संतों की अमृत वाणी


संतों की अमृत वाणी

तुलसी माया नाथ की, घट घट आन पड़ी।

किस किस को समझाइये, कूये माँग पड़ी॥

है नियरे दीखे नहीं, धिक धिक ऐसी जिन्द।

तुलसी या संसार के, हुआ मोतिया बिन्द॥

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।

आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥

पपिहा प्रण कबहुँ न तजे, तजे तो तन बेकाज।

तन छूटे तो कुछ नहीं, प्रण छूटे तो लाज॥

जिन जैसा सत्संग किया, वैसा ही फल लीन।

कदली साँप भुजंग मुख, बून्द एक गुण तीन॥

हरिजन से तो रूठना, संसारी से हेत।

सो नर ऐसे जाएंगे, ज्यों मूरी का खेत॥

सिंहों के लहडे नहीं, हंसों की नहिं पाँत।

लालों की नहिं बोरियाँ, संतों की न जमात॥

देह धरे का दण्ड है, सब काहू को होय।

ज्ञानी काटे ज्ञान से, मूरख काटे रोय॥

तरुवर पत्तों से कहे, सुनो पात एक बात।

या घर ये ही रीति है, इक आवत एक जात॥

जो ऊगै सो अस्त हो, फूले सो कुम्हलाय।

चिनिया मन्दिर गिर पड़े, जनमे सो मर जाय॥

हंसा बगला एक सौ, मान सरोवर माहि।

बगुला ढूंढ़े मछली, हंसा मोती खाहि॥

निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करत सुभाय॥

सभी खिलौना खाँड के, खाँड खिलौना नाहिं।

तैसे सब जग ब्रह्म में, ब्रह्म जगत है नाहिं॥

तत्व वस्तु जिसको मिली, सो क्यों करत पुकार।

सूरदास की कामिनी, किल पर करे सिंगार॥

काम बिगाड़े भक्ति को, ज्ञान बिगाड़े क्रोध।

लोभ बिराग बिगाड़ दे, मोह बिगाड़े बोध॥

साँचे बिन सुमरन नहीं, भय बिन मनि न होय।

पारस से परदा रहे, कंचन किस बिध होय॥

आशा तो एक राम की, दूजी आश निराश।

नदी किनारे घर करे, कभी न मरे पियास॥

लघुना से प्रभुता बढ़े, प्रभुता से प्रभु दूर।

चींटी मिस्री खातहे, हाथी फ कत धूर॥

नानक नन्हा हो रहो, जैसी नन्हीं दूब।

और घास जल जायगी, दूब रहेगी खूब॥

करनी बिन कथनी कथे, गुरुपद लहे न सोय।

बातों के पकवान सों, धापे नाही कोय॥

तुलसी गुरु प्रताप से, ऐसी जान पड़ी।

नहीं भरोसा श्वाँस का, आगे मौत खड़ी॥

तुलसी बिलंब न कीजिये, भजिये नाम सुजान।

जगत मजूरी देत है, क्यों राखें भगवान॥

माला मन से लड़ पड़ी, तू मत बिसरे मोय।

बिना शस्त्र के सूरमा, लड़त न देखा कोय॥

भजन करन को आलसी, भोजन को हुशियार।

तुलसी ऐसे पतित को, बार-बार धिक्कार॥

अरब खरब लों द्रव्य है, उदय अस्त लों राज।

बिना भक्ति भगवान की, सभी नरक का लाज॥

तुलसी या संसार में, पंच रतन हैं सार।

संतमिलन अरुहरिभजन, दयादीन उपकार॥

तुलसी या जग भय, कर लीजे दो काम।

देने को टुकड़ा भला, लेने को, हरि नाम॥

सन्स बंधन आधीनता, परतिय मात समान।

इतने में हरि ना मिलें, तुलसीदास जमान॥

राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।

तुलसी भीतर बाहिरौ, जो चाहत उजियार॥

धन जोबन यों जायगो, जा बिधि उड़त कपूर।

नारायण गोपाल भज, क्यों चाटे जग धूर॥

राम नाम जपते रहो, जब लग घट में प्रान।

कबहुँ तो दीनानाथ के, भनक पड़ेगी कान॥

तनसे मन से बचन से, देत न काहु दुःख।

तुलसी पाप झरत हैं, देखत उनका मुक्ख॥

एक भरोसो एक बल, एक आश विश्वास।

स्वाति सलिल हरिनाम है, चातक तुलसीदास॥

संत सभा झाँकी नहीं, कियो न हरिगुण गान।

नारायण फिर कौन विधि, तु चाहत कल्यान॥


दुख की मार!


दुख की मार

(श्री॰ राजेश जी, साहित्य रत्न)

यह मिट्टी का पुतला-मानव दुख की मार सहेगा कैसे?

मानव में रक्खा ही क्या है? थोड़ी मिट्टी थोड़ा पानी,

थोड़ी सर्दी-गर्मी पाकर पैदा हो जाता है प्राणी।

स्वयं हवा का खेल, हवा में चाहे जैसे किले बना ले-

छिपी नहीं है हमसे, तुमसे जैसी इसकी नींव निशानी॥

इस पर भी दुख पर दुख आयें, फिर यह अमर रहेगा कैसे?

यह मिट्टी का पुतला, मानव इतनी मार सहेगा कैसे?

सुख? जिसको हम सुख समझे थे, वह तो मृगतृष्णा थी कोरी

जिसके पीछे चल कर हमने केवल दुख की राशि बटोरी।

अवसर से पहले ढक लेती सुख के दिन को दुख की रातें-

सुख का द्वार दिखाई देता, दुख आ जाता चोरी-चोरी।

इस पर भी इस जग को कोई ‘सुख का सार’ कहेगा कैसे?

यह मिट्टी का पुतला-मानव इतनी मार सहेगा कैसे?

दुख से बचने को दुनिया ने आशा की दीवार बना ली,

इन्द्रधनुष सी मृग मरीचिका, सुखद कल्पना भी अपना ली।

अपने को धोखे में रक्खा, झूठ मूठ के सपने देखे-

इस पर भी दुख बढ़ता आया, ज्यों−ज्यों सुख की राह निकाली।

घोर दुखों के इस मरुस्थल में जीवन-स्रोत बहेगा कैसे?

यह मिट्टी का पुतला, मानव इतनी मार सहेगा कैसे?


निष्पाप बनने की प्रेरणा

भर्गो वेति पदं च व्याहरति वै,

लोकः सुलोको भवेत्।

पापे पाप विनाशने त्वभिरता,

दत्तावधानों वसेत्॥

दुष्टवा दुष्कृति दुर्विपाक निचयं,

तेभ्यो जुगुप्सेद्धि च।

तन्नाशाय विधीयताँ च सततं,

संघर्ष मेभिः सहः॥

अर्थ-“भर्गः” यह बताता है कि मनुष्यों को निष्पाप बनना चाहिए। पापों से सावधान रहना चाहिए। पापों के दुष्परिणामों को देखकर उनसे घृणा करे और निरन्तर उनको नष्ट करने के लिए संघर्ष करता रहे।

गायत्री का चौथा पद “भर्गो” मनुष्य जाति के लिए एक बड़ी ही महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। वह शिक्षा है-निष्पाप होना। पाप का अर्थ है बुराई, बुराई-माने वे कर्म जो करने योग्य नहीं हैं। इस दृष्टि से वे सभी शारीरिक मानसिक क्रियायें पाप की श्रेणी में आ जाती हैं जिनसे मनुष्य के व्यक्तिगत या सामूहिक जीवन में दुष्परिणाम उत्पन्न होते हैं।

जिन कामों को करने से शरीर का अनिष्ट होता है वे शारीरिक पाप हैं। स्नान न करना, गन्दे वस्त्र पहने रहना, अधिक खाना, बासी, बुसा, जल्दी-2 निगल लेना, हानिकारक चटोरी चीजों पर मन चलाते रहना, रात को जागना, अधिक वीर्यपात, अनियमित स्वास्थ्य विरोधी दिनचर्या आदि को शारीरिक पाप माना जायेगा। ईर्ष्या, डाह, द्वेष, कुढ़न, संताप, चुगलपना, तृष्णा, चिन्ता, क्रोध, शोक, निराशा, उद्वेग, चंचलता, कायरता आदि मानसिक पाप हैं। चोरी, आलस्य, उत्तरदायित्व से विमुख होना, व्यभिचार, शोषण, झूठ, छल, विश्वास घात, उद्दंडता, निष्ठुरता, स्वार्थपरता, देशद्रोह आदि सामाजिक पाप हैं। अनुदारता, संकीर्णता, सर्वत्र बुराई ही बुराई देखना, निराशा, आत्महनन, आत्महीनता, भयभीत रहना, अन्धपरम्परा आदि आत्मिक पाप हैं। कारण स्पष्ट है। इन पापों का अवलम्बन करने से अपनी शक्ति क्षीण होती है, विरोधी बढ़ते हैं, अशान्ति में वृद्धि होती है, समाज में गड़बड़ पड़ती है, फलस्वरूप इस के मार्ग पर चलने वाला निर्बल, दरिद्र, घृणास्पद, निंदनीय बन जाता है दूसरों के अविश्वास, असहयोग एवं विरोध के कारण उसे क्षति उठानी पड़ती है। प्राकृतिक एवं ईश्वरीय नियमों के आधार पर उसे आकस्मिक विपत्तियों का कष्ट भी भोगना पड़ता है।

पाप का फल दुख होता है, इस बात को साधारणतः सभी लोग जानते हैं फिर भी बहुत कम लोग ऐसे हैं जो पापों से बचने का प्रयत्न करते हैं। दुखों से लोग डरते हैं पर दुखों के कारण पाप को नहीं छोड़ते। यह ऐसा ही है जैसे कोई अग्नि तो हाथ पर रखे पर झुलसने से बचना चाहे। देखा जाता है कि अधिकाँश मनुष्य ऐसी ही बाल क्रीड़ा में व्यस्त रहते हैं। दुख चाहता हो, कष्ट और विपत्ति की यातना सहना चाहता हो, ऐसा कोई मनुष्य शायद ही मिलेगा। जो लोग धर्म की तपश्चर्या परमार्थ लाभ के लिए कष्ट सहते हैं वे किसी बड़े आत्मिक सुख की तुलना में छोटे साँसारिक कष्ट को ग्रहण कर लेते हैं वे भी वस्तुतः सुख की आकाँक्षी ही है।

महर्षि व्यास ने लोगों की इस मूर्खता पर आश्चर्य प्रकट किया है कि वे दुख को न चाहते हुए भी पाप करते हैं। पाप के अतिरिक्त भी दुख का कोई अन्य कारण हो सकता है पर यह निश्चित है कि पाप की प्रतिक्रिया दुख के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकती। बुरे कर्म का फल बुरा ही होगा भले ही वह आज हो या कल। इतना होते हुए भी लोग पाप करने से बाज नहीं आते, इसका कारण वह भूल है जिसे शास्त्रीय भाषा में माया, भ्रान्ति, अविद्या, असुर्या आदि नामों से पुकारा जाता है।

भगवान ने एक ऐसी आँखमिचौनी का, भूलभुलैयों का खेल रच दिया है जिसमें कितने ही व्यक्ति बुरी तरह भ्रमित हो जाते हैं। वह खेल है कर्म का फल, तुरन्त न मिलना। यदि चोर का हाथ सूज जाता, झूठ बोलने वाले की जीभ में दर्द होने लगता, व्यभिचारियों की इंद्रियाँ नष्ट हो जातीं। कुदृष्टि डालने वालों की आँखें फिर जातीं, आलसियों को लकवा मार जाता, बेईमानों का धन कोयला बन जाता, कुमार्गगामी लंगड़े हो जाते, अभक्ष्य खाने वालों के पेट में फोड़ा निकल आता और यह सब परिणाम तत्क्षण उपस्थित हो जाते तो कोई भी इन बुराइयों को करने के लिए तैयार न होता। तब सभी लोग पूर्ण धर्मावलम्बी होते। परन्तु लीलाधर की लीला तो देखिए! उन्होंने कर्म और फल दोनों को अटूट रज्जुओं में बाँध कर भी इतना दूर-दूर रखा है कि स्थूल बुद्धि का आदमी उन दोनों की घनिष्ठता को देख नहीं पाता सोचता है कि यदि आज कर्म का फल नहीं मिला तो संभव है कभी न मिलता हो। दूसरी बात यह कि पाप कर्मों में तात्कालिक आकर्षण और लाभ होता है जिनका लोभ संवरण करना बालबुद्धि के लिए कठिन होता है। इसके विपरीत पीछे आनन्द देने वाले सत्कर्म आरंभ में कष्टसाध्य प्रतीत होते हैं। इन दो पक्षों में से किसे चुनें, किसे न चुनें यह निर्णय करना साधारण बुद्धि का काम नहीं है। अक्सर चिकनाई पर पैर फिसल जाता है। तात्कालिक आकर्षण के लोभ में दूरवर्ती स्थायी सुख की उपेक्षा कर दी जाती है और क्षणिक लाभ के उपरान्त दीर्घकाल तक व्यथित करने वाली पीड़ा को अपना लिया जाता है। मंदबुद्धि पशु पक्षी जब जरा से चारे के लोभ में वधिक के जाल में पड़ कर जिस प्रकार दुख पाते हैं वैसे ही लोभ ग्रस्त मनुष्य पाप के फंदे में गला फंसा बैठते हैं और पीछे असहनीय यातनाएं भोगते रहते हैं।

भगवान ने यह खेल मनुष्य की बुद्धि परीक्षा के लिए रचा मालूम होता है। आँखमिचौनी के खेल में बालकों को काफी सूक्ष्म बुद्धि से काम लेना पड़ता है। भूलभुलैया में से बाहर निकलने के लिए भी काफी बारीकी से सोचना पड़ता है अन्यथा उलझन से बाहर निकलना कठिन हो जाता है। मनुष्य को इच्छित कर्म करने की, पाप और पुण्य में चाहे जिसे चुनने की स्वतंत्रता देकर प्रभु ने उसे ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ उसकी कठिन परीक्षा होती है, होनी भी चाहिए। स्वतंत्रता के साथ विवेक और उत्तरदायित्व भी आवश्यक है, अविवेकी और गैर-जिम्मेदार लोग स्वतंत्रता को बंधन में बदल लेते हैं। इस परीक्षा में पास हो जाना, भ्रान्ति के चक्कर से बच जाना, प्रलोभन में न पड़कर दूरदर्शिता से काम लेना, यही तो बुद्धि चातुरी का प्रमाण है। जो व्यक्ति अपनी चातुरी का ऐसा प्रमाण देते हैं वे स्वर्गीय सुख का, आत्मानंद का, पूर्ण स्वतंत्रता का, जीवन मुक्ति का, आनन्द लाभ करते हैं। जो भूलते हैं वे दुख दारिद्रय की चपत और दुत्कार सहते हैं।

इस भूल से बचने के लिए ही गायत्री का चौथा शब्द “भर्गः” है। भर्गः- अर्थात् निष्पाप। यह शब्द हमें सचेत करता है कि यदि आपत्तियों से बचना है तो पाप रूपी सर्प से सावधान रहना चाहिए कोई लोग सोचते हैं कि धर्म का, पुण्य का आचरण बड़ा कठिन है। यह मान्यता ठीक नहीं। सदा ही सत्य सरल और असत्य कठिन होता है। झूँठ बोलने में, बेईमानी में, ठगने में, चोरी करने में, व्यभिचार में काफी चालाकी, चतुराई, होशियारी, पेशबंदी, तैयारी आदि की बड़ी आवश्यकता पड़ती है, थोड़ी सी भी चूक हो जाने पर भेद खुल सकता है और निंदा तथा दंड का भागी होना पड़ता है। इसके विपरीत सच बोलने में, पूरा तोलने में, ईमानदारी बरतने में, सदाचारी रहने में किसी खटखट की जरूरत नहीं, मूर्ख से मूर्ख आदमी भी इन बातों में किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव नहीं करता। उचित और आवश्यक चीजें संसार में सुलभ हैं और अनुचित तथा अनावश्यक चीजें दुर्लभ हैं। हवा, पानी, अन्न, वस्त्र आदि आवश्यक चीजें सर्वत्र सुलभ हैं विष आदि अनावश्यक चीजें दुष्प्राप्य हैं। गाय, भैंस, बकरी, घोड़े आदि उपयोगी पशु आसानी से मिल जायेंगे। सिंह व्याघ्र आदि हिंसक पशु कहीं कहीं कठिनाई से दिखाई पड़ते हैं। इसी प्रकार लाभदायक पुण्य कर्म सर्वथा सुलभ हैं इसके विपरीत हानिकारक दुखदायी पाप कर्मों की व्यवस्था बड़ी चालाकी और कठिनाई से बन पड़ती है। जो धर्मपालन की, पुण्य संचय की, इच्छा रखते हैं उनके लिए यह सब बहुत ही सरल और सुलभ है।

फिर भी संचित संस्कारों, पुरानी आदतों, वातावरण के दुष्प्रभावों के कारण यदि बुराइयां छूटती नहीं, सन्मार्ग पर चलते चलते हर बार पैर फिसल जाता है तो भी निराश होने की बात नहीं बुराई के प्रति घृणा और विरोध का भाव जागृत रखना चाहिए। अपनी भूल और बुराई का बार-बार निरीक्षण करते रहना और उसके लिए पश्चाताप एवं छोड़ने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयत्न जारी रहे तो निरंतर बुराई घटती जाएगी चाहे वह कितनी ही मंद गति से कम क्यों न हो रही हो एक दिन उसका पूर्ण अंत अवश्य हो जाएगा। इसके विपरीत यदि विरोध का अन्त कर दिया गया उसे स्वभाव बना लिया गया उसे नीति मान लिया गया और उसके करने में आन्तरिक लज्जा, भय, पश्चाताप तथा दुख का भाव छोड़ दिया गया तो वह बुराई जड़ जमा लेगी और फिर उसका छूटना कठिन हो जायेगा। इसी प्रकार अन्य लोगों की समाज की, राज की, बुराइयों को भी सहन कर लेना या उनसे समझौता कर लेना उचित नहीं। यदि तत्क्षण उन पापों को मिटा डालना अपनी सामर्थ्य में न हो तो भी उनके प्रति असंतोष, असहयोग, विरोध और संघर्ष तो न्यूनाधिक मात्रा में जारी रखना ही चाहिए। और अवसर आने पर इस विरोध में कष्ट सहने के लिए भी तैयार करते रहना चाहिए। इस प्रकार यह मंद प्रयत्न भी निष्पाप बनने की महायात्रा में बड़ा सहायक सिद्ध होता है।

विद्यार्थी से बार-बार गलती होती है। पहले छोटे दरजे में था तब भी गलती होती थी। अब ऊँचे दरजे में है तो भी गलती होती है। यह देख कर भी कोई विद्यार्थी निराश नहीं होता वरन् उत्साह पूर्वक अपनी पढ़ाई जारी रखता है। और अनुभव करता है कि मैं आगे बढ़ रहा हूँ। निम्न श्रेणी का चोर मनुष्य समझता है कि मैं पाप करता हूँ। ऊँची आध्यात्मिक स्थिति का महात्मा भी आत्मनिरीक्षण में अपने अन्दर अनेकों त्रुटि पाता है। जितनी ही आत्मज्योति बढ़ती जाएगी उतनी ही स्पष्टता से छोटे-छोटे दोष भी बड़े दिखाई देने लगेंगे। इससे किसी को घबराने, हिम्मत हारने या निराश होने की जरूरत नहीं है। “इतना प्रयत्न करने पर भी हम पूर्ण निष्पाप नहीं हो पाये सदा असफल ही रहेंगे” ऐसी हिम्मत हारना उचित नहीं कक्षा 4 के विद्यार्थी की परीक्षा में भी आधे उत्तर गलत निकलते हैं और एम॰ ए॰ का छात्र भी आधे ही उत्तर सही कर पाता है। तो क्या दोनों ही समान असफल, समान अशिक्षित कहे जाएंगे।

गायत्री का ‘भर्गः’ पद हमें निष्पाप बनने की शिक्षा और स्फूर्ति देता है। इस प्रेरणा से बल लेकर यदि पवित्रता की दिशा में हमारा प्रयत्न जारी रहे तो संसार के समस्त कष्टों एवं भव-बंधनों से छूट कर हम जीवन मुक्ति का स्वर्गीय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं।


‘अपनत्व’ का प्रसार

(ले. श्री चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु)

सर्वं भूतात्मात्मानं सर्वभूतानि चीत्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः

(गीताः 629)

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यतियोऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमा मतः॥

(गीताः 6-32)

अर्थ- जो योगयुक्त पुरुष हैं, वे सर्वत्र समदर्शी होते हैं। वे सब प्राणियों में अपने को और सब प्राणियों को अपने भीतर देखते हैं।

(गीता 629 )

हे अर्जुन? जो दूसरों के दुःख और दूसरों के सुख को अपने ही दुख सुख की तरह जानकर सबको समता की दृष्टि से देखता है वही उत्तम और श्रेष्ठ योगी है।

(गीता 632)

संसार में अशाँति किस लिए है? महायुद्ध क्यों होता है? उसकी भयंकर लपटों से पृथ्वी क्यों भस्म हुई जा रही है? कोटि-कोटि मानव-प्राणियों का विनाशक शस्त्रों द्वारा महासंहार क्यों हो रहा है? माता धरित्री मानव-रक्त से रंजित क्यों हो रही है शत-शत वर्षों के अनवरत परिश्रम और प्रयत्न एवं अरबों-खरबों रुपयों के व्यय से जिन सुन्दर, दर्शनीय और रमणीय नगरों का निर्माण हुआ था, वे आज घंटों और दिनों में भस्मसात और विध्वस्त क्यों किये जा रहे हैं? अरबों-खरबों मूल्य की पोत संपत्ति अगाध सागर में क्यों डुबोई जा रही है? सुशिक्षित और सुसभ्य मानव आज बर्बर महा पशु क्यों बन रहा है? कारण यह है कि वह दूसरों को अपने से भिन्न समझता है।

पीछे की ओर देखिए। कौरव पाँडवों के संग्राम का प्राकृतिक कारण क्या था? पृथ्वी राज और जयचंद की कलह का हेतु क्या था? कौरव समझते थे कि पाँडव हमसे भिन्न हैं, जयचंद समझते थे कि पृथ्वीराज हमसे भिन्न हैं। कौरवगण पाँडवों को तथा जयचंद पृथ्वीराज को यदि अपना समझ सकते, तो कुरुक्षेत्र और पानीपत के सर्वनाशी युद्ध कदापि नहीं होते। इतिहास के पन्ने अपने वक्षस्थल में अंकित पंक्तियों द्वारा हमें पद-पद पर चेतावनी देते हैं कि मनुष्यों तुममें, अपनत्व का भाव नहीं है घटनायें आज की हों या प्राचीन, जातीय हों वा व्यक्तिगत, देशगत हों या समाजगत, राष्ट्रगत हों वा वंशगत सारी कलह, सारे क्लेश, विद्वेष और विनाश के कारण का यदि हम अनुसंधान करते हैं, तो हमारी आँखों के आगे मूर्तिमान हो जाता है, ‘अपनत्व का संकोच।

यदि किसी प्रकार ‘आपको’ हम ‘अपने आप, समझ सकते , तो क्या कभी हम आप के साथ विद्वेष या शत्रुता का व्यवहार कर सकते? कदापि नहीं ‘आपको’ हम अपने से ‘भिन्न’ ज्ञात करते हैं, यह कारण है कि हम आपसे स्नेह नहीं करते, आप पर विश्वास नहीं करते, आपके साथ सुन्दर व्यवहार नहीं करते। जरा सोचिए छल, वंचना, कपट, विद्वेष, दंभ, दोहन, शोषण, लूट-मार, हत्या आदि के बाहुल्य का कारण क्या है? एक वाक्य में समस्त अशाँति और सारे दुःखों का मूल कारण है ‘अपनत्त्व का संकोच तथा समस्त शाँति सुख-चैन का हेतु है अपनत्व का प्रसार।

हमारा पड़ोसी धनवान हो गया और हम दरिद्र हो गये, हमारे मन में द्वेष पैदा हो गया। क्यों द्वेष उत्पन्न हुआ? इसलिए कि पड़ोसी को हम अपना नहीं समझते। हम उसे अपने से भिन्न समझते हैं इसलिए उसका सुख भी हमारा सुख नहीं हो सकता वरन् हमारी डाह का कारण बन जाता है। प्रतिदिन हमारे सामने दुर्भिक्ष, भूकम्प, जल-प्लावन, महामारी इत्यादि विनाशकारिणी विपत्तियाँ आती हैं जिनसे सहस्र-सहस्र नर-नारियों का जीवन नष्ट हो जाता है, किन्तु उसके लिए हमारा हृदय रोता नहीं। हम उसी समय नाच, गाना, नौटंकी, सिनेमा आदि में अपना मनोविनोद करते हैं, रामलीला और कृष्णलीला की आड़ में मेले का सुख लूटते हैं। दीन-दुखियों के आर्तनाद से आकाश कंपायमान हो रहा है, पर हम टस से मस नहीं होते। हम सोचते हैं, उनमें हमारा कौन है? मरने वालों को रहने दो, हम क्यों अपना सुख छोड़ें? अपना मजा क्यों किरकिरा करें? कारण, हमारा अपनत्व हमारे शरीर में परिसीमित है। हमारे परिवार में परिसीमित है और बहुत हुआ तो हमारी जाति में परिसीमित है।

भारतीय संत महात्मा और ऋषि-मुनियों ने एक मत होकर घोषित किया था, अहंभाव को ध्वंस कर दो, सब सुख और शाँति फैल जायेगी। पूजा-पत्री, तीर्थ व्रत, यज्ञ-होम करो, या न करो, धर्म का ध्येय है ‘अहंत्व’ अहंकार-मममार’ का ध्वंस। यही ज्ञान का चरम है, यही वेदाँत है, इसी बात को हम ‘व्यवहारिक वेदाँत की दृष्टि से कह सकते हैं, अहंभाव का प्रसार कर दो, बस सुख और शान्ति का प्रसार हो जाएगा। परमहंस स्वामी रामतीर्थजी अथवा स्वामी विवेकानन्द जी ने अमेरिका और योरोप को यही सन्देश दिया था। यही भारत का दिव्य और अमर ज्ञान है। यही उसकी जगद् गुरुता का महान् गौरव है यही उपनिषदों के एकात्मवाद का वैज्ञानिक निष्कर्ष है। विश्व के समस्त प्राणियों के साथ अपनी अहंता का संप्रसार कर दो। विश्व में-अनन्त में अपने आपको लय कर दो।

वस्तुतः यदि अहंभाव का ध्वंस हो जाय तो आप में और हममें कोई भेद न रह जाय। शब्दाँतर में यदि अहंभाव का संप्रसार हो जाय तो भी हमारा आपस का सारा भेद मिट जाय। इसलिए अहंता का ध्वंस अथवा अहंता का प्रसार दोनों एक ही वस्तु हैं। हमारा अहंभाव जब तक हमारे भीतर संकुचित सीमाओं से आबद्ध है, तभी तक वह दुष्ट ‘अहंकार’ है, जो अज्ञान के कारण है। एक छोटी सी बात पर ध्यान दीजिए। हमारे देश में अब तक संपत्ति व्यक्तिगत है। प्रत्येक व्यक्ति अथवा प्रत्येक परिवार की संपत्ति अलग-अलग है। किंतु चीन और रूस में संपत्ति का राष्ट्रीकरण हो गया है, अर्थात् देश की सारी व्यक्तिगत संपत्ति राष्ट्र की संपत्ति हो गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अब उन देशों का प्रत्येक व्यक्ति सारे राष्ट्र की हानि-लाभ को अपना ही हानि-लाभ समझने लगा है।

व्यवहारिक वेदाँत की भाषा में हम कह सकते हैं कि इस साँपत्तिक राष्ट्रीयकरण के फल से वहाँ के लोगों का अहंभाव संप्रसार होकर राष्ट्रगत है। सुगंभीर दार्शनिक मीमाँसा यदि इस समय छोड़ दी जाय, केवल स्थूल दृष्टि या लौकिक सामाजिक-भाव से ही इसे देखा जाए, तो भी आप देखेंगे कि हमारा आपका जीवन इतने घनिष्ठ संबंधों से संबद्ध है कि जब तक आप हमें या हम आपको अपना आत्मीय नहीं मान लेते, तब तक पारस्परिक अथवा लौकिक सुख की आप प्रत्याशा नहीं कर सकते। यह बात एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगी।

आप धनवान् हैं। आपको कालरा हो गया। आपने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने बढ़िया इलाज किया। आप अच्छे हो गये। दूसरा भाई दरिद्री है। उसे भी कालरा हुआ, किन्तु उसके पास कोई चिकित्सक नहीं आया। वह कालरा से मर गया। किसी को उसकी खबर न हुई। उसकी मृत-देह का विषूचिका-विष चारों ओर व्याप्त हो गया। आपने उस दरिद्र भाई को तुच्छ और नगण्य समझकर घृणा-पूर्वक उसका परित्याग अवश्य किया, किन्तु उसके शरीर से वायु में व्याप्त होकर चारों ओर धावमान होने वाले कालरा के विषाक्त कीटाणुओं का आप परित्याग नहीं कर सकते। वे आप पर और आपके निवास-स्थान के बहुत से लोगों पर आक्रमण करेंगे, बाजार की खाने-पीने की चीजों में घुस जाएंगे। इसके विपरीत यदि आप उस गरीब को अपना आत्मीय समझकर उसकी चिकित्सा और उसकी सुरक्षा करते, और उसे चंगा कर लेते, अथवा उसके मृत-शरीर का अंतिम संस्कार कर देते, तो संभवतः इन व्याधियों से आप सुरक्षित रहते।

फलतः आप यदि अपने को ही स्वस्थ रखने का विचार करें, तो भी आप अकेले नहीं रह सकते आपको दूसरों को भी स्वस्थ रखने का उपाय करना पड़ेगा। “जग भले से भला” यह एक साधारण उक्ति है। इस लोकोक्ति के अर्थ का रहस्य ‘अहंभाव या अपनत्व के संप्रसार’ में निहित है। अहंता का विस्तार करने से ही आप सुखी रह सकते हैं। तो बात एक पड़ोसी के संबन्ध में है, वही ग्राम, देश, महादेश और समस्त भूमंडल के संबन्ध में कही जा सकती है।

वेदाँत दावे के साथ कहता है कि द्वैत में भय है। द्वैत का भाव-मात्रा भय है। राग और द्वेष का मूल कारण द्वैत है। द्वैत बंधन है, द्वैत मोह है, द्वैत शोक है, द्वैत दुःख है, और द्वैत अशाँति है। जब तक द्वैत है, जब तक संघर्ष अनिवार्य है। द्वैत को एक क्षण के लिए स्थान देना मानो शोक और भय को निमंत्रण देना है। द्वैत में अवस्थान करना मानो बंधन में, मोह में, शोक में, दुःख में और अशाँति में निवास करना है। द्वैत हमारी दुर्बलता है, दीनता है, अज्ञान है और विनाश है। द्वैत अज्ञान है और द्वैत ही अंधकार है। जब तक द्वैत रूपी दैत्य का विनाश नहीं हो जाता, हमारे भीतर प्रज्ञा का प्रकाश नहीं हो सकता। इस द्वैत-रूपी दैत्य के नाश का साधन है अहंता का ध्वंस अथवा ‘अपनत्व का संप्रसार’। अद्वैत ही प्रकाश है वही अभय पद है और वही मोक्ष या निर्वाण है। ईशावास्य उपनिषद् में स्पष्ट लिखा है-

श्यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आ मैवाभूत विजानतः।

तत्रा को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ (7)

अर्थ-जिस समय मनुष्य सब प्राणियों को अपना ही आत्मा ज्ञान लेता है, उस समय उस एकता का अनुभव करने वाले के लिए न किसी प्रकार का मोह, या अज्ञान रहता है, और न कोई शोक रहता है।


सच्चे और ईमानदार रहिए।

(श्री राजा महेन्द्रप्रताप)

बेईमानी मत करो। ईमानदारी सहित अपनी शुद्धि करो। सच्चे हिन्दू बनो, सच्चे मुसलमान बनो जो बनो सच्चे बनो। आज हमारा सब से अधिक नुकसान झूँठ से हो रहा है। धार्मिक कहानियाँ भी ऐसी प्रचलित हैं जो बेईमानी सिखाती हैं। कैसे हमने इन कथाओं को सुना, सुनवाया और प्रचलित होने दिया? सब धर्मों दीनों में ऐसी बातें भरी पड़ी हैं कि अमुक देवता ने झूँठ से काम निकाला अथवा धोखा दिया। श्रीकृष्ण तक की ऐसी कहानियाँ हैं कि उन्होंने अपनी माँ से झूँठ बोला, चोरी की या चालाकी में अपने किसी चेले को सिखाया कि इस प्रकार शत्रु को मार डालो, चीर कर दो कर दो।

मनुष्य जो दिन प्रति दिन सुनता है उसका उस पर बहुत असर पड़ता है। हम वह ही बनते हैं जो हमको गढ़ कर बनाया जाता है। हमारी शिक्षा त्रुटिपूर्ण है। और इसी कारण जन साधारण में बेईमानी अधिक है। देश क्यों गिरा? क्योंकि बेईमानी थी। देश क्यों शीघ्र उन्नति नहीं करता? क्योंकि बेईमानी है! यदि हमारे देशवासी ईमानदारी को ही धर्म समझें तो धर्म और समाज की उन्नति हो।

समाज की फिर से सुरचना करनी है। समाज को इस प्रकार रचना होगा कि झूँठ अथवा बेईमानी की आवश्यकता न रहे। मनुष्य बहुधा झूँठ बोलता है, अनुचित लाभ उठाने के लिये। मनुष्य सदा ही लाभ उठाना चाहता है क्योंकि उसे कल पर भरोसा नहीं। प्रत्येक व्यक्ति को भय रहता है कल का, काल का! समय न जाने कल क्या दिखलावे? नौकरी रहती है या नहीं? व्यापार में हानि न हो जाए? कोई लड़ाई न छिड़ जाए? चोरी का भय? डाके का डर? मनुष्य पर विश्वास नहीं है। और इसलिये मनुष्य झूँठ बोल कर, छल कपट से रुपये कमाना चाहता है।

हमको ऐसा समाज बनाना चाहिए कि उसमें प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से मरण तक खाना पीना, पहनना, मकान और समस्त जीवन की आवश्यक वस्तुयें अवश्य ही मिल सकें, सन्देह न रहे, फिक्र न रहे। ऐसे समाज में मनुष्य, बिना बात, क्यों झूँठ बोलेगा।

सुसंगठित कुटुम्ब में, जहाँ माँ-बाप पुत्रादि से प्रेम करते हैं, जहाँ भाई बहन आपस में प्रेम रखते हैं, जहाँ छोटे बड़ों का आदर करते हैं और सेवा करते हैं, झूँठ नहीं बोला जाता। यदि ऐसे कुटुम्ब में कभी कोई झूँठ बोलता है तो हँसी के लिये। हम को ऐसे ही कुटुम्ब ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में स्थापित करने हैं। मत कहिये कि यह असम्भव है। मेरा भाई यदि बीमार पड़ा है तो मैं तो उसका इलाज करूंगा ही, मैं यह नहीं सुनना चाहूँगा कि वह स्वस्थ नहीं होगा। समाज रोगी है। देश रोगी है। समाज को स्वस्थ बनाना है। आप सन्देह की बातें मत कहिये। सन्देह एक बड़ा शत्रु है।

मत कहिये कि ऐसा कभी नहीं हुआ। मत कहिये कि जो पहले कभी नहीं हुआ आज भी नहीं हो सकता। हम समस्त मनुष्य जाति का एक कुटुम्ब बनायेंगे। आज यह सम्भव है। आज हवाई जहाजों ने और रेडियो ने समस्त पृथ्वी को मानो एक छोटा सा देश बना दिया है। हमारी मनुष्य जाति अभी तो युवा अवस्था को पहुँची है। कम से कम यह सभ्यता जब से उत्पन्न हुई है आज ही इस दशा को प्राप्त कर सकी है जब कि मनुष्य आकाश में उड़ता है। आज यह भी सम्भव है कि हम मनुष्य जाति का एक कुटुम्ब बनावें।

वह पागलपन ही तो था। हिन्दू, सिख और मुसलमान नामों पर हमारे देशवासी पागल हुए। बिना बात रक्तपात किया। बहु काल की उलटी शिक्षा का यह कुफल था। लोगों ने सिखाया था कि धर्म के हेतु बेईमानी करो और झूँठ बोलो , झूठ बोला और बेईमानी की। भाई का भाई से विश्वास उठ गया। फिर यह ही हुआ जो होना था!

इसलिए मैं कहता हूँ बेईमानी मत करो। मत करो किसी भी नाम पर, किसी भी विचार से। यह बुद्धिमानी नहीं कि आप धोखा देवें। कुछ मन हो, कुछ कहें, कुछ दूसरों को जतावें। यह बेईमानी है। मैं फिर कहता हूँ कि देखो, भला चाहते हो तो बेईमानी मत करो!


दो बात

नारायण दो बात को, दीजे सदा बिसार।

करी बुराई और ने, आप कियो उपकार॥

तज पर अवगुण नीर को, क्षीर गुणन सों प्रीत।

हंस संत की सर्वदा, नारायण यह रीत॥

तनिक मान मन में नहीं, सब सों राखत प्यार।

नारायण ता संत पै, बार बार बलिहार॥


धन का महत्व

(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)

जीवन निर्वाह के लिये जिस जिस सामग्री की जरूरत पड़ती है वह धन है। इसलिये हमें धन की सख्त जरूरत है पर आज जीवन के लिये धन नहीं रह गया है धन के लिए जीवन हो गया है। हर आदमी जीवन खोकर, भाईचारा खोकर, सुख शान्ति खोकर, ईमान खोकर जिस किसी भी तरह धन कमाने के पीछे पाग बना फिरता है। पर इससे दुनिया में धन नहीं बढ़ा, धन का नशा बढ़ा, धन का पागलपन बढ़ा। इससे दुःख बढ़ा अशान्ति बढ़ी, बैर और घमण्ड बढ़ा क्रूरता बढ़ी बेईमानी बढ़ी, और हमारी शैतानियत बढ़ी। मनुष्य धन न खा सका धन ने मनुष्य को खा लिया।

यह ठीक है कि धन के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। थोड़ा बहुत धन तो हमें चाहिये ही, पर जितना चाहिये उसी के पीछे यह सब अनर्थ नहीं हो रहा है, अनर्थ वे ही लोग करते हैं जिनके पास चाहिये से अधिक धन है। आखिर सवाल होता है कि ‘चाहिये’ से अधिक धन का लोग क्या करते हैं क्यों मनुष्य उसके पीछे पागल हो रहा है।

मनुष्य को रोटी चाहिये कपड़ा चाहिये रहने को मकान चाहिये, यहाँ तक किसी की धन लालसा हो तो वह ठीक कही जा सकती है। पर देखा जाता है कि इनकी पूर्ति होने पर भी मनुष्य अपने को दीन समझता है और उनके सामने गिड़गिड़ाने को तैयार हो जाता है जिनके सामने झुकने को उसका अन्तरात्मा तैयार नहीं होता। वह सदाचारियों जन सेवकों और गुणियों को इतना महत्व नहीं देता जितना अपने से अधिक धनियों को। इसलिये प्रत्येक मनुष्य धन संग्रह की ओर बढ़ता चला जा रहा है। उतने धन की आवश्यकता है या नहीं इसका विचार वह नहीं करता क्योंकि जीवन के लिये जरूरत हो या न हो किन्तु महान बनने के लिये तो जरूरत है ही। मनुष्य में महान कहलाने की लालसा तीव्र से तीव्र है। और महत्ता का माप धन बन गया है इसलिये मनुष्य धन के पीछे पड़ा हुआ है। यह बिलकुल स्वाभाविक है। अगर दुनिया में धन से महत्ता मिलेगी तो लोग धन की तरफ झुकेंगे, अगर गुण सेवा सदाचार आदि से मिलेगी तो उसकी तरफ झुकेंगे।

मनुष्य को महान बनना चाहिये और दुनिया को महान बनने वालों की कद्र करनी चाहिये। पर धन और अधिकार से महान बनने वालों की कद्र करना समाज के कष्टों का बढ़ा लेना तथा सच्चे सेवकों को नष्ट कर देना है। किसी आदमी की कद्र करने का अर्थ ही यह है कि वह समाज की ऐसी सेवा कर रहा है जिसका बदला हम भौतिक दृष्टि से नहीं चुका पा रहे हैं इसलिये उसे महान कहकर उसका आदर यश बढ़ा कर हम बदला देना चाहते हैं। इसलिये जिस मनुष्य की जितनी निस्वार्थ जनसेवा हो उसी अनुरूप उसे महान मानना चाहिये।

आज जनता महत्ता की यह परिभाषा भूली हुई है वह समझती है कि जिसने किसी भी तरह धन पैदा कर लिया वह महान है और उसकी हमें इज्जत करनी चाहिये। जो जितने विलास का प्रदर्शन कर सकता है वह उतना ही महान है इसलिये हमें उसकी इज्जत करना चाहिये। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग धन और विलास की तरफ झुकते हैं। सच्ची सेवा सदाचार और गुण नष्ट होते जाते हैं।

किसी जमाने में अधिक सेवा के बदले में अधिक धन को देखकर उसकी वास्तविक महत्ता का अंदाज बाँधना भी ठीक रहा होगा पर वह समय हमारी कल्पना का ही विषय है, इतिहास के पन्नों में वह नहीं दिखाई देता। आज तो सैकड़ों हजारों में ऐसा एकाध आदमी होता है जो अपनी वास्तविक सेवा या महत्ता के कारण धनी बना हो। अधिकाँश धनी तो बाप दादों की जायदाद से धनी बने हैं या सट्टे से, या किसी बेईमानी से या अकस्मात् किसी की सम्पत्ति हाथ आ जाने से, या दम्भ ठगी आदि से धनी बने हैं। उनके इन कामों से जगत का नुकसान ही हुआ है। ऐसे हाल में उन्हें किसी तरह महत्व क्यों दिया जाए? उन्हें महान क्यों माना जाए?

हाँ, हर एक तरह के विनिमय का आधार धन ही है इसलिये धनी महत्ता खरीद सकता है। आप गुणी सेवक होने पर भी धूल फाँकते हुए पैदल चलते हो और वह आपकी बगल से सर्राटे से चमचमाती मोटर से निकल जाय, आप थर्ड क्लास में सिकुड़ कर बैठे हों और वह फर्स्ट क्लास में आराम से लेटा हुआ हो, आप सादा भोजन कर रहे हो और वह तरह तरह की स्वादिष्ट चीजें उड़ा रहा हो, आप अपने घर में झाडू लगाते हों और वह नौकरों से सब काम कराता हो इस प्रकार के अन्तर से वह आप पर महत्ता की छाप मार रहा हो यह सब हो सकता है पर इन सब बातों से आप में दीनता पैदा न होनी चाहिये। जब आप जानते हैं कि दुनिया में सौ में निन्यानवे लोग अयोग्य होने पर भी, जन सेवक न होने पर भी, दम्भ अनीति बेईमानी शोषण आदि से धनी बन जाते हैं तब आपमें दीनता का क्या कारण है? पाप, आलस्य, मूर्खता आदि ही दीनता के कारण कहे जा सकते हैं। अगर आपमें ये नहीं है तो आप दीन नहीं हैं और अगर आप दुनिया की उपयोगी सेवा करके उसका बदला धन से पूरा नहीं ले रहे हैं तो आप महान हैं। फिर भले ही आप थर्ड क्लास में सफर करें, झोपड़ी में रहें, साधारण भोजन करें, घर के छोटे मोटे काम अपने हाथ से करें। इन बातों से आपमें किसी तरह की दीनता न आनी चाहिये। न आप खुद को दीन समझें न आप धन और विलास देख कर किसी को महान समझें। जब आपका दृष्टिकोण बदल जायगा और धीरे-धीरे जब समाज का दृष्टिकोण भी बदल जायेगा तब व्यक्तियों का झुकाव धन संग्रह की तरफ इतना न होगा जितना सदाचार परोपकार तथा गुणों की तरफ होगा। इस प्रकार दुनिया से पाप और दुःख की जड़ उखड़ जाएगी।

धन और धनियों के बारे में आपको अपना विचार व्यवहार और शिष्टाचार सुधारना चाहिये इससे इस पाप के उखड़ने में काफी मदद मिलेगी। इस विषय की कुछ सूचनाएं यहाँ दी जाती हैं।

1-किसी भी धनवान को देखकर यह न सोचिये कि वह महान है। अगर वह वंश परम्परा से धनवान है तब तो यही सोचिये कि इसमें उसकी कोई बहादुरी नहीं है, यह तो उत्तराधिकारित्व सम्बन्धी सामाजिक पाप का परिणाम है इसमें उत्तराधिकारी की योग्यता से कोई मतलब नहीं! अगर पूँजीवाद के कारण धनवान है तो यह सोचिये कि यह भी समाज के पाप का परिणाम है। अगर विद्या कला आदि के कारण यह धनी है तब यह सोचिये कि यह तो अकस्मात् की बात है, नहीं तो सैंकड़ों विद्वान और कलाकार मारे मारे फिरते हैं, अकस्मात् अगर किसी को विद्या कला के कारण अन्य विद्वानों और कलाकारों से अधिक प्राप्ति हो गई है तो इसी से वह अन्य विद्वानों आदि से महान नहीं हो सकता, सम्भव है इस ऊपरी सफलता के लिये उसने दम्भ आदि से काम लिया हो, ईमानदारी की हत्या की हो, ऐसी हालत में उसे महान कैसे कह सकते हैं?

2-जो विद्वान कलाकार किसी धनी के आश्रित हैं और इससे कुछ विलास कर रहे हैं इससे उन्हें महान न समझिये। क्या कुत्ते भी धनियों के साथ उनकी मोटर में बैठकर नहीं निकलते?

3-सैंकड़ों में एकाध के हिसाब से ऐसे भी धनी हैं या हो सकते हैं तो धन का घमण्ड नहीं दिखाते, जरूरत होने पर सेवा के लिये गरीबों असहायों की झोंपड़ी में आते हैं, दम्भ नहीं करते, विलास का प्रदर्शन नहीं करते, सम्पत्ति जगहित के काम में लगाते हैं, नम्र रहते हैं, उनकी प्रशंसा उन के धनी होने के कारण न कीजिये किन्तु उनके गुणों के कारण कीजिये! सदा गुणों को ही महत्व दीजिए! ऐसे आदमी अगर लखपति हैं तो उनकी इज्जत साधारण करोड़पतियों से भी अधिक कीजिये।

4-दानी का सम्मान करते समय सिर्फ यह न देखिये कि उसने कितना दान किया है किन्तु यह देखिये कि उसने अपनी सम्पत्ति का कौन सा हिस्सा दान किया है, सेवा और जनहित की दृष्टि से किया है या आत्मश्लाघा के लिये?

5-धन विनिमय का आधार बना हुआ है, धनी आदमी हर तरफ धन के द्वारा मनचाही चीजें ले लेता है इसलिये उसका ध्यान रखने की जरूरत नहीं है, जरूरत है उनका ध्यान रखने की जो अपनी सेवाएँ आर्थिक विनिमय के बिना या उसका ख्याल रखे बिना देते रहते हैं। वे समाज के सच्चे साहूकार हैं, यश आदर सुविधाएँ देकर समाज को उनका ऋण चुकाना चाहिये। और आपको भी ऋण चुकाने में हिस्सा लेना चाहिये।

6-श्रम को नीची नजर से न देखिये। एक श्रीमान् ने नौकर के हाथ से गुलाब के फूल मिला हुआ शरबत पिला दिया इसकी अपेक्षा अपने हाथ से मामूली पानी पिलाने वाले का आदर अधिक कीमती है इसे आप ऊँची निगाह से देखिये। श्रम विभाजन की बात दूसरी है घर में श्रम का बटवारा होने से किसी को कोई एक श्रम करना पड़ता हो किसी को कोई दूसरा श्रम, इसमें कोई हर्ज नहीं, पर कोई इस बात की शेखी मारे कि मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ती इसलिये मैं महान हूँ तो उसे महान न समझ कर हरामखोर समझिये।

7-सदाचारी, गुणी, परोपकारी आदि का जितना विनय आप करते हैं उससे अधिक या इतना विनय धनी का कदापि न कीजिये। हाँ! धनी है उपयुक्त गुण हैं तो गुणी की हैसियत से सम्मान करना उचित ही है।

8-धनियों में इस बात का विवेक रखिये कि किसने किस तरह धन कमाया है। बेईमानी विश्वासघात दुराचार आदि से धन कमाने वाले धनी की अपेक्षा उस छोटे धनी को अधिक महत्व दीजिये जिसने इस प्रकार पाप नहीं किये हैं।

9-धन के ही कारण जो लोग सार्वजनिक सेवा क्षेत्र के या राजनैतिक क्षेत्र के पद हथिया लेते हैं उनका विरोध कीजिये। धनियों को राजनैतिक पदों पर नियुक्त न होने दीजिये। वे पद विद्वान सत्सेवकों के लिये निश्चित करने की कोशिश कीजिये धनियों के पास धन ही काफी बड़ी शक्ति है और संभव है कि अगर उनके हाथ में ब्राह्मण (विद्वान) और शासक की सुविधा भी आ जाए तो शैतानियत और हैवानियत का नंगा नाच होने लगे। इससे बचने बचाने की यथाशक्ति कोशिश कीजिये।

10-स्वार्थ की दृष्टि से नहीं किन्तु परमार्थ की दृष्टि से आप अपना व्यवहार शिष्टाचार आदि ऐसा बनाइये जिससे मालूम हो कि आप धनी की अपेक्षा सदाचारी परोपकारी गुणी की अधिक इज्जत करते हैं।

आज धन का मनुष्य के ऊपर भयंकर आक्रमण हो रहा है। इसके लिये धनियों की निन्दा करने की जरूरत नहीं है। यह मनुष्यमात्र की या समाज की कमजोरी है। जो गरीब हैं वे भी धन में और विलास में महत्ता देखते हैं उसी की तरफ झुकते हैं, इसका परिणाम यह हुआ है कि सत्य अहिंसा, सेवा, सदाचार, विद्या, कला आदि सभी लक्ष्मी के द्वारा कुचले जा रहे हैं। इससे मनुष्य, मनुष्य का घातक बन गया है और जब तक हम धन को महत्ता देंगे तब तक ऐसा होगा ही। समाज को धन की कद्रदानी घटानी होगी। दूर करनी होगी। तब मनुष्यता की हत्या होने से बचेगी। समाज एक दिन में एक साथ तो यह करेगा नहीं, वह तो एक-एक व्यक्ति को धीरे-धीरे हटानी होगी, सो उस के लिये हर एक व्यक्ति को तैयार होना चाहिये।


आत्म ज्ञान की उपासना का रहस्य

“ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्तिमचिरेणाधि गच्छति”

ज्ञान पाने के तुरन्त बाद ही मनुष्य पराशान्ति की ओर अग्रसर होता है। गीता के इस वाक्य से सिद्ध होता है कि शान्ति पाने का एक मात्र साधन ज्ञान है।

लेकिन ज्ञान क्या? किन्हीं किन्हीं लोगों का कहना है कि जिसे भूल गये हैं उसकी स्मृति का नाम ज्ञान है। अर्थात् आत्म स्मृति या आत्मानुभूति का नाम ज्ञान है।

आत्मा स्वयं ज्ञानमय है। उसे अपनी कर्मशक्ति का, आनन्द शक्ति का पता है। जब तक आत्मा निर्लेप रहती है तब तक अपने स्वरूप को वह भूलती नहीं है। और अपने स्वरूप का स्मरण रहने से मनुष्य शक्तिहीन नहीं होता। शक्तिहीन मानव ही अशान्ति को निमंत्रण देता है। इससे सिद्ध होता है कि लोगों का यह कहना कि ज्ञान पाने से शान्ति की ओर अग्रसर हुआ जाता है, तथ्य पूर्ण मालूम होता है।

उपनिषद् कारों ने आत्मानुभूति के लिए श्रवण मनन और निदिध्यासन रूप साधना का उपदेश दिया है। वे कहते हैं-

“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासि तव्यश्च।”

आत्मा को जानना चाहिए इस के लिए श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए और निदिध्यासन करना चाहिए।

श्रवण करना चाहिए-क्या श्रवण करना चाहिए?

आत्मा के गुणों का, आत्मा की शक्तियों का, आत्मा के विस्तार का, आत्मा के स्वरूप का श्रवण करना चाहिए। इन सारी बातों को वही सुना सकता है जिसको इनकी जानकारी है दूसरे शब्दों में जिसे आत्मानुभूति है, ऐसा प्रसंग शास्त्रों में आया है। शास्त्रानुशीर्ल भी श्रवण का एक अंग हो सकता है लेकिन इस अनुशीलनता के लिए भी ऐसे व्यक्ति की सहायता अपेक्षित है जो इसके रहस्यों से परिचित हो। आत्म रहस्य को जानने वाला और उसका श्रवण कराने वाला पुरुष गुरु होता है। गुरु के लिए शास्त्रों में कहा गया है-

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानामंजन शलाकयो।

सुचरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरु वे नमः।

अज्ञान या विस्मृति रूप अन्धेरे के कारण जो अन्धे हो गये हैं, जिन्हें कुछ दिखता ही नहीं है उनके नेत्रों को जो ज्ञान रूपी अंजन की सलाई लगा कर खोल देता है वही गुरु है, ऐसे गुरु की ही शरण में जाना चाहिए।

ऐसा गुरु सबसे पहले श्रवण कराता है। श्रवण उसी को कराया जाता है जिसमें सुनने की इच्छा होती है। सुनने की इच्छा मानव को सबसे पहले विनयी बना देती है। गीताकार का कहना है कि-

तदिद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्तव दर्शिभिः॥

ज्ञानी अथवा तत्त्व दर्शी ज्ञान का उपदेश तभी करते हैं जब विनयी होकर मानव उनके पास जाता है और फिर अपनी इच्छा की तीव्रता का प्रकाशन करता हुआ प्रश्न करता है। जब तक जानने की तीव्र उत्कंठा नहीं होती तब तक श्रवण करने का यह व्यक्ति अधिकारी ही नहीं है ऐसी बात कही जाती है।

जब संकट आता है तभी अस्थिर आकाँक्षा उठती है। लेकिन आकाँक्षा कुछ क्षण रहती है और फिर उस ओर से लौट आती है। ऐसी अवस्था में ज्ञान पाने का पात्रत्व या अधिकारीपन नहीं आता है। और जब तक पाने के लिए आकुलता उत्पन्न नहीं होती तब तक विनय का अभाव रहता है। अधिकारी व्यक्ति अपनी नम्रता के कारण किसी भी तत्व को ग्रहण करने तथा जानने की क्षमता रखता है इसलिए वह उस तत्व के जानकार को खोजता है, श्रद्धापूर्वक उसके समीप जाता है, अपनी कठिनाइयाँ उसके समीप निवेदन करता है और उनकी गुत्थियों को सुलझाने के लिये प्रश्नोपप्रश्न करता है। तत्वदर्शी गुरु समाधान करते हुए अधिकारी व्यक्ति को आत्मतत्व का श्रवण कराते हैं।

दृढ़ आकाँक्षा से सुना हुआ तत्व मन और बुद्धि में प्रवेश पाता है। यहीं से ज्ञान प्राप्ति की दूसरी अवस्था का आरंभ होता है। साधक मनन करता है। जो सुना है बार बार उसी के सम्बन्ध में विचारना, जीवन के व्यावहारिक क्षेत्रों में किस प्रकार और कहाँ उसका विस्तार है इसे समझने के लिए मन और बुद्धि को खुला रखना, जो सुना है उसका साक्षात्कार करने के लिए जागृत रहना और साक्षात्कार की तीव्र प्रेरणा के साथ कर्म क्षेत्र में अग्रसर रहना मनन की स्थिति का सूचक है।

मनन की क्रिया न होने से श्रवण का कोई फल नहीं होता। श्रवण को अधिक गहरा और व्यापक बनाने के लिए मनन की आवश्यकता होती है। मनन चित्त पर पड़े हुए अनेक पर्दों को खोलता हुआ आगे बढ़ता है। मनन से बड़ी गर्मी उत्पन्न होती है जैसे-जैसे यह ऊष्मा बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही वे सभी आवरण नष्ट होते जाते हैं जिन्होंने आत्म तत्व को ढँक रखा होता है। मनन करते-करते मन सूक्ष्मदर्शी और बुद्धि सूक्ष्म ग्राहिणी हो जाती है। इसके बाद निदिध्यासन की क्रिया आरंभ होती है। तल्लीनता ही निदिध्यासन का दूसरा रूप है। यही ध्यान कहलाता है। तल्लीनता, एकाग्रता, ध्यान और निदिध्यासन सब एक ही क्रिया का परिचय देते हैं। जिन गुणों का, जिन शक्तियों का श्रवण किया है समस्त संसार में जब वे प्रतिक्षण दिखाई देने लगती हैं कहीं भ्रम या अन्तराय नहीं रह जाता तब अनुभूति होनी आरंभ होती है।

यदि तत्व की जिज्ञासा प्रबल है तो श्रवण के बाद मनन रूपी फल साधक को अवश्य मिलता है। प्रबलता की जितनी कमी होगी मनन रूप फल की प्राप्ति भी उतनी ही कठिन रहेगी।

मनुष्य प्रायः प्रमादी होते हैं। सुनकर अनसुनी कर देने की उसकी आदत होती है। इसलिए जब तक तीव्र आकाँक्षा नहीं होती। तब तक श्रवण पर प्रमाद का पर्दा पड़ने का खतरा रहता ही है और यदि श्रवण के बाद मनन न हुआ तो आगे की क्रिया अपने आप बन्द हो जाती है। पर आकाँक्षा की तीव्रता वर्धमान रहती है, साधक क्रमशः एक के बाद दूसरा रास्ता तय करता हुआ आगे बढ़ता है। तीव्रता और मन्दता के अनुमान से ही सिद्धि की प्रगति होती है। इसका सम्बन्ध आकाँक्षा के साथ है। तत्व को जानने या पाने की जितनी तीव्र उत्कंठा होगी, उतना ही अधिक विनय होगा, विनय के साथ श्रवण के प्रति उतना ही तीव्र अनुराग होगा, और श्रवण होने पर मनन हुए बिना रहा ही नहीं जा सकता क्योंकि जहाँ तीव्रता होती है वहाँ प्रमाद होता ही नहीं। प्रमाद में जड़ता होती है और तीव्रता में गति। चेतना की जितनी बुद्धि होगी जड़ता उतनी ही कम होती जायगी। चेतना ही ज्ञान है। ज्ञान होने पर न प्रमाद रहता है और न जड़ता। जड़ता मानव को शिथिल बना देती है चेतना स्फूर्तिवान। इस लिए जैसे जैसे स्फूर्ति बढ़ती जावे समझना चाहिए कि साधना का काम उतने ही अच्छे ढंग से चल रहा है।

जिस प्रकार श्रवण के बाद मनन होना ही चाहिए उसी प्रकार आकाँक्षा होने पर श्रवण भी स्वाभाविक होता है। ये सब एक दूसरे के बाद आने वाले नित्य के स्नेही हैं। अर्थात् इन सबके साथ आत्मा का नित्य का सम्बन्ध है। आत्मा तो सब जगह अनेक रूपों से वर्धमान रहता है शास्त्रों में बतलाया गया है कि-

अग्निर्यैको युवनं प्रविष्टे।

रुपं रुपं प्रतिरुपो बभूव॥

एकतस्या सर्वभूतान्तरात्मा।

रुपं रुपं प्रतिरुपो बहच्य॥ “कठ 0।

जैसे अग्नि एक है लेकिन संसार के जितने पदार्थ हैं उनमें उन्हीं रूपों का अनुकरण करती हुई अग्नि मौजूद है। अनेक रूप होने के कारण उस एक के ही अनेक नाम हो गये हैं लेकिन तत्व में कोई अन्तर नहीं आया। इसी प्रकार अंतरात्मा भी एक ही है, अनेक आकार-प्रकारों, रंग-रूपों में समाविष्ट होने के कारण अनेकत्व में दिखाई देता हुआ भी अपनी एकता से वह खण्डित नहीं हुआ है। अखण्ड एकता ही उसका वास्तविक स्वरूप है और इस अखण्ड एकता की अनुभूति ही वास्तव में ज्ञान है। प्रकारान्तर से इसकी अनुभूति प्रत्येक मानव को होती ही रहती है परन्तु इस अनुभूति में अखण्डता नहीं होती। खण्डित अवस्था से अखण्डित अवस्था की ओर जाना ही ज्ञान की साधना का लक्ष्य है, यही स्वरूप प्राप्ति कहलाती है।

आत्मा सच्चिदानन्द घन है। सत् चित् आनन्द से ओत-प्रोत आत्मा का किसी न किसी रूप में सब को आभास मिलता है। जितने सम्बंध या बन्धन है उन सब में आत्मा की ही अखण्डता का आकर्षण व्याप्त है। सब में आनन्द का स्रोत प्रवाहित हो रहा है। स्त्री, पुत्र, पति, पिता, माँ, भाई, धन, दौलत आदि जितने भी आकार प्रकार दिखाई दे रहे हैं और जिनसे सम्बंध बनाये रखने की भावना तीव्र से तीव्र दिखाई दे रही है इस का एक मात्र कारण आत्मा की अखण्डता का प्रवाह है।

जिस सुख या जिस आनन्द की ओर जीव का जन्मजात झुकाव है उसका कारण आत्मा के आनन्द स्वरूप होने के कारण उससे मिलने की प्रेरणा है। खण्ड रूप में अपने आपको उससे पृथक समझने के कारण इस प्रकार की प्रेरणायें किसी न किसी रूप से मिलती ही रहती हैं। ये प्रेरणायें जितनी बलवान होती हैं, अखण्डता के लिए जीवन उतना ही उत्सुक होता है। यही उत्सुकता आत्मानुभूति की साधना में तीव्रता लाती है। सबसे पहले आकाँक्षा को जन्म देती है। फिर श्रवण कराती है फिर मनन करने के लिए मजबूर कर देती है और निदिध्यासन द्वारा आत्मा के एकत्व का बोध और साक्षात्कार दोनों ही हो जाते हैं। यही आत्मानुभूति की अवस्था है। यहाँ पहुँच कर साधक अनेक रूपों, आकृतियों और शक्तियों वाली एक ही आत्मा के दर्शन करता है। तब उसे अपने से भिन्न कुछ भी दिखाई नहीं देता। बल्कि समस्त संसार उस अकेले का ही विस्तार मालूम होने लगता है। फिर तो यह संसार उसका लीला निक्षेप हो जाता है जिसका निर्माण कि उस स्वयं ने स्वेच्छा से किया है। चारों ओर रस का समुद्र लहराता हुआ दिखाई देता है। अशाँति गायब हो जाती है। अनुभूतिकारों का कथन है कि-

“तत्रको मोहः कः शोकः एकत्वम नुपश्यति”

उस अखण्ड-एकत्वचालेः अवस्था में न शोक रहता है और न मोह तब तो एक ही आनन्द की धारा उसके अनुभव में उसकी कोई प्रथक सत्ता नहीं रह जाती। श्रवण, मनन और निदिध्यासन के फलस्वरूप इस ज्ञान की अनुभूति में साधक परा शान्ति को प्राप्त करता है।


कथनी

कथनी कथ केते गये, कर्म उपासन ज्ञान।

नारायण चारों युगन, करणी है परमान॥

जिनकों मन निजवश भयो, तशकर विषय विलास। नारायण ते घर रहो, करौ भले वनवास॥

नारायण या जगत में, यह दो वस्तु सार।

सबसों मीठी बोलियों, करयो पर उपकार॥

नारायण परलोक में, यह दो आवत काम।

देना मुट्ठी अन्न की, लेना भगवत नाम॥

कियो न मानत और को, परहित करत न आप।

नारायण ता पुरुष को, मुख देखे सों पाप॥


प्राणायाम क्यों करें?

(श्री ॐ स्वामी शिवानन्द सरस्वती)

‘प्राण’ एक ऐसी शक्ति है जो सर्वविदित है। वास्तविक शक्ति यही है। यह सर्वव्यापी है। इसकी गति चर या अचर होती है। यह प्रत्येक प्रकार के जीव, वृक्ष आदि में रहता है। नेत्रों की ज्योति के रूप में प्राण ही प्रकाशमान होता रहता है। प्राण की ही शक्ति से कान सुनते हैं, आँखें देखती हैं, चर्म स्पर्श का अनुभव करता है, जिह्वा स्वाद लेती है, नाक गन्ध का अनुभव करती है, तथा बुद्धि और मस्तिष्क अपना-अपना कार्य करते हैं। एक नवयुवती की मुस्कान, संगीत की मधुरता, कुशल वक्ता के वाक्यों का ओज तथा अपनी प्रेयसी के वचनों में आकर्षण-ये सभी प्राण की देन हैं प्राण से अग्नि जलती है। प्राण से वायु चलती है। प्राण से ही नदियाँ बहती हैं। प्राण से ही वायुयान आकाश में चलते हैं। भाप से चलने वाले इंजन की शक्ति भी प्राण ही है। प्राणशक्ति द्वारा ही मोटर और गाड़ियाँ चलती हैं। रेडियो में ध्वनि प्राण द्वारा प्रसारित होती है। प्राण विद्युतशक्ति है। प्राण बल है। प्राण आकर्षण है। प्राण ही हृदय से धमनियों में रक्त परिचालित करता है। प्राण के द्वारा ही पचन-पाचन, निष्कासन आदि क्रियाएँ होती हैं।

विभिन्न क्रियाओं से प्राण शक्ति व्यय होती है जैसे सोचना, इच्छा करना, बातचीत करना, लिखना, हिलना-डुलना आदि। एक स्वस्थ और बली पुरुष में प्राण शक्ति की ही बहुलता रहती है। भोजन, जल, वायु, ऊष्णता, प्रकाश आदि से प्राण प्राप्त होता है। स्नायुमण्डल इसे प्राप्त करते हैं। श्वास-प्रश्वास प्राण मस्तिष्क या स्नायु केन्द्र में जमा रहता है। वीर्य का रूप ओजस में परिवर्तित हो जाता है तो स्नायुमण्डल को प्रचुर मात्रा में प्राण शक्ति मिलती है। यही ओजस है, यही प्राण है।

जिस प्रकार बिजली घर में इंजन बिजली जमा करता है उसी प्रकार एक योगी प्राणायाम द्वारा प्रचुर मात्रा में प्राण संचित करता है। जिसने योग से प्रचुर मात्रा में प्राण संचित कर लिया है वह सभी दृष्टि से बली और तेजस्वी दिखलायी पड़ता है। तो वह स्वयं एक बिजली घर-सा बन जाता है। जो अन्य व्यक्ति उसके संसर्ग में आते हैं उन्हें भी प्राण शक्ति मिलती है और वे शक्ति, स्फूर्ति तथा तेज प्राप्त करते है। जिस प्रकार एक नदी से दूसरी नदी में जल प्रवाहित होता है। उसी प्रकार एक सिद्ध योगी की ओर से एक अशक्त व्यक्ति की ओर प्राण प्रवाहित होता है। जिस योगी ने यौगिक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर ली है वह यह देख सकता है।

प्राण और शरीर की शक्ति प्राणायाम द्वारा संचित होती है। यह श्वास को नियमित बनाता है। यह महत्वपूर्ण साधन है। प्राणायाम का उद्देश्य प्राण को नियंत्रित करना है। आन्तरिक गहन शक्ति तथा जीवन धारा पर नियंत्रण प्राप्त करने के हेतु श्वास का नियमित करना ही प्राणायाम है। प्राण का बाह्य रूप ही श्वास है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से नियमित श्वास-प्रश्वास बनाया जा सकता है। साधारण व्यक्ति की श्वास क्रिया अधिकाँशतः नियमित नहीं रहती।

यदि प्राण पर नियंत्रण कर लिया जाये तो विश्व की सभी शक्तियों पर विजय प्राप्त की जा सकती है-वे मानसिक हों अथवा शारीरिक। प्राणायाम सिद्ध योगी विश्वव्यापी ब्रह्म पर भी अधिकार कर लेता है जिससे सभी प्रकार की शक्तियाँ आविर्भूत होती है जैसे-आकर्षण, विद्युत, घनत्व, आदि तथा इच्छाशक्ति आत्मबल आदि। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी प्रकार की शक्तियों की प्राप्ति का साधन यही है।

यदि एक व्यक्ति श्वास या प्राण पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है तो मन पर भी नियन्त्रण प्राप्त हो जाता है। जिसने अपने मन पर अधिकार कर लिया है वह अपने श्वास पर भी विजय हासिल कर लेगा। यदि एक छूटा तो दूसरा भी गया। जिसने मन और प्राण पर नियन्त्रण हासिल कर लिया है वह आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है और परम पद प्राप्त कर लेता है। मन, प्राण तथा वीर्य में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिसने वीर्य को संचित कर लिया है वह प्राण और मन पर भी अधिकार कर लेगा।

यदि कोई अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि सुननी होती है तो आदमी एक बार अपनी श्वास रोक लेता है। रेलवे स्टेशन पर कुली जब माल उठाता है तो पहले खूब श्वास भर लेता अज्ञानता में प्राणायाम का अभ्यास करता रहता है। जब कोई व्यक्ति छोटा नाला कूद कर पार करता है या जो व्यक्ति लम्बा ऊंचा कूदने आदि का व्यायाम करता है वह भी अपनी अज्ञानता में प्राणायाम का अभ्यास करता रहता है। श्वास रोकने का यह अभ्यास उनमें शक्ति और स्फूर्ति भर देता है। फलतः तत्काल ही वे शक्ति और स्फूर्ति का अनुभव करने लगते हैं।

मिलावट के सोने को मिट्टी में रख कर सुनार एक नली से फूँक फूँक कर उसे विशुद्ध बना लेता है उसी प्रकार एक योगी प्राणायाम से अपने फेफड़े द्वारा शरीर और इन्द्रियों को विशुद्ध बना लेता है।

प्राणायाम का प्रधान उद्देश्य प्राण और अपान को एक करना और उस एकीकृत वायु को सिर की ओर प्रेरित करना है, जिससे सुषुप्त कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है।

प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम बैठने का ढंग ठीक या आसन सिद्ध करना अथवा शरीर पर नियन्त्रण प्राप्त करना होता है। उसके बाद की क्रिया प्राणायाम होती है। प्राणायाम के सफल अभ्यास के लिये उपयुक्त आसन का उचित रूप सिद्ध होना परमावश्यक है। आराम से और बगैर विशेष श्रम या थकान के जिस ढंग से कैसे कर प्राणायाम किया जा सके वही आसन है जिस आसन पर जितनी अधिक देर आराम के साथ रहा जा सके वही सर्वोत्तम है। छाती, गर्दन और शरीर को एक सीधी रेखा में होना चाहिये। शरीर या मेरुदण्ड को आगे की ओर या दाहिने बायें झुकाना न चाहिये। सीधे तन कर बैठे लेकिन शरीर को एकदम कस न दे। मेरुदण्ड को पूर्णतया सीधा रखना चाहिये। इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा। पीछे की ओर भी शरीर टेढ़ा होने या झुकने न पाये। नियमित अभ्यास से मेरुदण्ड साधारण अवस्था में सीधा रहा करेगा। स्थूलकाय (मोटे) व्यक्ति यदि पद्मासन या कमलासन न कर सकें तो वे सुखासन अथवा सिद्धासन पर बैठकर प्राणायाम का अभ्यास करें। आसन की सिद्धि तक प्राणायाम का अभ्यास रोके न रहे, दोनों का अभ्यास एक साथ करता रहे। समय पाकर दोनों सिद्ध हो जायेंगे। कुर्सी पर सीधा बैठ कर भी प्राणायाम किया जा सकता है।

भगवान कृष्ण ने कहा है

योगी युँजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।

एकाँकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥

छाचौदेशे प्रतिष्ठाप्य स्थिर मासनमात्मनः।

नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिन कुशोत्तरम॥

तत्रौकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रिय क्रियः।

उपविश्यासने युँज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥

योगी को एकान्त में रह कर मन और देह दोनों को भली भाँति वश में करके, वासनाओं को दूर कर और समस्त प्रपंच त्याग कर मन को शान्त रखना चाहिये।

उसे निर्जन स्थान में आसन लगाना चाहिये जो कि न बहुत ऊँचा हो और न नीचा हो। उस पर कुशासन रख उसके ऊपर व्याघ्रादि का चर्म बिछाना चाहिये। फिर उस पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाएं रोक कर तथा मन को एकाग्र कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योग करना चाहिये।

प्राणायाम यद्यपि केवल श्वास क्रिया से सम्बन्धित है तथापि इससे समस्त अवयवों एवं शरीर का उत्तम व्यायाम हो जाता है। प्राणायाम से समस्त रोग दूर होते हैं, स्वास्थ्य सुधरता है, पाचन शक्ति बढ़ती है, स्नायुओं को स्फूर्ति और शक्ति मिलती है, इन्द्रिय निरोध होता है और कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। प्राणायाम से स्वास्थ्य उत्तम और मन स्थिर होता है। प्राणायाम का अभ्यास करने वाला अपने श्वास पर निरोध करता है। उसके सीने पर पत्थर तक तोड़ा जा सकता है। प्राण पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेने के कारण उसे इसका कुछ असर नहीं मालूम पड़ता। प्राणायाम का जिसे अभ्यास हो जाता है उसका शरीर हल्का, निरोग, सुन्दर तथा काँति युक्त रहता है। लम्बी से लम्बी साँस और उसके साथ अधिक से अधिक वायु लेना ही अधिक शक्ति का परिचय है। एक साधारण व्यक्ति 1 मिनट में 15 बार श्वास लेता है। एक दिन में कुल 216000 बार श्वास लिया जाता है।

जिस कमरे में प्राणायाम का अभ्यास करना है वहाँ अंधेरा और सीलन न हो। वह सूखा और खूब हवादार होना चाहिये। किसी नदी या झील के किनारे, किसी बाग या बगीचे में, खुले हरे-भरे मैदान अथवा यदि विशेष सर्दी न पड़ती हो तो किसी पहाड़ के नीचे या शिखर पर करना सर्वोत्तम है। प्राणायाम का अभ्यास प्रतिदिन और सत्य पर ध्यान आधारित कर करना चाहिये। तभी चित्त सुषुम्ना में लिप्त हो जाता है। परिणामतः प्राण स्थिर हो जाता है। प्राणायाम के लिये मन की एकाग्रता और ध्यान पूर्वकता का होना आवश्यक है।

प्राणायाम करते समय या बाद में किसी प्रकार की कमजोरी, थकान या चित्त में झुँझलाहट न आनी चाहिये। उसे करने में पूर्ण प्रसन्नता और सुखद परिणाम का अनुभव करना चाहिये कभी भी अधिक या अनावश्यक थकान मालूम न होने पाये। श्वास और प्रश्वास बहुत धीरे-धीरे लेना चाहिये। कभी और कहीं भी आवाज न हो। जब कभी मन दुःखी हो, निराशा आती हो प्राणायाम के अभ्यास में लग जाने से शान्ति और उत्साह मिलेगा।

कुम्भक (श्वास लेकर वायु को अन्दर रोकना) शरीर में गर्मी उत्पन्न करता है। उससे कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है और वह सुषुम्ना नाड़ी से लेकर उर्ध्वगति को प्राप्त होती है। कुम्भक से आयु बढ़ती है। आसन का अभ्यास करते समय हल्के प्राणायाम का अभ्यास आसन की सिद्धि देता है, तथा अधिक शक्ति और स्फूर्ति प्राप्त होती है। प्राणायाम के साथ-साथ इष्ट मन्त्र का जप भी करते रहना चाहिये। यह योग साधना हो जायेगी।

प्रातःकाल नींद से उठने के बाद चूँकि थोड़ा-बहुत आलस्य बना ही रहता है अतः उस समय थोड़ा सा प्राणायाम कर लेना लाभकर होगा। और साथ ही आलस्य भी दूर हो जायेगा। ध्यान करने के लिये पहिले प्राणायाम कर लेना बड़ा हितकर होगा। प्राणायाम के बाद मन में एकाग्रता आ जाती है।


सकल अभिमान

बाँट खाय हरि को भजे, तजै सकल अभिमान।

नारायण ता पुरुष को, उभय लोक कल्यान॥

बहुत गई थोरी रही, नारायण अब चेत।

काल चिरैया चुग रही निश दिन आयू खेत॥

तेरे भावें कुछ करो, भलो बुरो संसार।

नारायण तू बैठि के, अपनो भवन बुहार॥

नारायण मैं सच्च कहुँ, भुज उठाय के आज।

जो जिय बने गरीब तू, मिले गरीब निवाज॥

विद्या पढ़ करते फिरै, औरन कौ अपमान।

नारायण विद्या नहीं, याहि अविद्या जान॥


मिथ्या प्रदर्शन, और झूठी नामवरी

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)

भारत में केवल धनिक पुरुष ही नहीं, साधारण स्थिति तथा निम्न वर्ग को भी अपव्यय तथा मिथ्या प्रदर्शन की भावनाएँ उन थोथे व्यक्तियों को नष्ट करती हैं, जो दूसरों के सन्मुख अपना अतिरंजित एवं झूठा स्वरूप रखना चाहते हैं। आज के युग का अभिशाप वे आदतें हैं जिन्होंने हमें व्यर्थ-व्यय में फँसा दिया है।

हम देखते हैं कि मध्यवर्ग तथा निम्न वर्गों में एक ओर घर में पत्नि और बच्चे फटे हाल रहते हैं, संतान टुकड़ों को तरसती है, मेरे तुम्हारे आगे हाथ पसारती है, तो दूसरी ओर दिखावा पसन्द पति अपने कपड़े-लत्ते, फैशन तथा जिह्वा की तृप्ति के निम्न आवश्यकता से अधिक व्यय करता है। पुरुष सभा सोसायटी में बैठता है, दूसरों को बढ़िया-2 सूटों, नेकटाई और बूट में देखता है। तो स्वयं भी उनका अनुकरण करता है। वह अपनी स्थिति, आय और जिम्मेदारियों को नहीं समझता। यदि समझता है, तो समझ कर भी भूलना चाहता है।

मिथ्या प्रदर्शन के अनेक रूप हैं-(1) चटकीली भड़कीली पोशाक (2)मित्रों में प्रतिष्ठा रखने के हेतु अपव्यय (3) विवाह, उत्सव, मेले प्रतिष्ठाओं जन्म-मरण संस्कारों में अनावश्यक व्यर्थ (4) दान, दहेज, रिश्वत, चन्दा इत्यादि में अपनी आय की उपेक्षा कर अमितव्यय (5) जाति बिरादरी भाई बन्धुओं के मध्य अपनी झूठी शान रखने के लिए अपव्यय (6) अपनी गन्दी आदतों-सिगरेट, चाय, शराब, सिनेमा, बाल-डाँसिंग व्यभिचार, इत्यादि के वश में आकर नाना प्रकार के भोग विलासों में फिजूलखर्ची। (7) प्रतियोगिता-अमुक व्यक्ति ने अपने लड़के की शादी में 2000) व्यय किये हैं तो हम 4000) रु. व्यय करेंगे। अमुक ने अमुक काम में इतना खर्च किया है, अतः हमें इतना करना चाहिये। इस प्रकार पारस्परिक कम्पटीशन में अनेक व्यक्ति बरबाद होते हैं।

मिथ्या-प्रदर्शन की भावना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से थोथेपन, संकुचितता, उथलेपन, और छिछोरेपन की प्रतिक्रिया है। जो व्यक्ति जितना कम जानता है, पढ़ा लिखा, अविवेकी और नासमझ है, वह उतना ही बाह्य प्रदर्शन करता है। जो स्त्रियाँ बिना पढ़ी लिखी मूर्ख हैं, बनाव शृंगार में अत्यधिक दिलचस्पी लेती हैं। लज्जा तक का ध्यान नहीं रखती। इसी फिजूलखर्ची का यह दुष्परिणाम है कि आज महिला जगत् में, विशेषतः पंजाबी नारी समाज में फैशन-परस्ती बुरी तरह अभिवृद्धि पर है। शाम को बड़े शहरों में ढेर की ढेर दिखावा पसंद नारियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्रों आभूषणों तथा सौंदर्य के अन्य प्रसाधनों से विभूषित निकलती हैं। इन्हें देखकर कौन कह सकता है कि भारत निर्धन देश है या यहाँ अन्न संकट है। प्रतिदिन बड़े-बड़े शहरी में दो से ढाई मन तक पाउडर और इसी अनुपात में क्रीम, सुर्खी, सेन्ट इत्यादि व्यय होते हैं। धोबियों, नाइयों और दर्जियों के बिल निरन्तर वृद्धि पर हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के फैशनेबल वस्त्र तैयार हो रहे हैं। सुनार आभूषणों के चक्र में डाल कर असंख्य धन लूट रहे हैं।

डॉ. सेमुएल स्माइल्स ने एक बड़े पते की बात लिखी है “दैनिक चर्या में हमारा सदा यही विचार रहा करता है कि किसी प्रकार हम दूसरों से कम न समझे जावें। समाज में हमारा उतना ही आदर हो, जितना दूसरे करते हैं तथा हमारे पास उतनी ही दिखावे की सामग्री हो, जितनी दूसरों के पास है। इन्हीं वस्तुओं..सुन्दर टायलेट, फोटो, बढ़िया फर्नीचर, रेडियो, किस्से कहानियों की पुस्तकें, हैट, बिजली का सामान, बढ़िया ड्रेस बाजे, मनोरंजन के सामान, फाउन्टेन पेन के संग्रह में हम सारी आमदनी खर्च कर डालते हैं। कभी कभी जरा सी वस्तु के निमित्त कर्ज लेते नहीं डरते। न जाने हमारे दिमाग में यह खोटा विचार कैसे घुस गया है कि जैसा दूसरे करें, वैसा हम करें। यदि हमारा दूसरा भाई घोड़ा गाड़ी रखता है, बहुत से नौकर रखता है, बड़े बढ़िया मकान में रहता है, प्रतिदिन नये नये कपड़े बदलता है, अच्छे अच्छे खाने खाता है और दूसरों को खिलाता है, तो हमको भी ऐसा ही करना चाहिए, तब ही हमारी बात बनी रहेगी। परन्तु यह कभी नहीं विचारते कि इतना व्यय करने की हमारी आमदनी भी है, या नहीं। दूसरों के समान हम प्रतिष्ठा पाना तो आवश्यक समझते हैं पर उसके कारणों और साधनों पर कभी विचार नहीं करते।

रुपये को मितव्ययिता और सावधानी से व्यय करने से प्रतिष्ठा में वृद्धि है, न कि ऋण लेकर या उधार व्यय करने से। ऋण के कारण बड़ी बड़ी जायदादें नष्ट हुई हैं। बड़े से बड़े रईस और तालूकेदार इसी फिजूलखर्ची के कारण सर्वस्व स्वाहा कर चुके हैं। लाखों का धन, बड़ी-बड़ी स्टेटें विलासिता, व्यभिचार, भोगविलास, झूँठे दिखावे की भट्ठी में नष्ट हुए हैं।

जिनमें आत्मबल और स्वाभिमान है, वे सच्ची तथा झूँठी प्रतिष्ठा में अन्तर समझते हैं। आत्मबल वाले महापुरुष बाह्य प्रदर्शन में नहीं, प्रत्युत आन्तरिक विकास में अपनी बुद्धि, तर्कशक्ति, अध्ययन, मनन, योग्यता की वृद्धि में गर्व का अनुभव करते हैं। वे सरल सादे वस्त्रों का प्रयोग करते हैं। साधारण किन्तु पौष्टिक भोजन काम में लाते हैं, आमदनी से आधा व्यय करते हैं। अपनी मौलिकता के प्रकाश में उन्हें दूसरों के अनुकरण से अधिक स्वाद आता है। वे स्वावलम्बी होने के साथ आत्मनिग्रही भी होते हैं। उनका जीवन अंधानुकरण में नहीं, प्रत्युत अपनी विशेषताएँ प्रकाशित करने में लगता है।

महात्मा गान्धी जी को लीजिये। वस्त्रों की दृष्टि से उनके पास एक खद्दर की धोती रही है, उसके साथ खद्दर की कमीज तथा चादर इत्यादि, भोजन में वे बकरी दूध, गेहूँ की चपाती, फल, तरकारियाँ, खजूर इत्यादि लेते रहे हैं। मकान अति साधारण किन्तु स्वच्छ। रहन-सहन में सादगी, दिखावे से सर्वदा दूर। उनकी विशेषता थी आन्तरिक विकास, आत्मनिष्ठा, सत्याग्रह अध्ययन तथा मनन। भारत के लिए रहन-सहन की दृष्टि से उन्होंने भारतीय आदर्श उपस्थित किया था।

अनेक व्यक्ति रस्म रिवाजों के दास बन रहे हैं। जो कुछ हमारे पूर्व पुरुषों ने किया, वही हम भी करेंगे। जो कुछ हमारे कुटुम्ब में होता चला आया है, वह हमें जारी रखना चाहिए। ऐसा सोचते समय हम यह भूल जाते हैं कि उनकी तथा हमारी परिस्थितियों में बहुत अन्तर आ गया है। फिजूल के रस्म रिवाज को रोकने का भरसक प्रयत्न हमें करना चाहिए। हम स्वयं उनसे बचें, तथा दूसरों को उनसे बचायें।

यदि हमारे पास रुपया है तो उसे शृंगार तथा दिखावे में खर्च करने के स्थान पर हमें ऐसे आवश्यक पदार्थों में व्यय करना चाहिए जिनसे स्थायी लाभ हो। जेवर कदापि आवश्यक चीज नहीं हैं। आवश्यक पदार्थ ये हैं।

(1) पौष्टिक पदार्थ, अच्छे-अच्छे फल, तरकारियाँ सूखे मेवे, दूध दही।

(2) साफ सुथरे वस्त्र-जो चलाऊ हों, धुल सकें और मजबूत रहें।

(3) स्वच्छ मकान-जिसमें वायु का प्रवेश खूब हो, आसपास स्वच्छ हो।

(4) संतान के लिए उत्तमोत्तम शिक्षा, पत्र, पत्रिकाएं अच्छी पुस्तकें

(5) बचत-रोग, वृद्धावस्था, विवाह, मृत्यु मकान आदि के लिए।

(6) दान-सत् शिक्षा और दीन दुखियों के लिए सहायता।

यदि हमारी आमदनी थोड़ी है तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारी सब आवश्यकताएं और दिल बहलाव की चीजें तो पूर्ण नहीं हो सकतीं। अतः हमें अपनी आवश्यकताओं में सबसे पूर्व रखना होगा। जो पूरी नहीं हो सकतीं उनके प्रति आत्म संयम से काम लेना होगा, मन का दमन करना होगा। जो चीजें हम क्रय नहीं कर सकते उनके प्रति मन में इच्छाएं करना ही अपने जीवन को दुःखमय बनाना है। अभाव की इच्छा जीवन को अस्त व्यस्त कर देती है। जब मनुष्य की बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती तो वह असत्य, अविचार, बेईमानी का पथ ग्रहण करता है, घर घर भीख माँगता है, चोर डाकू बन कर जाति और देश को कलंकित करता है।

जो आमदनी हो उससे कम व्यय कीजिये और थोड़ा थोड़ा अपनी भावी आवश्यकताओं के लिए अवश्य बचाते चलिये। अपनी चादर देख कर पाँव फैलाइये। ऋण बुरी बला है-यह झूँठ नीचता, कुटिलता, चिंता और मायाचार की जननी है। प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी क्षण भर में अपमानित कर देना उसके लिए साधारण सी बात है। दूसरों का अनुकरण कर केवल दिखावे मात्रा के लिए व्यय करना सबसे बड़ी मूर्खता है, बजट बना कर खर्च न करना निरर्थक और दुःखमय है।


स्त्रियों को भी व्यायाम आवश्यक है

(श्री गणेशदत्त “इन्द्र” आगरा)

अथर्ववेद में कहा है-

“देवैर्दत्तेन मणिना जांगिडेन मयोभुवा।

विष्कन्धं सर्वारक्षाँसि व्यायामें सहाभहे।” 2/4/4

अर्थात्-देव प्रदत्त मणि के समान श्रेष्ठ आनन्द वर्द्धक, रोगों के नाशक व्यायाम के द्वारा विघ्न और राक्षसों को हम दबा दें। यह वेद मंत्र स्पष्ट कह रहा है कि व्यायाम आनंद का देने वाला रोग नाशक, विघ्न और दुष्टों को दूर हटाने वाला है। आनंद सभी के लिये अपेक्षित है, वह स्त्री हो या पुरुष, निरोग स्त्री-पुरुष दोनों को ही आवश्यक हैँ विघ्नों से सभी बचना चाहते हैं, और दुष्टों से बचने के लिये पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को कहीं विशेष आवश्यकता रहती है।

स्त्री-पुरुष के भेद की बात ही छोड़िये। व्यायाम की तो प्राणीमात्र को आवश्यकता है। बिना व्यायाम के जीवन ही नहीं। प्रकृति प्रत्येक प्राणी को व्यायाम की ओर स्वयं प्रेरित करती है। छोटा सा शिशु जो अभी घुटनों भी नहीं चल सकता, लेटे लेटे ही अपने हाथ पैर हिला डुलाकर व्यायाम कर लेता है। यदि वह ऐसा न करे तो उसका स्वास्थ्य दिनानुदिन खराब होकर वह मर जायेगा। पशु पक्षी भी ऐसा ही व्यायाम नित्य अपनी शक्ति के अनुसार किया करते हैं। कुत्तों को देखिये, वे दौड़ते हैं आपस में खेलते हैं इत्यादि। उनके नैसर्गिक व्यायाम को प्रकट करते हैं। पक्षी उड़ते हैं, जलचर तैरते हैं, थलचर पशु दौड़ते भागते हैं। परन्तु मनुष्य प्राकृतिक नियमों को तोड़ते जाना ही अपनी बुद्धिमता की श्रेष्ठता मानता है। वह हाथ पैर नहीं हिलाना चाहता। लेटे बैठे ही सब काम कर डालने में अपनी मनुष्यता मानता है। यह मनुष्य की भूल है। वह ज्यों ज्यों परिश्रम से हट कर, आराम तलब बनता जायेगा, उसका पतन होगा।

जिस प्रकार जीवन चलाने के लिये मनुष्य को वायु, जल, अन्न, प्रकाश आदि की जरूरत है, उसी भाँति व्यायाम की भी अत्यन्त आवश्यकता है। फिर वह चाहे स्त्री हो या पुरुष। शरीर दोनों के हैं, समान इन्द्रियाँ और समान अवयव हैं। ऐसी दशा में व्यायाम भी दोनों ही को आवश्यक हैं। मैं, अखाड़े में कुश्ती पछाड़ने के लिये, अथवा सर्कस में अपना काम दिखाने के लिये किये जाने वाले व्यायाम को व्यायाम नहीं कह रहा हूँ। मेरा तात्पर्य उसी व्यायाम से है जिससे स्वास्थ्य ठीक रहे, आत्मरक्षा की जा सके और सुन्दर सबल तथा दीर्घायु बच्चे उत्पन्न किये जा सकें। ऐसे पवित्र अनुष्ठान में स्त्री-पुरुष दोनों को समानता से संलग्न रहने पर ही उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है।

जिस प्रकार पुरुषों ने स्त्री जाति को दबाये रखने के लिये “न स्त्री स्वातंत्र्य मर्हति” कह कर उनके पढ़ने लिखने तक के अधिकार छीन लिये, उसी प्रकार अपनी कमजोरी को छिपाये रखने के लिये स्त्रियों को व्यायाम से भी वंचित रख दिया। यदि प्राचीन समय में भी वर्तमान काल की स्त्रियों जैसी पीले मुख वाली, निस्तेज, निर्बल, रोगी, और डरपोक स्त्रियाँ होतीं तो, कीचक को एक धप्पे में जमीन पर चारों खाने चित्त गिरा कर अपने सतीत्व की, उस बल गर्वित नीच से द्रौपदी रक्षा कदापि नहीं कर सकती थी। जनक नन्दिनी देवी सीता महादेव जी के कठिन पिनाक को, जिसे उठा कर मोर्चा चढ़ा देना राक्षस जैसे पराक्रमी की शक्ति के बाहर था-बचपन में ही उधर से इधर उठाकर रखने में समर्थ न होती। रावण के यहाँ अपने पतिव्रत को नहीं बचा सकती थीं। यह सब उनके व्यायामशील होने का ही प्रभाव था। उन दिनों लड़कों की भाँति लड़कियाँ भी व्यायाम, घोड़े की सवारी, रथ परिचालन और शस्त्रास्त्र चलाना सीखती थीं। तभी वह हमारी उन्नति का हीरक-युग था।

आज पुरुषवर्ग स्त्रियों को बलवान बनाने में घबराता है। वह जानता है कि इनके बलवान होने पर हमारा बाबूपना धूल में मिल जायेगा। उसकी शान तभी तक है और उसकी निर्बलता की दुकान तभी तक है जब तक कि स्त्रियाँ बलवान नहीं बन जातीं। इसीलिये तो वे कहते हैं कि स्त्रियों को व्यायाम हानिकार है। व्यायाम से उनका सौंदर्य नष्ट हो जायेगा। सुकुमारता जाती रहेगी। मर्दानापन आ जायेगा। वे वन्ध्या हो जायेंगी और उनमें से स्त्रीत्व का नाश हो जायेगा इत्यादि। किन्तु ये सब बेप्रमाण और भ्रामक बातें हैं। व्यायाम से सौंदर्य कभी नाश नहीं हो सकता बल्कि व्यायाम तो सुँदरता प्रदान करता है। हाँ, दुबले पतले कमजोर हाथ पैर, निस्तेज पीला शरीर, फीका सफेद मुँह ही सौंदर्य मान लिया गया तो निराली बात है। इस कमजोरी और रोगी दशा का नाम ही सुकुमारता है तो बड़ी भारी भूल है। यदि स्त्री का शरीर प्रायः अस्वस्थ रहे, सिर दुखता रहे, चक्कर आते हों, दो चार कदम चलकर ही थक जाती हो, भोजन न पचता हो तो उसे पद्मिनी समझ बैठना या अत्यन्त सुकुमार मानकर अपने अहोभाग्य मानने लगना भूल है। वह तो बेचारी अस्वस्थ है, मृत्यु की ओर बढ़ रही है। व्यायाम के अभाव में ही उसकी यह दशा है न कि वह शिरीष-सुमन की भाँति स्वाभाविक सुकुमार है। यदि पोच और लचपचा शरीर ही स्त्रित्व का सूचक हो तो फिर कुछ कहना ही व्यर्थ है, परन्तु ये सब भूलें हैं। व्यायाम से न तो स्त्रियों में पुरुषत्व का उदय होता है और अव्यायाम से पुरुषों में ही स्त्रीत्व आता है।

यह स्पष्ट हो गया होगा कि स्त्रियों को व्यायाम की प्रथम आवश्यकता है। व्यर्थ की छूछी और शुष्क दलीलें पैदा करके स्त्रियों को व्यायाम से विरत करना, राष्ट्र के लिये अत्यन्त घातक है। आज भारत के अतिरिक्त सभी देशों में स्त्रियाँ जाग उठी हैं। वे पुरुषों से कदम मिलाकर चल रही हैं। भयंकर से भयंकर कामों में पुरुषों की समानता कर रही हैं। युद्ध विद्या सीख रही हैं। लड़ाई के मैदानों में जा रही हैं। अपने पुरुषार्थ से विपक्षियों को लोहे के चने चबवा रही हैं। पृथ्वी पर, समुद्र तल पर और आकाश में सर्वत्र पुरुषों के साथ प्रतियोगिता कर रहीं हैं, परन्तु हमारा देश अभी स्त्रियों के व्यायाम को ठीक नहीं समझ रहा है। यही कारण है कि आये दिन बंगाल और सीमा प्राँत से स्त्री-हरण के संवाद समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलते हैं!!! घर में बिल्लियों के लड़ मरने से डर कर घबरा जाने वाली, कुत्ते को भगाने में डरने वाली, और शरीर पर चुहिया के चढ़ जाने पर चीत्कार कर उठने वाली स्त्रियों से और उनके गर्भ द्वारा उत्पन्न सन्तानों से राष्ट्र का कुछ भी हित नहीं हो सकता।

यह स्पष्ट है कि स्त्रियों को व्यायाम हानिकारक नहीं अपितु अत्यन्त लाभप्रद है। स्त्रीत्व के लोप का, सौंदर्य और सुकुमारता के नाश का, तथा बाँझ हो जाने का भय मानना भूल है। आप यहाँ यह प्रश्न करेंगे कि अभी पुरुषों को ही व्यायाम प्रेम नहीं है और लाखों माँग पट्टी वाले, मुख पर तेल की वार्निश किये, निस्तेज और हतवीर्य बाबू इस देश में हैं, उन्हें व्यायाम की ओर प्रवृत्त न करके स्त्रियों के व्यायाम का प्रश्न उपस्थित कर बैठना कहाँ की बुद्धिमानी है? परन्तु यह प्रश्न व्यर्थ ही सा है हम पहिले ही कह आये हैं कि स्त्री हो या पुरुष मनुष्य मात्र को व्यायाम की जरूरत है। वे बाबू लोग न करें तो न सही-पुरुषों का बहाना लेकर स्त्रियों की शारीरिक उन्नति में बाधा पैदा करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। पुरुष तो खुली हवा में घूम फिर कर थोड़ा बहुत व्यायाम कर भी लेते हैं, परन्तु स्त्रियाँ तो घरों में बन्द रह कर अपने जीवन के दिन काट रही हैं। वे पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा बीमार, रोगी और निर्बल रहती हैं, क्षय रोगी स्त्रियों को ही ज्यादा होता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की ही अधिक मृत्यु होती है। हमारे कहने के सत्यासत्य का निर्णय किसी भी शहर में जाकर किया जा सकता है।

स्त्रियों के स्वास्थ्य को साधारणतया ठीक रखने को हमारे घरेलू व्यायाम ही काफी हैं, परन्तु नाली के नलों ने, मशीन की चक्कियों ने, कपड़ों की मिलों ने उसे चौपट कर दिया। कई बड़े बनने के शौकीन और बाबू कहलाने वालो ने जान बूझकर स्त्रियों को अकर्मण्य, आलसी और रोगी बना डाला। घर में जीवित प्रतिमाओं की भाँति उन्हें रख कर उनके स्वास्थ्य को चौपट कर डाला। चक्की पीसना, पानी भरना, धान कूटना, छाछ बनाना, कपड़े धोना, पशु पालना, कडबी काटना, चर्खा काटना प्रभृति अनेक घरेलू व्यायाम हैं, जिन्हें स्त्रियाँ सहज ही करके स्वस्थ, सबल और निरोग रह सकती हैं। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि ये घरेलू व्यायाम भारतीय नारी समाज के कल्याणार्थ एक झोंपड़ी से लगाकर राज महलों तक पुनः प्रचलित हों। इन्हें बालिकाएं, युवतियाँ और वृद्धायें सभी यथाशक्ति करके स्वास्थ्यलाभ कर सकती हैं।

इसके अतिरिक्त दूसरे भी अनेक व्यायाम हैं जो स्त्री जाति के लिये हितकर, उपादेय एवं आवश्यक हैं। हम आगे कभी थोड़े बहुत व्यायाम कन्याओं, युवतियों और वृद्धाओं के लिये अलग-अलग संक्षेप में लिखेंगे। जो स्त्रियाँ सदा रोगिणी रहती हैं, वे घरेलू व्यायामों को अवश्य करें। चक्की पीस कर ही विविध रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। जो पानी भर सकें वे कुएं से पानी खींचना शुरू करदें। कुछ दिनों में ही स्वास्थ्य उन्नत दिखाई पड़ेगा। जब स्त्रियाँ ऋतुमती हो तब व्यायाम भी बन्द कर दें। इसी प्रकार गर्भकाल में भी व्यायाम नहीं करना चाहिये। बहुत ही हल्का व्यायाम लेते रहना चाहिये। बिलकुल व्यायाम न लेने से भी प्रसव काल में बड़ी तकलीफें उठानी पड़ती हैं। हमारे उक्त विवेचन से आप समझ ही गये होंगे कि स्त्री जाति को व्यायाम की कितनी आवश्यकता है।


विद्यावन्त स्वरूप

विद्यावन्त स्वरूप गुण, सुत दारा सुख भोग।

नारायण हरिभक्ति बिन, यह सबही हैं रोग॥

नारायण सतसंग कर सीख भजन की रीत।

काम क्रोध मद लोभ में, गई आरबल बीत॥

नारायण जब अन्त में, यम पकरेंगे बाँहि।

तिनसों भी कहियो हमें, अभी फुरसतों नाँहि॥


मिट्टी की उपयोगिता

(डॉ. लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम.ए.एन.डी.)

यह मानव-स्वभाव की कमजोरी है कि जिस वस्तु को प्राप्त करने में जितना ही अधिक व्यय, परिश्रम तथा कठिनाइयाँ होती हैं हम उन्हें उतना ही महत्व देते हैं। डाक्टरों की लम्बी फीस और दवाखानों की महंगी दवाओं के बीच हम प्रकृति के इस दान ‘मिट्टी’ की महत्ता भूल गए हैं। हमारा यह अभाग्य है।

आपने लोगों से सुना होगा-अखाड़े की मिट्टी में बल होता है। इससे खाल में कोमलता आती है। तो अखाड़े की न भी हो, कहीं की भी हो लाभ तो मिट्टी का ही है। इसकी शक्ति महान है। पंडोल मिट्टी लो, न हो तो चिकनी मिट्टी को ही पानी में मिलाओ। हाथ मत डालो। कपड़े पर मिट्टी को 3 घंटे तक रखो। फिर दूसरी बदलो। ऐसे रोगी को जिसका हाथ काटने को डॉक्टर कह चुके थे, वह भी अच्छा हो गया। शरीर के अन्दर विष हो, ज्वर भी साथ में हो, फोड़े-फुँसी हों, तब मिट्टी की पट्टी यदि अरसे तक बाँधी जाय तो लाभ करती है। वैसे ही यदि किसी के बटिया पड़ गई हो-न पके, न फूटे, न दर्द हो वह मिट्टी की पट्टी से बटियाँ भी छट जाएं। 20-20 मिनट पर पट्टी बदली जाय। पट्टी चाहे गरम प्रयोग करें चाहे ठंडी।

याद रहे यदि रोग-स्थान छूने पर गरम मालूम पड़े तो ठंडी पट्टी और यदि वह छूने पर ठंडा मालूम पड़े तो गरम पट्टी का प्रयोग हो।

मिट्टी से शरीर का संपर्क नंगे पैर चलने से ही है। पर ईंटों के फर्श, पलस्तर, या तारकोल वाली सड़कों पर चलने से लाभ नहीं होगा। घास वाली भूमि पर और प्रातः ओस की बूँदें भी हों तो सोने में सुहागा है।

फोड़े तथा दर्द में जल्दी-जल्दी पट्टी बदले और यदि शरीर गरम हो तो ठंडी पट्टी बाँधे। उकौता दाद में भी मिट्टी का प्रयोग करना चाहिए पर कुछ अरसे तक प्रयोग करें। मिट्टी में पानी होने से, सिकुड़ कर पहले खून भीतर जायगा, फिर मिट्टी गरम होने पर खून फिर प्रतिक्रिया-स्वरूप बाहर की ओर आयेगा-इससे खून का दौरान होगा।

आँखों में जलन, सर का दर्द यदि खून के दौरान के कारण हो, रक्तचाप में लम्बे अरसे तक मिट्टी का प्रयोग करे। गठिया में विशेष लाभ होता है। ऐसे रोगों में विषैले पदार्थों के जमा होने से खून का दौरान कम हो जाता है। इससे पहले ही से ठंडक बनी रहती है-अतः मिट्टी को गरम करो। मिट्टी कूटो, पीसो, पानी मिलाकर डिब्बे में रखो और डिब्बे को उबलते पानी में रखो फिर ग्लेसरिन मिला दो। उससे गर्मी देर तक रहती है। वह ‘ऐन्टी फ्लाजस्टीन का असर करेगा। वरन् और ज्यादा ही। यह गरम प्लास्टर आधे-आधे घंटे बाद बदलें। निमोनिया में भी यही प्रयोग करे। पानी का सेक भी करें। प्लूरसी के रोगी पर भी यही गरम मिट्टी का प्रयोग करो। साइटिका तथा नसों में सूजन आ जाने पर भी गरम मिट्टी का प्रयोग होगा पर पट्टी का प्रयोग करो। पेट पर ठंडी पट्टी रखो पर पेचिश में गरम पट्टी प्रयोग करो। विशेष कर पहले पहल ऐंठन कम होने पर धीरे-धीरे फिर ठंडी पट्टी प्रयोग करें। गरम पानी का एनेमा दो। फिर पेट पर पट्टी लगाओ। इससे रोग की हालत संभल जाती है। पेचिश में पेडू पर मिट्टी की पट्टी लगाओ। ऐंठन की हालत में गरम, ऐंठन दूर होने पर धीरे-धीरे ठंडी पट्टी आधा इंच मोटी मिट्टी की सदा रहे। ऊपर से मोटा कपड़ा रखो। पैखाने के बाद तुरंत एनेमा देकर मिट्टी की पट्टी बाँधना अति लाभ करता है।

ठंडी पट्टी को बाद में 7-8 घन्टे तक रखा जा सकता है। बुखार में ठंडी पट्टी का प्रयोग करो। मलेरिया में पहले ठंडक लगती है क्योंकि खून का दौरान लड़ने के लिए भीतर जाता है-बाद में खून का दौरान बाहर की ओर होने पर ज्वर आ जाता है। ऐसी दशा में गरम पानी का एनेमा लें। चाय सा गरम जल लो। 20 बूँद नीबू डालकर खूब पानी पिलाओ कि पेशाबें हों। ज्वर आने के पूर्व आधा घंटा पहले वाष्प-स्नान करावे। फिर स्पंज करके लिटा दो। पसीना आयेगा। ज्वर आने के पहले ही यदि हम पसीना ले आयें तो जूड़ी नहीं आयेगी। जिस दिन जूड़ी-बुखार की बारी हो, उस दिन गरम पानी में नींबू का रस पिलाओ। उपवास कराओ। जब कंपकंपी उतर जाय, बुखार चढ़ा हो तब मिट्टी की पट्टी पेडू पर रखो। नीचे से ऊपर की ओर स्पंज करो और जिस भाग पर हो चुके वह ढकते जाओ। फिर मिट्टी की पट्टी लगाओ।

टाइफ़ाइड में मिट्टी की ठंडी पट्टी पेट पर बाँधो क्योंकि यह रोग पेट की खराबी से होता है। इन्फ़्लुएंज़ा, जुकाम, खराश में पेडू पर मिट्टी की पट्टी की ठंडी पट्टी बाँधे। मोतियाबिन्द, रोहे में तीन हिस्से पानी तथा एक हिस्सा नीबू का रस लो। प्रातः सायं आँखों में डालो और पेट पर मिट्टी की पट्टी रखो क्योंकि पेट की खराबी से ही रोहे आदि होते हैं।

मिट्टी द्वारा इलाज को समझने में नीचे लिखे सिद्धान्त को समझने में आसानी होगी। 3 प्रकार की मिट्टी होती है।

काली मिट्टी-खुले हुए रोगों में यही लाभकारी होती है। चर्म रोग में यह अधिक उपयोगी है। उकौता, खुजली, दाद तथा तेज गरमी या जलन वाले दाने तथा मकड़ी में भी इसका प्रयोग उत्तम है। फोड़े-फुँसी में भी लाभप्रद है। खाल पर सफेद दाने हों तथा नीबू का रस भी काली मिट्टी में मिला लें तो और भी लाभ है। यदि एक सेर मिट्टी में आधा चूना बारीक पीस कर मिला ले तो और भी अच्छा है।

चिकनी या धुली मिट्टी-अंदरूनी सूजन में यही ज्यादा फायदा पहुँचाती है। जिगर या आँतों की सूजन में भी लाभ करती है। बच्चों के यकृत रोगों में गाय के पेशाब में मिट्टी छनवा कर तैयार करे उससे बहुत लाभ होगा। साथ में सेब खिलावें।

बढ़े हुए जिगर तथा टाँसिल में सेब तो इतना अधिक लाभ करता है कि केवल सेब खाकर रोग दूर किया जा सकता है। पर सेब लेट कर खाए और उसमें चाकू न लगे।

पंडोल या मुल्तानी मिट्टी-अंदरूनी माद्दे को खींचकर ऊपर लाने में यह मिट्टी अति लाभप्रद है। यह रक्त की अधिक गरमी को शान्त करती है। ऊपर को माद्दा, यह मिट्टी घसीटती है। रोग को ऊपर लाकर रोग समाप्त कर देगी।

साधारणतया प्रायः ठंडी ही पट्टी लगाना चाहिए। पर यदि आँख में दर्द है पर आँख जलती नहीं है तो तनिक गरम कर पट्टी बाँधे।

मिट्टी का उपयोग तो साँप काटने पर भी होता है। आदमी की लम्बाई चौड़ाई का एक गढ्ढा खोदो आदमी को उसमें खड़ा करो या लिटा दो इस प्रकार कि उसका शरीर मिट्टी छूता रहे। शेष अन्य उपचार चाहें तो कर सकते हैं। मिट्टी में विष खींचने की शक्ति होती है। याद रहे एक बार ही प्रयोग ही हुई मिट्टी विषैली हो जाने के कारण फेंक देनी चाहिए।

प्रकृति की महानता अनन्त है। रेगिस्तान तथा पर्वतों को छोड़ कर सब कहीं मिट्टी ही मिट्टी है। यदि हम उसकी उपयोगिता समझ सकें और फिर उससे इलाज द्वारा लाभ भी उठा सकें तो जहाँ डॉक्टर-वैद्य प्राप्त नहीं है या धनाभाव है, वहाँ बिना खर्च के ही हम अपना इलाज कर सकते हैं।


बोलने का उत्तरदायित्व।

(डॉ. परशुराम शर्मा फीरोजपुर)

वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य भी एक प्रकार का पशु है। पर अन्य पशुओं से इसमें जो विभिन्नतायें तथा विशेषतायें हैं उनमें से एक उसकी बुद्धिशक्ति है। इस शक्ति ने उसे इतना उन्नत किया है कि कोई भी पशु उसके आगे नहीं ठहर सकता। जो कुछ भी हम इस पृथ्वी पर देखते हैं वह मनुष्य की बुद्धिशक्ति का ही फल है। ऐसे चमत्कार पशु नहीं कर सकते। यदि यह न होती तो पृथ्वी का रंग रूप कुछ और ही होता।

यद्यपि बुद्धिशक्ति पशुओं में भी है और उसके द्वारा वह अपने कार्य करते हैं पर वह मनुष्यों की तरह अपने साथी पशुओं तक अपना ज्ञान तथा भाव नहीं पहुँचा सकते जैसे मनुष्य करता है। इस लिए मनुष्य ने जितनी उन्नति की है उतनी पशु न तो कर सकते हैं और न उन्होंने की है। मनुष्य अपने आँतरिक भाव और गुप्त विचार अपने साथियों तक बोल कर पहुँचाता है। इसलिए वाणी उसकी मुख्य विशेषता है। एक दूसरे के प्रति बोली द्वारा ही मेल मिलाप होने से मनुष्य ने समाज का बड़ा विस्तृत रूप बना लिया है और मिलजुल कर रहने की आवश्यकता बढ़ गई है।

यह एक सत्य है कि शब्द अक्षरों के मेल से बनते हैं। अक्षर का अर्थ है नाश न होने वाला। इससे शब्द भी नाश वान नहीं। इसीलिए शब्द को वेद तथा ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। क्योंकि जैसे ब्रह्म नाशवान नहीं उसका कोई आदि अंत नहीं उसी प्रकार हमारे शब्द भी अनादि तथा अमर हैं और सर्वव्यापक हैं। यह सत्य यद्यपि हमारे महान ऋषियों ने जनता पर प्रकट किया था अब रेडियो के आविष्कार ने स्थूल रूप से इस सत्यता का कुछ अंश हमारे सामने रख दिया है।

शब्द का बल कितना है इसको हम प्रतिदिन देखते तो हैं फिर भी उसके मर्म को समझने में अयोग्य हैं। हम देखते हैं कि एक हमारा सम्बन्धी हम से प्रिय, मीठे, रुचिकर तथा पवित्र शब्द कहता है तो उसका हम पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है और हमारे भीतर सरसता, मिठास, प्रेम तथा निकटता का भाव पैदा होता है और जो भी उस वातावरण से स्पर्श करता है वह भी ऐसी ही अवस्था को प्राप्त होता है। परन्तु यदि उसके विपरीत वही सज्जन हमें कटु, घृणा, तथा झूठे शब्द बोलता है तो हम पर वही प्रभाव पड़ते हैं।

इन दोनों अवस्थाओं में यदि हम भी उसकी प्रतिक्रिया के अनुसार वैसे ही कटु और दुखदाई शब्द बोलने लग जायेंगे अथवा मीठे और प्रेम भरे भावों से उसे सम्बोधित करेंगे। इस प्रकार से एक चक्र चलने लग जाता है जो कुछ समय के लिए बंद हुआ प्रतीत हो परन्तु उसकी छाप हमारे दिल पर पड़ जाती है और वह आगे के लिए क्रम को और भी दृढ़ कर देता है। यदि बुरे शब्दों पर अधिकार न जमाया जावे तो उनके प्रभावों के अंकुर बढ़ते रहते हैं और कुचक्र हमें उसी गड्ढे में ढकेलता रहता है क्यों कि वह हमारे जीवन का अंग बन जाता है। इसलिए शब्दों पर अंकुश का होना अत्यन्त आवश्यक है। नहीं तो अति भयानक फल हमारे लिए तथा औरों के लिए पैदा हो जाते हैं। घरों में लड़ाइयां, बाजारों और शहरों में दंगे, देशों के भीतर परस्पर युद्ध इसी का फल होते हैं।

शब्दों पर अंकुश रखना अति कठिन है क्योंकि इनका स्रोत हमारे भीतर के भाव तथा विचार हैं। जब वह शुद्ध न होंगे तथा काबू में न होंगे तब तक शब्दों पर भी अधिकार नहीं हो सकता है। इसलिए हमें अपने भीतर की अवस्था को जानना और समझना चाहिए और उनको ऐसे नीच तथा बुरे नहीं होने देना चाहिए जिससे उनके द्वारा बुरे और घृणास्पद शब्दों की उत्पत्ति हो। इसके लिए हमें पहली बात यह करनी होगी कि हम ऐसे लोगों का संग न करें जो उन नीच विचारों को बढ़ाने वाले हैं। इसी प्रकार ऐसी पुस्तकें भी न पढ़े जो मन को उत्तेजित करती हों। वरन् श्रेष्ठ और भद्र जनों का संग करना चाहिए और ऐसा ही साहित्य देखना और पढ़ना चाहिए। तब जाकर उनसे बुरे शब्दों की उत्पत्ति न होगी और हम तथा और जन उन सब दुखों से बच सकेंगे जो उनसे पैदा होते हैं।

इस प्रकार से शब्द जहाँ पहले ही हमारे भीतर थे वहाँ वह प्रकाश होने पर भी बने रहते हैं और फिर हमारी ओर ही खिंच कर हम पर ही आक्रमण करते हैं अथवा हमारे ऊपर अधिकार जमा लेते हैं और हमारे जीवन का एक अंग बन कर न केवल टिके रहते हैं किन्तु औरों पर भी प्रभाव डालते रहते हैं। उनका अमर अस्तित्व चला ही चलता है। तब इन शब्दों के उच्चारण करने तथा औरों तक पहुँचाने में कितनी सावधानी की आवश्यकता है इसका अनुमान किया जा सकता है। हमें अपनी जिम्मेदारी इस विषय में पूरी तरह अनुभव करनी चाहिए।

गायत्री माता का यही उपदेश है कि “वह प्रभु जो सर्वशक्तिमान है हमारी बुद्धियों को श्रेष्ठ और उच्च मार्ग की ओर प्रेरित करे” जिससे हम श्रेष्ठ और उच्च वाणी का प्रयोग करें और उसके द्वारा अपना तथा औरों का हित साधित करें। नहीं तो हमारा मनुष्य जीवन गिर कर पशुओं से भी निकृष्ट हो जायेगा। और हम जहाँ आप दुख भोगेंगे वहाँ औरों के लिए भी दुखदाई प्रमाणित होकर उनका भी नाश करेंगे। हमारी यह साधना तथा भाव इतने प्रबल और उच्च हों कि हमारे भीतर दूसरों के अहित का भाव लेश मात्रा भी न होने पावे और उनके हित तथा सेवा का कार्य कर सकें इसी में हमारा हित तथा लाभ है।


संतों की अमृत वाणी।


एक बल

एक भरोसो एक बल, एक आश विश्वास।

याति सलिल हरिनाम है, चातक तुलसी दास॥

तुलसी सोई चतुर है, संत-चरण लवलीन।

परमन परधन हरन को, वेश्या बड़ी प्रवीन॥

पानी बाढ़ो नाव में, घर में बाढ़ा दाम।

दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम॥

पढ़ पढ़ के सब जग मुवा, पण्डित भया न कोय।

ढाई अक्षर प्रेम के, पढ़े सो पंण्डित होय॥

क्या मुख ले हंस बोलिये, तुलसी दीजे रोय।

जन्म अमोलक आपना, चले अकारथ खोय॥

नारायण हरि भजन में, तू जनि देर लगाय।

क्या जाने या देर में, श्वास रहै कि जाय॥

अपनो साखी आप तू, निज मन माहि विचार।

नारायण जो खोट है, ताको तुरत निकार॥

नारायण तू भजन कर, कहा करेंगे फूर।

अस्तुति निन्दा जगत की, दोऊन के शिर धूर॥

दो बातन को भूल मत, जो चाहत कल्यान।

नारायन एक तौत को, दूजे श्री भगवान॥

मगन रहे नित भजन में, चलत न चाल कुचाल।

नारायण ते जानिये, यह लालन के लाल॥

नारायण हरि लगन में, ये पाँचों न सुहात।

विषय भोग निद्रा हँसी, जगत-प्रीत बहु बात॥

जीवन माटी हो रही, साँई सन्मुख होय।

दाद् पहिले मर रहो, पीछे मरे सब कोय॥

दादू नीका नाम है, सो तू हिरदय राख।

पाखँड सारे दूर कर, सुन साधुन की साख॥

जो तोकौं काँटा चुबे, ताको वोहि तू फूल।

तोकों फूल के फूल हैं, वाही को तिरशूल॥


गायत्री महाविज्ञान

(प्रथम भाग और द्वितीय भाग)

दश वर्षों के कठोर परिश्रम से दो हजार ग्रंथों का अध्ययन करके वेदमाता गायत्री के संबंध में अखण्ड ज्योति द्वारा दो दो रुपये मूल्य की पाँच पुस्तकें (गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्री तंत्र, गायत्री योग) प्रकाशित की गई थीं। हर्ष की बात है कि देश भर के विद्वानों ने एक स्वर से इस अद्वितीय साहित्य की भूरि भूरि प्रशंसा की। आध्यात्म प्रेमियों ने भी इस साहित्य को खूब अपनाया, फलस्वरूप डेढ़ वर्ष के भीतर ही इनका प्रथम संस्करण समाप्त हो गया।

अब इन्हें दुबारा छपाया गया है। नये संस्करण में कितने ही सुधार किये हैं। (1) अलग-2 नामों की अपेक्षा इनका नाम एक ही रख दिया गया है “गायत्री महाविज्ञान” (2) पाँच पुस्तकों की बजाय अब यह साहित्य गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग और द्वितीय भाग दो ही भाग में दिये गये हैं। (3) पिछले संस्करण की कितनी ही कम महत्व की बातों को संक्षिप्त किया गया है और नवीन शोधों में प्राप्त हुए कितने ही अत्यन्त महत्वपूर्ण विषयों को बढ़ाया गया है (4) दोनों भागों में कागज बढ़िया ओर मजबूत लगाया गया है (5)मुख पृष्ठ नयनाभिराम रंगीन चित्रों समेत मोटे कार्ड बोर्ड का लगाया गया है। (6) मूल्य 10 की अपेक्षा 7) कर दिया गया है। (7) छपाई सफाई में पहले की अपेक्षा बहुत सुधार हुआ है इन सुधारों से यह ग्रन्थ पाठकों के लिए और भी अधिक उपयोगी बन गया है।

नीचे दोनों भागों की विषय सूची दी जा रही है। जिससे पाठक जान सकेंगे कि उनके लिए यह ग्रन्थ कितना आवश्यक एवं लाभ दायक है।

गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) की विषयसूची

(1) वेदमाता गायत्री की उत्पत्ति (2) गायत्री सूक्ष्म शक्तियों का स्रोत है (3) गायत्री साधना से गुप्त शक्ति कोषों का जागरण (4) गायत्री भूलोक की कामधेनु है (5) गायत्री और ब्रह्म एक ही हैं (6) गायत्री साधना से दिव्य लाभ (7) महापुरुषों की गायत्री भक्ति (8) गायत्री साधना से सिद्धियाँ (9) गायत्री साधना से लक्ष्मी, उन्नति तथा सफलता की प्राप्ति (10) गायत्री से दुर्लभ आपत्तियों का निवारण (11) स्त्रियाँ भी साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।

गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)विषय सूची

इस भाग में कितने ही महत्वपूर्ण शास्त्रीय संग्रह भाषाटीका समेत संपादित किये गये हैं। यथा-(1) गायत्री महात्म्य (2) गायत्री गीता (3) गायत्री स्मृति (4) गायत्री उपनिषद् (5) गायत्री रामायण (6) गायत्री पंजर (7) गायत्री संहिता (8) गायत्री तंत्र (9) गायत्री अभिचार (10) चौबीस गायत्री (11) गायत्री पुरश्चरण (12) गायत्री शाप विमोचन (13) गायत्री स्तोत्र (14) गायत्री शाप विमोचन (15) गायत्री तर्पण (16) गायत्री की 24 मुद्राएं (17) गायत्री लहरी (18) गायत्री चालीसा (19) गायत्री सहस्र नाम (20) गायत्री स्तवन। आदि आदि।

इन विषयों के अंतर्गत वह सब जानकारी आ गई है जिसको अपनाने से मनुष्य आशातीत उन्नति कर सकता है। स्वर्गीय सुख का आस्वादन कर सकता है और पाप तापों से छुटकारा पाकर जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

गायत्री को मंत्र राज कहते हैं। उससे वे सब कार्य हो सकते हैं जो अन्य किसी भी वेदोक्त या तंत्रोक्त मंत्रों से होते हैं। गायत्री के 24 अक्षरों में इतना विषद ज्ञान भंडार भरा हुआ है जिसकी विवेचना के लिए ही वेद, शास्त्रों, पुराण, इतिहास, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृति, संहिता, सूत्र आदि की रचना हुई है। योग साधना के लिए, आत्मसाक्षात्कार के लिए, ऋद्धि सिद्धियों की प्राप्ति के लिए गायत्री एक श्रेष्ठतम माध्यम है। इन सभी विषयों पर संक्षेप में किन्तु अत्यन्त ही सार गर्भित प्रकाश इस पुस्तक में डाला गया है।

अन्य खर्चों में कमी करके भी ऐसे उपयोगी ग्रन्थ को संग्रह करना चाहिए। गायत्री भारतीय संस्कृति रूपी ज्ञान गंगा की गंगोत्री है। उसके संबंध में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करना प्रत्येक धर्म प्रेमी का कर्तव्य है। यह निश्चित है कि इस पुस्तक को मंगाने में खर्च किया हुआ पैसा कदापि व्यर्थ नहीं जाता। केवल पुस्तक के पठन मात्र से इतनी उपयोगी जानकारी प्राप्त हो जाती है जो पुस्तक के मूल्य की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

दोनों भाग “गायत्री महाविज्ञान” एक प्रकार से भारतीय शास्त्रों में वर्णित समस्त ज्ञान विज्ञान का निचोड़ है। आध्यात्मिक मार्ग में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए यह एक अमूल्य साहित्य है। दोनों भागों का मूल्य 3॥)+3॥) = 7)मात्र है। दोनों भाग एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ । एक भाग का डाक खर्च 1) है।

गायत्री संबंधी संक्षिप्त साहित्य

उपरोक्त गायत्री महाविज्ञान के कुछ अति आवश्यक प्रकरणों का संक्षिप्त भाग अलग से छोटी पुस्तकों के रूप में भी छाप लिया गया है। इन पुस्तकों के नाम हैं (1) गायत्री ही कामधेनु है (2) गायत्री का वैज्ञानिक आधार (3) गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं (4) वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री (5) गायत्री के चौदह रत्न दूसरा भाग। मूल्य हर एक का छह-छह आना है। गायत्री विद्या की संक्षिप्त जानकारी कम मूल्य में प्राप्त करने के लिए यह पुस्तकें बड़ी उपयोगी हैं।

एक वितरण करने योग्य पुस्तक

गायत्री प्रचार के लिए एक बहुत ही सस्ती 24 पृष्ठ की छोटी सी “सर्व शक्तिमान गायत्री” नामक पुस्तक दो आना मूल्य की छापी गई है। अनुष्ठानों के अन्त में, ब्रह्म भोज, यज्ञ दक्षिणा एवं महा प्रसाद वितरण के स्थान पर सत्पात्रों को यह पुस्तक वितरण करनी चाहिए। 10) से अधिक मूल्य की पुस्तिकाएं लेने वाले का नाम पता मुख्य पृष्ठ पर छाप कर भेजा जायेगा।


श्रीरामकृष्ण परमहंस के उपदेश

भगवान के अनेक नाम हैं, अनन्त रूप हैं, चाहे जिस नाम का एवं जिस रूप का सरल हृदय से स्मरण करो, उसी के द्वारा परमेश्वर से मिलाप हो सकता है। जैसे जल एक ही है, कोई उसे पानी कहता है तो कोई वाटर, कोई जल कहता है तो कोई आब। इसी प्रकार एक ही सच्चिदानन्द भिन्न भिन्न नामों से पुकारा जाता है। कोई उसे कृष्ण कहता है तो कोई शिव या देवी कहता है, किसी की भाषा में उसका नाम गौड है तो किसी की बोली में अल्लाह। कोई उसे जिहोवा कहते हैं तो कोई हरि या ब्रह्म।

जल में नाव रहे तो कोई हानि नहीं, पर नाव में जल नहीं रहना चाहिये। साधक संसार में रहे तो कोई हानि नहीं परन्तु साधक के भीतर संसार नहीं होना चाहिये।

व्याकुल होकर उसके लिये रोने से ही वह मिलता है, लोग लड़के-वाले के लिये, रुपये-पैसे के लिये कितना रोते हैं, किन्तु भगवान् के लिये क्या कोई एक बूँद भी आँसू टपकाता है? उसके लिये रोओ, आँसू बहाओ, तब उसको पाओगे।

जिसके मन में ईश्वर का प्रेम हो गया, संसार का सुख अच्छा नहीं लगता। जो एक बार भी बढ़िया मिश्री का स्वाद ले चुका है, वह क्या राख खाना चाहेगा?

दो आदमी बगीचे में घूमने-फिरने गये थे एक आदमी यह हिसाब करने लगा कि इस बगीचे में कितने पेड़ हैं कितने फल हैं, बगीचे के दाम कितने हैं इत्यादि दूसरा आदमी मालिक के साथ मेल-जोल करके आम तोड़-तोड़कर खाने लगा। इन में यह पिछला आदमी ही चतुर था। ऐसे संसार में आकर भगवान के विषय में तर्क युक्ति विचार आदि करने से कुछ फल नहीं। जो उसको प्राप्त कर आनन्दानुभव कर सकता है, वही धन्य है।

अवधूत का एक गुरु था भ्रमर। उसने अत्यन्त कष्ट सह सह कर मधु संचय किया। कहीं से एक मनुष्य आया और मधु का छत्ता तोड़कर सारा मधु ले गया। अपने चिरसंचित मधु का उपभोग वह भ्रमर न कर सका अवधूत ने यह देखकर भ्रमर को प्रणाम किया, और कहा ‘प्रभो! तुम मेरे गुरु हो! संचय करने से क्या परिणाम होता है, यह मैंने तुम से आज सीख लिया है।

संसार कच्चा कुआँ है। इसके किनारे पर खूब सावधानी से खड़ा होना चाहिये। तनिक असावधान होते ही कुएं में गिर पड़ोगे, तब निकलना कठिन हो जायगा।

केवल शब्द कण्ठस्थ कर लेने से कुछ लाभ नहीं। ईश्वर-प्राप्ति के लिये ही पुस्तकों का पढ़ना है। के वल गीता पढ़ने से पूरा लाभ नहीं, जब तक वैराग्य प्राप्त कर ब्रह्म का साक्षात्कार करने की चेष्टा न की जाय। गृहस्थ हो या संन्यासी, सभी को मन से विषयासक्ति निकालनी होगी, तब ध्येय की प्राप्ति होगी।

ग्रन्थों में बहुत सी बातें हैं यह तो ठीक है, किन्तु जिन्होंने ग्रन्थ लिखे हैं, वे ग्रन्थों में लिखे हुए तत्वों की धारणा नहीं करा सकते हैं। साधु-संग होने पर धारणा होती है। ठीक-ठीक त्यागी-ज्ञानी-साधु यदि उपदेश दे, तब लोग इस बात को सुनेंगे और मान लेंगे। खाली पण्डित हो, वह यदि ग्रन्थ लिखे और मुँह से उपदेश देवे तो उससे धारणा उतनी नहीं होती जितनी त्यागी साधुओं की वार्ता से होती है।

उपाधियों के नाश के समय ही शब्द होता है। लकड़ी जलते समय आवाज करती है। सब जल जाने से फिर आवाज नहीं करती।

जमीन, जोरू और रुपया ये तीनों चीज लोगों को संसार में वृद्ध करती हैं। इन तीनों चीजों पर मन रखने से भगवान की ओर मन का योग नहीं होता।


विस्मृत-शहीद


विस्मृत-शहीद

श्री मोहन लाल जी अवस्थी “मोहन”

वे थे बड़वानल से जिनको अरि सागर ढूंढ़ नहीं पाया।

स्वातंत्र्य सुरा आरुण्य सदा जिनकी आँखों में था छाया॥

जिनका कर खींच आजादी को सर के बल ले आया।

सुख क्या होता है जग में जिनके तन ने जान नहीं पाया॥

सुन उनकी रण हुँकार भयंकर कब अरि के उर हिले नहीं?

वे काले थे मतवाले जिनके आगे दीपक जले नहीं॥

हम उनके गरम गरम शोणित में अपना खून मिला न सके।

शोणित की होली युद्ध क्षेत्र में अरि को कभी खिला न सके॥

कुछ सोच न अपनी वाणी से धरती आकाश हिला न सके।

हम उनकी तरह मृतक पुरुषों को छू कर कभी जिला न सके॥

पर दीन दुखी मनुजों के भी उर को हम धैर्य दिला न सके।

उनकी प्यासी आत्मा को नयनों की दो बूँद पिला न सके॥

थी गिरा वायु में गूंज उठी उनकी “सीधी तलवार करो”।

अपने मुष्टिक से चूर चूर नभ चुम्बी उच्च पहाड़ करो॥

खिलवाड़ अगर करना है तो युद्धस्थल में खिलवाड़ करो।

है अगर प्यार करना सीखा तो मातृभूमि को प्यार करो॥

यदि चलना ही है तो यह दुर्गम वन बीहड़ पथ पार करो।

यदि करना है जग में कुछ तो भारत का उद्धार करो॥

वे चले बवंडर से अपने उर में अगणित अरमान लिए।

वे चले महा अत्याचारी अरि शासन का अवसान लिए॥

वे चले कालिका सी प्यासी हाथों में नग्न कृपाण लिए।

वे चले शीश से कफन बाँध मुट्ठी में अपने प्राण लिए॥

वे चले प्रलय ले आँखों में भय से सारा जग डोल उठा।

“लो खून, हमें आजादी दो” बच्चा बच्चा यह बोल उठा॥

अब आजादी को पाकर के मद में हम ऐसे भूल गये।

आजादी पर मरने वालों के आज नाम तक भूल गये॥

जो किये हमारे लिए उन्होंने आज काम हम भूल गए।

जो उजड़े बस न सके अब तक वे आज धाम हम भूल गए॥

थे चुने उन्होंने शूल हमारे पथ के हम सब भूल गए।

हम भूल गये, उनको जो थे फांसी के झूले झूल गए॥

*समाप्त*