर बहुत कम मरते हैं। उनमें पूर्ण स्वस्थ रहने और आरोग्य का मधुर आनन्द लाभ करने की सामर्थ्य है। प्रकृति उनके शरीर की रक्षा करती है स्वयं शरीर के अन्दर एकत्रित हो जाने वाले विषों को निकालने का प्रयत्न करती हैं, शरीर के संवर्धन का पूरा विधान रखती है। वहीं उनका डॉक्टर, हकीम या वैद्य है।
प्रकृति की प्रचुरता- प्रकृति में प्रचुरता है, हर प्रकार की प्रचुरता है। आनन्द, स्वास्थ्य, आरोग्य की इतनी अधिकता है कि हम उसकी सीमा बन्धन नहीं कर सकते। स्वास्थ्य की उस अधिकता के कारण ही प्रकृति के अनेक पशु−पक्षी, जीव जन्तु जीवन का आनंद लेते हैं, जल, वायु, प्रकाश, भोजन से जीवन तत्व खींचकर वे दीर्घ जीवन के सुख लूटते हैं।
प्रकृति के कण-कण में पत्तियाँ, फलों, पौधों जल की प्रत्येक बूँद में अरोग्य भरा हुआ है। वायु के प्रत्येक अंश को, जिसे हम अन्दर खींचते हैं, जल के प्रत्येक घूँट में, जिसे हम पीते हैं, फल और तरकारियों के कण-कण में स्वास्थ्य और बल हमारे लिए संचित है। प्रकृति के पास जीवन को सर्वांग रूप से स्वस्थ रखने के लिए सभी उपकरण हैं।
प्रकृति में वैचित्र्य हैं। अपने-अपने स्वभाव, रुचि काल, अवस्था, परिस्थिति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति, जीव, जन्तु, पक्षी प्रकृति से जीवन शक्ति खींचता है। उसके द्वारा जैसा भी शरीर उसे मिला है, उसे स्वस्थ और सुन्दर बनाता है, आदमी समस्त शक्तियों को कार्यशील रखता है। प्रकृति के भंडार में सभी कुछ है, शहद जैसा मधुर पदार्थ क्या कभी मनुष्य बना सकता था? दुग्ध जैसा अमृत सदृश्य पदार्थ क्या किसी रासायनिक लैबोरेटरी में तैयार किया जा सकता था? मेवे, फल, तरकारियाँ, गन्ने, प्रकृति जीव को अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उचित मात्रा में ये भोजन के पदार्थ उपलब्ध हो जाते हैं। सर्प अपना विष एकत्रित करता है, मधुमक्खी शहद जुटाती है, नींबू खटाई के तत्व पृथ्वी से खींचता है तो करेला कड़ुवाहट एकत्रित करता है। प्रकृति में नवरस का विधान है। इन नवरसों में जो जिसे रुचे वह उसी से अपना स्वास्थ्य स्थिर रखता है।
प्रकृति में किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी साधन विद्यमान हैं। आपको बाह्य उपचारों की आवश्यकता नहीं। आप जैसा भी काम करना चाहें, उसके लिए सभी उपकरण एकत्रित कर सकते हैं। भाँति भाँति की जड़ी बूटियाँ, पौष्टिक पदार्थ, अमृतोपम दिव्य पदार्थ हमारे लिए संचित हैं। मिट्टी से लेकर धूप, जल, वायु, सूर्य किरण इत्यादि तक को यह शक्ति दी गई है कि वे हमारे शरीर को सबल और स्वस्थ बना सके।
प्राकृतिक सौंदर्य- प्रकृति में वास्तविक सुन्दरता है। आजकल के फैशन के भार से युक्त पुरुष या स्त्री को लोग सुन्दर समझते हैं उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। यह भ्रम-मात्र है। वास्तविक सौंदर्य तो पूर्ण रूप से विकसित, परिपुष्ट और स्वस्थ शरीर में है। प्रत्येक पुट्ठे (Muscle) और माँसपेशी में स्वाभाविक सौंदर्य है। जिस युवक या युवती के शरीर में लाल लाल रक्त प्रवाहित होता है, जिसके शरीर में स्वाभाविक लालिमा वर्तमान है, जिसका डीलडौल संतुलित है, न कोई अंग पतला है न कोई मोटा, न बादी चर्बी युक्त, न पेट ही बढ़ा हुआ है, नेत्र सुन्दर और चमकदार हैं, त्वचा कोमल और लाल है, फेफड़े परिश्रम सहन कर लेते हैं और गहरी नींद और आराम देते हैं, भूख खुलकर लगती है, स्वस्थ जल से (सोड़ा लेमन, शराब, चाय, शरबत से नहीं) जिसकी प्यास शान्त हो जाती है, चूर्ण चटनी पर जिसकी जिह्वा नहीं लपलपाती, जिसके स्वभाव में न चिड़चिड़ापन है, न क्रोध उतावलापन, उदासी या निरुत्साह-ऐसे स्वस्थ मनुष्य को ही पूर्ण सुन्दर कहना युक्ति संगत है।
श्री विट्ठलदास मोदी के शब्दों में “मोर के नीले हरे पंख, सिंह की अयाल, बारहसिंगे के उलझे हुए लम्बे सींग, साँड के चौड़े कंधे, मुर्गे की कलगी, साँप का चौड़ा फन, बिलाव की लम्बी मूँछ को सुन्दर मानने से कौन इन्कार कर सकता है? पशु-पक्षियों में सारी सुन्दरता नर वर्ग को मिली है। प्रकृति ने जहाँ नर वर्ग को सुन्दरता प्रदान की, वहाँ शक्ति भी दी। वस्तुतः पुरुष का सौंदर्य उसकी शक्ति में निहित है। उसका सौंदर्य उसकी शक्ति द्वारा प्रस्फुरित होता है।”
पुरुष हो या स्त्री-यदि वह पूर्ण स्वस्थ और सुन्दर बना रहना चाहता है, या कुरूप से सुरूप होना चाहता है तो उसे प्रकृति का आश्रय ग्रहण करना होगा। प्रकृति के नियमों का पालन करना होगा। व्यायाम और प्राकृतिक भोजन के द्वारा शरीर की प्रत्येक माँसपेशी को संतुलित रूप में विकसित करना होगा, शक्ति का अर्जन करना होगा-तभी हम सुन्दर बन सकेंगे। प्रकृति में ही वास्तविक सुन्दरता विद्यमान है।
चेहरे पर लाल रंग, पाउडर, क्रीम पोतने से क्या लाभ? वह तो पानी से धुल जायगा। यदि शरीर में माँस, स्वस्थ रक्त, स्वास्थ्य और आरोग्य नहीं तो उसे रेशमी कपड़ों या आभूषणों से अलंकृत करने से क्या लाभ सौंदर्य प्राप्त हो सकेगा? वास्तविक सौंदर्य, जो चिरस्थायी है, जिसमें ईश्वरत्व प्रकट होता है, वह प्राकृतिक सौंदर्य ही है।
प्रकृति हमारी छोटी मोटी भूलों को दुरुस्त करती है-
हमारे शरीर की रचना ही कुछ ऐसी बनाई गई है कि अवाँछनीय विजातीय द्रव्यों, संचित विषों, गंदी वस्तुओं या विषैले पदार्थों को भिन्न-भिन्न द्वारों से निकाल कर बाहर करती रहती है। हमारी छोटी-मोटी भूलों जैसे खान-पान का असंयम, अत्यधिक थकान, चलते फिरते, उठते बैठते जीवन शक्तियों की न्यूनता-इत्यादि को प्रकृति स्वयं दुरुस्त करती है और प्रायः प्रकृति के इस उपयोगी कार्य का हमें पता भी नहीं चलता। सृष्टि के सभी जीव जन्तु इन्हीं प्राकृतिक क्रियाओं से स्वस्थ रहते हैं। प्रकृति ने प्रत्येक शरीर में ऐसे-ऐसे गुप्त द्वार रखे हैं जिनके द्वारा विषैले पदार्थ स्वयं निकलते रहते हैं और हमारी आकृति में यथोचित सुन्दरता को अक्षुण्ण रखते हैं। यदि प्रकृति इस महान कार्य को अपने आप स्वाभाविक गति से सम्पन्न न करती, तो हमारे शरीर बेढंगे हो जाते, अंगों में भद्दापन और विषमता उत्पन्न हो जाती, हम लोग रोज ही अपचन, कब्ज, स्थूलता, सूजन, फोड़े, फुँसी, गठिया, प्रमाद, सिरदर्द व अन्य ऐसे ही छोटे-मोटे रोगों के शिकार रहा करते। भाग्यवश ऐसा नहीं है। हमारे शरीर के अन्दर व्याप्त प्रकृति इन पदार्थों से निरन्तर संघर्ष करती रहती है, अनावश्यक पदार्थों को शरीर में ठहरने नहीं देती और हमारे साधारण शारीरिक विकारों को दुरुस्त करती है।
प्राकृतिक रूप से स्वस्थ मनुष्य की पहचान-
प्रकृति ने मनुष्य को विश्व का सबसे सुन्दर शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक शक्तियों से सम्पन्न, स्वस्थ, सशक्त, सुडौल, दीर्घजीवी प्राणी बनाया है। आरोग्य और उत्तम स्वास्थ्य का मार्ग उसने बड़ा सरल और सीधा रखा है। मनुष्य तो क्या अल्पबुद्धि वाले पशु-पक्षी भी उसे भली-भाँति समझ सकते हैं। प्राकृतिक जीवन की आधार शिला क्या है, इसके लिए कुछ आवश्यक बातें यहाँ दी जाती हैं-
(1) डीलडौल- स्वस्थ मनुष्य का आकार संतुलित होना चाहिए। कद काफी ऊँचा हो, न शरीर पतला दुबला अस्थिपिंजरवत् हो, न भारी भरकम माँस से लटकता हुआ पोपला हो, प्रत्युत संतुलित रूप से प्रत्येक अंग विकसित हो। शरीर की मशीन का प्रत्येक कलपुर्जा ठीक काम करता हो, प्रशस्त उन्नत ललाट, चमकदार नेत्र, माथे व गालों पर स्वाभाविक रक्त की लालिमा हो, शिकस्त का नाम तक न हो। पाँव, जाँघ मजबूत हों, शरीर का भार वहन कर सकने वाली हों। शरीर श्रम व मौसम के परिवर्तनों को सम्हाल सके, रोग से लड़ सके, आमाशय अपना कार्य उचित रीति से करता रहे।
(2) आन्तरिक अवस्था- पाचन क्रिया अपना कार्य सही करे, शुद्ध लाल खून निर्मित हो, शरीर से मल-विसर्जन कार्य अपनी स्वाभाविक गति से होता रहे। जो भोजन खाया जाय, वह शरीर को परिपुष्ट एवं स्वस्थ रखे, अपच या दस्त से निकल न जाय। कभी अपच, कभी कब्ज, दस्त, पेट दर्द इत्यादि न हो, खाया हुआ भोजन चार-पाँच घंटे में पच जाय। खाना खाते समय रुचि एवं स्वाद स्वास्थ्य के सूचक हैं। भोजन के उपरान्त आलस्य या नींद नहीं आनी चाहिए। चटपटी चीजों पर मन न चले, साधारण भोजन में ही मजा आये।
(3) हृदय तथा फेफड़े- शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग हृदय तथा फेफड़े हैं। स्वस्थ मनुष्य में ये दोनों ही बड़े मजबूत होने अनिवार्य हैं। तेज भागने में आप हाँफ न जायं, नासिका में से श्वास न लेने लगें यह स्वस्थ फेफड़ों की पहचान है। सुषुप्तावस्था में मुँह से श्वास लेने की आदत कमजोर फेफड़ों की निशानी है। स्वस्थ फेफड़े बाहर से स्वच्छ वायु अन्दर लेकर रक्त की सफाई में सहायता करते हैं और अशुद्ध वायु को बाहर निकाल देते हैं। हृदय दूषित रक्त की सफाई निरंतर किया करता है। स्वस्थ फेफड़े और मजबूत हृदय मनुष्य को परिश्रमी और स्वस्थ बनाते हैं। युवकों में हृदय की गति प्रति मिनट 72 होनी चाहिए।
(4) मल विसर्जन कार्य- शरीर में जो कूड़ा करकट या गंदगी एकत्रित होती रहती है, उसे निकालने के लिए प्रकृति ने कई द्वार बना रखे हैं। मलमार्ग, मूत्रमार्ग, यकृत, त्वचा, फेफड़े के अतिरिक्त हमारे नेत्र और कान भी स्वास्थ्य के शत्रु, शरीर के अंग प्रत्यंगों में उत्पन्न हुए विकार स्वाभाविक गति से स्वयं बाहर न निकलते रहें, तब तक हम अपनी मल-विसर्जन इन्द्रियों को स्वस्थ नहीं कह सकते।
यदि मल-विसर्जन कार्य में किसी भी प्रकार पीड़ा होती है, तो आप स्वस्थ नहीं हैं। यदि मल या मूत्र के साथ रक्त आता है, तो उसके दो कारण हो सकते हैं (1) या तो शरीर के उस भाग में कुछ चोट, घाव या सूजन आ गई है, अथवा (2) आन्तरिक रूप से कुछ विकार हो गया है। मलमूत्र करने के पश्चात् एक प्रकार से शान्ति होनी चाहिए। यदि रक्त या पीव आवे, मल मार्ग से कीड़े आवें तो आन्तरिक विकारों के सूचक हैं। मूत्र विसर्जन में यदि गर्मी या जलन हो, रक्त या पीव आवे पेशाब गाढ़ा, लसदार हो या वीर्य आवे, तो शरीर को रोगी समझना चाहिए।
(5) मानसिक स्थिति- स्वस्थ मनुष्य मधुर, तृप्त और उत्साही होता है। चिंताएँ उसे नहीं सताती, चिड़चिड़ापन, क्रोध उतावलापन, उदासी निरुत्साह, ये सब शरीर में संचित नाना प्रकार के विकारों के द्योतक हैं। अशाँत चित्त, अशुद्ध विचारों से मुक्त मन, अतृप्त काम वासना से भरा हुआ अन्तःकरण मानसिक विक्षुब्धता के प्रतीक हैं।
अहंकार एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, चित्त की व्यग्रता, अतृप्त वासनाएं, विघ्न−बाधाओं से मिथ्या डर, कुत्सित कल्पनाएँ कायरता आदि सब गिरे हुए स्वास्थ्य की निशानी हैं। इसके विपरीत निर्बल शरीर में भवबाधा, भूतप्रेत के भय, विकार, काम वासनाएँ, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, इत्यादि भरे पड़े रहते हैं।
स्वास्थ्य से पवित्र विचार आते हैं, मन प्रसन्न और शुभ कल्पनाओं, मधुर विचारों से परिपूर्ण रहता है। काम में जी लगता है, आलस्य या उदासी नहीं सताती। हृदय मुस्कराते हुए पुष्पों को देख कर उत्फुल्ल होता है, चमचमाते हुए तारक-वृन्द को देखकर चमचमाता है। हम प्राकृतिक दृश्यों को देखकर मोहित हो जाते हैं। प्रकृति का सन्देश हमें हर फूल, पत्ती और पुष्प सुनाता है।
स्वास्थ्य स्वाभाविक है-
यदि आप प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण न करें, प्रकृति के परिवार के अन्य सदस्यों की भाँति सचाई और ईमानदारी से उनका पालन करते रहें, तो स्वाभाविक रूप से आप अपनी आयु का आनन्द ले सकेंगे। प्रकृति ने आपको बहुत उच्चकोटि का जीव बनाया है। प्रसन्नता का स्रोत आपके हृदय में प्रवाहित होना चाहिए। आनन्द से आपका निकट सम्बन्ध होना अनिवार्य है। यदि आप प्रकृति के निकट रह सके, तो निश्चय जानिये आपका स्वागत सदैव शान्त और गंभीर रहेगा, आपका हृदय आन्तरिक आह्लाद से भरा रहेगा और आप जीवन का स्वर्गीय आनन्द लूट सकेंगे।
स्वामी शिवानन्द जी के शब्दों में, “प्रकृति का स्वभाव अत्यन्त कठोर और दयालु है। वह अत्यन्त न्याय प्रिय है, न्याय में वह क्षमा नहीं करना जानती। सदाचारियों के लिए प्रकृति परम प्यारी माता है। और दुराचारियों के लिए वह पूरी राक्षसी है। वह स्वयं राक्षसी कदापि नहीं है। वह परम दयालु जगन्माता है। केवल दुराचारियों को (जो प्रकृति के नियम तोड़कर अस्वाभाविक जीवन व्यतीत करते हैं) वह राक्षसी प्रतीत होती है। दण्ड में भी प्रकृति हमें सुधारने का काम करती है। ठोकर खाने पर ही मनुष्य सावधान होता है।”
प्रकृति तत्व से हमारी अनभिज्ञता के दुष्परिणाम-
आज दवाई का इतना प्रचार हमारे अप्राकृतिक जीवन का द्योतक है। पहले तो हम प्रकृति के नियमों को तोड़ते हैं। जब प्रकृति हमें रोग रूप में सजा देती है तो हम तरह-तरह की दवाइयाँ खाते हैं। इस प्रकार क्या युवक और क्या युवतियाँ रसातल के मार्ग में जा रही हैं। गुप्त रोगों, मूत्र रोगों तथा अन्य निन्दनीय रोगों की संख्या दिन प्रतिदिन वृद्धि पर है। हमारा भोजन अप्राकृतिक हो चला है, हमारी रहाइश अस्वाभाविक हो चली है। हम दिन में सोते और रात में सिनेमा, होटलों, नाचघरों में मजेदरियाँ करते फिरते हैं। अप्राकृतिक रोशनी में पढ़ते लिखते हैं और असमय ही नेत्र रोगों से पीड़ित हो जाते हैं। अतिगर्म चाय, और अति शीतल बर्फदार शर्बत या सोडालेमन पीकर हम दन्त रोगों के शिकार बनते हैं। आज के नब्बे प्रतिशत फैशन परस्त नवयुवक नेत्र और दन्त रोगों से पीड़ित हैं। अस्वाभाविक मैथुन, वीर्यपात, और व्यभिचारी के चक्कर में फँसे हुए नवयुवकों की संख्या का पता हमें गुप्तरोगों के बढ़ते हुए विज्ञापनों और चिकित्सकों से लगता है। कलकत्ता शहर की गली गली में स्वप्नदोष या धातुक्षय का इलाज होता है।
अप्राकृतिक रीतियों से कच्ची आयु में वीर्यपात का दुष्परिणाम बड़ा भयंकर होता है, शरीर जर्जर होता है। युवक भी वृद्ध सा दिखता है। भले ही हम कितनी ही चालाकी से पाप करें किन्तु प्रकृति बड़ा सतर्कता से सब कुछ देखती है। उसके दरबार में माफी नहीं है। क्या बड़ा क्या छोटा सभी को वह समान रूप में दण्ड देती है। उसकी आंखों को आप धोखा नहीं दे सकते हैं। प्रत्येक नीच कर्म के लिए सजा का विधान है। शिवानन्दजी ने कहा है- “प्रकृति माता अपने हाथ में डंडा लिए तुम्हारे मर्म स्थानों पर कठोर डंडा प्रहार करने के लिए तैयार रहती है। ज्यों-ज्यों तुम वीर्य नाश करोगे। त्यों-त्यों वह तुम्हें मारते-मारते बेदम व अधमरा कर देगी। तब भी यदि तुम न चेतोगे या सुधरोगे, तब अन्त में तुम्हारा इन्तजार करती हुई मृत्यु की ओर तुम्हें, सड़े फल की तरह फेंक देगी, तुम्हें उठाकर नर्क कुण्ड में डाल देगी। भाइयो! लौटो प्रकृति की शरण में आओ। वह परम दयालु है। तुम्हारा अवश्य सुधार करेगी।”
प्रकृति और दीर्घजीवन -
विश्वास रखिये प्रकृति के नियम पालन करने से रोगी से रोगी व्यक्ति पुनः स्वास्थ्य और आरोग्य प्राप्त कर सकता है, दुबले पतले जर्जरित शरीर पुनः हृदय पुष्ट और सशक्त बन सकते हैं। जो कार्य पौष्टिक दवाइयाँ भी नहीं कर सकती वह प्रकृति के नियमानुसार रहने से अनायास ही प्राप्त हो सकता है। वेदों में निर्देश किया गया है-
“कुर्वन्नेवेह कर्र्माणि जिजीविषेच्छतंसमाः।
(यजु. 40।2)
अर्थात् काम करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए।”
‘पश्येम शरदः शतं।’
जीवेम शरदः शतं॥
शृणुयाम शरदः शतं।
प्रब्रवाम शरदः शत्ं।
अदीनः स्याम शरदः शतं॥
भूयश्च शरदः शतात (यजु. 36।24)
हम सौ वर्ष तक देखें, सौ वर्ष तक जीयें, सौ वर्ष तक सुनें, सौ वर्ष तक बोलें, सौ वर्ष तक समृद्धिशाली रहें।
उपरोक्त कथन में हमारे पूर्व पुरुषों ने यह माना है कि यदि हम सचाई से प्राकृतिक नियमों का पालन करें और उनके अनुसार प्राकृतिक जीवन व्यतीत करें, तो हमें अपनी पूरी आयु (अर्थात् सौ वर्ष) तक जीने के अधिकारी हैं, और यदि पुरुषार्थ करें तो हमें इससे भी अधिक जीना चाहिये।
यदि प्राकृतिक जीवन अपनाया जाय तो सौ वर्ष तक जीवित रहना कोई बड़ी बात नहीं। हमारे पूर्व पुरुष ऋषि मुनि इत्यादि प्रकृति के पुण्य प्रताप से बड़ी बड़ी उम्र वाले हुए हैं। ग्रीसदेश के इतिहास में उल्लेख है- “भारत में एक सौ चालीस वर्ष की आयु तक कई व्यक्ति जीते हैं, सौ वर्ष से ऊपर के मनुष्य को एक निराला नाम देने में आता है।” यह लेख आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व का है।
प्रकृति के प्रताप से दीर्घ जीव प्राप्त करने वालों के शुभ नाम और आयु देखिये- यूरोप में थामसपार 152 वर्ष, हेनरी जेन्किन्स 169 वर्ष, मेरी विलिंग 112 वर्ष, काउन्ट डेस्माउ 140 वर्ष, कैथराइन एडन 101 वर्ष, अब्राहम 175 वर्ष, इजाक 180 वर्ष, शेखसादी 102 वर्ष, कवि अवारी 114 वर्ष महाराष्ट्र में, निजाम उल्मुल्क 105 वर्ष, मल्लाहारी घनगर 115 वर्ष, पंडित प्रमाकर शास्त्री 109 वर्ष, रामसेठ भुरकीसुनार 105 वर्ष, हरद्वार रामलाल 105 वर्ष।
यदि स्वाभाविक रीतियों से हम जीते चले, प्रकृति के नियमों का पालन करते चलें, तो आयु क्षीण न होगी। दीर्घायु प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक नियमों का पालन अत्यन्त आवश्यक है।
रोग आपका मित्र है?
प्रकृति हमें बीमार नहीं पड़ने देना चाहती। साधारणतः जो लोग कुदरत के पास रहते हैं, साहचर्य बनाये रखते हैं और प्रकृति के मामूली नियमों का भी पालन करते हैं, वे बीमार नहीं पड़ते। बीमार पड़ने पर भी प्रकृति हमारी गलतियाँ सुधारने की चेष्टा करती है।
रोग प्रकृति की वह क्रिया है जिससे शरीर की सफाई होती है। रोग हमारा मित्र होकर आता है। वह यह बताता है कि हमने अपने शरीर के साथ बहुत अन्याय किया है, अनेक कीटाणुओं को स्थान देकर विष एकत्रित कर लिया है। रोग उस आन्तरिक मल का प्रतीक या बाह्य प्रदर्शन मात्र है। यह प्रकृति का संकेत मात्र है जो हमें बताता है कि हमें अब अपनी गलतियों में सावधान हो जाना चाहिए। शरीर में स्थित गंदगी, विष, जातीय तत्व या अप्राकृतिक जीवन से सावधान हो जाना चाहिए। रोग शरीर शोधन की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
साधारण पढ़े-लिखे या मूढ़ व्यक्ति रोगों से बुरी तरह भयभीत हो जाते हैं। वे उसके कारणों को समझने की चेष्टा नहीं करते। प्रकृति यदि अपनी ओर से बीमारियों को ठीक करने की योजना भी करती है, तब भी वे उसके मार्ग में रोक लगा देते हैं। देखा है कि अत्यधिक दवाई और इंजेक्शन इत्यादि का प्रयोग हानि कारक सिद्ध हुआ है।
स्मरण रखिये रोग बिना कारण के कभी उत्पन्न नहीं होते। शारीरिक तथा मानसिक विकार उत्पन्न होते ही सर्वप्रथम आप यह मालूम कीजिए कि शरीर में किन-2 कारणों में रोग के कीटाणु उत्पन्न हुए? क्यों आप बीमार पड़े? प्रकृति के किस नियम की आपने अवहेलना की है? रोग का वास्तविक कारण समझ लेना चिकित्सा की आधारशिला है।
“रोग प्रतिकार के रूप में प्रकट होता है और यह पहले विषम अवस्था का अन्त कर देता है, रोग मनुष्य के शरीर में इसलिए होता है कि उसके लिए रोग की आवश्यकता है। रोग स्वास्थ्य लाभ करने का एक उपाय है। रोग के द्वारा जब शारीरिक विकार बाहर निकल जाते हैं, तो मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। बाहर हम जिस रोग को देखते हैं वह रोग का लक्षण मात्र है। मान लीजिये, किसी व्यक्ति को जुकाम हो गया, अथवा फोड़ा निकल आया तो हम इसी को रोग मान लेते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से वह रोग है, वरन् रोग के लक्षण मात्र हैं। रोग से शरीर की विकृत अवस्था का पता चलता हैं।”
रोगों के प्रति हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। हम रोग को शत्रु नहीं, मित्र मानें अर्थात् निराशावादी बनने के स्थान पर आशावादी बनें। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि रोग हमें पूर्ण स्वस्थ कर देगा, संचित विकार निकाल देगा, शरीर के लिए लाभदायक सिद्ध होगा। यह मानसिक परिवर्तन प्राकृतिक चिकित्सा का सहकारी है। जो व्यक्ति अपने रोगों से मुक्त होने के लिए जितना ही आशावादी बनेगा, सुखद कल्पनाओं और मधुर आशाप्रद विचारों से अपना मन भरे रहेगा, उसे रोग एक मित्र प्रतीत होगा। शरीर से हट जाने पर भी रोग सूक्ष्म रूप से अन्तःकरण में विद्यमान रहता है।
डॉ. के. लक्ष्मण के शब्दों में, “आत्मा के अन्तर्भूत आनन्द को भूल जाना ही रोग है, जिनके कारण मन में इच्छाओं का उदय होता है।” आत्मविस्मृति ही रोग है। आजकल के बहुत से मानसिक एवं शारीरिक रोगों का कारण एक यह भी है कि मनुष्य सत् तत्व की रक्षा न कर असत् एवं विजातीय तत्वों का संचय होने देना। डॉ. फापड़ के अनुसार अनेक रासायनिक एवं शारीरिक रोग मनुष्य के चेतन और अचेतन मन की रहस्यमयी गुफाओं में होते हैं। पहले मन रोगी होता है, रोग चेतन पर आता है, वासनाओं और विचारों में प्रभाव दिखाता है और अन्त में स्थूल शरीर में नाना रूपों में प्रकट होता है। हर एक रोगी की सर्वप्रथम मानसिक अवस्था विकृत हो जाती है। दूषित अन्तःकरण, विकृत मन और अशुभ भावनाएँ रोगों का कारण है।
चिकित्सा के नाम पर आपको ठगा जाता है-
आज कुदरती जिन्दगी को भूल कर हम चिकित्सकों के कुचक्र में फँस गये हैं। ये लोग हमें इतनी दिलचस्पी स्वस्थ करने में नहीं लेते जितनी बीमारी को बढ़ाने में। इनका दृष्टिकोण अधिक से अधिक रुपया ऐंठना होता है।
डॉ. राम लिखते हैं कि हमारी लापरवाही का सबसे अधिक फायदा उन लोगों ने उठाया है जिन्होंने समाज की चिकित्सा का ठेका लिया है। ये लोग भूख नहीं लगती, उसकी दवा तैयार करते हैं। खाना हजम नहीं होता, उसकी दवा तैयार करते हैं। ये धातु पुष्ट करने के ठेकेदारी लेते हैं, बालों को काला करते हैं, दांतों को जमाते हैं, लड़के (लड़की नहीं) पैदा कराते हैं और संसार के सब पुरुषों की नपुँसकता व स्त्रियों का बाँझपन मिटाकर संसार में मकड़ी के समान अपना जाल फैलाये हुए हैं और संसार इनके जाल में फँसा है।
मूत्र रोगों में लोगों को डराकर और भीषण जटिल रोग बता बताकर ये उन्हें कुकर्म में प्रोत्साहन देते हैं। ताकत की दवाइयों का व्यापार आज जितना चलता है, शायद कभी नहीं चला। दुबले-पतले व्यक्तियों को व्यर्थ ही रोगी कह कर ये अटकाये रहते हैं। गुप्त रोगों में रुपया पानी की तरह बहाया जाता है और युवक चुपके चुपके खूब उसमें ठगे जाते हैं। हर एक साधू, फकीर, कविराज, वैद्य बना बैठा है और समाज को चूस रहा है।
अधिकाँश दवाइयां ऐसी दी जाती हैं जिनमें साधारण चीजों के अलावा कुछ भी नहीं होता। कभी-कभी पानी ही दे दिया जाता है। “नब्बे फीसदी रोग तो प्रकृति स्वयं चंगे कर देती है और चिकित्सक उसका श्रेय लूटते हैं। बुखार खाँसी दुखने वाली आँख, पेट विकार अधिक अंशों में कुदरत द्वारा ही ठीक हुआ करते हैं किन्तु इन्हें ठीक करने का सेहरा डाक्टरों के सिर पर बाँधा जाता है। प्रकृति का विधान ही ऐसा है कि हमारी मामूली बीमारियाँ स्वयं ही ठीक होती चलें। इनमें हमारे अन्दर बैठे हुआ आत्म विश्वास ही काम किया करता है। मामूली दवाई दी जाती है, तो हम समझते हैं कि हमें दवाई मिल रही है और हम चंगे हो जायेंगे। “हमें चंगे हो जाना चाहिये” इस भाव से हमारा ही आत्म विश्वास प्रकट होकर हमें स्वस्थ होने में सहायता करता है। प्रायः देखा जाता है कि किन्हीं साधु, वैद्य, हकीम या डॉक्टर पर हमारा विश्वास जाता है। “इसकी दवाई से हम अवश्य भले चंगे हो जायेंगे” इस भावना के साथ हम उन महाशय द्वारा दी गई जो भी चीज प्रयोग में लायेंगे उस से लाभ होगा। यह है प्राकृतिक चिकित्सा में आत्म विश्वास का चमत्कार। हमारे देखने में अनेक बार आया है कि असाध्य रोगी मानसिक शक्ति के सफल प्रयोग द्वारा अच्छे हो जाते हैं और अनेक शारीरिक रोगों को ठीक कर लेते हैं। हमारे विचारों का जो विलक्षण प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ा करता है उस मनोवैज्ञानिक चमत्कार से आज लोग अनभिज्ञ हैं। रक्त तब तक दूषित रहेगा और हमारा शरीर रोग ग्रस्त रहेगा। जब तक हमारे विचार रोगी और दूषित रहेंगे। स्वास्थ्य, बल, दीर्घायु की उत्पत्ति पवित्र विचारों द्वारा ही सम्भव है।
प्रकृति वह है जो आदि काल से थी। उसके सम्पूर्ण नियम अटल हैं, उन्हें तोड़ने में क्या राजा क्या रंक-दोनों ही को समान रूप से सजा मिलती है। वे अटूट अपरिवर्तनीय और चिर सनातन हैं। प्रकृति विरुद्ध जाकर हम नए रोगों की उत्पत्ति कर रहे हैं। प्रकृति की गोद में विचरण करने से आदिम निवासी हमारी सभ्यता के अनेक रोगों से अपरिचित थे।
प्रकृति के विरुद्ध आचरण -
ज्ञान के इस उन्नत युग में भी कुछ व्यक्ति ऐसी मूर्खताएँ करते हैं कि शरीर के भीतर मल और विष एकत्रित हो जाते हैं। ऐसा मालूम होता है मानो वे कह रहे हो- “हे रोग, हे अस्वस्थता। तुम आओ, मेरे शरीर में वास करो, मैं तुम्हें निमंत्रण देता हूँ। तुम्हारे लिए शरीर में उपयुक्त वातावरण उपस्थित करता हूँ। न्योता देकर तुम्हें बुलाता हूँ। तुम आओ तो मैं तुम्हारी सेवा करूंगा।”
शरीर के प्रति हमारा अत्याचार -
यदि हम अपने आहार-विहार में सजग रहें तो कोई कारण नहीं कि हम अल्पकाल में ही मृत्यु के ग्रास बनें। किन्तु हम शरीर जैसी सूक्ष्म मशीन की बहुत कम परवाह करते हैं। हम यह नहीं समझते कि यह कितनी बेशकीमती है, कितनी मूल्यवान है। यदि इसका एक भी पुर्जा बेकार हो जाय, तो असंख्य धन खर्च करने पर भी वैसा पुर्जा इसमें फिट नहीं किया जा सकता। आपका दाँत टूट जाता है, आप दन्त-चिकित्सक से दूसरा दाँत लगवाते हैं। वह एक खूबसूरत दाँत लगा देता है किन्तु एक हफ्ते बाद ही वह बुरा लगने लगता है, टूट जाता है या वैसा अच्छी तरह कार्य नहीं करता, जैसा प्राकृतिक दाँत करता था। जब दाँत जैसे साधारण पुर्जे की यह बात है तो नेत्र, हृदय, फेफड़े या अन्य सूक्ष्म अवयवों की तो बात ही कुछ और है। इन्हें तो एकबार बेकार होने पर मानवीय बाजार में खरीदा भी नहीं जा सकता। स्मरण रखिये, आपका शरीर एक अमूल्य खजाना है, यह एक से एक कीमती पुर्जों से बना है, इसमें ऐसी-2 विचित्रताएँ भरी हैं कि एक बार नष्ट होने पर उन्हें पुनः नहीं बनाया जा सकता।
शरीर के प्रति हमारे अत्याचार असंख्य हैं। नेत्र सूर्य की प्राकृतिक रोशनी में कार्य करने के लिए विनिर्मित हैं किन्तु हम दिन में तो सोते हैं, रात में विद्युत की तेज रोशनी में पढ़ते हैं, सिनेमा देखते हैं। समय से पूर्व ही उन्हें बेकार कर देते हैं। दाँतों से ऐसे अभक्ष्य पदार्थ खाते हैं, कभी अति गर्म, कभी अति शीतल चीजें चबा-चबा कर उन्हें बेकार बना डालते हैं। पेट की बात ही न पूछिये। मिर्च, मसाले, बासी पूरी, कचौड़ी, मिठाई, खटाई, मद्य, माँस, चाय, काफी न जाने कितने पदार्थ भक्षण कर हम अग्निमाँद्यता के शिकार होते हैं, तम्बाकू खाना, पान, बीड़ी, भाँग, चरस तेलयुक्त, गरिष्ठ पदार्थ पेट में भरकर असमय ही उसकी पाचन शक्तियाँ क्षीण कर देते हैं। मादक-द्रव्य तो प्रत्यक्ष विष हैं। कौन नहीं जानता कि चाय, काफी, कोको, चरस, शराब, चंडू, गाँजा, भाँग बुरी हैं? शोक! महाशोक जानते बूझते हम अपने पेट को बेकार करते हैं।
मनोविकारों का जाल -
मन तथा मस्तिष्क के प्रति हमारे अत्याचार इससे भी अधिक बढ़े हुए हैं। राजसी और तामसिक आहार से वैसे ही विचार उत्पन्न होंगे। तामसी आहार से मन चंचल, कामी, क्रोधी, लालची और पापी बन जाता है। चाहे हम कितनी भी साधना या एकाग्रता का अभ्यास करें, किन्तु तामसी आहार से स्वयं रोग, शोक, दुःख दैन्य वेग से बढ़ते हैं और मनुष्य का पुरुषार्थ घटता है, सौभाग्य दूर भागता है, सामर्थ्य न्यून होती है। राजसी और तामसिक पदार्थों (माँस, अत्यन्त उष्ण, कड़वा, तीक्ष्ण, गरिष्ठ, लहसुन, प्याज, अंडा, मछली, अत्यन्त तले हुए भोजन, रसहीन गला हुआ, बासी, मिठाइयों से मनुष्य प्रत्यक्ष राक्षस बन जाता है। फिर यदि इन अप्राकृतिक चीजों को खाकर कोई मनुष्य काम, क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिहिंसा के वशीभूत हो कुकर्म कर डाले तो क्या आश्चर्य?
मनोविकारों की उत्तेजना से दाहक तत्व बढ़ते हैं। मनोविकारों के द्वन्द्व से हमारी मानसिक वृत्तियाँ शारीरिक वृत्तियों से संश्लिष्ट होकर रोगों की अनेकरूपता उत्पन्न करती है। मनोविकार हमारे रक्त में अनेक प्रकार के रासायनिक परिवर्तन किया करते हैं। जैसे, यदि हम काम वासना से विक्षुब्ध हो उठते हैं, तो रक्त में एक प्रकार की गर्मी आ जाती है, रोम-रोम तरंगित हो उठता है। यदि वासना का ताँडव अधिक रहे तो गर्मी, सूजाक, गुप्तांगों के अनेक रोग, स्वप्नदोष, बहुमूत्र और पेशाब के अनेक गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं। क्रोध की अधिकता से रक्त में कुछ ऐसे विष उत्पन्न होते हैं जिनसे उद्वेग बढ़ता है, त्वचा का रंग काला हो जाता है, अंग फड़कने लगते हैं, शान्ति, स्थिरता और बुद्धि भंग हो जाती है। मूलरूप में क्रोध भी हमारे अनेक शारीरिक रोगों का कारण बन जाता है।
मानसिक तनाव -
हमेशा किसी मनोविकार के वशीभूत रहने से अनावश्यक संघर्ष मन में चलता है। भय, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, प्रतिहिंसा, लोभ, वासना- पर नियंत्रण न होने से मनुष्य उत्तेजित रहता है। इच्छाओं की विभिन्नताओं के अनुसार मनोविकारों की अनेकरूपता का विकास होता है। प्रत्येक मनोविकार अपनी जटिलता उत्पन्न कर शारीरिक विकार का कारण बनता है। अप्राकृतिक अनहोनी कल्पनाएँ, पुरानी दुःखद स्मृतियाँ, दलित वासनाएँ दाहक तत्वों की अभिवृद्धि किया करती हैं। अपने आप पर किए गये इन अत्याचारों के हमें स्वयं ही जिम्मेदार हैं। हम स्वयं रोगों को निमंत्रण देकर बुलाते हैं।
रोगों के प्रधान कारण -
“प्रकृति की पुकार पर जो लोग ध्यान नहीं देते, उन्हें भाँति-भाँति के रोग और दुःख घेर लेते हैं, परन्तु प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने वाले जंगल के प्राणी रोगमुक्त रहते हैं और मनुष्य के दुर्गुणों और पापाचारों से बचे रहते हैं।”
-टिंर्टनटुनेचर
प्रकृति की अवज्ञा करने का परिणाम (या दण्ड) रोग है। यह अवज्ञा हम भाँति-भाँति से करते हैं। एक स्वस्थ मनुष्य जब अपने प्रति अत्याचार करता है, तभी वह व्याधिग्रस्त होता है। साधारण गलतियों के लिए प्रकृति हमें मामूली सी सजा (सिर दर्द, जुकाम, पेट दर्द इत्यादि) देकर छोड़ देती है किन्तु अनवरत नियमोल्लंघन का परिणाम बड़े-बड़े जटिल रोग उत्पन्न करता है। प्रकृति के नियम तो अटल हैं, अपने नियमों के अनुसार वह इस शरीर पत्र को चलाया करती है। यदि उसके मार्ग में हम बाधा उपस्थित न करें, उसे अपना कार्य चलाने दें, तो हम दीर्घ जीवन का सुख लूट सकते हैं।
प्रकृति से मनुष्य जितना दूर गया, जितना उसका संपर्क छूटा, उतनी ही बीमारियाँ बढ़ी हैं। संसार ने पश्चिमी सभ्यता का दुष्परिणाम भुगत लिया है? भारतीय ऋषि मुनि सदैव प्राकृतिक माता के संपर्क में रहने का उपदेश देते रहे हैं। इस सभ्यता ने हमें सबसे अधिक सुख और दीर्घ जीवन-दान दिया है। आदिम युग में जब वह प्रकृति की गोद में खेलता-कूदता आखेट करता उसने सबसे अधिक आनंद किया। जब वह “सभ्यता” के दायरे में बंधा तो उसका प्रकृति से सम्बन्ध टूटने लगा। उन्नति के नाम पर वह धीरे-2 प्रकृति से दूर हटता गया। फलतः आज वह नाना प्रकार की व्याधियों का शिकार है।
प्राकृतिक जीवन से दूर हटने का क्या कारण है? यह है-हमारा आजकल का सभ्यतापूर्ण मिथ्या आहार-विहार से हमारे शरीर में विष रुक जाते हैं। दूषित मल पहले पेट के भीतर छेदों के पास एकत्रित होते हैं, फिर वहीं से भिन्न-भिन्न अंगों में जाकर अपना कुत्सित प्रभाव दिखाते हैं। आइये, विस्तार से हम आहार-विहार पर विचार करें।
मिथ्या आहार -
हममें से अधिकाँश व्यक्ति अपने अपने दाँतों से कब्र खोदते हैं। अपने भोजन को ऐसा अप्राकृतिक बना लेते हैं। कि पेट में एक पंसारी की दुकान बन सकती है। हम भोजन क्षुधा निवारण के लिए नहीं, स्वाद के लिए नाना प्रकार की मिठाइयाँ, अचार, स्वादिष्ट चूरन, तले हुए पदार्थ, अभक्ष पदार्थों का भी उपयोग प्रारंभ कर दिया है। हमारे सामने छप्पन प्रकार के भोजनों से भरा हुआ थाल आता है और हम भूख न होने पर भी केवल जिह्वा के स्वाद से प्रेरित होकर ठूँस-ठूँस कर खाते हैं। बनावटी रसों तथा स्वादों के प्रयोग सभ्य जगत में चल रहें हैं। इनके मोह में पड़कर मनुष्य प्राकृतिक रसों तथा स्वाद को विस्मृत करता जा रहा है। बड़े शहरों में हलवाइयों, मिठाई वालों, आचार मुरब्बे वालों ने नए-नए मिश्रणों से भिन्न-भिन्न वस्तुएँ तैयार की हैं। चाय, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, सुपारी, के बड़े-बड़े कारखाने और सजी धजी हुई दुकानें वृहत् संख्या में दृष्टिगोचर होती हैं। फल और तरकारियों को भी इस प्रकार बनाया जाता है और इतने मसाले खटाई इत्यादि भर दी जाती हैं कि उनका मूल स्वाद विकृत हो जाता है। खाते समय वह ज्ञात ही नहीं होता की कौन सी सब्जी हम खा रहें हैं। उनके विटामिन तो प्रायः बिल्कुल ही नष्ट हो जाते हैं।
शक्कर का प्रयोग बढ़ रहा है। भिन्न-भिन्न प्रकार की चिकनाई, माँस का व्यवहार समझदार व्यक्तियों में अधिक होने लगा है। माँसाहारियों में सुखाया हुआ माँस प्रयोग में खाने के लिए एक से एक अच्छी चीज विद्यमान है, वहाँ आज माँस व्यवहार देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे मनुष्य जागकर पुनः सोने की चेष्टा कर रहा है।
पेय पदार्थ में अप्राकृतिक तत्व घुस पड़े हैं। स्वच्छ निर्मल जल को छोड़कर हम सोडा लेमन, चाय, कॉफी, भाँति-2 की शराब, चटनी, इत्यादि का उपयोग कर रहे हैं। मादक द्रव्यों के व्यवहार से हम रोगों के शिकार बन रहें हैं। मादक द्रव्य रक्त में अनेक विष, हानिकारक अन्न उत्पन्न करते हैं। हमारी दवाइयाँ कई बार इतनी लाभ नहीं करती, जितना उलटकर हानि पहुँचा देती हैं। आजकल की दवाइयाँ रोग को दबाती हैं, उसे जड़मूल से विनष्ट नहीं करती। लोग समझने लगे हैं कि दवाई ली और रोग गया। ठूंस-2 कर आवश्यकता से अधिक खाया और फिर मुट्ठी भर चूरन खा लिया, काम हो गया। यह बड़ी ही प्रमादात्मक बातें हैं। तरल पदार्थों की आवश्यकता की पूर्ति चाय, शराब और सोडा पीकर करने वाले व्यक्ति यह नहीं जानते की चाय और कहवे के रूप में वे “टैनिक एसिड” और “कैफीन” विष पी रहे हैं। शराब और सोडे में शक्कर की अधिक मात्रा लेकर वे डायबिटीज के मरीज बन रहे हैं।
हमारा शरीर 16 तत्वों का बना है। इसमें कैल्शियम, लोहा, पोटैशियम एवं फास्फोरस इत्यादि लवण भी हैं। ये सभी लवण भोजन द्वारा शरीर को हमेशा प्राप्त होते रहने चाहिए। वास्तव में लवण तरकारियों और फलों में-जो विटामिनों की खान हैं-पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं किन्तु हम उन्हें बहुत पकाकर नष्ट कर देते हैं। ये सभी तत्व उचित मात्रा में हमें नहीं मिल पाते।
अधिक भोजन -
एक बहुत बड़ी गलती अधिक भोजन की है। आवश्यकता से अधिक भोजन करना पेट के साथ प्रत्यक्ष अत्याचार है। प्रातःकाल हम दूध और मिठाइयाँ, दोपहर में ठूँस-2 कर भोजन, शाम को फिर नाश्ता और रात को भोजन खाते हैं। सोते समय दूध पीते हैं, बीच में बार-2 छोटी मोटी चीजें जैसे- फल, चाय के प्याले, सिगरेट, चाट पकौड़ी, सोडा, रेवड़ी, मिठाई न जाने कितना अधिक खा डालते हैं। नब्बे प्रतिशत बीमारियाँ अधिक भोजन खाने से होती हैं। “एक चौथाई भोजन से मनुष्य का पोषण होता है और तीन चौथाई से डाक्टरों की डाक्टरी चला करती है।” हमारी पाचन शक्ति के ऊपर इतना बोझ पड़ जाता है कि अजीर्ण, मन्दाग्नि, उल्टी, दस्त, ग्रहणी, बुखार आदि हमें आ घेरते हैं। आवश्यकता से अधिक खाना शारीरिक दृष्टि से तो यह इसलिए निंद्य है कि शरीर के अन्दर कूड़ा करकट, गन्दगी का बोझ बढ़ता है, पाचन पर जोर पड़ता है और मल-निष्कासन अवयवों पर व्यर्थ का बोझ लदता है। शरीर में विष एकत्रित होकर रोग उत्पन्न होते हैं और आर्थिक दृष्टि से इसलिए बुरा है कि मनुष्य को बहुत अधिक व्यय करना पड़ता है।
अप्राकृतिक विहार -
“विहार” का अभिप्राय है, हमारा रहन-सहन। टहलना, घूमना, फिरना, बैठना, रतिक्रीड़ा। “विहार” का हमें विस्तृत अर्थ लेना चाहिए। आज के नगरों, तंग गलियों, गन्दी सड़कों, बिना रोशनदान और छोटी खिड़कियों वाले मकानों को देखिये। शरीर की प्रथम आवश्यकता है- शुद्ध स्वच्छ और निर्मल वायु। इन गन्दी गलियों में शुद्ध वायु भी मिलना एक वरदान है। आबादी अधिक होने से लोग सीलभरे अन्धेरे कमरों में रहते हैं। एक ही छोटे कमरे में इतने अधिक लोग भरे रहते हैं कि उन्हें अनेक प्रकार के छूत के रोग लग जाते हैं। व्यायाम के लिए स्थान नहीं मिलता। सोना, बैठना, भोजन पकाना, स्टोर तथा नाना वस्तुएँ रखना-सभी काम उसी में होते हैं। शुद्ध वायु और पर्याप्त प्रकाश न मिलना रोगों का प्रथम कारण है।
घरों के पश्चात् हम अधिक समय ऑफिसों, कलकारखानों, दफ्तरों और दुकानों पर व्यतीत करते हैं। बड़े अप्राकृतिक ढंग से बैठते हैं, रीढ़ की हड्डी झुकाये रहते हैं, फेफड़ों में पूरी हवा नहीं भरते, अधूरा श्वास लेते हैं। यथेष्ट मात्रा में जल नहीं पीते, आमाशय को सुखा डालते हैं। इन प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति यथासमय न करने के कारण हम रोग रूपी सजा पाते हैं।
टहलने और घूमने फिरने का हमें बहुत कम अवसर प्राप्त होता है। जब से साइकिल का प्रयोग प्रारंभ हुआ तब से तो यह समझिये हमने अपने पाँवों में स्वयं कुल्हाड़ी मार ली। मनुष्य का निर्माण एक भागने छोड़ने अन्य पशुओं का आखेट करने वाले शिकारी के रूप में हुआ। जंगलों, प्रकृति के अंचल में बहने वाली सरिताओं के तटों अमराइयों, वृक्ष और लताओं के मध्य रहकर उसने उस युग में सबसे उत्तम स्वास्थ्य और आयु प्राप्त की। आज हम एक ही स्थान पर बैठे रहकर अपनी तोंद फुला रहे हैं। पैरों को अशक्त बनाकर पंगु से बने हुए हैं। स्वच्छ हवा छोड़कर पूरा-2 दिन दुकानों और कारखानों में व्यतीत कर देते हैं।
किसी धन-सम्पन्न परिवार के स्त्री-पुरुषों के मोटे-मोटे शरीर को देखकर जो व्यक्ति स्वास्थ्य का अनुमान करते हैं, वे स्वास्थ्य और शक्ति को पहचानने में बड़ी भूल करते हैं। धनी व्यक्तियों के भारी भरकम शरीर स्वास्थ्य के परिचायक नहीं हैं। वे तो सदा अपच, कब्ज, खट्टी डकारों तथा बादी के शिकार रहते हैं। ये प्रकृति से बहुत दूर जा पड़े हैं। धन का मद उनके और प्रकृति के मध्य में एक दीवार है। स्वास्थ्य और शक्ति का धन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।
जब से मनुष्य ने शारीरिक श्रम कम किया, जब से मशीनों का युग आया, तब से उसका शरीर आराम तलब, कमजोर और दुर्बल सा हो गया है। मौसम की तनिक सी भी प्रतिकूलता को वह बरदाश्त नहीं कर पाता। साइकिल, मोटर, इत्यादि ने हमारे पाँव अशक्त किये। शारीरिक श्रम क्रमशः कम होता गया। शरीर विज्ञान का यह नियम है कि जिस हिस्से या अवयव से कार्य अधिक लिया जावेगा वह मजबूत बनता जायेगा, किन्तु जिसे निठल्ला और बिना काम छोड़ दिया जावेगा, वह निर्बल होता जावेगा। धनी पुरुष तो शारीरिक श्रम करते ही नहीं। अतः वे सबसे अधिक गिरे हुए स्वास्थ्य के शिकार होते हैं।
विषय वासना की अतृप्ति और आधिक्य आज जितना है, उतनी कभी नहीं रही है। समाज में गुप्त रोग, बहुमूत्र, स्वप्नदोष, सूजाक, गर्मी उपदंश, इन्द्रिय निर्बलता इत्यादि बड़ी मात्रा में फैले हुए हैं। कामोत्तेजक घृणित साहित्य की बिक्री बढ़ रही है। तज्जनित अनाचार, कामोपभोग की इच्छा तृप्ति के नाना साधन, गुप्त व्यभिचार, भ्रष्टता, यौन रोग बढ़ती पर हैं। गन्दे उत्तेजक उपन्यास कहानियाँ पढ़ने से और गन्दे सिनेमा के फिल्म देखने से युवक-युवतियों की कामवासनाएँ अल्पवयस में ही उत्तेजित हो उठती हैं। वे कामोपभोग के लिए बुरी तरह लालायित रहते हैं। युद्ध कालीन व्यभिचार ने समाज में मनमाना दुराचार, गुप्तरोग, अपराधों की संख्या बढ़ाई है। जो विवाहित हैं, वे पत्नि व्यभिचार कर रहे हैं।
श्री बैजनाथ महोदय इस विषय में लिखते हैं-”लोग समझते हैं कि विवाह जीवन का द्वार है। उसके द्वारा मनुष्य अपने जीवनोपवन में घुसे और मनमाना विषय-विलास लूटें। पति-पत्नि के बीच भला भोग की कोई सीमा क्यों हो? वहाँ तो सब कुछ न्याय है-नहीं वहाँ तो एक दूसरे की वासना की तृप्ति के लिए अपना शरीर अर्पण कर देना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है- ऐसे नर पशुओं को अपनी पत्नि की बीमारी और गर्भावस्था का भी ख्याल नहीं रहता। वे तो विकार के कारण पागल और अन्धे रहते हैं। संसार में विकार तृप्ति के अतिरिक्त उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता।”
जब हम निर्बल, निःसत्व और रक्तहीन नर कंकालों को देखते हैं तो हमें उन पर बड़ा तरस आता है। अल्पावस्था में विवाह अब इस उन्नत युग में भी हो रहे हैं। अप्राकृतिक रूप से काम वासना को भड़काने में सिनेमा और नाटक शृंगार, प्रधान कविताएँ, कामोत्तेजक उपन्यास, अश्लील साहित्य, घर का गन्दा वायुमंडल, कुसंगति, गालियाँ प्रमुख हैं। ऋतु शान्ति, गर्भादान इत्यादि हृदय के अन्तस्थल में छिपी विकाराग्नि को अप्राकृतिक रूप से कच्ची आयु में जागृत करते हैं।
प्रायः माता-पिता विषय वासना के वशीभूत हो इतने अंधे हो जाते हैं कि वे अपने बच्चों के सन्मुख ही नाना प्रकार की विकारजन्य कुचेष्टाएँ करते रहते हैं। अनजान में ही इस प्रकार वे दूषित कुसंस्कार बच्चों के कोमल अंतर्जगत पर डाल देते हैं।
निम्नवर्ग के लोग-नौकर सा या अन्य व्यक्ति बड़े आदमियों के बच्चों तक को कुसंगति में डाल देते हैं। निर्दोष बच्चों को पान, सिगरेट, रबड़ी, मलाई, भाँग, गाँजा, चरस इत्यादि अभक्ष्य पदार्थों की आदत डालकर पाप के गर्त में धकेलते हैं।
मिथ्या आहार तथा अप्राकृतिक विहार के कारण हम अंधे बने, प्रकृति के रहस्यों को भूलने लगे, प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने लगे। प्रकृति-तत्व क्या है? वह किस प्रकार हमारे जीवन में महत्वपूर्ण कार्य करता है? प्रकृति किस प्रकार हमारे स्वास्थ्य की रक्षा किया करती है? ये सब बातें हमने भूला दीं। जो आराम का समय है, उस समय हम कार्य में जुट गये, काम के समय आराम करने लगे। पीने के लिए हम कृत्रिम चीजों का प्रयोग करने लगे, जीवन में व्यर्थ आडम्बर हमने मोल ले लिये। हमारे वस्त्र इतने अधिक हो गये कि शरीर पर स्वाभाविक रूप से हवा भी नहीं लग पाती, पाँवों में हमने मोजे जूते डाल दिये, परिश्रम हम छोड़ बैठे व्यर्थ के अनेक आडम्बरों में हम फँस गये। हमारे जीवन में भ्रम, चिन्ताएँ, अतृप्त वासनाएँ, दलित अनुभूतियाँ वृद्धि पर हैं। हमारे जीवन में प्रकृति से सम्बन्ध प्रायः टूट सा चला है। बड़े-बड़े शहरों में चलने वाले कल-कारखाने, मिल और फैक्ट्रियां हमारे जीवन में कृत्रिमता उत्पन्न कर रही हैं। हम रात-दिन रुपये की चिंता करते हैं, उठते बैठते, सोते-जागते, चलते-फिरते प्रत्येक घड़ी हमारे सामने अर्थ चिंता रहती है। हम यह नहीं जानते कि बहुत कम पैसे से हम स्वास्थ्य, शक्ति, दीर्घ जीवन, सौंदर्य, प्राप्त कर सकते हैं।
प्राकृतिक जीवन ही वास्तविक जीवन है। प्रकृति तत्व में सभी उत्तम पदार्थों का सम्मिश्रण है। यदि हम आधुनिक सभ्यता के महारोग से अपने आपको स्वाभाविकता, का अवलम्बन कर सकें तो जीवन का वास्तविक आनन्द उपलब्ध कर सकते हैं। हम प्रकृति के जितना ही निकट आयेंगे, जितनी सचाई के साथ प्राकृतिक नियमों का पालन करेंगे, उतने ही अंशों में स्वास्थ्य लाभ करेंगे
वीर्य संचित होने से मस्तिष्क में प्रबल शक्ति आती है और इस मन की शक्ति के सहारे एकाग्रता साधन करना सहज हो जाता है।
(श्री लक्ष्मीनारायण टंडन प्रेमी ‘सम्पादक’ खत्री-हितैषी’)
सृष्टि में सृष्टिकर्त्ता को छोड़कर शेष सभी पदार्थ परिवर्तनशील हैं। वास्तव में नाश किसी का नहीं होता- केवल रूपांतर हो जाता है। संभव है हमारी इन्द्रियाँ उसका प्रत्यक्ष अनुभव न कर सकें। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं। सृष्टि और विनाश क्रम साथ ही साथ निरंतर लगा ही रहता है। कुछ तो हम देखते, समझते हैं और मानते हैं और कुछ को प्रत्यक्ष देखना संभव नहीं, बुद्धि द्वारा समझ भी सकते हैं और यह भी हो सकता है कि अज्ञानतावश हम न भी माने। पर सत्य तो सत्य है- उसे कोई माने या न माने। आत्मा अनश्वर है, जीव अजर-अमर है, किन्तु नास्तिक पूर्वजन्म, पुनर्जन्म, आत्मा तथा परमात्मा को नहीं भी मानते हैं। अस्तु, शरीर भी परिवर्तन करता रहता है। हम बालक को युवा होते, युवा को वृद्ध होते तथा वृद्ध को मरते देखते हैं। यह ‘दीर्घकालीन-परिवर्तन’ हम कह सकते हैं। आज मनुष्य स्वस्थ है, कल रोगी और परसों या तो फिर स्वस्थ या मृत। रोगी होना तथा स्वस्थ होना यह भी परिवर्तन है, जो प्रायः प्राणियों के शरीर के साथ लगा ही रहता है। प्रश्न हो सकता है। ‘ऐसा क्यों?’ और उत्तर भी अत्यन्त सरल है।
यह तो हम जानते ही है कि इंजन तभी चलेगा जब उसे कोयला पानी मिलेगा। पर कोयला पानी मिलने के बाद कुछ और क्रियाओं द्वारा भाप पैदा करना भी आवश्यक है और भाप पैदा हो जाने के बाद इंजन को चलाने वाले तथा खत्म होते हुए कोयला पानी को देने वाले की भी आवश्यकता है। सबका सब समुचित एकत्रीकरण और कार्यक्रम चालू होगा तभी इंजन सुचारु रूप से चलेगा। मानव शरीर की उपमा भी इंजन से दी जा सकती है।
हम खाते हैं, दफ्तर जाते हैं, आराम करते हैं, बोझा भी ढोते हैं-संक्षेप से “काम” करते हैं। काम करने में हमें शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। यह शक्ति हमें भोजन, जल आदि से प्राप्त होती है। भोजन, जल आदि से तात्पर्य यह है कि इससे अधिक हमें उष्णता, अग्नि या सूर्य आवश्यक हैं। इससे भी अधिक वायु और वायु से भी अधिक आकाश तत्व की हमें आवश्यकता है। पंचतत्वों से हमारा शरीर बना है और इस शरीर के पोषण या भोजन के लिए हमें पंचतत्वों की आवश्यकता है और पृथ्वी (और फल, तरकारी, अनाज आदि पृथ्वी तत्व से ही उत्पन्न होते हैं।) से अधिक जल, जल से अधिक वायु का हमारे लिए उपयोगी है। उपवास विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं 15-20 दिन के उपवास तो साधारण बात है, सौ-सौ दिनों के सफल उपवास लोगों ने किए हैं और प्राकृतिक चिकित्सकों ने कराये हैं। किन्तु जल का उपयोग होता रहा है। किन्तु यदि 10-5 दिन जल न मिले तो कदाचित मनुष्य अवश्य मर जाय। योगाभ्यासियों की बात जाने दीजिए जो समाधि लगाकर असंभव बात भी संभव दिखा सकते हैं पर साधारण प्राणी 10-5 मिनट हवा न मिलने पर भी जीवित नहीं रह सकता।
यह तो ठीक है पर आकाश तत्व को खाने की बात सुनने पर आश्चर्य होगा ही। पर बात है कुछ ऐसी ही। उपवास चिकित्सकों तथा हिमालय के निर्जन भागों और अगम्य कंदराओं के निवासी महात्माओं से पूछा जाय तो वह बतायेंगे कि अन्न फल आदि भोजन के बिना भी मनुष्य जीवित रह सकता है। (पार्थिव भोजन) यदि आकाश-तत्व उसे मिलता रहे। विद्वानों को यह बात समझाने की नहीं है। वह तो सर्वविदित है।
पर साधारण प्राणी तो समझते हैं भोजन ही जीव का आधार है। और एक दृष्टिकोण से वे ठीक ही समझते हैं। भोजन के बिना निस्तार नहीं। हम जानते हैं प्रत्येक क्षण माँस, त्वचा, हड्डी, कोषाणु (Cells) आदि शरीर की सभी वस्तुओं का एक ओर धीरे-धीरे नाश होता रहता है और दूसरी ओर नई-नई हड्डियों, कोषाणुओं आदि का जन्म होता रहता है। यदि इस सृजन और संहार का कार्य ठीक अनुपात से शरीर में होता रहता है, तो हम स्वस्थ रहते हैं, किन्तु जब उसके क्रम में कोई व्यतिक्रम उपस्थित हो जाता है तो हम अपनी स्वाभाविक दशा में नहीं रहते। कुछ परिवर्तन सा हम अनुभव करते हैं और कभी उस परिवर्तन का अनुभव हम नहीं भी, उस समय तो कम से कम कर पाते। यही रोग या अस्वास्थ्य है।
किन्तु प्रश्न का उत्तर स्पष्ट नहीं हुआ। ठीक है कोयला पानी रूपी अन्न, जल आदि जब मशीन रूपी शरीर को हम देते रहते हैं तब फिर गड़बड़ी क्यों? यदि इस लेन-देन के कार्य में कोई रुकावट नहीं आती तब फिर अस्वाभाविक दशा, जिसे हम रोग कह सकते हैं शरीर की क्यों होती है? मान लीजिए हम जला, अधजला गीला, सूखा, आग का पत्थर, का विभिन्न प्रकार का कोयला, मशीन में डालते हैं तो मशीन पर जो प्रतिक्रिया होती है, उसमें भी असमानता रहेगी। उसी प्रकार जैसा हम भोजन करेंगे, उसी के अनुसार तो शरीर का पोषण तथा शरीर का कार्य होगा।
हमारे भोजन में प्रोटीन, कारबोहाइड्रेट, चर्बी, शर्करा, विटामिंस अनेक प्रकार के तथा जल इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि यही वे सब तात्विक वस्तुएँ हैं जिनके द्वारा हमारा यह शरीर बना है। तो इससे यह सिद्ध हुआ कि हमें सब वस्तुएं ग्रहण करनी चाहिए। ठीक भी है परन्तु कौन, किस समय, किस अवस्था में और किस प्रकार तथा कितनी आदि पचासों ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें जानना हमें आवश्यक है। प्रोटीन का क्या कार्य है और चर्बी का क्या है आदि तथा कारबोहाइड्रेट की भोजन में कमी ज्यादती से क्या हानि लाभ होता है। आदि बातें आवश्यक होते हुए भी इस छोटे लेख में उन पर लिखना संभव भी नहीं है और प्रस्तुत शीर्षक के बाहर की भी बातें हैं। हमें तो केवल इतना निचोड़ निकाल लेना है कि भोजन ही स्वास्थ्य देता है और भोजन ही रोग।
किस भोजन से रोग होता है या किन-किन भोजनों के मिश्रण से रोग होता है और किन-किन मिश्रणों से स्वास्थ्य बनता है अर्थात् रोग नहीं होता, यही हमारा इस लेख का विषय है। इस विषय में 99 प्रतिशत जनता अनभिज्ञ हैं। हम अभाग्यवश यही समझते हैं कि तरमाल खाने से फल, तरकारी, दाल, रोटी, पकौड़ी, मिठाई आदि चाहे सभी एक साथ क्यों न खायें जायं लाभ ही पहुँचावेगा। अनपढ़ों की बात तो जाने दीजिए हमारे डिग्रीधारी विद्वान भी इन बातों में कोरे हैं और उससे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यदि उनसे इस सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है तो वह सुनने और समझने को ही तैयार नहीं होते। इतने लाभप्रद विषय के प्रति इतनी अधिक उपेक्षा और उदासीनता का प्रदर्शन यह हमारे सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। हम अज्ञानी हैं और अज्ञानी ही रहना चाहते हैं और सबसे अधिक हम जिह्वा अर्थात् स्वाद के वशीभूत हैं। हम जिंदा रहने के लिए खाना नहीं चाहते हम खाने के लिए जिन्दा रहना चाहते हैं।
महात्मा गाँधी ने सत्य कहा है कि केवल जिह्वा की इन्द्रिय को अपने बस में कर लो। शेष इन्द्रियाँ अपने आप बस में हो जायेंगी। अस्तु-यदि हम निम्नलिखित मिश्रण भोजन में न रखें भोजन करते समय, तो हमें लाभ होगा अन्यथा हानि -
(1) प्रोटीन और स्टार्च (माड़ी) वाले भोजनों को मिश्रण जैसे आलू (स्टा.) और गोश्त (प्रो.), रोटी (स्टा.), (प्रो.) और आलू, (प्रो.) और टोस्ट आदि।
याद रखिये स्टार्च अपने गलाने या हाजमे के लिए क्षार पदार्थ (Alkaline) चाहते हैं और प्रोटीन गलाने या धोने को आलू पदार्थ (Acid) अतः दोनों का एक साथ हजम होना असंभव है।
(2) स्टार्च और एसिड-(आलू) फलों का मिश्रित भोजन जैसे अनाज (स्टा.) और नींबू, नारंगी, टमाटर आदि (एसिड फ्रूट्स)। अभाग्यवश हमारे यहाँ दाल या तरकारी में नींबू डालकर रोटी और चावल के साथ खाया जाता है। चावल और रोटी (स्टा.) के साथ दाल (प्रो.) खाना भी अधिक लाभप्रद नहीं। रोटी तरकारी या चावल तरकारी खाई जाय तो अच्छा हो। यह ठीक है कि देश, ऋतु, अभ्यास, व्यक्तिगत शरीर, काल आदि का प्रभाव भी भोजन पर पड़ता है- अतः कोई सबके लिए एक सी भोजन सामग्रियाँ निर्धारित नहीं की जा सकती। तभी तो कहा गया है जो एक के लिए भोजन है वह दूसरे के लिए विष है।
मनुष्य यदि तगड़ा है, उम्र कम है, पेट ठीक है तो केवल वही इन मिश्रणों को खा सकता है। वह निभा ले जायगा। उसकी विशेष हानि न होगी। यदि वह खाये भी तो हर समय नहीं वरन् कभी-कभी। तथा हरी उबाली तरकारी साथ में काफी मात्रा में ले। शक्कर का प्रयोग भी केवल उन्हें ही लाभप्रद है जो शारीरिक परिश्रम अधिक करते हैं। सर्व साधारण को, दिमागी काम करने वालों तथा घर पर रहने वालों को शक्कर का प्रयोग नहीं करना चाहिए, या बहुत कम या कभी-कभी। 35 वर्ष की आयु के बाद प्रोटीन (दाल का प्रयोग सप्ताह में एक बार से अधिक नहीं करना चाहिए) का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। शहद खा सकते हैं। गुड़ तक गनीमत है और यदि शक्कर ही खाना है तो कच्ची शक्कर ही खायें। सफेद चीनी तो विष तुल्य होती है।
निम्नलिखित चीजें भी नहीं खानी चाहिए-
(1) दूध वर्ग तथा फल वर्ग, अन्न वर्ग के साथ (गेहूं, जौ, चावल, बाजरा, ज्वार आदि) और गन्ने का रस, गुड़, चीनी, शहद के साथ न खाये।
(2) मीठे फल (आम, खजूर, मुनक्का, किशमिश, अंजीर, अंगूर आदि) के साथ खट्टे फल न खायें।
(3) प्रोटीन के साथ दूध, मीठे फल, गुड़ शहद आदि न खायें। (4) शहद और घी सम मात्रा में (जहरीला हो जाता है।)
(5) शहद और मूली, शहद और मट्ठा, शहद और खिचड़ी, गरम चीज के साथ दही केला और दही (ये मिश्रण पाचन विकार पैदा करते हैं।)
(6) गरम पानी और दूध (शरीर को क्षीण करते हैं।) (7) दूध और मछली (कोढ़ पैदा करते हैं।)
(8) घी और बेल सम मात्रा में (पित्त बिगाड़ता है। (9) दूध के साथ खटाई, नमक, कुल्थी, मूली, लहसुन, उर्द के साथ मूली, बड़हल, कटहल (पाचन बिगाड़ते और रक्त विकार पैदा करते)
(10) दही को गरम रोटी या कोई कोई गरम पदार्थ के साथ।
(11) पानी मिला दूध और घी। (12) खीरा और खिचड़ी। (13) छाछ, दही, बेलगिरी में से किसी के साथ केला।
(14) दूध के साथ काँजी, सिरका, अंजीर, माँस, मछली, इमली, शराब, अखरोट, नींबू, जामुन।
(15) पानी और शहद सम मात्रा में। (16) शर्बत या ठंडे पानी के पीछे चाय या चाय के पीछे शर्बत, ठंडा पानी, खीरा, ककड़ी, तरबूज।
(17) काँजी सिरके साथ के साथ तिल। (18) तेल तथा घी की बनी चीजें साथ-साथ।
(19) मछली गन्ना और मसूर की दाल। (20) मछली और शहद। (21) दूध और तेल की बनी चीजें साथ-साथ।
(22) मूली या खरबूजे के साथ शहद। (23) दूध में गुड़। (24) खरबूजा और दही। (25) चावल और सिरका।
(26) माँस के साथ तिल दूध, पनीर सिरका या शहद। (27) घी, चिकनाई, मिठाई, खीरा, फ्रूट, ककड़ी, तरबूजा, खरबूजा, नाशपाती आदि के ऊपर पानी, शरबत या दूध-दही की लस्सी।
(28) तेल में बना कबूतर का माँस।
अब निम्नलिखित मिश्रण आदर्श हैं। अतः इनका प्रयोग लाभप्रद है।
(1) स्टार्च और फैट (रोटी, मक्खन, अनाज मलाई, केला-मलाई आदि)
(2) स्टार्च और हरे शाक (रोटी या अन्य अनाज-सलाद, आलू-हरी तरकारी, अनाज खीरा, ककड़ी आदि)
(3) स्टार्च, फैट और हरी तरकारी (रोटी मक्खन-हरे शाक, केला-मक्खन-हरी तरकारी सलाद आदि)
(4)स्टार्च और शर्करा (शहद-रोटी, शहद-अन्न आदि)
(5) स्टार्च और सूखे फल (रोटी-मुनक्का, खजूर-अंजीर आदि कोई अनाज और कोई सूखे फल आदि)
(6) स्टार्च, सूखे फल और शर्करा (रोटी-शहद-मुनक्का आदि)
(7) स्टार्च, फैट, हरी तरकारियाँ और सूखे फल (सलाद-किशमिश-घी या तेल मक्खन-रोटी या कोई अन्न)
(8) प्रोटीन और एसिड (अम्ल) फल (दूध ताजे फल, आदि)
(9) प्रोटीन और हरी तरकारियाँ (दूध दाल के साथ सलाद या कोई हरी तरकारियाँ या शाक)
(10) प्रोटीन और फैट (आदि तथा घी, दूध मक्खन आदि)
(11) प्रोटीन फैट और हरे शाक (हरी तरकारी आदि और घी, दूध आदि)
(12) प्रोटीन, फैट और एसिड (खट्टे) फल दाल, आदि घी, मक्खन, दूध आदि-नींबू टमाटर आदि। (13) प्रोटीन और शर्करा (सूखे मेवे-गिरी आदि, सूखे मेवे मलाई आदि-शहद आदि)
(14) फैट और शर्करा (सूखे फल दूध, शहद-दूध आदि)
(15) फैट और एसिड फल (कोई ताजे एसिड फल जैसे टमाटर, नींबू, संतरा, सेब आदि तथा मक्खन-मलाई-दूध आदि)
(16) दूध वर्ग (दूध दही, मक्खन, मलाई, मट्ठा, क्रीम आदि) तथा सभी साग-तरकारियां (पालक, परमल, गाजर, हरी मटर, और घीया तोरई, खीरा-ककड़ी टमाटर, प्याज आदि)
(17) अन्न वर्ग के साथ, शाक-तरकारियाँ तथा शहद या गुड़ और सूखे मेवों में कोई एक (अंजीर, मुनक्का, खजूर आदि) खा सकते हैं। अन्न वर्ग में से कोई भी एक या अधिक से अधिक दो पदार्थ दो एक भोजन में खाना पर्याप्त होगा जैसे रोटी-दाल के साथ गुड़ या शहद, दाल-चावल, तरकारी और गुड़ या शहद, रोटी-तरकारी और उसके साथ एक कोई मीठी चीज ले सकते है, प्रत्येक समय के भोजन में कुछ कच्ची सलाद और शाक होना आवश्यक है ही।
(नोट- काँसा, ताँबा या पीतल के पात्र में कई दिन का रखा हुआ घी, तेल या कुछ समय का रखा खटाई, दही, छाछ, मक्खन हानिप्रद है, अतः वर्जित है।)
भोजन सम्बन्धी यदि हम कुछ नीचे लिखे साधारण नियमों का पालन करें तो हम यदि रोगी हैं तो कुछ समय में निरोग हो सकते हैं और यदि स्वस्थ हों तो और भी अधिक स्वस्थ तथा सशक्त हो सकते हैं-
(1) नाश्ता करना एक दम छोड़ दें। यदि करे ही तो केवल फलों और दही दूध का ही।
(2) भोजन केवल दो बार करे-9 तथा दोपहर 12 बजे के बीच में तथा 5 और 8 रात के बीच में। बीच में कुछ न खाएं। हाँ 2 और 4 के बीच में फल खा सकता है और सोने के समय एक दो घंटे पहले दूध ले सकता है। नौकरी−पेशा, व्यापारी तथा मजदूर आदि मनुष्य पूरा भोजन रात को ही करें। दोपहर का भोजन तो बहुत हल्का होना चाहिए। क्योंकि खाने के बाद काम करना पड़ेगा तो पाचन की इन्द्रियाँ अपना काम ठीक से न कर सकेंगी।
(3) भोजन आधा पेट करें। एक चौथाई पानी तथा एक चौथाई हवा के लिए छोड़ दें।
(4) प्रत्येक भोजन के साथ हरी तरकारी, कच्चे शाक तथा फल का आवश्यक प्रयोग हो। यथा शक्ति पर्याप्त मात्रा में।
(5) बहुत परिश्रम के बाद, थके होने पर, क्रोध, शोक या चिंता आदि मानसिक उद्वेग होने के समय भोजन स्थगित कर दें।
(6) भोजन के बाद आधा घंटे नहीं तो 15 मिनट तो अवश्य ही विश्राम करें। पहले बाँयी करवट फिर दाँयी करवट फिर बाँयी करवट बैठें।
(7) आदर्श तो यह है कि एक समय में एक ही प्रकार की वस्तु खाएं। नहीं तो कम से कम तीन प्रकार से अधिक पदार्थ कभी न खायें अन्यथा उनके मेल से पाचन यंत्रों में कुछ ऐसे रासायनिक परिवर्तन होते हैं, जिनसे भोजन ठीक से नहीं पचते। रोटी-तरकारी एक प्रकार का भोजन समझा जाय।
(8) तले व्यंजन, मिर्च-मसाले मिले पदार्थ (पकवान आदि) चाय, काफी, नशीली वस्तुएँ न खायें।
(9) भोजन शाँत चित्त तथा प्रफुल्लित होकर करें।
(10) पानी या दूध गट-गट करके न पियें। कहा गया है पानी दूध आदि खायें तथा भोजन को पिये। इसका अर्थ है पेय पदार्थ घूँट-घूँट लेकर पियें, जिससे खूब लार उसमें मिल जाय। ठोस पदार्थों को इतना चबाये कि वह पानी सा हो जाय और तब उनको पी जायं। हमें याद रखना चाहिये कि पेट के दाँत नहीं होते अतः यदि बिना कुचले और चबाये ही भोजन पेट में पहुँच गया है तो बिना ठीक से पचे और बिना भोजन से समुचित रस बने ही, वह बहुत कुछ वैसे ही गुदा मार्ग से निकल जायगा। खूब चबाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भोजन में (अन्न, फल, तरकारी आदि में) प्राणतत्व के सूक्ष्म कण होते हैं। बहुत चबाने से वह अलग-अलग हो जाते हैं। भोजन के समय यह भावना करें कि भोजन के पोषक तत्व मेरे पेट के अंदर जा रहे हैं, जिनके द्वारा शुद्ध और समुचित रस, माँस मज्जा, वीर्य बन रहा है। इसके अतिरिक्त स्टार्च केवल लार द्वारा ही चबाते समय शर्करा के रूप में परिवर्तन होता है, पेट में कोई रस इसे शर्करा के रूप नहीं बदल सकता और शर्करा की आवश्यकता रुधिर की शुद्धि के लिए अत्यधिक है। दाँत, जीभ और मुँह का उपयोग करें।
(11) भोजन न बहुत गर्म हो न ठंडा। बासी, बदबूदार, खुला हुआ भी न हो। तामसिक भोजन वर्जित है। सात्विक भोजन करें। जैसा भोजन होगा वैसी ही बुद्धि बनेगी।
(12) माँस अंडा, गोश्त आदि भोजन वर्जित है क्योंकि इनमें लाभ कम और हानि अधिक होती है। जो लाभ इनसे होते हैं वह, और उससे भी अधिक हम दूध और फल-शाक द्वारा पहुँचा सकते हैं। माँस खाने वाले जानवर के मरे हुए कोषाणुओं (Cells) तथा उसके उपस्थित रोगों को भी उदरस्थ करते हैं।
(13) पानी भोजन के साथ न पियें। कम से कम भोजन के एक घंटे बाद पियें। (14) सोने के 3 घंटे पहले ही भोजन कर लें। (15) भोजन नियमित समय पर तथा परिमित करें। (16) सोकर उठने के पूर्व रात का ताँबे के बर्तन में रखा पानी पियें तथा सोने के पहले एक गिलास पानी पियें।
इस लेख में स्टार्च, प्रोटीन, फैट आदि का नाम बार-बार आया है अतः बहुत संक्षेप में इस पर प्रकाश डालना आवश्यक होगा ताकि पाठक इस लेख को भली भाँति समझ सकें।
(1) कोषाणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि, रक्षा तथा मरम्मत आदि के लिए प्रोटीन भोजनों की आवश्यकता होती है। इसके दो प्रकार हैं। एक तो पशु प्रोटीन जैसे दूध, गोश्त, मछली, अंडा और दूसरे वनस्पति प्रोटीन जैसी नारियल, द्विदल अनाज (चना, दालें, लोबिया, मटर आदि)
(2) उन कोषाणुओं की रक्षा के लिए जो अपने कार्य में लगी रहती हैं तथा शरीर में गर्मी पहुँचाने वाले पदार्थ “फैट” के अंतर्गत हैं। इसके भी दो भेद होते हैं। पहला पशु-फैट जैसे गोश्त, मक्खन, मलाई, घी आदि तथा दूसरा वनस्पति-फैट जैसे- जैतून, बादाम, गिरी आदि के तेल, नारियल आदि।
(3) शरीर में ईंधन का काम करने वाले पदार्थ स्टार्च और शर्करा भोजन (कारबोहाइड्रेट) कहलाते हैं। इनके भी दो भेद हैं। पहला-शर्करा-शहद, मावा, सूखे फल, चुकंदर, गुड़, चीनी, खाँड़ आदि दूसरा-स्टार्च। एक तो अनाज में मिलने वाला स्टार्च जैसे- गेहूं, जौ, मक्का, चावल आदि तथा दूसरा वनस्पति से पाया जाने वाला जैसे- आलू, घुइयाँ केला आदि।
(4) खनिज लवणों का काम रुधिर को शुद्ध करना आदि है। ताजे फलों और हरे शाकों में वह बहुत पाये जाते हैं। ये कैल्शियम, फास्फोरस क्लोरीन, पोटेशियम, सोडियम, मैग्नीशियम, आयोडीन आदि हैं। जिनका कार्य भिन्न-भिन्न है तथा जो भिन्न-भिन्न मात्राओं में भिन्न-भिन्न पदार्थों में मिलते हैं। फलों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-(1) अम्लीय (Acid) फल जैसे- टमाटर नींबू, नारंगी आदि तथा (2) क्षारमय (Alkaline) फल जैसे- अंगूर, सेब, सब प्रकार के सूखे फल आदि। इसके अतिरिक्त सब प्रकार की तरकारियाँ भी क्षार होती हैं।
(5) जल भी भोजन का ही एक अंग है और इसका महत्व सर्व विदित है।
“भाव प्रकाश” के अनुसार हम यहाँ स्वास्थ्य सुख एवं दीर्घायु की कामना रखने वाले पाठकों के लिए प्रकृति की दृष्टि से दिनचर्या दे रहे हैं। इसे ध्यानपूर्वक अनुसरण करना चाहिए।
निरोगी कौन है?
सुथुत कहते हैं- जिस मनुष्य के बात, पित्त आदि दोष, अग्नि, धातु और मल समान स्थित हों, जो व्यक्ति अपने शरीर के अनुसार समान रूप से क्रियाएँ करता हो और जिसके देह और मन प्रसन्न हों-वह मनुष्य स्वस्थ (निरोगी) कहलाता है।
प्रातःकाल क्या करें?
स्वस्थ मनुष्य आयु की रक्षा के लिए चार घड़ी तड़के अर्थात् ब्रह्ममुहूर्त में उठे और उस समय दुःख की शाँति के लिए ईश्वर का स्मरण करें। फिर दही, घी, दर्पण, सफेद सरसों, बैल गोरोचन और फूल माला-इनका दर्शन और स्पर्श करें-ये शुभकारक हैं।
यदि और अधिक जीवन की अभिलाषा हो तो घी में अपना मुख नित्य देखें। प्रातःकाल मल, मूत्र, आदि का विसर्जन करने से दीर्घायु होती है, क्योंकि इनसे पेट का गुड़गुड़ाहट, अफरा और भारीपन आदि सब दूर हो जाते हैं। मल को रोकने से पेट का फूलना, शूल, गुदा में कतरन के सदृश पीड़ा होती है तथा मल का अवरोध होता है। डकार बहुत आने लगते हैं। अथवा मुख में से बदबू निकलने लगती है। अधोवायु को रोकने से पेट में वायु सम्बन्धी अन्य रोग भी उत्पन्न हो जाते हैं। मूत्र रोकने से मूत्राशय में तथा लिंग में शूल होता है। मूत्र, कृच्छ, मस्तक में दर्द, शरीर की नम्रता, और तंक्षण का सम्पूर्ण संधियों में खींचने सदृश पीड़ा होती है। मलमूत्र का वेग हो तो तुरन्त मलमूत्र का त्याग करना चाहिए। इससे पहले अन्य कार्य न करें।
दाँतौन कैसी हो?
बारह अंगुल लम्बी कनिष्ठिका अंगुली के अग्रभाग की तरह मोटी, सीधी गाँठ और छिद्र रहित ऐसी दातौन करें। दाँतौन की नयी कुँची से एक-एक दाँत को घिसें। शहद, सोंठ, मिर्च, और पीपल इनके मिल हुए चूर्ण से अथवा तेल की भावना दिये हुए सैंधे नोन के चूर्ण से, वा तेल बल्कल नामक लकड़ी के चूर्ण से दाँतों को नित्य शुद्ध करें। मीठी दाँतौन में महुआ, तीक्ष्ण में करंज, कड़वी में नीम और कंसैली में खैर श्रेष्ठ हैं। समय, दोष और प्रकृति को विचार करके योग्य रस, और योग्य शक्ति वाले वृक्ष की लकड़ी की दाँतौन करें और दंत मंजन भी योग्य ही प्रयोग में लावें। इस प्रकार दाँतौन करने से मुख की विरसता (वेजायकेपना) दाँत जीभ तथा मुख के रोग नहीं होते। रुचि, स्वच्छता, और शरीर में हल्कापन होता है।
जीभी का प्रयोग -
जीभ साफ करने की जीभी सोने की, चाँदी की या ताँबे की बनवायें और यदि यह न मिले, तो कोमल, और स्निग्ध जीभी से जीभ के मैल को दूर करें। जीभी करने से जीभ का मैल, विरसता, दुर्गन्धता और जड़ता दूर होती है।
शीतल जल से बराबर कुल्ला करें, इससे कफ तृषा और मल दूर हो जाता है तथा भीतर से मुख स्वच्छ होता है। थोड़े गर्म जल से कुल्ला करने से कफ, अरुचि, मैल तथा दाँतों की जड़ता दूर होती है और मुख हल्का हो जाता है। शीतल जल से मुख धोने से रक्त पित्त और मुख के मुँहासे, झाँई, इत्यादि नष्ट हो जाते हैं, थोड़े गर्म जल से मुँह धोने से कफ तथा वात दूर होती है, स्निग्धता आती है और दुख का शोक नष्ट होता है।
तेल का उपयोग -
नित्य प्रति नाक में सरसों आदि का तेल डालने का अभ्यास करें। कफ बढ़ा हो तो प्रातःकाल, पित्त बढ़ा हो तो दोपहर में और वायु बढ़ी हुई हो तो सायंकाल में नाक में तेल डालने से मुख में सुगन्ध आती है, शब्द में स्निग्धता होती है, इन्द्रियों बितल रहती हैं और शरीर की सिकुड़ने श्वेत बाल, झाँई उस मनुष्य को नहीं होते।
अंजन लगाने के लाभ -
सफेद सुरमा नेत्रों को सदा हितकारी है। इसलिए इसको नेत्रों में सदा लगाना चाहिए। इससे नेत्र मनोहर और सूक्ष्म वस्तु को देखने वाले हो जाते हैं। काला सुरमा भी अच्छा होता है, इसके लगाने से नेत्रों की खुजली, मैल, तथा दाद नष्ट होता है और नेत्रों का पानी बहना बन्द हो जाता है। रात में जागा हुआ, थका हुआ, उल्टी करने वाला, जो भोजन कर चुका हो, ज्वर रोगी और जिसने सिर से स्नान किया हो-उनको सुरमा या अंजन नहीं लगाना चाहिए।
दाढ़ी बनवाने और क्षौर कर्म से लाभ -
पाँच-2 दिन में न रख, दाढ़ी, केश और रोम कटवावें। हजामत से शरीर की शोभा होती है, पुष्टता बढ़ती है, पवित्रता होती है, धन की प्राप्ति होती है, आयु बढ़ती है और शरीर में कान्ति बढ़ती है। नाक के बाल कभी न उखड़वावें, क्योंकि इससे नेत्र निर्बल हो जाते हैं। कंघे से बालों को काढ़ कर पुष्ट करें, इससे केश स्वच्छ होते हैं और उनकी धूल, कृमि तथा मैल दूर होता है।
शीशे में मुख देखने से लाभ -
शीशे में मुख देखना मंगल रूप है, कान्तिकारक, पुष्टिकर्त्ता, बल तथा आयु को बढ़ाने वाला और पाप तथा दरिद्रता का नाश करता है।
व्यायाम कीजिए -
कसरत करने से शरीर में हल्कापन और काम करने की सामर्थ्य आती है, शरीर सुन्दर तथा पुष्ट होता है, कफादि रोगों का क्षय होता है और अग्नि की वृद्धि होती है। जिसका शरीर व्यायाम से पुष्ट हो गया हो, उसको कभी कोई रोग नहीं होता, विरुद्ध अन्न भी पच जाता है, शिथिलता नहीं आती। अकस्मात् वृद्धावस्था नहीं आती।
व्यायाम बसन्त ऋतु में तथा शीतकाल में विशेष हितकारी है। खाँसी, श्वास, क्षय, रक्त तथा पित्त रोगी, दुर्बल, क्षती भोजन करने के पश्चात् कभी कसरत नहीं करनी चाहिए। बहुत कसरत करने से खाँसी, श्वास, ज्वर, वमन, श्रम, रक्तपित्तादि उत्पन्न होते हैं-इसलिए साधारण ही व्यायाम करना चाहिए।
मालिश के लाभ -
सम्पूर्ण अंगों में नित्य तेल का लगाना पुष्ट कारक है, किन्तु विशेष करके सिर में, बालों में और पाँवों में तेल की मालिश करें। सरसों का तेल, अग्नि के संयोग से अगरु आदि सुगंधित पदार्थों का निकाला हुआ तेल, चंपा, चमेली, बेल, जुही, मोतिया आदि पुष्पों से सुवाँछित किया हुआ तेल सर्वथा हितकारी है।
सिर में मला हुआ तेल सम्पूर्ण इन्द्रियों को तृप्त करता है, दृष्टि को बल देता है और सिर तथा त्वचा के रोगों को दूर करता है। सिर में कोमलता आती है, आयु की वृद्धि होती है, देह पुष्ट होती है। केशों में तेल लगाने से बाल बढ़ते हैं, लम्बे, नर्म, दृढ़ और काले हो जाते हैं तथा सिर में भरे रहते हैं।
नित्य कान में तेल डालने से कान में रोग तथा मैल नहीं होते तथा गर्दन और हनुग्रहरोग, ऊँचा सुनना तथा बहरापन भी नहीं होता। कानों में रस आदि पदार्थ डालने हों तो भोजन के पूर्व डालें और तेल आदि सूर्य अस्त होने पर डालें। पाँवों में तेल मलना पाँवों की स्थिरता करता है, निद्रा और दृष्टि को प्रसन्न रखता है। कसरत का अभ्यास करने से अमयुक्त और पाँवों में तेल की मालिश करने वाले मनुष्यों के पास रोग नहीं आते, जैसे गरुड़ के समीप सर्प नहीं आते।
स्नान के समय तेल का प्रयोग -
स्नान के समय तेल का उपयोग किया हुआ रोमकूप, शिराओं के समूह और धमनियों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर को तृप्त करता है और अत्यन्त बलदायक है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को जल से सींचने से पत्रादिक की वृद्धि होती है, उसी प्रकार मनुष्यों के शरीर को तेल के द्वारा मलने से धातुओं की वृद्धि होती है। नवीन ज्वर वाला, अजीर्ण युक्त, जिसने जुलाब लिया हो, वमन करने वाला-इन्हें तेल की मालिश वर्जित है।
उबटन से लाभ -
मैल को दूर करने के लिए शरीर में उबटन मलने से कफ और मेदा नष्ट होता है, वीर्य की वृद्धि तथा बल की प्राप्ति होती है। रुधिर यथावत् चलता है और त्वचा स्वच्छ तथा कोमल होती है। मुख पर उबटन मलने से नेत्र दृढ़ होते हैं, कपोल पुष्ट होते हैं, मुँहासे और झाँई नहीं होती, हुई हों तो नष्ट हो जाती हैं और मुख कमल के समान शोभायमान हो जाता है।
स्नान एक आनन्ददायक अनुभव -
स्नान करना अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, शक्ति, आयु और ओज को बढ़ाने वाला, उत्साह तथा बल को देने वाला और खुजली, मैल परिथम पसीना, आलस्य, तृषा, दाह तथा पाप इनको दूर करता है। शीतल जल आदि से सींचने से शरीर के बाहर की गर्मी मीडित होकर भीतर आती है। इससे स्नान करते ही भूख लगती है।
शीतल स्नान करने से रक्त पित्त दूर होता है। उष्ण जल से स्नान करने से बल बढ़ता है, वात पित्त, कफ का नाश होता है। सिर से अत्यन्त गर्म जल से स्नान करना सदा आँखों के लिए बुरा है। जो व्यक्ति शरीर में आँवले मलकर स्नान करते हैं, वे सौ वर्ष पर्यन्त जीते हैं। ज्वर, अतिसार, नेत्र, कान के दर्द वाला, वात रोगी, जिसका पेट में अफारा हो, पीनस रोग युक्त, अजीर्ण वाला-इन सबको स्नान नहीं करना चाहिए। भोजन के पश्चात् भी स्नान करना ठीक नहीं है। स्नान करने के बाद वस्त्र से अंग को खूब रगड़कर पोंछना चाहिए। इससे काँति बढ़ती है, खुजली और त्वचा के दोष दूर होते हैं।
भिन्न-2 वस्त्र तथा उनके गुण−दोष -
रेशमी कपड़े खास तौर पर पीताम्बर और टसर, ऊनी वस्त्र तथा लाल रंग के कपड़े वात, पित्त और कफ को दूर करने वाले हैं- इसलिए जाड़ों में ये वस्त्र पहनिये। जोगिया रंग के कपड़ों से चित्त पवित्र और शीतल होता है, पित्त दूर होता है। इसलिए गर्मियों में उन्हें धारण करना चाहिए। सफेद कपड़े शुभदायक, शीत और धूप निवारक हैं। जो गर्म हैं न शीतल हैं- ऐसे वस्त्र वर्षाकाल में धारण करें। निर्मल और नवीन वस्त्र कीर्ति देने वाले हैं, काम को प्रदीप्त करते हैं, आयु को बढ़ाते हैं, शोभायुक्त करते हैं, आनन्द आता है, त्वचा को हितकारी हैं, वशीकरण तथा रुचि उत्पन्न करने वाले हैं। श्रेष्ठ पुरुष कभी मैले वस्त्र न पहनें, क्योंकि मैले वस्त्रों से शरीर में खुजली होती है, जूऐं इत्यादि जीव उत्पन्न हो जाते हैं और ग्लानि, अशोभा तथा दरिद्रता प्राप्त होती है।
भोजन के सम्बन्ध में शास्त्रीय विधि -
भोजन का समय हो तो माँगलिक पदार्थों का दर्शन करें। संसार में ब्राह्मण, गौ, अग्नि, पुष्पों की माला, घृत, सूर्य, जल और राजा ये आठ माँगलिक हैं। इनका दर्शन करने से नित्य आयु और धर्म की वृद्धि होती है। भोजन से पहले अथवा बाद में खड़ाऊँ धारण करे क्योंकि इनसे पाँवों के रोग दूर होते हैं, शक्ति प्राप्त होती है, नेत्रों के लिए हितकारी हैं और आयु को बढ़ाने वाले हैं।
जो मनुष्य भूख लगने पर नहीं खाते, उनके शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है। शरीर की अग्नि खाये हुए आहार को पचाती है। आहार न मिलने से घात, पित्त, तथा कफ को पकाता है। दोषों का क्षय होने पर धातुओं को पचाती है और धातुओं का क्षय होने पर प्राणों को पचाती है अर्थात् प्राणों का नाश करती है।
आहार से तत्काल देह का पोषण होता है, बल की वृद्धि तथा स्मृति, आयु, शक्ति, वर्ण, उत्साह, धैर्य तथा शोभा की वृद्धि होती है। संध्या और प्रातःकाल-इन दोनों समय भोजन करने की शास्त्र में आज्ञा है। भूख लगे तभी भोजन का समय है ऐसा जानना चाहिए।
भोजन करने से पहले नमक और अदरक खाना हितकारी है। यह अग्नि को दीप्त कर रुचिकारक और जीभ व कंठ को शुद्ध करने वाला है। सेंधा नमक स्वादिष्ट, पाचक, हल्का, स्निग्ध, रुचिकारक, वीर्यवर्द्धक, सूक्ष्म, नेत्रों के लिए हितकारी और त्रिदोष नाशक है।
एकाग्रचित्त होकर पहले मधुर रस, बीच में खट्टा तथा खारीरस और अन्त में तीक्ष्ण, कड़ुवा तथा कसैला रस खाना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति पहले अनार खायें परन्तु उसमें केला और ककड़ी का त्याग करें। कँवल की ताल, भसीड़ा, शालूक, कन्द और ईख आदि को पहले ही खायें, भोजन करने के बाद पिष्टमय पदार्थ, चावल, चिल्ले आदि न खायें, आवश्यकता से अधिक भी न खा जायें।
पहले भी घी से पूर्ण कठिन पदार्थ खायें। फिर कोमल पदार्थ खायें अन्त में द्रव्य रूप पतले पदार्थ खायें।
भोजन में जल कितना पिएँ?
पेट के दो भागों को अन्न से भरें, तीसरा भाग जल से और चौथा भाग वायु के चलने फिरने के लिए खाली रहने देवें। अन्न के रस से प्रथम जीभ तृप्त होने पर दूसरे पदार्थ के स्वाद को नहीं जानती। इसलिए बीच-2 में थोड़ा सा जल पीकर जीभ को साफ कर लें। स्मरण रक्खें, अधिक जल पीने से अन्न जल्दी नहीं पचता और बिल्कुल जल न पीने से भी यही दोष होता है।
अतः बारम्बार थोड़ा-2 जल पीना चाहिए। भोजन करने से पहले जल पियें तो अग्नि मंद हो जाती है, मध्य में पीने से अग्नि दीप्त होती है और अन्त में पानी पीने से शरीर मोटा होता है।
भोजन के पश्चात् दूध क्यों पियें?
शिष्ट पुरुष भोजन के अन्त में दूध पीते हैं। दूध स्वादु, रसाँवित, स्निग्ध, सामर्थ्यवान्, धातुवर्धक, वायु तथा पित्तहारी, वीर्य-वर्द्धक, कफकारी भारी और शीतल है। हम नित्य प्रति दाहकारक जो-जो अन्न खाते हैं, उनकी दाह शान्त करने के लिए दूध पीना जरूरी है। ब्रह्म-पुराण में कहा गया है-”जिसके अन्त में दूध पीने को मिले, ऐसा भोजन करें और जिसके अन्त में दही खाया जाय, ऐसा भोजन न करें। दूध आदि मधुर भोजन खट्टे, खारी और चरपरे भोजन से उत्पन्न हुए पित्त की वृद्धि को दूर करता है। भोजन के बाद नमकीन पदार्थ खाकर कुल्ला करें, दाँतों से भोजन के टुकड़े निकाल डालो। आचमन के पश्चात् दोनों भीगे हाथों से आँखों का स्पर्श करें। भोजन के पश्चात् नित्य सुख प्राप्त होने के लिए अगस्त्य आदि का स्मरण करें। भोजन के बाद सोना न चाहिए।
भोजन के पश्चात् का कार्यक्रम -
भोजन करने के बाद धीरे-2 सौ कदम चलना चाहिए, इससे भोजन किया हुआ अन्न उदर में शिथिल होता है और गर्दन, घुटने तथा कमर को सुख होता है। भोजन करके बैठ जाने से शरीर में आलस्य और तन्द्रा उत्पन्न होती है, थोड़ी देर पश्चात् विश्राम करने से शरीर पुष्ट होता है, आयु बढ़ती है। खाट त्रिदोष नाशक है, पृथ्वी पर सोना पुष्टिकारक है। भोजन के पश्चात् भी मन को प्रिय लगें ऐसे शब्द गाना बजाना, सुन्दर वस्तु को छूना, रूप, रस, गंध का सेवन करें क्योंकि इनका सेवन करने से अन्न भली भाँति ठहर जाता है।
पगड़ी और जूते से लाभ -
पगड़ी धारण करने से क्रान्ति बढ़ती है, केशों को हितकारी तथा धूल, वात, तथा कफ को दूर करने वाला है। पगड़ी हल्की उत्तम है। पाँवों में जूतियाँ पहनना नेत्रों को सुखकारक, आयु बढ़ाने वाला, पाँवों के रोगों का नाशक, उत्साह और शक्ति देने वाला है।
धूप सेवन से लाभ -
सूर्य की किरणों का सेवन करने से पसीना मूर्च्छा, रक्तपित्त, तृषा, ग्लानि, परिश्रम तथा दाह और विवर्णता की उत्पत्ति होती है।
दिन कैसे व्यतीत करें?
यह विषय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। दिन में श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ मित्रता करनी चाहिए, नीच का संग छोड़ देना चाहिए। देव, ब्राह्मण, वृद्ध, वैद्य राजा तथा अतिथि की सेवा करनी चाहिए। याचक को निराश खाली न जाने दें। गुरु लोगों के पास सदा नम्रता पूर्वक बैठें। अपकार करने वाले के साथ भी उपकार करने में तत्पर रहे।
मनुष्यों के अभिप्राय को जानकर जो मनुष्य जिस प्रकार से प्रसन्न हो, उसी प्रकार बर्ताव करे क्योंकि अन्य मनुष्यों को प्रसन्न रखना ही चतुरता है।
जिस प्रकार सहाय बिना मनुष्य सुखी नहीं होता, उसी प्रकार सबके ऊपर विश्वास करने वाला अथवा सबके ऊपर सन्देह करने वाला भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता।
कभी उद्यम से खाली नहीं बैठना चाहिए। किसी के सफलीभूत उद्यम पर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। जो पुरुष ऐश्वर्यवान् के ऐश्वर्य को देख कर दुःख मानते हैं, वे सदैव दुःखी रहते हैं। विद्वानों को विचारना चाहिए कि अमुक पुरुष को किस प्रकार धन मिला उसी विद्या से उसी उपाय से हम भी धन उपार्जन करके संसार में अपने यश का प्रकाश करें।
किसी समय भी किसी के जा मिन न बने, किसी के वृथा साक्षी न हों, किसी की धरोहर न रक्खें और जहाँ जुआ होता हो, उसको दूर से ही त्याग दें।
इस प्रकार सदा सदाचार में तत्पर रहकर दिन व्यतीत करें और रात्रि को रात्रि के समयानुकूल कार्य करें। उक्त नियमों के अनुसार कार्य करने वाले को आयु आरोग्यता, प्रीति, धर्म और यश की प्राप्ति होती है।
संध्या में यह कार्य न करें?
विद्वान लोगों को संध्याकाल में आहार, मैथुन, निद्रा, अध्ययन और मार्ग चलना-ये पाँच कार्य नहीं करने चाहिये। सायंकाल में भोजन करने से व्याधि उत्पन्न होती है, मैथुन करने से गर्भ में विकार आता है पढ़ने से आयु का नाश होता है और मार्ग चलने से भय उत्पन्न होता है।
रात्रि में समय पर सोना -
रात्रि में समय पर सोने से धातुओं में समता आती है, आलस्य दूर होता है और पुष्टि की प्राप्ति होती है, रंग निखर आता है, उत्साह बढ़ता है, जठराग्नि प्रदीप्त होती है। जो मनुष्य शयन के समय बिनौरे के पत्तों का चूर्ण शहद में मिला कर चाटे तो वह तन्द्रा उत्पन्न करने वाला, वायु के वेग के निरोध से सुख पूर्वक शयन कर सकता है।
रात्रि के अन्त में पानी का नियम -
जो मनुष्य सूर्योदय के समय आठ अंगुलि बासी पानी पीने का नियम करता है वह रोग और जरा से छूट कर सौ वर्ष जीवित रहता है। जब रात्रि का चौथा प्रहर आरम्भ हो तो इस जल को पीने का समय जानना चाहिए। इस अभ्यास से बवासीर, सूजन, संग्रहणी, ज्वर, जठर, जरा, कोढ़, पेट के विकार, मूत्रधात, रक्तपित्त, कर्ण रोग, गल रोग, कमर का दर्द, नेत्र रोग नष्ट हो जाते हैं। प्रातःकाल उठकर नित्य नाक से पानी पीने से बुद्धि पूर्ण होती है, नेत्रों की दृष्टि गरुड़ के समान होती है। सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं।
ब्रह्म वस्तु (वीर्य) जब हमारे पास है, तभी तो आनन्द प्राप्त होता है, नहीं तो रमणी के देह में तो कुछ भी नहीं है। जो चीज देह से निकलते समय क्षण काल के लिये इतना आनन्द दे जाती है यदि उसका देह में रखा जाय तो कितने आनन्द की प्राप्ति हो सकती है।
प्राकृतिक चिकित्सा तथा अन्य चिकित्सा पद्धतियों में यथेष्ट अन्तर है। साधारण चिकित्सक रोगी को दवाई देकर ठीक करने का प्रयत्न करता है, अनेक दवाइयों, इंजेक्शन इत्यादि का प्रयोग कराता है, और बाह्य उपचारों का आश्रय लेता है। रोग के कारण रोगी में जो बाह्य लक्षण दिखाई देते हैं, उन्हें दूर करता है और उन लक्षणों के विलुप्त होने पर डॉक्टर का कार्य समाप्त हो जाता है। डॉक्टर रोगी के संबंध में कोई दिलचस्पी नहीं लेता। इसे चिकित्सा से कुछ दिन के लिए रोग दब जाता है, नष्ट नहीं होता। जिन कारणों से रोग उत्पन्न हुआ था, वे चिकित्सा के उपरान्त भी मौजूद रहते हैं और समय पाकर पुनः उभर आते हैं। स्थायी लाभ नहीं हो पाता।
जीवन की एक पद्धति -
कुदरती इलाज में ऐसी बात नहीं है। यहाँ केमिस्ट की बड़ी दुकान की भाँति इंजेक्शन और रंग-बिरंगी दवाइयाँ नहीं होती, चूरन चटनी, जड़ी बूटी इत्यादि रोगी को नहीं दी जाती। प्राकृतिक चिकित्सक के पास साधारण चीजें होती हैं, वह इन्हीं के प्रयोग से रोग दूर करता है। किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने रोगी को जीवन व्यतीत करने का एक ऐसा सरल, स्वाभाविक, शास्त्रीय मार्ग सिखाता है, जिससे वह घर में या प्रकृति के साहचर्य में रहकर ऐसा जीवन दिलाता है कि भविष्य में कभी बीमार ही नहीं पड़ता। स्वास्थ्य के नियमों का पालन कराने में वह अधिक दिलचस्पी लेता है। जहाँ साधारणतः डॉक्टर लोग अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझते हैं वहाँ कुदरती इलाज के डॉक्टर की दिलचस्पी प्रारंभ होती है।
एक बार प्राकृतिक चिकित्सक के द्वारा चंगा होने पर रोगी के जीवन का नया पृष्ठ खुलता है। वह उस पद्धति को ग्रहण करता है जिसमें रोग और व्याधि के लिए कोई स्थान नहीं। जहाँ जीवन अपने सधे सधाये मार्ग पर बँधा चला जाता है। उसे कृत्रिम और दिखावटी बातों की परवाह नहीं रहतीं। प्राकृतिक चिकित्सा मानव जीवन की सही दिशा संकेत करती है। यह वह शिक्षण पद्धति है जो हमें दीर्घ और आनन्दमय जीवन का वास्तविक रहस्य समझाती है। “कुदरती इलाज जीवन की एक पद्धति है, रोग मिटाने के इलाजों का तरीका ही नहीं।”
कुदरती इलाज के मूल तत्व-पंच महाभूत
शरीर का निर्माण पृथ्वी, जल, आकाश, तेज और वायु नाम के पाँच तत्वों से हुआ है, जो पंचमहाभूत कहलाते हैं। इनमें सबसे आवश्यक तत्व वायु है। उसके बिना एक क्षण अस्तित्व नहीं। वायु जीवन है। तेज तत्व शरीर को शक्ति पहुँचाता है, जल से रक्त संचालन का कार्य ठीक प्रकार चलता है।
वायु का उपयोग -
प्राकृतिक जीवन के अनुयायी को हवा का अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए। वैसे हवा तो सभी लेते हैं, किन्तु ईश्वर का प्रसाद तो स्वच्छ ताजी वायु में प्रकट होता है। घर की चहारदीवारों या गन्दी नालियों और कूड़े करकट से भरे मुहल्लों, बाजारों या कारखानों में स्वच्छ हवा मिलना कठिन है। अतः हमें चाहिए कि प्रातःकाल किसी उद्यान, जंगल या शहर से दूर टहलने जायं, और ताजी हवा से फेफड़ों को खूब भर लें। प्रातः साँय स्वच्छ हवा में दीर्घ श्वासोच्छ्वास की कसरतें करने से फेफड़े सशक्त बनते हैं। अधिक वायु लेने से रक्त साफ होता है, त्वचा का रंग निखर आता है, मुँह पर जीवन प्रकट हो जाता है। आपके मकान, खिड़कियों और रोशनदानों से युक्त हों। सोते समय कमरे में यथेष्ट वायु आये। बिस्तर पर पड़ कर आप कपड़ों से मुँह न ढ़क लें। दूसरी बुरी आदत मुँह से श्वास लेने की है। नथुनों की राह श्वास लेने से वायु को स्वच्छ होने का अवसर मिलता है और उसे जितना गर्म या ठंडा होना चाहिए वह वैसी हो जाती है।
वायु के संपर्क में अधिक से अधिक रहने की आदत डालिये। अपना अधिक समय उद्यान, सरिता तट, खुले स्थानों, सैर सपाटे, जंगलों, प्रकृति के अंचल में रह कर व्यतीत कीजिए। वायु का जितना अधिक उपयोग कर सकें कीजिये। हवा लग जायगी और हम बीमार हो जायेंगे-यह निरा भ्रम ही है। शुद्ध, स्वच्छ और ताजी वायु तो प्राणदाता है। उसको अपने अन्दर कार्य करने दीजिए।
पृथ्वी की आश्चर्यजनक शक्ति -
प्रकृति की इच्छानुसार मनुष्य को पृथ्वी के साथ निकट सम्बन्ध रखना चाहिए। कमरे के फर्श, पत्थरों या हरी घास पर नंगे पाँवों चलने से शक्ति प्राप्त होती है। जमीन पर सोने से जो सुख शान्ति मिलती है, वृक्षों तथा घर की शय्या पर वैसी दुर्लभ है। रात्रि में पृथ्वी पर सोने से निद्रा और शरीर में शान्ति होने के कारण पृथ्वी का बलदायक प्रभाव सूर्य स्नान या नंगे बदन सोने की अपेक्षा अधिक चमत्कारिक होता है।
दैनिक जीवन में पृथ्वी के साथ आप निकट सम्बन्ध निम्न रीतियों से कर सकते हैं। (1) नंगे पाँव चलकर पृथ्वी तल से सीधा स्पर्श होता है। जर्मनी में तो इस प्रकार का एक आन्दोलन तक प्रारंभ किया गया था कि नंगा (Nudity) रहना स्वाभाविक और आरोग्यप्रद है। नंगे पाँवों चलने वाला पाँवों को दृढ़ करता है और पृथ्वी से प्राण शक्ति खींचता है। नंगे पाँवों चलने से रुधिरा भिसरण बराबर होकर पैरों का आकार सुन्दर और सुदृढ़ होता है। (2)कई रोगों में पृथ्वी पर सोने से चमत्कारपूर्ण लाभ होता है। सोने के लिए ऐसी भूमि पसन्द करनी चाहिए, जहाँ घास कम उगी हुई हो। स्वाभाविक जीवन प्रारंभ करने वालों को कुछ दिन हवादार पर्णकुटी में सोना चाहिए। आनन्दी और फुर्तीला रहने के लिए यथासंभव प्रकृति का अनुसरण करना चाहिए। प्रकृति के पशु कम किन्तु गहरी निद्रा लेते हैं। हमें भी यथ-शक्य आराम के लिए, नवजीवन संचार के लिए विश्राम करना चाहिए। थोड़ी और आवश्यक नींद लेने से दृढ़ता, दीर्घायु एवं नवजीवन आता है, अधिक से आलस्य बढ़ता है, आयु और समय का नाश होता है। कृत्रिम शिथिलता अधिक निद्रा का परिणाम है। पृथ्वी का कोई जानवर मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करता। मनुष्य ही इन मादक पदार्थों का विष सेवन करता है। और प्रकृति के द्वारा सजा पाता है। पृथ्वी पर अधिक से अधिक बैठिये, सोइये, चलिये, विश्राम कीजिये। पृथ्वी की आर्द्रता या सर्दी से न डर कर घूमने फिरने या यात्रा के समय जमीन पर बैठकर या सोकर आराम करने का अभ्यास करना चाहिये। उत्तेजित मस्तिष्क वाले, हिस्टीरिया आदि वातग्रस्त मनुष्यों को शान्तिपूर्वक पृथ्वी पर बैठने और सोने से बहुत आराम मिलता है।
रात्रि के समय प्रकृति में एक नया जीवन प्रवाह निकला करता है। उस समय जंगल में घूमने से बड़ा लाभ पहुँचता है। रात्रि के समय पृथ्वी की शक्ति अति प्रबल हो जाती है।
आकाश तत्व -
कई वैज्ञानिकों ने जमीन पर स्वच्छ बालू को 5 इंच स्तर के रूप में बिछाकर उसे बिस्तर के रूप में प्रयोग किया। उन्हें अत्यन्त लाभ हुआ। ऐसे बिछौने पर खुले आकाश के नीचे सोना श्रेयस्कर है क्योंकि आकाश में अद्भुत जीवन है। आकाश तत्व को ग्रहण करने के लिए खुले मैदान में अधिक से अधिक समय व्यतीत करना चाहिए। पृथ्वी की शक्ति के साथ उसका भी संयोग हो जाने से नवजीवन प्राप्त होता है।
जल तत्व -
ईश्वर प्रदत्त सर्वोत्तम पेय पदार्थ स्वच्छ निर्मल, शीतल (बिना स्वाद का)जल है। अंग्रेजी में इसे god's water अर्थात् ईश्वर का जल कहते हैं। उसी को पीकर प्रकृति के सब प्राणी जीवन धारण करते हैं। हमें बनावटी द्रव्यों का पान छोड़ देना चाहियें। चाय, शराब, इत्यादि का प्रयोग तो साक्षात विष खाना है।
प्राणियों का जीवन धारण जल पर भी निर्भर है। वायु के पश्चात् यही प्रमुख तत्व है। जल प्राणियों का प्राण है। सम्पूर्ण संसार ही जलमय है। जल सर्व प्रधान औषधि है। इसके सेवन से जीवन सुन्दर बनता है और शरीर के लिए एक सर्वांग पूर्ण शक्ति है। यह रक्त, स्नायु, मांसपेशी तथा प्रत्येक कोष को सतेज और सशक्त करता है। शरीर की समस्त प्रणाली जैसे-भोजन, श्वास, रक्त संचालन के लिए अनिवार्य है। यह मन को शाँति, स्फूर्ति और प्रफुल्लता प्रदान करता है।
प्रकृति से दोस्ती -
शुद्ध वायु कुछ देर मिले, इससे स्थायी लाभ की आशा नहीं करनी चाहिए। शहरों में रहकर प्रातः साँय आप शरीर शोधन कार्य ही कर सकेंगे। इससे उत्तम तो यह है कि ग्रामों में निवास किया जाय। प्राकृतिक चिकित्सा का उचित स्थान ग्राम ही है। वहाँ कि स्थिति में प्राकृतिक जीवन को खूब अपनाया जा सकता है। ग्राम में शुद्ध वायु पाकर सदा स्वस्थ और शान्तिपूर्वक रहा जा सकता है। जो वातावरण प्राकृतिक चिकित्सक कठिनता से शहर में उपलब्ध कर सकता है, वह स्वस्थ वातावरण ग्राम में आसानी से हो जाता है।
हमें पुनः ग्रामों की और जाना होगा। आधुनिक जीवन की कृत्रिम किन्तु विषैली वस्तुओं अप्राकृतिक चीजों, आदतों, आहार-विहारों को छोड़ना होगा। सिनेमा, थियेटर, देर तक रात भर नाच रंग में मस्त रहना, मादक द्रव्यों, पान सिगरेट, बीड़ी, चाय, कहवा, शराब, कबाब, गोश्त ऐश के जीवन को सदा के लिए छोड़ देना होगा। सब प्रकार की मानसिक उत्तेजनाओं- काम क्रोध, भय, घृणा, कुढ़न से अपने मानसिक संतुलन की रक्षा करनी होगी। ग्रामीण जीवन में प्राप्त होने वाली शाँति, निश्चिंतता, प्रकृति का सामीप्य-वे देवी वस्तुएँ हैं जो हमें वास्तविक आनन्द प्रदान कर सकती हैं। ग्राम में श्रम करते हुए लज्जा न आयेगी और थककर विश्राम करने में जो आनन्द आवेगा, उसका वर्णन कौन कभी कर सकता है? सुविधानुमा हमें अपने शरीर को धूप, हवा, जल, मिटी के संपर्क में रखना पड़ेगा, फल, दूध, तरकारियाँ, छाछ, मक्खन, हमारा भोजन होंगे, हृदय में हमारे शान्ति और मन में उत्साह होगा। यह प्राकृतिक जीवन है जिसकी और हम बढ़ना चाहते हैं।
आयु क्षीण क्यों होती है।
आधुनिक युग में मरने वाले व्यक्तियों की संख्या निरन्तर वृद्धि पर है। कम होते-होते मनुष्य अल्पायु होता जा रहा है। भारत के व्यक्तियों की औसत आयु 30 वर्ष, जापान की 40, रूस 45, फ्राँस की 57, कनाडा 60, अमेरिका 62, नार्वे 63, न्यूजीलैंड की 67 हैं। आज का जीवन इतना अप्राकृतिक हो चला है कि उससे आयु क्षीण होती जा रही है। जीवन तो अक्षय है, उसका उत्तरोत्तर विकास हो सकता है किन्तु हम स्वयं अपनी गलतियों और मूर्खताओं से जीवन रज्जु को काट देते हैं।
अल्पायु का प्रधान कारण है समय से “पूर्व अपनी शक्तियों का अपव्यय करना।” शक्तियाँ यदि उसी अनुपात में बढ़ती रहें, जिस अनुपात में व्यय होती हैं तब तो स्वास्थ्य बना रह सकता है, किन्तु यदि उन्हें फिजूल खर्च किया जाय, तो कब तक जीवन रह सकता है? शक्तियों का अपव्यय हम अनेक विधियों से करते हैं। कैसे खेद का विषय है कि लोग जानते तक नहीं कि वे शक्तियों का अपव्यय कर रहे हैं और वे लगातार मूर्खता भरे अंधकार में अपना सर्वनाश किया करते हैं। जीवन शक्ति का अपव्यय मुख्यतः निम्न प्रकार से होता है-
(1) वीर्यपात की अधिकता- अनियमित विहार से आयु क्षीण होना निश्चय है। वीर्य ही शक्ति है, जीवन धन है। एक बार व्यय हो जाने पर उसे बाजार में खरीदा नहीं जा सकता। सम्पूर्ण शरीर जब पूरी तरह कार्य करता है तब 40 ग्राम आहार से एक बूँद रक्त और 40 बूँद रक्त से एक बूँद वीर्य तैयार होता है। वैज्ञानिकों का मत है कि दो तोला वीर्य के लिए एक सेर रक्त और एक सेर रक्त के लिए एक मन आहार की आवश्यकता है। आज हम जो भोजन करते हैं, उसका वीर्य बनने में पूरा एक महीना लग जाता है। अब विचारिए कि इस बहुमूल्य जीवन तत्व का अपव्यय भला कैसे पूरा हो सकता है? इसी के आधीन मनुष्य की सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ, बल, बुद्धि, आयु रहती है। व्यभिचारी पुरुष क्षणिक सुख के लाभ में आकर वीर्य नाश नाना विधियों से कर डालते हैं। यह एक प्रकार की आत्म हत्या ही समझिए।
(2) नशेबाजी- संसार में जितने मादक द्रव्य हैं, उनका शरीर पर बड़ा घातक प्रभाव पड़ता है। हम चाहते हैं कि कभी-कभी दवाई के रूप में भी इनका उपयोग होता है किन्तु आजकल तो धड़ाधड़ मादक द्रव्यों का प्रचार बढ़ रहा है। मनुष्य बुद्धि शून्य होकर राक्षस बना दीखता है।
शराब को लीजिए। बुरी समझते हुए भी अनेक व्यक्तियों ने इसे अपना लिया है। संसार के डॉक्टर आज इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि शराब का विष, चाय, न्यूमोनिया, विषम ज्वर, हैजा, लू और पेट, जिगर, गुर्दा, हृदय, रक्तवाहनियां, स्नायु विकार तथा मस्तिष्क के कई रोगों का जनक है। शराब का उपयोग साधारण श्रमजीवी उत्तेजना के लिए करते हैं। उन्हें मालूम नहीं कि यह शरीर परमेश्वर का मंदिर है। इसमें परमेश्वर विराजते हैं। प्रकृति ने शरीर ही में ऐसी ऐसी गुप्त शक्तियाँ भरी हैं कि उन्हें शराब जैसी उत्तेजक वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। शराब खोरी विनाश है। श्री बैजनाथ महोदय ने लिखा है “शराब कार्य शक्ति को घटाती है, रोजी छूट जाती है, मनुष्य बाल बच्चों का पोषण नहीं कर पाता, गृह सौक्य का नाश हो जाता है। मानव जाति के सर्वनाश के लिए ही शराब की उत्पत्ति हुई है और व्यभिचार में गाढ़ी मित्रता है। जहाँ-जहाँ शराब है, वहाँ-वहाँ व्यभिचार भी जरूर होता है। शराब पीते ही नीति अनीति की भावना तथा आत्म संयम धूल में मिल जाता है और स्त्री पुरुष ऐसी-ऐसी कुचेष्टाएँ करने लगते हैं जो अच्छी हालत में वे स्वप्न में भी न करते।”
अफीम और तम्बाकू बदन के रक्त को सुखा डालते हैं, मंदाग्नि उत्पन्न करते हैं। अफीम से बालक तक निःसत्व हो जाते हैं। श्रीयुक्त पैहम लिखते हैं नियमित रूप से अफीम का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को नीचे लिखी बीमारियाँ हो जाती हैं- कब्ज, रक्त की कमी, मंदाग्नि, हृदय, फेफड़े और गुर्दों के रोग, स्नायुजन्य कमजोरी, फुर्तीलेपन का अभाव, आलस्य, निद्रालुता, चित्त भ्रम, नैतिक भावना की कमी, काम का भार आ पड़ने पर चीं बोल देना, नैतिक अविश्वास और अंत में मृत्यु।
तम्बाकू भी कम शैतान नहीं है। महात्मा गाँधी ने लिखा है- “मैं सदा इस टेव को जंगली, हानिकारक और गंदी मानता आया हूँ। अब तक मैं यह न समझ पाया कि सिगरेट पीने का इतना जबरदस्त शौक दुनिया को क्यों है?” तम्बाकू से क्षय होना अवश्यम्भावी है। क्षय फेफड़ों का रोग है। दूषित वायु जब पुनः-पुनः अन्दर जायेगी तो निश्चय ही यह रोग हो जायेगा। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, उदर रोग, नेत्र, नपुँसकता, पागलपन इत्यादि रोग भी तम्बाकू के सेवन से उत्पन्न होते हैं। डॉ. रगलेस्टर के अनुसार “तम्बाकू से पाचन-यंत्रों की शुद्ध रक्त उत्पन्न करने की शक्ति कम होकर सब प्रकार के अजीर्ण, सम्बन्धी रोग उत्पन्न हो जाते हैं।” पंडित ठाकेरदत्त शर्मा के अनुसार अजीर्ण, कास, फेफड़ों के तमाम रोग, त्वचा रोग, निद्रानाश, दुःस्वप्न, चक्कर, नेत्ररोग, हृदय और मस्तिष्क की निर्बलता और उन्माद तम्बाकू से होने वाले सामान्य रोग हैं।
भाँग, गाँजा, चरस- ये सब प्रत्यक्ष विष हैं। चाय और काफी में कैफीन, टैफीन, टैनिन इत्यादि विष मिले हुए होते हैं। चाय में थीन नामक जहर होता है। चाय और काफी पीने से दाँतों की जड़े कमजोर हो जाती हैं। स्नायुओं को क्षणिक उत्तेजना तो मिलती है, किन्तु शक्ति या रक्त नहीं बढ़ने पाता।
स्मरण रखिये, मादक पदार्थ विषैले हैं। आपकी आयु, बल, बुद्धि, उत्साह और नैतिकता का ह्रास करने वाले हैं। इनका पान जहर का पान है। खतरों से भरा है, आत्महत्या के बराबर है। आप जानते बूझते क्यों विषपान कर रहे हैं?
(3) व्यभिचार- यह पाप वह भयंकर राक्षस है जो देखते-2 मनुष्य के पतन का कारण बनता है। आज का बहुत सा साहित्य हमारी भोली जनता को मृत्यु के मुँह में धकेल रहा है। व्यभिचार वह सामाजिक बुराई है, जो प्रत्येक राष्ट्र के लिए हानिकारक है। स्त्री पुरुषों के जीवन सत्व को नष्ट करने के अनेक नए तरीके निकाल लिए हैं, जिन्हें कहना और चर्चा करना भी पाप है। स्मरण रखिये, आप व्यभिचार कर जगत की आँखों से बच सकते हैं किन्तु प्रकृति बड़ी कठोर है। व्यभिचार का दंड उसके दरबार में गर्मी, सूजाक, स्वप्नदोष, नपुँसकता, नामर्दी इत्यादि मूत्र रोगों के रूप में मिलता है। घर का गंदा कामोत्तेजक वातावरण, सिनेमा, दुश्चरित्र व्यक्ति, अश्लील चित्र पुस्तकें इत्यादि से बड़े सावधान रहें। इनमें लिप्त होकर आत्महत्या न कर बैठें।
(4) चटोरापन- कुछ लोग चाट पकौड़ी, तरबतर मिठाइयाँ, बाजारू मसालेदार पकवान, दालसेब इत्यादि आवश्यकता से अधिक खाते हैं। भूख न होने पर भी वे पेट को इन जायकेदार वस्तुओं से भर डालते हैं। आवश्यकता से अधिक केवल स्वाद के लिए खाना अपनी कब्र दाँतों से खोदना है। बड़े शहरों में रहने वाले फैशनेबल व्यक्तियों की चटोरेपन की आदत बड़ी भारी कमजोरी है। अतः अनियमित आहार विहार न कर बैठें। बड़ी सोच समझ कर चलें।
(5) मानसिक दुर्बलताएँ- मृत्यु को पास लाने में मानसिक उद्वेग, क्लेश, दुःख, निराशा, कुढ़न, अहितकर चिंतन इत्यादि विकारों का बड़ा हाथ है। ये शत्रु दीखते नहीं, किन्तु अन्दर ही अन्दर शरीर को जर्जर कर देते हैं।
प्रकृति नहीं चाहती कि हम इन विकारों के वशीभूत होकर जीवन का क्षय कर दें। प्रकृति ने हमें पूर्ण निरोग, आनन्द और प्रसन्नता में रहने वाला प्राणी बनाया है। अनाकाँक्षित विकार सब मानसिक शक्ति के आधीन है। मानसिक शक्ति द्वारा यदि श्रद्धापूर्वक आत्मविश्वास धारण किया जाय तो ये विकार सुगमता पूर्वक दूर किये जा सकते हैं।
प्रकृति बड़ी दयालु एवं चतुर है। वह प्रत्येक मनुष्य को अपनी कमजोरियाँ सुधारने का अवसर प्रदान करती है। जब हम उत्साह, आनन्द, आशा, प्रेम, सत्य की बात सोचते हैं तो हृदय में नवजीवन का संचार होने लगता है, नसों में नया जोश, नवीन उत्साह आता है किन्तु जब हम अवाँछित मनोविकारों में फँसते हैं तो हमारी कार्य शक्तियाँ पंगु हो जाती हैं। यह इसीलिए कि फिक्र क्लेश, दुःख, कुढ़न, क्रोध के विचार अप्राकृतिक हैं। वे मनुष्य के लिए नहीं हैं। उन्हीं में लिप्त रहना प्रकृति से दूर जाना है।
प्रो. जेम्स साहब कहते हैं कि “यदि तुम दिन भर चिंतित अवस्था में बैठे रहोगे और बोलते समय बड़ी दुःखभरी आवाज में बोलोगे तो इसका तुम्हारे शरीर पर बड़ा बुरा प्रभाव होगा। डॉ. जार्ज विलियन कहते हैं कि “चिंता शरीर के अन्दर ऐसे अदृश्य घाव करती है जिसका प्रभाव दिमाग के कुछ जीवकोष्ठों (ष्टद्गद्यद्यह्य) पर पड़ता है। धीरे-धीरे वह असर नसों में फैलता है और बीमारियाँ पास आती हैं। दुर्विचार से ज्ञान तन्तु निर्बल होते हैं। जो मनुष्य अपने दुर्विचार उद्वेगों और विकारों का अनुयायी बनता है, वह मृत्यु को पास बुलाता है।
उपरोक्त सभी बातें- अपव्यय, वीर्यपात, नशेबाजी, पापकर्म, कुढ़न, निराशा, मृत्यु का भय, चटोरापन, अनियमित आहार-विहार आपके भीतरी शत्रु हैं। उन्हें अपनी आदत और स्वभाव में सम्मिलित कर आत्म-हत्या मत कीजिए।
डॉ. लेविस ने लिखा है कि धूप और पाचन की क्रियाओं में बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि मनुष्य या अन्य किसी प्राणी पर प्रतिदिन सूर्य किरणें नहीं पड़तीं, तो उसकी पाचन और समीकरण शक्ति क्षीण हो जाती है। स्फुरण (Solar Radiation) तथा मानव जीवन इन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। जीवन का सम्बन्ध प्रकाश-शक्ति तथा उसके वर्ण-वैभव से है, न कि प्रोटीन, श्वेत सार, हाइड्रोजन, कार्बन अथवा उष्णाँक से।
आकाश और वायु- तत्व की भाँति प्रकाश-तत्व भी अत्यन्त सूक्ष्म है। प्रकृति के हरे भरे प्रशस्त अंचल में हम जो नाना रंगों की चित्रपटी देखते हैं-यह सब सूर्य की सतरंगी किरणों की ही माया है। प्रकाश में अन्तर्निहित रंगीनी केवल नेत्रों को ही सुन्दर प्रतीत नहीं होती प्रत्युत जीवन रंजक भी है। सूर्य की किरणों का प्राणी जगत पर स्थायी प्रभाव पड़ा करता है। सूर्य किरण चिकित्सा का यही मूलाधार है। रंगीन बोतलों में पानी रखने से प्रकाश का प्रभाव भी बदलता रहता है और उसमें भाँति-2 के गुण उत्पन्न हो जाते हैं।
सूर्य की किरणों के रंग -
चर्म चक्षुओं से सूर्य की किरणें श्वेत प्रतीत होती हैं किन्तु वास्तव में ये सात रंगों की बनी हुई हैं। इन सातों रंगों का रासायनिक प्रभाव पृथक-2 होता है। विभिन्न फलों तथा तरकारियों को प्रकाश तथा रंग नाना प्रकार के गुण प्रदान करता है। इन रासायनिक गुणों के अनुसार हम पृथक भाजियों का प्रयोग करते हैं। प्रकृति की तीन रचना में सबका कुछ न कुछ गुप्त प्रयोजन है। वनस्पति जगत में प्रकाश तत्व के कारण ही नाना प्रकार के गुण, रंग, एवं रासायनिक तत्व सामने आते हैं।
रंगीन फल तथा तरकारियों का प्रभाव -
रंगों के आधार पर हम फल तथा तरकारियों को निम्न वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-
1. पीला रंग- इस रंग वाले फलों का प्रभाव पाचन क्रिया पर बड़ा अच्छा पड़ता है, आमाशय और कोष्ठ के स्नायुओं को उत्तेजित करने में इसका विशेष महत्व है। ये फल रेचक व पाचक होते हैं। पेट की खराबियों में ये खासतौर पर काम में लाये जाते हैं। इनमें कागजी नींबू, चकोतरा, मकोय, अनानास, खरबूजा, पपीता, बथुआ, अमरूद। इनमें कार्बन, नाइट्रोजन या खनिज लवण प्रचुर मात्रा में होता है।
2. लाल रंग- इस रंग वाले फलों में लोहा और पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है। नाइट्रोजन और ऑक्सीजन की भी पर्याप्त मात्रा होती है। इस वर्ग में चुकन्दर, लालबेर, टमाटर, पालक, लालशाक, मूली इत्यादि रखें गये हैं।
3. नारंगी रंग- इन फल तथा तरकारियों में चूना और लोहा विशेष रूप से पाया जाता है। इस श्रेणी में नारंगी, आम, गाजर इत्यादि हैं।
4. नीला रंग- इस रंग की श्रेणी में हम गहरा नीला और बैंगनी भी रखते हैं। इन तरकारियों में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, मैग्नीशियम तथा फास्फोरस अधिक होता है। इस श्रेणी में जामुन फालसा, आलू बुखारा, बेल, सेब विशेष रूप से आते हैं।
5. हरे रंग की तरकारियाँ शीतल प्रकृति की होती हैं, गुर्दों को हितकारी, पेट को साफ करने वाली और नेत्र तथा चर्म रोगों में लाभदायक सिद्ध होती है।
मनुष्य के शारीरिक अथवा मानसिक विकास में सूर्य किरणों द्वारा उत्पन्न उपरोक्त सभी रंगों के फल, शाक, भाजियों का संतुलन आवश्यक है। यदि एक ही प्रकार के रंग का भोजन अधिक दिन तक लेते रहे तो वह रंग शरीर में अधिक हो जायेगा और रोग उत्पन्न हो सकता है। अतः यथासंभव सभी रंगों का भोजन काम में लेना चाहिए। व्यक्तिगत रंग-संतुलन स्थापित कर हम सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।
दैनिक जीवन में सूर्य किरणों का उपयोग -
मनुष्य के लिए सूर्य का प्रकाश सर्वश्रेष्ठ एवं अकथनीय गुणकारी है। हमारी आत्मा पर इसका प्रभाव इतना विकासपूर्ण होता है कि प्रायः हम अनुभव किया करते हैं कि अंधेरे में जैसे दम घुट रहा हो। उजाले में रहने से आँतरिक द्वेष दूर होते और हृदय की खिन्नता मिटकर चित्त प्रसन्न होता है। प्रकाश उत्साह, साहस और उत्सुकता का द्योतक है।
सूर्य स्नान- सूर्य में कीटाणुनाशक शक्तियाँ हैं अतः अधिक से अधिक धूप में रहने का अभ्यास करना चाहिए। सूर्य की प्राण पोषक शक्तियों को ग्रहण करने के लिए अमेरिका और इंग्लैण्ड में सूर्य स्नान का रिवाज है। समुद्र तट पर जब लोग सूर्य स्नान के लिए जाते हैं तो केवल जाँघिया के, अन्य पोशाक बिल्कुल उतार देते हैं, सूर्य की तेज किरणों में रेत पर लेट जाते हैं। सूर्य स्नान के एक दृश्य का वर्णन श्रीयुत मन्नारायण अग्रवाल ने इस प्रकार किया है।
“थोड़ा आराम करके हम लोगों ने समुद्र में स्नान करने का विचार किया। अपने-अपने नहाने के कपड़े लेकर पैदल चल दिये। धूप काफी तेज थी और दूर से समुद्र का पानी चमक रहा था। यद्यपि हमारा स्थान ईस्टवोर्न से दूर था, तो भी वहाँ समुद्र स्नान के प्रेमियों की भीड़ थी। सागर की लहरें किनारे के कंकड़ों पर जोर-2 से गिर रही थीं। कुछ दूर पर छोटे-2 जहाज इधर-उधर जा रहे थे। किनारे पर बहुत से स्त्री पुरुष अपनी नहाने की पोशाक पहने सूर्य स्नान कर रहे थे। कोई छाती के बल लेटा था, कोई पीठ के बल। स्त्रियाँ अपने पतले छातों के नीचे पड़ी थीं। पहले पहले यह दृश्य बहुत विचित्र लगा। स्त्री पुरुष जिनकी देह का अधिकाँश भाग खुला था, बिल्कुल पास लेटे थे। लन्दन में तो बिना मोजे पहने निकलना पाप समझा जाता है। घरों में भी ड्रेसिंग गाउन पहनना बहुत जरूरी समझा जाता है लेकिन वे सब बातें धूप-स्नान करते हुए समुद्र के किनारे लागू नहीं। वहाँ तो शरीर का जितना अधिक भाग खुला रहे, उतना ही अच्छा है।”
अनिद्रा में उपयोग -
अनिद्रा में एनीमिया अर्थात् रक्त की कमी में सूर्य का प्रकाश अमृत-तुल्य है। अनिद्रा क्षय तक उत्पन्न कर सकती है। सूर्य-प्रकाश लेने से रुधिर की प्राणपोषक वायु बढ़ जाती है, गति में भी तीव्रता आ जाती है। प्रकाश में श्वास क्रिया गहरी और धीमी हो जाती है। इसके फलस्वरूप रात्रि में अच्छी नींद आती है।
रक्त की कमी (एनीमिया) में रोगी सरदर्द से बड़ा परेशान रहता है। ऐसी दशा में सूर्य किरणें देने से लाभ होता है।
रक्तचाप- सूर्य किरणों का बढ़े हुए रक्त चाप में उपयोग करने से रक्तचाप में कमी आ जाती है। सर्व साधारण के लिए भी यह उपयुक्त है कि वह 10-15 मिनट के लिए अवश्य धूप में बैठे। सूर्य किरण के सेवन से वजन बढ़ जाता है। रक्तचाप की सभी अवस्थाओं में किसी योग्य चिकित्सक के आदेशानुसार ही सूर्य-प्रकाश का सेवन करना चाहिए।
घाव-घावों को चंगा करने में सूर्य का प्रकाश बड़ा आश्चर्यजनक सिद्ध हुआ है क्योंकि रक्त में गति आ जाती है। सूर्य की किरणों से दूषित कीटाणु नष्ट होते हैं। सूर्य किरण शरीर को पार कर जाती हैं और रुधिर में जीवाणुओं की अभिवृद्धि करती हैं। इससे सब प्रकार की कमियाँ नष्ट होकर घाव अच्छा हो जाता है। रोगी को थोड़ी देर तक रोज सर्वांग सूर्य-स्नान लेना चाहिए।
क्षय में सूर्य का चमत्कार- क्षय रोग में सूर्य किरणों से अत्यधिक लाभ होता है। रुधिर में प्राण शक्ति का आविर्भाव होता है। क्षय के रोगी को धूप में 10 से 20 मिनट तक बैठना चाहिये। शरीर पर जितने कम कपड़े रहें उतना अच्छा है। शरीर नंगा रहे तो सर्वोत्तम है। आधुनिक चिकित्सक सूर्य किरण को क्षय के लिये महौषधि मानते हैं। क्षय में सूर्य किरण का उपयोग करते हुए किसी योग्य चिकित्सक का आदेश लेना चाहिये।
साधारण जीवन में-सूर्य-स्नान महान उपयोगी है, प्रकृति की अमूल्य तथा अनुपम देन है। छोटे-छोटे बच्चों का नित्य प्रति कुछ देर के लिए धूप में ही सेवन कराना चाहिये। शीतकाल में उन्हें धूप में ही खेलने देना चाहिये। गोद के शिशुओं को सूर्य किरणों में कुछ देर के लिए लिटाना चाहिए। रोगियों के लिये सूर्य प्रकाश महौषधि है।
सूर्य स्नान से शरीर के रक्त में लोहे की मात्रा 2 प्रतिशत बढ़ जायेगी। इसके लिए आप को लोह-प्रधान पदार्थ या लोह-तत्व बढ़ाने वाले भोजनों की आवश्यकता न पड़ेगी। धूप-स्नान से शरीर में इतना प्रभावोत्पादक गुण उत्पन्न होता है, जो कि औषधि-प्रणाली के लिए सर्वदा अज्ञात ही है, उसकी किसी भी दवा में इतना प्रभावोत्पादक गुण कभी नहीं पाया जाता। त्वचा के नीचे जो तत्व पहले से ही विद्यमान हैं, उसे सूर्य की किरणें तत्काल ही विटामिन डी. में परिणत कर देती हैं। शरीर में चूने की कमी के कारण होने वाले रोगों का इलाज बड़ा सहज हैं। वह है सूर्य-रश्मियों का उपयोग।
असंख्य रोगों की दवाई-दूध
भोजन सम्बन्धी विशेषज्ञों के अनुसार दूध आज तक की सबसे उत्तम वस्तु है। इसके सब प्रयोग-दूध, दही, मक्खन, मट्ठा, रबड़ी, खोया, मलाई-अच्छे हैं। सर्वोत्तम उपयोग इसे धारोष्ण अवस्था में लेना है। दूध से प्राप्त स्वास्थ्य स्थायी होता है। जिस रोगी ने दुग्धकल्प कर लिया है, तो समझ लीजिए उसे वह रोग कदापि न होगा। दुग्ध कल्प से जिन रोगों की चिकित्सा सफलतापूर्वक की जा चुकी है, उनमें से कुछ ये हैं-
स्नायु दौर्बल्य, सिर दर्द, आँतों का शैथिल्य, आमाशय के घाव, मूत्राशय अथवा गर्भ का स्थान च्युत हो जाना, पुराना कब्ज, रक्त का अभाव, अतिसार, आँव, संग्रहणी, श्वास नली के रोग, दमा, धमनियों की धड़कन, गठिया, नपुँसकता, यकृत की खराबी, पथरी, मधुमेह, आरम्भिक यक्ष्मा, दुबलापन, जलोदर, रक्तचाप। सूजाक तथा गर्मी का विष दूर करने के लिए दूध सर्वोत्तम है। स्नायुओं को सशक्त करने के लिए दूध ही मुख्य तत्व है। संग्रहणी में मट्ठा लाभ दायक है। मट्ठे की खटाई के कारण लैक्टिक एसिड वैसिली नामक कृमि नष्ट होकर निरोग हो जाती है।
छोटे बड़े बच्चे बूढ़े-सभी के लिए हर अवस्था में दूध से लाभ होता है। कुछ ही रोग ऐसे हैं, जिनमें दूध नहीं दिया जाता। बच्चों को दुग्ध कल्प से विशेष लाभ होता है। दूध मुनियों, महात्माओं का पवित्र सात्विक एवं पौष्टिक भोजन है। प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत इसका बहुत महत्व है। सभी रोगों में गाय का दूध, विशेषतः काली गाय का दूध गुणकारी माना गया है। तपेदिक के रोगों में बकरी का दूध देना चाहिए। यह हल्का है। भैंस का दूध पौष्टिक तो है किन्तु कुछ देर से पचता है और आलस्य उत्पन्न करता है। दूध के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए हमारी लिखी हुई पुस्तक “दूध की चमत्कारी शक्ति” “अखण्ड-ज्योति” कार्यालय से मँगाकर पढ़िए।
रोगनाशक जल-तत्व -
वेदों में जल की रोगनाशक शक्तियों का अत्यन्त विशद वर्णन है।
आपो इद्धा उ भेषजोरापो अभीव चातनीः।
आपः सर्वस्य भषजोस्तान्तु कृण्वन्तु भेषजम्॥
अर्थात् “जल ही परमौषधि है, जल रोगों का दुश्मन है, यह सभी रोगों का नाश करता है-इसलिए यह तुम्हारे भी सब रोग दूर करे।”
अथर्व वेद में लिखा है-
“आप इद्धा उ भेषजोरापो अभीव चातनीं।
आपः सर्वस्य भेषजो स्तास्ते मुँचन्तु क्षेत्रियात्॥
अर्थात् “जल ही दवा है, जल रोग दूर करता है, जल सब रोगों का संहार करता है। इसलिए यह जल तुम्हें भी कठिन रोगों के पंजे से छुड़ावें।”
भगवान ने आदेश किया है-”जल से सिंचन करो, जल सर्व-प्रधान औषधि है। जल के सेवन से जीवन सुखमय बनता है और शरीर की अग्नि भी आरोग्य वर्द्धक होती है।”
-ऋ. मं0 6 अ. 56 मं. 2
वेदों में एक स्थान पर प्रार्थना की गई है-उसका अभिप्राय इस प्रकार है-
“जल हमको सुख दे, सुखोपभोग के लिए हमें पुष्ट करे, बड़ा और दृढ़ करे। जिस प्रकार माताएँ अपने दुधमुंहे बच्चों को दूध पिलाती हैं, हे जल! उसी प्रकार तुम हमें अपना मंगलकारी रस पान कराओ। तुम हमारे मलों का नाश करो और योग्य संतान प्राप्त करने में सहायक हो। हे परमेश्वर! हम तुमसे अन्नादि पदार्थों के स्वामी मनुष्य मात्र का रक्षक तथा रोग मात्र की औषधि जल माँगते हैं।”
“जल में अमृत है, जल में औषधियाँ हैं। हे ईश्वर! दिव्य गुणों वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो, अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति करावे, हमारे पीने के लिए हो, सम्पूर्ण रोगों का नाश करे तथा रोगों से उत्पन्न होने वाले भय को न पैदा होने दे और हमारे सामने बहे।”
हे परमात्मा! मुझ में जो पाप (भीतर और बाहर) हैं, मैंने जो द्रोह, विश्वासघात किया है या मैंने जो अपशब्द कहे हैं या मैं जो झूठ बोलता हूँ, उन सबको जल बहा ले जाय।”
जल के अमृतोपम गुण -
जल में जो गुण होते हैं, उन्हें भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए। शीतलता, तरलता, हल्कापन एवं स्वच्छता इसके प्राकृतिक गुण हैं। भ्रम, क्रान्ति, मूर्च्छा, पिपासा, तन्द्रा, चमन, निद्रा को दूर करना, शरीर को बल देना, उसे तृप्त करना, हृदय को प्रफुल्लित करना, शरीर के दोषों को दूर करना, छः प्रकार के रसों का प्रधान कारण बनना तथा प्राणियों के लिए अमृत तुल्य सिद्ध होना, कब्ज इत्यादि आन्तरिक मल पदार्थों को निकाल देना, स्नान के द्वारा शरीर को स्वच्छ करना, शरीर के विजातीय तत्वों को निकाल फेंकना, आमाशय, गुर्दों, त्वचा को क्रियाशील बनाना, शरीर में खाद्य पदार्थ का काम देना-जल के कुछ गुण हैं।
मनुष्य के शरीर में 66 प्रतिशत जल-तत्व ही है। खाद्य पदार्थों के पश्चात् हमारा शरीर जल पर ही निर्भर रहता है। केवल जल पीकर हम एक मास तक जीवित रह सकते हैं। हमारे ही शरीरों को नहीं, वनस्पतियों का तो यह जीवन दाता है। जल में रहने वाले जीवों का तो यही जीवनाधार है। पृथ्वी जल-तत्व से उत्पन्न हुई है।
गीता में भगवान ने निर्देश किया है- “रसोऽहमासु कौन्तेय” (7/8 हे अर्जुन! मैं जल में रस रूप से रहता हूँ अर्थात् जल में जीवन चलाने वाला जो रस (प्राण) है, वह मैं हूँ।”
जलोपचार की प्रमुख विधियाँ -
जल में कई और गुण हैं जैसे अनेकरूपता, गर्मी सोख लेने की शक्ति, चीजों को अपने में मिला लेने और रूप परिवर्तन की शक्ति। शरीर के विकारों को धो डालने के लिए तरल रूप में इसका उपयोग किया जाता है। शरीर की गर्मी निकालने एवं गर्मी पहुँचाने में जल का प्रमुख हाथ हैं। इस धोने की शक्ति के कारण अन्य विजातीय पदार्थों के साथ जल मानव शरीर में से यूरिक एसिड और आकजेलिक एसिड जैसे हानिकारक पदार्थों को बाहर निकाल देता है।
दैनिक जीवन में जल का उपयोग -
वायु और धूप की भाँति जल भी हमारे लिए प्रधान तत्व हैं। यह ऑक्सीजन की 75 प्रतिशत खपत बढ़ा देता है और 85 प्रतिशत, हाइड्रोजन की मात्रा को शरीर से निकाल देता है। प्रत्येक रोग में जल का उपयोग अधिक से अधिक मात्रा में होना चाहिए। कम जल पीने वाले प्रायः आमाशय और अंतड़ियों को सुखा डालते हैं, कब्ज हो जाता है, पेट में दर्द बना रहता है। पानी का ठीक उपयोग अनेक रोगों को उत्पन्न नहीं होने देता, ठण्डा पानी शरीर के ताप को कम कर देता है, रक्त चाप घटाता तथा त्वचा के रंध्रों को क्रियाशील बनाता है। स्नायु तथा नाड़ियों को हल्के तौर पर प्रभावित करता है। पोषण शक्ति को प्रभावित करता है। कम पानी पीने से हाजमा बिगड़ता है। अतः हमें चाहिए कि जल के प्रयोग में आलस्य न करें।
रोग निवारण में जल का प्रयोग -
प्रधान विधियाँ तीन हैं- (1) पानी पीकर रोग-निवारण (2) स्नान द्वारा शरीर शुद्धि (3) गीली पानी की पट्टी के प्रयोग।
सर्वप्रथम हम पानी पीने के नियम को लेंगे। पानी कब्ज नाश की सरल औषधि है। कम पानी पीने से पेट का दूषित पदार्थ जम कर सड़ता है, अंतड़ियों में से गुजरते हुए तकलीफ होती है। उसे निकालने में पानी ही प्रधान कार्य करता है।
प्रातःकाल उठते ही थोड़ा सा जल पी लेने से सारे दिन शरीर में तरावट रहती है। उठते ही उषापान कीजिए, फिर थोड़ा सा टहलिये और शौचादि से निवृत्त कीजिए। कब्ज जड़ से चला जायेगा। अपच में भोजन के डेढ़ घंटे पश्चात् गर्म पानी पीने से अग्नि प्रदीप्त होती है और उदर शूल दूर हो जाता है। लोग सर्दी में गर्म चाय पीते हैं। वास्तव में उन्हें यदि कुछ लाभ होता है तो वह गर्म जल के ही कारण। शरीर की गंदगी और विष को निकालने में गर्म पानी का भी उपयोग होता है। पेशाब आने से अवयव खुल जाते हैं और तरावट रहती है। गले की जलन तथा अति भोजन के कारण पेट में जो जलन हो उसे दूर करने के लिए कुछ-कुछ समय पश्चात् एक-एक चम्मच ठंडा जल पीना चाहिए। प्रातःकाल एक गिलास जल में कुछ नींबू की बूँदें डालकर पीने से पेट ठीक रहता है। चेहरे का रंग लाल रखने के लिए, स्फूर्तिदायक एवं तरोताजा दीखने के लिए कम से कम तीन सेर जल दिन में अवश्य पीना चाहिये। रुधिर की तरलता जल से ही कायम रह सकती है।
प्रमेह, वीर्यपात, मूत्र नली की जलन, सफाई इत्यादि यथेष्ट जल के प्रयोग से दूर हो जाते हैं। अत्यधिक परिश्रम के करण गहरे लाल रंग का जो बदबूदार पेशाब उतरता है, वह जल की कमी का द्योतक है। जल का अधिकाँश भाग तो पसीने आदि के रूप में बाहर हो जाता है। बचा हुआ थोड़ा सा भाग ही गुर्दों को धो पाता है। अतः यदि परिश्रम करते समय थोड़ा जल घंटे डेढ़ घंटे के बाद पीने का क्रम रखें तो तरोताजगी बनी रह सकती है। बहुत से व्यक्तियों को अजीर्ण अथवा नजला प्रायः आवश्यकता से कम मात्रा में जल पीने के कारण होता है।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध लेखक मैडफैडन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि यदि प्यास लगी हो, तो गुनगुना अर्थात् थोड़ा गर्म पानी पीना उत्तम है। यदि संभव हो और आदत पड़ सके तो जल भोजन के आधे घंटे पश्चात् ही पीवें। यदि पाचन शक्ति क्षीण हो या अग्निमाँद्य हो, तो उस समय भी गर्म जल का प्रयोग करना उत्तम रहेगा। इनसे पाचन शक्ति प्रदीप्त होगी।
फादर नीय के जल विषयक विचार -
प्राकृतिक चिकित्सा में फादर नीय के विचार बड़े बहुमूल्य हैं उन्होंने जल चिकित्सा द्वारा स्वयं जनजीवन प्राप्त किया और दूसरों को मरने से बचाया। फादर नीय जल के अपने प्रत्येक प्रयोग के साथ शरीर के अंग-प्रत्यंग और त्वचा, को कठोर बनाने के लिए कुछ बहुत सीधे निरापद उपाय बताते थे। उनमें कुछ उपाय ये हैं। पाठकों को चाहिए कि दैनिक जीवन में इनका उपयोग करने लगें-
(1) नंगे पाव टहलना- इससे टाँगे और पाँव की उंगलियां कठोर तथा सहनशील बनती हैं।
(2) भीगी घास पर नंगे पाँव चलना- मौली घास के स्पर्श से आप प्राण शक्ति खींच सकेंगे। ओंस की भीगी घास श्रेष्ठतम है।
(3) गीले पत्थरों पर टहलना- जल तथा पत्थर के स्पर्श से शरीर कठोर तथा सहनशील बनेगा। पैरों में रक्त की गति बढ़ जायेगी, ताजी हवा, प्रकाश और जल से नई जान आयेगी।
(4) तुरन्त की गिरी हुई बर्फ पर टहलना तेजी से बर्फ पर चलने से सारा रक्त पाँवों में खिंच आयेगा। पैर में वेबाई फटने और दाँत में दर्द होने पर यह अच्छा इलाज है।
(5) ठंडे पानी में टहलना- थोड़े-2 पानी में टहलना शरीर को दृढ़ और श्रेष्ठ बनाता है। मसाने और गुर्दे पर इसका विशेष प्रभाव होता है। रुके हुए पेशाब को लाने में यह क्रिया विशेष लाभदायक है। पाचन शक्ति ठीक होती है, अधोवायु शान्त हो जाती है, छाती का भारीपन ठीक होता है और श्वास की गति भी ठीक हो जाती है और निर्बल रोगियों को पहले साधारण ठंडे पानी में यह क्रिया करनी चाहिए। घुटनों तक पाँवों को जल में डाले रहना शरीर को दृढ़ करने की एक उत्तम विधि है। इससे रक्त धमनियों में रक्त भर जाता है और व्यर्थ जमा हुआ रक्त ऊर्ध्व भाग की ओर खिंचता है जाड़ों के दिनों में इसे कम कर देना चाहिए।
(6) हाथों पाँवों को ठंडे जल में धोना- लाल बुखार, मोतीझरा और हाफा डाफा सरीखे रोगों के लिए लाभप्रद है।
(7) सम्पूर्ण शरीर पर या केवल पैरों पर पानी डालना- उपरोक्त 7 क्रियाएँ प्रत्येक पाठक दैनिक जीवन में अधिक से अधिक अपनाकर रोग मुक्त और शरीर को कठोर एवं सहनशील बना सकता है।
जल के विविध स्नान -
लुईकूने साहब ने जल को इतना अधिक महत्व केवल स्नानों के कारण ही प्रदान किया है। लूईकूने की सब प्रसिद्ध सम्पूर्ण चिकित्सा प्रणाली केवल शास्त्रीय स्नानों पर ही अवलंबित है।
आपके अनुसार रोगों का मूल सिद्धाँत एक रूप है। लुईकूने अनुसार सब रोग एक ही मूल जड़ से उत्पन्न होकर नाना रूपों में प्रस्फुटित होते हैं। शरीर के विभिन्न अवयवों में पेट मुख्य है। अतः सबसे अधिक अत्याचार उसी बेचारे पर होता है। आवश्यकता से अधिक भोजन, अप्राकृतिक भोजन ठूँस-2 कर खाने से, उसमें विजातीय तत्व एकत्रित होने लगता है।
इन विजातीय तत्वों को बाहर निकालने के लिए लूईकूने साहब ने दो स्नानों का आविष्कार किया है।
(1) उदर स्नान या कटि स्नान।
(2) मेहन-स्नान।
इन स्नानों से अस्वाभाविक गर्मी दूर होती है बहुधा ये चिरसंचित विजातीय द्रव्य देर तक जमे रहते हैं। वस्तुतः शीघ्र आरोग्य के लिए उस मल को स्नानों द्वारा ढीला करते हैं। ढीला करने के लिए लूईकूने साहब ने वाष्प स्नान तथा सूर्य-स्नान की भी व्यवस्था की है।
कटि स्नान- इस स्नान से सैकड़ों रोगियों को लाभ हुआ है। जिन रोगियों को रक्तचाप बढ़ा हुआ हो, फालिज या ब्रोंकाइटिस, दमा प्लूरेसी, निमोनिया, प्रदाह अण्डकोष का बढ़ा हुआ होना, जांघों की रोगी की पीड़ा, सूजाक या गर्मी हो, पीलिया अथवा पाण्डु रोग हो, स्त्रियों को मासिक धर्म सम्बन्धी गड़बड़ें हों, बाँझपन हो उनके लिए कटि स्नान बड़ा लाभदायक है।
कटि स्नान की विधि यह है। एक टब या नाँद में पानी इस प्रकार भरिये कि जब रोगी उसमें लेटे तो दोनों पाँव बाहर रख सके और जल उसकी नाभि और जांघों तक पहुँचे। जांघों का ऊपरी भाग और नाभि तक का सब हिस्सा जल में डूबा रहे। पेडू को जल से भीगे वस्त्र से एक ओर से दूसरी ओर तक रगड़ते रहें। यह अत्यन्त आवश्यक है कि टाँगों पाँव और शरीर का ऊपरी भाग पेडू के साथ ही ठंडा न किया जाय।
रक्तचाप के लिए जल की गर्मी 50 डिग्री से 85 तक और दबे हुए जुकाम की जीर्णावस्था में जल का तापक्रम 88 डिग्री से 100 डिग्री तक रखना चाहिए, पुरुष की जननेंद्रिय सम्बन्धी रोगों या स्वप्नदोष में जल 88 से 94 डिग्री तक जल रखना चाहिए। पाखाना या मुँह के रास्ते रक्त गिरने की दशा में 65 से 75 डिग्री तक इस दिन का कटिस्नान करना चाहिए, पुराने सूजाक और गर्मी (आतशक) में या तत्सम्बन्धी अन्य बीमारियों में 88 से 94 डिग्री तक गर्मी रखनी चाहिये। डॉ. दिलकश इत्यादि प्राकृतिक चिकित्सकों ने कटि स्नानों के नामक्रमों में कुछ परिवर्तन किये हैं। उनके अनुसार “कटि स्नान लेते समय वे पाँवों को गर्म पानी (तापमान 102 से 104 तक) में रखने की सलाह देते हैं। पेट को मलने के साथ-2 कमर के उस भाग को भी मलवाते हैं। इस स्नान को उन्होंने तीन भागों में बाँट दिया है- (1) ठंडे पानी का कटि स्नान (तापमान 50 से 85 डिग्री तक) (2) सामान्य जल का कटि स्नान (तापमान 88 से 94 डिग्री तक) (3) गर्म जल का कटि स्नान (तापमान 102 से 108 डिग्री तक) ठण्डे या सामान्य जल के कटि स्नान के गुण वहीं हैं जो लूईकूने के बताये हुये हैं। सिर की पीड़ा जैसी बीमारियों में या जिनका चेहरा सुर्ख हो जाता है। कटि स्नान के साथ पाँवों को गर्म पानी के टब में रखने से लाभ होता है। पानी का तापमान 102 प्रारंभ में होना चाहिये। फिर बढ़ाकर 108 तक ले जाना चाहिये।
मेहन स्नान- टब में शीतल जल भर कर रोगी एक स्टूल या पटरे पर इस प्रकार बैठता है कि पानी स्टूल के धरातल तक रहे। इसके लिए 55 से 65 तक के गर्म पानी की आवश्यकता होती है। रोगी अपने पैरों को टब के बाहर रखकर स्टूल पर बैठता है। जननेंद्रिय ही जल में डूबी रहती है। रोगी को चाहिए कि वह बाएँ हाथ की दो उँगलियों से इन्द्रिय को इस प्रकार पकड़े रहे कि उसके आगे का कोमल अंश बाह्य झिल्ली से ढ़क जाय। अब इस चमड़े को पानी के अन्दर मुलायम भीगे कपड़े से धीरे-धीरे मलना चाहिए। घृणित रोगी, जननेंद्रिय सम्बन्धी रोगों में यह स्नान रामबाण का कार्य करता है। यह स्नान दिन में दो या तीन बार अधिक से अधिक 10 से 30 या 65 मिनट तक दिया जा सकता है। हिस्टीरिया और मिर्गी में भी यह लाभदायक है। प्राकृतिक चिकित्सा सम्बन्धी अन्य उपचारों के साथ यह स्नान क्षय में भी लाभदायक है। बाँझपन, गर्भपात, डिप्थीरिया जैसे भयानक रोगों में भी उत्तम है। नासूर, भगन्दर, कारबन्कल आदि में भाप स्नान के बाद इसे देना चाहिए।
वाष्प स्नान- लूईकूने ने भाप के स्नान पर भी जोर दिया है। इसके लिए साधारण बेंत की कुर्सी से कार्य हो सकता है। कुर्सी के नीचे सम्हाल कर खौलते हुए जल का पात्र रखना चाहिए। रोगी का सम्पूर्ण शरीर कम्बल से इस प्रकार ढ़क देना चाहिए कि भाप बाहर न निकलने पावे। इसमें धुँआ न जाने पावे अतः स्टोव या कोपले की आग का उपयोग अच्छा है।
एडोल्फ जुस्ट का प्राकृतिक टब स्नान- इसका प्रयोग स्नायु दौर्बल्य, वायु विकार, दूषित जिगर, चक्कर आना, नेत्रों की बीमारियाँ, पुरुषों के जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोगों में किया जाता है।
टब की लम्बाई 4 फीट चौड़ाई 18 इंच और गहराई 9 इंच होनी चाहिए। 4 से 6 इंच गहरा पानी 70 से 72 डिग्री को तापमान का टब में डाला जाता है। रोगी टब में टाँग फैलावे हुए घुटनों को पानी के ऊपर एक दूसरे से पृथक करके बैठ जाता है। अपने हाथों से जल में डूबे हुए सीवन और अण्डकोषों को 5 मिनट तक धोता और मलता है। फिर पानी को हथेलियों से पेडू पर जोर से फेंकता है और साथ-साथ ही मलना शुरू करता है। 5 मिनट पश्चात् जल से निकल कर पानी को उठाकर अपने शरीर पर रोगी डाल लेता है। शरीर को हाथ से मलकर सुखाता है। प्राण शक्ति की वृद्धि के लिए इसका उपयोग उत्तम माना गया है।
जल की पट्टी का प्रयोग -
जल की पट्टी नाना प्रकार की हो सकती है। आवश्यकतानुसार सम्पूर्ण शरीर पर पानी की पट्टी बाँधी जा सकती है तथा किसी अंग विशेष पर भी इसका उपयोग हो सकता है। पट्टी में गर्म तथा ठंडे दोनों ही प्रकार के जल का उपयोग हो सकता है। यदि चाकू या अन्य नुकीली वस्तु से शरीर का अंग कट जाये तो ठंडे पानी की पट्टी ही सर्वोत्तम है। उदर के विकारों के लिए गर्म पट्टी पेडू पर बाँधनी चाहिए। गले के दर्द में गर्म जल बोतल में भरकर सेंकना बहुत उत्तम है। स्थानिक रोग मिटाने के लिए गर्म पानी की पट्टी का प्रयोग ही सर्वोत्तम है।
स्वर्गीय डॉ. बड़थ्वाल ने इस विषय में लिखा है- “स्थानिक दर्द मिटाने के लिए कई पर्त वाली फलालेन की पट्टी लेनी चाहिए। उसके खूब गर्म जल से भिगो निचोड़ कर उसकी पट्टी बाँधनी चाहिए। फिर, उसके ऊपर उसी प्रकार ऊनी वस्त्र बाँध लेना चाहिए जिस प्रकार ठंडी पट्टी में। गर्म पट्टी के बाद हमेशा फिर ठंडी पट्टी बाँधनी चाहिए, अन्यथा लाभ के बदले हानि होगी। निमोनिया में इस प्रकार एकान्तर से कई बार गर्म और ठंडी पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। गर्म पट्टी का प्रयोग सब प्रकार की वेदना मिटाने के लिए किया जा सकता है, किन्तु जलोदर में भूलकर भी गर्म पट्टी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।”
तरेरा - जब ज्वर अधिक हो, तो ठंडी पट्टी के प्रयोग से ज्वर कम हो जाता है। दूर तक टहलने के पश्चात् उखते हुए पावों को जल से धो डालने से थकावट दूर होती है। ठंडे स्नान बड़े बलवर्द्धक एवं दीर्घजीवन देने वाले होते हैं। स्नान में जब जल कुछ दूरी से डाला जाता है तो उसे तरेरा कहते है। तरेरा केवल शीतल जल का ही उत्तम है। यदि ऊपर भागों में रोग हो तो कमर से ऊपर तरेरा लेना चाहिए। निचले भागों के लिए कमर से नीचे तरेरा लीजिए। नेत्र कान इत्यादि के शूल से मुक्ति के लिए सिर पर ठंडे पानी का तरेरा उत्तम है। शरीर के भिन्न-भिन्न अवयवों पर भी आवश्यकतानुसार किसी जल चिकित्सा के विशेषज्ञ से पूछकर तरेरा का प्रयोग किया जा सकता है।
जल के इन असंख्य उपयोगों को देखकर मृगवेद में उचित ही निर्देश किया गया है।
“हे जल! तुम्हीं स्वास्थ्य के कारण हैं, अतः हमें ऐसा बल दो कि सत्य को जान पावें।”
प्रसन्नता जंतु नाशक औषधि है, जिस व्यक्ति ने यह तत्व सर्वप्रथम मालूम किया होगा उसकी गिनती महा चिकित्सकों में होनी चाहिए। हास्य तथा प्रसन्नता शरीर तथा मन पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालते हैं और शोक, भय, चित, क्लेश जैसी प्राणघातक वृत्तियों का उन्मूलन क्षण भर में कर डालते हैं। आनन्द ईश्वरीय गुण है, चिंता क्लेश इत्यादि आसुरी तत्व। ईश्वरीय गुण का प्रतीक आनन्द शरीर में मधुर रस उत्पन्न करता है और किसी अव्यक्त मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से शरीर और मन पर तत्काल शान्ति का अलौकिक प्रभाव डालता है। जिस समय आनन्द तथा प्रसन्नता अपना प्रभाव प्रकट करते हैं तो समस्त प्रतिकूल प्रसंग विलीन हो जाते हैं। शरीर के अणु-अणु में नवोत्साह का संचार हो उठता है।
हँसने से तात्पर्य है कि आपके सुख की कली फूल की पंखुड़ी की भाँति खिल उठे, रोम-रोम में नव स्फूर्ति दौड़ जाय, जीवन रस से, नई शक्ति से ओत-प्रोत हो उठे, मन की दुर्बलता धुल जाय। मुस्कराहट ज्ञान तन्तुओं में जो कुछ दुर्बलता अथवा चिंता होती है, उसे तत्काल दूर करती है। आनन्द का प्रभाव शरीर तथा मन के कण-कण में होता है। जिस जगह औषधि लाभ नहीं पहुँचाती, जहाँ इंजेक्शन, कुनैन या अन्य कृत्रिम साधन कार्य नहीं करते, वहाँ हास्य भाव अपना कार्य करता है।
विपत्ति, चिंता तथा व्याधि की हास्य के साथ शत्रुता है इसलिए प्रसन्नता की जितनी अधिकता होगी, उतनी ही व्याधि की न्यूनता होगी। जो हंसते हुए जीवन बितायेगा उसका जीवन उतना ही स्वस्थ होगा। यदि आप रोग तथा व्याधि से मुक्ति चाहते हैं, जीवन का बीमा चाहते हैं, सौ वर्ष तक जीना चाहते हैं तो एक ही मार्ग आपके समक्ष है- अन्तर से वास्तविक अन्तःकरण से -हंसो। खूब खिलखिलाकर हास्य फैलाओ। हंस-हंस कर रोग व्याधियों को मार भगाओ। हंसो और सारा संसार तुम्हारे साथ आनन्द से विभोर हो खिल खिला उठेगा। रोओ किन्तु तुम्हारे साथ रोने वाला और कोई न मिलेगा। यदि तुम सुख से जीवन व्यतीत करना चाहते हो, तो हास्य की महिमा को अविलग समझो और आज से, अभी से उसका अभ्यास प्रारंभ कर दो। अपने जीवन को हास्य से मधुर बनाओ। स्वयं भी हंसो तथा दूसरों को भी हंसाओ।
जब हम हंसते हुए जीवन व्यतीत करते हैं तो हमारे लिए सारा संसार परिवर्तित हो जाता है और हम उसका एक जीवन दृष्टिकोण से निरीक्षण करने लगते हैं। मनुष्य को यह गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि जिस प्रकार भोजन, जल, वायु इत्यादि जीवन शक्ति के पोषक तत्व हैं, उसी प्रकार और सच पूछा जाय तो उससे हास्य तत्व आनन्द में मग्न रहना आवश्यक है।
अतः हंसें, खिलखिला कर, बिना किसी प्रतिबन्ध के, हंसों। जब समस्त संसार आपको रुलाने को प्रस्तुत हो, जीवन के युद्ध में जब आँधी और तूफान वेग से आता दिखाई देता हो, जब यह प्रतीत होता हो कि जीवन मौका उलटकर समुद्र की लहरों में विलीन हो जायगी, तब खिलखिलाकर हंस दें। आँधी तूफान शान्त हो जायगा, जीवन नौका पुनः आनन्द से चलने लगेगी, हृदय खुशी से उछलने लगेगा।
खुलकर हंसने से फेफड़े, पेट आदि के आन्तरिक अवयवों को व्यायाम प्राप्त होता है। हृदय अधिक तीव्र गति से कार्य करने लगता है। रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है। हास्य नेत्रों की शक्ति को तेजवान करता है, छाती फैलती है और शरीर के प्रत्येक अंग को स्वास्थ्यप्रद गर्मी पहुँचती है। कठिन परिश्रम के मध्य में खुलकर हंस लेने से, मस्तिष्क को बहुत कुछ विश्राम प्राप्त हो जाता है, थकावट दूर हो जाती है और पुनः नवीन जोश से काम में जी लग जाता है।
हास्योपचार के लिए सहनशीलता की आवश्यकता है। जो जरा सी बात पर उद्विग्न हो उठता है, वह कैसे हंस कर रोग दूर कर सकता है? हँस वही सकता है जिसमें दूसरों के अपराध क्षमा कर देने की शक्ति हो, प्रतिहिंसा की ज्वाला हृदय से न सुलगती हो। यदि आपके विरुद्ध कोई अपशब्द कहे तब भी उद्विग्न न हों यदि कोई आपको रुलाने के लिए तैयार बैठा हो, हानि का हिमालय टूट पड़ने को हो,तो भी हंसे।
हँसना सीखिये। दूध पीने वाला बालक जैसे निर्दोष हँसी हँसता है, वैसी ही हँसी, मस्त बिखेरने वाली हँसी सर्वोत्तम दवा है। हास्य सेवन का आनन्द लें। हँसने वालो का संग करें, आनन्दजनक भविष्य को ही अपने सामने रखें प्रत्येक पहलू में आनन्द ही देखें, बरतें, सुनें और सुनायें। हास्य और केवल हास्य ही आपके दुःख दर्द की एकमात्र दवा है।
अगले अंक भी स्वास्थ्य अंक होगा-
जनवरी के इस अंक में स्वास्थ्य अंक की पाठ्य सामग्री न आ सकी। इसलिए शेष लेख फरवरी के अंक में आवेंगे। इस प्रकार अगला अंक भी स्वास्थ्य अंक ही होगा।
मेरी व्यक्तिगत राय है कि यदि रोगी के रोग का निदान ठीक तरह से हो जाए तो उसकी जड़ काटने के लिए औषधि की उतनी आवश्यकता नहीं रह जाती, जितनी कि प्राकृतिक नियमों के पालन की। हमारे अनेक रोगी इसी कारण अच्छे नहीं हो पाते कि हमें उनके रोगों का विधिवत ज्ञान ही नहीं होता। यदि हम रोग का ठीक-ठीक पता लगा लें, तो समझें कि आधा कार्य हो गया।
एक अंग्रेज महाशय अपनी दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं। “नौ वर्ष की अवस्था में मुझे मुख से श्वास लेने की आदत पड़ गई। गला दुखने लगा। लोगों ने कहा कि टान्सिल के लिए आपरेशन कराना होगा तभी यह ठीक हो सकेगा। कुछ मास पश्चात स्वयं ठीक हो गया और मालूम हुआ कि वह सर्दी के कारण हो गया था।”
“मेरे पेट में कुछ दिन तक दर्द रहा। दो-तीन बड़े-बड़े डॉक्टरों से मिला, परन्तु वे बड़े चक्कर में फँसे और कहने लगे कि अपेन्डिसाइटिस हो गया है। आपरेशन होगा। बिना चीर फाड़ किए जान-बचाना कठिन है। मैंने थोड़ा-थोड़ा टहलना प्रारंभ किया। जल तथा शाक तरकारी, टमाटर का प्रयोग बढ़ाया। दो मास में पेट का दर्द जाता रहा।”
“मेरे फेफड़ों में कुछ खराबी थी। साँस लेने में पीड़ा होने लगी। वैद्य ने बताया कि तपेदिक का डर है अतः मुझे कोई श्रमपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए। दौड़ना, कसरत, व्यायाम आदि हानिकर हैं। केवल पेय पदार्थ गिजा के रूप में लेना चाहिए। मैं बराबर दवायें लेता रहा किन्तु “मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।” तो निराश हो चला था, परन्तु सौभाग्य से एक दिन प्राकृतिक चिकित्सा के एक पत्र में सुन्दर लेख देख लिया, जिसमें प्राकृतिक चिकित्सा के लाभ बताए गए थे। मुझे उसे कार्यांवित करने की सूझ गई और मैंने औषधियाँ खाना बन्द कर दिया। पहले मैंने भोजन सुधारा- शाक, फल आदि का प्रयोग आरंभ कर दिया। माँस खाना बन्द कर दिया। व्यायाम तो मैं कर ही नहीं सकता था, टहलना प्रारंभ कर दिया। मालिश शुरू की। धीरे-धीरे लाभ हुआ। आरोग्यशास्त्र का अध्ययन करने से मुझे कुछ ऐसे व्यायाम ज्ञात हुए जिनको मैं कुर्सी पर बैठकर या लेट कर सकता था। मैंने आरोग्यशास्त्र का क्रमशः अभ्यास शुरू किया। मेरा तपेदिक चला गया। आरोग्यशास्त्र ने मुझे बताया कि मेरा रोग सिर्फ आलस्य, भ्रम और सन्देह था।”
उपरोक्त वृत्तांत से स्पष्ट है कि हमारे चिकित्सक प्रायः अटकल से ही काम लेते हैं। वे मस्तिष्क पर जोर डालना नहीं चाहते। उनके पास अनेक मरीज हैं, फिर हर एक का इतिहास क्यों कर सुनें। यदि हम चाहें तो स्वयं चिकित्सक बन सकते हैं। अपने विषय में जितनी अच्छी तरह हम समझ सकते हैं, दूसरा चिकित्सक नहीं।
“सर्व परवशं सर्वमात्मवशं सुखम्” अर्थात् आत्मवशता सुख है, परवशता दुःख। अतः प्रकृति के उपचार सीख कर हम में से प्रत्येक अपना चिकित्सक स्वयं बन सकता है। अतः इस शास्त्र के सिद्धान्तों का स्वयं ज्ञान प्राप्त कीजिये और प्रकृति के उपचार सीख कर उनका प्रयोग दैनिक जीवन में कीजिए।
(पं. हरिप्रसाद ओझा-”प्रेम”)
ब्रह्म मुहूरत शयन तजि, करिये प्रभु कौ ध्यान।
सुखद स्वास्थ्य में होयगी, इससे वृद्धि महान॥ 1॥
जल पीकर के शौच जा, टहल मील दो तीन।
निश्चय होंगी आपकी, कई व्याध्याँ छीन॥ 2॥
डाली कीकर नीम की, या पीलू की मूल।
सुदृढ़ स्वच्छ सब दाँत हो, रहै न रंजौं शूल॥ 3॥
निर्मल ताजी नीर सों, करि घर्षण असनान।
संध्या प्राणायाम करि, करिए गीता गान॥ 4॥
करिए सेवन धूप का प्रातः खुले शरीर।
वेधत हैं क्रमि रोग को, रवि किरणों के तीर॥ 5॥
भक्ष्याऽभक्ष्य पदार्थ को, करि पुनि पूर्ण विचार॥
कम खाओ चाबो अधिक, होय न उदर विकार॥ 6॥
तदपि उदर विकार का-पाओ कछु आभास।
उष्णोदक सेवन करो, अष्ट प्रहर उपवास॥ 7॥
प्राकृत वेगों की कवहुँ, गति मति रोको भूल।
वृद्धि पायेंगी देह में, विविधि रोग की मूल॥ 8॥
सुखद स्वास्थ्य के वास्ते, हँसिवो है अनिवार्य।
शुद्धि, वृद्धि हो रक्त की, अरु संचालन कार्य॥ 9॥
थक जाओ, जब तुम कभी, करते-करते काम।
लो अवश्य ही उस समय, यथा योग्य आराम॥10॥
नित्य सात घण्टे शयन, कीजै आप अवश्य।
न्यूनाधिक सोना बुरा, लाता है आलस्य॥ 11॥
*समाप्त*