(श्रीमती ब्रह्मवती देवी, वारा)
आज सर्वत्र अशाँति ही अशाँति विराजमान है। संसार में जितने भी झगड़े फैले हैं उसका एक मात्र कारण अन्याय से दूसरों का अधिकार लेना है। चोरी, ठगी, दुराचार, शोषण, अन्याय, दूसरों की कमाई हुई सम्पत्ति का अपहरण करना अन्याय है और अन्याय से धन जोड़ने से ही समस्त प्रकार के संघर्ष होते हैं। किसी भी प्रकार धन प्राप्त करने के नशे ने ही प्रत्येक देश, जाति परिवार को ऐसा मतवाला बना रखा है। जिसके परिणाम स्वरूप सर्वत्र कलह का साम्राज्य स्थापित है। सब अपनी-2 स्वार्थ सिद्धि में चिंतित रहते हैं। भाई ही भाई को सर्वनाश के लिए उद्यत है। परिवार का सारा सुख नर्क के रूप में परिणित हो जाता है कोई भाग्यवान परिवार की शायद इस दुख से मुक्त हो। प्रायः यह देखा जाता है कि मनुष्य के पास पर्याप्त धन होने पर भी उसकी तृष्णा एवं लोलुपता बढ़ती ही जाती है और वह उस तृष्णा के वशीभूत होकर धनोपार्जन की अभिलाषा से सहस्रों प्रकार के पाप करने में भी नहीं हिचकिचाता। इस प्रकार वह अपने को पापी बना लेता है।
प्रतिक्षण धन में ही अपने को लिप्त बनाये रखना और धनाढ्य बनना अपना परम कर्त्तव्य समझता है। धन-उपयोग की वस्तुएं अधिकाधिक रूप से निरंतर ऐसी प्रबल होती जाती हैं कि मनुष्य को चैन नहीं लेने देतीं। जिस आनन्द की अभिलाषा में वह धन एकत्रित करता है वह आनन्द क्षणिक समय के लिए प्राप्त होता है। अन्याय से एकत्रित किये धन से इस संसार में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं देखे गए हैं।
अनीति से संचय किया हुआ धन कभी आनन्ददायक नहीं होता। वह बुरी तरह नष्ट हो जाता है। उसके नष्ट होने पर लोग रोते हैं, सिर धुनते हैं यहाँ तक कि पागल भी हो जाते हैं, परन्तु फिर भी अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करते। यदि वे यह समझने लगें कि मेरा संचित किया हुआ धन नष्ट होने पर मुझे जैसा दुख हो रहा है वैसे ही जिसके धन को मैंने अनाधिकार से ग्रहण किया उसे भी होता होगा तो वह अपहरण का अन्याय करने को तत्पर नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य में इस प्रकार के आत्म भाव की कमी रहेगी वह कमी भी वास्तविक उन्नति के शिखर पर नहीं चढ़ सकता।
अपार धन का स्वामी होने पर भी कोई सुख ओर शाँति नहीं प्राप्त कर सकता। कहीं अनाचार और अत्याचार से एकत्रित किये हुए धन से कोई सुखी भी रहा है?
जिन व्यक्तियों के कर्म शुभ हैं और जिनका लक्ष्य उत्तम है वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति त्याग देने पर भी दुखी नहीं होते। उनके सुख की सामग्री सर्वथा एकत्रित ही रहेगी। महात्मा गाँधी, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर आदि महापुरुषों ने अपनी सब सम्पदा त्याग दी थी, फिर भी उन्हें निर्धनता का दुख नहीं भोगना पड़ा। सत्पुरुषों के पास अन्य आत्मिक सम्पत्तियाँ इतनी एकत्रित हो जाती है कि उन्हें थोड़े साधनों से भी अमीरों से अधिक सुख प्राप्त होता रहता है।
स्मरण रखिए वही धन फलीभूत होगा, वही सुख अशाँति की वृद्धि करेगा जो परिश्रम एवं ईमानदारी से, उचित प्रयत्नों द्वारा, प्राप्त किया जाता है। अन्यायोपार्जित धन चाहे कितनी ही जल्दी कितनी ही अधिक मात्र में एकत्रित क्यों न हो जाय पर उससे रोग, शोक, चोरी, विपत्ति, राजदंड, हानि आदि का ही कुयोग जमेगा और वह धन अनेक प्रकार के दुख देता हुआ नष्ट होगा।
वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-6
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
कौन है किसका यहाँ पर, हैं सभी आते अकेले।
कौन किसका साथ देता, हैं सभी जाते अकेले॥
मोह के बन्धन न पड़ तू, कौन अपना या पराया।
कर भला फिर भूल जग को, छोड़ दे सब मोह-माया॥
जग तुझे समझे न समझे, कर नहीं परवाह इसकी।
चार दिन की वाहवाही, कर नहीं तू चाह इसकी॥
मस्त रह! बस मस्त रह! अपनी फकीरी शान में तू।
यश-अयश निन्दा-प्रशंसा रख नहीं कुछ ध्यान में तू॥
सत्य प्रभु का ध्यान रख बस छोड़ दे सारी निराशा।
क्या अकेला, क्या दुकेला, साथ है जब अमर-आशा॥
दस कदम के साथियों का योग और वियोग क्या रे?
भक्त तू भगवान का फिर व्यर्थ चिंता रोग क्या रे?
देख तू सत्येश-मन्दिर विश्व का कल्याण जिसमें।
विश्व की सेवा जहाँ है और तेरा त्राण जिसमें॥
उस तरफ ही बढ़ वहीं है प्राण का आधार तेरा।
तू अकेला है यहाँ पर, है वहाँ संसार तेरा॥
मनुष्य का जीवन काल दो प्रकार से कटता है (1) जागते हुए (2) सोते हुए। आमतौर से लोग दिन में जागते हैं और रात को सोते हैं। सोना जरूरी भी है क्योंकि बिना उसके शारीरिक और मानसिक थकान नहीं मिटती। दिन भर काम करने से जो शक्तियाँ व्यय होती हैं उनकी क्षति पूर्ति के लिए निद्रा की आवश्यकता होती है। रात भर सोकर जब मनुष्य प्रातःकाल उठता है तो उसमें स्फूर्ति और ताजगी होती है। काम करने की नई क्षमता उसमें आ जाती है। यदि दो चार दिन भी लगातार न सोया जाय तो इतनी थकान हो जायेगी कि जीवन यात्रा का चलना तक दुर्लभ दिखाई देगा।
जिस प्रकार सोना जरूरी है उसी प्रकार जागना भी जरूरी है। क्योंकि जितने भी काम होते हैं जागृत अवस्था में होते हैं। निर्वाह और विकास की समस्त कार्य प्रणाली जागृत अवस्था में ही चलती है। यदि निद्रा ही प्रधान रूप धारण कर ले और जागरण कम हो जाय तो भी जीवन में विकट संकट उत्पन्न हो जाता है। जिस प्रकार गाढ़ी निद्रा में सोने से थकान पूरी तरह मिट जाती है और नई प्रफुल्लता पैदा होती है उसी प्रकार पूरी तरह से जागृत रहने से जागृत जीवन की कार्य प्रणाली सुचारु रूप से चलती है।
कितने ही मनुष्य ऐसे हैं जो जागृत अवस्था में भी सोते रहते हैं। उनके मस्तिष्क का एक अंश जागृत रहता है और शेष भाग सोता रहता है। इस अर्ध मूर्च्छित अवस्था में रहने वाला मनुष्य एक प्रकार से लुँज हो जाता है। उसकी दशा करीब-करीब, अर्ध विक्षिप्त की सी, भुलक्कड़ बालक की सी एवं अपाहिज की सी हो जाती है। यह ‘जागृत तन्द्रा’ का रोग ऐसी भयंकरता से फैला हुआ है कि आजकल अधिकाँश मनुष्य इसके शिकार मिलते हैं।
इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, पाठक अविश्वास न करें। सचमुच ही यह रोग बड़े भयंकर रूप से फैला हुआ है और अधिकाँश जन समूह इससे ग्रसित हो रहा है। इस रोग का रोगी देखने में अच्छा भला, तन्दुरुस्त, हट्टा कट्टा और भला-चंगा मालूम पड़ता है, शारीरिक दृष्टि से इसकी तन्दुरुस्ती में कोई फर्क नहीं मालूम पड़ता है फिर भी ‘जागृत तन्द्रा’ के कारण उसके जीवन का सारा विकास रुका हुआ होता है। उसकी सारी प्रतिष्ठा एवं साख नष्ट हो जाती है और जिम्मेदारी के साथ होने वाले सभी महत्वपूर्ण कार्यों से वह वंचित रह जाता है।
जागृत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं। उन तीनों के पृथक नाम भी हैं-(1) लापरवाही, (2) आलस्य, (3) प्रमाद। तीनों ही दर्जे क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। कहने और सुनने में यह तीनों बहुत मामूली बातें प्रतीत होती हैं क्योंकि अधिकाँश लोग इनमें ग्रसित होते हैं। पर “अधिकाँश लोग किसी बात से ग्रसित है” इसीलिए उसकी भयंकरता कम नहीं हो जाती। अधिकाँश लोग झूठ बोलते हैं, नशा करते हैं असंयम, नशेबाजी कब्ज या प्रमेह की भयंकरता कम नहीं होती, यह घातक तत्व जहाँ रहते हैं वहाँ भयंकर परिणाम उत्पन्न किये बिना नहीं रहते।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि जिस कार्य को मनुष्य पूरी दिलचस्पी से, जागृत मन से, ध्यानपूर्वक करेगा वह कार्य ठीक, निर्दोष और सुन्दर होगा। इस जागृति एवं दिलचस्पी की जितनी कमी होगी उतना ही फूहड़पन रह जायगा और भूलें होगी। घोड़ा जितनी तेज चलता हैं उतनी ही तेजी से ताँगे का पहिया घूमता है। पहिया स्वतंत्र रूप से नहीं चलता उसकी गति घोड़े की चाल के ऊपर निर्भर है। घोड़ा मन्द या तीव्र जैसी चाल से चलता हैं उसी गति से ताँगे का पहिया घूमने लगता है। मन की जिस कार्य में जितनी रुचि होगी वह उतना ही अच्छा बन पड़ेगा। यही हाल दिलचस्पी की कमी के साथ किये जाने वाले कामों का होता है वे अनेक प्रकार के दोषों से भरे हुए होते हैं।
क्रिया पद्धति के साथ पूरी दिलचस्पी को न जोड़ना जागृत तन्द्रा का प्रमुख चिह्न है। इस अवस्था में किये हुए कार्यों का ठीक प्रकार पूरा होना असंभव है। जिस वक्त कोई व्यक्ति झपकियाँ ले रहा हो उस समय उसे एक रेखा गणित का प्रश्न हल करने को दिया जाय तो वह उसे सही रूप से हल न कर सकेगा इसी प्रकार जो आधे मन से, अर्धजागृत अवस्था में कार्य करता है वह अपने सामने रखे हुए कार्यों को भली प्रकार पूरा न कर सकेगा। इस प्रकार की अधूरे मन के साथ की हुई कार्य प्रणाली को लापरवाही, असावधानी, आलस्य एवं प्रमाद कहा जाता है।
हर काम को सफल बनाने के लिए दो बातों का ध्यान रखना पड़ता है एक यह कि “इस कार्य को उत्तमता के साथ पूरा किया जाय”, दूसरा यह कि-”कहीं यह कार्य खराब न हो जाय” सफलता का लोभ और असफलता का भय-इन दोनों वृत्तियों का समन्वय ही जागरुकता है। जैसे गरम (पॉजिटिव) और ठंडे (नेगेटिव) तारों के मिलने से बिजली की धारा का संचार होता है वैसे ही उपरोक्त लोभ और भय का ध्यान रखने से मानसिक जागरुकता उत्पन्न होती है। यह जागरुकता सतेज होकर शरीर और मस्तिष्क की काम करने वाली शक्तियों को संगठित और संयोजित करके सुव्यवस्थित रूप से कार्य में प्रवृत्त करती है तब वह कार्य सफल हो जाता है।
परन्तु जब मनुष्य असफलता की लज्जा को भूल जाता है और सफलता के गौरव की उपेक्षा करता है तब उस जागरुकता रूपी विद्युत शक्ति का संचार नहीं होता। नाड़ियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। कार्यकारिणी शक्ति मंद हो जाती है। सामने पड़ा हुआ काम पर्वत के समान भारी प्रतीत होता है। उसे करते हुए मन में स्फूर्ति नहीं उठती वरन् बेगार के भार की तरह झुँझलाते हुए उसे किया जाता है। जब उस कार्य में रस नहीं आता तो उसके बिगाड़ सुधार की बारीकियों की ओर भी मन नहीं जाता। फलस्वरूप कार्यकाल में वे बातें सूझ नहीं पड़तीं कि कहाँ बिगाड़ करने वाली भूल हो रही है और क्या सुधार करने वाली गतिविधि छूटी जा रही है।
जागरुकता का अभाव ही असावधानी या लापरवाही कहा जाता है। ऐसे स्वभाव के आदमी में दो प्रकार के दोष और आ जाते हैं वह (1) आगे और पीछे के कार्यक्रम की परवा नहीं करता (2) अपने उत्तरदायित्व को अनुभव नहीं करता। जहाँ पहुँच गये बस वहाँ की बातों में उलझ गये। ताश खेल रहे हैं तो खेल में इतने मशगूल हैं कि कारखाने में मजदूरों द्वारा क्या नफा-नुकसान हो रहा होगा, इसका ध्यान नहीं। जरूरी काम को छोड़ कर दस मिनट के लिए किसी से मिलने गये हैं, तो वह जरूरी काम जहाँ का तहाँ पड़ा है पर दस मिनट की जगह तीन घंटे निरर्थक गप्प हाँकने में लगा दिये। लौट कर देखते हैं कि बहुत काम हर्ज हुआ। उस वक्त कुछ अफसोस भी करते हैं पर फिर वही रफ्तार। दूसरे दिन फिर वैसी ही लापरवाही। किसी रिश्तेदारी में या दोस्ती में दो रोज के लिए जावें तो दस रोज में लौटें। नियत समय पर उनका कोई भी काम नहीं हो पाता। स्नान, भोजन, सोना, जागना कुछ भी उनका समय पर नहीं होता। जीविका उपार्जन का जो व्यवसाय है वह भी ऐसा ही खंड-खंड हो जाता है। दुकान पर कभी बैठते हैं कभी नहीं बैठते, कोई सामान है, कोई बीता हुआ पड़ा है। निराश ग्राहक लौट जाते हैं। अगर कहीं नौकरी करते हैं तो देर में पहुँचते हैं, समय पर ठीक तरह काम पूरा करके नहीं देते, ऐसी दशा में असंतुष्ट मालिक की झिड़कियाँ सुनने को मिलती हैं। ऐसी दशा में जीविका के जो साधन हैं उनसे बहुत थोड़ी आमदनी हो पाती है। न तो निराश लौटने वाले ग्राहकों को अधिक नफा मिल सकता है और न असंतुष्ट मालिक वेतन बढ़ा सकता है। फल यह होता है कि लापरवाह व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति गिरने लगती है और धीरे धीरे दरिद्र बन जाते हैं।
लापरवाह व्यक्तियों से अपने वचन का पालन नहीं हो सकता। क्योंकि हर एक वचन को पूरा करने के लिए वह समय ध्यान रखना पड़ता है जब कि उसे पूरा करना है साथ ही वह सामग्री भी जुटानी पड़ती है जो वचन पूरा करने के लिए प्रस्तुत की जाने वाली है। लापरवाह मनुष्य पहले तो सोचता रहता है कि अभी क्या जल्दी है बहुत समय पड़ा है, इस काम को तो बहुत जल्द पूरा कर देंगे, ऐसे ही टालते-2 समय बीतता चला जाता है और जब वचन पूरा करने की अवधि बिल्कुल पास आ जाती है तब उसके हाथ पैर फूल जाते हैं कि अब यह कार्य कैसे पूरा हो। अन्त में दाँत निपोर कर रह जाते हैं।
जिनमें जागरुकता नहीं है उनकी सारी चीजें अस्त-व्यस्त रहती हैं। उनके निवास स्थान पर जाकर देखिए तो सारी चीजें इधर-उधर अस्त-व्यस्त कूड़े-कचरे की तरह जहाँ-तहाँ पड़ी होंगी। चूहे, दीमक, मकड़ी, छिपकली कीड़े-मकोड़े उनकी चीजों का निर्द्वन्द्व उपयोग कर रहे होंगे। बालों में चीलर, कपड़ों में जुएं रेंग रहे होंगे। शरीर पर जहाँ-तहाँ मैल जम रहा होगा, बदबू आ रही होगी, देह पर कपड़े बेढंगे भद्दे और मैले कुचैले होंगे। कहीं हजामत बढ़ रही है तो कहीं बटन टूटे हुए हैं। जूते की सिलाई उखड़ गई है तो यह न बन पड़ेगा कि जल्दी ही उसकी मरम्मत करा लें भले ही वह कीमती जूता थोड़े ही दिनों में इस छोटी सी भूल के कारण खराब हो जाय। इस प्रकार फटी-टूटी, अस्त-व्यस्त, मैली-कुचैली दशा में उनकी वस्तुएं पड़ी रहतीं हैं, यदि कोई दूसरा व्यवस्था करने वाला न हो तो उनके चारों ओर दरिद्र महाराज छाये हुए दृष्टिगोचर होते हैं।
ऐसे लोग दूसरों के यहाँ अपनी चीजें पड़ी रहने देते हैं, अपने यहाँ किसी की चीज आ जाय तो लौटाते नहीं। यदि भाग्यवश खोने या नष्ट होने से बच गई तो बार-बार तकाजे होने पर टूटी-फूटी या खराब दशा में वापिस करते हैं। जो एक बार चीज उधार दे देता है वह आगे के लिए होशियार हो जाता है और फिर उन्हें देने की भूल नहीं करता। आये दिन उनकी चीजें गुम होती रहती हैं-अपने बुरे स्वभाव के कारण वे चीजों को जहाँ-तहाँ पटक देते हैं फिर जरूरत के वक्त पर बेतहाशा इधर-उधर ढूँढ़ते फिरते हैं, नहीं मिलती तो कभी किसी पर झल्लाते हैं, कभी किसी पर नाराज होते हैं। घर में चीज निपट गई है पर लाई नहीं जाती। ईंधन, अनाज, नमक, तेल आदि की पुकार पड़ी रहती है।
लापरवाही का बड़ा भाई आलस्य है। मानसिक असावधानी को लापरवाही कहते हैं। इसमें जब बढ़ोत्तरी होती है तो वह शरीर पर भी अपना कब्जा कर लेती है और परिश्रम करना बहुत बुरा लगने लगता है। छोटा या बड़ा कोई भी परिश्रम क्यों न हो जहाँ तक बन पड़ता है उसे टालते हैं। जब तक अत्यन्त उग्र प्रेरणा न हो तब तक मेहनत करने को देह नहीं उठती। अपना काम दूसरों से कराने के अवसर ताका करते हैं। शरीर को उठाकर इधर-उधर ले जाना ऐसा लगता है मानो पहाड़ उठाने का काम उन्हें करना पड़ रहा हो। पलंग, आराम कुर्सी या गद्दी पर पड़े रहना उन्हें पसंद होता है। घर छोड़कर बाहर निकलना ऐसा प्रतीत होता है मानो मौन से युद्ध करने की मुसीबत उनके ऊपर आई हो। समय को वे निरर्थक गंवाते रहते हैं और हर काम को नियत अवधि से पीछे करते हैं। कई बार तो रेल आदि के टाइम से भी पिछड़ जाते हैं। शौच, स्नान, भोजन, शयन में भी उनका आलस्य साथ नहीं छोड़ता। नियत और उपयोगी समय पर उनका एक भी कार्य नहीं हो पाता, आलस्य में उनके जीवन के क्षण निरर्थक बर्बाद होते रहते हैं।
प्रमाद इन दोनों से भी आगे बढ़ी हुई स्थिति है। जानबूझ कर, अधिक उपयोगी एवं आवश्यक कार्यों की घृष्टतापूर्वक उपेक्षा करना, उन्हें बिगड़ने देना, प्रमाद कहलाता है। आलसी या लापरवाह व्यक्ति अपनी भूल के लिए कुछ पश्चाताप करता है। अन्यमनस्कता के कारण भूल करते समय उसे सूझ नहीं पड़ता कि इससे क्या अनर्थ होने की सम्भावना है। वह वस्तुस्थिति के दुष्परिणाम का ठीक-ठीक अन्दाज नहीं लगा पाता और ‘साधारण बात’ समझ कर नियत कार्य में ढील छोड़ देता है। किन्तु प्रमादी व्यक्ति बौद्धिक दृष्टि से उन सब बातों को जानता है, उसे अन्दाज होता है कि इस प्रकार की लापरवाही करने का क्या दुष्परिणाम हो सकता है। फिर भी अपनी ‘हेकड़ी’ के आधार पर उसकी परवाह नहीं करता। अहंकार, घृष्टता और निर्लज्जता की उसमें प्रधानता रहती है। वह घमंड के मारे दूसरों की हानि या घृणा की चिन्ता नहीं करता, औरों को तुच्छ या नाचीज समझता है, कर्त्तव्य पालन न करने पर जो भर्त्सना होती है, उससे शर्मिंदा होने के स्थान पर वह घृष्टतापूर्वक बेतुके जवाब देता है। अपनी भूल का निराकरण या सुधार करने के स्थान पर वह भर्त्सना करने वाले के दोष दिखाने लगता है। वह साबित करना चाहता है कि मैंने यह गलती की, तो तुम अमुक गलती कर चुके हो, फिर तुम्हें मेरी आलोचना क्यों करनी चाहिए?
लापरवाही, असावधानी, गैर-जिम्मेदारी, आलस्य, प्रमाद जैसे भयंकर दोष ‘जागृत तन्द्रा’ के कारण पैदा होते हैं। यह दोष साधारण दृष्टि से देखने पर बहुत छोटे मालूम पड़ते हैं, इनसे किसी भयंकर अनर्थ की आशंका नहीं मालूम पड़ती, इसलिए अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। परन्तु स्मरण रखना चाहिए कि- ‘छोटी-छोटी आदतों से ही जीवन निर्माण होता है।’ छोटे-2 परमाणुओं के संघटन से कोई बड़ी वस्तु बनती है। पीले और नीले रंग के नन्हे-नन्हे परमाणु अमुक मात्रा में मिल जाते हैं तो हरा रंग बनता है पर यदि उनकी मात्रा में न्यूनाधिकता रहे तो दूसरी प्रकार का रंग बनेगा। दवाओं में पड़ने वाली औषधियों की मात्रा में थोड़ा अन्तर कर दिया जाय तो उसके गुणों में भी भारी अन्तर आ जाता है। निशाना लगाते समय यदि बन्दूक की नाल एक जौ भर नीची हो जाय तो निशाने तक गोली के पहुँचने में कई गज का अन्तर पड़ जाता है। इसी प्रकार छोटे-छोटे गुण और छोटे-छोटे दोषों का अन्तर जीवन की अंतिम सफलता में जमीन आसमान का फर्क कर देता है।
अपना गुण गान करने वाला और दूसरे में दोष देखने वाला दंभी है। वह अपने से छोटे लोगों में आनन्द पाता है क्योंकि उनसे उसे अपने कार्यों और गुणों की प्रशंसा सुनने को मिलती है। दंभी की अपेक्षा और कोई खुशामद से प्रसन्न नहीं होता, इसलिए वह अपने खुशामद करने वाले साथियों द्वारा थोड़े समय में ही नष्ट हो जाता है। -स्पिनौजा
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मेरा देश ही मेरे लिए ईश्वर की महिमा का साकार रूप है। -देशबन्धु चितरंजनदास
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जिस शिक्षा-दीक्षा ने हमको अमानुष बना दिया है उसे नष्ट करके ही हम मनुष्य बन सकेंगे।
-देशबन्धु चितरंजनदास
(श्री स्वामी कुवलयानन्द)
आज मैं आपको यौगिक शिथिलीकरण अर्थात् उन योगिक आसनों के विषय में, जिनके द्वारा शरीर की स्नायु प्रणाली और माँस-पेशियों का शिथिलीकरण होता है, कुछ बातें बताना चाहता हूँ। किन्तु इन आसनों के टेकनिक अथवा विशेषता के सम्बन्ध में विचार प्रकट करने तथा आधुनिक युग के मनुष्य के लिए इनकी महान उपयोगिता बताने के पूर्व मैं यह आवश्यक समझता हूँ कि शरीर के भीतर स्नायु और माँस-प्रणालियों के कार्यों का संक्षिप्त रूप से सिंहावलोकन करा दूँ।
पहले मैं स्नायु प्रणाली को लेता हूँ। हम देखते हैं कि हमारे समस्त कार्य शरीर के ढांचे को ढ़कने वाली माँस पेशियों के संकोचन पर निर्भर करते हैं। कूदना, दौड़ना, टहलना, फेंकना, उठना, बैठना, लिखना, बातचीत करना अथवा साँस लेना आदि जो भी हम कार्य करते हैं वह हमारे शरीर की निर्दिष्ट माँसपेशियों के संकोचन के ही द्वारा होता है। कुछ वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमारे सोचने अथवा विचार करने की मानसिक क्रिया में भी माँसपेशियों में कुछ संकोचन होने की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार आप देखेंगे कि सम्पूर्ण जाग्रतावस्था में हमारी माँसपेशियों में बराबर संकोचन होता रहता है। संकोचन की यह क्रिया किस हद तक होती है यह हम जो कार्य करते हैं उसके प्रकार अथवा किस्म पर निर्भर है।
अब इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि माँसपेशियों के जिस संकोचन का उल्लेख ऊपर किया गया है वह स्नायु प्रणाली द्वारा नियन्त्रित होता है। यह स्नायु प्रणाली मस्तिष्क में और मेरु-दण्ड में शक्ति का सृजन करती है और तार की सी नाड़ियों के मार्ग से शरीर के प्रत्येक अवयव में पहुँचती है, जिसमें शरीर को ढ़कने वाली माँसपेशियों के अवयव भी सम्मिलित हैं। स्नायविक शक्ति संवेग के रूप में नाड़ियों के मार्ग से संचारित होती है। और जब किसी माँसपेशी में प्रविष्ट हो जाती हैं तो वहाँ पर संकुचन होता है। इस संकुचन का दायरा वहाँ पर पहुँचाई गई शक्ति की मात्रा पर निर्भर करता है। इस प्रकार स्नायु-संवेग जितना प्रबल होगा उसी अनुपात से मांसपेशियों का संकोचन भी होगा। ये स्नायु संवेग बिजली का सा गुण रखते हैं और यद्यपि सम्भव है हममें से अधिकाँश इससे अपरिचित रहते हों, किंतु सच बात तो यह है कि हमारे शरीर में मस्तिष्क और मेरुदण्ड से लेकर मांसपेशियों तक और फिर ज्ञानेन्द्रियों से चलकर मस्तिष्क और मेरुदण्ड तक नाड़ियों के मार्ग से विद्युत धाराएं लगातार प्रवाहित होती रहती हैं। ये विद्युत धाराएं साधारण विद्युत धारा की गति नहीं रखतीं। इनकी गति प्रति सेकेंड केवल 40 गज से लेकर 100 गज तक ही होती है। ये विद्युत धाराएं मनुष्य की चेतना में भी प्रविष्ट नहीं होतीं।
स्नायु संवेग की विद्युत का सबसे पहले पता सन् 1842 में लगाया गया था, लेकिन इस विद्युत की क्षीणतम धारा को व्यक्त करने के लिए यन्त्र तैयार करने में वैज्ञानिकों को करीब एक शताब्दी का समय लग गया। अब डॉ. जैकाब्सन ने ‘बेल टेलीफोन’ प्रयोगशाला की सहायता से एक ऐसा यन्त्र तैयार किया है जो एक ‘वाल्ट’ के 1 बटा 1000000 अंश को भी माप सकता है। आपके लिए यह एक दिलचस्पी की बात होगी कि यह यन्त्र बिजली की शक्ति का माप एक ऐसे तार से करता है जिसका व्यास केवल 1।10000 इंच है।
डॉ. जैकाब्सन तथा उसी के समान अन्य कई वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किये गए यन्त्रों के द्वारा स्नायुओं के तनाव का ठीक-ठीक माप किया जाना सम्भव हो गया है। आधुनिक सभ्य देशों में निवास करने वाला मनुष्य प्रतिदिन के कार्यों को पूर्ण करने में अपार स्नायुविक शक्ति खर्च करता है। आजकल के जीवन में कितनी अधिक स्नायुविक शक्ति व्यय करने की जरूरत पड़ती है। इसे समझने के लिए हमें केवल अपने कार्य में व्यस्त हुए किसी डॉक्टर, वकील, व्यवसायी, राजनीतिक या अधिकारी के कार्यों का अवलोकन मात्र करने की आवश्यकता है। इन लोगों को हर रोज बहुत अधिक व्यक्तियों से निपटना होता हैं। जिनमें से प्रत्येक अपनी एक अलग समस्या उपस्थित करता है और उसे तत्काल हल करा लेना चाहता है। उस डॉक्टर, उस वकील, उस राजनीतिक या उस व्यवसायी को हर बार नये आने वाले व्यक्ति के कारण शक्ति रूपी बिजली का बटन दबाना और छोड़ना पड़ता है। जिस गति अथवा तेजी के साथ हम अपने जीवन को बिता रहे हैं उसका अन्दाज हम रेलगाड़ियों, इंजनों, वायुयानों तथा तार, टेलीफोन, रेडियो आदि को देखकर लगा सकते हैं इन तेज रफ्तार वाले कार्यों के फलस्वरूप हमारे शरीर के ‘डाइनेमो’ को प्रायः अविराम चलते रहना पड़ता है, जिसका फल यह होता है कि हमारे स्नायुओं को लगातार ऊंचे दरजे के तनाव की अवस्था में रहना पड़ता है और हमारे शरीर की माँसपेशियाँ स्वभावतः संकुचित हो जाती हैं। वैज्ञानिक परीक्षाओं से यह प्रकट हो चुका है कि आवश्यकता से अधिक कार्य करने वाले व्यक्ति के स्नायु नींद की अवस्था में भी शान्त नहीं होते और उसकी माँसपेशियाँ शिथिल नहीं होतीं। उनका शरीर बराबर तनाव की अवस्था में रहता है जो एक प्रकार की आदत बन जाती है।
आमतौर पर हम सभी यह जानते हैं कि मशीनें भी बिना विश्राम अथवा आराम के कार्य नहीं कर सकतीं। अगर मशीनों को आराम न करने दिया जाये तो जल्द खराब हो जायेंगी, तो फिर जिन व्यक्तियों के स्नायु विश्राम करना जानते ही नहीं उन्हें स्नायविक रोगों का अगर शिकार होना पड़े तो क्या यह कोई आश्चर्य की बात होगी? प्रत्येक चिकित्सक यह जानता है कि स्नायु-दौर्बल्य के कारण अजीर्ण, कोष्ठबद्धता, अनिद्रा का रोग, रक्त-चाप का बढ़ना, नपुँसकता और उन्माद रोग हमारे नगरों की धनी आबादियों में लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इसका कारण हम आसानी के साथ समझ सकते हैं। वह यही है कि हम बिना विश्राम के लगातार आवश्यकता से अधिक स्नायविक शक्ति खर्च कर रहे हैं।
इन बुराइयों से हम छुटकारा कैसे पा सकते हैं? क्या हमें अधिक स्नायविक तनाव पैदा करने वाले कार्यों से अपना पिण्ड छुड़ाकर अपने स्नायुओं को आराम देना चाहिए था हमें इसके लिए रेलवे लाइनें तोड़कर, टेलीफोन और तार की लाइनों को नष्ट करके, रेडियो स्टेशन बन्द करके तथा वायुयानों द्वारा सफर करने पर रोक लगा, इन तेज रफ्तार से कार्य करने वाले साधनों से मुक्त हो जाना चाहिए। यह प्रायः सभी स्वीकार करेंगे कि हम चाहने पर भी ऐसा नहीं कर सकेंगे। जो भी हो, अगर हम चाहते हैं कि हमारा भविष्य सुखपूर्ण हो तो हमें अपने शरीर को बराबर तनाव की अवस्था में न रखकर उसे विश्राम देना होगा। और चूँकि हमारे जीवन के दायरे के चारों तरफ जो अवस्थाएं उत्पन्न हुई हैं उन्हें हम बिल्कुल बदल नहीं सकते इसलिए हमें इसके लिए व्यक्तिगत रूप से ही मुक्त होने के लिए उपाय करना पड़ेगा। हमारे लिए केवल यही एक मार्ग खुला है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि रूढ़िवादी डॉक्टर स्नायुविक खराबियों को दवाएं देकर दूर करना चाहेगा। डाक्टरी चिकित्सा करने वाला मनोवैज्ञानिक कुछ हद तक रोगी का मनोविश्लेषण करके इलाज करेगा। इन चिकित्सा प्रणालियों, पद्धतियों और विशेषतः पुराने स्नायविक रोगों की जाने वाली चिकित्सा प्रणालियों की सफलता अथवा असफलता के सम्बन्ध में व्यक्तिगत रूप से कोई विचार प्रकट करने के बजाय मैं आप लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि डाक्टरों का एक ऐसा भी वर्ग है जिसके सदस्यों का ख्याल है कि स्नायविक विकार से पीड़ित होने वाले रोगी को आराम तथा उसकी माँसपेशियों को विश्राम दिलाकर उसे रोगमुक्त किया जा सकता है।
हमारे रूढ़िवादी डॉक्टर भी स्नायु सम्बन्धी रोगियों को आराम करने की सलाह देते हैं। लेकिन खेद की बात यह है कि माँसपेशियों के शिथिलीकरण के बिना आराम करने का कोई विशेष लाभ रोगी को नहीं पहुँचाया जा सकता। रोगी चारपाई पर लेट तो जाता है लेकिन वह बराबर बेचैन बना रहता है और अपने शरीर को आराम पहुँचाने वाली स्थिति में करने के लिए खींचतान करता रहता है। इसका कारण यह है कि उसकी नाड़ियों के मार्ग से विद्युत शक्ति लगातार माँसपेशियों की ओर प्रवाहित होती रहती है, जिसके कारण नाड़ियों में बहुत अधिक तनाव और माँसपेशियों में संकुचन रहता है। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में किये गये प्रयोगों के द्वारा अन्तिम रूप से यह प्रमाणित किया जा चुका है कि जब तक शरीर की माँसपेशियों का शिथिलीकरण नहीं किया जाता तब तक नाड़ियों के मार्ग से प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा को रोका नहीं जा सकता और नाड़ियों के तनाव को दूर नहीं किया जा सकता। उन प्रयोगों से यह भी प्रकट हुआ है कि शरीर की माँसपेशियों को पूर्ण विश्राम पहुंचा कर माँसपेशियों में विद्युत शक्ति के प्रवेश को भी पूरी तौर से रोका जा सकता है और नाड़ियों को पूरा आराम पहुँचाया जा सकता है।
डॉक्टर जैकाब्सन ने शरीर की माँसपेशियों का ऐच्छिक शिथिलीकरण करने का साधन निकाला है, जो संक्षेप में इस प्रकार है- रोगी पीठ के बल चारपाई पर लेट जाता है और तब वह धीरे-धीरे और सजगतापूर्वक अपने शरीर के किसी खास अंग की-उदाहरण के लिए दाहिना हाथ ले लीजिये- मांसपेशियों को सिकोड़ता है। इसके साथ ही दूसरी ओर वह माँसपेशियों को संकुचन पैदा होने के ज्ञान का अधिकाधिक अनुभव करने की चेष्टा करता है। जब उसे माँसपेशियों के संकुचन का ज्ञान प्राप्त करने की पूर्ण सफलता मिल जाती है तो उसके उपरान्त वह उस मन्द संकुचन को भी रोकने की चेष्टा करता है जो कि आराम करने की हालत में भी माँसपेशियों में बना रहता है और जिसे अवशिष्ट संकुचन कहते हैं। इस बचे हुए संकुचन को भी दूर करने का प्रयत्न इच्छाशक्ति के द्वारा किया जा सकता है और जब इसमें सफलता मिल जाती है तो उसके उपरान्त यह अवशिष्ट संकुचन मिट जाता है और माँसपेशियों का पूर्ण शिथिलीकरण हो जाता है। इसी प्रकार जब शरीर की समस्त माँसपेशियों का शिथिलीकरण हो जाता है तो उसे साधारण शिथिलीकरण कहते हैं।
इसका उपयोग हमारे यहाँ के योगीगण साँस्कृतिक तथा रोगों का निवारण दोनों उद्देश्यों से करते आ रहे हैं। अब हम बतायेंगे कि शिथिलीकरण के ये तरीके क्या हैं?
साधारण शिथिलीकरण के लिए दो तरह के आसन करने की सलाह दी जाती है। वे हैं शवासन और प्राणधारण। शवासन करने के लिए पीठ के बल लेट कर जहाँ तक सम्भव हो सके वहाँ तक अपने शरीर को ढीला करना चाहिए। आंखें बन्द करके शरीर की माँसपेशियों के स्थानीय ढीलेपन अथवा शिथिलीकरण का बोध करना चाहिए। इसके लिए पाश्चात्य पद्धति के अनुसार संकुचन की अनुभूति को उन्नत बनाने की आवश्यकता नहीं है। इस नियम के अनुसार जब कोई व्यक्ति शिथिलीकरण की दिशा में कुछ उन्नति कर लेता है तब वह दूसरे आसन-प्राणधारण का लाभ उठाता है इसके लिए आसन करने वाला व्यक्ति एक ओर माँसपेशियों के शिथिलीकरण में कोई बाधा इत्यादि उत्पन्न नहीं होने देता तो दूसरी ओर साँस के बाहर निकलने तथा भीतर आने की क्रिया पर ध्यान आकर्षित करता है और धीरे-धीरे श्वास निश्वास के संचालन के बीच पूर्ण सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस सतर्क तथा सामंजस्यपूर्ण साँस लेने की क्रिया से समूची स्नायु प्रणाली पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके द्वारा न केवल हृदय तथा फेफड़े को काफी शिथिलता प्राप्त होती है बल्कि शरीर की माँसपेशियों के प्रत्येक अवयव का पूरी तौर से शिथिलीकरण हो जाता है। शिथिलीकरण के सम्बन्ध में प्राणधारण आसन के उपयोग से न केवल शिथिलीकरण की क्रिया कहीं अधिक आसान हो जाती है बल्कि श्वास संचालन क्रिया पर अधिकार स्थापित कर लेने के फलस्वरूप माँसपेशियों का शिथिलीकरण अपेक्षाकृत अधिक पूर्ण हो जाता है और उसके द्वारा वह मनुष्य दिन के चौबीसों घंटे श्वास को स्थिर रख सकने में समर्थ हो सकता है।
(श्री रामखेलावन चौधरी बी. ए. बम्बई)
जैसे अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि हम उसकी शक्ति का पहले अन्दाजा लगा लें, और यह समझ लें कि उसकी शक्ति का उद्गम क्या है, वैसे ही हमें यह समझ लेना चाहिये क्रोध पैदा क्यों होता है। इतना समझ लेने के बाद, क्रोध को पचा लेने की शक्ति मनुष्य प्राप्त कर सकता है।
ध्यायतो विषयान्पुँसः संगस्तेषूपायते,
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोभिजायते॥
(गीता अध्याय 2 श्लोक 68)
उक्त पंक्तियों में क्रोध की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला गया है। मनुष्य की इन्द्रियों के विषय हैं- सौंदर्य, स्वाद, मधुर शब्द, कोमल स्पर्श आदि। मनुष्य सुन्दर वस्तुओं को देखने, अच्छे-अच्छे भोजन और रसों का स्वाद लेने, संगीत के जैसे कर्ण प्रिय स्वरों को सुनने आदि की चिंता करता है। यह तो स्वाभाविक ही है किन्तु खतरा यह है कि उनके संबंध में सोचते वह इतना आदी हो जाता है कि वह उनके पाने की इच्छा करने लगता है। उनके बिना वह रह नहीं सकता, बस यही क्रोध का कारण है, क्योंकि उन सब चीजों की प्राप्ति अपने वश की बात नहीं है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि क्रोध का सबसे बड़ा कारण है किसी से अत्यधिक इच्छा करना। आप अपने मित्र, पुत्र या पत्नी से इसीलिए नाराज होते हैं कि उसने आपकी इच्छानुसार कार्य नहीं किया। इच्छा करना बुरी चीज नहीं है, किन्तु जब हम किसी के ऊपर आवश्यकता से अधिक आशाएं बाँध लेते हैं और अपनी स्वार्थ सिद्धि का आधार समझ बैठते हैं, तभी क्रोध को मानो न्योता दे देते हैं। कोई व्यक्ति हमारी या आपकी इच्छाओं का पालन, मशीन की तरह नहीं कर सकता है। उसकी भी इच्छाएं हैं, जब पहले उसकी इच्छाएं पूरी हो जाएगी तभी वह आपकी तरफ ध्यान देगा। इसलिए क्रोध के विजय के मार्ग में सबसे क्षीण पहला कदम यह होगा कि हमें किसी से अंधाधुन्ध आशाएं नहीं करनी चाहिये। किन्तु यह केवल रक्षात्मक कार्य हैं। क्रोध पर पूरी तरह विजय प्राप्त करने के लिए किसी से कुछ कार्य सिद्धि की अभिलाषा करने के स्थान पर, यदि हम यह सोचना बल्कि करना आरम्भ कर दें कि हमें अपने मित्रों और प्रेमियों की सेवा करनी है। इस प्रकार की मनोवृत्ति उत्पन्न हो जाने पर क्रोध की कोई गुंजाइश न रहेगी।
अपनी ओर से तो क्रोध पैदा न होने देने का प्रबन्ध मनुष्य उपर्युक्त विधि से चाहे कर ले किन्तु उस स्थिति में क्या होगा जब दूसरे हमारा अपमान करते हैं, या हमें हानि पहुँचाते हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, और हमारे आस-पास के जितने आदमी होते हैं वे प्रायः स्वार्थी ही होते हैं। जब एक की हानि होगी तभी दूसरे का लाभ होगा। ऐसी दशा में हानि पहुँचाने वाले के प्रति क्रोध कैसे न होने दिया जाय। इस सम्बन्ध में हमें उदारवृत्ति का अनुगमन करना चाहिए। जब संसार स्वार्थमय है और इसका प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से कुछ लेकर या छीन कर ही अपनी स्वार्थ लिप्सा पूरी करता है, तो उस पर क्रोधित होने का कोई कारण नहीं है। दुनिया के इस रवैये को समझ लेने के बाद क्रोध न आना चाहिए। अपना कर्त्तव्य यही है कि हम अपनी हानि को पूरी करें और उससे हमेशा बचते रहें।
लाभ-हानि के क्षेत्र के बाहर भी कुछ काम ऐसे होते हैं जिनसे दूसरे लोग हमें व्यर्थ में हानि पहुँचाते हैं या कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि अनजाने में दूसरों के द्वारा कुछ काम ऐसे हो जाते हैं जिसके कारण हमें क्रोध हो सकता है, जैसे कि आपकी पत्नी या पुत्र से असावधानी के कारण आपका गिलास या कलम टूट जाय। कभी-कभी कोई ऐसे नौकर मिल जाते हैं कि आप कहते हैं कि बाजार से आम ले आओ, वह ले आता है नींबू। इसी तरह मान लीजिये किसी ने आपके बच्चे को मार दिया, आपको क्रोध आ जाता है। इस प्रकार के छोटे-छोटे कारणों से क्रोध आता है। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए। महात्मा गाँधी ने बताया है कि जब क्रोध आये तो हमें उस समय कोई काम ही न करना चाहिए। क्रोध की दशा स्थायी नहीं होती। थोड़ी देर तक ही मनुष्य हिताहित ज्ञान शून्य हो सकता है, बाद में विचार शक्ति काम करने लगती है और मनुष्य का क्रोध कम हो जाता है। करीब-करीब इसी सिद्धान्त का अनुसरण अब्राहम लिंकन ने भी अनेक अवसरों पर किया था। एक बार उसकी सेना के एक बड़े उच्च पदाधिकारी ने उसके बताये गये युद्ध सम्बन्धी अनुशासन को नहीं माना, फलतः बड़ी हानि उठानी पड़ी। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध आया। उसने उस पदाधिकारी के नाम एक कड़ा पत्र लिखा, किन्तु लिखने में विचार शक्ति से काम लेना पड़ता है। परिणाम यह हुआ कि उसका क्रोध ठंडा हो गया और वह पत्र भेजा नहीं गया। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मानसिक आवेग में लिखना उसकी तीव्रता को कम कर देता है। इसी प्रकार हमारे देश में प्रचलित एक किंवदंती भी है जिसमें बताया गया है कि क्रोध की दवा क्या है? एक मनुष्य को बहुत क्रोध आता था, एक वैध से उसने इसकी दवा पूछी। वैद्य ने खाली पानी एक बोतल में भर कर उसे दे दिया और कहा कि जब क्रोध आये तो यह दवा मुँह में भर लो और भरे रहो, थोड़ी देर में तुम्हारा क्रोध कम हो जायेगा। तात्पर्य यह कि जब क्रोध आ जाय तो अपने को रोक कर किसी काम में लग जाने पर क्रोध कम हो जाता है।
मनुष्य जो कुछ दूसरों का अपराध कर बैठते हैं, वह उनके स्वभाव की निर्बलता है, यह सोचने और इस पर ध्यान देने से क्रोध बिल्कुल आता ही नहीं। अगर मनुष्य यह समझ ले कि अपराधी अज्ञान में अपराध करता है, तो क्रोध आये ही नहीं। महान् पुरुषों ने इसी तत्व को हृदयंगम करके ही क्रोध पर विजय प्राप्त की है। ईसा मसीह को जिन लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ाया, उन पर क्रोध करने की अपेक्षा, उनकी अज्ञानता के प्रति उन्हें दया थी। कृष्ण को जब बहेलिए ने अज्ञान वश बाण से बेध दिया तो अपने हत्यारे को देख कर वे केवल मुस्कराये थे और बोले कि इसमें तुम्हारा क्या दोष, यह तो होनहार ही था। संसार प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन ने जीवन भर किसी विषय पर बड़े परिश्रम से खोज की थी। उन गवेषणाओं पर टीका-टिप्पणी करके उसने तमाम कागजात एक मेज पर रखे थे। एक दिन वह अपनी अध्ययनशाला में बैठे पढ़ रहे थे कि उसका कुत्ता डायमंड एकदम उचका और जलते हुए लैम्प को गिरा दिया। पलभर में सारे मूल्यवान कागज जलकर भस्म हो गये। जीवन भर का परिश्रम कुत्ते ने नष्ट कर दिया पर न्यूटन शान्त रहे। क्रोध पर उसकी विजय बेमिसाल विजय थी, उसका हृदय भारी था, उसने कुत्ते के सर पर हाथ फेरते हुए उसने कहा- “डायमंड, डायमंड, तुम क्या जानो, तुमने क्या कर डाला।” उसकी जगह पर शायद कोई दूसरा होता तो क्रोध में अंधा होकर कुत्ते को गोली ही मार देता। इन महान व्यक्तियों ने क्रोध पर इसीलिए विजय पाई थी कि वे अपराधी का अपराध को कारण न मानकर, उसकी अज्ञानता को कारण मानते थे। गाँधी जी कहा करते थे- “अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं।”
‘क्रोध’ की उत्पत्ति संकीर्ण हृदय में होती है। जिसके विचार इतने संकुचित हैं कि वह अपने दृष्टिकोण को छोड़ कर दूसरों के विचारों के प्रति आदर नहीं रखता, वह पग-पग पर क्रोध करता चलता है। इसी तरह रूढ़िवादिता भी क्रोध की जड़ है। किसी धर्म के प्रति किसी रीति या परम्परा के प्रति आस्था रखना बुरी बात नहीं है, पर किसी अपने से भिन्न विचारों के प्रति, घृणा करना बुरी बात है। बहुत से वृद्ध, नौजवानों से इसीलिए क्रोधित हो जाते हैं कि नये ढंग से कपड़े पहनते हैं, पुराने रीति-रिवाजों को नहीं मानते। यह ठीक है कि बहुत सी बातें आधुनिक जीवन प्रणाली में बुरी भी हैं, पर हमें यह न भूल जाना चाहिए कि समय बदला करता है, जिस संस्कृति के आप पक्षपाती हैं, किसी समय में वह भी इसी तरह नयी रही होगी। मनुष्य को हमेशा प्रगतिशील होना चाहिए। परिवर्तनों और नवीन व्यवस्थाओं से घृणा या क्रोध करके कोई लाभ नहीं होता है। समय बदलता ही है, इस पर ध्यान रखने से क्रोध नहीं आ सकता।
क्रोध पर विजय प्राप्त करने का सबसे उत्तम उपाय है, अपने में न्याय की प्रवृत्ति का पैदा कर लेना। मनुष्य के अनेक कार्य उनमें से किसी की हानि या अपकार या अपराध कर डालने वाले काम उसके खुद के द्वारा नहीं होते। कभी-2 परिस्थितियाँ ऐसी आ जाती हैं कि मनुष्य ऐसे काम करने को मजबूर हो जाता है। ऐसे कामों में आत्म-हत्या, चोरी, व्यभिचार, डाका और कत्ल जैसे जघन्य अपराध भी शामिल हैं। यद्यपि यह ठीक है कि कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो जान बूझ कर ऐसे अपराध करते हैं परन्तु उनकी संख्या अधिक नहीं है। अधिकतर मनुष्य ऐसे गुरु अपराध भावावेश या परिस्थितियों के कारण कर डालते हैं। अब मनोवैज्ञानिक खोजों के आधार पर यह बात सिद्ध भी हो गई है। इसलिए जेलखानों में अपराधियों की मानसिक स्थिति को समझना और उनका सुधार करना राज्य का एक कर्त्तव्य बन गया है। इसी सत्य का पालन हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कर सकते हैं यदि किसी मित्र, सम्बन्धी या पास पड़ोसी ने अपमान या अपकार भी कर डाला हो, तो हमें उसके प्रति न्याय करना चाहिए और वह न्याय कैसे हो? यदि हम अपने को अपराधी की परिस्थितियों में रख दें और सोचें कि उन अमुक परिस्थितियों में हम क्या करते? तो यह समझ में आ जायगा कि हमारा भी काम शायद वैसा ही होता जैसा कि अपराधी कर चुका है। बस यह विचार आते ही अपराधी के प्रति क्रोध न आकर इसमें सहानुभूति पैदा हो जाती है और क्षमा भाव जाग्रत हो उठता है।
(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’, बेतिया)
‘तुम उदास क्यों हो? इसलिए कि तुम गरीब हो। तुम्हारे पास रुपया नहीं है।
इसलिए कि तुम्हारी ख्वाहिशें दिल ही दिल में घुटकर रह जाती हैं।
इसलिए कि दिली हसरतों को पूरा करने के लिए तुम्हारे पास दौलत नहीं है।
मगर क्या तुम नहीं देखते कि गुलाब का फूल कैसा मुस्करा रहा है।
हालाँकि उसके पास भी धन नहीं है। वह भी तुम्हारी तरह गरीब है। क्या तुम नहीं देखते कि बाग में बुलबुल कैसी चहचहा रही है। हालाँकि उसके पास भी तुम्हारी तरह एक कौड़ी भी नहीं है।
तुम क्यों रोते हो?
इसलिए कि तुम दुनिया में अकेले हो, मगर क्या तुम नहीं देखते कि घास का सर सब्ज तिनका मैदान में अकेला खड़ा है लेकिन वह कभी सर्द आहें नहीं भरता-किसी से शिकायत नहीं करता, बल्कि जिस उद्देश्य को पूरा करने के लिए परमात्मा ने उसे पैदा किया है। वह उसी को पूरा करने में लगा है।
क्या तुम इसलिए रोते हो कि तुम्हारा अजीज बेटा या प्यारी बीबी तुमसे जुदा हो गयी? मगर क्या तुमने इस बात पर भी कभी गौर किया है कि तुम्हारी जिन्दगी का सुतहला हिस्सा वह था जब कि तुम ‘बच्चे’ थे। न तुम्हारे कोई चाँद सा बेटा था और न अप्सराओं को मात करने वाली कोई बीबी ही थी, उस वक्त तुम स्वयं बादशाह थे।
क्या तुमने नहीं पढ़ा कि बुद्ध देव के जब पुत्र हुआ, तो उन्होंने एक ठंडी साँस ली और कहा- ‘आज एक बंधन और बढ़ गया।’ वे उसी रात अपनी बीबी और बच्चे को छोड़कर जंगल की ओर चल दिये।
याद रखो जिस चीज के आने पर खुशी होती है, उस चीज के जाने पर तुम्हें जरूर रंज होगा। अगर तुम अपनी ऐसी जिन्दगी बना लो कि न तुमको किसी के आने पर खुशी हो, तो तुमको किसी के जाने पर रंज भी न होगा। यही खुशी हासिल करने की कुँजी है। विद्वानों का कथन है-
जो मनुष्य अपने आपको सब में और सबको अपने आप में देखता है, उसको न आने की खुशी, न जाने का रंज होता है।
अगर तुम घास के तिनके की तरह केवल अपना कर्त्तव्य पूरा करते रहो- माने तूफान में हवा के साथ मिलकर झोंके खाओ, माने वक्त मुसीबत भी खुशी से झूमते रहो।
बरसात के वक्त अपने बाजू फैलाकर आसमान को दुआएं दो।
गरीब घसियारे के लिए अपने नाजुक बदन को कलम कराने के लिए तैयार रहो।
बेजुबान जानवरों को- भूख से तड़पते हुए गरीब पशुओं को अपनी जात से खाना पहुँचाओ तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि तुम्हें कभी रंज न होगा कभी तकलीफ न होगी। सुबह उठने पर शबनम (ओंस) तुम्हारा मुँह धुलायेगी। जमीन तुम्हारे लिए खाने का प्रबन्ध कर देगी। तुम हमेशा हरे-भरे रहोगे। जमाना तुम्हें देखकर खुश होगा, बल्कि तुम्हारे न रहने पर या मुरझा जाने पर दुनिया तुम्हारे लिए मातम करेगी।
वह बेवकूफ है। जो दुनिया और दुनिया की चीजों के लिए रोता है हालाँकि वह जानता है कि इन दोनों में से न मैं किसी चीज को अपने साथ लाया था और न किसी चीज को अपने साथ ले जाऊँगा।
(श्री लक्ष्मीनारायण जी टंडन ‘प्रेमी’, संपादक “खत्री-हितैषी”)
आपने स्टेशनों पर इंजनों के काम में आ चुके जले कोयले की राख को नीचे गिराते देखा होगा क्योंकि उस राख और फुजले से अब कोई काम इंजन का नहीं निकल सकता। हाँ यदि वह व्यर्थ पदार्थ इंजन में एकत्रित होता जाय तो एक समय के पश्चात् वह इंजन को समुचित ढंग से अपना कार्य करने में बाधक अवश्य सिद्ध होगा। बिल्कुल यही बात मनुष्य और भोजन के सम्बन्ध में लागू होती है। मानव-शरीर को जीवित तथा ठीक रखने के लिए हमें भोजन की आवश्यकता होती है। पेट में भोजन पहुँचने के बाद, उसका आवश्यक अंश आँतों की नसें सोख लेती हैं। जब वह भोजन पदार्थ निस्सार हो जाते हैं और शरीर के किसी काम के नहीं रह जाते तो गुदा द्वार से वह मल के रूप में बाहर निकल जाते हैं।
यदि नियमित रूप से-ठीक प्रकार से यह कार्य होता रहता है तो मनुष्य स्वस्थ रहता है। किन्तु निन्यानवे प्रतिशत ऐसा नहीं होता। बद्धकोष्ठता की बीमारी से आज सभ्य जगत पीड़ित है। भोजन का फुजला या पैखाना अब पूरा-पूरा नहीं निकलता अर्थात् हमें पैखाना साफ नहीं होता, तो जो फुजले का अंश बड़ी आँतों में भोजन करने के अठारह घंटे बाद रह जाता है, उसका विषैला रस बड़ी आँतों की नसें सोख कर हमारे शरीर के रक्त को विषैला कर देती हैं और यह बद्ध कोष्ठता ही प्रायः हमारे सब रोगों का कारण होती है। यह निर्विवाद सत्य है कि सब रोगों का एक ही कारण है-और वह है पेट। जिसके माने हैं कि किये हुए भोजन का समुचित रीति से न पचना और फुजले का बड़ी आँतों में अठारह घंटे से अधिक ठहरना।
अस्तु, यदि किसी प्रकार हम अपनी बड़ी आँतों को निरंतर फुजले से रहित करते रहें, उसकी सफाई करते रहें, तो न सड़ने वाली चीज रहेगी और न रोग होगा। तथा यदि हम रोगी हैं भी विशेष कर कोष्ठ बद्धता या उसके परिणाम स्वरूप अन्य रोगों के तो अपनी बड़ी आँतों की सफाई करके बहुत अंशों में रोग मुक्त हो जायेंगे। अतः बड़ी आँतों की सफाई अत्यधिक आवश्यक हुई।
यह सफाई हम अनेक प्रकार की दवाएं खा कर कर सकते हैं जैसे जुलाब लेकर, रेंड़ी का तेल पीकर आदि। ऊषापान नियमित पता साथ-2 चलने की कसरत करके, पेट की कसरतें तथा भौतिक क्रियाओं के द्वारा भी हम पेट और आँतों से बहुत कुछ उनका कर्त्तव्य करा सकते हैं। फल तथा हरी शाक भाजी को अधिक मात्रा में प्रयोग करके, नियमित आहार-विहार करके भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है। परन्तु इन सबको करने पर भी कभी-कभी पूर्ण सफाई बड़ी आँतों की नहीं हो पाती। अतः आँतों की सफाई के लिए हमें एनीमा का प्रयोग करना चाहिए।
मलाशय या बड़ी आँतें शरीर का वह अंग हैं जहाँ आमाशय और आँतों से होता हुआ भोजन आता है। यह लगभग पाँच फीट लम्बी मोटी नली है। यह पेट में दाहिनी ओर से नीचे से ऊपर उठती है और ऊपर ही बाँयी ओर ऊपर जाती है। फिर यह बाँयी ही ओर नीचे उतरती है। यहाँ यह थोड़ा सा मोड़ खाती है और अपेक्षाकृत पतली हो जाती है और गुदा-द्वार पर इसकी समाप्ति होती है।
एनीमा की उपयोगिता समझने के लिए बहुत संक्षेप में हमें इस मलाशय के विषय में समझना होगा। दाहिनी ओर, नीचे की तरफ, छोटी आँतों द्वारा पचे भोजन की लुबदी एक किवाड़ पर खिड़की से फेंक देती है। दोनों आँतों के बीच में इस दरवाजे की स्थिति ऐसी है कि मल या लुबदी इस दरवाजे के द्वारा छोटी आँतों से बड़ी आँतों में तो आ सकती है, पर बड़ी आँतों से मल छोटी आँत में नहीं चढ़ सकता।
आपने जानवरों को पैखाना फिरते देखा होगा। कितनी जल्दी उसका सारा का सारा पैखाना बाहर निकल जाता है। नैसर्गिक अवस्था में मनुष्य के सम्बन्ध में भी ऐसा ही होना चाहिये। किन्तु अस्वाभाविक खान-पान, पानी कम पीने के कारण तथा अप्राकृतिक ढंग से जीवन बिताने के कारण मल कड़ा पड़ जाता है और वह आँतों में चिपट जाता है। साधारण आदमियों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि जिन मनुष्यों को हम पूर्ण स्वस्थ और बलवान समझते हैं वह भी अपनी आँतों में पाँच से दस पौंड तक ऐसा मल सदा चिपटाये फिरते हैं। जिन लोगों ने लगातार कुछ दिनों तक नियमित रूप से एनिमा लिया है वह जानते हैं कि इतनी अधिक नित्य वह बलगम सी लसदार चीज को पैखाने के साथ निकलते देखकर उन्हें आश्चर्य में पड़ना पड़ता है। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि पुराने चिपटे हुए मल से मलाशय भर जाता है या आँशिक भर जाता है। मलाशय की दीवारें इस गंदे विषैले पदार्थ के रस को चूसा करती हैं और शरीर को विषैला और रोगों का घर बनाती रहती है। आप ही सोचिये यदि एनीमा लेकर न हम केवल नित्य का बचा फुजला निकाल सकें, वरन् पहले का भी संचित कड़ा और चिपका मल भी हम ढीला करके निकाल सकें, तो हम रोगों की जड़ को ही काटे देते हैं।
पर जुलाबों द्वारा यह कड़ा तथा चिपटा मल नहीं निकल पाता। यह तो केवल एनीमा द्वारा ही संभव है और वह भी एक दो दिन एनीमा लेने पर नहीं, कुछ दिनों लगातार एनीमा लेने पर। पेट का दर्द जो मलावरोध के कारण हो, बच्चों के चुन्ने पड़ जाना, बवासीर आदि अनेक रोगों में तो एनीमा तुरन्त लाभ दिखाता है। हाथ कंगन को आरसी क्या। एनीमा की उपयोगिता की परीक्षा जो चाहे कर सकता है। अतः बदहजमी, पित्त की अधिकता, गुर्दे तथा यकृत रोग आदि जो बद्धकोष्ठता के ही फलस्वरूप होते है, एनीमा द्वारा दूर किये जा सकते हैं, यदि समझदारी और धीरज से काम लिया जाय। हम याद रखें कि छूत तथा कीटाणुओं द्वारा फैलने वाले रोगों के अनुकूल मलाशय वाला शरीर धारी अपने को बना लेती है। रोग के कीड़ों को अनुकूल भूमि ही न मिले तो कीटाणु असर ही क्या करेंगे। अस्तु एनीमा की उपयोगिता अब स्वतः सिद्ध है। एनीमा द्वारा हम प्रकृति की ओर फिर लौटते हैं।
एनीमा के आविष्कार की कथा बड़ी रोचक है। कहते हैं एक बार एक चिड़िया अत्यन्त थकी माँदी तथा अस्वस्थ सी कहीं से आकर नदी-तट पर बैठी। उसने अपनी चोंच में पानी भरा और चोंच गुदा द्वार में डालकर कई बार पानी भरा। इस प्रकार उसने अपनी आँत साफ कर ली और स्वस्थ और ताजी होकर उड़ गयी। इसी सिद्धान्त को लेकर एनीमा का आविष्कार हुआ। चार-पाँच रुपये में एनीमा सैट किसी दवा खाने की दुकान से खरीदा जा सकता है। एक पानी भरने का बर्तन, एक रबड़ की नली और लकड़ी का टोंटीदार वेंट-यह है सीधी-साधी एनीमा की पिचकारी। एक रबड़ की नली के बीच में रबड़ का बुल्ला होता है और सिर में लकड़ी का टोंटी पर बंटे होता है-यह भी एनीमा की पिचकारी होती है।
जैसी सीधी-साधी यह पिचकारी होती है उतना ही सरल इसका प्रयोग है। दीवार पर दो-तीन फीट की ऊंचाई पर एनीमा पात्र टाँग दीजिये। आप जमीन पर लेट जाइए। लकड़ी की टोंटी खोलकर कुछ पानी निकाल दीजिए ताकि हवा पानी के साथ आँतों में न चली जाय और दर्द हो। फिर टोंटी में चिकनाई लगा कर गुदा द्वार के थोड़ा अंदर कर दीजिये। टोंटी खोल दीजिये और पानी को आँतों में चढ़ने दीजिए। जब सब पानी ऊपर चढ़ जाय तो टोंटी निकाल लें। आप पेट को हाथ से मलते जायं और कभी इस करवट और कभी उस करवट लेटें। 5 मिनट से लेकर आध घन्टे तक जितनी देर हो सके आप पानी रोकें। पानी जोर मारेगा बाहर निकलने को, पर अभ्यास के बाद आप सुविधापूर्वक उसे रोक सकेंगे और अधिक देर तक। पानी आध सेर से आरंभ करें। 2-3 सेर तक पानी चढ़ाया जा सकता है अवस्था तथा परिस्थिति का विचार करते हुए। पानी में सोडा या नमक भी चाहें तो मिला सकते हैं। यदि नींबू का रस जल में मिला लें तो अति उत्तम। पानी ऋतु के अनुसार कुछ गर्म-ठंडा भी कर सकते हैं किन्तु जितनी खून की गर्मी आपकी होती है या जितना जाड़ो में कुएँ का ताजा भरा पानी गरम होता है, उतना गर्म रहे तो अच्छा। यों दर्द आदि में कुछ अधिक गर्म जल का प्रयोग किया जाय। नित्य-प्रति आँतों में बल देने के लिए कुछ दिनों ठंडे जल और आध सेर पानी का नित्य एनीमा लेना अच्छा होगा। इन बातों के लिए कोई निर्धारित नियम नहीं बताया जा सकता। प्रत्येक परिस्थिति तथा दशा के अनुसार एनीमा के जल की मात्रा, जल की गर्मी और जल में मेल का विचार किया जा सकता है। पानी आँतों में रुक कर कड़े चिपके मल को ढीला करेगा। फिर आप पैखाने जायं। पानी पहली बार तो तेजी से निकल जायगा। फिर रुक-रुक कर दो तीन बार में धीरे-धीरे निकलेगा। 10-15 मिनट आप शौच गृह में रुकें पर जोर मत लगावें अन्यथा पानी बजाय नीचे आने के ऊपर चढ़ जायगा। स्वाभाविक रीति से उसे निकलने दें।
इस सम्बन्ध में दो तीन बातें बता देना आवश्यक है। छः-छः महीने तक लगातार लोगों ने एनीमा लिया है और बाद में छोड़ दिया है। अतः एनीमा लेने से एनीमा की आदत नहीं पड़ेगी। अतः यह डरना व्यर्थ है कि बिना एनीमा के हमें पैखाना ही न होगा। जो ठंडे तथा आध सेर जल से एनीमा लेते हैं उनको एनीमा की आदत कभी नहीं पड़ती। (ठंडे के माने बर्फ सा ठंडा पानी नहीं वह तो नुकसान करेगा) दूसरी बात यह है कि एनीमा किसी प्रकार से नुकसान कर ही नहीं सकता। जैसे दाँतों और मुँह की नित्य सफाई कभी हानि नहीं पहुँचा सकती वैसे ही आँतों की सफाई भला क्यों नुकसान पहुँचाने लगी? ऐसे योगी हैं जो योगिक-क्रियाओं द्वारा, गुदा-द्वार से पानी खींच लेते हैं और इस प्रकार अपने शरीर को मल रहित रखते हैं। हम सदा के लिए एनीमा-आदत डालने के विरोधी हैं।
साधारणतया एनीमा इस क्रम से लिया जाय तो अच्छा होगा। पहले दिन आध सेर गुनगुने पानी का एनीमा लें। दूसरी दिन का नागा कर दें और तीसरे दिन डेढ़ सेर का। फिर दो दिन का नागा करके दो सेर जल का एनीमा लें। दो सेर पानी तक आप मत डरिये। लोग तो 3-4 सेर तक का लेते हैं। महीने में एक बार दो बार यदि आँतों की सफाई हो जाया करे तो अच्छा हो।
पाठक पूछ सकते हैं कि एनीमा लेना तो अस्वाभाविक हुआ ठीक है, पर पेट में बरसों का पुराना मल एकत्रित रखना तो अत्यधिक अस्वाभाविक है और थोड़ा और कुछ दिनों एक अस्वाभाविक कार्य करके यदि हम बहुत बड़ी और स्थायी अस्वाभाविकता को दूर कर दें, तो क्या बुरा है? हाँ, प्रतिदिन 2-2 सेर जल पीना भी आप न भूलें चाहे प्यास लगे या न लगे। वैसे ही बंधे समय पर दो बार पैखाने जाना आप न भूलें, चाहे मालूम हो या न मालूम हो, अभ्यास में बड़ी शक्ति होती है।
अब एनीमा सम्बन्धी हम कुछ नियमों को लिखकर लेख समाप्त करते हैं। हमें समझना चाहिये कि एनीमा कब लें, कब न लें और कैसे लें। (1) अच्छा हो एनीमा स्वाभाविक पैखाना हो जाने के बाद लें (2) चौबीस घंटे में दो बार से अधिक न लें (3) फल और तरकारी आदि पर रहने पर नित्य एनीमा लें (4) उपवास काल में अवश्य एनीमा लें। यदि नित्य नहीं तो एक दिन छोड़ कर अवश्य लें। (5) सदा गर्म पानी का एनीमा न लें (6) एनीमा लेते समय जब पानी ऊपर चढ़ रहा हो तो जिस दिशा में घड़ी की सुइयाँ घूमती हैं, उसके विरुद्ध पेट मलें, और पानी चढ़ जाने के बाद जैसे घड़ी की सुइयाँ घूमती हैं उसी दिशा में पेट रगड़ें। याद रहे बड़ी आँतों को मल-त्याग का आदेश बड़े-कड़े शब्दों में दें (7) भोजन करने के कम से कम तीन घंटे तक एनीमा न लें (8) एनीमा लेने के 15 मिनट तक तो कुछ पियें भी नहीं। और एनीमा लेने के एक घंटे बाद तक भोजन या नाश्ता न करें (9) तुरन्त नहायें नहीं (10) तुरन्त धूप में न लेटें (11) एनीमा लेने के बाद तुरन्त कोई परिश्रम न करें वरन् 15 मिनट तक विश्राम करें (12) अत्यन्त क्षीण रोगी या जिस रोगी की प्राण-शक्ति कम हो गई हो, वह एनीमा न ले।
(श्रीयुत् रवीन्द्रनाथ ठाकुर)
मैं निश्चय रूप से कह सकता हूँ कि पाश्चात्य सभ्यता की उन्नति का अर्थ स्त्री के लिए अधिकाधिक कष्ट और विपत्ति है। स्त्री, समाज के व्यक्तियों को केन्द्र की ओर आकर्षित करती है, यह उसका व्यक्तिगत गुण है। परन्तु पश्चिम में स्त्री की यह शक्ति दिन पर दिन क्षीण होती जाती है। स्त्री की केन्द्र की ओर खिंचने वाली शक्ति पृथक करने वाली शक्ति के मुकाबले में असफल हो रही है। वहाँ जीवन-संग्राम बढ़ रहा है। पुरुष अधिक धनोपार्जन की लालसा में विदेश जा रहे हैं, अधिक सुख प्राप्ति के लिए वे विवाह के बन्धन में पड़ना नहीं चाहते। फलतः क्वारों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और स्त्री साम्राज्य नष्ट हो रहा है। कन्याओं को पति प्राप्त करने के लिए कई-कई वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यदि सौभाग्यवश उन्हें पति मिल भी जाता है तो भी उनकी समस्या हल नहीं होती। वह कमाने के लिए बाहर चला जाता है, पत्नी घर में बैठ कर ठण्डी साँसें छोड़ती है। पुत्र भी बड़ा होकर पृथक हो जाता है। स्त्री इस अकेलेपन से घबरा कर संघर्ष के संसार में उतर आती है यद्यपि उसका शरीर और मस्तिष्क दोनों इस योग्य नहीं हैं। पश्चिम में महिलाओं का घर से बाहर संघर्ष में सम्मिलित होना स्पष्ट प्रकट करता है कि वहाँ का सामाजिक गठन हो रहा है।
यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य सभ्यता में शक्ति जीवन की अनिवार्य वस्तु है। निःशक्त के लिए-चाहे वह स्त्री हो अथवा पुरुष-वहाँ कोई स्थान नहीं। चारों ओर से ‘काम करो’ की ध्वनि कर्ण गोचर होती है। जो काम नहीं करता उसे निकृष्ट समझा जाता है। पाश्चात्य महिला ने भी अनुभव किया कि यदि उसे समाज में आदरणीय जीवन व्यतीत करना है तो उसे भी यह सिद्ध करना होगा कि वह सशक्त है और पुरुष के समक्ष परिश्रम करने की क्षमता रखती है। यदि वह ऐसा नहीं करती तो उसे जीवन-संग्राम में आत्म-ग्लानि और अनादर के स्थान पर सन्तोष करना होगा।
यही स्थिति है जिसके वशीभूत हो पाश्चात्य महिला संकटावस्था में अपना दिन व्यतीत कर रही है। परन्तु इतने पर भी जब मैं देखता हूँ कि यूरोपीय महानुभाव भारतीय महिला की दुखावस्था पर आँसू बहाते हैं और उसकी सहायतार्थ अपनी सेवाएं समर्पित करने को तैयार होते हैं तो मुझे खेद होता है कि वे अपनी सहानुभूति व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं। भारतीय गृहिणी के सादे परन्तु सुन्दर आभूषणों ने तथा उसकी हंसमुख आकृति, निर्मल प्रेम और सरल स्वभाव ने घर को स्वर्गधाम बना रखा है। जब कभी उसे कोई कष्ट होता है तो उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं-परन्तु अत्याचारी पति और अयोग्य पुत्र कहाँ नहीं होते? क्या यूरोप इन से खाली है? हमने कभी शिकायत नहीं की कि हम अपनी स्त्रियों के साथ प्रसन्न नहीं और न हमारी स्त्रियों ने ही कभी यह शिकायत की कि हमें कष्ट है, फिर यह हजारों मील की दूरी पर बैठे हुए अपरिचित प्राणी क्यों हमारी स्त्रियों के दुख और कष्टों को स्मरण कर रुदन करते हैं।
मेरे विचार से इसका एक कारण है। वह यह कि लोग दूसरों के सुख-दुख का अनुमान लगाने में प्रायः भूल करते हैं। यदि सभ्यता की उन्नति मछली को मानव में परिणित कर दे तो निश्चय सब लोग अपने आपको जल-मग्न पायेंगे। पश्चिम की खुशी घर से बाहर है, हमारा सौख्य घर के अन्दर है। पश्चिम यह कैसे जान सकता है कि हम घर के आँगन में प्रसन्न हैं या नहीं? इसी प्रकार हम भी पश्चिम के लोगों के मनोभावों का अनुभव नहीं कर सकते। वह लोग खेल-कूद और विलास सामग्री को इतना चाहते हैं कि उसके सामने स्त्री बच्चों की तनिक भी परवाह नहीं करते। उनके लिए भोग विलास पहले और प्रेम बाद में है। इसके विपरीत प्रेम हमारे जीवन की सबसे महान आवश्यकता है। मुझे यह स्वीकार करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं कि हम भारतीय प्रेम के बिना जीवित नहीं रह सकते। मत्स्य पानी के अन्दर रहता है, किन्तु श्वास लेने के लिए उसे जल-धरातल पर आना पड़ता है, नहीं तो वह मर जायगा। इसी प्रकार यदि हमें जीवित रहना है तो हमें अपने घर के अन्दर जाना होगा।
प्रश्न होता है कि क्या भारतीय नारी कष्ट में है? मैंने जहाँ तक इस प्रश्न पर विचार किया है, मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि हमारे समाज के वर्तमान विधानानुसार भारतीय नारी पर्याप्त रूपेण प्रसन्न है। यह अन्य बात है कि हमारा देश हमारे लिए अनुकूल नहीं। पश्चिम का पुरुष क्या समझे कि नारी का वास्तविक सौख्य प्रेम में ही है?
यहाँ पश्चिम की वृद्ध कुमारियों और भारत की युवती विधवाओं की तुलना करना अनुचित न होगा। दोनों जातियों की संख्या के विचार से इनका अनुपात लगभग एक-सा ही है। परन्तु उनकी दशा समान नहीं। भारतीय विधवा का स्त्रीत्व कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसकी गोद कभी खाली नहीं रहती, उसके हाथ कभी निष्काम नहीं रहते, उसका हृदय कभी सूना नहीं रहता। वह अपने समधियों के बाल-बच्चों के लिए माँ बन जाती है और इस प्रकार उसके जीवन में मनोरंजन और आकर्षण प्रस्फुरित होता है। सम्मिलित परिवार के बच्चे उसकी आँखों के सामने पैदा होते हैं। वह अपने देवरों, अपने भाइयों से प्रेम करती है, उनके साथ खेलती है और समादर का जीवन व्यतीत करती है। अतः यह एक भ्रम है कि हमारी नारी अपनी पश्चिम की बहन से कम प्रसन्न है।
पश्चिम की नारी उमंगों के तूफान में रहती है। वह पुरुषों का मुकाबला करती है। बाजार में जाती है और अपने कुंआरेपन तथा यौवनकाल को कुत्ते पाल कर अथवा सिनेमा थियेटर देख कर व्यतीत करती है। मैं यह नहीं कहता कि हमारी सामाजिक स्थिति सुसम्पन्न है और हमारी स्त्रियाँ भय की दुनिया में जीवन-व्यतीत नहीं करतीं।
हमारी महिला को यद्यपि लिखना पढ़ना नहीं आता परन्तु वह एक उच्च कुल में रह कर व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण करती है। हाँ एक बात हमें माननी पड़ेगी, वह यह कि सम्मिलित परिवार प्रथा ने हमारी उन्नति को कुचल दिया है। आज कल हमारे परिवार इतने बढ़ गये हैं कि हमें उनसे बाहर की स्थितियों पर ध्यान देने का अवकाश ही नहीं, हमारा समाज एक सघन वन के समान है। इसमें हजारों छोटे-छोटे वृक्ष हैं। वे दूसरों को उन्नति करने का अवसर ही नहीं देते। सम्मिलित परिवार-प्रथा की कड़ियों में जकड़े रह कर हम एक जाति, एक राष्ट्र स्थापित करने में तथा विश्व विजयी शक्ति संगठित करने में असमर्थ रहे हैं। हमारे मध्य अच्छे माता-पिता और भाई जो उत्पन्न हुए हैं, उनके साथ ही हमने उच्च कोटि के त्यागियों को भी जन्म दिया है, परन्तु हम ऐसे व्यक्ति उत्पन्न नहीं कर सके जो संसार के लिए जिएं। हमारे लिए हमारा कुटुम्ब ही संसार है, यूरोप में घर का प्रेम कम है। हम कहते हैं कि एक अविवाहित व्यक्ति अर्द्ध पुरुष है, पाश्चात्य लोग कहते हैं कि जिस व्यक्ति के लिए कब्र नहीं वह अपूर्ण मनुष्य है। हमारा विचार है कि बिना बच्चों के घर सुनसान जंगल के समान है, उनका मत है कि विलास-सामग्री रहित घर, घर नहीं। जहाँ भौतिक ऐश्वर्य का समादर हो वहाँ यह समाज के लिए एक क्रूर स्वामी का काम देता है। धनाधीश गुणी-विद्वान को घृणा और सरल व्यक्ति को दया की दृष्टि से देखने लगता है। संपत्ति पहले-पहले योग्यता का बाह्य चिह्न प्रतीत होती है, किन्तु बाद को योग्यता का कुछ भी मान नहीं रहता जब तक कि उसके हाथ लक्ष्मी का आडम्बर न हो।
यदि मेरा अनुमान सत्य है तो यूरोपीय सभ्यता अपने लिए मृत्यु का विस्तृत क्षेत्र तैयार कर रही है। भौतिक ऐश्वर्य और विलास-सामग्री को एकत्रित करने से शनैः शनैः घर की प्रसन्नता विनष्ट हो रही है-उस घर की जो मनुष्य के प्रेम और शुभ भावनाओं का केन्द्र स्थान है, जो कि विशुद्ध हृदयता का अनन्त स्रोत है, जो मनुष्य के लिए एक ऐसी आवश्यक वस्तु है, जिसके मुकाबले में अन्य वस्तुएँ तुच्छ और नगण्य हैं।
पृथ्वी के उस भूभाग में जहाँ घर कम हो रहे हैं और होटल बढ़ रहे हैं, जहाँ एक व्यक्ति अपने आराम की चिंता में है और तदनुकूल सुख प्राप्त करने के लिए अपनी आराम-कुर्सी, अपना कुत्ता, अपना घर, अपनी बंदूक, अपना तम्बाकू और जुआ खेलने के लिए अपना क्लब रखता है, वहाँ हमें समझ लेना चाहिए-स्त्री की महत्ता कम हो रही है।
(श्री प्रभात सिंह इनामदार)
शहर के रास्ते पर पत्थर बिछे थे। एक गाड़ी वहाँ से निकली। एक पत्थर को उखाड़ती गई। पत्थर बोला, “अन्य पत्थरों के साथ मैं यहाँ क्यों पड़ा रहूँ? मैं तो स्वतंत्र जीवन बिताऊँगा।”
एक लड़का निकला। उसने पत्थर हाथ में लिया। पत्थर विचारने लगा, “सैर करने की मेरी इच्छा हुई कि यह प्रवास शुरू हुआ। देखो! यह मैं उड़ा। बहुत सरल बात है। जो मन से निश्चय किया, वही होता है।”
धड़ाम से पत्थर काँच की खिड़की से टकराया। काँच फूटा। फूटते-फूटते काँच चीख उठा, ‘अरे! जंगली! तू ने यह क्या किया? लेकिन पत्थर ने जवाब दिया, “मेरी राह में तू आया क्यों? जो मेरी राह में रोड़ा बन कर आता है, उस पर मुझे चिढ़ होती है। मेरी सहूलियत पहले-यही मेरा सिद्धाँत है।”
पत्थर मुलायम बिछौने पर जा गिरा। उसने विचार किया, “ठीक है, उड़ने से मैं थक गया हूँ। अब मैं घड़ी भर के लिए आराम करूंगा।”
नौकर आया। बिछौने से पत्थर उठाकर खिड़की के बाहर फेंक दिया। पत्थर रास्ते पर, अपनी असली जगह पर आ गिरा। पत्थर अपने दोस्तों से कहने लगा, “अच्छे तो हो न, मेरे दोस्तों! मैं अभी उस बड़े घर में मिलने गया था, पर धनवानों के साथ रहना मुझे अच्छा नहीं लगा। आम जनता के लिए मेरा दिल तरस रहा था, इसलिए मैं तुम्हारे पास वापस आया हूँ।”
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए)
ईर्ष्या वह आन्तरिक अग्नि है जो अन्दर ही अन्दर दूसरे की उन्नति या बढ़ती देखकर हमें भस्मीभूत किया करती है। दूसरे की भलाई या सुख देखकर मन में जो एक प्रकार की पीड़ा का प्रादुर्भाव होता है, उसे ईर्ष्या कहते हैं।
ईर्ष्या एक संकर मनोविकार है जिसकी संप्राप्ति आलस्य, अभिमान और नैराश्य के संयोग या जोड़ से होती है। अपने आपको दूसरे से ऊँचा मानने की भावना अर्थात् मनुष्य का ‘अहं’ इसके साथ संयुक्त होता है।
ईर्ष्या मनुष्य की हीनत्व भावना से संयुक्त है। अपनी हीनत्व भावना ग्रन्थि के कारण हम किसी उद्देश्य या फल के लिए पूरा प्रयत्न तो कर पाते, उसकी उत्तेजित इच्छा करते रहते हैं। हम सोचते हैं-”क्या कहें हमारे पास अमुक वस्तु या चीज होती? हाय! वह चीज उसके पास तो है, हमारे पास नहीं? वह वस्तु यदि हमारे पास नहीं है तो उसके पास भी न रहे।’
ईर्ष्या व्यक्तिगत होती है। इसमें मनुष्य दूसरे की बुराई अपकर्ष, पतन, बुराई, त्रुटि की भावनाएँ मन में लाता है। स्पर्धा ईर्ष्या की पहली मानसिक अवस्था है। स्पर्धा की अवस्था में किसी सुख, ऐश्वर्य, गुण, या मान से किसी व्यक्ति विशेष को संपन्न देख अपनी त्रुटि पर दुःख होता है, फिर प्राप्ति की एक प्रकार की उद्वेग पूर्ण इच्छा उत्पन्न होती है। स्पर्धा वह वेगपूर्ण इच्छा या उत्तेजना है, जो दूसरे से अपने आपको बढ़ाने में हमें प्रेरणा देती है। स्पर्धा बुरी भावना नहीं। यह वस्तुगत है। इसमें हमें अपनी कमजोरियों पर दुःख होता है। हम आगे बढ़कर अपनी निर्बलता को दूर करना चाहते हैं।
श्री रामचन्द्र शुक्र ने लिखा है- ‘स्पर्धा में दुःख का विषय होता है ‘मैंने उन्नति क्यों नहीं की? और ईर्ष्या में दुःख का विषय होता है- ‘उसने उन्नति क्यों की? स्पर्धा संसार में गुणी, प्रतिष्ठित और सुखी लोगों की संख्या में कुछ बढ़ती करना चाहती है, और ईर्ष्या कमी।
स्पर्धा व्यक्ति विशेष से होती है। ईर्ष्या उन्हीं-उन्हीं से होती है जिनके विषय में यह धारणा होती है। कि लोगों की दृष्टि हमारे हाथ उन पर अवश्य पड़ेगी या पड़ती होगी। ईर्ष्या के संचार के लिए पात्र के अतिरिक्त समान की भी आवश्यकता है। समाज में उच्च स्थिति, दूसरों के सन्मुख अपनी नाक ऊँची रखने के लिये ईर्ष्या का जन्म होता है। हमारे पास देखकर भी हम मनोविकार का संचार हो जाता है।
ईर्ष्या में क्रोध का भाव किसी न किसी प्रकार मिश्रित रहता है। ईर्ष्या के लिए भी कहा जाता है कि “अमुक व्यक्ति ईर्ष्या से जल रहा है।” साहित्य में ईर्ष्या को संचारी के रूप में समय-समय पर व्यक्त किया जाता है। पर क्रोध बिल्कुल जड़ क्रोध है। जिसके प्रति हम क्रोध करते हैं, उसके मानसिक उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते। असम्पन्न ईर्ष्या वाला केवल अपने को नीचा समझे जाने से बचने के लिए आकुल रहता है। धनी व्यक्ति दूसरे को नीचा देखना चाहता है।
ईर्ष्या दूसरे की असंपन्नता की इच्छा की आपूर्ति से उत्पन्न होती है। यह अभिमान को जन्म देगी, अहंकार की अभिवृद्धि करेगी, और कुढ़न का ताना-बाना बुनेगी। अहंकार से आदत होकर हम दूसरे की भलाई न देख सकेंगे। अभिमान में मनुष्य को अपनी कमजोरियाँ नहीं दीखतीं। अभिमान का कारण अपने विषय में बहुत ऊँची मान्यता धारण कर लेना है। ईर्ष्या उसी की सहगामिनी है।
ईर्ष्या द्वारा हम मन ही मन दूसरे की उन्नति देखकर मानसिक दुःख का अनुभव किया करते हैं। अमुक मनुष्य ऊँचा उठता जा रहा है। हम यों ही पड़े हैं, उन्नति नहीं कर पा रहे हैं। फिर वह भी क्यों इस प्रकार उन्नति करे। उसका कुछ बुरा होना चाहिए। उसे कोई दुःख, रोग, शोक, कठिनाई, अवश्य पड़नी चाहिए। उसकी बुराई हमें करनी चाहिये। यह करने से उसे अमुक प्रकार से चोट लगेगी। इस प्रकार की विचारधारा से ईर्ष्या निरन्तर मन को क्षति पहुँचाती है। शुभ विचार करते, सद्प्रवृत्तियों तथा प्राणशक्ति का क्रमिक ह्रास होने लगता है।
ईर्ष्या से उन्मत्त हो मनुष्य धर्म, नीति, तथा विवेक का मार्ग त्याग देता है। उन्मादावस्था ही उसकी साधारण अवस्था हो जाती है और दूसरे लोगों की उन्माद और साधारण अवस्था उसे अपवाद के सदृश्य प्रतीत होती है। मस्तिष्क के ईर्ष्या नामक विकार से नाना प्रकार की विकृत मानसिक अवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। भय, घबराहट, भ्रम ये सब मनुष्य की ईर्ष्या और विवेक बुद्धि के संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।
प्रत्येक क्रिया से प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती है। ईर्ष्या की क्रिया से मन में तथा बाह्य वातावरण में जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, वे विषैली हैं। आपकी अपवित्र भावनाएं इर्द-गिर्द के वातावरण को दूषित कर देती हैं। वातावरण विषैला होने से समाज का अपकार होता है। जो ईर्ष्या की भावनाएँ आपने दूसरों के विषय में निर्धारित की है, संभव है, दूसरे भी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसी ही धारणाएं आपके लिए मन में लायें।
जो लोग यह समझते हैं कि वे ईर्ष्या की कुत्सित भावना को मन में छिपा कर रख सकते हैं और मानते हैं कि दूसरों व्यक्ति उसे जान न सकेगा। वे बड़ी भूल करते हैं। प्रथम तो यह भावना छिप ही नहीं सकती, किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाती है। दूसरे दुराचार और छिपाने की भावना मनोविज्ञान की दृष्टि से अनेक मानसिक रोगों की जननी है। कितने ही लोगों में विक्षिप्त जैसे व्यवहारों का कारण ईर्ष्याजन्य मानसिक ग्रन्थि होती है। ईर्ष्या मन के भीतर ही भीतर अनेक प्रकार के अप्रिय कार्य करती रहती है। मनुष्य का जीवन केवल उन्हीं अनुभवों, विचार, मनोभावनाओं संकल्पों का परिणाम नहीं जो स्मृति के पटल पर है। प्रत्युत गुप्त मन में छिपे हुए अनेक संस्कार और अनुभव जो हमें खुले तौर पर स्मरण भी नहीं हैं, वे भी हमारे व्यक्तित्व को बनाते हैं। फ्राँस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वर्गसाँ ने मनुष्य के जीवन विकास का उपर्युक्त सिद्धान्त माना है। ईर्ष्या, क्रोध, काम, भाव, द्वेष, चिंता, भय, दुर्व्यवहार का प्रत्येक अनुभव अपना कुछ संस्कार हमारे अंतर्मन पर अवश्य छोड़ जाता है। ये संस्कार और अनुभव सदैव सक्रिय और पनपने वाले कीटाणु हैं। इन्हीं के ऊपर नवजीवन के निर्माण का कार्य चला करता है।
ईर्ष्या के विकार अंतर्मन में बैठ जाने पर आसानी से नहीं जाते। उससे स्वार्थ और अहंकार तीव्र होकर सुप्त और जागृत भावनाओं में संघर्ष और द्वन्द्व होने लगता है। निद्रा-नाश, घबराहट, प्रतिशोध लेने की भावना, हानि पहुँचाने के अवसर की प्रतीक्षा देखना, विमनस्कता इत्यादि मानसिक व्यथाएं ईर्ष्यापूर्ण मानसिक स्थिति की द्योतक है। यदि यह विकार बहुत तेज हुआ तो मन पर एक अव्यक्त चिंता हर समय बनी रहती है जल, अन्न, व्यायाम, विश्राम का ध्यान नहीं रहता, शयन समय घात प्रतिघात का संघर्ष और अव्यक्त की उद्भूत वासनाएं आकर विश्राम नहीं लेने देतीं। अतः मनुष्य की पाचनेन्द्रिय बिगड़ जाती है, रुधिर की गति में रुकावट होने लगती है, शारीरिक व्याधियाँ भी फूट पड़ती हैं। सम्पूर्ण शरीर में व्यवधान उपस्थित होने से मस्तिष्क का पोषण उचित रीति से नहीं हो पाता।
क्रोध को मन में स्थान देना अनेक मानसिक क्लेशों तथा रोगों को मोल लेना है। अतः इससे सदा सावधान रहना चाहिए।
(श्री पं. तुलसीराम शर्मा वृन्दावन)
हस्तावुपस्थमुदरंवाक्चतुर्थी चतुष्टयम्।
एतत्सुसंयतं यस्य स विप्रः कथ्यते बुधैः॥
(गरुड़ पु. प्रेतखंड अ. 10)
जिसके हाथ, उपस्थ (शिश्न ) उदर, तथा वाणी से सुसंयत (बुरे कर्मों से बचे) हैं विद्वान् उसको ब्राह्मण कहते हैं॥
हस्त आदि का सुसंयत होना क्या है सो आगे स्पष्ट करते हैं-
परवित्तंन गृहणति न हिंसाँ कुरुते तथा।
अक्षक्रीडारतो यस्तु हस्तौ तस्य सुसंयतौ॥
जो दूसरे के द्रव्य को अनुचित रीति से नहीं लेता, किसी जीव को सताता नहीं, जुआ नहीं खेलता तो समझना चाहिए कि इस पुरुष के हाथ सुसंयत हैं अर्थात् बुरे कर्मों से बचे हैं।
पर स्त्री वर्जनरतस्तस्योपस्थं सुसंयतम्।
अलोलुपमिदंभुँक्ते जठरं तस्य संयतम्॥
जो पुरुष परस्त्री का त्यागी है उसकी उपस्थ इन्द्रिय संयत है अर्थात् कब्जे में है। और जिस की भोजन में लोलुपता नहीं, उसका उदर सुसंयत (बुरे कर्मों से बचा) है।
सत्यंहितंश्रितं ब्रूते यस्माद् वाक् तस्य संयता।
यस्यसंयतान्येतानि तस्य किं तपसोऽध्वरैः॥
जो पुरुष सत्य, हित और मितभाषी है तो समझो कि उसकी वाणी संयत है। जिसके ये हस्त आदि सुसंयत (बुरे कर्मों से बचे) हैं उसको तपस्या और यज्ञ से क्या प्रयोजन है। इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि सदाचार से रहना ब्राह्मण का लक्षण है। और भी देखिये-
वृत्तस्थमपिचाँडालस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥
(पद्म पु. सृष्टि खण्ड 47।193)
सदाचारी चाँडाल को देवता ब्राह्मण कहते हैं। निवृत्तः पापकर्मेभ्यो ब्राह्मणः स विधीयते।
शूद्रोऽपिशीलसम्पन्नो ब्राह्मणादधिकोभवेत्॥
(भविष्य पु. अ. 44)
जो पाप कर्म से बचा हुआ है वही ब्राह्मण है। सदाचार सम्पन्न शूद्र भी ब्राह्मण से अधिक है। आचार हीन ब्राह्मण शूद्र से गया बीता है।
चतुर्वेदोऽपि दुवृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते।
योऽग्निहोत्रपरोदान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः॥
(म. भा. वन. 314।111)
चारों वेदों का जानकार यदि दुराचारी है तो शूद्र से भी गया बीता है जो अग्निहोत्री (काम क्रोधादि को हवन करने वाला) और इन्द्रिय निग्रही है वह ब्राह्मण है।
इस प्रकार के लक्षण वाले ब्राह्मण को लक्ष्य करके ही शास्त्रकार कहते हैं-
अहोतिदुर्भगा लोकाः प्रत्यक्षे केशवे द्विजे।
प्रतिमादिषु सेवन्ते तदभावेहि तत् क्रिया॥
तेषाँ पाणौ च यद्दत्तं हरिपाणौ तदर्पितम्।
(पद्म पु. आदि खंड 61)
आश्चर्य है कि दुर्भागी पुरुष प्रत्यक्ष ब्राह्मण केशव के होने पर प्रतिमा आदि का सेवन करते हैं योग्य ब्राह्मण के अभाव में प्रतिमा पूजन है॥ 51
उन ब्राह्मणों के हाथ में देना मानो भगवान के हाथ में देना है।
विप्राणाँ वपुरास्थाय सर्वाः तिष्ठन्ति देवताः।
अतः पूज्यास्तु ते विप्रा अलाभेप्रतिमादयः॥
(स्कं. पु. 7।1।106 64)
ब्राह्मणों के शरीर में देवता निवास करते हैं अतः ब्राह्मण पूजने योग्य हैं योग्य ब्राह्मण के अभाव में प्रतिमादि हैं। स्मरण रहे कि इसी प्रकार का वचन कूर्म पु. उत्तरार्ध (26। 36) पद्म पु. आदि खंड (57। 36) में आता है।
इन वचनों से सिद्ध है कि जहाँ कहीं शास्त्र में ब्राह्मणों की प्रशंसा के वचन हैं वे सदाचार संपन्न विद्वान ब्राह्मणों के विषय में है अनपढ़ के बारे में तो शास्त्रकार लिखते हैं कि-
अनधीयानमृत्विजम् (म. भा. उ. 23। 76)
बिना पढ़े पुरोहित को छोड़ देना चाहिए। विद्याहीनं गुरुं त्यजेत् (चाणक्य नीति)
विद्याहीन गुरु को त्याग देना चाहिए।
विवेक, सदाचार, स्वाध्याय और परमार्थ ब्राह्मणत्व की कसौटी है। जो इस कसौटी पर खरा उतरता है वही सच्चा ब्राह्मण है।
(श्री सुरेशचन्द्र वेदालंकर, हाटा)
वेदों में मानसिक चिकित्सा का वर्णन बड़े विशद एवं स्पष्ट रूप में पाया जाता है। यह मानसिक चिकित्सा या वह आदेश जिसके उच्चारण मात्र से रोगी व्यक्ति या पात्र पर प्रभाव पड़ जावे मंत्र-विद्या है। इस प्रकार सहसा, प्रभावकारी अनुष्ठान या प्रयोग को साधारण ग्रामीण लोग मंत्र विद्या कहते हैं। वेदों में इसके पाँच अंग पाए जाते हैं। 1- संकल्प या आवेश 2- अभिमर्श या मार्जन, 3- आदेश, 4- मणिबंधन (जिसे आजकल लोग गंडा ताबीज आदि के रूप में चला रहे हैं।) और 5- कृत्या और अभिचार है। जिसे ओज भ्रान्ति से लोगों ने टोना टोटका का रूप दिया हुआ है।
इन पाँच बातों का उद्देश्य शारीरिक रोगों को हटाना तथा कथित भूतादि बाधाओं को दूर करना, दारिद्रय, निराशा, ईर्ष्या आदि का शमन करना, दुष्ट स्वप्न के प्रभाव को मिटाना वीरता आदि गुणों का आवेश करना है। आज हम आपको सबसे पूर्व संकल्प या आवेश पर कुछ बताएंगे।
प्रबल तथा साधिकार इच्छा का नाम ‘संकल्प’ है और इसका बार-बार आवर्तन आवेश कहलाता है। यही दो वस्तुओं मनोविज्ञान का सर्वप्रथम आधार क्षेत्र हैं। संकल्प के बिना मानसिक प्रगति संभव नहीं और बिना मन की प्रगति के न तो मनुष्य अपनी ही उन्नति कर सकता है और न दूसरों की ही। यह संकल्प ही मनुष्य के आँतरिक जीवन को मूर्ति एवं बाह्य जीवन की पूर्ति है।
हम जब कोई भी काम करने को प्रस्तुत होते हैं तो सबसे पूर्व हमारे मन में संकल्प उत्पन्न होता है, वह संकल्प जब बारबार उत्पन्न होता है तो हम अपने संकल्प को क्रिया रूप में प्रेणित करने को हो जाते है। इसलिए वेद के अन्दर इस संकल्प को मन का सार और मनोविकार का कारण एवं आधार माना गया है। एक मंत्र आया है- कामस्तदग्रे समवर्तत मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। स काम कामेन वृहता स योनी रायस्पोषं यजमानाय धेहि।
(कामः अग्रे समवर्तत-) किसी मनुष्य के मन में संकल्प ही सर्व प्रथम उठता है (तत् यत्) वह जो कि (मनसः प्रथम रेतः आसीत्) मन का प्रथम सार है। (स काम) वह तू संकल्प। (वृहता कामेन) पुनः उठे हुए संकल्प के साथ (सयोनी) से मानस्थानी (यजमानाय) शरीर यज्ञ के याजक आत्मा या जीव के लिए (रायस्पोषं) ऐश्वर्य पुष्टि को (धेहि) धारण करो।
इस मंत्र का भाव यह है कि संकल्प ही मन का सार हेत और मनोविकास का कारण है। जब हम कोई भी काम करना चाहते हैं तो हमारे मन के अन्दर संकल्प समुद्भूत होता है और हम उस संकल्प से प्रभावित होकर कार्य करते हैं। यही संकल्प जब विद्युत की भाँति अभीष्ट की ओर बारबार अपनी तरंगें फेंक रहा होता है तब यह आवेश कहलाता है और तब मनुष्य अपने कार्य में सचेष्ट हो जाता है।
इस संकल्प द्वारा हम शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों तरह के पापों एवं दुखों को दूर कर सकते हैं। मानसिक पाप को दूर भगाने का स्पष्ट उल्लेख निम्न वेद मन्त्र में आया है-
परोपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि, परेहि न त्वा कामए वृक्षाँ घनानि संचर गृहेषु गोषु में मनः।
(मनस्पाप) ओ मन के पाप। तू (परः अपेहि) दूर हट (किम-) क्योंकि तुझे तो (अशस्तानि शंससि) निन्दित बातें ही अच्छी लगती हैं (परेहि) दूर हट जा, (न त्वाँ कामये) मैं तुझे देखना तक नहीं चाहता। तू मेरे आस-पास भी कहीं न रह (वृक्षान् वनानि संचार) तू दूर जंगल में वृक्षों एवं वनों को प्राप्त हो मैं मेरा मन (गृहेषु) स्त्री पुत्रादि में (गोषु) पशुओं में लगा रहे।
इस मंत्र में पाप को दूर करने के लिए दो उपाय बताए हैं। इन दोनों उपायों को वेद में बोध और प्रतिरोध नाम से कहा गया है। बोध का मतलब अभी भाव में लगा रहना अर्थात् जिस अच्छे कार्य को हम करना चाहते हैं, जिस सुखद वस्तु को हम पाना चाहते हैं उस ओर मन का लगाए रखना है। अपने मन में शैतानियत विचारों को न आने देने के लिए यह आवश्यक है कि मन को हर समय किसी काम में प्रवृत्त रखा जाय। खाली मन तो शैतान का घर होता है। श्री स्वामी श्रद्धानन्दजी कहा करते थे कि मनुष्य को हर समय कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। यदि उसके पास कोई काम न हो तो निठल्ला बैठे रहने से यह कहीं अच्छा है कि वह अपनी धोती को फाड़े और फिर सीए। यह मन की बोध शक्ति है।
प्रेतिबोध अनभीष्ट को हटाता रहता है, उसे अभीष्ट से मिलने नहीं देता। जहाँ बोध के द्वारा अभीष्ट गुणों को मनुष्य अपने में प्रकाशित करता है वहाँ प्रतिबोध द्वारा मनुष्य अपने अंदर से पाप निर्बलता और त्रुटि दूर कर कसता है तथा सद्गुण, बल, आशा और उत्साह का अपने में आवेश कर सकता है।
इस मन्त्र में भी पाप को दूर करने को उन्हीं दो उपायों को प्रयोग किया गया है। एक तो अनभीष्ट पाप की प्रवृत्ति को दूर करने के लिए, उसके प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए उसे एकान्त देश, जंगल या वन में जाकर रहने को कहा गया है और दूसरी ओर मन को किसी काम में प्रवृत्त करने के विचार से घर के स्त्री पुत्रों बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्य का विचार करके उसे किसी काम में लगाए रखने का निर्देश है। इस प्रकार इन दोनों उपायों द्वारा मनुष्य में जब यह भावना आ जाती है कि मैं इस दोष को दूर करके रहूँगा, इसे दूर करना मेरे लिए कोई कठिन नहीं मैं तो इसे हटा ही दूँगा तब वह अपने इस कार्य में सफल हो जाता है और इस संकल्प की अपने में अधिक वृद्धि होने पर वह न केवल अपने अपितु दूसरों के दोष भी दूर कर सकता है।
वेद का एक और मंत्र है जिसमें बड़े जोरदार शब्दों में आशा उत्साह और सफलता की प्राप्ति के लिए संकल्प किया गया है। मंत्र है-
कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः
गौजिद भूयासम्श्वजिद धनंजयो हिरण्यजिद।
इस मंत्र का भाव है कि कर्म करना तो मेरा दांये हाथ का खेल है और विजय तो मेरे बांये हाथ में रखी हुई हैं। मैं गौओं इन्द्रियों, भूमि, राष्ट्र, धन, आयु संपत्ति तथा यश का विजेता होऊँगा- इससे मुझे कोई नहीं रोक सकता।
जब हम, किसी काम को इतने दृढ़ निश्चय उत्साह एवं आशा से करेंगे तो असफलता हमें हो ही नहीं सकती।
इस प्रकार तेज, बल, वीर्य, ओज, मन और सहनशीलता की प्राप्ति के लिए भी संकल्प की आवश्यकता है, बिना संकल्प के ये वस्तुएं नहीं प्राप्त हो सकती। मन्त्र है-
तेजोसि तेजो मयि धेहि, वीर्यमसि वीर्यमयि धेहि, बलंमसि बलंमयि धेहि, ओजोसि ओजोमयि धेहि, मन्युरसि मन्यु मयि धेहि, सहोसि सहो मयि धेहि।
इस मंत्र में प्रभु से प्रार्थना की गई है कि तू तेजस्वरूप है तू मुझे तेज दे, तू बल स्वरूप है मुझे बल दे, तू पराक्रम स्वरूप है मुझे पराक्रम दे, तू ओज स्वरूप है मुझे ओज दे, तू मन्यु है मुझे मन्यु दे, तू सहनशीलता की साक्षात् मूर्ति है इसलिए मुझे भी तू सहनशील बना। इस प्रकार इस मन्त्र में तेजादि गुणों से विशिष्ट परमात्मा की उपासना की गई है और उससे प्रार्थना की गई है कि तू मुझे तेजादि गुणों से युक्त कर। यहाँ परमेश्वर के गुणों का ध्यान करके अपने अन्दर मनुष्य उन गुणों की स्थापना के लिए निश्चय करता, संकल्प करता है और निश्चय करने के बाद उन गुणों की प्राप्ति का प्रयत्न करता है।
जिस प्रकार इस संकल्प या आदेश द्वारा मनुष्य अपने अन्दर और दूसरों के अन्दर सद्गुणों की स्थापना कर सकता है ठीक उसी प्रकार इसके द्वारा अपने तथा दूसरे के रोग भी दूर किए जा सकते हैं। और स्वास्थ्य एवं बल की स्थापना की जा सकती है।
अपेहि मनसस्पते अपक्राम परश्चर परो निक्रत्या अवक्ष्ब बहुधा जीवतो मन।
ओ मन को पतित करने वाले दुख देने वाले रोग, हट जा, दूर हो जा, परे भाग जा जीवन धारण करते हुए जीते हुए के मन को दुख से अनेक प्रकारों से (परः आचक्ष्व)-दृष्टि से परे हो जा विलुप्त हो जा।
मन का स्थान हृदय है, हम बीमारी से जल्दी अच्छे नहीं होते, इसका कारण हमारी मानसिक शक्ति की कमी, विश्वास की कमी होती है। प्रायः क्षय आदि रोग तो लोगों को वहम से हुआ करते हैं। ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि हमें अपनी मानसिक कामनाओं को पुष्ट करना चाहिए। अपने संकल्पों को दृढ़ करना चाहिए और जिस समय हमारे प्राणों की गति मानसिक भावनाओं से पुष्ट होगी तो रोगों का बहिष्कार और स्वास्थ्य तथा बल का संचार शरीर में हो जाना अनिवार्य है।
इस प्रकार वेद द्वारा हमें यह मालूम हो गया कि संकल्प की अपनी कितनी ताकत है। यदि हम अपने संकल्प को दृढ़ कर लें तो यह हो नहीं सकता कि हम कोई काम करना शुरू करें और उस कार्य में हमें सफलता न मिले। इस तरह जिस व्यक्ति ने अपना संकल्प दृढ़ कर लिया, जिसने मन की पवित्रता उत्तम संकल्प, एवं आत्मिक बल प्राप्त कर लिया है वह अपनी भावनाओं और दृढ़ इच्छाओं से दूसरों को भी प्रभावित कर सकता है। अपने मन के शुद्ध विचारों एवं स्फुरणाओं से अन्य व्यक्तियों को भी प्रभावित कर सकता है और उनसे अपनी मानसिक शक्ति के प्रभाव से अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करवा सकता है। यही कारण है कि साधु पुरुषों एवं महात्माओं के साधुवाद एवं आशीर्वाद हमारा कल्याण करते हैं। सद्वैर्थों के स्वास्थ्य लाभ कराने वाले वाक्य तथा आश्वासन रोगी के रोग को दूर करने में समर्थ होते हैं।
इस प्रकार मानसिक चिकित्सा के अभ्यास करने वाले को अपनी संकल्प शक्ति की वृद्धि सर्वप्रथम करनी आवश्यक है।
कुसंस्कारों से भरे हुए मूर्ख होने की अपेक्षा नास्तिक होना ज्यादा अच्छा है क्योंकि उनमें कुछ न कुछ जीवन तो होता है, उनके सुधार की आशा की जा सकती है। लेकिन जिन लोगों के मस्तिष्क में कुसंस्कार घुस जाते हैं वे बिल्कुल बेकार हो जाते हैं, मृत्यु के कीड़े उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और उनका दिमाग फिर जाता है।
-स्वामी विवेकानन्द।
(महात्मा गाँधी)
शीतला के रोग से हम बड़े डरते हैं। उसके विषय में सैकड़ों भ्रमपूर्ण बातें फैल रही हैं। भारत में तो शीतला एक मुख्य देवी ही मान ली गई है और उसको असंख्य मनुष्य माता मानते हैं। अन्य रोगों के समान रुधिर दोष से ही शीतला होती है। मेदे की गरमी से खून बिगड़ता है शरीर अपने अन्दर भरे हुए विष को शीतला द्वारा बाहर निकालता है शीतला के रोगी को छूने से न डरना चाहिए। हाँ सावधानी की आवश्यकता है। यह भी एकदम से नहीं कह सकते कि छूत नहीं लगती। जिनके शरीर उसकी छूत ग्रहण करने योग्य हैं वे यदि शीतला के रोगी को छुवेंगे तो उन पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा। यही कारण है कि जहाँ शीतला का रोग फैला है वहाँ अनेक मनुष्य एक ही समय में इसके चंगुल में पड़ जाते हैं। इस प्रकार इसे छूत का रोग मानकर टीका लगाया जाता है और मनुष्यों को समझाने या बहकाने का प्रयत्न किया जाता है कि टीका लगवाने से निर्दोष शीतला निकलती है और उससे इस रोग का होना बन्द हो जाता है। गाय के थन में से शीतला के टीका देने की पीप निकलती है। वही हमारे शरीर में पहुँचाई जाती है। इससे यह लाभ बताया जाता है कि शीतला नहीं निकलती। पहले यह बात कही जाती थी कि एक बार के टीका लगने से शीतला नहीं निकलती। परन्तु जब यह ज्ञात हुआ कि टीका लगने पर भी बहुत समय तक इससे छुटकारा नहीं तो फिर यह कहा जाने लगा कि अमुक समय के पश्चात फिर टीका लगवाना चाहिए। आजकल यह रिवाज हो गया है कि जहाँ-जहाँ बीमारी प्रारम्भ हो तब वहाँ के सब मनुष्यों को चाहे वह टीका लगवा चुके हों या न लगवाया हो टीका अवश्य लगवाना चाहिए। उस प्रकार अनेक ऐसे मनुष्य देखने में आए हैं जिन्होंने पाँच छः या और अधिक बार टीका लगवाया है।
टीका लगवाना बड़ी जंगली प्रथा है वर्तमान काल में फैले हुए भ्रमों में से एक विशेष भ्रम है। जंगली समझे जाने वाले मनुष्यों में भी ऐसे भ्रम नहीं पाये जाते। इस भ्रम के मानने वाले को इतने ही से सन्तोष नहीं होता कि जिसकी इच्छा हो वही टीका लगवाए वे लोग इसके लगवाने को मजबूर करते हैं। जो लोग टीका लगवाने से इन्कार करते हैं उन पर कानूनी दृष्टि से मुकदमा चलाया जाता है और उन्हें कड़ा दण्ड दिया जाता है। टीके की खोज 1998 ई. में हुई है। इससे विदित होता है कि यह कोई प्राचीन भ्रम नहीं है। इतने थोड़े काल में लाखों मनुष्य इस भ्रम में फंस चुके हैं। जिन्हें टीका लगा दिया जाता है उन्हें शीलता से बचा हुआ समझा जाता है। परन्तु इसके मानने को एक भी सबल कारण नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता कि टीका न लगवाने से बड़ी शीतला निकलेगी ही। इसके विपरीत टीका न लगवाने वालों में शीतला न निकलने के अनेक उदाहरण पाए जाते हैं। जिन्होंने टीका नहीं लगवाया उनमें शीतला निकलने के उदाहरण से यह बात नहीं कही जा सकती कि यदि ये लोग टीका लगवाते तो शीतला से मुक्त ही रहते।
टीका लगवाना बड़ा गन्दा इलाज है। इसमें केवल गाय की लस ही हमारे शरीर में नहीं पहुँचाई जाती किन्तु मनुष्य लस को देखकर कै कर देते हैं। जिनके हाथ में लस लग जाती है वे साबुन से साफ करते हैं। यदि हमें कोई लस चखने को कहे तो सुनकर ही हमारा जी मचलाने लगेगा और यदि हमसे कोई हँसी में भी कहे तो हम उससे लड़ने लगेंगे। इतना होने पर भी किसी ने ही विचारा होगा कि हम टीका लगवा कर लस अर्थात् सड़ा रुधिर खाते हैं। इस बात को प्रायः सभी जानते होंगे कि अनेक रोगों में औषधियों की प्रवाही खुराक चर्म द्वारा शरीर में पहुँचाई जाती है। मुख द्वारा ली गई वस्तु तुरन्त रुधिर में नहीं मिल जाती, परन्तु जो वस्तु चर्म द्वारा शरीर में पहुँचाई जाती है शीघ्र रुधिर में मिल जाती है। तनिक सी वस्तु का भी शीघ्र प्रभाव पड़ता है। इससे ज्ञात होता है कि चर्म द्वारा भीतर पहुँचाई हुई दवा या खुराक खाने के समान ही है। इस प्रकार हम शीतला से बचने के लिए पीप खाते हैं। कहावत है कि कायर मृत्यु से पूर्व ही मर जाता है, इसके अनुसार शीतला से मर जाने या कुरूप हो जाने के भय से टीका लगवाकर हम पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
इस प्रकार लस शरीर में डलवा कर हम धर्म का विचार भी छोड़ देते हैं। माँस खाने वालों को भी रुधिर की मनाई है। और जीवित प्राणियों का रुधिर तथा माँस तो खाया ही नहीं जाता। लस जीवित प्राणी का रुधिर है और वह भी सड़ा हुआ है। यही सड़ा हुआ रुधिर हमें चर्म द्वारा खिलाया जाता है। जो मनुष्य आस्तिक हैं वह हजारों बार शीतला निकलना या देखते-देखते मृत्यु के मुख में जाना भी पसन्द करेगा, किन्तु रुधिर खाना पसन्द न करेगा।
टीके से जो दोष होते हैं उनके सम्बन्धों में इंग्लैण्ड के अनेक विचारवान् मनुष्यों ने विचार किया है। टीके के विरोध में वहाँ एक बड़ी सभा स्थापित हुई है। उसके सभासद टीका नहीं लगवाते। वे टीके के कानून का खुल्लमखुल्ला विरोध करते हैं। इसी कारण अनेक मनुष्य जेल भेजे जा चुके हैं। वे दूसरों को भी टीका न लगवाने के लिए कहते हैं। इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं तथा खूब विवाद हुआ है। टीके के विरोधी अपने समर्थन में निम्न बातें उपस्थित करते हैं-
1- गाय या बछिया के थन से पीप निकालने के काम में लाखों जीवित पशुओं पर बड़ी कठोरता का व्यवहार होता है। इस प्रकार की कठोरता मनुष्य को शोभा नहीं देती, अतः मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है कि टीके से कुछ लाभ भी हो तो वह उसे न लगवाये।
2- उससे लाभ कुछ नहीं होता, उल्टी हानियाँ होती हैं। मनुष्य के शरीर में अन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। टीका लगाने के हिमायती भी स्वीकार करते हैं कि इसके प्रचार के पश्चात् अन्य-2 रोग फैले हैं।
3- जिन-2 मनुष्यों के रुधिर से मुख्य लस तैयार की जाती है उन-2 मनुष्यों के अन्य-2 रोगों की छूत का उनमें लग जाना सम्भव है।
4- इस बात का भी विश्वास नहीं दिलाया जा सकता कि टीका लगाने से शीतला निकलती ही नहीं। टीके को प्रचलित करने वाले डॉ. जैनर का पहले यह कथन था कि एक हाथ में एक ही बार टीका लगवाने से मनुष्य सदैव के लिए छुटकारा पा जाता है, किन्तु जब एक हाथ से लाभ होता दिखाई न पड़ा तो दोनों हाथों में और फिर दोनों हाथों में कई बार टीका लगाने की प्रथा निकली। इस पर भी जब शीतला निकलने लगी तो कहा जाने लगा कि टीका लगाने के सात वर्ष पश्चात् शीतला से बचे रहने का विश्वास नहीं दिलाया जा सकता। अब तो सात के बदले तीन वर्ष ही कहे जाते हैं। उस प्रकार स्वयं डॉक्टर भी कोई निश्चित बात नहीं कह सकते। वास्तव में यह मानना कि टीका लगवाने से शीतला नहीं निकलेगी निरा भ्रम है। इसे कोई सिद्ध नहीं कर सकता कि टीका लगवाने से जिन्हें शीतला नहीं निकलती यदि वे टीका न लगवाते तो उन्हें अवश्य ही शीतला निकलती।
5- अन्तिम कारण लस लगवानी निरी गन्दी प्रथा है और गन्दगी द्वारा गन्दगी नष्ट होना समझना मूर्खता है।
इसी प्रकार की अन्य-2 युक्तियों से इस सभा ने अंग्रेज जनता पर बड़ा अच्छा प्रभाव डाला है। इंग्लैण्ड में एक शहर है जिसकी जनसंख्या का एक बड़ा भाग टीका नहीं लगवाता और उस शहर के मनुष्यों में यह रोग बहुत कम दृष्टि में पड़ता है। इस सभा के परिश्रमी जनों ने खोज करके सिद्ध कर दिया है कि डॉक्टर स्वार्थवश टीके के भ्रम को फैलाते हैं। उन्हें टीका लगाने के कार्य से प्रतिवर्ष हजारों पौंड की आय होती है। इसी कारण वे जान बूझकर टीके के दोषों को नहीं देखते। परन्तु कुछ ऐसे डॉक्टर भी हैं जो टीका लगवाने को बुरा बताते हैं और उनमें से अनेक इसके घोर विरोधी बन बैठे हैं।
पाठक यह पूछ सकते हैं कि जब ऐसी बात है तब हमें टीका न लगवाना चाहिए? मैं बेधड़क उत्तर दूँगा कि-नहीं।
(श्रीमती रत्नेशकुमारी ‘ललन’मैन पुरी)
देवी भागवत में एक प्रार्थना की गई है-
“पत्नीं मनोरमाँ देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्,
तारिणी दुर्ग संसार सागरम्य कुलोद्भवाम्”
हिन्दु संस्कृति के अनुसार यह एक आदर्श पत्नी का भावपूर्ण चारु चित्र है। पर हम आज आइये इस पर विचार करें जिससे जो आर्य संस्कृति के अन्ध भक्त नहीं हैं वे भी इसकी उपयोगिता समझ सकें।
आर्य-संस्कृति में यह माना जाता है कि सम्बन्ध वही सत्य (चिरस्थाई) होता है जो तन, मन आत्मा के साथ जुड़ता है। प्रत्येक विचारशील यह स्वीकार करेगा कि जब तक दो मन एक नहीं हो जाते विवाहित जीवन सफल तथा सर्वदा आनन्दमय नहीं रह सकता। रूप का आकर्षण तो कुछ ही सालों में धीरे-2 फीका होते-2 समाप्त हो जाता है। दो हृदयों के एक होने का साधन संस्कृत के किसी कवि ने बतलाया है “सम विचार जनयेति सख्यम्” मनोविज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि समान विचारों से हृदय आकर्षित होता है और वही आकर्षण यदि अधिक सहचर्य प्राप्त होवे तो मित्रता अथवा अन्तरंगता में परिणित हो जाता है। अतएव इस प्रार्थना का इतना अंश तो निर्विवाद है कि “पत्नी मनोरमाँ देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्”। मनोवृत्ति के अनुसार का अर्थ यह भी हो सकता है ‘मन में, भावनाओं ने भावी पत्नी का कल्पित आदर्श चित्र खींचा हो उसके अनुसार’ मनोविज्ञान इस अर्थ का भी समर्थन ही करेगा।
मनोरमा, का प्रयोग भी विचारणीय है पत्नी केवल आकर्षक न हो, जो अपने सौंदर्य से मन पर नशा चढ़ा दे, जिसे समय धीरे-2 उतारे दे, वरन् मनोरमा हो। अपने तन-मन दोनों के ही सौंदर्य से सदैव के लिए मन को रमा लेवे। वृद्धावस्था भी उस अनुराग के अकृत्रिम प्रेम बन्धन को शिथिल नहीं कर पाये। कुलवती इसलिए बतलाई गई है कि जैसे व्यक्तियों के बीच में बच्चा पलता है उनका भी बहुत कुछ प्रभाव उस पर पड़ता है। और माता-पिता के संस्कार तो बच्चों को विशेष रूप से प्रभावित करते ही हैं।
अब रहा एक गुण “संसार सागर से तारने वाली” यह विभूति आत्मा से सम्बंधित है। इसका तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त गुणों से जो पत्नी पति का मन आकर्षित कर लेवे वह कदाचित भी उसे कर्त्तव्य के पथ से विचलित न करे। वरन् यदि पति स्वयं ही मोह वश विपथ गामी होने लगे तो तन मन प्राण से उसको कर्त्तव्य मार्ग पर प्रेरित करने का पूर्ण प्रयत्न करें। आर्य नारियों के इन महान गुणों से भरे हुए अनेक चरित्र इतिहास गगन में नक्षत्रों की भाँति जगमगा रहे हैं।
(श्री के. वी. सुव्बाराव, मानिकपुर)
पहले एक विचार उत्पन्न होता है फिर वह शारीरिक अभ्यास में लाया जाता है और बार-बार और लगातार दुहराया जाता है उसी को आदत नाम दिया गया है।
आदत, बिजली की शक्ति के समान तेज और शक्तिशाली होती है। मनुष्य अपनी आदत का एक खिलौना बन जाता है और उसी के आधार पर उसके भविष्य का निर्माण होता है। कारण यह है कि उसे अपनी आदत के समान मित्र, साधन, विचार और अवसर बराबर प्राप्त होते रहते हैं। एक सी आदत वालों में स्वाभाविक प्रेम और एक दूसरे के विरुद्ध आदत वालों में स्वाभाविक भिन्नता बिना किसी परिचय के ही पायी जाती है।
पुरानी आदतें नयी आदतों की बजाय अधिक शक्तिशाली होती हैं। जब कभी आप नई आदतों का बीजारोपण करना चाहते हैं तो पुरानी आदतें उसमें बार-बार बाधा डालती हैं और नई आदत को बढ़ने से रोकती हैं। जिससे वह नई आदत डालने वाला व्यक्ति घबरा कर निराश हो जाता है और जब तक वह आदत के सिद्धान्त और असलियत का अनुभव नहीं कर लेता, सोचता है कि बदनसीब है, परन्तु ऐसा सोचना भूल है। पुरानी आदतें जो आज इतनी प्रबल हो रही हैं, एक दिन में नहीं पड़ गई हैं। काफी लम्बे समय तक, काफी दिलचस्पी के साथ अनेकों बार उन्हें क्रिया रूप में परिणित किया गया है तब वे आज इतनी मजबूत बन पाई हैं कि हमारे मन पर वे अधिकार जमा सकीं है और नई आदतों को न जगने देने के लिए संघर्ष करती हैं। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी आदत तब मजबूत होती है जब उसका पर्याप्त समय तक कार्य रूप में अभ्यास किया जाता है। आज जो आदतें पड़ी हुई हैं किसी समय वह भी नई रहीं होगी और उनको अपने पैर जमाने में अपने से पुरानी आदतों के साथ उसी प्रकार संघर्ष करना पड़ा होगा जैसा कि आज नई आदतें डालने की हमारी इच्छा को पुरानी आदतों से संघर्ष करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में निराश होने का कोई कारण नहीं। जब पूर्वकाल में पुरानी आदतों को हटाकर नई आदतें डालने में हम सफल हो चुके हैं तो कोई कारण नहीं कि अब फिर वैसा न किया जा सके।
ईश्वर का अस्तित्व, जीवन की हर एक स्थिति में, हर जगह और हर समय ध्यान में रखना हमारी एक स्वाभाविक आदत होनी चाहिए और इस आदत का बीजारोपण जीवन के शुरुआत से ही करना चाहिए। क्योंकि यह आदत जीवन की श्रेष्ठतम आदतों में सर्वोपरि महत्व की है।
जो मनुष्य ईश्वर पर विश्वास करता है, सदैव उसका ध्यान रखता है, हर जगह उसकी सत्ता को देखता है वह पाप कर्म नहीं कर सकता। जो ईश्वर विश्वासी है वह परम निर्भय रहता है, उसे मृत्यु का, हानि का, रोग का, वियोग का, आक्रमण का, ठगी का या किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। ईश्वर भक्त सदा ही निर्भय और निर्बन्ध रहते हैं।
आप अच्छी आदतें डालिए। क्योंकि आदतों से ही मनुष्य की जीवन धारा का निर्माण होता है। ईश्वर परायणता, आस्तिकता सब से अच्छी आदत है, क्योंकि उसके साथ-साथ वे सभी आदतें अपने आप अपने में आ जाती हैं जो जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए परम आवश्यक हैं।
(स्व. डॉ. इकबाल)
सच कह दूँ ऐ बिरहमन, गर तू बुरा न माने।
तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने॥
अपनों से बैर रखना तूने बुतो से सीखा-
जंगो जेदल सिखाया, वाइज को भी खुदा ने।
तंग आके मैंने आखिर, दैरो हरम को छोड़ा-
वाइज का वाज छोड़ा, छोड़े तेरे फसाने॥
कुछ फिक्र फूट की कर, माली है तू चमन का-
बूटों को फूँक डाला, इस विष भरी हवा ने॥
पत्थर की मूरतों में, समझा है तू खुदा है।
खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है॥
आ मिलके गैरियत के, पर्दे को फिर उठा दें।
बिछड़ों को फिर मिला दें, नक्शे दुई मिटा दें॥
सूनी पड़ी हुई है, मुद्दत से जी की बस्ती-
आ इक नया शिवाला, इस देश को बना दें॥
दुनिया के तीर्थों से ऊँचा हो अपना तीरथ-
दामाने आसमाँ से उसका कलस मिला दें॥
फिर इक अनूप ऐसी सोने की मूरती हो-
इस हरदुवार दिल में लाकर जिसे बिठा दें॥
जन्नार हो गले में तसबीह हाथ में हो-
यानी सनमकदे में शाने हरम दिखा दें॥
पहलू को चीर डालें, दरशन हो आम उसका-
हर आतमा को गोया इक आग सी लगा दें॥
आँखों की जो है गंगा ले ले के उसमें पानी-
उस देवता के आगे इक नहर सी बहा दें॥
हर रोज उठके गायें मन्तर वो मीठे मीठे-
सारे पुजारियों को ‘मै’ प्रीत की पिला दें।
मन्दिर में हो बुलाना जिस दम पुजारियों को-
आवाजये अजाँ को नाकूस में छिपा दें॥
अग्नी है वो जो निरगुन कहते हैं प्रीत जिसको-
धर्मों के यह बखेड़े उस आग में जला दें॥
आ इक नया शिवाला इस देश को बना दें।
*समाप्त*