सा श्रीर्या न मदं कुर्यान्स सुखी तृष्ण योज्झित।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः पुरुषः स जितेन्द्रियः॥1॥
लक्ष्मी वही श्रेष्ठ है जिसमें मद न हो, सुखी वहीं है जिसने तृष्णा को जीत लिया है, मित्र वहीं है जिसमें विश्वास और पुरुष वही है जो जितेन्द्रिय है।
क्वचिद्रुष्टः क्वचितुष्टो रुष्टस्त्तुष्टः क्षणे क्षणे।
अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादोऽपि भयंकरः॥2॥
कभी अप्रसन्न और कभी प्रसन्न, इस प्रकार जो मनुष्य क्षण-क्षण में असंतुष्ट और संतुष्ट होता रहता है, उसकी प्रसन्नता या कृपा भी भयानक है।
कष्टा वृत्तिः पराधीना कष्टो वासो निराश्रयः।
निर्धनो व्यवसायश्च सर्वकष्टा दरिद्रंता॥3॥
पराधीन जीविका से जीवन, आश्रय बिना निवास और धन बिना व्यवसाय बड़ा कष्टकारी होता है और दरिद्रता तो सब प्रकार से कष्ट देने वाली है।
आरोग्यं विद्वत्ता सज्जनमैत्री महाकुले जन्म।
स्वाधीनता च पुँसाँ महदैर्श्वयं विनाप्यथैः॥4॥
धन न होने पर भी मनुष्य को आरोग्य, विद्वत्ता, सज्जनों के साथ मैत्री, श्रेष्ठ कुल में जन्म और स्वाधीन वृत्ति रखने से ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
दानं प्रियवाक्सहितं ज्ञानमगर्वं क्षमान्वितं शौर्यम्।
वित्तं त्यागनियुक्तं दुर्लभमेतच्चतुर्भद्रम्॥5॥
मधुर वाणी के साथ दान, अहंकार रहित ज्ञान, क्षमा-युक्त वीरता और त्याग (दान) में नियुक्त धन ये चारों दुर्लभ हैं।
स जीवति यशो यस्य कीर्तिर्यस्य स जीवति।
अयशोऽकीर्ति सुयुक्तो जीवन्नपि मृपोपमः॥6॥
यशस्वी और कीर्ति वाले मनुष्य का ही जीवन है, कीर्तिहीन मनुष्य जीता हुआ भी मरे के समान है।
निन्दंतु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥7॥
अद्यैव वा मरणमस्तु युगाँतरे वा।
न्यायात्पथः प्रविचलंति पदं न धीराः॥8॥
चाहे नीतिवान पुरुष निन्दा करें या स्तुति करें, लक्ष्मी रहे या जाय, मरण चाहे आज हो या युगाँतर में। परन्तु धीर पुरुष न्याय मार्ग से एक पद भी विचलित नहीं होते।
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा-
स्त्रिभुवनमुपकारिश्रेणिभिः प्रीणयन्तः॥
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं
निज हृदि विकसंतः संति संतः कियन्तः॥9॥
जिनका मन, वचन और शरीर पुण्य रूपी अमृत से पूर्ण है, जो अपने उपकारों से तीनों लोकों को प्रसन्न करते हैं, जो दूसरों के जरा से गुण को पर्वत के समान करके अपने हृदय को विकसित करते हैं, ऐसे सज्जन कितने हैं?
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनार्द्धमं ततः सुखम्॥10॥
विद्या नम्रता को देती है, नम्रता से योग्यता आती है। योग्य ही धन कमा सकता है और धन से धर्म और धर्म से सुख होता है।
अर्थागमो नित्यमरोगिता च
प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या
षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥11॥
ये बातें सुख देने वाली होती हैं- नित्य धन, लाभ, नीरोगता, प्यारी और मीठा बोलने वाली स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और अर्थकारी विद्या।
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वर्ष-10 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-10
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(श्री गिरधारीलाल जी शास्त्री)
तुम किसे रिझाते रे! निर्जन वन में करके नर्तन मयूर
चिर रम्य मनोरम चंद्रराशि फैलाते मद में चूर-चूर
कोकिल! नीरव तरु डाली पर स्वर्गीय स्वरों में गाती हो
री, अरी बावली वहाँ कौन जिसको यह गान सुनाती हो
ठहरो-ठहरो ओ सरित! तनिक, क्यों यह कल-कल ध्वनि का गुँजन
गिरि पर किससे कहती फिरती- गतिमय, परिवर्तनमय जीवन
हे सूर्य! सतत रह जागरुक, सिखलाते हो कर्त्तव्य-ज्ञान
किस स्वार्थ हेतु सर्वदा किया करते जग को जीवन प्रदान
हे सुमन! तुम्हीं बतला दो ना, अपने परमल का प्रिय पराग
तुम लुटा रहे क्यों जगती को, हे चिर-सुन्दर! हे वीतराग
बोलो! हाँ शशि! बोलो बोलो! हे शीतलता के अमर स्त्रोत
करते हो क्यों जग को सदैव अमृत-वर्षा से ओत-प्रोत
सब के स्वर मिल कर गूँज उठे- ‘जीवन का केवल एक ध्येय’
निष्काम कर्म! निष्काम कर्म!! निष्काम कर्म!!! ही प्रेय श्रेय
जीवन अनादि! जीवन अनन्त! संचरण और जागृति जीवन
चेतना पूर्ण संघर्ष! प्रगति! उत्थान! विजय! सच्चा जीवन
-कर्मयोग
ऋषिवर! ब्रह्मचारी पुरुष मुझे परम प्रिय जान पड़ता है। ब्रह्मचर्य से ही मेरा निर्भय पद प्राप्त हो सकता है।
मुनिवर! तुम्हारा शाप अंगीकार करता हूँ। विवाह करने से तुम्हारा ब्रह्मचर्य व्रत खण्डित हो जाता और लोक-कल्याण में बाधा उपस्थित होती। इसलिए माया करनी पड़ी। -भगवान
देव, मनुष्य और असुर- सबके लिए ब्रह्मचर्य अमृत रूप है। जो वरदान चाहे वह ब्रह्मनिष्ठा से प्राप्त हो सकता है। -पितामह ब्रह्मा
ब्रह्मचर्य से ब्रह्मतेज का संचय होता है। पूर्ण तपस्वी अपना तप इसी के बल पर साध सकता है। जो अप्सरा महर्षि विश्वामित्र का तपोभंग कर, मुझे निर्भय करेगी, उसे मेरा सदा सम्मान प्राप्त होगा।
- देवराज इन्द्र
हे जीव! ब्रह्मचर्य रूपी सुधा निधि तेरे पास है। उसकी प्रतिष्ठा से अमर बन। निराश मत हो। मनुष्यता को सार्थक बनाने का उद्योग कर। -श्रुति
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन योग्य है। अधिकारी पुरुष ही अपनी सम्पत्ति की रक्षा कर सकता है। -महर्षि अंगिरा
हे निष्पाप! ब्रह्मचर्य से ही संसार की स्थिति है। मूलाधार के नष्ट होने पर ही पदार्थ का नाश होता है। अन्यथा नहीं। -महर्षि वशिष्ठ
ब्रह्मचर्य का पालन ब्रह्मपद का मूल है। जो अक्षय पुण्य को पाना चाहता है, वह निष्ठा से जीवन व्यतीत करे। -देवर्षि नारद
मोक्ष का दृढ़ सोपान ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य श्रम के सुधरने से सब क्रियाएं सफल होती हैं।
-महामुनि दक्ष
ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होते हैं। हे प्रभो! निष्कामता ही प्रदान कर दास को कृतार्थ करें।
-मुनिवर भारद्वाज
ब्रह्मचर्य से मनुष्य दिव्यता को प्राप्त होता है। शरीर के त्यागने पर सद्गति मिलती है।
-मुनीन्द्र गर्ग
ब्रह्मचर्य के संरक्षण से मनुष्य को सब लोकों में सुख देने वाली सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
-मुनिराज अत्रि
जीवात्मा ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा में लीन होता है। आत्म धर्म ही चारों फल की प्राप्ति का साधन है।
-महर्षि व्यास
ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से मनुष्य के अशुभ लक्षण भी नष्ट हो जाते हैं।
जो उत्तम धर्म का पालन करना चाहे, वह इस संसार में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
-पीयूषपाणि धन्वन्तरि
हे राजन! ब्रह्मचारी को कहीं भी दुःख नहीं होता, उसे सब कुछ प्राप्त है। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से हम अनेक ऋषि ब्रह्मलोक में स्थित हैं।
-देवव्रत भीष्म
ब्रह्मचारी को सब कुछ सम्भव है। उत्साह से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं। वे ही पुरुष रत्न हैं, जो अपने व्रत का सदा पालन करते हैं।
- महावीर हनुमान
ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर मनुष्य किसी भी आश्रम (गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) में प्रविष्ट हो सकता है। -ऋषीश जाबाल
ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त होती है। -ऋषिवर पिप्पलाद
ब्रह्मचारी रहकर नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिए। विधि रहित अध्ययन करने से स्वाध्याय का फल नहीं मिलता।
-महामान्य हारीत
हे जनक जी! जिसने ब्रह्मचर्य से चित्त की शुद्धि की है, उसी को अन्य आश्रमों (गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास) में आनन्द मिलता है।
-बाल-ब्रह्मचारी शुकदेव
बिना ब्रह्मचर्य के (विषय भोगों से) आयुष्य, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि लक्ष्मी, महत्त्वाकांक्षा, पुण्य, तप और स्वाभिमान का नाश हो जाता है।
-स्मृतिकार गौतम मुनि
इच्छा से वीर्य का नाश करने वाला ब्रह्मचारी निश्चय पूर्वक अपने व्रत (ब्रह्मचर्य) का नाश कर देता है। -महामति मनु
ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप हैं।
-योगिराज कृष्ण
ब्रह्मचर्य के पालन से आत्मबल प्राप्त होता है।
-योगाचार्य पतंजलि
ब्रह्मचर्य के बल से ही मनुष्य ऋषिलोक को जाता है। -कपिल मुनि
ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वालो को मोक्ष मिलता है। -सनत्सुजात मुनि
वीर्य ही सारे शरीर का सार है।
मनुष्य का बल वीर्य के अधीन है।
ओज ही शरीर की धातुओं का तेज है।
-वैधक
अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, सुलक्षण स्त्री से विवाह करना चाहिए।
-मिताक्षरा
जो मनुष्य ब्रह्मचारी नहीं उसको कभी सिद्धि नहीं होती। वह जन्म मरणादि क्लेशों को बार-बार भोगता रहता है। -अमृतसिद्धि
ब्रह्मचर्य से पाप इस प्रकार कटता है। जिस प्रकार सुर्योदय से अंधकार का नाश होता है।
-धर्म संग्रह
(योगिराज अरविन्द)
ब्रह्म का न आदि है और न अन्त। वह अखण्ड है। उसके खण्ड-खण्ड नहीं किये जा सकते। इस पृथ्वी पर समस्त वस्तुओं की योजना इसी ब्रह्म से परिपूर्ण है। अनन्त ब्रह्माण्ड भी इसी के द्वारा प्रकाशित है। विश्व के समस्त तथा हर एक पदार्थ में व्याप्त रहने पर भी इसकी पूर्णता में किसी प्रकार की कमी नहीं आने पाती क्योंकि वह सदा ही पूर्ण है और पूर्णता ही इसका स्वभाव एवं प्राकृतिक गुण है।
यह ब्रह्म पूर्ण से भी पूर्ण है। इसलिए जिस वस्तु में यह पूर्ण ब्रह्म समाविष्ट रहेगा, वह वस्तु भी पूर्ण रहेगी। इसका अनुभव सिर्फ चैतन्य पदार्थों में ही नहीं करना है। ये तो संसार के जड़ पदार्थों में भी उसी प्रकार ओत-प्रोत है जिस प्रकार चेतन पदार्थों में। इसलिए जड़ और चेतन दोनों में ही उनकी पूर्णता का साक्षात्कार करना होगा। लेकिन हमारी ये स्थूल आँखें इस भूमण्डल के चप्पे-चप्पे को खोज डाले तब भी ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाती। तोते की तरह भगवान को रट लेने से तो किसी भी जन्म में भगवान का दर्शन नहीं हो सकता। स्वर्ग की पवित्र तेजोमय किरण से जिस दिन हमारी स्थूल आँखें प्रकाश प्राप्त कर लेंगी माया रूपी अन्धकार से निकल भागेंगी, जिस दिन ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से हमारे मन से शंकायें और भ्रम दूर हो जायेंगे। उसी दिन हम धन्य तथा कृतार्थ हो जायेंगे। उस दिन संसार को मोहित करने वाला भगवान का सत् चित् आनन्द मय रूप देखकर उसका दर्शन करके हम धन्य होंगे।
पर जब तक इस दिव्य चक्षु का उद्घाटन नहीं होता अर्थात् जब तक दिव्य नेत्र नहीं खुलते तब तक सारे साधन बेकार हैं। केवल दिखावा मात्र हैं। जिस दिन दिव्य चक्षु खुल जायेंगे उस दिन प्रतीत होगा कि इस संसार में कोई भी पदार्थ जड़ नहीं है। सबके भीतर प्राण, चेतना, मन और विज्ञान प्रतिष्ठित है। सब के भीतर लीलामय भगवान निवास करके अनन्त गुणों का आनन्द उपभोग कर रहे हैं। संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं वह चाहे व्यक्त हों, अव्यक्त हों, या व्यक्तोन्मुखी हों प्रत्येक में भगवान अव्यक्त रूप से मौजूद हैं। दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाने पर अव्यक्त रूप से स्थित भगवान की लीलाओं का दर्शन होना आरम्भ हो जाता है। प्रत्येक वस्तु के अन्तर में श्री भगवान चित रूप से विराजमान होकर भिन्न-भिन्न रसों का उपभोग करते हुए आनन्द लेते हैं। एक ही ब्रह्म अनन्त रूप से अनेक वस्तुओं में निवास कर रहा है लेकिन इससे यह नहीं सोच लेना चाहिए कि वह विभक्त होकर अंश रूप से व्याप्त है। भगवान विभक्त नहीं हो सकते। वे तो पूर्ण हैं और पूर्ण रहकर ही प्रत्येक में व्याप्त हैं। काल, स्थान तथा स्थिति का उनके ऊपर प्रभाव नहीं पड़ता। वे अभेद और अखण्ड होकर ही समभाव से विराजमान होकर अपनी लीला किया करते हैं। साधक को इस लीला को देख सकने की ही दृष्टि प्राप्त करनी है।
(श्री पं. धर्मदेव शास्त्री, केशरी दर्शन)
उपनिषद् के ऋषि ने कहा है “सत्य का मुख सोने के पात्र से ढ़का है, हे प्रभो, उस ढक्कन को हटाओ जिससे सत्य धर्म का दर्शन हो सके” दर्शन का शब्दार्थ अपरोक्ष अनुभव है जिससे संसार का मर्म और रहस्य देखा जा सके, जिससे मानव और उसके मन का और सब से बढ़कर स्वयं अपना दर्शन हो उस शास्त्र को ही दर्शन शास्त्र कहा जा सकता है। दर्शन ऐसी आँख है जिससे दृष्टा होने पर भी अदृश्य सत्य का दर्शन होता है। इसी प्रकार के एक दार्शनिक ने कहा है-
“पराँचि खानि व्यत्रिणत् स्वयं भूः तस्मात्
पराड् पश्यति नान्तरात्मन् कश्चिद्धीरः
प्रत्यगात्मान मैक्षत आवृत चक्षुः अमृत्व मिच्छन”
“स्वयं भू भगवान ने इन्द्रियों की रचना ऐसी की है कि वह बाहर दूर के पदार्थों को देख सकती है, इसलिए साधारण मनुष्य चर्म-चक्षु से बाहरी दृश्य को ही देख सकता है। ‘अपने आप को देखने वाला कोई विरला ही होता है जो अंतर्मुख नेत्र से आत्म दर्शन करता है’ वस्तुतः मनुष्य सब को देखता है अपने आपको देखने का उसने कभी प्रयत्न नहीं किया, सबके साथ उसका संयोग हुआ आत्मा के साथ जिस दिन संयोग होगा, उसी दिन उसे पूर्णता की प्राप्ति होगी, अल्पता में सुख नहीं सुख पूर्णता में है, इसी पूर्णता की प्राप्ति में ही मानव प्रयत्नशील है, दर्शन शास्त्र इस सम्बन्ध में मनुष्य का मार्गदर्शक है।
“प्रदीप सर्वं विद्यानाम् उपायः सर्वकर्मणाम्”
सत्य अथवा पूर्णता का दर्शन कोरे पुस्तक ज्ञान से नहीं हो सकता। दर्शन शास्त्र आध्यात्मिक प्रयोगों के आधार पर बना है, छान्दोग्योपनिषद् में कथा आई है- नारद सनत्कुमार के पास गये और सीखने के लिए प्रार्थना की सनत्कुमार ने पूछा- जो तुम सीख चुके हो वह बताओ उसके आगे मैं कहूँगा। नारद ने कहा-
“चारों वेद, इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष आदि सभी विद्याओं को मैंने पढ़ा है परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि मैंने बहुत सारे शब्दों को ही पढ़ा है। आत्मा को- अपने आपको- मैंने नहीं पहचाना। क्योंकि आप जैसे अनुभवियों के मुख से मैंने सुना है कि आत्मा को पहचानने वाला शोक और दुख से रहित हो जाता है। परन्तु मैं तो शोक में पड़ा हुआ हूँ कृपया शोक सागर से मुझे पार कीजिये” इसके बाद सनत्कुमार ने नारद को उपदेश किया है।
याज्ञवलक्य ने योग द्वारा आत्म दर्शन को ही परम धर्म कहा है-
“अयं तु परमोधर्मः यद् योगेनात्य दर्शनम्...
हृदय की गाँठ तभी खुलती है और शोक तथा संशय तभी दूर होते हैं जब एक सत्य का दर्शन होता है जो बात नारद ने सनत्कुमार से कही है वह अध्यात्म शास्त्र के सभी जिज्ञासुओं ने स्वीकार की है, आत्म दर्शन अनुभवगम्य है भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है-
“जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वतैत।”
शाब्दिक-जबानी-ब्रह्म चर्चा करने वाले व्यक्ति से ब्रह्म प्राप्ति के उपाय योग का जिज्ञासु व्यक्ति श्रेष्ठ है।
भारतीय दर्शन सत्य का साक्षात्कार करने वाले ऋषियों की आध्यात्मिक प्रयोगशाला में लिखे गये हैं। हमारा यह विश्वास है ऋषियों ने जो कुछ अनुभव के आधार पर कहा है उसे अनुभव के बिना झुठलाया नहीं जा सकता। हमारे देश का पतन इसी कारण हुआ कि भारतीय समाज और भारतीय दर्शन का सम्बन्ध टूट गया है भारतीय दर्शन का महान सूत्र है भेद में अभेद दर्शन।
सर्व भूतस्थमात्मानं सर्व भूतानि चात्मानि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र सम दर्शनः
यों माँ पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति,
तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति
“यदा भूत पृथक भावमेकस्थ मनुपश्यति,
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते सदा”
-गीता
“योगी पुरुष सब भूतों में आत्मा को सब भूतों को आत्मा में देखता है, जो ‘मैं’ में सबको और सब में मैं को देखता है उसका नाश नहीं होता, जब मनुष्य जगत के पृथकत्व को एक में स्थित देखता है तब ब्रह्म भाव प्राप्त कर लेता है। भेद में अभेद का यह दर्शन जब तक भारतीय समाज का और भारतीयों के वैयक्तिक जीवन का आधार रहा तब तक भारत प्रगति करता रहा। इसी दर्शन के आधार पर भारतीयों में सहिष्णुता, समानता और समन्वय-बुद्धि का विकास हुआ। यम-नियम और योग के अन्य सब अंग जब तक भारतीय दर्शन व्यावहारिक क्षेत्र में है, तब तक भारतीय समाज उन्नत और आदर्श समझा जाता था परन्तु जब से उक्त सूत्र जीवन के क्षेत्र से दूर और बहुत दूर हो गये हैं तभी से भारतीय दर्शन की प्रतिज्ञा कम हो गई है और भारतीय समाज पंगु हो गया है। सब में आत्मा को देखने वाला दर्शन आज उन लोगों के हाथ में है जो अपने ही जैसे मनुष्य को छूने से अपवित्र बन जाते हैं। जो दर्शन प्रयोग और केवल प्रयोग के आधार पर चलता है आज उसके उत्तराधिकारी अकर्मण्य और दीर्घसूत्री तथा श्रम की उपेक्षा करने वाले हैं हमारे कथन का इतना ही अभिप्राय है कि दर्शन शास्त्र के प्रणेताओं का गुणगान करने से और दर्शन शास्त्र की ऊंची-2 बातों को कहने से हमारा कुछ उपकार होने वाला नहीं है।
विज्ञान ने आज देश और काल की दूरी बहुत हद तब हटा दी है हजारों मील की दूरी को आज विज्ञान ने कुछ ही घंटों में तय करने का साधन प्रस्तुत कर दिया है। आँख और कान के लिए आज बहुत हद तक दूर और समीप का भेद नहीं रहा परन्तु यह तथ्य है कि देश और काल की दूरी पर विजय पाने वाला मानव दूसरे मानव से पहले की अपेक्षा अधिक दूर होता जा रहा है, इस दूरी को हटाने की क्षमता विज्ञान में नहीं दर्शन में है। भारतीय दार्शनिक मानव और मानव में ही नहीं प्राणी मात्र में और उससे भी आगे पदार्थ मात्र में एक समान अविनाशी परम पुरुष को देखने का निर्देश कर गये हैं। ऊँचे-2 सिद्धाँतों के निर्माण की अपेक्षा आज मानव निर्माण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। मानव निर्माण का अर्थ है मानव को भेद में अभेद मूलक दर्शन के आधार पर समानता, सहिष्णुता और सहृदयता को सोचने का अभ्यासी बनाना। मानव जाति अपने क्रमिक विकास के साथ पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती जा रही है। पूर्णता की प्राप्ति पूर्ण दर्शन के बिना असम्भव है पूर्णता और अमरता पर्यायवाची शब्द हैं, भगवान बुद्ध जब 29 वर्ष की उम्र से आधी रात को अपनी प्रिय पत्नी यशोधरा और चि. राहुल को छोड़ कर घर से बाहर निकलें तब उन्होंने प्रतिज्ञा की थी।
“जननमरण यो दृष्टपारः न पुनरहं कपि हिवयं प्रवेष्टा।
“जन्म और मृत्यु का रहस्य पता लगाये बिना मैं कपिलवस्तु में प्रवेश नहीं करूंगा” बुद्ध भगवान ने जिस रहस्य का पता लगाया यह अपने तक सीमित नहीं रखा। मनुष्य मात्र को दुःख से छुड़ाने की इच्छा ही उनके लिए मोक्ष था। भागवत पुराण में नारायण के प्रति प्रह्लाद ने जो कहा है वह भक्तों के मनन योग्य है प्रह्लाद के शब्द हैं।
प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्ति कामः,
स्वार्थ चरन्ति बिजने न परार्थ निष्टाः।
नेतान् विहाय कृपलान् विमुक्ष एकः,
नाम्यं त्वदस्य शरणं प्रमत्तौऽनुपश्य।
“हे देव! प्रायः मुनि लोग एकान्त जंगल में अपनी ही मुक्ति के लिए कामना करते हैं वह स्वार्थ साधना है, इसमें कोई महत्व नहीं। संसार के चक्र में घूमते हुए इन दयनीय व्यक्तियों को छोड़ कर में अकेला मोक्ष नहीं चाहता, आपको छोड़कर कोई शरण नहीं कृपया उपाय बताइए।”
केवल अपने ही मोक्ष की इच्छा भक्त प्रह्लाद के शब्दों में स्वार्थ साधना है। आदि विद्वान कपिल ने साँख्य शास्त्र की रचना मनुष्य जाति को विविध दुःखों से छुड़ाने के लिए की है। प्राचीन शब्दों से पता चलता है कि कपिल अपनी मुक्तावस्था में से निर्वाण, शरीर द्वारा उक्त उपदेश की पूर्ति के लिए अवतीर्ण हुए। साँख्य दर्शन का पहला सूत्र है।
“अथ त्रिविध दुःखात्यन्तनिवृत्तिः अत्यन्त पुरुषार्थः॥”
‘आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक इन तीन दुःखों की अन्तिम निवृत्ति परम पुरुषार्थ है।’ दर्शन की उत्पत्ति का कारण क्या है इस सम्बन्ध में पूर्व और पाश्चात्य दार्शनिकों में मतभेद है। प्राच्य दर्शनकार मुक्ति अथवा निःश्रेयस को दर्शन का कारण बतलाते हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य के सामने जरा, मृत्यु और दुख लाइलाज रहे हैं। दुख से आत्यन्तिक छुटकारे का ही नाम मोक्ष है। जरा, मृत्यु और दुःख से छूटने के लिए ही भारत और विश्व के महान दार्शनिकों ने विविध प्रयोग किये हैं। यही भारतीय दर्शन का उद्देश्य है।
प्रार्थना कृपा और विरोध का तब तक कोई अर्थ नहीं होता जब तक उनके पीछे दृढ़ शक्ति न हो।
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अपनी संकल्प शक्ति की वृद्धि करो संकल्पशक्ति की वृद्धि करने का नाम ही प्रार्थना है। प्रार्थना में ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा सारी रुकावटों पर विजय प्राप्त हो जाती है।
-लोकमान्य तिलक
(कुमारी कृष्णा सरीन एम. ए.)
ईश्वर के सत् स्वरूप का साक्षात्कार अथवा स्पष्टीकरण ही धर्म का प्रधान उद्देश्य है। इस रहस्यपूर्ण सृष्टि से विस्मित होकर मनुष्य को उसके रचियता ईश के रहस्य को जानने की जिज्ञासा सृष्टि के आरम्भ से ही रही है। प्रभु का साक्षात्कार करने तथा उसके सत् स्वरूप को समझने का प्रयत्न प्रत्येक युग में प्रत्येक स्थान पर थोड़ा बहुत हुआ है। लेकिन भारतीय ऋषियों ने इस और जितना प्रयत्न किया है उतना अन्यत्र नहीं मिलता। पग-पग पर उसकी असीम सत्ता का अनुभव करके वे इस परिणाम पर पहुँचे कि पत्ती-पत्ती में, अणु-परमाणु में और प्रत्येक जीवधारी के व्यक्तित्व के विकास में वही सत् स्वरूप समाया हुआ है।
जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास का एक ही प्राकृतिक नियम कार्य करता है। जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी एक श्रेणी से उत्तीर्ण होकर दूसरी श्रेणी में बढ़ता है ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को धर्म की सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। धर्म की वे सीढ़ियां गृह-धर्म कुल-धर्म समाज-धर्म देश-धर्म और विश्व-धर्म या पूर्ण-धर्म हैं।
ईश्वर के सत्-स्वरूप का साक्षात्कार परिवार तथा समाज के छोटे क्षेत्र से होकर समस्त भू-मंडल में किया जाता है। देखिये! जब परिवार का कोई बच्चा बीमार पड़ जाता है तो गृह स्वामी और गृहस्वामिनी पूजा, अर्चना, प्रार्थना, वंदना और उसके उपचार के रात-दिन एक कर देते हैं। बच्चे के स्वस्थ होने पर वे ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद देते हैं और ईश्वर में उसका विश्वास एवं श्रद्धा बढ़ती है। समाज प्रेमी समाज के किसी अंग को सड़ा हुआ देखकर दुःख से व्याकुल हो जाता है और तुरन्त उसके उपचार में लग जाता है। विधवाओं की दशा को देखकर उसका मन रो पड़ता है। यही कारण था कि राजा राम मोहन राय ने एक विधवा को चिता में जलते हुए देखकर सती-प्रथा बन्द करने का बीड़ा उठाया। स्त्रियों की अज्ञानता से ऋषि दयानन्द के मन पर चोट लगी और उन्होंने नारी जाति के उद्धार के लिए कन्या गुरुकुल खुलवाकर उन्हें शिक्षित बनाया। आधुनिक शिक्षित नारी उन्हीं के प्रयत्न का फल है। हरिजनों की शोचनीय दशा ने गाँधी जी को व्याकुल कर दिया, और समाज के इस अंग को सड़ने से बचाने के लिए उन्होंने हरिजनोद्धार में अपने जीवन का अधिकाँश भाग लगाया। उसी के फलस्वरूप आज हरिजन प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति कर रहे हैं।
मनुष्य के जीवन का जितना विकास होता है, सृष्टि के साथ उसका जितना सम्बन्ध होता है उतने ही क्षेत्र के भीतर वह ईश्वर का साक्षात्कार करता है। समाज प्रेमी सत् का साक्षात्कार समाज की रक्षा और उसके सुख में करता है। समाज के प्रत्येक मनुष्य के साथ सम्बन्ध न होने पर भी उसकी सहानुभूति समाज के छोटे बड़े सभी प्राणियों के साथ होती है। वह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर सत् का प्रकाश देखता है। इसी प्रकार देश-धर्म का पालक देश के शासन प्रबन्ध की प्रत्येक बुराई को दूर करना अपना कर्त्तव्य समझता है। राष्ट्र को समुन्नत बनाने तथा उसकी रक्षा करने में उसकी ईश्वरानुभूति होती है। देश प्रेमी देशवासियों को अपने सम्बन्धी जैसा समझता है। डॉ. खान अब्दुल गफ्फार खाँ हजारा की घटनाओं से प्रभावित होकर वहाँ क्यों पहुँचे थे? बिहार की भयानक दशा से पं. जवाहर लाल नेहरू अधीर क्यों हो उठे हैं! यह हाथों में शासन सत्ता होने की बात नहीं, हृदय में पीड़ा अनुभव करने की बात है। बंगाल में जब शरणार्थियों की सेवा के लिए अपील हुई तो वे ही स्त्री-पुरुष प्राणों का मोह छोड़कर आगे आये जिन्होंने देश प्रेम को हृदय में उमड़ता पाया। देश के बच्चे-बच्चे में ईश की विभूति एवं सत्ता दृष्टि आई। साराँश यह है कि जब मनुष्य शनैः शनैः जीवन पुष्प को विकसित करता है तो उसकी ईश्वरानुभूति का क्षेत्र भी विस्तृत होता जाता है। वह परिवार समाज और देश जैसे सीमित क्षेत्र से निकल कर समस्त भूमण्डल में ईश्वर का साक्षात्कार करता है। वह विश्व के कल्याण, रक्षा, समृद्धि तथा सुख की अभिलाषा करता है। ईसा, बुद्ध और गाँधी ऐसे ही महान पुरुषों में से थे जो विश्व को सुखी देखकर सन्तुष्ट होते थे और उसकी हीन दशा से दुखित विश्व का बच्चा-बच्चा उनकी सहानुभूति प्राप्त करता था। उन्होंने विश्व के प्रत्येक प्राणी की अंतरात्मा में ईश्वर की सच्ची प्रतिमा देखी।
मनुष्य सत् का जितना साक्षात्कार करता है, उतना ही वह धर्म को समझता है। एक ओर ईश्वर में उसका प्रेम, विश्वास, श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है, तो दूसरी ओर प्राणीमात्र के लिए उसका प्रेम सहानुभूति और कष्ट निवारण का क्षेत्र विस्तृत होता है। मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है, जिसको प्राप्त करने पर विश्व के साथ उसके हृदय का तादात्म्य हो जाता हैं। उसका व्यक्तित्व विश्व के व्यक्तित्व में मिल जाता है। मानव समाज से पृथक उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता। विश्व की आत्मा उसकी आत्मा हो जाती है। उसे कोई स्थान ईश्वर से रिक्त दृष्टि नहीं आता। उस अवस्था में मनुष्य सब प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। इसी को भारतीय धर्म ग्रन्थों में मुक्तावस्था कहा गया है। आज महात्मा गाँधी विश्व के हृदय में गहरे क्यों पैठ गये हैं? चारों दिशाओं में उनकी आवाज क्यों गूँज रही है? प्रत्येक प्राणी की जिह्वा पर उनकी चर्चा क्यों है? इसलिए कि वे अपने व्यक्तित्व को मिला कर सब को उसका थोड़ा-थोड़ा अंश दे गये अथवा सबको अपने आप में लय कर गये। वृहदारण्यक उपनिषद् में “आत्मलय” करने को जीवन का मुख्य लक्षण बतलाया गया है। जिसे साम अर्थात् अपने समान बना लेना कहते हैं। अखिल विश्व के बीच जब मनुष्य का चित सत् का साक्षात्कार करता है, तभी वह सच्चिदानंद भगवान को समझता और प्रतिपल उसकी समीपता का अनुभव करता है। उस समय उसको सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है।
प्रेम, श्रद्धा, भक्ति और सहानुभूति धर्म के अंग हैं। हृदय को विकास होने पर प्राणी भगवान के प्रेममय स्वरूप को समझ कर चराचर जगत को प्रेम मय देखता है। श्रद्धा भक्ति सहानुभूति आदि गुण उसके हृदय में स्वभावतः उद्दीप्त होते हैं। ईसा, बुद्ध और गाँधी के जीवन पर दृष्टि डालने से यह बात स्पष्ट हो जाती है? ईश्वर के साथ हमारा जितना सम्बन्ध होगा हमारे धर्म और प्रेम की परिधि भी उतनी ही विस्तृत होगी। हम ईश्वर से जितना प्राप्त करते हैं उतना ही प्राणियों को दे सकते हैं। ईश्वर भक्त सबको अपने में और अपने को सब में देखने लगता है। यही आत्मा को पहचानना या आत्म साक्षात्कार है।
जो चीजें सरलता से मिल जाती हैं वे महान नहीं होती। महान चीजों को प्राप्त करने के लिए तो दुर्गम मार्ग से चलना होता है।
-लोकमान्य तिलक
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कोई भी महान कार्य चालाकी से नहीं होता। प्रेम, सत्य पालन और उत्साह द्वारा ही समस्त कार्य पूरे होते हैं इसलिए अपने पुरुषार्थ का उपयोग करो।
-स्वामी विवेकानन्द
हिन्दू-धर्म में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। विविध बातों के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी मतभेद भी हैं, पर गायत्री मन्त्र की महिमा एक ऐसा तत्व है जिसे सभी शास्त्रों ने, सभी सम्प्रदायों ने, सभी ऋषियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है।
अथर्ववेद 19-71-1 में गायत्री की स्तुति की गई है जिसमें उसे आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन, और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।
विश्वामित्र का कथन है- ‘गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है।’ सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री, मन्त्र की एक कला के समान भी नहीं हैं।
भगवान मनु का कथन है- ‘ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाला गायत्री मन्त्र निकाला। गायत्री से बढ़ कर पवित्र करने वाला कोई मन्त्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष का गायत्री का जप करता है वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों संध्याओं में गायत्री जपता है। वह वेद पढ़ने के फल को प्राप्त होता है। हम कोई साधना करें या न करें केवल गायत्री जप से भी सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
योगिराज याज्ञवलक्य कहते हैं- ‘गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया। एक और षट्अंगों समेत वेद और दूसरी ओर गायत्री को रखा गया। वेदों का सार उपनिषद् है, गायत्री वेदों की जननी है, पापों का नाश करने वाली है, इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मन्त्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, गायत्री से श्रेष्ठ मन्त्र न हुआ न आगे होगा। गायत्री जान लेने वाला समस्त विद्याओं का वेत्ता और श्रेष्ठ श्रोत्रिय हो जाता है। जो द्विज गायत्री परायण नहीं वह वेदों का पारंगत होते हुए भी शुद्र के समान है, अन्यत्र किया हुआ उसका श्रम व्यर्थ है। जो गायत्री नहीं जपता ऐसा व्यक्ति ब्राह्मणत्व से च्युत और पापयुक्त हो जाता है।
पाराशर जी कहते हैं- समस्त जप सूक्तों तथा वेद मंत्रों में गायत्री मंत्र परमश्रेष्ठ है। वेद और गायत्री की तुलना में गायत्री का पलड़ा भारी है। भक्तिपूर्वक गायत्री अपनाने वाला परम मुक्त होकर पवित्र बन जाता है। वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास पढ़ लेने पर भी जो गायत्री से हीन है उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिए।
शंख ऋषि का मत है- ‘नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री ही है। उससे उत्तम वस्तु स्वर्ग और पृथ्वी पर कोई नहीं है। गायत्री का ज्ञाता निस्संदेह स्वर्ग को प्राप्त करता है।’
शौनक ऋषि का मत है- ‘अन्य उपासनाएं करें चाहे न करें, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
अत्रि ऋषि कहते हैं- ‘गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रताप से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है उसके लिए उस संसार में कोई दुख शेष नहीं रह जाता है।
महर्षि व्यासजी कहते हैं- जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद, दूध का सार घृत है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री छोड़ कर अन्य उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
भारद्वाज ऋषि कहते हैं- ‘ब्रह्मा आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैं, वह ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं।’ गायत्री से रहित व्यक्ति शूद्र से भी अपवित्र है।
चरक ऋषि लिखते हैं- ‘जो ब्रह्मचर्य पूर्वक गायत्री की उपासना करता है और आँवले के ताजे फलों का सेवन करता है वह दीर्घजीवी होता है।’
नारद जी की उक्ति है- ‘गायत्री भक्ति का ही रूप है, जहाँ भक्ति रूपा गायत्री है वहाँ श्री नारायण का निवास होने में कोई संदेह नहीं करना चाहिए।’
वशिष्ठ जी का मत है- “मन्दमति कुमार्गगामी और अस्थिर मति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं फिर सद्गति होना निश्चित है जो पवित्रता और स्थिरता पूर्वक सावित्री की उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।”
उपरोक्त अभिमतों से मिलते-जुलते अभिमत प्रायः सभी ऋषियों के हैं। इससे स्पष्ट है कोई ऋषि अन्य विषयों में चाहे आपसी मत भेद रखते रहे हो पर गायत्री के बारे में उन सब में समान श्रद्धा थी और वे सभी अपनी उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। शास्त्रों में, धर्म ग्रन्थों में, स्मृतियों में, पुराणों में गायत्री की महिमा तथा साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े हैं, इन सब का संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
वर्तमान शताब्दी के आध्यात्मिक तथा दार्शनिक महापुरुषों ने भी गायत्री के महत्व को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसा कि प्राचीन काल के तत्वदर्शी ऋषियों ने किया था। आज का युग बुद्धि और तर्क का, प्रत्यक्ष वाद का युग है। इस शताब्दी के प्रभावशाली एवं मान्य व्यक्तियों की विचारधारा केवल धर्मग्रन्थों या परम्पराओं पर आधारित नहीं रही है। उन्होंने बुद्धिवाद तर्कवाद और प्रत्यक्षवाद को अपने विचार और कार्यों में प्रधान स्थान दिया है। ऐसे महापुरुषों को भी गायत्री तत्व सब दृष्टिकोणों से परखने पर खरा सोना प्रतीत हुआ है। नीचे कुछ के विचार देखिए-
महात्मा गाँधी कहते हैं- गायत्री मन्त्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शाँत हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।
लोकमान्य तिलक कहते हैं- जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में भारतीय प्रजा जकड़ी हुई है उनका अन्त राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से न हो जायगा। उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए जिससे सत् और असत् का विवेक हो। कुमार्ग को छोड़ कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मंत्र में यही भावना विद्यमान है।
महामना मदनमोहन जी मालवीय ने कहा था- ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री है। गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है। ईश्वर का प्रकाश आत्मा में आता है। इस प्रकाश से असंख्यों आत्माओं को भव बन्धन से त्राण मिला है। गायत्री में ईश्वर परायणता के भाव उत्पन्न करने की शक्ति है। साथ ही यह भौतिक अभावों को दूर करती है। गायत्री की उपासना करना ब्राह्मणों के लिए तो अत्यन्त आवश्यक है। जो ब्राह्मण गायत्री जप नहीं करता वह अपने कर्त्तव्य धर्म को छोड़ने का अपराधी होता है।
कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते हैं- ‘भारत वर्ष को जगाने वाला जो मन्त्र है वह इतना सरल है कि एक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है वह है- गायत्री मन्त्र। इस पुनीत मन्त्र का अभ्यास करने में किसी प्रकार के तार्किक ऊहापोह, किसी प्रकार के मतभेद अथवा किसी प्रकार के बखेड़े की गुंजाइश नहीं है।’
योगी अरविन्द घोष ने कई जगह गायत्री जप करने का निर्देश किया है। उन्होंने बताया है कि गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। उन्होंने कइयों को साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस का उपदेश है- “मैं लोगों से कहता हूँ कि लम्बे साधन करने की उतनी जरूरत नहीं है। इस छोटी सी गायत्री की साधना करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है।”
स्वामी विवेकानन्द का कथन है- ‘राजा से वही वस्तु माँगी जानी चाहिए जो उसके गौरव के अनुकूल हो परमात्मा से माँगने योग्य वस्तु सद्बुद्धि है। जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। सद्बुद्धि से सत्मार्ग पर प्रगति होती है इसी सत् कर्म से सब प्रकार के सुख मिलते हैं। जो सत् की ओर बढ़ रहा है उसे किसी प्रकार के सुख की कमी नहीं रहती। गायत्री सद्बुद्धि का मन्त्र है। इसलिए उसे मन्त्रों का मुकुटमणि कहा गया है।
जगद्गुरु शंकराचार्य जी का कथन है- गायत्री की महिमा का दर्शन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। बुद्धि का शुद्ध होना इतना बड़ा कार्य है जिसकी समता संसार के और किसी काम से नहीं हो सकती। आत्म-प्राप्ति करने की दिव्य दृष्टि जिस शुद्ध बुद्धि से प्राप्त होती है उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है। गायत्री आदि मन्त्र है। उसका अवतार दुष्टों को नष्ट करने और सत् के अभिवर्धन के लिए हुआ है।
स्वामी रामतीर्थ ने कहा है- राम को प्राप्त करना सबसे बड़ा काम है। गायत्री का अभिप्राय बुद्धि को काम रुचि से हटा कर राम रुचि में लगा देना है। जिसकी बुद्धि पवित्र होगी वही राम को प्राप्त करने का काम कर सकेगा। गायत्री पुकारती है कि बुद्धि में इतनी पवित्रता होनी चाहिए कि वह काम को राम से बढ़ कर समझे।
महर्षि रमण का उपदेश है- योग विद्या के अंतर्गत मंत्र विद्या बड़ी प्रबल है। मंत्रों की शक्ति से अद्भुत सफलताएं मिलती हैं। वह गायत्री मन्त्र है। जिससे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं।
स्वामी शिवानन्दजी कहते हैं- ब्रह्म मुहूर्त में गायत्री का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और हृदय में निर्मलता आती है। शरीर निरोग रहता है, स्वभाव में नम्रता आती है बुद्धि सूक्ष्म होने से दूरदर्शिता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होता है। कठिन प्रसंगों में गायत्री द्वारा दैवी सहायता मिलती है। उस के द्वारा आत्म दर्शन हो सकता है।
काली कमली वाले बाबा विशुद्धानन्दजी कहते थे- “गायत्री ने बहुतों को सुमार्ग पर लगाया है। कुमार्ग गामी मनुष्य की पहले तो गायत्री की ओर रुचि ही नहीं होती। यदि ईश्वर की कृपा से हो भी जाए तो वह कुमार्ग गामी नहीं रहता। गायत्री जिस के हृदय में वास करती है उसका मन ईश्वर की ओर जाता है। विषय विकारों की व्यर्थता उसे भली प्रकार अनुभव होने लगती है। कई महात्मा गायत्री का जप करके चरम सिद्ध हुए है। परमात्मा की शक्ति ही गायत्री है। जो गायत्री के निकट जाता है वह शुद्ध होकर रहता है। आत्म-कल्याण के लिए मन की शुद्धि आवश्यक है। मन की शुद्धि के लिए गायत्री मंत्र अद्भुत है। ईश्वर प्राप्ति के लिए गायत्री जप को प्रथम सीढ़ी समझना चाहिए।
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध आत्मज्ञानी टी0 सुब्बाराव कहते हैं- सविता नारायण की दैवी प्रकृति को गायत्री कहते हैं। आदि शक्ति होने के कारण इसको गायत्री कहते हैं। गीता में इसका वर्णन ‘आदित्यवर्णा’ कह कर किया गया है। गायत्री की उपासना करना योग का सबसे प्रथम अंग है।
श्री स्वामी करपात्री जी का कथन है- ‘जो गायत्री के अधिकारी हैं उन्हें नित्य नियमित रूप से उसका जप करना चाहिए। द्विजों के लिए गायत्री का जप एक अत्यन्त आवश्यक धर्मकृत्य है।
गीता धर्म के व्याख्याता श्री स्वामी विद्यानन्द जी कहते हैं- “गायत्री बुद्धि को पवित्र करती है। बुद्धि की पवित्रता से बढ़कर जीवन में और दूसरा लाभ नहीं है। इसलिए गायत्री एक बहुत बड़े लाभ की जननी है।
सर राधाकृष्णन कहते हैं- यदि हम इस सार्वभौमिक प्रार्थना गायत्री पर विचार करें तो हमें मालूम होगा कि यह हमें वास्तव में कितना ठोस लाभ देती है। गायत्री हम में फिर से जीवन का स्रोत उत्पन्न करने वाली आकुल प्रार्थना है।
प्रसिद्ध आर्य समाजी महात्मा सर्वदानन्द जी का कथन है- गायत्री मन्त्र द्वारा प्रभु का पूजन सदा से आर्यों की रीति रही है। ऋषि दयानन्द ने भी उसी शैली का अनुसरण करके संध्या का विधान तथा वेदों के स्वाध्याय का प्रयत्न करना बताया है। ऐसा करने से अन्तःकरण की शुद्धि तथा बुद्धि निर्मल होकर मनुष्य का जीवन अपने तथा दूसरों के लिए हितकर हो जाता है। जितनी भी इस शुभ कर्म में श्रद्धा और विश्वास हो उतना ही अविधा आदि क्लेशों का ह्रास होता है। जो जिज्ञासु गायत्री मन्त्र को प्रेम और नियमपूर्वक उच्चारण करते हैं उनके लिए यह संसार सागर में तरने की नाव और आत्म प्राप्ति की सड़क है।
आर्यसमाज के जन्मदाता श्री स्वामी दयानन्द गायत्री के श्रद्धालु उपासक थे। ग्वालियर के राजा साहब से स्वामी ने कहा था कि भागवत सप्ताह की अपेक्षा गायत्री पुरश्चरण अधिक श्रेष्ठ है। जयपुर के सच्चिदानन्द, हीरालाल रावल, घोडलसिंह आदि को गायत्री जप की विधि सिखाई थी। मुलतान में उपदेश के समय स्वामी जी ने गायत्री मन्त्र का उच्चारण किया और कहा कि- “यह मंत्र सबसे श्रेष्ठ है। चारों वेदों का मूल यही गुरु मन्त्र है आदि काल में सभी ऋषि मुनि इस का जप किया करते थे।” स्वामी जी ने कई स्थानों पर विशाल गायत्री अनुष्ठानों का आयोजन कराया था जिन में चालीस तक की संख्या में विद्वान ब्राह्मण बुलाये गये थे। यह जप पन्द्रह दिन तक चले थे।
इस प्रकार वर्तमान शताब्दी कि अनेकों गणमान्य बुद्धिवादी महापुरुषों के अभिमत हमारे पास संग्रहीत हैं। उन पर विचार करने से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि गायत्री उपासना कोई अन्धविश्वास जन्य परम्परा नहीं है, वरन् उसके पीछे आत्मोन्नति करने वाले ठोस तत्वों का बल है। इस महान शक्ति को अपनाने का जिसने भी प्रयत्न किया है उसे लाभ ही मिला है। गायत्री साधना कभी भी निष्फल नहीं जाती।
आचार की उन्नति करना, आर्थिक उन्नति से कहीं अधिक महत्व रखता है।
आत्म विश्वास तथा दृढ़ निश्चय के द्वारा मनुष्य की सब कठिनाइयाँ सरल बन जाती हैं।
-मदनमोहन मालवीय
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मनुष्यों को मनुष्य होने के कारण प्यार करना चाहिए न कि उनकी सम्पत्ति विद्या या अधिकार के कारण। -ला. लाजपत राय
(अनु.- श्री रामखेलावन चौधरी बी.ए.)
मनुष्य का बचपन सावन की हरियाली है। उसमें चिंता नहीं, विकार नहीं और कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं। बचपन का अंत मानो फूलों की सेज पर शयन करने के आनन्द की समाप्ति है। युवावस्था आते ही- मैं क्या बनूँगा?- यह एक प्रश्न दिन-रात प्रत्येक युवक की आँखों के सामने घूमा करता है। उसके माता-पिता और अभिभावकों के आगे यह समस्या आ जाती है कि- हम उसको क्या बनाये? युवावस्था को ‘मस्ती’ जैसे शब्दों की व्याख्या करना एक भयानक भूल है- संसार के निष्ठुर सत्य का सामना इसी समय करना पड़ता है। युवावस्था एक संग्राम है और युवक की एक भूल असफलता का कारण बन सकती है। युवावस्था शतरंज के खेल की भाँति ‘खेल’ कही जा सकती है पर यह याद रखना चाहिए कि एक गलत चाल से ही ‘जान’ का खतरा भी पैदा हो जाता है।
सम्भव है इस बात की गम्भीरता का अनुभव लक्ष्मी के कुछ वरद पुत्र न कर सकें। उनका ऐसा करना कुछ अनुचित भी नहीं मगर साधारण करोड़ों युवकों के लिए इसके महत्व को हृदयंगम कर लेना अति आवश्यक है। संग्राम में उतरने के पूर्व युद्ध कौशल के तत्वों की जानकारी आने वाली पराजय को विजय बना सकती है।
एक नवयुवक साहसी व्यक्ति को अपनी सफलता के लिए अपने शरीर और मन के स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए वह जान लेना जरूरी है कि वह जितना बड़ा बोझ अपने कंधों पर उठाने जा रहा है, उसके ढोने की शक्ति उसकी है या नहीं। बोझा ढोने में मनुष्य की लगन बड़ी सहायक होती है। चींटी अपने से बीसियों गुना भार उठा ले जाती है, क्योंकि उसमें सच्ची लगन है और अध्यवसाय है। वकील बनने की क्षमता रखने वाला, यदि रसायन शास्त्री बनने का प्रयत्न करे, तो इसे अपनी प्रतिभा का नष्ट करना ही कह सकते हैं। एक जन्मजात गायक कभी भी शेयर बाजार में सफल नहीं हो सकता। जिसमें अदम्य साहस है, जो प्रत्येक स्थिति पर काबू पा लेता है और जो बिखरी शक्तियों को एक में समन्वित कर लेता है, वह दैनिक जीवन में चमक सकता है। इस बात में सभी विद्वान सहमत हैं कि यदि सूर्य के रथ को खींचने वाले द्रुतगामी घोड़ों को बैलगाड़ी में जोत दिया जाय, तो इससे बढ़कर मूर्खता की दूसरी बात हो ही नहीं सकती। इसलिए युवक को चाहिए की वह अपनी आत्मा को पहचाने और संरक्षकों तथा माता-पिता का सबसे बड़ा काम यही है कि उसे केवल इतनी सहायता दे जिसमें उसे अपनी शक्तियों का बोध अच्छी तरह हो जाय। अभिभावकों की अदूरदर्शिता और अति प्रेम के कारण कितनी ही प्रतिभाओं का विकास न हो सका।
अपनी शक्ति को पहचानने में भी बहुत बड़े धोखे हो जाते हैं। ‘पसंद’ और ‘प्रतिभा’ दो अलग अलग चीजें है और ‘पसंद’ को ‘प्रतिभा’ समझ लेना बड़ी भारी भूल है। यदि किसी को कविता सुनने में आनन्द आता है तो उसे वह न समझ लेना चाहिए कि वह कालिदास और भवभूति बन सकता है। पसंद और प्रतिभा में विवेक कर लेना कठिन भी है पर उसे इस प्रकार समझा जा सकता है। ‘प्रतिभा’ मनुष्य के हृदय के भीतर निरंतर जलने वाली ज्वाला है, वह उसकी महत्वाकाँक्षा को प्रतिफल भोजन देकर जीवित रखती है। दिन-रात, सोते-जागते और उठते-बैठते, स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से मनुष्य एक बड़ी भारी कमी अपने में महसूस करता है। उसे पूरा करने के लिए उसका हृदय तड़पता रहता है और उसी के चिंतन में उसे शान्ति मिलती है, बस प्रतिभा यही है। प्रतिभा केवल एक होती है, पसन्द अनेक होती हैं। गायिका के जमघट में बैठकर और संगीत का आनन्द लाभ करके जब यह इच्छा होती है कि कितना अच्छा हो यदि मुझे भी गाना आ जाये और उस समय यह भी सोच ले कि हम भी गीत का अभ्यास करेंगे मगर उस गोष्ठी से दूर हट कर वही इच्छा लुप्त हो जाती है और यदि महीनों उस संगति में न जाये तो उस ओर ध्यान भी नहीं जाता, वही स्थिति पसन्द का बोध कराती है। पसंद क्षणिक है, वह मन को केवल अस्थायी शान्ति देती है। मनुष्य परिवर्तन चाहता है ‘पसंद’ केवल इसमें सहायता देती है। यदि पसंद पूरी न हो तो मनुष्य को कोई दुख विशेष नहीं होता। एक औंस ‘प्रतिभा’ हजारों मन ‘पसंद’ से ज्यादा कीमती है। इसलिए राख के अन्दर छिपी हुई चिंगारी की तरह अपनी प्रतिभा को खोज निकालो।
जीवन कभी भी शाँत, सुखी और सफल नहीं हो सकता, जब तक उसका समन्वय प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के साथ न हो। एक विद्वान कहता है कि-”बालक जो चाहता है, युवक उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है और पूर्ण मनुष्य उसे प्राप्त करता है।” सच्चा और स्वतः परिश्रम प्रतिभा से पैदा होता है। नेलसन ने जल युद्ध में अद्वितीय सफलता इसलिए प्राप्त की कि वह बचपन में जहाज का खिलौना खेला करता था। चन्द्रगुप्त मौर्य भारत सम्राट इसीलिए बना कि वह बचपन में खेलने कूदने में राजा का अभिनय किया करता था। यदि सच्ची प्रतिभा है तो जरा सा बल मिलने और मार्ग प्रदर्शन करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त करा देती है।
प्रतिभा को पहचान लेने के बाद, उसके समुचित विकास में अनेक बातों का सहारा लेना पड़ता है। घरेलू परिस्थितियों का इस सम्बन्ध में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि मनुष्य जिस माता के गर्भ से जन्म लेता है और जिस पिता के प्यार से पलता है, उसके प्रभाव से उसकी प्रतिभा अछूती नहीं रह सकती। इन्हीं कारणों से प्रायः सभी विद्वानों ने मातृ-प्रभाव को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। वह युवक बड़े भाग्यवान हैं और उनकी सफलता निश्चित है जिन्हें अच्छी माता और अच्छे पिता का संरक्षण प्राप्त है।
घरेलू प्रभाव के बाद मनुष्य की प्रतिभा पर सबसे अधिक प्रभाव ‘मित्र’ का पड़ता है। इस प्रकार के कुप्रभाव से बचना मनुष्य के हाथ में है। अच्छी संगति की महिमा इसीलिए बार-बार गाई है कि मनुष्य के जीवन का निर्माण उसके मित्रों के सहयोग से होता है। एक लेखक ने कहा है कि एक सच्चा मित्र मनुष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन है और जिसको ऐसा मित्र मिल गया, उसे मानो एक बड़ा खजाना मिल गया। एक सच्चा मित्र जीवन की दवा है। अपनी प्रतिभा के अनुकूल ही अपने मित्र बनाने चाहिए। अंग्रेजी कवि वायरन के काव्य का अध्ययन करने से स्पष्ट पता चलता है कि उसकी प्रतिभा पर उसके मित्रों के विचारों का रंग खूब चढ़ा हुआ है। शेली के संग में रह कर ही उसने भावों की कोमलता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग प्राप्त किया। अपने अध्ययन काल में पोले बड़ा आलसी था। रात भर सोने के बाद भी वह दिन चढ़े तक सोया करता था। एक दिन उसका मित्र आया और उसको बिस्तर पर पड़े देखकर बोला- “तुम्हारे बारे में सोचते-सोचते मैं रात भर न सो सका। मैं सिर्फ यही सोचता रहा तुम कितने बेवकूफ हो। मेरे पास इतने साधन है कि मैं जितना चाहूँ आराम कर लूँ, जितना चाहूँ आलस करूं, पर तुम गरीब हो, और आलस्य तुम्हें उचित नहीं। मैं शायद संसार में कुछ भी नहीं कर दिखा सकता अगर कोशिश भी करूं, पर तुम सब कुछ कर सकने में समर्थ हो। मुझे रातभर सिर्फ यह सोच कर नींद नहीं आई कि तुम बड़े मूर्ख हो और अब मैं तुमको गंभीरता पूर्वक सावधान करने और चेतावनी देने आया हूँ। अगर वास्तव में तुम इसी तरह आलसी बने रहे तो मैं तुम्हारा साथ हमेशा के लिए छोड़ दूँगा।”
यह प्रेम की ताड़ना थी। पोले के बाद का जीवन ‘मित्र’ के महत्व का सबसे बड़ा साक्षी है। अज्ञान और आलस्य के गहन अंधकार को मित्र का प्रकाश ही दूर कर सकता है।
अपनी सच्ची शक्तियों को पहचान लेने के बाद और उनमें विकास के लिए उचित सहयोग प्राप्त कर लेने के बाद जीवन संग्राम के लिए यात्रा करने का समय आ जाता है। उसी समय यह भी निश्चित कर लेना आवश्यक है कि हम अपने उद्देश्य कभी भी न बदलेंगे और सूत्र से काम लेंगे। प्रारम्भ में कोई भी काम अच्छा नहीं लगता और उसके कारण भी है, चाहे वह नौकरी हो, चाहे व्यापार हो या कला की उपासना, शुरू में ही सारे आयोजन इकट्ठा करने और उपयुक्त वातावरण तैयार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लुढ़कते हुए पत्थर पर काई नहीं जमती और ‘रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ”- यह दो कहावतें याद रखनी चाहिए। जीवन में यदि सब्र और शाँति से काम लिया जाय तो असफल होने का कोई कारण नहीं रहता।
कभी-कभी ऐसा होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर हम चलना चाहते हैं, दूसरे लोग उसे नीची दृष्टि से देखते हैं। ऐसी स्थिति में अपने मन चाहे काम से घृणा न करने लगना चाहिए। दूसरों को व्यर्थ में प्रसन्न करने और झूठा सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी प्रतिभा की भूख को मार डालना बड़ी बेवकूफी है। हर एक काम को ईमानदारी और सुरुचिपूर्ण ढंग से करके गौरव पूर्ण बनाया जा सकता है। सड़क पर एक गंदा टाट बिछाकर हजारों मक्खियों की भिनभिनाहट के बीच में बैठ कर जूता तैयार करने वाले मोची का व्यवसाय घृणित नहीं है, उसकी क्रिया प्रणाली घृणित है। बाजार में साफ सुथरे ढंग से बैठ कर और अपने ग्राहकों को अच्छा काम देकर वही मोची पूरा सम्मान प्राप्त कर सकता है।
जीवन संग्राम की तैयारी का प्रारंभ यहीं से होता है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
जीवन के जिस मूल तत्व पर मैं विश्वास करता हूँ वह प्रगति है। मनुष्य का जीवन निरन्तर अग्रसर हो रहा है। वह आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक प्रत्येक दृष्टि से निरन्तर संघर्ष करता हुआ आगे बढ़ रहा है।
“आगे बढ़ना”- यही हमारा इष्ट है। आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं का विश्वास है कि यदि मनुष्य इसी गति से बढ़ता रहा तो एक दिन वह परमेश्वर से सान्निध्य प्राप्त कर लेगा। उसमें उन सभी ईश्वरीय तत्वों का प्रचुर मात्रा में विकास हो जाएगा जिनका उल्लेख गीता के 16 वें अध्याय में किया गया है।
अनुभव हमारी सबसे बड़ी सम्पत्ति है, जो हम भाँति-2 के झंझटों, संघर्षों, हानि के पश्चात् प्राप्त करते हैं। अनुभव खरीदा नहीं जा सकता। एक कण अनुभव के लिए कभी-कभी भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। अनुभव से हमें ज्ञात होता है कब, किस प्रकार हमें अग्रसर होना उचित है। औचित्य तथा अनौचित्य का निर्णय हम अनुभव के बल पर किया करते हैं।
अनुभव हमें बताता है कि संसार के कार्य कोरी स्कीमें या योजनाएँ बनाने से नहीं होते। जो जितना ही कागजी कार्यवाही करता है, वह उतना ही घाटे में रहता है, उसकी शक्ति का बहुत सा अपव्यय केवल कोरी बातों में ही हो जाता है। अतः जब ठोस कार्य करने का अवसर आता है तो उसे मुँह की खानी पड़ती है। वह वहीं का वहीं रह जाता है।
अनुभव हमें बताता है जब आप शंकित अवस्था में हों, मार्ग स्पष्ट न सूझता हो, तो ठहरिये। जब हमें कोई पथ-प्रदर्शन न हो, तो थोड़ी देर ठहर कर पथ-प्रदर्शन के लिए कोशिश करनी चाहिए। यह पथ-प्रदर्शन दैवी एजेंसी से हमें प्राप्त होता है। यदि हमारी अन्तरात्मा खुली रहे और बुद्धि निर्विकार रहे, तो वास्तव में यह पथ-प्रदर्शन आपको प्राप्त हो जायेगा। एक समय होता है, जब हमें ठहर कर चिन्तन करना उचित है किन्तु एक बार न्यायोचित योजना बना कर उससे पीछे सरकना उचित नहीं है।
किंतु हमें निरन्तर अपनी गति पर ध्यान रखना चाहिए। हम चाहे ठहर कर विश्राम कर लें, पर प्रगति तो चलनी ही चाहिए। शैथिल्य जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन है, इससे सावधान रहें। लोहा जंग लग कर काम में आकर घिसने से पहले नष्ट होता है।
प्रकृति के विकास का नियम सब जगह कार्य करता है। उदाहरणार्थ यह देखा गया है कि पौधे बिना ठहरे (Pause) हुए विकसित नहीं होते। उनके विकास के क्रम हैं। वे एक स्थिति प्राप्त करने के पश्चात् कुछ ठहरते हैं, फिर विकसित होते हैं। एक बार ठहर कर वे नव-वेग से अग्रसर होते हैं, किंतु इन रुकावटों के बावजूद पौधे का विकास-क्रम नहीं टूटता। वह स्थिर नहीं होते, पीछे नहीं लौटते, निरन्तर आगे ही बढ़ते हैं, थोड़ी देर के लिए ठहरना उनके विकास की एक दशा मात्र है।
यही नियम हमारे आध्यात्मिक जीवन पर लागू होता है। कभी-कभी हम थक कर क्लाँत हो उठते हैं, मन प्रार्थना, चिंतन, मनन इत्यादि पर केन्द्रित नहीं होता, सब कुछ झंझट सा प्रतीत होता है। सब कुछ नियंत्रण तोड़ डालने को मन करता है। असंयम की ओर प्रवृत्ति होती है, मादक दृव्य हमें अपनी ओर खींचते हैं। साधक के लिए यह परीक्षा की घड़ी होती है। यहाँ उसके धैर्य और संयम की परीक्षा होती है। यदि वह किसी प्रकार एक रुकावट के पश्चात् पुनः क्रियाशील होकर चल उठा तब तो पुनः प्रगति होने लगती है, अन्यथा पतन प्रारंभ हो जाता है।
अपने आप से प्रश्न कीजिए- क्या मैं प्रतिदिन किसी निश्चित उद्देश्य की ओर बढ़ रहा हूँ? क्या मैं प्रतिदिन उस उद्देश्य के पास आने का सच्चाई से प्रयत्न करता हूँ? क्या मेरा पुरुषार्थ जागृत है? क्या मैं व्यर्थ के बहाने बना कर अपनी उन्नति रोकता तो नहीं हूँ?
स्मरण रखिए, आन्तरिक दृष्टि से आपको डांटने फटकारने वाला आपके पास अपनी आत्मा के अतिरिक्त कोई भी नहीं है। कोई भी आपसे आगे बढ़ने और उन्नति करने की अनुनय-विनय न करेगा। आप स्वयं ही अपने को बनाने और स्वयं ही बिगाड़ने वाले हैं।
जीवन तो सदैव प्रवाहित होने वाली, आगे को बहने वाली सरिता के समान गतिवान है। इसमें ठहराव नहीं है, प्रवाह और गति है। हमें अपने दैनिक जीवन में यही ध्यान रखना है कि हम अपने कार्यों से क्या निरन्तर उस दौड़ को कायम रख रहे हैं या हार कर कहीं बैठ गये हैं?
(श्री सच्चिदानन्द जी तिवारी, स्टेशन मास्टर, रीठी)
संसार में प्राणीमात्र जितने भी संकल्प अथवा कर्म करते हैं प्रायः उन सबसे किसी न किसी प्रकार की सुख प्राप्ति, अथवा दुःख से निवृत्ति की वासना अवश्य ही रहती है। यहाँ तक कि जो संकल्प स्वयं ही हमारे अन्दर उठते हैं अथवा जो कर्म इच्छा न रहते हुए भी हम से बन पड़ते हैं, उसकी जड़ में भी एक बहुत बड़ा अंश इसी वासना का अवश्य ही छुपा रहता है। कारण, कि जिन-जिन दशाओं में या जिन साधनों द्वारा हम सुख की प्राप्ति कर सकते हैं ऐसे कार्यों में हमारे अंतर्मन की स्वीकृति बनी रहती है, और इसके विपरीत स्थिति में हमारे अन्दर सूक्ष्म प्रतिद्वंद्विता के भाव क्रियाशील होने लगते हैं। उदाहरणार्थ, जो अंश हमारे भोजन में शरीर पोषण के लिए लाभदायक होता है वह अनिच्छा से खाने पर भी सुपाच्य है और पुष्टि कारक बन कर हमारे शरीर का अंग बन जाता है और इसके विपरीत या हानिकारक भोजन इच्छापूर्वक खाने पर भी हमारे शरीर का प्रत्येक अवयव उसे बाहर निकाल फेंकने की चेष्टा करने लगता है। हमारी इच्छा पूर्वक या अनिच्छा पूर्वक की हुई सभी क्रियाएं सुख प्राप्ति की कामना से सम्बद्ध होती हैं। इससे प्रकट होता है कि मनुष्य का जीवनोद्देश्य सुख की प्राप्ति है अब देखना यह है कि सुख-दुख का आधार क्या है। कई व्यक्ति सोचते हैं कि वस्तुओं की अधिकता या न्यूनता का सुख-दुख से साथ है पर वास्तव में ऐसी बात नहीं है। इच्छा की पूर्ति का नाम ही सुख है। यदि हम ऐसी इच्छाएं करें जो आसानी से पूरी हो सकें तो स्वल्प साधनों से भी सुखी रहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि इच्छाएं ऐसी हों जिनको पूरा करना सुगम न हो तो समझिए कि सुख प्राप्ति से उतनी ही दूर तक वंचित रहना पड़ेगा।
जिस वस्तु की इच्छा होती है उस पर चित्त की एकाग्रता केन्द्रित हो जाती है, इसलिए वही सुख का केन्द्र बन जाती है। एकाग्रता एक ऐसी शक्ति है कि वह जहाँ भी होगी वहीं रस उत्पन्न हो जाएगा। चित्त की एकाग्रता से ही इन्द्रियाँ वासना जन्य सुखों का उपभोग करती हैं। यदि चित्त की उस वासना से घृणा या विरक्ति हो जाय तो इन्द्रियाँ स्वस्थ और पुष्ट होते हुए भी अपने विषय के लिए उत्सुक या इच्छुक न होगी।
हमको जो इन्द्रिय-ज्ञान प्राप्त होता है। वह चित्त की एकाग्रता द्वारा ही होता है। जैसे कि हम किसी सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा कोई वस्तु देखने में व्यस्त हैं और हमारे कमरे की घड़ी टनाटन 12 के घंटे बजा कर शान्त हो रही है, पर हम उन घंटों की आवाज न सुन सके कारण, कि उस समय सब तरफ से चित्त हटाकर उसकी एकाग्रता केवल चक्षु-इन्द्रिय पर ही एकत्र थी इसलिए कान सही सलामत होने पर भी श्रवणेन्द्रिय घड़ी के घन्टे सुन न सकी। ज्ञानेन्द्रिय का आकस्मिक परिवर्तन सुख को दुःख में और दुःख को सुख में परिवर्तित कर देता है, जैसे की आप किसी सुन्दर नर्तकी का रूप देखने में व्यस्त है कि आप को यह नहीं मालुम हुआ कि आपके पिता भी आपके बराबर खड़े होकर आपकी इस रूप रस पान रूपी निर्लज्जता का निरीक्षण कर रहे हैं और जैसे ही उन्होंने आपके सर पर अकस्मात चपत जमा कर आपका नाम लेकर आपको बुलाया तो तुरन्त आपका सुख, दुःख में परिवर्तित हो गया और वह सुन्दरी, राक्षसी प्रतीत होने लगी, इसी प्रकार समझ लीजिए कि आप नौकरी से निराश होकर विचार मग्न बैठे हुए भूखों मरने के कष्ट के दुःख का अनुभव कर रहे हैं और उसी समय पोस्टमैन आपको नौकरी मिलने का तार आपके हाथ में देता है तो अकस्मात ही आपका दुःख-सुख में बदल जावेगा।
अब आप समझ गये होंगे कि सुख और दुःख वास्तव में कोई वस्तु नहीं हैं- केवल हमारी इच्छा, प्रलोभन, आकर्षण, स्वार्थ, भय इत्यादि ही हमको सुख-दुःख प्राप्त कराते हैं पर जब हम उसको यथार्थता को समझ लेते हैं तो हमारे लिए सुख और दुःख दोनों ही कुछ नहीं के बराबर है। और जब हम सुख में आनन्द और दुःख में क्लेश का अनुभव ही नहीं करते तो हम को इनके प्राप्त करने या त्यागने की आवश्यकता या इच्छा नहीं होती और जब इच्छा ही नहीं होगी। तब संस्कार भी नहीं बनेंगे। जब संस्कार न होंगे तो फल भोगने की आवश्यकता ही नहीं। इतना सब हो जाने पर आप स्वयं उस परमानन्द रूपी सुख का अनुभव करेंगे जो किसी को प्राप्त नहीं होता और जो वास्तविक सुख है इसी को परम सुख कहते हैं और इसी का नाम परमानन्द की प्राप्ति है।
इस आनन्द को प्राप्त करने के लिए, स्वार्थ त्याग, संभावना, निस्वार्थ प्रेम, राग-द्वेष का परित्याग सर्व संसार को प्रभुमय देखना भगवान को कर्त्ता मान कर और अपने को अकर्त्ता मान सदैव कार्य करते रहना ही एकमात्र क्रिया जीव को बन्धन मुक्त करने वाली है। जो इस मार्ग को अपनाते हैं वे ही क्षणिक मिथ्यानन्दों में न उलझकर जीवन के चरमलक्ष-परमानन्द को प्राप्त करते हैं।
धर्म हो चाहे राजनीति, दोनों में साहस की आवश्यकता होती है। मन की दृढ़ता के बिना साहस नहीं आता।
पेट भर लेना ही मनुष्य का उद्देश्य नहीं है और न कुटुम्ब का भरण पोषण करना ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है। एक कुत्ता भी तो अपना जीवन निर्वाह कर लेता है। -लोकमान्य तिलक
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भक्ति तीन प्रकार ही होती है- (1) पत्थर जैसी- जो डूब तो जाती है और बाहर से गीली भी हो जाती है परन्तु भीतर से सुखी ही रहती है। (2) कपड़े जैसी- जो सब तरफ से गीली हो जाती है और डूब भी जाती है। परन्तु फिर भी पानी से अलग ही रहती है। (3) शक्कर जैसी- जो पानी के साथ घुल−मिल कर एक हो जाती है। यही भक्ति सर्वश्रेष्ठ है।
-स्वामी रामतीर्थ
(श्रीमती रत्नेशकुमारी जी नीराँजना, मैनपुरी)
शारीरिक स्वास्थ्य के विषय में प्रायः सभी शुभचिंतक जिज्ञासा करते हैं, परन्तु मानसिक स्वास्थ्य के विषय में पूछना तो दूर अनेक व्यक्ति तो मानसिक अस्वस्थता की पहचान भी नहीं कर पाते, पर इसके लिए कोई निराली कसौटी नहीं है, जिन लक्षणों से शारीरिक स्वस्थता की पहचान होती है, उन्हीं से इसकी भी हो सकती है।
शारीरिक स्वस्थता के चिह्न ये होते हैं- शरीर में स्फूर्ति रहे, थोड़े ही श्रम से थकान न आ जाये, जाड़ा, गर्मी, बरसात इत्यादि को शरीर सहन कर सके शरीर की सन्तुलित अवस्था (वात, पित्त, कफ आदि का अपनी मर्यादा के अन्दर रहना) न नष्ट हो जाये। मानसिक-स्वास्थ की पहचान भी इससे बहुत कुछ मिलती-जुलती है। मन उत्साहपूर्ण रहे, साधारण मानसिक परिश्रम से ही मन और मस्तिष्क क्लाँत न हो जाये, कष्ट, मर्माघातों, कठिनाइयों और विपदाओं में हृदय अधीर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अथवा अशाँति और निराशा का क्रीड़ा-स्थल बन कर अपनी सन्तुलित-अवस्था (क्रोध, भय, निराशा, शोक आदि मन पर अधिकार न जमा बैठें। मन शाँत, विकार रहित और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का पक्षपात रहित निर्णय कर सकने की योग्यता) को न खो बैठे।
शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु जिस-जिस प्रकाश पथ्य और परहेज अत्यावश्यक हैं उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य के हेतु सद्विचार और आत्म-संयम है। मानसिक-स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु ये दोनों अनिवार्य हैं मानसिक-स्वस्थता का आनन्द, कह कर नहीं बताया जा सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, शोक, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा आदि मनोविकारों से रहित जब आपका मन अकारण ही स्वाभाविक रूप से प्रसन्न तथा शाँत रहता है तो बस वही मन की स्वस्थता की अवस्था है। क्या ऐसी सहज प्रसन्नता सदैव के लिए पा लेना प्रलोभनीय नहीं है?
अहर्निश मनोविकारों से क्षुब्ध होते रहना ही क्या जीवन का लक्ष है? दया, संवेदना, प्रेम की भी गणना मनोविकारों में ही की जा सकती है पर वे त्याज्य नहीं है क्योंकि वे हमको आत्म-विकार की ओर, मनुष्य मात्र के सत्य जीवन लक्ष्य विश्व प्रेम की ओर अग्रसर करते हैं। भाव तो जो भी हृदय के अन्तरतम से निकलेंगे दर्शकों और श्रोताओं पर अवश्यमेव थोड़ा बहुत प्रभाव डालेंगे ही, पर जैसे वे सुविचार या कुविचार होंगे प्रभाव भी उसी के अनुसार पुण्यमय अथवा गर्हित होगा। दुर्भावनाओं तथा सद्भावनाओं से उत्पन्न क्षोभों में एक और भी भिन्नता है, कुभावनाओं से उत्पन्न क्षोभ के मिट जाने पर भी मन में ग्लानि पश्चाताप असंतोष अथवा सूनापन सा छा जाता है। जिस प्रकार तीव्र ज्वर उतर जाने पर भी शरीर पर अपना प्रभाव शिथिलता और निर्बलता के रूप में छोड़ जाता है।
प्रश्न यह उठ सकता है कि क्या ये क्रोध आदि कुभाव सम्पूर्ण रूप से त्याज्य ही हैं? इसके बिना भी क्या गृहस्थ धर्म निभ सकता है? मैं कहती हूँ कि इनकी उलझन में पड़ने की आवश्यकता नहीं, जैसे वात, पित्त, कफ शरीर में मर्यादित रहे तभी कुशल है इसी प्रकार काम क्रोध आदि को भी हम संतुलित मात्रा में रखें तभी भला है। उनका अमर्यादित हो जाना ही त्याज्य है और उसी के अति मर्यादा के नियंत्रण को मनोविकारों का दमन कहते हैं।
(श्री जे. सी. कुमारप्पा)
ऐशोआराम की प्रवृत्ति राष्ट्र के सड़ने की निशानी है। उत्पादन का प्रमाण और उसका दर्जा बढ़ने के साथ ही यदि राष्ट्र के जीवन का पैमाना ऊँचा नहीं उठता है, तो वह रोग की निशानी है। यदि केवल ऐशोआराम की चीजों की खपत बढ़ती जाती है और उत्पाद एवं उत्पादन का गला घोटा जाता है, तो वह हालत खतरनाक हैं। हमारे देश में यह आखिरी हालत बड़े जोरों से अपना सिर ऊपर उठा रही है। उसके असर हमारी राजधानी नई दिल्ली में नजर आने लगे हैं। पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में कई लोगों के चले आने से यह हालत बदतर हो गई है, क्योंकि इस प्रकार आये हुए लोग उत्पादन तो कुछ नहीं करते, पर ऊँचे दर्जे के उपभोक्ता जरूर हैं।
फिलहाल दिल्ली शहर खुद गरीबों के बूते किये जाने वाले तड़क-भड़क के प्रदर्शन का एक खासा उदाहरण है। वहाँ की वाइसराय की कोठी पुराने जमाने के मुगलों के ऐश्वर्य को भी मात देने वाली है। उसमें कुल 86 रहने के आलीशान कमरे और 56 गुसलखाने हैं। ये कमरे इक्के-दुक्के नहीं, परन्तु बम्बई के फ्लैट जैसे हैं और उनमें हर एक मध्यवर्गीय कुटुम्ब बड़ी आसानी से रह सकता है। पुराने जमाने में जब दिल्ली में राजसी ठाठ वाले होटल नहीं थे, तब इंग्लैण्ड के अमीर-उमराव आदि मेहमानों के ठहराने के लिए वाइसराय की कोठी एक होटल का काम भी देती थी, पर आज वही रफ्तार गरीबों से वसूल किये टैक्सों के बूते पर चालू रखने की हमें कोई जरूरत नहीं दीखती।
इस कोठी में कुल 312 नौकर हैं और 90 फर्राश है, जिनका मासिक वेतन रु. 25,000 यानी सालाना तीन लाख रुपया होता है। उनके ‘अदना’ मालिक वाइसराय का वेतन भी इन्कमटैक्स और सुपरटैक्स (यदि लगता हो तो) मिलाकर मासिक रु. 25,000 के करीब होगा। नौकरों की भड़कीली पोशाकों के लिए सालाना रु. 40,000 खर्च होता है।
इस कोठी के बगीचे का क्षेत्रफल 290 एकड़ है और वह “तमाम दुनिया में अपनी सानी नहीं रखता” ऐसी कोठी के अधिकारी डींग मारते हैं पर यह सब सम्भव होने के लिए उस बगीचे के लिए 363 वनस्पति विशेषज्ञ और माली रखने पड़ते हैं। इनका सालाना खर्च रु. 3,00,000 से अधिक होता है। कोठी का तमाम घर खर्च रु. 450,000 से ऊपर जाता है। कोठी की मरम्मत के लिए हर साल करीब रु 12,00,000 और फर्नीचर दुरुस्ती या टूट-फूट के लिए हर साल रु. 1,00,000 खर्च होते हैं। पूरे सामान और फिटिंग की लागत रु. 50,00,000 है।
यह सब खर्च परम्परागत चले आये हों सो बात नहीं है। अंग्रेज वाइसरायों के जमाने में भी ये खर्च इतने अधिक नहीं बढ़े थे। सन् 1948 में बगीचे का खर्च रु. 77,000 से कुछ अधिक था, पर आज का खर्च तो इससे पाँच गुना है। उसी प्रकार 1938-309 में घर खर्च रु. 1,80,000 था और आज वह इससे 2॥ गुने से भी अधिक है। केवल मुद्रास्फीति की बदौलत इतना फर्क नहीं पड़ सकता।
यह तो एक नंगे और भूखे भिखारी के ऊँची कीमत की टोपी पहनने-जैसा नादानपने का ही काम हुआ। जो लोग ऐसी बेतुकी बातें करते हैं, उन्हें कभी अपना बेतुकापन महसूस होता है या नहीं, ईश्वर ही जाने। उनकी दृष्टि से शायद यह सब जीवन का पैमाना ऊँचा उठाने जैसा ही हो! हमारे प्रधान मन्त्री हमेशा जीवन का स्तर ऊँचा उठाने की बातें करते रहते हैं, इसलिए शायद उन्हें पार्क रोड़ पर की अपनी कोठी ठीक नहीं मालूम हुई। और वे कमाण्डर इन चीफ के आलीशान महल में रहने चले गये। तमाम मंत्री एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर पार्टियाँ देने में मशगूल हैं, पर आम जनता के लिए उन्होंने क्या किया इसका यदि लेखा-जोखा तैयार किया जाय तो ‘कुछ नहीं’ यही बड़े दुःख के साथ में कहना पड़ता है।
इधर ऊँचे ओहदे वाले लोग इस प्रकार अच्छे-अच्छे महलों का उपभोग करते हैं तो उधर मामूली क्लर्क आदि लोगों को रात को सिर रखने के लिए भी जगह नहीं मिलती। इससे शायद यह भी सिद्ध हो सकता है कि महकमों के क्लर्कों की संख्या बेहिसाब बढ़ा दी गई है, जिससे महकमों की कार्यक्षमता भी घट गई है। असिस्टेंट ऑफिसर की रिर्पोट से पता चलता है कि सन् 1939 में कुछ 6472 रहने के क्वाटर्स थे और पिछले साल उनकी संख्या 15404 हो गई थी। 1939 में रहने के मकानों के लिए कुल अर्जियाँ 10,000 थीं जो बढ़कर पिछले साल 70,000 हो गई। दफ्तरों के लिए सन् 1939 में 7,57,000 वर्ग फीट जगह काफी थी पर पिछले साल वह 56,34,00 वर्ग फुट लग गई। इससे क्या यह अनुमान लगायें कि सरकारी महकमों की कार्यक्षमता बढ़ गई है? या इन्हें कोई रोग हो गया है? हमें यह याद रखना चाहिए कि 1939 के बाद हिन्दुस्तान का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान में चला गया है। उसके बावजूद सरकारी नौकरों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि और उसी अनुपात में कार्य-क्षमता के बारे में शिकायतों की वृद्धि में बातें किसी खराबी की निश्चित द्योतक है।
हमें तो ऐसा डर लगता है कि ये सब हालतें अखिरी जार के जमाने के रूस की हालातों जैसी हो रही हैं। हम चाहते हैं और प्रार्थना करते हैं कि सब बातें रशियन क्रान्ति जैसी क्रान्ति के पूर्व चिह्न साबित न हों। एक तरफ साम्राज्यशाही ठाट-बाट और दूसरी तरफ भयंकर गरीबी और सारी चीजों का अभाव ऐसी हालत जब पैदा हो जाती है तभी क्रान्ति की सम्भावना रहती है, और आज अपने देश में ये हालतें अधिकाधिक दृष्टिगोचर हो रही हैं। समाजवादी और कम्युनिस्ट लोगों की धर-पकड़ यानी इस मर्ज के ऊपर से मरहम-पट्टी-जैसी है। पर, इससे मर्ज ठीक न होगा। हमारी व्यवस्था में अमूमन बदलाहट हो यही इस मर्ज की दवा है। क्या हमारे नेता लोग समय रहते चेत जायेंगे? या हमें रशियन-क्रान्ति के अग्नि दिव्य में से गुजरना पड़ेगा।
(श्री सोमाहुति भार्गव, पावटी)
‘संकल्पमयो ह्यय’ पुरुषः यो यन्संकल्पः स पव सः।’ उपनिषद् के इस वचन से प्रमाणित होता है कि मनुष्य की आत्मा संकल्प से बनती बिगड़ती है। ‘इंसान खयालात का पुतला है’ से भी यही जाहिर है।
अन्यत्र भी यही कहा गया है, ‘यन्यनसा मनुते तद् वाचादति, यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति, यत्कर्मणा करोति तत्फलमभिसंपद्यते’।
लोक में भी देखा जाता है, अपना जीवन भी साक्षी है कि बचपन में वह या उसके अभिभावक जो उसके लिए सोचते हैं, वह ही बन जाता है। सी. बाई. चिंतामणि कहते हैं लड़कपन में शिक्षा सचिव के स्वप्न लिया करते थे। सिन्हा अपने नाम के साथ बार-बार गवर्नर (लार्ड) लिखकर अपनी मनोवृत्ति दर्शाते रहते थे। हम देखते हैं कि वे तथा अन्य महापुरुष वैसे बन कर रहे जैसे कि वे बचपन में सोचा करते थे।
संकल्प को ‘व्रत’ भी कहते हैं। व्रत से ही कोई दीक्षित अर्थात् कर्म करने का अधिकारी बनता है। संक्षेप से वर्णित संकल्प की महिमा को पाठक हृदयंगम कर अभ्यास में लाकर लाभ उठावें। व्रत की बार-बार रटन द्वारा या पूर्व अभ्यास के बल पर एक बार ही तीव्र इच्छा करना अभीप्सा कहलाती है। आधुनिक योगियों में प्रथम कोटि के श्री. अरविन्द ईश प्राप्ति में इसी अभीप्सा के गुण को अनिवार्य बताते हैं। उनका कहना है, अभीप्सा जितनी बलवती होगी, उतनी ही फल प्राप्ति शीघ्रता एवं निश्चय से होगी। हमें चाहिए कि ऐसी बात न करें, जिसकी हमें वास्तविक आवश्यकता न हो। हृदय से चाहना या बार-बार चाहते रहने से ही इच्छा में शक्ति भर जाती है। ऐसे अभ्यासी आगे जाकर ऐसी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं कि जो सोचा शीघ्र पूरा हुआ। ऐसे सिद्ध को साँकल्पिक पुरुष-उपनिषदों में लिखा मिलता है। श्री अरविन्द के भक्त उन्हें उसी प्रकार में परिकलन करते हैं। अभीप्सा सत्य पर आश्रित होकर, परोपकार की भावना से परिपूर्ण हो, पुरुषार्थ का सहयोग पाये एवं आगे वर्णन किये जाने वाली विधि से संयुक्त हो तो सिद्धि सुनिश्चित तथा तीव्रता से होती देखी जा सकती है।
विधि की महिमा सर्वोपरि है। भक्तजनों के विश्वासनुसार गोविन्द से गुरु की गरिमा अधिक इसी से गिनी गई है कि यह भगवान की प्राप्ति की तरकीब जतलाता-बताता है। ध्येय की पवित्रता के साथ साधन की शुद्धि पर महात्मा गाँधी बहुत बल देते थे। इसमें उनका निहित प्रयोजन यही था कि लोग विधिज्ञ बनें। उत्साह, सम्पन्नता, अदीर्घ सूत्रता (अभीप्सा) के साथ क्रिया विधिज्ञता से ही किसी भी क्षेत्र में मनुष्य सफलता लाभ कर सकता है। अभ्युदय व निःश्रेयस्सिद्धि जिस धर्म नाम से कथन की गई है वह विधि के कथनोपकथन से परिपूर्ण है।
आप ध्येय या लक्ष्य में मतभेद संसार में बहुत कम पायेंगे किन्तु अभीष्ट फल न पाकर विधि विभिन्नता को ही इसमें कारण समझ सकेंगे। कहा जाता है संस्कारों से जड़ ही नहीं चेतन भी संस्कृत व उन्नत किये जाते हैं, परन्तु संस्कारों की सफलता उस जीवन विधि पर निर्भर करती है जो दो संस्कारों के बीच बितानी अति आवश्यक है।
विधिज्ञ को ही आधुनिक भाषा में वैज्ञानिक कह सकते हैं। प्राचीनतम काल में भी अथर्ववेद की महिमा इसी से अत्याधिक मानी गई थी कि वह ऋग्, यजु तथा साम में वर्णित ज्ञान, कर्म, उपासना के क्षेत्र में आई कठिनाइयों को सुलझाने में समर्थ है। हम विधिज्ञ भी उसे ही मानेंगे जो पग-पग पर आई कठिनाई को हटाने में सुलझा हो तथा सिद्धि की अंतिम सीढ़ी तक पहुँचा दे, क्योंकि चढ़ना गिरना, संभलना साधारण रूप के साधना क्षेत्र में नित्य ही देखने में आते हैं।
विधिज्ञ को ही आधुनिक भाषा में वैज्ञानिक कह सकते हैं। प्राचीनतम काल में भी अथर्ववेद की महिमा इसी से अत्याधिक मानी गई थी कि वह ऋग्, यजु तथा साम में वर्णित ज्ञान, कर्म, उपासना के क्षेत्र में आई कठिनाइयों को सुलझाने में समर्थ है। हम विधिज्ञ भी उसे ही मानेंगे जो पग-पग पर आई कठिनाई को हटाने में सुलझा हो तथा सिद्धि की अंतिम सीढ़ी तक पहुँचा दे, क्योंकि चढ़ना गिरना, संभलना साधारण रूप के साधना क्षेत्र में नित्य ही देखने में आते हैं।
आगामी विशेषाँक की सूचना
पाठकों को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि “अखण्ड-ज्योति” का जनवरी सन् 50 का अंक “आर्थिक सफलता अंक” होगा। इसमें आर्थिक कठिनाइयों से पार करने, समृद्ध जीवन बिताने के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव दिये जायेंगे। इस अंक का सम्पादक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. करेंगे।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि वर्तमान महंगाई के कारण जनसाधारण की आर्थिक दशा बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो रही है। लोगों के सामने आज प्रधान समस्या वह है कि आर्थिक चिंताओं को पूरा कैसे किया जाय? इस समस्या को हल करने के लिए वर्तमान अर्थ चक्र को ध्यान में रखते हुए प्रोफेसर साहब ऐसी पाठ्य सामग्री प्रस्तुत करेंगे, जो प्रत्येक पाठक के लिए अत्यंत ही उपयोगी सिद्ध होगी। प्रतीक्षा कीजिए।
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(डा. गोपालप्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)
सन्त श्री रामानुजाचार्य ने ‘भक्ति’ की प्राप्ति के लिए 7 साधनाएं बतलायी हैं-
1- विवेक (आहार मीमाँसा या खाद्यास्वाद्य विचार)
आहार के तीन दोष-
क- जाति विचार।
आहार के स्वाभाविक गुण या किस्म की ओर ध्यान देना चाहिए। सभी उत्तेजक वस्तुओं का परित्याग करना चाहिए।
ख- आश्रम विचार।
भोजन किस व्यक्ति के पास से मिला, इसका विचार। दुष्टता का प्रभाव भोजन द्वारा मिलता है।
ग- निमित्त विचार।
मैल और धूल इत्यादि चारों भोजन में न हों। किसी वस्तु का एक अंश किसी दूसरे ने खाकर छोड़ दिया हो तो उसे भी नहीं खाना चाहिए।
आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः
सत्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
-छान्दोग्योपनिषद् 7-36
आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि और मन की शुद्धि से परमात्मा का सतत और निरंतर स्मरण होता है।
जब इन्द्रियाँ बिना अत्यन्त आसक्ति के, ईर्ष्या द्वेष रहित और भय रहित होकर इस संसार में कार्य करती है, उसी कार्य का नाम है- ‘शुद्ध आहार’।
-शंकराचार्य
जब आहार शुद्ध है तभी मन पदार्थों को ग्रहण करने और उनके विषय में अनासक्त और द्वेष और भय से रहित होकर विचार करने में समर्थ हो सकता है, तब मन शुद्ध होता है और मन के शुद्ध होने पर ही इस मन में ईश्वर की सतत स्मृति-अव्याहत स्मृति निरन्तर जागृत रहती है।
2- विमोक्ष या स्वतंत्रता।
जो ईश्वर के प्रति प्रेम करना चाहता है उसे अपनी भौतिक उत्कृष्ट अभिलाषाओं का त्याग करना चाहिए। ईश्वर को छोड़ अन्य किसी बात की कामना नहीं करनी चाहिए।
3- अभ्यास।
मन सदा सत् तत्व की ही ओर जावे, कुविचारों और नीच वासनाओं का मनः क्षेत्र में स्थान न मिले। मन निरन्तर दिव्य विचारों में ही स्मरण करे। यह यद्यपि कठिन है, पर सतत अभ्यास से ऐसा हो सकता है।
4- क्रिया (कर्म)।
अपनी और दूसरों की भलाई करना। जितना ही हम अपना तथा दूसरों का उपकार करेंगे, उतना ही हमारे हृदय की शुद्धि होगी और उसमें परमात्मा का निवास होगा।
पाँच नित्यकर्म-
क- स्वाध्याय।
मनुष्य को प्रतिदिन कुछ पवित्र और सात्विक और प्रोत्साहन देने वाला अध्ययन करना चाहिए।
ख- देवयज्ञ।
ईश्वर देवता एवं सत्पुरुषों की उपासना।
ग- पितृयज्ञ।
अपने पितरों के प्रति कर्त्तव्य का पालन।
घ- मनुष्य यज्ञ।
मानव जाति के प्रति अपने कर्त्तव्य का ध्यान।
ड़- भूतयज्ञ।
मनुष्य की अपेक्षा नीची योनि वाले प्राणियों के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन।
5- कल्याण या पवित्रता।
इसके अंतर्गत पाँच बाते हैं-
क- सात्विकता या सत्यता।
विचार, प्राण और कार्य सभी पूर्णतया सात्विक एवं सत्य हों।
ख- आर्जव- निष्कपट भाव या सरलता। हृदय में कुटिलता या टेढ़ापन न होना।
ग- दया।
करुणा या सहानुभूति या सेवा भावना।
घ- अहिंसा।
मनसा, वाचा, कर्मणा किसी के साथ अन्याय न करना।
ड़- दान।
पीड़ितों, आपत्ति ग्रस्तों, असहायों को सामयिक सहायता देना तथा जनसमाज के आत्मिक विकास के लिए अपना समस्त, श्रम, धन और हृदय देते रहना।
6- अनवसाद।
हताश न होना- धैर्य और विवेक खोकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ न होना। संपदा लाभ के समय अति दूषित या मदोन्मत्त न बनना। प्रत्येक भली-बुरी स्थिति में मन को शान्त एवं संतुलित रखना।
7- अनभिष्या।
दूसरों की वस्तु पर अनीति पूर्ण लोभ नहीं करना, व्यर्थ या अभिमान पूर्ण विचार न करना और दूसरों द्वारा अपनी जो हानि हुई हो, उसको सोचते न रहना। अपनी न्यायोपार्जित वस्तुओं से सन्तुष्ट रहना।
परम भागवत वैष्णव रत्न श्री रामानुजाचार्य जी महाराज ने भक्ति की साधना करने वाले भक्तों के लिए उपरोक्त सात साधनाएं बनाई हैं। जो इन साधनाओं को करता हुआ भगवद्भक्ति का उपासक है वही सच्चे रास्ते पर चलने वाला भक्त है। जो केवल नाम जप, कीर्तन, आदि कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं और भक्ति प्राप्ति की उपरोक्त सात साधनाओं पर ध्यान नहीं देते वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे इसमें भारी संदेह है।
(श्री लक्ष्मीनारायण जी टंडन, संपादक “खत्री हितैषी”)
यो तो संसार में प्रायः कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ इस भयंकर रोग का कम-ज्यादा प्रकोप न हो, किंतु भारतवर्ष में इसका प्रधान अड्डा है। अनेक देशों में इस रोग से मृत्यु-संख्या घट रही है किंतु इस अभागे देश में उस में वृद्धि हो रही है। कहा जाता है कि युक्त प्रान्त के कानपुर नगर में संसार भर में सब से अधिक क्षय का प्रकोप है।
कमजोरों को सभी सताते हैं और भारतीयों का स्वास्थ्य बहुत गिरा हुआ है और गिर रहा है। अतः क्षय के क्या, प्रत्येक रोग के कीटाणु उसके शरीर पर सफलता पूर्वक आक्रमण करते हैं। बहुधा निमोनिया, डायबिटीज, प्लूरेसी, इनफ्लुऐजा, ब्रोनकाइरिस के बाद क्षय होने का बड़ा खतरा रहता है। प्राण-शक्ति या जीवनी-शक्ति की कमी वीर्य नाश, मानसिक क्षोभ बहुत गंभीर, चिंतायुक्त, दुखी रहना, हरदम सोच-विचार में पड़े रहना, बलवर्द्धक भोजनों के अभाव या आकस्मिक दुखद घटनाओं के धक्कों से भी क्षय हो जाता है। शक्ति से अधिक परिश्रम करना, धूल, सीलन, दूषित वायु, अस्वास्थ्य कर आदतें, हार्दिक क्लेश, सूर्य के प्रकाश की कमी, अनुपयुक्त भोजन, क्षय पीड़ित पशुओं के दूध का सेवन आदि भी इस रोग के कारण होते हैं तथा सहन शक्ति की कमी खसरा, कुकुर खाँसी आदि भी।
मानव-मात्र के लिए अज्ञानता से बढ़ कर कोई अभिशाप नहीं है। इस रोग के विषय में अज्ञान होना ही इस रोग ही उत्पत्ति, बुद्धि तथा भयंकर दुष्परिणामों का कारण है। अज्ञानता द्वारा ही इसका समाज में फैलाव होता है। अतः रोग अच्छा करने से कहीं ज्यादा उत्तम है, हम रोग को होने ही न दें और यह तभी संभव है जब हम अपने शत्रु के विषय में पूर्णरूप से जान लें कि यह क्या है, कैसे आता है, क्या करने से नहीं आता, आ जाने पर इससे कैसे युद्ध करना चाहिए और भगा देने पर क्या और कैसे सतर्क रहना चाहिए।
बाजी दफे तो जानते-बूझते हुए भी आदमी इस रोग के चंगुल में फंस जाते हैं। गरीबी, अशिक्षित तथा स्वास्थ्य के नियमों से अनभिज्ञ सम्बन्धी तथा न दूर की जाने वाली कुपरिस्थितियाँ भी इस रोग का अनिवार्य कारण बनती हैं। यदि घर में एक अशिक्षित तथा उत्तरदायित्व शून्य स्त्री या पुरुष क्षय से पीड़ित है और वह मना करने पर भी इधर-उधर थूकता है या सब एकमएक करता है, या एक जिम्मेदार-समझदार क्षयी इच्छा होते हुए भी गरीबी के कारण दूसरे स्थान पर नहीं जा सकता, बाल बच्चों के साथ रहता है तो फिर घर के अन्य पुरुषों का ईश्वर ही रक्षक है।
इसके कीटाणु खाँसने पर मुँह से निकलते हैं और उस समय बहुत शक्तिशाली होते हैं। बलगम के साथ भी यह निकलते हैं और बलगम के सूख जाने पर यह हवा में उड़कर लोगों तक पहुँचते हैं। धूप, खुली हवा में यह नष्ट या निर्बल हो जाते हैं। पर सीलन और अँधेरे में यह बरसों जीते हैं और कड़ी धूप में तो पाँच-मिनट में मर जाते हैं।
अतः क्षयी के बलगम को फिनाइल डालकर अलग बर्तन में रखें। उसका पैखाना, पेशाब दूर फेंका जाय, उसका बलगम जला दिया जाय, उसके खाने के बर्तन, पहनने और ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र, सोने-बैठने का स्थान अलग रखा जाए, बिना आवश्यकता उससे अधिक संपर्क न रखा जाय, यह चीजें तो स्वयं सिद्ध हैं। जिन रोगियों के बलगम में क्षय के कीड़े न मिलें, वह रोगी छूत नहीं दे सकते, लेकिन एहतियात रखना तो अच्छी ही बात है।
वह रोगी जिनका रोग तीव्र होता है उसमें रोग जल्दी बढ़ता है और खतरा भी अधिक होता है, किन्तु यदि रोग मंद हो जाता है तो पूरा फेफड़ा खराब होने में 10 से 30 वर्ष लग जाते हैं- कभी-कभी इससे भी अधिक।
प्रकृति से क्षय के कीड़े बहुत शान्ति- प्रिय होते हैं। यह शरीर में पहुँच कर भी विशेष नुकसान न पहुँचायें किन्तु शरीर के अन्दर रुधिर के श्वेत कीड़े इनसे लड़ने लगते हैं क्योंकि बाहरी कीड़ों को नाश कर देना ही उन की प्रकृति है, तब यह क्षय के कीड़े भी अपनी सुरक्षा के जहर छोड़ते है। इसी से टी.बी. होती और बढ़ती है। कहते हैं कि दस हजार कीड़े एक पंक्ति में सुई के छेद में सरलता से कबड्डी खेल सकते हैं। तात्पर्य यह है कि यह इतने छोटे होते हैं कि तेज खुर्दबीन के इनका दिखाई देना संभव नहीं और आश्चर्य की बात यह है कि इनके हड्डी, बाल गोश्त आदि सब होते हैं। प्रकृति भी शक्ति की बलिहारी है। यह कीटाणु एक इंच का हजारवाँ भाग लंबे और लम्बाई के चौथाई चौड़े होते हैं। मनुष्यों या जानवरों के बाहर यह नहीं रह सकते। इनकी भीतर तेजी से वृद्धि होती है और इनका विष अपने चारों ओर के पास कणों या को कोषाणुओं का नाश करता है। यह जान कर आश्चर्य होता कि मनुष्य के फेफड़े का क्षेत्र काफी होता है और 5-6 फेफड़े के कोषाणुओं के नाश होने पर भी मनुष्य जीवित रह सकता है। पहले प्रायः फेफड़े के निचले भाग से ही रोग का आरम्भ होता है।
इस रोग में मृत्यु संख्या 1 से 2 वर्ष आयु तक बहुत अधिक रहती है। बच्चों को सूखा रोग भी प्रायः क्षय ही होता है। इसे 15 वर्ष की आयु तक मृत्यु संख्या गिर जाती है। फिर 16 से 20 आयु तक मृत्यु-संख्या में वृद्धि रहती है। 45 आयु बाद इस रोग का खतरा कम हो जाता है। 18 से 30 वर्ष की आयु में यह रोग अत्यधिक होता है क्योंकि इसी आयु में अनेक प्रकार के अत्यधिक परिश्रम मनुष्यों को करने पड़ते हैं। यही जवानी का समय उसके जीवन-संग्राम में कूदने, भविष्य के बनाने की चिन्ता का है- इसी में अनेक बुराइयों और बुरी आदतों का भी वह शिकार हो जाता है।
याद रखिये जब मनुष्य निस्तेज, उत्साह-रहित, पीला पड़ने लगे, उसे खाँसी, सीने में दर्द, जल्द थकावट, खाँसी, कभी-कभी बुखार या सर्दी हल्की हरारत रहने लगे, उसका वजन कम होने लगे, उसकी भूख मारी जाय आदि तो यह चिह्न प्रकृति की ओर से मनुष्य के सतर्क हो जाने के हैं। क्षय के प्रारम्भ में यही चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं।
याद रखिये (क्षयी के) रोगियों के छींकने या सूखे कफ से 92 प्रतिशत, गाय के दूध या भोजन पर मक्खी बैठने आदि से 8 प्रतिशत रोग होता है। पानी आदि के द्वारा भी रोग हो सकता है।
वैद्यक, हिकमत, होमियोपैथिक तथा एलोपैथिक कोई भी इलाज दावे के साथ रोगी को अच्छा नहीं कर सकता। पर अधिकतर लोग एलोपैथिक इलाज ही करते हैं। क्षय के कारण फेफड़े में घाव हो जाते हैं। और भीतर के घावों पर किसी प्रकार की दवा लगाना संभव नहीं। साथ ही हम जानते हैं कि फेफड़े निरंतर काम करते रहते हैं और घाव को यदि विश्राम नहीं दिया जाएगा तो उनका अच्छा होना दुःसाध्य है। यही कारण है कि क्षय रोग प्रायः असाध्य माना जाता है।
प्रत्येक इलाज का ध्येय, चाहे वह एलोपैथिक हो या होमियोपैथिक, यही होता है कि घावों पर माँस के रेशे, ताने-बाने की भाँति बने और धीरे-धीरे घाव भरे। गोल्ड इन्जेक्शन देने से कहते हैं कि Hibrsis बनना प्रारम्भ हो जाते हैं। (यद्यपि आजकल गोल्ड इन्जेक्शन व्यर्थ से माने जाने लगे हैं।) ए. पी. देने से भी घाव विश्राम पाकर भरने लगता है। अतः हमें दो बातें ज्ञात हुई कि क्षय का सच्चा इलाज अधिक से अधिक विश्राम है। साथ ही अच्छा भोजन, कुछ ठंडी जलवायु, स्वच्छ वायु, सूर्य प्रकाश तथा नियमित जीवन है। दवाएं तो बरायनाम होती हैं।
बीमारी का पहला झोंका बड़ा घातक होता है। वर्षा ऋतु भी इस रोग के लिए बहुत बुरी होती है। यदि रोग की तेजी के पहले झोंके में आदमी बच जाय तो ठीक भोजन, विश्राम और गर्मी में पहाड़ों आदि पर जाने से आदमी काफी दिन चल सकता है। परन्तु पहाड़ों पर जाना भी परमावश्यक नहीं है। उचित रीति से प्रबंध होने पर मैदानों में भी गर्मी में बिना किसी हानि के रहा जा सकता है। और प्रत्येक रोगी को प्रत्येक दशा में पहाड़ों पर जाना लाभप्रद नहीं होता- कभी-कभी न जाना ही उचित है। 9-10 महीने बाद अगर हालत रुक जाय और धीरे-धीरे लाभ होने लगे तो रोग जीर्ण एवं मंद हो जाता है। इस रोग में जलवायु परिवर्तन से बहुत लाभ होता है।
रोगी में जीवनी शक्ति प्रायः बहुत कम हो जाने से क्षय अच्छा नहीं हो पाता। जीवनी शक्ति वह शक्ति है जो क्षय से लड़ सके। यह शक्ति जिसमें जितनी अधिक होगी यह उतनी ही शीघ्र अच्छा होगा।
अकसर रोगी जानना चाहते हैं किस करवट सोवें। अच्छा तो यही है कि जिस फेफड़े में रोग हो उस करवट सोने से घाव को विश्राम मिलता है। रात को बाँयी करवट सोना प्राकृतिक-चिकित्सा के अनुसार अच्छा है। पर साधारण तथा जिस करवट रोगी को अच्छा लगे सोये। किसी करवट सोना नुकसान दायक नहीं। हाँ, जिस तरफ बीमारी है उस तरफ करवट न सोने से एक डर हो सकता है कि छूत दूसरी तरफ न पहुँच जाए क्योंकि थूक की नली तो एक ही होती है पर यदि थूक में कीड़े नहीं मिलते तब तो हानि का प्रश्न ही नहीं उठता।
क्षय में यदि मनुष्य का पेट ठीक रहे तो वह क्षय से लड़ कर चंगा हो सकता है और पेट को ठीक रखना प्राकृतिक-चिकित्सा द्वारा ही सरल और सुलभ है। क्षय किसी दवा खाने से नहीं जाता। विश्राम आदि ही इसका इलाज है। चीड़ा-फाड़ी वाला इलाज- सर्जरी- ए. पी. फ्रैनिक और थरकोरलास्री ही एलोपैथी के श्रेष्ठ इलाज हैं।
क्षय होने से उस विष का दौरा सारे शरीर भर में रुधिर द्वारा थोड़ा बहुत होगा ही, इसी से मस्तिष्क, पेट, कलेजा, जिगर, गला आदि भी प्रभावित हो ही जाता है। जब तक रोग रहेगा, प्रत्येक स्थान पर थोड़ा बहुत क्षयजनित-विष का प्रभाव रहेगा। क्षय के दूर होते ही स्वतः धीरे-धीरे सब कष्ट दूर हो जायेंगे।
बुखार रहना क्षय में स्वाभाविक ही है। किंतु बाजी दफे रोग की तीव्रता के कारण बुखार न होकर वह प्राण शक्ति की कमी, कमजोरी, पेट की खराबी या अन्य बातों के कारण भी रह सकता है।
-शेष अगले अंक में
(श्री मोतीलाल जी राँका, व्यावर)
(1) अपना हेतु दूसरों को न मालूम होने देना पाप नहीं है, अपना अनुभव न कहने में अन्याय नहीं है, परन्तु न कहने के बहाने झूठ कहना पाप है।
(2) करार पालना चाहिए। पालना अशक्य हो तो पहले से सूचना देकर माफी माँगना चाहिए। अपने ही सुसूर से बाधायें न आई हों तो वे भी प्रकट करना चाहिए।
(3) लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ जाय ऐसा कोई काम न करना चाहिए। विश्वासघात करना महापाप है। अपनी ऐसी इच्छा न हो, वास्तविक भूल न हो और विश्वासघात का आरोप आवे तो सप्रमाण अपना निरपराधीपन साबित करना चाहिए।
(4) सरकार व कानून के पेच में न आकर चाहे जिस प्रकार पैसे कमाने का नाम व्यापार है, ऐसी समझ अनीतिपूर्ण है।
(5) लोगों की मूर्खता, भोलापन और विश्वास का बेतरह लाभ उठाना व्यापार-कला नहीं है, लुटेरापन है।
(6) व्यापारी का यह काम है कि वह अपने माल को इस तरह का मनोहर बतलावें कि ग्राहक ललचाया करें, परन्तु झूठ बोलकर ऐसा न करें।
(7) मीठी बोली, शान्त स्वभाव और सहनशील प्रकृति ये गुण व्यापारी के लिए आवश्यक हैं।
(8) व्यापारी को बकबक न करना चाहिए और बोलने की अपेक्षा सुनना ज्यादा चाहिए। सच्चे व्यापारी ज्यादा बोलने वाले नहीं होते।
(9) अपना मतलब किसी को जाहिर न होने देना व्यापार की चतुराई है।
(10) वाणी से मनुष्यों को वश किया जाय, बर्ताव से अपने आदर को बढ़ाया जाय और व्यवहार से अपना विश्वास जमा दिया जाय।
(11) जो व्यापारी क्रय-विक्रय नकद रुपये से नहीं करता या वैसा करने की पद्धति नहीं जारी करता अथवा जल्दी वसूली नहीं करता वह आगे पीछे नाश हुए बिना नहीं रहता।
(12) हिसाब न रखकर लेन-देन करना दूसरों को फायदा करने वाला है।
(13) ज्यादा नफा और कम व्यवहार की अपेक्षा कम नफा और ज्यादा व्यवहार अच्छा है। नुकसान होने का खास साधन बहुत बड़ी आशा है और भारी नफे की लालसा है।
(14) जिस व्यवसाय की लगन हमें न लगे उससे कुछ लाभ नहीं होगा।
(15) जो व्यापारी अपने ग्राहक को प्रसन्न नहीं रख सकता, उसके व्यापार में कभी बरकत नहीं होती।
(16) जिस व्यापार के साधन अपने हाथ में न हों, उसमें बरकत पाकर सुखी होने की आशा करना व्यर्थ है।
(17) निश्चय पूर्वक धैर्य से किये हुए व्यापार में सफलता होती है।
(18) अधूरी पूँजी, अविश्वासी नौकर और अनिश्चित व्यवसाय, ये अपयश के कारण हैं।
(19) अपनी हिम्मत न हो, धरु पूँजी न हो, निजी अनुभव न हो और स्वयं देख−रेख न रखी जा सकती हो तो ऐसे मनुष्य के लिए यही अच्छी सम्मति है कि वह स्वयं अपने जोखिम पर व्यापार न करें।
(20) दोषी कर्मचारी को दोष देना चाहिए परन्तु योग्य की प्रशंसा भी करना आवश्यक है। प्रशंसा, कृतज्ञता और शुभ भावना की उत्पादक है।
(21) अपने अधीनस्थ कर्मचारियों का अध्ययन करना चाहिए। उनके साथ उनके योग्य व्यवहार किया जाना आवश्यक है। नौकर को नौकर ही नहीं बल्कि सहयोगी समझना चाहिए।
(22) छोटी-छोटी बातों के लिए अधिक क्रोधित होकर किसी मनुष्य को डाट-डपट दिखाने के बजाय प्रेम से समझाना अधिक सफल होता है। अर्थात् किसी भी कर्मचारी को समझाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी आपके प्रति शुभ भावना व श्रद्धा कम तो नहीं हो रही है।
(23) तुमको जो कुछ करना है मन लगाकर करो। बेपरवाही से काम करने से अपने मन पर अनिष्ट परिणाम होता है। बेपरवाही की आदत एक बार पड़ी कि फिर मनुष्य का कभी उदय नहीं होता है।
(24) नकद दाम देकर जो चीज खरीदी जाती है, वह किफायती पड़ती है। क्योंकि नकद से खरीदने वाला दबैल नहीं रहता।
(25) माल थोड़े नफे से बेचने से बिक्री बढ़ जाती है और बिक्री के बढ़ने से थोड़ा नफा लेने पर भी ज्यादा लाभ हो जाता है।
(26) जो आदमी सब जगह माल तलाश करके जहाँ सस्ता मिलता है वहाँ जाकर स्वयं खरीदता है, उसे अधिक लाभ होता और होशियारी बढ़ती है। परन्तु बाहर इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ठगी के धोखे और कुसंगति में न फँस जाय।
(27) माल मँगाते समय पहले सब जगह से भाव मंगा लेना चाहिए। फिर जहाँ सस्ता पड़ता और चीज अच्छी हो, वहाँ से ही मंगानी चाहिये।
(28) तेज भाव का, कम बिकने वाला, और जल्दी खराब होने वाला माल ज्यादा नहीं खरीदना चाहिये।
(29) जिस व्यापार में ज्यादा और जल्दी घट बढ़ होती हो, उसमें सोच समझ कर हाथ डालना चाहिये और सट्टे-फाटके से दूर रहना चाहिए।
(30) ऋण (कर्जा-उधार) देते समय इतनी बातों का विचार जरूर करना चाहिए- हैसियत, सम्पत्ति, पूँजी, व्यापार, नफा, नुकसान, क्षेत्र, राज का कानून, चाल, चलन, संगति, साख, शोभा, मेल, परिवार, प्रकृति, काम करने वाली, नीयत इत्यादि इनकी देखभाल करके ही ऋण देना चाहिए।
-बाप की इज्जत पर लड़का जैसे बहुत समय तक नहीं जूझ सकता, उसी तरह प्रजा अकेले प्राचीन हिन्दुस्तान के गौरव पर हमेशा अपनी शान नहीं दिखा सकती।
-आत्मा अमर है, देह क्षण-भंगुर है। कोई प्रवृत्ति परिणाम प्राप्त किये बिना रहती नहीं, यह सब हम बचपन से सीखते हैं। फिर मौत से क्यों डरते हैं।
-आदर्श से हम जितने संलग्न रहेंगे उतना ही वह दूर होता दिखाई पड़ेगा। उतने ही अधिक वेग से उसका अनुसरण करना ही पुरुषार्थ है। जब हम गिर पड़ेंगे तभी हम खड़े भी होंगे, हमें सुस्ती करना या पीठ दिखानी नहीं चाहिए- इतना ही काफी है।
-जब तक मनुष्य में कोई भी भलाई रहे तब तक उसका सत्कार करना चाहिए, पर जब मनुष्य अपना मनुष्यत्व त्याग देने का हठ करे, तब उसका त्याग करना मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य हो जाता है।
-निश्चय समझ रखिये कि अगर हमारा जीवन संयममय हो जायगा तो हम जो चाहेंगे प्राप्त कर सकते हैं।
-प्राचीन काल में जीवन का आधार संयम था, पर आज-कल उसका आधार आनन्द-मंगल है। इसका फल यह हुआ है कि हम लोग बलहीन होकर कायर हो गये हैं।
-शिक्षा को जीविका का साधन बनाना मेरे विचार से तुच्छ वृत्ति है। जीविका उपार्जन का साधन शरीर है, फिर आत्मा पर यह बोझा क्यों लादा जाय।
-मस्तिष्क में भरे हुए ज्ञान का जितना अंश काम में लाया जाय उतने ही का कुछ मूल्य है, बाकी सब व्यर्थ बोझा है।
-भारतवर्ष के ऋषि-मुनियों का कथन है कि वेदादि सम्पूर्ण शास्त्रों का अध्ययन करके भी यदि मनुष्य ने आत्मा को न पहचाना, यदि समस्त बंधनों से मुक्त होने की पात्रता सम्पादित नहीं की तो उसका सारा ज्ञान व्यर्थ है। इससे तो श्रेष्ठ मत यह है कि जिसने आत्मा को जाना, उसने सब कुछ जान लिया। वर्णाज्ञान के बिना भी आत्म-ज्ञान होना सर्वथा संभव है।
-बालक के लिए लिखना-पढ़ना सीखने और साँसारिक ज्ञान प्राप्त करने के पहले इस बात का ज्ञात प्राप्त करना आवश्यक है कि आत्मा क्या है, सत्य क्या है, प्रेम क्या है और आत्मा के अन्दर कौन-कौन सी शक्तियाँ छिपी हुई हैं।
-वास्तविक शिक्षा का यह एक आवश्यक अंग होना चाहिए कि बालक इस बात का ज्ञान प्राप्त करे कि जीवन-संग्राम में वह प्रेम के द्वारा घृणा पर सत्य के द्वारा असत्य पर और कष्ट सहन के द्वारा बल प्रयोग पर बहुत सहज में विजय प्राप्त कर सकता है।
-यदि कोई मनुष्य तुम्हें जल पिलावे और उसके बदले में तुम भी उसे जल पिलाओ, तो तुम्हारा यह काम कुछ भी नहीं है। शोभा इसी में है कि अपकार करने वाले के साथ तुम उपकार करो।
-वास्तव में शोभा इसी में है कि अपकार के बदले में उपकार किया जाय।
-अहिंसा का, शान्ति का अर्थ नामर्दी नहीं है। उसका अर्थ शुद्ध मर्दानगी है। अहिंसा-अमन-का अर्थ पराधीनता-दुर्बलता नहीं। शौर्य हो वहीं क्षमा हो सकती है।
-मर कर जीने का मंत्र सीखना है। इस मंत्र का अनुसरण करके जगत जीता है। बीज मरता है तभी धान पकता है। माँ मरने के समान कष्ट भोगती है तभी बच्चा जीता है। यज्ञ बिना खाना, चोरी का धन है।
(श्री राजबहादुर ‘विकल’)
मत अंगार बिखेरो, वसुधा आज माँगती पानी।
अभी अभी पागलपन ने थी, गाई मृत्यु-प्रभाती
जलती हुई दिशाओं की, शीतल न हो सकी छाती
मानवता को अब न अधिक तुम, शोणित से नहलाओ
पशुता के मरघट में अपने गौरव को न जलाओ
क्रौंच-रुदन को सुनकर सहसा कवि बल जाने वालो-
सुन न रहे क्यों ‘तपसा-तट’ से दलित विश्व की वाणी
भौतिकता के मद में मत दो निज संस्कृति को पीड़ा,
मनु की संतानों के शोणित से न करो अब क्रीड़ा
रक्तपान से भला समझ लो अपने आँसू पीना
पावन बन कर सफल विश्व में दो दिन का भी जीना
बीज-रूप में सृष्टि बचा कर, प्रलय काल से खेले
आज उसी के ध्वंस हेतु क्यों, तुमने भृकुटी तानी
‘गौतम’ जागो अखिल विश्व में छाया घोर अँधेरा
‘महावी’ चल पड़ो तपस्या को हिंसा ने घेरा
थकी समर से वसुधा रोती इसका भार सम्हालो
कालकूट लख काँप उठेगी, मुख में अमृत डालो
भौतिकता के आवेशों में बापू को ही खोया-
दिल्ली के आँगन में बिखरी, शोणित बन नादानी
तुम उनकी संतान, अनल में हंस कर जलने वाले
रक्तपात से ऊब हिमालय पर चढ़, गलने वाले
उस मिट्टी की सुत हो, जिसका रहा अमृत से नाता
जिनका अस्थि जाल ही, नभ के लिए वज्र बन जाता
राज पाट को त्याग घूमते भगवा चीवर डाले-
तप की ज्वाला में ही निखरा करती उठी जवानी
घृणा द्वेष के बीज न बोओ, वेदों के अनुगामी
पशुता से क्यों प्यार कर रहे, उपनिषदों के स्वामी
नवल उषा की लाली लख कर, सामगान फिर गूँजे
हो न कहीं वैषम्य आज मानव मानव को पूजे
काल-सर्प के फन पर बैठी संस्कृति अमृत बाँटे-
अखिल-विश्व चरणों पर झुक कर ही बन जाये ज्ञानी
-दीपक
*समाप्त*