सन्तों के लक्षण

(पं. तुलसीराम शर्मा, उडिया बाबा का स्थान, वृन्दावन)

मूकःपरापवादे परदारनिरीक्षणेऽप्यन्घः

षंगुःपरधनहरणे, स जयति लोकत्रये पुरुषः॥

दूसरे की निन्दा में मूक (चुप) पर स्त्री दर्शन में अन्धे, परधन हरण में पंगु (बिना पैर के) ऐसे पुरुष की तीनों लोक में जीत होती है।

सन्तस्तृणोत्सारणमुक्तमाँगा-

त्सुवर्णकोटयर्पणमानयन्ति।

प्राणाव्ययेनापि कृतोपकाराः

खलाः परे वैरमिवोद्वहन्ति॥

सज्जन पुरुष के मस्तक से यदि कोई तिनका उतार ले (थोड़ा सा भी उपकार कर दे) तो वे करोड़ों स्वर्णदान के बराबर मानते हैं। नीच पुरुष का तुम प्राण देकर भी उपकार दो तो वे उल्टा बैर ही मानेंगे।

क्षारं जलं वारिमवः पिवन्ति

तदेव कृत्वा मधुरं वमन्ति।

संतस्तथा दुर्जनदुर्वचाँसि,

पीत्वाचसूक्तानिसमुद्गिरन्ति॥

समुद्र के खारी जल को मेघ पीते हैं उसी को मीठा करके वर्षाते हैं। इसी प्रकार सन्तः दुर्जनों के कटुवचनों को सुनकर मीठे वचन बोलते हैं।

मनसिवचंसिकाये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवन-

मुपकार श्रेणिभिः प्रीणयन्तः। परगुण परमाणू-

न्वपर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदिविकसन्तः सन्ति सन्तः

कियन्तः॥

मन, वाणी तथा शरीर से जो पुण्यकार्य करते हैं, उपकार से तीनों लोकों को प्रसन्न रखते हैं, दूसरे के थोड़े गुणों को अधिक मानते हैं और हमेशा प्रसन्न मुख ऐसे पुरुष इस संसार में बिरले हैं।

तृष्णाँ छिन्धि, भज क्षमाँ, जहि मदं, पापेरतिंमाकृथाः। सत्यं बूह्यनुयाहि साधुपदवीं, सेवस्वविद्वज्जनान्॥ मान्यान् मानय विद्रिषोऽप्यनुनयह्याच्छादयरुवान गुणान्। कीर्तिं पालय दुःखितेकुरुदयामेतत्सताँ लक्षणम्॥

तृष्णा (धन की अधिक लालसा) का छेदन करो, क्षमा (अन्य का अपराध सहना) का सेवन करो, मद्य का त्याग करो, पाप कर्म में प्रीति मत करो, सत्य भाषण करो, सज्जनों के मार्ग पर चलो, विद्वानों का सेवन करो, पूज्यों का आदर करो, शत्रुओं का भी आदर करो, गुरु आदि में नम्र भाव रखो, कीर्ति का विस्तार करो, दुखितों पर दया करो, इस प्रकार का व्यवहार रखना सज्जन पुरुषों का लक्षण है।

आत्मार्थं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः।

परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥

इस संसार में अपने लिए कौन मनुष्य नहीं जीता है परन्तु जिसका जीवन परोपकार के लिए है उसका ही जीवन, जीवन है।

नद्विषन्ति नयाचन्ते परनिन्दाँ न कुर्वते।

अनाहूता न चायान्ति तेनाश्मानोपिदेवताः॥

न किसी से बैर है न किसी से याचना है न किसी की निंदा करते हैं बिना बुलाये आना-जाना नहीं, इसी से पत्थर की मूर्ति भी देवता है। मनुष्य को भी चाहिये कि किसी से बैर, याचना और निन्दा न करे तो प्रतिष्ठा को प्राप्त होगा।

निर्बैरः सदयः शान्ताँ दंभाऽहंकारवर्जितः।

निरपेक्षोमुनिर्वीतरागः साधुरिहोच्यते॥ 2॥

(पद्म पु. उत्तरखण्ड अ. 99)

बैर रहित, दया वाला, शाँत चित्त (राज द्वेष रहित) पाखण्ड और अहंकार से रहित निरपेक्ष (किसी विषय की चाहना नहीं) आसक्ति रहित पुरुष साधु कहाता है।

वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-3


सुमन क्यों इतरा रहे हो?

(श्री रमाशंकर शर्मा ‘राकेश’)


सुमन क्यों इतरा रहे हो

यह क्षणिक सौंदर्य, क्यों फूले न आज समा रहे हो,

सुमन क्यों इतरा रहे हो?

मत करो अभिमान यदि तुमको मिला है रूप अनुपम।

यह तुम्हारा रूप यह सौंदर्य है केवल अमित भ्रम॥

है न कुछ स्थिर जगत में वह बुरा हो या कि उत्तम।

मृत्यु है पाना सभी को देर में हो निकटतम॥

इस अनित्य स्वरूप में क्यों विश्व को भरमा रहे हो? सुमन0।

यह न समझो भ्रमर गण के हेतु रस की खान को तुम।

और सुख सम्पन्न उपवन की सुहाती शान हो तुम॥

एक बुँद-बुँद के सरिस मिटते हुए अरमान हो तुम।

टूट कर जो फिर न जुड़ता तुच्छ वह सामान हो तुम॥

विश्व का कण-कण बदलता तुम बदलते जा रहे हो। सुमन0।

रस बनेगा विष, समीरण भी तुम्हें प्रतिकूल होगी।

आज की कोमल तुम्हारी पंखंडी कल शूल होगी॥

रंग करके भंग सुन्दरता तुम्हारी धूल होगी।

अस्तु इस सौंदर्य पर यह गर्व करना भूल होगी॥

देह है नश्वर तुम्हारी व्यर्थ ही इठला रहे हो। सुमन0?

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बुद्धिमानों! बुद्धि का सदुपयोग करो।

हर आदमी विद्या बुद्धि की शक्ति से सम्पन्न नहीं होता। किन्हीं बिरलों को ही यह ज्ञान सम्पदा मिलती है। सृष्टि में चौरासी लाख प्रकार के जीव जन्तु, कीट-पतंग, पशु-पक्षी बताये जाते हैं, इनमें नाममात्र की बुद्धि होती है, उसके सहारे वे बेचारे मुश्किल से अपनी जीवन यात्रा पुरी कर पाते हैं। उनका बुद्धिबल इतना कम होता है कि कई बार तो उन बेचारों को छोटी-2 अड़चनों के कारण अपने प्राण तक गंवाने पड़ते और आये दिन तरह-तरह के दुख भोगने पड़ते हैं। यदि उनकी बुद्धि थोड़ी अधिक विकसित रही होती तो वे भी मनुष्य की भाँति सुखी और समृद्ध रहे होते। परन्तु कर्म की गहन गति के कारण उन्हें वह साधन प्राप्त नहीं है, फलस्वरूप मनुष्य की अपेक्षा कई दृष्टियों से अधिक सक्षम होते हुए भी जैसे तैसे जीवन का भार ढो रहे हैं।

मनुष्य अनेकों अन्य जीव जन्तुओं की तुलना में बहुत पिछड़ा हुआ है। पक्षियों की तरह वह आकाश में नहीं उड़ सकता, कच्छ-मच्छ की तरह जल में किलोल नहीं कर सकता, हिरन और घोड़े की बराबर दौड़ नहीं सकता, हाथी की बराबर बोझ नहीं ले जा सकता, सिंह-व्याघ्र जैसा बलवान नहीं, भेड़-बकरी की तरह घासपात खाकर गुजारा नहीं कर सकता, उल्लू और चमगादड़ की तरह रात्रि में भली प्रकार देख नहीं सकता, ऊंट की तरह कई दिन बिना खाये नहीं गुजार सकता, सर्प की तरह सैकड़ों वर्ष नहीं जी सकता, जुगनू की तरह चमक नहीं सकता, मोर सा सुन्दर नहीं, बन्दर सी छलाँग नहीं मार सकता, सर्दी-गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, इतना निर्बल, पिछड़ा हुआ होते हुए भी अन्य समस्त जीव जन्तुओं से वह आगे बढ़ा हुआ है, सृष्टि का मुकुटमणि है, सबका नेता तथा स्वामी है, इतनी बड़ी सफलता का कारण है उसका बुद्धि बल। इस बुद्धि बल ने ही उसे एक साधारण प्राणी से महान मानव बना दिया है।

नीति का वचन है कि “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धिस्य कुतोबलम्” जिसमें बुद्धि है उसमें बल है, निर्बुद्धि में बल कहाँ से आया? जो जितना ही बुद्धिमान है वह उतना ही बलवान है। बुद्धिहीन का सारा बल निष्फल हो जाता है। मनुष्य ने इस बुद्धि बल के द्वारा ही इतना प्रभुत्व प्राप्त किया है। इसी की न्यूनाधिकता के कारण मनुष्य-2 के बीच में अन्तर दिखाई देता है। साधारणतः मानव प्राणियों के शरीर और आकृति में कोई भारी अन्तर नहीं होता, फिर भी राजा-रंक, धनी-दरिद्र, विद्वान-मूर्ख, सत्तारूढ़-पराश्रित, शोषक-शोषित, पुण्यात्मा-पापी, महापुरुष-दीनहीन, चतुर-भोंदू के बीच जमीन आसमान का अन्तर पाया जाता है। एक पालकी में बैठकर चलता है एक पालकी को उठाता है। एक की उंगलियों के इशारे पर लाखों करोड़ों प्राणियों की गतिविधि होती है, एक दूसरों द्वारा कठपुतली की तरह नचाया जाता है। एक का सर्वत्र जयघोष होता है और उसके चरणों पर सर्वस्व अर्पित किया जाता है। दूसरी ओर एक ऐसा व्यक्ति है जिसे कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता। इतना भारी अन्तर शरीरों के कारण नहीं, बुद्धिबल के कारण है, जिसमें जितना बुद्धि तत्व अधिक है वह उतना ही बड़ा आदमी बन जाता है।

बुद्धि की महत्ता सर्वोपरि है। यह मनुष्य के लिए एक ईश्वरीय वरदान है। सृष्टि के सब जीवों को यह बुद्धिबल प्राप्त नहीं है, यहाँ तक कि सब मनुष्यों को भी वह पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नहीं है। असंख्य मनुष्य ऐसे है जिनके पास नाम मात्र का बुद्धि तत्व है। उसकी मात्रा इतनी न्यून है कि जीवन यापन का कार्य चलाने के अतिरिक्त उसके द्वारा और कोई बड़ा काम नहीं कर सकते, उस थोड़ी सी बुद्धि से जब वे अपना उदर पोषण ही मुश्किल से कर पाते हैं तो उसके द्वारा कोई महान कार्य करना, यश प्राप्त करना या दूसरों का उपकार करना किस प्रकार संभव है? बहुत थोड़े मनुष्य इस संसार में ऐसे हैं जिनको विशिष्ट बुद्धिबल प्राप्त है, जो दूर की सोच सकते हैं, जिनको बारीक बातें सोचने की क्षमता है, जिनका विवेक परिमार्जित है, जो बहुश्रुत हैं, जिन्होंने विशाल अध्ययन किया है एवं जो अपने बुद्धिबल से असाधारण कार्य करने की क्षमता रखते हैं।

यह बुद्धिबल परमात्मा ने जिन विशिष्ट व्यक्तियों को दिया है वह एक विशेष उद्देश्य से दिया है। ज्ञान परमात्मा की अमानत है, धरोहर है, वह इसलिए दी गई है कि इस अमानत को वह परमात्मा की इच्छानुसार उसके बताये हुए प्रयोजनों के लिए खर्च करे। जिस किसी को भी परमात्मा असाधारण विशेषताएं देता है, इसी उद्देश्य से देता है कि वह उनके द्वारा सृष्टि के अन्य प्राणियों को लाभ पहुँचावे। जिन मनुष्यों को असाधारण बुद्धिबल दिया गया है उनके लिए परमात्मा ने यह कर्त्तव्य नियत कर दिया है कि वे उस शक्ति को अपने से कमजोरों के लिए, कम बुद्धि वालों के लिए निरन्तर वितरण करते रहें।

बुद्धिमानों का परम पवित्र उत्तर दायित्व यह है कि वे अपने बुद्धिबल को जन कल्याण के लिए लगावें। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमने परिश्रमपूर्वक इतनी विद्या प्राप्त की है तो इससे हम भोग ऐश्वर्य उठाकर ऐश आराम क्यों न करें? मजे-मौज क्यों न उड़ावें? ठाठ-बाट जमाने और गुलछर्रे उड़ाने में इसका उपयोग क्यों न करें? ऐसा सोचना उचित नहीं। एक राजा अपने नौकरों को नियत मात्रा में वेतन देता है, जिससे वे अपना गुजारा कर सकें परन्तु किसी विशेष कर्मचारी को वह विश्वास पात्र समझ कर उसे खजांची नियुक्त करता है और उसके पास बड़ी-बड़ी रकमें जमा करता है। यह रकमें इसलिए खजांची को दी जाती है कि वह उन्हें सुरक्षित रखे और सिर्फ उन कामों में खर्च करे जिनके लिए राजा आज्ञा दे, राज का हित हो। यदि वह खजांची इस प्रकार सोचने लगे कि राजा मुझ पर प्रसन्न है, उसने मेरी योग्यता के अनुसार मेरे पास इतना धन रख दिया है तो मुझे यह अधिकार है कि मैं इसका मनमाना उपयोग क्यों न करूं? अपने मौज मजे के लिए यह धन क्यों न खर्च करूं? तो ऐसा सोचना उस खजांची के लिए अनुचित होगा। यदि खजांची को मौज मजा करने के लिए इतना धन राजा ने दे दिया है तो अन्य कर्मचारी, जो उसी प्रकार दिन भर परिश्रम करते हैं, उन्हें भी उतना-उतना ही धन उसी प्रकार खर्च करने के लिए क्यों नहीं दिया? यदि नहीं दिया तो राजा को पक्षपाती ठहराया जायगा। यही बात परमात्मा के बारे में कही जा सकती है। इसके सभी पुत्र समान है, वह समदर्शी है, निष्पक्ष है, पर वह इस प्रकार पक्षपात क्यों करेगा?

हमें यह बात भली प्रकार समझ रखनी चाहिए कि साधारण प्राणियों की अपेक्षा जो भी वस्तु हमें विशेष रूप से मिली हुई है वह केवल इसलिए मिली हुई है कि उसके द्वारा हम अपने से कमजोरों की सहायता करें। बन्दूक हर किसी को नहीं दी जाती, उसे रखने का लाइसेन्स हर किसी को प्राप्त नहीं होता परन्तु राजा अपने पहरेदारों को, सैनिकों को बढ़िया-बढ़िया बन्दूक, हथियार राज्य की रक्षा के लिए अमानत की तरह दिये जाते हैं। यदि वे पहरेदार या सिपाही उन हथियारों के प्रयोजन को भूलकर अपने निजी लाभ के लिए उनका उपयोग करें, डकैती डालने के काम में लावें, उनसे डरा धमका कर किन्हीं को लूटें, अपने व्यक्तिगत कारणों के लिए किसी पर हमला करें या उन हथियारों को किराये पर उठावें या बेचें तो उनके यह कार्य सर्वथा अनुचित, अन्याय युक्त, कानून के विरुद्ध ठहराये जावेंगे और जब राजा को यह पता लगेगा कि इन कर्मचारियों ने मेरी विशेष अमानत को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति मान लिया और उसका मनमाना उपयोग किया तो वह बहुत क्रुद्ध होगा। उन कर्मचारियों को दंड देगा और अपने दिये हुए हथियार वापिस छीन लेगा। बुद्धिबल या अन्य बलों के बारे में भी यही बात है। वह एक प्रकार के हथियार हैं, जिनका उपयोग केवल मात्र ईश्वरीय प्रयोजन के लिए, संसार में धर्म वृद्धि के लिए, लोकहित के लिए, जन कल्याण कि लिए, परमार्थ के लिए ही किया जाना चाहिए।

सूर्य को प्रकाश और गर्मी का केन्द्र बताया गया है। क्या वह उस प्रकाश और गर्मी का उपयोग अपने मौज मजे के लिए करता है? नहीं, वह उस प्रकाश और गर्मी को निरन्तर अन्यों के लिए वितरित करता रहता है। असंख्यों प्राणी उसकी शक्ति से जीवन धारण करते हैं। चन्द्रमा की शीतल चाँदनी क्या उसके निज के उपयोग में आती है? नहीं, वह बेचारा अपनी उस अमृतमयी चन्द्रिका का संतप्त लोगों को शान्त करने के लिए वितरित करता फिरता है। वायु दिन रात क्यों चलती है? दिन रात बिना विश्राम किये घर पर जाकर दूसरों पर पंखा क्यों झलती रहती है? क्या इसके बदले में कोई ऐश आराम उसे मिलता है? नहीं कुछ भी नहीं। वायु जानती है कि मुझे जो प्रचण्ड शक्ति प्राप्त है वह परमात्मा की अमानत है। उसका व्यय मुझे उसके परमप्रिय पुत्रों के लिए, प्राणियों के लिए ही करना है।

नदियों को देखिए, जल का भार लिए सदैव दौड़ती रहती हैं, प्राणियों की तृषा शान्त करना और प्यासी भूमि को तृप्त करना ही एकमात्र उनका कार्य है, सरोवरों को देखिए, वे दूसरों के लिए जीवित हैं, अपना उनका क्या स्वार्थ है? समुद्र अपना जल, मेघ मालाओं को निरन्तर देता रहता है ताकि वे भूमंडल पर वर्षा करके उसे हरी भरी बनावें। क्या समुद्र ने कभी ऐसा कहा है कि जल मेरे लिए मिला है, उसका उपयोग किसी को न करने दूँगा। अगर समुद्र की मनोवृत्ति हमारी जैसी होती तो वह कहता-”मैंने जल कमाया है, मैंने अपनी चतुराई से संचय किया है, मुझे इसका लाभ उठाने का पूरा अधिकार है। जिसे पानी लेना हो मुझसे मोल ले जाय, मेरे यहाँ कोई खैरात थोड़े ही बटती है।” परन्तु नहीं, समुद्र हमारी तरह ओछा, स्वार्थी, संकीर्ण, अनुदार और मूर्ख नहीं है जो पराई अमानत पर अपना अधिकार जमावे और उसको तुच्छ स्वार्थ के लिए ही उपयोग करने का दुस्साहस पूर्ण दुराग्रह करे।

वृक्षों को देखिए। वे अपने सुमधुर फल, शीतल छाया, लकड़ी, फूल, गोंद आदि हमें देते हैं, अपने पुराने पत्तों से हमारे लिए भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं, क्या इसके बदले में उन्हें कुछ मुआवज़ा दिया जाता है। अगर हमारी तरह कुछ वृक्ष भी तराजू ले बैठते कि बिना कीमत दिये नहीं मिलेगा तो बुरा होता। पुष्प हमारा चित्त प्रसन्न करते हैं, औषधियाँ हमें भयंकर बीमारियों से उबारती है, वनस्पति और अन्न हमारे लिए शाक भाजी और भोजन की व्यवस्था करते हैं, गाय, बैल, भैंस, बकरी, घोड़े, ऊंट, हाथी, गधे, कुत्ते, तितली, मधुमक्खी आदि अपने अपने ढंग से हमारी सेवा सहायता किया करते हैं। उनके उपकारों के बदले में मनुष्य भला कितना प्रत्युपकार चुका पाता है? जब इतने अल्प शक्ति सम्पन्न प्राणी अपने जीवन का महत्वपूर्ण भाग बदले की इच्छा और आशा किये बिना परमार्थ के लिए समर्पित कर देते हैं तो मनुष्य के लिए यह शोभा नहीं देता कि वह अपनी सामर्थ्यों को परमार्थ में लगाते हुए झिझके और यह सोचे कि मैं अपनी कमाई से खुद ही मौज मजा क्यों न करूं? किसी को मुफ्त में अपनी सेवाएं क्यों दूँ? इस प्रकार की क्षुद्रता मानव प्राणी के महान गौरव को गिराने वाली है। जब मधुमक्खी जैसे सृष्टि के साधारण जीव इतनी तुच्छता, अनुदारता, संकीर्णता के क्षेत्र में नहीं सोचते तो क्या मनुष्य को ही इतना टुच्चा बनना चाहिए कि खुदगर्जी के अतिरिक्त और कोई बात उसे आवश्यक प्रतीत न हो।

जिन्हें सामर्थ्य प्राप्त है, जिनमें शक्ति है वे परमात्मा के कोषाध्यक्ष हैं। उनका काम है कि अपने पास जमा हुई सम्पत्ति को राज्य व्यवस्था कायम रखने वाले कामों में खर्च करते रहें। यदि खजांची के खजाने की चाबी अपने कब्जे में करके दूसरों को अंगूठा दिखा दे कि यह सब तो मेरा है, मैं ही इसका मालिक हूँ, इस संपत्ति का उपभोग तो मुझे अकेले को ही करना है तो इससे राज्य शासन में भारी अव्यवस्था उत्पन्न हो जायगी। ऐसी बगावत करने वाले कोषाध्यक्ष को राजा का क्रोध भाजन बनना पड़ेगा। वह राज्य के शत्रुओं में गिना जायगा। जरा कल्पना तो कीजिए कि यदि बादल अपना पानी पृथ्वी पर न बरसावे, सूर्य अपनी धूप को अपने अन्दर ही समेट कर रखे और पृथ्वी में परिक्रमा करना छोड़ दे, हवा परोपकार की बेवकूफी छोड़कर अपने घर मौज मजा करे, पृथ्वी अपने ऊपर हमारा बोझ लादने से इनकार कर दे तो फिर संसार का काम किस प्रकार चलेगा? जिस अनुदारता को हम अपनाते हैं उसे यदि हमारी माता ने अपनाया होता तो जैसे छछूँदर के कच्चे बच्चों को घर में से बुहारकर कूड़े पर फेंक दिया जाता है वैसे ही हमें भी किसी कूड़े के ढेर में फेंक दिया गया होता और जन्म के कुछ ही समय पर कीड़े मकोड़ों की तरह बिलबिला कर हम मर गये होते। हमारी स्नेहमयी माता जिसने पाल−पोस कर हमें इतना बड़ा किया है, उसकी सेवाओं की कीमत हममें से कौन चुका देता है? कितने आश्चर्य की बात है कि हम चारों ओर से दूसरों के कर्जों से लदे हुए होने पर भी ऐसा सोचते हैं कि हम किसी को अपनी चीज क्यों दें? ‘लेने में चतुर, देने में मकर’ की नीति को ईमानदारी की नीति किस प्रकार प्रकार कहा जा सकेगा?

बड़ा उत्तरदायित्व मिलना किसी की योग्यता और श्रेष्ठता का सर्वोपरि प्रमाण है। जिम्मेदारी हर किसी के ऊपर नहीं डाली जाती, जो उसके अधिकारी हैं उन्हें ही वह गौरव दिया जाता है। यह गौरव इतना बड़ा आनन्द है कि उसकी तुलना इन्द्रियों की क्षणिक खुजली मिटाने के, भोग भोगने के सुख से किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती। बड़े आदमी, रायबहादुर, खानबहादुर, सर, आनरेरी मजिस्ट्रेट आदि बनने में अपना गौरव अनुभव करते हैं। विश्वविद्यालय जिसे “डॉक्टर” की उपाधि से सम्मानित करते हैं वह अपने को धन्य समझता है, विक्टोरिया क्रॉस पाने के लिए फौजी जवान बड़ी से बड़ी जोखिम उठाकर अपनी बहादुरी का परिचय देते हैं, शहीद कहलाने का सम्मान प्राप्त करने के लिए अनेकों वीर अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं, संस्थाओं के पदाधिकारी बनने के लिए अक्सर इतनी कसमकस देखी जाती है कि लोग आपस में भिड़ तक जाते हैं। इन सब बातों पर थोड़ी गंभीरता से विचार किया जाय तो यह प्रकट हो जाता है कि महानता का गौरव प्राप्त करना भी एक आनंद है और वह इतना उत्तम, इतना उच्चकोटि का आनन्द है कि उसके लिए इन्द्रियों के भोग और लोभ की तृष्णा को तिलाँजलि दी जा सकती है। बड़प्पन एक श्रेष्ठ आनन्द है पर वह आनन्द यों ही नहीं मिलता, उसको प्राप्त करने वाले को त्याग करना पड़ता है, तप करना पड़ता है और तुच्छता से ऊपर उठना पड़ता है।

पं. जवाहरलाल नेहरू आजकल भारत के प्रधान मन्त्री हैं। इस पद का गौरव और उत्तरदायित्व इतना भारी है कि प्रतिदिन भारी श्रम उन्हें करना पड़ता है और व्यक्तिगत शौक, मौज की, लोभ संचय की सारी तृष्णाओं को तिलाँजलि देनी पड़ती है। महात्मा गाँधी को वृद्धावस्था में भी चैन कहाँ था? उनके परिश्रम के बदले में उन्हें क्या ऐश आराम मिलता था? संसार के सभी महापुरुष तभी महापुरुष बने हैं जब उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ या भोग-संचय की तुच्छता से अपने को ऊपर उठाया है। अगर वे हमारी तरह संकुचित दृष्टि से सोचते और तुच्छ लोभ एवं नीच वासनाओं में उलझे रहते तो उन्हें गौरव प्राप्त नहीं हो सकता था। गाँधी जी जितने पढ़े हुये हजारों वकील कचहरियों की धूलि फाँकते और पेट भरते रहते हैं। जवाहरलाल जैसे अमीरजादे दुनिया में लाखों पड़े हैं कोई पूछता तक नहीं, जमना लाल बजाज जैसों की संपत्ति को घंटे में खरीद बेच देने वाले सेठ हजारों हैं पर उनका महत्व कै कौड़ी का है? राजा, नवाब बड़े पड़े हैं, उनकी क्या गिनती है। इन साधन सम्पन्न व्यक्तियों को किसी हद तक सुखी कहा जा सकता है परन्तु उन्हें वह सुख कदापि उपलब्ध नहीं हो सकता। जो भारी उत्तरदायित्व कंधे पर लेकर, उसे ईमानदारी से पूरा करने वाले को प्राप्त होता है।

शेष जी के शिर पर पृथ्वी रखी हुई है बेचारे को हर घड़ी उसी बोझ को लादने से फुरसत नहीं, सूर्य तेजी के साथ अहिर्निश दौड़ता रहता है, ऐश आराम के लिए पलभर का मौका नहीं। शेष जी और सूर्य की कार्य प्रणाली को देखकर कोई व्यक्ति ऐसा कह सकता है-”यह बड़े बेवकूफ हैं, इतनी मेहनत बेकार करते हैं, इसके बदले में तनख्वाह तक नहीं लेते, इतनी योग्यता और शक्ति रहते हुए भी ऐश आराम के कोई साधन नहीं जुटाये,” ऐसा सोचने वाले की छोटी दृष्टि में सूर्य और शेष बेवकूफ हैं, गाँधी, ईसा, बुद्ध, सुकरात मूर्ख हैं और वह शूअर बुद्धिमान है जो भरपेट आराम से अपनी रुचि का भोजन करता है, दिनभर माँद में पड़ा सोता है, शूअरियों के साथ निर्द्वन्द्व विहार करता है और छः महीने पूरे नहीं हो पाते कि पौन दर्जन बच्चे पैदा कर देता है। जिनके सोचने का दृष्टिकोण इतना ओछा है उनकी महिमा किन शब्दों में कही जाय कुछ समझ में नहीं आता। मनुष्य की निज की आवश्यकताएं इतनी नहीं हैं जिसके लिए उसे बुद्धि की अमूल्य धरोहर का सारा व्यय अपने लिए करना पड़े। वृक्षों को अपने निर्वाह के लिए जिन पदार्थों की आवश्यकता है वह भूमि में उन्हें आसानी से मिल जाते हैं, अपने फलों को बेचकर गुजारा करने की उन्हें आवश्यकता नहीं होती। गाय को अपने गुजारे के लिए घास-पात आसानी से मिल जाता है उसे अपना दूध पीने की जरूरत नहीं। मधुमक्खी शहद दूसरों के लिए जमा करती है और अपना पेट फालतू समय में भर लेती है। मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएं इतनी कम हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए उसका दो चार घंटे का परिश्रम काफी है। पेट भरने के लिए अन्न, तन ढ़कने के लिए कपड़ा कमा लेने में बहुत भारी माथापच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। बेकार की जरूरतें बढ़ाते चलना और उन्हें पूरा करने के लिए सारी शक्ति खर्च कर देना कोई बुद्धिमानी नहीं है।

जिसके पास बुद्धि है उसे स्वभावतः बुद्धिमान होना चाहिए। बुद्धिमान खजांची वह है जो अपनी ईमानदारी और योग्यता का प्रमाण देकर दिन-दिन अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजा का कृपा भाजन बनता है और वेतनवृद्धि का लाभ पाता है। जो खजांची, राज्य कोष में से धन लेकर अपने लिए खर्च करने लगे उसे कौन बुद्धिमान कहेगा। जिन लोगों को परमात्मा ने बुद्धि रूपी सम्पत्ति प्रदान की है उनका कर्त्तव्य है कि अपनी बुद्धिमत्ता को, चतुरता को, विद्या को उन लोगों के लिए खर्च करता है जो अपेक्षाकृत कम बुद्धिमान हैं, जिनको बौद्धिक सहायता की आवश्यकता है। संसार में असंख्य प्राणी ज्ञान के अभाव में कितना कष्ट पा रहे हैं। उन्हें साधन प्राप्त हैं पर सद्बुद्धि की कमी के कारण नाना प्रकार की व्यथा, बाधाएं घेरे हुए हैं। यदि उन्हें विवेक सद्ज्ञान, सही दृष्टिकोण, सुबुद्धि सत्पथ प्राप्त हो जाय तो कोई कारण नहीं कि वे दुख दरिद्र की वेदना से पीड़ित रहने की बजाय निरन्तर सुख शान्ति का अनुभव न करें।

माता-पिता के ऊपर छोटे बालकों के पालन पोषण का उत्तरदायित्व होता है। राजा इस बात का उत्तरदायी है कि उसकी प्रजा का जानमाल सुरक्षित रहे। धनी और व्यापारी इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि वे अकाल, आपत्ति बेकारी, दरिद्रता आदि से जनता को बचाने के लिए अपने धन का उपयोग करें। जिनके पास बन्दूक का लाइसेंस है, वे इस बात के जिम्मेदार हैं, कि पड़ौस में डाका पड़ रहा हो तो अपनी बन्दूक से डाकुओं का मुकाबला करें। यदि माता-पिता बालकों के प्रति, राजा प्रजा के प्रति, धनी जनता के प्रति, बन्दूकवाला पड़ोसी के प्रति अपने उत्तरदायित्व का पालन नहीं करता तो ईश्वर के दरबार में वह अपराधी ठहराया जायगा और उसे इस गैर जिम्मेदारी का परिणाम भोगना पड़ेगा। एक छोटा बालक भूख से तड़प-2 कर प्राण त्याग रहा हो दूसरी और एक आदमी मिठाइयाँ उड़ा रहा हो तो वह मिठाई खाना धिक्कार के योग्य है। इसी प्रकार जबकि सद्बुद्धि के अभाव में जनता दुख, शोक, चिन्ता, क्लेश, कलह, पाप, ताप आदि से बेचैन है तब उन लोगों को जो विद्वान है, बुद्धिमान है यह शोभा नहीं देता कि उस ईश्वर प्रदत्त ज्ञान सम्पत्ति से अपना वैभव बढ़ाने में, खुद ही ऐश आराम उठाने में व्यस्त रहे। यदि वे इतना संकुचित दृष्टिकोण धारण करते हैं तो उनकी विद्या का क्या महत्व है? क्या गौरव है?


शारीरिक और बौद्धिक श्रम

परिश्रम, प्रयत्न, उद्योग, कर्मपरायणता द्वारा ही मनुष्य सुख, शाँति देने वाली भौतिक और आध्यात्मिक संपदाएं प्राप्त कर सकता है। जिसने जो कुछ पाया है अपने प्रयत्न और परिश्रम द्वारा पाया है। ईश्वर पूर्ण न्यायकारी है वह परिश्रम से न्यूनाधिक किसी को नहीं देता। इसीलिए विवेकवान व्यक्ति सदा से ही कर्म की सर्वोपरि महत्ता को स्वीकार करते रहे हैं और उसके अनुसार आचरण करते रहे हैं।

जो जीवन को ऊँचा उठा हुआ और आनंदित देखना चाहता है उसे परिश्रम से प्रेम करना चाहिए। परन्तु यह परिश्रम न तो केवल शारीरिक ही होकर रह जाय और न वह केवल मानसिक श्रम तक ही सीमित रहे बल्कि शारीरिक और बौद्धिक परिश्रम का हर बात में संमिश्रण किया जाय। दोनों प्रकार के श्रमों का मिलकर ही एक पूर्ण एवं प्रभावशाली परिश्रम बनता है। जो परिश्रम का सच्चा लाभ प्राप्त करना चाहता है उसे शारीरिक और मानसिक श्रम पर समान रूप से ध्यान देने का, दोनों का समन्वय करने का प्रयत्न करना चाहिए। पशु में शारीरिक बल अधिक है, वह मनुष्य से ज्यादा मेहनत कर सकता है तो भी पशु के श्रम से मनुष्य का श्रम अधिक कीमती होता है। कारण यह है कि पशु के श्रम में बुद्धि का समावेश नहीं होता किन्तु मनुष्य अपने कार्यों में चतुरता, बुद्धिमत्ता और क्रिया कौशल को भी जोड़ देता है। वह देखता चलता है कि काम में कहीं बिगाड़-बिगाड़ तो नहीं हो रहा है? वह यह भी सोचता चलता कि इस कार्य को अधिक उत्तम बनाने के लिए क्या-क्या प्रयोग और हो सकता है? इन दोनों संभावनाओं को ध्यान में रखकर वह बिगाड़ सुधार पर विचार करता हुआ, बुद्धि के संयोग से नई तरकीबें निकालता है, भूलों का सुधार करता है। पशु-श्रम से मनुष्य के श्रम में यही बहुमूल्य विशेषता है, यदि उसमें यह विशेषता न रहे तो मेहनत की दृष्टि से, मजबूती की दृष्टि से तो उसे एक गधे के भी पीछे रहना पड़ेगा।

शरीर से जो श्रम किया जाय उसमें बुद्धि का संमिश्रण करके उसे इस प्रकार करना चाहिए कि सफाई, खूबसूरती एवं अच्छाई उसमें से टपक पड़ रही हो। देखने वाले के मुँह से अनायास ही यह निकल पड़े कि वह कार्य किसी क्रिया कुशल मनुष्य का किया हुआ है। इसके करने में, दिलचस्पी, बुद्धिमानी, चतुरता, मेहनत एवं सुरुचि का समावेश हुआ है। ऐसे ही श्रम “मनुष्य के शारीरिक-श्रम” कहे जाते हैं। जिसमें यह बातें न हो वह पशु का श्रम है। फूहड़पन, अधूरापन, गंदगी, कुरूपता, एवं भूलों की अधिकता से भरे हुए काम मनुष्य के धर्म को लज्जित करने वाले हैं। जो लोग यह कहते हैं कि जितना गुड़ डाला जायगा उतना ही मीठा होगा, हमें कम पारिश्रमिक दिया जायगा तो कम या खराब काम करेंगे, यह तो अपनी ही तीन गुनी हानि हुई। एक तो वैसे ही पैसे कम मिलते थे, दूसरे अपना गौरव कम हुआ, अपनी नालायकी प्रख्यात हुई, तीसरे अपनी आदत खराब हुई, गंदा और भद्दा काम करने के कारण अपनी क्रियाशक्ति कुँठित हुई। जो लोग पूरा और सारा काम करते हैं, बौद्धिक संयोग से मेहनत करते हैं उन्हें उनकी जरूरत आज नहीं तो कल जरूर पूरी मिलेगी। एक नहीं तो दूसरा व्यक्ति उसकी कदर करेगा और अन्ततः दिलचस्पी से काम करने की पूरी-पूरी मजदूरी मिलकर रहेगी।

जो लोग दिमाग से मेहनत करते हैं और अपने बुद्धिबल से बहुत पैसा कमा लेते हैं उन्हें भी शारीरिक परिश्रम की उपेक्षा न करनी चाहिए, उसे तुच्छता एवं घृणा की दृष्टि से न देखना चाहिए। मस्तिष्क का पोषण और विकास करने वाली नाड़ियों का फैलाव समस्त शरीर में विस्तृत हो रहा है। यदि शरीर को क्रियाशील न रखा जाय तो बुद्धि का क्रमिक विकास कुँठित हो जाता है। अस्वस्थ शरीर में रहने वाला मस्तिष्क भी अस्वस्थ हो जाता है। निरन्तर दिमागी काम में जुटे रहने वाले वे लोग जो शारीरिक श्रम से बचे रहते हैं अक्सर मानसिक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। भय, संशय अत्यधिक स्वार्थपरता, अनिद्रा, चिंता, ईर्ष्या, आशंका आदि कई प्रकार के मन के रोग उनके पीछे पड़ जाते हैं। मनोरंजन शारीरिक श्रम द्वारा-मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाले नाड़ी तन्तुओं में सजीवता आती है, चैतन्यता उत्पन्न होती है। यदि ऐसा शारीरिक श्रम न मिले तो वे तन्तु अकड़कर कठोर हो जाते हैं और थोड़े ही दिनों में बुद्धि-बल घटने लगता है। संसार के सभी वह विचारवान पुरुष जो मस्तिष्क से अधिक काम लेते हैं-बौद्धिक परिश्रम ही जिनका प्रधान कार्य है- वे भी अपने बहुमूल्य समय का काफी भाग मनोरंजन परिश्रम में लगाते हैं। बागवानी, बढ़ईगिरी, लुहारी, जिल्दसाजी, सिलाई, टूटी-फूटी चीजों की मरम्मत, चित्रकला, कपड़े धोना, चरखा चलाना जैसे मनोरंजक साथ ही उत्पादक श्रम बुद्धिजीवी लोगों के लिए उतना ही उपयोगी है जितना कि उनका सोचने का श्रम। इन शारीरिक श्रमों का पैसे की दृष्टि से कुछ महत्व नहीं है। एक दो आने का लाभ कोई लाभ नहीं है। इनका मुख्य लाभ यह है कि शरीर और मन के समन्वय का श्रम नाड़ी समूह को सजीव, सतेज और चैतन्य करता है जो उस एक दो आने के उत्पादन की अपेक्षा अनेकों गुना मूल्यवान है।

दंड-बैठक, टहलना, मालिश आदि नियमित व्यायामों का करना आवश्यक एवं उपयोगी है पर उससे भी उपयोगी वे कार्य हैं जो शारीरिक श्रम के साथ-साथ मनोरंजक भी हैं और अपनी तृप्ति का कोई स्मारक उपस्थित करते हैं। ताश, शतरंज जैसे खेलों में शारीरिक श्रम नहीं है और न उस खेल के द्वारा कोई ऐसी वस्तु बनती है जिसे देखकर उस श्रम की सार्थकता, सफलता और सुन्दरता देखी जा सके। ऐसे काम तो बागवानी, बढ़ईगिरी, लुहारी, जिल्दसाजी, सिलाई, मरम्मत, चित्रकला, कपड़े धोना, सफाई करना, चरखा कातना, बुनना, कोई रासायनिक पदार्थ बनाना आदि ही हो सकते हैं। ऐसे श्रम के लिए दैनिक जीवन में अवश्य ही स्थान देना चाहिए। इससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने का लाभ तो है ही, साथ ही दैहिक परिश्रम के प्रति आदर भाव भी उत्पन्न होता है। मेहनत के कामों को हीनता या घृणा की दृष्टि से देखने की जो कुबुद्धि मनुष्य में उपज खड़ी हुई है, उस आसुरी अहंकार से उत्पन्न होने वाली अज्ञानता का भी नाश होता है। जो स्वास्थ्य लाभ की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी है।

समय की बचत, सुविधा या अपव्ययता, व्यापारिक आवश्यकता के लिए नौकरों का श्रम लेने की आवश्यकता है, परन्तु अमीरी के चोचले दिखाने के लिए जो श्रम दूसरों से लिया जाता है वह जीवन को उन्नत बनाने में अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा बाधक होता है। स्नान कराने के लिए नौकर चाहिए, कपड़ा पहनाने के लिए नौकर चाहिए, मुँह पर से मक्खी उड़ाने के लिए नौकर चाहिए, हाथ की छड़ी या थैला ले चलने के लिए नौकर चाहिए, इस प्रकार का नाजुकपन किसी कर्मठ व्यक्ति को शोभा नहीं देता। इसमें अमीरी नहीं झलकती वरन् पैसे का अहंकार टपकता है। रोगी और असमर्थों को छोड़कर शेष सभी को शारीरिक श्रम करना चाहिए। दूसरों के सामने मेहनत करते हुए लजाने की कोई बात नहीं है, यह तो गौरव की बात है। ग्रेट ब्रिटेन के भूतपूर्व सम्राट् एडवर्ड अष्टम (वर्तमान ड्यूक आफ विंडसर) अपने युवराज काल में कोयले की खान में मजदूरों के साथ मेहनत करते थे, मल्लाहों के साथ नाव चलाते थे। बादशाह नासरुद्दीन टोपी सीकर अपनी मजदूरी करते थे। कृष्ण जी ग्वाले का काम करते थे, उनके बड़े भाई बलराम हल चलाते थे। इन कार्यों से उनका गौरव कम नहीं हुआ वरन् बढ़ा। यह उचित मनोवृत्ति हम सबकी होनी चाहिए। परिश्रम करते हुए, अपना बोझा अपने कंधे पर रखकर ले चलते हुए किसी को किसी प्रकार का संकोच नहीं वरन् गौरव अनुभव करना चाहिए।

कई व्यक्ति भूखों मरना, तंगी में रहना, बेकारी भुगतना पसंद करते हैं पर ऐसे कार्य करने को तैयार नहीं होते जो शारीरिक परिश्रम वाले होने के कारण ‘छोटे’ समझे जाते हैं। यह झिझक मिथ्या, अज्ञान-मूलक एवं हानिकारक है। ऐसी झूठी प्रतिष्ठा के मोह में पड़े हुए व्यक्ति अपने बहुमूल्य समय को ही गंवाते रहते हैं और अपनी हानि करते रहते हैं। जिन्हें उन्नति के पथ पर चलना है, उन्हें परिश्रम को अपना अभिन्न मित्र बनाना होता है, परिश्रम ही वह दीपक है जिसके प्रकाश में मनुष्य विकास के मार्ग को प्राप्त करता है। ऐसे सच्चे मित्र से जो व्यक्ति घृणा करता है, उसे साथ रखने में शर्म अनुभव करता है। समझ लीजिए कि ऐसे व्यक्ति ऊंचे न उठ सकेंगे, आगे न बढ़ सकेंगे। बन्दूक पकड़ने में शर्म करने वाला सिपाही युद्ध में मोर्चा फतह नहीं कर सकता और न परिश्रम से झिझकने वाला व्यक्ति जीवन संग्राम में विजय प्राप्त कर सकता है।

स्मरण रखिए परिश्रम ही सम्पूर्ण वैभवों का पिता है। जो जितना ही अधिक परिश्रमी होता वह उतना ही अधिक आनंदित रहेगा। परन्तु हमारे कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक परिश्रम का समान स्थान होना चाहिए, दोनों की महत्ता को समान रूप से समझना चाहिए।


Quotation

जब तक हृदय में स्वार्थपरता रहती है तब तक भगवान से प्रेम नहीं हो सकता।

-स्वामी विवेकानन्द

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प्रार्थना करना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है।

-महात्मा गाँधी


हमारी खुराक क्या हो?

भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने काफी खोज करने के पश्चात् भोजन तालिका प्रकाशित की है जिसमें शरीर की आवश्यकता और भारतीयों की आर्थिक परिस्थिति तथा उपलब्ध भोजन सामग्री का ध्यान रखते हुए यह बताया गया है कि किस प्रकार के लोगों के भोजन में क्या-क्या चीजें रहनी आवश्यक हैं।

प्रकाशित तालिका में दूध के स्थान पर (यदि आदत हो तो) माँस, मछली का भी उल्लेख किया है। पर हम मानते हैं कि भारत में दूध या मट्ठा आसानी से उपलब्ध हो सकता है, इसलिए इसके स्थान पर माँस मछली जैसे अखाद्यों को लेने की आवश्यकता नहीं है। और अखण्ड-ज्योति के पाठकों के लिए तो वह सर्वथा निरर्थक है। इसलिए नीचे की तालिका में माँस मछली का उल्लेख निकाल दिया गया है।

इस तालिका के अनुसार भोजन सामग्री की व्यवस्था करना बहुत उपयोगी है, ऐसा भोजन विशेषज्ञों का मत है। पाठकों को इससे लाभ उठाना चाहिए।

1- घर के अन्दर काम करने वालों के लिए सस्ती खुराक

अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का इत्यादि) 10 औंस

दालें 3 औंस

पत्ते वाली सब्जी- (किसी प्रकार की और सस्ती) 3 औंस

अन्य तरकारियाँ- देसी तोरई, तोरई, अरबी, बैंगन इत्यादि) 6 औंस

तेल खाने वाला 2 औंस

भुने हुए चने 2 औंस

गुड़ 2 औंस

फल (यदि सस्ते हों) 4 औंस

छाछ 8 औंस

इसमें फल शामिल नहीं हैं, इसलिए चौथे दिन एक पाव फल खाये जायें।

2- घर के अन्दर काम करने वालों के लिए बीच की खुराक

अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का इत्यादि) 12 औंस

दालें तथा चना इत्यादि 3 औंस

सब्जी (हर प्रकार के साग और करमकल्ला इत्यादि) 3 औंस

तरकारियाँ (आलू, परवल, गोभी, भिंडी, टमाटर, गाजर, चुकन्दर, शलजम इत्यादि) 6 औंस

तेल (खाने वाला) 1 औंस

घी 1 औंस

फल (केले, आम, पपीते, अमरूद, खरबूजा आदि) 4 औंस

गुड़ 3 औंस

दूध 12 औंस

3- किसानों के लिए सस्ती खुराक

अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का) 12 औंस

मोटा अनाज (ज्वार, बाजरा इत्यादि) 4 औंस

दालें (मूँग चना, अरहर इत्यादि) 2 औंस

भुना हुआ चना या चने के अंकुये (नाश्ते में) सब्जी (लाल साग, बथुआ, चने का साग जो जाड़ों में कच्चा खाया जाता है।) 4 औंस

तरकारी (बैंगन, कद्दू, लौकी, भिंडी, अरबी, आलू जब सस्ते हों) 6 औंस

तेल (खाने वाला-आम तौर पर सरसों का तेल खाया जाता है, लेकिन तिली या महुवे का तेल खाने में कोई हानि नहीं) 1 औंस

फल (ककड़ी, खरबूजा, अमरूद, जामुन, आम, पपीता) 4 औंस

छाछ (या दही की लस्सी) 8 औंस

गुड़ 2 औंस

4- कारखानों के मजदूरों के लिए सस्ती खुराक

अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का इत्यादि) 16 औंस

दालें 2 औंस

भुने चने (या भीगे चने-नाश्ते में) 4 औंस

सब्जी (हर प्रकार के साग) 3 औंस

तरकारियाँ (आलू, गाजर, करमकल्ला, भिंडी, बैंगन, कद्दू इत्यादि) 6 औंस

तेल 1 औंस

फल और मसाला (कुचली हुई प्याज, टमाटर, मूली, खीरा, गाजर) 2 औंस

हरी मिर्च (जो ताजे नींबू के रस में भिगोई गई हो इत्यादि) और फल जैसे कि आम, कटहल, जामुन, अमरूद इत्यादि। 2 से 4 औंस तक

दूध 8 औंस

गुड़ 2 औंस

अगर दूध महंगा हो तो दही या मक्खन निकला दूध भी मुनासिब होगा।

5- कलाकारों के लिए अच्छी खुराक

अनाज 16 औंस

दालें 3 औंस

सब्जी 2 औंस

तरकारियाँ 8 औंस

तेल 1 औंस

घी 1 औंस

दूध 1 औंस

फल 4 औंस

मसाले और कच्ची तरकारियाँ (काटी हुई मूली, टमाटर, खीरे इत्यादि) 4 औंस

शक्कर या गुड़ 3 औंस

6- खुराक के उचित सम भाग

अनाज 14 औंस

दालें 3 औंस

सब्जी 8 औंस

दूसरी तरकारियाँ 3 औंस

फल 3 औंस

दूध 10 औंस

शक्कर या गुड़ 2 औंस

तेल, घी इत्यादि 2 औंस

7- गर्भवती स्त्रियों के लिए

अनाज 7 छटाँक

दालें 1 छटाँक

बिना पत्ते की तरकारियाँ (बैंगन, कद्दू, भिंडी, आलू, गाजर, लाल चुलाई, सफेद कद्दू) 3 छटाँक

पत्तेदार सब्जियाँ (बन्दगोभी-सरसों और चने का साग-लाल चुलाई-सेंजन) 2 छटांक

घी या पकाने वाले तेल 1 छटाँक

दूध 8 “

शक्कर या गुड़ 1 “

फल 1 “

8- दूध पिलाने वाली स्त्रियों के लिए

अनाज 7 छटाँक

दालें 1 “

बिना पत्ते की तरकारियाँ 3 “

पत्तेदार सब्जियाँ 2 “

घी या पकाने वाले तेल 1 “

शक्कर या गुड़ 1 “

फल और (नारियल) 2 “

मसाले आवश्यकतानुसार

9- बच्चों के लिए उचित भोजन

2 से 3 वर्ष की आयु के-

दूध 1 छटाँक

शक्कर या गुड़ 1 छटाँक

सब्जियाँ 1 छटाँक

अनाज आधी छटाँक

3 से 4 वर्ष की आयु के-

दूध 2 छटाँक

शक्कर या गुड़ 1 “

सब्जियाँ 1 “

अनाज 1 “

फलों का रस 1 “

5 से 7 वर्ष की आयु के-

अनाज 2 छटाँक

दूध 12”

शक्कर या गुड़ 1 छटाँक

सब्जियाँ 2 छटाँक

फल 1 छटाँक

8 से 12 वर्ष की आयु के-

अनाज 3 से 5 छटाँक

दूध 8 छटाँक

दालें आधी छटाँक

पत्ते वाली सब्जियाँ 1 छटाँक

दूसरी सब्जियाँ 2 छटाँक

फल 1 छटाँक

मक्खन आधी छटाँक

घी या गुड़ 1 छटाँक

12 से 14 वर्ष की आयु के -

अनाज (गेहूँ या चावल) 5 से 6 छटाँक

दालें 1 छटाँक

पत्ते वाली सब्जियाँ 1 छटाँक

बिना पत्ते वाली सब्जियाँ 3 “

कच्ची सब्जियाँ 1 “

मक्खन आधी छटाँक

घी या तेल आधी छटाँक

दूध 8 छटाँक

शक्कर या गुड़ 1 छटाँक

फल 2 छटाँक

(10) खुराक में धातुओं और चिकनाइयों की आवश्यकता और उसे प्राप्त करने के उपाय।

वस्तु जरूरत

लोहा 30 से 40 मिली ग्राम

कैल्शियम 80 से 36 ग्राम तक

फास्फोरस 10 ग्राम

चिकनाई 6 से 7 ग्राम तक

यह कैसे प्राप्त हो सकते हैं।

लोहा- मक्का, अखरोट, मूंगफली, बाजरा, कलेजी, दिल, पट्ठे, गेहूँ, अर्क, जौ, सोयाबीन, पालक।

कैल्शियम - दूध, सब्जियाँ, रोटी

फास्फोरस - मटर, दूध, अनाज।

चिकनाई- मक्खन, गोले का तेल, घी।

नोट- एक ग्राम 3 रत्ती के बराबर है।

एक छटाँक 2 औंस के बराबर है।

खुराक कैसे बेकार जाती है?

1- उस पानी को फेंक देने से जिस में चावल या तरकारियाँ पकाई गई हैं।

2- बहुत ज्यादा पकाने या खुले बर्तनों में पकाने से।

3-सोडा जो धोने में उपयोग होता है-तरकारियों में मिलाने से।

4- जितना खाया जाता है उससे ज्यादा पकाने से ।

5- चावल और अन्य अनाजों को बहुत बारीक पीसने या अधिक साफ करने से।

6- ऐसे छिलके फेंक देने से जो खाये जा सकते हैं।

7- चूहों और कीड़ों के कारण जो अनाज ठीक से नहीं रखा जाता।

8- जितनी आवश्यकता हो उससे अधिक खरीद लेने से।

9- खाने के लिए प्लेटों में अधिक निकाल देने से।

10- बड़ी और शानदार दावत करने से।


“अमृत फल” घर में ही होता है।

(डॉ. विश्वनाथ प्रमद श्रीवास्तव, बस्ती)

किसी मनुष्य को पता चला कि दुनिया में एक अमृतफल है, जिसे मिल जाता है वह तन्दुरुस्त और खुश हो जाता है, ज्यादा उम्र पाता है, अतः उसे अमृतफल पाने का शौक हुआ। आदमी सीधा साधा परन्तु धुन का पक्का था, लोगों से पूछता, क्यों भाई ऐसा फल कहाँ होता होगा अगर मिले तो मैं भी उसे खाऊँ और बहुत दिन जीऊँ। कोई कुछ कहता और कोई कुछ कहता, जितने मुँह उतनी बात, किसी ने साफ नहीं बताया।

लगन बुरी होती है, उसे अमृतफल की लगन लग गई और घर से उसी की तलाश में निकल पड़ा, कोई राजा के बाग में देखने को कहता तो वह राजा महाराजों के बगीचों को ढूंढ़ता फिरता। कभी जंगल पहाड़ खोजता। कोई सुनकर पागल कहता, कोई हंस पड़ता, कोई सोचने लगता कि भगवान की सृष्टि में सब कुछ मुमकिन है। लोगों के ऐसे उत्तरों से वह परेशान हो जाता परन्तु हिम्मत न हारी।

खोजने वाला ही पाता है। खोजते-2 आखिर उसे एक बुजुर्ग बुड्ढा आदमी मिला। “गर्ज वाला बावला” उससे पूँछ बैठा- बाबा आपको मालूम है कि अमृतफल किसके यहाँ है? बूढ़े की कमर झुकी थी बाल बर्फ की तरह सफेद थे, बदन में झुर्रियां पड़ गई थीं। उसने हंस कर कहा कि अमृतफल तो मेरे ही खानदान में है, मुझे तो नहीं मिला परन्तु मेरा बड़ा भाई इसका मालिक है। यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ और पता पूछकर बड़े भाई के घर पहुँचा। वह भी बूढ़ा था और आँखें धंसी व झुर्रियाँ पड़ी थीं परन्तु छोटे भाई से कुछ अच्छा था। बाल अधपके थे सवाल करने पर वह भी मुस्कराया और कहा कि हाँ अमृतफल मेरे ही खानदान मैं है जरूर लेकिन मैं बदनसीब हूँ मेरे हाथ नहीं लगा यह सिर्फ मेरे बड़े भाई को मिला है।

उसे चैन कहाँ? खोजता-खोजता उसके बड़े भाई के पास पहुँचा। वह दोनों से तगड़ा लेकिन आँखों पर ऐनक लगा रखी थी उससे सवाल करने पर बूढ़े ने ऐनक से देखकर वही उत्तर दिया कि मेरा बड़ा भाई अमृतफल का मालिक है। उसकी हैरत बढ़ती ही जाती थी कि सभी अपने बड़े भाई के पास बताते हैं परन्तु उम्र में सभी एक से एक कम मालूम होते जाते हैं। खैर, वह फौरन चल पड़ा और कुछ देर बाद पते पर जा पहुँचा। वहाँ एक मनुष्य मिला जो बिल्कुल नौजवान था। सर के बाल भंवरे की तरह काले थे। रोशन आँखें, सर से पाँव तक सुडौल, कहीं झुर्री का नाम नहीं, वह दरवाजे के अन्दर तख्त पर बैठा हुक्का पी रहा था, इसे मेहमान समझ कर उठा। यथोचित स्वागत सत्कार किया और बातें होने लगीं।

मुसाफिर ने पूछा क्या आपके पास अमृत फल है? बड़े भाई ने हंसते हुए जवाब दिया कि है तो जरूर। मुसाफिर ने कहा- मैं इसी को पाने की इच्छा से हजारों मील से ठोकर खाता तलाश करता यहाँ पहुँचा हूँ, बड़े भाई ने उत्तर दिया कि यह किसी-किसी बड़े अच्छे भाग्य वाले को ही मिलता है सबको नहीं मिलता। परन्तु आप उसे देख सकते हैं, दिखाने में कोई हर्ज नहीं। मुसाफिर ने कहा कि अच्छा कम से कम उसे देख तो लो। बड़े भाई ने कहा इतनी जल्दी क्या है इतने लम्बे सफर से आप आ रहे हैं, जरा आराम करें थकावट दूर होते ही आप बखुशी देखें।

मुसाफिर उसके घर मेहमान हो गया, बड़े भाई ने आवाज दी कि मुन्नू की माँ जरा इधर तो आना, एक खूबसूरत जवान स्त्री इस आवाज के साथ ही हाजिर हुई और हाथ बाँध कर हुक्म के इन्तजार में अदब के साथ खड़ी हो गई। बड़े भाई ने कहा मुन्नू की माँ आज खुशकिस्मती से तुम्हारे घर मेहमान आया है स्नान के लिए गरम पानी दो और अच्छे से अच्छा खाना बनाओ। स्त्री ने जबान तक नहीं खोली और घर में चली गई, मिनटों में ही सब काम खत्म कर लिया, नहाने के कपड़े वगैरह का स्त्री ने खुद ही इन्तजाम कर दिया। बड़े भाई के साथ मुसाफिर चौके में खाने बैठा तो निहायत साफ सुथरा खाना। सुन्दर स्वादिष्ट भोजन ठीक से थाल में सजा कर सामने रख दिया। मेहमान बहुत खुश हुआ और बार-बार मेहमाननवाजी का शुक्रिया अदा करता रहा, बड़ा भाई मुस्कराता ही रहा। मुन्नी की माँ ने हाथ धुलाए और दोनों बैठक में चले गए। इसके बाद मुसाफिर ने अलग पलंग पर आराम किया। इसी प्रकार कई हफ्ते खत्म हो गए मुसाफिर रोज सोचता कि अभी तक बड़े भाई ने अमृत फल नहीं दिखाया। वह जाने की भी सोचता परन्तु इन लोगों की खातिरदारी की खुशी को देखकर जाने के वास्ते कहने की हिम्मत ही न पड़ती।

एक दिन मुसाफिर ने कहा आपने मुझ पर बड़ी मेहरबानी की, इस तरह कोई अपने घर इतने दिन नहीं रहने देता परन्तु आप लोग खातिरदारी से नहीं उकताते। अब मुझे जाना बहुत आवश्यक है और आपने अमृतफल भी अभी तक नहीं दिखाया, जिसकी ख्वाहिश मुझे यहाँ तक खींच लाई है।

बड़े भाई ने कहा यह आप क्या कह रहे हैं। आप रोज अमृतफल देखते हैं और फिर भी इन्कार करते हैं, मैंने तो आपको खूब-खूब दिखाया, दिखाने में कोई कसर नहीं रखी, आपने न पहचाना तो मैं क्या करूं?

मुसाफिर को यह सुनकर बड़ी हैरत हुई और कहा कि भाई न मैंने देखा और न आपने दिखाया, आखिर आप इस तरह क्यों कहते हैं?

बड़ा भाई जोर से कह कहा लगा कर हंसा और मुन्नू की माँ को आवाज दी जरा इधर तो आना, मुसाफिर को अमृतफल दिखाना है।

आवाज के साथ ही स्त्री आ गई। बड़े भाई ने कहा इन्हें अमृतफल दिखाओगी या मैं ही दिखाऊँ, स्त्री शरमा गई और आँचल से मुँह ढांप लिया।

बड़े भाई ने कहा- ‘मुसाफिर यह मुन्नू की माँ ही अमृतफल है जो मेरे हाथ लगी है। यह कई लड़कों की माँ है। 95 वर्ष की हैं मेरी उम्र 83 वर्ष है परन्तु हम दोनों अब तक जवान हैं जब से ब्याह कर आई है इसने एक बात भी ऐसी नहीं की जिससे मेरे दिल को ठेस लगे। तमाम जिन्दगी मुझ से कभी अनबन नहीं हुई ‘यह मेरा अमृतफल हैं’। यह फल जब से मेरे हाथ लगा निहाल हो गया, इसने मेरा चाल-चलन सुधारा, लड़कों की राह पर लगाया, घर को बैकुँठ बना दिया। किसी तरह की तकलीफ नहीं हुई इसकी बरकत से घर में किसी बात की कमी नहीं, मेरे घर को स्वर्ग का नमूना बना दिया। मैं दरख्त हूँ यह बेल हैं जो मुझसे लिपटी रहती है और यह औलाद खिले हुए फूल हैं। क्यों अब आपने देख लिया? घर में नौकर चाकर सब हैं परंतु मेरी खिदमत यह अकेली आप ही करती है। किसी नौकर को मेरी खिदमत का हिस्सेदार नहीं बनाती, और मैं भी हमेशा इसकी मुहब्बत और खिदमत का दम भरता हूँ। तुमने अब भी अमृतफल देखा या नहीं, यही सच्चा अमृतफल है।

मुसाफिर की आँखें खुल गई और इत्मीनान जाहिर किया कि-

औरत अगर हो अच्छी तो घर स्वर्ग धाम है। औरत बुरी तो नर्क का फिर घर मुकाम है॥

औरत अगर है अच्छी तो है मर्द बादशाह।

हासिल है उसको दौलतोजार और मालोजाह॥

औरत अगर है नेक तो सब कुनबा नेक है।

औरत से बढ़ के कीमती कोई नहीं है शेष॥

मुसाफिर ने कहा यह सब तो मैंने खूब समझ लिया लेकिन यह क्या वजह है कि आप सबसे बड़े भाई और यह उम्र, आप छोटे भाई जितने ही छोटे हैं उतने ही ज्यादा उम्र के मालूम पड़ते हैं। भाई ने कहा-अच्छा चलिए यह राज भी जाहिर हो जावेगा। बड़ा भाई मुसाफिर को लेकर छोटे भाई के घर आया और अपने भाई से कहा यह बहुत दूर से आए हैं। मेरे घर कई हफ्ते रहे हैं कुछ दिन तुम भी इन्हें ठहरालो और खातिर कर दो। वह अपने घर में गया स्त्री से कहा कि बड़े भाई के मेहमान भाई के साथ आयें हैं, उन्हें अच्छा-अच्छा खाना दो, दावत करनी है। औरत ने नाराजगी जाहिर की और नाक भौं चढ़ाकर किसी तरह बनाकर पटक कर चलती हुई। दोनों खाना खाकर उससे छोटे भाई के घर गए और वहीं बात पेश की उसकी स्त्री तेज मिज़ाज थी, बोली- “बढ़ा भाई वाला बना है मुसाफिर को घर लाया है, घर में लकड़ी तक नहीं, तुझे चूल्हें में झोंक दूँ या तेरे बड़े भाई को या मुसाफिर को।

खैर, बहुत कहने सुनने के बाद खिचड़ी पकाई और दोनों ने जब्त कर के खाई, फिर सबसे छोटे भाई के भी घर गए और वही दरख्वास्त किया, औरत हाँड़ी में चावल पका रही थी, सुनते ही आग बबूला हो गई और गुस्से में वही हाँड़ी अपने शौहर के सर पर उठा कर पटक दी। हाँडी टूट गई उसका मुँहकड़ा उसके गले में अटक गया, वह इसी तरह हाँड़ी की हंसुली पहने चावल से लथपथ चिल्लाता हुआ बाहर चला आया, और रो रोकर अपनी दर्दनाक कहानी सुनाने लगा। दोनों को उस पर तरस आया और उसकी मलहम पट्टी की और बड़ा भाई 10-5 रुपये देकर मुसाफिर को साथ वापस लाया और कहा देखिए मुझे तो अमृतफल मिला है परन्तु मेरे भाइयों को विष फल मिला है। इसी सबब से वे बूढ़े होते जा रहे हैं। मैं उनकी बराबर मदद करता हूँ लेकिन यह लोग अपनी बीवियों से तंग आ गये हैं और अपनी या अपनी बीवी की मौत का इन्तजार करते हैं- इतना कहकर मुसाफिर को विदा कर दिया। मुसाफिर खुशी-खुशी अपने घर चला आया। वह अमृतफल देखना चाहता था उसने अमृतफल देख लिया।


आत्म निरीक्षण कीजिए।

(ले.- अमरचन्द नाहटा)

पशु-पक्षी और मानव में यदि कोई अन्तर है तो विचार करने की शक्ति का। पशु में विचार करने की शक्ति का तथा विधि विकास न होने के कारण उसकी प्रवृत्ति गतानुगतिक एक दूसरे के अनुकरण रूप ही अधिक नजर आती है। उसमें संशोधन करना, नये-नये तरीके निकालना, विचार के बल पर ही हो सकता है। साधारणतया मानव में भी विचार न करने पर गतानुगतिक प्रवृत्ति ही अधिक पाई जाती है और वास्तव में वह उसमें पशुपन का अवशेष ही समझिये। इसका मतलब वह कभी भी नहीं कि अनुकरण करना बुरा है या नहीं करना चाहिए पर किसी का अनुकरण करना हो तो विचार एवं समझपूर्वक होना चाहिये यही मानवता की कसौटी है। हम कोई भी प्रवृत्ति क्यों कर रहे हैं? इसके लाभालाभ का विचार किए बिना केवल अन्याय कर रहे हैं अतः हम भी करते रहें, यही भावना विकास में आगे बढ़ने में रुकावट डालती है, पर विश्व के प्राणी ऐसे ही अधिक मिलेंगे। इसीलिए “गतानुगतिको लाकः” की उक्ति प्रसिद्धि में आई है। वास्तव में मनुष्य होने के नाते हमें विचारों का विकास करते रहना अत्यन्त आवश्यक है। अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति का चेक-जाँच करते रहना आवश्यक है कि यह क्यों की जा रही है? इससे कितना लाभ व क्या हानि है? इसमें क्या कमी है एवं कैसे सुधार कर अधिक “सत्यं शिवं सुन्दरम्” की प्राप्ति की जा सकती है। इस प्रकार के जाँच पड़ताल ही आत्म निरीक्षण है और प्रत्येक मानव के लिए इसकी उपयोगिता निर्विवाद है।

हम में बहुत सी कमियाँ व दोष हैं, उनमें कभी न होने का प्रधान कारण आत्मनिरीक्षण नहीं करना ही है। वास्तव में उसके अभाव में हम अपने दोषों की ओर ध्यान नहीं देते। हम ओघ संज्ञा से यंत्रवत् क्रिया करते हैं पर उसमें जो दोष व कमियाँ हैं उनका हमें विचार न होने के कारण अनुभव ही नहीं होता। जब किसी दोष को जानते ही नहीं तो उसके सुधार का प्रयत्न होगा ही कहाँ से? हम न करने योग्य काम कर बैठते हैं, नहीं बोलने योग्य बोल देते हैं, नहीं विचारने योग्य बातों की उलझन में फंस अपना अहित कर बैठते हैं। आत्म निरीक्षण द्वारा इन सारी बातों की रोकथाम होती है, अपनी गलती सुधारी जाती है, दोष दूर किये जा सकते हैं, करने योग्य कार्य करने की नई प्रेरणा मिलती है, अतः थोड़ा भी पर नियमित रूप से आत्म निरीक्षण अवश्य करिये।

कोई भी व्यापारी अंधाधुँध व्यापार करता रहता है पर साथ ही उसके लाभ या नुकसान की ओर भी ध्यान रखता है। रोज नहीं, महीने में नहीं तो वर्ष में एक बार खाता तैयार कर आँकड़ा जोड़कर अपने व्यापार का निरीक्षण अवश्य करता है, जो नहीं करता वह सच्चा व्यापारी नहीं है। व्यापारी के लिए हिसाब किताब की जाँच अत्यन्त आवश्यक है। इसके बिना उसका व्यापार चौपट हो जायगा। कौन सा व्यापार करने में कितना नुकसान? हुआ वह क्यों हुआ? जब तक इसका ज्ञान नहीं प्रगति हो ही नहीं सकती। इसी प्रकार हमने इस मानव संसार रूप व्यापार मंडी में आकर क्या अच्छा व बुरा किया, ऊंचे उठे या नीचे गिरे, इसका लेखा-जोखा आत्म-निरीक्षण द्वारा किया जाता है। प्रवाह में न बहकर आत्म निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते जाइये।

हमारे में आज बहिर्मुखी वृत्ति दिनों दिन बढ़ रही है। दूसरों की आलोचना करते रहने के आदी हो गये हैं पर अपने दोषों को जानते हुए भी भुलाने की व्यर्थ कोशिश करते हैं। हमारी कहनी और करनी में बहुत ही विषमता है। मिथ्याचार व ढोंग का ही पोषण हो रहा है। अवगुण दृष्टि ही हमारा अधःपतन कर रही हैं। जो दोष दूसरों में देख रहे हैं वे अपने में भी न्यूनाधिक अंशों में विद्यमान हैं ही, पर आत्म निरीक्षण की प्रवृत्ति न होने से उनकी ओर ध्यान ही नहीं जाता। कभी जाता है तो उसे दोषों में शुमार न कर टाल देने की ही हमारी प्रवृत्ति है।

विश्व के बड़े से बड़े महापुरुषों ने यह गलती की, उन्हें ऐसा करना चाहिए था, वे क्या जानते हैं? इत्यादि तुच्छता सूचक छोटे मुँह बड़ी बात करते हमें तनिक भी संकोच नहीं होता, पर स्वयं करते धरते कुछ नहीं। नित्य प्रातःकाल हम समाचार पत्र पढ़ते हैं, रेडियो सुनते हैं, जगत भर की चिंता हमें लगी है पर अपनी हमें कुछ भी चिन्ता नहीं। विश्व की बातें जानने व बघारने वाले भी अपनी आत्मा के ज्ञान से सर्वथा कोरे हैं। हमारे महर्षियों ने ठीक ही कहा है कि जहाँ तक निज स्वरूप को नहीं जाना, विश्व का ज्ञान संचय करने पर भी तत्वतः कुछ भी नहीं जाना, क्योंकि सारे ज्ञान का मूल उद्देश्य आत्मा को उन्नत बनाना है पर बाह्य ज्ञान तो अहंकार को ही बढ़ाता है। महापुरुषों का यह अनुभव वाक्य भी सोलह आने सही है कि आत्महित में परहित स्वयं हो जाता है। पर केवल परहित में आत्महित होता भी है और नहीं भी होता। अर्थात् सबसे पहला काम आत्म सुधार व आत्मोन्नति है। यदि हम सदाचारी हैं तो जगत को सदाचार के प्रति अपने आचरण द्वारा आप से आप आकर्षित कर रहे हैं, पर केवल दूसरों को लम्बे-लम्बे उपदेश सुनाते हैं वहाँ आत्मवंचना ही पल्ले पड़ती है। अतः आत्म निरीक्षण का अभ्यास डालिये, यही आत्मोत्कर्ष का पहला सोपान है।

दिनभर में आपने क्या-क्या अच्छे व बुरे कर्म किये रात के समय उनको स्मरण कर अपने दोषों को सतर्कता से कम करने का व हटाने का अभ्यास डालिये। आत्म निरीक्षण पण द्वारा आप बहुत सी गलतियों को सुधार सकेंगे व भविष्य में उन्हें करने में असमर्थ हो सकेंगे। गलती करना अपनी कमजोरी है और दूर करने वाले भी हम ही हैं, तो फिर अभी हो तो सुधार के लिए तैयार क्यों न हो जायं।


मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

(श्रीमती ब्रह्मावती देवी जी, वारा)

मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता है, चाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता है, बुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।

जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैं, दुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।

ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनो, जो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।”

हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।

मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलता, यदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।

हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।


Quotation

जो तुम दूसरों से चाहते हो उसे पहले तुम स्वयं करो।

-राम कृष्ण परमहंस


ज्ञानी और अज्ञानी का अन्तर

(साधु वेश में एक पथिक)

जहाँ अज्ञानी वयोवृद्ध होकर भी भाववृत्ति में बालक की भाँति चंचल मति वाला होता है, वहाँ ज्ञानी आयु से बालक होते हुए भी भाव-वृत्ति में वृद्ध की भाँति स्थिर मति वाला होता है।

अज्ञानी दरिद्र होता है, शक्तिहीन रहता है और ज्ञानी परम उदार एवं वास्तविक शक्ति से सम्पन्न होता है।

अज्ञानी जगत प्रपंच का संगी होता है, इसी से दोष युक्त रहता है और ज्ञानी सभी से उपराम होने के कारण असंग स्थिति प्राप्त करता है, इसी से दोषों से मुक्त होता है।

अज्ञानी अपने सम्बन्धियों के मर जाने पर भी सम्बन्ध जीवित रखता है, इसीलिए सम्बन्ध उसे रुलाता रहता है, क्योंकि वह सम्बन्धासक्त है, लेकिन ज्ञानी साँसारिक सम्बन्धियों के रहते हुए भी सम्बन्ध को मिटा देता है, इसी से वह सम्बन्धियों के मर जाने पर शोक नहीं करता, क्योंकि वह विरक्त रहता है।

ज्ञानी उन सभी पदार्थों के प्रति रहने वाली आसक्ति, ममता का पहले ही त्याग कर देता है जो पदार्थ आगे कभी छूट जाने वाले हैं, लेकिन अज्ञानी पदार्थों के छूट जाने पर भी ममत्व बनाये रहता है और दुख भोगता है।

अज्ञानी आसक्ति के कारण जीवन में परतन्त्र रहता है और ज्ञानी विरक्त होने के कारण सदा स्वतन्त्र रहता है। अज्ञानी के अनेकों लक्ष्य होते हैं, लेकिन ज्ञानी का एक ही लक्ष्य होता है। एक अज्ञानी के करोड़ों अभिप्राय हैं और दूसरी ओर देखिये तो करोड़ों ज्ञानियों का एक ही अभिप्राय है, ऐसा किसी सन्त का कथन है।

ज्ञानी पुरुष सच्ची, साध्वी प्रेमिका की तरह केवल एक परम प्रेमास्पद को ही देखता है, उस एक से ही प्रेम करता है और अज्ञानी वेश्या की तरह अनेकों को देखता है, अनेकों से प्रेम करता है।

जगत को देखना ही अनेक को देखना है, अनेक से प्रेम करना है और जगदाधार परम तत्व को जानना ही एक को देखना है, एक से ही प्रेम करना है। अज्ञानी जगत को देखता है, जगत की अनेकता में भूलता है और ज्ञानी जगदाधार एक सत्य को देखता है, उसी परमानन्द स्वरूप सत्य में स्थिर हो रहता है।

अज्ञानी एकाध शुभ कर्मों के बन जाने पर अनेक प्रकार के फलों की कामना करता है और ज्ञानी अनेकानेक शुभ कर्मों को करते हुए एक ही फल चाहता है।

ज्ञानी की दृष्टि में जिस कर्म के अनेक फल हों वह बन्धनकारी कर्म है, जो संसार से बाँधता है। इसीलिए ज्ञानी वही कर्म करता है, जिससे मुक्ति रूपी एक ही फल प्राप्त हो।

अज्ञानी में तप, व्रत, जपादि साधनों से अहंकार की वृद्धि होती है और ज्ञानी में इन शुभ कर्मों से सद्गुण विकास एवं सत्स्वरूप में स्थिति होती है।

अज्ञानी अविचार वश विविध फलों की आशा से सकाम कर्म करते हुए अनेकानेक बन्धन बढ़ाता रहता है, लेकिन ज्ञानी विवेक दृष्टि से निष्काम होकर कर्म बन्धनों से अपने को बचाता रहता है। अज्ञानी में विविध विषयों के द्वारों प्राप्त होने वाले सुखों के प्रति रागवश दुर्गुण पोषित होते रहते हैं और ज्ञानी में विषय विराग होने के कारण अन्तरात्मा के सद्गुण प्रकट होते रहते हैं।

अज्ञानी की दृष्टि जगत के नाम रूपों में ही रहती है और ज्ञानी की विवेक दृष्टि नाम रूपातीत जगदाधार में रहती है। अज्ञानी साँसारिक सुखों के लोभ वश रोगी होता है और ज्ञानी परमार्थ की सिद्धि के लिए त्यागी होता है। अज्ञानी असत् को ही सत् मानता है और ज्ञानी असत् में सत् को जानता है।

अज्ञानी अपने में असत् की स्थापना करता है और स्वयं असत्मय हो जाता है। परन्तु ज्ञानी अपने में से असत् पदार्थों को निकाल देता है और अपने को असत् पदार्थों में से निकाल लेता है।

अमुक पदार्थ अथवा अमुक सम्बन्धी मेरे हैं, ऐसा मानना ही असत् पदार्थों को अपने में रख लेना है, इसी प्रकार देह, मन, बुद्धि आदि के संग से मैं अमुक जाति, वर्ण का, दुःखी, सुखी, मूर्ख या विद्वान हूँ- ऐसा मानना ही अपने को उन पदार्थों में रख देना है। यही अज्ञानी की भूल है।

अमुक पदार्थ या सम्बन्धी मेरे नहीं हैं, इनसे माना हुआ सम्बन्ध है-ऐसा अनुभव करना ही उन पदार्थों को अपने में से निकाल देना है, और देहादिक पदार्थ अथवा मन या बुद्धि के संयोग से मैं दुःखी, सुखी, मूर्ख या विद्वान नहीं-ऐसा देखना ही अपने को इन पदार्थों से निकाल लेना है-यही ज्ञानी का यथार्थ ज्ञान है।

अज्ञानी अपने में दोष रखता है, इसीलिए उसे सर्वत्र दोषी ही दिखते हैं और ज्ञानी अपने में से दोषों को निकाल देता है, इसीलिए उसे कहीं भी दोषी नहीं दिखते। अज्ञानी अपने को दोषियों के बीच में रखता है इसीलिए उसमें दोष आ जाते हैं और ज्ञानी अपने को दोषियों के बीच से निकाल लेता है, इस कारण उसमें दोष नहीं रह जाते।

अज्ञानी अपने अज्ञान के कारण बन्धन में पड़ता है और ज्ञानी अपने यथार्थ ज्ञान के कारण मुक्त हो जाता है।

वासना में आसक्त मनुष्य अज्ञानी है, और वासना से विरक्त ज्ञानी है। अज्ञानी परतन्त्र होकर संसार में भटकता है और ज्ञानी स्वतन्त्र होकर संसार में आनन्दपूर्वक विचरता रहता है।


तेरे नाम का आधार

(ले.- काका कालेलकर)

मनुष्य की दुर्बलता का अनुभव करके हमारे परम कारुणिक साधु संतों ने उद्धार के बहुत से रास्ते ढूँढ़े। अन्त में उन्हें भगवान का नाम मिला। इससे उन्होंने गाया कि-राम नाम ही हमारा आधार है। सब तरह से हारे हुए मनुष्य के लिए बस, राम नाम ही एक तारक मंत्र है। राम नाम यानी श्रद्धा-ईश्वर की मंगलमयता पर श्रद्धा। युक्ति, बुद्धि, कर्म, पुरुषार्थ, सब सत्य हैं, परन्तु अन्त में तो राम नाम ही हमारा आधार है।

लेकिन आजकल का जमाना तो बुद्धि का जमाना कहलाता है। इस तार्किक युग में श्रद्धा का नाम ही कैसे लिया जाए?

सच है कि दुनिया में अबुद्धि और अन्धश्रद्धा का साम्राज्य छाया है। तर्क, युक्ति और बुद्धि की मदद के बिना एक कदम भी नहीं चला जा सकता। बुद्धि की लकड़ी हाथ में लिए बिना छुटकारा ही नहीं। परन्तु बुद्धि अपंगु है। जीवन यात्रा में आखिरी मुकाम तक बुद्धि साथ नहीं देती। बुद्धि में इतनी शक्ति होती तो पण्डित लोग कभी के मोक्ष धाम तक पहुँच चुके होते। जो चीज बुद्धि की कसौटी पर खरी न उतरे, उसे फेंक देना चाहिये। बुद्धि जैसी स्थूल वस्तु के सामने भी जो टिक सके उसकी कीमत ही क्या है? परन्तु जहाँ बुद्धि अपना सर्वस्व खर्च करके थक जाती हैं और कहती है-’न एतदशकं विज्ञातुँ यदेतद्यक्षमिति।’ वहाँ श्रद्धा क्षेत्र शुरू हो जाता है। बुद्धि की मदद से कायर भी मुसाफिरी के लिए निकल पड़ता है। परन्तु जहाँ बुद्धि रुक जाती है, वहाँ आगे पैर कैसे रखा जाय? जो वीर होता है, वही श्रद्धा के पीछे-2 अज्ञान की अंधेरी गुफा में प्रवेश करके उस ‘पुराणह्वरेष्ठ’ को प्राप्त कर सकता है।

बालक की तरह मनुष्य अनुभव की बातें करता है। माना कि, अनुभव कीमती वस्तु है, परन्तु मनुष्य का अनुभव है ही कितना? क्या मनुष्य भूत भविष्य को पार पा चुका है? आत्मा की शक्ति अनन्त है। कुदरत का उत्साह भी अथाह है। केवल अनुभव की पूँजी पर जीवन का जहाज भविष्य में नहीं चलाया जा सकता। प्रेरणा और प्राचीन खोज हमें जहाँ ले जायं, वहाँ जाने की कला हमें सीखनी चाहिए। जल जाय वह अनुभव, धूल पड़े उस अनुभव पर जो हमारी दृष्टि के सामने से श्रद्धा को हटा देता है। दुनिया यदि आज तक बढ़ सकी है तो वह अनुभव या बुद्धि के आधार पर नहीं, परन्तु श्रद्धा के आधार पर ही। इस श्रद्धा का माथा जब तक खाली नहीं होता, जब तक यात्रा में पैर आगे पड़ते ही रहेंगे, तभी तक हमारी दृष्टि अगला रास्ता देख सकेगी और तभी तक दिन के अन्त होने पर आने वाली रात्रि की तरह बार-बार आने वाली निराशा की थकान अपने आप ही उतरती जायगी। इस श्रद्धा को जाग्रत रखने का-इस श्रद्धा की आग पर से राख उड़ाकर इसे हमेशा प्रदीप्त रखने का-एकमात्र उपाय है राम-नाम।

राम-नाम ही हमारे जीवन का साथी और हमारा हाथ पकड़ने वाला परम गुरु है।


वनस्पति घी

(ले.- श्री जे. सी. कुमारप्पा)

आराम पसन्द माताएँ रोते बच्चों को चुप कराने के लिए उनके मुंह में चूसनी दे देती हैं। इस चूसनी से बच्चे को भोजन नहीं मिलता, परन्तु वह समझता है कि दूध पी रहा है। इसी प्रकार वनस्पति घी के प्रयोग करने वाले किसी ऐसी वस्तु का उपयोग करना चाहते हैं, जो घी जैसी दिखायी दे और वनस्पति घी के निर्माता इस प्रकार के लोगों की इच्छा, एक ऐसी वस्तु देकर शान्त कर देते हैं, जो उन्हें घी की पुष्टि तो देती नहीं, परन्तु घी जैसी दिख पड़ती है। माता बच्चे के मुख में चूसनी रखने का उससे कोई मूल्य वसूल नहीं करती, परन्तु वनस्पति घी बनाने और बेचने वाले अपने ग्राहकों से नफा कमा कमाकर मोटे हो रहे हैं। वनस्पति घी तो है ही नहीं। इसमें दूध से बने घी का विटामिन ‘ए’ तत्व भी नहीं है। अधिक से अधिक वनस्पति घी वनस्पति के तेल का ऐसा अपाच्य अथवा दुष्पच विकार है, जिसमें हाइड्रोजन गैस मिलाकर उसे घी के समान जमाने वाला बना दिया गया है। हाइड्रोजिनेशन अर्थात् हाइड्रोजन मिलाने की प्रक्रिया से शुद्ध वनस्पति के तेल में सिवाय उसको घी में मिलावट योग्य बना देने के और कोई गुण उत्पन्न नहीं होता। वनस्पति तेल और घी में बड़ा भेद तो यही है कि घी पशुओं से उत्पन्न होता है और विटामिन ‘ए’ तत्व भी प्रायः जीवों से ही उत्पन्न होता है। अतएव जिन वनस्पति घी में विटामिन होने का दावा किया जाता है, उनमें भी विटामिन ऐसे ही तेलों से प्राप्त करके मिलाया जाता है, जो जीव जन्तुओं के शरीर के अंग होते हैं- जैसे कि शार्क अथवा काड मछली के कलेजे का तेल। हिन्दुस्तान सरीखे निरामिषभोजी देश में जहाँ कि बहुत से लोगों को सिवाय दूध घी इत्यादि के अन्य जीव भोजनों के खाने में भारी परहेज है, वनस्पति घी को बिना उसके विटामिन की प्राप्ति का सूत्र बताये बेचना, जनता के साथ भारी धोखा करना है।

हाट स्प्रिंग्य की न्यूट्रिशन कांफ्रेंस में बतलाता गया था कि विटामिन कन्सेन्ट्रेटों का बहुत उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए यदि वनस्पति घी को काड या शार्क मछली के लिबर ऑयल से प्राप्त विटामिन कान्सेन्ट्रेट द्वारा विटामिन युक्त किया जायगा, तो वह भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा। एक बात और भी है। तेल को हाइड्रोजिनेशन के लिए किसी कैटेलिटिक एजेंट (सहायता वस्तु) की आवश्यकता होती है। वनस्पति घी के निर्माण में साधारणतया कैटेलिटिक एजेंट के रूप में निकल धातु का प्रयोग किया जाता है। और हाइड्रोडनेन्ट किये हुए तेलों में निकल की उपस्थिति पाई भी जाती है। निकल एक ऐसा खनिज पदार्थ है, जिसकी मानव शरीर को बिल्कुल ही आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह अत्यन्त स्वल्प परिणाम में खाया हुआ भी अन्त, में विष सिद्ध होता है। न्यूट्रिशन रिसर्च इन्स्टीट्यूट कूनूर के डायरेक्टर डा. पी. एन. पटवर्धन ने इण्डियन सायंस-काँग्रेस में बतलाया था कि मुझे खोज के पश्चात् ज्ञात हुआ है कि जन्तुओं को शारीरिक बुद्धि और प्रजनन शक्ति पर वनस्पति घी का प्रभाव प्रतिकूल पड़ता है।

जो लोग तेल खाते हैं, उनको भी देश के विविध भागों में राई, तिल और नारियल इत्यादि विविध तेलों के खाने का अभ्यास है। आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शरीर पर सब तेलों का प्रभाव एक सा नहीं पड़ता। अलग-अलग तेल, अलग-अलग गुणकारी अथवा हानिकारक होते हैं। उदाहरणार्थ, बादाम का तेल मस्तिष्क के लिए गुणकारी और शरीर को शक्ति देने वाला माना जाता है। परन्तु मूँगफली का तेल चिकना होते हुए भी मस्तिष्क के लिए हानिकारक माना जाता है। इस दृष्टि से सरसों, तिल और नारियल के तेल मूँगफली के तेल से कहीं बेहतर हैं। वनस्पति घी के अधिकतर कारखाने मुख्यतया मूँगफली और बिनौले के तेलों का प्रयोग करते हैं। ये दोनों तेल घटिया हैं, और इसलिए साधारण तेल के स्थान पर भी यदि वनस्पति घी का उपयोग किया जाय तो उससे उत्कृष्ट वनस्पति तेल का लाभ प्राप्त नहीं होगा। जनता को शुद्ध भोज्य पदार्थ मिलने के लिए जो कानून बनाये गए हैं, उनके द्वारा वनस्पति घी निर्माताओं के लिए यह नियम अनिवार्य कर देना चाहिए कि वे अपने माल के लेबल पर स्पष्ट रूप से यह घोषित करें कि उन्होंने उसे किस तेल से तैयार किया है और उसमें मिलाया हुआ विटामिन किस सूत्र से प्राप्त किया है।

वस्तु स्थिति के उपरोक्त प्रकार होते हुए, हमारी समझ में यह नहीं आता कि साबुन बनाने आदि औद्योगिक प्रयोजनों के अतिरिक्त वनस्पति घी बनाया ही क्यों जाय? वस्तुतः घानी या कोल्हू से निकले हुए वनस्पति तेल सुपाच्य और शुद्धता के लिहाज से वनस्पति घी से कहीं अच्छे हैं, और दूध के घी से तो उसका कोई मुकाबला ही नहीं। फिर भी पूँजीपति लोग हमारे देश की जनता के एक भाग का विशेषतः नागरिक जनता का, शौक पूरा करने और उनकी अज्ञानता का लाभ उठाने के लिए एक-एक कारखाने के पीछे विदेशों से मशीन मंगाने में चार-चार, पाँच-पाँच लाख रुपये तक व्यय कर देते हैं।


स्थायी सफलता का राजमार्ग

(श्री दौलतराम कटरहा बी. ए. दमोह)

जब हम किसी वस्तु की पूरी-पूरी कीमत चुका देते हैं तभी हम उसके पूर्णतया स्वामी होते हैं। उसी तरह जब हमें किसी वस्तु को प्राप्त करने की पूर्ण योग्यता होती है। तभी वह वस्तु हमारे और हमारे अनुगामियों के पास बहुत समय तक टिकती है। ऐसी सफलता को ही हम स्थायी सफलता कह सकते हैं।

संसार के पदार्थों की प्राप्ति के लिए हमें उनके अनुरूप ही पुरुषार्थ प्रकट करना पड़ता है और यह पुरुषार्थ ही हमारी सफलता को स्थिर बनाता है। मान लीजिए किसी परतंत्र राष्ट्र को स्वतन्त्र होना है तो उसे इस कार्य के लिए अपनी अन्तः शक्ति को संगठित करना पड़ेगा, उसे अपनी कमजोरियों को दूर करना पड़ेगा। किन्तु यदि उसे स्वतंत्रता प्राप्ति का यह राजमार्ग स्वीकार न हो और वह बाह्य शक्तियों की सहायता से उसे प्राप्त करना चाहे तो हम कहेंगे कि उस राष्ट्र की वह स्वतंत्रता स्थिर न रहेगी और उस राष्ट्र के पुनः परतंत्र हो जाने की सम्भावना बनी रहेगी।

मनुष्य की उद्देश्य-सिद्धि उसकी कार्य-शक्ति पर निर्भर है। उद्देश्य-सिद्धि उसके जीवन का प्रधान लक्ष्य है किन्तु उसके लिए वह अपनी कार्य-शक्ति का किस तरह प्रयोग करता है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उद्देश्य सिद्धि तब ही स्थायी होगी जब कि उसकी कार्य-शक्ति का उचित प्रयोग होगा। साध्य हमें तब ही सुखदायी हो सकता है जब कि साधन भी न्यायसंगत हो। “येन केन प्रकारेण प्रसिद्धो पुरुषो भवेत्” वाली नीति यहाँ कभी स्थायी सफलता न देगी।

मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।

जिस मनुष्य के हृदय में अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए जितनी अधिक बलवती इच्छा होती है वह मनुष्य अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए उतनी ही तीव्रगति से अग्रसर होता है, किंतु यदि उसे अधर्म में प्रवृत्त नहीं होना है तो उसे अपने आपको तीव्रगति से कर्म में नियोजित करना चाहिए। उसे उद्देश्य को “येन केन प्रकारेण” सिद्ध कर लेने की इच्छा को भी अपने वश में रखना होगा। इच्छा की तीव्रता के कारण अन्याय-पूर्वक सफलता पा लेने के लोभ का भी संवरण करना होगा। जोश के साथ यह होश भी उसे रखना होगा कि कहीं वह अनीति की राह पर न चल पड़े। उसे अपना कार्य भी सिद्ध करना है पर इसके लिए अनीति-पूर्ण, सरल और छोटे मार्ग पर भी नहीं चलना है। उसे अपना इष्ट साधन करना है पर उसमें आसक्त भी नहीं होना है। अतएव उसे अपने उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए केवल इसी शर्त पर आगे बढ़ना चाहिए कि वह केवल न्याय-संगत साधनों का पर उद्देश्य के सरलतापूर्वक मिल जाने पर भी उसे अस्वीकार कर देगा।

सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं। वस्तुतः यदि हम किसी वस्तु को न्याय-पूर्ण तरीकों से प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उसकी प्राप्ति के लिए थोड़ा बहुत योग ही साधना पड़ेगा। प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए हमें संयम करना पड़ता है और संयम करना योग का एक मुख्य अंग है अतएव धर्म-पूर्ण उपायों द्वारा द्रव्योपार्जन करना अथवा अन्य किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न करना भी योग है। इसलिए हमें स्थायी सफलता के लिए धर्म का साथ न छोड़ना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि हिन्दुओं का पूर्वकाल में धर्म-शिक्षा के अनन्तर अर्थ-शास्त्र की शिक्षा देने का तरीका कितना सुन्दर था। तभी हिन्दु धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को एक के बाद एक करतलगत करता चला जाता था।

जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है। स्मरण रखिए कि जिस तरह पतिव्रता स्त्री पति को छोड़ अन्यत्र नहीं रहती उसी तरह लक्ष्मी भी वहीं रहती है जहाँ लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की पूजा होती है।


उपवास का आध्यात्मिक रहस्य

(राजकुमारी श्री रत्नेश कुमारी, मैनपुरी स्टेट)

हिन्दू धर्म में जो कुछ भी परम उपयोगी बातें रखी गई हैं वे केवल मानसिक लाभ के ही लिए नहीं रखी गई वरन् त्रिविधि उन्नति की पावन त्रिवेणी बनाई गई है। जिससे उनका अनुगामी कृतकृत्य हो सकें। उपवास भी उनमें से एक है जो उसे एकाँगी दृष्टिकोण से देखते हैं वे उससे अधूरा ही लाभ उठा पाते हैं। जब हमारे लिए हमारे दूरदर्शी पूर्वज त्रिविधि लाभों की पवित्र त्रिवेणी बना गये फिर भी हम उसका पूरा-2 लाभ उठाने से वंचित रहें तो इसमें दोषी हमारे सिवा कौन है?

शारीरिक उन्नति के विषय में तो प्राकृतिक चिकित्सा के ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। अतः मैं उसके अन्य दो लाभों के ही विषय में आपका ध्यान आकर्षित करूंगी। “उपवास” का शाब्दिक अर्थ है “दूसरे स्थान पर निवास करना” अतएव हमें अपना उपवास तभी सफल मानना चाहिए जब हम जिस शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक स्थिति में हों उससे अधिक श्रेष्ठ स्थिति में पहुँच जायें। इसके लिए यह आवश्यक है कि न तो हम इतना कम ही आहार ग्रहण करें कि हमारा पित्त खराब हो, फलस्वरूप शरीर तथा मन का सन्तुलन बिगड़ जाये और न आहार इतना अधिक ही होना चाहिये कि शरीर पर आलस्य का राज्य हो जाय और मन उच्च विचारों में रमण करने का पूर्ण आनन्द न प्राप्त कर सके। आहार की मात्रा इस कसौटी पर कस कर पाठक स्वयं ही निश्चित कर सकते हैं पर मैं इतना अवश्य कहूँगी कि फल, दुग्ध लेना अन्न की बनिस्बत अधिक अच्छा होगा, यदि वे भी ठूँस-2 कर पेट भर न खाये जायें तो।

जब शरीर और मन में स्फूर्ति शान्ति अर्थात् दोनों की समावस्था होती है तब आध्यात्मिक विचारों में मन सरलता पूर्वक डूब जाता है। इस डुबकी में जो आनन्द मिलता है उसको कह कर नहीं बतलाया जा सकता, आप स्वयं ही सरलतापूर्वक इसको अनुभव कर सकते हैं। आप स्वयं ही अनुभव कर सकेंगे कि इस दिव्य आनन्द के सन्मुख सभी साधारण आनन्द फीके पड़ जाते हैं।

कुछ नियम और भी यदि उपवास में ले लिए जाते हैं तो वह विशेष शक्तिशाली हो जाता है प्रातःकाल के उगते हुए बाल सूर्य को साक्षी करके ये व्रत दृढ़तापूर्वक ग्रहण करना कि-”आज मैं उपवास करूंगा। अर्थात् शरीर तथा मन को शान्त रखूँगा, इष्ट देव तथा आदर्श विचारों का ही चिन्तन करूंगा, सद्ग्रन्थों का ही पठन-पाठन करूंगा, दिन में नहीं सोऊंगा, कुविचारों को मन में स्थान नहीं दूँगा तथा उनको उत्पन्न करने वाले व्यर्थ के वार्तालाप भी नहीं करूंगा।’

इस व्रत संयुक्त उपवास को करने पर आपको इतना आनन्द अनुभव होगा कि मेरा विश्वास है कि आप इसको अपने नित्य की जीवन चर्या में सम्मिलित करने को उत्सुक हो उठेंगे।


लोक मत की अवहेलना

(श्री द्वारिका प्रसाद कटरहा, दमोह)

कोई-कोई लोग कहा करते हैं कि यदि हमारा हृदय शुद्ध है तो दुनिया हमें कुछ भी क्यों न कहा करे हमें उसके अविश्वास, संदेह और दोषारोपण की कुछ भी परवाह नहीं। हम मानते हैं कि इन व्यक्तियों में गंभीर आत्म-विश्वास, चरित्र की दृढ़ता, दृढ़ निश्चय और सत्यता की लगन है और सत्य के पीछे वे लोकमत के सामने नहीं झुकना चाहते, किंतु यदि वे अपना उचित समय देकर लोगों की भ्रमपूर्ण धारणाओं का निवारण कर सकते हैं और इस तरह लोगों का बौद्धिक धरातल थोड़ा बहुत ऊंचा उठाकर अपनी कार्य पद्धति के औचित्य को सिद्ध करते हुए लोकमत को अपने पक्ष में ला सकते हैं तो ऐसा न कर लोकमत की उपेक्षा करते रहने में भारी भूल होगी। यदि हमारा कोई कार्य प्रचलित रीति रिवाजों से कुछ भिन्न है तो यह अवश्य है कि अन्य असहिष्णु व्यक्ति हमारे कार्य की कटु आलोचना करेंगे। इस समय हमें चाहिए कि अपनी तथा समाज की भलाई के लिए हम अपनी स्थिति को स्पष्ट कर दें।

यदि आप किसी नए रास्ते पर चलते हैं और दूसरों को यह संतोष नहीं दिला सकते कि वह रास्ता ठीक है, तो आपका यह कहना कि भले ही समाज उस पर चले अथवा न चले, कम से कम उस रास्ते पर चलने में मुझे बाधा न पहुँचाई जायं तो यह बात समाज को मान्य नहीं हो सकती। भले ही आप समझते है कि आपके उस रास्ते पर चलने में समाज को कोई हानि नहीं होती किंतु आप अपने इस आचरण से समाज के अन्य कोमल प्रकृति के व्यक्तियों को उसी रास्ते पर आने के लिए ललचाते हैं और उन्हें मूक निमन्त्रण देते हैं और इस तरह यह संदेह हो सकता है कि जब आप अपने रास्ते के ठीक होने में संतोषदायक उत्तर नहीं दे सकते तो आपके कारण लोग भटक सकते हैं। चाहे आप अपने मन का प्रचार करें, चाहे न करें, आप जिस मार्ग पर चलते हैं उसका मौन एवं अदृष्ट प्रभाव अन्य लोगों पर पड़ता ही है। जब तक आप जीवित हैं तब तक आपकी प्रत्येक हलचल आकर आपके वातावरण को प्रभावित करेगी ही। प्रभाव की दृष्टि से आप विश्व के एक अविच्छेद्य अंग हैं। आप कितने भी शाँत और अहानिकर क्यों न हों किंतु आपको शून्य मानकर निश्चित नहीं हुआ जा सकता। आप प्रकृति के एक भाग हैं और आपका वातावरण दूसरा भाग और इनमें सदा आदान-प्रदान चलता ही रहता है। अतएव आपको निश्चित रूप से उस रास्ते पर नहीं चलने दिया जा सकता।

समाज एक सूत्र में ग्रथित है। आपको चाहिए कि आप किसी ऐसे विचार को समाज में न छोड़ दें जिसके कि आदि अंत का स्वयं आपको ही पता न हो और जिसके सम्बन्ध में आप अन्य लोगों का उचित समाधान न कर सकते हो। ऐसे उच्छृंखल विचारों को प्रचलित कर आप सामाजिक जीवन को विच्छृंखल बनाते हैं। नयी विचारधारा को जन्म देते समय आपको यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह पुरानी बातों से समस्वरता स्थापित कर ले और उनमें फिट बैठ जायं। ऐसा न हो कि वह विचार-धारा और तत्सम्बन्धी दलीलें हमारे गले ही न उतरें और हमारा जीवन उसकी भयंकर प्रताड़ना से तिल-मिला उठे। चिर परीक्षित प्राचीन मर्यादाओं की शृंखला से असम्बद्ध प्रतीत होने वाली ऐसी अटपटी, असंगत तथा उच्छृंखल विचार-धारा के प्रति समाज अधिक समय तक उदासीन भी नहीं रह सकता। यों तो हमें उस अनोखी विचारधारा के बाह्य स्वरूप को ही समाज के सामने उपस्थित करना पड़ेगा अथवा स्वयं ही उस विचार-धारा को छोड़ देना पड़ेगा। हम निष्कंटक रूप से उस पर नहीं चले जा सकते।

यदि आप कोई नया कार्य करना चाहते हैं तो आपको समाज को साथ लेकर चलना ही पड़ेगा। यदि कोई द्विज अपना पखाना स्वयं ही उठाने को बुरा नहीं समझता तो उसे समाज के कुछ लोगों को समझाकर अपने साथ लेना पड़ेगा। वह यदि अछूतोद्धार करना चाहता है तो भी वह अकेला कुछ नहीं कर सकता। उसे दूसरों को समझाकर अपनी ही विचार-धारा पर लाना होगा। तब कहीं वह अपने कार्य में सफल हो सकता है। यदि आप केवल लोकमत की उपेक्षा करते हैं और लोक को शिक्षा देकर आप उसे सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न नहीं करते तो आपकी यह कार्य प्रणाली केवल विनाशात्मक है। यह तो तोड़-फोड़ की नीति है और इससे तो समाज की बनी बनाई कुछ परिपाटियाँ बिगड़ ही सकती हैं, पर नवीन नहीं बन सकतीं। किंतु हमें तो निर्माण नीति का अवलम्बन करना चाहिए। लोगों के विचारों में क्रान्ति देने वाले स्वयं महात्मा ईसा जैसे महापुरुष ने कहा था कि मैं पुरानी बातों को मेटने नहीं बल्कि उनकी पूर्ति करने आया हूँ। पूर्ति करने में पुरानी वस्तु को थोड़ा बहुत मेट कर परिवर्तन भले ही करना पड़ता है किन्तु उसमें निर्माण के आगे विनाश मात्रा बहुत कम होती है।

लोगों की विचार धारा को सुसंस्कृत बनाने का कोई रचनात्मक प्रयत्न किए बिना लोक मत का तुच्छ गिनना अत्यन्त गलत नीति है। लोक मत की इतनी उपेक्षा सर्वथा हेय है। रचनात्मक कार्य किए बिना विनाशात्मक कार्य-प्रणाली लोक को कभी सहन नहीं हो सकती। यदि आप समाज को अपना रचनात्मक सहयोग नहीं दे सकते तो आपको विनाशात्मक कार्य-पद्धति अपनाने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं हो सकता। रचनात्मक सहयोग न दे सकना, हममें निस्वार्थता की कमी का परिचायक भी हो सकता है। इसका तो यह भी अर्थ हो सकता है कि हम अपने आपको उन्नत बनाने में ही उलझे हुए हैं और सब प्राणियों की उन्नति में अपनी वास्तविक उन्नति नहीं देखते तथा हमारे कार्य क्षेत्र परिधि अत्यंत संकुचित है और हम स्वार्थी हैं।

अपनी नवीन विचार धारा उपस्थित करने के कारण प्रारम्भ में संसार के बड़े-बड़े महापुरुषों को घोर लोक निन्दा का सामना करना पड़ा। पर उससे वे हतप्रभ न हुए उन्होंने लोक-निन्दा की बिल्कुल परवाह न की और सत्पथ से तनिक भी विचलित न हुए। पर इस बेपरवाही का यह मतलब नहीं था कि वे लोक के प्रति अपने कर्त्तव्य से उदासीन रहे। यदि उन्होंने लोक-मत का विरोध किया होता तो साथ-साथ लोक हित के लिए रचनात्मक कार्य भी किया। महात्मा सुकरात, ईसा मुहम्मद और दयानन्द आदि ने लोक को शिक्षित कर उनके बीच में अपने मत का प्रचार किया और आज उनके अनुयायी संसार में करोड़ों पुरुष हैं। अतएव रचनात्मक कार्य करने पर ही लोक-मत की उपेक्षा उचित हो सकती है।

महान पुरुषों की इतनी महती सफलता का कारण उनका गंभीर आत्म-विश्वास और दृढ़ निश्चय है। उसी के बल पर वे लोक-निन्दा के भयंकर आघातों को निरन्तर सहते हुए पर्वत के समान अचल बने रहते हैं। वे बड़े जीवन के आदमी होते हैं और “यद्यपि सत्यं लोक विरुद्धं नहिकरणीयम् नाचरणीयम्” इस नीति के शिक्षा के हामी नहीं होते। वे जिस कार्य को ठीक जान लेते हैं घोर विरोध सहन करते हुए भी उसमें प्रवृत्त होते ही है।

लोक-मत की उपेक्षा न कर जिस बात को हम ठीक समझते हैं उस बात को दूसरों को भी हृदयंगम करा देने के प्रयत्न से एक लाभ और होता है। यदि हमारा मन गलत है अथवा उसमें सुधार की आवश्यकता है तो लोक संपर्क में आने से हमें अपनी भूल समझ में आ जाती है और उसमें समुचित सुधार हो सकता है जो कि लोक-मत और लोक धर्म की उपेक्षा करने पर शायद न हो सकता। इसके अतिरिक्त हमें अपने ज्ञान को कर्म में उतार कर हृदयंगम कर लेने का भी प्रचुर अवकाश मिलता है।


Quotation

जो तुम दूसरों से चाहते हो उसे पहले तुम स्वयं करो।

-रामकृष्ण परमहंस

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पैसे के लालच से किया गया विवाह, विवाह नहीं, एक नीच सौदा है। -महात्मा गाँधी

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शास्त्र का मुख से उच्चारण करना लाभकारी नहीं है। लाभकारी तो शास्त्र पर अमल करना है।

-महात्मा गाँधी

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जो मनुष्य मार कर डर से गाली खा कर बैठा रहता है, वह न तो मनुष्य है और न पशु।

-महात्मा गाँधी


महात्मा गाँधी की अमर वाणी

-जिसका ईश्वर के सिवा और कोई अवलम्ब नहीं, वह जानता ही नहीं कि संसार में पराभव भी कोई चीज है।

-यदि संसार को आत्मा के अस्तित्व का विश्वास हो तो इस बात का सदा ध्यान रहना चाहिए कि शारीरिक बल की अपेक्षा आत्मिक बल कहीं श्रेष्ठ है। यह प्रेम का वह पवित्र सिद्धाँत है जिससे पर्वत हिल जाते हैं।

-प्रायः निर्बल मनुष्य पर बली मनुष्य अत्याचार करते देखे जाते हैं। निर्बल हार जाता है। इससे उसकी कुछ अनीति सिद्ध नहीं होती और न बली ही की नीति सिद्ध होती है। दुराग्रही साधनों का विचार नहीं करता। उसका लक्ष्य योग्य अथवा अयोग्य कारणों से केवल अपनी अभीष्ट सिद्धि की ओर ही रहता है। परन्तु यह तो धर्म नहीं, अधर्म है। धर्म में किसी प्रकार की असत्यता नहीं होती। धर्म का नाम तो प्रेम से, दया से और सत्य से होता है। इसके त्याग से प्राप्त हुआ स्वर्ग भी निन्द्य है।

-जहाँ सत्य है और जहाँ धर्म है केवल वहीं विजय है।

-जिस धर्म में जितनी ही कम हिंसा है समझना चाहिये कि उस धर्म में उतना ही ज्यादा सत्य है। हम अगर भारत का उद्धार कर सकते हैं तो सत्य और अहिंसा ही से कर सकते हैं।

-मेरा विश्वास है कि बिना धर्म का जीवन बिना सिद्धाँत का जीवन होता है, और बिना सिद्धांत का जीवन वैसा ही है जैसा कि बिना पतवार का जहाज। जिस तरह बिना पतवार के जहाज इधर से उधर मारा-मारा फिरेगा ओर कभी उद्दिष्ट स्थान तक नहीं पहुँचेगा, उसी तरह धर्म-हीन मनुष्य भी संसार-सागर में इधर से उधर मारा-मारा और कभी अपने उद्दिष्ट स्थान तक नहीं पहुँचेगा।

-मैंने जीवन का एक सिद्धाँत निश्चित किया है। वह सिद्धाँत यह है कि किसी मनुष्य का चाहे वह कितना ही महान क्यों न हो, कोई काम तब तक कभी सफल और लाभदायक नहीं होगा जब तक उस काम को किसी प्रकार का धार्मिक आश्रय न होगा। यहाँ “धर्म” शब्द से मेरा उस धर्म से तात्पर्य नहीं जिसे आप संसार के समस्त धर्म-ग्रंथों को पढ़ कर सीखेंगे। जिस धर्म से मेरा तात्पर्य है वह वास्तव में मस्तिष्क के द्वारा नहीं ग्रहण किया जा सकता। बल्कि उसका सम्बन्ध हृदय के साथ है। वह एक ऐसी चीज है जो हम पर प्रत्यक्ष तो नहीं होती परन्तु हम से जिसकी सृष्टि होती है वह धर्म सदा हम लोगों के हृदय में रहता है, कुछ लोगों को तो उसके हृदय में रहने का ज्ञान होता है और कुछ लोगों को उसका जरा भी ज्ञान नहीं होता। लेकिन वह हृदय में रहता अवश्य है और इस धर्म भाव को चाहे हम किसी बाहरी सहायता से जाग्रत करें और चाहे आत्मिक उन्नति के द्वारा जाग्रत करें, पर यदि हम किसी काम को उचित रीति से करना चाहें अथवा किसी ऐसे काम को करना चाहें जिसके करने के लिए हमारा विवेक हमें विवश करता हो तो उस दशा में हमें उस धर्म-भाव को जाग्रत करना ही पड़ेगा। हमारे धर्म-शास्त्रों में कुछ ऐसे नियम बतला दिये गये हैं जो जीवन के सत्य सिद्धान्त हैं और जिन्हें हमें मानना ही पड़ता है।

-हम सदाचार द्वारा ईश्वर के कृपा-पात्र हो जायं तो फिर जैसी कि उसने प्रतिज्ञा कर राखी है हमें किसी बात की कमी न होगी। यही सच्चा “धर्म-शास्त्र” है। आप और हम इसे प्रेम पूर्वक अंगीकार करें और अपने दैनिक व्यवहारों में इसका आचरण करें।

-सदाचारी पुरुष ब्रह्मचर्य पालन करते हुए जहाँ तक संभव होगा अपने बल वीर्य की रक्षा करेंगे। वे कभी चोरी न करेंगे, घूस न लेंगे, दूसरों का अथवा अपना समय व्यर्थ न बितावेंगे, अकारण, ‘धन-संचय’ न करेंगे, ऐश-आराम की वृद्धि न करेंगे और आवश्यक वस्तुओं को केवल सुख−चैन के लिए काम में न लावेंगे। वे सादगी से रह कर और इस बात का दृढ़ विश्वास रख कर कि हम शरीर नहीं किन्तु आत्मा हैं और आत्मा को मारने वाला कोई “माई का लाल” संसार में पैदा ही नहीं हुआ, आधि-उपाधि के भय से रहित होकर चक्रवर्ती राजा के वैभव और शान-शौकत से अथवा अभिमान से अन्ध न होकर निर्भयता पूर्वक अपने सारे कार्य करते हैं।

-मेरी दृढ़ धारणा है कि कोई मनुष्य उस समय तक बड़े काम अथवा राष्ट्रोन्नति करने में समर्थ नहीं हो सकता जब तक उसके आचरण सच्चे न हों और उसके वचनों का मूल्य न हो।

-खाने, पीने और वृत्तियों को सन्तुष्ट करने में हम पशुओं के ही समान हैं लेकिन क्या आपने कभी किसी घोड़े या गौ में उतना अधिक चटोरापन देखा है जितना हम लोगों में होता है। क्या आप समझते हैं कि अपने खाद्य पदार्थों की संख्या को उस सीमा तक पहुँचा देना कि जहाँ हमें स्वयं अपनी दशा का भी ज्ञान न हो, वास्तविक जीवन और सभ्यता का चिह्न है।

-खाने और बोलने के सम्बन्ध में जिसने जबान की चंचलता रोक ली उसने मानो सबको अपने वश में कर लिया।

-सत्य बिना मुझे तो सब नीरस मालूम होता है। असत्य से देश का लाभ होता ही नहीं, यह मेरी भावना है। पर कदाचित असत्य से तात्कालिक लाभ दीखता हो तो भी सत्य का त्याग कदापि न करना चाहिए- यह मैं दृढ़ता पूर्वक मानता हूँ।


वैदिक शंखनाद

भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम्।

ऋग्-10-25-1।

“हे प्रभो! तू मेरे अन्दर उत्साह, बल और कर्म को फूँक दे।”

प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु।

उग्राः वः सन्तु बाहवाऽनाधुष्या यथासथ॥

ऋग् 10-103-13

ऐ वीरो! उठो, आगे बढ़ो, विजय प्राप्त करो। तुम्हारी भुजाएं उग्र हों ताकि तुम कभी पराजित न हो सको।

उद्बुध्यध्वं समनसः सखायः

समग्निमिन्ध्वं बहवः रानीडाः।

दधिक्रामग्निमुषसं च देवी-

मिन्द्रावतोऽवसे निहये वः॥

उठो, जागो, हे भाइयो! मनोबल से अनुप्राणित हो जाओ। एक राष्ट्र के वासी तुम सब अपने अन्दर उत्साह की अग्नि को प्रदीप्त करो। तुम्हारी रक्षार्थ मैं उस “अग्नि” का आह्वान करता हूँ, जिसे धारण करते ही मनुष्य क्रियाशील हो उठता है। तुम्हारी रक्षार्थ मैं प्रकाश से जगमगाती हुई उस “उषा” का आह्वान करता हूँ, जिससे जीवन ज्योतिर्मय हो उठता है। अपने जीवनों को ‘अग्निमय’ बनाओ, अपने जीवनों को ज्योतिर्मय बनाओ।

इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं, न स्वप्नाय स्पृहयन्ति। यन्ति प्रमादमतन्द्राः॥ ऋग् 08-2-18

जो व्यक्ति जाग कर शुभ कर्मों में लगता है उसी को देवता चाहते हैं, सोये पड़े रहने वाले से वे प्रीति नहीं करते। अच्छी तरह समझ लो प्रमादी की कोई मदद नहीं करता।


रजत कण

(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)

संसार के दुखों की जड़ तृष्णा है।

प्रतिदिन मनुष्य को कुछ समय आत्म-परीक्षा के लिए अलग निकाल देना चाहिए, जिससे वह विचार कर सके कि उसने कौन सा कर्त्तव्य या कौन सा अकर्त्तव्य किया।

कठिन परिश्रम तथा दैहिक स्वास्थ्य मानसिक शान्ति के लिए अत्यावश्यक है।

हम लोगों को जो कुछ प्राप्त है, उसी में सन्तुष्ट रहना चाहिए। और जो अप्राप्य है, उसके लिए दुख करना वृथा है।

अपना सुधार करो और अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करो।

पर दूषण परखने से कोई सहज कार्य संसार में नहीं और आत्म-अध्ययन से बढ़कर कठिन कार्य भी नहीं।

तुम प्रतिदिन दूसरों के कष्टों का विचार करो, फिर तुम देखोगे कि तुम अपने आपका कष्ट भूल से गये हो।

प्रत्येक मनुष्य में कुछ न कुछ गुण हैं उसी को तुम ढूँढ़ो, उसी से तुम सुखी रहोगे।

हम लोगों को बालकों पर दया करनी चाहिए, क्योंकि वे बच्चे हैं। स्त्रियों को क्षमा करना चाहिए, क्योंकि वे अबला हैं। शासकों पर दया करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें बहुत कुछ निर्णय करना होता है और वे भूल कर सकते हैं। सज्जनों को क्षमा करना चाहिए, क्योंकि उनका अभिप्राय प्रत्येक कार्य में अच्छा ही रहता है। दुर्जन दया के पात्र हैं, क्योंकि उनका भविष्य अंधकार मय है।

‘अहिंसा’ निर्बलता नहीं है। ‘अहिंसा’ हिंसा के भावों का अभाव है। निर्बलता में हिंसा के भाव तो रहते हैं, परन्तु हिंसा के साधन नहीं रहते। इसके विपरीत अहिंसा में चाहे साधन हों या न हों, परन्तु हिंसा के भावों का पूर्ण अभाव रहता है।

जवानों और बुढ़ापे का आधार आयु पर नहीं हृदय पर है।

पाप शीघ्र बढ़ता है, परन्तु पानी के बुलबुलों की भाँति नष्ट भी शीघ्र ही हो जाता है। नेकी देर में फैलती है, परन्तु सदा जिंदा रहती है। काल का भयानक चक्र और बड़ी-बड़ी क्रान्तियाँ उसे मिटा नहीं सकतीं।

जिन गंभीर विषयों पर विद्वान भी कुछ कहते हुए डरेंगे उन्हीं विषयों पर मूर्ख लोग साहस करके खूब बढ़-बढ़ कर बोलेंगे।

भगवान मन को देखते हैं- ‘भावग्राही जनार्दनः’

थोड़ी भी विषय-बुद्धि रह जाती है तो भगवान के दर्शन नहीं होते। दियासलाई की सींक भीग जाय तो कितना ही रगड़ो, जलेगी नहीं। विषयासक्त मन गीली दियासलाई है।

योगी दो प्रकार के होते हैं-व्यक्त और गुप्त। गुप्त योगी गृहस्थी में रहता है पर कोई उसे पहचान नहीं पाता। गृहस्थ मन से त्याग करता है। ऊपरी त्याग से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।


‘क्या जाने’


क्या जाने

(श्री बृजलाल वर्मा)

कर चुका मृत्यु का आलिंगन वह जीवन को क्या पहचाने।

जो दीप शिखा में जला कीट वह अंधकार को क्या जाने॥

वह पक्षी जिसका तड़प-तड़प पिंजरे में जीवन गया बीत,

मीठी-मीठी मादक ध्वनि से फिर गा न सका जो मधुर गीत,

जो बदन बधिक का लख क्षण-क्षण निज श्वासें गिनता हो अधीर,

आघातों से जो विद्ध और जीवन भर जिसने सही पीर,

वह वन प्रदेश में उड़-उड़ कर स्वच्छंद विचरना क्या जाने।

जो दीप शिखा में जला कीट वह अंधकार को क्या जाने

भू शैय्या भी जिसको न मिली पर्यंक शयन की कौन कहे,

करवट ले लेकर ठिठुर-ठिठुर हिम रजनी के खरपात सहे,

जिसका धन बोरे का चादर जिसकी निधि बोरे की गुदड़ी,

टाटों के ही जिसके सुवस्त्र जिसके टाटों की ही पगड़ी,

पट मिला न जीवन भर जिसको वह पाटाम्बर को क्या जाने।

कर चुका मृत्यु का आलिंगन वह जीवन को क्या पहचाने॥

जो खड्ग देख डर गया और गोली की ध्वनि सुनकर चिल्लाया,

जो बर्छी को लख काँप गया, श्रोणित को लख जो घबराया,

प्राणों का है व्यामोह जिसे जिसको प्रिय अति अपना शरीर,

स्वाराधन में जो है विह्वल केवल निज सुख में जो अधीर,

वह दीन दुखी के लिए समर में लड़ कर मरना क्या जाने।

कर चुका मृत्यु का आलिंगन वह जीवन को क्या पहचाने॥

कलियों को पुष्पित होते लख जिसका मन तनिक न मुस्काया,

शशि की उस रजत चन्द्रिका मैं जो मुग्ध न क्षण भर हो पाया,

भर साँस न ली, यद्यपि आया, सुमनों से सुरभि बटोर पवन,

जिसका मन हरण न कर पाये कोकिल, रसाल, सर, वन-उपवन,

आलोकमयी सुषमा को वह जड़-हृदय परखना क्या जाने।

कर चुका मृत्यु का आलिंगन वह जीवन को क्या पहचाने॥

-सहयोगी

*समाप्त*