रामायण में एक रहस्यमय गीता

(श्रीमती रत्नेश कुमारी जी नीराँजना, मैनपुरी)

गीता की परिभाषा यह मानी जाती है “वह ज्ञान जो जीवन पथ के भ्रान्त पथिकों को सही रास्ता दिखलाने के लिए कहा गया हो” तदनुसार ऐसी अनेक गीताएँ श्रीमद्भागवत तथा श्री रामचरित मानस इत्यादि धार्मिक ग्रन्थों में भरी पड़ी हैं। जिनको बहुत से जिज्ञासुओं ने खोजा तथा अलग भी किया है।

आज कल के मानव का जीवन दिन-2 कार्य व्यस्त होता जा रहा है अस्तु वह चाहता है थोड़ा से थोड़ा समय देकर अधिक से अधिक लाभ उठाना। लघु कहानियाँ, भाव चित्र, एकाँकी नाटक उसकी इसी प्रवृत्ति का परिणाम हैं।

रामायण में एक अति संक्षिप्त गीता उपलब्ध होती है। भगवान राम ने वानरों को विदा करते हुए उपदेश दिया है-

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।

सदा सर्वगत सर्वहित, जानि कियहु अति प्रेम॥

इस दोहे के अर्थ पर विचार कीजिए। देखिए तो किस तरह गागर में सागर भरा हुआ है।

भगवान कहते हैं-

‘अब गृह जाहु’- अर्थात् गृह त्याग की कोई आवश्यकता नहीं। घर रहते हुए भी तपोवन के समान, गृहत्याग के समान ही सन्मार्ग में प्रगति हो सकती है। इसलिए गृहत्याग का विचार छोड़कर घर जाओ। ‘अब’ इस समय में, आधुनिक काल में, तो यही श्रेष्ठ मार्ग हैं। प्राचीन काल में चाहे गृह त्याग उपयुक्त भले ही रहा हो पर ‘अब’ तो गृह में ही तप करने की परिस्थिति है।

‘सखा सब’- सबको अपना सखा, मित्र, भाई, स्वजन समझते हुए, सबसे सुहृदयता पूर्ण व्यवहार करो।

‘भजहु माहि दृढ़ नेम’- ईश्वर को अस्थिर चित्त से, अनियमितता से, ढिलमिल, संदिग्ध चित्त से नहीं, वरन् दृढ़ विश्वास और सुनिश्चित नेम बना कर भजन करो। ऐसा श्रद्धा और विश्वासपूर्ण भजन की आशाजनक फल उत्पन्न करता है। “विश्वासः फलदायकः।”

‘सदा सर्वगत’- ईश्वर को सदा, प्रत्येक भली बुरी स्थिति में सब के अन्दर समाया हुआ समझ कर, प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में उसके भावी सुधार एवं उन्नति की आशा रखनी चाहिए और घृणा द्वेष से बचना चाहिए।

‘सर्वहित’- ईश्वर सर्व हितकारी है। हानि, कष्ट, वियोग आदि बुरी परिस्थितियाँ भी वह मनुष्य के हित के लिए ही उत्पन्न करता है, इसलिए ईश्वर की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाकर संतुष्ट रहना चाहिए।

‘जानि’- ईश्वर को जानना चाहिए, उसके संबंध में ज्ञान विज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जिस से संशय भ्रम की गुंजाइश न रहे। तथा ‘प्रतीति होने पर प्रीति होने’ के सिद्धाँतानुसार ईश्वर में सुदृढ़ आस्था हो जाय।

‘कियहु अति प्रेम’- उपरोक्त तथ्यों का समावेश करते हुए ईश्वर की अन्यान्य भाव से, अत्यन्त प्रेम से, भक्ति करनी चाहिए। इस प्रकार की साधना से मनुष्य के परम कल्याण का भाग प्रशस्त होता है।

इस दोहे के 7 तथ्य हैं। श्रीमद्भागवत गीता में इन्हीं तथ्यों का प्रधान रूप से उपदेश किया गया है। संभव हुआ तो अगले किसी अंक में इन 7 तथ्यों का जोरदार समर्थन करने वाले गीता के प्रमाण भी उपस्थित करने का प्रयत्न करूंगी। मेरा विश्वास है कि उपरोक्त दोहे के आधार पर अपनी मनोभूमि का निर्माण करके कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

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वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-7

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विडम्बना

(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी)


विडम्बना

राम नाम रटता, क्या रमता कभी राम में तेरा मन भी?

विश्व लोटता था चरणों पर,

और रमा थी जिसकी दासी,

‘राम-राज्य’ में लहराती थी,

जो नन्दन की स्वर्ण लता-सी

सुना कभी इन कानों से उस, भारत माता का क्रन्दन भी?

अपनी दशा देखकर आया,

कब तेरी आँखों में पानी!

ध्यान कहाँ निज गौरव का, तू-

पराधीनता का अभिमानी!

रे निर्लज्ज! बोल, क्या तेरे, शोणित में है संस्पन्दन भी?

दानव दल का दलन किया था

राम-तुल्य उन प्रण वीरों का-

वंशज है क्या रे कायर! तू

लव कुश से उन रण-धीरों का!

देखा है तूने रे मानव! क्या कृमि-कीटों का जीवन भी?

राम-नाम रटता, क्या रमता, कभी राम में तेरा मन भी?


जागते रहिए! सावधान रहिए!!

(2)

जागृत तन्द्रा में विभोर मनुष्य-वास्तव में आधा मनुष्य है। अर्ध जीवित और अर्ध मृतक उसे कह सकते हैं। जैसे शरीर के एक भाग को लकवा मार जाय और दूसरा भाग अच्छा रहे तो उससे क्या काम हो सकेगा? किसी आदमी का एक हाथ एक पैर एक कान, एक आँख नष्ट हो जाय तो उस बेचारे की बड़ी दुर्दशा होगी। इसी प्रकार जो अर्धतन्द्रा में पड़ा रहता है वह अधूरा मनुष्य जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करने वाला योद्धा नहीं बन सकता। लापरवाही एक मानसिक लकवा है जिससे आधा मस्तिष्क लुँज-पुँज हो जाता है। ऐसे मानसिक अपाहिज दरिद्रता के चिथड़े में लिपटे एक कोने में पड़े रहते हैं और जीवन के भार को किसी प्रकार गिरते मरते ढोते रहते हैं। उन्नत, समृद्ध एवं सम्पन्न जीवन तो उनके लिए आकाश कुसुम की भाँति दुर्लभ है।

जीवन की धूलि में मिला देने वाला यह सत्यानाशी रोग जितना भयंकर और घातक है उतना ही चिकित्सा में सुगम भी है। ज्वर, खाँसी, दस्त आदि रोग ऐसे हैं कि उनको दूर करने में किसी जानकार चिकित्सक से सलाह लेने की और अमुक औषधियाँ खरीदने और सेवन करने की आवश्यकता पड़ती है, कई तरह के उपचार करने पड़ते हैं। तब कहीं कुछ समय लेकर वे रोग नष्ट होते हैं। परंतु इस रोग के निवारण करने में इस प्रकार का एक भी झंझट नहीं है। रोगी जब चाहे कि मुझे इस रोग से पीछा छुड़ाना है, उसी समय वह उससे छुटकारा पा सकता है। यह रोग तभी तक ठहरता है जब तक रोगी उसका विरोध नहीं करता और अपने में उसे ठहरने देता है, पर जब वह विरोध करने और हटा देने को उतारू हो जाता है तो फिर उसका ठहरना नहीं हो सकता। व्यभिचार दूसरे पक्ष के सहयोग पर निर्भर है। यदि पुरुष व्यभिचारी हो पर कोई स्त्री उसके कार्य में सहयोग न दे तो व्यभिचार होना असंभव है। इसी प्रकार जागृत तन्द्रा का घातक रोग भी रोगी के सहयोग पर निर्भर है। जहाँ विरोध होगा, हटाने का प्रयत्न होगा, वहाँ उसका ठहरना नहीं हो सकता। यह रोग किसी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपना शिकार नहीं बना सकता। जैसे ही मनुष्य यह सोचता है कि मुझे अपने को जागृत तन्द्रा के चंगुल से छुड़ाना है वैसे ही उस बीमारी के पाँव उखड़ जाते हैं। जैसे ही वह यह दृढ़ संकल्प करता है कि मैं जागरुक रहूँगा-लापरवाही को पास भी न फटकने दूँगा। वैसे ही वह अपना बोरिया बिस्तर समेट लेती है। कहते हैं कि चोर के पैर बड़े कमजोर होते हैं। घर का मालिक चाहे वह कमजोर ही क्यों न हो जाग पड़े और सावधान हो जाय तो घर में घुसे हुए हट्टे-कट्टे पहलवान चोर को भी भागना पड़ता है। मन के सजग हो जाने पर लापरवाही भी चोर की तरह भाग खड़ी होती है।

अन्धकार क्या है? प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है, वैसे स्वतंत्र रूप से अन्धकार का कोई अस्तित्व नहीं। अन्धकार नाम का पदार्थ स्वतंत्र रूप से कहीं उपलब्ध नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार लापरवाही भी स्वतंत्र चीज नहीं है। जागरुकता का अभाव ही लापरवाही है। जैसे स्नान करना या न करना, टहलने जाना या न जाना, अपने हाथ की बात है, उसी प्रकार मन का जागरुक रखना या न रखना भी अपने हाथ की बात है। अपनी इच्छा के ऊपर यह सब निर्भर है। मन की इच्छा होती है तो उसकी आज्ञानुसार हाथ अपना काम करना शुरू कर देता है और जब तक इच्छा रहती है वह काम में जुटा रहता है। मन की इच्छा न हो तो हाथ को हिलने-डुलने से कुछ प्रयोजन नहीं। मस्तिष्क की भी यही दशा है। मनुष्य चाहता है कि सावधानी, एकाग्रता और दिलचस्पी से काम करूं तो उसकी इस चाहना के मार्ग में कोई बाधा नहीं। खुशी-खुशी मस्तिष्क उसी प्रणाली को अपना लेता है जिसको कि मन चाहता है। जिस काम में अधिक रुचि होती है उस काम को लापरवाह व्यक्ति भी बड़ी सावधानी से पूरा करते हैं। जैसे शतरंज, चौपड़ या ताश खेलने में जिसकी अधिक रुचि होती है वह उस खेल को बड़ी सावधानी और सफलता के साथ खेलता है। उस खेल में बहुत कम भूलें उससे होती हैं। परंतु वही व्यक्ति जब दूसरे काम करता है तो भूल पर भूल होने लगती है। इससे सिद्ध है कि मन की ढील या उदासीनता ही लापरवाही का मूल कारण है। जबकि लापरवाह, आलसी और प्रमादी व्यक्ति किसी अपनी दिलचस्पी के एक काम में अपना कौशल प्रकट कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि वे अन्य कार्यों में कौशल प्रकट न कर सकें बाधा केवल एक ही है वह है-मन की उदासीनता। इस बाधा को हटा दिया जाय तो हर एक व्यक्ति पूर्ण रूप से क्रिया कुशल, कर्त्तव्य निष्ठ, परिश्रमी, कर्मपरायण और सफल मनोरथ हो सकता। उसके कार्यों में जो त्रुटियाँ, कुरूपताएं, फूहड़पन तथा गैर जिम्मेदारी भरी रहती है उन सबका दर्शन भी दुर्लभ हो सकता है।

जो व्यक्ति जागरुक बनना चाहता है उसे प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि “मैं जागृत जीवन व्यतीत करूंगा। आत्म गौरव की रक्षा के लिए अपने हर एक कार्य को सफल और सुँदर बनाने का प्रयत्न करूंगा। जीवन के बहुमूल्य क्षणों का अत्यन्त सावधानी के साथ सुव्यवस्थित ढंग से सदुपयोग करूंगा।” यह प्रतिज्ञा जिह्वा के अग्रभाग से नहीं वरन् अन्तःकरण के गहनतम प्रदेश से की जानी चाहिए। लापरवाही से होने वाली भयंकर हानियों के ऊपर बहुत समय तक गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। जिन लोगों के लापरवाही की कारण जीवन दुर्दशा ग्रस्त हो रहे हैं उनकी दशा का सुविस्तृत चित्र कल्पना लोक में खींचना चाहिए और विचार करना चाहिए कि यदि उनमें यह दोष न रहा होता तो कितना आगे बढ़ गये होते। इसी प्रकार कुछ उन लोगों के जीवनों पर दृष्टिपात करना चाहिए जो साधारण सी स्थिति के होते हुए भी अपने अध्यवसाय के कारण कितने आगे बढ़े गये। यदि उन उन्नतिशील व्यक्तियों ने इतनी सावधानी न बरती होती तो जो उनकी आरंभिक दशा थी, उससे भी गिरी दशा होती। ऐसी दशा में उस गिरी दशा में और आज की उन्नतिशील दशा में कितना जमीन आसमान का अंतर होता।

एक वे हैं जो लापरवाही के कारण ऊँचे से नीचे गिरे, दूसरे वे हैं जो जागरुकता के कारण नीचे से ऊँचे उठे हैं। इन दोनों प्रकार के मनुष्यों की आरंभिक और अंतिम अवस्था के अंतर को ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि सावधानी में कितनी महानता और असावधानी में कितनी भयंकरता भरी हुई है। इस महानता और भयंकरता को एक-एक करके अपने जीवन से संबद्ध होने की कल्पना करनी चाहिए और मस्तिष्क में एक छाया चित्र बनाना चाहिए कि यदि भूतकाल में मैंने असावधानी न बरती होती तो अब तक कितना आगे होता, तब आज कैसे उत्तम दशा रही होती। असावधानी के कारण कितने स्वर्ण सुयोग हाथ से निकल गये, समय और शक्ति की कितनी बर्बादी हुई। इस पर खेदपूर्ण पश्चाताप करना चाहिए और एक दूसरे कल्पना चित्र में यह सीखना चाहिए कि यदि भावी जीवन में सावधानी बरती जाय तो किस-किस दिशा में कितनी-कितनी प्रगति हो सकती है? और उस उन्नति-युक्त दशा में अपनी स्थिति कितनी अच्छी एवं आनन्द- दायक हो सकती है। इस प्रकार असावधानी से उत्पन्न होने वाली हानियों का भय और सावधानी से होने वाले लाभों का लोभ, अनेक उदाहरणों, तर्कों, प्रमाणों और कल्पनाओं के साथ मन के सामने रखने से भीतर से एक स्फुरणा उत्पन्न होती है। यदि वह स्फुरणा कायम रखी जा सके तो मनुष्य जागरुक बन सकता है।

जीवन को जागृत बनाने के लिए दो शर्तों की प्रधान रूप से आवश्यकता है। एक तो समय का कार्य विभाजन, दूसरे अपने कार्यों में रुचि, प्रातःकाल चारपाई पर से उठते ही दिन भर का कार्यक्रम बना लेना चाहिए कि आज कौन कार्य किस समय करना है। उन कार्य की विशेष आवश्यकता के अनुसार समय में हेर-फेर करना पड़े तो कोई बात नहीं, परंतु अपनी निजी ढील के कारण जरा भी विलंब न होना चाहिए। जिन्हें प्रातःकाल का नियत किया हुआ कार्यक्रम याद रखने में अड़चन पड़ती हो उन्हें डायरी में नोट कर लेना चाहिए और रात को जब सोते समय यह देखें कि उस कार्यक्रम पर अमल हुआ या नहीं? यदि नहीं हुआ तो उसका कारण अन्य परिस्थितियाँ थीं या अपनी ढील? जहाँ अपनी ढील दिखाई पड़े वहाँ अपने को डाँटना चाहिए और आगे के लिए सावधानी रखने की दृढ़ता स्थापित करनी चाहिए।

हर कार्य को अपने गौरव की कसौटी समझ कर करना चाहिए। इस कार्य की श्रेष्ठता या निकृष्टता पर मेरा व्यक्तित्व परखा जाने वाला है। यह अनुभव करना चाहिए। जैसे कोई चित्रकला का विद्यार्थी चित्र बनाते समय यह ध्यान रखता है कि इस अभ्यास से तात्कालिक लाभ न सही पर अभ्यास हो जाने पर जब मैं सफलता के शिखर पर पहुँचूँगा तो यह लाभ बहुत बड़ा होगा। इस दृष्टिकोण से वह बड़ी मेहनत और एकाग्रता से काम करता है। वह जानता है कि शिक्षाकाल की छोटी-मोटी रद्दी कागज पर, मामूली स्याही से बनने वाली तस्वीरों का स्वयं कुछ विशेष महत्व नहीं है, तो भी इन रद्दी कागज पर बड़े परिश्रमपूर्वक बनाये जाने वाले चित्रों के अंतर्गत चित्रकला में महान सफलता का रहस्य निहित है। साधारण छोटे-मोटे दैनिक जीवन के कार्यों को जो मनुष्य अच्छे से अच्छा, सुँदर से सुँदर, बढ़िया से बढ़िया बनाने का प्रयत्न करता है। वह अपनी क्रिया शक्ति को सतेज करता है, अपने अभ्यास को बढ़ाता है। उन छोटे कामों में विशेष मनोयोगपूर्वक अधिक सुँदरता उत्पन्न करना तत्काल कुछ विशेष महत्व भले ही न रखता हो पर उसे अभ्यास, सुरुचि, बनाने और बढ़िया काम करने की जो आदत पड़ती है वह अत्यन्त ही मूल्यवान है।

यह बढ़िया काम किसने किया है? जब इस प्रश्न को प्रसन्न और सन्तुष्ट चेहरे से कोई पूछता हो तो समझ लीजिए कि उस काम के कर्ता के लिए सजीव उपहार भेंट किया जा रहा है। मनुष्य का गौरव इस बात में है कि उसके कामों के अच्छेपन, सुघड़ता और निर्दोषता के लिए प्रशंसा की जाय। जो व्यक्ति अपने काम को प्रशंसा योग्य बनाता है, वह काम उलट कर अपने करने वाले को प्रशंसा योग्य बनाता है। बहुत काम करना अच्छी बात है। पर उससे भी अच्छी बात यह है कि काम को उत्तमता से किया जाय। बहुत काम करना पर खराब करना यह कोई अच्छाई नहीं है, चाहे अपेक्षाकृत कुछ कम काम हो पर वह उत्तमता से किया हुआ होना चाहिए।

चीजों को संभाल कर यथास्थान रखना, यह एक बड़ा अच्छा गुण है। इससे वस्तुएं खोने फूटने-टूटने या मैली कुचैली होने से बच जाती हैं और वे अधिक समय तक अपनी मजबूती तथा सुँदरता को कायम रखे रहती हैं। सौंदर्य का प्रथम नियम चीजों का यथास्थान रखना है, नियत स्थान से भिन्न जगह पर पड़ी हुई वस्तु ही कूड़ा कचरा कही जाती है। प्रयोजन पूरा होने के उपरान्त वस्तुओं को जहाँ-तहाँ न पड़ी रहने देना चाहिए, वरन् उन्हें यथास्थान रखने के बाद तब वहाँ से हटना चाहिए। किसी काम की समाप्ति तब समझनी चाहिए जब उस कार्य में प्रयुक्त हुई वस्तु यथास्थान पहुँचा दी जाय।

(1) इस कार्य में कोई भूल तो नहीं हो रही है? (2) इस कार्य को और अच्छा किस तरह बनाया जा सकता है? इन दो प्रश्नों को सदैव मन में जागृत रखने से ऐसे उपाय सूझ पड़ते हैं जिनके द्वारा अधिक लाभदायक, संतोषजनक और उन्नतिशील स्थिति प्राप्त हो सके। मैं जाग्रत तन्द्रा में तो नहीं जा रहा हूँ? कोई लापरवाही तो नहीं बरत रहा हूँ? आलस्य में बहुमूल्य समय तो नहीं गंवा रहा हूँ? प्रमाद के लक्षण तो मुझमें नहीं आ रहे हैं? इस प्रकार के प्रश्नों से अपनी शोधक दृष्टि को भरा रखना चाहिए और एक निष्पक्ष एवं खरे आलोचक की तरह अपने आप की परीक्षा तथा समीक्षा करते रहना चाहिए जैसे मुँह पर कोई मक्खी या मच्छर आ बैठे तो उसे तुरंत ही उड़ा देने के लिए हाथ उठता है वैसे ही लापरवाही को मक्खी और आलस्य को मच्छर समझ कर उन्हें पास न आने देना चाहिए और जैसे ही वे दिखाई दें वैसे ही तुरंत ही उन्हें भगा देने का प्रयत्न करना चाहिए।

अपना स्वभाव ढीला पोला मत बनने दीजिए, अपने मन को उदास, निराश ओर गिरा हुआ मत रहने दीजिए। समय को तुच्छ वस्तु समझ कर उसका अपव्यय मत कीजिए। अपने आपको सदा चैतन्य, जागरुक और कर्त्तव्य परायण रखिए। जागृति में जीवन और तन्द्रा में मृत्यु है। आप जीवितों का जीवन जीना चाहते हैं तो जागृत रहिए। अपने हर काम को सावधानी और सतर्कता के साथ कीजिए। स्मरण रखिए जागृत मनुष्यों को ही जीवन फल मिलता है। वह कहावत बिल्कुल सत्य समझिए कि-

‘जागै सो पावै! सोवै सो खोवै


सत्य असत्य की विवेचना

(लोकमान्य तिलक)

वेद में सत्य की महिमा के विषय में कहा है कि सारी सृष्टि की उत्पत्ति के पहले ऋतं और सत्यं उत्पन्न हुए। और सत्य ही से आकाश, पृथ्वी, वायु आदि पंच महाभूत स्थिर हैं- ‘ऋतंच सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्य जायत।’ ऋ. 10, 190, 1 ‘सत्ये नोत्तभिता भूमिः।’ ऋ. 10,86,1। सत्य शब्द का धातुगत अर्थ भी यही है-रहने वाला अर्थात् जिसका कभी अभाव न हो अथवा त्रिकाल अबाधित। इसीलिए सत्य के विषय में कहा गया है कि सत्य के सिवाय और धर्म नहीं है, सत्य ही परब्रह्म है। महाभारत में कई जगह इस वचन का उल्लेख किया गया है कि ‘नास्ति सत्यात्परो धर्मः’ (1,162,24) और यह भी लिखा है कि-

अश्वमेध सहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम।

अश्वमेध सा स्त्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते॥

आ. 74, 102

हजार अश्वमेध और सत्य की तुलना की जाय तो सत्य ही अधिक होगा।

सत्य के संबंध में मनु जी का कहना है-

वाच्यर्था नियताः सर्वे वां मूला वाग्विनिःसृताः।

ताँ तुयः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेय कृन्नरः।

मनुष्यों के सब व्यवहार वाणी से हुआ करते हैं। एक के विचार दूसरे को बताने के लिए शब्द के समान अन्य साधन नहीं है। वही सब व्यवहारों का आश्रय स्थान और वाणी का मूल दाता है। जो व्यक्ति उसको मलिन कर डालता है अर्थात् जो वाणी की प्रतारणा करता है, वह सब पूँजी ही की चोरी करता है। इसीलिए मनु ने कहा है ‘सत्यपूताँ वदेद्वाचं, मनु. 6-46 जो सत्य से पवित्र किया गया हो, वही बोला जाय। और और धर्मों से सत्य ही को पहला स्थान देने के लिए उपनिषद् में भी कहा है। सत्यंवद, धर्मंचर (तै. 1, 11, 1) जब बाणों की शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह शाँति और अनुशासन पर्वों में, युधिष्ठिर को सब धर्मों का उपदेश दे चुके तब प्राण छोड़ने के पहले ‘सत्येषु युतितव्यं वः सत्यं हि परमं बल’ इस वचन को सब धर्मों का सार समझ कर उन्होंने सत्य ही के अनुसार व्यवहार करने के लिए सब लोगों को उपदेश किया है।

जो सत्य इस प्रकार स्वयं सिद्ध एवं चिरस्थायी है, उसके लिए कुछ अपवाद भी हैं। कल्पना कीजिए कि कुछ आदमी चोरों से पीछा किये जाने पर तुम्हारे सामने किसी स्थान में जाकर छिप रहे। इसके बाद हाथ में तलवार लिए हुए चोर तुम्हारे पास आकर पूछने लगे कि वे आदमी कहाँ चले गये! ऐसी अवस्था में तुम क्या कहोगे? क्या तुम सच बोल कर सब हाल कह दोगे या उन निरपराधी मनुष्यों की रक्षा करोगे? शास्त्र के अनुसार निरपराधी जीवों की हिंसा को रोकना सत्य ही के समान महत्व का धर्म है। मनु कहते हैं-

नापृष्ठः कस्यचिद् ब्रू यान्न चान्यायेन पृच्छतः।

(2.110 म.भा. 6, 287, 34)

जब तक कोई प्रश्न न करे, तब तक किसी से बोलना नहीं चाहिए। और यदि कोई अन्याय से प्रश्न करे तो पूछे पर भी उत्तर नहीं देना चाहिए। यदि मालूम भी हो तो सिड़ी या पागल के समान कुछ हूँ हूँ करके बात बना देना चाहिए- ‘जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।’ अच्छा, क्या हूँ-हूँ कर देना और बात बना देना एक तरह से असत्य भाषण करना नहीं है। महाभारत में कई जगह कहा है कि ‘न व्याजेन चरेर्द्धम’ (आ. 215, 34) धर्म से बहाना करके मन का समाधान नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि तुम धर्म को धोखा नहीं दे सकते। तुम खुद धोखा खा जाओगे। अच्छा, यदि हूँ-हूँ करके कुछ बात बना देने का भी समय न हो तो क्या करना चाहिए? मान लीजिए, कोई चोर हाथ में तलवार लेकर छाती पर आ बैठा है और पूछ रहा है कि तुम्हारा धन कहाँ है? यदि कुछ उत्तर न दोगे तो जान ही से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे समय पर क्या बोलना चाहिए? सब धर्मों का रहस्य जानने वाले भगवान कृष्ण ऐसे ही चोरों की कहानी का दृष्टान्त देकर कर्ण पर्व (69, 61) में अर्जुन से और आगे शाँति पर्व के सत्यानृत अध्याय 109, 15, 16 में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं-

अकूजनेम चेन्मोक्षो नावकूजेत्कथंचन।

अवश्यं कूजितन्ये वा शंकरेन्वाप्यकूजनात्।

श्रेयस्त्रत्रानृतं वक्तुँ सत्यादिति विचारितम्।

अर्थात् यह बात विचारपूर्वक निश्चित की गई है कि यदि बिना बोले मोक्ष या छुटकारा हो सके तो, कुछ भी हो बोलना नहीं चाहिए। और यदि बोलना आवश्यक हो अथवा न बोलने से (दूसरों को) कुछ सन्देह होना संभव हो, तो उस समय सत्य के बदले असत्य बोलना ही अधिक उपयुक्त है। इसका कारण यह है कि सत्य धर्म केवल शब्दोच्चार ही के लिए नहीं है। अतएव जिस आचरण से सब लोगों का कल्याण हो, वह आचरण सिर्फ इसी कारण से निन्द्य नहीं माना जा सकता कि शब्दोच्चार अयथार्थ है। जिससे सभी की हानि हो वह न तो सत्य ही है और न अहिंसा ही। शाँतिपर्व (329,13,287,18) में सनत् कुमार के आधार पर नारदजी शुक्रदेवजी से कहते हैं-

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।

यद्भूत हितमत्यन्तं एतत्सत्यं मतं मम॥

सच बोलना अच्छा है, परंतु सत्य से भी अधिक ऐसा बोलना अच्छा है जिससे सब प्राणियों का हित हो, क्योंकि जिससे सब प्राणियों का अत्यन्त हित होता है वही, हमारे मन से, सत्य है। यह वचन महाभारत के वनपर्व में ब्राह्मण और व्याघ्र के संवाद में दो-तीन बार आया है। उनमें से एक जगत तो ‘अहिंसा सत्य वचनं सर्व भूत हितं परम्’ पाठ है। (वन 206,73) और दूसरी जगह ‘यद्भूत हितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा (वन 208, 4) ऐसा पाठान्तर किया गया है सत्य प्रतिज्ञ युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य से ‘नरो व कुँजरो वा’ कह कर उन्हें संदेह में क्यों डाल दिया? इसका कारण वही है जो ऊपर कहा गया है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे शास्त्रकारों ने झूठ बोलकर किसी खूनी की जान बचाने का समर्थन किया हो। शास्त्रों में, खून करने वाले आदमी के लिए देहान्त प्रायश्चित अथवा वधदण्ड की सजा कही गई है। इसलिए वह तो सजा पाने या वध करने के ही योग्य है। शास्त्रकारों का कहना है कि ऐसे समय अथवा इसी के समान और किसी समय जो आदमी झूठी गवाही देता है वह अपने सात या अधिक पूर्वजों सहित नरक में जाता है।

(मनु 8, 89, 99, म. भा. 6, 3)

अन्य धर्मों में भी इसी का समर्थन होता है। ईसामसीह के शिष्य पाल बाइबिल में कहते हैं यदि मेरे असत्य भाषण से प्रभु के सत्य की महिमा और बढ़ती है (अर्थात् ईसाई धर्म का अधिक प्रचार होता है) तो इससे में पापी क्यों कर हो सकता हूँ। (रोम 3, 7) ईसाई धर्म के इतिहासकार मिलमैन ने लिखा है कि प्राचीन ईसाई धर्मोपदेशक कई बार इसी तरह आचरण किया करते थे। वर्तमान समय के नीति शास्त्रज्ञ भी इसका समर्थन करते हैं। सिजविक नाम के नीति शास्त्र जिनका कि नीति शास्त्र कालेजों में पढ़ाया जाता है उनका कहना है कि “छोटे लड़कों को और पागलों को उत्तर देने के समय और इसी प्रकार बीमार आदमियों को (यदि सच बात सुना देने से उनके स्वास्थ्य के बिगड़ जाने का भय हो तो) अपने शत्रुओं को, चोरों को और यदि बिना बोले काम न चलता हो तो) जो अन्याय से प्रश्न करे उनको उत्तर देने के समय अथवा वकीलों को अपने व्यवसाय में झूठ बोलना अनुचित नहीं है।” ‘लेस्ली स्टीफन’ नामक अंग्रेज ग्रंथकार अपने नीति शास्त्र विषयक आधिभौतिक विवेचन में कहता है कि ‘किसी कार्य के परिणाम की ओर ध्यान देने के बाद ही किसी बात की नीतिमत्ता निश्चित की जानी चाहिए। यदि मेरा यह विश्वास हो कि झूठ बोलने ही से कल्याण होगा तो मैं सत्य बोलने के लिए कभी तैयार नहीं रहूँगा। मेरे इस विश्वास में यह भाव भी हो सकता है कि इस समय झूठ बोलना ही मेरा कर्त्तव्य है। नीति शास्त्र की चर्चा करते हुए ग्रीन साहब ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ‘नीति शास्त्र यह नहीं कहता कि किसी साधारण नियम के अनुसार सिर्फ यह समझ कर कि वह है हमेशा चलने में विशेष कुछ महत्व है, किन्तु उसका कथन सिर्फ यही है कि सामान्यतः उस नियम के अनुसार चलना हमारे लिए श्रेयस्कर है। इसका कारण यह है कि ऐसे समय हम लोग केवल नीति के लिए, अपनी लोभ मूलक नीच मनोवृत्तियों को त्यागने की शिक्षा पाया करते हैं।

हमारे शास्त्रकारों का कहना है कि-

न नर्मयुक्त वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाह काले। प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृताम्याहुरपातकानि॥

अर्थात् ‘हंसी में’ स्त्रियों के साथ, विवाह के समय, जब जान पर आ बने तब और सम्पत्ति की रक्षा के लिए, झूठ बोलना पाप नहीं है। (म.भा. आ. 82, 16, शा.प. 109, मनु 8.110) परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियों के साथ हमेशा ही झूठ बोला करें। सिजविक साहब ने जिस भाव से छोटे लड़के, पागल और बीमार आदमी के विषय में अपवाद कहा है वही भाव महाभारत के उक्त कथन का भी है। अंग्रेज ग्रन्थकार पारलौकिक और आध्यात्मिक दृष्टि पर कुछ भी ध्यान नहीं देते इसी लिए तो उन्होंने लिख मारा कि व्यापारियों को अपने लाभ के लिए झूठ बोलना तथा वकीलों का अपने व्यवसाय के लिए झूठ बोलना अनुचित नहीं है किन्तु यह बात हमारे शास्त्रकारों को मान्य नहीं है। इन लोगों ने कुछ ऐसे ही मौकों पर झूठ बोलने की अनुमति दी है जब कि केवल सत्य शब्दोच्चारण (केवलवाचनिकसत्य) और सर्वभूत हित (अर्थात् वास्तविक सत्य) में विरोध हो जाता है और व्यावहारिक दृष्टि से झूठ बोलना अपरिहार्य हो जाता है। इनका कहना है कि सत्य आदि नीति धर्म नित्य अर्थात् सब समय एक समान अपरिहार्य हैं, अतएव यह अपरिहार्य झूठ बोलना भी थोड़ा सा पाप ही है और इसीलिए प्रायश्चित भी कहा गया है यथा- तत्पावनाय निर्वाप्यश्चरुः सारस्वतो द्विजैः। (याज्ञ. 283, मनु. 8, 104-106) युधिष्ठिर ने संकट के समय एक ही बार दबी हुई आवाज से ‘नरो वा कुँजरो वा’ कहा था जिसका फल यह हुआ था कि उसका रथ जो पहले जमीन से चार अंगुल ऊपर चला करता था, अब और मामूली लोगों के रथों के समान धरती पर चलने लगा, और अंत में एक क्षणभर के लिए उन्हें नरक लोक में भी रहना पड़ा। (म.भा. द्रोण 191, 51, 58 तथा स्वर्गा. 3, 15) इससे सिद्ध होता है कि सत्य के संबंध में जो विशेष अवसरों के लिए अपवाद दिए गए हैं वे मुख्य या प्रमाण नहीं माने जा सकते क्योंकि शास्त्रकारों का तो अंतिम और तात्विक सिद्धाँत है-

आत्महेतोः परार्थे वानर्महास्याश्रपात्तथा।

येमृषानवदन्तीह ते नराः र्स्वणगामिनः॥

म.भा. अनु. 144/19

जो लोग इस जगत में स्वार्थ के लिए, परार्थ के लिए ठट्ठे में भी कभी झूठ नहीं बोलते, उन्हीं को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

अपनी प्रतिज्ञा या वचन को पूरा करना सत्य ही में शामिल है। भगवान श्रीकृष्ण और भीष्म पिता यह कहते हैं कि चाहे हिमालय पर्वत अपने स्थान से हट जाय अथवा अग्नि शीतल हो जाय परंतु हमारा वचन टल नहीं सकता। (म.भा.आ. 103 तथा 81-48) भर्तृहरि ने भी ऐसे सत्पुरुषों का वर्णन किया है-

तेजस्विनः सुखमसूनपि संत्यजन्ति।

सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम्॥

तेजस्वी पुरुष आनन्द से अपनी जान भी दे देंगे परंतु वे अपनी प्रतिज्ञा का त्याग कभी नहीं करेंगे। (नीति श. 110) श्री रामचन्द्रजी के एक पत्नी व्रत के साथ उनका एक बाण और एक वचन का व्रत प्रसिद्ध है। ‘द्विः शरं नाभि संघत्ते रामो द्विर्नाभिभाषते।’ हरिश्चन्द्र ने अपने स्वप्न में दिए वचन को सत्य करने के लिए डोम की नीच सेवा भी की थी। यद्यपि इस प्रकार के सत्याचरण के विरुद्ध भी कुछ न कुछ मिलता है। जैसे वेद में इन्द्रादि देवताओं ने वृत्रासुर के साथ जो प्रतिज्ञाएं की थीं उन्हें तोड़ दिया और उसको मार डाला। व्यवहार में भी कुछ कौल करार ऐसे होते हैं जो न्यायालय में बेकायदा समझे जाते हैं या जिनके अनुसार चलना अनुचित माना जाता है। अर्जुन के संबंध की एक ऐसी ही कथा महाभारत (कर्ण पर्व 99) में है। अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि ‘जो कोई मुझसे कहेगा कि तू अपना गाण्डीव धनुष किसी दूसरे को दे दे उसका शिर मैं तुरंत ही काट डालूँगा,’ इसके बाद युद्ध में जब युधिष्ठिर कर्ण से पराजित हुआ तब उसने निराश होकर अर्जुन से कहा। तेरा गाण्डीव हमारे किस काम का है, तू उसे छोड़ दे। यह सुनकर अर्जुन हाथ में तलवार ले युधिष्ठिर को मारने दौड़ा, भगवान कृष्ण उस समय वहीं थे उन्होंने तत्व ज्ञान की दृष्टि से सत्य धर्म का मार्मिक विवेचन करके अर्जुन को यह उपदेश किया कि ‘तू मूर्ख है, तुझे अब तक सूक्ष्म धर्म मालुम नहीं हुआ है, तुझे वृद्धजनों से इस विषय की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। ‘न वृद्धाः सेवितास्त्वया।’ तूने वृद्धजनों की सेवा नहीं की है। यदि तू प्रतिज्ञा की रक्षा करना ही चाहता है तो तू युधिष्ठिर की निर्भर्त्सना कर, क्योंकि सभ्यजनों की निर्भर्त्सना मृत्यु ही के समान है। इस प्रकार बोध करके अर्जुन को ज्येष्ठ भ्रातृ वध के पाप से बचाया। भगवान श्रीकृष्ण ने इस समय जो सत्यामृत विवेक अर्जुन को बताया है, उसी को आगे चलकर शाँति पर्व के सत्यानृत नामक अध्याय में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा है (शा. 109) सत्य की साधना के लिए व्यवहार करते समय इस उपदेश को लोगों को सतत् अपने सामने रखना चाहिए।


मौनव्रत की महिमा

(ले.-राजगुरु पं. हरिदत्त जी शास्त्री)

गीता में मानस तप के प्रकरण में ‘मौनमात्म विनिग्रहः, भाव संशुद्धिरित्येतत्तपो मानसः उच्यते।’ मन को शुद्ध करने के लिए मानसिक तप की आवश्यकता है। मानसिक तप का प्रधान अंग मौनव्रत है। नारद ने प. उप. में इसी ब्रह्मनिष्ठा के प्रकरण में कहा है ‘न कुर्यात् वदेत्किंचित्’ अर्थात् ब्रह्म-विकासी को मौन व्रत करना आवश्यक है। उपनिषदों में ‘अवाकी’ शब्द मौनव्रत को प्रकाश देता है? धर्मशास्त्र में कर्मांग में भी मौनव्रत बताया है। ‘उच्चारे जप काले च षट्सुमौनं समाचरेत’। जपकाल, भोजनकाल, स्नान, शौचकर्म में मौन रहना चाहिए। आचार प्रकरण में आता है ‘यावदुष्णं भवेदन्नं या वदश्नन्ति वाग्यतः पितरस्नाव दस्मिनियावन्नोक्ताः हविर्गुणाः।’ भोजन करते समय जब तक मौनपूर्वक भोजन करो, वह भोजन देवता पितरों को पहुँचता है। इसी पर सनक जुजात गीता में कहा है ‘वाचोवेगं मनसः क्रोध वेगं.... एतान् वेगान् योसहमे।’ वाणी के, मन के, इन्द्रियों के वेग को जो रोकता है वह ऋषि और ब्राह्मण है। चरक ऋषि ने विमानस्थान में आरोग्य की शिक्षा में कहा है ‘काले हितमितवादी’। जब कहने का अवसर हो तब संक्षिप्त शब्द और हितप्रद बात बोले।

‘चित्रं वटु तरोः मूले वृद्धा शिष्याः गुरुर्युवा गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्न संशयः’ कहते हैं कि आज एक वट वृक्ष के नीचे आश्चर्यप्रद बात देखी, जहाँ वृद्ध-वृद्ध पुरुष शिष्य थे और युवा गुरु था। गुरु ने मौनव्रत कर दिखाके सारे संशय दूर कर दिये। अर्थात् मौनव्रत से मनोबल होकर ब्राह्मी स्थिति हो जाती है। हाँ, जो गुलामी की जंजीर में जकड़े हुए हैं उनको तो ‘मौनान मूर्ख’ इस कहावत का भय रहता होगा। पर यह सत्य जानिये कि सब प्रकार के कलह शाँति के लिए मौनव्रत परमौषधि है- ‘मौनेन कलहोनास्ति।’ मौनव्रत वाले को कलह से भय नहीं रहता है। मौन न रखने से पहला दोष शास्त्र दृष्टि का यह है कि असत्य के आभास रूप संसार की सत्यवत् बात करना जो पाप है क्योंकि यह संसार परिणाम संधात, नहीं है, यह विवृत है। इसलिए ‘योन्यथा सन्नमात्मा न अन्यथा प्रणिपत्तये किं तेन नत्कर्श पापं चौरेणात्मपहारिणा।’ संसार को सभ्य व्यवहार करना ही आत्मा का अन्यथा ज्ञान है। देह, वृद्धि, दृश्य को सत्य कहना यही अन्यथावाद है। शास्त्र कहता है कि जिसने अपनी वाणी से संसार को सत्य कहा, आत्मा को उल्टा ज्ञान बताया वह चोर पापी है। इस पाप से बचने को भी मौनव्रत उपकारक है। चातुर्मास्य व्रतों में मौनव्रत की प्रतिष्ठा मानी गयी है। माधवाचार्य ने शंकर दिग्विजय लिखने के आरंभ में ही कह दिया। ‘वन्ध्यासूनु खरी विषाण सदृश क्षुद्र क्षितीन्द्र क्षमा .................... मद्वाणि मधिपा संयामि यस्मिन् त्रैलोक्य रंगस्थली’ अर्थात् मैंने राजाओं की झूठी प्रशंसा करने से जो अपनी जिह्वा पर पाप लगा दिया है उसकी शुद्धि करने के निमित्त आज भगवान शंकराचार्य के सच्चे वर्णन को कहता हूँ। इससे भी संसार की झूठी बातों से पाप बताया। उसका उपाय भी मौनव्रत है।

उपनिषद्- ‘यद्वाचा नाभ्युदिते।’ ब्रह्म वह है जो वाणी से नहीं कहा जाता। तब अब्रह्म शब्दों को रोकने के लिए मौनव्रत है। ‘मुनिमौन परो भवेत्’ मौनव्रत में ही मुनि की प्रतिष्ठा है। वाणी तेज का विषय है, तेज ही रवि अर्थात् प्राण है। इसके क्षरण न करने से तेजोमात्रा संचित होकर तेजस्वी दीर्घायु होता है। आपको स्मरण रहे जिन इन्द्रियों से तेजोमात्रा का क्षरण होता है। उनके निग्रह से एक महान शक्ति का संचय हो जाता है। गाँधारी के नेत्रों के द्वारा जो तेजीमात्रा क्षरित होती थी उसका संयमन करके उसने अपने पुत्र दुर्योधन का शरीर अच्छेद्य, अभेद, वज्रमय बना दिया था, इसी तरह वाणी का संयमन जो मौनव्रत है, उसके प्रभाव से वाणी में शक्ति आ जाती थी। द्रोणाचार्य ने अपने पूर्व वाणीव्रत से ‘उभयोरपि सामर्थ्य शापादपि शरादपि’ इसको चरितार्थ किया।

जिसने मौनव्रत धारण कर वाणी के वेग का संयमन कर लिया वह वाणी से कदाचित शाप या अनुग्रह करना चाहे तो कर सकता है। उसकी वाणी इतनी बलवती और सफला हो जाती है वह जो कहता है, चाहे शाप या अनुग्रह दोनों ही, कर सकता है। आपने सत्यवाचा का प्रसंग सुना होगा। उस सत्यवाचा के मुख से जो शब्द निकलते थे वह सत्य होते थे। इसलिए मौनव्रत परमाराध्य है। कुछ लोग खाने-सोने तथा क्लब सोसाइटियों में गप्प लड़ाने के अभ्यस्त हो गये हैं। उनका विश्वास यह रहता है कि गप्प-शप्प करने से मनोविनोद हो जाता है, किन्तु यह बात सर्वथा असत्य है। व्यर्थ गप्प से अपनी वाणी की कुशलता का भ्रामक ज्ञान लोगों को होता है। गप्प करने से वाणी का तेज नष्ट हो जाता है। बकवादी का वेदमयी वाणी पर भी कम विश्वास होता है। गप्प से मन प्रसन्न रहेगा यह भ्रममात्र है। गप्प का परिणाम मन को खेदजनक बनाना है। यह शाँतिकारक वाणी का दोष है। इसलिए परम शाँति चाहने वालों को मौनव्रत पर ध्यान देना चाहिए।

मनोबल और व्रत की प्रारम्भिक भूमिका का ऐसा अभ्यास डालिये कि पहले मितवादी बनने की कोशिश कीजिए, गप्पबाजी से अपना पीछा छुड़ाइए। कम से कम प्रातःकाल में जब तक शौचाचार, भजन होता है तब तक अर्थात् 8-9 बजे तक मौनपूर्वक अपने आपको रखना सीखिए। भोजनादि तथा ऊपर वर्णित कार्यकाल में मौनव्रत रखिए। महीने में किसी एक या दो पुण्य दिन निश्चित कर लीजिए, जैसे- एकादशी या पूर्णिमा या रविवार। इन सब या इनमें से किसी दिन भी मौनव्रत रखिए। इस प्रकार मौनव्रत का अभ्यास पड़ जाने से आप में स्वतः विद्या का प्रकाश और आत्मानुसंधान होने लगेगा और आप मौनव्रत के महात्म्य को स्वयं अनुभव कर लेंगे।

मौनव्रत महान पुण्यदायी पापहारि है। इससे मनोबल का संचार होने लगे जायेगा। पर गूँगा रहना मौनव्रत नहीं है। मौनव्रत रखने से लाभ होता है, केवल चुप्पी साधने से नहीं। मौनव्रती को मिताहारी, ब्रह्मचारी, प्रणवजापी होना चाहिए। ऐसा जप करें कि अर्द्धमात्रा का अनुभव हो जाये। जिससे निर्वाण कला की जागृति हो। मैंने स्वामी कृष्णानन्द जी को एक बार 15 वर्ष के बाद देखा। उनका अखण्ड मौनव्रत साढ़े तीन वर्षों से है। उनमें ब्रह्म तेज की शक्ति आप देख सकते हैं। वे नग्न गंगोत्री में रहते हैं। 1907 में एक महात्मा को विमलेश्वर में मैंने देखा लोगों ने कहा कि 36 वर्ष से इनका मौनव्रत चल रहा है।


मनुष्य ही देव और असुर है।

(श्री लालचन्द्रजी)

देव भी मनुष्य हैं और असुर भी मनुष्य हैं, देवों से जगत में दिव्य ऐश्वर्य वैभव बढ़ता है और सर्वहित होता है। असुरों की इच्छा सदा केवल अपना ही ऐश्वर्य वैभव बढ़ाने की होती है और उनकी गढ़ी हुई ऐश्वर्य शक्ति जगत में द्रोह, कलह और उपद्रव फैलाकर अन्ततः मनुष्यों में परस्पर युद्ध उत्पन्न करके जगत के विध्वंस का कारण बनती है। असुर साम्राज्यवादी होते हैं, वे केवल अपनी ही बढ़ती चाहते हैं, और छल, कपट, दंभ, अत्याचार से सरल सीधे लोगों को पराधीन कर के उनका हर प्रकार से शोषण करते हैं।

असुरों के प्रभाव से मनुष्य की कामना, लालसा में बदल जाती है। भावना का स्थान परस्पर की स्पर्धा ले लेती है और आपस में सहकार, प्रेम और उदारता के स्थान ईर्ष्या, द्वेष और घृणा मनुष्यों के हृदयों में बस जाते हैं। मानव-हृदय विलास प्रिय हो जाता है और प्रेयसी और रुचि बढ़ते-बढ़ते मनुष्य श्रेय से अलग सा होने लगता है। असुरों के प्रभाव से साधारण जनों में मिथ्याचार, दिखावा, धोखा फैलता है और मनुष्यों की वृत्ति पापमयी, स्वार्थी और मलिन हो जाती है। असुर लोगों की शिक्षा, दीक्षा भी उन्हीं लोगों के अनुकूल हुआ करती है। वे शिक्षा मानवता के विकास की नहीं देते, बल्कि उनकी शिक्षा में कोरे आचार-विचारों की ही भरमार होती है। संक्षेपतः असुरों में हिंसक पशुओं की सी वृत्ति अधिक और मानव स्वभाव के विकास का पर्याप्त अवसर न मिलने के कारण असुर समाज में विलासिता का ही दौर दौरा रहता है। मदिरापान, माँस भक्षण आदि ही उन्हें रुचते हैं और चाय आदि की भरमार के कारण उनका स्वभाव चंचल तथा क्रूर होता है। उनके प्रेम में व्यभिचार, बर्ताव में कपट, व्यवहार में छल तथा आपस में राग रहता है। आपस में भी ऊपरी ही प्रीति होती है। जो स्वार्थ पूर्ति तक टिकती है। उनका प्रेम वास्तव में मोह-युक्त अथवा आसक्ति से बंधा हुआ होता है। असुर स्वभाव वाले लोग प्रेम करना जानते ही नहीं, उनका प्रेम तो विलासिता तथा काम-लिप्सा में समाप्त होता है। समता दृढ़ होती है और हृदय में कर्त्तव्य करने की स्फूर्ति बढ़ती है। सत्य और प्रेम असुर वृत्ति में नहीं दिखाई दिया करते, वहाँ तो दिखावा है, वास्तविकता नहीं।

जो कोई भी स्वार्थी है, जो केवल अपने ही प्राणों का पोषण जानता है जिसे केवल अपनी ही फिक्र है, जिसका ध्येय केवल अपने शरीर की रक्षा है, वहाँ असुर है। असुरत्व की भित्ति स्वार्थ है, देवत्व की नींव उदारता है। जिसका स्वार्थ सीमित है, मर्यादा के अंदर है वह साधारण मानव है। जो अपने स्वार्थ का दमन करके पर हित में लगे हैं वे देव हैं। जो केवल अपनी ही स्वार्थपूर्ति में तत्पर हैं, वे असुर हैं।

असुर अभिमानी, क्रोधी और अन्यायी होते हैं वे धर्म नहीं समझते और उनका आचरण सदा कुटिलता, हिंसा, निर्दयता और कठोरता का होता है। असुर लोगों में पाशविक शक्ति विपुल होती है पर उनमें आत्मिक तेज और ओज नहीं होता। असुर लोग बलवान होते हुए भी सदा अपने अत्याचारों के कारण जनता से भयभीत रहते हैं। असुर लोग निर्लज्ज, लोभी, क्षुद्र, निष्ठुर, द्वेषी, ईर्ष्यालु, कामी तथा पापाचारी होते हैं। असुर लोगों में दर्प, निन्दा, क्रूरता, शठता, पिशुनता, कृपणता, मलिनता आदि दुर्गुण पाये जाते हैं। असुरों को समता नहीं भाती, वे विषमता में ही सुख मानते हैं। असुरों का मन्तव्य है कि वे तो ऐश्वर्यशाली हों और अन्य जन उनके आधीन रह कर उनकी आज्ञा पालन करते रहें। असुरों में आपस में तो ममता तथा राग और स्नेह होता है, पर अन्य लोगों के साथ उनका बर्ताव घमंड का होता है। अहंकार का विकृत रूप असुरों में ही देखा गया है। असुर लोग बहुत डींगें मारते हैं। अपनी कीर्ति के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं। सदा यश की कामना करते रहते हैं पर उन्हें न तो सत्पुरुषों में यश ही मिलता है और न भले मनुष्य उनकी कीर्ति ही करते हैं। यश चाहते हुए भी असुरगण सदा अपयश के ही भागी होते हैं। असुरों की नीति में सरलता नहीं होती। धोखा, टेढ़ापन और कुटिलता ही उनकी नीति के आधार होते हैं। असुर लोग जनता के हृदयों पर राज्य नहीं कर सकते, वे केवल शरीरों पर अत्याचार करके अपने अधिकारों का प्रदर्शन किया करते हैं। संसार की हानि सदा से असुरों के कारण ही हुई है।

असुरों में हठ बहुत देखा गया है। वे हारने पर भी ढीठ बने रहते हैं। वृथा बकवाद करना और डींगें मारना उनका मुख्य लक्षण है। अपनी डींगें मारना उनकी आदत होती है। उनमें दम, दान और दया नहीं होती। उनमें स्वैर वृत्ति, कृपणता, वैर भाव, क्रूरता आदि दोष देखे गए हैं, असुरों के भाषण कटु, उनकी वाणी कठोर, उनकी जीवनचर्या दम्भ से भरी होती है। असुर लोग प्रायः साधारण लोगों में भले से बने रहकर उन्हें ठगा करते हैं और अपना स्वार्थ पूरा किया करते है। संक्षेपतः असुरों में सारे लक्षण रजोगुण के पापी जाते हैं, काम और क्रोध, जिनकी उत्पत्ति ही रजो गुण से कही गई है, असुरों में स्पष्ट दीखते हैं। रजोगुण के मूर्तिमान स्वरूप असुर लोग होते हैं। इतिहास साक्षी है कि असुरों के द्वारा जगत का कल्याण कभी नहीं हुआ, सर्वहित उनका ध्येय ही नहीं होता। असुर लोग सदा स्वार्थी होते हैं और यह अनुभव सिद्ध बात है कि स्वार्थ यदि सीमित न रहे तो सदा विनाश का कारण होता है।

देव मनुष्य असुर मनुष्यों से विपरीत गुण वाले होते हैं। देवों में परस्पर प्रेम, मेल-मिलाप तथा समता के भाव विशेष होते हैं। देव मनुष्यों में अन्यता का भाव नहीं होता, वे सबसे अनन्यता का, विमल प्रेम का व्यवहार करते हैं, और इसी कारण सदा अभय रहते हैं। देव मनुष्यों का अन्तःकरण शुद्ध रहता है। उनमें ऋजुता तथा सरलता होती है। अहिंसा, सत्य, शाँति, ओजस्विता स्थिरता, दृढ़ता, धैर्य, ज्ञान, दक्षता आदि सद्गुण देव मनुष्यों में विकसित होते रहते हैं। देव मनुष्य प्रियवादी गंभीर, दयावान, संयमी, सदाचारी और त्यागी देखे गए हैं। यश की भावना देव मनुष्यों में ही चरितार्थ होती है। देवों का अन्तःकरण शुद्ध होता है। शुद्ध पवित्र अन्तःकरण में ही ज्ञानयोग की व्यवस्थिति होती है। देव मनुष्य सदा अभय रहते हैं क्योंकि वे किसी की हानि नहीं करते, सब का हित चाहते और करते रहते हैं और जनता उनके लिए प्राण तक देना कर्त्तव्य समझते है। देव लोग सर्वप्रिय होते हैं। जो अधिकार, बल से, शक्ति से, असुरों को नहीं मिलता, वह अधिकार देवों को उनके उदार चरित्र होने के कारण उन्हें जनता, स्वयं भेंट करती है, वे जनता के हृदयों के राजा होते हैं। जनता के हृदय में उनका निवास होता है क्योंकि वे जनता के सुख-दुख के साथी होते हैं। जनता उनका आदर करती है उनकी आज्ञापालन करती है। देव मनुष्य निष्काम सेवा में ही अपनी तृप्ति ओर प्रसन्नता समझते हैं, वे लेने के स्थान पर देने में ही तत्पर रहते हैं। दर्प और दंभ तो उन्हें छू भी नहीं सकते, वे सदा नम्र और सरल स्वभाव के ही होते हैं। देव मनुष्य नित्य आत्म परीक्षण द्वारा अपने आपको ठीक-ठीक देखकर अपने दोष दूर करते रहते हैं। देवों में अंदर बाहर की पवित्रता स्पष्ट झलकती है। देवलोग त्यागपूर्वक तथा संन्यासी रहकर सब भोग भोगते हैं वे असुरों की भाँति लोलुप तथा लम्पट नहीं होते। देव मनुष्यों की वृत्ति निश्चल, एकाग्र तथा स्थिर होती है, उनमें अभिमान नहीं होता, आत्म-सम्मान होता है। शक्तिशाली होते हुए भी वे नम्र देखे गए हैं। उदारता उनका एक विशेष लक्षण होता है, देव मनुष्यों में अन्य जनों को ठीक-ठीक पहचानने की क्षमता होती है इसलिए उनकी सफलता चिरस्थायी होती है। देव मनुष्यों में सत्वगुण प्रधान होता है। वे सदा प्रसन्न चित्त अपने कर्त्तव्यों को समझने वाले और समझबूझ कर कर्त्तव्य पालन करने वाले हुआ करते हैं। देवलोग सदा अपने वचन को निभाते हैं, वे अपनी प्रतिज्ञा का प्राणपण से पालन करते हैं। सत्यनिष्ठा उनके जीवन की विशेषता होती है, वे सदा कर्त्तव्यरत और कर्मफल-त्यागी होते हैं। वे अपने आपको सात्विक दान तथा ज्ञानयुक्त भोग में व्यय करके सदा प्रफुल्लित रहते हैं। देव मनुष्यों को कभी चिन्ता, भय, शोक और रोग नहीं घेरते, वे सदा स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट होते हैं। उनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। उनका शरीर सुँदर तथा मन पवित्र होता है, वे सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के उपासक होते हैं। देवलोग जनार्दन पूजा के लिए विख्यात हैं। निष्काम जनसेवा में ही उन्हें प्रसन्नता मिलती है। देव मनुष्यों में ही वास्तविक पुरुषार्थ देखा गया है। उन्हें आत्मप्रसाद मिलता है। वे जीवन-संग्राम में विजयी होकर जीवन को खेल तथा संगीत के रूप में देखते हैं और नित्य आनन्द मग्न कर्त्तव्य में लगे रहते हैं।

उदार चरित्र देव हैं और कृपण लोग असुर हैं। कृपण तो वास्तव में है कृपा का पात्र, तरस के योग्य। क्योंकि कुमार्ग तथा आसुरी बुद्धि के कारण वह ऐश्वर्य रखता हुआ भी दरिद्री है। उसके मन में संकीर्णता है, असुर सदा चिंतातुर देखे गये हैं। उनके छोटे-दिल, उनके कठोर बर्ताव, उनके छल, कपट, उनके ईर्ष्या, द्वेष और घृणा, उन्हें कभी निश्चित रख ही नहीं सकते। देवजन सदा आत्मतृप्त और संतोषी होते हैं। देवत्व में जीवन का विकास है असुरत्व में जीवन का ह्रास है।


क्या सिद्धियाँ आवश्यक हैं?

जिन सिद्धियों के लिए लोग लालायित रहते हैं और अपनी व्यक्तिगत इच्छा और अभिलाषा लिए उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। उनके संबंध में आइए सार्वजनिक हित की दृष्टि से बड़े दृष्टिकोण से विचार करें कि यदि सिद्धियाँ सर्व सुलभ हो जाएं तो संसार में सुविधा की वृद्धि होगी या असुविधा की।

मान लीजिए कि अपने जीवन की अवधि लोगों को मालूम हो जाय यह पता चल जाय कि हमारी मृत्यु, कब? किस दिन? कहाँ? किस प्रकार होगी? तो उस मनुष्य का जीवन बड़ा विचित्र हो जायगा। अमुक दिन मरूंगा, इससे पहले नहीं मर सकता, यह निश्चय हो जाने पर वह बड़ी से बड़ी दुर्घटना करने के लिए, किसी से भी लड़ने मारने के लिए तैयार हो जायगा। मृत्यु के डर से लोग आगे-पीछे सोचते हैं और संघर्ष में पड़ने से बचते रहते हैं। जब मरने से निधड़क हो गया हो, उसे बड़े से बड़े उत्पात करने में कुछ भय न होगा। दूसरी बात यह भी है कि जिसे मालूम है कि मेरी मृत्यु के समय में केवल इतना समय रहा है साँसारिक काम-धंधों से उदास होकर बैठ जायगा। मृत्यु के शोक में बहुत पहले से डूब जायगा। किन्हीं बड़े कामों का आयोजन न करेगा। समाज में मित्रता और घनिष्ठता स्थापित न करेगा। अपने दीर्घ जीवन की आशा से लोग धन वैभव एकत्रित करते हैं, वह उसके मरने पर विधवा तथा बच्चों के काम आती है जिसे मालूम है कि मुझे सिर्फ आठ महीने जीना है वह संचय न करेगा, जो होगी उसे भी खर्च कर देगा, ऐसी दशा में पीछे वालों को जो पैतृक धन से सहायता मिलती है वह न मिला करेगी। जो जल्दी मरने वाला होगा, उसका विवाह न होगा बेचारा विवाह सुख से भी वंचित रह जायगा। अधूरी उम्र के स्त्री पुरुषों को दूसरा साथी न मिलेगा, उन्हें अविवाहित जीवन बिताना पड़ेगा। इस प्रकार एक नहीं हजारों प्रकार की कठिनाइयाँ बढ़ जावेंगी। यदि लोग अपना मृत्यु समय निश्चित रूप से जान लिया करें तो संसार का स्थिर रहना उसकी कार्य प्रणाली चलना बड़ा कठिन हो जाय। यदि वह ऐसा न करता तो बेचारे वैद्य डॉक्टरों का पेशा ही मिल जाता। जिसकी मृत्यु जिस स्थान पर जिस प्रकार होने को होती, लोग उसका बचाव करने के लिए दूर भागते और परमात्मा को अपना विधान कायम रखने के लिए भारी रस्साकशी करनी पड़ती। इस कठिनाई को ध्यान में रखकर परमात्मा ने मनुष्यों को मृत्युकाल का पहले से ही ज्ञान होना असंभव कर दिया है।

मान लीजिए कि व्यापार की तेजी मंदी का लोगों का पता चल जाय, तो व्यापार का कारोबार ही ठप्प हो जाय। जब लोगों को यह मालूम हो जाय कि अब तेजी आने वाली है तो पहले से ही लोग चीजों को रोक लेंगे और लोगों को वह वस्तु मिलनी कठिन हो जायगी। इसी प्रकार वह मालूम हो जाय कि यह चीज मंदी होने वाली है तो उसे बेचना तो सब चाहेंगे, लेगा कोई नहीं। जो वस्तु मंदी होने वाली है, उसका उत्पादन और आयात ही कोई न करेगा, फलस्वरूप उस वस्तु का मिलना दुर्लभ हो जाएगा। सब लोगों को तेजी मंदी का पता चलने लगे तब तो व्यापार नाम की कोई वस्तु ही न रह जायगी और तेजी मन्दी केवल शब्द कोषों में ही लिखी मिलेगी। इतना न भी हो केवल किन्हीं एक दो मनुष्यों को भी तेजी मंदी का ठीक ज्ञान हो तो वे एक दिन में अरबों खरबों रुपया एकत्रित कर सकते हैं। जिसे तेजी मंदी का ठीक ज्ञान होगा वह संसार की समस्त संपदा पर चंद दिनों के अंदर कब्जा कर लेगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से संसार का साधारण क्रम बिल्कुल उलट-पलट हो जाएगा। परमात्मा अपनी दुनिया को इस प्रकार उलट-पुलट नहीं करना चाहता इसलिए उसमें तेजी मंदी का सच्चा ज्ञान किसी ज्योतिषी, सिद्ध या सटोरिये को नहीं दिया है।

मान लीजिए कि लोगों को अपने भाग्य की बात मालूम हो जाय तो उन्हें कोई प्रयत्न, परिश्रम या उद्यम करने में रुचि न रहे। जितना धर्म जब जिस दिन मिलना होगा उतना-मिल ही जायगा, किस उद्योग करने की परेशानी सिर पर लेने से क्या फायदा? जो रोग, शोक, लाभ, हानि, यश, अपयश, उन्नति, अवनति, पाप, पुण्य, सुख होने वाला होगा हो ही जाएगा। तकदीर की लिखी होकर रहेगी फिर किसी प्रकार के परिश्रम का झंझट करने से क्या लाभ? इस प्रकार का निर्णय हर आदमी कर लिया करेगा और क्रियाशीलता, कर्मपरायणता को छोड़ बैठेगा। उद्योग में किसी को रुचि न रहेगी। निठल्लेपन, अकर्मण्यता, निराशा और उदासीनता का चारों ओर साम्राज्य छा जायगा, कोई आदमी किसी बात के लिए, अपने को जिम्मेदार न समझेगा। अदालत, पुलिस, राजदंड आदि की भी आवश्यकता न समझी जायगी। जिसका जिस प्रकार जो होता है, जिसका जैसा भाग्य है उसे कोई मिटा नहीं सकता। विधाता के अंक मिट नहीं सकते फिर पुलिस, अदालत एवं राजदंड की क्या आवश्यकता? ऐसा निराशावाद एवं कर्मत्याग संसार चक्र को चलने से रोक देगा। दुनिया बड़ी नीरस और कुरूप हो जाएगी। यह स्थिति परमात्मा को स्वीकार नहीं। यही कारण है कि उसने भाग्य को जानने की किसी को भी सुविधा नहीं दी है। जो ज्योतिषी दूसरों का भाग्य बताते हैं, वे अपनी जीविका चलाने के लिए ग्राहकों को बुलाने का प्रयत्न करते हैं। यदि उन्हें यह विश्वास होता कि इसमें भाग्य कथन की वास्तविकता योग्यता है तो सबसे पहले अपना भाग्य देखते और जितनी आमदनी होना भाग्य में लिखा मिलता उसे अमिट समझकर भाग्य बताने का झंझट और धन प्राप्त करने का प्रयत्न करते। उन ज्योतिषियों की अन्तरात्मा जानती है कि हमारा ‘भाग्य कथन’ निश्चित नहीं है, इसलिए वे उस पर निर्भर न रह कर प्रयत्न का आश्रय लेते हैं। भाग्य जानने की सिद्धि से मनुष्य जाति को वंचित रख कर परमात्मा ने संसार चक्र के रुक जाने के खतरे से पहले ही खबरदारी कर ली है।

यदि मनुष्य दूसरों के मन की, पेट की बात जान लिया करते तो दुनिया में कोई बात गुप्त न रह पाती। चारों को यह मालूम पड़ जाता कि अमुक का धन कहाँ रखा है, कब वह घर से बाहर जाएगा। बस, मौका पाते ही आसानी से धन चुरा लिया करते। युद्ध की योजनाएं, हथियार, सेना की संख्या आदि के भेद दूसरों के मन में से जान कर लड़ाई करने वाला दूसरा पक्ष तैयार हो जाता। व्यापारिक भेद भी प्रकट हो जाते और लाभ उठाने की गुंजाइश न रहती। यहाँ तक कि किसी को किसी से बातचीत करने की भी जरूरत न पड़ती। झट यह मालूम कर लिया जाता कि सामने वाला क्या चाहता है। इस चाहना का जो उत्तर मिलना होता उसे आगन्तुक भी सामने वाले का दिल टटोल कर जान लेता। झूठ बोलने, धोखा देने आदि के लिए गुंजाइश भी न रहती। दूसरों का मन परखने की छोटी सी बात यदि सर्वसुलभ हो जाती तो इस छोटी चीज के कारण ही संसार की स्थिति कुछ से कुछ हो जाती। फिर यह लोक मर्त्यलोक न रहकर यक्षलोक हो जाता।

यदि सोना बनाने की विद्या लोग जान जाते तो सोने का स्थान लोहा या पीतल जैसा हो जाता। प्रचुर परिमाण में बनने लगने पर वह पीतल की तरह बिकता। तब उसके जेवर पहनना लोग अपमानजनक समझते। सोना इसीलिए सोना है कि वह थोड़ी मात्रा में है, जिस दिन वह रसायन विद्या से या पारस से बनने लगेगा उसी दिन वह सोना न रहेगा। आसानी से बन जाने वाले चाँदी, राँगा और जस्ता से अधिक महत्व की न रहेगी। फिर वह पारस पत्थर भी कौड़ी कीमत का रह जाएगा। धातु बनाने के काम आने वाले अनेकों रासायनिक वस्तुओं की श्रेणी में एक चीज पारस भी गिनी जाने लगेगी। प्राचीन काल में विमान में बैठने वाले देवता समझे जाते थे अब तो नन्नू जुलाहा भी दस रुपए खर्च करके विमान की सैर कर सकता है। अब विमान का महत्व बढ़िया मोटर जितना रह गया है। कुछ समय बाद आज का जितना भी महत्व न रहेगा इसी प्रकार पारस भी यदि मनुष्य जाति के लिए सुलभ हो गया तो उसके महत्व की भी ऐसी ही दुर्दशा होगी।

अमृत यदि मिलने लगे और उसे पीकर सब लोग अमर हो जाएं तो संसार में कुछ ही समय बाद भूमि का बिल्कुल अभाव हो जाएगा। एक मनुष्य यदि तीन वर्ष में एक बच्चा पैदा करे तो जीवन भर में असंख्य बच्चे पैदा करता चला जाएगा। फिर एक-एक बच्चे के उसी क्रम से अनेकों बच्चे होते जायेंगे। पुरखे मरेंगे नहीं, लड़के पैदा होते जायेंगे। यह बढ़ोत्तरी आखिर इतनी हो जाएगी कि भूमि से खाद्य पदार्थ प्राप्त करना तो दूर खड़े रहने की भी जगह न बचेगी। भारी मेलों की भीड़ के समान आबादी ठसाठस खड़ी होगी। खाद्य पदार्थों का कोई साधन न होगा। भूख प्यास से लोग छाती पीटेंगे। मर कर इन कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने का द्वार बंद हो जाएगा। असह्य पीड़ा देने वाले रोगों से छुटकारा प्राप्त करने का द्वार बंद हो जाएगा। असह्य पीड़ा देने वाले रोगों से छुटकारा दिलाने वाली मृत्यु तो रहेगी नहीं, वे यातनाएं घुल-घुलकर और चीख-चीख कर सहनी होंगी। अमृत को पाने के लिए जो आज लालायित हैं वे ही उस समय इसे जीवन का सबसे बड़ा हानिकारक पदार्थ समझेंगे। इससे दूर रहने का प्रयत्न करेंगे।

अदृश्य होने की विद्या सीख जाने पर लोग चाहे जहाँ छिपकर बैठे रहा करेंगे, दूसरों की गुप्त बातों को देख लिया करेंगे। काम सेवन की एकान्त लज्जा की रक्षा करना भी कठिन हो जाएगा। चोर, डाकू, व्यभिचारी हत्यारे व्यक्ति चाहे जहाँ छिपकर बैठ जाया करेंगे और फिर मनमानी करतूतें किया करेंगे। पकड़े जाने और सजा भुगतने का भी उन्हें डर न रहेगा।

यदि नेत्रों और कानों की शक्ति बहुत बढ़ जाय। शब्द तथा प्रकाश की किरणों को अधिक पकड़ने लगे तो देखने और सुनने की क्रिया में भारी विक्षेप उत्पन्न हो जाय। मनुष्य के कानों के पर्दे इस प्रकार बने हुए हैं कि एक नियत संख्या के शब्द कम्पन ही वह ग्रहण कर सकता है। यदि उसकी शक्ति अधिक तेज हो जाय और आकाश में बहने वाली शब्द तरंगों को अत्यधिक मात्रा में ग्रहण करने लगे तो शब्दों की भारी भीड़ कान के पर्दों पर जमा हो जाएगी और जैसे मेले ठेलों में कचर पचर के अनेक संमिश्रित शब्द कानों में टकराते हैं कि कोई भी बात ठीक प्रकार सुन समझ नहीं पाते। किसी साथी से बातें करनी होती हैं तो उसके कान के पास मुँह ले जाकर कहते हैं तब वह उस कचर पचर में से उस बात को सुन पाता है। यदि कान अधिक तीव्र हो जाय तो वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसी कचर-पचर कानों में हर घड़ी सुनाई पड़ा करेगी। दूर-दूर के शब्द आकर कानों के पर्दों में टकराया करेंगे उस भीड़ में साधारण बातें भी सुनना कठिन पड़ जाएगा। यही बात नेत्र, नासिका आदि इन्द्रियों की शक्ति बढ़ने पर होगी। उस दशा में सुविधा न होकर अनेक गुनी कठिनाई बढ़ेगी। इसी से परमात्मा ने नेत्र कान आदि इन्द्रियों को उतनी ही शक्ति दी है जितनी उपयोगी एवं आवश्यक है।

जो वस्तुएं मनुष्य के लिए आवश्यक हैं वे सुलभतापूर्वक उपलब्ध हैं। हवा, जल, भोजन, वस्त्र, मकान आदि जिन वस्तुओं की अधिक आवश्यकता है आसानी से मिल जाती हैं। हवा सबसे अधिक आवश्यक है, उसके बिना क्षण भर भी जीवन संभव नहीं, इसीलिए वह अत्यंत ही सुविधापूर्वक पर्याप्त मात्रा में मिल जाती है। इसके बाद क्रमशः पानी का, अन्न का, वस्त्र का, मकान का नंबर है। इसी क्रम से यह वस्तुएं कष्टसाध्य होती जाती हैं। इसी क्रम से जो वस्तु जितनी ही अनावश्यक एवं अनुपयोगी हैं वे उतनी ही कष्ट साध्य है। परमात्मा ने जिन बातों को मनुष्य के लिए आवश्यक समझा है उन्हें सुगम रखा है। जो चमत्कारिक सिद्धियाँ निष्प्रयोजन एवं खतरनाक हैं वे गोप्य हैं, दुर्लभ हैं, सर्वसाधारण के लिए उनकी प्राप्ति असंभव जैसी है।

जिन योगीजनों की आत्मा, योग साधन द्वारा आत्म संयम द्वारा बहुत ऊंची उठ गई है, जो जीवन मुक्त पुरुष परमात्मा की समीपता में हैं, निस्संदेह उनमें विशेष तेज होता है। उनमें ईश्वरीय शक्ति के अंश आ जाते हैं, साधारण मनुष्यों की अपेक्षा वे विशेष आध्यात्मिक अनुभूतियाँ रखते हैं। परन्तु जिस आध्यात्मिक भूमिका में पहुँचने पर जीव को विशेष स्थिति प्राप्त होती है उस अवस्था में पहुँचने पर उसका आत्मिक दृष्टिकोण बहुत ऊंचा उठ जाता है, तब वह परमहंस, स्थिति प्राप्त, गुणातीत एवं जीवन मुक्त की दशा में होता है। उस समय वह अपने आध्यात्मिक उत्तरदायित्व को भली प्रकार समझने लगता है और सांसारिक संपदाओं के लोभियों द्वारा उसे उल्लू नहीं बनाया जा सकता। समस्त विश्व कर्म की धुरी पर घूम रहा है, हर व्यक्ति अपने प्रयत्नों और कर्मों के अनुसार भले बुरे परिणाम प्राप्त करता है। सच्चा योगी इस ईश्वरीय क्रिया पद्धति में अकारण टाँग नहीं अड़ाता। जिस किसी की सहायता करनी होती है उसे कर्त्तव्य कर्म पर चलकर अपने प्रयत्न से अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करने की सलाह देता है। अपनी निजी शक्ति से ईश्वरीय व्यवस्था क्रम में टाँग अड़ाकर किसी को लाभ हानि नहीं पहुँचाता। कोई चमत्कार या अनोखे करतब नहीं दिखाता।

योग शास्त्रों में योगीजनों के लिए सिद्धियों को प्रकट करना और उनका प्रयोग या प्रदर्शन करना सर्वथा निषिद्ध कहा है। क्योंकि इससे परमात्मा के व्यवस्थाक्रम में गड़बड़ी उत्पन्न होती है। अस्वाभाविक ढंग से प्राप्त की हुई वस्तुएं प्राप्त करने वाले के लिए तथा अन्य लोगों के लिए अन्ततः हानिकारक सिद्ध होती हैं। धन को परिश्रम, उत्पादन या व्यापार के साधारण, स्वाभाविक क्रम से कमाया जाना चाहिए। परिश्रम का ही फलता फूलता है। किसी को जमीन में गढ़ी गई विपुल संपदा मिल जाय तो वह उसका सदुपयोग न कर सकेगा। साधारण मनुष्यों को यदि कोई विचित्र लाभ किसी ऋद्धि-सिद्धि द्वारा मिल भी जाय तो वे अपनी आध्यात्मिक अपरिपक्वता के कारण उनका दुरुपयोग करने लगते हैं फलस्वरूप वह लाभ उनके लिए तथा सबके लिए हानि से भी बुरा पड़ता है।

चमत्कारी सिद्धियाँ केवल उन लोगों को प्राप्त होती हैं जो उनका उपयोग संसार चक्र में गड़बड़ी फैलाने में प्रयोग नहीं करते। ऐसे महात्मा किसी लोभी की खुशामद के भुलावे में पड़कर उसकी इच्छानुसार चलने को तैयार नहीं होते। वे भूल कर भी अलौकिक शक्तियों का किसी पर प्रदर्शन नहीं करते। हाँ मानवोचित सेवा धर्म से प्रेरित होकर स्वयं कर्त्तव्य धर्म में प्रवृत्त रहते हैं और दूसरों को भी कर्त्तव्य धर्म में लगे रहने का उपदेश करते हैं। पर किसी को क्षण भर में करोड़पति बना देने के लिए तेजी मंदी, सट्टा, लाटरी, भाग्य, भविष्य बताने का उनका कार्यक्रम नहीं रहता। अपनी आत्म-शक्ति से किसी के बुरे कर्म फल को जादू की तरह हटा नहीं देते, वरन् भविष्य में वैसा कर्म फल फिर न मिले, इस प्रकार का ज्ञान का सदुपदेश करते हैं। स्व प्रयत्न से कर्म प्रक्रिया द्वारा वैभव पर्व संपत्ति प्राप्त करने के लिए ही जनता का पथ-प्रदर्शन करते हैं। जो योगी सिद्धियों का सदुपयोग करने की आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त नहीं कर सके हैं उन्हें तो सिद्धियाँ मिलती नहीं, जो उस स्थिति में पहुँच जाते हैं वे प्राप्त सिद्धियों का कर्म विधान नष्ट करने में उनकी तनिक भी रुचि नहीं होती। इस प्रकार सच्चे योगी तो चमत्कार दिखाते नहीं और झूठे योगियों के पास चमत्कारी शक्ति होती नहीं। दोनों ही दशा में हमें किसी से कोई चमत्कार प्राप्त नहीं हो सकता।

चमत्कारी सिद्धियाँ पहले तो हानिकारक होने के कारण परमात्मा ने सर्वसाधारण के लिए वैसे ही दुर्लभ कर दी हैं। साधारणतः वे किसी को प्राप्त नहीं हो सकतीं। दूसरे जिन योगियों को वे प्राप्त होती हैं वे कच्ची मनोभूमि वाले लोभी वृत्ति के मायाग्रस्त मनुष्यों पर किसी भी प्रकार प्रकट नहीं करते। जो व्यक्ति माया रहित होकर उन योगियों के पास पहुँचता है उसे ऐसी सिद्धियों की इच्छा नहीं होती। सभी दृष्टिकोणों से उन चमत्कारों की प्राप्ति हमारे लिए कठिन है। हमें उनकी मृग तृष्णा में न भटककर कर्त्तव्य कर्म के सीधे-साधे मार्ग पर चलकर सीधी सच्ची परम मंगलमयी स्वाभाविक सिद्धियाँ प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।


Quotation

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रेम और बलिदान को प्रधान समझना चाहिए। अगर आप उन मनुष्यों के जीवन पर दृष्टि डालेंगे, जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अमर बना लिया है तो आपको मालूम होगा कि उनकी सफलता का मूल कारण प्रेम और बलिदान की भावना ही है।

-डॉ. एनी बेसेन्ट


भारतीय नारी का सर्वोत्तम गुण

(श्री स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती, ऋषीकेश)

सत्राजित दुहिता तथा भगवान श्री कृष्ण की अर्द्धांगिनी सत्यभामा ने द्रौपदी से प्रश्न किया ‘हे द्रौपदी! कैसे तुम अति बलशाली पाण्डु-पुत्रों पर शासन करती हो? वे कैसे तुम्हारे आज्ञाकारी हैं तथा तुमसे कभी कुपित नहीं होते? तुम्हारी इच्छाओं के पालन हेतु सदैव प्रस्तुत रहते हैं। मुझे इसका कारण बतलाओ।

द्रौपदी ने उत्तर दिया- ‘हे सत्यभामा! पाण्डु पुत्रों के प्रति मेरे व्यवहार को सुनो- मैं अपनी इच्छा, वासना तथा अहंकार को वश में कर अति श्रद्धा एवं भक्ति से उनकी सेवा करती हूँ। मैं किसी अहंकार-भावना से उनके साथ व्यवहार नहीं करती।

मैं बुरा और असत्य भाषण नहीं करती। मेरा हृदय कभी किसी सुँदर युवक धनवान या आकर्षण पर मोहित नहीं होता। मैं कभी नहीं स्नान करती, खाती अथवा सोती जब तक पति नहीं स्नान कर लेते, खा लेते अथवा सो जाते एवं तब तक जब तक कि हमारे समस्त सेवक तथा अनुगामी नहीं स्नान कर लेते, खा लेते या सो जाते। जब कभी भी मेरे पति क्षेत्र से वन अथवा नगर से लौटते हैं तो मैं उसी समय उठ जाती हूँ उनका स्वागत करती तथा उनको जलपान कराती हूँ।

मैं घर के सामान तथा भोजन को सदैव स्वच्छ एवं क्रम से रखती हूँ। सावधानी से भोजन बनाती तथा ठीक समय पर परोसती हूँ। मैं कभी भी कठोर शब्द नहीं बोलती। कभी भी अनुलाभों (बुरी स्त्रियों) का अनुसरण नहीं करती।

मैं वही करती हूँ जो उनको रुचिकर तथा सुखकर लगता है। कभी भी आलस्य तथा सुस्ती नहीं दिखाती, बिना विनोदावसर के नहीं हंसती। मैं द्वार पर बैठकर व्यर्थ समय नष्ट नहीं करती। मैं क्रीड़ा-उद्यान में व्यर्थ नहीं ठहरती जब कि मुझे अन्य काम करने होते हैं।

जोर-जोर से हंसना, भावुकता तथा अन्य इसी प्रकार अप्रिय लगने वाली वस्तुओं से अपने को बचाती एवं सदैव पति की सेवा में रत रहती हूँ।

पति-विछोह मुझे कभी नहीं सुहाता। जब कभी मेरे पति मुझे छोड़कर बाहर जाते हैं तो मैं सुगंधित पुष्पों तथा अंगराग का प्रयोग न कर जीवन कठोर तपस्या में बिताती हूँ। मेरी रुचि, अरुचि, मेरे पति की रुचि अरुचि ही हैं और उन्हीं की आवश्यकतानुसार अपना समायोग करती हूँ। मैं प्राण प्रण से अपने पति की भलाई चाहती हूँ। मैं उन वक्तव्यों का याथातथ्य पालन करती हूँ जो कि मेरी सास ने सम्बंधियों, अतिथि, दान, देव-पूजा, एवं पितृ-पूजा के विषय बतलाये थे। मैं उनका निशदिन अक्षरशः पालन करती हूँ। ‘मैं अपने पति के साथ बहुत ही नम्रता और आदर का व्यवहार करती हूँ। पति-सेवा में निर्धारित व्यावहारिक नियमों से तनिक भी विचलित नहीं होती। ‘मेरा विचार है कि नारी का सर्वोत्तम गुण पति सेवा है। पति ही स्त्री का ईश्वर है। वही उसका एक मात्र शरणालय है, उसके लिए और कहीं शरण नहीं है। ऐसी दशा में पत्नी वह कार्य कैसे कर सकती है जो कि उसके पति को अप्रिय एवं अरुचिकर प्रतीत हो?

मेरे पति मेरे मार्ग प्रदर्शक हैं! मैं कभी भी अपनी सास की बुराई नहीं करती। मैं कभी भी सोने, खाने अथवा अलंकरण में अपने पति की इच्छा के प्रतिकूल नहीं जाती। मैं अपने काम पूर्णतः एकाग्र-चित्त, प्रोत्साहित हो किया करती हूँ।

मैं अपने गुरु की सेवा अत्यन्त नम्रता से करती हूँ अतएव मेरे पति मुझसे बहुत प्रसन्न रहते हैं। प्रति-दिन मैं अपने सास की सेवा अति आदर और नम्रता से करती हूँ। मैं उनके खाने-पीने तथा कपड़ों आदि का स्वयं निरीक्षण करती हूँ। ‘मैंने खाने-पीने, कपड़े, गहने आदि के विषयों में अपनी सास से अधिक पाने की कभी इच्छा नहीं की। मैं उनका अत्यधिक सम्मान करती हूँ। महाराज युधिष्ठिर के राज प्रासाद में वेद-पाठ करने वाले ब्राह्मणों को मैं भोजन जल तथा परिधान द्वारा पूजा करती हूँ। मैं समस्त परिचारिकाओं के अभियोग सुनती तथा उनके निराकरण का उद्योग करती और उनको सन्तुष्ट रखने का प्रयत्न करती हूँ।

मैं उनके पालन योग्य नियमों को बनाती हूँ। मैं अतिथियों की अति भक्ति भाव से सेवा करती हूँ। मैं सर्वप्रथम शैय्या से उठती तथा सबसे पीछे शयन को जाती हूँ।

हे सत्यभामा! यही मेरा व्यवहार और अभ्यास रहा है, जिसके कारण मेरे पति मेरे आज्ञाकारी हैं।

‘सत्यभामा!’ द्रौपदी ने कहा,

मैं तुमको अपने पति को आकर्षित करने का उपाय बतलाऊँगी। संसार में ऐसा कोई भी देवता नहीं है-जो पति की बराबरी कर सके, यदि पति तुमसे प्रसन्न हैं तो तुम्हारे पराक्रम की सीमा नहीं है, और यदि अप्रसन्न है तो तुम सब कुछ खो दोगी। तुम अपने पति से परिधान अलंकार कीर्ति यहाँ तक कि अंत में स्वर्ग भी पा सकती हो। जो स्त्री पतिव्रता प्रेम परिचित तथा कर्त्तव्यवती होती है उसके निमित्त सुख तो एक प्रकार का जन्म सिद्धि अधिकार होता है। उसको कष्ट एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़े तो वे अल्पकालीन तथा मायावी होते हैं। अतएव सदैव प्रेम और भक्ति से कृष्ण की उपासना करो। ‘सेवा के निमित्त सदैव प्रस्तुत रहो, पति के सुख का ही ध्यान रखो। वह तुम्हारा भक्त बन जावेगा और सोचेगा कि मेरी पत्नी मुझे सचमुच प्यार करती है। मैं भी उसका अनुगमन करूं।’ द्वार पर जैसे ही अपने पति की आवाज सुनो, खड़ी हो जाओ तथा उसकी सेवा के लिए प्रसन्न बदन हो प्रस्तुत रहो। जैसे ही वे कक्ष में प्रवेश करें उसका आसान तथा पैर धोने को जल दो। ‘जब वह किसी परिचारिका को किसी काम के लिए पुकारे तो तुम स्वयं जाकर वह काम करो। कृष्ण को अनुभव करने दो कि तुम अन्तःकरण से उनकी पूजा करती हो। ‘सदैव अपने पति की भलाई सोचो। वही उन्हें खिलाओ जो कि उन्हें रुचिकर हो। उनके पास मत उठो बैठो जो भी तुम्हारे पति से विद्वेष रखते हैं। ‘मनुष्य की उपस्थिति में कभी भी उत्तेजित न हो अपने मन को मौन धारण कर शाँति दो।

केवल उन्हीं स्त्रियों से मित्रता रखो जो पति भक्त हैं, जो उच्च-कुल, पाप-शून्य तथा गुणवती और उज्ज्वल चरित्र की हैं, तुमको स्वार्थी तथा बुरे स्वभाव की स्त्रियों से दूर रहना चाहिए।

इस प्रकार का आचरण प्रशंसनीय होता है। यही समृद्धि, प्रसिद्ध तथा सुख का द्वारा खोल देता है। अतएव अपने पति की प्रेम, विश्वास एवं भक्ति भाव से पूजा करो।

तब सत्यभामा ने द्रौपदी को हृदय से लगा लिया और कहा-’ओ पवित्रे! तुम पृथ्वी पर अपने पति के साथ शाँति का भोग करोगी। तुम्हारे पुत्र द्वारिका में आनन्द से हैं। तुम शुभ चिह्नों से सुशोभित हो। तुम कभी भी अधिक समय तक दुर्भाग्य न भोगोगी। मैं तुम्हारी प्राण प्रेरक वार्त्ता से अति लाभाँवित हुई। यह बुद्धिमत्ता तथा उच्च विचारों की खान है।

प्रिय द्रौपदी! ‘तुम सदैव प्रसन्न रहो।’

यह शब्द कहती हुई सत्यभामा रथ पर बैठ गई और भगवान कृष्ण के साथ उन्होंने अपने नगर को प्रस्थान किया।

(वन पर्व, अ. 232-233)

हमारी पवित्र मातृभूमि, भारतवर्ष, ने सुलभा, गार्गी, मन्दालसा आदि साधु नारियों, सीता, सावित्री अनुसूया तथा नलयानी आदि पतिव्रताओं तथा मीरा ऐसी भक्त नारियों, महारानी चुडलाय ऐसे योगिनियों को जन्म दिया है। ये इतिहास में सहस्रों ज्ञात, अज्ञात नामों में से कुछ ही हैं।

आधुनिक नारी वर्ग को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। उनको उन्हीं की तरह जीवन बिताना चाहिए। उनको भौतिक प्रभावों से दूर रहना चाहिए। एक व्यसनी, विलासी नारी सच्ची स्वाधीनता को नहीं समझती।

यत्र तत्र घूमना, कर्त्तव्य हीन बनना, मनचाहा सब कुछ करना, सब कुछ खाना-पीना, बहित्र (मोटर) दौड़ाना अथवा पश्चिम-निवासियों का अंधानुसरण करना स्वतंत्रता नहीं है। सतीत्व स्त्री का सर्वोत्तम अलंकार है। सतीत्व की सीमा पार करने, मनुष्य की तरह व्यवहार करने से नारी अपनी कोमलता, बुद्धिमत्ता, प्रताप तथा सुँदरता का नाश करती है।

नारी-समाज का अपने अधिकारों, स्वतंत्रता तथा समानाधिकार के निमित्त आँदोलन से कोई लाभ न होगा। धारा-सभा अथवा राज्य परिषद के आसन पर जाना नारी समाज की स्वाधीनता का द्योतक नहीं है। भारत एक आध्यात्मिक देश है। यह ऋषि, मुनि, योगी, योगिनी तथा दार्शनिकों की जन्म भूमि है। आत्मा तथा आध्यात्म विज्ञान के विषय में यह देश अपनी समता नहीं रखता। स्त्रियाँ धार्मिक क्षेत्र में स्थान रखती हैं। बालकों के भविष्य निर्माण में उनका पूर्ण हाथ होता है।

स्त्रियाँ किसी प्रकार भी मनुष्य से हीन नहीं है। वे उत्कृष्ट व्यक्तित्व रखती हैं। वे स्वभावतः धैर्यवान, सहनशील, भक्तिभावपूर्ण होती हैं। वे मनुष्य से अधिक आत्मबल रखती हैं। उनका देवी रूप में सम्मान तथा आदर करना चाहिए किन्तु फिर भी वे मनुष्य के बराबर स्वतंत्र तथा अधिकार नहीं माँग सकतीं। उनको अपने पतियों की आज्ञाकारिणी होना चाहिए। यह सब कुछ उनके प्रताप, तेज तथा पतिव्रत धर्म को और उज्ज्वल करेगा।

पत्नी मनुष्य की अर्धांगिनी होती है। कोई यश अथवा धार्मिक कृत्य उसके बिना सफल न होगा। वह मनुष्य की जीवन साथिन है। ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि जब पत्नी भक्ति और पवित्रता के कारण अपने पति की गुरु बन जाती है। यदि कोई मनुष्य अपनी पत्नी को अपनी दासी, हीन मानकर यह सोचता है कि स्त्री केवल भोजन बनाने तथा भोग के लिए है तो वह अत्यधिक दारुण तथा अक्षम्य अपराध करता है।

स्त्रियों को शिक्षा देनी चाहिए। सभ्य नारियाँ समाज के निमित्त आशीषर्चन के समान होती हैं। किन्तु अत्यधिक स्वाधीनता तथा स्वच्छन्दता का फल अत्यंत भयानक होता है। यह दैहिक जीवन महत्वपूर्ण है। मध्य मार्ग ही सर्वोत्तम है। किसी वस्तु का अतिक्रमण बुरा होता है।

स्त्रियों को गीता, भागवत, रामायण तथा अन्य धार्मिक पवित्र ग्रन्थों का ज्ञान होना चाहिए। स्वास्थ्य विज्ञान, गृह-चिकित्सा, परिचर्या कर्म, बाल शिक्षण, आहार-शास्त्र तथा संतान शास्त्र आदि का ज्ञान होना चाहिए।

स्त्रियाँ प्रकृतितः अच्छी मातायें होती हैं। ईश्वरीय महान उपक्रम में उनको इतना महान कार्य करना होता है। दैवी-उपक्रम में यही सोचा गया था। यही ईश्वरीय इच्छा है। स्त्रियाँ अपना अलग मनोवैज्ञानिक विशिष्ट, स्वभाव, सामर्थ्य, गुण तथा संस्कार रखती हैं तथा मनुष्य अलग। वे मनुष्य से प्रतियोगिता नहीं कर सकतीं और न उनको करना चाहिए। उनको मनुष्य का काम न करना चाहिए। अवश्य वे शिक्षित हों उनको अपने धार्मिक ग्रन्थों का ज्ञान होना चाहिए। माता-पिता का कर्त्तव्य है कि अपनी पुत्रियों को समुचित शिक्षा दिलावें। यह अत्यावश्यक है। अच्छी माताओं का समाज में पूजनीय स्थान होता है। अच्छी मातायें सभी से सम्मानित तथा आदर का पात्र होती हैं। वे क्यों समान समानाधिकार, मताधिकार, स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता के निमित्त प्रयत्न करती हैं जब कि समाज में अतुलनीय, स्थिति अपूर्व स्थान तथा पद की अधिकारिणी है। क्या यह अज्ञान और मूर्खता नहीं है?

जिस पवित्र भूमि में सुलभा, मीरा सी पतिव्रता तथा भक्त नारियाँ हों, जो अपनी संतान को धर्म की ओर सत्य के सन्मार्ग पर अग्रसर करे-भगवान से यही प्रार्थना है।


अपने स्थान पर सब का महत्व है।

(श्री लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेम’, संपादक ‘खत्री-द्वितैषी’)

प्रायः हम जिन चीजों को साधारण समझ कर उनकी उपेक्षा करते हैं, अनुभव बताता है कि वह ही अधिक महत्व की होती हैं। संसार में कोई भी वस्तु हीन तथा नगण्य नहीं है। अपने-अपने स्थान पर सभी का महत्व होता है। भोजन करना, जल पीना आदि साधारण बात हैं किन्तु इन्हीं के उचित तथा अनुचित प्रयोग पर हमारा स्वास्थ्य तथा अस्वास्थ्य किस प्रकार निर्भर है यह बात ‘अखण्ड-ज्योति’ इस वर्ष के पिछले अंकों में छाप चुकी है। आज हम आपको पैखाने तथा पेशाब के संबंध में कुछ बतायेंगे। इन चीजों को घिनौनी कहकर हमें उपेक्षा न करनी चाहिए। स्वास्थ्य-विज्ञान की दृष्टि से इनके विषय में जानना लाभप्रद होगा।

यह एक विचित्र बात है कि ज्यों-ज्यों हम सभ्यता की सीढ़ी को पार करते जाते हैं, त्यों-त्यों हम प्रकृति माता से दूर होते जाते हैं। हमारे जीवन में अस्वाभाविकता तथा कृत्रिमता बढ़ती जाती है। प्रत्यक्ष-तथा परोक्ष रूप से अनेक बार अनजाने ही हम प्रकृति के नियमों की अवहेलना करते हैं। उनके नियम तोड़ते हैं। प्रकृति के नियम बड़े कठोर हैं। प्रकृति का न्याय इसी में है कि जैसे हमारे अच्छे या बुरे कर्म हो वैसा ही हमें अच्छे और बुरे फल मिलें और मिलते भी हैं। प्रकृति को हम किसी भी प्रकार धोखा नहीं दे सकते।

प्रायः झूठी लज्जा तथा व्यर्थ के संकोच में पैखाना पेशाब मार लेते हैं। चार आदमियों में बैठे हैं, संकोचवश हम उठते नहीं। रात के समय हम लेटे हैं आलस्यवश हम पैखाने पेशाब को उठते नहीं। स्त्रियों में यह दोष विशेष रूप से पाया जाता है। अक्सर मैंने स्त्रियों को कहते सुना है कि जाड़े में कौन पैखाने जाय, नहाना पड़ेगा, धर्म की भावना ही उनके स्नान में प्रधान है, स्वास्थ्य की भावना नहीं। अन्यथा वह सोचती कि पैखाने न जाने से जो स्वास्थ्य बिगड़ेगा तो! यह ठीक है कि स्नान की भावना धर्म के नाम पर स्वास्थ्य के भाव की ही द्योतक है किन्तु अशिक्षित, प्राचीन, रूढ़िवादिनी स्त्रियाँ स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से प्रायः स्नान आदि नहीं करतीं। यदि स्वास्थ्य की भावना ही ऐसी स्त्रियाँ रखतीं तो पैखाने अवश्य जातीं-नहाना पड़ेगा इस डर से उसे मार न लेती। आप सुनकर हंसेंगे कि ऐसी भी स्त्रियाँ हैं जो कहती हैं कि आज एकादशी का व्रत है, दूसरी बार मालूम पड़ने पर दिशा कौन जाय अन्यथा भूख सतायेगी। यह है हमारा दुर्भाग्य।

हम जानते हैं कि बड़ी आँतों की नसें रस सोखा करती हैं। जब उनमें सड़ा मल भरा रहता है तो उस दूषित तथा विषैले पदार्थ के रस को घसीट कर हमारा रक्त दूषित करती हैं। अफखरात हृदय तथा मस्तिष्क की ओर चढ़ने लगते हैं। इससे तुरंत दिल सा बैठने लगता है, मिचली आती है, सर चक्कर खाता है, आँखों के सामने अंधेरा होता है। अनेक छोटे-मोटे रोग ऐसे मनुष्यों को अपना शिकार बनाते हैं। इसी प्रकार पेशाब आपको लगा पर आप पेशाब मार रहे हैं-गर्मी से वाष्प बनकर वह दिमाग की ओर बढ़ेगा। हमें पथरी होने की संभावना होती है क्योंकि गुर्दों में पेशाब के अंदर के ठोस कण जमा हो होकर कड़े हो सकते हैं। अस्तु, पेशाब-पैखाने रोकने के भयंकर परिणामों को समझ कर आइए हम समझें कि हमें पेशाब कब करना चाहिए, कब नहीं तथा पैखाना कब जाना चाहिए कब नहीं।

लघु शंका के लिए हमें कब जाना चाहिए और क्या ध्यान रखना चाहिए यह नीचे लिखा है-

(1) साधारण तथा जब भी लगे तब। यहाँ पहले ही लिख चुका हूँ कि पेशाब के वेग को रोकने से उसके दूषित मल फिर खून में लौटने लगते हैं और अफखरात मस्तिष्क की ओर बढ़ने लगते हैं, मसानों पर जोर पड़ता है और वह कमजोर हो जाते हैं, पथरी का डर रहता है।

(2) स्त्री-संग तथा स्वप्न-दोष के बाद यदि स्नान न करे देह भी न अंगोछे तो कम से कम पेशाब तो कर ही डाले। (तथा कुछ रुक कर इन्द्रिय स्नान भी करा लें।) इससे ठंडक पहुँचती है गंदगी दूर होती है। पेशाब की नली में यदि एक आध बूँद वीर्य रुकी होती है तो वह दूर होती है। (पर गर्भधारण करने की इच्छुक स्त्री पति-संग के बाद तुरन्त कभी पेशाब न करें) (3) सोने के पहले पेशाब करें। इससे स्वप्न दोष का भय नहीं होता। नींद भी अच्छी आती है। (4) भोजन कर चुकने के तुरंत बाद। इससे मसाने में आये विष निकल जाते हैं। उस समय बाँयी ओर झुका रहे तथा बाँया श्वास चले। दाँत कसकर बंद कर लेना चाहिए तथा मुँह भी (5) सोकर उठते ही यदि तुरंत पैखाना नहीं जाता है तो कम से कम पेशाब तो कर ही लें।

बहुत से लोगों में बड़ी गंदी आदत होती है कि वह पेशाब के बाद इन्द्रिय नहीं धोते। विशेष कर पढ़े-लिखे व्यक्ति तथा दफ्तरों आदि में काम करने वाले। इस बात में हम मुस्लिमों से शिक्षा लें। यदि उनके पास जल नहीं होता तो वह मिट्टी या ईंट के टुकड़े से पोंछ लेते हैं।

केवल पानी पीने के तुरंत पूर्व ही पेशाब नहीं करनी चाहिए न पानी पीकर तुरन्त पेशाब करना चाहिए। इससे मसाने कमजोर होते हैं।

अब हम देखें कि पैखाने कब जाना चाहिए और क्या ध्यान रखना चाहिए-

(1) साधारणतया जब भी पैखाना लगे तब। पैखाना मारने से बहुत कुछ वहीं रोग या कष्ट हो सकते हैं जो पेशाब मारने से अर्थात् बड़ी आँतों की नसें दूषित द्रव्य चूसकर खून में पहुँचाकर उसे दूषित करने लगती हैं। कहा जा चुका है कि शर्म, डर, आलस्य आदि वश पैखाना, पेशाब मारना रोगों को न्यौता देना है। (2) कहते हैं पैखाना जाता है ‘एक बार योगी, दो बार भोगी, बार-बार रोगी’। योगी चौबीस घंटे में एक ही बार भोजन करता है- वह भी सूक्ष्म तथा सात्विक अतः उसका एक बार दिशा को जाना पर्याप्त है।

पर गृहस्थ दो बार भोजन करता है। कम से कम करना तो दो ही बार चाहिए। अभाग्यवश आजकल प्रायः लोगों का मुँह दिन रात बकरी की भाँति चलता है अतः वैसे ही अनियमित तथा बे हिसाब उन्हें पैखाना भी जाना पड़ता है। पर नियमित रूप से दो बार भोजन करने वाले गृहस्थ को उसी हिसाब से नियमित समय पर दो बार पैखाना जाना चाहिए। (3) प्रातः उठते ही ऊषापान तथा करवट आदि लेने के बाद, लगे या न लगे तुरंत पैखाना जाना चाहिए। सायंकाल को 4 और 6 के बीच में। हमें दो प्रकार के साधारणतया मनुष्य मिलते हैं- एक तो वह लोग जिन्हें दस्त बहुत आते हैं। खान-पान के नियम तोड़ने पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका कोठा बहुत कड़ा होता है। उन्हें कब्ज बहुत रहता है। एक दिन के किये हुए भोजन का फुजला थोड़ा-थोड़ा करके तीन-तीन चार-चार दिन बाद निकलता है। चौबीस घंटे के अंदर ही सब नहीं निकल जाता। ऐसे लोगों को पेट की कसरतें, टब में (बाथ) पेडू मलना, गेहूँ की दलिया, छाछ, दही, फल, हरी तरकारियाँ, शाक, दूध आदि का प्रयोग अधिक करना चाहिए। कब्ज की संसार में कोई दवा है ही नहीं। घूमने से अधिक और कोई चीज कब्ज दूर करने में सहायक नहीं होती। ऐसे लोगों को चार-मील रोज सुबह शाम टहलना चाहिए। गाँव वाले मील दो मील चलकर खेतों में पैखाने जाते हैं। ऐसा करने से प्रायः उन्हें कब्ज नहीं रहता। (4) उपवास-काल में भोजन नहीं किया जाता, इससे पैखाना नहीं लगता, पर रुधिर में घूम−घूम कर मल-विकार और विष अड्डा जमा लेते हैं। अतः प्रतिदिन एनिमा लेकर उन्हें निकाल दें अन्यथा बड़ी आँतों की नसें सोखकर खून में विष को वापस पहुँचा देगी। (5) उपवास तोड़ने पर यदि दो घंटे तक पैखाना न लगे तो अवश्य एनीमा लेकर पैखाना जायं। (6) पैखाने के समय दाहिनी ओर झुक बैठे तथा दाहिना श्वास चले। दाँत कस कर बंद रखे तथा मुँह भी, ताकि गंदी हवा फेफड़ों में न पहुँचे। (7) कब्ज अधिक रहता है तो जुलाब लेना उचित नहीं। कभी-कभी एनीमा द्वारा सफाई कर लें। पैखाने, पेशाब के बाद मल-मूत्र द्वार तथा हाथ-पैर ठीक प्रकार से धोकर स्वच्छ कर लें।

खाना खाने के तुरंत बाद पैखाना जाना गंदी आदत है। यद्यपि कुछ पश्चिमी लेखक इसे उचित समझते हैं, पर भारतीय नहीं। ऐसी आदत न पड़ने दें पर यदि कभी मालूम ही पड़े तो मारे नहीं। यदि हम पैखाने और पेशाब के संबंध के नियमों का पालन ठीक से करें तो हम अनेक छोटे-मोटे रोगों को भगाकर स्वस्थ हो सकते हैं।


मित्र के कर्त्तव्य

(श्री पं. तुलसीराम शर्मा वृन्दावन)

पापान्निवारयति योजयतेहिताय।

गुह्यं च गुह्यति गुणान् प्रकटीकरोति॥

आपद्गतं च न जहातिददातिकाले।

सन्मित्रलक्षण मिदंप्रवदंतसिन्तः॥

(गर्तहरिशतक)

मित्र को कुकर्म से हटावे, श्रेष्ठकर्म में लगावे, छिपाने योग्य बात को छिपाये मित्र के गुणों को जाहिर करे, विपत्ति में साथ न छोड़े, समय पर सहायता करे, संतों ने श्रेष्ठ मित्रों का लक्षण ऐसा ही कहा है।

ददाति प्रतिगृहणाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।

भुंक्तोभोजयते चैवषड्विधंप्रीतिलक्षणम्॥

समय पर दे और ले, मन की कहे और सुने, भोजन करे और करावे, यह छः प्रकार के लक्षण प्रीति का है। रामायण में कहा है-

जेन मित्र दुख होहिं दुखारी।

तिनहिं विलोकत पातक भारी॥

निजदुख गिरिसमरजकरिजाना।

मित्र के दुखरज मेरु समाना॥

कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।

गुणप्रगटहिं अवगुणहिं दुरावा॥

देत लेत मन शंक न धरहीं।

बल अनुमान सदाहित करहीं॥

विपत्ति कालकर शतगुण नेहा।

श्रुति कह सन्त मित्रगुण एहा॥

जिसमें उपरोक्त लक्षण हैं वही सच्चा मित्र है।


आत्मा के पाँच आवरण

(डॉ. गोपाल प्रसाद जी ‘वंशी’ बेतिया)

उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान का उपदेश भिन्न-भिन्न प्रकार के अधिकारियों को भिन्न-भिन्न रीति से किया गया है। उस उपदेश से आत्मा की पहचान होती है। आत्मा सत्-चित्-आनन्द स्वरूप है और आत्मा को छोड़कर जो अन्य सकल अनात्म पदार्थ हैं, वे जड़ कहलाते हैं। जो पुरुष आत्मा और अनात्मा के भेद को जानता है उसको आत्मज्ञानी या ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। आत्मा सर्वव्यापक है और समस्त पदार्थों का सार वस्तु है। सर्वव्यापक होने से सर्वत्र विद्यमान है, इसलिए खोज करने पर सर्वत्र और सर्वदा मिल सकता है। इसको खोजने का सबसे अच्छा स्थान अपना शरीर है। उसमें वह पाँच आवरणों से ढ़का हुआ है-

(1) मनुष्य के शरीर में जो भाग जड़ और ठोस देखने में आता है, उसको ‘अन्नमय कोश’ कहते हैं। मनुष्य शरीर में आत्मा के ऊपर यह पहला आवरण (खोल) है और आत्मा इस ‘अन्नमय कोश’ में व्यापक है तथा इस कोश की स्थिति का कारण है।

(2) इस ‘अन्नमय कोश’ के भीतर प्राणों का आवागमन होता है। ये प्राण संपूर्ण ‘अन्नमय कोश’ के भीतर फैले हुए हैं। शरीर के जिस भाग में प्राणों की चेष्टा (क्रिया) नहीं रहती है, वह भाग जड़ या मुर्दा हो जाता है। शरीर में जितनी गति (हरकत) होती है, उस सबका कारण ‘प्राणमय कोश’ हैं। इसके ही बल पर रक्त-संचालन होता है और शरीर में चेष्टा होती है। यह ‘प्राणमय कोश’ नाम का दूसरा आवरण (खोल) है और आत्मा इसमें व्यापक है तथा यह स्वयं ‘अन्नमय कोश’ में व्यापक है।

(3) इन कोशों के भीतर शरीर में एक और आवरण है जो इनसे श्रेष्ठ है और जिसको ‘मनोमय कोश’ कहते हैं, क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ मन के अधीन होकर काम करती हैं। पहले दो के समान इस कोश में भी आत्मा व्यापक है। वह तीसरा आवरण आत्मा को ढके हुए इस शरीर में विद्यमान है और यह स्वयं पहले दोनों-अन्नमय और प्राणमय कोशों में व्यापक है।

(4) इस कोश के भीतर एक चौथा आवरण और है, जो इससे भी श्रेष्ठतर है, जिसको ‘विज्ञानमय कोश’ कहते हैं। मनोमय और प्राणमय कोश इस ‘विज्ञानमय कोश’ के अधीन हैं, क्योंकि जिस मनुष्य में विज्ञान बढ़ा हुआ होता है, वह मन और प्राणों की चेष्टा को रोक सकता है। आत्मा इसमें व्यापक है और आत्मा की विद्यमानता से इसकी स्थिति है। यह स्वयं पहले तीनों कोशों में व्यापक है।

(5) इसके भी भीतर एक पाँचवाँ आवरण है, जिसको ‘आनन्दमय कोश’ कहते हैं। जिस समय मनुष्य घोर निद्रा में होता है तो जागने पर कहता है कि मैं बड़े आराम से सोया था। इस दशा में जब कुल चेष्टायें और समस्त चेष्टाओं को वश में रखने वाले कोश कुछ काम नहीं देते थे तब इस ‘आनन्दमय कोश’ के आश्रय से ही इस शरीर की स्थिति थी। आत्मा इस कोश में व्यापक है और आत्मा के भरोसे ही इस कोश की स्थिति है। यह कोश-शेष चारों कोशों में व्यापक और उनकी स्थिति का कारण है।

आत्मा इन कोशों में व्यापक होकर भी इन कोशों से असक्त और संबंध रहित है। एक मणि के ऊपर पाँच खोल चढ़े हों तो मणि का प्रकाश पाँचों खोलों को तो प्रकाशित करेगा फिर भी वह मणि उन पाँचों से पृथक रहेगी। आत्मा और पंच कोशों का संबंध भी ऐसा ही है।


मानवता के प्रति एक महान अपराध-माँसाहार

(श्री निरंजन प्रसाद गौतम, पटलौनी)

माँसाहार स्वास्थ्य, धर्म एवं नीति आदि सभी दृष्टियों से अहितकर तथा अनुपयुक्त है। इसे हमें प्रकृति ने भोजन के रूप में नहीं दिया अपितु स्वार्थान्ध मानव ने निरपराध एवं निर्बल जीवों की अपने बल द्वारा हत्या कर उदर पोषणार्थ एक खाद्य रूप में ले लिया है।

माँस खाने से उसका दुष्प्रभाव शरीर और मन दोनों पर ही पड़ता है। पश्चिमी देशों में जहाँ विशुद्ध शाकाहारियों की संख्या नाम मात्र को ही है वहाँ माँस भोगियों की धारणा है कि- माँस शरीर के लिए एक उत्तम खाद्य है उनका कहना है कि माँस में अधिक और उत्तम प्रोटीन ही उसके गुण हैं। दाल एवं वनस्पतियों की अपेक्षा इसके प्रोटीन में पोषण तत्व अधिक पाये जाते हैं तथा अपेक्षाकृत इनका अधिक भाग बेकार नहीं जाता। माँस के प्रोटीन के गुणों की शरीरस्थ माँस के गुणों से समानता होने के कारण शरीर इसे शीघ्र ग्रहण कर लेता है और दाल तथा अनाजों की भाँति माँस में दुष्पाच्य तत्व सेल्यूलोज भी नहीं होता।

माँस भोगियों का यह कथन सुनने में उपयोगी एवं आकर्षक प्रतीत होता है किन्तु स्वास्थ्य विशेषज्ञों की दृष्टि में माँसाहार की अपेक्षा निरामिष भोजन ही श्रेष्ठ है। उनका कहना है कि- माँस पाकाशय में पहुँचते ही अनेकों प्रकार के विषैले कीटाणुओं का उत्पादन करता है। वे कीटाणु रक्त वाहिनी नलियों में प्रवेश कर रक्तावरोध जन्य अनेक व्याधियों को जन्म देते हैं। इससे शरीर में ऐंठन व मस्तिष्क में पीड़ा होने लगती है। माँसाहार से उत्पन्न गठिया अत्यन्त दुखद होता है जो असाध्य का रूप तक ले लेता है। एक विशेष प्रकार का विषैला फोड़ा भी जिसे ‘कैन्स’ कहते हैं अधिक होते देखा जाता है क्योंकि माँस एक शीघ्र सड़ने वाली वस्तु है और उसके सड़ते ही विषैले कीटाणुओं का जन्म होने लगता है। उनसे अनेक प्रकार की वात-व्याधियों की उत्पत्ति हो जाती है।

माँस से शरीर की चर्बी में तो अधिक वृद्धि होती है किन्तु बल में शाकाहारियों की अपेक्षा कुछ भी वृद्धि होते नहीं देखी गई।

दैहिक व्याधियों के साथ-2 इसका दुष्प्रभाव मानसिक शक्तियों पर भी पड़ता है। मानसिक शक्तियों के ह्रास में माँस का प्रमुख स्थान है। मन के ऊपर जो विचारों का परिशोधक मन्य है यदि माँस जन्य विषाक्त परिमाणुओं से लिप्त होगा तो विचार भी अवश्य दूषित हो जावेंगे। परिणाम स्वरूप ज्ञानेन्द्रियाँ कुँठित होने लगेंगी तथा कर्मेन्द्रियों में शैथिल्य की अधिकता आती जायगी साथ ही उदारता, सहानुभूति, शुभ चिंतन एवं न्याय की प्रवृत्ति बहिर्गत होती जाती है। मादकता, अपव्ययता, अकर्मण्यता तथा निर्दयता का साम्राज्य छा जाना है। इसके विपरीत भोजन को फल-घी-दूध-दाल-साग तरकारियों से युक्त सात्विकी बनाया जाय तो मस्तिष्क के विकास में बड़ी सहायता मिलती है। नवीन कल्पना शक्तियों के स्त्रोत खुलते हैं, विवेक बुद्धि जागृत होती है। हमारे पूर्वज गौतम, कपिल, वशिष्ठ, कणादि, विश्वामित्र आदि ऋषियों ने निरामिष भोजन द्वारा ही अपने मस्तिष्क में अनन्त ज्ञान राशि को संचित कर रखा था। उनका भोजन दूध-फल-शाक-सब्जी ही थे, धार्मिक दृष्टियों से भी माँसाहार सर्वथा अनुचित है।

‘यथामाँस तथा सुरा ययाक्षाधिदेवने।

यथापु सो वृवस्यत स्त्रियाँ निहन्यते मनः। एषातेअद्ये

मेनाधिवत्सेनिहन्यताम्। अथर्व 6/7/70/1

इस वेदोक्ति के अनुसार हिन्दू धर्म में, माँस, मदिरा, द्यूत एवं परस्त्रीगमन आदि सब की एक ही श्रेणी के निकृष्ट कर्मों में गणना की है। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त इस्लाम के प्रमुख अनुयायी अब्दुल्ला ने मसूद ने कहा है कि ‘जो जानवर को ऐशा अशरत के लिए हलाक करता है वह काबे को बिस्मार करने वाले के मानिन्द दोषी है।’ ईसाई धर्म में माँस को अपवित्र होने की दृष्टि से पुण्य पर्वों पर उसके उपयोग का त्याग किया है, अतएव ईसाई लोग लेण्ट (40 दिन के व्रत) के उत्सव पर उसका उपयोग नहीं करते, इस प्रकार सब की दृष्टियों में यह अपवित्र और हेय होते हुए भी आज इसका अन्य खाद्य पदार्थों की अपेक्षा कम बोलबाला नहीं है। शायद ही कोई नगर होगा-जो पशु-वध के स्थान से रहित हो।

नैतिक दृष्टि से विचारने पर प्रकृति के गर्भ से उत्पन्न होने के नाते सभी प्राणियों में परस्पर सहयोग और प्रेम होना आवश्यक है। प्रत्येक प्रकृति पुत्र में प्राण की स्थापना स्वभावतः मृत्युपर्यन्त उसके जीवन बिताने के लिए हुई है। उसके इस नियम का उल्लंघन करना ईश्वर के प्रति अपराध है। कल्पना कीजिए, आज कोई जीव विशेष अपेक्षाकृत मनुष्य से अधिक शक्तिशाली रहा होता और उसने अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य के प्राण लेने का नियम बना लिया होता तो यह मनुष्य को अत्याचार न प्रतीत होता किंतु?

‘सर्वाणिभूतानिमित्रस्यच्क्षुषा समीक्षामहे’ सब प्राणियों को मित्र समझो, की नीति से आज मनुष्य दूर चला गया है वह यदि ‘आत्मवत्सर्व भूतेषु’ के सिद्धाँत को मानता तो उन दयनीय निर्बल उपयोगी एवं भोले-भाले प्रकृति तस्त्रों, पशु-पक्षियों का उदर पोषण के लिए कदापि वध नहीं करता।

जो अपनी जिह्वा की चाटुकारिता के लिए सात्विक अन्न और वनस्पतियों को छोड़कर माँस खाता है। ईश्वर से जीवन अधिकार लेकर आये हुए पशु-पक्षियों को बात की बात में अपने छुरी की धार से माँस का लोथड़ा बना देता है। वह हत्यारा मनुष्य न स्वार्थ ही समझता है न परार्थ ही। एक हानिकारक स्वाद के लिए मानवता के प्रति घोर अपराध करना जो उचित समझते हैं उनकी बुद्धि को क्या कहा जाय?


अपनी दशा सुधारिये।

(पं.चुन्नीलाल जी शर्मा, ओकास, जबलपुर)

संसार में प्रत्येक मनुष्य के जीवन की घटनाएं उसके आँतरिक विचारों के गुण और शक्ति द्वारा खिंचकर ही उसके सामने आ खड़ी होती हैं। मनुष्य के जीवन को बनाने और बिगाड़ने में इन घटनाओं का पूर्ण महत्व रहता है। घटनाओं का कारण मनुष्य के आँतरिक विचारों पर ही निर्भर रहता है। कहा भी है- ‘जैसे आप हैं वैसा ही आपका संसार है’ मतलब यह कि जैसे आपके विचार होंगे वैसे ही आप बनेंगे और जैसे आप बनेंगे वैसा ही आपका जीवन क्षेत्र-संसार भी बनेगा।

विश्व की प्रत्येक वस्तु का समावेश स्वयं आपके आँतरिक अनुभव में हो जाता है। आपके ही विचारों वाँछनाओं और उच्च अभिलाषाओं से आपकी सुँदर सृष्टि निर्मित होती है। अपने ही विचारों से आप अपने जीवन जगत और विश्व को बनाते अथवा बिगाड़ते हैं, क्योंकि यथार्थ में यदि परिस्थितियों में सुख-दुख, शाँति-अशाँति पहुँचाने की शक्ति होती तो वे (परिस्थितियाँ) सब मनुष्यों को एक ही तरह सुखी-दुखी तथा शाँत और अशाँत बनातीं परन्तु एक ही दशा का भिन्न-भिन्न मनुष्यों के लिए अच्छा या बुरा प्रमाणित होना यह सिद्ध करता है कि भलाई-बुराई करने की, सुख-दुख पहुँचाने की तथा शाँत-अशाँत बनाने की शक्ति उस घटनाचक्र में नहीं है बल्कि उस व्यक्ति के मस्तिष्क में है जिसे उसका सामना करना है।

विचार का संपर्क आत्मा से अधिक रहता है इसलिए जैसे आपके विचार हैं वैसी ही आपकी आत्मा भी है तथा आपका अड़ोस-पड़ोस जीवन जगत व विश्व भी ठीक वैसा ही है। जो कुछ हम हैं वह केवल हमारे विचारों का फल ही है। यदि हम सुखी हैं तो हमारा सारा संसार सुखी है और दुखी हैं तो हमें सारा-सारा संसार चाहे वह कितना ही सुखमय क्यों न हो दुखमय प्रतीत होता है। मतलब यहाँ कि हम अपने विचारों से व अपनी दृष्टि से ही विश्व को देखते हैं। जिस प्रकार हम होते हैं उसी प्रकार हमारी दशा होती है। यह सब हमारी मनोदशा पर ही अवलंबित रहता है। यदि हम दुख में भी सुख अनुभव करने लगें तो हमें दुख की छाया भी नहीं सता सकती।

यदि आप उस मंगलमय प्रभु का विधान समझ इस वास्तविकता का अनुभव करने लगेंगे तो आप अवश्य अपने विचारों को व्यवस्थित रूप देने लगेंगे तथा सदा अपने मस्तिष्क में उच्च विचारों को ही स्थान देना चाहेंगे। जो कि प्रसन्नता शाँति शक्ति जीवन सत्य प्रेम, न्याय हया शाँति सौंदर्य तथा अमरत्व के ही मोर्चों का समावेश होने देंगे। जिस समय आप ऐसा करने लगेंगे, आप अवश्य शक्तिशाली, दयामय तथा सुख-संपन्न हो जावेंगे।

आज यदि आप बुरी परिस्थितियों तथा विषय वातावरण से जकड़े हुए हैं तो उन पर दाँत मत पीसिए, अपने भाग्य को मत कोसिये, उस स्थिति के लिए किसी को भी अनायास दोषी मत ठहराइये, अपने अंत में गहरे उतर जाइए कारण की खोज कीजिए, आपको उसका कारण व उसका प्रतीकार अवश्य मालूम हो जावेगा। आप देखेंगे कि बुराई का कारण आप में ही विद्यमान है। जब यह समझने पर आपको उसे ठीक करने के लिए अपना दृष्टिकोण बदल देने की आवश्यकता है, अपने आपको खुशी-खुशी घटना के सामने पेश कर दीजिए वह आपके विचारों द्वारा निर्मित की हुई स्वतः की ही सृष्टि है। उसे आप अवश्य दूर कर सकते हैं।

यदि आप अपने विचारों को सुधार कर निश्चित रूप से आँतरिक जीवन को सुधारने का दृढ़ संकल्प कर लेंगे तो बाह्य जीवन में भी उस उन्नत दशा को सफलता पूर्वक ला सकेंगे, जिसके लिए आप व्याकुल हैं तथा विचार करते हैं।

यदि आप, क्रोध, चिंता, ईर्ष्या लोभ, शोक, भय तथा कोई असंगत मानसिक अवस्था के वश में हो गये हैं और फिर भी पूर्ण स्वास्थ्य की आशा रखते हैं तो वास्तव में आप एक असंभव बात का स्वप्न देख रहे हैं। यदि आपको अपनी दशा सुधारनी है तथा पूर्ण स्वस्थ रहना है तो क्रोध, चिंता, द्वेष, शोक इत्यादि के विचारों को सदा के लिए अपने अंतः से निकाल दीजिए। अपने आपको पूर्ण स्वस्थ समझिए, आपकी दशा में अवश्य सुधार होगा।

अपने आपको कभी दरिद्र न समझिए तथा यह निश्चय कर लीजिए कि जो कुछ आपके पास है आप उसी का सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं। क्योंकि यदि आप उस वस्तु का जो आपके पास है, दुरुपयोग करते हैं या अपेक्षा करते हैं तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन वस्तु क्यों न हो, वह आपके पास से अवश्य छीन ली जाएगी, क्योंकि आपके पास उसका सदुपयोग नहीं हो रहा है।

इसी प्रकार आपको अपनी दशा का उचित ज्ञान होना आवश्यक है। जब आपको अपनी भली व बुरी दशा का ज्ञान हो जावेगा तब आप अपने सात्विक विचारों द्वारा अपनी बुरी दशाओं को बदलकर अपने भाग्य भवन का निर्माण कर सकेंगे।


कामुकता के तुच्छ विचारों से ऊँचे उठिए।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

क्या गृहस्थ, क्या कुमार, यदि वह अत्यधिक वीर्यपात का शिकार होकर रोग ग्रस्त हो चुका है तो भी सद्संकल्प से पुनः आत्म सुधार के मार्ग का पथिक बन सकता है। ‘विश्वासः फलदायकाः।’ आत्मोन्नति में विश्वास तथा दृढ़ संकल्प पुनरुत्थान के प्रधान तत्व हैं। आप आन्तरिक मन से संकल्प कीजिए कि विषयभोग, वीर्यनाश, कामोद्वेग वासना की पूर्ति यह स्वास्थ्य, सदाचार, प्रकृति के विरुद्ध है। अति स्त्रीप्रसंग करना कफ़न की तैयारी करना है। व्यभिचार, हस्त मैथुन, गुदा मैथुन, कुसंग क्षण-क्षण निर्बल, निस्तेज, दुखी तथा अल्पायु बनाने वाले हैं। वीर्य के एक बिन्दु का नष्ट करना मानो अपनी जीवन शक्ति को गंदे नाले में फेंकना है। सभी अप्राकृतिक वीर्यनाश के मार्ग शरीर की कोमल नसों को निर्बल करने वाले शरीर की चमक-दमक कान्ति का नाश करने वाले हैं। अतः प्रत्येक तर्क से आप आन्तरिक मन को समझाइए कि वह कामोपभोग में प्रवृत्त न हो, न वैसी बातें करे, न सोचे। पवित्र संकल्प कीजिए कि आप पुण्यात्मा, सदाचारी, वीर्यवान बनेंगे, जीवन की सर्वांगीण उन्नति करेंगे, बुद्धि तथा मन को शिव संकल्प, शुद्ध विचार, कल्याणकारी कर्मों में लगायेंगे और मन, वचन, कर्म द्वारा अद्भुत दैवी शक्ति प्रकट करेंगे।

शुभ संकल्प उन पुष्ट विचारों का नाम है जिनमें कूट-कूट कर विश्वास भरा हो। यदि आप हृदय से चाहते हैं कि निम्न जीवन की भूमिका से उठकर उच्च आध्यात्मिक जीवन पर चलें तो उसके लिए दृढ़ संकल्प कर लीजिए। अपने संकल्प तथा विचारों से हम नष्ट या श्रेष्ठ बनते हैं। यदि गुप्त रूप से मन में-आन्तरिक गुप्त मन में कोई दबी हुई वासना या कुकल्पना छिपी रहे, तो वह भी साधक का पतन करने के लिए यथेष्ट है। संकल्प विचारों को जन्म देते हैं, मनुष्य के चारों ओर उसी प्रकार का वातावरण निर्माण करते हैं। मन में सद्संकल्प को सजाना, आन्तरिक मन में दृढ़ता से जमाना वीर्यरक्षा का प्रथम सोपान है।

पुण्य संकल्पों में पाप संकल्पों से कहीं अधिक शक्ति है। पाप स्वयं निर्बल है, वह असत्य है, खोखला और निर्जीव है। उसमें स्थायित्व नहीं, ठहराव नहीं। अतः पुण्य संकल्प स्वभावतः ही बुरे विचार कुकल्पना दुश्चिन्ताओं को परास्त करेंगे। पापमय भावना पुण्य संकल्प के समक्ष ठहर नहीं सकती! भगवान ने स्वयं कहा है- तुम्हारी यह चेष्टा कभी निष्फल न होगी। तुम्हारा अवश्य उद्धार होगा। आपके पुण्य संकल्प निश्चय ही पापमय वासना को दग्ध कर देंगे। कुबुद्धि, अज्ञान और कुविचारों को परास्त करेंगे। दुःस्वप्नों का नाश करेंगे। आपके हृदय में एक अन्तर्ज्योति है, ईश्वर का एक मंदिर है, अन्तरात्मा की एक आवाज है उसे विकसित कीजिए। उस दैवी ज्योति को जाग्रत कीजिए, यह विवेक जागृति ही उन्नति का राजमार्ग है। इस अन्तर्ज्योति के जागृत होने से कामवासना रतिप्रसंग विषयोपभोग से स्वयं वैराग्य हो जाएगा। यह अन्तर्ज्योति चैतन्य शक्ति है, अंतर्बल है। आज से ही दृढ़तापूर्वक संकल्प कीजिए- ‘मैं कभी निंद्य वासना से सने हुए अपवित्र विचारों, गन्दी कल्पनाओं की तरंगों को हृदय में ग्रहण नहीं करता। मैं प्रत्येक स्त्री को माता या भगिनी के रूप में देखता हूँ। इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं। मैं पूर्ण ब्रह्मचारी हूँ। वीर्य की रक्षा करता हूँ। शुभ सोचता हूँ, शुभ कर्म करता हूँ। अतः मैंने कामवासना को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने का निश्चय किया है।


नारी-वन्दना


नारी-वन्दना

(श्री शिवमूर्ति मिश्र ‘शिव’)

ऐसी शक्ति मनुज ने पायी, दशों दिशाओं का तन जागा।

रवि निकला, उषा मुस्कायी, तमकी मृत्यु हुई, हतभगा॥

मनुकी ओ सतरूपा, आओ, पुण्य वासना की अँधियारी।

मिलने को आतुर उजियाला, मुक्त पुरुष की ममता प्यारी॥

जन्म-जन्म की विह्वल तृष्णे’ नक्षत्रों की ठण्डी ज्वाला।

तुम्हें पिलाता काल लबालब, पूर्ण आयु का भर-भर प्याला॥

मुग्ध रहो जीवन की लज्जे, घूँघट तिमिर न छूने पाये।

आत्म-शान्ति की किरण-किरण से, जीवन-पथ ज्योतित हो जाये॥

जननी! पढ़ो ऋचायें उरकी, तुम्हीं स्वर्ग की पुण्य धरित्री।

जहाँ बीज उग रहे पिता के, जहाँ स्रवित-रति करुणा महती॥

तुम्हीं यज्ञ की अग्नि, कुण्ड में हवन जहाँ कलुषों का होता।

जहाँ गन्ध वात्सल्य स्नेह-सा, उड़-उड़कर आशीष संजोता॥

तुम्हीं ज्ञान की रश्मि, प्रज्वलित, तुम्हीं बुद्धि की शाश्वत ज्वाला।

अरे, अमृत की दीप्त पिपासे, तृप्ति कण्ठ में तुमने ढाला॥

मनुज-पाश में बंधी मानवी, शक्ति और पौरुष की आत्मा।

नर का भोग्य न बन पायेगी, पड़ी नरक में स्वर्गिक गरिमा॥

आदि पुरुष की यही लालसा, मिटो न जग से अमर मनुजते।

पंचभूत में लय होने तक, रहा ‘जिओ’ का स्वर जो भजते॥

ज्योति-शृंग से उतर चेतने, वितरित करो श्वास का कम्पन।

वितरित करो सुधा का वैभव, दिव्य-तेज-आनन्द-रूप धन॥

मृत्युजीत अभिमानी मानव, मर्त्य तुम्हारे लिए न देगा।

कर्म शक्ति से ज्योति ग्रस्त हो, स्वर्ग और सुख वरण करेगा॥

मनु का वंश तुम्हीं से रक्षित, ओ शुभदा, वरदा, कल्याणी!

मातृ-शक्ति औ भुवन-मोहिनी, बाल-शक्ति की मुखरित वाणी॥

तुम्हीं गुणात्मक अणु की सत्ता, महावीर्य से आलिंगित तुम।

नृत्य लासमय डंक तुम्हारा, ताण्डव की ओ छुम-छुम-छुम-छुम-छुम॥

ध्वंस-सृजन की गुरु विभीषिका, डमरू नादकी डिम-डिम हो तुम।

योगिराज की राधा-रानी, सीते! लय तक पूर्ण रहो तुम॥

-साधना

*समाप्त*