गायत्री महाविज्ञान के पाँच अनुपम ग्रन्थ रत्न।

गायत्री मन्त्र भारतीय धर्म की आत्मा है, जड़ है। हिन्दु धर्म गंगा है तो उसका उद्गम स्त्रोत-गंगोत्री-गायत्री में है। गायत्री से चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार श्रुति, स्मृति, उपनिषद्, शास्त्र, पुराण, दर्शन आदि में जो ज्ञान का भण्डार भरा हुआ है वह सब गायत्री के छोटे से अक्षरों में मौजूद है। इसीलिए गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मन्त्र माना गया है, और उसकी नित्य उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।

गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी देने के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि-गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया हो जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दस वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्व-साधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है।

(1) गायत्री विज्ञान-

गायत्री शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन तथा परिचय, गायत्री की सरल, सुबोध एवं नित्य करने योग्य साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)

(2) गायत्री रहस्य-

गायत्री मन्त्र के एक-एक अक्षर में ज्ञान का आगाध समुद्र भरा हुआ है। इन चौबीस अक्षरों में ऐसी विस्तृत व्याख्या, विवेचना एवं मीमाँसा की गई है कि उनके गर्भ में छिपे हुए ज्ञान भंडार व परिचय भली प्रकार प्राप्त हो जाते हैं। अनेकों ऋषियों ने, शास्त्रों ने, वेद भाष्यकारों ने, दक्ष राज रावण ने गायत्री के जो विभिन्न अर्थ किए हैं। वे सब भी इस किये है वे सब भी इस पुस्तक में मौजूद हैं। ‘गायत्री रामायण’ भी पुस्तक में संकलित है। (मूल्य 2)

(3) गायत्री के अनुभव-

वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में वर्णित गायत्री की महिमा तथा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के महापुरुषों ने गायत्री के संबंध में जो अपने अनुभव और अभिमत प्रकट किए हैं उन सबका इस पुस्तक में वर्णन है। साथ ही अनेक साधकों ने गायत्री की उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किए हैं, उनके स्वयं बताए हुए वर्णन भी दिये गए हैं। (मूल्य 2)

(4) गायत्री तन्त्र-

गायत्री तन्त्र को ‘मन्त्र राज’ कहा है। उससे बड़ा कोई मन्त्र नहीं है। जो कार्य संसार के अन्य किसी भी मन्त्र से हो सकता है वह गायत्री मंत्र से भी हो सकता है। इस पुस्तक में दक्षिणमार्गी वेदोक्त, तथा वाममार्गी तंत्रोक्त दोनों प्रकार की विधियाँ बताई गई हैं जिसके द्वारा सात्विक, राजस और तामसिक तीनों ही प्रकार के लाभ उठाए जा सकते हैं। पुरश्चरण, अभिचार, कवच कीलक, मारणा, सम्मोहन आदि सभी साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है। (मूल्य 2)

(5) गायत्री योग-

गायत्री द्वारा 12 योगों की साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यानयोग, सूर्ययोग, प्राणयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नादयोग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग। इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना-विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)


Quotation

पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ । व्यवस्थापक-‘अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


बन्धन में मुक्ति।


बन्धन में मुक्ति

(श्रीमती शान्ति एम. ए.)

मुक्ति आज बन्धन में, मुझको, मुक्ति आज बन्धन में!

मेरे नारी सुलभ हृदय को नहीं किसी ने बाँधा,

मैंने थक कर व्यापकता से सीमा का वृत साधा,

अन्तर्यामी निहित हो गया मेरे छोटे मन में!

मुक्ति आज बन्धन में, मुझको, मुक्ति आज बन्धन में!

बन्धन में ही स्वतंत्रता की विजय-श्री मिलती है,

श्वासों के पिंजड़े में कोमल काव्य कली खिलती है,

मुझको शाश्वत शाँति मिल गई अपने ही रोदन में!

मुक्ति आज बन्धन में, मुझको, मुक्ति आज बन्धन में!

मैं तो जानी नहीं कभी भी निराकार की माया,

मैं तो समझी यही कि तुम हो प्राण और मैं काया,

स्वयं पूज्य बन गई पूज्य के पुराण चरन पूजन में!

मुक्ति आज बन्धन में, मुझको, मुक्ति आज बन्धन में!


गायत्री में प्रणव और व्याहृतियों का हेतु।

भूर्भुवः स्वस्त्रयोलोका व्याप्तमोम्त्रह्मेतेषुहि।

स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥

-गायत्री स्मृति

अर्थ- भूः भुवः और स्वः ये तीन लोक हैं।

इन तीनों लोकों में ॐ ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस व्यापकता को जानता है वह ही वास्तव में ज्ञानी है।

यह विश्व तीन मार्गों में विभक्त है प्रत्येक विभाग को लोक कहते हैं। भूःलोक, भुवःलोक, स्वः लोक यह तीनों प्रसिद्ध हैं। मोटे तौर से इन्हें आकाश पृथ्वी और पाताल कहा जाता है। आध्यात्मिक भाषा में इन्हें साँसारिक, शारीरिक और आत्मिक क्षेत्र कहा जाता है। इन तीनों क्षेत्रों में ॐ नाम वाला परमात्मा समाया हुआ है। यह तीनों ही प्रभुमय हैं। यह संदेश गायत्री मन्त्र के आरम्भ में प्रयुक्त होने वाले प्रणव और व्याहृतियों में सन्निहित है।

गायत्री मन्त्र का सर्वप्रथम प्रारंभिक संदेश यह है कि विश्व के जीवन के तीनों भागों में परमपवित्र महा मानवता का, ईश्वरीय दिव्यता का अस्तित्व स्वीकार करें। गीता के 11 वें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया था। रामायण में भगवान राम ने अपने जन्म काल में कौशल्या को विराट् रूप दिखाया था, उत्तरकाण्ड में काकभुसुंडिजी के संबंध में वर्णन है कि वे भगवान के मुख में चले गए तो उन्होंने वहाँ सारे ब्रह्माण्डों को देखा। मिट्टी खाते समय माता के अनुशासन करने पर भी भगवान ने अपना मुँह खोल कर अपने अन्दर विश्व ब्रह्माण्डों को दिखाया था। इस विराट् रूप की भावना प्रत्येक द्विज के-मनुष्यता का उत्तर दायित्व समझने वाले व्यक्ति के-अन्तःकरण में बिठा देना गायत्री का प्रथम उद्देश्य है।

भगवान के इस विराट् रूप को देखना हर किसी के लिए संभव है। अखिल विश्व ब्रह्माण्ड को परमात्मा की विशालकाय मूर्ति समझना और उसके अंग प्रत्यंगों के रूप में समस्त पदार्थों को देखने की भावना ही विराट् रूप का दर्शन है। चर्म चक्षुओं से इस प्रकार के दर्शन किसी के लिए भी संभव नहीं, अर्जुन के लिए भी संभव नहीं थे इसलिए भगवान ने “दिव्यं ददामि ते चक्षुम्” दिव्य चक्षु, दिव्य दृष्टि, दिव्य भावना देकर इस रूप का दर्शन होना संभव किया था।

आकाश, पाताल पृथ्वी से-ऊपर, नीचे, बीच में-सर्वत्र-परमात्मा की दिव्य ज्योति जल रही है, सर्वत्र वह परम प्रभु समाया हुआ है। प्रत्येक अणु परमाणु उसकी सत्ता से परिपूर्ण है, इस महासत्य को जब हम अपनी दिव्य कल्पना के आधार पर हृदय क्षेत्र में प्रतिष्ठित करते हैं तब वह क्षण विराट् दर्शन के ही होते हैं। यह अनुभूति जितनी अधिक तीव्र प्रत्यक्ष, निश्चित और श्रद्धामय होगी, उसी अनुपात से भगवान के विराट रूप के दर्शन का आनन्द मिलेगा। और अर्जुन, कौशल्या, यशोदा, काकभुसुँडि की तरह उस दर्शन का अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त होगा।

भारतीय संस्कृति का मूल ईश्वर विश्वास है। भारतीय दर्शन का आरम्भ ईश्वरवाद को लेकर होता है। भारतीय जीवन में सर्वप्रथम ईश्वर का स्थान है। यही उसकी आत्मिक विचार धाराओं और परम्पराओं का मूल्य स्त्रोत है। यदि इस ईश्वरीय तथ्य को उसमें से पृथक कर दिया जाए तो फिर उसकी सारी महत्ता ही हतप्रभ हो जाती है।

संसार को जड़ प्रकृति की रचना, ईश्वर रहित मानने से उसे भोग्य समझने की, अपने लाभ के लिए मनमाना उपयोग करने की इच्छा होती है जैसा कि आम लोगों का ख्याल है कि संसार की सभी वस्तुएं मनुष्य के लाभ या उपयोग के लिए बनाई गई हैं। इस भौतिक दृष्टिकोण को अपनाकर मनुष्य जाति ने अन्य प्राणियों पर भारी अत्याचार, शोषण और बलात्कार किया है। पदार्थों का दुरुपयोग किया है। वस्तुओं को जोड़-जोड़ कर उनका संचय करके परिग्रह का पाप कमाया और सम्पत्तिवान बनने के लोभ में असंख्य अल्पशक्ति वालों को, अभाव-ग्रस्त एवं निर्धन रहने का दुख सहने को विवश किया। अनीश्वरवादी भौतिक दृष्टिकोण स्वभावतः पदार्थों का मनमाना उपयोग करके अपनी संतुष्टि की इच्छा पैदा करता है। इसके विपरीत प्रत्येक जड़-चेतन पदार्थों में, प्रत्येक परमाणु में तीनों लोकों में भूः र्भुः स्वः में, सर्वत्र ॐ को परमात्मा को व्याप्त देखने से दूसरे ही दृष्टिकोण की उत्पत्ति होती है।

प्रत्येक वस्तु में विश्वव्यापी, आत्मा का परमात्मा का, सच्चिदानन्द शक्ति का दर्शन करना सब प्राणियों और पदार्थों में परमात्मा की झाँकी करना एक ऐसी आत्मिक विचार पद्धति है जिसके द्वारा विचार करने पर विश्व सेवा की, लोक सुरक्षा की, विश्व व्यवस्था की भावना पैदा होती है। ईश्वर सब प्राणियों में समाया हुआ है इसलिए प्रभु की चलती फिरती इन प्रतिमाओं को स्वस्थ, सुन्दर और सुखी रखने के लिए अपने प्रयत्न होने चाहिएं। संसार के पदार्थों धन सम्पदाओं, प्रकृति, वैभवों में ईश्वर का निवास है इसलिए इनको दैवी अमानत समझ कर अपने लिए न्यूनतम भाग उपयोग करना और शेष को सर्वोपयोगी, सुन्दर एवं सुविकसित बना रहने देना उचित है। इस प्रकार विश्व में भूः भुवः स्वः में, आत्मा की, परमात्मा की झाँकी करने से संसार के प्रति एक श्रद्धामय भावना उत्पन्न होती है जिसके कारण अपने भोग के लिए संसार का मनमाना उपयोग करने की इच्छा हटती है और उसके स्थान पर विश्व को अधिक सुगम्य, समृद्ध एवं सुख-शाँतिमय बनाने में अपने आपका उत्सर्ग करने की भावना पैदा होती है। कहना न होगा कि भोगवादी विचारधारा ही व्यक्तियों, और समुदायों में क्लेश, पाप और संघर्ष उत्पन्न करती है। इसके विपरीत विश्व को परमात्मा की दिव्यमूर्ति मान कर उसके आगे आत्म-समर्पण करने की त्यागमयी आध्यात्मिक मनोवृत्ति विश्व में सुख शान्ति की, प्रेम, एकता, सेवा-सहानुभूति, संयम, उदारता, भ्रातृ भावना आदि की अभिवृद्धि करती है।

मनुष्य की पशुता पर, पाशविक मनोवृत्तियों पर अंकुश रखना और उनके स्थान पर दैवी सद्वृत्तियों का, महान मानवता का विकास करना आध्यात्मवाद का प्रधान लक्ष्य है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए भगवान के विश्वव्यापी विराट् रूप की मान्यता भारतीय धर्म शास्त्रों में है। पौराणिक उपाख्यानों में अर्जुन, यशोदा, कौशल्या, काकभुसुण्डि आदि के उस विराट् रूप का घटनात्मक वर्णन किया गया है। गायत्री मन्त्र के प्रारम्भ में ‘ ॐ भूः भुर्वः स्वः’ इसी उद्देश्य से है। इस व्याहृति भाग का संदेश यह है कि हम निखिल विश्वब्रह्माण्ड में विश्वात्मा को, परमात्मा को समाया हुआ अनुभव करें और प्रभु की इस सुगम्य वाटिका के किसी भी कण का अपव्यय या दुरुपयोग अपनी पाशविक वृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए न करें।

प्रत्येक पदार्थ में परमात्मा की सत्ता समाई हुई देखने की, ॐ में भूर्भुवः स्वः ओत प्रोत अनुभव करने की, शिक्षा गायत्री ने इसलिए दी है कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त मनुष्य के अन्तःकरण में जिन अनेकों पाशविक वृत्तियों की, नीच संस्कारों की प्रधानता होती है उनको चोरी चोरी चरितार्थ करने का अवसर न मिले। मनुष्य उस स्थिति में पाप करता है जब वह देखता है कि मेरे पाप कर्म गुप्त रहेंगे या उनके दण्डों से मैं बच जाऊंगा। यदि उसे यह विश्वास दृढ़ हो जाए कि भगवान जर्रे जर्रे में समाया हुआ है, हर जगह मौजूद है तो पापकर्म करने का साहस ही नहीं हो सकता। ऐसा कौन सा चोर है जो सावधान खड़ी हुई सशस्त्र पुलिस के सामने चोरी, करने का साहस करे। चोरी व्यभिचार, ठग, धूर्तता, दंभ, असत्य, हिंसा आदि के लिए आड़ की, पर्दे की, दुराव की, जरूरत पड़ती है। जहाँ मौका होता है, इन बुरे कामों को पकड़ने वाला नहीं होता, वहीं इनका किया जाना संभव है। जहाँ धूर्तता को भली प्रकार समझने वाली, देखने वाली, पकड़ने वाली, मजबूत ताकत सामने खड़ी होती है वहाँ पाप कर्मों का हो सकना संभव नहीं। इसी प्रकार जो इस बात पर सच्चे मन से विश्वास करता है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है वह किसी भी दुष्कर्म को करने का साहस नहीं कर सकता।

बुरे काम करने वाला पहले यह भी भली प्रकार देखता है कि मुझे देखने या पकड़ने वाला तो कोई यहाँ नहीं है, जब वह भली भाँति यह विश्वास कर लेता है कि उसका पाप कर्म किसी की दृष्टि या पकड़ में नहीं आ रहा है तभी वह अपने काम में हाथ डालता है। इस प्रकार जो व्यक्ति अपने को परमात्मा की दृष्टि या पकड़ से बाहर मानते हैं वे ही दुष्कर्म करने को उद्यत हो सकते हैं। पापकर्म करने का स्पष्ट अर्थ यह है कि यह व्यक्ति ईश्वर को मानने का दंभ भले ही करता हो पर वास्तव में परमात्मा के अस्तित्व से इनकार करता है। उसके मन को इस बात पर भरोसा नहीं है कि परमात्मा यहाँ मौजूद है। यदि विश्वास होता तो इतने बड़े हाकिम के सामने किस प्रकार उसके कानूनों को तोड़ने का साहस करता? जो व्यक्ति एक पुलिस के चपरासी को देखकर भय से थर-थर काँपा करते हैं वे इतने दुस्साहसी नहीं हो सकते कि सृष्टि के सर्वोच्च अफसर की आँखों के आगे, न करने योग्य काम करें, उसके कानून तोड़ें, उसको क्रुद्ध बनावें, उसकी अवज्ञा करें। ऐसा दुस्साहस तो वही कर सकता है जो यह समझता है कि परमात्मा कहने-सुनने भर की चीज है। वह पोथी-पत्रों में, मन्दिर-मठों में, नदी-तालाबों में या स्वर्ग नरक में भले ही रहता हो पर हर जगह मौजूद नहीं है।

गायत्री में सर्वप्रथम प्रणव और व्याहृतियों (ॐ भूर्भुवः स्वः) का आयोजन इसी लिए किया गया है कि मानव हृदय में गहराई तक यह भावना जागृत हो जाए कि सर्वत्र परमात्मा व्याप्त है। प्रत्येक पदार्थ विश्वात्मा से परिपूर्ण है। कोई भी बुराई, भलाई जो उसके मन में आती है विश्वात्मा की जानकारी में तत्क्षण आ जाती है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति यह जान जाता है कि अमुक व्यक्ति के आन्तरिक भाव क्या हैं। किसी को मायाचार प्रलोभन या धोखे से कुछ समय के लिए भ्रम में भले ही डाल दिया जाए पर आध्यात्म विज्ञान की सुनिश्चित प्रणाली के अनुसार हमारी गुप्त भलाइयाँ और बुराइयाँ प्रत्येक जड़ चेतन पदार्थ के अन्तराल में निवास करने वाली विश्वव्यापी आत्मा में सर्वत्र फैल जाती हैं तद्नुसार उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप विश्व ब्रह्माण्ड की भाव लहरी कुँए की आवाज की तरह हमारे लिए लौट पड़ती है। चोर का, व्यभिचारी का, ठग का, कलेजा अपने आप बिना किसी कारण के धक् धक् करता रहता है, अनायास ही उसके मन में तरह-तरह के भय, संदेह, पश्चाताप उठते रहते हैं। यह सब क्या है? यह उस मनुष्य की गुप्त बुराइयों की प्रतिध्वनि है जो विश्व आत्मा से टकरा कर कुँए की आवाज की तरह वापिस लौटती है। दर्पणों से बने हुए महल में बन्द हुआ कुत्ता जैसे चारों ओर अपने जैसे असंख्य कुत्ते घूमते देखता है अपने भौंकने का प्रत्युत्तर असंख्य मुखों से सुनकर डरता और घबराता है। वैसे हो पापी मनुष्य भी सर्वत्र व्याप्त विश्वात्मा से टकराकर लौटी हुई अपनी अनुचित मनोवाँछाओं की भयंकरता से अपने आप पीड़ित, प्रस्त और आत्म-प्रताड़ित होता रहता है। यही बात भलाइयों, अच्छाइयों, पुण्य-भावनाओं, सद्वृत्तियों के बारे में है। पवित्र अन्तःकरण से निकली हुई सद्भावनाएं विश्व-भर के जड़-चेतन पदार्थों में-व्यापक परमात्म संबंध के कारण सात्विक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती हैं और संसार की हर वस्तु के लिए आदर की, आशीर्वाद की, सहयोग की, उदारता की प्रतिध्वनि भेजती है। फलस्वरूप सद्भावना युक्त मनुष्य प्रतिक्षण अनायास ही अपने अन्दर आनन्दमयी तरंगों का आस्वादन करता रहता है।

सर्वत्र प्रभु की झाँकी करना, सर्वत्र विश्वात्मा का, परमात्मा का दिव्य प्रकाश झिलमिलाते देखना, अपने चारों ओर, अन्दर-बाहर दिव्य सत्ता से परिपूर्ण अनुभव करने से अनायास ही मनुष्य परम सात्विक, परम आनन्दमयी भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। स्वार्थ और वासना की नारकीय नीच विचारधाराओं से वह ऊपर उठता है और दिव्य दृष्टि से अपने को, दूसरों को, संसार के पदार्थों को देखता है। यह विचारधारा निश्चय ही व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में सुख शान्ति का आविर्भाव करती है। इस प्रकार की मान्यता रखने वाले व्यक्तियों के गुण, कर्म, स्वभाव महान मानवता के अनुकूल होते हैं, उनसे मनुष्यता की प्रतिष्ठा बढ़ती है। वह स्वयं सुखी रहते हैं और अपने चारों ओर सुख-शान्ति का वातावरण उत्पन्न करते हैं।

भुः संसार को, भुवः शरीर को, स्वः अन्तरात्मा को भी कहते हैं। यह तीनों परम प्रभु से ओत-प्रोत हैं, यह मानकर चलने से लोक सेवा द्वारा संसारव्यापी ईश्वर की उपासना करने की इच्छा होती है। शरीर और मन को स्वस्थ, संयत, सक्रिय, सन्मार्ग गामी, सुखी, सद्गुण सम्पन्न बनाने में प्रभु प्रज्ञा का ध्यान रहता है। अन्तरात्मा को पवित्रता, पुण्य, परहित, उदारता, प्रेम, प्रसन्नता की भावना द्वारा प्रभु के निवास योग्य सुन्दर मन्दिर बनाने का विचार होता है। जीवन के इन तीनों क्षेत्रों में भी ईश्वरीय श्रद्धा की स्थापना हो जाती है। समष्टि क्षेत्र विश्वव्यापी ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखने और व्यष्टि क्षेत्र में जीवन के इन तीनों विभागों में ईश्वर की व्यापकता का अनुभव करने से जीवनमुक्ति का अनुभव होता है। सर्वत्र भीतर बाहर ईश्वर ही ईश्वर का परिलक्षित होना यही तो परमानंद की, ब्रह्म निर्माण की सहज समाधि की, स्थिति प्रज्ञ की, परमहंस अवस्था है। गायत्री का साधक इस भावना को जैसे-जैसे जितनी-जितनी मात्रा में हृदयंगम करता जाता है। इस तत्व पर उसकी श्रद्धा और अनुभूति जितनी ही प्रबल होती जाती है उसी अनुपात से वह मायामुक्त होता जाता है। और जीवित स्वर्ग में प्रवेश करता जाता है।

ईश्वर उपासना की अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। विभिन्न सम्प्रदायों के अनेक धर्मग्रन्थों में विविध प्रकार के ईश्वरीय चरित्रों, कथाओं का वर्णन है, इनके कहने या सुनने से परमात्मा प्रसन्न होने का महात्म्य लिखा है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, तीर्थ, व्रत, उद्यापन, हवन, बलिदान, जप-तप, साधना, संन्यास, ध्यान, संध्या, नमाज, कथा, कीर्तन, दान, पुण्य, पूजा, अर्चना, भोग, प्रसाद आदि अनेक विधि-विधानों कर्मकाण्डों द्वारा परमात्मा की उपासना की जाती है। इन सबका एक मात्र रहस्य यह है कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखे, उसका ध्यान रखे, मनोभूमि में उसे प्राथमिकता दे, और अपने चारों ओर ईश्वर की समीपता देखते हुए उचित विचारधारा और कार्यप्रणाली को ही अपनाए। ईश्वर को निकटतम उपस्थित देखने वाला व्यक्ति स्वभावतः सन्मार्गगामी होगा। उसका मन और शरीर उचित गतिविधि को ही अपनाता है। फलस्वरूप सत्कर्मों का फल इतना शान्ति दायक, इतना सन्तोषजनक, इतना कल्याणकारक होता है कि उसे ईश्वरीय वरदान से कम किसी भी प्रकार नहीं कह सकते ।

निश्चय ही ईश्वर एक निर्विकार, सर्वव्यापक, नियम स्वरूप, सत्ता है। वह न किसी पर प्रसन्न होता है न अप्रसन्न । निन्दा स्तुति से वह प्रभावित नहीं होता। खुशामद करना या कोसना उसके लिए दोनों बराबर हैं। वह तो कर्म करने के लिए मनुष्य को पूर्णतया स्वतंत्र छोड़ देता है और निष्पक्ष जज की तरह किए हुए कर्मों का यथोचित फल मिलने की व्यवस्था कर देता है। ईश्वर उपासना एक आध्यात्मिक व्यायाम है, एक आत्म-अनुशासन है जिससे मनुष्य की अन्तः भूमि का सुसंबद्ध विकास होता है। उस विकास के फलस्वरूप ऐसे विचारों और कार्यों का अभ्यास हो जाता है जिसके कारण अति आनन्द दायक परिस्थितियाँ आये दिन अनायास ही प्राप्त होती रहती हैं। ईश्वर उपासक कृतज्ञतापूर्वक इस आनन्द उपहार को ईश्वरीय वरदान समझ कर शिरोधार्य करता हुआ अपनी अहंकारिता का परिचय देता है। इस प्रकार जो कार्य किसी भी ईश्वर उपासना विधि से होता है वही कार्य प्रणव और व्याहृतियों में सन्निहित भावनाओं को अपनाने से हो सकता है।

ईश्वर ने मनुष्य को कर्म करने में पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है। हम चाहे जैसे भले या बुरे कर्म करने में पूर्णतया स्वतंत्र हैं इतना होते हुए भी कर्म फल से छुटकारा नहीं मिल सकता, उसमें मनुष्य, ईश्वर का परतंत्र है। कर्म का फल मिलना अवश्यम्भावी है। प्रत्येक प्राणी की अन्तरात्मा में बैठा हुआ ईश्वर उसे कर्तव्य अकर्तव्य का संदेश देता रहता है। चोरी करते समय भीतर ही भीतर उसे न करने की पुकार उठती है, पैर काँपते हैं। और दिल धड़कता है, इसी प्रकार कोई सत्कर्म करने पर आन्तरिक सन्तोष होता है मानो अन्तरात्मा उस सुकृत के लिए आशीर्वाद दे रही हो। यह ईश्वरीय पथ प्रदर्शन है, अन्तरात्मा के आदेशों पर चलते हुए सद्विचार और सत्कार्यों को अपनाना एक प्रकार से उसकी सच्ची पूजा करना है। राजा चारणों, नटों, प्रशंसकों और खुशामदियों से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना आज्ञाकारी आदेश पालक, कर्तव्यनिष्ठ और वफादार कर्मचारी से संतुष्ट रहता है।

यों ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। पर हमारे लिए उसकी छाया दो स्थानों पर विशेष रूप से प्रदर्शित होती है। दो वेदियों से वह हमें विशेष रूप से पुकारता है। (1) सतोगुण की वृद्धि के स्थानों में (2) निर्धनों की सहायता के क्षेत्रों में। जहाँ उत्तम विचार और कार्य हो रहे हैं। मानव प्राणियों में सात्विकता की वृद्धि के लिए जहाँ आयोजन हो रहे हैं उन स्थानों में ईश्वर की विशेष कलाएं, अतिरिक्त शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं वहाँ अपना समय, सहयोग, सद्भाव देना निस्संदेह ईश्वर की पूजा का एक श्रेष्ठ कार्य है। वह परीक्षा लेता है कि देखें हममें दया रूपी, उदारता रूपी, श्रद्धा भक्ति है या नहीं? जो सच्चा ईश्वर भक्त है वह अपने से अधिक उन्नतिशील लोगों को देखकर प्रसन्न होता है और अपने से निर्बलों की सहायता के लिए दौड़ पड़ता है जो गिरे हुए हैं उन्हें उठाना, जो पीड़ित हैं उन्हें सहायता देना, ईश्वर की क्रियात्मक पूजा है।

अपने से ज्ञान में, बल में, धन में, गुणों में, पुण्य में जो लोग पिछड़े हुए हैं उन्हें ऊंचा उठा कर अधिक सुखी बनाने के लिए जो भी प्रयत्न किए जाएं वे सभी ईश्वर की उपासना के प्रतीक हैं। चूँकि सभी में ईश्वर है इसलिए अपने में, अपने परिवार में, अपने स्वजनों निकटवर्तियों में भी वह है। अपने निकटवर्ती क्षेत्र से कार्य आरंभ करना सुविधाजनक एवं उचित होता है, इसलिए अन्तरात्मा की अपेक्षा अपना मन निर्मल है उसे ऊंचा उठाना चाहिए एवं अपने परिजनों को आन्तरिक और साँसारिक संपदाओं से सम्पन्न करना चाहिए। उनमें सात्विकता के अंश अधिकाधिक मात्रा में भरने चाहिएं। इस प्रकार अपने निकटवर्ती क्षेत्र से, मन-मन्दिर तथा परिवार-उपवन से ही ईश्वराधना आरंभ कर देनी चाहिए। ‘दिया तले अंधेरा’ की कहावत चरितार्थ करना उचित नहीं। मन्दिर में घी के दीपक करना और अपने निकटवर्ती क्षेत्र में अज्ञान का अंधकार, यह तो कोई भला तरीका नहीं है।

स्वयं अधिक न कर सकें तो जो लोग सात्विकता को बढ़ाने का, धर्म का, कर्तव्यनिष्ठा का, सद्ज्ञान का, सत्कर्मों का आयोजन कर रहे हैं उसमें शक्तिभर सहयोग देकर सर्वव्यापी सच्चिदानन्द परमात्मा की पूजा करनी चाहिए। अपनी बड़ी शक्ति दूसरों की बड़ी शक्ति में मिला देने से एक सुव्यवस्थित शक्ति प्रवाह बन जाता है, अपनी शक्ति कम हो तो उसे दूसरों के साथ युक्त करके प्रभु के पूजन के महान अभियान में साझी बना जा सकता है। सर्वध्यापक एक ईश्वर प्रसन्नता के लिए (1) सत् तत्व की वृद्धि करना (2) गिरों को उठाना, यह दोनों ही सदाचार उसकी पूजा के सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।

ईश्वर सर्वत्र है इसका यह गलत अर्थ न लगा लेना चाहिए कि जहाँ जो कुछ भी हो रहा है ईश्वर की इच्छा से हो रहा है ऐसा कदापि नहीं होता, पाप तो मनुष्य अपनी स्वतंत्र कर्तव्य शक्ति का दुरुपयोग करके करते हैं। इस दुरुपयोग का नाम ही शैतान है। शैतान की सत्ता को हटा कर ईश्वरीय सत्ता को प्रकाश में लाना यह मनुष्य मात्र का धर्म है। हर मनुष्य को, हर जड़ चेतन पदार्थ को उपयोग, सुखदायक और सुव्यवस्थित बनाना यही तो हर वस्तु में छिपे हुए ईश्वर को प्रत्यक्ष करना उसका पूजन करना है। मैल और गर्द गुबार से जैसे मन्दिर की प्रतिमा को माँज-धोकर नित्य स्वच्छ किया जाता है वैसे ही संसार के

ऊपर चढ़ी हुई बुराइयों रूपी गर्द गुबार को हटा कर स्वच्छ करना ईश्वर पूजा का एक प्रधान कार्य है।

गायत्री मानव जीवन में सर्वतोमुखी आनंद की स्थापना करने वाली महाविद्या है। उसका प्रारम्भ सर्वत्र ईश्वरीय मोचना रखने की शिक्षा से होता है। ॐ भू र्भुवः स्वः का, प्रणव और व्याहृतियों का, प्रथम आयोजन उसमें इसीलिये हुआ है। गायत्री स्तुति के प्रथम श्लोक में इसी लिये यह कहा गया है कि-जो भूर्भुवः स्वः में ॐ की व्यापकता को जानता है वही बुद्धिमान वास्तविक ज्ञानी है। पाठकों को ऐसा ही ज्ञानी बनने का प्रयत्न करना चाहिए।


लक्ष्य में तन्मय हो जाइए।

द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों को बाण विद्या सिखाने के पश्चात सबको एकत्र किया, और उनकी परीक्षा लेने की तैयारी की। एक बड़े पेड़ पर एक काठ की चिड़िया रखी गई। उसको बेधने का लक्ष्य ठहराया गया। आचार्य ने एक एक को बुलाकर उसे लक्ष्य बेधने को दिया। शिष्य जब लक्ष्य बेध के आता तो उससे उनका एक ही प्रश्न रहता- तुम्हें क्या दिखाई देता है? और प्रत्येक व्यक्ति के उत्तर भी अलग अलग रहते। इन उत्तरों में सबको एक चिड़िया का दीखना तो समान रहता पर इसके साथ जो अन्य बातें मिली रहती वे सब भिन्न होतीं। कोई चिड़िया के साथ पत्ती देखता, कोई टहनी, कोई पेड़ और इसीलिए आचार्य सबको हटाते जाते। सबके अन्त में अर्जुन से पूछने का नम्बर आया। आचार्य ने पूछा-तुम्हें क्या दिखाई देता है? अर्जुन ने कहा, मुझे चिड़िया की आँख के सिवा और कुछ नहीं दिखाई देता। अर्जुन के उत्तर से आचार्य प्रसन्न हो गये, अर्जुन ने खुशी खुशी लक्ष्य बेध किया, आचार्य ने आशीर्वाद दिया।

द्रोणाचार्य और अर्जुन के इस संवाद ने बताया कि लक्ष्य कौन बेध सकता है, जिसकी निगाह में लक्ष्य के सिवा अन्य कुछ भी न समाये। सफलता की कुँजी यही एक मात्र तन्मयता है। इसका एक दूसरा नाम एकाग्रता है।

मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

सिद्धि का एक सुन्दर उदाहरण महाभारत में इस प्रकार मिलता है। जिस समय आचार्य द्रोण कौरव एवं पाण्डव राजकुमारों को बाण विद्या सिखा रहे थे उस समय एक निषाद कुमार आचार्य के पास बाण विद्या सीखने के लिए आया। निषाद होने के कारण आचार्य ने सिखाने से इंकार कर दिया। निषादकुमार इससे निराश नहीं हुआ अपितु उसी तन्मयता के साथ उसने आचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसको गुरु मानकर उसने बाण विद्या सीखना आरंभ कर दिया। उसकी एकाग्रता ने उसे बाण विद्या में पारंगत कर दिया। यह उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

सिंहगढ़ जीतने के लिए मराठों के एक दल ने उस पर चढ़ाई कर दी। प्रसिद्ध तानाजी राव इसके सेनानी थे। अपने सैनिकों के साथ किले की दीवार पर रस्सी टाँगकर चढ़ गये। शत्रुओं के साथ घोर युद्ध होने लगा। तानाजी खेत रहे। इस पर वीर मराठा चंचल हो गये और एकाग्रता भंग होते ही उन्होंने भागना आरम्भ कर दिया, जिस रास्ते आये थे उसी रास्ते से उतरने का प्रयत्न करने लगे। तानाजी के भाई सूर्याजी ने उस रास्ते को बन्द करने के लिए रस्सी

को काट दिया और कह दिया कि भागने का रास्ता बन्द हो गया। भागने का रास्ता बन्द हो जाने पर जीत का ही रास्ता खुला मिला, इस लिए जो शक्ति भागने में लग गई थी उसने फिर जीत का बाना पहना। और सिंहगढ़ पर विजय प्राप्त की।

मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं। शास्त्रों में इस सफलता को पाने के लिए बाण के समान गतिवाला बनने का आदेश दिया है-

“शर वत् तन्मयो भवेत्”

बाण की तरह तन्मय होना चाहिए। धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।


निर्भय और निर्लोभी ही स्वतंत्र विचारक हो सकता है।

जो चीज जिस रूप में हमारे सामने आती है। हमारे मन में उसकी वही रूप रेखा अंकित हो जाती है, और तब मन उसी प्रकार का चिंतन और मनन करता है और वैसा ही चिन्तन और मनन करते हुए मन भी उसी साँचे में ढल जाता है। परिणाम यह होता है कि चिन्तन की स्वतन्त्र दिशा का लोप हो जाता है। यहाँ तक कि चिन्तन की स्वतन्त्रता भी नष्ट हो जाती है।

चिन्तन की स्वतन्त्रता का भय का वातावरण जिस प्रकार शत्रु है वैसे ही धन भी अन्तराय है। ज्यादातर लोग गरीबी में रहकर अपना जीवन चला नहीं पाते। गरीबी में रहना तो एक प्रकार की तपस्या है, संयम है इसलिये धन के लिये उन्हें कहीं न कहीं अपना पल्ला फैलाना ही पड़ता है। पारिश्रमिक रूप से, प्रतिग्रह रूप से, किसी भी रूप से, धन जिससे मिलता है, मनुष्य उस धनी के प्रति कृतज्ञ हो जाता है, और वह अपनी सारी चिन्तन शक्ति उसके लिए सौंप देता है। इसलिए धन के गलत रास्ते जाने पर भी उसमें इतना नैतिक बल नहीं रहता कि उसके खिलाफ आवाज उठा सके बल्कि कभी कभी तो उसी के गुण गाते हुए पाया जाता है।

महाभारत में इसका एक प्रमाण मिलता है। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य-जितने पाँडवों के हितैषी थे। उतने ही कौरवों के । परन्तु रहते थे कौरवों के आश्रय में। भरी सभा में जिस समय द्रौपदी को नंगा किया जा रहा था, ये लोग वहीं थे परन्तु उस कर्म के विरोध करने का भी इनमें नैतिक साहस नहीं रह गया था। जब कि इन्हीं द्रोणाचार्य ने अपने गुरुभाई द्रुपदराज द्वारा किया गया अपमान नहीं सहा और स्वयं गरीबी में रहना कबूल कर लिया था। लेकिन जैसे ही धन के लालच में आकर इन्होंने कौरवों के यहाँ आश्रय ग्रहण किया इनकी सत् असत् विवेकिनी बुद्धि लुप्त हो गई। और यहाँ तक लुप्त हुई कि द्रोणाचार्य जैसे सात महारथियों ने मिलकर सोलह वर्ष के बेचारे अकेले अभिमन्यु को, वह भी निःशस्त्र होने की अवस्था में, मार डाला ।

स्वतन्त्र चिन्तन की शक्ति होने पर कोई भी धर्मनिष्ठ ब्राह्मण क्या ऐसा करता? कदापि नहीं, द्रोणाचार्य ने युद्ध के आरम्भ में ही इस अन्यायाचरण के सम्बन्ध में अपना मत प्रकट किया था कि मनुष्य धन का दास है, धन मनुष्य का नहीं, कौरवों ने हमें धन से खरीद लिया है इसलिये हमें उन्हीं की ओर से लड़ना है। यदि धन से वे खरीदे गये न होते तो इन समस्त अधर्म एवं अन्यायाचरण के विरुद्ध हुँकार मारते, इन्हें क्या देर लगती। भीष्म पितामह का भी यही हाल था। उन्होंने भी इन्हीं शब्दों में जवाब दिया था।

इसलिए लोक में भी ऐसी कहावत है कि-“जैसा अन्न वैसा मन” अर्थात् जिस व्यक्ति का अन्न खाते हैं उसका समर्थन करना ही होता है।

क्योंकि तब वह मन स्वतन्त्र विचार करने के अयोग्य हो जाता है और वह अपने मालिक के प्रत्येक कार्य में गुण ही गुण देखता है, और यदि कहीं अवगुण दिखाई भी दे जाता है तो फिर उसके विरुद्ध बोलने की नैतिक शक्ति अपने में नहीं पाता ।

बिना नैतिक शक्ति हुए मनुष्य में स्वतंत्र विचार की शक्ति नहीं रहती । दलबन्दी और पार्टी बन्दियाँ स्वतंत्र विचारों का कैदखाना है। क्योंकि वे किन्हीं विशिष्ट स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनाई जाती हैं । विशिष्ट स्वार्थ आते ही स्वतन्त्र विचार रफूचक्कर हो जाते हैं।

जब किसी विशिष्ट स्वार्थ को लेकर सरकारें बनायी जाती है तो तमाम स्वतन्त्र विचारकों को हथियाने की कोशिश की जाती है। भय या प्रलोभन ये ही दो हथियार हैं उन्हें हथियाने के। जो कल तक ब्रिटिश सरकार के पोषक थे। सरकार बदलते ही जब वे काँग्रेस सरकार के पोषक बन जाते हैं, तो समझा जाता है कि प्रलोभन ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया। यदि वे स्वतन्त्र विचारक होते तो या तो वे प्रारम्भ में ही ब्रिटिश सरकार का विरोध करते या फिर वे काँग्रेस सरकार के आते ही अवकाश ग्रहण कर लेते ।

अच्छे-अच्छे क्रान्तिकारी पैसे से खरीद लिए जाते हैं, विद्वान और वैज्ञानिक तो पैसे से खरीदे जाने का सर्वत्र उदाहरण है। आज के विज्ञान का उपयोग विनाश के लिए हो रहा है, यदि ये वैज्ञानिक स्वतन्त्र विचारक होते तो क्या अपने विज्ञान का उपयोग कुछ लोगों की स्वार्थ-पूर्ति और जनसंहार में होने देते ? वे अपना नमक का हक हलाल करने के लिए मजबूर रहते हैं, इसलिए जो न करना चाहिए वह भी करते रहते हैं। सरकारी नौकरी या सरकारी सहायता देकर आदमियों को फोड़ते और अपने काबू में करते हुए तो प्रायः देखा ही जाता है।

प्रतिग्रह भी स्वतन्त्र विचार का दुश्मन है। दान लेने वाला दानदाता का समर्थक, ज्ञात रूप से या अज्ञात रूप से, बन ही जाता है। इसी प्रकार जहाँ भय रहता है वहाँ स्वतन्त्र विचार हो ही नहीं सकता ।

इसीलिए भय और भोग पर विजय पाने के उपराँत ही मनुष्य स्वतन्त्र विचारों की उपासना कर सकता है। तब उसे नैतिक बल बढ़ाना पड़ता है और स्वयं को तपस्या की-कष्ट सहने की आँच में तपने के लिए छोड़ना पड़ता है। तब वह विज्ञापनों के चक्कर में नहीं फंसता बल्कि इन सबसे अपने को ऊपर उठाकर स्वतंत्र विचारों की साधना में अपने को खपा देता है। तब सारे प्रलोभन उसके लिए बेकार हो जाते हैं। संसार तो उसके लिए प्रयोग-शाला रहती है जहाँ वह अपने “स्व-“में प्रतिष्ठित रहता है और उसके तंत्र के आगे किसी को कुछ नहीं समझता ।

जो लोग यह स्वीकार करते हैं कि धन और भय अथवा भोग और भय मनुष्य को स्वतन्त्र विचारों से पृथक नहीं कर सकते, सचमुच ही वे भोले है, और उनमें अपने दैनिक जीवन को ही एकाग्रता पूर्वक देखने और उनका विश्लेषण करने की शक्ति नहीं है। यदि वे अपने अपने सिन्तडडडड और विचारों के साथ अपने जीवन की तुलना करें तो वे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करेंगे।

सच तो यह है कि संयम का पाठ पढ़े बिना तथा गरीबी को अपनाये बिना स्वतन्त्र विचारक बना ही नहीं जा सकता। स्वतन्त्र विचार के लिए इतना बड़ा त्याग सहना संभव नहीं है इसीलिए तो आज भारतवर्ष में विचार क्रान्ति नहीं हो रही और मानसिक गुलामी में सबके सब जकड़े पड़े हैं।


Quotation

वह मूर्ख है जो अपना नुकसान देखकर रोता है। नुकसान होने पर ही आत्मा को विचार करने और ईश्वर को पूजने का समय मिलता है और सत्य का दर्शन भी होता है।

-टॉलस्टाय


इन तीन का ध्यान रखिए।

(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

उत्पादन की जड़-इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये-अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना। ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है। जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं। सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं। विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

इन तीनों को झिड़को :- निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता-ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता। घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता। कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है। दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

इन तीनों को त्याग दीजिए-कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक। (1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है। (2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है। (3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

इन तीनों को ग्रहण कीजिए-चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिए इन तीनों सद्गुणों-होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता-का विकास अनिवार्य है। (1) यदि आप अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में निरन्तर जागरुक, सावधान रहें, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें, सतर्क रहें, तो आप अपने निश्चित ध्येय की प्राप्ति में निरन्तर अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क मनुष्य कभी गलती नहीं करता, असावधान नहीं रहता। कोई उसे दबा नहीं सकता। (2) सज्जनता एक ऐसा दैवी गुण है जिसका मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष वन्दनीय है। वह जीवन पर्यंत पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार, एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती हैं। (3) सहनशीलता दैवी सम्पदा में सम्मिलित है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है केवल महान आत्माएँ ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं। इनके अतिरिक्त इन तीन पर श्रद्धा रखिये-धैर्य, शान्ति, परोपकार।

इन तीन को हासिल कीजिए-सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता (1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है। (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है। (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।

इन तीनों का आनन्द प्राप्त करो-(1) खुला दिल (2) स्वतन्त्रता (3) सौंदर्य-ये तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं। खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है। स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा। सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।

इन तीन के लिये लड़ो-इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए। इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।

इन तीनों को स्मरण रखो-आरोग्य, सुमित्र और संतोष वृत्ति। ये तीनों ही आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले है। चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु इन स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पादकों को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सब से बड़ा हितैषी और सहायता है। संतोषवृत्ति मनः शक्ति को परिपुष्ट करने, आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है। इन तीनों का प्राप्त करो-(1) अच्छी पुस्तक (2) अच्छी सोबत और (3) अच्छी आदतें। अच्छे, उपयोगी, चरित्र का परिष्कार एवं आत्म सुधार करने वाले सद्ग्रन्थ जिस व्यक्ति के पास है, उसे अकेलापन, नीरसता, शुष्कता कभी न प्रतीत होगी। पुस्तकें सदा सर्वदा चौबीसों घंटे का आत्मसुधार करने को प्रस्तुत हैं, आपकी सद्शिक्षाएँ देने को मौजूद रहती हैं। इनके सत्संग से अनेक साधारण व्यक्ति महत्ता प्राप्त कर सकते हैं। सत्साहित्य से समाज के ज्ञान का संवर्द्धन चरित्र का संशोधन होता है। उच्च कोटि के साहित्य से ही घर की शोभा है।

महात्मा गाँधी जी ने कहा है, “अच्छी पुस्तकों के पास रहने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती। जितना ही मैं उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करता गया, उतना ही मुझे उनकी विशेषताएं मालूम होती गईं। जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक है, वह सब जगह सुखी रह सकता है।” लोकमान्य तिलक के अनुसार, “मैं नर्क में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि वे जहाँ होंगी, वहाँ आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” अच्छी पुस्तकें ही अच्छी सोहबत और अच्छी आदतें प्रदान कर सकती हैं।

विवाह संस्कार होता है। यह होने पर जीव के ऊपर अनेक जिम्मेदारियाँ आ पड़ती हैं। यहाँ तो देह-भाव-विलोपन और आत्म बलिदान का पाठ पूरा पूरा सीखना पड़ता है। कालान्तर में जो संतान प्राप्ति होती है, उसकी सेवा बिना आत्म त्याग और बलिदान के संभव नहीं। साथ साथ अपने जीवन सहचर के व्यक्तित्व में जो अपने व्यक्तित्व को मिलना होता है-वह भी बिना आत्मोत्सर्ग के सम्भव नहीं। कदाचित अपने जीवन-सहचर के व्यक्तित्व में अपने व्यक्तित्व को हमें विलीन भी करना पड़ता है।-खोना भी पड़ता है-और यह देह-भाव को बनाए रखकर नहीं बन सकता। इस जीवन में तो इच्छा-निरोध, आत्म-संयम की पूरी-पूरी साधना करनी पड़ती है क्योंकि बिना इसके अपने जीवन सहचर के साथ पूर्णतया घुल मिल जाना नहीं बनता। अतएव विवाह में आत्म विलीनीकरण परमावश्यक है और यह आत्म विलीनीकरण-देह-भाव का यह उच्छेद-पशुत्व को दबाने और देवत्व को जगाने का एक साधन है। अतएव विवाह पशुत्व से देवत्व की और बढ़ने का एक मार्ग है।

विवाह भौतिक दृष्टि के अतिरिक्त, आध्यात्मिक जीवन के क्रमिक विकास की दृष्टि से भी जीव के बाल्य काल के पश्चात् स्वाभाविक रूप से ही आवश्यक है।


विवाह-आत्म विकास रूपी सोपान की एक बड़ी सीढ़ी है।

(श्री दौलतराम कटहरा बी0 ए0)

हिन्दु धर्म में जिन षोडश संस्कारों का विधान का ध्येय जीव को पशुत्व से देवत्व की ओर उन्मुख करना है। जीव अपनी शैशव दशा में पशु के समान ही खाता-पीता सोता-जागता रोता-चिल्लाता रहता है। उस समय उसके जीवन में बुद्धि तत्व अविकसित रहने से उसका जीवन आध्यात्मिक नहीं होता। जब वह तनिक बड़ा होता है तब क्रमशः माता-पिता और गुरुजनों की आज्ञा पालन आदि गुणों को सीखता है इस तरह उसे धीरे धीरे आत्म-दमन, आत्म-संयम और इच्छा-निरोध का पाठ सीखना पड़ता है। उसे आज्ञा-पालन द्वारा अपने क्षुद्र ‘स्व’ का-अपने दैहिक व्यक्तित्व का भाव भुलाना पड़ता है और तब धीरे धीरे उसकी गुहा में आत्म का प्रकाश होता है, उसका आत्म-भाव उभरता है और तब उसका आत्म-विस्तार प्रारम्भ होता है। ज्यों-ज्यों वह आत्म-दमन करता है, अपने ऊपर नियंत्रण लगाता है, त्याग करता है, त्यों-त्यों उसमें आत्मीयता का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा होने पर जीव का विवाह संस्कार होता है। यह होने पर जीव के ऊपर अनेक जिम्मेदारियाँ आ पड़ती है। यहाँ तो देह-भाव-विलोपन और आत्म-बलिदान का पाठ पूरा-पूरा सीखना पड़ता है। कालान्तर में जो संतान प्राप्ति होती है, उसकी सेवा बीना आत्म त्याग और बलिदान के संभव नहीं। साथ-साथ अपने जीवन सहचर के व्यक्तित्व में जो अपने व्यक्तित्व को मिलाना होता है-वह बिना मिलाए रख कर नहीं बन सकता। इस जीवन में तो इच्छा-निरोध, आत्म संयम की पूरी-पूरी साधना करनी पड़ती है, क्योंकि बिना इसके अपना जीवन सहचर के साथ पूर्णतया घुल-मिल जाना नहीं बनता। अतएव विवाह में आत्म-विलीनीकरण परमावश्यक है और यह आत्म विलीनीकरण- देह-भाव का यह उद्देश्य-पशुत्व को दबाने और देवत्व को जगाने का एक साधन है। अतएव विवाह पशुत्व से देवत्व की और बढ़ाने का एक मार्ग है।

विवाह भौतिक दृष्टि से अतिरिक्त, अध्यात्मिक जीवन के क्रमिक विकास की दृष्टि से भी जीव के बाल्य-काल के पश्चात स्वाभाविक रूप से ही आवश्यक है बाल्य-काल के उपरान्त आध्यात्मिक सोपान पर आगे चढ़ने के लिए जो अगली सीढ़ी हो सकती है वह विवाह-बन्ध ही है। बाल्यकाल के उपराँत एक दम संन्यास धर्म में पहुँचना सबके लिए सरल नहीं और न अपेक्षित ही है। बाल्य-काल में सदा खाते-पीते, सोते-जागते सुखों का उपभोग ही होता है-इंद्रियों की तृप्ति का प्रयत्न ही चलता रहता है। इच्छाओं का निरोध नहीं होता किंतु इसके ठीक विपरीत संन्यास में एक दम त्याग ही त्याग है। अतएव विवाह ही एक ऐसी बीच की अवस्था है जो मनुष्य को विरक्ति और भोग की अवस्था के ठीक बीचों-बीच रखकर विरक्ति और त्याग के साथ साथ ही सुख-भोग की शिक्षा देती है। मध्यम मार्ग राग-द्वेष से वियुक्त होकर सुखोपभोग करना इस जीवन के अतिरिक्त न तो बाल्यावस्था में संभव है और न संन्यासावस्था में। इसलिए विवाह एक पवित्र बंधन है और विवाहित जीवन को योग्यतापूर्वक निबाहने में ही मनुष्य का आध्यात्मिक कल्याण है।

सफल विवाहित जीवन ईश्वर से सम्मिलन की पूर्वावस्था है। जायसी आदि संतों ने ईश्वर-प्रेम कैसा होना चाहिए उसकी एक क्षुद्र झाँकी पति-पत्नी के प्रेम को माना है। जायसी ने अपने काव्य पद्मावत में महारानी पद्मिनी और रतनसिंह के प्रेम का उत्तम विवरण किया है। जब लौकिक प्रेम के निबाहने में इतनी जानिसारी की आवश्यकता होती है तो ईश्वर-प्रेम तो फिर सिर का सौदा है, सिर हथेली पर रखकर चलना है। अतएव लौकिक प्रेम ही ईश्वर से सामीप्य लाभ करने का मार्ग प्रस्तुत करता है। शास्त्रकारों की दृष्टि में विवाहित जीवन पवित्र जीवन है। तैत्तरीयोपनिषद् में तो “प्रजातंतु माव्यवच्छेत्सीः” ऐसा उपदेश है। अतएव जहाँ पवित्र जीवन है वहाँ पापमय उत्पत्ति कहाँ हो सकती है। फिर हम ब्रह्म ज्ञान हो जाने पर भी सत्य काम जाबाल और समुग्वा रैक्व जैसे ब्रह्म ज्ञानियों को भी विवाह करते देखते हैं। इससे भी जीवन की पवित्रता ही प्रतिपादित होती है। केवल आत्म-संयम का होना न होना ही विवाहित जीवन को पवित्र या अपवित्र बना देता है। पुनश्च भगवान कृष्ण ने भी तो कहा है “धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोअस्मि भरतर्षभ” अर्थात् प्राणियों में स्थित मैं धर्म अविरुद्ध काम हूँ।

ऋग्वेद का वचन है।

समानी व आकूतिः समाना हृदय समान हो,

अर्थात् हमारा आचरण समान हो,

हमारे मन समान हों और हम एक दूसरे की सहायता के लिए सदा तत्पर रहें। यदि हम अपने जीवन-सहचर के साथ भी एकात्म्यता और अभिन्नता का अनुभव नहीं कर सकते तो वेद में वर्णित समाज के साथ इतनी अभिन्नता हो सकना तो बहुत दूर की बात है। इस दृष्टि से भी विचार करें तो विवाह-बन्धन उत्कृष्ट सामाजिक तथा आध्यात्मिक जीवन यापन करने के लिए उत्तम शिक्षण-स्थल है। विवाह आध्यात्मिक विकास के लिए सुअवसर प्रदान करता है।

विवाहित जीवन बहुतों के लिए दुःखमय प्रतीत होता है। किंतु इसका कारण केवल आत्म-संयम और पुरुषार्थ की कमी है। कठिनाइयाँ केवल हमारी चरित्र-गत तथा पुरुषार्थ संबंधी न्यूनताओं की ओर ही संकेत करती हैं और मानों हमें उन पर विजय प्राप्त करने के लिए उद्बोधित करती है। जो लोग पलायन-मनोवृत्ति लेकर विवाह-बंधन से बल निकलते है वे दुख और कठिनाइयों से भी भले ही बच निकलें, किन्तु कठिनाइयों से बच निकलना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। इससे उद्देश्य की सिद्धि नहीं होती। जीवन का लक्ष्य है अपनी आत्म-शक्ति बढ़ाना और अपनी उन चरित्रगत तथा पुरुषार्थ संबंधी न्यूनताओं को दूर करना, जो कठिनाइयों को जन्म देती हैं और जिनके रहते हुए कठिनाइयाँ प्रतीत होती हैं। विवाहित जीवन की उपेक्षा कर तथा अपनी चरित्र-गत न्यूनताओं से अपरिचित रह कर पूर्ण आनन्द भोगने का दावा करना भ्रम मात्र है पूर्ण आनन्द तो पूर्णतया पुरुषार्थी और दोष-मुक्त होने पर ही प्राप्त हो सकता है। विवाह पुरुषार्थी और पूर्णतया दोष-मुक्त होने का बढ़िया साधन है। अतएव जिनके जीवन में कोई दोष नहीं है और पूर्ण पुरुषार्थी है केवल वे ही इस बीच की सीढ़ी-विवाहित जीवन की उपेक्षा करने के अधिकारी हैं-क्योंकि उनको विवाहित जीवन सफल-आत्म-विजय प्राप्त ही रहता है।

मनुष्य ने अपने विकास काल में जिस सर्वोत्तम तत्व को विकसित किया है वह माता-पिता का हृदय ही है। इसमें जिस सुकोमलता का निवास है वह मनुष्य को देवोपम बना सकता इसी के कारण मनुष्य इस हिंसक विश्व में सर्वोपरि सुशोभित हो रहा है। इस प्रेम-मय हृदय की प्राप्ति के लिए विवाह ही द्वार को उन्मुक्त करता है।

विवाहित जीवन में जो बात मैं अत्यन्त बुरी समझता हूँ वह अपने सहचर के प्रति दुरोध है। उसकी नजर की चोरी की कौन कहें हमें तो उससे अपने विचारों को भी न छुपाने का आदर्श सदा अपने सामने रखना चाहिए। हम कभी ऐसे विचारों को स्थान न दें जिसे हम अपने जीवन-सहचर पर प्रकट न कर सकते हों। तभी विवाहित जीवन सफल, सुखी और शाँति-मय हो सकता है।


सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है।

प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किये हुए भले बुरे कामों का, फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरन्त मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधि निर्धारित भली-बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए है उनका परिणाम कभी पीछे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

यदि प्रत्येक भले बुरे कर्म का फल तुरन्त हाथों-हाथ मिल जाता होता तो इस संसार में कहीं भी पापी और पाप का निशान ढूंढ़ने मिलता। क्योंकि जैसे विष खाते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है। वैसे ही पाप करते ही उसकी भयंकर पीड़ा होती तो उसे कोई स्पर्श भी न करता और बुराई का स्वादिष्ट फल मिठाई की तरह मधुर, बर्फ सा शीतल, चन्दन सा सुगंधित और सब प्रकार मनोहर आनन्द मय होता तो दौड़ दौड़ कर सभी लोग बुराई करते, अशुभ कर्म करने में कोई किसी से पीछे न रहता। परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धिमता की परीक्षा करने के लिए और उसकी स्वतंत्रता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता को स्वतंत्र दिशा में विकसित होने देने के लिए ऐसी व्यवस्था की है कि कर्मफल तुरन्त तो बहुत कम मिलते हैं वे आगे पीछे के लिए जमा होते रहते है। यह उधार खाता, उचंत खाता, बैंकों के हिसाब की तरह आगे पीछे जमा खर्च में पड़ता रहता है। यह वह स्थान है जिस पर मनुष्य की बुद्धिमता परखी जाती है, इसी खतरे से सावधान करने के लिए धर्म का विधान है। वेद पुराण शास्त्र, इतिहास इसी जगह पर सावधान करने के लिए अपना अभिमत घोषित करते रहते हैं। फिर भी लोग चूकते हैं।-भ्रम में पड़ते हैं, और इस संदेह में पढ़ते हैं कि जाने कर्मफल मिलता भी है या नहीं। शास्त्रों की वाणी, धर्म की व्यवस्था जाने सच है भी या नहीं। इस संदेह में भ्रमित होकर ही वे पाप और नास्तिकता को अपना लेते है। तुरन्त फल न मिलना यही तो माया है, इस माया में ही मनुष्य भ्रमित होता है। आग छूने से जलन और बर्फ छूने से ठंडक की भाँति यदि पाप पुण्य का स्पर्श अपना अपना तुरन्त परिणाम दिखाते तो वेदशास्त्र धर्म भजन, पूजन कथा, कीर्तन आदि किसी की जरूरत न पड़ती। जैसे हरी घास को देखते ही गधा सीधा उसे खाने को चला जाता है वैसे ही सब लोग पुण्य के लिए सीधे चल देते है। और जैसे लाल झंडे को देखकर भैंस बिदकती है वैसे ही पाप का नाम सुनते ही लोग उससे बचकर दूर भागते हैं। पर ऐसा है नहीं, यही ईश्वर की माया है। हम माया को समझें और उसके जाल में न उलझें यही हमारी बुद्धिमानी का प्रमाण हो सकता है।

जैसे गोबर के उपले आज थापे जाएं तो वे कई दिन में सूख कर जलाने लायक होते है। हम जो भले बुरे कर्म करते रहते हैं उनका भी धीरे धीरे परिपाक होता रहता है और कालान्तर में वे कर्मफल के रूप में परिणित होते है। इसी प्रक्रिया को भाग्य, तकदीर, कर्मलेख, विधाता के अंक, प्रारब्ध, होतव्यता, आदि नामों से पुकारते हैं। हम देखते हैं कि कई व्यक्ति अत्यन्त शुभ कर्मों में प्रवृत्त है पर उन्हें कष्ट में जीवन बिताना पढ़ रहा है और जो पाप में प्रवृत्त हैं वे चैन की छान रहे हैं। इस का कारण यही है कि उनके भूतकाल के कर्मों का उदय इस समय हो रहा है और आज की करनी का फल उन्हें आगे आने वाले समय में मिलेगा।

मोटा नियम यही है कि जो किया गया है, उसका फल अवश्य मिलेगा। कर्म जैसे मन्द या तीव्र किये गये होंगे उनकी बुराई अच्छाई के अनुसार न्यूनाधिक सुख दुख का विधान होता है। यह कर्म भोग बड़े बड़ों को भोगना पड़ता है।

परन्तु इसमें सूक्ष्म नियमानुसार कभी कभी हेर फेर भी हो जाता है। जो प्रारब्ध परिपक्व होकर भोग के रूप में प्रस्तुत है उसमें परिवर्तन होना तो कठिन है पर जो कर्म अभी पक रहे हैं, भोग बनने की स्थिति में जो अभी नहीं पहुँच पाये हैं उन पर वर्तमान कर्मों का प्रभाव पड़ता है और उनका फल न्यून या अधिक हो सकता है अथवा वे नष्ट भी हो सकते हैं। धर्म ग्रन्थों में जहाँ शुभ कर्मों का महात्म्य वर्णन किया गया है वहाँ स्थान-स्थान पर ऐसा उल्लेख आया है कि “इस शुभ कर्म के करने से पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं।” यहाँ सन्देह उत्पन्न होता

है कि यदि उस कर्म के करने वाले के पाप नष्ट ही हो गये तो वर्तमान में तथा भविष्य में किसी प्रकार का दुख या अभाव उसे न रहना चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं, शुभ कर्म करने वाले भी अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह सुख दुख प्राप्त करते रहते हैं।

पूर्वकृत पापों के नष्ट होने का संबंध उन कर्मों से है जिनका अभी परिपाक नहीं हुआ है, जो अभी संचित रूप में पड़े हैं और समयानुसार फलित होने के लिए जो सुरक्षित रखे हुए हैं। वर्तमान काल में यदि अधिक बलवान शुभकर्म किए जाएं, मन में यदि उच्चकोटि की सतोगुणी भावनाओं का प्रकाश प्रज्वलित रहे तो उसके तेज से, ऊष्मा से वह अशुभ संचय झुलसने लगता है और हत प्रभ हीन वीर्य होने लगता है। जहाँ अग्नि की भट्टी जलती रहती हो उसके आस पास में कई पुस्तकें औषधियाँ आदि रखी रहें तो वे सब उस गर्मी के कारण जीर्ण शीर्ण निस्तेज और क्षतवीर्य हो जायेंगी। कोई बीज उस गर्मी को रखे रहें तो उनकी उपजाने की शक्ति मारी जायेगी। इसी प्रकार यदि वर्तमान काल में कोई व्यक्ति अपनी मनोभूमि को तीव्रगति से निर्मल और सतोगुणी बनाता जा रहा है तो उसकी तीव्रता से भूतकाल के अशुभ कर्मों की शक्ति अवश्य नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि भूतकाल में अच्छे कर्म किये गये थे और उनका सुखदायक शुभ परिपाक होने जा रहा था तो वह परिपाक भी वर्तमान काल के कुकर्मों, दुर्गुणों, कुविचारों और दुष्ट भावनाओं के कारण हीन-वीर्य, निष्फल और मृतप्रायः हो सकता है। वर्तमान का प्रभाव भूत पर ही पड़ता है और भविष्य पर भी। महापुरुषों के पूर्वज भी प्रशंसा पाते है और संतान भी आदर की दृष्टि से देखी जाती है। दुष्ट कुकर्मियों के पूर्वज भी कोसे जाते हैं और उनकी संतानें भी लज्जा का अनुभव करती है।

स्मरण रखिए वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भोग्य बन गये फलों को छोड़ कर अन्य संचित पाप क्षतवीर्य हो जायेंगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े पर वे कष्ट अन्ततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े-बड़े पूर्व घातक स्वल्प दुख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं। पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हीन वीर्य हो जायेंगे जो संचित पाप कर्म हैं वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्लवित होंगे, जिससे दुखदायी पाप फलों की शृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी।

हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनायें, यह प्रणाली हमारे बुरे भूतकाल को भी श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित कर सकती है।


सादगी सबसे बढ़िया फैशन है।

(लेखक-महात्मा गाँधी)

आरोग्य जैसे आहार पर निर्भर है वैसे ही, किसी हद तक, पोशाक पर भी। गोरी लेडियाँ शौक के लिये ऐसी पोशाक पहनती हैं कि वे उनके पैर और कमर तक रहें। इससे उन्हें कई प्रकार की बीमारियाँ हो जाती हैं। चीन में औरतों के पैर इतने छोटे कर दिये जाते हैं कि हमारे बच्चों के पैर भी उनके पैरों से बड़े होते है। इससे चीन की औरतों के स्वास्थ्य को बड़ा धक्का पहुँचता है। इन दो उदाहरणों से पढ़ने वाले समझ सकते हैं कि कुछ अंश में हमारे स्वास्थ्य का आधार पोशाक पर भी है। बहुत अंशों में पोशाक को पसन्द करना हमारे हाथ में नहीं रहता। हम अपने बड़े-बूढ़ों की पोशाक पहनते हैं। और वर्तमान काल में ऐसा करने की जरूरत भी है। पोशाक का मुख्य उद्देश्य क्या है, उसे भूलकर अब पोशाक से हमारा धर्म, हमारा देश और हमारी जाति आदि जाने जाते हैं। मजदूर, मास्टर, कारोबारी आदि की पोशाक भी जुदी ही जाति की होती है। ऐसी स्थिति में आरोग्य की दृष्टि से पोशाक का विचार करने से कुछ लाभ ही होगा।

पोशाक शब्द में जूते और जेवर इत्यादि शामिल समझने चाहिए। पोशाक का मुख्य उद्देश्य क्या है? मनुष्य अपनी प्राकृतिक स्थिति में कपड़ा नहीं पहनता था। स्त्री-पुरुष केवल अपना गुप्त भाग ढक लेते और बाकी शरीर का सब भाग खुला रखते थे। इससे उनका चमड़ा कठिन और मजबूत हो जाता था। ऐसे मनुष्य हवा और पानी को खूब सह सकते हैं। उन्हें एकाएक सर्दी इत्यादि नहीं होती, यह तो प्रायः सभी लोग जानते हैं कि हम केवल नथुनों से ही हवा नहीं लेते हैं। कपड़े पहनकर हम चमड़े के इस बड़े काम को रोकते हैं। ठंडे देश के मनुष्य ज्यों-ज्यों आलसी बनते गये त्यों-त्यों उन्हें शरीर ढकने की जरूरत हुई। वे ठंड न सह सके और पोशाक का रिवाज चल पड़ा। अन्त में लोगों ने पोशाक को मनुष्य का आभूषण मान लिया। फिर उससे देश, जाति आदि की पहचान होने लगी।

असल में प्रकृति ने मनुष्य के शरीर पर चमड़े की बहुत ही योग्य पोशाक दी है। यह मानना कि शरीर नग्न दशा में बुरा मालूम होता है, बिल्कुल भ्रम है। अच्छे से अच्छे चित्र तो नग्न दशा में ही भले दिखाई पड़ते हैं। पोशाक से शरीर के साधारण अंगों को ढककर मानो हम दिखाते हैं कि उनके दोष छिपाने के लिए हम यह कर रहे हैं। हमारे पास ज्यों-ज्यों पैसा अधिक होता है त्यों-त्यों हम अपनी टीमटाम बढ़ाते जाते हैं। हर तरह से आदमी अपनी सुन्दरता बढ़ाना चाहता है। शीशे में मुँह देख-देख कर अकड़ता है- वाह ! मैं कैसा खूबसूरत हूँ। यदि ऐसी आदतों से हम सबकी दृष्टि में फर्क न पड़ा हो तो हम तुरन्त समझ सकते हैं कि मनुष्य का अच्छे से अच्छा रूप उसकी नग्न दिशा में दिखाई देता है, और उसी में उसका आरोग्य भी है। एक पोशाक पहनी कि रूप में उतना ही फर्क डाला। शायद केवल कपड़े से सन्तोष न होने पर स्त्री-पुरुषों ने गहने पहनने शुरू कर दिये। बहुतेरे मर्द भी पैर में कड़े पहनते हैं, कानों में बालियाँ लटकाते हैं और हाथ में अंगूठी पहनते हैं। ये सब गन्दगी के घर हैं। यह समझना बहुत ही कठिन है कि इनके पहनने में कौन-सी शोभा फटी पड़ती है। इस विषय में औरतों ने तो हद ही कर दी है। ये पैरों में ऐसे भारी-भारी कड़े, पाजेब पहनती हैं कि पैर उठाना भी कठिन हो जाता है। बालियों से कान गुँथे रहते हैं। नाक में भारी नथ लटका करती है और हाथों में तो जितने गहने हों उतने ही थोड़े! इस पहनाव से शरीर पर बहुत मैल जमा हो जाती है। कान और नाक में तो मैल की हद ही नहीं रहती। हम इस मैली दशा को शृंगार समझ कर खूब पैसे फूँकते हैं। चोरों की वजह से जान जोखिम में डालते हुए नहीं डरते। किसी ने बहुत ठीक कहा है कि “अभिमान से पैदा हुई मूर्खता को हम तकलीफ झेलते हुए जो नजराना देते हैं वह बहुत ही अधिक होता है।” ऐसे उदाहरण बहुत लोगों ने अपनी आँखों देखे होंगे कि कान में फोड़ा होने पर भी औरतों ने अपना बालियाँ नहीं उतारने दीं। हाथ में फोड़ा होकर पक गया। फिर भी पहुँची न उतरी। उंगली पककर सूज आई तब भी मर्द और औरतें हीरा जड़ी अंगूठी अपनी उंगली से उ

तार डालना रूप में फर्क आ जाने का कारण समझती हैं।

पोशाक के सम्बन्ध में अधिक सुधार मुश्किल हैं। फिर भी हम गहनों और अनावश्यक कपड़ों को एकदम विदा कर सकते हैं। रीतिरिवाज के लिये कुछ कपड़ों को रखकर बाकी को अलग कर सकते हैं। पोशाक मनुष्य का आभूषण है, यह बहम जिन लोगों के मन से दूर हो गया है वे बहुत कुछ सुधार करके अपना आरोग्य ठीक कर सकते हैं।

आजकल यह हवा बह रही है कि यूरोप की पोशाक हमारे लिए बहुत अच्छी है, इस पोशाक से हमारा रौब बढ़ जाता है और लोग हमारा सम्मान करने लगते हैं। इन सब बातों पर विचार करने का यह स्थल नहीं। यहाँ तो इतना कहना आवश्यक है कि यूरोप की पोशाक यहाँ के ठण्डे भागों के लिये भले ही योग्य हो, किन्तु वह भारतवर्ष के लिये उपयोगी नहीं सिद्ध हो सकती। हिन्दुस्तान के लिये, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, हिन्दुस्तान की ही पोशाक समुचित हो सकती हैं। हमारे कपड़े खुले और ढीले-ढाले होते हैं। इसलिये उनमें हवा आती जाती है। हमारे कपड़े अधिकतर सफेद होते हैं जिससे सूर्य की किरणें बिखर जाती हैं। काले रंग के कपड़े में सूर्य की गर्मी अधिक मालूम होती है। इसका कारण यह है कि उसमें लगकर किरणें बिखरती नहीं !

हम अपना सिर प्रायः ढके रहते हैं और बाहर जाते समय तो अवश्य ही ढक लिया करते हैं। पगड़ी तो हमारी पहचान हो गई है। फिर भी, जहाँ तक सुविधा हो, सिर खुला रखने में ही फायदा है। बाल बढ़ाना और पटिया पाड़ना जंगलीपन की निशानी हैं। बढ़े हुए बालों में धूल, मैल और जूएं पड़ जाती हैं। कहीं सिर में फोड़ा हुआ तो उसका इलाज करना भी कठिन हो जाता हैं। सिर पर साहब लोगों के से बाल बढ़ाना पगड़ी बाँधने वालों के लिये बेवकूफी है।

पैरों के द्वारा भी हम बहुतेरे रोगों के पंजे में फंस जाते हैं। बूट इत्यादि पहनने वालों के पैर नाजुक हो जाते हैं। उनके पसीना निकलने लगता है और वह बहुत ही बदबू करता है। जिस मनुष्य को बास की परख है वह मोजे और बूट पहिनने वाले मनुष्य के पास बदबू के मारे उस समय खड़ा नहीं रह सकता जब वह अपने मोजे और बूट उतार रहा हो। हम जूतों को पादत्राण और कंटकारि कहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि जब काँटों में, ठण्डक में अथवा धूप में चलना पड़े तभी जूते पहनने चाहिये और सो भी इस प्रकार के जिनसे केवल तलुये ढंकें। सारा पैर न ढक जाय। इस अभिप्राय को सेंडल (खड़ाऊंदार) जूते भली-भाँति पूरा कर सकते हैं। जिनका सिर दुखता हो जिनका शरीर कमजोर हो, जिनके पैरों में दर्द होता हो और जिन्हें जूते पहनने की आदत है, उनके लिये तो हमारी यही सलाह हैं कि वे नंगे पैर चलने का प्रयोग कर देखें। इससे उन्हें तुरन्त मालूम होगा कि पैर खुले रखने और उन्हें पसीना-रहित रखने से हम तत्काल कितना लाभ उठा सकते हैं।


ईश्वर की महिमा अपार है।

(पं. सच्चिदानन्दजी तिवारी, रीठी)

ईश्वर की महिमा अपार है। उसका आँशिक वर्णन अपनी-अपनी मति के अनुसार सब करते हैं पर उसका समस्त साँगोपाँग वर्णन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है क्योंकि बुद्धि जितनी दूर तक दौड़ सकती हैं उस परिधि से परमात्मा की सीमा असंख्य गुनी हैं। बुद्धि जितनी बातों को जानती है उसकी अपेक्षा वे बातें असंख्य गुनी अधिक हैं जिनका अब तक बुद्धि को कुछ भी पता नहीं चला हैं। जब स्थूल प्रकृति के सम्पूर्ण रहस्यों को ही हम नहीं जानते तो सूक्ष्मातिसूक्ष्म ब्रह्म तत्व को पूर्ण रूप से जान लेना किस प्रकार संभव है? इतना होते हुए भी ईश्वर हमसे सर्वथा अविज्ञात भी नहीं हैं। वह प्रत्येक स्थूल पदार्थ में व्यापक होने से हमारे अति निकट हैं, प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़ा है, यहाँ तक कि हमारे गुह्यातिगुह्य मर्मस्थल अन्तः करण में समाया हुआ है, इस प्रकार वह निकट है, उसकी संज्ञा सर्वत्र प्रकाशित और प्रकट हैं। उसी लिए उसे “अणोग्णयान महतो महीयान” कहा गया हैं।

ईश्वर अविचल है वह विचलित नहीं होता, फिर भी विश्व ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अणु परमाणु को गति, प्रेरणा और शक्ति प्रदान करता हुआ सृष्टि का संचालन करता है। वह अद्वैत हैं, क्योंकि “ईषवास्य मिदं सर्वं यत्किंचिद् जगत्याँजगत” यह जो कुछ हैं सब प्रभुमय है। परन्तु वह द्वैत भी है, और असंख्य भी हैं क्योंकि अनादि काल से इस सब पसारे को वह अपने साथ लिये हुए हैं ओर अनन्तकाल तक इसे अपने साथ लिये रहेंगे। जितने भी रूप हैं सब उसी के रूप हैं। वह निष्क्रिय, निराकार, निर्विकार हैं, साक्षी और दृष्टा मात्र रहकर वह निर्लिप्त हैं। इतने पर भी सारी क्रियाएं उसी की हैं, समस्त साकार उसी के हैं, उसकी इच्छा ही प्राणियों की इच्छा है। विशुद्ध से विकारी बन जाना उसी की लीला है।

वह अमर है, अजर हैं, अविनाशी है, वह न बदलता है और न घटता बढ़ता है, फिर भी प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति, वृद्धि, हीनता और मृत्यु का वही कारण है। वह हमें दिखाई नहीं देता पर हम सबको देखता है। उसे हम भली प्रकार नहीं जानते पर वह हमें आदि से अन्त तक भली प्रकार जानता है। हम उसकी दयालुता, और हितचिन्तकता को नहीं जानते, थोड़ी सी अनिच्छित परिस्थिति सामने आ जाने पर कहते हैं कि ईश्वर हमसे रुष्ट हैं, हमारे ऊपर दैवी प्रकोप हैं, हम उसे कोसते हैं और अन्यायी बताते हैं, पर वह जानता हैं कि हमारा वास्तविक हित किस बात में है। कई बार विपरीत परिस्थितियाँ ही हमारे सर्वोच्च हित में होती हैं इस बात को हम नहीं समझ पाते पर वह जानता है।

ईश्वर शक्ति का समुद्र हैं। जब हम उससे मिलते हैं तो शक्ति प्राप्त करते हैं। वह सत् का केन्द्र हैं उसकी समीपता से हमारा सतोगुण बढ़ता है। वह चित् हैं-उसकी आराधना से हममें चैतन्यता, स्फूर्ति, क्रिया-कुशलता आती हैं। वह आनन्द का स्रोत हैं- जब हम उसका ध्यान करते हैं, उपासना में निमग्न होते हैं तो आनन्द का पारावार नहीं रहता। आत्मानन्द की उपलब्धि ही जीवन का लक्ष्य है दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि परमात्मा की प्राप्ति ही जीव का ध्येय है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलता है वही सत्पथगामी, बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी कहा जा सकता हैं।

हमें प्रभु प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि वही एक मात्र प्राप्त करने योग्य हैं। हमें भगवत् चिन्तन में निमग्न रहना चाहिए क्योंकि वही वह दुर्ग हैं जिसमें प्रवेश करने पर विषय विकारों के, पाप तापों के विषैले बाणों से रक्षा हो सकती है। भवबन्धन को तरने के लिए प्रभु का स्मरण ही नौका हैं। आत्मकल्याण का आत्म लाभ सर्वोपरि स्वार्थ साधन केवल प्रभु चरणों की शरणागति से ही हो सकता है। इसलिए हम ईश्वर का चिन्तन करें , मनन करें, ध्यान करें , गुणगान करें , और उसे अपना जीवन सहचर बनावें , यही उचित है।


त्यागमय जीवन।

(श्री रमेशकुमारी जी मैनपुरी स्टेट)

आध्यात्म विद्या के अनुभवी आचार्यों ने सुख का बीज मन्त्र ‘त्याग‘ बताया हैं। त्याग ही बड़ी कृषि है जिसके परिणाम स्वरूप हजार गुनी फसल प्राप्त होती है। त्याग का व्यापार सबसे अधिक चतुरता, बुद्धिमत्ता, दूर दर्शिता और विवेकशीलता भरा सर्वथा लाभ ही देने वाला व्यापार है। “पहले दो, तब मिलेगा” का स्वर्ण सिद्धान्त अविचल हैं। नई प्राणवायु ग्रहण करने के लिए फेफड़ों में भरी हुई पुरानी हवा को त्यागना आवश्यक हैं। शौच जाकर पेट खाली न किया जाय तो नये भोजन को उदरस्थ करना कठिन है।

किसान बीज को खेत में बखेर देता है इस त्याग का यथा समय फल मिलता है। विद्याध्ययन में समय श्रम और धन खर्च होता है, समयानुसार इसका फल भी मिलता है। भरी थैली को व्यापार में फंसा देने के बाद, खाली कर देने के बाद ही व्यापारी कुछ लाभ उठा सकता है। पति पत्नी-मित्र मित्र-जब एक दूसरे के लिए कुछ त्याग करते हैं तभी उन्हें मैत्री का सुख मिलता है। यदि दोनों पक्ष अपने अपने मतलब में चौकस रहें अपनी जरा भी हानि न होने दें, केवल स्वार्थ का ही ध्यान रखें तो पति पत्नी में और मित्र मित्र में प्रेम का आनन्द उदय नहीं हो सकता। माता पिता यदि सन्तान के लालन पालन में आत्म त्याग न करे तो सन्तान सुख प्राप्त करना उनके लिए कैसे संभव हो सकता है? बाजार में “इस हाथ दे, उस हाथ ले” का व्यवहार चलता है। कोई वस्तु खरीदनी है तो उसकी कीमत चुकाये बिना अभिलाषित वस्तु प्राप्त नहीं हो सकती। कुछ प्राप्त करने से पहले कुछ देना आवश्यक हैं।

यह नियम आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उसी प्रकार लागू होता है जैसा कि भौतिक जगत में। गीता में बताया गया हैं कि-त्याग ही सुखों का जनक है। यदि आत्मोन्नति करनी है तो त्याग का मार्ग अपनाना आवश्यक है। त्याग का तात्पर्य है-छोड़ना ! हम प्रायः अपने स्वार्थ को, मोह को, अहंकार को, ममता को, स्वामित्व को बहुत बढ़ा लेते हैं फलस्वरूप मनः क्षेत्र पर इतना भार जमा रहता है कि उसके दबाव से अन्तः- करण हर घड़ी दबा हुआ, कुचला हुआ, भारी-भारी रहता हैं। प्रायः धनवान एवं वैभव सम्पन्न लोग रात दिन चिन्ताओं से बेचैन रहते हैं। कारण यह है कि उनकी ममता के सूत्र से बंधा हुआ वह वैभव उनके ऊपर भार बनकर चढ़ उठता है फलस्वरूप वे धन का सुख भोगना तो दूर उस वैभव के भार से दबे हुए कुचले हुए दूसरे दुख उठाते रहते हैं, और एक गरीब की अपेक्षा भी बुरी मनः स्थिति में रहते हैं।

बड़ा संचय इसलिए उपयोगी हो सकता हैं कि उससे बड़ा त्याग किया जाय। अन्यथा भी हिंसा, असत्य, चोरी, दुराचार की भाँति ही परिग्रह को भी पाप माना गया है। आत्मोन्नति का साधन योग है, योग की आरंभिक सीढ़ी यम नियम है। यम पाँच हैं-“अहिंसा, सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यपरिग्रह यमः” इस सूत्र में महर्षि पातंजलि ने अपरिग्रह को आत्मोन्नति का प्रारंभिक तथ्य बताते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जो लोग केवल ममता स्वार्थ और संचय ही पसंद करते हैं, त्याग करने में जिनकी रुचि नहीं हैं वे आत्मोन्नति नहीं कर सकते। त्याग के बिना आत्म सुख की प्राप्ति असंभव है।

हमारे धर्मशास्त्रों में पग पग पर दान का महात्म्य वर्णित है। हर कर्मकाण्ड के साथ हर शुभकर्म के साथ हर आपत्ति के निवारण के लिए, कुछ न कुछ दान करना आवश्यक होता है, जिनमें मनुष्य त्याग का पाठ पढ़े। हमारे प्रातःस्मरणीय ऋषि मुनि, जिनके चरणों में ऋद्धि सिद्धि लोटती थी, भिक्षाटन करते थे, जिससे वे लोगों को दान का, त्याग का क्रियात्मक पाठ पढ़ा सकें अभ्यास करा सकें। कंदमूल फल खाकर गुजर कर सकने वाले, वल्कल वस्त्रों से तन ढके रह सकने वाले वीतराग महात्माओं को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती पर लोगों को त्याग की साधना कराने के लिए वे भी भिक्षाटन करते हैं। इसमें लेने वाले का लाभ नहीं देने वाले का ही लाभ प्रधान है। आज के भिक्षाजीवियों की दुरावस्था का भयंकर चित्र खींचते हुए तो दुख होता है पर प्राचीन काल में दान धर्म का उदय आत्म कल्याण के प्रधान साधन के रूप में ही हुआ था।

एक कथा है कि एक चोर किसी साधु के पास गया, और कहने लगा कि मुझे भी ऊँचा उठने का, स्वर्ग जाने का उपाय बताइए। साधु ने एक दिन नियत कर दिया कि उस दिन आना। चोर नियत समय पर पहुँचा। साधु ने चार भारी पत्थर उसके सिर पर रख दिये और अपने पीछे पीछे पहाड़ी पर चढ़ते आने को कहा। चोर चढ़ने लगा पर थोड़ी ही देर में हाँफने लगा, तब साधु ने एक पत्थर उतार कर फेंक दिया। इससे वह कुछ तो हलका हुआ पर थोड़ी ही दूर चल फिर लड़खड़ाने लगा, साधु ने एक पत्थर और उतार दिया। कुछ दूर बाद वह दो पत्थर भी भारी लगे। इसी प्रकार एक एक करके वह दो पत्थर भी फेंक दिये गये तब बोझ रहित हो जाने पर चोर आसानी से साधु के साथ चला गया और पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गया। तब साधु ने कहा कि तेरे सिर पर जब तक पत्थर रखे हुए थे तब तक पहाड़ी पर चढ़ना कठिन था पर जब पत्थर फेंक दिये तो चढ़ना सहज हो गया। इसी प्रकार जब तक मनुष्य के ऊपर स्वार्थ, संचय, ममता, भोग विलास रूपी पत्थरों का बोझ लादा रहता है तब तक उसे उसी को उठाये रहना कठिन पड़ता है, फिर आत्मोन्नति के लिए चलना किस प्रकार हो सकता है? यदि तू लोभ, स्वार्थ, विलासिता अहंकार आदि पत्थरों को फेंक कर हलका हो जाय तो मेरी ही भाँति तेरे लिए भी साधु बनना संभव है।

महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों से कहा था कि-“जो बहुत जोड़ता है वह बहुत खोयेगा। जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है वह सब कुछ छोड़कर मेरे साथ चले।” भगवान बुद्ध ने राज सिंहासन छोड़ा था पर वे किसी प्रकार घाटे में नहीं रहे। राजा विश्वामित्र से महर्षि विश्वामित्र का पद ऊंचा था, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी कुछ बुरे नहीं रहे, अमीर का बेटा जवाहर, दर दर का भिखारी जवाहर बना परन्तु उसका वह त्याग कोई घाटे का सौदा नहीं है। अकबर का दरबारी प्रताप सिंह बनने की अपेक्षा जंगलों में भटकने वाला राणाप्रताप क्या मूर्ख कहलाया ? भामा शाह अपना सब कुछ लुटा गये, क्या वे घाटे में रहे ? सिकन्दर अपनी दौलत को देख देखकर मरते वक्त बुरी तरह फूट फूट कर रोता था, मरने के बाद उसने अपने दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकले रहने देने का आदेश किया था ताकि लोग यह जान सकें कि विपुल सम्पत्ति जमा करने वाला सिकन्दर अपने साथ कुछ भी न ले जा सका था उसके दोनों हाथ बिल्कुल खाली थे।

त्याग का अर्थ जिम्मेदारियों का कर्तव्य का त्याग नहीं है जैसा कि आजकल कितने ही नासमझ लोग अपने कठोर कर्तव्यों से विमुख होकर कायरतापूर्वक घर छोड़कर भाग खड़े होते हैं और विचित्र वेष बनाकर आलस्य में समय बिताते हुए दूसरों पर भार बनते हैं। त्याग का वास्तविक अर्थ है- अपनी दुर्भावना दुर्वासना स्वार्थपरता, ममता एवं लोभवृत्ति का त्याग। वेद भगवान ने कहा दे--“सौ हाथों से कमा, हजार हाथों से दान कर” हम तत्परतापूर्वक अपने श्रम का शक्ति का योग्यता का समय का पूरा पूरा उपयोग करते हुए आत्मिक और साँसारिक उत्पादन बढ़ावे और उस उत्पादन का आवश्यक अंश जीवन निर्वाह के लिए उपयोग करते हुए शेष को निर्लोभ भाव से परमार्थ में लगावें। यही गीता का कर्म योग हैं। यह त्यागमय जीवन बिताने की नीति मानव जीवन के सदुपयोग की सर्वोत्तम नीति है, आत्मोन्नति की सर्वोत्तम साधना है।


Quotation

आपत्तियाँ आने पर उनका वीरता के साथ सामना करो और उनसे विचलित न होओ।

-मारकस अनटोनियस

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मनुष्य कष्टों के कारणों को दूर करने का प्रयत्न करके कष्टों को कम कर सकता है। यही उसके करने योग्य कार्य हैं।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर

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कठिनाइयों की सृष्टि करना बुद्धिमानी नहीं है, इन पर विजय प्राप्त करना पुरुषार्थी मनुष्यों का काम हैं। -प्रेमचन्द


चार मनःस्थितियाँ और समाधि।

(डॉ. गोपालप्रसाद ‘वंशी’, वेतिया)

वेदान्त मत में संसार स्वप्नवत् है। स्वप्न की चार ही अवस्था हैं-स्वप्नावस्था से ये चार ही प्रकार के स्वप्न देखे जाते हैं, प्रकारान्तर की कल्पना का अन्तर्भाव इन्हीं चारों में हो जाता है। स्वप्न की ये दशाएं और इनका क्रम इस प्रकार है :-

(1) जब मनुष्य सोने लगता हैं तो क्रमशः बाह्य व्यापार बन्द होने लगते हैं। पहले दूरस्थ व्यापार से मन उपरत होता जाता है, फिर आस-पास के मकान आदि अन्य वस्तुओं से, पश्चात् शरीर का ज्ञान भी नहीं रहता और आत्मा सहसा एक दूसरे संसार में पहुँच जाता है।

इस प्रथम प्रकार के स्वप्न की अन्तिम दशा में अन्नमय कोश का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, केवल शरीराध्यास की वासना बनी रहती है। इस प्रथम स्वप्न में जो दृश्य हमारे सामने आते हैं उनके सम्बन्ध में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना मन करता है और इष्टनिष्ट का निर्णय बुद्धि करती है, इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के त्याग के लिये मन, प्राण को प्रेरणा करता है। इस दशा में भयंकर सिंह, सर्प आदि अनिष्ट पदार्थों से स्वप्नद्रष्टा भागना चाहता है तो सोते-सोते अनायास पाँव हिलने-काँपने लगते हैं कभी-कभी उठकर चलने भी लगता हैं। जीवात्मा यह स्वप्न-व्यापार प्राणमय कोश पर्यंत के अध्यास से करता है—यद्यपि इस अवस्था में प्रधान व्यापार प्राणमय कोश का ही रहता है पर इसके अगले तीन कोशों (मनोमय,विज्ञानमय और आनन्दमय) के व्यापार का संबंध भी रहता है, क्योंकि ये तीनों कोश सूक्ष्मता के तारतम्य से परस्पर संबंध है। यथा--(क्रिया)-भागना, चलना आदि प्राणमय कोश का काम है, (कल्पना)-यह इष्ट है या अनिष्ट इत्यादि मनोमय कोश का, निर्णय विज्ञानमय कोश (बुद्धित्व) का और इष्ट में आनन्द-प्रतीत ‘आनन्दमय कोश, का कार्य है।

(2) स्वप्न की दूसरी दशा यह है कि द्रष्टा, सिंह आदि अनिष्ट पदार्थ को देखकर भागना चाहता है, पाँव काम नहीं देते, चल नहीं सकता, किसी को पुकारना चाहता है पर जबान नहीं खुलती, इसका कारण यह है कि इस दशा में आत्मा में प्राणमय कोश का अध्याय छूट जाता है--(क्रिया प्राणमय कोश के सहारे होती हैं, इसलिये ऐसा होता है)--इस अवस्था में शेष तीनों कोशों का काम बराबर जारी रहता है, अर्थात् मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय और इष्ट में आनन्द का मान, यह सब होता रहता हैं। उक्त दोनों प्रकार के स्वप्न सर्व साधारण को होते हैं।

(3) स्वप्न की तीसरी दशा यह है कि वस्तु (स्वप्न इष्ट) या अनिष्ट सामने हैं, पर उसके संबंध में ग्रहण या परिहार की कल्पना नहीं होती। इष्ट, तटस्थ बना रहता है, यह विज्ञानमय कोश का काम है, इसमें वस्तु का बोध मात्र होता है और यह स्वप्न प्रायः सत्य ही होता है। इसी स्थिति की उत्कृष्ट दशा का नाम योग में- ‘ऋतम्भरा, प्रज्ञा हैं। इसी प्रज्ञा के द्वारा वेदादि शास्त्रों का यथार्थ ज्ञान होता है, इसमें सात्विक वासना का लेश होता है।

(4) स्वप्न की चौथी अवस्था वह है जिसमें ‘दृश्य, कुछ नहीं होता, केवल आनन्द का आभास होता है क्योंकि इस अवस्था में बुद्धि का व्यापार बन्द हो जाता हैं। यह दशा आनन्द मय कोश की है, इसमें अन्य किसी कोश का संबंध लेशमात्र भी नहीं रहता।

यह अन्तिम दोनों स्वप्न (तीसरा, चौथा) सिर्फ संयमी पुरुष को ही होते हैं। इसे ही ‘सबीज’ या ‘सविकल्प’ भी कह सकते हैं।

इन उक्त प्रकार के चारों स्वप्नों की दशा से परे पहुँचने पर जो भी अवस्था रहती है वही आत्मस्वरूप की दशा, प्रत्यगावस्था अथवा विशुद्ध ज्ञान है।

समाधि से परे जो अवस्था है वह ब्राह्मीभूत अन्नत है। उसमें पहुँचने पर आत्मा परब्रह्म परमात्मा में विलीन होकर स्वयं सत् चित् और आनन्द स्वरूप हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के उपरान्त और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता।


गायत्री का अर्थ चिन्तन।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ-ब्रह्म

भूः-प्राण स्वरूप,

भुवः-दुःखनाशक

स्वः-सुखस्वरूप

तत-उस

सवितुः-तेजस्वी, प्रकाशवान

वरेण्यं-श्रेष्ठ

भर्गः-पाप नाशक

देवस्य-दिव्य को, देने वाले को।

धीमहि-धारण करें,

धियो-बुद्धि

योः-जो

नः-हमारी

प्रचोदयात्-प्रेरित करे।

गायत्री मन्त्र के इस अर्थ पर मनन एवं चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्वों की वृद्धि होती है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। वह भाव बड़े ही शान्तिदायक उत्साहप्रद सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्य प्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।

मनन के लिये कुछ संकल्प नीचे दिये जाते हैं। इन शब्दों को नेत्र बन्द करके मन ही मन दुहराना चाहिए और कल्पना शक्ति की सहायता से इनका मानस चित्र मनः लोक में भली प्रकार अंकित करना चाहिए-

1-भूःलोक, भुवःलोक, स्वःलोक, तीनों लोकों में-ॐ परमात्मा-समाया हुआ है। यह जितना भी विश्व ब्रह्माण्ड है, परमात्मा की साकार प्रतिमा है। कण कण में भगवान समाये हुए हैं। इस सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र देखते हुए मुझे कुविचारों और कुकर्मों से सदा दूर रहना चाहिए, एवं संसार की सुख शान्ति तथा शोभा बढ़ाने में सहयोग देकर प्रभु की सच्ची पूजा करनी चाहिए।

2-तत-वह परमात्मा, सवितुः-तेजस्वी, वरेण्य-श्रेष्ठ, भर्गो-पाप रहित और देवस्य-दिव्य है। उसकी मैं अन्तःकरण में धारणा करता हूँ। इन गुणों वाले भगवान मेरे अन्तःकरण में प्रतिष्ठित होकर मुझे भी तेजस्वी, श्रेष्ठ, पापरहित एवं दिव्य बनाते हैं। मैं प्रतिक्षण इन गुणों से युक्त होता जाता हूँ। इन गुणों की मात्रा मेरे मस्तिष्क तथा शरीर के कण कण में बढ़ती जाती है। मैं इन गुणों से ओत प्रोत होता जाता हूँ।

3-‘यो-वह परमात्मा, नः हमारी, धियो-बुद्धि को, प्रचोदयात्-सन्मार्ग में प्रेरित करें। हम सबकी हमारे स्वजन परिजनों की, बुद्धि सन्मार्गगामी हो। संसार की सबसे बड़ी विभूति, सुखों की आदि माता, सद्बुद्धि को पाकर हम इस जीवन में ही स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करें। मानव जन्म को सफल बनावे।’

उपरोक्त तीन चिन्तन-संकल्प पर धीरे-धीरे मनन करना चाहिए। एक एक शब्द पर कुछ क्षण रुकना चाहिए और उस शब्द का कल्पना-चित्र मन में बनाना चाहिए।

जब यह शब्द पढ़े जा रहे हों कि परमात्मा भूः भुवः स्व तीनों लोकों में व्याप्त है। तब ऐसी कल्पना करनी चाहिए जैसे हम पाताल, पृथ्वी, स्वर्ग को भली प्रकार देख रहे हैं और उसमें, गर्मी, प्रकाश, बिजली शक्ति या प्राण की तरह परमात्मा सर्वत्र समाया हुआ है। यह विराट ब्रह्माण्ड ईश्वर की एक जीवित जागृत साकार प्रतिमा है। गीता में अर्जुन को जिस प्रकार भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया है वैसे ही विराट् पुरुष के दर्शन अपने कल्पना लोक में मानस चक्षुओं से करने चाहिए। खूब जी भरकर इस विराट् ब्रह्म के, विश्व पुरुष के, दर्शन करने चाहिए। और अनुभव करना चाहिए कि मैं इस विश्व पुरुष के पेट में बैठा हूँ। मेरे चारों ओर परमात्मा ही परमात्मा है। ऐसी महाशक्ति की उपस्थिति में कुविचारों और कुसंस्कारों और कुकर्मों को मैं किस प्रकार अंगीकार कर सकता हूँ? इस विश्व पुरुष का कण कण मेरे लिए पूजनीय है। उसकी सेवा, सुरक्षा, एवं शोभा बढ़ाने में प्रवृत्त रहना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है।

संकल्प के दूसरे भाग का चिन्तन करते हुए अपने हृदय को भगवान का सिंहासन अनुभव करना चाहिए और उस परम तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, निर्विकार, दिव्य गुणों वाले परमात्मा को विराजमान देखना चाहिए। भगवान की झाँकी तीन रूप में की जा सकती है। (1) विराट पुरुष के रूप में (2) राम कृष्ण, विष्णु, गायत्री सरस्वती आदि के रूप में (3) दीपक की ज्योति के रूप में। यह अपनी भावना इच्छा और रुचि के ऊपर है। परमात्मा को पुरुष रूप में या गायत्री के मातृ रूप में अपनी रुचि के अनुसार ध्यान किया जा सकता है। परमात्मा स्त्री भी है और पुरुष भी। गायत्री साधकों की माता गायत्री के रूप में ब्रह्म का ध्यान करना अधिक रुचता है। सुन्दर छवि का ध्यान करते हुए उसमें सूर्य के समान तेजस्विता, सर्वोपरि श्रेष्ठता परम पवित्र, निर्मलता और दिव्य सतोगुण की झाँकी करनी चाहिए। इस प्रकार गुण और रूप वाली ब्रह्म शक्ति को अपने हृदय में स्थायी रूप से बस जाने की, अपने रोम रोम में रम जाने की भावना करनी चाहिए।

संकल्प के तीसरे भाग का चिन्तन करते हुए ऐसा अनुभव करना चाहिए कि वह गायत्री- ब्रह्म शक्ति हमारे हृदय में निवास करने वाली भावना तथा मस्तिष्क में रहने वाली बुद्धि को पकड़ कर सात्विकता के, धर्म के, कर्तव्य के, सेवा के, सत्पथ पर घसीटे लिये जा रही है। बुद्धि और भावना को इसी दिशा में चलने का अभ्यास तथा प्रेम उत्पन्न कर रही है। तथा वे दोनों बड़े आनन्द, उत्साह तथा संतोष का अनुभव करते हुए माता गायत्री के साथ साथ चल रही हैं।

गायत्री में दी हुई यह तीन भावनाएं क्रमशः ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग का प्रतीक हैं। इन्हीं तीनों भावनाओं का विस्तार होकर योग के ज्ञान, भक्ति और कर्म यह तीन आधार बने हैं। गायत्री का अर्थ चिन्तन बीज रूप से अपनी अन्तरात्मा को तीनों योगों की त्रिवेणी में स्नान कराने के समान है।

इस प्रकार चिन्तन करने से गायत्री मंत्र का अर्थ भली प्रकार हृदयंगम हो जाता है और उसकी प्रत्येक भावना मन पर अपनी छाप जमा लेती है। जिससे यह परिणाम कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगता है कि मन कुविचारों और कुकर्मों की ओर से हट गया है और मनुष्योचित सद्विचारों एवं सत्कर्मों में उत्साह पूर्वक रस लेने लगा है। यह प्रवृत्ति आरम्भ में चाहे कितनी ही मन्द क्यों न हो पर यह निश्चित है कि यदि वह बनी रहे, बुझने न पावे तो निश्चय ही आत्मा दिन दिन समुन्नत होती जाती है।


बच्चों का शोष (सूखा) रोग।

(लेखक -आयुर्वेदाचार्य श्री सत्येंद्रनाथ जी शास्त्री)

जिस प्रकार देश में उत्पत्ति-संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है, उसी प्रकार मृत्यु संख्या भी बढ़ती ही जाती है। छोटे-छोटे बालक ठीक परिचर्या न होने से अकाल में ही काल के गाल में चले जाते हैं। कितने ही बालक उचित आहार दूध की कमी, रहने के स्थान की कमी, वस्त्रों की कमी, आदि के कारण और कितने ही रोग में फँसकर उचित चिकित्सा के न होने से मृत्यु मुख में गिरते हैं। बच्चों की मृत्यु का कारण ज्वर, खाँसी, दस्त, पेचिश, पसली, मोतीझरा, माता, और सूखा आदि रोग हैं। इन्हीं रोगों से बहुधा बालकों की मृत्यु होती है। इन सब रोगों में सूखा रोग सबसे अधिक कष्टदायक, असाध्य और दुश्चिकित्स्य है। दुर्भाग्य से यह रोग हमारे देश के बालकों में बहुत होता है। हमने देखा है कि सूखा रोग से पीड़ित सौ में निन्यानवे बालक अच्छे होते ही नहीं। दैवयोग से सौ में कोई एक आध ही बच पाता है।

सूखा रोग किसे कहते हैं?-इस रोग को वैद्यकशास्त्र में “शोष” कहते हैं। यह क्षय रोग का एक भेद है। जिस प्रकार क्षयरोग (तपेदिक) असाध्य होता है, उसी प्रकार बालकों को यह (सूखा रोग) भी असाध्य होता है।

सूखारोग के लक्षण :- सूखारोग का बालक बहुत दुर्बल हो जाता है। उसे हर समय थोड़ा बहुत ज्वर बना रहता है और दिन रात में कभी तेज भी हो जाता है। खाँसी रहती है, खाँसी में कभी कफ आता है, कभी नहीं आता। खाँसी के विकार से फुफ्फुस (फेफड़ों) में कफ (बलगम) बोलता रहता है। पेट कड़ा हो जाता है और पेट में अजीर्ण से मल की गांठें पड़ जाती हैं, कभी कभी अपने आप पतले दस्त भी हो जाते हैं। बच्चे को कभी भूख लगती है, कभी नहीं, प्रायः अरुचि ही रहा करती है। यहाँ तक कि माँ का दूध भी पच नहीं पाता। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा और रूखा हो जाता है। वह हर समय रें-रें किया करता है। शरीर में रक्त-माँस की कमी हो जाती है, और उसके हाथ पाँव सूख कर पतले लकड़ी से हो जाते हैं। पीठ, रीढ़ खम्भा कमर आदि अंगों का माँस सूख जाता है और बैठक की जगह खाल लटक कर सलवटें पड़ जाया करती है। बच्चे की आवाज (स्वर) बहुत क्षीण हो जाती है तथा वह हर प्रकार से अशक्त हो जाता है।

सूखा रोग क्यों होता है? :- सूखारोग होने के मोटे-मोटे ये तीन कारण हैं।

(1) माता के पोषकतत्व हीन दूषित दूध से।

(2) दूषित ऊपरी दूध से।

(3) दूसरे रोगियों के संसर्ग से।

1-यह रोग बच्चों को दूध की खराबी से होता है। बच्चे तो किसी प्रकार का कुपथ्य करते नहीं, किन्तु उनको दूध पिलाने वाली उनकी माँ अथवा धाय कुपथ्य कर लेती हैं। जो छोटे-छोटे बालक अपनी माँ का दूध पीते हैं, उनको शरीर की वृद्धि और पोषण के लिये अच्छा दूध मिलना चाहिये। जो स्त्रियाँ अनेक प्रकार के खट्टे, बासी, अजीर्णकारक, दूध को दूषित करने वाले पदार्थ खाती हैं, अथवा अतिचिन्ता, क्रोध, शोक, ईर्ष्या, द्वेष, कलह और कामवासना से ग्रस्त रहती हैं, उनका दूध दूषित हो जाता है। दूषित दूध के पीने से बालकों को अजीर्ण, ज्वर, खाँसी, मोतीझरा, आदि अनेक रोग हो जाते हैं। अतः दूध पिलाने वाली माताओं को चाहिए, कि वे जब तक बच्चों को अपना दूध पिलावें तब तक ऊपर कहे हुए दूध को बिगाड़ने वाले अजीर्ण आदि कारणों से बचती रहें, और सदा शुद्ध, ताजा दुग्धवर्द्धक अग्निप्रदीपक आहार सेवन करें।

छह महीना, नौ महीना अथवा एक वर्ष तक, जब तक बालक माता का दूध पीये तब तक, बच्चे की माँ को चाहिए कि वह दूध दलिया आदि दुग्धवर्धक और दुग्धपोषक पदार्थों का सेवन अवश्य किया करे। जो माताएँ ऐसा नहीं करतीं किन्तु इसके विपरीत दूध को बिगाड़ने वाले पदार्थों का सेवन करती हैं, उनका दूध अवश्य दूषित हो जाता है और उस दूध में बच्चे के शरीर का पोषण करने वाले पोषक तत्व नहीं रहते। बच्चे के शरीर की वृद्धि के लिये दूध में पोषक तत्वों का होना अत्यावश्यक है। जब बच्चों को पोषक तत्व हीन दूषित दूध पिलाया जाता है, तब वे दुर्बल और रोगी हो जाते हैं। पोषक तत्वहीन दूध को पीने वाले बालकों के शरीर रस, रक्त, माँस, चरबी, हड्डी, मज्जा आदि धातुओं की वृद्धि होना बन्द हो जाती है। इसके बाद जब वे दूषित दूध पीते हैं, तब उस दूषित दूध से अजीर्ण, ज्वर, खाँसी, दस्त, सूखा आदि रोग शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार महादुष्ट सूखारोग की उत्पत्ति होती है। रोग, शत्रु और अग्नि इनको लगते ही मिटा देना चाहिए, ऐसा ऋषियों ने कहा है। जो लोग ऋषि वाक्य पर नहीं चलते वे सदा हानि उठाते हैं।

बालक जनने के बाद स्त्रियों का शरीर अत्यन्त दुर्बल और अशक्त हो जाता है। उस समय उनके शरीर की पुष्टि के लिये आहार और विश्राम तथा उचित परिचर्या की आवश्यकता होती है। यदि उस समय जरा भी असावधानी से काम लिया जाय तो प्रसूता (जच्चा) को ज्वर, खाँसी, दस्त, क्षय (दिक) आदि रोग शीघ्र ही पैदा हो जाते हैं, रोगी होने से प्रसूता (जच्चा) का दूध भी रोगी हो जाता है, और उस दूध में रोग के साथ साथ बालक के शरीर की पुष्टि व वृद्धि करने वाले पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है। उस रोगी सारहीन दूध के पीने से बालक को सूखारोग हो जाता है। इस प्रकार माँ के दूषित और पोषक-तत्वहीन दूध के पिलाने से बालकों को सूखारोग हुआ करता है।

2-जिन माताओं के स्तनों में दूध कम उतरता है, अथवा जो अपनी बीमारी या कमजोरी से अपना दूध नहीं पिला सकतीं, वे बालक को ऊपर का दूध पिलाती है। ऊपर के दूध में गाय, बकरी या बाजार में गाय, भैंस, बकरी, भेड़ का मिला हुआ दूध होता है, हमारे यहाँ अधिकतर माताओं को बच्चों के दूध पिलाने का सही ढंग नहीं मालूम होता। इस विषय में माताओं को बहुत जानकारी की आवश्यकता है। जन्म से ही बालक को ऊपर का दूध पिलाना अच्छा नहीं। हमारा तो यह विचार है कि माताओं को कम से कम छह मास अथवा नौ मास तक शिशु को अपना ही दूध पिलाना चाहिये। क्योंकि शिशु को जैसा अनुकूल अपनी माँ का दूध होता है, वैसा और नहीं होता। यदि माता के दूध कम उतरे अथवा रोग आदि से दूषित हो तो उन्हें योग्य चिकित्सक से चिकित्सा कराकर उस दूध के दोषों को दूर करना चाहिये। नौ मास या एक वर्ष (12 मास) का बालक इस योग्य हो जाता है कि वह ऊपर के दूध को पचा सके। बालक को यदि ऊपर का ही दूध पिलाना हो तो गाय या बकरी का ताजा दूध लेकर उसमें थोड़ा जल मिलाकर मन्द अग्नि से औटाकर उसमें किंचित मीठा मिलाकर थोड़ा थोड़ा पिलाना चाहिए। गाय से बकरी का दूध अधिक अच्छा है।

3-तीसरा कारण-छोटा बालक किसी रोगी बालक बालक या पुरुष-स्त्री के पास रहता है और उस रोग से पीड़ित रोगी का झूठा जल, दूध अन्न आदि वस्तु खा लेता है, तो उसके शरीर में उस रोग के कीटाणु बहुत शीघ्रता से प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं। अतः माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने उन्हें कोंपल-कलेवर बालकों को रोगी मनुष्यों से सदा अलग ही रखा करें।

सूखारोग का परिणाम-

हम पहले ही लिख चुके हैं कि यह रोग असाध्य होता है। जिस घर में यह बच्चों को लग जाता है, उसमें क्षयरोग की भाँति अनेकों बच्चों की जाने जाती हैं। हमने स्वयं देखा है कि इसी महादुष्ट रोग से एक एक माँ ने अपने नौ नौ बालक गंवाये हैं। अनेकों घर इस रोग के प्रताप से बलहीन हो गये। आगे का वंश चलाने वाला कोई बालक ही न जीया। धनी घरों में बालकों को जब यह रोग लग जाता है तब उसकी चिकित्सा में वैद्यों और डाक्टरों के लिए हजारों रुपया गँवाया जाता है, परन्तु अन्त में कोई लाभ नहीं होता। यह प्राण नाशक रोग बालक की जीवन लीला समाप्त करके ही पीछा छोड़ता है। बहुत कम बच्चे इस मूँजी मरज के पंजे से बच पाते हैं।

रोग से बचने के उपाय :-

जो जो कारण रोग होने के बताये गये हैं, उन कारणों से बालकों को बचाना चाहिये। सब से प्रथम बालक के लिये शुद्ध दूध और यदि वह अन्न खाने लगा हो तो अन्य खाने-पीने की वस्तु का ठीक प्रबन्ध करना चाहिये। यदि बच्चे को माता के दूध की खराबी से यह (सूखा) रोग हुआ हो तो माता के दूध को शुद्ध कराने को चिकित्सा करानी चाहिये और उसकी माता का दूध पिलाना बन्द कराकर उत्तम गाय या बकरी का विधिपूर्वक औटाया हुआ शुद्ध दूध पिलाना चाहिये। बच्चे को योग्य चिकित्सक को दिखाना चाहिए। इस रोग को चिकित्सा में ढील डालना या टालम-टोल करना अच्छा नहीं क्योंकि बहुत बढ़ जाने पर यह अच्छा होता ही नहीं ऐसा देखा गया है।

(1) बालक को अत्युत्तम “स्वर्ण भस्म” (सोने का भस्म) दो चावल (चौथाई रत्ती) लेकर उसे एक-एक रत्ती दूध बच और अतीस के चूर्ण में मिलाकर नित्य प्रातः काल और सायंकाल खिलावें। उत्तम स्वर्ण भस्म विश्वसनीय स्थान से योग्य वैद्यराजों से लेवें, नकली से लाभ न होगा।

(2) अतीस, काकड़ा सींगीं, छोटी पीपल और नागरमोथा इन चारों को उत्तम-उत्तम (अतीस घुनी न हो) लेकर कूटकर चूर्ण बनावें। इस चूर्ण की मात्रा बालकों के लिए एक रत्ती से चार रत्ती तक की है। इस चूर्ण में दो चावल स्वर्ण भस्म और आधी रत्ती मोती या मूँगा की भस्म मिला कर मधु (छोटी मक्खी का असली शहद) से मिलाकर दिन रात्रि में दो बार से चार बार तक खिलावें।

(3) “सितोपलादि चूर्ण” (योग्य वैद्यों के यहाँ सदा मिलता है) में स्वर्णभस्म अथवा मोती भस्म अथवा मूँगा की भस्म मिलाकर दिन−रात में चार बार नित्य समान भाग मधु घृत में मिलाकर खिलावें।

(4) “च्यवनप्राश अवलेह” माशे में स्वर्ण या मोती-मूँगा की भस्म मिलाकर दूध में घोलकर दिन-रात्रि में सवेरे, दोपहर, शाम-तीन बार खिलावें।

(5) बच्चे के शरीर में “महालाक्षादि तैल” या “बृहच्छतावरी तैल” अथवा “अश्वगन्धादि तैल” की नित्य मालिश करें, और साथ ही ऊपर लिखी औषधियों में से कोई औषधि खिलावें। औषधियों के सेवन के समय बच्चे को सिर्फ दूध ही पिलाना चाहिये, और कुछ नहीं। इस प्रकार बालक की चिकित्सा करानी चाहिये।


अखण्ड ज्योति द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति, गहरे अनुभव और अनुसंधान के साथ लिखी गई है।

(1) मैं क्या हूँ।

(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान।

(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान।

(4) परकाया प्रवेश।

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या।

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार।

(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान।

(8) भोग में योग।

(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय।

(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य।

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि।

(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि।

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?

(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना।

(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?

(17) गहना कर्मणो गतिः

(18) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर प्रकाश।

(19) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा।

(20) शक्ति संचय के पथ पर।

(21) आत्मगौरव की साधना।

(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान।

(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला।

(24) आन्तरिक उल्लास का विकास।

(25) आगे पढ़ने की तैयारी।

(26) अध्यात्म धर्म का अवलोकन।

(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन।

(28) ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग।

(29) यम नियम।

(30) आसन प्राणायाम।

(31) प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि।

(32) तुलसी के अमृतोमय गुण।

(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान।

(34) मैस्मेरिज्म की अनुभव पूर्ण शिक्षा।

(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग।

(36) हस्त विज्ञान।

(37) विवेक सतसई।

(38) संजीवनी विद्या।

(39) गायत्री की चमत्कारी साधना।

(40) महान जागरण।

(41) तुम महान हो।

(42) गृहस्थ योग।

(43) अमृत, पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति।

(44) घरेलू चिकित्सा।

(45) बिना औषधि कायाकल्प।

(46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण।

(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

(48) विचार करने की कला।

(49) दीर्घ जीवन के रहस्य।

(50) हम वक्ता कैसे बन सकते है?

(51) लेखन कला।

(52) प्रार्थना के चमत्कार।

(53) विचार संचालन विद्या।

(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।

(55) आध्यात्म शास्त्र।

(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।

(57) सफलता के तीन साधन।

(58) शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य।

(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति।

(60) दैवी संपदायें।

(61) आध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार।

(62)कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान।

(63) सुखी वृद्धावस्था।

(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग।

(65) वैज्ञानिक आध्यात्मवाद।

(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनायें।

(67) योग के नाम पर मायाचार।

(68) जादूगरी या छल।

(69) सौभाग्य बढ़ाना।

(70) सम्मोहन विज्ञान।

(71) ब्रह्मचर्य विज्ञान।

(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व।

(73) प्रेम का रहस्य।

(74) अमृत कण।

(75) उपवास के चमत्कार।

(76) प्रसिद्धि और समृद्धि।

(77) स्त्री-रोग-चिकित्सा।

(78) बाल-रोग-चिकित्सा।

(79) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत।

(80) यज्ञोपवीत से धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।

मूल्य में कमी के लिये लिखा-पढ़ी व्यर्थ है। छः रुपए से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ

व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा।


पतझर बारह मास इधर है।


पतझर बारह मास इधर है

(श्री राज बहादुर ‘विकल’)

तुम बसंत के गीत गा रहे पतझर बारह मास इधर है!

यह बसन्त उनका है जिनके महल और ऊँची दीवारें,

जिनके घर सोने चाँदी की होती रहती है झनकारें

मैं मजदूर, झोपड़ी मेरी रात रात-रोया करती है,

यहाँ भूख का ताँडव होता मति धीरज खोया करती है!

सोने को धरती व ओढ़ने को नीला आकाश इधर है!

धनवानों के घर बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

रक्त चूस डाला धरती ने सरसों से है चेहरे पीले

नहीं धार की वर्षा होती अश्रुधार से आँगन गीले!

जिनको सुख वह व्यंग्य कर रहे हमने पाया केवल रोना,

मरने पर मरघट की छाती जीवन में खंडहर का कोना!!

तिल तिल करके प्राण जल रहे उनका क्षीण प्रकाश इधर है!

दौलत वालों का बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

कोकिल की काकली नहीं है, भूखे बच्चों की चीत्कारें,

नंगी माँ बहनों का क्रन्दन लज्जा की मिटती मनुहारें।

खिली स्वप्न में भी न यहाँ पर उठते अरमानों की कलियाँ,

ओ बसन्त, तुम व्यंग्य कर रहे इधर भरे आँसू से गलियाँ!

तुम अनंग के दूत, तड़पने वालों का इतिहास इधर है!

तुम बसंत के गीत गा रहे पतझर बारह मास इधर है!!

आशाओं की बलिवेदी पर तिल तिलकर जल जाना होता!

उर के लहू से दो टुकड़ों का है मोल चुकाना होता-

तुम मधु की बूँदे ले आये बुझ न सकेगी भूख हमारी,

मेरा उर जलता पलाश सा असंतोष की ले चिनगारी!

मधुर उमंगों के तुम प्रहरी, जीवन का उपहास इधर है!

रोटी वालों का बसन्त है पतझर बारह मास इधर है!!

जिनके घर में सोना, चाँदी, सुरा, सुन्दरी, भोजन, प्याली,

उनके महलों में बसन्त है जिनके फूली है फुलवारी!

उनकी क्षण क्षण ही होली है उनको पल पल में दीवाली!

मेरा तो त्यौहार मौत है, जीवन मरने की तैयारी!

तुम संगीत सुरा में डूबे-रुक रुक चलती साँस हमारी!

धनवानों के घर बसंत है-पतझर बारह मास इधर है!

*समाप्त*