(श्री नीरज)
मैं अकम्पित दीप प्राणों का लिए-
यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?
बन्द मेरी पुतलियों में रात है।
ह्रास बन बिखरा अधर पर प्रात है।
मैं पपीहा मेघ का, मेरे लिए-
जिन्दगी का नाम ही बरसात है।
साँस में मेरी उनचासा पवन-
यह प्रलय पवमान मेरा क्या करेगा?
यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?
कुछ नहीं डर वायु जो प्रतिकूल है।
और पैरों में कसकता शूल है।
क्योंकि मेरा तो सदा अनुभव यही -
राह पर हर एक काँटा फूल है।
बढ़ रहा जब मैं लिए विश्वास यह-
पंथ फिर वीरान मेरा क्या करेगा?
यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?
मुश्किलें मारग दिखाती हैं मुझे।
आफतें बढ़ना बताती हैं मुझे।
पंथ की उत्तुँग दुर्गम घाटियाँ-
ध्येय-गिरि चढ़ना सिखाती हैं मुझे।
एक भूपर, एक नभ, पग मेरा-
यह पतन उत्थान मेरा क्या करेगा? यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा? -हिन्दुस्तान
यज्ञोपवीत का भारतीय धर्म में सर्वोपरि स्थान है। इसे द्विजत्व का प्रतीक माना गया है। द्विजत्व का अर्थ है-मनुष्यता के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना। जो लोग मनुष्यता की जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार नहीं पाशविक वृत्तियों में इतने जकड़े हुए हैं कि उनको अनुपवीत शब्द से शास्त्रकारों ने तिरस्कृत किया है। और उनके लिए आदेश किया है कि वे आत्मोन्नति करने वाली मण्डली से अपने को पृथक, बहिष्कृत एवं निकृष्ट समझें। ऐसे लोगों को वेद-पाठ, यज्ञ, तप आदि सत्साधनाओं का भी अनधिकारी ठहराया गया है, क्योंकि जिसका आधार ही मजबूत नहीं वह स्वयं खड़ा नहीं रह सकता, जब स्वयं खड़ा नहीं रह सकता तो इन धार्मिक कृत्यों का भार-वहन किस प्रकार कर सकेगा?
भारतीय धर्म शास्त्रों की दृष्टि में मनुष्य का यह आवश्यक कर्त्तव्य है कि वह अनेक योनियों में भ्रमण करने के कारण संचित हुए पाशविक संस्कारों का परिमार्जन करके मनुष्योचित संस्कारों को धारण करे। इस धारण को ही उन्होंने द्विजत्व के नाम से घोषित किया है। कोई भी व्यक्ति जन्म से द्विज नहीं होता, माता के गर्भ से तो सभी शूद्र उत्पन्न होते हैं। शुभ संस्कारों को धारण करने से वे द्विज बनते हैं। महर्षि अत्रि का वचन है- जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्चते। जन्मजात पाशविक संस्कारों को ही यदि कोई मनुष्य धारण किये रहे तो उसे आहार, निद्रा, भय, मैथुन की वृत्तियों में ही उलझा रहना पड़ेगा। कंचन-कामिनी से अधिक ऊँची कोई महत्वाकांक्षा उसके मन में न उठ सकेगी। इस स्थिति से ऊंचा उठना प्रत्येक मनुष्यताभिमानी के लिए आवश्यक है। इस आवश्यकता को ही हमारे प्रातः स्मरणीय ऋषियों ने अपने शब्दों में “उपवीत धारण करने की आवश्यकता” बताया है।
किसी भी दृष्टि से विचार कीजिए, मनुष्य जीवन की महत्ता सब प्रकार असाधारण है। कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद नर देह मिलती है, यदि इसे व्यर्थ गंवा दिया जाये तो पुनः कीट पतंगों की चौरासी लाख योनियों में भटकने के लिए जाना पड़ता है। कहते हैं कि गर्भस्थ बालक जब रौख नरक की यातना से दुखी होकर भगवान से छुटकारे की याचना करता है तो इस शर्त पर छुटकारा मिलता है कि संसार में जाकर जीवन का सदुपयोग किया जायगा। कहते हैं कि मनुष्य की रचना परमात्मा ने इसी उद्देश्य से की कि वह मेरा सर्वश्रेष्ठ उत्तराधिकारी राजकुमार सिद्ध हो और ऐसे कार्य करे जो मेरी महिमा प्रकट करते हों। कहते हैं कि आत्मा का सर्वश्रेष्ठ विकास मानव प्राणी में होता है, इसलिए उसका आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे ईश्वर अंश-जीव-की महानता प्रकट हो। कहते हैं कि एक बार जन्म लेने के पश्चात् कयामत की प्रतीक्षा तक इंसान की रूह को न्याय के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है, फिर कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए दोजख-जन्नत में जाना पड़ता है, इसके पश्चात् तब कहीं पुनर्जन्म होता है। इसलिए इतने दुर्लभ जीवन का ऐसा उपयोग होना चाहिए जिसे सर्वोत्तम कहा जा सके। कहते हैं कि शरीर मर जाता है पर यश अमर रहता है, इसलिए जो व्यक्ति संसार में चिरकाल तक जीना चाहता है या अमर रहना चाहता है उसे चाहिए कि अपने यश को अमर कर जाय। वैज्ञानिक कहते हैं कि शरीर का एक-एक पुर्जा इतना बहुमूल्य है कि उसकी तुलना का कृत्रिम यंत्र करोड़ों रुपये खर्च करने पर भी नहीं बन सकता। और भी न जाने लोग क्या-क्या कहते हैं। दार्शनिकों के, धर्माचार्यों के, मनुष्य जीवन के बारे में अनेक दृष्टिकोण हैं पर उन सभी दृष्टिकोणों का एक ही फलितार्थ निकलता है कि मनुष्य जीवन ऐसी चीज नहीं कि इसे यों ही ज्यों-त्यों करके काट डाला जाय। इसका ऐसा अच्छा उपयोग होना चाहिए जिससे अपने लिए और दूसरों के लिए सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो।
हमारे पूर्वजों ने इस तथ्य को अपनी दूर दृष्टि से, अपने योग बल से, पहले ही भली प्रकार समझ लिया था। उनने चिरकालीन विचार का गम्भीर परीक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला था कि-जन्म से मनुष्य भी अन्य पशु पक्षियों के समान शिश्नोदरपरायण होता है, पेट भरने और क्रीडा करने की ही इच्छाएं उसे प्रधान रूप से सताती हैं, यदि कोई विशेष प्रयत्न करके उसे ऊंचा न उठाया जाय तो वह चाहे कितना ही चतुर क्यों न कहलाये, पाशविक वृत्तियों के आधार पर ही जीवन व्यतीत करेगा। चूँकि इस प्रकार की जीवनचर्या अत्यंत ही तुच्छ और अदूरदर्शितापूर्ण है इसलिए यही कल्याणकर है कि मनुष्यों को इस निम्न धरातल से ऊंचा उठकर उस भूमिका में अपना स्थान बनाना चाहिए जो उच्च है, आदर्शपूर्ण है, धर्ममयी है और अनेक सत्परिणामों को उत्पन्न करने वाली है। चूँकि यह स्थिति जन्मजात पशुवृत्तियों की क्रियाशैली से बहुत भिन्न है, दोनों में आकाश-पाताल का अन्तर है, इसलिए इस एक स्थिति से दूसरी स्थिति में पदार्पण करने की परिवर्तन पद्धति को उपनयन कहा गया है।
देखने में यज्ञोपवीत कुछ लड़ों का एक सूत्र मात्र है जो दाहिने कंधे पर पड़ा रहता है। इसमें स्थूल रूप से कोई विशेषता नहीं मालूम पड़ती। बाजार में दो-दो, चार-चार पैसे के जनेऊ बिकते हैं। स्थूल दृष्टि से यही उसकी कीमत है। तथा मोटे तौर से वह इस बात की पहचान है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों में से किसी वर्ण में इस जनेऊ पहनने वाले का जन्म हुआ है। पर वस्तुतः केवल मात्र इतना ही प्रयोजन उसका नहीं है। उसके पीछे एक जीवित जाग्रत दर्शन-शास्त्र छिपा पड़ा है। जो मानव-जीवन का उत्तम रीति से गठन, निर्माण और विकास कराता हुआ उस स्थान तक ले पहुँचता है जो जीवधारी का चरम लक्ष्य है।
स्थूल दृष्टि से देखने में कई वस्तुएं बहुत ही साधारण प्रतीत होती हैं, पर उनका सूक्ष्म महत्व अत्यन्त ही महत्वपूर्ण होता है, पुस्तकें स्थूल दृष्टि में देखने में छपे हुए कागजों का एक बंडल मात्र हैं जो रद्दी में बेचने पर दो-चार पैसे की ठहरती हैं पर उस पुस्तक में जो ज्ञान भरा हुआ है वह इतना मूल्यवान है कि उसके आधार पर मनुष्य कुछ से कुछ बन जाता है। “विक्टोरिया क्रॉस” जो अंग्रेजी सरकार की ओर से बहादुरी का प्रतिष्ठित पदक दिया जाता था वह लोहे का बना होता था और उसकी बाजारू कीमत मुश्किल से एकाध रुपया होगी पर जो उसे प्राप्त कर लेता था वह अपने आपको धन्य समझता था। परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर जो प्रमाण पत्र मिलते हैं उनके कागज का मूल्य एक दो पैसा ही होगा पर वह कागज कितना मूल्यवान है इसको वह परीक्षोत्तीर्ण छात्र ही जानता है। सरकारी कर्मचारियों के पद की पहचान के लिए धातु के बने अक्षर मिलते हैं जो कंधे या सीने पर कपड़ों में लगा लिए जाते हैं। यह धातु के अक्षर बाजारू कीमत से दो-चार आने के ही हो सकते हैं पर वे कर्मचारी जानते हैं कि उन्हें लगा लेने और उतार देने पर उनको जनता कितने अन्तर से पहचानती है। यज्ञोपवीत भी एक ऐसा ही प्रतीक है जो बाजारू कीमत से भले ही दो-चार पैसे का हो पर उसके पीछे एक महान तत्वज्ञान जुड़ा हुआ है। इसलिए ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि जनेऊ पहनना कंधे पर एक डोरा लटका लेना है, वरन् इस प्रकार सोचना चाहिए कि मनुष्य की दैवी जिम्मेदारियों का एक प्रतीक हमारे कंधे पर अवस्थित है।
पत्थर की प्रतिमा को मध्यस्थ बनाकर हम सर्वव्यापी, अनन्त शक्तियों और गुणों से सम्पन्न परमात्मा को अपने सम्मुख उपस्थित देखते हैं। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है। यद्यपि इस प्रकार की प्रभु पूजा में भावना प्रधान और प्रतिमा गौण है, तो भी प्रतिमा को ही यह श्रेय देना पड़ेगा कि वह भगवान की भावनाओं का उद्रेक और संचार विशेष रूप से हमारे अंतःकरण में करती है। यों कोई चाहे तो चाहे जब, चाहे जहाँ, भगवान को स्मरण कर सकता है, इसमें कोई रोकटोक नहीं। पर मन्दिर से जाकर प्रभु प्रतिमा के सम्मुख अनायास ही जो आनंद प्राप्त होता है वह बिना मंदिर में जाये, चाहे जब कठिनता से ही प्राप्त होगा। गंगा तट पर बैठकर जो पवित्र भावनाएं उत्पन्न होती हैं वे हर स्थान पर मुश्किल से ही हो सकती हैं। इसी प्रकार यद्यपि बिना यज्ञोपवीत धारण किये हुए भी दैवी भावनाएं कोई मनुष्य बेरोक टोक अपने मन में उत्पन्न कर सकता है, पर इस परम पवित्र दिव्य भावना संपन्न सूत्र को माध्यम बनाकर, हर समय कंधे पर धारण किए रह कर, जितना अपने उत्तरदायित्व को स्मरण रखना सुगम है, उतना उसे बिना धारण किए सुगम नहीं। इसी दृष्टि से हमारे आचार्यों ने प्रत्येक भारतीय धर्मावलम्बी को यह आदेश किया था कि वह द्विजत्व की जिम्मेदारी का बोझ अपने कंधे पर अनुभव करे और जिस प्रकार किसी बात को याद रखने के लिए कपड़े में गाँठ लगा कर स्मरण रखने का माध्यम नियुक्त कर लेते हैं, उसी प्रकार कंधे पर यज्ञोपवीत धारण करके सदा इस बात का स्मरण रखें कि हमने शपथपूर्वक दिव्यत्व की, द्विजत्व की, जिम्मेदारी को कंधे पर धारण किया हुआ है।
यह पूछा जाता है-”कि मन में कोई बात हो तो उसी से सब कुछ हो सकता है, इसके लिए बाह्य चिह्न धारण करने की क्या आवश्यकता? जब मन में द्विजत्व ग्रहण करने के भाव मौजूद हों तो उनका होना ही पर्याप्त है फिर यज्ञोपवीत क्यों पहनें? और यदि मन में उस प्रकार की भावना नहीं है तो जनेऊ पहनने से भी कुछ लाभ नहीं?”
मोटे तौर से यह तर्क ठीक प्रतीत होता है, परन्तु जिन्होंने मनुष्य की प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया है वे जानते हैं कि इस तर्क में कितना कम तथ्य है। बुराई की ओर, अधर्म की ओर, पाशविक माँगों के भोगने की ओर, मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति होती है। इस ओर मन अपने आप चलता है, पर उसे त्याग के, संयम के, धर्म के ,मार्ग पर ले चलने के लिए बड़े-बड़े कष्टसाध्य प्रयत्न करने पड़ते हैं। पानी को बहाया जाय तो वह जिधर नीची भूमि होगी बिना किसी प्रयत्न के अपने आप अपना रास्ता बनाता हुआ बहेगा। निचाई जितनी अधिक होगी उतना ही पानी का बहाव तेज होता जायगा। परन्तु यदि पानी को ऊपर चढ़ाना है तो यह कार्य अपने आप नहीं हो सकता, इसके लिए तरह-तरह के साधन जुटाने पड़ेंगे। नल, पम्प, टंकी आदि का कोई माध्यम लगा कर उसके पीछे ऐसी शक्ति का सहयोग करना पड़ता है जिसके दबाव से पानी ऊपर चढ़े। दबाव देने वाली शक्ति तथा पानी को ऊपर ले जाने वाले साधन यदि अच्छे हुए तो वह तेजी से और अधिक मात्रा में ऊपर चढ़ता है, यदि यह साधन निर्बल हुए तो पानी के चढ़ने की गति भी मंद हो जायगी। यही बात जीवन को उच्च मार्ग में लगाने के संबंध में है। यदि धर्म-मार्ग में, सिद्धान्तमय उच्च पथ में प्रगति करनी है तो उसके लिए ऐसे ही प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि पानी को ऊपर चढ़ाने के लिए करने होते हैं। सोलह संस्कार, नाना प्रकार के धार्मिक कर्म-काण्ड, व्रत, जप, तप, पूजा, अनुष्ठान, तीर्थ-यात्रा, दान, पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग ऐसे ही प्रयोजन हैं जिनके द्वारा मन को प्रभावित, अभ्यस्त और संस्कृत बनाकर दिव्यत्व की ओर-द्विजत्व की ओर-बढ़ाया जाता है। इन सब का उद्देश्य केवल मात्र इतना ही है कि मन, पाशविक वृत्तियों से मुड़कर दिव्यत्व की ओर अग्रसर हो। यदि ऐसा करना अपने आप ही, सरलतापूर्वक हुआ होता तो यज्ञोपवीत को व्यर्थ बताने वाले तर्क को स्वीकार करने में किसी को कुछ आपत्ति न होती। उस दशा में यह पृथ्वी ब्रह्म लोक होती ओर वैसा समय सतयुग कहा जाता। पर आज तो वैसा नहीं है। हमारे मनों की कुटिलता इतनी बढ़ी हुई है कि आध्यात्मिक साधन करने वाले भी बार-बार पथ भ्रष्ट हो जाते हैं तब ऐसी आशा रखना कहाँ तक उचित है कि अपने आप ही सब कुछ ठीक हो जायेगा।
यज्ञोपवीत धारण करना इसलिए आवश्यक है कि उससे एक प्रेरणा नियमित रूप से मिलती है। जिनके जिम्मे संसार के बड़े-बड़े कार्य हैं, जिनका जीवन व्यवस्थित है वे सबेरे ही अपना कार्यक्रम बनाकर मेज के सामने लटका लेते हैं और उस तख्ती पर बार-बार निगाह डाल कर अपने कार्यक्रम को यथोचित बनाते रहते हैं। यदि वह याद दिलाने वाली तख्ती न हो तो उनके कार्यक्रम में गड़बड़ पड़ सकती है यद्यपि उस तख्ती का स्वतः कोई बड़ा मूल्य नहीं है पर उसके आधार पर काम करने वाले का अमूल्य समय व्यवस्थित रहता है इसलिए उसका लाभ असाधारण महत्वपूर्ण है और उस महान लाभ का श्रेय उस तख्ती को कम नहीं है। जनेऊ ऐसी ही तख्ती है जो हमारे जीवनोद्देश्य और जीवन क्रम को व्यवस्थित रखने की याद हर घड़ी दिलाती रहती है।
जिन उच्च भावनाओं के साथ, वेदमंत्र के माध्यम से, अग्नि और देवताओं की साक्षी में यज्ञोपवीत धारण किया जाता है उससे मनुष्य के सुप्त मानस पर एक विशेष छाप पड़ती है। “यह सूत्र यज्ञमय एवं अत्यन्त पवित्र है। इसके धारण करने से मेरा शरीर पवित्र है, इसलिए इसे सब प्रकार की अपवित्रताओं से बचाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक गंदगियों से इस दैवी पवित्रता की रक्षा की जानी चाहिए” यह भावना उस व्यक्ति के मन में उठनी ही चाहिए जो जनेऊ धारण करता है। जहाँ इस प्रकार की सात्विक आकाँक्षा होगी वहाँ दैवी शक्तियाँ उसके संकल्प को दूर करने में सहायक होंगी, उसे प्रेरणा और साहस देंगी जहाँ वह फिसलेगा उसे रोकेंगी और यदि गिरेगा भी तो उसे फिर उठावेंगी। इस प्रकार यज्ञ की प्रतिमा-यज्ञोपवीत, धारण करने वाला जब यह समझता रहेगा कि मैंने अपने कंधे और छाती पर यज्ञ भगवान को सुसज्जित कर रखा है तो निश्चित रूप से वह यज्ञमय जीवन व्यतीत करने की आकाँक्षा करेगा। इस प्रकार की आकाँक्षा चाहे कितनी ही मंद क्यों न हो, प्रभु के प्रेरक आशीर्वाद के समय मनुष्य के लिए सदा कल्याणकारी ही होती है और इससे दिन व दिन सन्मार्ग में-कल्याण पथ-में ही प्रगति होती है। यह प्रगति चूँकि ईश्वरीय प्रगति है इसलिए इसके द्वारा प्राणी सब प्रकार की सुख शान्ति का अधिकारी बनता जाता है।
श्रेष्ठता का आचरण पहन लेना, अपने आपको ऐसे पवित्र बंधनों में बाँध लेना है जिनके कारण पतन के गर्त में गिरते-गिरते मनुष्य अनेक बार बच जाता है। बाह्य वेष को देखकर लोग किसी व्यक्ति के बारे में अपना मत बनाते हैं, लोक मत की दृष्टि में कोई व्यक्ति यदि अच्छा बन गया है तो उसे अपनी प्रतिष्ठा का खयाल रहता है। मन विचलित होकर जब कुमार्गगामी होने को तैयार हो जाता है तब लोक लाज एक ऐसा बन्धन, सिद्ध होती है जो उसे गिरते-गिरते बचा लेती है। जिस व्यक्ति ने ब्राह्मण या साधु का वेष बना रखा है, तिलक, जनेऊ माला, कमंडल आदि धारण कर रखे हैं वह सबके सामने निर्भीकतापूर्वक मद्य माँस का सेवन, जुआ, चोरी, व्यभिचार आदि कुकर्म करने में समर्थ न हो सकेगा। करेगा तो बहुत डरता-डरता, छिप कर, अल्प मात्रा में। पर जिन्होंने अपने को प्रत्यक्ष रूप से मद्य-माँस विक्रेता तथा पाप व्यवसायी घोषित कर रखा है उनको इन सब बातों में तनिक भी झिझक नहीं होती, वह इन कर्मों को अधिक मात्रा में करना अपनी अधिक बहादुरी समझते हैं। रामायण में पतिव्रता होने का एक कारण लोक-लाज को भी बताया है। असंख्यों स्त्री-पुरुष मानसिक व्यभिचार में लीन रहते हैं पर लोकलाज वश वे कुमार्ग गामी होने से बच जाते हैं। यज्ञोपवीत श्रेष्ठता का, द्विजत्व का, आदर्शवादी होने का प्रतीक है। यह एक साइनबोर्ड है जो घोषित करता है कि इस जनेऊ पहनने वाले ने कर्त्तव्यमय, धर्ममय जीवन बिताने की प्रतिज्ञा ली हुई है। जो इस प्रकार का साइनबोर्ड कंधे पर धारण किये हुए है उसे अपने मार्ग से विचलित होते हुए झिझक लगेगी, सोचेगा-दुनिया मुझको क्या कहेगी इस प्रकार की लोकलाज बहुत हद तक उसे कुमार्गगामी होने से रोकेगी। वह भूल या पाप करेगा भी तो झिझकते हुए कम मात्रा में करेगा। उतना नहीं कर सकेगा जितना सर्वतन्त्र स्वतंत्र होने पर निर्भय और निर्लज्ज मनुष्य निरंकुशतापूर्वक कुकर्म किया करते हैं।
कई व्यक्ति कहते सुने जाते हैं कि हम आदर्श जीवन, द्विजत्व ग्रहण तो करना चाहते हैं पर इस समय तक हम द्विज बन नहीं सके हैं, इसलिए हम द्विजत्व के प्रतीक यज्ञोपवीत को धारण क्यों करें? यह आशंका भी उचित नहीं, क्योंकि यज्ञोपवीत धारण करने का अर्थ द्विजत्व में प्रवेश करना, आदर्श जीवन व्यतीत करने का व्रत लेन, दिव्यता में प्रवेश करना है। इसका अर्थ यह नहीं कि जिस दिन व्रत लिया जाय उसी दिन वह साधना पूर्ण भी हो जानी चाहिए। इस संसार में सभी प्राणी अपूर्ण और दोष-युक्त हैं। उन दोषों और अपूर्णताओं के कारण ही तो उन्हें शरीर धारण करना पड़ रहा है। जिस दिन वह अपूर्णता दूर हो जायगी, उस दिन शरीर धारण करने की आवश्यकता ही न रहेगी। कोई व्यक्ति चाहे वह कितना ही बड़ा महात्मा क्यों न हो किसी न किसी अंश में अपूर्ण एवं दोषयुक्त है। फिर क्या हम यह कहें कि-जब सारा संसार ही पापी है तो हमारे अकेले धर्मात्मा बनने से क्या लाभ?
हमें इस प्रकार विचार करना चाहिए कि श्रेष्ठता की पाठशाला में प्रवेश करना, द्विजत्व का व्रत लेना ही यज्ञोपवीत धारण करना है। पाठशाला में प्रवेश करने के दिन “पट्टी पूजा” होती है, इसका अर्थ है कि अब उस बालक की नियमित शिक्षा आरम्भ हो गई। विद्या प्राप्त करने का उसने व्रत ले लिया है। यदि कोई विद्यार्थी कहे कि- सरस्वती पूजा का अधिकार तो उसे है जो सरस्वतीवान् हो, पूर्ण विद्वान हो, हम तो अभी दो-चार अक्षर ही जानते हैं फिर सरस्वती पूजा क्यों करें? तो उसका यह प्रश्न असंगत है क्योंकि वह सरस्वती पूजा का अर्थ यह समझा है कि जो पूर्ण सरस्वतीवान् हो जाय उसे ही पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार तो संसार के किसी भी काम को कोई भी व्यक्ति करने का अधिकारी नहीं है। क्योंकि चाहे वह कितना ही अधिक क्यों न जानता हो तो भी किसी न किसी अंश में वह अनजान अवश्य होगा। ऐसा तो कोई भी वकील, डॉक्टर, पंडित, शिल्पकार, गायक तथा अध्यापक न मिलेगा। तो क्या उनके द्वारा किये जाने वाले सब काम रुके ही पड़े रहेंगे?
व्रत लेने का अर्थ ही यह है कि- “अभी यह नहीं किया जा सका था-आगे यह करेंगे।” कोई व्रत लेता है कि मैं नियमित रूप से व्यायाम किया करूंगा, इसका अर्थ है कि वह अब तक ऐसा नहीं करता रहा है, आगे करेगा। जो व्यक्ति सदा से ही नियमित व्यायाम करता है, उसके लिए तो वह एक साधारण, स्वाभाविक दैनिक क्रिया है उसका व्रत लेने की उसे क्या आवश्यकता? इसी प्रकार जो व्यक्ति द्विजत्व में पारंगत नहीं हो सके हैं उन्हें ही यज्ञोपवीत धारण करना आवश्यक है। जब उनका द्विजत्व पुष्ट, परिपक्व और पूर्ण हो जायगा तब फिर उन्हें इसकी कुछ भी आवश्यकता न रहेगी। संन्यास आश्रम में जनेऊ का त्याग कर दिया जाता है, क्योंकि उस स्थिति में पहुँचे हुए व्यक्ति के लिए वह निष्प्रयोजन है। जिस कार्य के लिए उसे धारण किया गया था वह पूरा हो चुका तो व्यर्थ का बोझ क्यों लादा जाय? जो लोग शंका करते हैं कि हम द्विजत्व नहीं हैं, इसलिए हम जनेऊ पहनने का साहस क्यों करें? उन्हें समझना चाहिए कि-”उन्हें इसी कारण यज्ञोपवीत अवश्य पहनना चाहिए क्योंकि उनमें द्विजत्व का अभी पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। इस विकास के लिए ही तो यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है।” क्या कोई पहलवानी का विद्यार्थी ऐसी शंका करता है कि मैं पूर्ण पहलवान नहीं हूँ, इसलिए अखाड़े में क्यों उतरूं? मुद्गर क्यों उठाऊँ? उसे अखाड़े में उतरने और मुद्गर उठाने की इसीलिए आवश्यकता है कि चूँकि वह अभी पूर्ण पहलवान नहीं हो पाया। जब तक पूर्ण पहलवान हो जाएगा तो उसे इन अभ्यासों से छुटकारा भी मिल सकता है। यही बात उपवीत धारण के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।
यज्ञोपवीत धारण करना इस बात का प्रतीक नहीं है कि इस व्यक्ति का पूर्ण आध्यात्मिक विकास हो गया। वरन् इस बात का प्रतीक है कि-इस व्यक्ति ने आदर्श जीवन, धर्ममय जीवन व्यतीत करने का संकल्प किया है और यह अपनी परिस्थिति के अनुसार यथासाध्य अधिक से अधिक प्रयत्न करता हुआ लक्ष्य तक पहुँचने की ईमानदारी के साथ चेष्टा करेगा। ऐसी दशा में यह झिझक करना व्यर्थ है कि हम इस योग्य नहीं कि उपवीत धारण करें। इस अयोग्यता का निवारण उसके धारण करने से ही होगा। जो यह कहता है कि मैं तैर नहीं सकता इसलिए पानी में न घुसूँगा। उसे जानना चाहिए कि पानी में घुसे बिना तैरना नहीं आ सकता। जो कहता है कि-मैं घोड़े पर चढ़ना नहीं जानता इसलिए नहीं चढूँगा, उसे जानना चाहिए कि घोड़े की पीठ पर बैठे बिना वह घुड़सवार नहीं बन सकता। यह ठीक है कि आरम्भ में काफी गलतियाँ भी होती हैं, पर उनका संशोधन तो धीरे-धीरे अभ्यास करने से उस कार्य में लगने से ही तो होगा। ऐसा कोई कायदा इस संसार में नहीं है कि आप किसी कार्य में पूर्ण पारंगत हो जावें तब उस कार्य को आरंभ करें। कार्य को आरंभ करने से ही उसमें कुशलता प्राप्त होती है। जनेऊ धारण करके, जब और द्विजत्व प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ेंगे तभी तो आप धीरे-धीरे इस मंजिल को पार करते हुए एक दिन सच्चे अर्थों में द्विज कहलाने योग्य बनेंगे, तभी तो आपको पूर्ण द्विजत्व की प्राप्ति होगी।
भारतीय धर्म के आचार्यों की आन्तरिक भावना रही है कि भारतमाता के सुपुत्र पाशविक जीवन से, आहार, निद्रा, भय, मैथुन से ऊँचे उठकर ऐसा सैद्धान्तिक जीवन जियें जो उनके गौरव के उपयुक्त हो, जो व्यक्ति और समष्टि में सुख शान्ति का आविर्भाव करता हो, जो आत्मा को परमात्मा तक पहुँचा कर जीवन लक्ष्य की पूर्ति करता हो। इस पशुत्व से देवत्व में परिणित होने की प्रक्रिया को उन्होंने प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी के लिए आवश्यक बताया है और आदेश किया है कि-जन्म से शूद्र उत्पन्न होने वाले, ‘हे मनुष्यों! तुम संस्कार से द्विज बनो।’ पशु योनि से मनुष्य योनि में आना एक बहुत बड़ा सौभाग्य है, पर इससे भी बड़ा सौभाग्य यह है कि अपनी पशु मनोभूमि को देव मनोभूमि में बदल दिया जाय, तभी सच्चे अर्थों में मनुष्य योनि का मिलना कहा जायगा। इस प्रकार का जन्म धर्म द्वारा होता है, संस्कार द्वारा होता है, आदर्श जीवन का व्रत धारण करने से होता है। यही व्रत धारण ‘द्विज’ बनना है यहाँ यज्ञोपवीत धारण करना है। जो इस मार्ग को नहीं अपनाता, जिसकी इस ओर रुचि नहीं है, वह पशु-तुल्य है, ऐसे इन्द्रियपरायण, लोभ-मोह में ग्रस्त, अज्ञानान्धकार में भटकने वाले प्राणियों को हेय दृष्टि से देखा गया है। जिनको आदर्शों से प्रेम नहीं, उनके लिए वे सभी धर्माधिकार, सामाजिक अधिकार, नागरिक अधिकार हिन्दू धर्म ने छीन लिए हैं और उन्हें अस्पर्श्य अन्त्यज कहकर तिरस्कृत किया है। यह अस्पर्श्य अन्त्यज किसी वंश विशेष में उत्पन्न होने के कारण नहीं वरन् कुबुद्धि के कारण होते हैं। जन्म का ब्राह्मण भी यदि कुबुद्धिग्रस्त है, पशुताप्रिय है तो वह भी इसी बहिष्कृत श्रेणी में आवेगा। इसके विपरीत यदि किसी छोटी जाति में उत्पन्न हुआ व्यक्ति उस आदर्शों से प्रभावित है, उस मार्ग पर चलने का व्रत लेता है तो वह द्विज के अतिरिक्त और कौन होगा?
मनुष्यों! अपने साधारण जन्म से सन्तुष्ट न रहो, हमारा धर्म हमें आदेश करता है कि श्रेष्ठ जीवन जियो, देवत्व को प्राप्त करो, नर देह को सफल बनाओ। प्रतिज्ञा करो कि हम उस मार्ग का अवलम्बन करेंगे जो कल्याणकारी है। संकल्प करो कि हम पशुता की गंदगी का परित्याग करके मनुष्यता की सुरभित सुगंध का आस्वादन करेंगे। निश्चय करो कि हमारा लक्ष्य सत्य, शिव और सुन्दर होगा। इन भावों को, अपने द्विजत्व को, पुष्ट और विकसित करने के लिए आपको यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए।
सूचना
यज्ञोपवीत संबंधी दो बड़ी ही महत्वपूर्ण पुस्तकें अखण्ड-ज्योति प्रेस से इसी मास प्रकाशित हुई हैं। (1) भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र यज्ञोपवीत। (2) यज्ञोपवीत से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति। इन पुस्तकों को पाठक अवश्य पढ़े।
(श्री गोपाल प्रसाद बंशी बेतिया)
आनन्द का वास्तविक स्वामी तो कर्त्तव्य पालन और त्याग ही है। यदि हम परमार्थ के लिए कुछ करते हैं अथवा किसी के लिए स्वयं हंसते-हंसते कष्ट झेलते हैं अथवा किसी दीन भिखारी को कुछ दे डालते हैं, तो हमारी आत्मा में कैसा मधुर, सुखकर, शान्त नाद सा होता है कितना आनन्द आता है तब। उस सुख के सम्मुख साँसारिक सुख किस खेत की मूली हो सकते हैं? इसे आत्मिक आनन्द कहते हैं। यही चिरस्थायी कल्याणकारी तथा सदैव सुखकर है।
ईश्वर प्रार्थना का अर्थ है-जगन्नियंता से अपने विकास की याचना। अपनी कमियों की पूर्ति की याचना। हम अनुभव करते हैं कि हमारे अन्दर कई दुर्बलताएँ हैं-कमियाँ हैं। हम अनुभव करते हैं कि उनकी पूर्ति सर्वथा हमारे बस की बात नहीं है। कहीं न कहीं से उनकी पूर्ति होती हुई हम देखते हैं। उसी अवश्य शक्ति का नाम ईश्वर है।
मानव-चरित्र कितना रहस्यमय है। हम दूसरों का अहित करते हुए जरा भी नहीं हिचकते किन्तु जब दूसरों के हाथों हमें कोई हानि पहुँचती है तो हमारा खून खौलने लगता है।
मानव-जीवन अपनी समस्त कला, अपने समस्त वैभव और ऐश्वर्य के साथ अन्त में मृत्यु का आश्रित हो जाता है। मृत्यु जीवन की सबसे अज्ञात पहेली, सबसे अंतिम विजय है।
उद्यम, साहस, धैर्य, बल, बुद्धि और पराक्रम ये छः गुण जिस मनुष्य में हैं, वह सब कुछ पाता है।
(खलील जिब्रान)
कितना विचित्र है जमाना और कितने अनोखे हैं हम!
जमाना बदला और अपने साथ-साथ उसने हमें भी बदला। उसने हमें रास्ता दिखाया और हम भी उसके साथ हो लिये, उसने अपने चेहरे से परदा उठाया ओर हम सब कुछ भूल कर खुशी से फूल उठे।
कल तक हम जमाने से डरते थे और उसकी शिकायत करते थे, लेकिन आज हम उसके मित्र हैं और हम उससे प्रेम करते हैं। इतना ही नहीं हम उसकी गति, चरम सीमा और रहस्यों को समझने लगे हैं।
कल तक हम बचते-बचाते छुपते-छुपाते उन छिपकलियों की तरह रेंगते थे, जो रात की भीषणताओं और दिल के डरों के बीच काँपती हैं। लेकिन आज हम उन पहाड़ी रास्तों में दनदनाते हुए फिरते हैं, जो तेज आँधियों के घात के स्थल और बिजली के स्थान हैं।
कल तक हम खून से गुँधी हुई रोटी खाते और आँसू मिला पानी पीते थे, पर आज हम प्रायः अप्सराओं के हाथ से स्वादिष्ट भोजन खाते और बहार की सुगंधित शराब पीते हैं।
कल तक हम भाग्य के हाथ का खिलौना थे वह शक्ति और सत्ता के नशे में चूर हमें जिस तरह चाहता था नचाता था, पर आज जब उसका नशा उतर चुका है हम उसके साथ खेलते हैं और वह हमारे साथ खेलता है। हम उससे छेड़-छाड़ करते हैं और वह हंसता है। हम उसको रास्ता बताते हैं और वह हमारे पीछे-पीछे चलता है।
कल तक हम मूर्तियों के सामने धूप बत्ती जलाते थे और प्रचंड देवताओं के सामने भेंट चढ़ाते थे लेकिन आज हम अपनी आत्मा के सिवा किसी के सामने धूप नहीं जलाते और अपने आपे के सिवा किसी पर भेंट नहीं चढ़ाते, क्योंकि सबसे बड़े और महान देवता ने हमारे हृदय को अपनी ज्योति से प्रकाशित कर दिया है।
कल तक हम बादशाहों से डरते थे और हमारी गर्दनें उनके सामने झुक जाती थीं लेकिन आज हम सत्य के सिवा किसी के सामने सिर नहीं झुकाते, सौंदर्य के सिवा किसी की आज्ञा नहीं मानते और प्रेम के सिवा किसी चीज के इच्छुक नहीं होते।
कल तक हमारी निगाहें पादरी के चेहरे पर न पड़ सकती थीं और हम ज्योतिषियों को देखते भय खाते थे पर आज जब कि जमाना बदल चुका है, हम सूर्य के सिवा किसी पर निगाह नहीं जमाते, समुद्र के गीत के सिवा और कोई दूसरी आवाज नहीं सुनते।
कल तक हम अपनी आत्मा के महल ढाते थे, जिससे उनकी नींव पर अपने पूर्वजों की कब्रें बनायें, लेकिन आज हमारी आत्मा एक पवित्र वेदी है, जिस के समीप न अतीत की परछाइयाँ आ सकती हैं और न उस मौत की सड़ी-गली अंगुलियाँ ही छू सकती हैं।
कल तक हम विस्मृति के कोनों में छुपे हुए एक मूक विचार थे, लेकिन अब हम एक ऊँची आवाज हैं जो लोक की गहराइयों में हलचल पैदा कर देती है।
पहले हम राख में दबी हुई छोटी सी चिनगारी थे, लेकिन अब हम भड़कती हुई आग हैं, जिसने तलहटियों को चारों तरफ से घेर रखा है।
हमने कितनी रातें खोई हुई मुहब्बत और नष्ट किए हुए अन्न के लिए रोते हुए जागकर काटी हैं। जमीन हमारा बिस्तर थी और बर्फ हमारा लिहाफ। हमने कितने दिन बैठे-बैठे भेड़ों के उस गल्ले की तरह गुजारे हैं जिनका चरवाहा न हो इस हालत में अपनी चिन्ताओं को दाँतों से तोड़ने और अपने विचारों को दाढ़ों से चबाते थे, लेकिन फिर हम भूखे के भूखे और प्यासे के प्यासे ही रहते थे। हम कितनी बार दोनों वक्त मिलते खड़े हुए हैं और इस अवस्था में बीती हुई जवानी का मातम करते थे।
हम अनजान चीज की इच्छा में जान देते थे और अज्ञात कारणों के आधार पर भयभीत होते थे। इस शून्य और अन्धेरे लोक को टकटकी बाँध कर देखते थे और खामोशी और अभाव की चीख-पुकार पर कान लगाते थे।
लेकिन वह जमाना इस तरह गुजर गया, जैसे भेड़िया कब्रिस्तान से गुजर जाता है और जब कि वातावरण भी साफ है और हम भी स्वस्थ हैं, हम अपनी प्रकाशमान रातें शानदार मसहरियों में गुजारते हैं। हम ख्याल से जागते हैं, चिंता के साथ बातें करते हैं और आशाओं से गले मिलते हैं हमारे इर्द-गिर्द आग की चिनगारियाँ भड़कती हैं और हम इन्हें अपनी मजबूत अंगुलियों से पकड़ लेते हैं हम इनसे असंदिग्ध भाषा में बातचीत करते हैं। देवताओं के झुँड के झुँड हमारे पास से गुजरते हैं। और हम इन्हें अपने दिल के शौक से लुभाते और अपनी आत्मा के गीतों से मतवाला बनाते हैं।
हम कल यह थे और आज यह हैं। और यही अपनी सन्तान के लिए देवताओं की इच्छा है। लेकिन ऐ शैतान की संतानों! यह बताओ, अब तुम्हारा इरादा क्या है? जब से तुम जमीन के छिद्रों से निकले हो क्या एक कदम भी तुम ने आगे की तरफ बढ़ाया है जब से शैतानों ने तुम्हारी आंखें खोली हैं, क्या कभी ऊंचाई की तरफ तुमने निगाह उठा कर भी देखा है? जब से साँपों की फुँकार ने तुम्हारे होंठ चूमे हैं, क्या सत्य के लिए तुमने एक बात भी अपनी जबान से निकाली है? जब से मौत ने तुम्हारे कानों में रुई ठूँसी है क्या एक क्षण के लिए भी तुमने यौवन के गीत पर कान लगाये हैं?
सात हजार वर्ष पहले मैंने तुम्हें देखा तो उस वक्त भी तुम कीड़े-मकोड़ों की तरह गुफाओं के कोनों में रेंग रहे थे और अब इतने लम्बे काल के बाद सात मिनट हुए जब मैंने अपनी खिड़की के एक शीशे में से तुम पर निगाह डाली तो अब भी तुम नापाक गलियों में मारे-मारे फिर रहे हो। गुमनामी शैतान तुम्हारा नेतृत्व कर रहे हैं, गुलामी की बेड़ियाँ तुम्हारे पैरों में पड़ी हैं और मौत तुम्हारे सिरों पर मंडरा रही है।
तुम आज भी वही हो, तो कल थे और कल और उसके बाद भी वैसे ही रहोगे, जैसा मैंने शुरू में तुम्हें देखा था।
लेकिन हम कल यह थे और आज भी यह हैं, और यही अपनी संतान के बारे में देवताओं का कानून है।
मगर, ऐ शैतान की संतान! तुम्हारे बारे में शैतान का कानून क्या है?
श्रद्धा का अर्थ आत्म-विश्वास है और आत्म-विश्वास का अर्थ है ईश्वर-विश्वास। जो तमाम विपत्तियों से घिर जाने पर भी विचलित नहीं होता वही सच्चा श्रद्धावान है। -महात्मा गाँधी
*****
जो बुद्धिवाद सर्वज्ञता का दावा करने लगता है उसे भयंकर राक्षस समझना चाहिए। -महात्मा गाँधी
*****
भूल करना मनुष्य का स्वभाव है। अपनी भूल को मंजूर कर लेना और अपने आचरण से दुबारा भूल न होने देना ही सच्ची मर्दानगी है। -महात्मा गाँधी
*****
शरीर को रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं है। -लोकमान्य तिलक
(श्रीमती रत्नेश कुमारी नीराँजना, मैनपुरी)
बच्चे ही राष्ट्र की भावी आशा हैं उनका उपयुक्त विकास हो सके इस महान कार्य में सहायता देना यों तो प्रत्येक नागरिक का साधारण कर्त्तव्य है पर जन्मदाता माता-पिता पर इसके विशेष उत्तरदायित्व का भार रहता है। उन भावी नागरिकों का जीवन-पथ प्रशस्त हो, वे उपयुक्त पाथेय अपने माता-पिता से पा सकें यह उनका जन्म सिद्ध अधिकार है। और उनके माता-पिता की उनके तथा राष्ट्र के प्रति एक महान सेवा है।
पिछले किसी लेख में मैं एक बार विस्तृत विवेचन कर चुकी हूँ कि किस प्रकार क्रोधावेश के खीझ भरे कटु वाक्य उन कोमल मक्खन से हृदयों पर दारुण आघात करके उनकी आशा तथा उत्साह को कुचल डालते हैं फलस्वरूप या तो वे भावी नागरिक निराशा और हीनता के तीव्र भावावेश से ग्रसित होकर सदैव के लिए जीवन समर से मुँह मोड़ लेते हैं। जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य करने योग्य उनके पास साहस, उत्साह तथा धैर्य ही शेष नहीं रह जाता। अशान्ति की गोद में ही वे अपने जीवन की शेष घड़ियाँ अपने को अयोग्य मानते हुए किसी न किसी प्रकार व्यतीत कर डालते हैं।
अथवा यह विद्रोह समाज विरोधी कार्यों में फूट पड़ता है वे सोच लेते हैं वे तो बुरे हैं ही समाज उनको कभी भी अच्छा मान ही नहीं सकता है तो वे अच्छा बनने का व्यर्थ प्रयत्न ही क्यों करें? वे तो वैसे ही काम करेंगे जिनको समाज बुरा मानता है देखें समाज उनको रोक तो ले यह चुनौती देते हुए वे अपने में बड़प्पन की भावना अनुभव करते हैं।
ये दोनों ही रास्ते अपने जीवन की सुख शान्ति को मिटा डालने के मार्ग हैं जिनको कोई भी विवश होकर ही ग्रहण करता है और इस का बहुत कुछ उत्तरदायित्व माता-पिता तथा गुरु पर रहता है।
इस लेख में मैं यह बताने जा रही हूँ कि भावनाओं को दबाने का कैसा कुप्रभाव उन नन्हें-2 सुमनों पर पड़ता है जो कि आपसे उपयुक्त सहायता पाकर जग कानन को सुरभित कर सकते हैं।
बचपन में तीन भावनाएं विशेष रूप से रहती हैं (1) जिज्ञासा, (2) कर्म करने की तीव्र इच्छा, (3) प्रशंसा प्राप्ति की लालसा। जो सहृदय बुद्धिमान जननी-जनक अपने लाडलों की इन मुख्य प्रवृत्तियों को क्रोध अथवा उपेक्षा से कुचलते नहीं हैं वरन् इनका सदुपयोग करते हैं उनके ही बच्चे कार्य- कुशल, बुद्धिमान आत्म-विश्वासी, कर्त्तव्यनिष्ठ, प्रशंसित, धैर्यशाली, साहसी तथा दृढ़ विचारों वाले होते हैं।
यदि बच्चा आपसे किसी विषय में प्रश्न करता है तो उसे न तो झिड़किये और न उसका मजाक ही बनाइये। यदि प्रश्न किसी कठिन विषय पर हो और वह शीघ्रतापूर्वक उसको न समझ सके तो भी झुँझलाइये मत, जितना भी समझा सकें प्यार से समझा दीजिए और कह दीजिये जब तुम जरा और बड़े हो जाओगे तब तुम इसको और भी अच्छी तरह से समझ सकोगे। अगर जिस समय बालक आप से प्रश्न पूछता है, आपको अवकाश नहीं है तो उससे स्नेहपूर्वक ही कह दीजिये कि अमुक समय पर मैं तुमको इस विषय पर समझाऊँगा फिर अपना वायदा अवश्य ही पूरा कीजिए जिससे बच्चा भी आपकी तरह बहानेबाजी न सीख सके।
यदि बच्चा कुछ काम अपने हाथ से करना चाहता है तो उसको रोकिए मत बल्कि उसकी सहायता कीजिए। उसको सुचारु रूप से करना धैर्य तथा प्रेमपूर्वक ही सिखलाइये। यदि काम खतरे का हो जैसे आग चाकू आदि से सम्बन्धित तो बच्चा अगर समझ सकता हो तब तो युक्तिपूर्वक मधुर भाव से उसे समझा दीजिये नहीं तो कोई दूसरी चमकीली चीज देकर बहला दीजिये। यदि कुछ और भी बड़ा हो तो अपने सामने ही सावधानी पूर्वक उसको उनका उपयोग करना बतलाइए इसमें कुछ भी खतरा नहीं होगा पर बालक का आत्म-विश्वास तथा उत्साह अवश्य ही बढ़ेगा।
मेरा तो विचार है कि यदि बच्चे में कर्मप्रियता की भावना कुछ कम भी हो तो भी धीरे-धीरे उसको छोटे-छोटे कामों की मधुरतापूर्वक शिक्षा देकर जैसे अपने जूते के फीते बाँधना, जूते पहनना, कपड़े पहनना, भोजन करना, जल पीना, मुँह धोना इत्यादि-2 अगर कुछ और बड़ा हो तो अपने छोटे भाई या बहिन की सम्हाल करने का भार भी उतनी हद तक डाला जा सकता है जहाँ तक कि उसकी दिलचस्पी और इस विषय में उत्पन्न कर सकें। कोई भी काम विवश करके कठोरता पूर्वक नहीं कराना चाहिये जिससे कि कुसंस्कार पड़े।
जो बच्चे बचपन से ही धीरे-2 काम करने के अभ्यस्त हो जाते हैं उनको फिर नागरिक बनने पर कुछ भी असुविधा नहीं होती वरन् वे प्रत्येक कार्य को प्रसन्नता से तथा सरलतापूर्वक कर लेते हैं। मैंने दो लड़कियों को देखा है जिनमें से एक की माँ ने तो बचपन से ही सारे काम सिखा दिए और दूसरी ने प्यार के मारे उसको कोई भी काम नहीं छूने दिया। वह कर्मशीला तो आदत होने के कारण अपनी ससुराल में भी सारा काम हँसते-हँसते तथा सुन्दर रीत से कर लिया करती थी सब घर वाले उससे खुश रहा करते थे। और दूसरी बेचारी ससुराल में सारे दिन काम में लगी रहती थी पर एक जो अभ्यास न होने से उससे ठीक से बनता ही नहीं था दूसरे आत्म-विश्वास तथा उत्साह न होने से वह शीघ्रतापूर्वक कर भी नहीं पाती थी। अस्तु सारा घर उससे असन्तुष्ट रहा करता था और वह अपना जीवन भार मानती थी।
इस तरह जो लड़के भी बचपन से काम करने के आदी रहते हैं फलस्वरूप उनको कार्यशीलता वयस्क होने पर और भी निरन्तर अभ्यास तथा शक्ति वृद्धि के कारण बढ़ जाती है। उनको कभी भी कार्य करना खलता नहीं बल्कि प्रसन्न चित्त सहज भाव से करते हैं।
कोई भी अच्छा काम बच्चा करे तो प्रशंसा करके उसे उत्साहित अवश्य ही कीजिये। और उसकी योग्यता तथा शक्ति अनुसार अच्छे कार्यों की ओर उसका ध्यान आकर्षित किया करिये। इन्हें पुरस्कार भी दिये जा सकते हैं पर बच्चे के मन पर कार्य की बनिस्बत पुरस्कार का ही महत्व अधिक गहराई से अंकित न होने पाये इसका ध्यान रखिए।
अपनी परिवार रूपी फुलवारी के माली आप ही हैं हर पेड़ पौधे को उचित, परिमित स्थान पर हृदयाकर्षक ढंग से रखिए। दर्शकों की दृष्टि में इसे प्रशंसित रखने का उत्तरदायित्व आप पर ही है इसका भली-भाँति ध्यान रखिए।
सारे धर्म भगवान के चरण हैं, इतना जानने वाला व्यक्ति ही धर्म के रहस्य को जानता है। उसके लिए न पुराण पढ़ने की जरूरत है और न कुरान।
-बिनोवा भावे
*****
कुरान की रु से जहाँ-जहाँ ईश्वर समर्पण है वहाँ-वहाँ इस्लाम है, परधर्मों को कुरान ने कभी बुरा नहीं बतलाया है। इसका दोष तो कुरान को नहीं, उन मुसलमानों को है जो कुरान के उपदेश के खिलाफ आचरण कर रहे हैं। -मुहम्मद अली
*****
स्त्री साक्षात् त्याग मूर्ति है। जब वह किसी काम में जी जान से लग जाती है तो वह पहाड़ को भी हिला देती है। -महात्मा गाँधी
(श्री दौलतराम कटरहा बी. ए.)
मेरे एक मित्र व्यापारी हैं। एक दिन वे शिकायत करने लगे कि क्या करूं इतनी आमदनी पर भी मुश्किल से गुजर होती है। हर महीने करीब पच्चीस तीस रुपए का तो कपड़ा ही खरीदना पड़ता है। दीगर खर्च और भी ज्यादा है। पान-सिगरेट में ही बीस से पच्चीस रुपये माहवार तक का खर्च है। मैंने कहा कि मेरी आय यद्यपि आप से कम है तथापि मुझे पैसे का वैसा कष्ट नहीं होता। उन्हें ताज्जुब हुआ। मैंने कहा बात बिल्कुल सही है। आप एक वस्त्र को महीने दो महीने तक चलाते हैं, मैं उसे सावधानी से रख साल भर चलाता हूँ। आपकी घड़ी साल-साल में बिगड़ती है, मुझे वर्षों उसके पीछे कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। आपके यहाँ चीनी और काँच के अनेकों जोड़ी बर्तन फूटते रहते हैं, वे मेरे पास वर्षों चलते रहते हैं, इस तरह मेरी व्यवहार की वस्तुएं प्रायः आप से कम हैं।
हम लोग समृद्धिशाली जीवन बिताने के लिए सदा लालायित रहते हैं और सोचते हैं कि उस इच्छा की पूर्ति का एकमात्र उपाय है आमदनी की वृद्धि। किन्तु हम इस प्रश्न के दूसरे पहलू पर कभी विचार ही नहीं करते। आमदनी तो आखिर खर्च ही की जाती है तब फिर क्यों न हम अपने खर्च पर नियंत्रण लगावें। खर्च में कमी करना दूसरे रूप में अपनी आमदनी को बढ़ाना ही तो है।
सावधानी-पूर्वक और व्यवस्था-पूर्वक रहना परोक्ष रूप से आमदनी बढ़ाने का सुन्दर तरीका है। व्यवस्थापूर्ण आचरण करने से हमारा जीवन संयमित होता है और संयमित जीवन स्वयं ही एक सुन्दर सम्पत्ति है। व्यवस्थित जीवन बिताना जीवन-कला में दक्षता प्राप्त करना है, अतएव जो लोग इस तरह की डींग हाँकते हैं कि हमारे यहाँ पाँच सौ रुपए महीने का खर्च है वे भले ही ऐसा कह कर अपनी योग्यताओं का प्रमाण देना चाहते हैं कि वे जीवन-कला से निताँत अनभिज्ञ हैं तथा उनका यह बढ़ा हुआ खर्च केवल अन्याय-पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के बल पर ही हो रहा है। वे ऐसे परिग्रह से जिसकी वे आवश्यकता सिद्ध नहीं कर सकते। गाँधी जी के शब्दों में “पड़ोसी को चोरी करने के लालच में फँसाते हैं।” अतः जगत में विषमता फैलती है और लोग उससे होने वाले दुःख भोगते हैं। सामाजिक उथल-पुथल और क्राँतियाँ सब इस विषमता के ही अवश्यम्भावी परिणाम हैं। गाँधी जी के मतानुसार धनी के घर उसके लिए अनावश्यक चीजें भरी रहती हैं, मारी-मारी फिरती हैं, खराब होती रहती हैं, दूसरी ओर उनके अभाव में करोड़ों मनुष्य भटकते हैं, भूखों मरते हैं, जाड़े से ठिठुरते हैं। यदि सब लोग अपनी आवश्यकता भर को ही संग्रह करें तो किसी को तंगी न हो और सबको संतोष रहे। आज तो दोनों ही तंगी अनुभव करते हैं। करोड़पति, अरबपति होने को छटपटाता है। अतः भले ही कोई अपने बढ़े हुए खर्च की चर्चा कर सम्मान पाने और अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने का इच्छुक हो किन्तु मनीषियों की दृष्टि में वह इस तरह सम्मान्य नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी सेवा कर सम्मान्य नहीं बनता। वह सम्मान्य बनता है दूसरों की सेवा करके तथा अपने गुणों से दूसरों को लाभ पहुँचा कर।
पाश्चात्य देशों के लोग भोगवादी हैं। जो जितना ही अधिक भोग भोग सकता है उसे वे उतना ही अधिक योग्य समझते हैं। किन्तु योग्यता की हमारी कसौटी कुछ और ही है। भगवान बुद्ध समझते थे कि मेरी चतुराई इसी में है कि मुझे कम से कम वस्तुओं की आवश्यकता पड़े। जिस महापुरुष ने वासना को ही संसार-मूल मानकर इच्छा के त्याग द्वारा ही निर्वाण प्राप्त करने का मूल-मंत्र संसार को बताया उसके लिए जीवन-कला की यह परिभाषा देना बिल्कुल स्वाभाविक है। भोग-वाद के इस युग में महात्मा गाँधी ने भी हमें यही शिक्षा दी है। वे कहते हैं अनावश्यक कोई भी वस्तु न लेनी चाहिए। एक चीज की जरूरत न होते हुए जिस के अधिकार में वह है उससे, चाहे उसकी आज्ञा लेकर ही लें तो वह भी चोरी होगी।....मुझे अमुक फल की जरूरत नहीं है, फिर भी मैं उसे खाता हूँ, या जरूरत से ज्यादा खाता हूँ, तो यह चोरी है। अतएव “अस्तेय-व्रत पालन करने वाला उत्तरोत्तर अपनी आवश्यकताएं कम करता जायगा।” और मन से भी किसी की चीज को पाने की इच्छा न करेगा क्योंकि किसी की अच्छी चीज को देखकर ललचाना भी मानसिक चोरी है। उस पर जूठी नजर डालना भी चोरी है।
अधिक खर्च करने से जीवन गौरवशाली नहीं होता। अधिक पैदा कर लेना भी योग्यताओं का कोई सच्चा प्रमाण नहीं है प्रत्युत सम्भव है कि आने वाला युग अधिक सम्पत्ति जुटाने वाले व्यक्ति को परिग्रही और चोर समझे। अधिक कमाने वाले को तो लोग आज भी चोरबाजारी कहने के लिए ही उतारू रहते हैं। अतएव अपने व्यवहार की वस्तुओं का अत्यन्त सावधानी से उपयोग करना तथा आवश्यकताओं को उत्तरोत्तर कम करते जाना ही सर्वोत्तम जीवन कला है। कार्य-क्षमता में शिथिलता एवं न्यूनता लाए बिना आवश्यकताओं को कम कर सकने में सचमुच ही बड़ी बुद्धिमानी है। भगवान बुद्ध के पट्ट शिष्य ‘उपस्थाक आनन्द’ ने इस कला को कहाँ तक अपने जीवन में उतार लिया था वह एक छोटे से वृत्तान्त से प्रतीत होगा। आनन्द बिना आवश्यकता के किसी भी वस्तु का प्रतिग्रहण न करते थे और जब भक्तगण उन्हें कुछ देना चाहते तो उनका सदा यही कहना रहता था कि “मेरे पात्र और भिक्षु-वस्त्र पूरे हैं। मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं”। किन्तु जब एक बार उदयन की रानियों ने उन्हें 500 चादरें भेंट कीं तो उदयन को बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा-
आनन्द? आप इतने अधिक चीवरों का क्या करेंगे?
‘महाराज? जो फटे चीवर वाले भिक्षु हैं उन्हें बाँटेंगे।’
‘और जो पुराने चीवर हैं उनका क्या करेंगे?’
‘महाराज! उन्हें बिछौने की चादर बनाएंगे।’
‘भन्ते आनन्द! वह जो पुराने बिछौने की चादर है, उनका क्या करेंगे?’
‘उनसे गद्दे का गिलाफ बनाएंगे।’
‘जो वह पुराने गद्दे के गिलाफ हैं, उनका क्या करेंगे?’
‘उनका फर्श बनाएंगे।’
‘जो वह पुराने फर्श हैं, उनका क्या करेंगे?’
‘उनका पायन्दाज बनाएंगे।’
‘जो वह पुराने पायन्दाज हैं, उनका क्या करेंगे?’
‘उनका झाड़न बनाएंगे।’,
‘जो वह पुराने झाड़न हैं, उनका क्या करेंगे?’
‘उनको कूटकर, कीचड़ के साथ मर्दन कर, पलस्तर करेंगे।’
आनन्द की यह मितव्ययिता हमारे लिए अच्छी मार्ग-प्रदर्शिका हो सकती है। यदि हम इस तरह वस्तुओं का सदुपयोग करना सीखेंगे तो हमारी आवश्यकताओं की भी पूर्ति होगी और धन कमाने के लिए हमें व्यर्थ की ‘हाय हाय’ भी न करनी पड़ेगी। हम संसार में अहिंसक रहकर अपनी आजीविका प्राप्त कर सकेंगे और साथ-साथ जीवन की कला भी सीख जाएंगे। हम इस जीवन के मूल्य को अपनी आमदनी बढ़ाकर उतना नहीं बढ़ा सकते जितना कि आवश्यकताओं और इच्छाओं को कम करके।
(श्री राजा महेन्द्र प्रताप)
आज वह दुनिया नहीं जो पाँच सहस्र वर्ष पहले थी। न आज वह संसार है जो एक हजार बरस पीछे था। पिछले दो सौ साल में हमारे भूमण्डल का रंग ही बदल गया। ऐसे वायु विमान, रेडियो, रेल, तार इत्यादि कहीं इतिहास में नहीं दीखते जहाँ तक दृष्टि काम करती है। पिछले पैंतीस वर्ष में दो महाभारत हुए और दुख के साथ कहना पड़ता है कि तीसरे जगत-व्यापी महायुद्ध की तैयारियाँ जारी हैं। कम्युनिस्टों और धन पूजकों में खींचातानी समस्त संसार में चल रही है। धर्म के नाम पर अभी हमारे देश में सहस्रों स्त्री पुरुष और बालक मार डाले गये। वह हिन्दू मुसलमान जो एक सहस्र वर्ष हिन्दुस्तान में साथ रहे आज एक दूसरे से अलग हो रहे हैं। धर्म के नाम पर प्यारे देश को काट डाला गया। सिख पंथ जो हिन्दू मुसलमानों में मेल कराने को उत्पन्न हुआ था आज आप जुदा हो बैठा है। वह बुद्ध धर्म जो संसार के उद्धार के लिए इस देश में जन्मा था आज यहाँ हिन्दुस्तान में ढूँढ़े नहीं मिलता। ईसाई धर्म कुछ आया पर उसका प्रभाव इस देश में बहुत ही कम है। आज हमारा राज कहता है कि वह दुनियावी है अर्थात् उसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं।
धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता और वह धर्म ही नहीं जो रोटी के प्रश्न को हल न करे। ईसाई धर्म की मुख्य प्रार्थना में जो प्रत्येक ईसाई को प्रतिदिन करनी चाहिए, वह ईश्वर से माँगता है कि हे पिता तू हम को हमारी आवश्यक रोटी देता रह। हम आज धर्म द्वारा ऐसा समाज प्रबंध रच देना चाहते हैं कि कोई भी बिना रोटी के कभी न रहे। सब की धर्म एक ही ईश्वर की इच्छानुसार पैदा हुआ है। उन सबका उद्देश्य मनुष्य की भलाई था। उनके जो विचारों में या क्रियाकाण्ड में अन्तर है वह इसलिए कि वह भिन्न-भिन्न समय में उत्पन्न हुए और उनका जन्म स्थान भी एक न था। एक ही डॉक्टर जैसे समय का, स्थान का विचार करके ही अपनी दवा बताता है इसी प्रकार ईश्वर ने भी धर्म की दारु देते समय वायुमण्डल का लिहाज रखा है। और भिन्न-भिन्न स्थानों के मनुष्यों की प्रकृति का भी ध्यान रखा गया है। आज भी सब मनुष्य एक से नहीं। और इसलिये उनको कुछ भिन्न-भिन्न विचार ही अच्छे लगते हैं।
धर्म के नामों पर लड़कर धर्म को बदनाम मत करिये। धर्म बुराई को मिटाकर मनुष्य को मनुष्य के हितार्थ समयानुसार सच्चे सीधे रास्ते पर चलाने के लिए उत्पन्न हुए थे और आज तक उपस्थित हैं। मनुष्य को लड़ाता है अन्धा स्वार्थ या सामूहिक जातीय मूर्ख विचार। आप देखते हैं प्रति दिन, कैसे वह एक नादान मनुष्य चार पैसे के लिए लड़ कर अपनी जान तक को खो बैठता है।
आज हम धर्मों में मेल कराकर उनकी समस्त शक्ति सब की भलाई में लगाना चाहते हैं। यदि आप अपने ही धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं तो अपने ही धर्म वालों को सच्चे साधु प्रकृति के व्यक्ति बनायें। थोथे ढोल मत पीटिये। और यदि आप हमारी भाँति यह समझ सकते हैं कि प्रत्येक धर्म अपना स्थान रखता है और उसका मनुष्य जीवन में अपना कुछ कर्त्तव्य है तो दूसरे धर्म वालों से मिल कर बुराई के विरुद्ध धर्म युद्ध अथवा जिहाद कीजिये।
वह सब बुराई है जो मनुष्य को दुख देती है अथवा मनुष्य को दुखी बनाती है। उद्देश्य है और अवश्य ही सब धर्म, राजनीति और विद्या का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए-मनुष्य को सुखी बनाना। विद्या आविष्कार करती है। राजनीति ऐसा राज प्रबंध बनाती है कि सब शान्तिपूर्वक रहें, आर्थिक और सामाजिक उन्नति कर सकें। धर्म ऐसा विश्वास उत्पन्न करता है कि मनुष्य भलाई करने को अपना कर्त्तव्य मानता है और दैवी दुर्घटना में भी प्रसन्न रहता है।
आज हम धार्मिक विश्वास के साथ सुखी समाज की रचना करने चले हैं। हमें विश्वास हो गया है कि नया युग आ गया है। आज हम अपनी सारी बुद्धि लगा कर विचारों की खोज करेंगे। उन विचारों को निकाल फेंकेंगे जो बीमारी के कीटाणुओं की भाँति आपस में झगड़े कराकर समाज को रोगी बनाते हैं। यह किसी धर्म या कम्युनिज्म का कसूर नहीं कि हम लड़ते हैं, यह बुराई है अन्याय की और अन्याय से उपजे विचारों की। इसका एक मात्र इलाज है कुटुम्ब व्यवस्था।
प्रत्येक विद्यालय, कारखाना, ग्राम, मोहल्ला नगर, प्रान्त, देश और समस्त संसार कुटुम्ब के सिद्धान्त पर रच दिये जायेंगे। बड़ों का आदर होगा। बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिलेगी। हट्टे कट्टे काम करें। धर्म कुटुम्ब की शिक्षा दें और धर्म राजनैतिक प्रबन्ध ऐसा बनवाये कि कुटुंब प्रथा प्रत्येक जन-समूह में चले और सब समूहों में संघ स्थापित रहे।
यह है हमारी धार्मिक क्रान्ति। कहो कि-आप धार्मिक क्रान्तिकारी हो! आप समस्त देश में कुटुंब प्रथा को चलायेंगे और सर्व संसार में भी कुटुंब प्रथा को ही कायम करेंगे। आप समस्त वर्तमान धर्मों का आदर करते हैं। उनके मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे इत्यादि में एक समान जाकर भजन पूजा कर सकते हैं। आप न पूँजीपतियों के शत्रु हैं और न कम्युनिस्टों के। आप अमरीका की मशीन उन्नति का आदर करते हैं और रूस के नये समाज को भी मित्र भाव सहित अवलोकन करते हैं। आप तो चाहते हैं कि अमरीका, एशिया, यूरोप, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया इत्यादि टापुओं में सब ही स्थान पर कुटुंब प्रथा चले। आपकी किसी से लड़ाई नहीं। कोई व्यक्ति या जन समूह आप का शत्रु नहीं। हम धर्म युद्ध करते हैं और जिहाद करते हैं उन सब बुराइयों के विरुद्ध जो कुटुम्ब प्रथा चलने से रोकती हैं। वह बुराइयाँ आज धर्मों में भी घुसी हुई हैं और राज्यों में भी प्रचलित हैं। हमारे कुछ त्रुटिपूर्ण विचार उन्हीं बुराइयों के कड़वे फल हैं। हम उन विचारों को बदलेंगे।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
हमारे एक मित्र की ऐसी आदत है कि जब तक सब कुछ चीजें यथास्थान न हो, सफाई, शान्ति, और उचित वातावरण न हो, तब तक वे कुछ भी नहीं कर पाते। घर पर आते ही चीजों को इधर-उधर यथा स्थान न पाकर वे बिगड़ उठते हैं, उनकी मानसिक शान्ति विचलित हो उठती है।
इस प्रकार के आदर्शवादी संसार में कम नहीं हैं। वे चाहते हैं कि संसार में उच्चता, पवित्रता, स्वच्छता, शुद्धता एवं शान्ति प्राप्त हो। इनके अभाव में प्रायः क्रुद्ध हुए रहते हैं। उनका मन क्रोध से भरा रहता है। वे परिस्थितियों को दोष देते हैं। कहते हैं “क्या करें, हमें तो अवकाश ही नहीं मिलता। कार्य करें, तो किस प्रकार करें। कभी कुछ हमें उलझाये ही रहता है।” परिस्थितियों की अनुकूलता की ही प्रतीक्षा में से व्यक्ति दिन सप्ताह और वर्ष बरबाद कर रहे हैं।
परिस्थितियों की अनुकूलता की प्रतिज्ञा करते-2 मूल उद्देश्य दूर पड़ा रह जाता है। हमें जीवन में जो कष्ट है, जो हमारा लक्ष्य है, उसे हम परिस्थिति के प्रपंच में पड़ कर विस्मृत कर रहे हैं।
हमने अपनी मनः स्थिति ऐसी संवेदनशील बना ली है कि सूक्ष्म सी बात से ही हम विचलित हो उठते हैं। आदर्श परिस्थितियाँ इस व्यस्त संसार में दुष्प्राय हैं। कुछ न कुछ कमी, कुछ अड़चन, मामूली बीमारियाँ, मौसम का परिवर्तन, भाग्य की करवटें सदा चलती रहेंगी। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती जायेंगी। संभव है वे आपके विपक्ष में हों या आपको प्रतीत हो कि महान संकट आने वाला है, फिर भी हमें अपने मूल उद्देश्य को दृष्टि से दूर नहीं करना चाहिए।
यदि आपके पास कीमती फाउन्टेन पेन नहीं है, बढ़िया कागज और फर्नीचर नहीं है, तो क्या आप कुछ न लिखेंगे? यदि उत्तम वस्त्र नहीं हैं, तो क्या उन्नति नहीं करेंगे? यदि घर में बच्चों ने चीजें अस्त-व्यस्त कर दी हैं, या झाडू नहीं लगा है, तो क्या आप क्रोध में अपनी शक्तियों का अपव्यय करेंगे? यदि आपकी पत्नी के पास उत्तम आभूषण नहीं हैं, तो क्या वे असुन्दर कहलायेंगी या घरेलू शान्ति भंग करेंगी? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी न करेंगे? यदि सब्जी, भोजन, दूध इत्यादि ऊंचे स्टैन्डर्ड का नहीं बना है, तो क्या आप बच्चों की तरह आवेश में भर जायेंगे? नहीं, आपको ऐसा कदापि न करना चाहिए।
परिस्थितियाँ मनुष्य के अपने हाथ की बात है। मन के सामर्थ्य एवं आन्तरिक स्वावलम्बन द्वारा हम उन्हें विनिर्मित करने वाले हैं। हम जैसा चाहें जब चाहें सदैव कर सकते हैं। कोई भी अड़चन हमारे मार्ग में नहीं आ सकती। मन की आन्तरिक सामर्थ्य के सम्मुख प्रतिकूलता बाधक नहीं हो सकती।
सदा जीतने वाला पुरुषार्थी वह है जो सामर्थ्य के अनुसार परिस्थितियों को बदलता है। किन्तु यदि वे बदलती नहीं, तो स्वयं अपने आपको उन्हीं के अनुसार बदल लेता है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में उसकी मनः शान्ति और संतुलन स्थिर रहता है। विषम परिस्थितियों के साथ वह अपने आपको फिट करता चलता है।
निराश न होइए यदि आपके पास बढ़िया मकान, उत्तम वस्त्र, टीपटाप, ऐश्वर्य इत्यादि वस्तुएँ नहीं हैं। ये आपकी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। न जाने मन के किस अतल गह्वर में यह अमूल्य सम्पदा लिपटी पड़ी हो किन्तु आप गह्वर में है अवश्य। आत्म-परीक्षा कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।
प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान न होकर उनके अनुकूल बनिये और फिर धीरे-2 उन्हें बदल डालिये।
(पं.चुन्नीलाल शर्मा ओकास, जबलपुर)
कुछ लोगों की धारणा है कि भगवान ही दंड दिया करते हैं परन्तु वास्तव में भगवान किसी को दंड नहीं देते। मनुष्य स्वयं ही कर्मवश अपने आपको दंड देता है। जब कभी यह कोई बुरा कार्य अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर बिना विचारे किया करता है तब उसे उसका फल मिला करता है। यदि कार्य बुरा होता है तो फल भी दंड रूप में मिलता है और यदि कर्म अच्छा होता है तो फल यश रूप में प्राप्त होता है।
भगवान प्रेम स्वरूप है। सारा संसार उन प्रभु की रचित माया ही है। जब भगवान प्रेम स्वरूप हैं तब दंड कैसे दे सकते हैं? भगवान कदापि दंड नहीं देते। विश्व-कल्याण के लिए विश्व का शासन कुछ सनातन नियमों द्वारा होता है जिन्हें हम धर्म का रूप देते हैं तथा धर्म के नाम से पुकारते हैं। धर्म किसे कहते हैं?-”जो धारण करे” यानी जिसके धारण करने से किसी वस्तु का अस्तित्व बना रहे वही धर्म है।
अग्नि का धर्म प्रकाश व उष्णता देना है। परन्तु यदि वह प्रकाश व उष्णता नहीं दे तो वह तो राख अथवा कोयले का ढेर मात्र ही रह सकता है क्योंकि वह अपने को छोड़ चुकी है। ठीक यही दशा मानव की है। वह भी धर्म रजु द्वारा बंधा रहता है। जब कभी वह अपना धर्म त्यागता है उसे अवश्य ही हानि उठानी पड़ती है और वह दंड विधान बन कर उसे आगाह करती है। मनुष्य मार्ग की मानवता का आधार धर्म ही है। जब जानबूझकर अथवा असावधानी वश सनातन नियमों का उल्लंघन किया जाता है। तब अवश्य ही दंड का भागी बनना पड़ता है। भगवान को व्यर्थ ही दोषी ठहराना अनुचित है।
भगवान कल्याणमय हैं तथा उनके नियम भी कल्याणमय हैं। जब उन नियमों का उचित प्रकार पालन नहीं किया जाता तब ही दंड चेतावनी के रूप में मिला करते हैं परन्तु मूर्खता व अज्ञानवश मनुष्य इतने पर भी नहीं संभलता और एक के बाद दूसरा नियम भी खंडित करता जाता है।
मनुष्य अपने आपको नहीं पहचान पाता है वास्तव में जो कुछ वह किया करता है उसी से कार्यानुसार दंड व यश का भागी बनता है। अब सब कुछ मनुष्य मात्र पर ही रह जाता है। यदि मनुष्य स्वतः को सुधार लेता है तो वह सबको सुधार सकता है परन्तु जब वह स्वतः नहीं सुधरेगा तो दूसरों को कैसे सुधार सकता है। नियमों का विधान पालन करने के लिए ही बनाया जाता है। जब उन विचारों का उल्लंघन किया जाता है तब मनुष्य अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाता है तब उसे उस अवस्था में दंड प्राप्त होता है।
यहाँ प्रधानता मनुष्य के कर्मों की ही है वह कर्मानुसार ही फल को प्राप्त होता है। भगवान सबसे प्रेम करते हैं। भगवान की मान्यता ही मानवता का आधार है। चाहे कितनी ही बाधाएं सामने क्यों न खड़ी हों, यदि मनुष्य प्रेमपूर्वक उनका अभिनन्दन कर, प्रेम स्वरूप प्रभु का मंगल विधान समझ अपने पथ पर दृढ़ होकर डटा रहता है तो उसका विकास सदैव सही मार्ग से ही होता है। मनुष्य के लिए कर्त्तव्य की जो सीमा निर्धारित की गई है उसके पालन के लिए न तो कोई विशेष प्रयत्न ही आवश्यक है और न कोई साधना की, सीधा पथ है-उस प्रभु का आधार।
सब कठिनाइयों का प्रेमपूर्वक स्वागत करें तो आप उन्हें अवश्य जीत सकेंगे। भारी से भारी विपत्ति क्यों न हो हमें उसका प्रेमपूर्वक अभिनन्दन करना चाहिए। भगवान के प्रत्येक विधान में हमारा मंगल भरा है। आज जो विपत्ति व बाधाएं हमारे सामने हैं उनसे मुँह मोड़ने व भागने की आवश्यकता नहीं है। उनका आविर्भाव तो हमारे कल्याण के लिए ही हुआ है। हो सकता है हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उपलक्ष के ही वे हमें प्राप्त हो रही हों। हमें कब और किस समय कौन सी वस्तु की आवश्यकता होती है यह वे अंतर्यामी परम प्रभु स्वतः जानते हैं।
परम पिता हमें कितना अपार स्नेह देते हैं यदि वह रहस्य हम समझ जाए तो सुख और दुख, शाँति अशाँति दोनों ही हमारे लिए समान हो जाएंगे। तथा यश व दंड का भेद ही न रह जायगा। अपने परम शुभ चिंतक मंगलमय भगवान के प्रत्येक विधान में हमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए तथा सबसे प्रेम का व्यवहार कर प्रेम स्वरूप प्रभु को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रेम ही परमात्मा है और परमात्मा ही प्रेम है।
(साहित्य-रत्न श्री लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए., संपादक ‘खत्री-हितैषी’)
शीर्षक पढ़कर अनेक पाठक चौंकेंगे ही, प्रथम तो वह सोचेंगे कि यदि पानी पीकर ही स्वस्थ रहा जा सके तो कोई अस्वस्थ ही क्यों हो। फिर यह सोचेंगे कि भला पानी कौन ऐसा जीव होगा जो न पीता हो, तो फिर हम अस्वस्थ क्यों रहते हैं। यह भी क्रोधपूर्वक सोचा जा सकता है कि क्या हम खाना-पीना सम्बन्धी साधारण बातें भी नहीं जानते जो हमें बच्चा समझ कर उपदेश दिया जा रहा है। किन्तु बात है कुछ ऐसी ही। हमारे ज्ञान का क्षेत्र कितना अधिक संकुचित है, यह बताने की आवश्यकता नहीं। और हँसी की बात तो यह कि जिस भोजन और जल के बिना हम जीवित ही नहीं रह सकते, उसी के विषय में हम कितना कम जानते हैं, या हमारा ज्ञान कितना भ्रामक है। काम तो हमारा चलता ही जाता है, किन्तु ‘नकटा जिया बुरे हवाल’ कहावत हम पर लागू होती है। सचमुच हम यदि भोजन और जल के उपयोग को वैज्ञानिक ढंग से जान जाएँ तो सचमुच ही हम अस्वस्थ और रोगी न हों। आप आश्चर्य मत करें-’भोजन’ तथा ‘जल’ सम्बन्धी ज्ञान भी ‘विज्ञान’ ही है।
आइये, पहले हम दो बातें समझें -अर्थात् पानी कब पीना चाहिए और कब नहीं पीना चाहिए। पहले हम देखेंगे कि हमें पानी कब पीना चाहिए?
(1) साधारणतया, जब भी प्यास लगे, तभी पानी पीना चाहिए-रात हो या दिन। 2॥ सेर से कम पानी पीने वाले (24 घंटे में) अवश्य कब्ज, बदहजमी तथा खुश्की आदि रोगों से पीड़ित होंगे। पानी कम पीने से शरीर के अन्दर के अनेक विष पानी में घुल कर पेशाब या पसीने के रूप बाहर नहीं निकल पाते। पानी अधिक पीने से त्वचा साफ रहती है, रोम-कूप खुलते हैं, मूत्र तथा पसीने द्वारा शरीर की सफाई होती है, चेहरे की दमक बैठ जाती है, मल ढीला होता है, कब्ज दूर होता है, पाचन-क्रिया ठीक होती है तथा अनेक छोटी-मोटी बीमारियाँ दूर होती हैं। चित्त हल्का होता है, खून पतला रहता है, भोजन हजम होता है।
(2) मनुष्य को ऊषापान अवश्य करना चाहिए। सोकर उठते ही कुल्ला आदि करके 5 मिनट रुक कर रात का ओस में (ताँबे के बर्तन में) रखा आध-सेर से सेर भर तक पानी पियें (यदि एक नींबू का रस मिला लें तो और भी अच्छा) 3-4 मिनट बाँयी करवट तथा 3-4 मिनट दाँयी करवट और फिर 3-4 मिनट बाँयी करवट लेटकर तुरन्त शौच लगे या न लगे। कुछ लोग 3-4 मिनट टहल कर फिर शौच जाना उचित समझते हैं। इससे पाचन और मल-निष्कासन में सुविधा और आराम होता है। बवासीर जैसे कठिन रोग दूर होते हैं।
(3) भोजन के आध घंटे पूर्व आध सेर जल का पीना भी गुणकारी है। जल को दूध की भाँति घूँट-2 कर पिएं ताकि लार मिल जाय, गट-गट करके न पी जाएं। जल पीते समय यह भावना करें कि प्राण-तत्व जल के द्वारा मेरे अंदर प्रवेश करके मुझे स्वास्थ्य, शक्ति और स्फूर्ति दे रहे हैं, मेरा रक्त लाल, पतला तथा शुद्ध हो रहा है।
(4) भोजन के साथ जल न पियें अन्यथा पेट में कीचड़ हो जाने से भोजन के पाचन में गड़बड़ी होती है। भोजन के 1-2 घंटे बाद जल पिएं। तब प्यास भी खूब लगती है और पाचन-अंगों में भोजन पचने में सहायता मिलती है क्योंकि पाचन-रस आमाशय आदि में भोजन में ठीक से मिल चुकते हैं।
(5) सोने के पूर्व एक गिलास जल पियें। इससे स्वप्न-दोष का भय नहीं रहता, नींद अच्छी आती है, भोजन ठीक से पचता है।
(6) उपवास काल में जल का प्रयोग अधिक करना चाहिए-प्यास लगे या न लगे। उपवासकाल में पाचन-अंगों को भोज्य-पदार्थों को पचाने के काम से छुट्टी मिल जाती है तो वह शरीर के संचित विष तथा विकारों को पचाने लगते हैं तथा निकालना आरम्भ कर देते हैं। जल पीने से, शरीर भर के रुधिर से विष एकत्रित होकर जल में घुल कर पेशाब के रूप निकल जाते हैं। उपवास-काल में जल में यदि नींबू का रस डालकर पिएं तो विष आदि तेजी से दूर होते हैं पर साथ ही साथ उनकी तेज प्रतिक्रिया नहीं होने पाती।
हमारे लिए यह जानना भी आवश्यक है कि जल कब नहीं पीना चाहिए। (1) भोजन के तुरंत पहले या तुरंत बाद न पीना चाहिये। इससे पेट में कीचड़ हो जाती है और पाचन-रस ठीक से भोजन में नहीं मिल पाते।
(2) पानी पीकर तुरन्त पेशाब नहीं करना। वैसे ही पेशाब करके तुरन्त पानी नहीं पीना चाहिए। इससे पाचन तंत्र तथा गुर्दे कमजोर पड़ जाते हैं। अतः 10-5 मिनट आगे पीछे जल पिएं। मान लो सोकर उठते ही पेशाब करके 4-5 मिनट कुल्ला आदि करने में लगा दें और तब जल पियें।
(3) एनिमा लेने के 15 मिनट पहले या 15 मिनट बाद जल न पियें।
(4) चिकनी चीजें दूध, मलाई, मक्खन, घी तथा मेवा, भुने चने, फल, मिठाई आदि के बाद जल न पिएं। चिकनी चीजों के ऊपर जल से खाँसी होने का डर रहता है। खीरा-ककड़ी-खरबूजा आदि के ऊपर जल पीने से हैजे का डर हो सकता है। फल आदि के ऊपर जल पीने से सर्दी, नजला, जुकाम आदि हो सकता है। भुने चने के ऊपर जल पीने से पाचन-क्रिया को कमजोरी हो सकती है।
(5) सो कर उठने पर, चाहे दिन हो या रात, तुरंत पानी पीने से जुकाम, सर दर्द तथा तबियत भारी हो जाने का भय होता है।
(6) गर्म चीजों- चाय, दूध आदि के ऊपर पानी न पिये तुरंत। वैसी ही तुरन्त पानी पीकर यह चीजें न पिये।
(7) जुलाब आने पर जल न पियें क्योंकि तब आंतें कमजोर होती हैं और मल फेंकने का काम करती होती हैं। जल पीने पर उनका ध्यान बँटेगा।
(8) स्त्री-संग के बाद तुरन्त जल न पिएं। क्योंकि बदन यकायक गर्म और सनसनाहट के बाद स्तब्ध सा हो चुकता है, अतः तुरन्त ठंडक पहुँचना ठीक नहीं।
(9) व्यायाम का कठिन परिश्रम या कड़ी धूप और लू से आने के बाद या नमी के बाद तुरन्त जल न पिएं। गर्मी सर्दी एक साथ पहुँचना ठीक नहीं।
कोमल जल (soft water) ही पीना चाहिए। बर्फ का ठंडा पानी भले ही तुरन्त प्यास बुझा दे तथा असर अस्थायी होता है। स्वास्थ्य के लिए बर्फ का प्रयोग वर्जित है। सब से अच्छा ताजा भरा ढके कुओं का मीठा जल पीना उत्तम है। नल के जल से छुटकारा नहीं, अतः भले ही वह कुछ हानिकारक हो, पीना ही चाहिये। बढ़ती नदी की बीच-धारा का जल शुद्ध होता है। बालू-कोयला-चूना द्वारा साफ किया या उबाल कर ठंडा किया हुआ जल, वर्षा का शुद्ध वातावरण का एक किया हुआ जल आदि पीना चाहिए। ट्यूब-वेल्स (ट्यूब के कुएँ) न हों तो ऐसे कुओं का जल तो कभी न पियें जिनमें गर्द-गुबार, पत्तियाँ पड़ती हों, जिसकी जगत ऊंची न हो और नहाने, धोने आदि का पानी भीतर चला जाता हो, जिनमें अपवित्र और गंदे डोल या गगरे आदि पानी भरने प्रयोग के में लाये जाएं, जिस कुएँ के जल में पेट्रोल या पोटैशियम परमैगनेट आदि दवायें डाल कर उसके कीड़े न मार दिए गए हों। जल को थिराकर, छान कर, गर्म करके पीना ही अच्छा होता है। पहाड़ी झरनों के पानी में मिले पत्थर के सूक्ष्म कण थिराने से नीचे बैठ जाते हैं या नदियों की बालू भी।
जल पीने जैसे साधारण कार्य को हम नियमित तथा सुचारु रूप देकर अपने स्वास्थ्य का कारण बना सकते हैं तथा अनेक छोटे-मोटे रोग भगा सकते हैं।
(पं.तुलसी रामजी शर्मा, वृन्दावन)
वर्तमान समय में अनेकों धूर्त, आलसी, प्रमादी, व्यसनी मूर्ख तथा कुमार्गगामी लोग संत पुरुषों का वेष बनाकर अपनी आत्मा को तथा दूसरों को ठगते हैं। ऐसे लोगों के संबंध में जनता की नीति क्या होनी चाहिए? इस प्रश्न पर नीचे के श्लोकों में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। इस नीति को अपनाने से धूर्तता का शीघ्र अन्त हो सकता है।
नास्ति दानात्परं मित्रमिह लोके परत्रय।
अपात्रे किन्तु यद् दतं दहत्यासप्तमं कुलम्॥
(अत्रि. 149)
अर्थ- इस लोक और परलोक में दान से बढ़कर कोई मित्र नहीं। परन्तु कुपात्र को दिया हुआ दान सात पीढ़ी को नरक में डालता है।
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणेगृहमागते।
क्रीडन्त्यौषधः सर्वा यास्यामः परमागतिम्।
व्यास. 4।50
विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण के घर आने पर अन्न देवता प्रसन्न होते हैं कि इसके मुख में पहुँचने से हमारी परम गति होगी।
नष्ट शौचे व्रत भ्रष्टे विप्रेवेद विवर्जिते।
दीयमानं रुदत्यन्नं भयाद् वै दुष्कृतं कृतम्॥
व्यास. 4। 51॥
अपवित्र, व्रत-भ्रष्ट, अनपढ़ ब्राह्मण को दिया हुआ अन्न रोता है कि मेरी दुर्गति होगी।
पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकामंछठान्।
हैतुकान् वकवृत्तींश्चवाँग मात्रेणापि नार्चयेत्॥
(मनु. 4।30)
पाखंडी (वेद बाह्य व्रतों के चिह्न-जैसे मनुष्य की खोपड़ी आदि धारण करने वाले) नीच कर्म करने वाले, बिडाल व्रति, कपटी, शठ, कुतर्की, बगुला भगत-ये लोग यदि घर पर आवें तो वाणी मात्र से भी सत्कार न करें।
वेद विद्या व्रतस्नाताञ् श्रोत्रियान्गृहमेधिनः।
पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीताँश्च वर्जयेत्॥
वेद विद्या स्नातक, व्रत स्नातक, वेद का जानकार यदि घर आवे तो हव्य कव्य से पूजन करे इनके विपरीत हो उनका सत्कार न करे।
धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्यदेशेऽवुधाजनाः।
पूज्यन्ते ब्राह्मणामूर्खादानमानादिकैरपि॥
(देवी भा. 3।10।39।)
मूर्खा यत्रसुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः।
तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पंडितेन कदाचन॥41॥
उस राजा के राज्य को धिक्कार है जिसमें दान मानादि से मूर्ख ब्राह्मण पूजे जाते हैं॥39॥
जहाँ दान मानादि से मूर्ख गर्वीले हैं उस स्थल में पंडित को न बसना चाहिए॥41॥
अव्रताश्चानधीयाना यत्रभैक्ष्य चराद्विजाः।
तंग्रामं दंडयेद् राजा चौरभक्तद दंडवत्॥
(अत्रि. 22 पाराशर 1। 66। वसिष्ठ अ. 3। 5)
जिस ग्राम में अव्रती (ब्राह्मणोचित कर्मों से रहित) अनपढ़ ब्राह्मणों का जीवन-निर्वाह भिक्षा द्वारा होता है उस ग्रामवासियों को राजा चोर को भोजन देने वाले के समान दंड दे।
विद्वद् भोज्यमविद्वाँसो येषु राष्ट्रेषु भुँजते।
तेष्वनावृष्टि मिच्छन्ति महद्वा जायते भयम्॥1
(अत्रि. 23 वविष्ठ. 3।23)
जिस देश में विद्वानों के भोगने योग्य पदार्थ को मूर्ख भोगते हैं उस देश में अनावृष्टि होती है अथवा और कोई बड़ा भय उत्पन्न होता है।
इन वचनों के आधार पर यदि सरकार आज कल के भिखारियों पर कुछ दृष्टि डालती है तो क्या बुरा करती है।
सुभुक्तमपि विद्वाँसं धार्मिकं भोजयेद्द्विजम्।
नतुमूर्खमवृत्तस्थं दशरात्रमुपोषितम्॥
कूर्म प्र. 26।63॥
भोजन किये धर्मात्मा विद्वान ब्राह्मण को और भी भोजन करावे परन्तु दश दिन के भूखे दुराचारी मूर्ख को नहीं।
स्मरण रहे कि यही वचन पद्म पु. आदि खंड (57/63) में है।
न्यायागतस्य दव्यस्य वोद्धव्यौ द्वाव तिकमौ।
अपात्रे प्रतिपतिश्च पात्रे चा प्रतिपादनम्॥
(म.भा. शाँ. 26।61)
न्याय पूर्वक पैदा किये हुए द्रव्य का दो प्रकार से दुरुपयोग होता है एक तो सुपात्र को न देना और इससे भी बढ़कर यह है कि कुपात्र देना।
नदद्याद्यशसे दानं नभयान्नेकोपकारिणे।
न नृत्य गीतशीलेभ्यो हासकेभ्यश्चधार्मिकाः॥
(संस्कृत लोकोक्ति)
धर्मात्मा पुरुष यश के लिए दान न करे, न डर से, न उपकारी को न नाचने गाने वाले के लिए, न हंसाने वाले (मसखरे) के लिए। इनको देना वास्तव में दान नहीं।
गानेन न जीविका यस्य यस्यभार्या च पुँश्चली।
परोपतापिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम्॥
नारद पु. 12।9॥
गाने से जिसकी जीविका है, जिसकी स्त्री व्यभिचारिणी है जो अन्यों को दुखदायी है, ऐसे को देना निष्फल है।
नित्ययाश्चा परस्यापि0 (नारद पु.12।7)
अर्थात् नित्य माँगने वाले को देना व्यर्थ है।
कितवान् कुशीलवान् क्रूरान पाखण्डऽस्थाँश्चमानवाँन
विकर्मस्थान् शौण्डिकाँश्च क्षिप्रं निर्वासयेत्पुरात्
(मनु. 9।225)
जुआरी, कुशीलवान् (नाचने गाने वाले) दुष्ट, वेद निन्दक कुकर्मी शराबी इनको शीघ्र ही राजा अपने देश से निकाल दे। क्योंकि-
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नः तस्कराः।
विकर्मक्रिययानित्यं वाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः॥226॥
ये जुआरी आदि गुप्त चोर राज्य में रह कर अपने बुरे आचरणों से सज्जनों को दुराचारी बना देते हैं।
अपूज्यपूजनाँचैव पूज्यानाञ् चाप्यपूजनात्।
नृ घातक समं पापं शश्व प्राप्न प्रोतिमानवः।
(म.भा. शाँ. 284।17)
निरादर के योग्य का आदर करने से और आदर के योग्य का निरादर करने से मनुष्य हत्या के समान पाप होता है।
विशुद्ध श्रद्धा और निष्कपट प्रेम से जो भगवान के समीप जाते हैं, उन्हें भगवान मिल जाते हैं।
-श्री रामकृष्ण परमहंस
*****
मृतक संस्कार के अवसर पर किसी के यहाँ भोजन न करो क्योंकि ऐसे समय के भोजन से भगवद् भक्ति और प्रेम नष्ट हो जाते हैं।
-श्री रामकृष्ण परमहंस
*****
(श्री के. वी. सुब्वाराव, मानिकपुर)
साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।
परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।
जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।
हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।
लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।
(श्री बलदेव सहाय, दिल्ली)
संसार में सर्वत्र भिन्नता दिखाई देती है। कोई भी दो वस्तुएं बिल्कुल एक सी नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, एक ही वस्तु जैसी कल थी वैसी आज नहीं है और जिस रूप में आज है उसमें कल नहीं रहेगी। फिर भी यह सारा दृश्य नानात्व एक अदृश्य एकत्व में पिरोया हुआ है। भिन्नता में एकता है और उस ऐक्यभाव में आनन्द हो। मनुष्य नाना उपायों से, नाना युक्तियों से, नाना चतुराइयों से नानात्व में एकत्व को पकड़ कर आनन्द का उपभोग करना चाहता है। उसकी सारी क्रियाओं में परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष, सूक्ष्म अथवा स्थूल रूप से यही प्रिय चेष्टा ओत-प्रोत है।
संगीत को लीजिये। विभिन्न खाद्य यन्त्रों की अनेकानेक ध्वनियों में आकाश पाताल का अन्तर होता है। कंसर्ट (सम्मिलित वाद्य) में सब अपना पृथक-पृथक अस्तित्व खो देते हैं, वहाँ यसराज की उमड़ती भीड़, सितार की भीनी झंकार, सरोद की तरल-तरंग और तबले की सौम्य समताल-सब घुल मिलकर एक जान, एक रस हो एक स्वर में गूँज उठते हैं। कितनी विचित्र ध्वनियाँ हैं और कैसे उन में होती है विलक्षण एकता। यह एकता ही कलाकार का आदर्श है और उसी एकता में आनन्द हिलोरें ले रहा है। सुनने वाले उसी में अपने-अपने व्यष्टि स्वरूप को डुबोकर मन्त्र-मुग्ध एवं चित्र लिखित से अपूर्व आनन्द का पान करते हैं।
साहित्य में मनुष्य का प्रयत्न और भी गहन होता है। साहित्य की सामग्री है मानव-हृदय और मानव चरित्र-दोनों ही अत्यन्त विचित्र एवं विभिन्न। कोई भी दो हृदय अथवा कोई भी दो चरित्र एक से नहीं होते। पर साहित्य एक के भाव को सब का, इस काल की वस्तु को चिरकाल का और नश्वर को अमर बना देता है। साहित्यकार समस्त हृदयों को मथकर एक ऐसी वाणी की सृष्टि करता है, ऐसे सजीव चित्र अंकित करता है जिसको पढ़कर सब जगह के और सब काल के रसिकगण एक स्वर से कह उठते हैं- मैं भी ऐसा ही अनुभव करता हूँ, यह बिल्कुल मेरा ही भाव है मेरे ही दिल का नक्शा है। युग पर युग पड़ते चले जाते हैं, पीढ़ियों पर पीढ़ियाँ ढलती चली जाती हैं पर वह साहित्य की वस्तु एक युग से दूसरे युग में एक हृदय से दूसरे हृदय में अनुभव होती हुई अपरिवर्तित रूप से प्रवाहित होती चली जाती है। वह सब समय की ओर सब हृदय की बात होती है। काल एवं स्थल के ऊपर होता है उसका साम्राज्य और आनन्दातिरेक से विभोर कर देना होता है उसका सरल सहज स्वभाव।
इसी तरह प्रेम के सम्बन्ध में सामान्य अनुभव की बात है कि साधारण सबकी प्राप्ति भी उसी समय होती है जब दो प्रेमी अपने-अपने पृथक अस्तित्व को खोकर आपस में अत्यन्त निश्छल एकता प्राप्त कर लेते हैं। वस्तुतः एक प्रेमी की साधना उस समय सफल होती है जब वह अपने प्रेमास्पद का आधार ले अपनी प्रेम भावना को एक से ऊपर उठाकर अनेक के व्यापक स्वरूप में व्यवहृत कर पाता है। जब वह सब में सर्वत्र अपने को उनमें इस प्रकार ढाल देता है कि द्वैत का भाव नहीं रहता। संसार में विभिन्न रूप रंग होते हुये भी पावन प्रेमी रूप में कुरूप में, पुरुष में स्त्री में, पुष्पों में लताओं में, वृक्षों में कुंडों में, अपने प्रिय और केवल अपने प्रिय का ही अभेद दर्शन करता है। अंतर्जगत से लेकर बाह्य-जगत तक उसको केवल उसी का जलवा नजर आता है। विशुद्ध एकरस आनन्द का उद्रेक उसी समय होता है।
अतएव द्वैत को अद्वैत में लय करने से आनन्द की सृष्टि होती है। संगीत में भिन्न-2 ध्वनियों को चातुर्य एवं अभ्यास द्वारा एक में मिला दिया जाता है। वहाँ दो नहीं होते इसी में उसका गौरव है। साहित्यकार सब के भाव को अपना बनाकर फिर उसको सर्वसाधारण का बना देता है। उसके सार्वजनिक एवं कालातीत होने में उसकी कला है। प्रेमी अपने सौंदर्य मूर्ति के चरण युगल में अपने को न्यौछावर कर सारे संसार को ‘सिया-राम मय’ देखता है यहाँ तक कि स्वयं भी वही हो जाता है। ऐसा तदाकार एवं तादात्म्य ही प्रेमियों की मंजुल मंजिल का अन्तिम चरण है। संगीत अपने राग में, साहित्य अपनी पत्नियों में सौंदर्य अपने प्रेम में केवल नाना स्वरों से नाना युक्तियों से केवल एक ही संदेश दे रहा है-
विभिन्नता के अंतर्गत एक है।
(वैद्य श्री गंगा प्रसाद जी स्वर्णकार, हटा)
स्त्रियों के लिए पति ही सर्वस्व है, पति से ही गति है, पति ही देवता तथा पति ही प्रभु है, पति ही धर्म और पति ही गुरु है, बाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों पर यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है, अनुसूया के द्वारा पतिव्रत धर्म का उपदेश किये जाने पर आदर्श महारानी सीता कहती हैं कि मुझे भी यह मालूम है कि स्त्री का गुरु पति ही होता है।
विदितं तु ममाप्येतद्यथा नार्याः पतिर्गुरुः
(बाल्मीक रा.अयो. 11 व 2)
रावण के द्वारा भगवान राम की निन्दा किये जाने पर फिर कहती हैं।
दीनोश्च राज्यहीनो वै योमे भर्ता स में गुरुः
(बा.रा.उ. 78।17 )
निर्वासित होने पर भी वह कहती हैं कि स्त्री के लिए तो पति ही देवता व पति ही बन्धु तथा पति ही गुरु है।
पतिर्हि देवता नार्याः पतिर्बन्धुर्पतिर्गुरुः
प्राणैरपि प्रियं तस्माद्भर्तुः कार्यविशेषतः।
7।48।17
यद्वैकिंच्मनुरवदत्त र्द्भतुः
(तैत्तिरीय सं. 2।2।10।2)
इस वेद वाक्य से समर्थित मनु महाराज भी कहते हैं कि स्त्रियों के निमित्त पति की सेवा ही गुरुकुल वास है।
पति सेवा गुरौ वासः
(मनु. 2।67)
बृहस्पति जी ने भी अगस्त पत्नी लोपामुद्रा की प्रशंसा करते हुए कहा है कि पति ही देवता, पति ही गुरु तथा धर्म, तीर्थ और व्रत है इसलिए सब छोड़कर स्त्री एक पति ही की सेवा करे।
भर्ता देवो पुरुर्भर्ता धर्म तीर्थ व्रतानि च।
तस्मार्त्सवं परित्यज्य पतिरेकं समर्चयेत्॥
(स्कंद पु.का.सं. 4।48)
तिर्यग्योनि गता कपोती भी अपने पति से कहती है कि ब्राह्मणों का गुरु अग्नि है सब वर्णों का गुरु ब्राह्मण है, स्त्रियों का गुरु उसका पति है और अभ्यागत सबका गुरु है।
गुरुरग्निर्द्विजातीनाँ वर्णानाँ ब्राह्मणो गरुः।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणाँ सर्वस्याभ्यागतो गुरुः॥
(ब्रह्म पु.80। 45)
ब्रह्म पुत्री मोहनी भी राजेन्द्र रुक्माँगद से कहती हैं कि पति ही गति, स्वामी देवता तथा गुरु है।
भर्ता नाथो गतिर्भर्ता दैवतं गुरुरेव च।
तस्य वश्यं चरेद्यातु सा कथं सुखमाप्नुयात्॥
(वृहन्नार. पु. उ. भाग 14।40)
महर्षिशाता तप ने भी कहा है, कि स्त्री का एक पति ही गुरु है।
पतिरेको गुरुः स्त्रीणाम्।
निर्णय- सिन्धुकार ने भी कहा है कि बाल्मीकि रामायण में पति को गुरु कहा गया है और इस पर उन्होंने रामायण और शाता तप के प्रमाण भी दिये हैं वह लिखते हैं।
पित्रा दयोमहागुरवः स्त्रीणाँ पतिरेव गुरु रुक्रश्च
(रामायणे)
पतिर्बन्धुर्गतिर्भर्ता दैवतं गुरुरेव च।
पतिरेको गुरुः स्त्रीणाँसर्वस्याभ्यागतो गुरुः॥
(शाता तपः)
चाणक्य नीति में भी उपर्युक्त श्लोक को चाणक्य ने दुहरा दिया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामायण में कहा है कि-
एकै धर्म एक व्रत नेमा।
काय बचन मन पति पद प्रेमा॥
स्त्रियों का तो एक पतिव्रत ही सच्चा धर्म है देखो मनुस्मृति अ. 5।154 में लिखा है कि स्त्री का सच्चा देवता पति ही है।
सततं देववत्पतिः॥125॥
श्रीमद्भागवत स्कन्ध 3 अध्याय 18 श्लोक 33 में कश्यप जी ने दिति से कहा है कि केवल एक पति ही स्त्री का परम देवता है।
पतिरेव हि नारीणाँ दैवतं परमं स्मृतम्॥126
(श्री स्वामी जयन्ती प्रसाद जी)
जिस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणुओं की एकता से विश्व की उत्पत्ति है-उसी प्रकार अनेकों व्यक्तियों के मेल से समाज बना है। एक-एक कर के समाज से सभी व्यक्तियों को यदि पृथक कर दिया जाय तो यहाँ समाज रहे न संसार। अतः आओ, हम सब अलग-अलग अपने अस्तित्व की चिंता छोड़ व्यक्तित्व का, स्वार्थ का, अहंकार त्याग कर निजी सद्गुणों द्वारा समाज तथा संसार की सेवा वाली सुन्दर सृष्टि का सृजन करें। मनुष्य सेवा के लिए ही पैदा हुआ है- मैं आपकी सेवा करूं, आप उनकी और वे मेरी। इस प्रकार हम सबका कार्य सुचारु व सुव्यवस्थित रूप से ठीक समय पर होता रहे। और रागद्वेष रूपी तू-तू, मैं-मैं के उस छीना झपटी वाले दूषित तरीके को ग्रहण करने से भी बच जायं जिसे अपनाने से मन कलुषित रहता है, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। चित्त चलायमान होता है और व्यर्थ का अहंकार चमक जाता है।
भारत वर्ष में अतिथि सत्कार का बड़ा ही महत्व है। आतिथ्य सत्कार से ही गृहस्थाश्रम का महत्व व शोभा बताई जाती है। हर कोई जिस प्रकार अपने अतिथि को अपने से अच्छा खिलाता-पिलाता है। आतिथ्य सत्कार के समय भीतर से सेवा भाव का समुद्र उमड़ पड़ता है। उसी तरह की निर्मल, निर्दोष तथा परमार्थ की निष्कलंक और पवित्र भावना, सेवा भाव से एक दूसरे के प्रत्येक कार्य को करते समय रह सकती है। सेवा बहुत ही ऊँची चीज है। सेवा में न मजदूरी का ही भाव है और न दुकानदारी का इसलिए सेवा करना मनुष्य मात्र का सबसे मुख्य कर्त्तव्य है। विदेशों में कुछ भी रहा हो परन्तु भारतवर्ष की संस्कृति तो यही बतलाती है कि मानवता की सेवा करने से ही हमारी रक्षा हो सकती है।
अपनी आत्मा की महत्ता से बड़ी दूसरी कोई महत्ता नहीं है, अपनी आत्मा के भीतर जो सार्वलौकिकता है उससे परे कोई सार्वलौकिकता नहीं है। स्व-परिग्रह से मुक्ति ही सच्ची मुक्ति है यही बात गाँधी जी ने हमें सिखलाई है।
-विलियम हनैस्टहाकिंग
*****
अपने आपको पहचान लेना ही सत्य को पहचान लेना है। -महात्मा गाँधी
*****
इन्द्रियों के विषय या भोग-विलास में सुख नहीं है। सुख तो तुम्हारे भीतर है, जो ब्रह्मचर्य में ही मिल सकता है। -स्वामी रामतीर्थ
(साधु वेष में एक पथिक)
बाल्यावस्था वही उत्तम है जो निरर्थक क्रीड़ाओं एवं संग दोषवश व्यसन-वासनाओं की पूर्ति में ही भ्रष्ट न होकर विद्याध्ययन में सार्थक हो।
युवावस्था वही उत्तम है, जिसकी शक्ति से सद्गुणों का विकास हो, सद्ज्ञान का सुन्दर प्रकाश हो, सदाचरण की ही रक्षा हो, और धर्म पथ में चलते हुए सत्यानन्दघन प्रियतम की प्राप्ति ही लक्ष्य हो। अशुभ कर्मों की ओर प्रेरित हुई इन्द्रियों का दमन हो, दुर्विकारों का शमन हो तथा विषयों का दमन हो और शुभ कर्मों के लिए ही सदा तत्पर मन हो, जिसकी शक्ति से विषय-वासनाओं के पथ पर चंचल हुए मन का निरोध हो, स्वेच्छाचारिता का विरोध हो।
वृद्धावस्था वही उत्तम है जिसमें साँसारिक पदार्थों के प्रति मोह ममता का त्याग हो, केवल परमात्मा में ही अटल अनुराग हो, ऐहिक सुख-भोगों की तृष्णा पर क्रोध हो, बहिवृत्तियों का अवरोध हो और सत्या सत्य का यथार्थ बोध हो।
बलवान वही उत्तम है जो निर्बलों, असहायों की सहायता करने में शूर हो, जिससे आलस्य तथा भय सर्वथा दूर हो। संयम जिसके साथ में हो, इन्द्रिय रूपी घोड़ों की मन रूपी लगाम जिसके हाथ में हो, इसके साथ ही जो बुद्धिमान हो और निरभिमान हो।
धनवान् वही उत्तम है जो कृपण न होकर दानी हो, उदार हो, जिसके द्वारा धर्मपूर्वक न्याययुक्त व्यापार हो, जिसके द्वार पर अतिथि का समुचित सत्कार हो, दीन दुखियों का सदा उपकार हो, जिसके यहाँ विद्वानों एवं साधु-महात्माओं का सम्मान हो, जो स्वयं अति सरल और मतिमान् हो।
बुद्धिमान् वही उत्तम है, जिसमें अपने माने हुए ज्ञान से निराशा हो, यथार्थ सत्य को जानने की सच्ची जिज्ञासा हो, सद्गुरुदेव के प्रति पूर्ण निर्भरता हो और उन्हीं की आज्ञा पालन में सतत् तत्परता हो।
ज्ञानी वही उत्तम है जिसकी बुद्धि से प्रवृत्ति-पोषक अज्ञान दूर हो, निवृत्ति द्योतक भक्ति भरपूर हो, भव भ्रान्ति नष्ट हो, परम शान्ति स्थिर और स्पष्ट हो, जिसके जीवन में मुक्ति विद्यमान हो और परमानन्दमय परमात्मा की व्यापकता का सर्वत्र भान हो, जो क्रोध, अभिमान, माया आदि दुर्गुणों से रहित हो और धैर्य, क्षमा, सत्य-ध्यान और दया आदि सद्गुणों के सहित हो, जिसके समीप में शान्ति का वास हो, जिसके शब्दों से भ्रान्ति का नाश हो, जो पूर्ण त्यागी, वीतरागी हो और परमात्मा का ही अटल अनुरागी हो।
त्यागी वही उत्तम है, जिसका मन भोग-वासनाओं से सदा वियुक्त हो, जिसका अहं देहाभिमान से मुक्त हो। जिसमें किसी भी पदार्थ के प्रति अपनत्व न रहे, जो किसी को भी अपना न कहे, विचार की धारा में जिसकी आसक्ति ममता बह जाय, जो नित्य है, उसके सिवाय जहाँ अन्य कुछ भी न रह जाय।
प्रेमी वही उत्तम है जो आनन्दघन प्रियतम में सदा योगस्थ रहे और संसार प्रपंच से सदा तटस्थ रहे। जहाँ प्रेमास्पद का स्वभावतः सतत् ध्यान रहे, अपनी सुध-बुध में उन्हीं का गुणगान रहे और प्रत्येक दशा में “वही एक अपने हैं” केवल यही अभिमान रहे।
अत्यन्त सुखी वही है जिसका जीवन स्वार्थ त्याग से पूर्ण है। -स्वामी रामतीर्थ
कहते मानव जाति आज उन्नति पथ पर बढ़ती जाती है?
हाय, जहाँ पर रूप और यौवन के भी सौदे होते हैं,
जौहर की गर्वित ज्वाला के पावन अंगारे रोते हैं,
सतियों की प्रज्वलित चिता की कान्ति जहाँ पर बुझ जाती है,
वहीं पुरुष की पतित वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती हैं॥1॥ कहते0
जहाँ दुखी माँ, नारी बनकर खुले बाजारों में आती है,
भाई के हाथों निज बहनों की अस्मत लूटी जाती है,
आज जहाँ कंचन पर इज्जत अपने को बलि चढ़वाती है,
वहीं पुरुष की पतित वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती है॥2॥ कहते0
अरे! जहाँ मादक द्रव्यों में पैसा पानी बन बहता है,
जिस काले पीले पानी में विष का घोल घुला रहता है,
जहाँ ‘जहाँ को जन्नत करने’ जीभ गरल से लग जाती है,
वहीं पुरुष की भ्रमित वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती है॥3॥ कहते0
जहाँ दूसरों का धन लेकर हाय हड़प करना आता है,
अन्धा स्वार्थ, हत्या, चोरी, लूट, डकैती करवाता है,
हँसते परिवारों की दुनिया क्षण में जहाँ उजड़ जाती है,
वहीं पुरुष की विकृत वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती हैं॥ 4॥ कहते0
एक देश के दो लालों के मन में जहाँ भेद आते हैं,
जहाँ धर्म का ढोंग लिए, भाई-भाई से लड़ जाते हैं,
भिन्न प्रभु की मन्दिर मस्जिद में सत्ता मानी जाती है,
वहीं पुरुष की विकृत वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती हैं॥5॥ कहते0
हाय! जहाँ पर कोई शोषित निज दुख में सिसकी भरता है,
गर्वित क्रोधी क्रूर पुरुष का दमन और शासन करता है,
अरे जहाँ पीड़ित मानवता अपने आँसू टपकाती है,
वहीं पुरुष की क्रूर वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती है॥ 6॥ कहते0
अन्यायी का शस्त्र त्रसित जन पर भीषण चोटें करता है,
जहाँ शवों के ऊपर चढ़ खूनी दानवता इठलाती है,
वहीं पुरुष की क्रूर वासना निज क्रीड़ा स्थल पाती है॥ 7॥ कहते0
कहते मानव जाति आज उन्नति पथ पर बढ़ती जाती है?
*समाप्त*
(श्री कैलाशनाथ जी बुधवार)