(1) गायत्री विज्ञान- गायत्री शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन तथा परिचय, गायत्री की सरल, सुबोध एवं नित्य करने योग्य साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या- गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। मूल्य 2 रु 0/
(2) गायत्री रहस्य- गायत्री मन्त्र के चौबीसों अक्षरों की ऐसी विस्तृत व्याख्या, विवेचना एवं मीमाँसा की गई है कि उनके गर्भ में छिपे हुये ज्ञान भंडार का परिचय भली प्रकार प्राप्त हो जाता है। अनेकों ऋषियों ने, शास्त्रों में, वेद भाष्यकारों ने, राक्षस राज रावण ने गायत्री के जो विभिन्न अर्थ किये हैं वे सब भी इस पुस्तक में मौजूद हैं। मूल्य 2 रु 0/
(3) गायत्री के अनुभव- वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में वर्णित गायत्री की महिमा तथा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के महापुरुषों ने गायत्री के संबंध में जो आपने अनुभव और अभिमत प्रकट की हैं उन सबका इस पुस्तक में वर्णन है। साथ ही अनेक साधकों ने गायत्री की उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये है, उनके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये है। मूल्य 2 रु 0/
(4) गायत्री मन्त्र- गायत्री मन्त्र को ‘मन्त्र राज’ कहा है। उससे बड़ा कोई मन्त्र नहीं है। जो कार्य संसार के अन्य किसी भी मन्त्र से हो सकता है वह गायत्री मन्त्र से भी हो सकता है। इस पुस्तक में दक्षिण मार्गी वेदोक्त, तथा वाम मार्गी तंत्रोक्त दोनों प्रकार की विस्तृत विधियाँ बताई गई हैं जिनके द्वारा सात्विक, राजस और तामसिक तीनों ही प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। पुरश्चरण, अभिचार, कवच कीलक, मारण, सम्मोहन आदि सभी साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है। मूल्य 2 रु 0/
(5) गायत्री योग- गायत्री द्वारा 12 योगों की साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यान योग, सूर्ययोग, प्रणवयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नाद योग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। मूल्य 2 रु 0/
108 गायत्री सेट कम मूल्य में
इस मास चैत्र की नवदुर्गाओं में एक गायत्री उपासक (जिसने अपना नाम छापने की मनाई कर दी है) ने अपनी विशेष कामना पूर्ति के उपलक्ष्य में गायत्री पुरश्चरण किया है। तथा 324 रु 0/ अखण्ड ज्योति कार्यालय को इस लिए भेजे हैं कि गायत्री के अमूल्य 5 ग्रन्थ रत्न 10 रु 0/ के स्थान पर 7 रु 0/ में 108 सज्जनों को दिये जायं। पिछली बार की भाँति एक मास के भीतर ही वह सुविधा समाप्त हो जाने की संभावना है। इसलिए जो सज्जन इस सुविधा से लाभ उठाना चाहे शीघ्र ही पुस्तक मँगा लें।
जिनके पास गायत्री के अधूरे सेट हैं वे सज्जन भी शेष पुस्तकें इसी सुविधा के अनुसार (प्रति पुस्तक 1 रु 0/ के हिसाब से) मँगा सकते हैं। पर यह ध्यान रहे 6 रु 0/ से कम की पुस्तकें लेने वाले को डाक खर्च भी देना पड़ता है।
व्यवस्थापक-
‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) एक अंक का।)
सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य
(श्री राम)
सुनलो सर्वस्व धर्म का यह, सुन कर तुम उस पर ध्यान धरो।
जो अपने लिये अहितकर हो औरों के लिये कभी न करो॥
जीवन की यही सफलता है, देही देही का श्रेय करे।
धन से, मन से, बचनों से क्या प्राणार्पण से भी नहीं टरे॥
हैं ग्रन्थ पुराण अठारह जो उसमें दो बाते व्यास कहें।
उपकार किये से पुराण मिले पर पीड़न से तो पाप लहें॥
श्रुतियों में भी स्मृतियों में भी मतभेद दिखाई देते हैं
मुनि एक नहीं जिनके मतको केवल प्रमाण में लेते हैं॥
है तत्व धर्म का बहुत गूढ़ जिसको हम नहीं जानते हैं।
हाँ,श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्ग चलें उसको सन्मार्ग मानते हैं॥
विद्या धन शक्ति मिले दुर्जन करते विवाद मद पीड़ा हैं।
पर सज्जन ज्ञान दान रक्षा करने का लेते बीड़ा हैं॥
-अशोक
मृत्यु से डरने की कोई बात नहीं । जैसे नया वस्त्र पहनने में, नई जगह जाने में, स्वभावतः एक प्रसन्नता होती है वैसे ही प्रसन्नता मृत्यु के संबंध में भी होनी चाहिए। आत्मा एक यात्री के समान है। उसे विविध स्थानों, व्यक्तियों, परिस्थितियों के साथ संबंध स्थापित करते हुए वैसी ही प्रसन्नता होनी चाहिए जैसी कि सैर सपाटा करने के लिए निकले हुए सैलानी लोगों को होती है।
मरने से डरने का कारण हमारा अज्ञान है। परमात्मा के इस सुन्दर उपवन में एक से एक मनोरम वस्तुएं हैं। यह यात्रियों के मनोरंजन की सुव्यवस्था है, पर वह यात्री जो इन दर्शनीय वस्तुओं को अपनी मान बैठता है, उन पर स्वामित्व प्रकट करता है, उन्हें छोड़ना नहीं चाहता, अपनी मूर्खता के कारण दुख का ही अधिकारी होगा। इस संसार का हर पदार्थ, हर परमाणु तेजी के साथ बदल रहा है। इस गतिशीलता विकास और विनाश का क्रम टूट जाये तो यह संसार एक निर्जीव जड़ पदार्थ बनकर रह जायगा। यदि इसे आगे चलते रहना है तो निश्चय ही उत्पादन, परिवर्तन और नाश का क्रम अनिवार्यतः जारी रहेगा। शरीर चाहे हमारा अपना हो, अपने प्रियजन का हो, उदासीन का हो या शत्रु का हो निश्चय ही परिवर्तन और मृत्यु को प्राप्त होगा। जब जिस समय हम चाहें तभी वे शरीर नष्ट हो ऐसा नहीं हो सकता। प्रकृति के परिवर्तन, कर्म बंधन, ईश्वरीय इच्छा से प्रधान है, इनके आगे हमारी इच्छा चल नहीं सकती। जिसे जब मरना है वह तब मर ही जायेगा, हम उसे रोक नहीं सकते । इस जीवन मृत्यु के अटल नियम को न जानने के कारण ही मृत्यु जैसी अत्यंत साधारण घटना के लिए हम रोते चिल्लाते, छाती कूटते भयभीत होते और दुख मनाते हैं।
जिसे जीवन का वास्तविक स्वरूप मालूम हो गया है उसे न अपनी मृत्यु में कोई दुख की बात प्रतीत होती है और न दूसरों की मृत्यु का कष्ट होता है। किसी विशाल नगर के प्रमुख चौराहे पर खड़ा हुआ व्यक्ति देखता है कि प्रति क्षण असंख्यों व्यक्ति अपने कार्यक्रम के अनुसार इधर से उधर आते जाते हैं। वह स्वयं भी कहीं से आया है और कहीं जा रहा है केवल कुछ क्षण के लिए चौराहे का कौतूहल देख रहा है। इस अपने या दूसरों के आवागमन पर यदि वह व्यक्ति दुख माने या विलाप करे तो उसे अविवेकी ही कहा जायेगा। संसार के विशाल चौराहे पर भी ऐसे ही आवागमन की भीड़ लग रही है। एक की मृत्यु ही दूसरे का जन्म है, एक का जन्म दूसरे की मृत्यु है। एक सुख दूसरे का दुख है और दूसरे का दुख, एक का हर्ष। यह आँख मिचौनी, यह भूल-भुलैया, विवेकवानों के लिए एक चित्ताकर्षक विनोदमयी क्रीड़ा है, पर बाल बुद्धि के व्यक्ति इसमें उलझ जाते हैं और इस कौतूहल को कोई महान आपत्ति मानकर सिर धुनते, रोते बिलबिलाते और पश्चाताप करते हैं।
मृत्यु के दुख में शरीरों का नष्ट होना कारण नहीं वरन् जीवन के वास्तविक स्वरूप की जानकारी होना ही कारण है। ऐसे कितने ही बलिदानी वीर हुए है जो फाँसी की कोठरी में रहते हुए दिन दिन अधिक मोटे होते गये, वजन बढ़ता गया और फाँसी के फंदे को अपने हाथ गले से लगाया और खुशी के गीत गाते हुए मृत्यु के तख्ते पर झूल गये। कवि ‘गंग‘ को जब मृत्यु दंड दिया गया और उन्हें पैरों तले कुचल डालने को खूनी हाथी छोड़ा गया तो वे प्रसन्नता से फूल उठे, उन्होंने कल्पना की कि देवताओं की सभा में कोई छंद बनाने वाले की आवश्यकता हुई है इसलिए भक्त कविगंग को लेने के लिए हाथी रूपी गणेश आये हैं। कितने ही महात्मा समाधि लेकर अपना शरीर त्याग देते हैं। उन्हें मरने में कोई अनोखी बात दिखाई नहीं पड़ती।
कई व्यक्ति सोचते हैं कि मरते समय भारी कष्ट होता है, इसलिए उस कष्ट की पीड़ा से डरते हैं। यह भी मृत्यु समय की वस्तु-स्थिति से जानकारी न होने के कारण है। आमतौर से लोग मृत्यु से कुछ समय पूर्व बीमार रहते हैं। बीमारी में जीवनी शक्ति घटती जाती है और इन्द्रियों की चेतना शिथिल पड़ती जाती है इस शिथिलता के साथ-साथ ज्ञान तंतु संज्ञा शून्य होते जाते हैं फलस्वरूप दुख की अनुभूति भी पूरी तरह नहीं हो पाती । प्रसुता स्त्रियाँ या लंघन के रोगी गर्मी की ऋतु में रात को भी अक्सर बंद घरों में सोते हैं पर उन्हें गर्मी का वैसा कष्ट नहीं होता जैसा कि स्वस्थ को होता है। स्वस्थ मनुष्य रात को बन्द कमरे में नहीं सो सकता पर रोगी सो जाता है। कारण यह है कि रोगी के ज्ञान तंतु शिथिल हो जाने के कारण गर्मी अनुभव करने की शक्ति मंद पड़ जाती है, रोगियों को स्वाद को भी ठीक अनुभव नहीं होता, स्वादिष्ट चीजें भी कड़ुई लगती हैं क्योंकि जिह्वा के ज्ञान तंतु निर्बल पड़ जाते हैं। रोग जन्य निर्बलता धीरे-धीरे इतनी बढ़ जानी है कि मृत्यु से कुछ समय पूर्व मनुष्य संज्ञा शून्य हो जाता है और बिना किसी कष्ट के उसके प्राण निकल जाते हैं। जो कुछ कष्ट मिलना होता है रोग काल में ही मिल लेता है। डॉक्टर लोग जब कोई बड़ा आपरेशन करते हैं तो रोगी को क्लोरोफार्म सुँघाकर बेहोश कर देते है ताकि उसे कष्ट न हो। दयालु परमात्मा भी आत्मा से शरीर को अलग करने का आपरेशन करते समय संज्ञा शून्यता का क्लोरोफार्म सुँघा देता है ताकि हमें मृत्यु का कष्ट न हो।
यह सभी जानते हैं कि कोई रोगी जब मरने को होता है तो मृत्यु से कुछ समय पूर्व उसकी बीमारी कम हो जाती है। कष्ट घट जाता है। तब अनुभवी चिकित्सक समझ जाते हैं कि अब रोगी का अन्त समय आ गया। कारण यह है कि बीमारी के कारण रोगी की जीवनी शक्ति चुक जाती है और ज्ञान तन्तु रोग को प्रकट करने एवं कष्ट अनुभव करने में असमर्थ हो जाते हैं। यह मान्यता भ्रम पूर्ण है कि गर्भ काल में, माता के उदर में और मृत्यु के समय प्राणों को अधिक कष्ट होता है। दोनों ही दशाओं में मस्तिष्क अचेतन व्यवस्था में और ज्ञानतन्तु संज्ञाशून्य व्यवस्था में रहने के कारण प्राणों को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता । ऐसी दशा में मृत्यु के कष्ट से डरने का कोई कारण नहीं रह जाता।
अनावश्यक मोह ममता ही मृत्यु भय का प्रधान कारण है। हम कर्तव्य से प्रेम करने की अपेक्षा वस्तुओं से मोह करने लगते हैं। हमारा प्रेम, कर्तव्य भावना में संलग्न न रह कर शरीर, सम्पत्ति आदि में लग जाता है। प्रिय वस्तु के हाथ से जाने में कष्ट होता ही है इसलिए मरने का भी दुख होता है। यदि आरम्भ से ही यह मान कर चला जाये कि हमारे अधिकार या संबंध में जो भी शरीर या पदार्थ है वे प्रकृति के परिवर्तन धर्म के कारण किसी भी समय बदल, बिगड़ या नष्ट हो सकते हैं तो उनसे अनावश्यक मोह ममता जोड़ने की भूल न हो। तब मनुष्य यह सोचेगा कि संसार में सबसे अधिक प्रिय, सबसे अधिक आत्मीय, सबसे अधिक लाभदायक अपना कर्तव्य है। उसी से पूरा-पूरा प्रेम किया जाये। इस प्रेम को जितना अधिक बढ़ाया जा सके बढ़ाया जाये, इस प्रेम से जहाँ रत्तीभर भी बिछोह हो वहाँ दुख माना जाये तो यह प्रेम अत्यंत सुख−शांति को देने वाला और कभी नष्ट न होने वाला बन आयेगा। जो कर्तव्य पालन को अपना लाभ समझेगा उसे हानि का दुख न उठाना पड़ेगा। कारण यह है कि अपना प्रेमी ‘कर्तव्य’ सदा अपने साथ है, उसे कोई भी शक्ति, हमारी इच्छा के विपरीत हमसे नहीं छीन सकती । इसी प्रकार जब हमारे लाभ का केन्द्र बिन्दु हमारा ‘कर्तव्य’ है तो उसमें घाटा पहुँचाने वाला हमारे अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता। हमारे प्रेम और लाभ जब पूर्णतया हमारे हाथ में है तब बिछोह या हानि जन्म दुखों के सामने आने का कोई कारण नहीं रह जाता। दूसरों की मृत्यु-प्रेमियों और पदार्थों की मृत्यु का दुख हम सभी में तभी दूर रह सकता है जब हम मिथ्या मोह ममता को छोड़ कर कर्तव्य से प्रेम कर और उसी को अपनी सम्पत्ति समझकर विवेक से काम करें
अपनी मृत्यु में दुख भी इसी बात का होता है कि जीवन जैसे बहुमूल्य पदार्थ का सदुपयोग नहीं किया गया। आलस्यवश देर में स्टेशन पहुँचने पर जब रेल निकल जाती है और उस दिन नियत स्थान पर न पहुँच सकने के कारण जो भारी क्षति हुई उसका विचार कर करके वह आलसी मनुष्य स्टेशन पर खड़ा हुआ पछताता है और अपने आपको कोसता है। मृत्यु के समय भी ऐसा ही पश्चाताप होता है जब कि मनुष्य देखता है कि मानव जीवन जैसी बहुमूल्य सम्पत्ति को मैंने व्यर्थ की बातों में गँवा दिया, उसका सदुपयोग नहीं किया, उससे जितना लाभ उठाना चाहिए था वह नहीं उठाया । यदि हम जीवन के क्षणों का सदुपयोग करें उसकी एक घड़ी को केवल आत्म लाभ के, सच्चे स्वार्थ के लिए लगावें तो चाहे आज चाहे कल जब भी मृत्यु सामने आवेगी किसी प्रकार का पश्चाताप या दुख न करना पड़ेगा।
गायत्री का आरंभिक पद ‘तत्’ हमें यही शिक्षा देता है कि मृत्यु से डरो मत, उससे न डरने की कोई बात नहीं। डरने की बात है हमारा गलत दृष्टिकोण, गलत कार्यक्रम। यदि हम अपने कर्तव्य पर प्रति क्षण सजगता पूर्वक आरुढ़ रहें तो न हमारी न किसी दूसरे की मृत्यु हमारे लिए कष्ट कारक होगी।
(श्री दौलतराम कटरहा वी. ए. दमोह)
मनुष्य की असंतुलित, स्वार्थमय संकीर्ण विचारधारा का कारण उसका अहंभाव है। उसका ‘अहं एवं उसकी जीवित रहने की इच्छा उस की विचारधारा को प्रभावित करती है तथा उसे अपना अस्तित्व बनाए रखने की प्रेरणा होती है और इसीलिये मनुष्य बहुधा अपने के लिए ही वह धन-संग्रह करता है और व्यवहार करते समय दूसरों के प्राणों की अपेक्षा अपने प्राणों को अधिक महत्व देता । वह एक छोटे से शरीर में सीमित अपने क्षुद्र ‘अहं’ के पीछे कभी कभी विशाल जनसमूह के हितों को भी ठुकराने से नहीं हिचकता और इस तरह वह अत्यंत स्वार्थी बन बैठता है। यदि वह कभी अपने प्रियजनों का पक्ष लेता है तो इसीलिये कि वे अपने हैं। कहने का प्रयोजन यह कि उसके समस्त शुभ अथवा अशुभ कार्यकलापों का मूल उसका महत्व ही है।
इसके अतिरिक्त कुछ पुरुष ऐसे होते हैं जो सदा इस अहं का विरोध कर इसे मिटा देने का प्रयत्न करते हैं। अहं को मिटाने के लिए वे अपने सुखों की अपेक्षा दूसरों का अधिक ध्यान रखते हैं। वे दूसरों के सुख के लिए जहाँ अपने सुखों को तिलाँजलि दे देंगे वहाँ कभी कभी अपने प्राणों को भी होम डालेंगे। स्वार्थी मनुष्य पहले अपना, फिर अपने प्रियजनों का और अंत में दूसरों का ख्याल रखता है किन्तु ये लोग अपनी अहं भावना को मिटाने के लिए इस क्रम को उलट देते हैं। इनका अनुभव दूसरी ओर ही हो जाता है। किंतु इस दूसरी श्रेणी के अतिरिक्त इने गिने वे महापुरुष भी होते हैं जो कि व्यवहार करते समय न तो एक ओर ही झुक जाते है और न दूसरी ओर ही। इनकी विचार-धारा में सम्यक् संतुलन एवं निर्भीकता होती है। व्यवहार करते समय न्याय और लोकसंग्रह को दृष्टि में रखते हुए यदि उन्हें किसी व्यक्ति के विरुद्ध कार्य करना पड़ेगा तो वे उसके विरुद्ध कार्य अवश्य करेंगे और यदि स्वतः अपने हितों को त्यागना पड़ेगा तो उन्हें भी त्याग देंगे। वे अपने शरीर को इस तरह संचालित करते हैं, उसका इस तरह व्यवहार करते हैं कि उनके द्वारा समाज का अधिक से अधिक कल्याण साधन हो। ऐसे व्यक्तियों के सामने यदि कभी ऐसा प्रश्न आवे कि या तो अन्य व्यक्ति प्राण दे अथवा स्वयं ये ही अपने प्राण दें तो यदि ये देखते हैं कि इनके जीवन-धारण से अधिक कल्याण व्यक्ति अपने प्राण त्यागे और ये अपने प्राणों की रक्षा करें। यह अनिवार्य नहीं कि प्रत्येक कार्य द्वारा ये अपने अहं को मिटाने का ही अभ्यास करें। वस्तुतः जहाँ दूसरी श्रेणी के लोग अपने अहं के त्याग-रूपी जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधना में पूर्णतया निरत रहते हैं वहाँ इस तीसरी श्रेणी के लोगों को साधना की परिपक्वावस्था में अहंभाव रह ही नहीं जाता इन्हें साध्य की उपलब्धि हो जाती है और ये सिद्ध पुरुष हो जाते हैं। आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से दूसरी श्रेणी के लोग जहाँ साधन-काल में हैं वहाँ इस तीसरी श्रेणी के महापुरुष सिद्धाँत काल में हैं।
जो व्यक्ति साधन काल में रहता है वह हठ पूर्वक अनेकों वस्तुओं का परित्याग करता है। यदि वह पूर्ण वैरागी होना चाहता है तो वह कहेगा कि मैं केवल जमीन पर ही सोऊंगा, झोपड़ी में ही रहूँगा, जमीन पर ही बैठूँगा, दाल-रोटी खाऊंगा और जूते तथा छाते का उपयोग नहीं करूंगा। वह कहेगा कि मैं पलंग का उपयोग नहीं कर सकता, बड़े महलों में नहीं ठहर सकता, कुसफल पर नहीं बैठ सकता और मेवा मिष्ठान नहीं खा सकता। शायद उसे यह भय रहता है कि कहीं ऐसा करने से वह उन विषयों की मोहकता द्वारा आकर्षित होकर और विषय-सुखों में फंस कर पतित न हो जावे। इस तरह राग को त्याग करने की इच्छा से वह द्वेष का वरण कर बैठता है और शायद उसे वैराग्याभिमान भी हो जाता है। उसे यह भी भय होता है कि कहीं उन विषयों में एक आध बार भी भूल से रत होने पर उसके हृदय में उनके प्रति राग और आकर्षण गुप्त रूप से न बढ़े और इस तरह इन्द्रिय विजय का प्रश्न एक कदम और पीछे न हो जावे। इसलिए साधन काल में बहुधा साधक हठ पूर्वक प्रयत्न करता है, प्राणबद्ध होकर कार्य करता है और यदि वह त्याग का अभ्यास करता है तो बहुधा उसे त्यागाभिमान हो जाता है, यदि वह सेवा करता है तो वह अहिंसाभिमानी हो जाता है। किंतु जो व्यक्ति इन्द्रियों और मन पर विजय प्राप्त कर लेता है अथवा सिद्धाँत काल में पहुँच जाता है उसे इस तरह का कोई भय नहीं होता। यदि उसे युद्ध जैसे अकुशल कर्म में भी प्रवृत्ति होना पड़े तो भी वह इन सब लोकों को मारने में कदापि न हिचकेगा और न अहंभाव के अभाव में उसे पाप ही लगेगा। वह यह कभी न कहेगा कि मुझ अप्रतीकार करने वाले को भले ही मेरे शत्रु मार डाले पर मैं उनके विरुद्ध कभी भी हथियार न उठाऊंगा भले ही वे कौरवों और रावण जैसे ही आततायी और पाप-परायण ही क्यों न हों। वह महान त्यागी भी होता है किंतु यदि कभी उसे मिष्ठान अर्पित किया जाता है, सुकोमल-शय्या दी जाती है अथवा सुगंधित पुष्प-हार विनय एवं श्रद्धापूर्वक दिया जाता है तो वह उनका हठ-पूर्वक त्याग नहीं करता। यदि उसे कभी महल में सोना हो तो वह आध्यात्मिक पतन के भय से हठ-पूर्वक वहाँ रहना अस्वीकार न करेगा। यदि उसे बैठने के लिए कभी कुसफल दी जायेगी तो वह कुसफल पर भी बैठ जायगा, यदि आवश्यकता पड़ेगी तो वह जूते और छाते का भी उपयोग करेगा और मौका आने पर वह पैसे के छूने में भी कोई ऐतराज न मानेगा और उसका दुरुपयोग करेगा। इन वस्तुओं का उपयोग उसमें तनिक भी राग अथवा आशक्ति उत्पन्न नहीं करता क्योंकि वह इन सुन्दर पदार्थों को सुखकर तथा साग-पात, कन्द-मूल आदि जैसे साधारण पदार्थों को तथा कठोर भूमि-शय्या को दुखकर नहीं मानता। उसकी गति अवधूतों जैसी हो जाती है और वह सोना-मिट्टी, सुन्दर-असुन्दर, मृदु-कठोर, मीठी-कड़वी आदि वस्तुओं के प्रति समदर्शी भाव रखता है। सुन्दर की अप्राप्ति में वह दुखी और असुन्दर की अप्राप्ति में वह सुखी नहीं होता और न सुन्दर की प्राप्ति में सुखी और असुन्दर की प्राप्ति में दुखी ही होता है। इन द्वन्द्व समुदायों में से न तो वह किसी को दूसरे की अपेक्षा विशेष हितकर और न पहले की अपेक्षा अधिक अहितकर ही समझा है। वह जानता है कि जहाँ तक इन द्वन्द्वों का इन्द्रियों से सम्बन्ध है वहाँ तक वे सुन्दर-असुन्दर और सुखद-दुखद हैं किंतु इन्द्रियों, मन और बुद्धि से परे आत्मा के सामने भले बुरे के ये भेद अत्यन्त तुच्छ हैं। अतएव वह आत्मा में ही रमण करने वाला, अंतर्मुखी, अन्तः सुखी, अन्तराराम और अंतर्ज्योति हो जाता है और इसलिए प्रकृति की इन द्वैत-मयी वस्तुओं में वैषम्य न देखते हुए वह उन्हें समत्वभाव से ही देखता है। उसकी विचार-पद्धति भय रहित होती है वह समत्व बुद्धि-युक्त होता है अतएव उसकी विचारधारा संतुलित होती है।
साधन काल में मनुष्य विषय पाश में फंसने से डरता रहता हैं अतएव वह उन विषयों से सम्बन्धित विषयों पर कभी कभी निर्भयतापूर्वक न तो सोच ही सकता है और न आचरण ही कर सकता है। भय-पूर्ण विचार धारा के कारण वह कई बार अपने कर्तव्य का निर्णय ठीक ठीक नहीं कर सकता अतएव कर्तव्य-च्युत हो जाता है। उसकी बुद्धि अर्जुन के समान ही लड़खड़ाने लगती है और ऐसे समय में उसे सिद्धान्त-काल में पहुँचे हुए कृष्ण जैसे महात्मा की सिद्धान्त-काल में पहुँचे हुए महापुरुष की विचारपद्धति पूर्ण तथा संतुलित और निर्भीक होती है। उदाहरण के लिए महात्मा भीष्म को ही लीजिए जब महात्मा भीष्म ने अम्बा और अम्बालिका से विवाह करना अस्वीकार किया और उन्होंने भगवान परशुराम की सहायता माँगी तब परशुराम जी ने भीष्म को समझाकर देखो पत्नी के रहते हुए भी भगवान शंकर कामासक्त नहीं हैं और न पत्नी ही उनके लिए बंधन का कारण हैं। इसलिए भगवान शंकर का अनुकरण कर तुम भी विवाह करलो। तुम्हें दोष न लगेगा। इस पर महात्मा भीष्म ने कहा कि भगवान शिव कामजयी हैं किन्तु मैं तो काम से डरने वाला हूँ। भले ही भगवान परशुराम को निरुत्तर करने के लिए महात्मा भीष्म ने ऐसा उत्तर दिया हो किन्तु इसमें संदेह नहीं कि साधनावस्था में मनुष्य भीष्म के समान ही डरता रहता है और उसे विशेष सतर्क रहना पड़ता है किन्तु सिद्धान्त- काल में अभ्यास में प्रतिष्ठित हो जाने पर वह इस तरह के प्रासक्ति सम्बन्धी भय और संशयों से पूर्णतया विमुक्त हो जाता है, उसकी विचारधारा संतुलित होती है।
धर्म का मार्ग अलग है, और भोग का मार्ग अलग। एक श्रेय है, दूसरा प्रेय। श्रेय को ग्रहण करने वाला कल्याण पाता है। प्रेय को ग्रहण करने वाला अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं करता। बुद्धिमान् श्रेय को चुनता है, परन्तु मूर्ख लोभवश प्रेय को पसन्द करता है।
किसी समय एक चोर ने न्यायाधीश के समक्ष अपनी चोरी की सफाई देते हुए इस भाँति कहा हुजूर मैंने चोरी तो अवश्य की है, परन्तु सच्चा अपराधी मैं नहीं हूँ। मेरे पड़ोसी ने अपना सोने का चमकदार कंठा दिखाकर मेरे मन को मोहित कर लिया और मुझे उसको चुरा लेने के लिए लाचार किया। अतएव सच्चा अपराधी वही है और सजा उसी को होनी चाहिए। अपराधी की ये बाते सुनकर जज साहब को उसकी युक्ति पर हँसी आ गई उन्होंने अपराधी को एकान्त वास की सजा देकर कहा कि अब तुम्हारा मन लुभाने के लिए तुम्हारे सामने कोई मनुष्य न आवेगा।
यदि सच पूछा जाये तो नैतिक संसार में मनुष्य प्रतिदिन इसी प्रकार की युक्तियों का उपयोग करता रहता है। अमुक मनुष्य मेरे कार्य में बाधा डालता है, अमुख ने मुझसे ऐसी बात कहीं जिससे मुझे क्रोध आ गया, चार आदमियों में बैठते हैं तो लाचार होकर ऐसा काम करना ही पड़ता है-, इत्यादि बातें अपने दोषों को दूसरों के सिर मढ़ने के प्रयत्न नहीं तो क्या हैं?
कितना अच्छा हो यदि मनुष्य कोई अपराध करने के साथ ही उसे स्वीकार करने में आना-कानी न करे। नैतिक उन्नति की सबसे पहली सीढ़ी यही है कि मनुष्य अपने अपराधों को समझने लगें। हजारों मनुष्य तो बुरे कार्यों को करते रहते और उन बेचारों को रंच मात्र भी खबर नहीं कि ये कार्य वास्तव में बुरे हैं। जिस समय चोर चोरी को सचमुच बुरा समझने लगे उसी समय से जान लो कि अब वह रास्ते पर आ रहा है। परन्तु केवल दिखाऊ मन की इच्छा से अथवा किसी की हाँ में हाँ मिलाने के अभिप्राय से बुरे कार्य बुरा कह देने से कोई नहीं । इससे तो उलटी हानि है। कुकार्य से घृणा होने की बात तो दूर रही, ऐसा करने से तो उसने अपने आपको ही ठगा कहना चाहिए। प्रवंचना अथवा मायाजाल इसी का नाम है परन्तु देखा जाता है कि लोक में मनुष्यों ने इसे ही सभ्यता और शिष्टाचार मान रखा है। ऐसे लौकिक व्यवहार की अवहेलना करने से समाज भले ही असंतुष्ट हो जाए, परन्तु उन्नति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को इसमें आगा-पीछा न करना चाहिए।
अपने किये हुए अपराधों को दूसरों के सिर मढ़ते फिरने की कुटेव के कारण मनुष्य अपने ऐबों को नहीं देख सकता। जो कार्य उसने किया है उसका बुरा फल होने पर वह तुरन्त किसी दूसरे व्यक्ति को पकड़ने की कोशिश करने लगता है। अपने आलस्य द्वारा समय पर किये गये कार्यों की आलोचना होने पर वह अपने सिर का दोष दूसरों पर मढ़ देता है। यदि ऐसा करने के बदले वह अपने अपराध को मुक्त कंठ से स्वीकार कर ले तो संदेह नहीं कि वह दुबारा वैसा कार्य न करे।
अपने अपराध को स्वीकार करना यह उन्नति पथ के ऊपर मानों कई कदम आगे बढ़ना है। साधनों को दोष देते फिरना मूर्खता है। वास्तव में कैद का दंड देने वाला मजिस्ट्रेट नहीं है, तुम्हारे कुकार्य ही हैं। इसमें संदेह नहीं कि संसार में पाप-समृद्ध रूपी राक्षस नाना प्रकार के मनोहर रूप धारण कर मनुष्यों के चित्त को विकृत करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु उन्हें अपने हृदय में स्थान देना या न देना तुम्हारे काबू में है। जिस प्रकार भूतों का भय दृढ़चित्त मनुष्यों के हृदय में फटकने भी नहीं पाता उसी प्रकार सच्चरित्र मनुष्यों के पास आने में पाप-वासनाओं को भी बड़ा डर लगता है। लालच उसी के लिए है जो लालची है। निर्लोभी व्यक्ति को वह अपने फंदे में कभी नहीं फँसा सकता । अतएव इन कुवासनाओं को धिक्कारना और दोष देना निरर्थक है। मनुष्य की दृष्टि को भी हित करने वाले पाप-समूह की संसार में क्या आवश्यकता थी। भोले-भाले शुद्ध-हृदय मनुष्य को ठगना और उसे चक्कर में फंसाना निदान उसकी निन्दा करना और उसे दंड-पात्र ठहराना यह तो दुष्टों का माया-पूर्ण षड्यंत्र जंचता है। वास्तव में विचार करने से मालूम होता है कि पदार्थों की परीक्षा करने के लिए बहुधा भय-पूर्ण स्थलों का उपयोग किया जाता है। सोने की परीक्षा करने के लिए काली कसौटी चाहनी पड़ती है। इसी भाँति मनुष्य के हृदय की परीक्षा करने के हेतु ही पाप-वासनायें संसार में विद्यमान है। देखो, जब तक तुम्हारे सामने कोई 500 रुपयों की थैली चुपचाप लाकर न रख दे तब तक तुम लोभी हो अथवा निर्लोभी, इसकी परीक्षा कैसे हो सकती है? यदि पाप न होते तो संसार में महात्मा और दुष्टों की पहचान कैसे होती। अतएव छल, अभिमान, माया, मोह इत्यादि कुवासनाओं से घेरे जाने पर अपने लिए असमर्थ मान कर उन्हें दोष का स्थान मानना मानो उन्नति के मार्ग से हटना है।
प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि वासनाओं की तपस्या कितनी कठिन है। पाप क्रोध के बुरे परिणामों के विषय में चाहे ग्रंथ के ग्रंथ लिख देने योग्य ज्ञान रखते हों, घंटों उस विषय पर व्याख्यान देकर लोगों को उनके आवेश के शमन करने की शिक्षा दे सकते हों, परन्तु जब सच्चे क्रोध का अवसर आ- उपस्थित होता है उस समय उसे संभाल लेना टेढ़ा काम है। इसीलिये किसी महात्मा का कथन है कि केवल ज्ञान के द्वारा आत्मोन्नति असंभव है। जानना और काम को कर दिखाना ये दो बातें हैं। काम-वासना को ही लीजिए पुराणों की तिलोत्तमा द्वारा ब्रह्माजी के तपो-भ्रष्ट होने की बात सभी को विदित है। पाँच हजार वर्ष तक दिव्य तप करने वाला योगी भी जिस काम-वासना को विजय न कर सका उसकी जलन का क्या ठिकाना है।
वासनाओं के अवगुणों और बुरे फलों की आलोचना करने के लिए यदि प्रतिदिन मनुष्य कोई विशेष समय नियत कर लेता उसकी नैतिक उन्नति बहुत शीघ्र हो सकती है। प्रत्येक धर्म में अपने दिन भर के कार्यों पर विचार करने के लिए सोने के पेश्तर समय निश्चित करने का उपदेश दिया गया है। उसका अभिप्राय यही है कि मनुष्य अपने नैतिक चरित्र की संभाल उसी भाँति कर लिया करे जैसे कि वह अपने दैनिक आय-व्यय किया करता है।
सन्त प्रवर महात्मा तुलसीदास की अनुभूति है- उमा जे रामचरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निल प्रभुमय देखहिं जगत कासन करहिं विरोध॥
जो भगवान को मानते हैं, उन पर श्रद्धा करते हैं, उनके अस्तित्व में विश्वास रखते हैं उनके न काम होता है, न मद् होता है और न क्रोध। वे संसार के अणु-अणु में प्रभु का दर्शन करते हैं तब उनका विरोध किसके साथ हो? तुलसीदास जी की आस्तिकता की इस परिभाषा पर किन किन आस्तिकों को आज परखा जा सकता है?
धर्म के नाम पर बड़े बड़े आडंबर करने वालों की आज कमी नहीं है, लेकिन उनके जीवन में प्रभु के दर्शन नहीं होते। ऐसा मालूम होता है जैसे जीवन के अन्य व्यापारों की तरह धर्म का भी वे एक व्यापार कर लेते हैं और सबसे अधिक उसकी कोई कीमत नहीं है।
भगवान पर मेरा विश्वास है ऐसे कहने वाले भी मिलते हैं लेकिन ये शब्द मुँह से निकलते हैं या हृदय से इसका निर्णय करना कठिन है। उनका व्यवहार रागद्वेष पूर्ण देखा जाता है और स्वयं भी उन्हें अपने विश्वास शब्द का विश्वास नहीं होता। प्रभु आज उपेक्षणीय हो गये हैं लेकिन तब भी हम आस्तिक हैं इसे बड़े जोर से चिल्लाकर कहते लोग पाये जाते हैं।
जिसके हृदय में प्रभु का निवास है और जो उसका दर्शन करता है उसका जीवन प्रभुमय होता है। उसके जीवन में समत्व होता है। वह संसार को प्रभु का विग्रह केवल मानता ही नहीं, अनुभव भी करता है। प्रभु उसके आचार में, प्रभु उसके जीवन में समा जाते हैं। वह व्यक्ति प्रभु की अर्चना के लिये किसी समय को अपने कार्यक्रम में अलग नहीं रखता। उसके जीवन का कार्यक्रम ही प्रभुमय होता है। उसका खाना पीना सोना जागना चलना फिरना तथा जगत के समस्त व्यवहारों में प्रभु समाये रहते हैं। ऐसे आस्तिक के लिए सम्प्रदायों के अलग नाम नहीं हैं, उसके लिए प्रत्येक घर प्रभु का मन्दिर है। और प्रत्येक शरीर प्रभु का विग्रह वहाँ भेदभाव की गुँजाइश ही नहीं रहती । वह संसार में भगवान की नित्य लीला का रसास्वादन करना है और स्वयं को भी भगवान की लीला का एक पात्र मात्र समझना है।
आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है, न माँग। वह न किसी से ऊंचा होता है न नीचा, न बड़ा न छोटा, न पवित्र न अपवित्र। उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं सताता ।
आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है। ऊंच नीच के भावों से भरी हुई है। यद्यपि मन्दिर मस्जिद और गिरजाघरों की संख्या बराबर बढ़ रही है लेकिन आस्तिकता की सब ओर उपेक्षा की जा रही है। हम कहने को तो आस्तिक बनते हैं लेकिन हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इस तरह हमारा जीवन आत्म प्रवञ्चना से भरा हुआ है। हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं या अपनी समझ को लेकर हम धोखा खा रहें हैं धोखे का यह जीवन आस्तिक जीवन नहीं है इसे भी समझने वालो की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है।
भारत के जीवन में जब जब आस्तिकता का जमाना रहा है, वह हमेशा खुशहाल रहा है लेकिन जैसे जैसे उसकी उपेक्षा की जाती रही है उसकी खुशहाली हटती गई है। आज कलह और क्लेशों से भरा हुआ भारत हम सब की आस्तिकता का डिमडिम घोष कर रहा है और फिर भी हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।
आस्तिकता अनन्त शान्ति की जननी है। जहाँ आस्तिकता होगी वहाँ अशांति का कोई चिन्ह दृष्टि गोचर नहीं होना चाहिए। ईश्वर का सच्चा विश्वासी पवित्र अन्तःकरण का होता है तदनुसार उसके व्यवहार तथा कर्म परिपाक भी सुमधुर ही होते हैं।
परमात्मा व्याख्यान से नहीं मिलता, न बुद्धि से और न ज्यादा पढ़ने सुनने से । बलहीन भी उसे नहीं पा सकते, आलसी भी नहीं। तप और संन्यास के बाहरी चिन्ह ही धारण करने वाले पुरुष भी उसे नहीं पा सकते। त्याग आदि उपायों द्वारा जो लगातार साधना करते रहते हैं। परमात्मा उन्हीं को मिलता है।
-मुण्डकोपनिषद्
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परमात्मा सत्य, तप, उचित ज्ञान और अखण्ड ब्रह्मचर्य की साधना से मिलता है। यह परमात्मा हमारे ही अन्दर है, जो संयमी है और जिनके दोष दूर हो गये हैं। वे ही उसका दर्शन कर सकते हैं।
-मुण्डकोपनिषद्
(श्री बालकृष्ण शर्मा, नवीन)
आज हम कहाँ हैं? से मेरा तात्पर्य है हमारा देश, हमारी राजनीति, हमारी सामाजिक मनोदशा, हमारा वैयक्तिक व्यवहार। यदि हम अपने भीतर और अपने बाहर दृष्टि डालें तो क्या हमें यह देखकर चिन्ता न होगी कि हमें जहाँ होना चाहिये, वहाँ हम नहीं हैं? स्वतन्त्रता के पश्चात् जैसे हमारे तुरंग की लगाम ढीली हो गई है, जैसे वह, ऊंचे, गगनचुम्बी शिखर की ओर, चढ़ते सहसा मुड़कर पतन की खाई की ओर दौड़ लगाने लगा है। और, लगाम कौन थामे बाट! तनोन्मुख राष्ट्रजीवन तुरंगम को उत्थानोन्मुख कौन करे गुरु बिन कौन बाट गुरु तो चला गया। आज भी चले जाइये देखिये उसकी समाधि पर हे राम अंकित है। उसके अन्तिम शब्द । यह उसका सन्देश है। इस भारत राष्ट्र की आत्मा की ..की यह संचित पुकार - हे राम। दशरथ ने शबरी ने विरहनि-दीक्षिता माता सती सीता ने, भारत की आत्मा ने, प्रयासोन्मुख गाँधी ने पुकारा- हे राम! क्या हमने यह पुकार सुनी? और यदि सुनी तो हम क्या समझे?
घोड़ा पतन की खाई की ओर दौड़ा जा रहा है। गाँधी सन्देश दे गया हे राम! हम क्या समझे कदाचित कुछ न समझे। पर समझना है। गाँधी की पुकार को समझना है। और स्मरण रहे देश के प्रत्येक जन को, समाज के प्रत्येक अंग को, पूँजीपति को, श्रमजीवी को, कृषक को, उन्मूलितप्राय जमींदार को, समाज सेवक राजनीतिज्ञ को, सबको गाँधी का यह सन्देश हृदयंगम करना है। ‘राम’ कौन राम? क्या दशरथी राम? हाँ दशरथ-नन्दन, दैत्य- निकन्दन राम भी और साथ ही वह राम जिसे शताब्दियों के भारतीय चिन्तन मन्थन ने सत्य शिव एवं अद्वैत के नवनीत प्रतीक के रूप विश्व को प्रदान किया है। दशरथी महामानव राम को हमें अपने जीवन में अवतीर्ण करना है हमारे जीवन व्यवहार का आदर्श वह निस्पृह। दशरथ-सुवन क्यों न बने, जिसने कर्तव्य सम्मुख राज का परित्याग कर दिया? और हमारे जीवन का तत्वज्ञान उस राम के रस अभिषिक्त क्यों न हो, जिसके स्मरण मात्र पदार्थवाद के मिथ्याज्ञान आडम्बर का सिरोधारण हो जाता है? समझ लीजिये मुख्य रूप में ये ही समस्याएं हमारे सम्मुख हैं।
(1) वैयक्तिक आचार का ह्रास एवं
(2) चारों ओर से भयंकर पदार्थवादी मिथ्य तत्वज्ञान का आक्रमण।
हम जनसेवक आज अंतर्दर्शन क्यों न करे । यदि हमारी वृत्तियाँ आज अन्तर्मुखी न हुई यदि आज हम अपने आप को समझने में समर्थ न हुए तो समझ लीजिये हम उस महान् संगठन के अधः पतन का कारण बन जायेंगे जिसकी नींव में गाँधी का यज्ञमय प्रस्वेद है और जिसका द्वार देहली पर गाँधी का पुनीत रक्त इसलिये वहाँ कि कोई संगठन मन्दिर की पवित्रता नष्ट न करे। गाँधी जाते-जाते सन्देश दे गया कि भारतीयों सर्व भविन एक बार पुकार उठो- हे राम! मर्यादा पुरुषोत्तम के उपासक, क्या आज लौकिक मर्यादा का पालन कर रहे हैं? जीवन में समय का अभाव है, महत्वाकाँक्षा, इन्द्र पद को भी निगल जाने के लिए मुख फैलाए हुए हृदय स्थली में धमाचौकड़ी मचा रही है। द्वेष, हिंसा, मिथ्याचार, जीवन के सहकारी हैं। क्या इन्हीं गुणों से हम इस हत-भाग्य देश को उन्नत करेंगे? कैसा उन्नत देश जब कि उसके हम निवासी अपने हृदय की नारकीयता के मलमय कुण्ड में घृणित एवं घृण्य कीटाणुओं के साथ किलबिलाते रहे? मैं- पंक्तियों को लिपिबद्ध करने वाला, मैं भी उतना ही अपराधी हूँ जितने अन्य जन। अतः कोई भी संगी यह न समझे कि मैं उच्चता के निर्मल सिंहासन पर आसीन होकर यह बात कह रहा हूँ। हम सब अपराधी हैं। हम सब पतनोन्मुख हैं। हम सबको आज राम का, गाँधी का आह्वान करना है। हमें बुलाना है उस राम को जिसके विषय में आदि कवि की अमर वाणी मुखरित होकर कृत-कृत्य हुई थी कि- समुद्र एव गाँभीर्यें स्थैयेच हिमवानिव, वह राम गम्भीरता में समुद्र के समान हैं और स्थिरता में, धीरता में हिमाचल के सदृश हैं ! इस प्रकार आदि कवि ने अनुष्टु छन्द के अर्ध श्लोक में समग्र भारत वर्ष की एकता को, दक्षिण के हिन्द महासागर की गम्भीरता के साथ उत्तरस्थ अटल हिमाचल की शाश्वत स्थिरता, को बाँध दिया है। यह है गाँधी का सन्देश । यह है दाशरथी राम स्वरूप। भारत एक है । उत्तर-दक्षिण एक है, अन्योन्याश्रित हैं। और वह इकाई किस भित्ति पर आधारित है? उसका आधार क्या है छल, बल, लोभ, द्वेष, ईर्ष्या प्रमाद, महत्वाकाँक्षी वैयक्तिक आवारहीनता, नहीं। उस एक देशीयता का आधार है राम की सी यह गम्भीरता जिसके चरण- प्रक्षालन के लिए महासागर व्याकुल है और राम की सी वह स्थिरता, वह धीरता, जिसके पुण्य दर्शन के लिए हिमालय भी, गौरीशंकर शिखर के रूप में, उन्नीत-ग्रीव होकर, और ऊंचे को अपलक निहार रहा है। क्या हम में इस सन्देश को सुनने की क्षमता नहीं रही?
मैं ऐसा नहीं मानता । हम में इसके सुनने की क्षमता है। राम को जीवन में उतारने की प्रेरणा का जो अभाव आज अगोचर हो रहा है, उसका कारण केवल मात्र एक क्षणिक मलावरण है। जिन प्यारों ने गत अठारह, बीस, पच्चीस, अट्ठाइस वर्ष त्याग कष्ट-सदन एवं सेवा-परायणता में बिताए, वे आज भी उसी प्रकार धूनी रमाने को तत्पर हो सकते हैं। निःसन्देह मान व तितिक्षा की, मानव सहनशीलता की, विपदाओं एवं विपन्न अवस्था से जूझते रहने की एक सीमा है। पर दाशरथी राम निःसीम थे। कामचन्द सुत मोहनदास निःसीम थे। हमें भी आज निःसीमता की ओर चरण निक्षेप करना ही पड़ेगा। गत्याँतर नहीं।
हारी, थकी अस्थियाँ लेकर करते जाओ कूच, सखे।
पथ जैसा है, वैसा ही है, निरखो नीच न ऊंच, सखे॥
हाँ बहुत दिन हो गए। जब चले थे, तब से अब तक इतने वर्ष बीत गए। त्याग ही त्याग में तो जीवन बीता। अब क्यों थोड़ा भोग का स्वाद चखा जाये? पर, भाई, यह कैसे सम्भव है?
जब चले थे तब सम्मुख क्या ध्येय था? केवल स्वराज्य-प्राप्ति ही क्या ध्येय था? नहीं क्या हमने सहस्रों बार नहीं कहा कि स्वराज्य तो एक साधन मात्र है? क्या हम यह नहीं कहते रहे कि इस साधन को प्राप्त करके हम इस देश में एक नयी समाज, एक नई आर्थिक व्यवस्था रचेंगे? क्या हम यह स्वप्न नहीं देखते रहे कि हम अपनी इस पुण्यभूमि में ऐसे मंगलमय विचार बीजों का रोपण करेंगे जिनसे अभिनव मानवता पुष्पित एवं फलित होगी? आज, यही काम, हमारे सम्मुख है। तय? हमारा क्या कर्तव्य है? क्या यह कि हम भोग-भावना की ओर, लाभ लोभ की ओर, लालच भरी दृष्टि डालें? क्या यह कि हम नैतिक भावना को तिलाँजलि देकर कुत्सा, निन्दा और ईर्ष्या का वरण करें? क्या यह कि हम अपने ही संगियों को, अपनी महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए धक्का, दे दें? क्या यह कि हम अपने संगठन का नाम लेकर उल्टी सीधी प्रत्येक रीति से अपना हित साधन करने लग जायें? काँग्रेस जन एक दूसरे को आज फूटी आँखों नहीं सुहाते। क्यों? क्या इसलिए कि उनके बीच कोई सैद्धान्तिक विचार भेद हैं? नहीं तो। इस द्वेष का कारण केवल व्यक्तिगत दलबन्दी एवं विरुद्ध पक्षपात का भाव है अमुक ऐसा है ही अतः उसे हम खोदकर बड़ा देंगे- यह भावना काम कर रही है। और यों सोचने वाले भले मानुस यह भूल जाते हैं कि यदि वे इस प्रकार की विद्वेष-प्रेरणा को प्रश्रय देते रहे तो वह दिन दूर नहीं है, जब वे स्वयं खोदकर बड़ा दिये जायेंगे। किसके द्वारा? उस एक भयंकर एवं प्रचंड शक्ति के द्वारा जो आज भारतवर्ष को चतुर्दिक् से -पूर्व से, उत्तर से , दक्षिण-पूर्व से, उत्तर-पश्चिम से -घेर कर उस पर राजनैतिक, साँस्कृतिक एवं सैद्धाँतिक आक्रमण करने का निश्चय कर चुकी है। और एक हम अन्धे है जो इस प्रत्यक्ष बात को भी देखने में असमर्थ हो रहे हैं।
मैं कहता हूँ, भाई, यदि नैतिक आचरण सद्व्यवहार को, दया, दाक्षिण्य, पारस्परिक स्नेह एवं सौहार्द को, आप आध्यात्मिक अर्थ मानव को ऊंचा उठाने वाला, गुण नहीं मान तो भी, राम के नाम पर, इतना तो मानिये कि आज की परिस्थिति में जब तक आप हम नैतिक का आश्रय नहीं लेंगे तब तक हम अपने नैतिक अस्तित्व की भी रक्षा नहीं कर सकेंगे? काँग्रेसजन समझ लें कि जहाँ हमारी एक संगठनात्मक दृढ़ता स्थापित करने का समाधान हमारे वैयक्तिक आचरण ही में निहित है, वहीं हमारी बड़ी समस्या मिथ्या पदार्थवादी सिद्धान्त के आक्रमण समस्या का समाधान भी भारतीय सांस्कृतिक अध्यात्मवाद की प्राण प्रतिष्ठा में निहित है।
(श्री॰ अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)
प्रत्येक प्राणी उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहता है, पर जहाँ तक बाधक कारणों का सम्यक् परिज्ञान न हो एवं उनको दूर न किया जाये, उन्नति असंभव है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी उसके बाधक कारणों को जानना परमावश्यक होता है। लेख में वैसे तीन दोषों पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है। 1.ममत्व, 2.कपट और 3.अवगुणग्राही दृष्टि। जहाँ तक ये दोष रहेंगे, वहाँ तक साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।
1.ममत्व- जहाँ तक साँसारिक पदार्थों में आत्मा की आशक्ति रहेगी, आत्मा का लक्ष्य बहिर्मुखी रहने के कारण आत्मानुभव का मार्ग बन्द ही रहेगा। इसलिए सारे भौतिक पदार्थों भाषों से अपनी आत्मा को अलग, भिन्न, समस्त कर उनके आकर्षण को रोकना बहुत ही आवश्यक है पर पदार्थों की आसक्ति हटते ही आत्मा के स्वरूप का दर्शन एवं अनुभव होगा, आत्मोन्नति का प्रथम सोपान है। जिन-जिन वस्तुओं को आत्मा मेरी अपनी समझता है उनकी प्राप्ति अभिवृद्धि में हर्ष एवं विनाश-क्षीणता में होता है। जहाँ ममत्व भाव नहीं वहाँ हर्ष शोक का प्रादुर्भाव नहीं होता है होता है तो अत्यल्प एवं क्षणिक। आत्मा द्रव्य वास्तव में इन पाँच द्रव्यों से सर्वथा भिन्न है दृश्यमान सभी पदार्थ पौद्गलिक (भौतिक) है, क्योंकि पुद्गल के सिवाय सभी पदार्थ अरूपी हैं अरूपी पदार्थों पर आसक्ति नहीं होती । जिसे हम देखते हैं, सुनते हैं, खाते हैं, सूँघते हैं और स्पर्श करते हैं अर्थात् पाँचों इन्द्रियों द्वारा जिनके साथ हम अपना किसी प्रकार का सम्बन्ध करते हैं उन्हीं का मन विचार करता है अच्छे या बुरे मेरे या तेरे की कल्पना करता है उस कल्पना के द्वारा ही आत्मा अपने स्वरूप (विचार) से च्युत होकर उनके प्रति आकर्षित होती है। इसीलिए “मैं और मेरा” इसी को मोह का मूलमन्त्र माना गया है और मोह ही आत्मा का परम शत्रु सबसे प्रबल बाधक कारण माना गया है।
पर पदार्थों के संयोग से आत्मा विभाव दशा को प्राप्त होती है। इसीलिए सर्व संग परित्याग-अपरिग्रहता-निर्ग्रन्धता को जैन धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है। जैन तीर्थंकर स्वयं इनका आदर्श उपस्थित करते हैं अर्थात् साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है। रोगादि दुख भी आत्मा को अकेले ही भोगने पड़ते है अतः आत्मा अकेली ही है बाह्य संयोग धन, दौलत, कुटुम्ब परिवार यावत् देह भी अपना नहीं हैं। तब उन पर समत्व रखना मूर्खता व अज्ञानता नहीं तो क्या है। योगी पुरुषों ने सबसे बड़ी भूल इसी को बतलाया है कि जो पदार्थ अपने नहीं उन्हें अपना मान लेना और अपने स्वरूप को भूल जाना
बहिर्मुखी वृति के कारण आत्मा की सारी शक्ति बाह्य पदार्थों की ओर लगी है और वह उनके लाभ हानि में ही सुख-दुख मान बैठा है, अन्यथा सुख व आनन्द कहीं बाहर से आने वाली चीज नहीं। सच्चे स्वरूप के अज्ञान के कारण ही वह इधर दौड़ धूप कर रहा है। यदि मैं अकेला हूँ, कोई भी चीज मेरी नहीं है तब उन पर आसक्ति कैसी? आनन्द यदि मेरे पास है तो उसकी प्राप्ति के लिए दौड़ धूप क्यों? इसी पर विचार करिये। पोद्गलिक-सभी पदार्थ रूप वाले विनाशी हैं, आत्मा अरूपी एवं अविनाशी है दृश्यमान सभी चीजें पुद्गल की बनी हुई हैं अतः ममत्व को हटाकर आत्मा का अन्तर्मुखी होना आध्यात्मिक साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।
2. कपट- वस्तु के स्वरूप को अन्य प्रकार से दिखलाने का प्रयत्न कपट है मेरे हृदय में कुछ और ही। यह आत्मोन्नति का परम बाधक कारण है इस प्रपंच जाल से आत्मा बड़ी मलिन हो जाती है। भूमिका की शुद्धि के बिना सुभग चित्रों का आलेखन संभव नहीं। इसी प्रकार आत्मा का सरल-निष्कपट होना उसकी भूमिका शुद्धि है। जहाँ तक बकता है भ्रम फैलाने की वृति काम कर रही है, वहां तक सद्वृत्तियाँ पनप नहीं सकती। चित्त बहिर्मुखी बना रहता है। कैसे अपने दोषों को छिपाया जाये दूसरे को ठगा जाये, इसी में चित्त फंसा रहता है। वहाँ सुविचारों को अवकाश कहाँ? जो पापी है और अपने आपको छिपाने का प्रयत्न कर लोगों के समक्ष अपने को धर्मी दिखलाने की कोशिश करता है, उसका सुधार बहुत ही कठिन है।
3. अवगुणग्राही दृष्टि- यह भी एक बड़ा भारी अवगुण है इसके कारण मनुष्य अवगुणों की ओर अग्रसर होता है। ऐसी आत्मा हजार गुणों को नहीं देखती बल्कि छिद्रान्वेषी होकर अवगुण की ओर ही झुकती है। यह नहीं सोचती कि दोष हम सब में है किसी में कम और किसी में अधिक और पराये दोषों को देखने से लाभ ही क्या? एक सन्त ने इस सम्बन्ध में बहुत ही सुन्दर कहा है, “हे आत्मा दूर जलती हुई अग्नि को क्या देखता है। तेरे स्वयं पैरों में द्वेषों की अग्नि सुलग रही है उसे देखो, पराये मैल में कपड़े धोने से वे उज्ज्वल कैसे होंगे। थोड़े बहुत अवगुण सभी में होते हैं तुम्हारे में भी हैं तो अपने दोषों को क्यों नहीं देखते पराई निन्दा में क्यों लगे हो। निन्दा करने की यदि तुम्हारी आदत ही पड़ गई है तो अपने दोषों की निन्दा करो। अतः अपने दोषों की ओर दृष्टि डालों और दूसरे की निन्दा को छोड़ो।
“मनुष्य जैसे विचारों में रहता है वैसा ही बन जाता है” अवगुणों को ढूँढ़ने की दृष्टि रखने से स्वयं अवगुण का भाजन हो सकता है। इसीलिए इस दृष्टि दोष को निवारण कर हमें अपनी दृष्टि को गुण ग्राहक बनाना आवश्यक है। अवगुण देखने हो तो अपने देखो, जिससे उन्हें छोड़ने की भावना जगे तथा आत्मा दोष रहित बने। औरों के तो गुण ही देखो जिससे गुणी बने और गुणों के प्रति तुम्हारा आकर्षण बढ़े।
इन तीनों विवेचना का सार यही है कि इनके द्वारा आत्मा को बढ़ने का अवकाश भी नहीं होता। अतएव बहिर्मुखी वृत्तियों की ओर से हटकर अन्तर्मुखी होने का लक्ष्य रखा जाय। महत्व, कपट और अवगुण ग्राही दृष्टि से बचा जाय तभी आत्मोन्नति होगी।
गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों के साथ अनेक कारण जुड़े हैं। इसके साथ कई चौबीस रहस्यों का सम्मिलन है। नीचे कुछ ऐसे ही चौबीस अक्षरों के हेतु बताये जाते हैं।
(1) संसार की समस्त विद्याओं के भण्डार 24 महाग्रन्थ हैं। 4 वेद, 4 उपवेद, 4 ब्राह्मण 6 दर्शन और 6 वेदाँग इस प्रकार चौबीस हुए। तत्वज्ञों का ऐसा भी मत है कि गायत्री के एक-2 अक्षर से यह एक ग्रन्थ बना है। गायत्री के गर्भ में इन 24 ग्रंथों का मर्म छिपा हुआ है। गायत्री का मर्म इन 24 ग्रंथों में वर्णित है जो गायत्री का विस्तृत रहस्य जानना चाहें वे इन 24 महाग्रंथों को पढ़कर उसका मर्म समझ सकते हैं।
(2) हृदय, जीव का और ब्रह्मरंध्र, ईश्वर का स्थान है। हृदय से ब्रह्मरंध्र 24 अंगुल दूर है। एक अक्षर से एक एक अंगुल की दूरी को पार करके जीव गायत्री द्वारा ब्रह्म में लीन हो सकता है ऐसा योगी लोग कहते हैं। गायत्री के 24 अक्षर यह संकेत करते हैं कि ईश्वर जीव से, हृदय मस्तिष्क से, 24 अंगुल दूर है। हृदय में ईश्वर रहता है और मस्तिष्क में मन । अपने मन को ईश्वर के अर्पण कर दो कल्याण प्राप्ति हो जायगी।
(3) गायत्री के तीन विराम होते हैं शरीर के भी तीन भाग है। प्रत्येक भाग के अंतर्गत आठ अंग होते है इस प्रकार शरीर रूपी गायत्री के 24 अक्षर हो जाते है (अ) शिर, नेत्र, प्राण = अक्षर (ब) मुख, हाथ, पैर, नाक= अक्षर (स) कंठ, त्वचा, गुदा, शिश्न=अक्षर । यह सब मिलकर 24 हुए। गायत्री के दो दो अक्षरों से इन बारह प्रमुख अंगों की रचना हुई है। यह स्वभावता पवित्र है। इन्हें पवित्र ही रखने का प्रयत्न करना चाहिए।
(4) शरीर की सुषुम्ना नाड़ी में 2 कशेरुकाएं हैं (ग्रीवा में 7 पीठ में 12 कमर में 5 = 24) ये कशेरुकाएं प्राणों का, मातृ.. का ग्रन्थियों का और चक्रों का पोषण करने वाले हैं। यह पोषण गायत्री कहा जाता है और 24 कशेरुकाओं को 24 अक्षर कहते हैं।
(5) शरीर में प्राण सूत्र 24 हैं। गायत्री में 24 अक्षर है। गायत्री का एक एक सूक्ष्म शरीर के लिए उतना ही महत्वपूर्ण जितना कि स्थूल शरीर के लिए ये 24 प्राण सूत्र हैं।
(6) शरीर में 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राणतत्व और 4 अन्तःकरण हैं। इन 24 के द्वारा ही शरीर जीवित रहता है। हमारे आध्यात्मिक शरीर में गायत्री की 24 शक्तियाँ इसी प्रकार ओत प्रोत है।
(7) गायत्री साधना से अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि और सात शुभ गतियों की प्राप्ति होती है। यह 24 महान लाभ गायत्री के अंतर्गत हैं।
(8) इस मन्त्र में 24 ऋषियों और 24 देवताओं की शक्तियाँ सन्निहित है (देखिए- गायत्री योग)
(9) साँध्या दर्शन में वर्णित 24 तत्वों से सृष्टि का क्रम चलता है। उन 24 का प्रतिनिधित्व गायत्री के 24 अक्षर करते हैं।
(10) शरीर में प्रधानतः 24 अंग है। उसके प्रत्येक तृतीयाँश में भी 24-24 टुकड़े हैं। शरीर के तीन भाग हैं। सिर, धड़ और पैर । इन तीनों भागों में से प्रत्येक में 24-24 अवयव हैं। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर में 24 तत्व हैं इन तीनों शरीर के अवयवों की सृष्टि 24 अक्षर वाली गायत्री से होती है। ब्रह्म पुरुष के शरीर के 24 भाग गायत्री के अक्षर है।
इस प्रकार के और भी अनेकों कारण है जो गायत्री के 24 अक्षरों के हेतु हैं। प्रत्येक अक्षर के पीछे बड़े बड़े महान् तत्व छिपे हुए हैं।
मनुष्य शक्तियों का केन्द्र है। उसमें भौतिक शक्तियाँ भी। सर्कस में अद्भुत खेल दिखाते हुए नटों को, बाजीगरों को, साहसिक कार्य करने वाले बहादुरों के करतबों को देखकर यह पता चलता है कि मनुष्य शरीर को साध ले तो एक से एक अनोखे काम कर सकता है। मानवीय बुद्धि दर्शन, साहित्य, रसायन, विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा, कृषि, शिल्प, संगीत आदि महिमा का वर्णन ही क्या हो सकता है। आध्यात्मिक शक्तियाँ द्वारा अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि, देवसिद्धि, आत्म दर्शन, दर्शन प्राप्ति आदि महान पुरुषार्थ उपलब्ध किये जाते है।
मनुष्य देखने में बड़ा दुर्बल और साधारण सा प्राणी है पर उसके कण कण में एक से एक अद्भुत शक्तियाँ भरी हुई हैं जो उनको जान लेता है और उनको जागृत करके सशक्त बना देता है। एवं उनसे काम लेना सीख जाता है वह दूसरों के सामने अद्भुत शक्ति सम्पन्न की तरह प्रकट होता है।
वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से यह देखा जा सकता है कि मनुष्य शरीर एक अच्छा खासा बिजलीघर, शक्तिकेन्द्र है। बिजली घर के इंजन की तरह मनुष्य का हृदय हर घड़ी काम करता है और वहाँ से असंख्यों तार निकल कर सम्पूर्ण शरीर साम्राज्य में फैलते हैं। बिजली के उपयोग एवं वितरण को व्यवस्थित रखने का यन्त्र भवन जिस प्रकार होता है वैसा ही मानवीय मस्तिष्क है। मस्तिष्क से असंख्यों ज्ञानतन्तु निकलते हैं और वे बारीक जाल की तरह सारे शरीर में फैल जाते हैं। यह बिजलीघर ऐसे सुरक्षित रूप से बना है कि इसकी शक्तियों का प्रदर्शन एवं व्यय बाहर नहीं होता इसलिए शरीर को छूने से कोई विशेषता मालूम नहीं होती पर यांत्रिक परीक्षा से प्रकट है कि करीब 260 वाट बिजली हर घड़ी काम करती रहती है। उसकी, ऊष्मा, शक्ति तथा गतिशीलता से देह के विविध कल पुर्जे काम करते रहते हैं।
मशीनों से बनने वाली बिजली की अपेक्षा, शरीर की बिजली अनेक गुनी सूक्ष्म उच्चकोटि की तथा प्रकृति के सूक्ष्मतम परमाणुओं को प्रभावित करने वाली है। हमारे पूजनीय पूर्वज इस रहस्य को जानते थे। इसलिए उन्होंने शरीर की विद्युत शक्ति का प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं से संबंध स्थापित करने का सफल आविष्कार किया था। आज के पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने लाखों करोड़ों रुपयों की कीमत में बनने वाले, और पेट्रोल आदि खर्चीले दुष्प्राप्य साधनों से चलने वाले यन्त्र बनाये हैं। वे एक नियत स्थान पर रखे रहते हैं एक जगह से दूसरी जगह उन्हें उठा ले जाना बड़ा कष्ट साध्य है। यह कठिनाई भारतीय योग विज्ञान में तनिक भी न थी। आज रेडियो से खबर भेजनी हो तो कीमती ट्रान्समीटर यन्त्र होना चाहिए। फिर उसका नियमित सम्बन्ध किया जाना चाहिए तब कहीं संवादों का आदान प्रदान हो सकता है। योग विज्ञान के आधार पर इस झंझट की तनिक भी जरूरत न थी। मस्तिष्क की अमुक ग्रंथियों को जागृत करके आत्म विद्युत की चेतना से उसे क्रियाशील बनाया जाता था और उस माध्यम से विचार तरंगें सुदूर स्थानों को भेज कर जहाँ संवाद भेजना होता था वहाँ तत्काल भेज दिया जाता था। लंका में बैठा हुआ रावण, अमेरिका में बैठे हुए रावण से इसी आधार पर वार्तालाप करता रहता था। आज रेडार नामक रेडियो शक्ति से संचालित बम निर्दिष्ट स्थान पर जाकर गिरता है। इस बम को बनाने और चलाने में बहुत ही खर्चीले यन्त्रों तथा पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। प्राचीन काल में मन्त्र शक्ति से ही कृत्या-घात चलाई जाती थी और शत्रु जहाँ कही भी होता था वहीं ढूँढ़ कर वहीं उसके ऊपर गिरती थी, अनेक प्रकार के योगिक चमत्कारों का वर्णन प्राचीन पुस्तकों में मिलता है। यह चमत्कार वैज्ञानिक आधार पर निर्भर थे। प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को अपने शरीर की विद्युत शक्ति द्वारा यथेच्छित दिशा में मोड़ लेने की विद्या हमारे पूर्वजों को ज्ञात थी और वे इच्छानुसार प्रकृति के अपार भण्डार में से अपना आवश्यक प्रयोजन सिद्ध कर लेते थे। शाप और वरदान, अभीष्ट पदार्थ की अनायास प्राप्ति, असंभव दिखाई पड़ने वाले कार्यों को संभव बना देना, यह सब अचरज भरे कार्य करने की उस जमाने में साधारण लोगों में भी क्षमता थी। कारण यही था कि शारीरिक विद्युत का प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं के साथ सम्बन्ध मिला कर उन्हें अभीष्ट दिशा में परिवर्तित कर लेने का ज्ञान उन्हें था। इस युग के वैज्ञानिक भी जब उस ज्ञान को प्राप्त कर लेंगे तो आज की खर्चीली मशीनरी की उन्हें कुछ भी आवश्यकता न रहेगी। बोझ उठाने के लिए बड़ी बड़ी क्रेन मशीनें तक निरुपयोगी हो जायेगी और वायु विद्या के आधार पर मामूली वानर बड़े पर्वतों को उठा ले जाया करेंगे।
उपरोक्त पंक्तियों में प्राचीन विज्ञान की चर्चा करना हमारा उद्देश्य नहीं है यहाँ तो यह बताया है कि मनुष्य शरीर केवल हाड़ माँस का पुतला ही नहीं है उसमें बड़ी-2 सूक्ष्म विद्युत शक्तियाँ भरी हुई हैं वे काम भी करती रहती हैं। यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से उनसे काम लेना न जानता हो तो वह बिजली अपने समीपवर्ती क्षेत्र में काम रहती है। सत्संग और कुसंग का फल प्रसिद्ध है। अधिक विद्युत शक्ति वाले का प्रभाव कम शक्ति वाले पर पड़ता है कमजोर तबियत का वाला आदमी बलवान प्रकृति के बुरे आदमियों की संगति में रहे तो वह बुरा बन जायेगा। इसी प्रकार न्यून शक्ति वाला बुरी.. प्रकृति का मनुष्य यदि तेजस्वी सत्पुरुषों में रहे तो उसका भला बन जाना स्वाभाविक है ऋषि मुनियों के आश्रमों में सिंह भी कुत्ते की तरह बैठे रहते हैं। वे अपनी हिंसा वृत्ति भूल जाते हैं। ऋषियों के शरीर से निकलते रहने वाले अहिंसक तेज का ही यह प्रभाव है।
नजर लगने से बच्चों का बीमार हो जाना या हसरत भरी निगाह से देखे जाने पर मकान, पशुओं का दूध, तथा अन्य अनोखी चीजों का पदभ्रंश हो जाना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य की भावनाएं दूसरों पर क्या प्रभाव डाल सकती हैं। सताये हुए की ‘हाय’ सताने वाले को ले बैठती है। सत्पुरुषों के आशीर्वाद से लोग फलते फूलते उन्नति करते और कठिनाईयों से पार हो जाते है। कर्मों के आयोजन में साक्षी रहे मकान, वस्त्र, पदार्थ आदि का उपयोग करने से वैसे ही कुविचार उसका उपयोग करने वाले पर आक्रमण करते हैं। निकट रहने वाले के ऊपर एक बीमार की बीमारी दूसरे स्वस्थ व्यक्ति पर हमला कर देती है। इस प्रकार की बातों से पता चलता है कि मनुष्य में रहने वाली बिजली प्रायः अपने निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रभाव डालती रहती है। मैस्मरेजम विद्या जानने वाले मनुष्य इस बिजली के द्वारा दूसरों को बेहोश कर देते हैं, उन्हें अपना वशवर्ती बना लेते हैं, उनके मस्तिष्क पर अपना अधिकार कर लेते हैं तथा अनेक आश्चर्यजनक दिखाते हैं।
इसी शारीरिक विद्युत का चतुर प्रयोक्ता, उससे अनेक कष्ट साध्य रोगियों को अच्छा कर सकता है। अपनी स्वस्थ प्राण शक्ति को रोगी के शरीर में प्रवेश करके उसे उसी प्रकार नव जीवन दे सकता है जैसे स्वस्थ मनुष्य का खून पिचकारी द्वारा निर्बल या रोगी के शरीर में पहुँचा दिया जाये तो वह शीघ्र स्वस्थ हो जाता है। कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी आत्मविद्या जानने वाले ने अपनी आयु का एक भाग किसी मृत्यु मुख में पहुँचे हुए रोगी को दान किया है और वह स्वयं उतने वर्ष कम जीकर, उस मृत्यु मुख में जाने वाले व्यक्ति को उतने वर्ष अधिक जीवन धारण कराने में समर्थ किया है। इसी प्रकार अपना तप, तेज, एवं आत्मबल किन्हीं विशेष प्रिय शिष्यों के शरीर में प्रवेश करके उसकी आत्मिक शक्तियों का जागरण करा देने में कई गुरु समर्थ होते हैं। कुँडलिनी जागरण की साधना अत्यन्त कष्ट साध्य और समय साध्य हैं पर ऐसे कई गुरु होते हैं जो शिष्य के सिर पर हाथ रखकर कुँडलिनी शक्ति को जागृत करा देते हैं। वे अपनी शक्ति के द्वारा षट्चक्रों का, सूक्ष्म ग्रन्थियों का तथा कुँडलिनी का जागरण हो जाता है। ऐसे जागरणों में तत्काल तो पूर्ण सफलता प्रतीत हो जाती पर यदि शिष्य की मनोभूमि बलवान एवं स्थिर हुई तो ही वह सफलता टिकती है, अन्यथा वह धीरे-धीरे अल्प काल में ही समाप्त हो जाती है। जो, हो गुरु की शक्ति अपना चमत्कार तो दिखा ही देती है।
पतिव्रत और पत्नीव्रत का भारतीय समाज में इतना अधिक महत्व इसी विज्ञान के आधार पर दिया गया है। पाश्चात्य सभ्यता के प्रभावित व्यक्ति अक्सर ऐसा कहते सुने जाते हैं कि = “काम सेवन स्वेच्छा सहयोग है। जैसे दो व्यक्ति आपस में शरीर को तेल मालिश करके या थके अंगों को दबा दबाकर एक दूसरे को प्रसन्न करते हैं और उसमें किसी प्रकार का पाप नहीं होता इसी प्रकार मूत्रेन्द्रियों की खुजली को स्त्री पुरुष आपसी सहयोग से मिटाकर प्रसन्नता लाभ करें तो इसमें क्या दोष है स्त्री पुरुष का जोड़ा कोई जन्म से तो होता नहीं, इसलिए वह ईश्वर दत्त तो है नहीं । जब एक साथी को मैथुन के लिए नियुक्त कर लेने का अपने को अधिकार है तो अनेकों को नियुक्त कर लेने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? जब अनेक सुन्दर-2 फल, फूल, वाहन, वस्त्र, खाद्य, वाद्य, मनोरंजन आदि का उपयोग करके स्वाद परिवर्तन का लाभ उठाया जाना निन्दनीय नहीं है तो अनेक साथियों के सहयोग से काम तृप्ति के स्वाद परिवर्तन करते रहने में क्या हर्ज है?”
उपरोक्त दलील स्थूल दृष्टि से चाहे कैसी ही आकर्षक प्रतीत क्यों न हो पर उसका थोथापन शरीर विद्युत विद्या के आधार पर स्पष्ट प्रकट हो जाता है। जननेंद्रियां शरीर का सबसे अधिक सूक्ष्म, संवेदन शील एवं प्राणपूर्ण भाग हैं, एक नया प्राणी उत्पन्न कर देने तक की जीवनी शक्ति उनमें निवास करती है। मस्तिष्क और जननेन्द्रिय यह दो ही प्राण केन्द्र हैं। इनके आधार पर दो प्राणी आपस में इतने घनिष्ठ हो जाते है कि उनका संबंध छुड़ाये नहीं छूटता। पति पत्नी में जैसा आतुर, जैसा उल्लासपूर्ण, जैसा सजीव प्रेम होता है वैसा अन्य संबंधियों में नहीं होता, कारण यह है कि जननेन्द्रियों के संस्पर्श के आधार पर उन दोनों में प्राण शक्ति का आपसी आदान-प्रदान ऐसा महत्वपूर्ण हुआ है कि एक दूसरे की आत्मा के साथ लिपट जाते है। यह आत्मिक सम्मेलन एक ही साथी के साथ उचित रूप से हो सकता है। यदि यह अनेकों के साथ हो तो अनेकों की विद्युत शक्तियों का संमिश्रण होगा यही कारण है कि व्यभिचारी स्त्री पुरुष अपने जोड़े के प्रति वफादार नहीं रह सकते। वेश्याएं किसी की सगी नहीं होती, क्योंकि अनेकों दिशाओं में उनकी वफादारी बटी रहती है। दूसरी बात यह कि शारीरिक विद्युत शक्तियों का व्यभिचार केन्द्र द्वारा, व्यभिचारियों में आदान प्रदान होता रहता है। रोगी, कुबुद्धि, दुष्ट प्रकृति के व्यभिचारियों की शारीरिक और मानसिक छूत अन्य सहवास करने वालों का लगे बिना रह नहीं सकती।
द्रौपदी का उदाहरण एक नई समस्या है, उस पर दूसरे पहलू से विचार करना होगा। उत्तरीय भारत के पर्वतीय प्रदेशों में भी बहुगति प्रथा प्रचलित है और सहस्रों वर्ष से चली आ रही है। वहाँ सब भाइयों की एक सम्मिलित पत्नी होती है। संतानें बड़े पिता जी, मझले पिता जी, छोटे पिताजी आदि कह कर संबोधित करती हैं। सहस्रों वर्षों के परीक्षण के पश्चात् भी यह प्रथा कोई अशान्ति, द्वेष, मनोमालिन्य एवं दाम्पत्ति वफादारी में कमी का कारण सिद्ध नहीं हुई। इसका कारण यही है कि एक कुटुम्ब के एक प्रकृति अथवा स्वार्थ के भाई एक समान गुण कर्म स्वभाव के होते हैं और दुराव का भाव लेशमात्र भी न रख कर प्रकट रूप से, शुद्ध मन से, बहुपति प्रथा को निर्दोष एवं स्वाभाविक मानते हैं उनके पारस्परिक स्वार्थ आपस में टकराते नहीं, पत्नी की वफादारी विभाजित नहीं होती। इन कारणों से बहुपति प्रथा भी पतिव्रत एवं सती धर्म का एक भाग रही है। पर यह उदाहरण सबके लिए लागू नहीं हो सकता। इस प्रथा का उदाहरण देकर व्यभिचार का समर्थन ठीक नहीं। यह तो विशेष परिवारों की विशेष परम्परा है। साधारणतः व्यभिचार शरीर विद्युत विद्या के आधार पर हानिकर और निन्दनीय ही ठहरता है।
उपरोक्त पंक्तियों से पाठक मनुष्य शरीर की बिजली से होने वाले हानि लाभों के सम्बन्ध में छुआछूत की, चौके में एकान्त में स्वच्छता-पूर्वक भोजन करने की, उच्च वर्ग के लोगों से भोजन बनवाने की प्रथाएं इसी आधार पर चली हैं ताकि अवाँछनीय लोगों की शारीरिक विद्युत अपने ऊपर कोई बुरे प्रभाव न डाल सके। सत्संगति का महत्व भी इसीलिए है कि उससे अच्छे लोगों का तेज अपने ऊपर अच्छा प्रभाव डालता है। सत्संग एक हलका सा शक्तिपात है। योग मार्ग में रुचि रखने वाले जानते हैं कि अधिक आत्म शक्ति सम्पन्न व्यक्ति अपनी शक्ति का थोड़ा सा भाग किसी प्रिय शिष्य को बिजली के तार छूने के समान हलका या भारी झटका लगता है, और कई बार वह मूर्छित तक हो जाता है। यह विशिष्ट शक्तिपात की बात हुई। प्रभावशाली व्यक्तियों के संसर्ग में हलका हलका शक्तिपात प्रतिक्षण होता रहता है। और उससे आत्मोन्नति का मार्ग बड़ा सरल हो जाता है। मनुष्य शरीर की विद्युत असाधारण शक्तिशाली है। अपने पूर्वजों की भाँति जब हम उसका उपयोग जान लेंगे तो उससे भारी लाभ उठा सकेंगे।
शास्त्रों में कहा है कि ‘न गृहं गृह मित्याहु गृहिणी गृहं मुच्यते’ घर को घर नहीं कहते वरन् गृहिणी को ही घर कहते हैं, और लोक में प्रसिद्ध है कि ‘बिन घरनी घर भूत को डेरा।’ लोक और शास्त्र की बात का समर्थन व्यवहार द्वारा हो जाता है।
मनुष्य जीवन का आधार प्रेम है। जहाँ प्रेम है वहाँ स्वर्ग है, सुख है। जिस घर में प्रेम नहीं वहाँ रहने की इच्छा नहीं होती, ठहरने की आकाँक्षा नहीं रहती। प्रेम में एक आकर्षण है, एक खिचाव है।
जब तक मनुष्य अपनी ही अपनी बात सोचता है तब तक कहीं से भी उसे आकर्षण प्राप्त नहीं होता। आकर्षण या खिंचाव उसी समय उसे अनुभव होता है जब वह अपने को भूलकर औरों के प्रति अपना उत्सर्ग कर देता। जब स्वार्थ को खत्म करके परम स्वार्थ परमार्थ की शरण लेता है।
कौन मानव जानबूझकर दुःख की ओर कदम बढ़ाता है, परेशानी को मोल लेना चाहता है। जीवन का क्रम ही है सुख की ओर बढ़ना, शान्ति की ओर चलना लेकिन अपने सुख की चिन्ता नहीं, जब तक दूसरों के सुख की चिन्ता न होने लगे तब तक सुख पास नहीं आता। इसी से तो हम कहते हैं दूसरे के लिए त्याग करना ही मानव का परम स्वार्थ है। दूसरे के लिए सुख खोजने की प्रवृत्ति उत्पन्न करने से अपने लिए सुख पाने का राजपथ तैयार किया जाता है। इस प्रवृत्ति का जनक है-गृहस्थ जीवन। वह एक ऐसी पाठशाला है जहाँ इस हाथ देकर उस हाथ पाने की तात्कालिक शिक्षा प्राप्त होती है।
विवाहित जीवन के लिए जिस नारी को पराये घर से लाते हैं, और अपना घर और उसकी ताली कुँजी उसे दे देते हैं तो ठंडी साँस लेते हैं। उसे उस घर की मालकिन बना देने पर ही मानव के सुख की शुरुआत कर देते हैं। और तब फिर पुरुष का सारा व्यापार अपने लिए न होकर उस नारी लिए होता है जो कि अपनी नहीं थी पर जिसके लिए सब कुछ उत्सर्ग कर दिया गया। घर लाई हुई नारी को सुखी रखना एक मात्र यही कर्त्तव्य पुरुष का रह जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि यह आई हुई नारी अपना सर्वस्व पुरुष के प्रति समर्पित कर देती है। स्वयं दुःख उठाकर भी वह पुरुष को सुखी देखना चाहती है। स्वयं भूखी रहकर भी वह पुरुष को तृप्त कर देना चाहती है। यह परस्पर का आत्मसमर्पण ही गृहस्थ जीवन के सुख की कुँजी है।
परन्तु यह सुख उस समय मिट्टी में मिल जाता है जब एक दूसरे के प्रति त्याग की भावना समाप्त हो जाती है या समाप्त होने के लिए कद बढ़ाती है। जब एक दूसरे को शंका की नजर से देखते हैं या एक दूसरे को अपने अधीन रखने के प्रयत्न में लग जाते हैं। और जानते हैं, इसमें कौन सी भावना काम करने लगती है? वह भावना होती है दूसरे को कम देना और अधिक पाने की इच्छा रखना । यह इच्छा जिस दिन अंकुरित होती है सुख और शान्ति की भावना का उसी दिन से तिरोभाव आरम्भ हो जाता है। और एक नया शब्द जन्म लेता है जिसके द्वारा दूसरे को अपने काबू में रखने के लिए मानव व्यक्त करता है। वह शब्द है अधिकार। अधिकार दूसरे से कुछ चाहता है परन्तु दूसरे को देने की बात भूल जाता है। इस माँग और भूख की लड़ाई में ही गृहस्थ जीवन का सुख विदा माँगना प्रारम्भ कर देता है।
हम पहले ही बतला चुके हैं कि प्रेम के जीवन में सुख है और प्रेम त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ाता है। वहाँ अधिकार नामक शब्द के प्रवेश का निषेध है। वहाँ तो एक ही शब्द जा सकता है जिसका नाम कर्त्तव्य है। अपना कर्त्तव्य करते चलो। जो तुम्हारा प्राप्त है वह अपने आप मिल जायेगा। लेकिन कर्त्तव्य की बात भूल कर प्राप्त की बात को सामने रखने से प्राप्त करने में कठिनाई रहती है। समस्त झगड़े-बखेड़ों की यही एक मात्र जड़ है।
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि दुनिया का कार्य स्वयं ही आदान प्रदान से चल रहा है, जब कुछ दिया जाता है तब तुरन्त ही कुछ मिल जाता है। देना बन्द होते ही मिलना बन्द हो जाता है। इसलिए लेने की आकाँक्षा होने पर देने की भावना पहले बना लेना जरूरी होता है। अधिकार में लेने की भावना भरी रहती है, देने की नहीं। इसलिए आपस का प्रेम कम होना आरम्भ हो जाता है। जिस दिन ये अधिकार ही लालसा गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट हो जाती है, गृहस्थ जीवन कलह का अखाड़ा बन जाता है। आज यही कारण है कि अधिकाँश मानव इसी के शिकार हो रहे हैं और अपने जीवन को शाँत और दुखी बनाये हुए हैं। अपने ही हाथों उन्होंने अपनी सुख सुविधा को लात मार दी है।
अधिकार की मंशा है दूसरों को अपने अधीन रखना-अपनी इच्छा के अधीन रखना, अपने सुख का, भोग का यंत्र बनाना। जब किसी भावना का प्रवाह एक ओर से चलना आरम्भ हो जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया दूसरी ओर से भी होना आरम्भ हो जाती है। जब एक दूसरे को अपने भोग का यंत्र बनाना चाहता है तो दूसरा भी पहले को यंत्र बनाने की धुन में लग जाता है।
पुरुष ने जिस दिन से स्त्री को अपने भोग का उपकरण बनाना विचारा, उसी दिन से स्त्री ने भी पुरुष को अपनी तृप्ति का साधन बनाने की ठानी। एक दूसरे को सुख देने, प्रसन्न रखने की भावना का लोप हो गया। प्रेम की जगह भोग ने आश्रय लिया। धरनी की जगह रमणी की प्रतिष्ठा हुई। घर भूत का डेरा बनने लगा। गृहिणी जो आत्म साधिका थी, लिपस्टिक, जम्फर, जाकेट, विलायती तरीके के जूतों की साधिका बनी। दिखावट बढ़ी रुपयों की माँग बढ़ी, स्वच्छन्दता बढ़ी। और पुरुष ने उसे दबाकर रखने की माँग को बढ़ाया। इस तरह गृहकलह जन्मा, भोग और अधिकार के प्रश्न ने सेवा को खोया, प्रेम को खोया और आज घर-2 में चिताएं जल रही हैं।
एक युग था पति के बिना नारी घर में न रह सकती थी, पति के सुख को ही अपना सुख मानने वाली नारी पति के साथ वन जाकर - ‘भूमि सयन, बल्कल वसन, असन कन्द फलमूल। तेकि सदा सब दिन मिलहिं, समय समय अनुकूल॥
पाने वाली वन में भी सुखी रही और आज अधिकार का प्रश्न उठाने वाली महल में स्वच्छन्द रहने पर भी एक टीस, एक वेदना, लिए जिन्दा है। भावना बदलते ही जिन्दगी बदल गई। जिन्दगी की तृप्ति और शान्ति दोनों बिदा हो गये। मानव जीवन का जो श्रेयस्कर मार्ग था उसे छोड़कर भ्रष्ट पथ होने का पुरस्कार हजारों नर नारी रात दिन भोग रहे हैं इसलिए यह आवश्यक है कि उन्हें फिर से आर्य पथ पर चलने की तैयारी करनी चाहिए।
अधिकार माँगने से नहीं, देने से मिलता है। कर्त्तव्य कर्म करने से स्वयं उसका बदला मिल जाता है। भारतीय दर्शन में कर्त्तव्य का नाम ही धर्म है। पुरुष धर्म और नारी धर्म दोनों का आदि स्त्रोत समर्पण है। दोनों की भावनाओं में दिल में, दिल में और दिमाग में समर्पण की, उत्सर्ग की, भावना के बीजों को आरोपित करने से फिर से शान्ति तृप्ति और सुख का समावेश हो जायेगा, विवाहित जीवन का जो उद्देश्य है वह सफल होगा।
(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र, एम॰ए॰)
आत्मसुधार एवं मनुष्यों की सफलता के आंकड़ों की परीक्षा के पश्चात् पाश्चात्य विचारकों ने यह निर्देश किया है कि सौ में से केवल तीन ही व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो व्यापार में सफलता प्राप्त करते हैं। तैंतीस में से एक व्यक्ति सबसे ऊँचा उठ पाता है। शेष साधारण ही रह जाते हैं। वे अपनी जीविका उपार्जन तो करते हैं, किन्तु बड़ी सम्पत्ति के अधिकारी नहीं बन पाते। कुछ तो गरीबी की पंक्ति में ही रह जाते हैं।
बहुत कम आगे चल कर ऊँचे उठते हैं। एक वर्ष वैसा ही होता है, जैसा दूसरा वर्ष, उसमें कुछ भी उन्नति नहीं हो पाती। ऐसा क्यों होता है।
मानव जीवन की सात भूमिकाएँ-
साधारणतः मनुष्य के जीवन में सात स्टेज होती हैं। यदि सफल व्यक्ति 70 वर्ष जीवित रहा, तो उसका जीवन क्रम कुछ इस प्रकार रहेगा-
1 से 10 वर्ष तक-खेल कूद वाले चापल्य 10 से 20 वर्ष तक- शिक्षा प्राप्ति और पुस्तकावलोकन। 20 से 30 वर्ष तक- अपने व्यक्तित्व की पहचान, नाना क्रियाएँ। 30 से 40 वर्ष तक- सच्ची और ठोस उन्नति, संघर्ष 40 से 50 वर्ष तक- पूर्णता और सफलता 50 से 60 वर्ष तक- नाना प्रकार की शक्तियों की प्राप्ति । 60 से 70 वर्ष तक-प्रतिष्ठा और मनः शान्ति।
उपरोक्त तालिका में 10 से तीस वर्ष की आयु को तैयारी, या जीवन संघर्ष के लिए ज्ञान संचय की आयु माना जाता है। 30 वर्ष से 60 तक का जीवन नवीन और उत्पादक कार्य के लिए श्रेष्ठतम है। इन परिपक्व दिनों में मानव का ज्ञान और अनुभव संतुलित होता है, विवेक बुद्धि अपनी परिपक्वता को प्राप्त होती, और मनुष्य को अपनी स्थिति, शक्तियों एवं गुप्त सम्पदाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। साठ से सत्तर वर्ष की आयु प्रारम्भिक साठ वर्षों ज्ञान, बुद्धि, के अनुभव, विवेक का पुरस्कार हैं। उसमें मनुष्य मनः शान्ति का अपनी स्थिति, शक्तियों एवं गुप्त सम्पदाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। साठ से सत्तर वर्ष की आयु प्रारम्भिक साठ वर्षों के ज्ञान, बुद्धि, अनुभव विवेक का पुरस्कार है। उसमें मनुष्य मनः शान्ति और अमरत्व पद की प्राप्ति के लिए साधना में प्रवृत्त होता है। यही वह परिपुष्ट एवं सबसे अधिक प्रसन्नता का काल है, जिसके लिए मनुष्य का प्रारम्भिक संघर्ष चलता रहा था। इसी में जीवन का सर्वोच्च ज्ञान मिलता है।
हमारी त्रुटि कहाँ हैं?
वर्तमान असफल व्यक्तियों की प्रथम त्रुटि प्रारम्भिक तैयारी और आत्म की अनंत शक्तियों की वैज्ञानिक जानकारी का अभाव है मनुष्य जीवन की तैयारी के विषय में जागरुक नहीं रहते। उनमें उद्देश्य हीनता होती है। वहीं जीवन के नाना प्रलोभनों से ग्रसित मानव अपनी शक्तियों को उद्देश्य हीन कार्यों में नष्ट करते है। विवेकहीन मानव पिंड ही अपना विनाश करता है। शक्ति का मार्ग जब अनुचित मार्गों में खुल जाता है, तो मनुष्य एक ऐसे अंधकार में पड़ा रहता है, जहाँ से उसे यथार्थ आत्म ज्ञान नहीं होता।
नब्बे प्रतिशत व्यक्ति अपने विषय में गंभीरता से विचार नहीं करते वे अपनी मुख्य शक्तियाँ विशेषताएँ, प्रकृति की रुझान, मालूम करने की चेष्टा नहीं करते। हम अपना शक्तिशाली गुण कैसे मालूम कर सकते हैं? यह देखिये कि आपको किस कार्य को करने में सर्वाधिक शान्ति, संतोष, और आनन्द प्राप्त होता है। जिस कार्य में आपकी शक्तियाँ अनायास ही प्राकृतिक रूप में एकाग्र हो जाती हैं, वही हमारा मुख्य गुण है। उसी की दिशा में हमें विकास करना है, आगे उठकर सफलता लाभ करना है। शक्ति का सदुपयोग यदि इसी विशिष्ट गुण के विकास के हेतु चलता रहे, तो मनुष्य अपने मूल रूप को जाग्रत कर सकता है।
अपने व्यक्तित्व की गुत्थी सुलझाइये। अपना मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कीजिये। आप बाजार से कोई मशीन खरीदते है, तो उसकी विशेषताएँ दुकानदार से मालूम करते हैं। खेद है कि मनुष्य रूपी इस महाप्रतापी अटूट शक्तिपुँज शरीर की विशेषताओं का हमें ज्ञान नहीं? शरीर में जो मस्तिष्क है और मस्तिष्क के अणु अणु में जो नानाप्रकार की शक्तियों का खजाना मरा पड़ा है हमारे गुप्त मन में जो नाना व्यापार होते हैं, उनका हमें ज्ञान नहीं है। मनुष्य की शक्ति अनन्त है। वह भौतिकता की सीमा को चीर कर आध्यात्मिकता की ऊंचाई में उठती है। हम वास्तव में अपना विकास अवरुद्ध कर देते हैं, बढ़ना और विकसित होना समाप्त कर देते हैं, नवीन ज्ञान, और पराशक्ति के प्रकाश की ओर से नेत्र मूँद लेते है।
कृषक की उपज भूमि की जुताई तैयारी, खाद, जल तथा प्रकृति की कृपा पर है। यदि उसने अच्छी तरह जुताई और तैयारी करने में कसर नहीं रखी है, तो निश्चय ही उसे अच्छी फसल मिलेगी । यही तथ्य जीवन की तैयारी का भी है। अधिकाँश व्यक्ति किसी भी कार्य के लिए तैयारी नहीं करते। वे कुछ बनना ही नहीं चाहते यह एक कटु सत्य है। जो व्यक्ति कुछ भी नहीं जानता, किसी धन्धे में कुशल नहीं है, वह किस प्रकार सफल हो सकता है?
यदि आप अपनी आय, प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन की निष्ठा से असंतुष्ट हैं, तो सर्व प्रथम आत्म-निरीक्षण कीजिए। क्या आप जो रुपया पाते हैं, उससे ऊंची योग्यता या कुशलता रखते हैं? क्या आपकी शिक्षा और अनुभव ऊंचे हैं? आपको क्या क्या आता है? किस किस दिशा में आप दूसरों की अपेक्षा विकसित हैं? आपको क्यों अमुक पद दिया जाये? अपनी योग्यता, बुद्धि, अनुभव, स्वास्थ्य, चरित्र की दृढ़ता, में आप कितने व्यक्तियों को हरा सकते हैं?
पहले अपनी शक्तियों योग्यताओं और विशेषताओं को देखिये, तत्पश्चात् संसार से अपने लिए ऊंची तनख्वाह, प्रतिष्ठा, मान, इत्यादि पाने की आशा कीजिए। अधिक योग्यता अधिक की आशा कीजिए। अधिक योग्यता =अधिक मान, प्रतिष्ठा और रुपया। निम्नयोग्यता अपमान, दारिद्रय और बेकदरी। इसे साधारण न समझिये। योग्यताओं का ही संसार आदर करता है। योग्यता के आगे ही लक्ष्मी नत मस्तक होती है। आजकल के नवयुवक योग्यता तो बढ़ाते नहीं, यों ही कहते फिरते हैं कि कोई हमें पूछता नहीं? हमें पैसा नहीं मिलता?
हमारी योग्यता कैसे बढ़े?
योग्यता वृद्धि के लिए प्रथम तत्व अध्ययन और परिश्रम हैं। यदि मनुष्य परिश्रम करने के लिए प्रस्तुत है, सब कुछ भूलकर एक मार्ग में अपनी शक्तियों को लगा सकता है, तो वह अवश्य योग्यता बढ़ा सकेगा। आलस्य मनुष्य का सब से बड़ा शत्रु है, परिश्रम सबसे बड़ा मित्र। यदि आप परिश्रम करने को प्रस्तुत हैं, तो संसार की योग्यता आपकी होकर रहेगी।
योग्यता बढ़ाने के लिए जब आप अग्रसर हो तो दो शत्रुओं से सावधान रहें (1) निराशा का त्याग करें (2) असफलता से हतोत्साहित न हों। इनसे उन्नति का मार्ग कंटकाकीर्ण होता है। पग पग पर कठिनाईयाँ और अड़चने आती हैं, लोग कटु आलोचनाएं करते हैं, छिद्रान्वेषण होता है किन्तु सावधान। निराश न हो। आत्म प्रेरणा से कठिनाइयों को चीरते हुए निरंतर अग्रसर हों। यदि एक दो बार असफल हो जायें, तो मार्ग न त्यागें। डटे रहें। अनेक व्यक्ति आलसी तो नहीं होते किन्तु असफलता के एक साधारण से झटके से हतोत्साहित होकर बैठ जाते हैं।
आप ऐसे निराश डाँवाडोल व्यक्तियों में कदापि नहीं है। आप अपने में उच्चतम शक्तियों की उपस्थिति में विश्वास रखते हैं। आपकी मानसिक और बौद्धिक सम्पदाएं संसार को चमत्कृत करने वाली हैं। आप निरन्तर आगे बढ़ने के लिए बने है। अपने विषय में यह मनोवैज्ञानिक धारण, सही मार्ग है।
आप उस मुक्केबाज के विषय में क्या कहेंगे, जो एक मुक्का लगने से पस्त हिम्मत खोकर बैठ गया? यदि यही मुक्केबाज पुनः प्रयत्नशील है, तो कल वह अपने प्रतिद्वन्द्वी को अवश्य पराजित करेगा । यदि आप अपनी योग्यताएं बढ़ाने में सतत उद्योगशील हैं, तो आज नहीं, कल आप अवश्य ही योग्यतम व्यक्तियों में होंगे।
योग्यता वृद्धि के उपकरण-
योग्यता बढ़ाने के लिए कुछ मार्ग इस प्रकार हैं-(1) पुस्तकों का अध्ययन परीक्षाएं तथा स्वतन्त्र स्वाध्याय। जितनी पुस्तकें आज सस्ती हैं, वैसी कभी नहीं रही। इतनी सुविधाएं मनुष्य को कभी प्राप्त नहीं हुई हैं। शिक्षा के अनेक कोर्स पृथक भी बिकते हैं, जिन्हें खरीद कर आप अपनी योग्यता बना सकते हैं। यह मत समझिये कि आपको कोई आकर्षक सी डिग्री प्राप्त नहीं हुई। योग्यता के सन्मुख डिग्री का कोई महत्व नहीं। पुस्तकों का अध्ययन इस गंभीरता, शुद्धता, पूर्णता, और सम्हाल कर होनी चाहिए कि मूल तत्व स्मृति पर सदा के निमित्त अंकित हो जाये।
(2) दूसरा मार्ग बड़े विद्वानों का संपर्क है। उनके भाषण तथा प्रवचन अथवा करने से मानव उत्तरोत्तर सदर्शन संचय करता है और द्विगुणित वेग से उच्चता और पवित्रता की ओर उठता है। सत्संग के समान योग्यता वृद्धि का दूसरा सहज साधन नहीं है।
(3) तृतीय मार्ग संसार का भ्रमण और क्रियात्मक अनुभव प्राप्त करना है। मनुष्य को अधिक से अधिक व्यक्तियों, शहरों और समाज के कार्यों के संपर्क में आना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अनुभवों का एक संसार लिए फिरता है। उस अनुभव को आप मस्तिष्क में रखने के लिए प्रस्तुत रहिये।
(4) मनुष्य का सामाजिक जीवन सबसे बड़ा शिक्षक है। समाज में अधिक से अधिक कार्य करने से मनुष्य नाना प्रकार के ज्ञान से पूर्ण होता है। ज्ञान का भण्डार तो आपके इर्द गिर्द फैला पड़ा है उसे बटोरने भर की आवश्यकता है।
(5) योग्यता प्रदर्शन के निमित्त इन कलाओं को सीखिये (1) भाषण देने की कला (2) लेखन द्वारा विचार प्रतिपादन (3) बातचीत करने की संभाषण कला (4) इन्टरव्यू (5) रेडियो के भाषण सुनना समाचार पत्र पढ़ना तथा उसमें लेख, कहानी, आवश्यक सामयिक ज्ञान संचय करना। इन्हीं के सहारे लेख लिखा जाता है। अपने विचारों को लिपिबद्ध करना आत्म प्रकटीकरण का सर्वोत्तम उपाय है। साहित्य क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए यह आवश्यक है कि हम किसी खास विषय का विशेष अध्ययन करें। कौन विषय हमारे युग-धर्म के अनुकूल हैं? इसका निर्णय स्वयं अपनी रुचि के अनुसार करना चाहिए।
सम्पादकाचार्य पं॰ बनारसीदास चतुर्वेदी ने ठीक ही लिखा है- नवयुवक लेखक के लिए किसी विषय का विशेष अध्ययन कर लेना ही साहित्य क्षेत्र में प्रवेश करने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। आज का युग विशेषता का है।
किसी अच्छे पुस्तकालय के सदस्य बन जाइये। अनेक व्यक्तियों को यह पता नहीं कि कलकत्ते की इम्पीरियल लाइब्रेरी पुस्तकों के मूल्य के रूप पंद्रह बीस रुपये जमानत के तौर पर जमा करके और दुतरफा डाक व रजिस्ट्री का खर्च लेकर पुस्तकें उधार दिया करती है। उसी से लाभ उठाइये। छोटे छोटे निजी पुस्तकालयों के निर्माण की भी बड़ी आवश्यकता है। मास में कुछ रुपया उत्तम पुस्तकों के लिए रखिये । लेख लिखना बहुत कुछ अभ्यास और परिश्रम पर निर्भर है। प्रारम्भ में किसी मार्ग दर्शक के मिल जाने से कोई भी शिक्षित व्यक्ति अपनी भाषा में अपने भाव साधारणतया प्रकट कर सकता है। शिष्यत्व की भावना विकसित कीजिये और योग्य विद्वानों की संगति में रहिये।
हमारा जीवन साहित्य में प्रतिबिम्बित होता है। यदि हमारा जीवन उच्चकोटि का, ऊँचे आदर्शों, संयम और लोकोपकार पर निर्भर नहीं है, तो उसका कुप्रभाव कृतियों पर हो सकता है। अतः जीवन को ऊंचा उठाइये और फिर अपने अनुभव भाषा में प्रकट कीजिये। अत्याचार के विरुद्ध आपकी लेखनी तीव्र होनी चाहिए। एक रूसी लेखक ने लिखा है-
“क्या तुम लेखक बनना चाहते हो? यदि हाँ, तो मनुष्य जाति के पुराने जमाने के संबित दुःख समूह का इतिहास पढ़ो। अगर उसे पढ़ते हुए तुम्हारा हृदय विदीर्ण न हो तो अपनी लेखनी छोड़ दो। तब सब कोई तुम्हारे पाषाण हृदय की खेदजनक शुष्कता को पहचान लेंगे।”
अन्याय और अत्याचार के प्रति लिखने से आपकी वाणी में खोज आयेगा।
(श्री॰ मनोहर दयालजी वर्मा जबलपुर)
महर्षि जमदग्नि के पास एक कामधेनु थी जिसको कीर्ति ने लेना चाहा तथा महर्षि जी का वध कर दिया। इस बात पर से जमदग्नि के पुत्र परशुराम जी ने महावली कीर्ति वीर्य की सेना का संहार किया एवं क्षत्रियों के नाश पर तुल गये। इस उपयुक्त वर्णन से सिद्ध होता है कि गौ के कारण आर्य महर्षियों और ब्राह्मणों को घोर युद्ध करना पड़ा था। यह वार्ता गोरक्षा के महत्व को भली भाँति प्रकट करती है।
रामचन्द्रजी के गुरु श्री वशिष्ठ जी के पास एक कामधेनु गौ थी, राजर्षि विश्वामित्र द्वारा महर्षिजी की कामधेनु को बल पूर्वक हड़पने का प्रयत्न किया गया परन्तु महर्षि के क्रोध से एक भयंकर सेना ने उद्भव होकर विश्वामित्र राजा की सेना को परास्त किया। इसमें सिद्ध है कि गौ को छीनने पर घोर युद्ध होता था।
महाराज दलीप के कोई सन्तान न थी । राजा तथा रानी गुरु वशिष्ठ की आशा से गायों को वन में चराते थे। एक बार हिंसक सिंह ने गाय पर आक्रमण किया। सिंह भूखा था तथा माँसाहार से ही उसकी क्षुधा शान्त होती है अतएव राजा ने स्वयं सामने होकर उनके माँस को खाकर सिंह से भूख शान्त का निवेदन किया। हिंसक पशु भी पसीजा तथा गौ भक्ति को देखकर पीछे पैर लौट गया। इससे सिद्ध है कि भारतीय सम्राट गौ रक्षा हेतु अपने प्राण तक समर्पण करने को तैयार रहते थे।
भारतवर्ष में गुरु नानक, गोविन्द सिंह, बन्दा वैरागी, शिवाजी, राणाप्रताप विशेष रूप से गौ भक्त हुये हैं। सम्राट अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में भी गोघात करने वाला प्राणी दण्ड का भागी होता था।
वेदों में गौ के लिये 171 जगह “श्रधन्यों” शब्द आया है जिसका अर्थ = न मारने योग्य है। चारों वेदों में सैकड़ों मन्त्र गौओं की महिमा के आये हैं यथाः= पशुन् पाहि, गाय महिसीः अजाँ मा हिन्सीः अर्वि माहिन्सीः इमंमाहिन्सी र्द्धपाँद पशु, मा हिग्सीरेक सफं पशु। अर्थात् पशुओं की रक्षा करो। गाय, बकरी भेड़ को न मारो, मनुष्य और द्वपिद पक्षिओं को मत मारो। एक खुर वाले घोड़े गधे को न मारो पुनः अथर्ववेद- 9/6/9 में लिखा है कि एतइदवाउ स्वादपि य दघि गंवक्षीरं व माँस व । तदेव नाश्नीयात॥ अर्थात् गाय का दूध, दधि ओर घी खाने योग्य है। माँस नहीं। ऋग्वेद 8/4/18 में हैं कि जो राक्षस, मनुष्य का घोड़े का और गाय का माँस खाता हो तथा दूध की चोरी करता हो उसके सिर को कुचल देना चाहिए। ऋग्वेद 8/101/15 “के मन्त्र माता रुद्राणाँ । दुहिता वसूना” में गो को मारने की मनाही की गई है। अथर्ववेद 101/29 में= अमा गो हत्या वे मीसा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुष वर्धाः अर्थात् हे क्रूर स्त्री तू गौ, घोड़े पुरुष की हत्या न कर । यजुर्वेद ग॰ 30 मन्त्र 18 में है कि अन्तदाय गौ घात गौ घाती का प्राणदण्ड दो।
भगवान रामचन्द्र जी के अवतार के कारणों पर प्रकाश डालते हुए रामायण में गोस्वामी तुलसीदास जी कहा है-विप्र धेनु, सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार।
देश हित देशोन्नति, देशवृद्धि तथा देश को उच्च बनाने के हेतु गो रक्षा को महत्व देना अत्यावश्यक है। गौ हमारे देश की सम्पत्ति है इसी के द्वारा हमें अन्न तथा दूध की प्राप्ति होती है। भारत माता को स्वाधीन करा लेने के उपरान्त जनता का ध्यान अब गोमाता के प्राण बचाने के लिए भी जाना आवश्यक है। इस धार्मिक देश के स्वतंत्र होने पर भी गौ वध होना एक कलंक की बात है।
(आयुर्विज्ञानाचार्य पं॰ गयाप्रसाद जी शास्त्री, श्रीहरि)
मोटापा या मेदोवृद्धि के समान ही “कृशता” भी एक भयंकर रोग है। जिस प्रकार अत्यन्त मोटा आदमी संसार के प्रत्येक कार्य तथा पुरस्कार से वंचित हो जाता है, उसी प्रकार एक कृश मनुष्य भी अल्पप्राण तथा अल्पबल होने के कारण जीवजगत के लिये प्रायः अनुपयोगी होता है। मोटापे में अत्यधिक पेट बढ़ने के कारण वीर्य आदि अन्य धातुओं की वृद्धि रुक जाने से पुरुष पुरुषत्व से वंचित हो जाता है एवं कृशता में वायुदोष की अतिशय वृद्धि के कारण रस, रक्त तथा वीर्य में उत्सुकता बढ़ जाने से वीर्य क्षय हो जाता है। मोटे आदमी में आलस्य बढ़ जाने के कारण जहाँ वह अजगर के समान किसी स्थान के ऊपर पड़े रहने में ही सुख मानता है। वहीं दुर्बल या कृश मनुष्य के स्वभाव में बहुत अधिक आशुकारिता या चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। मोटे आदमी में अपेक्षाकृत कामवासना की कमी होती है किन्तु कृश आदमी बेहद कामी होता है। मोटे पुरुषों के प्रायः सन्तान का अभाव पाया जाता है किन्तु कृश व्यक्तियों के यहाँ कीड़े-मकोड़ा के समान निर्वीर्य निष्प्राण तथा कमजोर सन्ततियाँ पाई जाती हैं। मेदोवृद्धि या मोटापा रोग की प्रवृद्ध दशा में निद्रानाश तथा बहुमूत्र आदि रोग मुख्यतः पैदा होते हैं और कृशता में विश्वास, रक्तपित्त तथा क्षय आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उक्त सब लक्षण तथा रोग केवल लैंगिक अन्तर के साथ-2 स्त्रियों तथा पुरुषों दोनों में ही समानरूप से पाए जाते हैं। फलतः मोटापा तथा कृशता दोनों की अवाँछनीय भयंकर रोग हैं।
अत्यधिक मोटा होना या अत्यधिक कृश होना केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही भयंकर हानिकर नहीं है किन्तु ये दोनों ही प्राणी देखने में भी अत्यन्त कुरूप पाए जाते हैं। जिस घर में इस प्रकार के रूप-रंग तथा ढंग-बेढंग के जीव होते हैं, वह घर सर्वसाधारण की दृष्टि में कई बार यदि मुर्दा अजायब घर नहीं तो कम से कम जिन्दा अजायब घर तो अवश्य प्रतीत होता है।
कृशता रोग के अनेक कारणों के होते हुए भी हम यहाँ मुख्य-2 कारणों के ऊपर ही कुछ प्रकाश डालेंगे। साधारण तथा “कार्श्यरोग“ को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक स्वाभाविक कार्श्य और एक अस्वाभाविक कार्श्य। जिन लोगों के माता-पिता दोनों ही या दोनों में से कोई भी एक अत्यन्त कृश या कमजोर हुआ करते हैं, उनकी संतानें भी जन्म से ही कार्श्य रोग का शिकार हुआ करती हैं। जिन दंपत्तियों के बहुत शीघ्र-शीघ्र सन्तानोत्पत्ति हुआ करती है, उनके बच्चे भी पर्याप्त मात्रा में माता का दुग्ध या अन्य पोष्य पदार्थ न पाने से प्रायः आजन्म कृश रहते हैं। इनकी कृशता स्वाभाविक है और यह कृशता प्रायः किसी भी उपचार से शीघ्र दूर नहीं होती है। इस प्रकार के कार्श्य रोगी प्रायः अकाल में ही मृत्यु का शिकार हुआ करते है।
दूसरा कार्श्य रोग का कारण है शुद्ध घी, दूध, मक्खन, दही आदि पोष्य पदार्थों का एकान्त अभाव। कुछ राजा-रईस, सेठ साहूकार, तथा पूँजीपतियों को छोड़कर आज इस पराधीन भारत के घर घर में जो अस्थि मात्र शेष नर कंकाल दिखलाई पड़ रहे हैं, उसका मूल कारण है पेट की ज्वाला शान्त करने के लिए मुट्ठी भर दानों की कमी या अभाव। जिस देश में कभी घी-दूध की नदियाँ बहतीं थी, जहाँ का मुख्य आहार ही घी, दूध, दही, छाछ, कन्दमूल एवं भिन्न भिन्न प्रकार के मधुर फल थे और जिस सात्विक आहार के कारण ही जहाँ लोग चिरायु होते थे उसी स्वर्गिक देश के बच्चों को आज रातदिन होने वाले गोधन-संहार के कारण गन्दे, बाजारू वनस्पति घी के चक्कर में पड़कर अपने रहे सहे स्वास्थ्य तथा जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है। फलतः कार्श्यरोग का कारण है अन्न, घी, दूध आदि पौष्टिक पदार्थों का अभाव।
कार्श्यरोग का तीसरा कारण है अत्यधिक चिन्ता करना, क्रोध करना, शोक करना, रात्रि को दो बजे तक जागते रहना, गाँजा, भाँग, शराब आदि नशीली चीजों की सेवन करना, किसी छोटी सी भी साँसारिक घटना के ऊपर मजाक करके बात का बतंगड़ बनाते रहना, किसी से घोर ईर्ष्या करना, घृणा करना, बैर करना, तथा शक्तिशाली बैरी से बदला लेने की प्रति कुभावनाओं से अपने शरीर के रक्त को कम करते रहना, बहुत अधिक पढ़ने-लिखने आदि दिमागी काम करना तथा बहुत अधिक विषय, विलास एवं व्यभिचार-स्त्री प्रसंग आदि के द्वारा शुक्र, वीर्य तथा शोषित बल का क्षय करना। सब पूर्वोक्त कारणों से शरीरांतर्गत वायु प्रकुपित होकर रस, रक्त, माँस, भेद एवं वीर्य आदि धातुओं का क्षय करके मनुष्य को “कार्श्यरोग“ का शिकार बनाता है।
लक्षण
आँख में चमक, प्रकाश, शुभ्रता तथा अभाव के साथ-2 गड्ढे में घुस जाना बालों का तथा यौवन के पुण्य प्रभाव एवं उमंग तरंगों के समय गालों का पिचक जाना, मुखमण्डल पर खून की लाली के अभाव के साथ-2 मुंहासा, झाँई, फुँसियों और फुर्रियों का बाजार लगना, ललाट एवं नेत्रों के नीचे कलंक रूप काली रेखाओं तथा दागों का पड़ना, मुख से सुन्दरता, प्रकाश, तथा प्रसन्नता का लोप होना, अंस, बाहु, वक्षःस्थल तथा दोनों जंघाओं में आवश्यक एवं पर्याप्त माँस का न होना, शरीर का रक्त माँस शुष्क होकर कंकाल के समान कुरूप हो जाना, रक्त तथा वीर्य में उष्णता पैदा हो जाने के कारण पेशाब-पाखाने या स्वप्न के समय वीर्य का क्षय होना एवं जीवन में उत्साह, साहस तथा शक्ति के अभाव के कारण किसी भी कर्तव्य में उदासीनता और मन का न लगना। कार्श्य रोग के रोगी में सब पूर्वोक्त लक्षण लक्षित होने लगते हैं।
उपचार
कार्श्य रोगी या दुबले-पतले मनुष्यों को निम्न उपचार या औषधियाँ काम में लानी चाहिए। इन सब उपचारों से कृशता तथा दुर्बलता दूर होकर शरीर हृष्ट-पुष्ट तथा बलवान बनता है। कार्श्यरोगी को सब से प्रथम अपनी दिनचर्या तथा रात्रिचर्या को ठीक करना चाहिए। गर्मियों में नियम पूर्वक प्रातः 4 बजे तथा शीतकाल में प्रातः 5 बजे उठकर और मुख हाथ धोकर एक गिलास जल पीना चाहिए। इसे वैद्यक शास्त्र में ‘अमृतपान’ कहते हैं। इस ‘अमृतपान’ के द्वारा अंतड़ियों की गर्मी, खुश्की तथा सड़ाँध दूर होकर पुराने से पुराने मलावरोध (कब्ज) दूर होता है। जल पीने के 5-10 मिनट के बाद शौच जाना चाहिए। सभी प्रातः कृत्यों से निवृत्त होकर प्रतिदिन नियम पूर्वक किसी सुन्दर उद्यान में भ्रमणार्थ जाना चाहिए। चिन्ता, शोक, घृणा, ईर्ष्याद्वेष, क्रोध तथा प्रति हिंसा की भावनाओं को अपने मन में न आने देना चाहिए। सदा स्वयं प्रसन्न और हंसते रहना तथा प्रसन्नचित्त मित्रों का साथ करना। गन्दे चित्रपटों, नाटकों तथा उपन्यासों को देखने एवं पढ़ने से दूर रहना जिनके द्वारा मानसिक वृत्तियों में क्षोभ पैदा हो या किसी प्रकार की भी उत्तेजना पैदा हो। स्वादिष्ट और मीठे फलों के रस में मिश्री या शहद मिला कर प्रातः सायं पीना। फल, सूखी, मेवा, दूध, घी, मक्खन, दही, छाछ, शाक-भाजी तथा हितकारी, हलके, सुपाच्य, सात्विक आहारों का सेवन करना। अधिक से अधिक विश्राम तथा शयन करना । रात्रि में 9 बजे हाथों-पैरों तथा मुख को धोकर सद्भावनाओं के साथ भगवान् का स्मरण करते हुए निश्चित होकर सो जाना। विषय भोग से दूर रहना। माता-पिता, गुरुजन तथा अन्य पूज्य जनों की सेवा करके उनसे फिर जीवन तथा सुन्दर स्वास्थ्य प्राप्त करने का शुभाशीर्वाद प्राप्त करना। दीनों पर दया करना तथा यथाशक्ति उन्हें दान देना। सुखी एवं सदाचारी मित्रों का सदा साथ करना। अपने तन में, मन में एवं रोम रोम में आनन्द, उल्लास तथा नव-जीवन का अनुभव करना। ये सब उपचार ऐसे हैं, जिनके द्वारा मनुष्य केवल कार्श्य ही क्या सभी प्रकार के रोगों से मुक्त होकर दीर्घायु प्राप्त कर सकता है।
(संकलनकर्ता-पं॰ श्री मदनमोहन जी विद्याधर)
(1) जब जीव सच्चे मन से अपनी आत्मा, प्राण एवं सब सामर्थ्य में परमेश्वर को भजता है तो वह करुणामय उसे अपने आनन्द में स्थिर कर देता है। जैसे कोई छोटा बालक यदि घर के ऊपर से अपने माता-पिता के पास नीचे आना चाहता है, अथवा नीचे से उनके पास ऊपर जाना चाहता है तो माता-पिता हजारों आवश्यक कार्यों को छोड़कर और दौड़कर अपने बच्चे को गोद में उठा लेते हैं, वैसे ही जब कोई सच्चे आन्तरिक भाव से कृपानिधि परमेश्वर की ओर चलता है तो वे अनन्त शक्ति रूप अपने हाथों से उस जीव को उठाकर सदा के लिये अपनी गोद में रख लेते हैं, फिर उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं देते और वह सदा आनन्द मग्न रहता है।
(2) जो परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना नहीं करता, वह कृतघ्न और महामूर्ख है, क्योंकि जिसने जीव के सुख के लिये इस जगत् के सारे पदार्थ दे रक्खे हैं, उस ईश्वर के गुण भूल जाना-उसी को न मानना-कृतघ्नता और मूर्खता ही है।
(3) सब मनुष्यों को सब प्रकार से सब काल में सत्य से ही प्रीत करनी चाहिये, असत्य से कभी नहीं। हे मनुष्यों ! तुम अमृत अर्थात् झूठ या अन्याय के करने में कभी प्रीत मत करो।
(4) सत्य से ही मनुष्यों को व्यवहार और मुक्ति का उत्तम सुख मिलता है।
(5) सत्याचरण का ठीक-ठीक फल है कि जब मनुष्य निश्चित रूप से केवल सत्य ही मानता, बोलता और करता है तो वह जो-जो काम करता और कराना चाहता है, वे सब सफल हो जाते हैं।
(6) धर्म का स्वरूप न्यायाचरण है। न्यायाचरण इसे कहते है कि पक्षपात छोड़कर सब प्रकार सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग किया जाये।
(7) जो मनुष्य महामूर्ख है, वे ऐसा समझते है कि सत्य से व्यवहार का नाश और असत्य से उसकी सिद्धि होती है। परन्तु यदि कोई भी पुरुष किसी को व्यवहार में झूठा समझ ले तो उसकी सारी प्रतिष्ठा और विश्वास नष्ट होकर उसके व्यवहार का भी नाश हो जाता है। और जो सब प्रकार के व्यवहारों में झूठ छोड़कर सत्य ही बोलते हैं, उनको तो लाभ ही लाभ होता है, हानि कभी नहीं होती, सत्य व्यवहार का नाम ही धर्म और इससे विपरीत का अधर्म है। क्या धर्म को फल सुख और अधर्म का फल दुःख ही नहीं है? इसलिये जिस सत्य के आचरण से धर्मप्राण ऋषिगण सत्य के भंडार परमात्मा को पाकर आनन्दित हुए थे और जिससे जब भी वैसा ही आनन्द प्राप्त होता है, उसका सेवन मनुष्य क्यों न करें। यह निश्चित है कि सत्य से परे कोई धर्म और असत्य से परे कोई अधर्म नहीं है। अतः वे ही पुरुष धन्य हैं, जो झूठ का आश्रय तनिक भी नहीं लेते।
(8) जो वेद-शास्त्रोक्त हो और जिसकी प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परीक्षा कर ली गई हो, वह पक्षपातशून्य सत्य ही न्याय रूप धर्म है। उसके आचरण में सर्वदा प्रीति रक्खो तथा अपने आत्मा प्राण और मन को सत पुरुषार्थ एवं स्वभाव से युक्त करके सदा सत्य में ही प्रवृत्त करो।
(9) धर्मात्मा का ही लोक में विश्वास होता है, धर्म से ही लोग पापों से छूटते हैं, जितने उत्तम कर्म हैं, वे सब धर्म के ही अंतर्गत हैं, इसलिये धर्म को ही सबसे श्रेष्ठ समझना चाहिये।
(10) जिस मनुष्य ने किसी के सामने एक बार भी चोरी, जारी या मिथ्या भाषणादि कोई कुकर्म कर लिया, उसकी प्रतिष्ठा उसके सामने मृत्युपर्यन्त नहीं होती। जैसी हानि मिथ्या प्रतिज्ञा करने वाले की होती है, वैसी और किसी की नहीं होती, इसलिये जिसके साथ जैसी प्रतिज्ञा की जाये, उसके साथ उसे उसी प्रकार पूरा करना चाहिये।
(11) जो मनुष्य विद्या कम भी जानता हो परन्तु दुष्ट आचरण छोड़कर धार्मिक आचरण करता हो तथा खाना-पीना, बोलना-सुनना, उठना-बैठना, लेना-देना आदि सब व्यवहार यथायोग्य सत्यानुकूल करता हो, वह कभी दुःख को प्राप्त नहीं होता। और जो सारी विद्या पढ़कर पूर्वोक्त सद्व्यवहारों को छोड़कर दुष्ट कर्म करता है, वह कभी कहीं भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता ।
(12) विद्याभ्यास सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्संग ब्रह्मचर्य एवं जितेन्द्रियता आदि जितने उत्तम कर्म हैं, वे सब तीर्थ कहलाते हैं, क्योंकि इनके द्वारा जीव दुःख सागर से तर जा सकते हैं।
(13) परमेश्वर की सम्यक् उपासना करके इस प्रकार उन्हें समर्पण करें कि ‘हे दयानिधे! आपकी कृपा से हम जो जो शुभ कर्म करते हैं, वे सब आपके अर्पण हैं, जिससे कि हम लोग आपको प्राप्त होकर सत्य एवं न्यायानुकूल आचरण रूप धर्म, धर्मानुकूल पदार्थों की प्राप्ति कर अर्थ, धर्म, और अर्थ के द्वारा इष्ट भागों का सेवन कर काम तथा समस्त दुःखों से छूटकर सर्वदा आनन्दमग्न रहना रूप मोक्ष प्राप्त कर सकें।
अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तक।
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इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति गहरे अनुभव और अनुसन्धान के साथ लिखी गई है।
(1) मैं क्या हूँ।
(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान।
(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान।
(4) परकाया प्रवेश।
(5) स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या।
(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार।
(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान।
(8) भोग में योग।
(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय।
(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य।
(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि।
(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि।
(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?
(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना।
(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?
(17) गहना कर्मणो गतिः
(18) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर प्रकाश।
(19) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा।
(20) शक्ति संचय के पथ पर।
(21) आत्मगौरव की साधना।
(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान।
(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला।
(24) आन्तरिक उल्लास का विकास।
(25) आगे बढ़ने की तैयारी।
(26) अध्यात्म-धर्म का अवलोकन।
(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन।
(28) ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग।
(29) यम नियम।
(30) आसन प्राणायाम।
(31) प्रत्योहार, धारण ध्यान और समाधि।
(32) तुलसी के अमृतोमय गुण।
(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान।
(34) मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा।
(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग।
(36) हस्त विज्ञान।
(37) विवेक सतसई।
(38) संजीवनी विद्या।
(39) गायत्री की चमत्कारी साधना।
(40) महान जागरण।
(41) तुम महान हो।
(42) गृहस्थ योग।
(43) अमृत, पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति।
(44) घरेलू चिकित्सा।
(45) बिना औषधि कायाकल्प।
(46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण।
(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?
(48) विचार करने की कला।
(49) दीर्घ जीवन के रहस्य।
(50) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?
(51) लेखन कला।
(52) प्रार्थना के चमत्कार।
(53) विचार संचालन विद्या।
(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।
(55) अध्यात्म शास्त्र।
(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।
(57) सफलता के तीन साधन।
(58 )शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य।
(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति।
(60) दैवी सम्पदाएं।
(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार।
(62) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान।
(63) सुखी वृद्धावस्था।
(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग।
(65) वैज्ञानिक अध्यात्मवाद।
(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनायें।
(67) योग के नाम पर भावाचार।
(68) जादूगरी या छल।
(69) सौभाग्य बढ़ाना।
(70) सम्मोहन विज्ञान।
(71) ब्रह्मचर्य विज्ञान।
(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व।
(73) प्रेम का रहस्य।
(74) अमृत कण।
(75) उपवास के चमत्कार।
(76) प्रसिद्धि और समृद्धि।
(77) स्त्री-रोग-चिकित्सा।
(78) बाल-रोग-चिकित्सा।
(79) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत।
(80) यज्ञोपवीत से धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की प्राप्ति।
मूल्य में कमी के लिये लिखा पढ़ी व्यर्थ है। छह से अधिक रुपये की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ
व्यवस्थापक “अखंड ज्योति” कार्यालय मथुरा।
( श्री पं॰ ईश्वरलाल शर्मा)
छोटे से मानव प्राणों में सारी विश्व वेदना भर कर।
अर्ध निशा में तरुण चला वह ले विराग की ज्योति मनोहर॥
उसने नग में कम्पित होकर प्रलयंकर का ताँडव देखा।
उसने अग्नि शिखाओं में भस्मित होता सारा सब देखा॥
उसने देखा पशुता मानवता को पूर्णावृत्त किये है।
उसने देखा अनुकूल अपने अन्तर का अभिशाप लिये है॥
देखा उसने कथित ज्ञान है बना हुआ शोषण का साधन।
देखा उसने प्राणपहरण बना हुआ है-देवाराधन॥
उसके सम्मुख तारक माला भरे बनी थी अग्नि कणों सी।
उसके सम्मुख जीवन की स्थिति थी केवल परितृप्त क्षणों सी॥
बना दिया उसको विद्रोही इस भीषण नम उत्पीड़न ने।
“चलो विश्व स्वतन्त्र खोजने” कहा अर्धम्पत उसके मनने॥
बोल उठा वह तरुण-मुझे अब मेरे ममता मोह, विदा दो।
राग विदा दो, द्वेष विदा दो, क्षोभ विदा दो, द्रोड़ विदा दो॥
मेरे धन वैभव, तजता हूँ, आज तुम्हारी मादक ममता।
फैल सके जिससे यत्किंचित् विश्व व्यापिनी निर्मल समता॥
सर्व नाशिनी राज तृष्णा का सत्वर ही आत्यन्तिक क्षय हो।
मेरा अन्तर तम वसुधा की शान्ति साधना में ही लय हो॥
राहुल के सुकुमार प्यार को कहाँ आज मैं ठुकराता हूँ?
कहाँ स्नेह सी शुचि यशोधरा को मैं हा! तजने जाता हूँ?
पाकर मैं बुद्धत्व शीघ्र ही यहाँ लौट कर आ जाऊंगा।
इस मृदुता को, इस शुधिता को मानव बनकर अपनाऊंगा॥
राम! तुम्हारा ही आश्रय हो एक मात्र मुझको निर्जन में।
जिससे दिव्य ज्योति प्रकटित हो मेरे इस कलुषित जीवन में॥
-मानव धर्म,
*समाप्त*