जिसकी प्रत्येक पंक्ति उपयोगी और जीवन में काम काम आयेगी।
इस अंक के सम्पादक- प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.
आगामी वर्ष जनवरी 50 में ‘अखण्ड-ज्योति’ ने ‘आर्थिक सफलता-अंक’ प्रकाशित करने का निश्चय किया है। मनुष्यों की अनेक कठिनाइयाँ इस कारण हैं कि वे रुपये का कमाना सदुपयोग, व्यय करना या बचत करना नहीं जानते। सर्वाधिक संतोष प्राप्त करने के लिए पारिवारिक आय व्यय, वास्तविक एवं कृत्रिम आवश्यकताएँ, बजट, रहन-सहन ऊँचा करने की विधि, मनोरंजन इत्यादि सभी का ज्ञान आवश्यक है। “आर्थिक सफलता” अंक में निम्न लेख रहेंगे-
1. पारिवारिक आय व्यय कैसे करें? बजट बनाने के उपाय।
2. जीवन रक्षक पदार्थ तथा उनका उचित संग्रह और उपयोग।
3. निपुणता दायक वस्तुएँ।
4. आमदनी बढ़ाने और खर्च करने की कला।
5. रहन-सहन ऊँचा करने के साधन।
6. फैशन का खफ्त-हमारी बेवकूफियाँ।
7. कर्ज से कैसे बचें?
8. बड़ों के आर्थिंडडडडडड अनुभवों से लाभ उठाइये।
9. गृहस्थी का स्वर्ग।
10. ब्याज का चक्रव्यूह।
11. व्यापार करते समय की सावधानियाँ।
12. लाटरी और पहेलियों की सनक।
13. विज्ञापन हमें कैसे बेवकूफ बनाते हैं?
14. जब आप चीजें खरीदने निकलें।
15. छोटी-छोटी किन्तु महान बातें जिन पर हम गौर नहीं करते आदि, आदि।
प्रत्येक परिवार में इस उपयोगी अंक की एक प्रति अवश्य रहना चाहिए। इतने नवीन एवं उपयोगी विषयों पर लेख रहने के कारण विशेषाँक की पृष्ठ संख्या साधारण अंक से करीब दूनी रहेंगी।
व्यवस्थापक- “अखण्ड-ज्योति” मथुरा।
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वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-11
इन्सान और धनवान
(श्री यशवन्त शर्मा ‘वीर’)
गरीबों की मुसीबत पर जिगर जिसका पिघल जाये।
अनाथों के बुरे दिन देख कर जो दिल मचल जाये॥
किसी के दर्द में हम दर्द और गमख्वार बन जाये।
किसी के खार जारों में गुलो गुलजार बन जाये॥
किसी की चश्म पुरनम देखकर आँसू बहाता हो।
किसी की आतिशे गम को मसर्रत से बुझाता हो॥
खिजाँ दीदा चमन को मौसमे गुल में बदल डाले।
नुकीले खार को पाँवों के छालों से मसल डाले॥
जो अपने फर्ज पर, कौमो वतन पर, सब लुटा डाले।
जरूरत हो तो अपनी जिन्दगी तक भी मिटा डाले॥
जिसे कुब्बत मिले ऐसी, उसे इन्सान कहते हैं।
लूटा दे धन गरीबों पर उसे धनवान कहते हैं॥
आ यद्योनिं हिरण्ययमाशुऋतस्यसीदति। जहात्य प्रचेतसः॥
अभिवेनाः अनूषते यक्षन्ति प्रचेतसः।
मज्जन्त्यविचेतसः॥
ऋग् 9।6420, 21
(आशुः) भोक्ता जीव (यत्) जो (ऋतस्य) ऋत की (हिरणयम्) स्वर्णिम (योनिम्) गोद में (आसीदति) आ बैठता है। उसे (अप्रचेतसः) मूढः अज्ञानी (जहाति) छोड़ देते हैं। अथवा वह (अप्रचेतसः) अज्ञानियों को (जहाति) छोड़ देता है। (बेनाः) बुद्धिमान, मेधावी (अभि अनुषते) अभिमुख होकर प्रशंसा करते हैं। (प्रचेतसः) ज्ञानी (यक्षन्ति) यज्ञ करते हैं, सत्कर्म करते हैं और (अविचेतसः) अज्ञानी (मज्जन्ति) डूब मरते हैं।
ऋत की, सत्य की, कल्याण की, श्रेय की स्वर्णमयी, शान्ति दायक गोद में जो बैठ जाता है उसे बेवकूफ लोग छोड़ देते हैं या वह उन बेवकूफों को छोड़ देता है क्योंकि उन दोनों के मार्ग एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न होते हैं, दोनों के विचार और कार्यों में भारी अन्तर होता है-जिससे उनकी पटरी आपस में नहीं बैठती। फलस्वरूप दोनों को अलग-अलग रहने के लिए विवश होना पड़ता है।
जिन्होंने स्वर्णिम ऋतम्भरा बुद्धि को अपना लिया है। उनका दृष्टि कोण दूसरा होता है। वे सत्य को ढूँढ़ते हैं, सत्य को देखते हैं, सत्य की ओर चलते हैं, सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं। यही उनका लक्ष होता है, इसी में उन्हें जीवन की सफलता दीखती है। वे सोचते हैं। मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, मुझे वह करना चाहिए जो अविनाशी आत्मा के गौरव के अनुकूल हो। मुझे वह करना चाहिए जो आत्मकल्याणकारी हो, आत्मोन्नति और आत्म शान्ति में सहायक हो। आत्म लाभ में, धर्म लाभ में उसे अपना सच्चा लाभ दिखाई पड़ता है।
अज्ञानियों का दृष्टिकोण दूसरा होता है। वे दूर की नहीं सोच पाते, आज का भौतिक हानि लाभ ही उन्हें वास्तविक हानि लाभ दीखता है, ऐसे आदमी तीन वस्तुएं चाहते हैं (1) अपरिमित धन संपदाएं (2) हर घड़ी बढ़िया-बढ़िया इन्द्रिय भोग (3) अहंकार की, गर्व की पूर्ति। इन तीन इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह व्याकुल रहते हैं। जितनी मात्रा में यह त्रिविधि माया उन्हें मिलती है, उतनी ही उनकी तृष्णा बढ़ती जाती है। अधिक का, और अधिक का लालच बढ़ता है, यहाँ तक कि वे उचित अनुचित का विचार छोड़ देते हैं और जैसे भी बने वैसे इस त्रिविधि माया को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। इस दौड़ के आवेश में वे चोरी, हिंसा, हत्या, लूट, शोषण, अपहरण, व्यभिचार, बलात्कार, जुआ, ठगी, धोखा, असत्य, ढोंग आदि बुरे से बुरे कर्म को करने में नहीं चूकते। आरंभ में थोड़ा नशा होने पर अनीति के मार्ग पर वह धीरे-धीरे थोड़ा झिझक-झिझक कर चलता है, पर जब नशा पूरे जोर से बढ़ आता है तो वह धर्म-अधर्म का, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का विवेक छोड़ कर जैसे भी बने वैसे अपनी इच्छा पूर्ति के लिए अनीति के मार्ग पर सरपट दौड़ने लगता है। धर्मपूर्वक नीति पूर्वक तो यह तीनों ही वस्तुएं बहुत थोड़ी मात्रा में मिल सकती हैं। जिन्हें इन वस्तुओं की तृष्णा प्रचंड रूप से सता रही है, उनके लिए अधर्म का मार्ग अपनाने के सिवा और कोई चारा नहीं।
ऋत की गोद में बैठा हुआ व्यक्ति सोचता है, इस माया में, इस मृग तृष्णा से भटकने से कोई लाभ नहीं, अपरिमित धन को जमा करके क्या करूंगा? यह मेरे साथ जाने वाला तो है नहीं, बिखरे हुए बालू के कण जमा करके महल बनाने के समान बाल क्रीड़ा करने से क्या लाभ? धन एक स्थान पर जमा रह नहीं सकता। हवा का झोंका आते ही रेत के कण जैसे इधर-उधर उड़ जाते हैं वैसे ही कठिन परिश्रम से जमा की हुई सम्पदा, घटना चक्र के एक ही दौर में कहीं से उड़कर कहीं पहुँच जाती है। ऐसी अस्थिर वस्तु को बटोरने की भूल विलौअल करने से, पानी को मथने से क्या लाभ? वह धर्म-जीविका करता है। निर्वाह के लायक नीति पूर्वक कमाता है और अपनी आवश्यकताएं सीमित रखता हुआ, थोड़े में गुजारा कर लेता है और सुखी रहता है।
ऋत की गोद में बैठा हुआ व्यक्ति इन्द्रिय भोगों की अति के पीछे चलती-फिरती मृत्यु की छाया देखता है। विषयी, कामी, असंयमी, चटोरे, रंगीले, ऐयाश, आराम-तलब, मनोरंजनों में मस्त लोग अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को खोखला कर डालते हैं। निरोगता उनका साथ छोड़ देती है, शान्ति उनके मन में से विदा हो जाती है, वृद्धावस्था, अशक्तता, अकाल मृत्यु उनके सिर पर मँडराने लगती है। भोग की अधिकता के कारण इन्द्रियाँ जवाब दे जाती हैं, उनमें नीरसता अनुभव करती हैं फिर भी आदत से मजबूर चटोरे व्यक्ति उसी राह पर बढ़े चलते हैं। ऋत? बुद्धिवाला, मेधावी इस बेवकूफी को देखकर हँसता है। कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर अपने मसूड़े छील लेता है और अपना खून आप पीकर बड़ा प्रसन्न होता है सोचता है कि बड़ा लाभ कमा लिया। मेधावी देखता है कि विषयी पुरुष अपने ही बलवीर्य की, अपनी ही जीवनी शक्ति की होली फूँक रहे हैं और उस कौतूहल को देख कर प्रसन्न हो रहे हैं। इस बेवकूफी से वह दूर रहता है। वह अपनी ईश्वर प्रदत्त शक्तियों को इस प्रकार नष्ट न करके उन्हें संयम पूर्वक आत्मोन्नति की साधना में लगाता है।
ऋत की स्वर्णिम गोद में बैठा हुआ व्यक्ति पानी के बबूले को ऐंठ में इतराता हुआ, टेढ़ा-2 चलता हुआ देख कर हंसता है। बीमारी के एक झटके में शरीर की सारी चमक-दमक काफूर हो सकती है, घटना चक्र की एक लात में धन, पद, सत्ता धूल में मिल सकती है। मौत की डाढ़ में उलझा हुआ इंसान किस विरते पर घमंड से इठा जाता है? विद्या में, बल में, बुद्धि पद में, योग्यता में, वैभव में एक से एक बड़े इस दुनिया मौजूद हैं। इन घमंड से गला फुलाने वालों की अज्ञता को क्या कहा जाय? अनेकों का वैभव मुझ से बढ़ा-चढ़ा है यह जानते हुए भी मूर्ख लोग अपने आपको सबसे बड़ा समझते हैं। दूसरों पर रौब, धौंस, भय, आतंक जमाकर अपनी महत्ता प्रकट करने की ओछी नीति से न जाने कैसे उन्हें सन्तोष हो जाता है? सर्प, बिच्छू, व्याघ्र, चोर, लुटेरे, भूत, पिशाच आदि से लोग कुछ देर के लिए आतंकित तो रहते हैं, पर किसी का भी हृदय उनकी महत्ता स्वीकार नहीं करता। वरन् हर एक के मन में उनके प्रति घृणा, द्वेष, विरोध, शत्रुता की भावना रहती है, यह देखते हुए भी जो दर्प प्रकट करके अपना सिक्का जमाना चाहता है, अपना बड़प्पन प्रकट करना चाहता है उसे अज्ञानी के अलावा और क्या कहा जाय? कुछ लोग अपना ऐश्वर्य प्रकट करने के लिए फिजूलखर्ची का आश्रय लेते हैं। विवाह, शादी, पोशाक, सजावट, सवारी आदि में जहाँ थोड़ा धन खर्च करने से आसानी से काम चल सकता है वहाँ गर्वोन्मत्त लोग अन्धाधुन्ध पैसा फूँकते हैं। अपव्यय करना, धन का अनावश्यक कार्यों में खर्च करना, एक प्रकार से लक्ष्मी माता का अपमान है। माता के इस अपमान में भी जो लोग बड़प्पन समझते हैं उन्हें क्या कहें? वेद भगवान ने ऐसे लोगों के लिए “अप्रचेतसः” शब्द ठीक ही प्रयुक्त किया है। वस्तुतः वे मूढ़, मूर्ख, बेवकूफ ही हैं। अपने मन में वे भले ही अपने को बड़ा चतुर चालाक समझते रहें।
ऋत सेवी, सत्य परायण, श्रेय मार्ग में लगा हुआ व्यक्ति, वस्तुस्थिति को समझता है, तत्व का ज्ञान होने से उसे भली प्रकार विदित होता है कि क्या सत्य है, क्या असत्य है? क्या अविनाशी है, क्या नाशवान है? क्या कर्म है, क्या अकर्म है? क्या लाभ है, क्या हानि है? इस ज्ञान के कारण वह ऋत की सुनहरी गोद में आ बैठता है, अपना जीवनक्रम सात्विकता से परिपूर्ण बना कर यज्ञ मय जीवन व्यतीत करता है। सत्कर्म, सद्विचार, सद्भाव, सत्संग में तल्लीन रहता है, परमार्थ ही उसका स्वार्थ होता है। उच्च दृष्टिकोण द्वारा, सच्चाई और सेवा की सद्भावना के साथ किये हुए साधारण कार्य भी यज्ञ रूप हो जाते हैं। इस प्रकार वह ज्ञानी सदा यज्ञ करता रहता है और हर घड़ी आत्म शान्ति का मधुर रसास्वादन करता है और अन्त में जीवन लक्ष को प्राप्त कर लेता है।
इस प्रकार सुनिश्चित, सत्पथ पर चलने वाले लोग प्रायः भौतिक दृष्टि से बहुत बड़े अमीर नहीं बन पाते, विपुल सम्पत्ति के स्वामी वे नहीं हो पाते, अनियंत्रित विषय भोगों के साधन भी उनके पास नहीं होते, गर्व करने की भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसी दशा में दुनियादार आदमी, उनका महत्व नहीं समझते बल्कि कई बार तो उन्हें असफल, अयोग्य, अभागा आदि शब्दों से व्यंग भी करते हैं। परन्तु चित्र का दूसरा पहलू भी है- जो बुद्धिमान हैं, मेधावान् हैं, ज्ञानी हैं तत्वदर्शी हैं वे अभिमुख होकर उनकी प्रशंसा करते हैं, धर्म का धन ही सच्चा धन है, सत् परायणतत्व की तृप्तिदायक भोग है, आत्म गौरव ही सच्चा गर्व है। इस प्रकार ज्ञानी लोग उस ऋत परायण को सच्चा धनी, सफल और चतुर समझते हैं और अभिमुख होकर हृदय से उसकी प्रशंसा करते हैं, प्रतिष्ठा करते हैं।
मायाबद्ध, अचेतस् अज्ञानी अलग रास्ते पर चलते हैं, उन्हें आत्मिक जगत् से कुछ प्रयोजन नहीं, भौतिक जगत में ही उलझते-सुलझते, हंसते-रोते व्यस्त रहते हैं। दूसरी ओर ऋत सेवी, आत्मकल्याण को प्रधानता देता है, शरीर को किराये का मकान समझ कर उसकी चौकसी और आवश्यकता पूर्ति के लिए साँसारिक कार्य करता है, सामाजिक उत्तरदायित्वों को, कर्त्तव्यों को निवाहता है, पर इसमें इतना लिप्त नहीं होता कि आत्म चेतना को भूल जाय तथा अनीति के मार्ग पर चलने लगे। इस प्रकार ज्ञानियों और अज्ञानियों के रास्ते अलग-अलग हो जाते हैं। एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं।
ऋत मार्ग पर चलता हुआ ज्ञानी अन्त में परमात्मा तक पहुँच जाता है उसका लक्ष मिल जाता है परन्तु अज्ञानी, उल्टे मार्ग पर चलने वाला मूर्ख, विचित्र माया की मृगतृष्णा में भटकता हुआ किसी गहरे गर्त में जा गिरता है और डूब मरता है। पाप के पत्थर सिर पर लाद कर संसार सागर से पार नहीं हो पाता वरन् बीच में ही डूब करता है। एक तैरने का मार्ग है दूसरा डूबने का। ज्ञानी यज्ञ रूपी नौका पर सवार होकर पार होता है, और अज्ञानी पाप पाषाणों के बोझ से डूब मरता है। वेद भगवान, इस ध्रुव सत्य को, अटल तथ्य को, सर्व साधारण के लिए इस मंत्र द्वारा प्रकाशित करते हैं और सावधान करते हैं कि यदि सत् मार्ग छोड़ कर असत् मार्ग पर चले तो ऐ ज्ञानियों! मझधार में डूब मरोगे।
ईश्वर पर अपनी मर्जी मत लादो, शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति में ईश्वर की मर्जी को ही चलने दो। उसमें ईश्वर की मर्जी को ही अपनी मर्जी बना लो। -स्वामी रामतीर्थ
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स्त्रियाँ लड़के और शूद्र राष्ट्र रूपी वृक्ष की जड़ें हैं। जड़ को योग्य खाद और पानी देकर वृक्ष को अधिक सम्पन्न बनाने का हमारा पहला कर्त्तव्य होना चाहिए।
-स्वामी रामतीर्थ
-जब हम भोगेच्छा से परे होंगे तभी आनन्द मिलेगा। पहले कामना ही सहायक थी, अब वही बाधक है।
-हम जब व्यक्तित्व से परे होंगे तभी वास्तविक व्यक्तित्व प्राप्त होगा। “अहं” पहले सहायक था, अब वही विघ्नकर्ता है।
-जब हम मानवता से परे होंगे तभी मानवीय बन सकेंगे। “पशु” पहले हमारा साथी था, अब वही बाधक है।
-बुद्धि को व्यवस्थित स्मृति में रूपांतरित कर समग्र आत्मा को ज्ञान ज्योतिस्वरूप बनाओ, यही तुम्हारा लक्ष्य है।
-प्रयत्न को आत्मबल के सहज और सम्राट के समान मुक्त प्रवाह में रूपांतरित करो। समस्त आत्माओं को शक्ति के स्वरूप में पहचानो, यही तुम्हारा लक्ष्य है।
-भोगेच्छा को सत्वयुक्त आनन्द की पराकाष्ठा में रूपांतर करो। आत्मा का आनन्दस्वरूप प्राप्त करना ही तुम्हारा लक्ष्य है।
-अपने छोटे से व्यक्तित्व को विराट् व्यक्तित्व में परिवर्तित करो। आत्मा को दिव्य बनाना ही तुम्हारा लक्ष्य है।
-पशु से मिटकर पशु के चालक बनो, गौचारक श्री कृष्ण का स्वरूप प्राप्त करो। गौ से मिटकर गोपाल बनो, यही तुम्हारा लक्ष्य है।
-मानव प्रगति को प्राप्त हो, ऐसी तुम्हारी इच्छा हो तो पुरातन क्षीण समय के सर्वमान्य रूप धारण करके बैठे हुए विचारों का शोधन करो। विचारों का इस प्रकार शोधन करने से सुषुप्ति को प्राप्त विचार शक्ति जागृत हो उठती है और नवीन सृजन करने लगती है। यदि शोधन न किया गया तो मानवी मन याँत्रिक पुनरुक्ति के चक्कर में ही भ्रमित रहता है और यह याँत्रिक गति ही मन का सत्य धर्म है, ऐसा भ्रमवश मान बैठता है।
-अपनी धरणी के आस-पास चक्कर लगाने की एक मात्र गति करने के लिए ही मानव का आत्मा नहीं सृजित हुआ है, अखण्ड-ज्योति के भंडार रूप सत्य के सूर्य की भी वह प्रदक्षिणा करता है।
-प्रथम अन्तर में अपनी आत्मा का मान जागृत करो, तत्पश्चात् विचार करो और तब कर्म में प्रवृत्त हो जाओ।
-सजीव विचार सृष्टि ही भविष्य की दुनिया है। सर्व सत्यकर्म विचार के मूर्त स्वरूप है। “समस्त ब्रह्माण्ड किस कारण अस्तित्व को प्राप्त हुआ है?” क्या तुम इसे जानते हो?-कारण यह है कि भगवान के दिव्य चैतन्य में एक विचारतरंग लीला करने लगी इसीलिए।
-जीवन के लिए विचार अपरिहार्य नहीं। फिर जीवन का आदि कारण कोई मानसिक विचार नहीं है। विचार तो जीवन को आविर्भूत करने का एक साधन मात्र है। “स्व विचारों में मैं जो देख सकता हूँ, उसी स्वरूप को मैं प्राप्त कर सकता हूँ। मन के विचार मुझे जिन अमुक-अमुक कार्यों का सम्पादन करने की सूचना देते हैं वे सब मैं कर सकता हूँ। विचार मुझे जो दर्शन कराते हैं, वह स्वरूप मैं धारण कर सकता हूँ। ऐसी अविचल शक्ति, समर्थता, श्रद्धा प्रत्येक मानव में होनी ही चाहिए क्योंकि उस के अन्दर में भगवान वास कर रहे हैं।
-अभी तक मानव ने जो कुछ प्राप्त किया है, उसी की पुनरावृत्ति करते रहना हमारा कर्त्तव्य नहीं। हमें तो केवल नवीन साक्षात्कार और मानव ने अभी तक स्वप्न में भी जिस की कल्पना नहीं की है, ऐसी प्रभुता प्राप्त करनी है।
-काल, आत्मा और सृष्टि यह तीनों हमारे क्षेत्र हैं। आशा, सर्जन, कल्पना, भावी दर्शन हमारे उत्साहक हैं। शक्ति, विचारणा और विश्वास हमारे सर्वसाधक शस्त्रास्त्र हैं।
-अभी हमारे लिए क्या-क्या प्राप्त करना शेष रहा है, जानते हो? देखो :-
-प्रथम तो प्रेम- क्योंकि अभी तक हमने केवल द्वेष और आत्मसंतोष की ही साधना की है।
-ज्ञान? क्योंकि अभी तक हम केवल स्खलन अवलोकन और विचारशक्ति को ही प्राप्त कर सके हैं।
-आनन्द? क्योंकि अभी तक हम केवल दुःख सुख तथा उदासीनता को ही प्राप्त कर सके हैं।
-शक्ति? क्योंकि अभी तक निर्बलता, प्रयत्न और विजय पराजय तक ही हम पहुँच सके हैं।
-जीवन? अर्थात् प्राण। अभी तक मानव केवल जन्म, मृत्यु और वृद्धि ही देख सका है।
-अद्वैत? क्योंकि अभी तक मानवजाति को युद्ध और स्वार्थ साधन करने की विद्या ही आती है।
-एक शब्द में कहें तो अभी हमें भगवान को प्राप्त करना है। हमें अपने को उसके दिव्य स्वरूप को प्रतिमा बनाकर आत्मा का पुनर्निर्माण करना है।
(ले.- श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)
सिद्धि ही जीवन का चरम एवं परम लक्ष्य है और उसके लिए साधक, साधन एवं साध्य की त्रिपुटी की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। इस त्रिपुटी में से एक भी सदोष है तो सिद्धि भी सदोष ही प्राप्त होगी, जिसे वास्तव में सिद्धि कहा भी नहीं जाना चाहिए। हमें कलकत्ता जाना है पर मार्ग दूसरा ही ले लिया या चलने में उत्साह की मन्दता हो गई और चलना बन्द कर दिया या रास्ते में ही अन्य स्थान को कलकत्ता समझ कर जम गये, तो कलकत्ता पहुँचने की इच्छा की सिद्धि न हो सकेगी। इसी प्रकार यदि साध्य को ही निश्चित नहीं किया या भ्रमवश गलत वस्तु को ही साध्य मान बैठे तो सिद्धि नहीं मिलेगी। एक गंभीर भूल जो हम सभी कर बैठते हैं, वह है साधनों को साध्य मान लेना। इससे हमारी प्रगति रुक जाती है। योग रूप साधन का साध्य मोक्ष प्राप्त करना है पर योग साधन करते-करते बीच में विभूतियाँ सहज रूप में प्राप्त होती हैं। यदि हम उनके आकर्षक रूप में मोहित हो गये तो आगे बढ़ नहीं सकेंगे, हमारी प्रगति वहीं रुक जायेगी।
विश्व के अधिकाँश प्राणी तो साध्य को निश्चित ही नहीं कर पाते। उनके लिए तो साधन ही साध्य होता है। अतः उनको सिद्धि की प्राप्ति न होना तो स्वाभाविक है पर कुछ समझदार कहे जाने वाले व्यक्ति साध्य को ठीक से जान लेते हैं, पर थोड़ा चल कर वे भी विचलित हो जाते हैं क्योंकि सिद्धि का मार्ग बहुत लम्बा एवं विकट है। उसको पूर्ण रूप से पार कर लेने के लिए असाधारण धैर्य, उत्कृष्ट इच्छा, अनुपम लगन, एवं काफी पुरुषार्थ की आवश्यकता है।
रुचि-वैचित्र्य के कारण विश्व के समस्त प्राणियों के साध्य की कल्पना एक–सी न होकर विभिन्न प्रकार की हैं, पर सबके मूल में एक ऐसी वस्तु अवश्य है, जो सभी की चाहना का सार है, वह है “सुख की अनुभूति करना’। अतः साधारणतया उसे ही सबका साध्य कह सकते हैं। कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वही उसे प्रतिफल मिलता रहता है। अतः सुख कैसे मिले?-यही समस्या सबके सामने खड़ी है। इस विकट समस्या को सुलझाने का प्रयत्न अपनी-अपनी बुद्धि, योग्यता एवं प्रतिभा के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार से मनीषियों ने किया है, पर उनमें दो तरह की दृष्टि ही प्रधान रूप से लक्षित होती है। बाह्य दृष्टि वालों ने तो सुख का साधन विभिन्न वस्तुओं की अधिकाधिक परिमाण में प्राप्ति को जाना है। फलतः विश्व में नित्य नई वस्तुओं का आविष्कार हुआ एवं होता जा रहा है। और उनके अधिकाधिक प्राप्त करने में विश्व जुटा हुआ है। हमें ज्यों-ज्यों अधिक धन अधिक वस्तुएं मिलती जाती हैं, हमारी तृष्णा बढ़ती ही जाती है, तृप्ति और शान्ति नहीं प्राप्त होती, हमारी बेचैनी बनी रहती है। इस एक बात को लेकर अंतर्मुखी वृत्ति वाले मनीषियों ने सुख की प्राप्ति के इस तरीके को गलत बतलाते हुए आवश्यकताओं को कम करने तथा वृत्तियों को वश में कर संतोष और आत्म साक्षात्कार करने को ही सुख का साधन निश्चित किया। वास्तव में अनुभूति भी इसी को सत्य बतला रही है, पर अनादि अभ्यास तथा संस्कार के वश हो अंधानुकरण की प्रवृत्ति से छूटना भी तो सहज नहीं। विकट मार्ग में जाने का साहस और उत्साह भी सबके लिये सम्भव नहीं। अतः बिरले व्यक्तियों को छोड़ सभी बाह्य पदार्थों की प्राप्ति को ही साध्य मानकर रात-दिन उसी के पीछे भागते फिरते हैं।
मनुष्य जब कोई प्रवृत्ति करता है, तो किसी कारण से। कारण के बिना ‘कार्य नहीं होता। हम अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति के कारण को ढूंढ़ें, तो सबके मूल में वही भूल व्याप्त मिलेगी। यहाँ निम्न लिखित उदाहरण काफी होंगे। विचार शील प्रत्येक मनुष्य जानता है कि हम भोजन करते हैं शरीर-रक्षा और पोषण के लिये। धन कमाते हैं आवश्यक सामग्री को जुटा सकने के लिये। पढ़ते हैं तो ज्ञान बढ़ाने के लिये या बुद्धि विकास के लिये। धर्मानुष्ठान करते हैं परमात्मपद प्राप्त करने के लिये। घर बनवाते हैं सर्दी-गर्मी आदि से बचने के लिये। कपड़े पहनते हैं शरीर की रक्षा के लिये। खेती आदि करके उत्पादन करते हैं खाने के लिये। बोलते हैं अपने भाव दूसरों तक पहुँचाने के लिये। लिखते हैं तो याद रहने और अधिक समय तक दूसरों के लाभ उठाते रहने के लिये। इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्ति सकारण है, पर हमें देखना यह है कि उसका मूल उद्देश्य उससे पूरा होता है या नहीं।
अब हमारी भूल कहाँ होती है, टटोलिये। हम भोजन करते हैं, पर उसमें शरीर के पोषण को ध्यान रख बीच में ही पथभ्रष्ट ही स्वाद को साध्य समझ लेते हैं। फलतः बहुत बार भूख से अधिक खा लेते हैं या अनावश्यक गरिष्ठ पदार्थ खा लेते हैं, जिससे शरीर रक्षा का उद्देश्य नष्ट होता है और उल्टे उसकी हानि हो जाती है। हमारा साध्य शरीर-रक्षा न रहकर बीच की भूलभुलैया का मजा लेना हो जाता है। वास्तव में खाना साधन है पर उसे साध्य मान हम भूल को छोड़ देते हैं। उसी प्रकार शरीर रक्षा की जाती है दीर्घायु और धर्म सामने के लिये, पर जब हमारा शरीर निरोग हुआ, तब हम भोगों में जुट जाते हैं। उसी के शृंगार और सार सम्भाल में सारा समय और जीवन बरबाद कर देते हैं। अतः साध्य-धर्म को छोड़ शरीर रूपी साधन को साध्य मान उसी से ममत्व बढ़ा लेते हैं। यह हाल धन कमाने का है। उसका साध्य जीवनोपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति और सद्कार्य करना है। पर आवश्यक धन की प्राप्ति हो जाने पर भी हम उसी के संग्रह में जीवन व्यतीत कर देते हैं। आखिर उस परिग्रह बढ़ाने का उद्देश्य क्या? मानव क्यों व्यर्थ का श्रम करता है और चिंता मोल लेता है? धन रूप साधन को साध्य मान लेने के कारण मनुष्य उसी के पीछे चिपका रहता है। सद्कार्यों में व्यय करते नहीं बनता और जीवन के अन्त तक कमाता ही रहता है। उसे विश्रान्ति कहाँ?
यही हाल घर-मकान और अन्य वस्तुओं के संग्रह तथा उत्पादन का है। एक घर बनता है, फिर धन बढ़ा तो उसको गिरा नया बनाता है। उसको एक घर चाहिए, पर 10-20 बढ़ाता जाता है। कहिये, यह पागलपन नहीं तो क्या है? आखिर अमर-पद तो कोई लिखा के लाया नहीं। दो दिन की जिन्दगी है। फिर उसे झमेलों में बरबाद कर देना कहाँ की अकलमन्दी है? पर भूल में वही भूल यहाँ भी काम कर रही है। घर आदि को ही साध्य मान, उन्हीं के पीछे लिपटे और भूल साध्य को भुला दिया गया। उसी का यह दुष्परिणाम है। हमारी भूल की कहानी कहाँ तक कही जाय। लिखते-लिखते पोथा हो जायेगा।
प्रत्येक धर्म में कुछ व्रत नियम और अनुष्ठान पाये जाते हैं। उनका उद्देश्य पशुता से ऊपर उठकर मानवता की प्राप्ति करना होता है। पर, उन व्रत-नियमों और अनुष्ठानों को करते-करते हमारी उम्र बीत जाती है। फिर भी हमारी पशुता तनिक कम नहीं होती। हम में मानवोचित गुणों का भी विकास नहीं होता। फिर मोक्ष की प्राप्ति की तो बात ही करना व्यर्थ है। हम मन्दिर, मस्जिद और गुरुद्वारे में जाते हैं। उसका साध्य क्या है। यही न, कि हमारे जीवन में नैसर्गिक गुणों का विकास हो? दर्शन, भजन और चिन्तन करते हैं आत्म विकास के लिये। धर्म ग्रन्थ पढ़ते हैं और व्याख्यान सुनते हैं इसलिये कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की जीवन में प्रतिष्ठा हो, हमारा नैतिक जीवन आदर्शमय बने। सामयिक, प्रतिक्रमण, क्षामन, क्षामना करते हैं, इसलिये समत्व भाव की वृद्धि हो, क्रोध, मान, माया एवं लोभ की कमी हो, राग-द्वेष को छोड़ें, अपने दोषों को स्मरण कर भविष्य में उनसे हटते रहें, क्षमत-क्षामना कर द्वेष को हटाकर हृदय को पवित्र-उदार और विशाल बनावें। पर ऐसा होता कहाँ है। नित्य प्रतिक्रमण और सामयिक करते रहने पर भी हमारी वृत्तियाँ पुरानी हैं एवं धर्म कार्य न करने वाले दूसरों की भाँति ही उसमें भी वे सब दोष पाये जाते हैं। कभी-कभी तो अधिक मात्रा में। कहिये, साधन दूषित है या साध्य गलत है। क्योंकि साध्य तो प्राप्त होता नहीं। अतः कोई कमी तो अवश्य है ही।
विचार करने पर यहाँ भी वही भूल घर किये बैठी प्रतीत होती है। धर्म ग्रन्थ पढ़कर सामयिकता क्रिया कर हमने अपना काम कर लिया यही हमारी धारणा प्रतीत होती है और वास्तव में यही साधनों को साध्य मान लेना है। किन्तु साध्य दूर है। वहाँ तक हमें पहुँचना है, पर सोचने-विचारने का तनिक भी कष्ट नहीं उठाते। इस भूल का दुष्परिणाम यहीं तक नहीं रुकता। पर साधनों को साध्य मान लेने के कारण ही साधनों को लेकर झगड़े होते हैं, जिससे साध्य का सर्वथा खून हो जाता है। धर्म के लिए जो साधन हैं उन्हीं को लेकर हम धर्म के मूल को जलाने वाले द्वेष, गाली, गलौज, ईर्ष्या एवं मार-काट तक कर बैठते हैं।
समस्त धर्मों के व्रत, नियम, पूजा-पाठ, देव-गुरु-भक्ति आदि के विधि विधानों में एक ही साध्य समान रूप से प्रतिष्ठित मिलता है- वह है मोक्ष की उपलब्धि। जिससे समस्त दुःखों से छुटकारा मिल जाता है जिसके लिए राग द्वेष रूपी कालुष्य को हटाकर समत्व भाव रूप आत्म-शुद्धि की अत्यन्त-आवश्यकता है। जब तक बाह्य पदार्थों में आसक्ति या ममत्व भाव है, तब तक राग द्वेष का झगड़ा लगा ही रहेगा। अतः जिस किसी प्रवृत्ति द्वारा हम निजात्म स्वरूप के निकट पहुँचते हैं, वही उपादेय है।
जिससे बीत राग भाव की प्राप्ति न हो, वह साध्य अधूरा है। यही मान कर चलते जाना है। एक ही स्थान पर पहुँचने के मार्ग अनेक हो सकते हैं। अतः मार्ग के लिये हमें झगड़ा नहीं करना है। लक्ष्य को ठीक से निर्धारित कर सम्मुख रखना है और उसकी प्राप्ति हो रही है या नहीं, या किस हद तक हो रही है, इस तुला पर अपनी प्रवृत्ति को तौलते रहना है। यदि राग द्वेष बढ़ रहे हैं तो उसके कारण निकाल के उन्हें हटाने में प्रयत्नशील रहना है।
(श्री विजयमुनी जी)
जीवन एक प्रश्न है, और मृत्यु है उसका अटल उत्तर! आत्मा अज्ञान काल से, जीवन और मृत्यु के झूले पर झूलता चला आया है। जन्म और मरण का खेल वह अनादि काल से खेलता आ रहा है। परन्तु, अब सवाल यह है कि आत्मा अपनी उलझनों को कैसे सुलझा सकता है?
भारतीय दर्शनकारों ने अपनी-अपनी सूझ और अनुभव के आधार पर, आत्म कल्याण का जो मार्ग बतलाया है उसे संक्षेप में यहाँ लिख देना आवश्यक है।
भक्तिवाद का कहना है कि ‘मानव जीवन को सरस और सुन्दर बनाने के लिए भक्ति मार्ग सब से अधिक उपयुक्त और सरल है। प्रभु का नाम स्मरण कोटि-कोटि जन्म संचित कर्मों को नष्ट कर डालता है। अतएव भक्त शिरोमणि मलूकदास जी कहते हैं कि “कुछ करने धरने की जरूरत नहीं है केवल भगवान के नाम की माला फेरने भर से जीवन निर्वाह हो जायगा।” मलूक दास जी आलस्यवाद और भक्तिवाद में कोई अन्तर नहीं समझते। और इसीलिए यह कह बैठे-
“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए सब के दाता राम।”
भक्तिवाद से प्रभु नाम स्मरण मात्र से ही बैकुँठ का प्रवेश पत्र मिल जाता है।
ज्ञानवाद का दावा है कि मुक्ति के लिए भक्ति नहीं, ज्ञान आवश्यक है। भक्ति अंधी है, वह ठीक-ठीक मार्ग का निर्देश कैसे कर सकती है? अंधा मनुष्य जब स्वयं ही अपना गन्तव्य मार्ग नहीं जानता? तब यह दूसरों का क्या खाक बतलाएगा? अतएव ज्ञानवाद ज्ञान को ही मुक्ति का साधन बतलाता है।
न्याय और वैशेषिक दर्शन का कहना है कि आत्म ज्ञान द्वारा ही अपने बंधनों से मुक्ति हो सकती है। देखिए ज्ञानवादी दर्शन यह कहते हैं-
“तत्वज्ञान सति दोषा, भावस्ततो जन्मा भाव” तत्व परिज्ञान होने से दोषों का नाश हो जाता है और फिर तो जन्म और मृत्यु का प्रश्न ही समाप्त समझिए। जिस किसी भी मनुष्य का ज्ञान खूब परिपक्व हो गया है, वही कैवल्य प्राप्त कर मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।
जीवन को प्रगतिशील बनाने के लिए ज्ञान और आचार दोनों ही आवश्यक हैं। सच्चा दर्शन ज्ञान और आचार दोनों से समन्वय और सन्तुलन चाहता है। ज्ञान तथा आचार का सन्तुलन ही जीवन-प्रगति के लिए आवश्यक है।
“पढनं ताणँ तओ दया” ज्ञान और आचार दोनों तत्व ही जीवनोत्कर्ष के लिए अनिवार्य बतलाए हैं। और भी देखिए, ‘ज्ञान क्रियाएँ मोक्षः’ अर्थात् ज्ञान और क्रिया के समन्वय से आत्मा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। क्या रथ कभी भी एक चक्र से गतिशील हो सकेंगे? क्या कोई पक्षी गगन में एक ही पर के बल से ऊँची उड़ान भर सकता है? ऐसा कभी नहीं होगा। फिर, ज्ञान और क्रिया के बिना मोक्ष कैसा?
जैसे प्रकाश और ताप दोनों सूर्य के गुण हैं, वैसे ज्ञान और आचार भी आत्मा के वास्तविक गुण है। जिस प्रकार अग्नि में स्वाहा और स्वधा दो शक्तियाँ प्रच्छन्न है, उसी प्रकार आत्मा में भी विचार और आचार दो शक्तियाँ रही हुई हैं। उक्त दोनों शक्तियों के सहयोग और सन्तुलन से ही आत्मा कर्मों से मुक्त हो सकती है। जब विचारों का सम्बन्ध जीवन से टूट जाता है, तब वे निर्जीव हो जाते हैं। उनकी प्राण शक्ति का लोप हो जाता है।
एक अध्यापक जब अपने शिष्य को विज्ञान का शिक्षण देता है, उसको विज्ञान के प्रच्छन्न रहस्य बतलाता है, तब क्या इतने भर से ही शिष्य विज्ञान का रहस्य जान लेता है? नहीं कदापि नहीं। शिष्य विज्ञान के प्रच्छन्न रहस्यों को तब तक नहीं समझ पाता, जब तक कि अध्यापक प्रयोगशाला में पहुँच कर, कथित सिद्धान्त का प्रत्यक्ष नहीं करा देता है। शिक्षार्थी विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों में जो कुछ पढ़ता है। जब उसे वह प्रयोग शाला में प्रत्यक्ष देख लेता है, तभी उसे सिद्धान्तों के रहस्यों का परिज्ञान होता है।
अतएव आचार के बिना विचार का कोई मूल्य नहीं है। विचार तब आचार में आता है तभी उस का महत्व समझ में आता है। विचार और आचार दोनों सापेक्ष तत्व हैं।
महात्मा गाँधी ने एक बार छात्रों के समक्ष भाषण करते हुए कहा था- “पढ़ने का अर्थ ही आज गलत हो गया है। जो पढ़ कर गुणना न जानें, वे पढ़े नहीं हैं। जो गुन सकें, वे ही पढ़े हुए हैं। विचार और आचार के सन्तुलन से ही जीवन सुन्दर बनता है।” व्याकरणशास्त्र का नियम है कि कर्ता होकर भी जब तक क्रिया न हो वाक्य नहीं बन सकता। इसी प्रकार विचार के साथ आचार भी आवश्यक है।
आज का युग, एक बौद्धिक युग है। इस युग में मानवीय मस्तिष्क का विकास तो खूब हुआ है परन्तु मनुष्य को नैतिक भावना में बहुत कम सफलता मिली है। अतएव मनुष्य का ज्ञान निष्फल प्रतीत होता है। जीवन में समाज में और देश में जब कोई ऐसी समस्या आ पड़ती है जिसे हम अपने नैतिक आदेशों के प्रयोग से हल कर सकते हैं तब ही असफल ही रहते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस युग में मानव का बौद्धिक विकास तो अवश्य हुआ परन्तु नैतिक विकास नहीं हो पाया।
अतएव विचार और आचार का समन्वय करना, उस में सन्तुलन करना, दर्शन का मुख्य विषय रहा है। यह एक परखा हुआ मार्ग है कि आत्मा विचार और आचार के समन्वय से ही उन्नत और पवित्र होकर बन्धनों से छुटकारा पा सकती है।
पक्व विज्ञानः कैचल्यं लभते नरः।” साँख्य और योग भी ज्ञानवाद के ही मानने वाले रहे हैं साँख्य दर्शन का मन्तव्य है कि प्रकृति और पुरुष का भेदज्ञान ही मोक्ष प्रधान साधन है। साँख्य दर्शन मनुष्य का माया के साथ खुल कर खेलने को कहता है और फिर भी उस के लिए मोक्ष का द्वार खुला रखा है-
“हस, पिव, लल, खाद, दोद,
नित्य भुड्क्षस्व व भोगान यथामि कामं,
यदि विदितं ते कपिल मतं
तत्प्राणस्यति मोक्ष सौख्य मचिरेण। “
हँसना तथा खेलना-कूदना, खाना और पीना नाना विधि भोग भोगना। यह सब कुछ साँख्य मत में मोक्ष के प्रति बन्धक नहीं हैं। यह सब कुछ करते कराते भी यदि तुमने कपिल मुनि को साँख्य सिद्धान्त को, साँख्य को समझ लिया है तो फिर तुम्हारी मुक्ति को कौन रोक सकता है? प्रकृति और पुरुष की विवेक ख्याति ही मोक्ष का साधन है।
वेदान्त दर्शन तो ज्ञानवाद का प्रबल समर्थक है ही। “ब्रह्मचित् ब्रह्मैव भवति” जिसने ब्रह्म को समझ लिया वह तो बस ब्रह्म हो ही गया। वेदान्त का यह सुप्रसिद्ध सिद्धान्त है कि “ज्ञानान्मुक्तिः” ज्ञान के द्वारा ही मोक्ष सम्भव है। ज्ञान के बिना मुक्ति पाना दुराशा मात्र है। अतएव ब्रह्म और माया का विभेद जान लेने से मुक्ति मिलती है।
और, मीमाँसा दर्शन? वह ज्ञान का नहीं, बल्कि क्रियाकाण्ड के द्वारा मुक्ति का प्रतिपादन करता है। उसका कहना है कि यज्ञ और होमादिक के द्वारा ही आत्मा का कल्याण हो सकता है।
इस प्रकार सभी ने अपनी-अपनी बात कह डाली। दोनों ओर से ‘अतिवाद’ का प्रबल समर्थन मिला है। भक्त, भक्ति से आगे कदम नहीं बढ़ाता और ज्ञानी, ज्ञान की सीमा से बाहर पैर रखना पाप समझता है। और यज्ञ वादी तो भक्ति और ज्ञान दोनों को ही व्यर्थ समझता चला आया है।
आगमों में ज्ञानवाद को बड़ा महत्व दिया गया है। ज्ञान के बिना, प्रकाश और आलोक के बिना गन्तव्य स्थान का पता ही कैसे चलेगा? ज्ञान का जीवन में कम महत्व नहीं। परन्तु ज्ञान को ही सब कुछ समझ लेना, कहाँ की बुद्धिमता है? सच्चा दर्शन एकान्त को नहीं, अनेकान्त को स्वीकार करता है। वह कहता है कि जीवन को सुन्दर बनाने के लिए ज्ञान भी आवश्यक है, पर आचार की उपेक्षा से जीवन सुन्दर कैसे बना रह सकेगा?
(कुमारी कृष्णा सरीन एम. ए.)
महान् पुरुषों ने सत्य ही कहा है- “प्रेम में भगवान है” प्रेम और दुःख का जोड़ा है। जहाँ प्रेम हैं वहाँ दुःख अवश्य है। प्रेम से प्राण भी पृथक् नहीं हो सकते। प्रेम का क्षेत्र बढ़ने पर दुःख का क्षेत्र भी बढ़ जाता है। जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनका दुःख दूर करने के लिए हमें न्याय करना पड़ता है। अतः प्रेम और दुःख के विस्तार के साथ-साथ हमारे त्याग की भावना भी उत्कृष्ट होती जाती है। परिवार, समाज, देश और विश्व-धर्म के पालकों में से प्रत्येक को अपने-2 क्षेत्र में दुःखानुभूति होती है और उस दुःख को दूर करने के लिए वे अपने समस्त सुखों को त्याग देते हैं। परिवार से प्रेम करने वाली गृहणी और गृहस्वामी परिवार के सुख में अपने सुखों को होम देते हैं। समाज-प्रेमी समाज के सुख के लिए, देश-प्रेमी देश के सुख के लिए और विश्व-प्रेमी विश्व के कल्याणार्थ, अपने सुखों को तिलाँजली दे देता है। गौतम, अत्रि, कणाद, वशिष्ठ, भागीरथ इत्यादि अनेक ऋषि हो चुके हैं, जिन्होंने संसार के कल्याणार्थ भौतिक सुख वैभव को त्याग कर एकान्त वास किया और तपस्या चिन्तन और मनन के द्वारा निज आत्माओं को ईश्वरीय ज्ञान से अलोकित कर उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया। अतएव उन्होंने संसार को अमूल्य ज्ञान निधि भेंट की। वे मानव के हित चिन्तक और विश्व धर्म के पालक थे।
धर्म की उच्चतम श्रेणी विश्व-धर्म है जो कि पूर्ण धर्म है। विश्व धर्म शरीर है तो गृह, कुल, समाज, और देश धर्म उसके अंग। इन अंगों के मिलने पर (जहाँ) विश्व धर्म रूपी शरीर पूर्ण होता है। और पृथक् होने पर उसका अस्तित्व नहीं रहता। विश्व धर्म के पालक में समस्त धर्मों का समन्वय होता है। छोटी-2 धर्म रूपी नदियाँ विश्व-धर्म रूपी समुद्र में समा जाती हैं। मनुष्य जीवन के ध्येय की पूर्णता विश्व-धर्म में है। यदि शरीर का कोई अंश सड़ रहा है और उससे सारे शरीर को हानि पहुँचने की सम्भावना है तो डॉक्टर उस अंग को शरीर से पृथक् करके शरीर की रक्षा करते हैं। इसी प्रकार धर्माचार्यों ने धर्म की श्रेणियों में विरोध होने पर विश्व-धर्म की रक्षा के लिए शेष धर्मों की उपेक्षा सर्वथा उचित मानी है। युद्ध क्षेत्र में खड़े अर्जुन के मन में कुल-धर्म और लोक विधायक विश्व-धर्म के सम्बन्ध में भ्रम उत्पन्न हुआ और वह विश्व धर्म की महानता को भूलकर कुल-धर्म के चक्कर में पड़ गया। उस समय श्री कृष्ण ने उसको कुल-धर्म का उल्लंघन करके विश्व-धर्म के पालन का उपदेश दिया। भगवान् की भक्ति में तन्मय मीरा को विश्व-धर्म के लिए गृह परित्याग करना पड़ा, उसने दोनों धर्मों को निबाहने का शक्ति भर प्रयत्न किया, किन्तु उसके मार्ग में अधिक से अधिक रोड़े अटकाये गए। जिस समय उसके लिए दोनों धर्मों का पालन निताँत असंभव हो गया तो वह कुल-धर्म की उपेक्षा करने के लिए विवश हो गई। लंका पति रावण के भाई विभीषण को भी ठीक ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा। साँसारिक व्यवहारों में छोटे बड़े सभी के सम्मुख धर्म के अंगों में विरोध के विकट अवसर आते हैं। ये व्यक्ति चाहे सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक हों या संन्यासी अथवा गृहस्थी। सामाजिक कार्यकर्ता के सामने समाज की दशा सुधारने में अपने बड़े-बूढ़ों के कुपित होने का भय और सामाजिक सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न उठता है। राजनैतिक कार्यकर्त्ता को निज कर्त्तव्य पालन करने में अपनी जाति तथा परिवार के लोगों को भारी कष्ट होने तथा हत्यायें होने तक की सम्भावना होती है। ऐसे अवसर पर कार्य-कर्त्ता यदि सम्बन्धियों के भौतिक शरीरों के मोह में पड़कर व्यापक धर्म की अवहेलना करते हैं तो वे स्वयं अनेक प्रकार की हानियाँ उठाते हुए मानव समाज का अनिष्ट करते हैं। दूरदर्शी श्री कृष्ण को सदियों पूर्व यह ज्ञात हो गया था कि आधुनिक जीवन की बढ़ती हुई जटिलताएँ मनुष्य के जीवन में धर्म सम्बन्धी संघर्ष और विरोध के अधिकाधिक अवसर लायेगी। अतः उन्होंने संसार को ज्ञान का यह अमृत पिलाया जो ऐसे प्रत्येक अवसर पर मनुष्य को कर्त्तव्य ज्ञान कराकर धर्म का पथ सुझाता है। गीता में स्थान-2 पर यह स्पष्ट कहा गया है कि व्यापक धर्म की अवहेलना किसी भी दशा में उचित नहीं।
धर्म के अंगों में विरोध का कारण मानव हृदय की संकीर्णता है जो दुःख का मूल है और कभी आनन्द दायक नहीं। एक गृहस्वामी अपने रोगों, बालक का उपचार कराने में तन-मन-धन लगा देता है। लेकिन सड़क के किनारे ठंड से ठिठुरते हुए बच्चे के लिए उसके हृदय में करुणा का श्रोत नहीं उमड़ता। एक गृहणी अपने बच्चे को फलता-फूलता देखकर हर्षित होती है और द्वार पर खड़े भूख से व्याकुल बच्चे को चार गालियाँ सुनाकर बाहर निकाल देती है। ‘समाज’ शब्द से आप मानव समाज की कल्पना करेंगे। क्या मनुष्य ने मानव समाज के टुकड़े नहीं कर दिये? हमारे ही देश में एक ईसाइयों का समाज है दूसरा सवर्णों हिन्दुओं का तीसरा हरिजनों का चौथा सिक्खों का पाँचवा मुस्लिम लीगियों का और छठा राष्ट्रीय मुसलमानों का। इनमें भी प्रान्तों के अनुकूल जातियाँ बन गई हैं। पहाड़ी, आसामी, बंगाली, पंजाबी, सिंधी, मारवाड़ी इत्यादि। जब प्रत्येक सीमित समाज राष्ट्र के कल्याण की अवहेलना करके अपने समाज की उन्नति करता है। तो वह एक ओर अपना नाश करता है और दूसरी ओर राष्ट्र रूपी शरीर के नाश का कारण बनता है। क्या लीगी भाइयों ने स्वार्थान्ध होकर अपने सीमित समाज के सुख के लिए देश के निरीह प्राणियों के गले पर छुरे नहीं चलाये? जो अनर्थ एक साम्प्रदायिक सामाजिक धर्म के पालक ने किया वही एक देश-धर्म का पालक भी कर रहा है। जो देश-प्रेमी अपने देश के लिये मर मिटने को तैयार है। उसकी रक्षार्थ अपना सिर हथेली पर रखे हैं। किन्तु दूसरे देशवासियों की रोटी छीन कर अपने देश वासियों का पेट भरता है और उनको भूखों तड़पने के लिए छोड़ देता है। उनका पैसा छीन कर अपने देश को धनी बनाता है और उनको निर्धनता का सामना करने के लिए छोड़ देता है। उनके दुःख से उसका हृदय दयार्द्र नहीं होता। आप ऐसे देश प्रेमी को क्या कहेंगे? धर्म के स्वरूप का यह कैसा उपहास है। कैसा आडम्बर है? संसार प्रसिद्ध देश भक्त अंग्रेज जाति ने क्या भारत के साथ ऐसा ही व्यवहार नहीं किया, यूरोप के बड़े-2 देश रूस और अमेरिका क्या संकुचित देश-धर्म का पालन नहीं कर रहे? आधुनिक मनुष्य के दुख मय जीवन का क्या यह वास्तविक कारण नहीं? जिस प्रकार शरीर के अंग शरीर से पृथक होने पर कुछ भी कार्य नहीं कर सकते, उसी प्रकार शरीर रूपी विश्व-धर्म जो कि पूर्ण-धर्म है, लोक विधायक है और जिससे समस्त सृष्टि की स्थिति और रक्षा है- से पृथक होकर गृह, कुल, समाज और राष्ट्र-धर्म कुछ अर्थ नहीं रखते। बल्कि वे मनुष्य के विनाश का कारण बनते हैं। आज मनुष्य विज्ञान और कला की उन्नति के शिखर पर पहुँच कर भी विनाश की ओर जा रहा है, क्योंकि धर्म के अंग अपने प्राण, विश्व धर्म से सम्बन्ध तोड़ बैठे हैं। मानव का कल्याण इसी में है कि गृह, कुल, समाज और राष्ट्र-धर्म विश्व-धर्म के अधीन होकर उसके संकेत पर कार्य करें। तभी मनुष्य मानसिक संघर्ष से अवकाश पाकर लोक के मध्य मंगल का विधान कर सकेगा। उसके धार्मिक विचारों में आज जो विरोध और विषमता फैली है वह मिट जायगी और सर्वत्र समता का राज्य होगा।
मनुष्य के आत्मिक विकास के लिए धर्म के विभिन्न अंगों को ध्यान रखते हुए हिन्दू धर्म में चार आश्रम की व्यवस्था की गई है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्याश्रम में मनुष्य का धर्म, प्रेम और कर्त्तव्य अपने तक सीमित रहता है, गृहस्थ आश्रम में समाज और परिवार तक बढ़ता है, वानप्रस्थ आश्रम में समाज और देश तक बढ़ता है, और संन्यास आश्रम में मनुष्य का धर्म, प्रेम और कर्त्तव्य विश्व के प्रति होता है। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम् की अवस्था है जब सारी वसुधा अपना परिवार बन जाती है। प्रत्येक धर्म के पालन की विशेष अवस्था को छोड़ कर चारों आश्रमों में धर्म के विभिन्न अंगों का थोड़ा समावेश हो जाता है। मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति, व्यक्तित्व के विकास और धर्म के तत्व का इतना सुन्दर समन्वय अन्यत्र नहीं मिलता।
धर्म का पूर्ण विकास और ईश्वर के सत् स्वरूप का प्रकाश महान व्यक्तियों में होता है, जो पूर्ण धर्म-विश्व-धर्म-का पालन करते हुए व्यक्तित्व रूपी पुष्प को कर्म-ज्ञान-भक्ति के द्वारा विकसित करते हैं। ऐसे मनुष्य पूर्ण-धर्म स्वरूप माने गये हैं। मनुष्य के लिए वह स्वाभाविक हो गया है कि वह उनको भगवान का अवतार मानें। जब एक वस्तु में हम किसी दूसरी वस्तु के गुणों की अधिकता देखते हैं तो उस वस्तु में दूसरी वस्तु का आरोप कर दिया करते हैं। सुन्दर मुखवाली स्त्री की उपमा चन्द्रमा से दी जाती है। इसी प्रकार विश्व-प्रेमी में ईश के गुणों का बाहुल्य देख कर मनुष्य ने उसमें ईश्वर का आरोप कर दिया। अज्ञानी मनुष्य इन महान् पुरुषों में ईश्वरीय विभूति का प्रकाश न देख कर उनके नाम और मूर्ति तक सीमित रह गये, आगे न बढ़ सके। जिसका परिणाम हुआ-धर्म में ढोंग और आडम्बर की वृद्धि।
अभ्युदय और निःश्रेयस अर्थात् धर्म का विकास और मोक्ष की प्राप्ति इसी लोक के मध्य मानव समाज के व्यवहार के द्वारा होती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र ने विश्व के एक कोने में बैठ कर तपस्या नहीं की थी। कर्मठ होते हुए भी उनका समस्त जीवन एक लम्बी तपस्या था। निष्काम भावना से अपने व्यवहारों में धर्म पालन करते हुए वह संसार के लिए एक आदर्श स्थापित कर गये। जो मनुष्य यह सोचते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति जंगल के किसी कोने में बैठे, नेत्र मूँद, अंतःकरण में ईश्वर को खोजने से होती है वह भूल करते हैं। वास्तव में मनुष्य के जीवन का पूर्ण विकास कर्म, ज्ञान और भक्ति को ठीक-2 अपनाने में होता है। कोरे ज्ञान का उपदेश आलस्य, कोरी भक्ति पाखण्ड और कोरा कर्म अज्ञानता है। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना भक्ति व्यर्थ है। अतएव मनुष्य इनमें से किसी अंग को छोड़ कर पूर्ण भक्ति को प्राप्त नहीं हो सकता। यह सम्भव है कि कोई ज्ञान को प्रधान रख कर चले, कोई भक्ति को और कोई कर्म को, लेकिन शेष दोनों को उनके अंग रूप समझे। महर्षि दयानन्द ने ज्ञान को प्रधान रखा, तुलसीदास ने भक्ति को प्रधानता दी, श्री राम और श्री कृष्ण ने कर्म को प्रधान मानकर भक्ति और ज्ञान को पीछे रखा किन्तु छोड़ा किसी अंग को नहीं।
युगावतार महात्मा गाँधी कर्म, ज्ञान और भक्ति के द्वारा जीवन की सफलता एवं व्यक्तित्व के विकास का जो जीता जागता स्वरूप हमारे सामने छोड़ गये, क्या वह हमारे धार्मिक, राजनैतिक, नैतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत विरोधों तथा भ्रमपूर्ण विचारों को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं? क्या हम प्रेम धर्म को अपना कर उनका अनुकरण करते हुए अपने जीवन को सफल नहीं बना सकते?
(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘बंशी’, बेतिया)
परमहंस श्री स्वामी रामतीर्थ जी महाराज ने इसके संबंध में 8 बातें बतलायी हैं-
1- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह सबसे प्राचीन है। सबसे प्राचीन होना उनके सच्चे होने का प्रमाण नहीं है। कभी-कभी पुराने से पुराने घरों को गिराना उचित होता है और पुराने वस्त्र अवश्य बदलने पड़ते हैं। यदि कोई नये से नया मार्ग नीति और विवेक की कसौटी पर खरी उतरे, तो वह उस ताजे गुलाब के फूल के सदृश उत्तम है, जिस पर चमकती हुई ओंस के कण-शोभायमान हो रहे हैं।
2- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि वह सबसे नया है। सबसे नई चीजें समय की कसौटी से परखी जाने के कारण सर्वथा सर्वश्रेष्ठ नहीं होती।
3- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि उस विपुल जन-संख्या का विश्वास है, क्योंकि विपुल जनसंख्या का विश्वास तो वास्तव में शैतान अर्थात् अज्ञान के धर्म पर होता है। एक समय था, जब विपुल जन-संख्या गुलामी की प्रथा को स्वीकार करती थी, परन्तु यह बात गुलामी की प्रथा के उन्नति होने का कोई प्रमाण नहीं हो सकती।
4- किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि उस पर चलने वाले कुछ थोड़े से चुने हुए लोग हैं, क्योंकि कभी-कभी यह थोड़ी संख्या, जो किसी धर्म को स्वीकार करती है, अंधकार और भ्रान्ति में होती है।
5- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह राजों और महाराजों द्वारा प्राप्त हुआ है। राजा लोगों में प्रायः आध्यात्मिक धन का पूरा अभाव रहता है।
6- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि उसका प्रवर्तक त्याग-मूर्ति है, क्योंकि ऐसे बहुत त्यागी हैं, जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया है, पर जानते कुछ भी नहीं, और वस्तुतः वे धर्मोन्मादी हैं।
7- किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह ऐसे मनुष्य का चलाया हुआ है, जिसका चरित्र परमश्रेष्ठ है। अनेकशः परम श्रेष्ठ चरित्र के लोग सत्य का निरूपण करने में असफल रहे हैं। हो सकता है, किसी मनुष्य की पाचन शक्ति असाधारण रूप से प्रबल हो तो भी उसे पाचन-क्रिया का कुछ भी ज्ञान न हो। यह एक चित्रकार है जो कला-चातुर्य का एक मनोहर, उत्कृष्ट और अत्युत्तम नमूना दिखलाता है, परन्तु यही चित्रकार शायद अत्यन्त कुरूप हो। ऐसे भी लोग हैं, जो अत्यन्त कुरूप होते हैं, पर तो वे सुन्दर सत्यों का निरूपण करते हैं। सुकरात इसी प्रकार का मनुष्य था।
8-जिस किस चीज को स्वीकार करो या जिस किसी धर्म पर विश्वास करो, तो उसकी निजी श्रेष्ठता के ही कारण करो। उसकी स्वयं जाँच-पड़ताल करो, खूब छान-बीन करो।
(श्री सच्चिदानन्द जी तिवारी, स्टेशनमास्टर, रीठी)
बहुधा मनुष्यों को यह कहते सुना जाता है कि गृहस्थाश्रम में रह कर भाई हम क्या कर सकते हैं, या गृहस्थ की झंझटों में फँस कर सब भूल कर, नोन, तैल, लकड़ी ही याद रह जाती है, या गृहस्थ छोड़ कर जंगल या पर्वतों में जाकर भजन हो सकता है-इत्यादि, नाना प्रकार के उदाहरण देकर, अपने बचाव तथा संसारी मिथ्यानन्द में लिप्त रहने के लिए हजारों बहाने ढूँढ़ निकालते हैं और कर्त्तव्य शून्य होकर अकर्त्तव्य की ओर बढ़े चले जाते हैं, और चले जा रहे हैं। हम उपरोक्त अड़चनों अथवा गृहस्थ आश्रम की कायरता पूर्ण आड़ लेने वालों से केवल यह अनुरोध करना चाहते हैं कि अगर हम किसी से सुनकर कि बद्रीनाथ का पथ अत्यंत कठिन है, या वहाँ से लौटने पर मनुष्य मर जाते हैं अथवा हजारों में से कोई एक बद्रिकाश्रम पहुँच पाता है, अपने को असमर्थ समझ बैठे और जो अन्य पुरुष उत्साह पूर्वक जाने को तत्पर हैं उनको भी उपरोक्त कठिनाइयाँ सुनाकर हतोत्साह करते हैं तो बद्रीनारायण के दर्शन जीवन भर भला कैसे हो सकते हैं? इसी प्रकार गृहस्थाश्रम में रह कर, बिना भगवत् प्राप्ति के उपाय किये ही हम हार मान बैठे तो सद्गति कैसे प्राप्त हो सकती है?
यह माना कि कार्य इतना सहज नहीं है परन्तु दुर्लभ भी तो नहीं है। यदि आप चाहें और अभ्यास करना आरम्भ करें तो आप देखेंगे कि जिसको आप पर्वत समझ रहे थे वह तिल मात्र भी नहीं है।
गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी त्याग के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने के लिए त्याग ही मुख्य साधन है, अतएव, त्याग के लक्षण सात श्रेणियों में विभक्त करके, संक्षेप रूप से हम आपके समक्ष उपस्थित करते हैं।
(1) निषिद्ध कर्म त्याग। जैसे चोरी, कपट, झूठ, हिंसा, प्रमाद, व्यभिचार, अभक्ष्य भोजन, निकृष्ट कर्मादि में आसक्ति इत्यादि।
(2) काम्य कर्म त्याग। धन, पुत्र, स्त्री, रोग निवृत्ति, आदि के उद्देश्य से दान, तप, यज्ञ, उपासनादि, अर्थात् सकाम कर्मों को अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त करना।
(3) तृष्णा त्याग। मान बड़ाई, प्रतिष्ठा अथवा अन्य संसारी व्याधियाँ, जो भगवत्प्राप्ति में बाधक हों, उन सब का त्याग।
(4) स्वार्थ त्याग। अपने सुख के लिए किसी भी प्रकार की सेवा, धन, पदार्थों या शारीरिक सेवा की इच्छा दूसरों से करने का त्याग।
(5) आलस्य तथा फल की इच्छा का त्याग। ईश्वर भक्ति, देवता, माता, पिता, गुरुजन, सेवा, यज्ञ, दान, तप, वर्णाश्रम के अनुसार गृहस्थ निर्वाह के लिए जीविकोपार्जन तथा शुभ कर्मों में आलस्य और सब प्रकार की कामना का त्याग।
(6) संसारी पदार्थ, कर्मों में ममता और आसक्ति का त्याग। धन, मित्र स्त्री, पुत्र, बान्धवजन, मान, बड़ाई, भवन, इहलोक व परलोक के विषय भोग रूप पदार्थ, इनमें आसक्ति और ममता का त्याग।
(7) संसार को नाशवान् समझ कर इसकी सम्पूर्ण वस्तुएं मायामय जान, शरीर सहित सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मों में सूक्ष्म वासना तक का सर्वथा अभाव अथवा अन्तःकरण में उनके चित्रों का संस्कार रूप से भी न रहना, शरीर में अहंभाव का सर्वदा अभाव होकर मन, वाणी, और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का अभिमान लेश मात्र भी न रहना। यह सातवीं श्रेणी का त्याग है।
पूर्वोक्त 6 श्रेणियों के त्याग को प्राप्त हुए पुरुष की तो विषयों का विशेष संसर्ग होने से कदाचित् उनमें कुछ आसक्ति हो भी सकती है परन्तु सातवीं श्रेणी के त्यागी व्यक्ति की विषयों के साथ संसर्ग होने पर भी आसक्ति कदापि नहीं हो सकती है क्योंकि इस पुरुष के लिये केवल एक परमात्मा के अतिरिक्त संसार में कोई वस्तु रहती ही नहीं और ऐसे पुरुष की एक सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा में ही अनन्य भाव से गाढ़ स्थिति निरन्तर बनी रहती है इसीलिए उसके अन्तःकरण में सम्पूर्ण अवगुणों का अभाव होकर अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपैशुनता, लज्जा-अमानित्व निष्कपटता, ऐसे ही व्यवहार करता है। यदि किसी काल में कोई साँसारिक स्फुरणा हो भी जावे तो भी उसके संस्कार नहीं जमते।
यह पुरुष सर्व सद्गुणों का आविर्भाव स्वभाव से ही रखता है या यों कहें कि ये सब स्वाभाविक गुण हो जाते हैं जैसे-शौच, (बाहर, अन्तर, शुद्धि) संतोष, तितिक्षा, सत्संग, स्वाध्याय, शम, दम, विनय, आर्जव, दया, श्रद्धा, विवेक, वैराग्य, एकान्तवास, अपरिग्रह, समाधान, उपरामता, तेज, क्षमा, धैर्य, अद्रोह, अमय, निरहंकारता, शान्ति और ईश्वर में अनन्य भक्ति इत्यादि।
इसलिए अज्ञान निद्रा से चेत कर उपरोक्त सात श्रेणियों के कहे गये त्याग द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने के हेतु किसी सत्यपुरुष की सहायता लेकर उसके कथनानुसार साधन करने को तत्पर हो जाना ही उत्तम है, क्योंकि यह अति दुर्लभ मनुष्य देह अनन्त जन्मों के उन कृपासिन्धु भगवान की दया से ही मिलती है फिर इन नाशवान क्षण भंगुर संसारी अनित्य भोगों में इस जीवन के अमूल्य समय को क्यों नष्ट किया जावे?
गृहस्थाश्रम इसी कारण सब आश्रमों में श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इस आश्रम में रहकर जो मनुष्य अपने कर्त्तव्य का पालन करता हुआ, संसार में रहते हुए भी अपने अन्दर संसार को न रहने देता हुआ, संसारी व्यवहारों को स्वप्नवत् मानता हुआ, दुख, सुख, जीवन, मरण, सब में समत्व भाव रखता हुआ, सब कुछ श्री कृष्ण भगवान को अर्पण करता हुआ, भगवान को कर्त्तामान उनकी आज्ञानुसार कार्य करता हुआ, उत्तम आचरण करने वाला पुरुष गृहस्थाश्रम में रह कर भी गुप्त योगी कहाता है और सुगमता से भगवान को प्राप्त हो जाता है।
जहाँ उद्योग की प्रतिष्ठा नहीं होती वहाँ हमेशा ही नाश और अवनति रहती है, विद्या, बल, ज्ञान वहाँ झाँकते भी नहीं। परन्तु जहाँ उद्योग को अपनाया जाता है वहाँ का मुर्दापन चला जाता है और चैतन्यता चमकने लगती है। -स्वामी रामतीर्थ
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सारे संसार को अपने साथ लिये बिना संसार का एक परमाणु भी आन्दोलित नहीं हो सकता।
-स्वामी विवेकानन्द
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(पं. शिवशंकरलाल त्रिपाठी, हस्वा फतेहपुर)
मनुष्य जीवन में दूसरों पर क्रुद्ध होने, उन्हें दंड देने एवं प्रतिशोध लेने के कितने ही अवसर आते रहते हैं। ऐसे अवसरों पर आवेश एवं उत्तेजना वश प्रायः ऐसी भूलें हो जाती हैं जो अपने लिए तथा दूसरे के लिए बड़ा दुखदायी सिद्ध होती हैं। तू तू-मैं मैं से लेकर हाथापाई, फौजदारी, मुकदमा और खूरेजी तक होती देखी गई हैं। ऐसी स्थिति उत्पन्न होती पाई गई है जिसके कारण चिरकाल तक द्वेष का विष फलता फूलता रहा और दोनों पक्ष अवसर पाते ही एक दूसरे के लिए दुखदायी बनने में अपना गौरव समझते रहे।
इच्छा के विपरीत कार्य, वचन एवं अवसर को देखकर हमें प्रायः क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध के आवेश में ऐसी दुर्घटनाएं घटित हो जाती है जैसी कि स्वस्थ मस्तिष्क एवं स्थिर चित्त होने पर कदापि न होतीं।
क्रोध का अवसर उपस्थित होते ही हमें विचार शक्ति को जागृत करना चाहिए और आवेश को वश में रखते हुए वस्तुस्थिति पर विचार करना चाहिए कि सामने उपस्थित परिस्थिति को बदलने के लिए क्या करना चाहिए। जो सर्वोत्तम उपाय समझ में आये वही करना चाहिए। कई बार एक सीमा तक नाराजगी प्रकट करना, झगड़ना, धमकी देना, आक्रमण करना भी कारगर होता है पर अधिकतर इस प्रकार के प्रयोग सफल नहीं होते। यदि कमजोर स्वभाव का, अशक्त एवं वास्तविक दोषी हुआ तो आपके क्रोध के कारण झिझक जायगा और अपनी गतिविधि बदल देना। पर यदि स्थिति इसके विपरीत हुई तो वह या तो आपके क्रोध का तुरन्त क्रोध में ही प्रत्युत्तर देगा और संघर्ष छिड़ जायेगा। अथवा वह उस समय तो चुप ही रहेगा पर किसी उपयुक्त अवसर पर नीचा दिखाने की घात लगाये रहेगा। यह क्रिया-प्रतिक्रिया का चक्र यदि चल पड़े तो द्वेष, दुर्भाव, प्रतिशोध, कलह, क्लेश, घात प्रतिघात की एक ऐसी शृंखला बन जाती है। जिसके कारण अशाँति का तूफान उठ खड़ा होता है। इसलिए ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से पहले ही सचेत हो जाने की आवश्यकता है।
क्रोध उत्पन्न करने वाली परिस्थिति सामने आते ही सबसे पहले यह देखना चाहिए कि हम अनधिकार चेष्टा तो नहीं कर रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि दूसरों के विचार या कार्य हमारी रुचि के अनुकूल ही हों। जैसे हमें अपने स्वतंत्र विचार रखने और स्वतंत्र गतिविधि बनाये रखने का अधिकार है वैसा ही दूसरों को भी है। यदि कोई व्यक्ति हमारे स्वार्थों पर सीधा आक्रमण नहीं करता या किसी आततायीपन का परिचय नहीं देता तो उसकी प्रतिकूल रुचि से हमें एक सीमा तक ही नाराज होने का अधिकार है। इतने मात्र के लिए संघर्ष कर बैठने की आवश्यकता नहीं है। कई बार हमारी अपनी मान्यता गलत, भ्रान्त या उलटी होती है। ऐसी दशा में हमारा क्रोध व्यर्थ ही नहीं अनुचित और मूर्खतापूर्ण भी होता है।
दूसरे लोग भी कई बार अज्ञानता, भूल, भ्रम अस्वस्थता, आवेश, उल्टी जानकारी होने के कारण कुछ ऊटपटाँग कार्य कर बैठते हैं। उनकी नीयत बुरी नहीं होती। ऐसे अनजान लोगों की क्रियाएं भी ऐसी हो जाती हैं जो अपने लिए वैसी ही हानिकारक सिद्ध होती हैं जैसी कि शत्रुओं द्वारा की हुई कुचेष्टा। इस प्रकार के अवसरों पर हानि का विचार करके क्रोध को बढ़ाना उचित नहीं वरन् यह देखना चाहिए कि करने वाले की नीयत क्या थी। यदि अज्ञानवश कोई दुर्घटना घटित हुई है तो हानि की मात्रा का विचार न करते हुए उसे क्षमा ही कर देना चाहिए। सुप्रसिद्ध दार्शनिक सर आइजक-यूटन की चौकी पर बड़े महत्व पूर्ण कागजात फैले पड़े थे, उसी पर मोमबत्ती जल रही थी। पास में ही उनका कुत्ता सो रहा था। कुत्ता अचानक चौंक पड़ा जिससे मोमबत्ती गिरी और सारे कागज जल कर भस्म हो गये। इन कागजों में उनकी तीस वर्ष निरंतर जीवन की शोधें थीं। न्यूटन इतनी बड़ी क्षति के मारे सन्न रह गये। पर उन्होंने कुत्ते को पुचकारते हुए सिर्फ इतना ही कहा “प्रिय, तुम नहीं जानते कि तुमने क्या वज्रपात कर डाला।”
विपरीत एवं अप्रिय परिस्थितियों के निवारण के लिए क्रोध करने की अपेक्षा उन कारणों को ढूँढ़ना चाहिए जिनकी वजह से यह सब होता है और फिर उसके निवारण के लिए स्वस्थ चित्त से जुट जाना चाहिए। यह कार्य मधुर व्यवहार, क्षमा, उदारता और दूरदर्शिता से ही हो सकता है। यह सब बातें तभी हममें रह सकती हैं जब क्रोध के आवेश से बचते हुए स्थिर मति रहने का अभ्यास करें। क्रोध हमारी एक मस्तिष्कीय खुजली को मिटा सकता है, अहंकार का उग्र रूप प्रदर्शित कर सकता है पर उन कारणों को नहीं मिटा सकता जो हमारी अप्रसन्नता के कारण हैं। उन्हें दूर करना है तो सबसे पहले अपने दृष्टिकोण को इतना परिमार्जित करना होगा कि साधारण बातों पर दूसरों से टकराने की नौबत न आवे। साथ ही हम इतने विवेक शील बनें कि विघ्न के मूल कारण को समझ कर उसको आसानी से हटाया जा सके।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
घृणा और प्रेम (Attraction & Repulsion) मानव मन के दो भिन्न अवस्थाएँ हैं। प्रेम दूसरों को आकर्षित करता है, तो घृणा विकर्षित करती है, वातावरण में कटुता, क्रोध, गंदगी फैलाती, मानसिक रोग उत्पन्न करती और आत्म-भाव में संकोच उत्पन्न करती है।
घृणा में विवेक
घृणा का भाव प्रायः सब मनुष्यों में एक सा नहीं होता। कुछ तो ऐसे सामान्य विषय हैं जिनमें घृणा करना ठीक है। वेश्यागमन, जुआ, मद्यपान, स्वार्थपरता, कायरता, आलस्य, लम्पटता, पाखंड, अनधिकारी चर्चा, मिथ्याभिमान आदि विषय ऐसे हैं जिनमें प्रायः सब मनुष्य घृणा करने के लिए विवश हैं। मतभेद वहाँ होता है, जहाँ एक व्यक्ति को एक बात से घृणा मालूम हो रही है पर दूसरे को नहीं। ऐसी अवस्था में यह मालूम करना कठिन हो जाता है कि किसका दृष्टिकोण ठीक है।
एक मेहतर आता है। उसके वस्त्र स्वच्छ और निर्मल हैं, सभ्य व्यक्तियों जैसी वेशभूषा है। वह साधारण पढ़ा लिखा भी है, पर आप फिर भी उसे घृणा करते हैं। उसके जन्म की भावना आप पर आरोपित हो जाती है और उसकी समस्त अच्छाइयों को ढ़क लेती है, यह बुरा है। इसी प्रकार अनेक व्यक्ति भिन्न-2 प्रकार के व्यक्तियों से घिन करते हैं। जानवरों को घृणा के भाव से देखते हैं। ग्रामीणों की अशिक्षा की वजह से तिरस्कारपूर्ण दृष्टि से देखा जाता है। सभ्य मनुष्य असभ्य, मूर्ख, पोंगापंथी, पुराने विचार रखने वालों को घृणा करते हैं। घृणा निवृत्ति का मार्ग दिखलाती है। वह हमारे “अहं” को संकुचित करती है, संकीर्णता और कट्टरपन का परिचय देती है। घृणा के बदले में दूसरे से हमें घृणा ही मिलती है। किसी को अपने प्रति ईर्ष्या करते देख कर हम उससे घृणा प्रकट करेंगे। हमारी घृणा उसमें नई ईर्ष्या उत्पन्न कर उसकी ईर्ष्या बढ़ायेगी नहीं।
घृणा और रोग
मनोवैज्ञानिकों ने अनुसंधान करके मालूम किया है कि रोगी से घृणा करने से उसमें घृणा की प्रवृत्ति की वृद्धि होती है। मानसिक रोग और जटिल हो उठता है। जब रोगी इस भ्रम में पड़ जाता है कि उसके आस-पास वाले उससे घिन करते हैं, प्रेम नहीं करते, तो वह मन ही मन बड़ा दुःखी रहने लगता है। घृणा का उद्देश्य जिसके हृदय में यह उत्पन्न होता है, उसकी क्रियाओं को निर्धारित करना है। जिसके प्रति उत्पन्न होती है, उस पर किसी प्रकार का प्रभाव डालना नहीं। रोगी जब घृणा के भाव से हृदय को भर लेता है, तो उसका अन्तःकरण दूषित हो उठता है, मन अस्त-व्यस्त, विक्षुब्ध, परेशान सा बना रहता है। तबियत नहीं लगती। अन्दर ही अन्दर उसे जलाया करता है।
मनुष्य के भाव संक्रामक होते हैं। घृणा के भाव का एक बुरा वातावरण दंभी मनुष्य के इर्द-गिर्द रहता है। वह अपने मिथ्या अभिमान में दूसरे को कुछ नहीं समझता, वरन् उनका तिरस्कार करता है।
आजकल जाति, सम्प्रदाय, धर्म इसीलिए मिटाये जाते हैं क्योंकि वे समाज में घृणा और द्वेष का वातावरण उपस्थित कर देते हैं। इन भेदभावों को मिटाने के लिए कानून पास किये जा रहे हैं। पर खेद के साथ कहना पड़ता है कि इन कानूनों के बावजूद जातीयता, साम्प्रदायिकता धार्मिक घृणा और द्वेष की निरन्तर अभिवृद्धि हुई है। समता उत्पन्न नहीं हो सकती है। घृणा और द्वेष बढ़े हैं और रक्तपात, लूट-खसोट, मारपीट के कारण बने हैं। उच्च वर्ग वालों ने निम्न वर्ग वालों को अपनी घृणा का शिकार बनाया है। शिक्षितों ने अशिक्षितों को, पुरुष ने स्त्री को घृणा की दृष्टि से देखकर नीचे गिराया है।
यदि हम वास्तविक एकता और समता लाना चाहते हैं तो वह कानून बनाने से न होगा। हिंसा, घृणा, द्वेष की प्रवृत्तियाँ बढ़ती ही रहेंगी। ऊपर से एकता या समता लादना संभव नहीं। उसका जन्म तो मनुष्य के अन्तस्थल से ही होना चाहिए। जब तक पारस्परिक घृणा और द्वेष का बहिष्कार नहीं किया जायेगा, एकता संभव नहीं है।
घृणा से मुक्ति के उपाय
आत्मा के विकास के लिए घृणा को त्याग दीजिये। घृणा नाना प्रकार के द्वेष की जननी है। संसार के असंख्य बुद्धिहीन प्राणी-आपके प्रेम के, सहानुभूति और सौहार्द भाव के लिए तरस रहे हैं। उन्हें अपना प्रेम दीजिये। गन्दे से गन्दे और दीन हीन प्राणी की भी उपयोगिता है। उसे अपनी दया, सहानुभूति, प्रेम के कुछ कण दान दीजिए। तनिक से उत्साह से वे नए जीवन से भरे पूरे होकर उन्नत बनेंगे। जिस प्रेम के बल से आप सैकड़ों व्यक्तियों को नये जोश और प्रेरणा से भर सकते हैं, उसे त्याग कर घृणा करना कौन सी बुद्धिमानी है?
प्रत्येक वस्तु के गुण भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव विभिन्न हैं। प्रकृति का वैचित्र्य ही ऐसा है। भेद या विषयता दूर करने के लिए सबसे सरल उपाय यह है कि हम आपसी घृणा और द्वेष को भूल जायं। प्रत्येक मानव प्राणी को अपना सम्बन्धी और आत्म स्वरूप समझें। वैसा ही व्यवहार करें।
पागल और अर्द्धविक्षिप्त व्यक्तियों से घृणा कर आप उनके मानसिक रोगों की जटिलता और बढ़ा देंगे। विक्षिप्त व्यक्ति में हठ का भाव बढ़ा हुआ रहता है। यदि आप उस हठ के प्रति अपनी सहानुभूति प्रदर्शित करें तो रोगी को बहुत लाभ हो सकता है। घृणा से वह बढ़ जायेगा।
घृणा का विष है, जो मन को बेकार कर डालता है। मन की उर्वरा शक्ति को सजग करने के लिए प्रेम, सहानुभूति तथा शान्ति की आवश्यकता है। घृणा तो उसे बंजर बना डालती है।
मनोविकारों को उत्पन्न न होने देने की सामर्थ्य आप में है। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के प्रताप से आप इस मनोविकार से मुक्ति पा सकते हैं।
घृणा के विषय में पं. रामचन्द्र शुक्ल ने सत्य ही कहा है- “सभ्यता या शिष्टता के व्यवहार में “घृणा” उदासीनता के नाम से छिपाई जाती है। दोनों में जो अन्तर है वह प्रत्यक्ष ही है। जिस बात से हमें घृणा है, हम चाहते या आकुल रहते हैं कि वह बात न हो, पर जिस बात से हम उदासीन हैं, उसके विषय में हमें परवाह नहीं रहती, वह चाहे हो, चाहे न हो। यदि कोई काम किसी के रुचि के विरुद्ध होता है तो वह कहता है, “उँह” हम से क्या मतलब, जो चाहे सो हो”। यह सरासर झूठ बोलता है।”
मानव मस्तिष्क बड़ा ही आश्चर्यजनक, शक्तिशाली एवं चुम्बक गुण वाला यंत्र है, उसका एक एक परमाणु इतना विलक्षण है कि उसकी गतिविधि सामर्थ्य और क्रियाशीलता को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक हैरानी में रह जाते हैं। इन अणुओं को जब किसी विशेष दिशा में नियोजित कर दिया जाता है तो उसी दिशा में एक लपलपाती हुई अग्नि जिह्वा अग्रगामी होती है। जिस दिशा में मनुष्य, इच्छा, आकाँक्षा और लालसा करता है उसी दिशा में, उसी रंग में उसी लालसा में शरीर की अन्य शक्तियाँ नियोजित हो जाती हैं।
पहले भावनाएं मन में आती हैं। फिर जब उन भावनाओं पर चित्त एकाग्र होता है। यह एकाग्रता, एक चुम्बक शक्ति आकर्षण तत्व के रूप से प्रकट होती है और अपने अभीष्ट तत्वों को अखिल आकाश में से खींच लाती हैं। ध्यान का यही विज्ञान है। इस विज्ञान के आधार पर, प्रकृति के अन्तराल में निवास करने वाली सूक्ष्म आद्यशक्ति, ब्रह्मस्फुरणा गायत्री को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। उसके शक्ति भण्डार को प्रचुर मात्रा में अपने अन्दर धारण किया जा सकता है।
जप के समय अथवा किसी अन्य सुविधा के समय में नित्य गायत्री का ध्यान किया जाना चाहिए। एकान्त, कोलाहल रहित, शान्त वातावरण के स्थान में स्थिर चित्त होकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। शरीर शिथिल रहे। यदि जप काल में ध्यान किया जा रहा है तब तो पालती मारकर, मेरुदंड सीधा रख कर ही ध्यान करना उचित है। यदि अलग समय में करना हो तो आराम कुर्सी पर लेट कर या मसंद, दीवार, वृक्ष, आदि का सहारा लेकर साधन करना चाहिए शरीर बिल्कुल शिथिल कर दिया जाय। इतना शिथिल मानों देह निर्जीव हो गया हो। इस स्थिति में नेत्र बन्द करके दोनों हाथों को गोदी में रख कर ऐसा ध्यान करना चाहिए कि- “इस संसार में सर्वत्र केवल नील आकाश ही नील आकाश है, उसमें कहीं कोई वस्तु नहीं है। प्रलय काल में जैसी स्थिति होती है, आकाश के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं रह जाता वैसी स्थिति की कल्पना चित्र मन में भली भाँति अंकित करना चाहिए। जब यह कल्पना चित्र मानस लोक में भली भाँति अंकित हो जाय तो सुदूर आकाश में एक छोटे ज्योति पिण्ड को सूक्ष्म नेत्रों से देखना चाहिए। सूर्य के समान प्रकाशवान एक छोटे नक्षत्र के रूप में गायत्री का ध्यान करना चाहिए। यह ज्योति पिण्ड अधिक समय तक ध्यान करने पर समीप आता है, बड़ा होता जाता है और उसका तेज अधिक प्रखर होता जाता है।
चन्द्रमा या सूर्य के मध्य भाग में ध्यान पूर्वक देखा जाय तो उसमें काले-काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इसी प्रकार इस गायत्री तेज पिण्ड में ध्यान पूर्वक देखने से आरंभ में भगवती गायत्री की धुँधली सी प्रतिमा दृष्टि गोचर होती है। धीरे-धीरे ध्यान करने वाले को यह मूर्ति अधिक स्पष्ट, अधिक स्वच्छ और अधिक चैतन्य, हँसती, बोलती, चेष्टा करती, संकेत करती तथा भाव प्रकट करती हुई दिखाई पड़ती है। हमारी गायत्री पुस्तकों के आरंभ में भगवती गायत्री का एक चित्र दिया हुआ है। उस चित्र को ध्यान आरंभ करने से पूर्व कई बार बड़े प्रेम से, गौर से, भली-भाँति अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण करके उस मूर्ति को मनः क्षेत्र में इस प्रकार बिठाना चाहिए कि ज्योतिपिंड में ठीक वैसी ही प्रतिमा की झाँकी होने लगे। थोड़े दिनों में यह तेजोमण्डल से आवेष्टित भगवती गायत्री की छवि अत्यन्त सुन्दर अत्यन्त हृदय ग्राही रूप से ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होने लगती है।
जैसे सूर्य की किरणें धूप में बैठे हुए मनुष्य के ऊपर पड़ती हैं और वह किरणों की ऊष्णता को प्रत्यक्ष अनुभव कराता है वैसे ही यह ज्योति पिण्ड जब समीप आने लगता है तो ऐसा अनुभव होता है मानों कोई दिव्य प्रकाश अपने मस्तक में अन्तःकरण में और शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके अपना अधिकार जमा रहा है। जैसे अग्नि में पड़ने से लोहा भी धीरे-धीरे गरम और लाल रंग का अग्निवर्ण हो जाता है वैसे ही जब गायत्री तेज को ध्यानावस्था में साधक अपने अन्दर धारण करता है तो वह भी सच्चिदानन्द स्वरूप, ऋषि कल्प होकर ब्रह्म तेज से झिलमिलाने लगता है। उसे अपना संपूर्ण शरीर तप्त स्वर्णों की भाँति रक्त वर्णों अनुभव होता है और अन्तःकरण में एक अलौकिक दिव्य तत्व का प्रकाश सूर्य के समान प्रकाशित हुआ दीखता है। इस तेज संस्थान में आत्मा के ऊपर चढ़े हुए अनेक कलुष कषाय जल बल कर भस्म हो जाते हैं और साधक अपने को ब्रह्म स्वरूप, निर्मल, निष्पाप, निरासक्त अनुभव करता है।
इस तेज धारण ध्यान-में कई बार रंग-बिरंगे प्रकाश दिखाई पड़ते हैं, कई बार आकाश में छोटे-छोटे रंग-बिरंगे तारागण प्रकट होते, जगमगाते और छिपते दिखाई पड़ते हैं, वे एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर चलते हैं और फिर बीच में ही तिरछे चलने लगते हैं तथा उलटे वापिस लौट पड़ते हैं। कई बार चक्राकार एवं बाण की तरह तेजी से एक दिशा में चलते हुए छोटे-छोटे प्रकाश खण्ड दिखाई पड़ते हैं। अन्तरात्मा में गायत्री शक्ति की वृद्धि होने से छोटी-छोटी अनेकों शक्तियों एवं गुणावलियाँ विकसित होती हैं वे ही ऐसे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे प्रकाश पिण्डों के रूप में परिलक्षित होते हैं।
जब साधना अधिक प्रगाढ़, पुष्ट और परिपक्व हो जाती है तो मस्तिष्क के मध्य भाग या हृदय स्थान पर वही गायत्री तेज स्थिर हो जाता है। यही सिद्धावस्था है। जब वह तेज बाहर आकाश से खिंचकर अपने अन्दर स्थिर हो जाता है तो ऐसी स्थिति हो जाती है जैसे अपना शरीर और गायत्री का प्राण एक ही स्थान पर सम्मिलित हो गये हों। भूत-प्रेत का आवेश शरीर में चढ़ जाने पर जैसे मनुष्य उसे प्रेतात्मा की इच्छानुसार काम करता है वैसे ही गायत्री शक्ति का आधान अपने अन्दर हो जाने से साधक के विचार कार्य, आचरण, मनोभाव रुचि, इच्छा, आकाँक्षा, पर्व ध्येय में परमार्थ प्रधान रहता है। उसके मनुष्यत्व में से पशुता घटती जाती है और देवत्व की मात्रा बढ़ती जाती है।
उपरोक्त ध्यान गायत्री का सर्वोत्तम ध्यान है। जब गायत्री तेज पिण्ड की प्रकाश किरणें अपने ऊपर पड़ने की ध्यान भावना की जा रही हो तब यह भी अनुभव करना चाहिए कि यह किरणें सद्बुद्धि, सात्विकता एवं सशक्तता को उसी प्रकार हमारे ऊपर डाल रही हैं जिस प्रकार कि सूर्य की किरणें गर्मी, प्रकाश तथा गतिशीलता प्रदान करती हैं। इस ध्यान से उठते ही साधक अनुभव करता है कि उसके मस्तिष्क में सद्बुद्धि, अन्तःकरण में सात्विकता तथा शरीर में सक्षमता की मात्रा बढ़ गई है। यह वृद्धि यदि थोड़ी-थोड़ी करके भी नित्य होती रहे तो धीरे-धीरे कुछ ही समय में वह बड़ी मात्रा में एकत्रित हो जाती है, जिससे अधिक ब्रह्म तेज का एक बड़ा भण्डार बन जाता है। ब्रह्म तेज एक दर्शनीय हुण्डी है जिसे दोनों में से किसी भी बैंक में भुनाया जा सकता है। उसके बदले में दैवी लाभ या साँसारिक सुख कोई भी वस्तु प्राप्त की जा सकती है।
(श्री रामखेलावनजी चौधरी बी. ए. लखनऊ)
उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध की बात है। सारे रोम में नेपोलियन की वीरता के गाने गाये जा रहे थे। उसके शत्रु उसका नाम सुनकर काँप उठते थे। किसी में इतना साहस न था कि उसके शौर्य-वारापार की थाह ले सके। आल्पस और पिरीनीज के दुर्लघ्य पर्वत उसका मार्ग अवरुद्ध न कर सके थे। दिग्विजयी वीर नेपोलियन से किसी ने पूछा-सम्राट! तुम्हारी विजय का रहस्य क्या है? सम्राट ने अत्यन्त स्वाभाविकता से उत्तर दिया-अभी तक इस सम्बन्ध में मैंने कुछ विचार नहीं किया। रण के मैदान में तो मुझे कभी याद तक नहीं आया कि विजय या पराजय का परिणाम होगा। युद्ध के समय मुझे केवल शत्रु पर कठिन से कठिन प्रहार करने की चिंता रहती और मैं वार पर वार किये जाता हूँ जब तक शत्रु की गर्दन कट कर गिर नहीं जाती। इसी रहस्य को कौरव और पाँडव राजकुमारों के बीच खड़े हुये द्रोणाचार्य ने भी समझ लिया था और केवल अर्जुन को चिड़िया की आँख बेधन करने की अनुमति दी। अन्य राजकुमारों की एकाग्रता इतनी क्षीण थी कि वे आकाश, धरती, वृक्ष, डाली सभी देख सकते थे। बेधना है चिड़िया का शिर और देखते हैं हजारों चीजें। यही सोच कर गुरु ने उनका तिरस्कार किया और अर्जुन को पूर्ण विश्वास के साथ बाण चलाने की आज्ञा दी। अर्जुन की तरह चिड़िया रूपी लक्ष्य की केवल आँख मात्र ही जिन्हें दिखाई देती है, जीवन संग्राम में उनकी विजय में कोई भी संदेह नहीं।
सम्पूर्ण एकाग्र मन से और अनन्य प्रेम के साथ अपनी लक्ष्य प्राप्ति के लिए अनवरत लड़ते रहना विजय का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। अपने जीवन में सफलता पाने के लिये केवल एक ही काम करना उचित है। अपनी सारी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को एक ओर यदि लगा दिया जाय तो कोई भी काम ऐसा नहीं रह जाता जो दुःसाध्य हो। जो लोग अपने जीवन में असफल हुये हैं यदि वे स्वयं उस पर विचार करें तो उन्हें स्पष्ट पता चल जायगा कि उन्होंने कितनी ही बार अपने जीवन के मार्ग को बदला है। इसी से वे असफल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति एक साथ कलाकार, व्यवसायी अथवा सैनिक नहीं हो सकता। एक कार्य में दक्ष और पारंगत न होकर अनेक कामों में केवल थोड़ी जानकारी प्राप्त कर लेना एक अच्छी नीति नहीं कही जा सकती। उन्हीं व्यक्तियों को सफल कहा जा सकता है जिन्होंने एक विशेष मार्ग का अवलंबन प्राणपण से किया है। सर्वतोमुखी प्रतिभा के गुणगान चाहे जितने किये जाय किन्तु वह केवल आदर्श कल्पना है और वास्तविकता से कोसों दूर है। प्रसिद्धि, सफलता और जननायक बनने का सम्मान वही लोग पा सके हैं जिन्होंने तन मन से एक दिशा में प्रयत्न किया है। गाँधी के विश्वबंध होने और टैगोर के विश्वपूजित होने का कारण यही है कि एक ने राजनीति और दूसरे ने साहित्य को छोड़ कर इधर-उधर अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनाधिकार चेष्टा कभी नहीं की। साधारण व्यक्ति और गाँधी में शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अन्तर केवल नगण्य है, फर्क है सिर्फ जीदारी, लगन और एकाग्रता का। जीवन संग्राम में विजय चाहने वाले योद्धाओं को याद रखना चाहिये कि- लुढ़कते हुए पत्थर पर कभी काई नहीं जमती।
लोग जीवन में अपने उद्देश्य और दृष्टिकोण क्यों बदलते हैं? सिर्फ इसलिए कि उन्हें सफलता के असली माने नहीं मालूम। सफलता का अर्थ आजकल यही लगाया जाता है कि खूब रुपया इकट्ठा हो, खूब चारों ओर नाम फैल रहा हो। सच्ची सफलता तभी समझी जाती है जब प्रसिद्धि और पैसा दोनों दो साल में इकट्ठा हो जाय। वास्तव में आज के भौतिक युग में सफलता और सुख जैसी मानसिक स्थितियों का मूल्याँकन अन्य सामग्रियों की भाँति ‘रुपये’ के मापदण्ड से किया है। सफलता की कीमत आत्मसंतोष चरित्र की सफलता जैसे गुणों के आधार पर नहीं आँकी जाती है। इसीलिए आप दो वर्ष तक कपड़े का व्यवसाय करके जब काफी रुपया और नाम नहीं पा सकते, तो सराफे की दुकान करके बैठ जाते हैं। आपका गलत दृष्टिकोण इसके लिए उत्तरदायी है। सफलता प्राप्त करने के लिए जो लोग अलाउद्दीन के चिराग जैसा चमत्कार, दिखाना या देखना चाहते हैं, वे बेहद मूर्ख हैं। यदि कोई व्यक्ति दो एक साल में बड़ी चमत्कारिक उन्नति कर भी डाले तो उसका पतन शीघ्र हो जायगा। इसका कारण यह है कि वह अपनी विजयों का संगठन नहीं कर पाता। व्यवसाय में नौकरी या कहीं भी चार छः साल यदि कोई तरक्की न हो तो कभी भी न घबराना चाहिए। जीवन के मोटे पोथे में चार छह साल केवल मामूली से पन्ने हैं। धीमी किंतु निश्चित गति से चल कर ही दौड़ की प्रतियोगिता में पहला नम्बर आता है विद्वानों ने ठीक कहा है-
जल विंदुनिपातेन क्रमशः पृर्यते घटः
स हेतुः सर्वविद्यानाँ धर्मस्यच, धनस्य च।
एक-एक बूँद करके घड़ा भरता है। इसी प्रकार धर्म, धन और विद्या थोड़ा-थोड़ा करके संचित की जाती सकती है।
शीघ्र सफलता की इच्छा से जो लोग नित नये व्यवसाय करके लक्खी सौदागर बन बैठते हैं उन्हें एक बात जरूर याद रखनी चाहिये। मान लीजिये आप ने दो तीन वर्ष तक कोई कारखाना चलाया और आपको प्रत्याशित लाभ नहीं मिला। इसलिए उसे छोड़ कर आप दूसरा व्यवसाय आरम्भ करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में इस बात पर ध्यान दीजिये कि यह ठीक है कि आपको धन नहीं प्राप्त हुआ पर आपको दूसरे प्रकार का लाभ अवश्य हुआ है। उस कारखाने के बल पर उससे सम्बन्धित कच्चा माल बेचने वालों, उत्पादित माल के खरीदारों, उपभोक्ताओं, मजदूरों और कारीगरों से आपका परिचय हो चुका है और इसके लिए ही आपके लाभ का मुख्य अंश खर्च हो गया है। साथ ही यही वे आधार हैं जिनके बल पर आप आगे चलकर लाखों रुपया कमा सकते हैं। यह लाभ ही ठोस लाभ है और आप मूर्खतावश उसे छोड़ कर दूसरे क्षेत्र में जाना चाहते हैं। जहाँ यह सारी कठिनाइयाँ एक बार फिर उठानी पड़ेंगी। अपने उद्देश्य को बदल देना अपनी पराजय मोल लेना है।
कभी-कभी ऐसे अवसर भी आ जाते हैं जब बार-बार प्रयत्न करने पर भी अच्छा फल नहीं होता। ऐसी दशा में उस काम में अरुचि और उसके प्रति विरक्ति पैदा हो जाती है। वास्तव में मनुष्य की शक्ति की परीक्षा का समय यही होता है। यदि ऐसे संकटों के मौके पर आपने अध्यवसाय से काम लिया तो आप कभी भी असफल न होंगे। सफलता प्राप्ति के लिए अध्यवसाय अचूक साधन है। असफल होने पर भी बार-बार प्रयत्न करते जाना ही अध्यवसाय है। यदि महान ऐतिहासिक व्यक्तियों के जीवन को पढ़ा जाय तो स्पष्ट पता लग जायगा कि पहले प्रयत्न में किसी को भी सफलता नहीं मिली। हाँ असफलता से वे निराश नहीं हुए वरन् दूने उत्साह से अपनी लक्ष्य सिद्धि के लिए प्रयत्नशील रहे और अंत में वे सफल हुये।
विषम परिस्थितियों और विपत्तियों का अपना-अलग महत्व है। इन्हीं के कारण मनुष्य को अपनी भूलों और कमजोरियों का पता चलता है। कई बार असफल हुआ व्यक्ति जो सफलता प्राप्त करता है, वह स्थायी और संगठित रूप में न केवल उसके लिये वरन् उसके परिवार और समाज के लिए लाभदायक होता है। इसलिये दुर्दिन और विषम परिस्थितियों के बीच मनुष्य को घबराना नहीं चाहिये। उनके बीच रह कर आपका चरित्र चट्टान की तरह दृढ़ हो जायगा और असफल होने की कोई गुँजाइश न रहेगी। विपत्तियों का सामना करते-करते सबसे बड़ा लाभ वह होता है कि मनुष्य में अपने आप को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने की आदत पड़ जाती है। कैसा भी घोर संकट आ जाय वह फौरन ही उसके अनुकूल अपनी जीवन चर्या में परिवर्तन कर डालता है।
अपने जीवन के लक्ष्य को उचित या अनुचित किसी भी तरीके से प्राप्त कर लेना सफलता कभी नहीं कहला सकती। सच्ची विजय न्याय संगत और ईमानदारी पर आधारित होनी चाहिये। कोई हर्ज की बात नहीं यदि आप अपने आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए मिलें नहीं खरीद सकते और एक साधारण श्रेणी के व्यक्ति बने रह जाते हैं। चोरी, मक्कारी और जालसाजी के बल पर प्राप्त शेर की खाल में सजे हुए रंगे सियारों की झूठी शान देख कर सच्चे वीर कभी भी धर्म पथ से च्युत नहीं होते। आजकल के जमाने में प्रायः सभी लोगों पर बड़े बन जाने की धुन बहुत जोरों में सवार है। रावण पंडित था, नीतिवान था और अजेय था, पर क्या वह सफल था? वह केवल असफल ऐश्वर्य का नमूना था। आप दिखाऊ सफलता प्राप्त करने के लिए अपनी नैतिकता को कभी न बेचें।
(श्री. रत्नेश कुमारी नाराँजना, मैनपुरी )
कुछ लोग सोचते हैं तथा कहते भी हैं कि कर्त्तव्य पालन से क्या लाभ? स्व सुख की कामना त्याग कर यदि हम दूसरों को सुखी बनाने के लिए कष्ट भी उठाये और वे उस स्वार्थ त्याग का मूल्य न समझें तो सारा कष्ट सहन व्यर्थ ही तो गया।
मान लीजिये एक घर में चार लड़के हैं उनका पिता नहीं रहा सब से बड़े भाई ने जो बैंक में रुपये जमा थे और पिता के जीवन बीमा के जो रुपये मिले वे तीनों भाइयों की पढ़ाई में व बहिन की शादी में लगा दिये। अस्तु उसे उच्च शिक्षा तथा उच्च पद पाने की अपनी बचपन की ही परम प्रिय साध का बलिदान करना पड़ा जीवन निर्वाह के लिए उसने कोई मामूली सी नौकरी कर ली। तीनों भाइयों की शादी भी करके ही उच्च शिक्षा पाने के बाद उनमें से एक वकील दूसरा डॉक्टर और तीसरा प्रोफेसर हो गया अब कभी यदि वे सार्वजनिक स्थानों पर मिल जाते हैं या उनके घर पर ही कोई सम्माननीय अतिथि आ जाते हैं तो वे अपने बड़े भाई से अच्छी तरह बोलते तक नहीं हैं कि कहीं कोई इस सत्य को जान न जाये। उन्हें ये बात लज्जास्पद तथा अपमानजनक प्रतीत होती है। कहिये जो उस ने अपना सुनहला भविष्य नष्ट किया अपनी प्यारी अभिलाषा का बलिदान कर दिया उससे उसे क्या लाभ हुआ? कठिन परिश्रम किया मोटा लाया मोटा पहना स्वास्थ्य तक बिगड़ गया उसको इन सारे त्यागों का क्या बलिदान मिला?
अच्छा? लीजिये सुनिये उसको क्या-2 लाभ हुए। सर्वश्रेष्ठ लाभ ‘मनुष्यता’। ‘आदमी के लिए आसान नहीं इन्सान होना’ दूसरा लाभ ‘आत्म सन्तोष’ वह नहीं जानेगा कि आत्म-ग्लानि जनित अशान्ति कैसी होती है, आत्म धिक्कार। अपनी ही दृष्टि से आप ही गिरना कैसा होता है? और पश्चाताप की नरकाग्नि कैसी दारुण दुस्सह होती है। तीसरा लाभ “उच्च आदर्श रखना” उसने दूसरों के सामने अनुकरणीय उदाहरण रखा। चौथा लाभ “आत्म सम्मान” उसे किसी के भी सन्मुख लज्जित होकर के आँखें नीची नहीं करनी पड़ेंगी क्योंकि उसने कोई बुरा काम नहीं किया है।
यदि इसके विपरीत करता तो मान लीजिये वह उच्च शिक्षित उच्च पद पर प्रतिष्ठित तथा धन सम्पन्न होता पर जब-2 वह अपने भाइयों को अशिक्षित नीच काम करते दीन हीन वेश में देखता, उसकी अन्तरात्मा धिक्कार उठती कि ये उसकी घृणित स्वार्थ परता है। जिसने उसके सहोदरों का जीवन दुर्वह बना दिया। आत्मग्लानि की अशान्त-अग्नि में वह जलता रहता, सबके सन्मुख लज्जित सा रहता और सामने न सही तो पीछे लोग अवश्य ही उसके इस कुकृत्य के हेतु उसे बुरा बतलाते। जब उसने अपने संग भाइयों की भलाई नहीं सोची तो और कौन उसकी शुभकामनाओं पर विश्वास करेगा? ऐसे व्यक्ति का भला जीवन ही क्या जिसका अधिकतर मनुष्य विश्वास न करें और सद्भावनाएं जिसके प्रति न रखें।
अब प्रश्न ये उठता है कि वह वर्तमान दशा में भी कहाँ शान्ति या सन्तोष पा सका है? उसने धनी या पद प्रतिष्ठित बनने की जो अपनी अतृप्त कामना कुचल दी है, वह कब उसे चैन पाने देती है? वह इस अशान्ति से बहुत ही सरलतापूर्वक छुटकारा पा सकता है यदि वह उपरोक्त चारों लाभों का महत्व समझ जाये। वह महान और प्रशंसनीय तो बन ही गया है क्योंकि उसने मनुष्यता नहीं खोई है जो कि जीवन की सर्वश्रेष्ठ कमाई है, जिसे बहुत कम मनुष्य ही पाते हैं। बस कमी इतनी ही रही कि प्रतिदान की कामना उसने हृदय में बसा रखी उसे त्यागते ही उसकी सारी अशान्ति छूमन्तर हो जायेगी और वह अकथनीय आनन्द से भर उठेगा, वह गर्व कर सकेगा कि वह उच्च शिक्षित नहीं, उच्च पदस्थ नहीं, पर वह उनसे भी श्रेष्ठ-एक सच्चा मनुष्य अवश्य है।
पुस्तक लिखने, कवि बनने या अन्य श्रेष्ठ कार्य करने में जितनी बुद्धि लगती है उतनी ही हल चलाने में खर्च होती है। ऐसे विचार जब तक किसी राष्ट्र या जाति में नहीं आ जाते तब तक उसका उन्नत होना संभव नहीं। -स्वामी रामतीर्थ
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हृदय के प्रबल उच्छ्वास से ही हृदय में स्फूर्ति पैदा होती है। बुद्धि और विचार शक्ति अच्छी चीजें हैं, लेकिन वे दूर तक नहीं जा सकती। भावों से ही गंभीर रहस्यों का उद्घाटन होता है। -स्वामी विवेकानन्द
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इच्छा शक्ति के सामने सभी शक्तियाँ कमजोर हैं क्योंकि इच्छा शक्ति स्वयं ईश्वर के यहाँ से आती है। शुद्ध और दृढ़ इच्छा शक्ति सर्व शक्तिमान है।
-स्वामी विवेकानन्द
(श्री लक्ष्मी नारायणजी टण्डन एम. ए. लखनऊ)
क्षय के रोगी को अच्छा हो जाने पर भी अधिक शारीरिक तथा मानसिक परिश्रम से बचना ही चाहिए क्योंकि अंग्रेजी में कहावत है- ‘ह्रठ्ठष्द्ग ञ्ज. क्च. ड्डद्यख्ड्डब् ञ्ज.क्च.’ (एक बार क्षय, सदा की क्षय) जिसका तात्पर्य यह है कि आदमी अब चुटैल हो गया है। यदि संभल कर न रहेगा तो फिर उसकी तबियत पलट सकती है। पश्चिमीय देशों में इसे “ष्ठद्बह्यद्गद्बह्यद्ग शद्ध ख्द्गड्डद्मठ्ठद्गह्यह्य” अर्थात् कमजोरी की बीमारी कहते हैं। यदि उपयुक्त और बलवर्धक भोजन, कुछ ठंडी जलवायु वाले स्थान में निवास, नियमित जीवन, क्रमिक वैज्ञानिक आधार पर परिश्रम और विश्राम, अति का त्याग, चिंता, ग्लानि का त्याग, जिन परिस्थितियों तथा कारणों से क्षय हुआ था उनसे बचाव रखा जाय तो कोई कारण नहीं है कि क्षयी अच्छी आयु क्यों न पावे, पूरी जीवन क्यों न जिये।
प्राकृतिक नियमों के पालन तथा प्राकृतिक चिकित्सा से यह रोग दूर किया जा सकता है यदि रोगी की अवस्था अत्यधिक गिर नहीं गई है। प्राकृतिक-चिकित्सक, भगवान नहीं है। यह दावा वह नहीं कर सकता कि वह रोगी को चंगा ही कर देगा किन्तु इतना तो अवश्य हो सकता है कि उसके रोग में, उसकी पीड़ा में कमी हो जाय, रुकावट हो जाय और यदि रोगी को मरना ही है तो शान्ति की मौत मर सके।
यह तो सभी जानते हैं कि पृथ्वी (भोजन, पृथ्वी से ही उत्पन्न होता है) तत्व से जल तत्व, जल से अग्नि, अग्नि से वायु और वायु तत्व से आकाश तत्व अधिक सूक्ष्म तथा प्रभावोत्पादक होता है। अतः आकाश तत्व को प्राप्त करने के लिए हमें आत्म-संकेत, शिथिलीकरण, ईश्वर भक्ति तथा धर्म, यज्ञ आदि कृत्य उपयोगी होंगे। क्षयी यदि निम्नलिखित सामग्री से नित्य प्रातः साँय यज्ञ करे या अशक्त रोगी अपने कमरे में कराये तो बड़ा लाभ होगा- नीम की पत्ती 80 तोला, अकउआ 20 तोला, मोर पंखी 5 तोला, सरसों पाँच तोला, बच पाँच तोला, देवदारु पाँच तोला, अगर 5 तोला, चन्दन 5 तोला, हींग 1 तोला। इन सबको कूट पीस लिया जाय। कोयले की बिना धुँए वाले आग पर रोगी के स्थान पर डाली जाय। वायु तत्व के लिए खुले रोशनीदार कमरे, हरियाली से पूर्ण बगीचे आदि में रहना उपयोगी है ही। अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्राणायाम करे। उदाहरणार्थ पहले फेफड़े की पूरी साँस निकाल दें फिर उँगली से दाहिना नथुना बन्द करके बाँये नथुने से श्वांस लें। फिर अंगूठे से बाँया नथुना बन्द करें। जितनी देर श्वास घसीटी है उसकी आधी देर रोके फिर दाहिने नथने से धीरे-धीरे हवा निकाले इसमें उतना या उससे ज्यादा समय दे जितना श्वास घसीटने में लगा था। फिर नथुना बन्द कर हवा रोके जितना पहले रोका था। फिर दाहिने नथने से श्वांस घसीटे पहले की भाँति। फिर नथुना बन्द करके उतने ही देर रोके। फिर बाँये नथुने से धीरे-धीरे हवा निकाल दें पहले की भाँति। स्वामी रामतीर्थ जी का कहना है कि इससे क्षय में अवश्य लाभ होगा तथा स्वस्थ मनुष्य अधिक स्वस्थ रहेंगे। बहुत अशक्त या बढ़े, हुए रोग वाले बहुत धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखा जायगा। कम से कम श्वासक्रिया को तो ठीक किया ही जा सकता है। प्रायः लोगों के श्वास लेने का तरीका बहुत गलत होता है। यही ठीक करके हम क्षय को दूर कर सकते हैं। श्वास क्रिया से मतलब सिर्फ उस क्रिया से नहीं है जो श्वास लेने से फेफड़ों के अन्दर जाती है। न गहरी श्वासक्रिया से ही तात्पर्य है। श्वास निकालते समय पूरी हवा बाहर निकाल देना चाहिए। कितनी वायु अन्दर जाती है, इससे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि कितनी हवा बाहर निकाली जाती है। क्षय फेफड़ों के ऊपरी भाग से इसलिए प्रारंभ होता है क्योंकि यहाँ वर्षों तक गंदी हवा रुकी रहती है पूरी श्वास-क्रिया न करने से जब फेफड़े पूरे खाली होंगे तो स्वाभाविक रूप से फेफड़े और पैर के बीच का पर्दा (डायाफ्रेम) स्वतः पूरे परिमाण में हवा भर लेंगे। केवल सीने के ऊपरी भाग को ही श्वास लेने में फुलाना गलत है। ठीक यह है कि डायाफ्रेम फुलाया जाय। श्वास लेते समय पसलियों के निचले भाग फूलें। श्वास बाहर निकालते समय भी सीने को दबने न दो। पेट, पसलियों की तह में जहाँ तक दबाया जा सकता है दबाया जाय। श्वास लेते या निकालते समय झटके न लगें इसका ध्यान रखा जाय। अभ्यास से श्वास क्रिया में कठिनाई न पड़ेगी। इस सम्बन्ध में अन्य लेख में विस्तार पूर्वक लिखा जायगा।
सूर्य प्रकाश की क्षयी को बहुत आवश्यकता है। प्रातः के सूर्य की किरणों में नंगे बदन रोगी रह सकता है कुछ देर। पर फेफड़े के क्षयी को सूर्य की तेज किरणों और धूप से तो अवश्य ही बचना चाहिये-विशेष कर यदि उसे कभी खून आ चुका हो। हाँ हड्डी के क्षय या आँतों के क्षय में धूप बहुत लाभप्रद है। रंगीन शीशियों का धूप में रखा पानी चिकित्सक की राय के मुताबिक पिये। इस सम्बन्ध में विस्तार से अन्यत्र लिखा जाय। जल का प्रयोग कैसे हो इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति में इसी वर्ष लेख छप चुका है। भोजन क्या-क्या खायें, क्या-क्या न खायें, कौन भोजन एक साथ खायें कौन नहीं, यह भी जनवरी 49 के अंक में छप चुका है। तो भी संक्षेप में क्षयी निम्न लिखित इलाज करें। दूसरी स्टेज तक का टी.बी. ठीक हो सकता है-
(1) साफ खुला हवादार प्रकाश वाला स्थान।
(2) नंगे बदन पर जितनी देर हो सके-हवा और प्रकाश लें। धूप चिकित्सक से पूछ करे प्रातः की सूर्य-रश्मियाँ पाँच मिनट लें। धीरे-धीरे समय बढ़ावें।
(3) कमजोर रोगी उपवास न करें। एक बार बकरी का कच्चा दूध-दूध सर्वोत्तम है दूसरी बार रोगी या दलिया और एक भाजी तथा शाक, तीसरी बार दूध तथा फल चौथी बार तरकारी का रसा तथा दूध या किशमिश, मुनक्का और दूध।
(4) एनिमा प्रायः लिया करे। इस सम्बन्ध में भी इसी वर्ष मेरा लेख छपा है।
(5) साधारणतया वह अपना टाइमटेबल इस प्रकार रखें या सुविधानुसार अपनी शक्ति और स्वास्थ्य के अनुसार परिवर्तन कर लें-
6 बजे प्रातः-पैखाने, दातून, स्नान या देह अँगोछना, गर्म कपड़ा ओढ़ कर लेटे या शिथिलीकरण, सूर्य-रश्मि सेवन।
7॥-8 तक एक पाव दूध, एक संतरा, या रात के भिगाये मुनक्के और उसका पानी 8 से 10 तक हवा, रोशनी, धूप।
10॥ तक कटि-स्नान, मेहन स्नान, रीढ़ या पेडू पर गीली मिट्टी बाँधना जैसा चिकित्सक बताये। तेल मालिश करायें। अच्छा हो कि लाक्षादि तेल लें। प्रातः नहाया हो तो नहा कर कपड़े गर्म ओढ़े या टहले 11 बजे फल का रस।
1 बजे एक प्रकार का भोजन-रोटी, दलिया, शाक तरकारी आदि। ऊपर से आधा तोला गुड़ या शहद खायें।
फिर विश्राम।
2 से 3 तक दोपहर को फिर नंगे बदन हवा और सूर्य प्रकाश लें।
3 बजे पेडू पर मिट्टी बाँधे।
4॥-5 बजे फल या फल और दूध। (कच्चा नींबू, शहद, पत्तेदार शाक और हरी तरकारी किसी न किसी समय अवश्य ही खाई जायें)
6-7 बजे रात सिट्ज, हिप, स्पाइबल आदि स्नान यदि बताये हैं।
8 बजे रात मुनक्का खायें, दूध पियें।
9-10 बजे तक सो जाय ईश्वर का ध्यान तथा आत्म संकेत और शिथिलीकरण करते हुए। सोते समय लहसुन को कूट कर अपने सिरहाने रख लें। लहसुन का प्रयोग करें। यह अत्याधिक लाभप्रद इस रोग में होता है। अडूसे का प्रयोग भी इस रोग में अत्यन्त लाभप्रद होता है। केवल एक नुस्खा ही स्थानाभाव से लिखता हूँ- अडूसे के पत्ते 400 तोले (हरे) लेकर आठ गुने पानी में उबालें। पानी चौथाई रह जाने पर तब उतार कर छान लें। फिर बड़ी हड़ का चूर्ण 256 तोला, शक्कर 400 तोला मिला कर मंदाग्नि पर उबालें और जब अबलेह (चटनी के तरह) गाढ़ा हो जाय, तब नीचे उतार कर बंसलोचन 16 तोले, पीपल छोटी 8 तोला, दाल-चीनी, तेजपात, छोटी इलायची और नागकेसर चार-चार तोला का चूर्ण बनाकर मिलावें। फिर ठंडा हो जाने पर 32 तोला शहद मिलावें। मात्रा 1 से 2 तोला दूध के साथ दो बार। ताजी तुरन्त की सब्जी का रस भी अत्यन्त लाभ-प्रद बताया जाता है।
सब से बड़ी चीज तो यह है कि रोगी सदा प्रसन्न-चित्त तथा चिंतामुक्त रहे और आशामय साफ रहे।
वैद्यक में केवल दवाओं और रसों के आधार पर ही इलाज होता है। मोती भस्म, च्यवनप्राश द्राक्षासव, बसंतमालती, मकरध्वज, शीतोषलाद, वासावलेह आदि खिलाते हैं। लाक्षादि तेल की मालिश करते हैं। सिद्धान्त वही है कि क्षयी शक्ति हीन न होने पावे। वह अधिक शक्ति पा सके और इस प्रकार अपने रोग को दबाने की क्षमता उसमें हो जाय।
अब तो भारत में अनेक सैनाटोरियम तथा क्षय के अस्पताल हैं जहाँ धनवान रोगी अपना इलाज कर सकते हैं किन्तु रोगियों की संख्या देखते हुए अस्पतालों आदि की संख्या नगण्य है। इस दिशा में भारत सरकार बहुत कुछ कर रही है। प्रायः निर्धनों को ही यह रोग होता है और निर्धन या मध्यम वर्ग के परिवार में किसी के रोग होने पर रोगी तो मरता है, घर वालों का भी दिवाला निकल जाता है। यह राज रोग है। प्राचीन समय में विषयी राजाओं तथा धनिकों को ही होता था। पर अब तो धनी, निर्धन, स्त्री, पुरुष, बालक-बालिका कोई इसके पंजे से मुक्त नहीं। ईश्वर भारत-वासियों को सुबुद्धि तथा सुपरिस्थितियाँ देकर उनकी रक्षा करें।
स्वामी विवेकानन्द के उपदेश
इच्छा शक्ति के सामने सभी शक्तियाँ कमजोर हैं क्योंकि इच्छा शक्ति स्वयं ईश्वर के यहाँ से आती है। शुद्ध और दृढ़ इच्छा शक्ति सर्व शक्तिमान है।
सामाजिक व्याधि को हम बाहरी प्रयत्नों से दूर नहीं कर सकते। सुधार तो मन के ऊपर प्रभाव डालने से ही हो सकता है। शिक्षा द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से उसके लिए प्रयत्न करना होगा। आन्दोलन द्वारा सनसनी फैलाकर किसी सामाजिक बुराई को दूर करने की कोशिश से कोई लाभ नहीं हो सकता।
मजबूत बनो और मर्द बनो। जो दुष्ट होते हुए भी मजबूत और मर्द हैं मैं उसकी इज्जत करता हूँ क्योंकि उसकी शक्ति किसी न किसी दिन उसे अपनी दुष्टता छोड़ने के लिए बाध्य कर देगी और उसे सत्य के रास्ते ले आयेगी।
तुम्हारा भाग्य तुम्हारे हाथ है। जो जो शक्ति और सहायता तुम चाहते हो वह सब तुम्हारे भीतर मौजूद हैं। इस लिए अपना भाग्य अपने आप ही बनाओ।
(श्री राजबहादुर ‘विकल’)
करना नव निर्माण तुम्हें अब, वीर जवानो, जागो!
आज न पागलपन लेकर हो शस्त्रों की झनकारें,
समय कह रहा अब न बहाना यहाँ रक्त की धारे,
महावीर, गौतम की फिर कण-2 में करुणा जागे,
पशुओं तक का रुदन देख नयनों में वरुणा जागे,
महा प्रलय के बिखरे कण दे रहे चुनौती तुमको-
जगो पाथके अविचल प्रण माँके अभिमानो! जागो!!
तुम ‘दधीचि’ हो कभी त्याग का अपने मोल न माँगो,
तुम्हीं अमर ‘प्रह्लाद’ घुसो लपटों में भय को त्यागो,
तुम विलास को त्यागो, वसुधा आज मुक्ति की प्यासी,
सुरा, सुन्दरी, स्वर्ण छोड़ कर हो योवन संन्यासी,
ऐसा हो संन्यास, देश में जीवन ज्योति जगा दे-
अखिल सृष्टि का काँपे तम, गौतम के प्राणों! जागो!!
मानव बनो, कह रहीं बापू के शोणित की धारें,
मानव बनो, कह रहीं प्राची की ऊँची दीवारें,
बापू के शोणित को लेकर, अब न रक्त फिर माँगो,
रो लो अपने दुष्कर्मों पर, हंसते हुए अभागो,
अपनी संस्कृति के आँगन में मत अंगार बखेरो-
विष करना है शान्त सभी अमृत संतानों! जागो!!
तुम अनन्त बन आज तोड़ दो सीमाओं का घेरा,
सामवेद के मंत्रों को ले आये नया सवेरा,
बोधि वृक्ष की छाया से फिर बहे ज्ञान की धारा,
अखिल विश्व के पथ भ्रान्तों को भारत हो ध्रुवतारा,
‘अरण्यक’ संवाद सुनाने लगे देश की भाषा-
अन्धकार का वक्ष चीर कर स्वर्ण विहानो! जागो!!
काशी जागे, मथुरा जागे, जाग पड़े उज्जैनी,
अलका के प्रसून फिर गूँथे वसुन्धरा की वेणी,
इन्द्रप्रस्थ, साकेत, जगें, जागे विधवा वैशाली,
तक्षशिला के खंडहर में हो मणियों से दीवाली,
बढ़ो चरणो, फिर अतीत की बिरुदावली सुनाने-
अखिल विश्व की करुणा ले मनु के अरमानों! जागो!!
*समाप्त*