अब जीवन की चाह बन चुकी मिटने की अभिलाषा,
विश्व शान्ति में राग भर रही, अमर क्रान्ति की भाषा।
वृद्ध जगत, जर्जर समाज है, रूढ़ि ग्रस्त मानव है।
मेरे आगे पड़ा हुआ विधवा संस्कृति का शव है।
अब है कितनी देर, जगो, मेरे प्रलयंकर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो।
दानवता है मुक्त और पशुता ने है बल पाया,
अनाचार है नियम, विषमता विश्व-मोहनी माया।
छल है साधन, लूट यहाँ संयम, परवशता क्रम है।
अट्टहास अनहद है, इसका सत्य स्वयं ही भ्रम है।
भूमि अस्थि बन चुकी, कफ़न बन करके अम्बर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो।
शोषण का हो अन्त, विश्व शोषित के स्वर में बोले,
“निर्बल की जय” सत्ता का शाश्वत सिंहासन डोले।
परा प्रकृति के उपहारों के सब समान अधिकारी,
नहीं किसी तक सीमित भू की अचल सम्पदा सारी।
जीवन बन कर फूट पड़ो, नवयुग के निर्झर जागो,
राह देखता सर्वनाश, जागो शिवशंकर जागो।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज)
हे सौम्य! हे सत्यकाम! ‘मैं कौन हूँ’ यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा- अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतन्त्र तथा दृष्टि विषयक और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकला है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।
हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्मप्रकाश है। इस तुच्छ अपनेपन को नष्ट कर दें और सच्चिदानन्द आत्म से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान, तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्णज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है, न उद्देश्य, न प्रसन्नता है, न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शान्ति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।
तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म ज्ञान द्वारा कृत्रिम निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ को जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है। बहुत हो चुका। अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविधा की जंजीर को तोड़ दे-उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़-माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘मैं-मैं’ न कर, बल्कि ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम्-ओऽम्-ओऽम् का स्मरण कर, स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है- तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला। ‘तत् त्वं असि’- ‘तू’ ही ‘वह’ है। मेरे प्रिय सत्यकाम! ‘उसे’ जान- ‘उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।
अपने भीतर टटोल। अपने को समस्त विचारों से विमुक्त कर ले। विचार शून्य बन जा। सत्य और असत्य की पहचान कर। अनन्त और अदृश्य में भेद कर। इस बहते हुए मन को बार-बार केन्द्रित करने की चेष्टा कर। विपरीत की द्वन्द्वता से ऊपर उठ। नेति-नेति, के पाठ का अध्ययन कर। धोखे के चक्रों का नाश कर दे। अपने को सर्वव्यापक आत्मा से मिला। आत्म ज्ञान प्राप्त कर और उस सर्वश्रेष्ठ आनन्द का भोग कर।
धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ अनेक नहीं हो सकता। यह कैसे सम्भव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है। जैसे रेगिस्तान में जल का आभास किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अध्यात्म’ कहते हैं। इस अध्यात्म को ब्रह्म- चिन्तन अथवा ज्ञान-अध्यात्म द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा कर। अपने सत्-चित्त आनन्द स्वरूप में रमण कर।
अज्ञान के कारण ही दुख और क्लेश व्यापते हैं। अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान और अनुभव कर। वास्तव में अस्तित्व, ज्ञान और सुख सम्पूर्ण हैं। तू वास्तव में अमर है तथा सर्वव्यापक आत्मा है। उपनिषद् के इस उपदेश को स्मरण रख “जीव और ब्रह्म एक है” ओऽम् के रहस्य पर विचार कर और अपने स्वरूप में स्थित हो। केवल आत्म-ज्ञान द्वारा ही अज्ञान तथा तीनों क्लेशों का नाश किया जा सकता है। आत्म ज्ञान ही तुझे अमर गति, अनन्त सुख, चिरस्थायी शान्ति और सुख दे सकेगा।
चारों वेद एक स्वर से कहते हैं कि वास्तव में तू ही अविनाशी आत्मा अथवा अमर ब्रह्म है। शान्ति तथा चतुराई से अपने ऊपर के एक-एक आवरण को तथा मन को इन्द्रिय विषयों से हटा ले। एकान्त वास कर। इन्द्रिय विषयों को विष समझ। दूरदर्शिता एवं अनासक्ति द्वारा अपने मन को वश में कर। विवेक, वैराग्य, शत-सम्पत तथा मुमुक्षत्व को सर्वश्रेष्ठ श्रेणी तक बढ़ा। सर्वदा ध्यानस्थ रह। एक क्षण भी व्यर्थ न जाने दे।
आकाश सौम्य और सर्वव्यापक है, इसीलिए ब्रह्म की उपमा आकाश से दी जाती है। प्रारम्भ में तू सौम्य ब्रह्म पर विचार कर सकता है। पहले आकाश पर विचार कर और फिर धीरे-धीर ब्रह्म पर। इस प्रकार गूढ़ चिन्तन में लीन हो जा।
‘ओऽम्’ ब्रह्म का चिह्न है। अर्थात् परमात्मा का चिह्न है। ओऽम् पर विचार कर। जब तू ओऽम् का चिन्तन करेगा, तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि ब्रह्म का चिह्न ओऽम् है।
यह जान ले कि मन में उठने वाले क्षणिक विचार तथा संकल्प धोखा देने वाले हैं। तू मन तथा विचारों का दर्शक है परन्तु तू अपने उन विचारों में मग्न मत हो। अपने को ब्रह्मज्ञान के बीच में स्थित कर। अपने को सर्वश्रेष्ठ और उच्च स्थिति में रख। अपने आप को संदेह रहित, दुःख-रहित, निर्भय एवं क्लेश-रहित, और भ्रम-रहित बना तथा निर्मल सुख में स्थित होना सीख। काल और मृत्यु तेरे निकट नहीं आ सकते। तेरे लिए कोई बन्धन या रुकावट नहीं है। तू यह अनुभव करेगा कि तू इस ब्रह्माण्ड की समस्त ज्योतियों से सर्वश्रेष्ठ ज्योति है। अपूर्व सुख की यह स्थिति अवर्णनीय है। इसे अनुभव कर और प्रसन्न रह।
तू वह अमर आत्मा है जो समय, स्थान और उत्पत्ति से भी परे है। तू इसमें तनिक भी संदेह न कर। समय, स्थान और उत्पत्ति मन की उपज है। वह केवल मन में ही रहते हैं। दूरदर्शिता को प्राप्त कर। ढूँढ़ने वाले को ढूँढ़, जानने वाले को जान, सुनने वाले को अनुभव कर। इन नामों और आकारों में जो एकता है उसको पहचान। उद्देश्य विषय से भिन्न नहीं है, तू सर्वदा ही विषय को समझता रहा है।
अज्ञान की इस दीर्घ निद्रा से जाग। जन्म-मरण तथा उसके साथ के पापों से मुक्ति प्राप्त कर। आकारों के भ्रम से छुटकारा पा ले। मोह, ममता, मेरा तथा अपनेपन का त्याग कर। अपने को सर्वव्यापक जाग्रति जान। आत्म-ज्ञान के साम्राज्य के सिंहासन पर आरुढ़ हो जा। यही तेरा सर्व प्रथम घर है-अनन्त प्रकाश तथा असीम घर का अमिट स्थान है।
इस “मैं” को क्रूरता के साथ नष्ट कर दे। अगर “मैं” अदृश्य हो जाएगा तो तेरे लिए ‘वह’ और ‘तू’ अथवा ‘यह’ और ‘वह’ नहीं रहेंगे। यह एक अभूतपूर्व असाधारण एवं अवर्णनीय अनुभव होगा। तब तू संसार की अन्तिम सुन्दरता को पा लेगा। तू तब ‘जीवन मुक्त’ हो जाएगा- एक स्वतंत्र पुण्यात्मा हो जायेगा। इस ज्ञान को दूसरों के साथ बाँट कर उन्हें भी ऊपर उठा। सत्य का सूर्य बन कर प्रकाश को चारों ओर फैला। इस अमित आनन्द और शाश्वत शाँति को जन-जन में बाँट, तू अमर हो जायगा।
ब्राह्मण जो कुछ भी जानते हैं उसे सिखाकर, जो ज्ञान अनुभव उन्होंने प्राप्त किये हैं उसे दान देकर, भारतवासियों को उन्नत बनाने में सचेष्ट रहे। साँसारिक कार्यों में ही लगे रहना यथार्थ ब्राह्मण का कार्य नहीं है।
-स्वामी विवेकानन्द
(योगिराज श्री अरविन्द)
आर्य ज्ञान, आर्यशिक्षा, आर्य आदर्श, जड़ ज्ञानवादी, राजसिक, भोगपरायण, पाश्चात्य जाति के ज्ञान और आदर्श से एकदम भिन्न है। यूरोपीय लोगों के मतानुसार स्वार्थ और सुखान्वेषण के बिना कर्म का आचरण नहीं हो सकता, विद्वेष के बिना विरोध और युद्ध होना असंभव है। उनकी धारण यही है कि या तो सकाम कर्म किया जा सकता है अन्यथा कामना हीन संन्यासी बनकर बैठा जा सकता है। उनके विज्ञान का मूलमंत्र यही है कि जीविका के लिए जो संघर्ष होता है उसी से जगत् गठित हुआ है, उसी के द्वारा जगत की क्रमोन्नति साधित हो रही है।
जिन दिन आर्यों ने उत्तर मेरु से दक्षिण की यात्रा कर पंचनद भूमि को अधिकृत किया था उसी दिन से इस सनातन शिक्षा को प्राप्त कर उन्होंने सनातन प्रतिष्ठा भी प्राप्त की है कि यह विश्व आनन्द धाम है। प्रेम, सत्य और शक्ति के विकास के लिए सर्वव्यापी नारायण स्थावर और जंगम में, मनुष्य, पशु, कीट और पतंग में, साधु और पापी में, शत्रु और मित्र में, देव और असुर में प्रकट होकर जगत् भर में क्रीड़ा कर रहे हैं। क्रीड़ा के लिए ही सुख है, क्रीड़ा के लिए ही दुःख है, क्रीड़ा के लिए ही पाप है, क्रीड़ा के लिए ही पुण्य है, क्रीड़ा के लिए ही मित्रता है, क्रीड़ा के लिए ही शत्रुता है क्रीड़ा के लिए ही देवत्व है, क्रीड़ा के लिए ही असुरत्व है। मित्र शत्रु सभी क्रीड़ा के सहचर हैं, दो दलों में विभक्त होकर उन्होंने स्वपक्ष और विपक्ष की सृष्टि की है।
आर्य, मित्र की रक्षा करते हैं और शत्रु का दमन करते हैं, परन्तु उन्हें आसक्ति नहीं होती। वे सर्वत्र, सर्व भूतों में, सब वस्तुओं में, सभी कर्मों, सभी धर्मों और सभी विभूतियों में नारायण के दर्शन कर इष्ट-अनिष्ट, शत्रु-मित्र, सुख-दुख, पाप-पुण्य, सिद्धि-असिद्धि के प्रति समभाव रखते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी परिणाम उन्हें इष्ट होते हैं, सभी लोग उनके मित्र होते हैं, सभी घटनाएं उन्हें सुख देती हैं, सभी कर्म उनके लिए आदरणीय होते हैं, सभी फल उनके लिए वाँछनीय होते हैं। पूर्णरूपेण योग की प्राप्ति हुए बिना द्वन्द्व का नाश नहीं होता। उस अवस्था को बहुत थोड़े से लोग ही प्राप्त कर पाते हैं, परन्तु आर्य शिक्षा साधारण आर्यों की सम्पत्ति है।
आर्य, इष्ट का साधन और अनिष्ट का वर्जन करने की चेष्टा करते हैं, परन्तु इष्ट की प्राप्ति होने पर विजय-मद से मत्त नहीं हो जाते और न अनिष्ट के घटित होने पर भयभीत ही होते हैं। मित्र की सहायता करना तथा शत्रु को पराजित करना उनके प्रयास का उद्देश्य होता है, पर वे शत्रु के प्रति विद्वेष और मित्र के प्रति अन्यायपूर्ण पक्षपात का भाव नहीं रखते, कर्त्तव्य के लिए वे स्वजनों का संहार भी कर सकते हैं, विपक्षियों की प्राण रक्षा के लिए प्राण त्याग भी कर सकते हैं। सुख उन्हें प्रिय होता है, दुःख उन्हें अप्रिय होता है, फिर भी वे सुख में न तो चंचल होते है न दुःख में ही उनकी धीरता और प्रसन्नता विचलित होती है। वे पाप का त्याग और पुण्य का संचय करते हैं, किंतु पुण्य कर्म के लिए वे न तो वर्जित होते हैं न पाप में गिर जाने पर दुर्बल बालक की भाँति क्रन्दन करते हैं, बल्कि हंसते-हंसते कीचड़ में से निकल कर शरीर को पोंछकर, परिष्कृत और शुद्ध करके पुनः आत्मोन्नति की चेष्टा करते हैं। आर्य कार्यसिद्धि के लिए विपुल प्रयास करते हैं, हजार पराजय होने पर भी पैर पीछे नहीं हटाते, परन्तु असिद्धि से दुःखित होना, विलाप करना या असंतुष्ट होना उनके लिये अधर्म है। अवश्य ही जब कोई मनुष्य योगारुढ़ होकर, गुणातीत की तरह कर्म करने में समर्थ होता है तब उसके लिए द्वन्द्व का अन्त हो जाता है। जगन्माता जो कार्य देती है उसे ही वह सहर्ष करता है, जो फल देती है उसका ही सानन्द उपभोग करता है। जिन्हें माँ उसके पक्ष में निर्दिष्ट कर देती है उन्हीं को लेकर वह माँ का कार्य सम्पन्न करता है। जिन्हें माँ विपक्षी के रूप में उसे दिखा देती है उन्हीं का आदेशानुसार दमन या संहार करता है। यही शिक्षा आर्य शिक्षा है इस शिक्षा के अन्दर विद्वेष या घृणा का स्थान नहीं।
नारायण सर्वत्र हैं, भला किससे विद्वेष करें, किससे घृणा करें? अगर हम पाश्चात्य ढंग का राजनैतिक आन्दोलन करें तो फिर विद्वेष और घृणा आना अनिवार्य है और यह पाश्चात्य मतानुसार निन्दनीय नहीं है, क्योंकि स्वार्थ का विरोध है, एक ओर उत्थान और दूसरी ओर दमन हो रहा है। परन्तु हमारा उत्थान केवल आर्य जाति का उत्थान नहीं है, प्रत्युत आर्य चरित्र, आर्य शिक्षा, आर्य धर्म का उत्थान है।
राजनीति धर्म का अंग है, परन्तु उसका आचरण आर्य-भाव के साथ, आर्य-धर्मानुमोदित उपाय से करना चाहिए। हम भावी आशा स्वरूप युवक दल से यह कहते हैं कि यदि तुम्हारे प्राणों में विद्वेष हो तो उसे शीघ्र ही जड़ से निकाल फेंको। विद्वेष की तीव्र उत्तेजना से क्षणिक रजःपूर्ण बल आसानी से जाग्रत होता है और शीघ्र ही क्षीण होकर दुर्बलता में परिणत हो जाता है। जिन लोगों ने देशोद्धार करने की प्रतिज्ञा की है और उसके लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर चुके हैं उनके अन्दर प्रबल भ्रातृभाव, कठोर उद्यम शीलता, लोहसम दृढ़ता और ज्वलन्त-अग्नितुल्य तेज का संचार करो, उसी शक्ति से तुमको असीम बल प्राप्त होगा और तुम चिर-विजयी हो सकोगे।
अब आर्य जाति की सनातन शक्ति का पुनरुद्धार करना होगा। पहले, आर्यचरित्र और आर्यशिक्षा को आयत्त करना होगा, दूसरे, योग शक्ति का पुनर्विकास करना होगा, तीसरे, आर्योचित ज्ञान पिपासा और कर्मशक्ति के द्वारा नवयुक्त के लिए आवश्यक सामग्री का संचय करना होगा तथा इन कुछ वर्षों की उन्मादिनी उत्तेजना को सुशृंखलित कर और स्थित लक्ष्य की ओर मोड़ कर मातृ कार्य का सम्पादन करना होगा। आज-कल देश भर में जो युवक पथान्वेषण और कर्मान्वेषण कर रहे हैं, वे उत्तेजना का अतिक्रमण कर कुछ दिनों तक शक्ति संचय करने का पथ ढूँढ़ निकालें। जिस महत् कार्य को सम्पन्न करना है वह केवल उत्तेजना के द्वारा नहीं सम्पादित हो सकता, उसके लिए शक्ति की आवश्यकता है। ऐ युवकों! तुम लोगों के पूर्व पुरुषों की शिक्षा का अनुकरण करने से जिस शक्ति को प्राप्त किया जाता है वह शक्ति अघटन घटन पटीयसी है। वह शक्ति तुम्हारे शरीर में अवतरण करने के लिए उद्यत हो रही है। वह शक्ति ही माँ है। उन्हें आत्मसमर्पण करने का उपाय सीख लो। माँ तुम लोगों को यंत्र बनाकर इतना शीघ्र, इतने बल के साथ कार्य सम्पन्न करेगी कि जगत् स्तम्भित हो जायगा। उस शक्ति के बिना तुम्हारे सारे प्रयास विफल हो जायेंगे। मातृमूर्ति तुम्हारे हृदय में प्रतिष्ठित हो गयी है, तुमने मातृपूजा और मातृसेवा करना सीख लिया है, अब अन्तः निहित माता को आत्म समर्पण करो। कार्य सिद्धि का दूसरा कोई पथ नहीं है।
जिसे शाँति की तलाश है उसे अपने भीतर निगाह दौड़ानी चाहिए। -महात्मा गाँधी
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अच्छी बातें जहाँ से मिलें वहाँ से ग्रहण करना चाहिए और अपनी बुराइयों को बिना किसी पक्षपात के छोड़ देना चाहिए। -ला. लाजपतराय
कोई मनुष्य अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुका है या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुका है तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराशा होने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण को मिला था, उस ने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया। बाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे। सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है। इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के उपरान्त सत्पथ गामी हुए हैं और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी हुए हैं। यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं। कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे। अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति कुमार्ग गामी रही है यदि वही शक्ति सत्पथ पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है। गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।
मंद मति तम की स्थिति में हैं, उनकी क्रिया किसी भी दिशा में क्यों न हो। पुरुषार्थी, चतुर, संवेदनशील व्यक्ति रज की स्थिति में हैं चाहे वह अनुपयुक्त दिशा में ही क्यों न लगा हो। तम नीचे की सीढ़ी है, रज बीच की, और सत सबसे ऊपर की सीढ़ी है। जो रज की स्थिति में है उसके लिए सत में जा पहुँचना केवल एक ही कदम बढ़ाने की मंजिल है, जिस पर वह आसानी से पहुँच सकता है। स्वामी विवेकानन्द से एक मूढ़मति ने पूछा- मुझे मुक्ति का मार्ग बताइए। स्वामी जी ने उसकी सर्वतोमुखी मूढ़ता को देख कर कहा तुम चोरी, व्यभिचार, छल, असत्य भाषण, कलह आदि में अपनी प्रवृत्ति बढ़ाओं। इस पर वहाँ बैठे हुए लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा स्वामी जी आप यह क्या अनीति का उपदेश करते हैं? उन्होंने विस्तार पूर्वक समझाया कि तम में पड़े हुए लोगों के लिए पहले रज में जागृत होना पड़ता है तब वे सत में पहुँच सकते हैं। भोग और ऐश्वर्य को अर्निद्य मार्ग से प्राप्त करना निर्दोष और निद्य मार्ग से प्राप्त करना, सदोष रजोगुणी अवस्था है। दरिद्र को पहले सुसम्पन्न बनना होता है तब यह महात्मा बन सकता है। दरिद्र और नीच मनोवृत्ति का मनुष्य उदारता और महानता की सतोगुणी भावनाओं को धारण करने में समर्थ नहीं होता।
एक बार स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में अध्यात्म पर भाषण दे रहे थे। अमेरिकनों ने सभा में ही पूछा स्वामी जी! क्या भारतवासी पूर्ण अध्यात्मवादी हो गये हैं, जिससे उन्हें उपदेश न देकर आपको अमेरिका आने की आवश्यकता अनुभव हुई? स्वामी जी ने इस प्रश्न का बड़ा अच्छा उत्तर दिया। उन्होंने कहा- आप अमेरिका निवासी रजोगुणी स्थिति में है, धनी और विद्या सम्पन्न है इसलिए आप ही सतोगुण स्थिति में चलने के, अध्यात्म का अवलम्बन करने के अधिकारी हैं। मैं अधिकारी पात्रों को ढूँढ़ता हुआ आपके पास अमेरिका आया हूँ। मेरे देश वासी इस समय, दरिद्रता, अविद्या और पराधीनता में जकड़े पड़े हैं, उनकी स्थिति तम की है। मैं उनसे कहा करता हूँ कि- तुम उद्योगी बनो, अधिक कमाओ, अच्छा खाओ और सम्मान पूर्वक जीना सीखो यही उनके लिए आत्मोन्नति का मार्ग है। तम की स्थिति को पार कर रजोगुण में जागृत होना और तदुपरान्त सतोगुण में पदार्पण करना आत्मोन्नति का यह सीधा सा मार्ग है।
जो लोग पिछले जीवन में कुमार्ग गामी रहे हैं, बड़ी ऊटपटाँग गड़बड़ करते रहे हैं वे भूले हुए, पथभ्रष्ट तो अवश्य हैं पर इस गणन प्रक्रिया द्वारा भी उन्होंने अपनी चैतन्यता बुद्धिमत्ता, जागरुकता और क्रियाशीलता को बढ़ाया है। यह बढ़ोतरी एक अच्छी पूँजी है। पथ भ्रष्टता के कारण जो पाप उनसे बन पड़े हैं वे पश्चाताप और दुःख के हेतु अवश्य हैं पर संतोष की बात इतनी है कि इस कँटीले, पथरीले, लहू-लुहान करने वाले, ऊबड़-खाबड़ दुखदायी मार्ग में भटकते हुए भी मंजिल की दिशा में ही यात्रा की है। यदि अब संभल जाया जाय और सीधे राजमार्ग से, सतोगुणी आधार से आगे बढ़ा जाय तो पिछला ऊल-जलूल कार्यक्रम भी सहायक ही सिद्ध होगा।
पिछले पाप नष्ट हो सकते हैं, कुमार्ग पर चलने से जो घाव हो गये हैं वे थोड़ा दुख देकर शीघ्र अच्छे हो सकते हैं। उनके लिए चिंता एवं निराशा की कोई बात नहीं। केवल अपनी रुचि और क्रिया को बदल देना है। यह परिवर्तन होते ही बड़ी तेजी से सीधे मार्ग पर प्रगति होने लगेगी। दूरदर्शी तत्वज्ञों का मत है कि जब बुरे आचरणों वाले व्यक्ति बदलते हैं तो आश्चर्य जनक गति से सन्मार्ग में प्रगति करते हैं और स्वल्प काल में ही सच्चे महात्मा बन जाते हैं। जिन विशेषताओं के कारण वे सफल बदमाश थे वे ही विशेषताएं उन्हें सफल संत बना देती है।
अच्छी बातें जहाँ से मिलें वहाँ से ग्रहण करना चाहिए और अपनी बुराइयों को बिना किसी पक्षपात के छोड़ देना चाहिए। -ला. लाजपतराय
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मानसिक दासता से बढ़कर हानि देने वाली और कोई दासता नहीं है। -ला. लाजपतराय
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अपने देश से-अपने आप को, अपनी स्त्री या बच्चे को तथा अपनी सम्पत्ति को प्रेम करता है, वह तुच्छ और अपूर्ण देश भक्त है। -श्री अरविन्द घोष
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धर्म शास्त्रों में मातृभूमि को परमपूजनीय बतलाया है। जो धर्म के रहस्य को समझते हैं वे अपने हृदय में यह विश्वास करते हैं कि अपनी मातृभूमि से प्रेम करना ही धर्म का सबसे छोटा और सबसे बड़ा अंग है। -श्री अरविन्द घोष
(श्री रामखेलावन जी चौधरी बी. ए.)
विज्ञान अपने प्रारम्भ में ही मनुष्य से कहता है- तुम सुख चाहते हो? यदि चाहते हो तो आशावादी बनो। हमेशा आशा करो और विश्वास करो कि तुमको सुख मिलेगा। तुम्हारी आशा और तज्जनित सुख की एक मात्र शत्रु है चिन्ता। इसलिए चिन्ता को पहचानो और समझो, चिन्ता की उत्पत्ति कहाँ से होती है। चिन्ता के उद्गम निम्नलिखित हैं-
(1) प्रेम अथवा विवाहित जीवन की विफलता।
(2) आर्थिक संकट और आर्थिक हानि।
(3) वियोग जनित एकान्त।
(4) अतीत की दुखदायी स्मृतियाँ जो दुख क्रोध अथवा घृणा को उद्दीप्त करती हैं।
यह वह समस्याएं हैं जिन्होंने मनुष्य की नींद हराम कर दी है, उसे सुख और शाँति से वंचित किया है। इन्होंने उसे चिंता की ज्वाला, जो सतत जलती रहती है और उसे जलाती रहती है। यह वह समस्याएं है जिन से बचा नहीं जा सकता, इसीलिए जीव को संग्राम भूमि बनना ही पड़ता है। ये जीवन में आती हैं और अपना काम कर जाती हैं। चिन्ता की जननी इन समस्याओं का सामना करने के लिए सुख-विज्ञान-बताता है कि यह मूल मंत्र याद रखो-
“जो अवश्यम्भावी है, जो अनिवार्य है उसका सामना करो और तज्जनित लाभ हानि का सामना करने के लिए तैयार रहो।”
“इस पृथ्वी पर जितने प्रकार के रोग हैं, उनका सबका या तो इलाज है और या वे असाध्य हैं। यदि अमुक रोग का उपचार कर सकते हो तो कर डालो और यदि नहीं कर सकते, तो चिन्ता क्या? जो होनहार मृत्यु है, उसके लिए तैयार हो जाओ।”
शत्रु से लड़ाई को टालो यदि युद्ध न टल सके तो उस पर आक्रमण करके नष्ट कर दो और यदि अपनी पराजय ही निश्चित है तो उसे स्वीकार करो। चिंता-शत्रु के विरुद्ध अपनी युद्ध रीति का निर्देश सुख-विज्ञान उक्त ढंग से ही करता है। पहले चिंता से बचने उसको टालने का प्रयत्न करो- टाल करके अपने को सबल बनाओ।
(1) ईश्वर पर विश्वास करो- किसी ने सच कहा है कि वे मनुष्य बड़े ही मूर्ख और अभागे हैं जो ईश्वर को अपने जीवन युद्ध में अपना साथी न बनाकर अकेले ही लड़ते हैं। जो अपने आप ही को हर काम का कर्त्ता मानता है और जो यह समझता है कि सारे काम केवल उसकी इच्छा के अनुसार हो सकते हैं वह चिंता से मुक्त हो ही नहीं सकता। प्रयोग के लिए सिर्फ एक बार ऐसा विचार मन में लाकर देखो- मैं कुछ नहीं कर करता, जो कुछ करेगा ईश्वर ही करेगा, मैं तो सिर्फ काम करता हूँ, सफलता देने वाला वह है। इस विचार के आते ही अपूर्व शाँति मिलेगी।
(2) गहरी नींद सोओ और शरीर को आराम दो- जब चिंताएं अत्यधिक बलवती हो जायं तो नींद का सहारा लेना बड़ा उपयोगी होता है। अपने अंग प्रत्यंग ढीले करके खाट पर पड़ जाना चाहिए और एक गहरी नींद में अपने को डुबो देना चाहिए। थोड़ी देर को यह नींद तुम में फिर नई शक्ति भर देगी।
(3) संगीत से प्रेम करना सीखो- मनुष्य के द्वारा प्राप्त सारी कलाओं में संगीत कला ही ऐसी है जो रात भर में ही मदमस्त बना देती है। अगर तुम अपने को भूलना चाहते हो, आनन्द में लीन होना चाहते हो तो संगीत से बढ़ कर दूसरा साधन मिल ही नहीं सकता। अन्य कलाओं में विचार का स्थान होता है पर संगीत में केवल खालिस ‘भाव’ होता है। हम सभी जानते हैं कि तीव्र भावुकता जिस में निराशा मिली होती है, हमारी चिंता का कारण बन सकती है और वही भावनात्मक संवेदना यदि संगीत के द्वारा जाग्रत होती है तो वह बड़ी उल्लासदायिनी और विस्मृति देने वाली होती है। इसलिए अनुभूति प्रधान चिन्तनशील मनुष्यों के लिए संगीत विशेष रूप से उपयोगी है। यों तो यह सबका मनोरंजन करती है। संगीत में ही इतनी ताकत है कि वह सर्पों और वन मृगों तक को खींच सकता है- मनुष्य तो फिर मनुष्य ही है।
(4) जीव के चमकते हुए पहलू को देखो- जीवन निस्सार है, उसका वीभत्स अंत मरघट में देखा जा सकता है, यह जीवन का अंधकारमय पहलू है। इसके विपरीत संसार क्या भोगने की वस्तु नहीं? यह नाशवान् है, इसलिए क्या इसका उपभोग नहीं करना चाहिये? वह धारणा गलत है। आमोद-प्रमोद और आनन्द के साधन जितने मिल सकते हैं, उनका उपयोग अवश्य करना चाहिए।
सुख विज्ञान के यह चार सिद्धान्त ऐसे हैं जिस के आधार पर चिन्तादायिनी समस्याओं से केवल बचा जा सकता है। इनके अतिरिक्त कुछ उपाय ऐसे भी हैं जिनके द्वारा समस्याओं का सामना भी विधिपूर्वक किया जा सकता है। उन उपायों का समुचित उपयोग तभी हो सकता है जब मनुष्य अपने में निष्पक्ष रूप से विचार करने की आदत पैदा कर ले। समस्याओं को सुलझाने का वैज्ञानिक ढंग यह है-
(1) समस्या कौन सी है?- प्रायः बहुतेरे व्यक्ति अपनी समस्याओं को ठीक से नहीं समझ पाते। जब समस्या के साथ दूसरी अन्य समस्याओं को उलझा कर उसे इतना जटिल बना डालते हैं कि उसका हल ही नहीं निकल पाता। सारी कठिनाइयों की जड़ में जो समस्या हो उसे खोज निकालना चाहिए।
(2) समस्या के पैदा होने का कारण क्या है?- किसी न किसी कारण से ही कोई समस्या उठ खड़ी होती है। यदि वे कारण दूर हो जायं- चाहे उन्हें खुद दूर करे या तदनुरूप किसी की सहायता लें- तो वह समस्या दूर की जा सकती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि उस समस्या का पूरा-पूरा विवरण जान लिया जाय। समस्या के बारे में सब बातें एक कागज पर लिख भी लेनी चाहिए। इस वाक्य को हमेशा याद रखना चाहिए- समस्या की पूरी जानकारी प्राप्त कर लेना ही समस्या को आधा हल कर लेना है।
(3) उस समस्या के कितने हल सम्भव है?- कभी-कभी जब सोचने लगो तो एक समस्या के अनेक हल निकल आते हैं। अभी तक समस्या के कारण चिन्ता थी, अनेक हल निकल आने से फिर यह चिन्ता हो जाती है कि किस हल को अपनाया जाय। ऐसी स्थिति में अपनी शक्ति और रुचि के अनुसार ही कोई हल चुनना चाहिए। मान लीजिए ‘निर्धनता’ आपकी समस्या है। निर्धनता के कई हल हो सकते हैं- नौकरी, व्यवसाय और मजदूरी इत्यादि अब इन में जिसे अपनाने में आप की रुचि और शक्ति हो, उसे अपनाना श्रेयस्कर है।
(4) किसी एक हल पर डट कर अमल करो- हल को चुनने के निर्णय पर पहुँचने के लिए बहुत समय न लगाना चाहिए। ज्यादा देर करना अपनी कमजोरी का द्योतक है। अतः एक को निश्चित करके उस मार्ग पर पूरी कोशिश करके डट जाना चाहिए।
यह चारों सिद्धान्त व्यावहारिक हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मनुष्य के अकर्मण्यता रोग को दूर करती और उसे कर्म-पथ पर अग्रसर करती है। इनके अतिरिक्त कुछ बातें और भी हो सकती हैं, जिन को समझ लेने से मन में बड़ी शाँति और संतोष प्राप्त होता है।
1- अधिक से अधिक हानि का अनुमान कर लो- कोई भी काम तुम्हें करना है, उस पर विचार करके देखो, उसके दो ही परिणाम हो सकते हैं- या तो लाभ या हानि। प्रायः लाभ की ही बात सोच कर मनुष्य काम करता है पर यह भी समझ लेना चाहिए कि उसे दुख और चिन्ता तभी होती है जब लाभ नहीं मिलता। इसलिए कोई काम करके हमें लाभ की बड़ी-बड़ी आशा न करके बड़ी से बड़ी हानि की सम्भावना पर ध्यान कर लेना उचित है। कम से कम जीवन के व्यावसायिक कार्यों में यह दृष्टिकोण मनुष्य में निर्भीकता की अभिवृद्धि करता है। परोक्ष रूप से उसका प्रभाव यह पड़ता है कि निडरता से काम होने के कारण लाभ ही होता है और लाभ के अभाव में चिंता नहीं होती।
(2) अगर हानि या हार ही सुनिश्चित है तो उसको सहने के लिए तैयार रहो- यह मानना ही पड़ेगा कि कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें हानि से नहीं बचा जा सकता। यदि हानि होती है या हार होती है तो उसे सहन करना उचित है। इससे शक्ति बढ़ती है, हानि से ज्ञान बढ़ता है और अपनी कमजोरी का परिचय मिल जाता है। इसलिए उसे सह कर प्रयत्न करते रहना ही ठीक है।
(3) अपने पास जो भी साधन हैं उन्नति के लिये वही काफी हैं- अपने पास यदि थोड़ा ही धन है या थोड़ी ही योग्यता है तो उस कमी का रोना रोते रहना उचित नहीं। कहा भी गया है- ‘क्रिया सिद्धिस्सत्वे भवति महताँ नोपकरणे’ अर्थात् सिद्धि की प्राप्ति शक्ति से होती है, साधनों से नहीं। साधनविहीन व्यक्तियों ने ही संसार में क्रान्तियाँ की हैं।
(4) खाली मत बैठो- कहा गया है खाली दिमाग शैतान का घर। जैसे किसी स्थान पर हवा बिल्कुल न रहे तो दूसरी जगह से हवा दौड़ कर उस स्थान को भर देती है। इसी तरह मस्तिष्क कभी बेकार नहीं रहता। उस में यदि शुभ विचार और संकल्प नहीं हैं तो बुरे विचार ही उस में अपना स्थान बना लेंगे। इसके अतिरिक्त अपने शरीर को भी काम में लगाये रहता है तो विचार कम आते हैं। यदि आप दौड़ रहे हों या तैर रहे हो तो क्या विचार कर सकते हैं? व्यावहारिक मनोविज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान विलियम जेम्स ने कहा है कि ‘ऐसा जान पड़ता है कि हमारे मनोभावों के अनुरूप कार्य होते हैं पर वास्तव में भाव और क्रिया एक दूसरे पर आश्रित हैं और अपनी क्रियाओं का संयोजन करके जो हमारे वश की बात है, हम परोक्ष रूप से अपने मनोभावों को वश में कर सकते हैं जिन पर काबू पाना अत्यधिक कठिन है। इसलिए किसी न किसी काम में लगे रहने पर चिन्ता दूर ही रहती है।
(5) सोचो- हम सबसे अधिक सुखी हैं- अगर तुम क्लर्क हो, तो डायरेक्टर की पदवी का सोच करके दुखी मत हो। तुम्हें यह संतोष करना चाहिए कि दूसरे चपरासी हैं। उनसे तुम अवश्य सुखी ज्यादा हो। इस प्रकार के विचारों से मन में सुख की भावना को स्थान दो। यदि प्रत्येक वस्तु में तुम चाहो तो सौंदर्य और गुण देख सकते हो। जेम्स ऐलेन ने ठीक बताया है कि जैसे ही मनुष्य अन्य लोगों या वस्तुओं के प्रति अपने विचारों को बदल देता है, वे लोग और वस्तुएं भी उसके लिए बदल जाती हैं।
यह है चिंता निवारण के कुछ स्वर्णिम नियम।
जीवन एक संगीत है, उसके सभी तार ठीक रखो, नहीं तो उस का साज बिगड़ जायगा
-मदन मोहन मालवीय
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हिन्दी लिखने में कोई कठिनाई नहीं, वह तो हम सबकी मातृभाषा है। जो कुछ मित्रों से या घर में बोलें यदि वही देवनागरी में लिख लें तो लिखना आ गया। -आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
यद्यपि सम्पूर्ण भीतरी शत्रुओं- माया, मोह, ईर्ष्या, काम, लोभ, क्रोध इत्यादि का तजना कठिन है, तथापि अनुभव से ज्ञान होता है कि ‘अहंकार’ नामक आन्तरिक शत्रु को मिटाना और भी कष्ट साध्य है। यह वह शत्रु है जो छिप कर हम पर आक्रमण करता है। हमें ज्ञान तक नहीं होता कि हम ‘अहंकार’ के वशीभूत हैं।
अहंकार प्रत्येक मनुष्य में वर्तमान है। धनी मानी, वृद्ध, युवक, बालक विज्ञान किसी न किसी प्रकार के अहंकार में डूबे हैं। ‘अहं’ ही घमंड है। हमें किसी न किसी बात का मिथ्या गर्व बना है। विद्वान को अपनी विद्वत्ता का, धनी को अपने धन का, स्त्री को अपने रूप, यौवन, सौंदर्य का अहंकार है, राजा और जागीरदार अपने ऐश्वर्य के अहंकार में किसी दूसरे की नहीं सोचते, पूँजीपति अपनी पूँजी के गर्व में गरीब मजदूरों के अधिकारों को नहीं देना चाहते। संसार के अनेक संघर्षों का कारण यही है कि किसी के ‘अहं’ को चोट पहुँचती है। अभिमान मनुष्य के पतन का मूल है।
भक्त सूरदास ने भीतरी शत्रुओं का उल्लेख करते हुए अपने एक भजन में लिखा है-
प्रभु मैं सब पतितन को राजा।
पर निंदा मुख पूरि रह्यो, जग
यह निसान नित बाजा॥
तृष्ना देसरु सुभट मनोरथ
इन्द्रिय खडग हमारे।
मंत्री काम कुमत दैवे को
क्रोध रहत प्रतिहारे॥
गज अहंकार चढ़यो दिग विजयी
लोभ छत्र धरि सीस।
फौज असत-संगति की मेरी
एसो हौं मैं ईस॥
मोह मदै बन्दी गुनगावत
मगध दोष अपार।
सूर पाप को गढ़ दृढ़ कीनो
मुह कम लगे किंवार॥
‘अहंकार’ को सूर हाथी मानते हैं। उन्होंने इसे ‘दिग्विजयी गज’ कहकर सम्बोधित किया है। अर्थात् संसार में बहुत कम इस दुर्बलता से मुक्त हैं। आदि काल से मनुष्य इस प्रयत्न में है कि वह अभिमान से मुक्त हो जाये और इसी के लिए प्रयत्न करता रहा है। किंतु शोक! महाशोक!! जीवन पर्यंत हम वृथा के अभिमान में फँसे रहते हैं। अपने बराबर किसी को नहीं मानते। अपनी बुद्धि को सबसे अधिक महत्व प्रदान करते हैं। अपनी चीज, बाल बच्चे, विचार, दृष्टिकोण, घर बार सच पर अभिमान करते हैं। इसी वृथा के अहंकार के कारण हम जीवन में और बड़ी बातें सम्पन्न नहीं कर पाते। जहाँ के तहाँ ही पड़े रह जाते हैं। हमारी उन्नति में रोक पहुँचाने वाला शत्रु अहंकार ही तो है। सूर ने इस भाव को कितनी सुन्दरता से व्यक्त किया है, देखिये-
रे मन! मूरख जनम गंवायो।
करि अभिमान विषय सों राच्यो,
नाम सरन नहि आयो।
यह संसार फूल सेमर को,
सुन्दर देखि लुभायो।
चाखन लाग्यो रुई उड़ि गई
हाथ कछू नहीं आयो।
कहा भयो अबके मन सोचे,
पहिले नाँहि कमायो।
‘सूरदास’ हरि नाम भजन बिनु,
सिर धुनि-धुनि पछितायो॥
मनुष्य अभिमान कर विषयों में फंसा रहता है, विवेक भूलता है। और फिर आयु पर्यन्त पछताता है। सम्पत्ति आती है और एक मामूली से झटके से निकल जाती है। शारीरिक शक्ति बीमारी के एक आक्रमण से नष्ट हो जाती है। पग जरा सी गलती से छूट जाना है और मनुष्य पदच्युत हो जाता है फिर कोई उसे टके को भी नहीं पूछता। धन, सम्पदा, ऐश्वर्य, शक्ति सब निस्सार पदार्थ हैं। मनुष्य इनके अभिमान में अपनी आध्यात्मिक उन्नति को भूल जाता है और पतनोन्मुख होता है।
सम्पत्ति और साँसारिक पदार्थ का अहंकार ही मनुष्य को बन्धन में डालता है। यदि मन का स्वामी बनना हो तो इस अभिमान का तुरन्त त्याग कर डालना चाहिए। अहंकार के चश्मे में से मनुष्य अपनी वास्तविक स्थिति, देश इत्यादि को नहीं देख पाता। यह दुर्बलता उसे तुच्छ और कमीना बनाये रखती है।
अहंकार का अर्थ संकुचितता है। इससे मनुष्य अपने आपको एक संकुचित परिधि में बाँधे रखता है। वह दूसरों से उन्मुक्त भ्रातृभाव से मिल नहीं पाता, अपना हृदय उनके सामने नहीं खोल सकता। मिथ्या गर्व में वह यह सोचा करता है कि दूसरे आये और आकर उसकी मिथ्या प्रशंसा करे। प्रशंसा से वह फूल उठता है। उसकी शठता, मद, अभिमान द्विगुणित हो उठते हैं। धीरे-धीरे उसे दूसरों से तारीफ कराने की आदत बन जाती है। वह अपनी तनिक सी बुराई सुनते ही विह्वल हो उठता है और क्रोध में कुछ का कुछ कर बैठता है। बन्धन ही मृत्यु है, अहंकार का बन्धन सर्वथा त्याज्य है। अहंकार को चोट पहुँचते ही मनुष्य को हजारों बिच्छुओं के काटने के समान दुःख होता है।
आप जन्म से दूसरों के समान हैं। दूसरे भी आप जैसे ही हैं। सब में समानता है। फिर किस बात का वृथा अहंकार आप करते हैं। मिथ्या अभिमान में फँसकर क्यों आप एक नए आन्तरिक दुःख की सृष्टि कर रहे हैं। यदि आप अभिमानी नहीं हैं तो आपका अन्तस्थल शुद्ध निर्मल रहेगा, मानसिक वृत्तियाँ शाँत बनी रहेगी, मधुर निद्रा आवेगी, जनता में प्रत्येक जगह आपका सम्मान होगा। आपके पड़ौसी आपको भली प्रकार समझ सकेंगे। आन्तरिक दृष्टि से सफाई, स्वास्थ्य और सौभाग्य की जननी है। इस मनोविकार के मोहजाल में मुक्त हो जाइये।
(ले.- श्री अगरचन्दजी नाहटा, बीकानेर)
किसी भी कार्य की सिद्धि में आलस्य सबसे बड़ा बाधक है, उत्साह की मन्दता प्रवृत्ति में शिथिलता लाती है। हमारे बहुत से कार्य आलस्य के कारण ही सम्पन्न नहीं हो पाते। दो मिनट के कार्य के लिए आलसी व्यक्ति फिर करूंगा, कल करूंगा-करते-करते लम्बा समय यों ही बिता देता है। बहुत बार आवश्यक कार्यों का भी मौका चूक जाता है और फिर केवल पछताने के आँतरिक कुछ नहीं रह जाता।
हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग आलस्य में ही बीतता है अन्यथा उतने समय में कार्य तत्पर रहे तो कल्पना से अधिक कार्य-सिद्धि हो सकती है। इसका अनुभव हम प्रतिपल कार्य में संलग्न रहने वाले मनुष्यों के कार्य कलापों द्वारा भली-भाँति कर सकते हैं। बहुत बार हमें आश्चर्य होता है कि आखिर एक व्यक्ति इतना काम कब एवं कैसे कर लेता है। स्वर्गीय पिताजी के बराबर जब हम तीन भाई मिल कर भी कार्य नहीं कर पाते, तो उनकी कार्य क्षमता अनुभव कर हम विस्मय-विमुग्ध हो जाते हैं। जिन कार्यों को करते हुए हमें प्रातःकाल 9-10 बज जाते हैं, वे हमारे सो कर उठने से पहले ही कर डालते थे। जब कोई काम करना हुआ, तुरन्त काम में लग गये और उसको पूर्ण करके ही उन्होंने विश्राम किया। जो काम आज हो सकता है, उसे घंटा बाद करने की मनोवृत्ति, आलस्य की निशानी है। एक-एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गये तो बहुत से कार्य पूर्ण कर सकेंगे, पर बहुत से काम एक साथ लेने से- किसे पहले किया जाय, इसी इतस्ततः में समय बीत जाता है और एक भी काम पूरा और ठीक से नहीं हो पाता। अतः पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि जो कार्य आज और अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़, तत्काल कर डालिए, कहा भी है-
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब॥
दूसरी बात ध्यान में यह रखनी है कि एक साथ अधिक कार्य हाथ में न लिये जायं, क्योंकि इससे किसी भी काम में पूरा मनोयोग एवं उत्साह नहीं रहने से सफलता नहीं मिल सकेगी। अतः एक-एक कार्य को हाथ में लिया जाय और क्रमशः सबको कर लिया जाय अन्यथा सभी कार्य अधूरे रह जायेंगे और पूरे हुए बिना कार्य का फल नहीं मिल सकता।
जैन धर्म में कार्य सिद्धि में बाधा देने वाली तेरह बातों को तेरह काठियों (रुकावट डालने वाले) की संज्ञा दी गई है। उसमें सबसे पहला काठिया ‘आलस्य’ ही है। बहुत बार बना बनाया काम तनिक से आलस्य के कारण बिगड़ जाता है। प्रातःकाल निद्रा भंग हो जाती है, पर आलस्य के कारण हम उठकर काम में नहीं लगते। इधर-उधर उलट-पुलट करते-करते काम का समय गंवा बैठते हैं। जो व्यक्ति उठकर काम में लग जाता है, वह हमारे उठने के पहले ही काम समाप्त कर लाभ उठा लेता है। दिन में भी आलसी व्यक्ति विचार में ही रह जाता है, करने वाला कमाई कर लेता है। अतः प्रति समय किसी न किसी कार्य में लगे रहना चाहिए। कहावत भी है ‘बैठे से बेगार भली’। निकम्मे आदमी में कुविचार ही घूमते हैं। अतः निकम्मेपन को हजार खराबियों की जड़ बतलाया गया है।
मानव जीवन बड़ा दुर्लभ होने से उसका प्रति क्षण अत्यन्त मूल्यवान है। जो समय जाता है, वापिस नहीं आता। प्रति समय आयु क्षीण हो रही है, न मालूम जीवन दीप कब बुझ जाय। अतः क्षण मात्र भी प्रमाद न करने का उपदेश भगवान महावीर ने दिया है। महात्मा गौतम गणधर को सम्बोधित करते हुए उन्होंने उत्तराध्ययन-सूत्र में ‘समयं गोयम मा पमायए’ आदि- बड़े सुन्दर शब्दों में उपदेश दिया है। जिसे पुनः-पुनः विचार कर प्रमाद का परिहार कर कार्य में उद्यमशील रहना परमावश्यक है। जैन दर्शन में प्रमाद निकम्मे पन के ही अर्थ में नहीं, पर समस्त पापाचरण के आसेवन के अर्थ में है। पापाचरण करके भी जीवन के बहुमूल्य समय को व्यर्थ ही न गंवाइये।
कई लोग कार्याधिक्य से घबराते हैं और आराम नहीं होने से स्वास्थ्य नष्ट होने की आशंका करते हैं, पर आलस्य के त्याग द्वारा कार्य शक्ति बहुत बढ़ाई जा सकती है। अतः अपने को अधिकाधिक कार्य कर सकने के उपयुक्त बनाने का अभ्यास डालना चाहिए।
आत्मा अनन्त शक्ति का भंडार है, पर उसका मान न होने से हम उस शक्ति का अनुभव नहीं कर पाते। बहुत बार हमारी शक्ति को काम में न लेने के कारण ही वह कुँठित हो जाती है और विधिवत उपयोग करते रहने से वह क्रमशः बढ़ती चली जाती है। हम दो-चार घंटे शारीरिक वाचिक एवं मानसिक श्रम करके थक जाते हैं, एवं विश्राम करने के लिए आतुर हो उठते हैं, पर अभ्यास के बल पर जिन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ा लिया है, वे 16 एवं 20 घंटे तक काम करने पर भी हारते नहीं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यों को देखिए, उनका प्रतिफल कार्य संलग्न है। तीन-चार वर्ष हुए जब नेहरू जी सिलहट पधारे थे तो देखा कि एक ही दिन में 100-150 मील के भ्रमण के साथ 10-15 कार्यक्रम थे। पर किसी को फेल न होने दिया, उनके एक-एक मिनट के समय का कार्यक्रम बँधा था। स्थान-स्थान पर भाषण देना पड़ता था, लोग उनकी कार्य-शक्ति को देख कर दंग रह जाते थे। गाँधी जी को भी कितने अधिक कार्य करने पड़ते थे, पर सब को नियमित रूप से करते थे। सैकड़ों व्यक्तियों से मिलना सबकी बातें सुनकर संतोष प्रद उत्तर देना। सैकड़ों व्यक्तियों के पत्र आते थे, उनका उत्तर देना, हरिजनादि के लिए लेख लिखना या लिखाना, प्रवचन देना, रोगियों को संभालना, चरखा कातना, शारीरिक सभी कार्य अच्छी तरह से करना, टहलने भी जाना, फिर भी सब काम समय पर निपट जाते और आज के कार्य कल पर नहीं छोड़ते। अभ्यास और नियमितता से कार्य शक्ति को बहुत बढ़ाया जा सकता है इसके यह दो ज्वलंत उदाहरण हैं।
आलस्य के कारण हम अपनी शक्ति से परिचित नहीं होते- अनन्त शक्ति का अनुभव नहीं कर पाते और शक्ति का उपयोग न कर, उसे कुँठित कर देते हैं। किसी भी यन्त्र एवं औजार का आप उपयोग करते रहते हैं तो ठीक और तेज रहता है। उपयोग न करने से पड़ा-पड़ा जंग लगकर बरबाद और निकम्मा हो जाता है। उसी प्रकार अपनी शक्तियों को नष्ट न होने देकर सतेज बनाइये। आलस्य आपका महान शत्रु है। इसको प्रवेश करने का मौका ही न दीजिए एवं पास में आ जाए तो दूर हटा दीजिए। सत्कर्मों में तो आलस्य तनिक भी न करे क्योंकि “श्रेयाँसि बहु विघ्नानि” अच्छे कामों में बहुत विघ्न जाते हैं। आलस्य करना है, तो असत् कार्यों में कीजिए, जिससे आप में सुबुद्धि उत्पन्न हो और कोई भी बुरा कार्य आप से होने ही न पावे।
(श्री सिद्धेश्वरजी मंडलोई, राजपुर)
आज कल बौद्धिक ज्ञान को शिक्षा कहते हैं। मास्टरी, डाक्टरी, इंजीनियरी, कला-कौशल आदि की योग्यताएं शिक्षा कहलाती हैं इनके द्वारा धन, मान तथा सुख सामग्री की प्राप्ति होती है। क्या शिक्षा का प्रयोजन यही है? नहीं, केवल इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। शरीर को आनन्द मिला पर आत्मा अशाँत रही तो वह वैभव फीका है, निस्सार है। सच्चा आनन्द वह है जिसमें साँसारिक और आत्मिक जीवन की उभय पक्षीय उन्नति एवं तृप्ति प्राप्त हो। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी बनाना है।
हम संसार की अनेक बातें जानते हैं, पर अपनी आत्म-सत्ता के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत थोड़ा है। दुनियावी स्वार्थ में हम भले ही चौकस हों, पर आत्मिक स्वार्थों के क्षेत्र में पग-पग पर बाजी हारते हैं। थोड़ी सी भोग सामग्री हमारे पास भले ही जमा हो जाय पर आत्मिक सम्पत्तियों से प्रायः हम रीते ही रहते हैं। यह समझ किस काम की? इस शिक्षा से, इस चतुराई से क्या लाभ, जिसके द्वारा एकाँगी तुच्छ को प्राप्त करना तो सुलभ हो जाय पर वास्तविक लाभ की पहचान और उपलब्धि में कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो। शिक्षा तो वह है- जिससे बुद्धि का उचित परिमार्जन हो और जीवन के हर पहलू पर ठीक तरह विचार कर सकने की क्षमता प्राप्त हो जाय।
कहते हैं कि “इंसान को इशारा काफी होता है।” जो संकेत मात्र से साधारण विचार बुद्धि से अपना हित अनहित समझ ले। कुमार्ग पर चलने से अपरिमित हानि होती है और लाभ अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक। जिसे कौड़ी के मोल हीरा बेचते हुए झिझक नहीं होती उसे शिक्षित किस प्रकार कहा जाय? शिक्षित कहना तो दूर उसे तो इंसान तक नहीं कह सकते, क्योंकि “इन्सान को इशारा काफी होता है।” जब कोई अनुचित कार्य किया जाता है तो आत्मा इशारा करती है, अन्तःकरण पुकारता है कि यह न करो यह अनुचित है। यह बड़ा जोरदार इशारा है जो इशारा नहीं समझता और केवल लोभ तथा भय को ही समझता है वह तो पशु है। उसे तो नर पशु ही कहा जा सकता है।
साँसारिक जानकारी की बहुत सी बातें स्कूलों में सिखाई जाती है, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी, पर इतने मात्र से ही संतुष्ट हो बैठना पर्याप्त न होगा। हमें शिक्षा का वह भाग भी प्राप्त करना चाहिए जिससे सत् असत् का विवेक होता है और सच्चे स्वार्थ साधन के लिए उत्साह पैदा होता है। ऐसी शिक्षा के लिए स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।
(श्री के. बी. सुब्बाराव)
पानी पृथ्वी से अधिक सूक्ष्म है। पृथ्वी पानी का बदला हुआ स्वरूप है। पृथ्वी पानी से उत्पन्न हुई है। पृथ्वी प्रलय के समय पानी में घुल जाती है। पानी पृथ्वी से अधिक द्रव है इसलिए पृथ्वी पर फैल जाता है। अग्नि पानी से अधिक सूक्ष्म है। पानी अग्नि से उत्पन्न होता है। जब मानसून गरम होती है, हमें पसीना आता है। पानी अग्नि में मिल जाता है। हवा अग्नि से अधिक सूक्ष्म है। अग्नि हवा से उत्पन्न होती है। अग्नि हवा में घुलनशील है। हवा अग्नि पर फैलती है। आकाश हवा से अधिक पतला है और इन दूसरे चार तत्वों की उत्पत्ति आकाश से ही होती है। आकाश, हवा, अग्नि, पानी और पृथ्वी इन चार तत्वों पर आच्छादित है। मन और समय आकाश से अधिक सूक्ष्म है। परमात्मा मन से भी अधिक सूक्ष्म है।
विचार से बढ़कर मन है। मन से बढ़कर बुद्धि होती है। परन्तु बुद्धि से बढ़कर क्या है? वह है, आत्मा या परमात्मा। ये बड़ी आत्मा बुद्धि बगैर सब तत्वों का जरिया है, यह क्राँति सूक्ष्म है। यह स्थिर, अस्थिर, भीतर और बाहर, द्रव और दृढ़ सब में व्याप्त है, यह बात स्वयं सिद्ध है और वह बहुत दूर और पास है और वही सब से बड़ा आत्मा या परमात्मा है। यह परमात्मा सब और हर एक जीव में छुपा हुआ व्याप्त-विद्यमान है, परन्तु प्रकाशित नहीं होता, जो व्यक्ति उस परमात्मा के अस्तित्व का अनुभव करना चाहते हैं वे इस तत्व को समझ कर, पालन करके इसको अपनी दिन चर्या से लाकर अपने चित्त को सूक्ष्म करके ध्यानपूर्वक साधना के द्वारा उसका अनुभव कर सकते हैं।
तुम अपनी शक्तियों को संगठित करो और अपने बिखरे वस्त्र को एकत्र करो, तब काम करने में लग जाओ। ऐसा करने पर कोई तुम्हारी माँगों को पूरा करने से विरक्त नहीं हो सकता।
-लोकमान्य तिलक
पिछले लेख में बताया जा चुका है कि गायत्री कोई देवी देवता, भूत-पलीत आदि नहीं वरन् ब्रह्म की स्फुरणा से उत्पन्न हुई आद्य शक्ति है जो संसार के प्रत्येक पदार्थ का मूल कारण है और उसी के द्वारा जड़ चेतन सृष्टि में गति, शक्ति, प्रगति, प्रेरणा एवं परिणति होती है। जैसे घर में रखे हुए रेडियो यंत्र का संबंध विश्व व्यापी ईथर तरंगों से स्थापित करके देश-विदेशों में होने वाले प्रत्येक ब्रॉडकास्ट को सरलता पूर्वक सुन सकते हैं। उसी प्रकार आत्म शक्ति का विश्व व्यापी गायत्री शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करके सूक्ष्म प्रकृति की सभी हलचलों की जान सकते हैं और उस सूक्ष्म शक्ति को इच्छानुसार मोड़ने की कला विदित हो जाने पर-साँसारिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र में प्राप्त हो सकते हैं। जिस मार्ग से यह सब हो सकता है उसका नाम है-साधना।
कई व्यक्ति सोचते हैं- “हमारा उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति, आत्म-दर्शन और जीवन-मुक्ति है, हमें गायत्री के सूक्ष्म प्रकृति के चक्कर में पड़ने से क्या प्रयोजन? हमें तो केवल ईश्वराधना करनी चाहिए।” ऐसा सोचने वालों को जानना चाहिए कि ब्रह्म सर्वथा निर्विकार, निर्लेप, निरंजन, निराकार और गुणातीत है। वह न किसी से प्रेम करता है न द्वेष। वह केवल दृष्टा एवं कारण रूप है। उस तरह सीधी पहुँच नहीं हो सकती। क्योंकि जीव और ब्रह्म के बीच में सूक्ष्म प्रकृति का सघन आच्छादन है। इस आच्छादन को पार करने के लिए प्रकृति के साधनों से ही कार्य करना पड़ेगा। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, कल्पना, ध्यान, सूक्ष्म शरीर, षट्चक्र, इस देव की ध्यान प्रतिमा, व्यक्ति भावना-उपासना, व्रत, अनुष्ठान, साधन यह सब भी तो मात्रा निर्मित, ही हैं, इन सब को छोड़कर ब्रह्म प्राप्ति किस प्रकार होनी संभव है? जैसे ऊपर आकाश में पहुँचने के लिए वायुयान की आवश्यकता पड़ती है वैसे ही ब्रह्म प्राप्ति के लिए भी प्रकृति मूलक आराधना का ही आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री के आवरण में होकर पार जाने पर ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। सच तो यह है कि साक्षात्कार का अनुभव भी गायत्री के गर्भ में ही होता है। इस से ऊपर पहुँचने पर सूक्ष्म इन्द्रियाँ और उनकी अनुभव शक्ति भी लुप्त हो जाती है। इसलिए मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति चाहने वाले भी गायत्री मिश्रित ब्रह्म की-राधेश्याम, सीताराम लक्ष्मी नारायण की-ही उपासना करते हैं। निर्विकार ब्रह्म का सायुज्य तो तभी होगा जब ब्रह्म “बहुत से एक होने” की इच्छा करेगा और सब आत्माओं को समेट कर अपने में धारण कर लेगा। उससे पूर्व सब आत्माओं की सविकार ब्रह्म में ही सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य आदि हो सकता है। इस प्रकार गायत्री मिश्रित सविकार ब्रह्म ही हमारा उपास्य रह जाता है। उसकी प्राप्ति के साधन जो भी होंगे, वे सभी सूक्ष्म प्रकृति गायत्री द्वारा ही होंगे। इसलिए ऐसा सोचना उचित नहीं कि ब्रह्म प्राप्ति के लिए गायत्री अनावश्यक है। वह तो अनिवार्य है। नाम से कोई उपेक्षा या विरोध करें यह उनकी इच्छा, पर गायत्री तत्व से बचकर अन्य मार्ग से जाना असंभव है।
कई व्यक्ति कहते हैं कि हम निष्काम साधना करते हैं, हमें किसी फल की कामना नहीं फिर सूक्ष्म प्रकृति का, गायत्री का, आश्रय क्यों लें? ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि निष्काम, साधना का अर्थ-भौतिक लाभ न चाह कर आत्मिक सतोगुणी लाभ चाहना है। बिना परिणाम सोचे या चाहे तो किसी कार्य में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती, यदि कुछ किया भी जाय तो उससे समय एवं शक्ति के अपव्यय के अतिरिक्त और कुछ परिणाम नहीं निकलता। निष्काम कर्म का तात्पर्य देवी, सतोगुणी आत्मिक कामनाओं से है। ऐसी कामनाएँ भी गायत्री के प्रथम पाद में, ह्रीं तत्व में, सरस्वती भाग में आती है। इसलिए निष्काम भाव की उपासना भी गायत्री क्षेत्र से बाहर नहीं है।
मंत्र विद्या के वैज्ञानिक जानते हैं कि जीभ से जो भी शब्द निकलते हैं उनका उच्चारण कंठ, तालु, मूर्धा, ओष्ठ, दंत, जिह्वा मूल आदि मुख के विभिन्न अंगों द्वारा होता है। इस उच्चारण काल में मुख के जिन भागों से ध्वनि निकलती है, उन अंगों की नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैलते हैं, इस फैलाव क्षेत्र में कई सूक्ष्म ग्रंथियाँ होती हैं जिन पर उस उच्चारण का दबाव पड़ता है। जिन लोगों की कोई सूक्ष्म ग्रन्थियाँ रोगी या नष्ट हो जाती हैं उनके मुख से कुछ खास शब्द अशुद्ध या रुक-रुक कर निकलते हैं, इसी को हकलाना और तुतलाना कहते हैं। शरीर में अनेकों छोटी-बड़ी दृश्य-अदृश्य ग्रन्थियाँ होती हैं योगी लोग जानते हैं कि उन कोषों में कोई विशेष शक्ति भण्डार छिपा रहता है। सुषुम्ना से सम्बद्ध षट्चक्र प्रसिद्ध हैं, ऐसी ही अगणित अनेकों ग्रंथियाँ शरीर में हैं। विविध शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रंथियों पर अपना प्रभाव डालता है और उस प्रभास से उन ग्रंथियों का शक्ति भण्डार जागृत होता है। मंत्रों का गठन इसी आधार पर हुआ है। गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं। इनका संबंध शरीर में स्थित ऐसी 24 ग्रन्थियों से है जो जागृत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्तियों को सतेज करती है। गायत्री मन्त्र के कारण से सूक्ष्म शरीर का सितार 24 स्थानों से झंकार देता है और उससे एक ऐसी स्वर लहरी उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव अदृश्य जगत के महत्वपूर्ण तत्वों पर पड़ता है। यह प्रभाव ही गायत्री साधना के फलों का प्रधान हेतु है।
शब्दों का ध्वनि प्रवाह तुच्छ चीज नहीं है। शब्द विद्या के आचार्य जानते हैं कि शब्द में कितनी शक्ति है और उसकी अज्ञात गतिविधि के द्वारा क्या-क्या परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। ब्रह्म की स्फुरणा कम्पन उत्पन्न करती है, वह कम्पन ब्रह्म से टकरा कर “ॐ” ध्वनि के साथ बार-2 ध्वनित होता रहता है। जैसे दीवाल-घड़ी का लटकन घण्टा पेंडुलम झूलता रह कर घड़ी के पुर्जों में चाल पैदा करता रहता है इसी प्रकार वह “ॐ” कार ध्वनि प्रवाह सृष्टि को चलाने वाली गति पैदा करता है। आगे चलकर उस प्रवाह में ह्रीं, श्रीं, क्लीं की तीन प्रधान सत्, रज, तममयी धाराएं बहती हैं। तदुपरान्त उसकी ओर भी शाखा प्रशाखाएं हो जाती हैं जो बीज मंत्र के नाम से पुकारी जाती हैं। यह ध्वनियाँ अपने-2 क्षेत्र में सृष्टि का संचालन कार्य शब्द तत्व द्वारा होता है। ऐसे तत्व को तुच्छ नहीं कहा जा सकता। गायत्री की शब्दावली ऐसे चुने हुए शृंखलाबद्ध शब्दों से बनाई गई है जो क्रम और गुम्फन की विशेषता के कारण अपने ढंग की एक अद्भुत ही शक्ति प्रवाह उत्पन्न करती है।
दीपक राग गाने से बुझे हुए दीपक जल उठते हैं, मेघ मल्हार गाने से वर्षा होने लगती है, वेणु-नाद सुनकर सर्प लहराने लगते हैं, मृग सुधि-बुधि भूल जाते हैं, गाय अधिक दूध देने लगती है। कोयल की बोली सुनकर काम भाव जागृत हो आते हैं। सैनिकों के कदम मिलाकर चलने की शब्द ध्वनि से लोहे के पुल तक गिर सकते हैं इसलिए पुलों को पार करते समय सेना को कदम मिला कर न चलने की हिदायत दी जाती है। अमेरिका के डॉक्टर हैविसन ने विविध संगीत ध्वनियों से अनेक असाध्य और कष्ट साध्य रोगियों को अच्छा करने में सफलता और ख्याति प्राप्त की है। भारत वर्ष में ताँत्रिक लोग थाली को घड़े पर रखकर एक विशेष गति से बजाते हैं और उस बाजे से सर्प बिच्छू आदि जहरीले जानवरों के काटे हुए, कंठमाला, विषबेल, भूतोन्माद आदि के रोगी बहुत करके अच्छे हो जाते हैं। कारण यह है कि शब्दों के कंपन सूक्ष्म प्रकृति में से अपनी जाति के अन्य परमाणुओं को लेकर ईथर का परिभ्रमण करते हुए जब अपने उद्गम केन्द्र पर कुछ ही क्षणों में लौट आते हैं तो उनमें अपने प्रकार की एक विशेष विद्युत शक्ति भरी होती है और परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त क्षेत्र पर उस शक्ति का एक विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। मन्त्रों द्वारा विलक्षण कार्य होने पर भी यही कारण है। गायत्री मंत्र द्वारा भी इस प्रकार शक्ति का आविर्भाव होता है। मंत्रोच्चारण में मुख के जो अंग क्रियाशील होते हैं, उन भागों के नाड़ी तंतु कुछ विशेष ग्रंथियों को गुदगुदाते हैं, उनमें स्फुरणा होने से एक वैदिक छंद का क्रमबद्ध योगिक संगीत प्रवाह ईथर तत्व में फैलता है और अपनी कुछ क्षणों में पुरी होने वाली विश्व परिक्रमा से वापिस आते-आते एक स्वजातीय तत्वों की सेना वापिस ले आती है जो अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में बड़ी सहायक होती है। शब्द संगीत के शक्तिमय कम्पनों का पंच भौतिक प्रवाह और आत्म शक्ति का सूक्ष्म प्रकृति की भावना, साधना, आराधना के आधार पर उत्पन्न किया गया संबंध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होता है।
गायत्री मन्त्र को और भी अधिक सक्षम बनाने वाला कारण है साधक का ‘श्रद्धामय विश्वास’ विश्वास की शक्ति से सभी मनोविज्ञान वेत्ता परिचित हैं। हम अपनी पुस्तकों और लेखों में ऐसे असंख्यों उदाहरण अनेकों बार दे चुके हैं जिनसे सिद्ध होता है कि केवल विश्वास के आधार पर लोग केवल भय की वजह से अकारण काल के मुख में चले गये और विश्वास के कारण मृत प्रायः लोगों ने नवजीवन प्राप्त किया। रामायण में तुलसीदास जी ने ‘भवानी शंकरो बन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणो’ गाते हुए श्रद्धा और विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। झाड़ी को भूत, रस्सी को सर्प, मूर्ति को देवता, बना देने की क्षमता विश्वास में है। लोग अपने विश्वासों की रक्षा के लिए धन, आराम तथा प्राणों तक को हंसते-हंसते गंवा देते हैं। एकलव्य, कबीर आदि के ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिससे प्रकट है कि गुरु द्वारा नहीं केवल अपनी श्रद्धा के आधार पर गुरु द्वारा प्राप्त होने वाली शिक्षा से भी अधिक विज्ञ बना जा सकता है। हिप्नोटिज्म विज्ञान का आधार, रोगी को अपने वचन पर विश्वास कराके उससे मनमाने कार्य करा लेना ही तो है। ताँत्रिक लोग मंत्र सिद्धि की कठोर साधना द्वारा अपने मन में उस मंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा जमाते हैं, जिसके मन में जितनी गहरी श्रद्धा जमी होती है उस ताँत्रिक का मंत्र भी उतना ही काम करता है। जिस मन्त्र से श्रद्धालु ताँत्रिक चमत्कारी काम कर दिखाता है उसी मन्त्र को अश्रद्धालु साधक चाहे सौ बार करे कुछ लाभ नहीं होता। गायत्री मन्त्र के संबंध में भी यह तथ्य बहुत हद तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वास पूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और आत्म संबंध दोनों की महत्ता से संयुक्त गायत्री का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्ध होती है।
पिछले पृष्ठ पर ऊपर दिये हुए चित्र में दिखाया गया है कि गायत्री के प्रत्येक अक्षर का किस-किस स्थान से सम्बन्ध है। उन स्थानों पर योगिक ग्रन्थि चक्र है। इनका परिचय इस प्रकार है-
अक्षर ग्रन्थि का नाम उसमें भरी हुई शक्ति
1. तत् तापिनी सफलता
2. स सफला पराक्रम
3. वि विश्वा पालन
4. तुर् तुष्टि कल्याण
5. व वरदा योग
6. रे रेवती प्रेम
7. णि सूक्ष्मा धन
8. यं ज्ञाना तेज
9. भर् भर्गा रक्षा
10. गो गौतमी बुद्धि
11. दे देविका दमन
12. व वराही निष्ठा
13. स्य सिंहिनी धारणा
14.धी ध्याना प्राण
15. म मर्यादा संयम
16. हि स्फुटा तप
17. धि मेधा दूरदर्शिता
18. यो योगमाया जागृति
19. यो योगिनी उत्पादन
20. नः धरित्री सरसता
21. प्र प्रभवा आदर्श
22. चो ऊष्मा साहस
23. द दृश्या विवेक
24. यात् निरंजना सेवा
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गायत्री प्रेमियों को शुभ सूचना
इस मास से ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रत्येक अंक में गायत्री सम्बन्धी दो बड़े ही महत्वपूर्ण लेख रहा करेंगे। यह लेख माला एक डेढ़ वर्ष चालू रहेगी। आगे चल कर यह लेख माला दुष्प्राप्य हो सकती है। इसलिए गायत्री प्रेमियों को चाहिए कि इस अंक से लेकर आगे के सब अंकों को बहुत सुरक्षित रखें।
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दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ का बोझा बढ़ता जा रहा है और इस से किसी समय पृथ्वी पर भारी उथल-पुथल हो सकती है। पृथ्वी को इस प्रलय से केवल कोई परमाणु विस्फोट ही बचा सकता है। यह विचार न्यूयार्क के समीपवर्ती ‘लोंगद्वीप’ के विख्यात विद्युत इंजीनियर ने अभी हाल में गम्भीरता पूर्वक प्रकट किये हैं। आपका नाम श्री ह्यू ए. ब्राउन है।
श्री ब्राउन ने यह नहीं बताया कि पृथ्वी पर प्रलय कब होगी। उन्होंने पिछले 35 वर्षों में पृथ्वी का गम्भीर अध्ययन किया है जिससे वह यह सिद्धाँत प्रतिपादित कर सके हैं कि भूपिंड इस हिम-संगठन के कारण प्रत्येक 8000 वर्ष में अपना सन्तुलन करने के लिए करवट बदलता है। यह 8000 वर्ष की अवधि फिर पूरी सी हो चुकी है और भूमण्डल कभी भी करवट ले सकता है।
‘जब यह प्रलय होगा, तब अधिकाँश महाद्वीप जल से परिप्लावित हो जायेंगे और उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों का जलवायु उष्ण प्रदेशों जैसा हो जायगा। न्यूयार्क क्षेत्र तथा अधिकाँश सभ्य संसार का विस्तृत प्रदेश समुद्र के जल से 13 मील तक नीचा चला जायगा।’
‘यह भूमण्डल गत 10 लाख वर्षों से चला आ रहा है प्रति 8000 वर्षों बाद इस प्रकार का प्रलय होता आ रहा है। यदि हम अब की बार इस प्रलय को रोकना चाहते हैं तो ऐसा कर सकते हैं, हमें दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का निरीक्षण करना चाहिए और निश्चित करना चाहिये कि कितनी बर्फ विनष्ट कर दी जाय। यह बर्फ परमाणु बमों से नष्ट की जा सकती है।’
‘भू पिंड की इस प्रलय का अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि विश्व का अन्त हो जायगा। इस प्रलय से उन का अंत अवश्य हो जायेगा, जो आजकल विस्तृत पृथ्वी पर रहते हैं। हाँ, कुछ व्यक्ति पीछे अवश्य छूट जायेंगे।’
‘अनेक वर्ष हुए, उत्तरी ध्रुव में कुछ लम्बे बाल तथा दूध वाले जानवर बर्फ में दब गये थे। लम्बी अवधि के बाद जब लोगों ने जाकर उन्हें देखा तब उनके मुँह में ताजे भोजन के ग्रास विद्यमान थे। इससे श्री ब्राउन ने परिणाम निकाला कि यह अमित हिम के कारण सुन्न होकर मर गये और साथ ही हिम ने उनको सुरक्षित भी रख लिया। उदाहरण के लिए, यदि उष्ण कटिबन्ध एकदम हिमाच्छादित ध्रुव प्रदेशों में बदल जाय तो यहाँ के प्राणी मात्र की भी वही दशा होगी, जो दक्षिणी ध्रुव के उक्त प्राणियों की हुई थी।’
‘अब से लगभग 8 सहस्र वर्ष पहले जब प्रलय हुई थी तो दोनों ध्रुव प्रदेश क्रमशः उन स्थानों पर होंगे जहाँ आजकल अफ्रीका में सूडान तथा प्रशाँत महासागर में सामीओं द्वीप हैं। इन्हीं प्रदेशों के निकट क्रमशः मिश्र तथा हवाई द्वीप थे जहाँ पर आधुनिक युग की सभ्यता का सबसे पहले अभ्युदय हुआ, क्योंकि उस प्रलय के जल की बाढ़ से वह स्थान मिश्र तथा हवाई द्वीप न आये होंगे।’
‘पिछले प्रलय के अवसर पर भूतपूर्व ध्रुवों के निकटवर्ती क्षेत्रों पर भी विनाशकारी बाढ़ का कम प्रभाव पड़ा होगा। यह क्षेत्र दक्षिणी अमेरिका के इक्वेडोर और पेरू तथा मलाया प्राँतद्वीप का निकटवर्ती द्वीप सुमात्रा होगा। हमारी वर्तमान सभ्यता के यह प्रदेश भी अग्रणी है।’
‘अगली प्रलय के अवसर पर इस प्रकार ध्रुववासी एस्किमो लोग बच जायेंगे, बशर्ते जब उनके वर्तमान प्रदेश का जलवायु उष्ण प्रदेश अथवा समशीतोष्ण कटिबन्ध जैसा हो जाय तो वह उसके साँचे पर अपने को एकाएक ढाल सके। इस प्रलय का जहाँ कम प्रभाव और पड़ सकता है, वह अटलांटिक तथा प्रशान्त महासागरों के वर्तमान धन शून्य प्रदेश हैं।’
‘धरती के करवट पलटने का प्रमाण इससे भी मिलता है कि लगभग 50 वर्ष हुए, संसार के विख्यात ज्योतिषियों ने यह अन्वेषण किया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर लड़खड़ाने लगी है, जो ध्रुवों के बीच गुजरती मानी जाती है।’
‘जब ध्रुव (दक्षिणी) पर बर्फ का वजन इतना बढ़ जायगा कि निचले हिमप्रस्तर उसे अपने ऊपर लादे न रख सकेंगे तो विशाल हिम पर्वत टूट कर भूमध्य रेखा की ओर बह चलेंगे, इससे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति तथा दोनों ध्रुवों के सम्बन्ध में विषम अन्तर पैदा हो जायगा। अतः जहाँ से महा विशाल हिम पर्वत टूटेंगे। वहाँ से पृथ्वी अपना सिर सन्तुलन उपलब्ध करने के लिए करवट बदलेगी। उक्त हिम प्रस्तर भूमध्य रेखा पर चले जायेंगे।’
(डॉ. गोपालप्रसाद बंशी, बेतिया)
किसी साधु की गुदड़ी चोरी हो गई। विनोद और कौतुक के लिए किसी राज कर्मचारी ने ही ऐसा किया था। साधु ने राज दरबार में रिपोर्ट लिखाई कि मेरी सारी सम्पत्ति चोरी चली गई।
रिपोर्ट लिखने वाले अधिकारी ने पूछा- आपकी क्या-क्या चीज चोरी गई है, लिखाइए। साधु ने लिखाया- रजाई, बिछौना, चादर, तकिया, अँगरखा, आसन, छतरी, धोती आदि सभी कुछ चोर चुरा ले गये।
साधु के पास इतना सामान होने की बात सुनकर वहाँ बैठे हुए लोग उसे बड़ा मालदार अनुभव करने लगे। “इतनी चीजें क्यों जमा कर रखी थी?” चारों ओर से प्रश्नों की बौछार होने लगी।
जिसने चुराई थी वह राज कर्मचारी भी वहाँ उपस्थित था। वह हँस पड़ा और बोला महाराज जी झूठ बोलने से क्या? राज आपको इतनी चीजें अपने पास से थोड़े ही दे देगा। देखिए, यही आपकी गुदड़ी है न? और तो कोई चीज नहीं थी?
अपनी गुदड़ी पाकर साधु संतुष्ट हुआ। उसने कहा- जो-जो चीजें मैंने बताई थी उन सबका काम यह गुदड़ी निकाल देती है। इसलिए मैं उन सब चीजों को इस एक में ही समाया हुआ समझता हूँ। वे अनेक वस्तुएं अलग-अलग मेरे पास नहीं है तो भी उन सबका प्रयोजन इस एक से हल हो जाने के कारण मेरे लिए यह उतना ही महत्व रखती है जितना कि अन्य लोगों के लिए मेरी चोरी वाली रिपोर्ट में लिखाई हुई चीजों का होना।
साधु की बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। साधु ने कहा हंसिये नहीं, आपके सब के पास भी एक ऐसी ही गुदड़ी है जिसको प्रयोग करने लगें तो बहुत चीजें बटोरने के झंझट से बच जायं और उस एक से ही सब काम निकाल लिया करें।
लोगों ने आश्चर्य से पूछा- ऐसी गुदड़ी हमारे पास कहाँ है? साधु ने कहा- अन्तरात्मा में निवास करने वाला ईश्वर ही वह गुदड़ी है। उसका आश्रय मजबूती से पकड़ लिया जाय उसे हर समय छाती से लगा कर रखा जाय, और हर अवसर पर उसको उपयोग किया जाय तो वह जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है।
साधु के प्रवचन से श्रोताओं के कान खुल गये। उनकी समझ में आया कि अनेक प्रयोजनों की पूर्ति एक ईश्वर आश्रय रूपी गुदड़ी से भी हो सकती है।
(श्रीमती ब्रह्मावती देवी, वारा)
भारत की नारियों में अपने कर्त्तव्य का ज्ञान प्राचीन समय से होता चला आया है, क्यों न हो हमारी प्राचीन मातायें गर्भावस्था से ही अपनी संतान को चाहे वह पुत्र हो या पुत्री सुँदर, सुशील, धार्मिक एवं विद्वान बनाने के यथेष्ट रूप से प्रयत्न करती रहती थी। जब तक उनकी संतान पूर्ण रूप से योग्य न बन जाये। उस काल लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष ध्यान दिया जाता था। उनको धर्म शास्त्र गृह-कार्य में दक्ष एवं पारिवारिक और लौकिक व्यवहार में पटु बना दिया जाता था ताकि वे अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए दोनों कुलों को उज्ज्वल कर अक्षय सुख को प्राप्त होती थी हमारे ग्रन्थ प्रमाण स्वरूप हैं। राज्य घराने में उत्पन्न हुई सुकुमारियाँ सीता, दमयन्ती, सावित्री, शकुन्तला आदि अपने कर्त्तव्य और ज्ञान द्वारा घोर दुःखों से पीड़ित होने पर भी अपने कर्त्तव्य पथ से विचलित न हुई और संसार में नारी समाज के लिए आदर्श बनकर अमरता को प्राप्त हुई।
इसका कारण यही था कि हमारी प्राचीन मातायें बाल्य काल से ही अपनी सुशिक्षा द्वारा पुत्रियों को निरन्तर सुशिक्षित करती रहती थी। सीताजी को ससुराल जाते ही माय रानी सुनयना ने क्या ही सुन्दर शिक्षा दी थी जिसको हमारी रामायण पढ़ने वाली बहनें और मातायें भली प्रकार जानती हैं। माता के आदेशानुसार सीता जी ने अपने गुणों द्वारा सारे परिवार को अपने वश में कर लिया था। कौशल्या माता तो उनको आँख की पुतली की तरह रखती थी। दशरथ का उन पर अगाध वात्सल्य था। देवर, देवरानियाँ सासुएं उन पर कितना प्रेम करते थे यह किसी से छिपा नहीं है।
इसी भाँति सावित्री सारे सुखों और वैभव को ठुकरा कर नेत्रविहीन सास-ससुर और पति सत्यवान की सेवा करती हुई वन में निवास करती थी घर का सारा कार्य वह नित्य प्रति अपने ही हाथों करती थीं, अपने पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज पर भी विजय प्राप्त किया था।
गार्गी, मैत्रेयी धर्म शास्त्र की ज्ञाता थीं ऐसे हमारे प्राचीन समय के भारत के अनेकों उदाहरण हैं ये हमारी प्राचीन माताओं की सुशिक्षा का ही प्रभाव है जो लड़कियों के लिए लौकिक और पारलौकिक सुख का हेतु है।
परन्तु शोक है कि आज वह हमारी प्राचीन शिक्षा नष्ट हो गई। हम सब कर्त्तव्य हीन हो गई इसी कारण हमारा पारिवारिक जीवन अशान्तिमय बन गया। नित्य प्रति प्रत्येक घर में कलह, न बहू सास से प्रसन्न न सास बहू से प्रसन्न, कहीं देवरानी-जिठानी में नहीं बनती, तो किसी परिवार में कई चूल्हे हैं इसका एकमात्र कारण किसी को अपने सच्चे कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं। सास-बहू को नौकरानी समझ कर शासन करना चाहती है तो बहू स्वयं मालकिन बनकर सास पर हुक्म चलाना चाहती है। माताएं चाहती हैं कि मेरी लड़की ससुराल जाकर अपना प्रभाव जमावे परन्तु सास चाहती है बहू मेरी आँखों के इशारे पर नाचे। भला ऐसा कब सम्भव हो सकता है, आखिर वह भी तो किसी की बेटी ही है।
जो शिक्षा स्कूल, कालेजों में कन्याओं को दी जाती है उससे उन्हें सुशिक्षित कहलाने का, प्रमाण पत्र या डिग्रीधारी होने का अथवा नौकरी का साधन भले ही मिल जाय पर वह शिक्षण नहीं मिलता जिसको प्राप्त करने से वे आदर्श नारी, पुत्री, कुल-वधु और माता बन सके। वर्तमान शिक्षा प्रणाली यों तो पुरुष जाति के लिए भी कुछ विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं हो रही है पर नारी जाति के लिए तो वह उलटा ही परिणाम उपस्थित कर रही है। अशिक्षित बहिनों की अपेक्षा आज की सुशिक्षित कहलाने वाली बहिनें प्रायः सफल गृहिणी सिद्ध नहीं होतीं।
हमें आज शिक्षा की आवश्यकता है। पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी शिक्षित होना ही चाहिए पर हमारी शिक्षा ऐसी हो जो आदर्श नारी, सुगृहिणी, गृह-लक्ष्मी, सती-साध्वी और विवेकशील माताएं पैदा करें। ऐसी शिक्षा धार्मिक आधार पर होनी चाहिए और ऐसी शिक्षा विदुषी, चरित्रवान महिलाएं तथा वयोवृद्ध, विद्वान तपस्वी पुरुष ही दे सकते हैं। जब हमें नारी जाति के लिए ऐसी ही शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो छात्राओं की नस-नस में भारतीय संस्कृति का आदर्श भर दे और उसके परिणाम स्वरूप प्रत्येक घर में स्वर्गीय सुख और शाँति के दर्शन होने लगें।
(श्री. रत्नेशकुमारी जी नीराँजना, मैनपुरी)
आपने ये गुरु-वन्दना स्वयं पढ़ी न भी हो, तो भी सुनी तो जरूर ही होगी। आप सभी में से अनेकों में स्वयं पढ़ी भी होगी और कुछ कदाचित ऐसे भी होंगे जो नित्य पाठ करते होंगे-
‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देव महेश्वरः,
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः’।
क्या आपने कभी इस पर विचार किया है इस में सत्य का भी अंश है या केवल स्तुति वाक्य मात्र है? यदि आपने विचार नहीं किया है तो आपका ये वन्दना पाठ व्यर्थ है क्योंकि आपका अन्तर मन कभी भी उस बात को धारण नहीं करेगा। जिस पर उसका विश्वास न होगा भले ही आप दिन में बीसों बार तोता रटन्त करें।
अस्तु, आइये हम इस पर विचार करें “ब्रह्मा गुरु क्यों है”? हाँ, गुरु ब्रह्मा है क्योंकि वह हमको नवीन, दिव्य, पवित्र आनन्दमय जीवन प्रदान करता है, जिसको भुक्तभोगी ही जान सकता है।
गुरु विष्णु भी है। यह नव-जीवन हमारे चिर संचित कुसंस्कारों के बीच में कैसे टिक पायेगा। यदि गुरुदेव का पवित्र संरक्षण न प्राप्त हुआ तो महेश भी गुरु हैं, हमारे मन में जो कुसंस्कारों की बस्ती बसी हुई होती है। उसका शाँत भाव से धीरे-धीरे या क्षण मात्र में नाश कर देता है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों (सृजन, वर्धन, संहार) शक्तियाँ जिस में निवास करती हैं तथा जो उनसे समय-2 पर काम भी लेता है पर उनमें जिस की आसक्ति नहीं है वही तो परब्रह्म है। गुरु भगवान में ये भी गुण होता है इसीलिए तो वह परब्रह्म भी कहा जाता है।
आइये, आज अनन्य मन से प्रार्थना करें-
‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देव महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।’
कठोर कार्य ही चरित्र को सहनशील, सहिष्णु, वीर, बलवान बनाने के लिए ईश्वर द्वारा भेजे जाते हैं।
-लोकमान्य तिलक
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जिस शख्स को जातीय इज्जत और आत्म-सम्मान का ध्यान नहीं है, वह मनुष्य नहीं पशु है।
-ला. लाजपतराय
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राष्ट्र के हित की वृद्धि में लगे रहना ही देवताओं की उपासना करना है।
-स्वामी रामतीर्थ
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यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा कोई विरोध न करे तो मन को हमेशा शाँत रखो और हृदय में पवित्र विचारों को स्थान दो। -स्वामी रामतीर्थ
यों तो वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त, बसन्त, ग्रीष्म-यह छह ऋतुएं होती हैं। मोटे तौर से सर्दी, गर्मी, वर्षा यह तीन ऋतुएं मानी जाती हैं। पर वस्तुतः दो ही ऋतु हैं (1) सर्दी (2) गर्मी। वर्षा दोनों ही ऋतुओं में होती है। गर्मियों में मेघ सावन, भादो बरसते हैं, सर्दियों में पौष, माघ में वर्षा होती है। गर्मियों की वर्षा में अधिक पानी पड़ता है सर्दियों में कम। इतना अन्तर होते हुए भी दोनों ही बार पानी पड़ने की आशा की जाती है। इन दो प्रधान ऋतुओं के मिलने की संधि बेला को नवदुर्गा कहते हैं।
जैसे दिन और रात्रि के मिलन काल को संध्या काल कहते हैं। और उस महत्वपूर्ण संध्या काल को बड़ी सावधानी से बिताते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय भोजन करना, सोते रहना, मैथुन करना, यात्रा आरंभ करना आदि कितने ही कार्य वर्जित हैं। उस समय को ईश्वराधन, संध्यावंदन, आत्म-साधन आदि कार्यों में लगाते हैं क्योंकि वह समय जिन कार्यों के लिए सूक्ष्म दृष्टि से अधिक उपयोगी है, वही कार्य करने से थोड़े ही श्रम से अधिक और आश्चर्यजनक सफलता मिलती है। इसी प्रकार जो कार्य वर्जित है वे उस समय में अन्य समयों की अपेक्षा अधिक हानिकारक होते हैं। सर्दी-गर्मी की ऋतुओं का मिलन, दिन और रात्रि के मिलन के समान संध्या काल है, पुण्य पर्व है। पुराणों में कथा है कि ऋतुएं नौ दिन के लिए ऋतुमती-रजस्वला होती है। जैसे रजस्वला को विशेष आहार-विहार और आचार-विचार का ध्यान रखना आवश्यक होता है वैसे ही उस संध्याकाल में-संधि वेला में- रजस्वला अवधि में- विशेष स्थिति में रहने की आवश्यकता होती है।
आरोग्य शास्त्र के पंडित जानते हैं कि आश्विन और चैत्र में जो सूक्ष्म ऋतु परिवर्तन होता है उसका प्रभाव मानव शरीर पर कितनी अधिक मात्रा में होता है। उस प्रभाव में स्वास्थ्य की दीवार हिल जाती है और अनेक व्यक्ति ज्वर, जूड़ी, हैजा, दस्त, चेचक, अवसाद आदि अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। वैद्य डाक्टरों के दवाखानों में इन दिनों बीमारों का मेला लगा रहता है। वैद्य लोग जानते हैं कि वमन, विरेचन, नस्य, स्वेदन, वस्ति, रक्त मोक्षण आदि शरीर शोधन कार्यों के लिए आश्विन और चैत्र का महीना ही सबसे उपयुक्त है। इस समय में दशहरा और रामनवमी जैसे दो प्रमुख त्यौहार नवदुर्गाओं के अन्त में होते है। ऐसे महत्वपूर्ण त्यौहारों के लिए यही समय सब से अधिक उपयुक्त था। नवदुर्गाओं के अन्त में भगवती दुर्गा प्रकट हुई। चैत्र की नव दुर्गाओं के अन्त में भगवान राम का अवतार हुआ। यह पूर्णमासी की ऊषा ऐसी ही हैं जिसके अन्त में सूर्य या चन्द्रमा का उदय होता है।
क्वार और चैत्र मास शुक्लपक्ष में प्रतिपदा (पड़वा) से लेकर नवमी तक नौ दुर्गाएं रहती हैं। यह समय गायत्री साधन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। इन दिनों में उपवास रखकर चौबीस हजार मन्त्रों के जप का छोटा सा अनुष्ठान कर लेना चाहिए। यह छोटी साधना भी बड़ी साधना के समान उपयोगी सिद्ध होती है।
एक समय अन्नाहार, एक समय फलाहार, दो समय दूध और फल, एक समय आहार, एक समय फल दूध का आहार, केवल दूध का आहार, इनमें से जो भी उपवास अपनी सामर्थ्यानुकूल हो उसी के अनुसार साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर शौच स्नान से निवृत्त होकर पूर्व वर्णित नियमों को ध्यान में रखते हुए उपासना के लिए बैठना चाहिए। नौ दिन में 24 हजार जप करना है। प्रतिदिन 2667 मंत्र जपने हैं। एक माला में 108 दाने होते हैं। प्रतिदिन 25 मालाएं जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। तीन-चार घंटे में अपनी-अपनी गति के अनुसार इतनी मालाएं आसानी से जपी जा सकती है। यदि एक बार इतने समय लगातार जप करना कठिन हो तो अधिकाँश भाग प्रातः पूरा करके न्यून अंश सायंकाल को पूरा कर लेना चाहिए। अंतिम दिन हवन के लिए है। उस दिन पूर्व वर्णित हवन विधि के अनुसार कम से कम 108 आहुतियों का हवन कर लेना चाहिए। ब्राह्मण भोजन और यज्ञ पूर्ति की दान दक्षिणा की भी यथाविधि व्यवस्था करनी चाहिए।
यह छोटा नौ दिन का अनुष्ठान नवदुर्गाओं के समय में यदि प्रतिवर्ष करते रहा जाय तो सबसे उत्तम है। स्वयं न कर सकें तो किसी अधिकारी सुपात्र ब्राह्मण से वह करा लेना चाहिए। यह नौ दिन साधना के लिए बड़े ही उपयुक्त हैं। कष्ट निवारण, कामना पूर्ति और आत्मबल बढ़ाने में इन दिनों की उपासना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है। आश्विन की नवदुर्गाएं निकट हैं। पाठक उस समय एक छोटा अनुष्ठान करके उसका लाभ देखें।
नवदुर्गाओं के अतिरिक्त भी छोटा अनुष्ठान इसी प्रकार कभी भी किया जा सकता है। सवालक्ष जप का चालीस दिन में पूरा होने वाला पूर्ण अनुष्ठान है। नौ दिन का एक पाद (पंचमाँश) अनुष्ठान कहलाता है। सुविधा और आवश्यकतानुसार उन्हें भी करते रहना चाहिए। यह तपोधन जितनी अधिक मात्रा में एकत्रित किया जा सके उतना ही उत्तम है।
छोटा गायत्री मंत्र-
जैसे सवा लक्ष जप को पूर्ण अनुष्ठान न कर सकने वालो के लिए नौ दिन का चौबीस हजार जप का लघु अनुष्ठान हो सकता है। उसी प्रकार अल्पशिक्षित, अशिक्षित, बालक या स्त्रियों के लिए लघु गायत्री मन्त्र भी है। जो चौबीस हजार का पूर्ण मंत्र याद नहीं कर पाते वे प्रणव और व्याहृतियां (ॐ भूर्भुवः स्वः) इतना पंचाक्षरी मन्त्र जप कर काम चला सकते हैं। जैसे चारों वेदों का बीज चौबीस अक्षर वाली गायत्री है। वैसे ही गायत्री का मूल पंचाक्षर मन्त्र-प्रणव और व्याहृतियां हैं। ॐ भूर्भुवः स्वः यह मन्त्र स्वल्प ज्ञान वालों की सुविधा के लिए बड़ा उपयोगी है।
(श्री लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ संपादक ‘खत्री-हितैषी)
यों तो ‘गुणमय, दोषमय कीन्ह विश्व करतार’ कथन ठीक है- सर्वांगपूर्ण, सर्वांगीण, सुन्दर, सर्वांग उपयोगी जो कोई भी वस्तु है संसार में ईश्वर के अतिरिक्त नहीं हैं, किन्तु रुपया में पन्द्रह आने लाभ पहुंचाने वाली वस्तुयें ‘लाभ प्रद’ कहलाती हैं यही संसार का नियम है। धूप में रहने से यदि रंग काला हो जाता है, इससे फैशनेबल लोग धूप से दूर भागते हैं। भागा करें। भले ही दोपहर की धूप रंग काला कर दे, पर प्रातःकाल की धूप तो रंग भी काला नहीं करेगी। निर्धनों का कम से कम दिन का तो जाड़ा सूर्य भगवान की कृपा से ही पार होता है-भारत गर्म देश है यहाँ हम धूप और सूर्य की भले ही परवाह न करें, किन्तु संसार के ठंडे प्रदेशों के निवासियों से इसकी महत्ता पूछी जाय तो वे बतावेंगे कि यह कैसा अमृत है।
यह साधारण बात तो कोई भी जानता है कि बिना सूर्य की गर्मी और प्रकाश के पेड़-पौधे, कीट-पतंग, मनुष्य, पशु-पक्षी कोई ही जीवित नहीं रह सकता। किन्तु सूर्य का प्रकाश और धूप किस प्रकार रोगों को भगाने और स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायता देता है, यदि हम जान जायं तो हमारा बहुत लाभ हो। संभव है आपको यह सुनकर हँसी आवे कि-धूप भी एक प्रकार का भोजन है। जल, वायु और आकाश तत्व से प्राण तत्व और भोजन योगी जन तथा वह मनुष्य प्राप्त करते हैं जिन्होंने अपने शरीर को प्राकृतिक ढंग पर चल कर निताँत शुद्ध कर लिया है, पर धूप से भी वे लोग भोजन ग्रहण कर लेते हैं। एक प्राकृतिक चिकित्सक ने मुझको बताया कि जब उन्हें भूख लगती है तो वह काफी देर धूप में बैठ जाते हैं और उनकी भूख बहुत कुछ कम हो जाती है। खैर इतनी बड़ी बात आप जाने दें। पर डाक्टरों के इस सिद्धान्त को भी सभी मानते हैं कि धूप और प्रकाश से बढ़कर अधिक सफल कीटाणु-नाशक कोई वस्तु नहीं है। वर्तमान समय में जब देश का स्वास्थ्य गिरा हुआ है तब तो धूप और प्रकाश हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है। आइये पहले हम यह समझें कि धूप कब कैसे लेनी चाहिए-
(1) प्रातःकाल के निकलते सूर्य की प्रथम रश्मियाँ (अल्ट्रा वायलेट रेज) स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद हैं। उससे घटिया सायंकाल के समय डूबते हुए सूरज की किरणें हैं। सूर्य की किरणें नंगे बदन लेना चाहिए। स्त्रियाँ यदि नंगे बदन न ले सकें तो एक बहुत पतला या भीगा कपड़ा पहन लें। अब तो सूर्य-चिकित्सा-विज्ञान के आधार पर अनेक रोगों की सफल चिकित्सा हो रही है। सूर्य की धूप से रंगीन शीशों आदि का तैयार किया हुआ वैज्ञानिक ढंग से पानी तथा सेल आदि अनेक रोगों को दूर करने में समर्थ हुआ है।
(2) जाड़े के दिनों में दस बजे से पहले और गर्मी में आठ बजे से पहले धूप-स्नान कर लें। सर्दी के दिनों में भले ही दोपहर को धूप लें। पर ऐसे समयों में पैर घुटने तक कपड़े से ढके रहें और चेहरा हरे पत्तों से या कम से कम कपड़े से ढ़का रखें। करवट लेते रहे ताकि सारे शरीर में धूप लगे। पाँच मिनट से प्रारम्भ करके एक घंटे तक या और अधिक तक बढ़ा सकते हैं। शरीर से तेजी से पसीने द्वारा विकार निकलता है और रोम-कूप खुल जाते हैं। (फिर स्नान कर लें।) चर्म रोगों में जैसे खाज, दाद, उकौता आदि में तथा स्नायु-दुर्बलता तथा शारीरिक कमजोरी में धूप कभी भी न लें। अस्थि-क्षय में यह राम बाण है। पर फेफड़े के क्षय में रोगी सीधी धूप कभी भी न लें। वह कम ही लें। क्योंकि धूप से रोगों का उभार तेजी से होता है। विशेष कर जिन्हें बीमारी तेजी पर हो या जिन्हें एक बार भी खून आ गया है, ऐसे क्षयी, सीधी धूप से, कम से कम तेज धूप से बचें। वे प्रातः की रश्मियों का सेवन कर सकते हैं- वह भी धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ा कर। प्रखर सूर्य किरणों से तो स्वस्थ मनुष्य को भी बचना चाहिए।
यह जानना भी आवश्यकता है कि धूप कब न लें-
(1) तेज हवा चलती हो, बदली हो, पाला हो उस दिन धूप-स्नान स्थगित रखें। बहुत सर्दी हो तो एक हल्का कपड़ा पहन सकता है।
(2) खाना खाने के बाद कम से कम एक घंटे तक धूप न लें।
(3) नहाने के भी तुरन्त बाद धूप न लें। 10-15 मिनट गुजर जाने दें।
(4) एनीमा लेने के 10-15 मिनट तक धूप न लें। वैसे ही धूप के 15-20 मिनट तक एनीमा न लें।
(5) दोपहर की प्रखर धूप से बचें।
विटामिन डी तो शरीर में अपने आप धूप में बैठने से उत्पन्न हो जाता है। सरसों का तेल यदि धूप में रख कर गर्म कर लें और फिर धूप में शरीर में मले तो विटामिन डी पैदा हो जाता है। यही कारण है कि माताएं शिशुओं के शरीर में धूप में उन्हें लिटाकर कड़ुवा तेल मलती हैं। विटामिन डी की कमी से हड्डी और दाँत सम्बन्धी रोग, हड्डी का टेढ़ा हो जाना (रिकेट) दाँतों का ठीक समय पर न निकलना, सूखा रोग, जुकाम, मृगी, हिस्टीरिया, पीलिया, दाद, खुजली, उकौता, हृदय रोग, क्षय, इन्फ्लुएंजा, निमोनिया आदि रोग हो जाते हैं। निर्धन मनुष्य भले ही दवा आदि तथा उन पदार्थों का प्रयोग करने में समर्थ न हों जिनसे विटामिन डी उसे प्राप्त हो, पर धूप और धूप में तेल-मालिश में तो कुछ खर्च नहीं होता। अतः धनी, निर्धन, युवा, बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी को धूप और प्रकाश का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए। हमारे यहाँ सूर्य नमस्कार सूर्य-पूजा आदि इसी से महर्षियों ने प्रचलित की। सूर्योदय के पूर्व नहा धोकर निकलते सूर्य को जल चढ़ाने की धार्मिक प्रथा है। उसके अन्दर यही अल्ट्रावायलेट-रेज के नाम वाली बात छिपी है।
(श्री पं. तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन)
पतिभिर्भ्रातृ भिश्चैताः पतिभिदवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्चबहुकल्याणमीप्सुभिः॥
मनु. 3।55॥
विरोध कल्याण के इच्छुक माँ, बाप, भाई, पति और देवरों को चाहिए कि स्त्रियों का पूजन (सत्कार) करें, वस्त्राभूषण से भूषित करें॥55॥
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फलाः क्रिया॥ 56॥
जिस कुल में स्त्रियों का आदर होता है उस कुल पर देवता प्रसन्न रहते हैं और जहाँ अपमान होता है वहाँ सब कर्म निष्फल होते हैं॥56॥
शोचन्तिजामयो यत्र बिनश्यन्याशु तत्कुलम्।
नशोचन्तितुयत्रैतावर्धते तद्धिसर्वदा ॥ 57॥
जिन कुल में स्त्रियाँ क्लेश भोगती हैं वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। जहाँ क्लेश न पाकर आराम पाती हैं वह कुल सब प्रकार से बढ़ता रहता है।
तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः॥
भूति कामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषुच॥59॥
इसलिए ये स्त्रियाँ सदा भूषण वसन भोजन से संतुष्ट करने योग्य हैं कल्याण की कामना वाले पुरुषों को मंगल कार्य और उत्सवों में संतुष्ट रखना उचित है।
संतुष्टोभार्ययाभर्त्ताभर्त्रामार्या तथैव च।
यस्मि न्नेवकुलेनित्यं कल्याणंतत्रवैध्रुवम्॥60॥
जिस कुल में स्त्री से स्वामी और स्वामी से स्त्री प्रसन्न रहती है उस कुल में सदा कल्याण होता है।
जामयोयानि गेहानि शपन्त्य प्रतिपूजिताः।
तानिकृत्याहतानीव विनश्यन्तिसमन्ततः॥58॥
जहाँ जामि (पत्नी-कन्या-पुत्र वधू) का आदर नहीं होता वह जिस कुल को शाप दे देती है वह अभिचार अथवा कृत्या (मारणादिक) के समान चारों ओर से नाश हो जाता है॥58॥
मातरं पितरं वृद्धं भार्या साध्वीं सुतं शिशुम्।
गुरुविप्रं प्रपन्न च कल्पोऽविभ्रच्छवसन् मृतः॥
(भा. 10।45।17)
वृद्ध माता-पिता, पतिव्रता स्त्री, बालक पुत्र, गुरु और शरणागत विप्र इन का जो पालन नहीं करता है वह जिन्दा होता हुआ मृतक के तुल्य है।
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
लड़के सो लड़के थे यह भी नहीं देखते कि किसी को किस मौके पर चिढ़ाना चाहिए और किस मौके पर नहीं। पंडित रामकृष्ण के यहाँ आज मेहमान आये थे और वे अपने मेहमान के साथ बाजार से लौट रहे थे कि लड़को ने चिल्लाकर कहा- पंडित जी, राधेश्याम।
पंडित जी जरा बिगड़ कर बोले- क्या बकते हो? उस चोर का नाम क्यों लेते हो? राम-राम कहो, राम-राम!
लड़कों ने और जोर से चिल्लाया कहा- राधेश्याम- राधेश्याम।
पंडित जी कहते रहे मूर्खों! नासमझों! क्या बकते हो आदि। और लड़के चिल्लाते रहे ‘राधेश्याम-राधेश्याम’। इस युद्ध में पंडित जी पराजित हुए और वे चल दिये। लड़के तब तक चिल्लाते रहे जब तक उनकी आवाज पंडित जी के कानों में पहुँच सकती थी। और पंडित जी जाते-जाते तब तक मुंह फिरा कर धमकाते रहे जब तक उनके चेहरे की आकृति लड़कों को दिखाई दे सकती थी।
घर पहुँच कर मेहमान ने पूछा- आप तो वैष्णव हैं, ‘राधेश्याम’ कहने से चिढ़ते क्यों हैं?
पंडित जी ने हँसते-हँसते कहा-चिढ़ता नहीं हूँ किसी तरह लड़कों से राधेश्याम कहलाना चाहता हूँ, भगवान का नाम लेने से विचारों की मुक्ति हो जायगी।
मेहमान ने कहा- वे तो आप को चिढ़ाने के लिये राधेश्याम कहते हैं भगवान का नाम लेने का तो उन्हें ख्याल भी नहीं होता, तब कैसे उनकी मुक्ति हो जायगी।
पंडित जी ने कहा- आप को क्रिया-माहात्म्य का पता नहीं है।
मेहमान चुप रहे।
पंडित जी बड़े गौभक्त थे। उनने घर में एक गाय रख छोड़ी थी और बड़े जतन से वे उस की सेवा किया करते थे। उस के खाने-पीने आदि की पूरी व्यवस्था किये बिना वे सोते नहीं थे।
मेहमान ने कहा- गौ-सेवा के पुण्य में आज मुझे भी हाथ बटाने दीजिए।
पंडित जी ने खुशी से स्वीकृति दे दी। मेहमान ने गाय के बाँधने की जगह की खूब सफाई की और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था करके गाय को बाँध दिया।
जब सवेरे पंडित जी उठे तो उन ने देखा कि गाय को बाँधने का रस्सा इतना छोटा कर दिया गया है कि गाय सिर भी नहीं उठा सकती। पंडित जी को बड़ा रंज हुआ। उनने मेहमान से पूछा-आप ने गाय का रस्सा इतना छोटा क्यों कर दिया? बेचारी का रात भर सिर झुका रहा।
मेहमान ने कहा- मैंने सोचा इस प्रकार सिर झुकाने से नम्रता या विनय की तपश्चर्या होगी और इस तपश्चर्या से परमात्मा अवश्य खुश होगा।
पंडित जी ने कहा- इस प्रकार तो गाय का प्राण भी निकल जायगा तब भी तपस्या न होगी। बिना समझे कहीं कोई तपस्या होती है?
मेहमान ने आश्चर्य से कहा-आप तो क्रिया- माहात्म्य रातभर में ही भूल गये।
अब की बार पंडित जी को चुप रहना पड़ा।
इस बातचीत का दुष्परिणाम यह हुआ कि जब लड़के चिढ़ाते हैं पंडित जी ध्यान ही नहीं देते। इस प्रकार एक चहल-पहल ठंडी पड़ गई है और इस से बहुतों का मनोरंजन छिन गया है।
(पं. परमानन्द पन्त, रानीखेत)
अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं-”क्या करें, हमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा है, हमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा। यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?”
ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।
सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है। जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं है, प्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।
रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो। सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयों, बाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।
जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।
इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए, जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि “हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होती, इसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?
बाधाएं, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैं, बिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।
(श्री ज्वाला प्रसाद मिश्र)
मेरा आँगन, मेरा आँगन-मेरा आँगन, मेरा आँगन।
मेरे इस नन्हें से घर का उन्मुक्त हृदय, यह चिर पावन।
दिखने को दिखता है यद्यपि यह आज जरा रीता-रीता,
पर कौन कहे इसमें मेरा कितना मधुमय बचपन बीता,
मैं कितनी बार यहाँ हारा, मैं कितनी बार यहाँ जीता,
मेरा नन्हा सा कुरुक्षेत्र, मेरी यह नहीं सी गीता,
मेरा आँगन, यह कभी रहा मेरे बचपन का समराँगण।
मेरा आँगन, मेरा आँगन॥
जग से असीम को सीमित सा देखा इसके सीमित तन में,
उसने अनन्त का आदि अन्त पाया घर के इस आँगन में,
वह निराकार साकार हुआ शिशु में भोले से बचपन में,
अव्यक्त व्यक्त हो बोल उठा, उसके अटपट तुतलेपन में,
नर होकर इसकी गोदी में खेले जीवन भर नारायण।
मेरा आँगन, मेरा आँगन॥
उग उठी दूब आँगन में, जाने किसका बचपन लहराया,
खिल पड़े सुमन आँगन में, जाने कौन यहाँ आ मुस्काया,
प्रकटी रवि किरणें आँगन में, नभ किसके पद छूने आया,
चिड़ियाँ चहकीं आँगन में किसने किसका आज विरुद गाया?
मच रहा महोत्सव आँगन में हर घड़ी विपल प्रतिपल प्रतिक्षण।
मेरा आँगन, मेरा आँगन॥
जग ने इसमें चलना सीखा घुटनों के बल पैरों के बल,
गिर-गिर कर उठता रहा यहीं प्रतिफल जीवन भर नर-निर्बल,
हो गया अनेकों बार विफल, हो गया अनेकों बार विफल,
उसके पद-चिह्नों को लेकर विस्तृत है इसका वक्षस्थल,
है धड़कन रही इसके दिल में उस मानव के उर की धड़कन।
मेरा आँगन, मेरा आँगन॥
-युगाँतर
*समाप्त*