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“अखण्ड ज्योति” के पाठकों को कुछ आवश्यक सूचनाएं।

(1)यह अंक इस वर्ष का अन्तिम अंक है। इस अंक के साथ अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। पाठकों से प्रार्थना है कि अपना चन्दा मनीआर्डर से भेज दें। वी0 पी0 पी0 में व्यर्थ ही छः आने अधिक खर्च पड़ते हैं। अकारण छः आने गंवाना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। जो सज्जन ग्राहक न रहना चाहें वे अपने निर्णय की सूचना एक कार्ड द्वारा देने की कृपा करने का कष्ट अवश्य कर दें।

(2)गतवर्ष जिन सज्जनों ने देर से चन्दा भेजा था उन्हें आर्थिक सफलता अंक से वंचित रहना पड़ा था। क्योंकि कागज की अव्यवस्था के इस जमाने में प्रायः उतनी ही प्रतियाँ छपती हैं जितने ग्राहक, रजिस्टर में दर्ज होते हैं। इसलिए पाठकों से प्रार्थना है कि अपना चन्दा जल्दी से ही भेज दें जिससे इस जनवरी के “जीवन कला अंक” से वंचित न रहना पड़े।

(3)आगामी वर्ष गायत्री महाशक्ति की रहस्यमयी साधनाओं द्वारा अलौकिक लाभ प्राप्त कराने वाली शिक्षा, नियमित लेख माला के रूप में हर अंक में छपेगी। ‘हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता’ पर भी एक बड़ी ही खोजपूर्ण लेख माला चलेगी। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति, पाठकों की ज्ञान वृद्धि में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि करेगी। ढाई रुपया जैसी तुच्छ चीज के लिये पाठकों को इस अमूल्य लाभ से वंचित न रहना चाहिये।

(4)मनीआर्डर कूपन पर अपना ग्राहक नम्बर और पूरा पता हिन्दी या अंग्रेजी में साफ -साफ लिखना चाहियें। अधूरा या घसीट कर लिखा हुआ पता ठीक प्रकार न पढ़ा जाने से रजिस्टर में कुछ का कुछ दर्ज हो जाता है और पत्रिका बीच में ही गुम होती रहती है।

(5)पुराने ग्राहक अपना ग्राहक नम्बर अवश्य लिखें। नये ग्राहक मनी आर्डर कूपन पर “नया ग्राहक” शब्द लिख दें।

(6)अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में हमें बड़ी भारी असुविधा रहती है। उधर ग्राहकों की फाइलें भी अधूरी रहती हैं। इस वर्ष से स्थायी ग्राहकों के पते छपे हुये रहेंगे ताकि पत्रिका पहुँचने में गड़बड़ न हो, परन्तु अधूरे वर्ष के हिसाब वालों के पते न छपाये जा सकेंगे। इसलिए जिनका हिसाब बीच के किसी महीने से चलता है उन ग्राहकों से विशेष आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि अगले वर्ष के शेष महीनों का भी चन्दा भेज कर अपना हिसाब शुरू साल (जनवरी) से ही रखें।

(7) अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक प्रकार से सतोगुणी फल उत्पन्न करने वाले वृक्ष लगाना है। इससे (1) ग्राहकों को आत्मकल्याण का, सुख-शाँति का मार्ग मिलता है। (2) अखण्ड-ज्योति की शक्ति बढ़ने से वह लोग सेवा के कार्यों को अधिक मात्रा में, अधिक शीघ्रता से, अधिक सफलता के साथ, पूरा करती है। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति के ग्राहक बढ़ाना एक स्वल्प श्रम का महान पुण्य कार्य है। इस दशा में शक्ति भर प्रयत्न करने के लिये हम अपने ग्राहकों से विशेष रूप से अनुरोध करते हैं।

विनीत -

व्यवस्थापक- “अखंड ज्योति” , मथुरा।

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


प्रेम का प्रश्रय


प्रेम का प्रश्रय

मैंने तुमको नहीं तुम्हारे, भोलेपन को प्यार किया है॥

शशि की सुन्दरता न कभी,

बस मधुर चाँदनी यश पाती है।

तारों का स्वर मन हर लेता,

बीणा कभी न हर पाती है॥

निर्झर कब आकर्षित करता,

आकर्षित कल-कल करती है॥

सागर भी खाली ही रहता,

पर सरिता उसको भरती है॥

नैया कभी न पार उतरती, लहरों ने खुद पार किया है॥

चित्र न कभी सुहाना लगता,

भाव सदा मन का भाते हैं।

स्वप्न किसी को नहीं लुहाते,

सुधि भाती जो देते जाते हैं॥

इन फूलों का आकर्षण क्या?

कोमलता खुद है आकर्षण!

इसी तरह तुम नहीं तुम्हारी,

कृतियाँ करती हैं मधु-वर्णन !!

सुन्दरता का नहीं, भावना का मैंने मनहार किया है॥

-के. एल. आर्य


स्थिरता और स्वस्थता के सन्देश।

स्वरेषो वै शब्दो निगदति मनः स्थैर्य कारणम्।

तथा सौख्यं स्वास्थ्यं ह्यु पदिशिति चित्तस्पचलतः निमग्नत्वं सत्यब्रत सरसि चा चक्षत् उत।

त्रिधाँ शान्तह्य भिर्भुविच लभते समय रतः॥

अर्थ- ‘स्व’ यह शब्द मन की स्थिरता का निर्देश करता है। चंचल मन को सुस्थिर और स्वस्थ रखो, यह उपदेश देता है। सत्य में निमग्न रहो यह कहता है। इस उपाय से संयमी पुरुष तीनों प्रकार शान्ति प्राप्त करते हैं।

जीवन में आए दिन दुरंगी घटनाएं घटित होती रहती हैं। आज लाभ है तो कल नुकसान, आज बलिष्ठता है तो कल बीमारी, आज सफलता है तो कल असफलता। दिन रात का चक्र जैसे निरंतर घूमता रहता है वैसे ही सुख-दुःख का, सम्पत्ति-विपत्ति का, उन्नति-अवनति का पहिया भी घूमता रहता है। यह हो नहीं सकता कि सदा एक सी स्थिति रही आवे। जो बना है वह बिगड़ेगा, जो बिगड़ा है वह बनेगा, श्वासों के आवागमन का नाम ही जीवन है। साँस चलना बन्द हो जाय तो जीवन भी समाप्त हो जायेगा। सदा एक सी ही स्थिति बनी रहे परिवर्तन बन्द हो जाय तो संसार का खेल ही खत्म हो जायेगा। एक के लाभ में दूसरे की हानि है और एक की हानि में दूसरे का लाभ। एक शरीर की मृत्यु ही दूसरे शरीर का जन्म है। यह मीठे और नमकीन हानि और लाभ दोनों ही स्वाद भगवान ने मनुष्य के लिये इसलिए बनाये हैं कि वह दोनों के अन्तर और महत्व को समझ सके।

खिलाड़ी लोग जो गेंद, ताश, शतरंज, नाटक आदि खेलों को मनोरंजन के उद्देश्य से खेलते है और उसकी अनुकूल प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के कारण अपने आपको उत्तेजित, उचित या अशाँत नहीं करते वैसा ही दृष्टिकोण जीवन की विविध समस्याओं के सम्बन्ध में रखा जाना चाहिए। किंतु हम देखते हैं कि लोग इन स्वाभाविक आवश्यक एवं साधारण से उतार चढ़ावों को देखकर असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाते हैं और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं।

जरा सा लाभ होने में, सम्पत्ति मिलने, रूप सौंदर्य यौवन की तरंग आने, कोई अधिकार या पद प्राप्त हो जाने, पुत्र जन्मने, विवाह होने, आदि अत्यन्त ही तुच्छ सुखद अवसर आने पर फूले नहीं समाते, खुशी से पागल हो जाते हैं, ऐसे उछलते-कूदते हैं मानो इन्द्र का सिंहासन इन्हें ही प्राप्त हो गया हो। सफलता, बड़प्पन या अमीरी के अहंकार के मारे उनकी गरदन टेढ़ी हो जाती है, दूसरे लोग अपनी तुलना में उन्हें कीट पतंग जैसे मालूम पड़ते हैं और सीधे मुँह किसी से बात करने में उन्हें अपनी इज्जत घटती दिखाई देती है।

जरा ही हानि हो जाय, घाटा पड़ जाय, कोई कुटुम्बी मर जाय, नौकरी छूट जाय, बीमारी पकड़ ले, अधिकार छिने, अपमानित होना पड़े, किसी प्रयत्न में असफल रहना पड़े, अपनी मरजी न चले, दूसरों की तुलना में अपनी बात छोटी हो जाय तो उनके दुख का ठिकाना नहीं रहता। बुरी तरह रोते चिल्लाते हैं। चिन्ता के मारे सूख-सूख कर काँटा होते जाते हैं, दिन-रात सिर धुनते रहते हैं, भाग्य का कोसते हैं और भी, आत्महत्या आदि, जो कुछ बन पड़ता है करने से नहीं चूकते।

जीवन एक झूला है जिसमें आगे भी और पीछे भी झोंटे आते हैं। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न होता है और आगे आते हुए भी, यह अज्ञानग्रस्त, माया मोहित, जीवन विद्या से अपरिचित लोग बात-बात में अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं कभी हर्ष में मदहोश होते हैं तो कभी शोक में पागल बन जाते हैं। अनियंत्रित कल्पनाओं की मृग मरीचिका में उनका मन अत्यन्त दीन अभावग्रस्त दरिद्री की तरह व्याकुल रहता है। कोई उनकी रुचि के विरुद्ध बात कर दे तो क्रोध का पारापार नहीं रहता। इन्द्रियाँ उन्हें हर वक्त तरसाती रहती हैं, भस्मक रोग वाले की जठर ज्वाल के समान, भोगों की लिप्सा बुझ नहीं पाती। नशे में चूर शराबी की तरह “और लाओ, और लाओ, और चाहिए, और चाहिए” की रट लगाये रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए कभी भी सुख-शान्ति के एक कण का दर्शन होना भी दुर्लभ है। भले ही उनके पास लाख करोड़ की सम्पदा तथा वैभव के साधन भरे-पूरे हों पर वे किसी न किसी अभाव के कारण दीन दरिद्र ही बने रहेंगे उन्हें अपना दुर्भाग्य ही हर घड़ी परिलक्षित होता रहेगा। अपनी मनोवांछाएं पूरी होने पर जो सुखी होने की आशा करता है वह मूर्ख न तो सुख को, न सुख के स्वरूप को, न सुख के उद्गम को, जानता है, और नहीं वह उसे प्राप्त ही कर सकता है।

गायत्री के ‘स्वः’ शब्द में मानव प्राणी को शिक्षा दी गई है कि मन को अपने में अपने अन्दर स्थिर रखो। अपने भीतर दृढ़ रहो। घटनाओं और परिस्थितियों को जल तरंगें समझो उनमें क्रीडा कल्लोल का आनन्द लो अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही स्थितियों का रसास्वादन करो, किन्तु उनके कारण अपने को उद्विग्न, अस्थिर, असन्तुलित मत होने दो जैसे सर्दी, गर्मी की परस्पर विरोधी ऋतुओं को हम प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हैं उन ऋतुओं के दुष्प्रभाव से बचने के लिए वस्त्र, पंखे, अंगीठी शर्बत, चाय आदि की प्रतिरोधात्मक व्यवस्था कर लेते हैं वैसे ही सुख-दुख के अवसरों पर भी उनकी उत्तेजना का शमन करने योग्य विवेक तथा कार्य-क्रम की हमें व्यवस्था कर लेनी चाहिये। कमल सदा पानी में रहता है पर उसके पत्ते जल से ऊपर ही रहते हैं। उसमें डूबते नहीं इसी प्रकार साक्षी द्रष्टा निर्लिप्त, अनासक्त एवं कर्मयोगी की विचारधारा अपनाकर हर परिस्थिति को हर चढ़ाव उतार को देखें और उसमें मिर्च तथा मिठाई के कड़ुए मीठे रसों का हँसते-2 रसास्वादन करें।

गायत्री का “स्व” शब्द बताता है कि इन हर्ष शोक की बाल क्रीड़ाओं में न उलझे रह कर हमें आत्म परायण होना चाहिये। ‘स्व’ को पहचानना चाहिए। आत्म-चिन्तन, आत्म-विश्वास, आत्म-गौरव, आत्म-निष्ठा, आत्म-साधन, आत्म-उन्नति, आत्म-निर्माण यह वह कार्य है। जिनमें हमारी इच्छा शक्ति, कल्पना शक्ति एवं क्रिया शक्ति का उपयोग होना चाहिए। क्योंकि अन्दर का मूल केन्द्र, उद्गम स्रोत, आत्मा ही है। जिसने आत्मा के साथ रमण करना सीख लिया उसे स्वर्ग की अप्सराएं भी चुड़ैलों जैसी तुच्छ एवं कुरूप दिखाई देने लगती हैं। क्योंकि आत्मा ही अनन्त यौवन और अनन्त सौंदर्य है। अपनेपन की, आत्म-भाव की, छाया पड़ते ही अपनी तुच्छ सी वस्तु, सन्तान, सम्पदा, देह कितनी सुन्दर कितनी प्रिय मालूम पड़ने लगती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता, जिसकी छाया पड़ने से जड़ वस्तुएं इतनी मनोरम बन जाती हैं तो उस आत्मा की समग्र प्राप्ति में कितना सुख होगा, यह कल्पना से नहीं अनुभव से ही जाना जा सकता है। अनन्त वैभव का, ऐश्वर्य का, सुख-शांति का रत्न भण्डार अपने अन्दर है जिसने उस खजाने पर अपना अधिकार कर लिया उसके लिए चाँदी ताँबे के टुकड़ों में कोई आकर्षण नहीं रह जाता, आत्म प्राप्ति का लाभ इतना बड़ा है कि उसकी तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं हो सकती। आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द, परमानन्द का सुख गूँगे के गुड़ की तरह है संसार की कोई भी उपमा देकर उसकी मिठास को बताया नहीं जा सकता।

आत्म स्थित मनुष्य का अन्तस्तल स्वस्थ होने से वह सदा प्रसन्न रहता है उसके चेहरे पर प्रसन्नता नाचती रहती है। चेहरा सदा मुस्कुराता हुआ, हँसता हुआ, खिलता हुआ दिखाई देता है। उसकी वाणी से मधु टपकता है और बोलने में फूल झड़ते हैं। स्नेह, आत्मीयता, नम्रता, सौजन्य एवं हितकामना का सम्मिश्रण होते रहने से उसकी वाणी बड़ी ही सरल एवं हृदयग्राही हो जाती है।

स्वस्थ-आत्मा में स्थित व्यक्ति बालकों की तरह सरल, छल-कपट से रहित, निर्मल अंतःकरण का होता है। उसे सबके प्रति ममता, आत्मीयता, दया एवं सहानुभूति होती है। वह किसी से नहीं कुढ़ता, न किसी का बुरा चाहता है। ईश्वर पर विश्वास होने से वह भविष्य के बारे में आशावादी और निर्भर रहता है। फल स्वरूप अप्रसन्नता उसके पास नहीं फटकती और आनन्द एवं उल्लास से उसका अंतःकरण भरा रहता है यह आनन्दमयी स्थिति उसकी मुखाकृति एवं वाणी से हर घड़ी छलकती रहती है। गायत्री का ‘स्वः’ शब्द हमें ऐसी ही स्वस्थता की ओर ले जाता है।


आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग

(श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)

यदि आप जल्दी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो इसके लिए सजगता, होशियारी रखना बहुत जरूरी है आध्यात्मिक मार्ग में थोड़ी-सी सफलता थोड़ी सी मन की गंभीरता, एकाग्रता, सिद्धियों के थोड़े से दर्शन, थोड़े से अन्तर्यामी ज्ञान की शक्ति से ही कभी संतुष्ट मत रहो। इससे ज्यादा ऊंची चढ़ाइयों पर चलना अभी बाकी है।

सदा सेवा करने को तैयार रहो। शुद्ध प्रेम, दया और नम्रता सहित सेवा करो। सेवा करते समय कभी मन में भी खीझने या कुढ़ने का भाव मत आने दो। सेवा करते हुए मुख पर खेद और ग्लानि के भाव मत आने दो। ऐसा करने से जिसकी सेवा करते हो वह आपकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आप एक अवसर खो दोगे। सेवा के लिए अवसर ढूँढ़ते रहो। एक भी अवसर को मत जाने दो बल्कि अवसर खुद बनालो।

अपने जीवन को सेवामय बना दो सेवा के लिए अपने हृदय में चाव तथा उत्साह भर लो। दूसरों के लिये प्रसाद बन कर रहो। यदि ऐसा करना चाहते हो तो आपको अपने मन को निर्मल बनाना होगा। अपने आचरण को दिव्य तथा आदर्श बनाना होगा। सहानुभूति, प्रेम, उदारता, सहनशीलता और नम्रता बढ़ानी होगी। यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से भिन्न हों तो उनसे लड़ाई झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा। आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।

आपको कोई काम निरुत्साह से, लापरवाही से, बेमन से नहीं करना चाहिए यदि मन की ऐसी वृत्ति रखोगे तो जल्दी उन्नति नहीं कर सकते। सम्पूर्ण चित्त, मन, बुद्धि आत्मा उस काम में लगा होना चाहिये। तभी आप उसे योग या ईश्वर पन कह सकते हो। कुछ मनुष्य हाथों से काम करते हैं और उनका मन कलकत्ते के बाजार में होता है, बुद्धि दफ्तर में होती है और आत्मा स्त्री या पुत्र में संलग्न रहती है। यह बुरी आदत है। आपको कोई भी काम हो उसे योग्य सन्तोषप्रद ढंग से करना चाहिये। आपका आदर्श यह होना चाहिये कि एक समय में एक ही काम अच्छे ढंग से किया जाये। यदि आपके गुरु मित्र आपसे तौलिया धोने को कहें तो आपको ना उन्हें बताए हुए ही उनके और कपड़ों को भी धो डालने चाहिए।

लगातार असफलता होने से आपको साहस नहीं छोड़ना चाहिए असफलता के द्वारा आपको अनुभव मिलता है। आपको वे कारण मालूम होंगे जिनसे असफलता हुई है और भविष्य में उनसे बचने के लिये सचेत रहोगे। आपको बड़ी-बड़ी होशियारी से उन कारणों से रक्षा करनी होगी। इन्हीं असफलताओं की कमजोरी में से आपको शक्ति मिलेगी। असफल होते हुए भी आपको अपने सिद्धान्त, लक्ष्य, निश्चय और साधन का दृढ़ मति होकर पालन और अनुसरण करना होगा। आप कहिये “कुछ भी हो मैं अवश्य पूरी सफलता प्राप्त करूंगा, मैं इसी जीवन में-नहीं नहीं, इसी क्षण आत्म साक्षात्कार करूंगा। कोई असफलता मेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती।”

प्रयत्न और कोशिश आपकी ओर से होनी चाहिये भूखे मनुष्य हो आप ही जाना पड़ेगा। प्यासे को पानी पीना ही पड़ेगा। आध्यात्मिक सीढ़ी पर आपको हर एक कदम अपने अपने आप ही रखना होगा। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखिये। साहसी बनो। यद्यपि बेरोजगार हो कुछ खाने को नहीं हो, तन पर वस्त्र भी न होवे तब भी सदा प्रसन्न रहो। आपका यथार्थ स्वभाव सच्चिदानन्द है। यह बाह्य नाशवान स्थूल शरीर तो माया का ही कार्य हैं मुस्कुराओ, सीटी बजाओ, हँसो कूदो और आनन्द में मग्न होकर नाचो।

कर्मयोगियों को सुशील, मनोहर मिलनसार प्रकृति का होना होगा। उसको पूर्ण रूप से, अनुकूलता, क्षमाशीलता, सहानुभूति करने वाला, विश्व प्रेम, दया के गुणों से युक्त रहना होगा। उनको दूसरों की चाल तथा आदतों के अनुकूल ही अपने को बनाना होगा। उनको अपने हृदय को ऐसा बनाना होगा कि सभी को अपने गले लगा सकें। उन्हें अपने मन को शाँत तथा समतुल्य रखना होगा। दूसरों को सुखी देखकर उनको प्रसन्न होना होगा। अपनी सब इन्द्रियों को अपने वश में करना होगा। अपना जीवन बहुत सादगी से व्यतीत करना होगा। उन्हें अनादर, अपकीर्ति, निन्दा, कलंक, लज्जित होना, कठोर वचन सुनना, शीत-उष्ण तथा रोगों के कष्ट को सहना होगा। उन्हें सहनशील होना होगा। उनको आप में, ईश्वर में, शास्त्रों में, अपने गुरु के वचन में पूरा विश्वास रखना होगा।

जो मनुष्य संसार की सेवा करता है वह अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की मदद करता है वास्तव में वह अपनी ही मदद करता है। यह सदा ध्यान में रखने योग्य बात है। जब आप दूसरे व्यक्ति की सेवा करते हैं, जब आप अपने देश की सेवा करते हैं तब आप यह समझकर कि ईश्वर ने आपको सेवा द्वारा अपने को उन्नत तथा सुधारने का दुर्लभ अवसर दिया है। उस मनुष्य के आप कृतज्ञ हों जिसने आपको सेवा करने का अवसर दिया हो।

कर्मयोग ही मन को अन्तर्ज्योति तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति का उपयुक्त पात्र बनाता है। वह हृदय को विशाल बनाकर सब प्रकार के बाधा विघ्नों को जो एकता प्राप्त करने में बाधक हुआ करते हैं, हटा देता है। कर्मयोग ही चित्त वृद्धि के लिये एक सफल साधन है।

निष्काम सेवा करने से आप अपने हृदय को पवित्र बना लेते हैं। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, श्रेष्ठता का भाव और उसी प्रकार के और सब आसुरी सम्पत्ति के गुण नष्ट हो जाते हैं। नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, दया की वृद्धि होती है। भेद-भाव मिट जाते हैं। स्वार्थपरता निर्मूल हो जाती है। आपका जीवन विस्तृत तथा उदार हो जायेगा। आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आपको आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा। आप सब में “एक” और “एक” में ही सबका अनुभव करने लगेंगे। आप अत्यधिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगे। संसार कुछ भी नहीं है केवल ईश्वर की ही विभूति है। लोक सेवा ही ईश्वर की सेवा है। सेवा को ही पूजा कहते हैं।

अधिकाँश साधक कुछ सेवा के बाद ही शीघ्र ही ईश्वर प्राप्ति के लिये अधीर हो जाते हैं यह निष्काम सेवा या कर्मयोग का लक्षण नहीं, कर्मयोगी वे हैं जो नम्रता तथा आत्मभाव से मनुष्यों की सेवा करते हैं। वही वास्तव में अखिल विश्व के नायक बन जाते हैं। सब लोग उनकी बड़ाई तथा आदर करते हैं। जितना ही आत्मभाव से सेवा करने जायें आप उतनी ही विशेष शक्ति, पौरुष, तथा योग्यता प्राप्त करेंगे। आप इसका अभ्यास करके ही स्वयं अनुभव प्राप्त करें।

जब दूसरों की भलाई करने का भाग मनुष्य का एक अंग ही बन जाता है, तब रेचक मात्र ही किसी प्रकार की कामना नहीं रह जाया करती है। उनको दूसरों की सेवा तथा भलाई करने से ही अत्यन्त आनन्द का अनुभव हुआ करता है। दृढ़ निष्काम सेवा करने से एक विचित्र प्रकार की प्रसन्नता तथा आनन्द हुआ करता है। उनको निष्काम तथा निस्वार्थ कर्म करने से आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और बल होता है।

आप दूसरों की सेवा करते समय बीज या निराशा, विरक्ति तथा उदासी के भावों को कभी मन में भी न लाया करें। सेवा में ही आनन्दित होकर सेवा किया करें। दूसरों के सेवा करने के लिए सदा प्रस्तुत रहा करें। सेवा करने के अवसर को ढूँढ़ा करें। एक भी अवसर न चूके। सेवा करने का अवसर स्वयं बना दिया करें।

कर्मयोग के अभ्यास में किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं होता। यह असाध्य भी नहीं है इसमें अपराध तो होता ही नहीं उल्टे इसका थोड़ा भी अभ्यास करते रहने से जन्म-मरण रूप दुःख तथा उसकी सहयोगिनी बुराइयों के ही निवृत्ति होती है। निदान “आत्मज्ञान” की प्राप्ति कर्मयोग से होती है। यहाँ अनिश्चित कुछ भी नहीं है। कर्मयोग का यह आध्यात्म अंत में आत्मानन्द को परमगति तक पहुँचा देता है।


कर्मयोगी की मानसिक स्थिति

निस्पृह होकर अनासक्त मन से संसार के कल्याण के लिये कर्म करते रहना कर्मयोगी का लक्षण है। ऐसे कर्मयोगी दो प्रकार के होते हैं। एक तो वे जो गृही होकर कर्मयोग की साधना करते हैं। घर में रहो चाहे घर छोड़ दो, संसार के कल्याण के लिए कर्म अवश्य करते रहना चाहिये। भगवान के लिये कर्म, लोक कल्याण के लिए कर्म, यह ध्येय रखना और इस पर चलना कर्मयोगी का यही साधन है।

गृही और गृह त्यागी कर्मयोगी के दो रूप होते हुए भी दोनों में कोई अन्तर नहीं है। कर्मयोगी को लोक कल्याण के लिए जब गृहत्याग की आवश्यकता होती है तब वह गृहत्यागी हो जाता है और जब गृहस्थ जीवन में रह कर लोककल्याण की अधिक सम्भावना रहती है तब वह गृही होकर रहता है। गृहस्थ होना और गृह त्यागना उसकी लोक सेवा या लोक कल्याण के अंग होते हैं। मुख्य उद्देश्य तो लोक कल्याण ही होता है। फिर भी गृहत्याग की अपेक्षा लोक कल्याण साधना में गृहस्थ होने का अधिक महत्व है।

गृहस्थ का त्याग करने पर मनुष्य आम लोगों की श्रेणी से ऊपर उठ जाता है। जिसके कारण लोग उसे अपने समान का न समझकर विजातीय ही समझते हैं इसलिए जन समाज की जो साधारण समस्याएं होती हैं वह उन्हें सक्रिय रूप से सुलझाने में कोई आदेश उपस्थित नहीं करता कर्मयोग का जीवन तो आदर्श जीवन होता है और लोक कल्याण के लिए उसे ऐसा जीवन बनाने और बिताने के लिए इस प्रकार के जीवन को अंगीकार करना पड़ता है। इसलिए गृहत्याग की अपेक्षा जो गृहस्थ होकर कर्मयोग का पालन करते हैं। वे आदर्श कर्मयोगी हैं। गृहस्थ जीवन में रह कर व्यक्ति जीवन के संघर्ष में प्रत्यक्ष भाग लेता है और उन संघर्षों के प्रभाव से ऊपर उठ कर कर्मयोगी की प्रतिष्ठा करता है। गृहत्यागी संघर्ष के संपर्क में नहीं आता इसलिए उससे ऊपर उठा हुआ दिखता है। संपर्क में आने पर जो अविचलित रहे वही संघर्ष में आए व्यक्तियों को अविचलित बनाने में अपना आदर्श उपस्थित कर सकता है। और आम लोगों पर उसका प्रभाव भी पड़ सकता है।

कर्मयोगी अपनी जरा सी लगती का भी प्रायश्चित करता है, गलती को दिखाने की सर्वसाधारण की सी उसकी आदत नहीं होती। जब वह अपनी गलती को सुधारने की प्रवृत्ति रखता है तब उसे दूसरे की गलती सहन कैसे हो सकती है। अतः वह दूसरों से भी उसका प्रायश्चित कराता है। ऐसे प्रायश्चित कठोर भी होते हैं परन्तु मन पर उनके संस्कार न पड़े इसलिए कठोरता का भी व्यवहार करता दिखाई देता हुआ अन्तर में अत्यन्त कोमल वृत्ति का होता है। पड़ने वाले संस्कारों की उपेक्षा न कर वह अपनी सहिष्णुता का परिचय देता है।

अपने साथ किये हुए व्यक्तियों के असद्व्यवहार को स्मरण रखने का उसका स्वभाव नहीं होता, क्योंकि उस व्यक्ति को तात्विक दृष्टि मिली रहने से वह उस व्यक्ति के प्रति रोष धारण नहीं रहता। उसके सद्व्यवहार में वह उसकी मानसिक स्थिति और समाजगत स्थिति का दर्शन करके वह उससे उसे ऊपर उठाने का प्रयत्न करता है।

इसी प्रकार पापी के प्रति उसमें घृणा का समावेश नहीं रहता। घृणा के स्थान को प्रेम घेरे रहता है परन्तु पाप के प्रति वह सतत जागरुक रहता है और उसके समूलोच्छेदन के लिए उसकी तत्परता बराबर क्रियाशील रहती है। अपराधी और पापी होना व्यक्तियों का स्वभाव नहीं होता बल्कि समाजगत स्थितियाँ मानव को नचाया करती हैं और उन्हीं के कारण वह ऐसे कार्य कर बैठता है जिनको उसे नहीं करना चाहिए। यद्यपि आरम्भ में उसके न करने के सम्बन्ध में उसमें क्षोभ रहता है, परन्तु स्थितियों से मुक्ति न पाने के कारण धीरे-धीरे क्षोभ कम होता जाता है तथा पाप और अपराध उसमें घर करते जाते हैं। कर्मयोगी उसके वास्तविक कारण से अवगत रहता है। इसलिए उसके मन में ऐसी किन्हीं वृत्तियों का उदय नहीं होता जो तामसिक या राजसिक हों।

क्रोध आदि कुछ वृत्तियाँ जो कर्मयोगी में दिखाई देती हैं वे तो सिर्फ ऊपर ही ऊपर रहती हैं उनका उसके अन्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे वृत्तियाँ समाज संस्कार के लिए आवश्यक होती हैं। समाजगत अपराध तथा पापों के संस्कारों को हटाने के लिए उन सब की आवश्यकता होती है।

संसार के दुःख द्वन्द्वों के प्रभाव से वह व्यक्ति मुक्त रहता है, यद्यपि सांसारिक जनों की तरह दुःख, सुख, चिन्ता विपत्तियाँ उसे घेरे रहती हैं परन्तु मन और भावनाओं को ऊपर रखने के कारण वे इनके प्रभाव से चंचल नहीं हो पातीं। अचल बनने की साधना ही वास्तव में कर्मयोग की साधना है।

हठयोग आदि योगों का स्वतन्त्र कोई अस्तित्व नहीं हैं। ये योग संयमी और सुपुष्ट बनाते हैं। संयमी जीवन की प्रत्येक प्रकार के योग में आवश्यकता हो सकती है। उसी प्रकार हठयोग के साधनों को समझना चाहिए।

तात्पर्य यही है कि जो व्यक्ति संघर्ष से घबराता नहीं। बल्कि संघर्ष कर अपने को सहिष्णु एवं निष्पाप बनाने की तैयारी करता है तो निश्चय ही योगी है। यह योग की वृत्ति यदि एकाँगी है, व्यक्तिगत शक्ति तक सीमित है, व्यक्ति से पृथक समाज की ओर उसका ध्यान नहीं है तो वह योग की पूर्णावस्था नहीं है। योग की पूर्णावस्था तो कर्मयोग में ही प्रतिष्ठित है।


शान्त विचारों की ठोस शक्ति

(ले- प्रो. श्री लालजीरामजी शुक्ल)

हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं- एक उद्वेगयुक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेगयुक्त विचार हैं और जिसके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति क्रोध में आकर कोई बात कह रहा है तो हम समझते हैं कि वह व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्तियों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।

उद्वेगपूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है शान्त विचार वृहद मन के विचार हैं उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों का हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं लाता तो वे विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।

अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की चेतना को समक्ष आती हैं। ये भावनायें अच्छे तन-मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही आती हैं जैसी उसकी आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की प्रेरणा ही उसे आशावादी और निराशावादी बनाती है। अर्थात् मन का जैसा रुख रहता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास करने लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर रहते हैं।

गम्भीर परिस्थितियों में मन का शान्त रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी व्यक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शान्त लोगों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्तियों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है। शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे-धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेगपूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिए शान्त होने की आवश्यकता होती है और उसका कार्य अवश्य जगत में होता है।

शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचाई और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभ चिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रयत्न करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।

हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे-धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसे हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं। और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कार्यों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उत्पन्न होती हैं। ये रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करें तो वह उसका कारण अपने आप ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उसमें आत्म-विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीव्र हो जाती है। और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिए वैयक्तिक इच्छाओं का नियन्त्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती हैं, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतनी ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शान्त विचारों का अन्त कर देती है जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह भी उतने ही अधिक होते हैं। भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति से संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। अधिक मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन से कार्य करता है पर अचेतन मन उसकी सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य को शीघ्रता से थकावट आ जाती है। और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

जिस प्रकार शान्त विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं एकान्त में हम किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति नित्यप्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं। वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसा कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर-दूर के लोगों का प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।


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सत्यता, सद्वचन, उदारता, क्षमा, लोकहित आदि कोई न कोई कार्य करते रहना चाहिए ये सब बहुत बड़े सहायक हैं, -‘स्वामी’ रामतीर्थ।


आप के निमार्ण-कार्य

(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

मानव जीवन के यापन के अनेक भेद-प्रभेद हैं। उनमें नाना प्रकार के कार्य हैं। किंतु एक तत्व प्रत्येक में एक जैसा ही मिलता है। वह है समय का सदुपयोग। कुछ का सम्पूर्ण जीवन खाने कमाने में ही व्यय होता है। कुछ आमोद-प्रमोद ओर मनोरंजन प्रधान जीवन को ही सर्वोपरि मानते हैं। किसी का समय ज्ञान की वृद्धि, वृद्धि की प्रखरता, अध्ययन और आत्मोन्नति में बीतता है।

वास्तव में हमें यह प्रतीत नहीं कि हमें क्या निर्माण कार्य करना है। जीवन तो दीर्घ है। पूर्ण जीवन में हमें कोई ऐसा महान कार्य कर डालना है कि हमारी स्मृति सदा सर्वदा के लिए अमिट बनी रहे। हम में से अधिकाँश ऐसे हैं जो कुछ करना चाहते हैं। उनके मन में लगन है, उत्साह और पर्याप्त प्रेरणा है किन्तु उन्हें निर्माण कार्यों का ज्ञान नहीं है।

निर्माण कार्य! आप गहराई से सोचिये कि संसार में करने के योग्य कितने महत्वपूर्ण कार्य आपके निमित्त रखे हैं? आप जीवन तथा समाज के जिस पक्ष की ओर जायं और निर्माण कार्य मिल जायेंगे, सर्वप्रथम आपको “स्व” अर्थात् स्वयं अपना निर्माण करना है। आप कहेंगे हम तो पहले से ही निर्मित हैं, हम अपने क्या बना सकते हैं? आपके निर्माण के लिए अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र है।

आत्म-निर्माण में सर्वप्रथम अपने स्वभाव का निर्माण है। आपको यह देखना है कि कौन कौन-सी दुष्ट आदतें आपको छोड़नी हैं? उनके स्थान पर कौन-कौन शुभ और सात्विक आदतों का विकास करना है? अच्छी आदतों से उत्तम भाव का निर्माण होता है और मनुष्य का दृष्टिकोण बनता है। जैसा दृष्टिकोण होता है, वैसा ही आनन्द मनुष्य को प्राप्त होता है।

आपको निम्न आदतें छोड़ देनी चाहिएं - निराशावादिता, कुढ़न, क्रोध, चुगली और ईर्ष्या। इनका आन्तरिक विष मनुष्य को कभी भी पनपने नहीं देता, समाज में निरादर होता है, आन्तरिक विद्वेष से मनुष्य निरन्तर दग्ध होता रहता है। बात को टालने की एक ऐसी गन्दी आदत है जिससे अनेक व्यक्ति अपना सब कुछ खो बैठे हैं। इनके स्थान पर सहानुभूति, आशावाद, प्रेम, सहनशीलता, संयम की आदतें लोक एवं परलोक दोनों में मनुष्य को सन्तुष्ट रखती हैं। यदि हम आत्मनिर्माण में अपना समय लगायें, तो हमारा जीवन बहुत ऊँचा उठ सकता है।

अमर आत्माओं।़ जीवन का, उच्च सात्विक और कलात्मक जीवन का निर्माण करो। अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाओ। मानसिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए स्वाध्याय करो, अधिक से अधिक ज्ञान संचय करो। आत्मोन्नति एवं आत्मतुष्टि के लिए नियमित रीति से आध्यात्मिक ग्रन्थों का पठन-पाठन, अध्ययन, मनन, विद्वानों के सत्संग, भाषण सुनना एक चिर साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।

अपने भविष्य का निर्माण स्वयं आपके हाथ में है। आज के कार्यों द्वारा आपका भविष्य निर्माण होना है। आप आज जो परिश्रम, और उद्योग कर रहे हैं, उन्हीं के बल पर भविष्य का निर्माण हो सकेगा।

समाज निर्माण कीजिए। आपके समाज में विस्तृत कार्य क्षेत्र हैं जिसमें आपके योग की आवश्यकता है। आपके समाज में इस उन्नत युग में अनमेल विवाह, बाल-विवाह, बहु-विवाह, छूत-अछूत, मजदूर और पूँजीपति, किसान और जमींदार, कृषि की उन्नति, समाज से अशिक्षा को दूर करने की असंख्य छोटी बड़ी अनेक समस्याएं फैली हुई हैं। अपनी जीविका के उपार्जन के पश्चात आप इनमें से कोई भी क्षेत्र छाँट सकते हैं।

देश के प्रति भी आपका कुछ कर्तव्य है। राष्ट्र को आपकी सेवाओं की आवश्यकता है। आज हमारे देश में उत्साह है, जनता में हलचल है, प्रत्येक हृदय में प्रेरणा है कि राष्ट्र निर्माण किया जाये। किन्तु क्या किया जाय? हम कहते हैं आपको अपनी शक्ति के अनुसार नागरिक शिक्षा, जनता को उसके अधिकार और कर्त्तव्यों की शिक्षा देना, प्रवासी भारतीय, रंग-भेद को दूर करना, नाना वादों की शिक्षा, राजनीति का ज्ञान प्रदान करना है। राष्ट्र-निर्माण का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है और समस्याएं भी गम्भीर हैं। सम्भव है आपके लिए यही क्षेत्र उपयुक्त हो।

राष्ट्र भाषा के निर्माण की समस्या यथेष्ट महत्व की है। मद्रास, बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र इत्यादि भागों में हिन्दी प्रचार का बीड़ा उठाकर आप अमर बन सकते हैं अपने समय का सदुपयोग हिन्दी के लेख, पुस्तकें लिखकर, हिन्दी में भाषण देकर, जन जागृति द्वारा, अशिक्षित जनता में ज्ञान का प्रकाश प्रदान कर अन्य भारत की 90 प्रतिशत जनता को हिन्दी बोलना लिखना सिखा सकते हैं।

हमारे देश के 75 प्रतिशत व्यक्तियों को भरपेट भोजन तक प्राप्त नहीं होता। उनके लिए उद्योग, धन्धे, घरेलू कार्य, स्त्रियों के लिए सिलाई, बुनाई, कताई, नर्सिंग अध्यापन इत्यादि की शिक्षा दे सकते हैं। जिस देश में जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही हो, तथा अस्पृश्यता हो, धर्म में मायाचार लूट-पाट चल रही हो, पंडित महन्त इत्यादि जनता को ठग रहे हों, नारियों का निरादर हो, उस देश में आपके लिए निर्माण कार्य की न्यूनता नहीं है।

अवकाश निकालिये। विद्यार्थियों को यथेष्ट समय निर्माण-कार्य के लिए प्राप्त हो सकता है, जैसे रविवार दो-दो चार-चार दिन की छुट्टियाँ, दशहरे और बड़े दिन की छुट्टियाँ, ग्रीष्मावकाश। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी अपना समय निकाल कर सार्वजनिक सेवा में लगा सकते हैं। राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति को सहयोग देकर जीवन सफल करना चाहिये।


साहित्य, संगीत और कला

ले-श्री किशोरीलाल घ. मशरुवाला

आज मैं देखता हूँ कि जहाँ-तहाँ साहित्य, संगीत और कला की उपासना की जा रही है हमारे महाविद्यालयों में इनकी बड़ी पूछ है बड़ा आदर है। सत्याग्रह-आश्रम की बुनाईशाला के द्वारों पर एक-2 पटिया टंगी रहती थी, जिस पर लिखा रहता था - ‘कला ही राष्ट्र का जीवन है।’ और, अगर यह कहूँ कि संगीत की उपासना तो गुजरात में सत्याग्रहाश्रम से ही शुरू हुई तो अत्युक्ति न होगी। भर्तृहरि ने साहित्य, संगीत और कला से हीन मनुष्य को पशु से भी बदतर कहा है एक श्रुति ने तो रस ही को ब्रह्म कहा है। इन प्रबल प्रमाणों के रहते हुए भी आज साहित्य, संगीत और कला की जो विचार-हीन उपासना हो रही है, उसका विरोध करना कर्त्तव्य हो जाता है।

मैं इस बात को मानने से इनकार करता हूँ कि साहित्य, संगीत और कला मनुष्य को पूर्णता के समीप पहुँचाते हैं। पुरातत्वज्ञ ऐसे उदाहरण भी हमारे सामने रख सकते हैं कि जहाँ एक ही मनुष्य में इन तीनों का विकास हुआ है, फिर भी वह मनुष्य नीच से नीच है। वैसे तो कोई भी वस्तु ब्रह्म से भिन्न नहीं है, इसलिए रस का अर्थ साहित्य, संगीत और कला की पोषक वृत्ति करके भी ‘रसो वैस’ वाक्य को मैं मिथ्या नहीं कह सकता। फिर भी मैं यह कहना चाहता हूँ कि जो उपासना मनुष्य को पूर्णता तक पहुँचा सकती है, जिससे समस्त प्रजा का कल्याण हो सकता है, वह अकेले साहित्य, संगीत और कला की उपासना नहीं।

किसी मनुष्य को दूसरे किसी मनुष्य से किसी कार्य-वश या उसके हित के लिए जो कुछ कहना पड़ता है, उसे वह (सभ्यता और सौजन्य की दृष्टि से) चुने हुए उपर्युक्त शब्दों में, शुद्ध उच्चारण के साथ, और एक ही अर्थ की द्योतक वाक्य-रचना द्वारा अपने भावों को पूरी तरह व्यक्त कर सकने वाले स्पष्ट शब्दों और दृष्टान्तों के उपयोग से, यदि ठीक-ठीक कह सकता है, तो इतना कहने की शक्ति प्राप्त करने के लिये साहित्य की जितनी उपासना आवश्यक है, मेरे विचार में वही साहित्यिक उपासना की सीमा का सूचन करती है। उसके हृदय में उत्पन्न होने वाली सात्विक प्रसन्नता से और उसके जीवन की पूर्णता से उसकी वाणी में जितना आनन्द उत्पन्न हो सकता है, वही सात्विक का सच्चा रस है और उसमें जितनी स्वाभाविक सुन्दरता प्रतीत होती है वही सच्ची कला है।

जिस कथन या उक्ति से किसी भी आवश्यक कार्य का सम्बन्ध नहीं, न जिससे किसी का हित हो ही सकता है, वह कितनी ही सुन्दर लच्छेदार भाषा में क्यों न कहा जाय और उत्कृष्ट साहित्य का कैसा ही सुन्दर नमूना क्यों न माना जाय मनुष्य के विकास के लिये मैं तो उसे निरुपयोगी ही समझता हूँ।

इसी प्रकार हृदय में होने वाले उदात्त मन्थन के परिणाम-स्वरूप सहज गति से सार्थक शब्दों का जो राग-बद्ध या ताल-बद्ध प्रवास निसृत होता है, उसमें जितना संगीत है, वह क्षम्य हैं और केवल वैज्ञानिक छान-बीन की दृष्टि से उस संगीतगत स्वर्ग का अभ्यास भी क्षम्य है। मैं उसे क्षम्य मानता हूँ लेकिन, अर्थ को भुलाकर या गौण बनाकर केवल स्वरों की जो कसरत की जाती है, मैं नहीं समझता कि उससे मानव-जाति के विकास में कोई सहायता पहुँचती है।

मेरे विचार में कला का भी ऐसा ही मर्यादित स्थान है। अगर मेरे उपयोग की चीज इतनी अच्छी तरह बनायी गयी है कि उसके उपयोग में मुझे पूरी-पूरी सुविधा होती है, तो उसके जैसी और जितनी कला है, उसी में कला की आवश्यक सीमा आ जाती है। उदाहरण के लिए, चर्खे को ले लीजिये। अगर मुझे चर्खे का उपयोग करना है तो जरूरी है कि वह टिकाऊ हो, उसके जोड़ इस प्रकार जोड़े गए हों कि चलाने में कोई तकलीफ न हो, उसमें कम से कम घर्षण होता हो, उसका तकुआ चकली सरलता से घूमने वाली हो और उसे तेल पिलाने की जगह इस तरह बनी हो कि जहाँ तेल की जरूरत नहीं है वहाँ बिलकुल न पहुँचे तो मैं कहूँगा कि उसके बनाने में कारीगर ने अपनी पूरी कुशलता का उपयोग किया है। मैं यह उम्मीद न करूंगा कि वह चर्खा तरह-तरह के रंगों से रंगा हुआ हो अथवा उसकी लकड़ी पर जगह-जगह सुन्दर खुदाई का काम किया गया हो। मनुष्यत्व के विकास के लिये उतनी ही कला आवश्यक है, जितनी मनुष्य को उसके काम में कुशल बनाती है, इससे अधिक जो कुछ है सब आडम्बर है और मनुष्य जीवन को उसके ध्येय से विमुख करने वाला है।

साहित्य, संगीत और कला पर किया गया मेरा यह प्रहार यदि किसी को अरुचिकर प्रतीत हो तो उनसे मैं यह निवेदन करूंगा कि ये इन तीनों विभूतियों को, कम से कम अपने जीवन में, पूरी तरह उतारें।

जब मैं देखता हूँ कि कोई साहित्यिक अपनी खानगी बातचीत में गन्दी और अश्लील बात ही विशेष करता है तो मुझे साफ कहना चाहिये कि उसके लिखे हुए साहित्य को पढ़ने या सोचने का कोई उत्साह मुझ में नहीं रह जाता।

ऐसे गायक भी पाये जाते हैं, जिनके गान और तान में जन-समूह को मुग्ध करने की शक्ति है, लेकिन उनके जीवन को देखा जाय तो उसमें कोई संगीत नहीं होता, उनकी राग-बद्ध वाणी जितनी मीठी और आह्लादकारक, उनकी मामूली बातचीत उतनी ही कठोर और घृणास्पद, इतनी कि उनसे बोलने को जी नहीं होता।

मैंने ऐसे चित्रकार और बढ़ई देखे हैं, जिनकी कारीगरी को देखते ही मुँह से ‘वाह-वाह’ निकल पड़ता है, लेकिन, अगर उनके कपड़े, घरद्वार, साज-सामान आदि देखे जायं, तो वे इतने भद्दे और अव्यवस्थित होंगे कि देखने को जी ही न चाहेगा। ऐसे समय में यह सोचने लगता हूँ कि काश, ये कलाकार अपने कला-नैपुण्य का कुछ अंश कम करके भी बचे हुए समय को कपड़े धोने, पैबँद लगाने, घर को साफ-सुथरा रखने, दरवाजों और खिड़कियों को कसा-गँसा रखने, खटिया के पायों को सीधा करने, लत्ते-कपड़ों को खूँटी पर टाँगने और अपने औजारों को हर तरह सम्भाल कर रखने में खर्च करें, ताकि इनके विश्वकर्मा प्रभु इन पर विशेष प्रसन्न हो।

जिसके चरित्र को मैं आदर की दृष्टि से नहीं देखता, उसके आध्यात्मिक लेखों में कितनी ही तर्कपटुता और योग शक्ति क्यों न हो, मैं उन्हें त्याज्य ही समझता हूँ। इसी तरह साहित्य, संगीत और कला की भक्ति से जिनकी दिनचर्या में वह आवश्यक परिवर्तन नहीं होता, जो होना चाहिये, उनकी सिद्धियों से लाभ उठाने की मुझे जरा भी इच्छा नहीं होती।

मेरी प्रार्थना है कि साहित्य, संगीत और कला विषयक अपनी वृत्ति और रुचि का हम एक बार फिर विचार करें। मेरे विचार तो मुझे यह सुझा रहे हैं कि जिस प्रकार किफायत और मेहनत में आबादी या समृद्धि का प्राण बसता है और निरंकुश भोग-विलास में समृद्धि सम्पत्ति का ध्येय है, उसी प्रकार गीता भाषा और मजदूरी या कारीगरी की सादगी में और व्यवहारोपयोगिता में राष्ट्र के प्राण समाये हुए हैं, जबकि साहित्य, संगीत और कला के विलास अथवा विकास में राष्ट्र के प्राण का क्षय निहित है।


उलझन भरी पहेली

(श्री नोखेरामजी शर्मा बी. ए., काव्यतीर्थ)

अन्धे ने कहा-हाय! मुझे भगवान् ने अंधा बना दिया, नहीं तो मैं संसार का कितना उपकार करता! अपने सुख की तनिक भी परवा न करके सदा दीन दुखियों की सेवा में लगा रहता।

लंगड़े ने कहा- मैं क्या करूं। यदि मेरे पैर दुरुस्त होते तो दौड़-दौड़ कर मैं अच्छे-अच्छे कार्य सम्पन्न करता, जीवों की भलाई करता पर करूं क्या?

निर्धन ने कहा- जब मैं गरीबों को धनाभाव से पीड़ित देखता हूँ तो मेरा कलेजा फटने लगता है। यदि मेरे पास धन रहता तो मैं निर्धनों पर धनियों के अत्याचार का सक्रिय प्रतिरोध करता। अपने सामने किसी को धनाभाव से पीड़ित न देखता, सारा धन परोपकार में ही लगाता रहता?

मूर्ख ने कहा- न मालूम पढ़-लिख कर किस तरह आदमी स्वार्थी हो जाते हैं। मेरे पास तो विद्या नहीं, यदि मैं विद्वान रहता तो, अपनी विद्या को कभी पैसे लेकर न बेचता, वरन् उससे दूसरों की भलाई करता, सत्य की रक्षा करता तथा ज्ञान के अन्वेषण में उसका उपयोग करता।

निर्बल ने कहा- बलवान पुरुष अत्याचारी तथा परपीड़ित किस तरह हो जाते हैं? यदि मैं बलवान रहता तो केवल पीड़ितों को बचाता, अत्याचारियों के विरुद्ध लोहा लेता तथा सदैव दूसरों के दुःख दूर करने के लिए कटिबद्ध रहता। जिस तरह लोग मुझे निर्बल जानकर सताया करते हैं वैसे मैं कभी न करता !

समय ने पलटा खाया। अन्धे की आँखों में ज्योति आ गयी, लंगड़े का पाँव सीधा हो गया, निर्धन मितव्ययिता और घोर परिश्रम से धनी हो गया, मूर्ख को विद्या प्राप्त हो गयी और निर्बल बलवान हो गया।

आँख वाला सुन्दर दृश्यों को देखने में दिन बिताने लगा। जीवन भर की अभिलाषा संचित थी। जिसे देखता घन्टों लगा देता, उसके पीछे खाना-पीना भूल जाता। रूप के आगे उसे कुछ न सुहाता था। वह अपने तन की सुधि भी भूल गया !

लंगड़ा पाव पाकर फूला न समाया। जहाँ-जहाँ जाने के लिए सोच रखा था वहीं को चल पड़ा। उसने धनोपार्जन के लिए दौड़-धूप करना शुरू कर दिया। स्वार्थसिद्धि में वह अनवरत लीन हो गया।

धनवान ने कहा- जब मैंने परिश्रमपूर्वक धन कमाया है तो इस पर मेरा पूरा अधिकार है। मैं इसे मुफ्त क्यों लुटाऊं? सब मेरी तरह क्यों नहीं कमा लेते? जो भूखों मरते हैं वे अपने कर्म का फल भोगते हैं। अपव्यय और आलस्य को अपनाकर लोग अब मेरा बोझ बनना चाहते हैं। यह सरासर अन्याय है। इस पर यदि धनवान पैसे देकर लोगों से वाजिब काम लेते हैं तो वे क्या बेजा करते हैं? यदि वे कुछ अत्याचार भी करें तो भी कोई अनुचित नहीं, उन्हें अपनी घोर तपस्या के बदले कुछ तो विशेषाधिकार मिलना ही चाहिये।

विद्वान् ने कहा- यदि मैंने परिश्रमपूर्वक विद्या प्राप्त की है तो इससे दूसरों को क्या? इसे जिधर चाहे, उपयोग करने का मेरा पूर्ण अधिकार है। इसके द्वारा मैं धन न कमाऊं तो अपनी अभिलाषा कैसे पूरी करूं। सत्य का पता न कभी लगा है न लगेगा, झूठ न रहे तो दुनिया उठ जाय। एक तो यों ही लोग दुष्ट और स्वार्थी हैं, यदि मैं उन्हें और भी मदद पहुँचाने लगूँ तो न मालूम वे कब मुझ-जैसों को हड़प जाए!

बलवान ने कहा- बल केवल निर्बलों पर ही व्यक्त हो सकता है। यदि मेरी मदद चाहते हैं तो उन्हें भी मुझे मदद करनी चाहिए। यहाँ तो सब स्वार्थ के पुतले हैं, फिर मैं निःस्वार्थ क्यों बनूँ। कोई निर्बल मर रहा हो तो मरे। यह उसके दुष्ट कर्म का फल है। वह जीना चाहता हो तो परिश्रम करके बलवान क्यों नहीं बन जाता?

समय फिर पलटा ! जिसे आँख मिली थी, उसकी आंखें जाती रही। पाँव वाले का लंगड़ापन फिर आ गया। धनवान का कारोबार नष्ट हो जाने से दिवाला निकल गया, कर्जदार उसे निर्बल पाकर रुपये हड़प गये। बलवान फिर कमजोर हो गया। और विद्वान् फिर पहले की तरह लोगों में तिरस्कृत हो गया!

तब उन्हें अपनी-अपनी पुरानी प्रतिज्ञाएं याद पड़ीं। पर समय बीत गया था, मौका हाथ से निकल चुका था। पर अब पछताने से क्या हो सकता था।


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तिनके के समान हलका बनने से, वृक्ष के समान सहिष्णु बनने से, मान छाड़ कर दूसरों को मान देने से, इष्ट की महिमा समझने से तथा अभिमान का त्याग करने से साधना शीघ्र सफल होती है। इस प्रकार योग्यता प्राप्त करने के लिये सत्संग, धर्मग्रन्थ, और भक्त चरित्र का अभ्यास, गुरु आशा का पालन तथा माता-पिता आदि गुरुजनों की तथा भक्तों की सेवा-पूजा करना बहुत आवश्यक है।

-विजयकृष्ण गो.।


श्री रामकृष्ण परमहंस के उपदेश

जो हीन बुद्धि हैं, वे ही सिद्धाई चाहते हैं। बीमारी को अच्छा करना, मुकदमा जिता देना, जल के ऊपर से चलना-ये सब (सिद्धाई हैं)। जो भगवान् के भक्त हैं, वे ईश्वर के पादपद्मों को छोड़ कर और कुछ भी नहीं चाहते हैं। जिनकी थोड़ी बहुत सिद्धाई हो, उनकी प्रतिष्ठा-लोकमान्य होती है।

व्याकुल होकर भगवान् की प्रार्थना करो। विवेक के लिए प्रार्थना करो। ईश्वर ही लक्ष्य है, और सब अनित्य है, इसी का नाम विवेक है। जल-छादन (जल छानने के महीन कपड़े) से जल छान लेना होता है। मेला-कूड़ा कर्कट एक तरफ रहता है, और अच्छा जल दूसरे तरफ पड़ता है। तुम उनको (ईश्वर को) जान कर संसार को छोड़ो इसी का नाम विद्या का संसार है।

नाना मत हैं। ‘मत का पन्थ’ अर्थात् जितने मत हैं उतने ही पन्थ हैं। किन्तु सभी मानते हैं कि-‘मेरा मत ही ठीक है - मेरी ही घड़ी ठीक चल रही है।’

सत्य कथा - सत्य बोलना कलि की तपस्या है। कलियुग में अन्य तपस्या कठिन है। सत्य मार्ग पर रहने से भगवान् पाया जाता है।

अवतार या अवतार के अंश को ईश्वर कोटि कहते हैं, और साधारण लोगों का जीवन या जीव-कोटि। जो जीव कोटी के हैं, वे साधनाएं कर ईश्वर का लाभ कर सकते हैं। वे (निर्विकल्प) समाधि से फिर लौटते नहीं हैं।

जो ईश्वर कोटी हैं, वे मानो राजा के बेटे हैं, और मानों सात मंजिल वाले मकान की चाबी उनके हाथ में है। वे सातों मंजिलों तक चढ़ जाते हैं, फिर इच्छानुसार उतर भी आ सकते हैं। जीव कोटी मानो छोटे कर्मचारी (नौकर) हैं वे सात मंजिल के कुछ दूर तक पहुँच सकते हैं।

जनक ज्ञानी थे। साधनाएं कर उन्होंने ज्ञान लाभ किया था। शुकदेव थे ज्ञान की मूर्ति। शुकदेव का साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था। लोकशिक्षा के लिए प्रहलाद कभी ‘सोऽहं’ भाव में रहते, फिर कभी दास भाव में और कभी सन्तान भाव में रहते थे। हनुमान की भी वैसी अवस्था थी।

भगवान् को लाभ करना हो तो संसार से तीव्र-वैराग्य चाहिये। जो कुछ ईश्वर के मार्ग के विरोधी मालूम हो, उसे तत्क्षण त्यागना चाहिये। पीछे होगा यह सोच कर छोड़ रखना ठीक नहीं है। काम-काँचन ईश्वर-मार्ग के विरोधी हैं। उनसे मन हटा लेना चाहिये।

दीर्घसूत्री होने से परमार्थ का लाभ नहीं होगा। कोई एक अंगोछा लेकर स्नान करने को जा रहा था। उसकी औरत ने उससे कहा कि- तुम किसी भी काम के नहीं हो, उम्र बढ़ रही है, अब भी यह सब (व्यवहार) छोड़ नहीं सके। मुझको छोड़कर तुम एक दिन भी नहीं रह सकते। किन्तु देखो, वह रामदेव कैसा त्यागी है। पति ने कहा-क्यों उसने क्या किया? औरत ने कहा-उसकी सोलह औरतें हैं। वह एक-एक करके उनको त्याग रहा है। तुम कभी त्याग कर नहीं सकोगे। जो त्याग करता है वह क्या थोड़ा-थोड़ा करके त्याग करता है? औरत से मुस्कराकर कहा-पगली, तू नहीं समझती है त्याग करना उसका काम नहीं है। अर्थात् उसके कहने से त्याग नहीं होगा, मैं ही त्यागकर सकूँगा। यह देख, मैं चल देता हूँ।’

इसी का नाम तीव्र वैराग्य है। उस आदमी को ज्यों वैराग्य आ गया त्यों−ही उसने त्याग किया। अंगोछा कन्धे में ही रहा कि वह चल दिया। वह संसार का कुछ ठीक-ठाक नहीं कर पाया। घर की ओर एक बार पीछे लौट कर देखा भी नहीं।

जो त्याग करेगा उसको मनोबल चाहिए। लुटेरों का भाव ! लूटने से पहले जैसे डाकू लोग कहते हैं, ऐ मारो ! लूटो ! काटो ! अर्थात् पीछे क्या होगा, इसका ख्याल न कर खूब मनोबल के साथ आगे बढ़ना चाहिये।

तुम और क्या करोगे? उनके (ईश्वर के) प्रति भक्ति और प्रेम लाभ कर दिन बिताना है। श्रीकृष्ण के अदर्शन से यशोदा पगली जैसी बनकर श्रीमती (राधा) के पास गई। श्रीमती ने उनका शोक देखकर आद्या शक्ति के रूप से उनको दर्शन दिया और उनसे कहा-‘माँ’ वर फिर क्या लूँ? तो इतना ही कहा कि-मैं तन, मन, वचन से कृष्ण की ही सेवा कर सकूँ, इन्हीं आँखों से उनके भक्तों का दर्शन हो। जहाँ-जहाँ उनकी लीलाएं हों इन पैरों से वहीं जा सकूँ। इन हाथों से उनके ही प्रेमी भक्तों की सेवा करूं। सब इन्द्रियाँ उन्हीं के दर्शन श्रवणादि में लगें।

इधर का (ईश्वरीय) आनन्द मिलने से उसको (वैषयिक) आनन्द अच्छा लगता है। ईश्वरी आनन्द लाभ करने से संसार नमक का (शाक जैसा) निःरस भान होता है। शाल मिलने से फिर वनात अच्छा नहीं लगता है।

जो संसार के धर्म संसार में रह कर ही धर्मावरण करना ठीक है यह कहते हैं वे यदि एक बार भगवान् का आनन्द पावें तो उनको फिर और कुछ अच्छा नहीं लगता। कर्म के लिए आशक्ति कम होती जाती है। क्रमशः ज्यों-ज्यों आनन्द बढ़ता जाता है त्यों-त्यों फिर कर्म भी कर नहीं सकते हैं केवल उसी आनन्द को ढूंढ़ते फिरते हैं। ईश्वरीय आनन्द के पास फिर विषयानन्द और रमणानन्द तुच्छ हो जाते हैं, एक बार स्वरूपानन्द का स्वाद तुच्छ कर उसी आनन्द के लिए व्याकुल होकर फिरते है, तब संसार गृहस्थी रहे चाहे न रहे ! उसके लिए कोई परवाह नहीं रहती है।

संसारी लोग कहते हैं कि-दोनों तरफ रहेंगे! दो आने का शराब पीने से मनुष्य दोनों ओर ठीक रहना चाहते हैं। किन्तु अधिक शराब पीने से क्या फिर दोनों तरफ नजर रखी जा सकती है?

ईश्वरीय आनन्द मिलने से फिर कुछ साँसारिक कार्य अच्छा नहीं लगता है। तब काम काँचन की बातें मानो हृदय में चोट सी लगती हैं। बाहरी बातें अच्छी नहीं लगती हैं। तब मनुष्य ईश्वर के लिए पागल होता है। रुपये पैसे कुछ भी अच्छे नहीं लगते हैं।

ईश्वर लाभ के बाद कोई संसार है तो वह होता है-विद्या का संसार। उसमें कामिनी-काँचन का प्रभाव नहीं रहता है, उसमें रहते हैं, केवल भक्ति, भक्त और भगवान्।


अपने बाल-बच्चे मत बेचिए!

(श्री जनार्दमजी पाठक)

ऐसी दुर्घटनाएं सदा ही समाचार-पत्रों में इन को मिलती हैं, कि अमुक स्थान में अमुक कन्या ने, जो अत्यन्त होनहार और विवाह के समस्त गुणों से पूर्ण थी, अपने विवाह के पहले आत्महत्या करके अपने प्राण दे दिये। भावुक पाठक का हृदय इसको पढ़कर अवश्य ही व्यग्र और विह्वल हो जाता है, तथा वे इस दुर्घटना के मूल कारणों पर तरह-तरह के अनुमान करने लगते हैं। मेरी समझ में इसके वस्तुतः दो ही कारण होते हैं। एक तो उस कन्या के माँ-बाप या उसके कोई निकट सम्बन्धी उसे किसी अयोग्य पुरुष के साथ रुपये आदि लेकर विवाह करना चाहते हैं, और नहीं तो किसी लड़के का दुष्ट अभिभावक इतना अधिक द्रव्य उस लड़की के पिता भाई या उसके परिवार के और लोगों से चाहता है, जिससे कि उस कन्या के वे सम्बन्धी अत्यन्त विह्वल और व्यग्र हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में उस बेचारी कन्या को जीवन अवश्य ही बोझ मालूम पड़ता है।

क्यों न हो-“सबसे अधिक जाति अपमाना।” नारी-जाति का यह असह्य अपमान जब उसे बर्दाश्त नहीं होता तो वह अपने प्राणों को त्याग देती है। सती ने जिस तरह अपने अपमान और क्रोध की दहन-ज्वाला से अपने पिता के यहाँ प्राण दे दिये थे, ठीक उसी तरह दो एक नहीं, अनेकों देवियाँ हमारे समाज के भयंकर अग्निकुण्ड में वर-विक्रय और कन्या-विक्रय की कुप्रथा के कारण अपने को होम कर देती हैं। कितनी ही कन्याएं आजीवन कुमारी ही रह जाती हैं। उनके अभिभावकों के पास तिलक-दहेज के लिये इतने रुपये नहीं कि जिनसे उनका विवाह कर सकें।

मेरा यह दृढ़विश्वास है कि बहुत सी कन्याएं, जिन्हें अपने भविष्य की कुछ भी चिन्ता है, इस वर-विक्रय और कन्या विक्रय की घातक कुप्रथा के कारण चिंतासागर में डूबी रहती हैं, जंगल के मृग-शावकों की तरह सदैव भयातुर बनी रहती हैं ठीक ही है, जहाँ तिलक-दहेज और कन्या-विक्रय के इतने जबर्दस्त जाल बिछे हुए हैं, वहाँ अभागी कन्या-मृग शावकों को अयोग्य वर-बधिक के जाल में फंस जाना न पड़े यही आश्चर्य है!

जिस परिवार में तिलक-दहेज की विशेष चाहत हैं, वहाँ कन्याओं का समुचित सत्कार नहीं हो सकता, बल्कि वे आरम्भ से ही उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाती हैं। उन्हें सुयोग्य बनाने का भी प्रयत्न प्रायः नहीं किया जाता। ऊँची शिक्षा देने-दिलाने की बात तो दूर रही, सूत कातने, कपड़ा बुनने, भात-रोटी आदि भोजन की सामग्री प्रस्तुत करने, तथा सीना-पिरोना आदि उपयोगी कार्यों के ज्ञान से भी वे वंचित रहती हैं, जिससे उन्हें पति-गृह में और भी अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। कन्याओं के प्रति सभी का यह भाव रहता है कि कन्या ऐसी महाजन है जो हम लोगों से अपना ऋण अदा कराने आयी है, अतएव उसका आदर ही क्या? लोग उनकी उपेक्षा करते हैं। बेचारी कन्याओं के बीमार पड़ने पर प्रायः लोग उनकी चिकित्सा आदि की व्यवस्था भी उस समय नहीं करते, जैसे लड़के के लिये करते हैं। जनसाधारण में ऐसी कहावत प्रसिद्ध है कि ‘बिन ब्याहे बेटी मरे, खड़ी उख बिकाय। बिन मारे बैरी मरे, दोनों कुल तर जाय।”

एक ही घर में लड़कों को सुन्दर चीजें खिलायी-पिलायी जाती हैं और कन्याओं को उन चीजों से यत्नपूर्वक वंचित रखा जाता है। तिलक-देहज के कारण जब कन्याओं के लिए वर-घर उपयुक्त नहीं मिलते, तो लोग उन्हें अभागिनी और बुरे लक्षणों वाली कह कर अपमानित किया करते हैं विशेष तिलक-देहज के भय से कुछ लोग अपनी कन्या का विवाह बूढ़े, रोगी एवं भारी अयोग्य पुरुष के साथ करने में भी संकोच नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने में उन्हें कम खर्च करना पड़ता है। कहीं-कहीं तिलक-देहज की परेशानी के कारण कन्या के उपयुक्त घर और वर नहीं मिलते, तो उनके अभिभावक व्यर्थ के मोह में पड़ कर मरते हुए भी देखे जाते हैं। कन्या खरीद कर जो विवाह करने वाले हैं, उनमें अधिकाँश से लोग ऐसे होते हैं, जिनका विवाह करना निर्धनता आदि कई कारणों से उनके परिवार वाले पसंद नहीं करते। जिस दिन से नव-वधू पति गृह में जाती है, उस दिन से वहाँ अनेकों लड़ाई-झगड़े खड़े हो जाते हैं। वह परिवार नरक से भी भयानक हो जाता है। उस विवाहिता रमणी को तरह-तरह के दुखों का सामना करना पड़ता है और उसकी संतानें भी दुखों से बची नहीं रहतीं।

तिलक-दहेज देकर जो कन्याओं का विवाह करते हैं, उनके यहाँ यदि कोई दूसरी लड़की है, तो उसी अनुपात से उन्हें उसके विवाह में रुपये आदि भी खर्च करने पड़ते हैं, यदि उनके भाई या परिवार के और किसी आदमी के कोई लड़की है और उसके तिलक-दहेज में बुरा कुछ भी कम हुआ, तो उसका फल बहुत बुरा होता है। उनके घर में शीघ्र ही वैमनस्य फैल जाता है। तरह-तरह के लड़ाई-झगड़े खड़े होकर उस परिवार का नाश करके ही छोड़ते हैं। कितने ही लोगों को तो कन्या-विक्रय और वर-विक्रय की कुप्रथा के कारण इतना अधिक खर्च करना पड़ता है कि वे बहुत जल्द राह के भिखारी बन जाते हैं।

तिलक-दहेज में विशेष रुपये-पैसे खर्च करके आज के दिन धनी-मानी कहलाने वाले लोगों की जो दुर्दशा होती है, वह वे बिचारी जानती हैं या भगवान् ही जानता है। यदि वे कन्याएं किसी कन्यार्थी एवं सीधे-सादे श्रमजीवी के घर भी ब्याही गयी होतीं, तो भी, मेरी समझ से, उन्हें उतना कष्ट नहीं होता। तिकल-दहेज ही एक ऐसा प्रतिबन्ध है, जिससे किसी पूँजीपति, जमींदार और धनी कहलाने वाले मनुष्य की कन्या किसी किसान या मजदूर के घर नहीं ब्याही जाती और ऐसा होने से समाज में जो समानता और भ्रातृत्व उत्पन्न होता, वह आज नहीं हो पाता सामाजिक अभिन्नता और मैत्री के ख्याल से भी इस कुप्रथा को समाज से निर्वासित करने की निताँत आवश्यकता है।

लड़का बेचने वालों को अपनी व्यर्थ को मान-प्रतिष्ठ आदि खोजने के लिये नीच-तमाशे आदि में बहुत से रुपये लगाने पड़ते हैं नशीली चीजों का भी व्यवहार करना पड़ता है। इस तरह जिस कुप्रथा के कारण कुकर्म में पानी की तरह रुपये बहाने पड़ते हैं, उसके कायम रहते वर-वधू की सुख और शाँति ही कब नसीब हो सकती है। कितनी ही जगहों में बहुत से लोग तिलक-दहेज के लिए इस तरह गुटबंदी किये रहते हैं कि किसी लड़की वाले के सम्मुख एक दूसरे का गुण गान करते और उसको बहुत ही धनी तथा प्रतिष्ठित बना देते हैं, जिससे कन्या वालों को पूर्ण विश्वास हो जाता है और उस लड़के वाले को तिलक-दहेज में मुँह माँगे रुपये आदि देकर अपनी कन्या का विवाह उस लड़के के साथ कर देते हैं। उस तरह अनेक स्थानों में तिलक-दहेज के नाम पर प्रायः धोखा और विश्वासघात हो रहा है। कितने ही लोग लड़के वाले से इस तरह मिले रहते हैं कि विवाह होने पर दान-दहेज में कमीशन पाते हैं।

इस प्रकार कन्या-विक्रय में दलाली और अनेक धोखेबाजियाँ हुआ करती हैं। वर-विक्रय और कन्या-विक्रय की इस कुप्रथा के कारण बहुत-सी अव्यक्त-वेदना एवं निर्णाक-कुण्ठिता नव-वधुओं के ऊपर जितने अत्याचार हो रहे हैं, उन्हें सुनकर पाषाण हृदय भी कम्पित हो जाता है। जिसका पिता दहेज में अधिक रुपये न दे सके, उस वधू विचारी को तरह-तरह से कोसा जाता है। कहते हैं कि कितने ही घरों में तो बहुएं इसलिए भी जलाकर मार डाली जाती हैं कि नये विवाह में तिलक-दहेज में और भी अधिक रुपये आदि मिलेंगे। वधू कैसे ही गुणवती हो, गृह-कार्य में कैसी ही प्रवीण हो, पर उसकी नितान्त उपेक्षा की जाती है। रुपये पैसे के लिए उसके रूप-लावण्य आदि के गुणों पर पानी फेर दिया जाता है। परिवार के स्त्री-पुरुष सभी उससे घृणा करते हैं। कितनी ही कन्याएं पिता के घर इसलिए छोड़ दी जाती हैं और पति के घर उन्हें नहीं ले जाया जाता, क्योंकि उनके पिता किसी निष्ठुर एवं लोभी लड़के वाले को दहेज में विशेष द्रव्यादि नहीं दे सके। जबकि समाज में कन्याओं का पुनर्विवाह निषिद्ध है तो यह कैसा अन्याय है और हमारे समाज का यह कैसा बड़ा अत्याचार है?


वर्तमान समय के षडरिपु

(लेखक-श्री अमरचन्दजी नाहटा)

प्राचीन ऋषियों ने काम-क्रोध आदि षडरिपुओं से बचने के लिए उपदेश दिये हैं और वह सर्वथा उचित ही है, परन्तु वर्तमान काल में हमारे यहाँ और ही छः बड़े प्रबल भूत पैदा हो गये हैं, जो प्राणियों को अपने जाल में जकड़ कर बड़ी भर्त्सना कर रहे हैं। इस लेख में उन्हीं का संक्षेप में परिचय कराया जा रहा है। आशा है विवेकीजन अपने कल्याण के लिये इनसे बचते रहने का प्रयत्न करेंगे एवं इनके अधीन मानवों को इन शत्रुओं का परिचय कराके उनसे अलग रहने को, जान-बूझकर उन्हें अपने से दूर भागने की सलाह देंगे। वे षडरिपु इस प्रकार हैं - (1) फूट, (2) सट्टा, (3) फैशन (4)नशा (5) मुकदमेबाजी और (6) व्यभिचार। अब इनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है -

1- शास्त्रों में कहा है-‘संघे शक्तिः कलौयुग‘ अर्थात् कलियुग में संगठन एक बड़ी भारी शक्ति है, पर हमारे भारत में इसका निताँत अभाव है और फूट का ही बोल-बोला है। जाति-जाति में तो क्या घर-घर में कलह का साम्राज्य है। धर्म, जो कि सबको एक सूत्र में बाँधने का परम साधन है, मत-मताँतरों में बंट कर फूट को और अधिक बढ़ा रहा है। पहले जमाने के ग्रन्थों को पढ़ कर ज्ञात होता है कि उस समय इतनी फूट नहीं थी एक दूसरे से हिल-मिल कर रहने की प्रथा थी। दलबंदियाँ होती थी, भाई-भाई, बेटे-बाप में वैमनस्य प्रायः नहीं था इसीलिए उस समय के लोगों में भाईचारा विस्तृत था। परोपकार की वृद्धि अधिक मात्रा में थी। व्यक्तिगत स्वार्थ की मात्रा कम होकर बड़े-बड़े विशाल परिवार प्रेम से रहते थे, पर आज फूट ने हमारा सर्वस्व लूट लिया है।

2- पहले के जमाने में परिश्रम प्रधान पुरुषार्थ आजीविका का साधन था, पर आज लट्टेबाजी ने लाखों मनुष्यों को आलसी एवं अपव्ययी बना डाला है। गाढ़े परिश्रम की कमाई खर्च करते समय भी बड़ा विचार होता था, पर अब तो ‘दो बायें, चार खायें, तेरह लगायें’ इत्यादि जबान की लयालय से ही धन बरसने लगा समझते हैं तब शरीर को कष्ट देने अथवा पूँजी लगाने की आवश्यकता ही क्या? आज प्रत्येक नगर में देखिये सट्टेबाजी का बाजार गरम है। सारे शरह में चहल-पहल, भीड़-भाड़, हो-हल्ला वहीं नजर आवेगा जहाँ सट्टा होता है। मर्दों की कौन कहे, अब तो कहीं-कहीं घर की औरतें तक चाँदी के पाट का आखरों और न जाने कितने प्रकार के सट्टे करने में प्रवीण बन जाती हैं और सट्टा कर रही हैं। सट्टे में धन आते देर नहीं लगती और परिश्रम भी कुछ नहीं होता, अतः वह धन आते ही पानी की तरह बेपरवाह खर्च किया जाता है। पर चले जाने पर दिवाला निकाल कर घर का घाटा बाजार में बाँट दिया जाता है। सट्टेबाजी में दुश्चिन्ता और अशान्ति हर समय बनी रहती है, इसी से स्वास्थ्य पर भी बड़ा बुरा असर पड़ता है। बुरी संगति मिलने से अनेकों दुर्गुण घर कर लेते हैं। जीभ की चाट इतनी बढ़ जाती है कि चलते फिरते स्वादिष्ट वस्तुओं पर चाहे वह स्वास्थ्य को नष्ट करने वाली क्यों न हो, परन्तु दो-चार रुपये रोज खर्च कर डालना साधारण सी बात हो गई है। लुच्चे लफंगे बाबू साहिब के ही जरिये बन गये। वे भी माल उड़ाते हैं तथा घर के बच्चों की आदत भी प्रारम्भ से ही बिगड़ जाती है। इस प्रकार जीवन की बड़ी भारी बरबादी इस सट्टेबाजी ने कर दी यह हम सबके प्रत्यक्ष है।

3- आधुनिक दूषित शिक्षा प्रणाली के कारण

फैशन का फितूर ही प्रायः सब पर सवार हो गया है। घर की स्थिति चाहे कैसी ही क्यों न हो, हमको तो फैशन देवी के प्रेरणानुसार अपव्यय करना ही पड़ता है। पहले जमाने के लोग पाँच-सात रुपया महीना कमा कर भी अपना जीवन संतोष एवं शान्ति से बिताते थे, पर आज सौ-दो सौ रुपया मासिक पाने वाले व्यक्तियों के सिर पर हर समय ऋण का बोझा लदा रहता है। इसका प्रधान कारण महंगाई के साथ अपव्यय भी है। पहले प्रायः सभी लोग साधारण रोगों का इलाज स्वयं घर में ही कर लेते थे, वह भी साधारण जड़ी-बूटी और घरेलू सुलभ पदार्थों से ही, पर आज थोड़ी सी ही किसी के गड़बड़ी हुई और दौड़े डॉक्टर साहब को लाये। फैशन वाले व्यक्तियों के द्रव्य का ही अपव्यय होता है। पुरानी परिपाटी के व्यक्ति अपने पूजा-पाठ करने में काफी समय लगाते थे, पर आज हमारे फैशन के गुलाम बाबू साहबों को पूजा-पाठ करने का अवकाश ही कहाँ से मिले। उठते ही बीड़ी-सिगरेट व चाय पीने में समय लगता है, साबुन लगाने, टूथ पाउडर को रगड़ने, केश सम्भारने और रोज नाई का काम करने में ही आफिस का समय हो जाता है। उठते भी तो सूर्योदय के पीछे हैं। हमारी देवियाँ भी वैसी ही हो चली हैं-उन्हें पति की कमाई की क्या चिन्ता, रोज नई-नई साड़ी लाओ, शौक का सामान मंगाओ, सिनेमा देखने ले जाओ बच्चों को दिखाने के लिए भी नौकर चाहिए। घर का काम-काज तो करे ही कौन? कहाँ तक लिखा जाय। हमारी आवश्यकताएं बहुत अधिक बढ़ गई हैं उनकी पूर्ति में ही सारा जीवन बरबाद कर रहे हैं नित्य नये फैशन ने खरचे का पार नहीं रखा।

4- आज सौ में नब्बे पुरुष नशे के शिकार हैं। किसी को बीड़ी-सिगरेट, चिलम के धुंए का नशा है, तो किसी का चाय बिना काम नहीं चलता। अफीम, भाँग, चरस, गाँजा और मदिरा का भी बोल-बाला है। हिसाब करके देखा जात तो एक-एक नशे के पीछे करोड़ों रुपये खराब होते हैं। और स्वास्थ्य की बरबादी तो निश्चित ही है। मैंने हजारों मजदूरी और दूसरे शुद्ध कर्म करके पेट भरने वाले गरीबों की ओर लक्ष्य किया तो उनकी बरबादी का पहला कारण नशा ही पाया। दिन भर गाढ़ा परिश्रम करके जो थोड़ा बहुत पैसा कमाया, पर शाम हुई और गाँजे का दम लगाने तथा शराब पीने में सारी कमाई समाप्त हो गई। उनकी आर्थिक दशा सुधरे तो कैसे? घर का दरिद्र दूर हो तो कैसे? बच्चे, स्त्री तो घर में भूखों मर रहे हैं, पर नशेबाज के लिए तो कहावत प्रसिद्ध है -

‘घर के जाने मर गया, आपके आनन्द’

सचमुच नशा मनुष्य का बड़ा भारी शत्रु है।

5- मुकदमेबाजी वर्तमान सभ्यता की देन है। आप कचहरी जाकर इसका मजा देखिये- गरीब, अमीर सबकी मन्दिर, मस्जिद। आज कचहरी है। साधारण तुच्छ बातों के पीछे हजारों लाखों रुपया स्वाहा हो रहा है। जिसको चस्का लग गया - बस अपना नहीं तो पराया ही सही, मामला चलाये बिना नींद आती। झूठी गवाहियाँ देते-देते सारी जिन्दगी बीती जाती है। झूठ के बिना मामला चलता भी तो नहीं। धर्म गंमाओं, धन का नाश करो और हैरान होवो। तीन-तीन मजे इस रिपु रोज में हैं। फिर छूटे भी तो कैसे? हमारी बुद्धि का यहाँ दिवाला निकल जाता है। पुराने जमाने में पंचायत द्वारा बहुत सी समस्याएं हल कर ली जाती थी मोहल्ले की बरबादी होती न प्रपंच बढ़ता।

6- व्यभिचार यद्यपि षडरिपुओं के अंतर्गत काम का ही, यह भेद है, पर आज इसके प्रचार एवं परिणति में बड़ा भेद हो गया है। परस्त्री गमन का इतना अधिक प्रसार पूर्व काल में नहीं था। ‘राम’ शब्द विषय भोग की लिप्सा (स्वस्त्री सम्बन्धी) में ही प्रायः सीमित था, पर आज का वातावरण तो इतना दूषित हो चला है कि कुछ कहते नहीं बनता। यदि यह पाप-प्रवाह जल्दी नहीं रुका तो सती स्त्री और स्वदार संतोषी ब्रह्मचारी पुरुषों का नाम केवल ग्रन्थों में रह जायेगा। शहरों में ही नहीं, अब इस रोग ने गांवों में भी अड्डा जमा लिया है। मुझे लिखने में संकोच होता है, और परिस्थिति भयंकर नजर आ रही है। पाठक स्वयं विचार लें, मुझे बड़ा परिताप होता है, जब मैं साधु, महन्त और त्यागी कहे जाने वाले लोगों को भी इसी कीचड़ में फंसा देखता हूँ, जिनके विषय में वासना को उत्तेजित करने वाले समस्त कारणों पर गम्भीर विचार कर समाज का उस ओर विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करने के उचित उपाय खोज निकालने और बचाव के तरीकों का प्रचार करने की बड़ी आवश्यकता है। होली धाँय-धाँय करती हुई जल रही है, वातावरण को पवित्र बनाने की ओर हम सभी को कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

आज तो खुलेआम व्यभिचार को बढ़ाने वाले साधनों का प्रचार हो रहा है। सिनेमा को ही लीजिए कितने गन्दे गाने इसके द्वारा प्रचलित हो रहे हैं इससे बच्चे स्त्रियों व पुरुषों को कितनी कुशिक्षाएं मिल रही हैं फिर भी सरकार द्वारा नित्य नये सिनेमा खोलने का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे गाढ़ी कमाई के पैसों का कितना अपव्यय होता है व बदले में कितनी कुत्सित वातावरण का विकास होता है। हमारे नेतागण जरा ध्यान से सोचें।

इसी प्रकार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों की ओर नजर डालिये कामोत्तेजक औषधियां आदि के विज्ञापनों की ही भरमार मिलेगी। कहीं भी देखिये वस्तुओं पर लेबल देखिये सुन्दरी स्त्रियों के चित्र मिलेंगे। कहीं-कहीं तो वे चित्र अर्द्धनग्न से देकर व्यभिचार के प्रति आकर्षित किया जा रहा है। देश की उन्नति के लिए हमारे इन अवनति के कारणों पर विचार कर इनके उन्मूलन के लिए सरकार की ही नहीं प्रत्येक विवेकी व्यक्ति को कटिबद्ध हो जाना चाहिये।


भोजन तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ उपयोगी नियम

(डॉ. लक्ष्मी नारायण टण्डन, ‘प्रेमी’ एम. डी.)

पाचन-शीलता में सहायक साधना निम्नलिखित बातों से सम्भव है :-

1- भोजन केवल दो बार करें। दिन में 9 से बारह तक तथा रात को 5 से 6 तक किसी समय। बंधे हुए समय पर ही भोजन करें। महात्मा गाँधी का यदि भोजन का समय टल जाता था तो वह उस समय उपवास कर डालते थे। पित्त के कारण भोजन खूब पचता है और पित्त का वेग रात के 2 बजे से 1 बजे दोपहर तक रहता है, इससे 12 बजे तक दिन में भोजन कर लें। रात को पित्त कम होता है अतः रात को हल्का भोजन करें। रात को रक्त का प्रवाह त्वचा की ओर होता है पेट की ओर नहीं।

2- स्वभाविक भूख लगने पर ही भोजन करें। नियमित समय पर खाने के अभ्यास से स्वाभाविक भूख लगेगी। बासी, बहुत ठण्डा, बहुत गरम भोजन न करें।

3- नाश्ता न करें। यदि करें ही तो दूध तथा फलों का रस आदि हल्की चीजों का ही।

4- भर पेट न खाएं। पेट से अधिक खाना तो रोगों का बुलाना है। आधा पेट खाएं, एक चौथाई पानी के लिए और एक चौथाई हवा के लिए रखें। पाचन-यन्त्र रबड़ के समान लचीले हैं। पेट से अधिक खाने से वे फैल जाते हैं इससे हानि होती है। एक बार अधिक खाने से अच्छा है कि थोड़ा-थोड़ा 3 बार खाएं। कम खाने से उतने लोग नहीं मरते जितने अधिक खाने से मरते हैं।

5-पेट में ठूँस-ठूँस कर भोजन भर लेने से ठीक से रसों को निगलने और मिलने में (भोजन में) असुविधा होती है। तथा आमाशय में जो एक प्रकार की हरकत स्वाभाविक रूप से होती रहती है इसमें भी बाधा पड़ती है। इसके अतिरिक्त भोजन पचाने में अत्यधिक प्राणशक्ति खर्च हो जाती है।

6- बहुत परिश्रम के बाद, थकावट की दशा में तथा चिन्ता, क्रोध, शोक, आदि की दशा में भोजन न करें। भोजन शान्त दशा में तथा स्वाभाविक अवस्था में करें। क्रोध-शोक के अवसरों पर हमने देखा है कि भूख मर जाती है।

7- रोगों के उभार में चोट आदि लगने, खाँसी सर्दी, बुखार, तबियत ढीली होने, जुकाम शुरू होने, डाक्टरों के मना करने पर भोजन न करें। स्त्री प्रसंग के बाद भी भोजन न करें।

8- तले व्यंजन, मिर्च-मसाले, पकवान आदि मिले पदार्थ, चाय, काफी आदि नशीली चीजें न खाएं।

9- खाते समय भावना करें कि इस भोजन से मेरे शरीर का पोषण हो रहा है। पोषक तत्व मेरे अन्दर जा रहे हैं। प्राण-तत्व जो भोजन में थे और जिन्हें मैंने चबा-चबाकर अलग कर दिये हैं मेरे स्वास्थ्य की वृद्धि कर रहे हैं। जल पीते समय भी ऐसी ही भावना करें तथा आत्म-संकेत करें। रूखा सूखा भोजन इस प्रकार बल और स्वास्थ्य देने वाला हो जाता है।

10- जब तक पहला भोजन भली भाँति पच न जाय, बीच में जल को छोड़ किसी प्रकार का भी हल्के से हल्का भोजन न करना चाहिये एक भोजन के 5-6 घण्टे तक दूसरा भोजन न करें। 3 घण्टे के पहले तो यदि पहले वाला भोजन हजम भी हो गया हो तब भी न खाएं।

11- जब तक भोजन पच न जाय तब तक कठिन शारीरिक परिश्रम या व्यायाम न करें।

12-भोजन करने के बाद आधे घण्टे तक तो कम से कम अवश्य ही विश्राम करें। भोजन करते ही कार्यारम्भ या पढ़ाई-लिखाई या शारीरिक श्रम से, पाचक प्रणाली और मस्तिष्क दोनों को बहुत हानि पहुँचेगी।

खाने के बाद पहले बाँई करवट, फिर दाहिनी करवट और फिर बाँई करवट लेट जाये। कहते हैं रात को भोजन के बाद विश्राम करके मील दो मील चलना बहुत लाभप्रद होता है।

13- दफ्तर, दुकान, स्कूल, कालेज तथा बाहर अधिक परिश्रम करने वाले, अच्छा हो, रात को ही मुख्य भोजन करें। दोपहर को पेट भर खाकर भोजन न करें।

14- सदा भोजन के साथ या बीच में फलाहार करें। थोड़ा-सा दूध भी यदि भोजन के साथ पियें तो लाभप्रद है। शाक का प्रयोग अधिक और साथ में करें। इससे पैखाना खुला सा होता और रक्त शुद्ध होता है।

15- रूखा-सूखा भोजन होने पर भी प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे तो शरीर में लगता है। अतः शुद्ध खुले स्थान में धुले साफ कपड़े पहन कर या नंगे बदन शान्त होकर भोजन करें।

16- भोजन न बहुत गरम खाएं न बहुत ठण्डा। बासी, बदबूदार, खुला। जिस पर मक्खी बैठती हो तथा गर्द आदि पड़ती हो भोजन न करें।

17- भोजन करके तुरन्त न सोवें। भोजन करने के कम से कम 3 घण्टे पश्चात् सोवें। अन्यथा खाना ठीक से हजम न होगा।

18- भोजन करने के आधे घण्टे पूर्व पानी पी लेने से भोजन ठीक से हजम होता है। भोजन के साथ तथा बाद में जल न पिएं। भोजन के कम से कम एक घण्टा बाद जल पिएं। भोजन के साथ तो अधिक रसादार तरकारी भी न खाना चाहिये भोजन और जल के एक साथ पेट में मौजूद होने से भोजन में ठीक से रस नहीं मिलने पाता।

19- भोजन खूब महीन दाँतों से पीस लें। जीभ और मुँह का भी प्रयोग करें ताकि लार खूब मिल जाय।

20- सोने के पूर्व एक गिलास पानी पी लें। सोकर उठने पर भी ताँबे के बर्तन में रखा आधा सेर जल कुल्ला करके पियें फिर 2 मिनट बाँई, 3 मिनट दाहिनी करवट तथा 4 मिनट सीधे लेट कर तुरंत पैखाने जाएं चाहे लगा हो या न लगा हो। ऐसा करने वाले सदा स्वस्थ रहते हैं और उनका पेट ठीक रहता है।

21- हमारी पाचन क्रिया स्वस्थ रहे। इसका ध्यान रखें। व्यायाम, प्राणायाम, टहलने आदि से पाचन-यन्त्र सशक्त और स्वस्थ रहते हैं।

22- भोजन स्वादिष्ट हो। इससे लार पर्याप्त मात्रा में निकलती है। किन्तु उपयोगिता के ऊपर स्वाद को प्रधानता न दी जाय। स्वाद के साथ ही सादगी भी भोजन में रहे। स्वाद से अधिक स्वास्थ्य का ध्यान रहे। उदाहरणार्थ पहले रोटी चबाइये और जब बिलकुल पिस जाय तब तरकारी खाएं। अन्यथा तरकारी के साथ रोटी का स्वाद बढ़ने पर रोटी जल्द ही आदमी निगल लेता है।

23- भोजनोपरान्त तेज चलना, शारीरिक परिश्रम, आग तापना, नहाना, सोना, मैथुन, पढ़ना, बहुत हँसना, गाना आदि वर्जित है।

24- भोजनोपरान्त पेशाब करने से अपने विषैले पदार्थ मूत्र के साथ निकल जाते हैं।

25- भोजन परिमित करे सूक्ष्म मात्रा में भोजन लें। हमारे शरीर को थोड़े ही, ठीक से किए हुए भोजन से, अपनी आवश्यकता के तत्व सुगमतापूर्वक मिल जाते हैं। परन्तु बहुत कम खाना भी हानिकारक है। बहुत कम खाने से पाचन-यन्त्र शरीर की चटनी आदि लेने लगते हैं।

26- आधे सेर नहीं तो पाव भर दूध रोज अवश्य ही आदमी को पीना चाहिये। बच्चों को दूध तो अवश्य ही पीना चाहिये।

27- भोजन के साथ में कुछ कच्चे शाक, तरकारी तथा फल अवश्य खाएं। फल सदा पहले खाये, फिर कच्चा शाक, फिर पकी तरकारी, फिर अन्न (यह अन्न और पकी तरकारी साथ) और तब सूखी मेवा।

प्रत्येक भोजन में कच्ची शाक भाजी और फल अवश्य हों। भोजन के बाद तुरन्त धूप में न लेटें।

28- भोजन के अतिरिक्त कुछ अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का पालन करना आवश्यक है। जैसे-व्यायाम, गहरी साँस, शुद्ध वायु, सूर्य की धूप, प्रकाश, संयम, ब्रह्मचर्य, नियमित जीवन, पंच तत्वों का आवश्यकतानुसार उचित प्रयोग।

यदि हम लोग भोजन का ध्यान रखेंगे तो भोजन हमारा ध्यान रखेगा। हम भोजनों का नहीं, जिह्वा का ध्यान रखते हैं अतः खाया-पीया भोजन भी हमारे शरीर में नहीं लगता। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन, स्वस्थ मस्तिष्क तथा स्वस्थ आत्मा का विकास होगा, यह हम सावधान होकर ध्यान रखें।


Quotation

मैं परमेश्वर से आठ सिद्धियों वाली उत्तम गति या मुक्ति नहीं चाहता, मैं केवल यही चाहता हूँ कि समस्त देहधारियों के अन्तःकरण में स्थित होकर उनमें कष्टों को भोगूँ जिससे उन्हें कष्ट न हो।

-राजा रन्तिदेव।

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लोभ, दीनता, भय और धन आदि किसी भी कारण से मैं अपना धर्म नहीं छोड़ सकता-यह मेरा दृढ़ निश्चय है। -भीष्म पितामह।

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सब जीवों में आत्म भावना रखने के कारण यदि समस्त गुणों के आधार अद्वितीय परमात्मा मुझ पर प्रसन्न हो तो (मुझे मारने की चेष्टा करने वाले ) ये ब्राह्मण (दुर्वासा जी) सन्ताप से छूट जाएं।

-भक्त अम्बरीष।

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तुम परमेश्वर और भोग दोनों की सेवा नहीं कर सकते, विषय न बटोरो, कल के लिए चिन्ता न करो कल अपनी चिन्ता आप करेगा।

महात्मा ईसामसीह।


गायत्री साधना का अधिकार

गायत्री मन्त्र का अधिकार केवल द्विजों का ही है। जिनका दूसरा जन्म नहीं हुआ है उनके लिए गायत्री व्यर्थ है। अनाधिकारी होने के कारण न तो उनका इस महान साधना में मन लगता है न विश्वास होता है और न वे तदनुकूल आचरण कर पाते हैं। आयुर्वेद पढ़ना हो तो आरम्भ में हिन्दी और संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है। अशिक्षित व्यक्ति आयुर्वेद कालेज में नाम लिखाने जाएं तो प्रिंसिपल को यही कहना पड़ेगा कि आपको प्रविष्ट नहीं किया जा सकता।

द्विजत्व का अर्थ है-दूसरा जन्म। एक जन्म माता-पिता से होता है। पशु-पक्षियों का जन्म भी इसी प्रकार होता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद मानव शरीर पाने पर भी उसमें पिछले पाशविक संस्कार ही प्रधान रहते हैं। पेट भरना, कामवासना, लोभ, स्वार्थ एवं अहंकार आदि की पाशविक वृत्तियों से प्रेरित होकर वह सोचता है, इच्छा करता है और कार्य प्रवृत्त होता है। यदि यही गतिविधि जारी रहे तो वह नर पशु ही बना रहता है।

पशुता की विचार धारा और कार्य प्रणाली से ऊँचा उठ कर मनुष्यता की जिम्मेदारियों को कन्धे पर लेना, मानवोचित इच्छाएं करना, विचार एवं कार्यों को अपनाना दूसरा जन्म है। पशु का आदर्श इन्द्रिय भोग और स्वार्थ है। मनुष्य का आदर्श आत्मोन्नति और परमार्थ हैं। पशु अपने लाभ के लिए दूसरों की हानि की परवाह नहीं करता मनुष्य दूसरे की सेवा के लिए अपने सुख और स्वार्थ का बलिदान कर देता है। शूद्र का तात्पर्य है-नर पशु। ऐसे व्यक्तियों को शास्त्रों में श्वान समान तिरस्कृत और बहिष्कृत किया है। गायत्री से भी उन्हें आत्मिक अयोग्यता के कारण ही वंचित रखा गया है।

पानी नीचे की ओर अपने आप बहता है। जितनी अधिक सिंचाई होगी उतना ही बहाव तेज होगा। पर यदि पानी को ऊपर की ओर, ऊँचाई की ओर बढ़ाना हो तो कितने ही कष्ट साध्य प्रयत्न करने पड़ते हैं। पशुता की ओर, पतन की ओर, भोग और स्वार्थ की ओर मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, इस प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करके धर्म की ओर, संयम की ओर, कल्याण की ओर, अग्रसर होने के लिए जो विशेष अवरोध करना पड़ता है उसका नाम है- द्विजत्व का वृत्त, यज्ञोपवीत संस्कार, गुरु दीक्षा।

पहला स्थूल जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से होता है। दूसरा सूक्ष्म जन्म माता गायत्री और पिता गुरु के संयोग से होता है। रोगी अपना इलाज अपने आप नहीं कर सकता, अपने दोषों को समझना, अपनी मानसिक स्थिति को तोलना और आत्मनिर्माण का कार्यक्रम बनाना इस महान योजना को बिना अनुभवी पथ-प्रदर्शक के पूरा नहीं किया जा सकता। जैसे सभी बीमारी की एक दवा नहीं दी जाती उनकी अपनी सूक्ष्म परिस्थितियों को समझ कर अनुभवी वैद्य पृथक-पृथक प्रकार की औषधियों और अनुमानों का विधान करता है ऐसे ही हर व्यक्ति की मिश्र मनोभूमि के अनुरूप ही आत्मोन्नति की योजना बनाई जाती है। यह कार्य दिव्यदर्शी, सूक्ष्म बुद्धि, स्वार्थ रहित, सदाचारी, ज्ञानवृद्ध महापुरुष ही कर सकते हैं। ऐसे ही लोगों को गुरु कहा जाता है। बगीचे का व्यवस्थित विकास करने के लिए ऐसे माली का संरक्षण आवश्यक है जो ठीक समय पर बोना, जोतना, खींचना एवं काट-छाँट करना जानता है। इस प्रकार की नियुक्ति हो जाने पर द्विजत्व का एक महत्वपूर्ण भाग पूरा हो जाता है।

गायत्री के चौबीस अक्षर जीवन की गतिविधि का निर्णय करने में कसौटी का काम देते हैं। प्रत्येक अक्षर एक-एक स्वर्ग शिक्षा का प्रतीक हैं। ‘ॐ’ की शिक्षा है कि सर्वत्र परमात्माओं को व्यापक समझ कर कहीं भी गुप्त या प्रकट रूप से बुराई न करो। ‘भू’ की शिक्षा है कि-अपने अन्दर सम्पूर्ण उत्थान पतन के हेतुओं को ढूंढ़ो। ‘भुवः’ का अर्थ है-कर्त्तव्य कर्म में तत्परता से प्रवृत्त रहो और फल के लालच में अधिक न उलझो। ‘स्वः’ का सन्देश है कि-स्थिर रहो, हर्ष शोक में उद्विग्न न बनो। ‘तत’का तात्पर्य है कि- इस शरीर के क्षणिक सुखों को ही सब कुछ मत समझो, जन्म जन्मान्तरों के स्थायी सुखों का महत्व समझो। ‘सवितुः’ का भावार्थ है- अपने को विद्या, बुद्धि, स्वास्थ्य, धन, यश, मैत्री, साहस आदि शक्तियों से अधिकाधिक सुसंपन्न करना। ‘वरेण्यं’ का संदेश है कि इस दुरंगी दुनिया में से केवल श्रेष्ठता का ही स्पर्श करो। ‘भर्गो’ का अर्थ है-शरीर, मन, मकान, वस्त्र तथा व्यवहार को स्वच्छ रखना। ‘देवस्य’ का अर्थ है- उदारता, दूरदर्शिता। ‘धीमहि’ अर्थात्- सद्गुण, उत्तम स्वभाव, दैवी संप्रदाय, उच्च विचार। ‘धियो’ का तात्पर्य है- किसी व्यक्ति, ग्रन्थ या सम्प्रदाय का अंधानुयायी न होकर विवेक के आधार पर केवल उचित को ही स्वीकार करना। ‘यो नः’ की शिक्षा है- संयम, तप, ज्ञान, सहिष्णुता, तितीक्षा, कठोर श्रम, मितव्ययिता, शक्तियों का संचय और सदुपयोग। ‘प्रचोदयात्’ अर्थात् प्रेरणा देना, गिरे हुओं को ऊँचा उठाना, उत्साहित करना, प्रफुल्लित, सन्तुष्ट एवं सेवा परायण रहना।

संपूर्ण वेद शास्त्रों में अनेक शिक्षायें अपने-अपने ढंग से दी गई हैं उन सब का सार भाग उपरोक्त पंक्तियों में आ गया है उतनी बातें भली प्रकार हृदयंगम कर ली जाएं तो समझ लीजिये कि चारों वेदों के पंडित हो गये। गायत्री के 24 अक्षरों में दिव्य जीवन की समस्त योजना, नीति, विचारधारा, कार्यप्रणाली सन्निहित है, इस पर चलने में व्यवहारिक सहयोग देना, पथ-प्रदर्शन करना, गुरु का काम है। इस प्रकार गायत्री माता और गुरु पिता द्वारा हमारे आदर्शवादी जीवन का जन्म होता है। यही द्विजत्व है।

यज्ञोपवीत में तीन लड़ें होती है प्रत्येक लड़ में तीन-तीन धागे होते हैं। जैसे देवताओं की मूर्ति पाषाण या धातुओं की होती हैं वैसे ही हर घड़ी छाती से लगाये रहने योग्य गायत्री की मूर्ति यज्ञोपवीत रूपी बनाई गई है। गायत्री में तीन पद और नौ शब्द हैं। यज्ञोपवीत में तीन लड़े और नौ सूत्र हैं। तीन व्याहृतियों की प्रतीक तीन ग्रंथियाँ हैं। ऊँकार ब्रह्म ग्रन्थ है। यज्ञोपवीत धारण करने का अर्थ है-“गायत्री से सन्निहित शिक्षाओं को जीवन व्यवहार में क्रियात्मक रूप से चरितार्थ करने का उत्तरदायित्व कन्धे पर उठाना।” इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने की प्रतिज्ञा लेना ही यज्ञोपवीत संस्कार या द्विजत्व में प्रवेश कहलाता है।

यज्ञोपवीत धारण का अर्थ उसी दिन इन सब गुणों से परिपूर्ण हो जाना एवं पुराने कुसंस्कारों से तत्क्षण मुक्त हो जाना नहीं है। यह पूर्ण सिद्धावस्था अन्तिम लक्ष्य है “हम सच्चे हृदय से गायत्री में निर्धारित जीवन नीति की उत्तमता को स्वीकार करेंगे।” इस प्रतिज्ञा के साथ द्विजत्व का आरम्भ होता है। जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कार एक दिन में नहीं छूट जाते वरन् उन्हें हटाने के लिए काफी लम्बा धर्मयुद्ध करना पड़ता है। कई बार हम कुसंस्कारों पर विजय पाते हैं कई बार कुसंस्कारों की जीत होती है। यह लड़ाई निरंतर जारी रहनी चाहिये। पाप एवं पतन के सामने कभी भी आत्मसमर्पण न करना चाहिये। उसके प्रति घृणा और प्रतिरोध का भाव सदा जारी रहे। कोई बुराई अपने में हो और छूट न पा रही हो तो भी उसे अपनी कमजोरी या भूल समझकर पश्चाताप ही करें और उससे छुटकारा पाने के लिए यथा शक्ति प्रयत्न जारी रखें। बुराई को भलाई के रूप में स्वीकार करना, उसका समर्थन करना, उसका विरोध छोड़ देना, उसमें रस लेना यह शूद्रत्व का चिन्ह है। हम पाप के प्रतिरोध में अपनी अन्तःचेतना को समक्ष रखें तो हम द्विजत्व की प्रतिज्ञा पर दृढ़ कहे जा सकते हैं। चाहे पूर्ण शुद्ध होने में, पूर्ण सफलता मिलने में, पूर्ण विजय प्राप्त होने में, कितनी ही देर क्यों न लग जाय।

पशुत्व का विरोध और मनुष्यता का समर्थन करने की प्रतिज्ञा लेना, द्विजत्व का व्रत स्वीकार करना आत्मोन्नति का सर्वप्रथम एवं अत्यन्त आवश्यक धर्म कृत्य है। इसे करने के उपरान्त आदर्शवाद के अनुयायियों में अपनी गणना करा लेने के पश्चात् ही हमें वह अधिकार मिलता है कि गायत्री साधना द्वारा देवी शक्तियों को प्राप्त करें। अनाधिकारी व्यक्ति किसी प्रकार उसे प्राप्त भी कर लें तो उसका दुरुपयोग ही करेंगे इसलिए शास्त्रकारों ने प्रतिज्ञा हीन, व्रत हीन, यज्ञोपवीत हीन व्यक्तियों को शूद्र संज्ञा देकर गायत्री का अनाधिकारी ठहरा दिया है। यह प्रतिबन्ध सर्वथा उचित एवं दूरदर्शितापूर्ण ही हैं।

जन्म से हर मनुष्य शूद्र होता है। कर्म से, संस्कार से वह द्विज बनता है। हम में से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपनी जन्मजात शूद्रता का परित्याग करके सन्मार्ग गमन रूपी द्विजत्व की प्रतिज्ञा लें इस प्रतिज्ञा के साथ-साथ की हुई गायत्री साधना ही सफल हो सकती है।


चाय के बदले आप यह पी सकते हैं।

(श्री ना. वि. आठवके)

सर्वोत्तम पौष्टिक पेय गाय का धारोष्णा दूध ही हो सकता है। किन्तु आज-कल उसका मिल सकना सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है, अतएव उसके बदले यदि भैंस का दूध भी काम में लाया जाये तो चल सकता है। दूध को अच्छी तरह गर्म कर शकर मिलाने के बाद कुछ ठंडा कर लिया जाये, जिन्हें खालिस दूध पचता न हो, वे उसमें चुटकी भर सोंठ का चूर्ण मिलाकर चाय की तरह घूँट-घूँट पी सकते हैं, जिससे कि वह लार के साथ मिलकर भली भाँति पच सके।

जिन्हें दूध बिलकुल ही नहीं पचता हो, वे कप भर गर्म पानी में आधा कागजी नींबू का रस निचोड़ कर उसमें छोटे दो चम्मच भर शहद मिला कर सवेरे 6 बजे या शाम को 6 बजे प्रतिदिन नियम से पी सकते हैं। केवल नींबू कभी न चूसा जाय। ग्रीष्म ऋतु में ठण्डा और शीतकाल में गर्म पानी लेना चाहिये। इस पेय से पेट के रोग, जन्तु नष्ट हो जाते हैं और दस्त साफ होता है।

(1) नाचणी (नागली) एक प्रकार का जंगली अनाज होता है उसका सत् निकाल कर प्रतिदिन सवेरे आधे पाव पानी में एक चम्मच भर सत्व मिलाकर पकाया जाय इसके बाद उसी आधा पाव दूध और शक्कर मिलाकर लपसी तैयार कर ली जाय यह पेय भी दूध के समान पौष्टिक एवं छोटे से लेकर बड़े तक सबके लिए उपयोगी है। इसमें चाय, कॉफी, कोको, ओव्हलटीन आदि की अपेक्षा बहुत ही कम खर्च पड़ता है। मैं प्रतिदिन अपने बच्चों के साथ सवेरे यही पेय सेवन करता हूँ।

(2) चणक रस- अंजली भर, अच्छे चने आधे सेर पानी में रात को भिगो दिये जाएं और सवेरे उसी पानी के साथ उन्हें पकाया जाय। इसके बाद जब पाव भर पानी रह जाय तब उसमें जीरा, पिसी हुई कालीमिर्च, नमक, हल्दी डाल कर फिर थोड़ी देर उबाल कर घी से छोंक दें। इसके बाद छान कर उस पानी को पियो। यह चणकरस गर्म या ठण्डा जैसी इच्छा हो, पिया जा सकता है। एक दम न पीकर थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिये। बीमार आदमी आधी कटोरी तथा अन्य व्यक्ति जितना भी पचा सकें उतने परिमाण में पी सकते हैं। यह रस पौष्टिक, स्वादिष्ट, पाचक और कब्जियत दूर करता है। शक्ति बढ़ा कर स्नायुओं को बलवान बनाता है। इसमें खर्च भी बहुत कम होता है इसलिए गरीब तो अवश्य ही इसका उपयोग करें।

(3) यवरस-गर्मी के दिनों में जौ (यव) का रस बहुत उत्तम होता है। रात को अंजली भर अच्छे साफ किये हुए जौ तीन पाव पानी में भिगो कर ऊपर से ढक दिया जाये। सवेरे उसी पानी में उन्हें उबाला जाये। जब डेढ़ पाव पानी रह जाय, तो वह उत्तम गुलाबी रंग का पेय छान कर ठण्डा करके पिया जाय। उसमें स्वाद के लिए थोड़ी सी शक्कर या नमक मिलाकर चणकरस की तरह थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिए। यह रस भी सबके लिए उपयोग किया जा सकता है। कम खर्च भी है।

(4) छाछ या मट्ठा- गैस उत्पन्न करने वाले जन्तुओं पर छाछ या दही बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है। ताजी छाछ केवल बीस मिनट में पच जाती है। इतनी शीघ्रता से पचने वाला दूसरा पदार्थ नहीं हो सकता। दूध के पचने में बहुत देर लगती है। छाछ से रुधिराभिसरण (खून का दौरान) अच्छा होने लगता है। छाछ में सादे नमक के बदले सेंधा नमक मिलना चाहिए। छाछ ताजी और मीठी होनी चाहिए। यह कब्जियत पर बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई हैं। भैंस की छाछ कुछ भारी होती है। इसलिए उसमें सोंठ, कालीमिर्च, पीपल का चूर्ण तथा सेंधा नमक मिलाना चाहिए। केवल दही को बिलोकर नहीं पीना चाहिये, वरन् उसमें पर्याप्त पानी मिलाना चाहिये और प्याले भर छाछ में चुटकी भर जीरे का चूर्ण तथा थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाना चाहिए। यह शक्ति-वर्धक पेय है। छाछ पीने के बाद पानी से कुल्ला करना चाहिये जिससे दाँतों को हानि न पहुँच सके। व्यायाम करने वाले लड़कों को दूध के बदले छाछ पिलाते हैं। भोजन के अन्त में भी कटोरी भर छाछ अवश्य पीना चाहिए जिससे भली भाँति अन्न का पाचन हो सके।

(5) गन्ने का रस- गन्ने या ईख के ताजे रस में लौह, ताम्र, फास्फोरस रहने के कारण वह एक उत्तम पौष्टिक पेय है, इससे रक्त वृद्धि होती है और इसकी बिना दाने की राव (काकब) शक्कर से अधिक उपयोगी है। उसमें भी लोहा है।

(6) धान की खीलें- बीमार आदमी के लिए अदहन के (उबलते हुए) पानी में अंजली भर धान की बढ़िया खीलें (लाई या धानी) डालकर 15 मिनट के बाद उस पानी को छान लिया जाय। वही थोड़ा-थोड़ा करके बीमार आदमी को देना चाहिए। इसका उपयोग पाचक एवं हल्लक आधार के रूप में हो सकता है।

(7) प्रो. राममूर्ति की ठंडाई - 10 बादाम 2 छोटी इलायची, 5 कालीमिर्च, 3 माशे घनिया इन सब चीजों को रात को भिगो दिया जाय, सवेरे बादाम छीलकर सब चीजों को पत्थर पर पीस कर उसमें पाव भर पानी मिला कर कपड़े से उस ठंडाई को छान लिया जाय। उसमें 2 तोला मिश्री मिलाकर व्यायाम के घंटे भर बाद पीना चाहिए। गर्मी के मौसम में यह ठंडाई रोज पी सकते हैं।

बड़े सौंफ का पेय- बड़ी सौंफ, पाचक, अग्निदीपक, और कफ, वायु, ज्वर, शूल, दाह तृषा, उल्टी (वमन), अतिसार आदि का नाश करती है। इसलिए घी में भून कर थोड़ा सा कूट लेने के बाद वह सोंफ का कढ़ा दूध व शक्कर मिला कर पीने से भी कोई हानि नहीं होती। यह लाभप्रद एवं चाय की तलब को मिटाने वाला है।

महात्मा गाँधी का पेय- जो कि एक प्रकार की कॉफी ही कही जा सकती है। अर्थात् अच्छे गेहूँ तवे पर लाल सुर्ख होने तक घी में भूने जायें, इसके बाद उन्हें कूट कर डिब्बे में भर रख लिया जाय। इसकी कॉफी बना कर पीने से वह स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्टिक भी होगी।


महात्मा शेख सादी की सूक्तियाँ

(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’, बेतिया)

चरित्र-हीन मूर्ख-चरित्र-हीन विद्वान् से अच्छा है, क्योंकि मूर्ख तो अन्धा होने के कारण पथभ्रष्ट हुआ, पर विद्वान् दो आँखें रखते हुए भी कुएं में गिरा।

*** *** ***

अपने पड़ौसी भिक्षुक से आग मत माँग, उसकी चिमनी से जो धुँआ तू निकलता देखता है, वह लौकिक आग का नहीं बल्कि उसके हृदय में सुलगी हुई दुख की आग का है।

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यदि तेरा मृत्यु-समय उपस्थित नहीं हुआ है तो शेर या चीते के मुँह में पहुँच कर भी तू जिन्दा रह सकता है।

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जो दूसरे को देखकर जलता है, उस पर जलने की जरूरत नहीं, क्योंकि दाह-रूपी शत्रु उसके पीछे लग रहा है। उससे शत्रुता करने की हमें फिर क्या जरूरत है।

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कठोर और मूर्ख मधुमक्खी से कह दो कि जो तू शहद नहीं देती तो डंक भी मत मार।

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जिसने लोगों को धोखा देने के लिए सफेद कपड़े पहिने हैं, उसने अपना भाग्य काला किया है। साँसारिक विषयों से हाथ को रोकना चाहिये। आस्तीन छोटी हो या बड़ी एक ही बात है।

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अपने परिश्रम से जुटाया हुआ अन्न सिर का और साग-रोटी से अच्छा है जो गाँव के सरदार ने दी है।

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विद्वान् की मूर्खों में वही दशा होती है जो किसी सुन्दरी की अन्धों में और धर्म-पुस्तक की नास्तिकों में।

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पत्थर सैकड़ों वर्षों में कहीं लाल बन पाता है उसे एक क्षण में पत्थर से नहीं तोड़ डालना चाहिये।

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बुद्धि आत्मा के इस प्रकार अधीन है, जिस तरह कोई भोला पुरुष किसी चालाक स्त्री के वश में।

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जो साधु ईश्वर के लिए एकाँत-वास नहीं करता, उसका एकान्त-वास धुँधले शीशे की तरह है जिसमें कुछ दिखाई नहीं देता।

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यदि एक बेकार पत्थर सोने के मूल्यवान प्याले को तोड़ दे तो पत्थर मूल्यवान और सोना मूल्यहीन नहीं हो सकता।

*** *** ***

जबर्दस्त के साथ लड़ाई मत ठानो। जबर्दस्त के सामने अपने हाथ बगल में दबा लो।

*** *** ***

किसी आदमी की विद्या बुद्धि का हाल तुम एक दिन में भले ही मालूम कर लो, पर उसके मानसिक दोषों का पता तुम्हें वर्षों तक नहीं चल सकता। इसलिए किसी की विद्या आदि पर मोहित होकर उस पर एक साथ विश्वास मत करो।

*** *** ***

मैं न राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ग चाहता हूँ, और न मोक्ष ही चाहता हूँ। मैं दुःखी पीड़ित प्राणियों के दुःख का नाश चाहता हूँ।


मानव में जीवन के दो क्षण!!


मानव में जीवन के दो क्षण (kavita)

(1)

मानव! ये जीवन के दो क्षण!

आतप में, उल्कापातों में,

निष्ठुर जग के उत्पातों में,

शलों के अंचल में सुस्मित,

प्रलयंकर झंझावातों में।

तुम करो मोद-मधु का वितरण,

सुरभित हो वसुधा का कण-कण !

मानव! ये जीवन के दो क्षण !

(2)

तिल-तिल कर जलती रहे सदा,

प्राणों की स्नेह भरी बाती,

यह जलन अमर वरदान बने,

परहित हो जीवन की थाती।

तुम करो मुदित मन मृत्यु वरण,

जगमगा उठे जग का प्राँगण !

मानव ! ये जीवन के दो क्षण !

(3)

हो सत्य तुम्हारा चिर सहचर,

हो हार तुम्हारी जय-माला।

लोचन-जल निश्छल बह-बह कर,

शीतल कर प्राणों की ज्वालों।

क्या शरण? बनो तुम स्वयं शरण,

हों प्रगतिमनन निर्भीक चरण।

मानव ! ये जीवन के दो क्षण !

*समाप्त*

(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, बी. ए. साहित्य रत्न)