आप बिना पैसे के भी अमीर बन सकते हैं।

आप आश्चर्य करेंगे कि क्या बिना पैसे के भी कोई धनवान हो सकता है? लेकिन सत्य समझिए इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जिनकी जेब में एक पैसा नहीं है या जिनकी जेब ही नहीं है, फिर भी वे धनवान हैं और इतने बड़े धनवान कि उनकी समता दूसरा कोई नहीं कर सकता। जिसका शरीर स्वस्थ है, हृदय उदार है और मन पवित्र है, यथार्थ में बड़ा धनवान है। स्वस्थ शरीर चाँदी से कीमती है, उदार हृदय सोने से मूल्यवान है और पवित्र मन की कीमत रत्नों से अधिक है। लार्ड कालिंगवुड कहते थे-‘दूसरों को धन के ऊपर मरने दो मैं तो बिना पैसे का अमीर हूँ। क्योंकि मैं जो कमाता हूँ नेकी से कमाता हूँ।’ सिसरो ने कहा है-मेरे पास थोड़े से ईमानदारी के साथ कमाये हुए पैसे हैं, परन्तु वे मुझे करोड़पतियों से अधिक आनन्द देते हैं।

दधीचि, वशिष्ठ, व्यास, बाल्मीकि, तुलसीदास, सूरदास, रामदास, कबीर आदि बिना पैसे के अमीर थे, वे जानते थे कि मनुष्य के लिए आवश्यक भोजन मुख द्वारा ही अन्दर नहीं होता और न जीवन को आनन्दमय बनाने वाली सब वस्तुएं पैसे से खरीदी जा सकती हैं? ईश्वर ने जीवन रूपी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर अमूल्य रहस्यों को अंकित कर रखा है, यदि हम चाहें, तो उनको पहचान कर जीवन को प्रकाश पूर्ण बना सकते हैं। एक विशाल हृदय और उच्च आत्मा वाला मनुष्य झोंपड़ी में भी रत्नों की गरमाहट पैदा करेगा। जो सदाचारी है और परोपकार में प्रवृत्त है, वह इस लोक में भी धनी और परलोक में भी। भले ही उसके पास व्यय का अभाव हो। यदि आप विनयशील, प्रेमी, स्वार्थ और पवित्र हैं, तो विश्वास कीजिए कि आप अनन्त धन के स्वामी हैं।

जिसके पास पैसा नहीं, वह गरीब कहा जायगा, परन्तु जिसके पास केवल पैसा है, वह उससे भी अधिक कंगाल है। क्या आप सद्बुद्धि और सद्गुण को धन नहीं मानते? अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े थे और गरीब थे, पर जब जनक की सभा में जाकर अपने गुणों का परिचय दिया तो राजा उनका शिष्य हो गया। द्रोणाचार्य जब धृतराष्ट्र के राज दरबार में पहुँचे, तो उनके शरीर पर कपड़े भी न थे, पर उनके गुणों ने उन्हें राजकुमारों के गुरु का सम्मान पूर्ण पद दिलाया। महात्मा डायोजेनिस के पास जाकर दिग्विजयी सिकन्दर ने निवेदन किया-‘महात्मन् वाषिंक आपके लिए क्या वस्तु उपस्थित करूं? उन्होंने उत्तर दिया-“मेरी धूप मत रोक, और एक तरफ खड़ा हो जा। वह चीज मुझसे मत छीन, जो तुम मुझे नहीं दे सकते। इस पर सिकन्दर ने कहा-‘यदि मैं सिकन्दर न होता तो डायोजनिज ही होना पसन्द करता।’

गुरु गोविन्द सिंह, वीर हकीकतराय, छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप आदि ने धन के लिए अपना जीवन उत्सर्ग नहीं किया था। माननीय गोखले से एक बार एक सम्पन्न व्यक्ति ने पूछा कि आप इतना बड़ा राजनीतिज्ञ होते हुए भी गरीब, निर्बल जीवन क्यों व्यतीत करते हैं? उन्होंने उत्तर दिया - “मेरे लिए यही बहुत है। पैसा जोड़कर जीवन जैसी महत्वपूर्ण वस्तु का आधा भाग नष्ट करने में मुझे कुछ भी बुद्धिमत्ता प्रतीत नहीं होती।”

फ्रेंकलिन से एक बार उनका एक धनी मित्र यह पूछने गया कि - मैं अपना धन कहाँ रखूँ? उन्होंने उत्तर दिया कि-तुम अपनी थैलियों को अपने सिर के अन्दर उलट लो, अर्थात् उनके बदले ज्ञानवृद्धि कर लो तो कोई भी उस धन को चुरा न सकेगा।

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) एक अंक का।)

सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य


प्रार्थना।


प्रार्थना

(श्री विद्यावती मिश्र)

भगवान पतित मानव को इतना वर दो।

मानव का शुचि सम्मान अमर हो जावे,

मानव का शुचि उत्थान अमर हो जावे।

जो प्राप्त न हो पाया पीड़ित मानव को-

वह कल्पवृक्ष कल्याण अमर हो जावे।

निर्बलता का आधार सबल तुम कर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥

वह वैभव जिसमें हो न तनिक उजियाली,

विश्वास न जिसमें हो आशा मतवाली,

जो बिना छुये तम प्राची का छू लेती-

दे पाओ तो दे दो ऐसी वैकाली।

ऐसी गति, ऐसी संस्कृति जग में भर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥

शिव, सत्य, सुन्दरं लिये हुये हो माया,

अमरत्व लिये हो नर की नश्वर काया,

आहों की झंझा-बात रोक लेने को-

काँटे करते हैं वन-कुसुमों की छाया।

मेरे जीवन शशि से मृगाँक तुम हर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥


आप बिना पैसे के भी अमीर बन सकते हैं।

आप आश्चर्य करेंगे कि क्या बिना पैसे के भी कोई धनवान हो सकता है? लेकिन सत्य समझिए इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जिनकी जेब में एक पैसा नहीं है या जिनकी जेब ही नहीं है, फिर भी वे धनवान हैं और इतने बड़े धनवान कि उनकी समता दूसरा कोई नहीं कर सकता। जिसका शरीर स्वस्थ है, हृदय उदार है और मन पवित्र है, यथार्थ में बड़ा धनवान है। स्वस्थ शरीर चाँदी से कीमती है, उदार हृदय सोने से मूल्यवान है और पवित्र मन की कीमत रत्नों से अधिक है। लार्ड कालिंगवुड कहते थे-‘दूसरों को धन के ऊपर मरने दो मैं तो बिना पैसे का अमीर हूँ। क्योंकि मैं जो कमाता हूँ नेकी से कमाता हूँ।’ सिसरो ने कहा है-मेरे पास थोड़े से ईमानदारी के साथ कमाये हुए पैसे हैं, परन्तु वे मुझे करोड़पतियों से अधिक आनन्द देते हैं।

दधीचि, वशिष्ठ, व्यास, बाल्मीकि, तुलसीदास, सूरदास, रामदास, कबीर आदि बिना पैसे के अमीर थे, वे जानते थे कि मनुष्य के लिए आवश्यक भोजन मुख द्वारा ही अन्दर नहीं होता और न जीवन को आनन्दमय बनाने वाली सब वस्तुएं पैसे से खरीदी जा सकती हैं? ईश्वर ने जीवन रूपी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर अमूल्य रहस्यों को अंकित कर रखा है, यदि हम चाहें, तो उनको पहचान कर जीवन को प्रकाश पूर्ण बना सकते हैं। एक विशाल हृदय और उच्च आत्मा वाला मनुष्य झोंपड़ी में भी रत्नों की गरमाहट पैदा करेगा। जो सदाचारी है और परोपकार में प्रवृत्त है, वह इस लोक में भी धनी और परलोक में भी। भले ही उसके पास व्यय का अभाव हो। यदि आप विनयशील, प्रेमी, स्वार्थ और पवित्र हैं, तो विश्वास कीजिए कि आप अनन्त धन के स्वामी हैं।

जिसके पास पैसा नहीं, वह गरीब कहा जायगा, परन्तु जिसके पास केवल पैसा है, वह उससे भी अधिक कंगाल है। क्या आप सद्बुद्धि और सद्गुण को धन नहीं मानते? अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े थे और गरीब थे, पर जब जनक की सभा में जाकर अपने गुणों का परिचय दिया तो राजा उनका शिष्य हो गया। द्रोणाचार्य जब धृतराष्ट्र के राज दरबार में पहुँचे, तो उनके शरीर पर कपड़े भी न थे, पर उनके गुणों ने उन्हें राजकुमारों के गुरु का सम्मान पूर्ण पद दिलाया। महात्मा डायोजेनिस के पास जाकर दिग्विजयी सिकन्दर ने निवेदन किया-‘महात्मन् वाषिंक आपके लिए क्या वस्तु उपस्थित करूं? उन्होंने उत्तर दिया-“मेरी धूप मत रोक, और एक तरफ खड़ा हो जा। वह चीज मुझसे मत छीन, जो तुम मुझे नहीं दे सकते। इस पर सिकन्दर ने कहा-‘यदि मैं सिकन्दर न होता तो डायोजनिज ही होना पसन्द करता।’

गुरु गोविन्द सिंह, वीर हकीकतराय, छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप आदि ने धन के लिए अपना जीवन उत्सर्ग नहीं किया था। माननीय गोखले से एक बार एक सम्पन्न व्यक्ति ने पूछा कि आप इतना बड़ा राजनीतिज्ञ होते हुए भी गरीब, निर्बल जीवन क्यों व्यतीत करते हैं? उन्होंने उत्तर दिया - “मेरे लिए यही बहुत है। पैसा जोड़कर जीवन जैसी महत्वपूर्ण वस्तु का आधा भाग नष्ट करने में मुझे कुछ भी बुद्धिमत्ता प्रतीत नहीं होती।”

फ्रेंकलिन से एक बार उनका एक धनी मित्र यह पूछने गया कि - मैं अपना धन कहाँ रखूँ? उन्होंने उत्तर दिया कि-तुम अपनी थैलियों को अपने सिर के अन्दर उलट लो, अर्थात् उनके बदले ज्ञानवृद्धि कर लो तो कोई भी उस धन को चुरा न सकेगा।

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) एक अंक का।)

सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य


प्रार्थना।


प्रार्थना

(श्री विद्यावती मिश्र)

भगवान पतित मानव को इतना वर दो।

मानव का शुचि सम्मान अमर हो जावे,

मानव का शुचि उत्थान अमर हो जावे।

जो प्राप्त न हो पाया पीड़ित मानव को-

वह कल्पवृक्ष कल्याण अमर हो जावे।

निर्बलता का आधार सबल तुम कर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥

वह वैभव जिसमें हो न तनिक उजियाली,

विश्वास न जिसमें हो आशा मतवाली,

जो बिना छुये तम प्राची का छू लेती-

दे पाओ तो दे दो ऐसी वैकाली।

ऐसी गति, ऐसी संस्कृति जग में भर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥

शिव, सत्य, सुन्दरं लिये हुये हो माया,

अमरत्व लिये हो नर की नश्वर काया,

आहों की झंझा-बात रोक लेने को-

काँटे करते हैं वन-कुसुमों की छाया।

मेरे जीवन शशि से मृगाँक तुम हर दो।

भगवान पतित मानव को इतना वर दो॥


खर्च की कमी कैसे पड़ जाती है?

आप 100 रु॰ मासिक कमाते हैं, पास पड़ोस वाले आपको आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न समझते हैं, आपके हाथ में रुपये आते जाते हैं, किन्तु आपको यह देख कर अत्यन्त दुःख होता है कि आपका वेतन महीने की 20 तारीख को ही समाप्त हो जाता है। अन्तिम दस दिन खींच तान, कर्ज, तंगी और कठिनाई से कटते हैं। आप बाजार से उधार लाते हैं, जीवन-रक्षा के पदार्थ भी आप नहीं खरीद पाते। आपके नौकर, बच्चे, पत्नी आपसे पैसे माँगते हैं, बाजार वाले तगादे भेजते हैं आप किसी प्रकार अपना मुँह छिपाये टालमटोल करते रहते हैं और बड़ी उत्सुकता से महीने की पहली तारीख की प्रतीक्षा करते हैं। वर्ष के बारहों महीने यह क्रम चलता है। कुछ बचत नहीं होती वृद्धावस्था में दूसरों के आश्रित रहते हैं, बच्चों के विवाह तक नहीं कर पाते, पुत्रों को उच्चशिक्षा या अपनी महत्वाकाँक्षाएं पूर्ण नहीं कर पाते। लेकिन क्यों?

अपव्यय और आदत के गुलाम-

कभी आपने सोचा है कि आपका वेतन क्यों 20 तारीख को समाप्त हो जाता है? आप असंतुष्ट झुँझलाये से क्यों रहते हैं?

अच्छा अपने घर के समीप वाली जो पान सिगरेट की दुकान है, उसका बिल लीजिये। महीने में कितने रुपये आप पान सिगरेट में व्यय करते हैं? प्रतिदिन कम से कम से कम 6 सिगरेट और दो चार पान आप प्रयोग में लेते हैं। बढ़िया सिगरेट या बीड़ी माचिस आपकी जेब में पड़ी रहती हैं। यदि चार पाँच आने रोज भी आपने इसमें व्यय किये तो महीने के आठ दस रुपये सिगरेट में फुँक गये। सिगरेट वाले का यह तो न्यूनतम व्यय है। प्रायः होता यह 14 से 20 रुपये प्रतिमास तक है।

चाट पकौड़ी चाय वाला, काफी हाऊस, रेस्तराँ, चुसकी, शरबत, सोडा आइसक्रीम, लाइटरिफ्रे शमेन्ट वालो से पूछिये कि वे आपकी कमाई का कितना हिस्सा ले लेते हैं? यदि अकेले गये तो ॥) या ॥।) आने अन्यथा 1)-1।) का बिल मित्रों के साथ जाने पर बन जाता है। एक प्याली चाय ( या अप्रत्यक्ष विष?) खरीद कर आप अपने पसीने की कमाई व्यर्थ गंवाते हैं। चुसकी, शरबत, सोडा क्षण भर की चटोरी आदतों की तृप्ति करते हैं। इच्छा फिर भी अतृप्त रहती है। मिठाई से न ताकत आती है, न कोई स्थायी लाभ होता है, उलटे पेट में भारी विकार उत्पन्न होते हैं।

घृणित आदतें-

सिनेमा हाउस का टिकट बेचने वाला और गेट कीपर आपको पहचानता है। आपको देख कर वह मुस्करा उठता है? हँस कर दो बातें करता है। फिल्म अभिनेत्रियों की तारीफ के पुल बाँध देते हैं। आप यह फिल्म देखते हैं, साथ ही दूसरे का नमूना देख कर दूसरी को देखने के बीज मन में ले आते हैं। एक के पश्चात् दूसरी फिर तीसरी फिल्म को देखने की धुन सवार रहती है। और रुपया व्यय कर, आप सिनेमा से लाते हैं वासनाओं का ताँडव, कुत्सित कल्पना के वासनामय चित्र, गन्दे गीत, रोमांटिक भावनाएँ, शरारत से भरी आदतें। साथ ही अपनी नेत्र ज्योति भी बरबाद करते हैं। गुप्त रूप से वासनापूर्ति के नाना उपाय सोचते, दिमागी ऐयाशी करते और रोग ग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। काम रूपी शेर हमारा शोषण कर लेता है। भगवान् ने कहा है-“नरक के तीन प्रचण्ड महाद्वार रात दिन खुले हुए हैं। सबसे पहला द्वार काम का है, जिसमें कि विषय वासनाओं के गुलाम बलात् खींचे और ठूंसे जाते हैं।” सिनेमा ही वह प्रथम द्वार है। महीने में 14 से 20 रु॰ हम खुशी खुशी सिनेमा में भेंट करते हैं और सिनेमा सम्बन्धी सस्ती, बेकार, अश्लील पत्रिकाएँ खरीदते हैं।

बीमारियों में आप मास में 8 से 10 रु. व्यय करते हैं, किसी को बुखार है, तो किसी को खाँसी, जुकाम, सरदर्द, या टाँसिल। पत्नी प्रदर या मासिकधर्म के रोगों से दुःखी है। आप स्वयं कब्ज या अन्य किसी गुप्त रोग के शिकार हैं, तब तो कहने की बात ही क्या है। कभी इन्जेक्शन, तो कभी किसी को ताकत की दवाई चलती ही रहती है। कुछ बीमारियों ऐसी भी हैं जिन्हें आपने स्वयं पाल पोस कर बड़ा किया है। आप दाँत साफ नहीं करते, फिर आये दिन नये दाँत लगवाते या उन्हीं का इलाज कराया करते हैं। दंत डॉक्टर आपकी लापरवाही और आलस्य पर पलते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके शहर में दवाइयों की इतनी दुकानें क्यों बढ़ती चली जा रही हैं? मुहल्ले-मुहल्ले में डॉक्टर, वैद्यराज, हकीम ओर गुप्तरोगों को ठीक करने वाले संख्या में निरन्तर बढ़ रहे हैं। अधर्मी अपना पैसा रोगों के शिकार होकर इन्हें देते हैं और पालते हैं।

विवाह, झूठा दिखावा, धनी पड़ोसी का प्रतियोगिता, सैर सपाटा, यात्राएँ, उत्सवों, दान इत्यादि में आप प्रायः इतना व्यय कर डालते हैं कि कई महीनों तक सम्भल नहीं पाते। पत्नी ने गहने, साड़ी या किसी अन्य कीमती चीज की जिद की, तो आप अपनी जेब देखने के स्थान पर केवल उसे प्रसन्न करने मात्र के लिए तुरन्त कुछ भी शौक की चीज खरीद लेते हैं। हमने स्वयं अपने एक मित्र को अपनी पत्नी के लिए एक कीमती घड़ी खरीद कर देते हुए देखा जब कि पत्नी घड़ी देखना भी ठीक तरह न जानती थीं। फाउन्टेन पेन प्रायः इतने कीमती खरीदे जाते हैं, जो आभूषण की भाँति सम्भाल कर रखने पड़ते है। फिर भी भय बना रहता है कि कोई उचाट न ले, या गिर न जाय। प्रेमचन्द जी ने अपने उपन्यास ‘गबन’ में एक ऐसे पति का वृत्तान्त लिखा है जिसने पत्नी से अपनी असली हालत छुपाये रक्खी और अन्त में बड़े कष्ट झेले। उसके आभूषण बनाने के लिए सरकारी रुपया गबन किया। अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण न रखने और प्रलोभनों द्वारा परास्त हो जाने से प्रायः हम अपना दिवाला निकाल लेते हैं।

आप दिन में एक रुपया कमाते हैं, पर भोजन, वस्त्र या मकान अच्छे से अच्छा रखना चाहते है। फैशन में भी अन्तर नहीं करते, आराम और विलासिता की वस्तुएँ-क्रीम, पाउडर, शेविंग, सिनेमा, रेशमी कपड़ा, सूट-बूट, सुगंधित तेल, सिगरेट भी कम करना नहीं चाहते। फिर बताइये कर्जदार क्यों कर न बनें?

आपका धोबी महीने में 10 रु॰ आपसे कमा लेता है। आप दो दिन तक एक धुली हुई कमीज नहीं पहनते। पैन्ट की क्रीज, रंग, एक दिन में खराब कर डालते हैं, हर सप्ताह हेयर कटिंग के लिए जाते हैं, प्रतिदिन जूते पर पालिश करते हैं, बिजली के पंखे और रेडियो के बिना आपका काम नहीं चलता। पैसे पास नहीं, फिर भी आप अखबार खरीदते हैं, मित्रों को घर पर बुलाकर कुछ न कुछ चटाया करते हैं। रिक्शा, ट्राम, साइकिल की सवारी में आपके काफी रुपये नष्ट होते हैं।

तीन बातें ऐसी हैं, जिन्होंने सबसे अधिक आदमियों को गरीब और कर्जदार बनाया है। इन तीनों के द्वारा ग्रसित व्यक्ति कभी नहीं पनपता। ये हैं-नशेबाजी व्यभिचार, और मुकदमेबाजी। सावधान ।

हमारी कृत्रिम आवश्यकताएँ-

ज्यों-ज्यों आपकी आवश्यकताएँ बढ़ेंगी, त्यों-त्यों आपको खर्च की तंगी का अनुभव होगा। आजकल कृत्रिम आवश्यकताएँ वृद्धि पर हैं। ऐश, आराम, दिखावट, मिथ्या गर्व प्रदर्शन, विलासिता, शौक, मेले, तमाशे फैशन, मादक द्रव्यों पर फिजूलखर्ची खूब की जा रही है। ये सब क्षणिक आनन्द की वस्तुएँ हैं। कृत्रिम आवश्यकताएं हमें गुलाम बनाती हैं। इन्हीं के कारण हम महंगाई और तंगी अनुभव करते हैं। चूँकि कृत्रिम आवश्यकताओं में हम अधिकाँश आमदनी व्यय कर देते हैं, हमें जीवन रक्षक और आवश्यक पदार्थ खरीदते हुए महंगाई प्रतीत होती है। साधारण, सरल और स्वस्थ जीवन के लिए निपुणता-दायक पदार्थ अपेक्षाकृत अब भी सस्ते हैं। जीवन रक्षा के पदार्थ-अन्न, वस्त्र, मकान, इत्यादि साधारण दर्जे के भी हो सकते हैं। मजे में आप निर्वाह कर सकते हैं। अतः जैसे-जैसे जीवन रक्षक पदार्थों का मूल्य बढ़ता जाये, वैसे-वैसे आपको विलासिता और ऐशो-आराम की वस्तुएं त्यागते रहना चाहिए। आप केवल आवश्यक पदार्थों पर दृष्टि रखिये, वे चाहे जिस मूल्य पर मिलें खरीदिये किन्तु विलासिता और फिजूलखर्ची से बचिये। बनावटी, अस्वाभाविक रूप से दूसरों को भ्रम में डालने के लिए या आकर्षण में फंसाने के लिए जो मायाचार चल रहा है, उसे त्याग दीजिये। भड़कीली पोशाक के दम से मुक्ति पाकर आप सज्जन कहलायेंगे।

उपभोग की वस्तुओं का वर्गीकरण-

आप पूछेंगे कि आवश्यकताओं, आराम की वस्तुओं और विलासिता की चीजों में क्या अन्तर है? मनुष्य को सबसे मूल्यवान उसका शरीर लगता है। शरीर में उसका सम्पूर्ण कुटुम्ब भी सम्मिलित है। वह अपना और अपने परिवार का शरीर (स्वास्थ और अधिकतम सुख) बनाये रखने की फिक्र में है। उपभोग के आवश्यक पदार्थ वे हैं, जो शरीर और स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। ये ही मनुष्य के लिए महत्व के हैं।

(1)-जीवन रक्षक पदार्थों के अंतर्गत तीन चीजें प्रमुख है-(1) भोजन (2) वस्त्र (3) मकान। भोजन मिले, शरीर ढकने के लिए वस्त्र हो और सर्दी गर्मी बरसात से रक्षा के निमित्त मकान हो। यह वस्तुएं ठीक हैं, तो जीवन रक्षा और निर्वाह चलता रहता है। जीवन की रक्षा के लिए ये वस्तुएं अनिवार्य हैं।

यदि इन्हीं पदार्थों की किस्म अच्छी है तो शरीर रक्षा के साथ-साथ निपुणता भी प्राप्त होगी। कार्य शक्ति, स्फूर्ति बल और उत्साह में वृद्धि होगी, शरीर निरोग रहेगा और मनुष्य दीर्घजीवी रहेगा। ये निपुणता दायक पदार्थ क्या हैं? अच्छा पौष्टिक भोजन जिसमें अन्न फल, दूध, तरकारियाँ, घृत, इत्यादि प्रचुर मात्रा में हों, टिकाऊ वस्त्र, जो सर्दी से रक्षा कर सकें, हवादार स्वस्थ वातावरण में खड़ा हुआ मकान जो शरीर को धूप, हवा, जल इत्यादि प्रदान कर सके। प्रथम श्रेणी के अंतर्गत साधारण भोजन करने फटा पुराना वस्त्र पहनने तथा टूटी फूटी झोंपड़ी में रहने से भी मनुष्य जीवित तो रह सकेगा, पर उसमें कुशलता, स्फूर्ति, ताजगी, तन्दुरुस्ती न आ सकेगी। संभव है सब तत्व न मिलने के कारण शरीर रोगी और निर्बल हो जावे, कार्य शक्ति क्षीण हो जावे, शरीर का पूर्ण विकास न हो। इसीलिए यह निपुणता दायक वस्तुएं आवश्यक हैं।

आराम की वस्तुएँ-

यदि आपकी आमदनी इतनी है कि निपुणता दायक चीज (अच्छा अन्न, घी, दूध, फल हवादार मकान, स्वच्छ वस्त्र, कुछ मनोरंजन) खरीद सकते हैं, तो आराम की चीजों को अवश्य लीजिये। इनसे आप की कार्य-कुशलता तो बढ़ेगी, पर उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में आप खर्च करते हैं।

आराम की वस्तुएं ये हैं-कोट, बूट, साइकिल, घड़ी, फाउन्टेन पेन, पक्का मकान, कुर्सियाँ मेज-बढ़िया बिछौने, पुस्तकालय, अधिक घी और दूध, कभी-कभी मिठाई, तेल मालिश, अखबार, धोबी की सेवाएँ, छोटे नौकर जैसे बरतन साफ करने वाली महरी, पानी भरने वाला कहार, मेहतर इत्यादि। घर में गाय, भैंस, बकरी पालना, बगीचा लगाना, मनोरंजन के साधारण सामान। यदि कोई घर रेडियो खरीद सकता है, तो इसमें वह भी सम्मिलित किया जा सकता है। कुछ आवश्यक पुस्तकें, बच्चों के लिए मास्टरों की ट्यूशन, छोटी-2 पिकनिक या बाहर की वार्षिक यात्रा, घर को सजाने का मामूली सामान। जन्मोत्सव तथा विवाह में साधारण व्यय।

उपरोक्त वस्तुओं से शरीर को सुख और आराम तो मिलता ही है किन्तु निपुणता भी बढ़ जाती है। लेकिन जितना खर्च इन पर होता है, उस अनुपात में कार्य कुशलता नहीं बढ़ती है।

विलासिता की वस्तुएँ-

इनसे खर्च की अपेक्षा निपुणता और कार्य कुशलता कम प्राप्त होती है। कभी-2 कार्य कुशलता का ह्रास तक हो जाता है। मनुष्य आलसी और विलासी बन जाता है, काम नहीं करना चाहता। रुपया बहुत खर्च होता है, लाभ न्यून मिलता है।

इस श्रेणी में ये वस्तुएं हैं-आलीशान कोठियाँ, रेशम या जरी के बढ़िया कीमती भड़कीले वस्त्र, मिष्ठान मेवे, चाट पकौड़ी शराब, चाय, तरह-2 के आचार मुरब्बे, माँस भक्षण, फैशनेबल चीजें, मोटर, तम्बाकू, पान, गहने, जन्मोत्सव और विवाह में अनाप शनाप व्यय, रोज दिन में दो बार बदले जाने वाले कपड़े, साड़ियाँ, अत्यधिक सजावट, नौकर चाकर, मनोरंजन के कीमती सामान, घोड़ागाड़ी, बढ़िया फाउन्टेन पेन, सोने की घड़ियाँ, होटल रेस्तराँ में खाना, सिनेमा, सिगरेट, पान, वेश्यागमन, नाच रंग, व्यभिचार, शृंगारिक पुस्तकें, कीमती सिनेमा की पत्र पत्रिकाएं, तस्वीरें अपनी हैसियत से अधिक दान, हवा खोरी, सफर, यात्राएँ, बढ़िया रेडियो, भड़कीली पोशाक, क्रीम, पाउडर, इत्र आदि ।

उपरोक्त वस्तुएं जीवन रक्षा या कार्य कुशलता के लिए आवश्यक नहीं है किन्तु रुपये की अधिकता से आदत पड़ जाने से आदमी अनाप शनाप व्यय करता है और इन की भी जरूरत अनुभव करने लगता है। इन्हीं वस्तुओं पर सब से अधिक टैक्स लगते हैं कीमत भी बढ़ती है। ये कृत्रिम आवश्यकताओं से पनपते हैं। इनसे सावधान रहिये।

हम देखते हैं कि लोग विवाह, शादी, त्यौहार, उत्सव, प्रीतिभोज आदि के अवसर पर दूसरे लोगों के सामने अपनी हैसियत प्रकट करने के लिए अन्धाधुन्ध व्यय करते हैं। भूखों मरने वाले लोग भी कर्ज लेकर अपना प्रदर्शन इस धूम-धाम से करते हैं मानों कोई बड़े भारी अमीर हो। इस धूम-धाम में उन्हें अपनी नाक उठती हुई और न करने में कटती हुई दिखाई पड़ती है।

भारत में गरीबी है, पर गरीबी से कहीं अधिक मूढ़ता, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, मिथ्या प्रदर्शन, घमंड, धर्म का तोड़ मरोड़ दिखावा और अशिक्षा है। हमारे देशवासियों की औसत आय तीन चार आने प्रतिदिन से अधिक नहीं। इसी में हमें भोजन, वस्त्र, मकान, तथा विवाह शादियों के लिए बचत करनी होती है। पैसे की कमी के कारण हमारे देशवासी मुश्किल से दूध, घी, फल, इत्यादि खा सकते हैं। अधिक संख्या में तो वे स्वच्छ मकानों में भी नहीं रह पाते, अच्छे वस्त्र प्राप्त नहीं कर पाते, बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते, बीमारी में उच्च प्रकार की चिकित्सा नहीं करा सकते, यात्रा, अध्ययन, मनोरंजनों के साधनों से वंचित रह जाते हैं। फिर भी शोक का विषय है कि वे विवाह के अवसर पर सब कुछ भूल जाते हैं, मृतक भोज कर्ज लेकर करते हैं, मुकदमेबाजी में हजारों रुपया फूंक देते हैं। इस उपक्रम के लिए उन्हें वर्षों पेट काट कर एक एक कौड़ी जोड़नी पड़ती है, कर्ज लेना पड़ता है, या और कोई अनीति मूलक पेशा करना पड़ता है।

आमतौर पर मध्यम वर्ग के खोखले व्यक्ति झूठमूठ अमीरी का नाटक किया करते हैं। अहंकार का यह स्वरूप नितान्त अनुचित है।


हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण।

मनुष्य आवश्यकताओं का एक पुलिंदा है। उसके जन्म के साथ आवश्यकताओं का सम्बन्ध है और मृत्यु पर्यन्त आवश्यकता तथा उनकी पूर्ति का कुटिल चक्र अविराम गति से चलता रहता है। मनुष्य संसार की विविध वस्तुओं का उपभोग इसीलिए करता है कि उसकी कुछ आवश्यकताएँ होती हैं। हम कार्य तथा उद्योग इसी लिए करना चाहते हैं कि हमें अर्थ लाभ हो और हम अपनी-आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। प्रतिदिन प्रातःकाल हम उठ कर सायंकाल तक अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के विविध साधन एकत्रित किया करते हैं।

इच्छा और आवश्यकता में यथेष्ट अन्तर है, यद्यपि अनेक व्यक्ति एक ही अर्थ में इनका प्रयोग करते हैं। इच्छा का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। हम नाना प्रकार की वस्तुएं देखते हैं और लुभा कर उनकी इच्छा करने लगते हैं। ऐसी ही एक इच्छा हमारी आवश्यकता भी है। आवश्यकता केवल ऐसी इच्छा है जिसके बिना हम रह नहीं सकते, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त साधन हैं और जिसे प्राप्त करने से हमारी तृप्ति हो सकती है। कुछ आवश्यकताएं रुपये पैसे से, और कुछ उसके बिना भी पूर्ण हो सकती हैं। अनेक बार रुपये पैसे की कमी श्रम द्वारा पूर्ण हो जाती है।

आवश्यकता और उद्योग का घनिष्ठ सम्बन्ध है। आप जितना ही अपनी आवश्यकताएं बढ़ायेंगे, उतना ही उद्योग, परिश्रम और कष्ट आपको रहेगा। प्रत्येक आवश्यकता अपने साथ उद्योग की कुछ मात्रा चाहती है। यदि आपकी आवश्यकताएं थोड़ी हैं, तो आप आसानी से, थोड़े ही रुपये और श्रम से संतुष्ट और तृप्त हो सकते हैं। आधुनिक काल में फैशन परस्त तथा असंयमी व्यक्तियों ने अपनी आवश्यकताओं में वृद्धि की है। फलतः उनका जीवन संकट में है।

महंगाई पर विजय-

महंगाई से बचने का एक उपाय है। आप अपनी आवश्यकताओं का अध्ययन करें। जो आराम, विलास, या फैशन की वस्तुएं हैं, उन्हें तुरन्त त्याग दें। अनावश्यक टीपटाप, दिखावा, सौंदर्य प्रतियोगिता, मिथ्या आडंबर, टायलेट का सामान, मादक द्रव्यों का सेवन छोड़ दें। नौकर छुड़ा दें और स्वयं उनका कार्य करें। अपने छोटे मोटे कार्य-कमरे की सफाई, जूता पालिश, साधारण कपड़े धोना, बाजार से सब्जी लाना, बच्चों या पत्नी को पढ़ाना, अपनी गाय भैंस की देख रेख-स्वयं कर लिया करें। सोने चाँदी के गहने कुछ वर्ष के लिए न बनवायें। पुस्तकें न खरीदे प्रत्युत किसी अच्छे स्थानीय पुस्तकालय के मेम्बर बन जाय। समाचार पत्र पड़ोसी के यहाँ से माँग कर पढ़ लिया करें। फाउन्टेन पेन के स्थान पर एक आने के साधारण होल्डर और दो पैसे की दवात से काम निकाल लें। बिजली के पंखे की जगह एक आने का हाथ का पंखा खरीद लें। मिट्टी के तेल की लालटेन का उपयोग पुनः करने लगें। यदि आप दफ्तर में इक्का या मोटर में बैठ कर जाते हैं, तो उसे त्याग दीजिये। पैदल ही टहलते-2 चले जाया कीजिये। इससे पैसे भी बचेंगे और कसरत होने से पेट की अनेक बीमारियों से आप बचे रहेंगे।

आप बढ़िया सिल्क या रेशम के वस्त्र न पहनें साधारण खादी के सस्ते कपड़े से काम चला लें, कपड़ों को कम मैला कर अधिक चलावें, कम वस्त्रों से ही अपना काम निकाल लें। उन्हें बड़ी सावधानी से रक्खें। भारतवर्ष का जलवायु ऐसा अच्छा है कि एक कुरते धोती या नेकर से सम्पूर्ण दिन मजे से कट सकता है। आमोद-प्रमोद, विशेषतः सिनेमा जाना बिल्कुल छोड़ दें। आपको महंगाई न सतायेगी। महंगाई इसी लिए प्रतीत होती है कि आपकी कृत्रिम आवश्यकताएं अनियंत्रित रूप से बढ़ी हुई हैं तथा आप अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को नहीं जानते। मनुष्य की असली जरूरतें तो इतनी कम हैं कि बड़ी से बड़ी महंगाई में भी बखूबी पूर्ण हो सकती हैं।

मनोनिग्रह-सफलता की कुँजी-

जैसे-2 महंगाई में वृद्धि हो, आप मोटी-2 आवश्यकताओं की पूर्ति और बढ़ी हुई कृत्रिम आवश्यकताओं को त्यागते जाइये। खुद परिश्रम कीजिये आलस्य को त्याग कर पुरुषार्थ को खोज निकालिये। आपकी गुप्त सामर्थ्य बहुत कुछ करने में समर्थ है। स्मरण रखिये, मनुष्य की जरूरतें अपरिमित हैं, उनकी गिनती कठिन है। सब की पूर्ति असंभव है। कुछ को तो त्यागना होगा ही। अतः अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार अपनी आवश्यकताओं में कटौती करते चलिये। कई इच्छाएं ऐसी हैं जिनकी पूर्ति नहीं हो सकती, जैसे धन की इच्छा, अधिकार की इच्छा, मकान या अधिक भूमि प्राप्ति की इच्छा। सौंदर्य की इच्छा की भी तृप्ति असंभव है। कई आवश्यकताएं ऐसी होती हैं, जो परस्पर एक दूसरे की पूरक होती हैं। आप फाउन्टेन पेन लेते हैं, तो उसी की रोशनाई लेनी होगी, टेनिस खेलते हैं, तो गेंद भी लेनी होंगी, स्टोव के साथ तेल लेना होगा इत्यादि। इनके फेर में बड़े सोच समझ कर पड़ना चाहिए।

आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे।

तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।

एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।


आमदनी खर्च करने की कला।

आमदनी की न्यूनाधिकता पर मनुष्य के घर गृहस्थी के सुख की न्यूनाधिकता अवलम्बित नहीं है प्रत्युत अपनी आमदनी को ठीक प्रबन्ध और शास्त्रीय नियमानुसार संयम और मनोनिग्रह द्वारा खर्च करने पर सम्पूर्ण सुख अवलम्बित रहता है।

अपने रुपये को बुद्धिमानी से व्यय करना एक कला है, जिसको न जानने के कारण हमारे परिवार दुःखी हैं। अनेक व्यक्ति आवश्यक खर्चे छोड़ देते हैं किन्तु आराम और विलासिता पर व्यय करते हैं। जीवन रक्षक पदार्थ खरीदते हुए महंगाई की शिकायत करते हैं, पर विलासिता की वस्तुओं, उदाहरणार्थ-चाय, तम्बाकू, सिगरेट, पान, सिनेमा, शराब, फैशन, भड़कीले वस्त्र, नेकटाई, टोप-को खरीदते समय महंगाई का अनुभव नहीं करते।

अनिश्चित व्यय वाले व्यक्ति-

आमदनी का सम्बन्ध हमारी प्रकृति, आदतों, फैशन, रहन सहन का ढंग, जलवायु, देशकाल, आवश्यकताओं, घर के सदस्यों की संख्या, रीति रस्म, आचार व्यवहार पर निर्भर है। इनमें से प्रत्येक का ध्यान हमें रखना पड़ता है। उपभोक्ताओं की परिस्थितियों के अनुसार आमदनी की कमी या अधिकता बदलती रहती है। प्रायः देखा जाता है कि आदत पड़ जाने पर मनुष्य विलासिता पर व्यय करना आवश्यकताओं पर व्यय करने से अधिक उत्तम समझता है। जिस व्यक्ति को शराब, चाय, सिनेमा, वेश्यागमन, तम्बाकू, गाँजा, चरस का व्यसन लग जाता है, वे दूध, दही, मक्खन, हवादार मकान इत्यादि जीवन रक्षण और निपुणता - दायक पदार्थों में व्यय करना पसन्द नहीं करते। फैशन परस्त लोग घर की गरीबी न देखते हुए भी बाहरी टीपटाप, मिथ्या प्रदर्शन में फंसे रहते हैं। निर्धन लोग थोड़ी सी वाहवाही के लिए कर्ज लेकर विवाह, जनेऊ या दान इत्यादि में व्यय कर देते हैं। गरीब मजदूर भी पान, बीड़ी, सिनेमा, चाय, जुआ, सट्टा, शराब इत्यादि व्यसनों में व्यय करते हुए नहीं डरते। भिक्षुक तक चाय या बीड़ी पीना दूध रोटी से अधिक पसन्द करते हैं।

एक अमीर व्यक्ति के लिए आलीशान महल, बिजली के पंखे, लैम्प, मोटर, फाउन्टेन पेन, भड़कीले वस्त्र, सजावट की वस्तुएँ आराम की वस्तुएँ समझी जायेंगी, किन्तु एक गरीब किसान, या क्लर्क, मामूली दुकानदार नौकरी पेशा के लिए ये ही वस्तुएँ विलासिता की चीजें मानी जावेंगी।

सदा अपनी आमदनी पर दृष्टि रखिये। आमदनी से अधिक व्यय करना नितान्त मूर्खता और दिवालियापन की निशानी है। जैसे-2 आमदनी कम होती जाये, वैसे-2 व्यय भी उसी अनुपात में कम करते जाइये। व्यय में से विलासिता और आराम की वस्तुओं को क्रमशः हटाते चलिये, व्यसन छोड़ दीजिये, सस्ता खाइये, एक समय खाइये, सस्ता पहनिये। मामूली मकान में रह जाइये, नौकरों को छुड़ाकर स्वयं काम किया कीजिये, धोबी का काम खुद कर लीजिये, चाहे बर्तन तक खुद साफ कर लीजिये किन्तु आमदनी के बाहर पाँव न रखिये।

कभी उधार न लीजिये-

उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है। उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है। श्री संतोष नारायण नौटियाल का अनुभव तथा सीख याद रखिये-

“उधार लेने की आदत कैसी है, इस पर दो राये नहीं हो सकतीं। इसका तो एक ही उत्तर है-आदत बहुत बुरी है। उधार लेते समय तो चाहे वह रुपया हो या और कोई चीज कुछ पता नहीं चलता, परन्तु देते समय दशा बिगड़ जाती है। ऐसा लगता है, जैसे पैसे फेंक रहे हैं। धीरे-2 यह आदत इतनी जोर पकड़ती है कि उधार की चीज या पैसा लौटाने को मन नहीं होता और फल यह होता है-मित्रों का कन्नी काटना, समाज में निरादर, बदनामी आदि। फिर वह “भेड़िया आया” वाली बात होती है। यदि कभी वास्तविक आवश्यकता पड़ी भी तो पैसा नहीं मिलता। इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ऋण के चार प्रमुख कारण बतलाये हैं-कपड़े-लत्ते, जूता, तड़क भड़क और आमोद-प्रमोद। ऋण पर ऋण बढ़ता है और उसका तार जीवन भर नहीं छूटता। शुक्ल जी लिखते हैं-“ऋण एक नाले के समान है, जो ज्यों ज्यों आगे चलता है, त्यों त्यों बढ़ता है। सबसे बुरी बात ऋण में यह है कि जिसे ऋण का अभ्यास पड़ जाता है, उसकी घडक खुल जाती है, उसे आगम का भय नहीं रहता और जब तक उसका नाश नहीं होता, तब तक वह विष का घूँट बराबर पिये जाता है। यदि उसका चित्त ऐसा हुआ कि जिसमें लतें जल्दी लगती हो, तो वह निर्द्वन्द्व न रह सकेगा, ऋण के बराबर बढ़ते हुए बोझ से दब कर वह छटपटाया करेगा।

आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये। व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है। बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है। सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है। टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है।

क्या आप कर्जदार हैं?

क्या आप कर्जदार है? यदि ऐसा है तो आपकी आत्मा को शान्ति नहीं मिल सकती। उन धनी मानी व्यक्तियों के उदाहरण अपने सन्मुख रखिये जो आजन्म ऋण के बोझ से दबे रहे। हमारे ग्रामीण तो 80 प्रतिशत कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। गोल्डस्मिथ, बालजाक, मार्क टवैन, वेबस्टर, लार्ड वायरन, सर वाल्टर स्काट सब कर्जदार रहे। वाल्टरस्काट आजन्म कर्ज चुकाते रहे। रूसी लेखक डास्टाएन्सकी कर्ज में डूबा रहा। उसकी इच्छा थी कि कर्ज से मुक्त हो जावे किन्तु न हो सका। गोल्डस्मिथ इतना फिजूल खर्च रहा कि जौनसन साहब की सहायता करने पर भी ऋण मुक्त न हो सका। कथाकार बालजाक अपने महाजनों से डरा-2 फिरा करता था। मार्क स्वेन का 300,000 रु॰ व्यापार में नष्ट हो गया था। लार्ड वायरन जैसे कवि का घर कई बार नीलाम होते होते बचा सुविख्यात चित्रकार व्हिरलय तथा हेडेन का जीवन सदैव दुःख में रहा।

श्री योगेन्द्र बिहारी लाल ऋण ग्रस्त व्यक्तियों के उदाहरण देते हुए लिखते हैं-“सौ वर्ष पहले ल्योब्रमेल इंग्लैंड का फैशन ‘सम्राट् कहा जाता था। उसके कपड़े पहनने का ढंग ही फैशन हो जाता था पर ऋण के कारण उसका सब कुछ बिक गया। जब नीलाम करने वाले उसके घर आते थे तो वह कपड़ों की अलमारियों के पीछे छिप जाता था। अन्त में वह पकड़ा गया। दरिद्रता के कारण उसे फटी कमीज पहननी पड़ती थी, और जनता उस भूतपूर्व फैशन सम्राट पर हंसती थी। विलियन पिट का विवाह कुमारी एडेन से होने जा रहा था, पर पिट के ऋण ग्रस्त होने से विवाह न हो सका था।”

अब्राहमलिंकन ने किसी से शराब की दुकान में साझीदार के मरने पर लिंकन ग्यारह वर्ष तक ऋण चुकाता रहा।

खर्च के विषय में बेखबर रहने से मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है। इसी के सदुपयोग से जीवन सरस बनता है, समाज में आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। कौटिल्य ने कहा है-“केवल धन के द्वारा मनुष्य गुण, आनन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति करता है।” वास्तव में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न रहने से मनुष्य नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति भी सरलता से कर सकता है। रुपया पास होने से सूर्योदय और गुलाब भी हमें सुन्दर लगते हैं। एक कवि ने लिखा है-

“जब जेब में पैसा होता है,

जब पेट में रोटी होती है।

तब हर एक जर्रा हीरा है,

तब हर एक शबनम मोती होती है॥

इस उक्ति में एक शाश्वत सत्य अंतर्निहित है।

आमदनी खर्च करने का उद्देश्य क्या हो?

आप यह उद्देश्य सामने रखिये कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवनरक्षक पदार्थ और निपुणता दायक वस्तुएँ पर्याप्त परिणाम में प्राप्त होती रहें। जब तक ये चीजें न आ जावें, तब तक किसी प्रकार की आराम या विलासिता की वस्तुओं से बचे रहिये। यदि किसी का स्वास्थ्य खराब है, तो पहले उसकी चिकित्सा होनी चाहिए। यदि किसी विद्यार्थी का अध्ययन चल रहा है, तो उसके लिए सभी को थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए। कृत्रिम आवश्यकताओं को दूर करने का सब को प्रयत्न करना चाहिए। शिक्षा, त्याग और पारस्परिक सद्भाव से सभी सामूहिक परिवार के लिए प्रयत्नशील हो।

प्रत्येक व्यक्ति की अपने खर्च पर गंभीरता से विचार कर कृत्रिम आवश्यकताओं, व्यसनों, फैशन, मिथ्या प्रदर्शन, फिजूल खर्ची कम करनी चाहिए। आदतों को सुधारना ही श्रेष्ठ और स्थायी है। ऐश आराम और विलासिता के खर्चो को कम करके बचे हुए रुपये को जीवन रक्षक अथवा निपुणता दायक या किसी टिकाऊ खर्च पर व्यय करना चाहिए। बचत का रुपया बैंक में भविष्य के आकस्मिक खर्चों, विवाह शादियों, मकान, या बीमारियों के लिए रखना चाहिए। प्रत्येक पैसा समझदारी से जागरुक रह कर भविष्य पर विश्वास न करते हुए खर्च करने से प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम संतोष और सुख होगा।

कमाई और आमदनी से नहीं, आपकी आर्थिक स्थिति आपके खर्च से नापी जाती है। यदि खर्च आमदनी से अधिक हुआ तो बड़ी आय से क्या लाभ?

हम एक प्रिंसिपल महोदय को जानते हैं जिन्हें 800 रु. मासिक आमदनी होती थी। किन्तु वे 200 रु. माह बार घर से और खर्चे के लिए मंगवाते थे। सदैव हाथ तंग रखते और वेतन के कम होने का रोना रोया करते थे।

दूरदर्शी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और खर्चों का पहले से ही बजट तैयार करता है। उसकी आय वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यय नहीं होती प्रत्युत वह भविष्य के लिए, बच्चों की शिक्षा, विवाह, बुढ़ापे के लिए धन एकत्रित रखता है। अपनी परिस्थिति के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य बचाता है।

किसी कवि ने कहा है-

कौडी कौडी जोड़ि कै, निधन होत धनवान।

अक्षर अक्षर के पढ़े, मूरख होत सुजान॥

आप बचत कर सकते हैं?

बचत का प्रश्न प्रत्येक का व्यक्तिगत प्रश्न है। यह मनुष्य की आवश्यकताओं की कमी, दूरदर्शिता, मितव्ययिता पर निर्भर है। मनुष्य को बजट में 10 प्रतिशत बचत सदा रखनी चाहिए। यह न्यूनतम है। जो जितनी मितव्ययिता, से काम लेगा, उसे उतनी ही अधिक बचत होगी। बचत के लिए दो काम कीजिए-(1) अपनी आय बढ़ाइये (2) खर्चों के ऊपर नियंत्रण रखिये। खर्च जितना कम होगा, बचत उतनी ही अधिक होगी। सोच समझ कर आत्मनिग्रह पूर्वक व्यय करने से कुछ बचत अवश्य होगी।

प्रायः देखा जाता है कि लोगों की नीयत बचाने की होती ही नहीं। जितना आया, व्यय कर डाला। शिक्षा के अभाव और व्यसन के पंजे में फंसे रहने से बहुत से व्यक्ति मृत्यु, बीमारी, शादी, शिक्षा आदि के लिए भी कुछ नहीं बचाते, बुढ़ापे की तो बात ही दूर है। यदि कोई दैवी घटना संयोगवश आ जाती है, तो वे दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाते हैं। ऐश आराम, या विलासिता की वस्तुओं के पंजे में फंसे रहने से खर्च बढ़ता है, और बचत कम होती है। दुराचार, व्यसन, व्यभिचार, बीमारियाँ, ठाट-बाट, झूठा दिखावा, विवाह, दान में अधिक अपव्यय , मकान बनाना, व्यापार के लिए कर्ज लेकर न चुका सकना, बेकारी, उद्योगहीनता बहुत ही निन्दनीय हैं। इनमें फंस कर आमदनी क्षीण होती और पूरी आयु नष्ट होती है।

बजट में बचत का विधान रखिये-

रुपये का यह नियम है कि हाथ में आते ही व्यय होने लगता है। छिपी हुई कृत्रिम आवश्यकताएँ, प्रलोभन और विलासिता की वस्तुएँ खरीदने को मन कर आता है। यदि आप रुपया अपनी जेब में रखेंगे, तो वह अवश्य खर्च होगा। रुपया जेब में रख कर मितव्ययिता का अभ्यास कठिन ही नहीं नितान्त असंभव है।

जब आप बाजार जाय तो केवल उतना ही रुपया ले जाय जितना आपको जरूरत हो, जो वस्तुएँ खरीदनी हों, उनकी एक सूची साथ रक्खें। अधिक रक्खा हुआ पैसा बाजार से वापस कदापि नहीं लौटेगा। आप प्रलोभन के सामने झुक जायेंगे और पैसे जेब से निकल जायेंगे।

घर में इतना ही रुपया रखिये, जितना मास के लिए आवश्यक हो। शेष को डाकखाना सेविंग्स बैंक, या बीमा कम्पनी में डाल दिया कीजिये। भविष्य में अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए दत्तचित्त रहिये जब तक आय न बढ़े, तब तक दैनिक आवश्यकताओं पर नियंत्रण रख कर खर्च कम करने का पूरा प्रयत्न करते रहिये।

बचत में से भी हम निकालने के आदी होते हैं। क्षणिक आवेश में आकर अपनी संचित आमदनी व्यय कर डालते हैं। इस लिए बचत के वे उपाय श्रेष्ठ हैं जिनमें से रुपया आसानी से नहीं निकल सकता। ऐसे उपायों में बीमा कम्पनी में जमा करना, जायदाद खरीदना, या बैंक के स्थायी डिपॉजिट में रुपया रखना बड़ा अच्छा है। गहनों के रूप में भी रुपया रक्षित रहता है। गहने बेचते हुए प्रायः हम हिचकते हैं। परिमित व्यय करने वाला थोड़ा बहुत अवश्य बचा सकता है। केवल मन पर नियंत्रण, कृत्रिम आवश्यकताओं का दमन और संयम की आवश्यकता है।

पारिवारिक बजट-

हम नीचे एक बजट की रूप रेखा देते हैं जिससे बचत के ऊपर प्रकाश पड़ता है-

1-भोजन पर व्यय-25 प्रतिशत

2-वस्त्र इत्यादि पर व्यय-10 प्रतिशत

3-किराया मकान पर व्यय-20 प्रतिशत

4-बचत-15 प्रतिशत

5-आत्मसुधार पर व्यय-10 प्रतिशत

6-आकस्मिक व्यय के लिए-15 प्रतिशत

7-विलासिता और मनोरंजन-5 प्रतिशत

बजट का नियम स्मरण रखिये कि जो कम आमदनी वाले गरीब और अधिक सदस्यों वाला परिवार होगा, उसकी आय का अधिक भाग जीवन रक्षण में खर्च होना चाहिये। निपुणता तथा आराम की वस्तुओं के लिए उसके पास उसी अनुपात में पैसा कम बचेगा। किन्तु आमदनी में वृद्धि के साथ-2 जीवन रक्षक पदार्थों में कम अनुपात में खर्च होगा और आराम और विलासिता की चीजों पर अपेक्षाकृत अधिक व्यय होगा।

उपरोक्त बजट से हम इन निष्कर्षों पर पहुँचे हैं

(1) जिन परिवारों की आमदनी कम है वे जीवन निर्वाह की वस्तुओं पर अधिक खर्च करते हैं। (2) वस्त्रों पर मजदूर तथा निम्न श्रेणी के अलावा मध्यम और सम्पन्न परिवार लगभग एक सा ही खर्च करते हैं। (3) किराया मकान में गरीबों को कुछ लाभ रहता है। अधिक आमदनी वाले प्रायः शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, परिचर्या इत्यादि में ज्यादा खर्च करते हैं।

निम्न श्रेणी के व्यक्ति प्रायः मादक वस्तुओं में बहुत व्यय कर डालते हैं। शहर के बाबू लोग फुटकर खर्चों-सजावट, डॉक्टर की फीस बीड़ी चाय, कर्ज का सूद, सामाजिक व्यय, टैक्स, मनोरंजन, सिनेमा, पान मिठाई धोबी, पोस्टेज साबुन, शेविंग-में व्यय करते हैं। यह अनुचित है। यदि ये फुटकर चीजों पर नियंत्रण करे, तो मजे में जीवन काट सकते हैं। सुधार की बहुत गुंजाइश रहती है केवल नियंत्रण और संयम की आवश्यकता है।

रहन सहन ऊँचा करने के लिए संयम और इन्द्रिय निग्रह चाहिए। दूसरा तत्व शिक्षा है। सद्बुद्धि और अर्थशास्त्र की शिक्षा से वे कृत्रिम आवश्यकताओं से बच सकेंगे, यदि हम अपनी शक्तियों का विकास करें। अच्छे आदमियों के रहन सहन का अनुकरण करें, आय वृद्धि करें। दूसरे शहरों में काम तलाश करें, तो बहुत अधिक अच्छी तरह रह सकते हैं। किन्तु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम पहले जीवन रक्षक पदार्थ खरीदें, फिर निपुणता दायक पदार्थों का अधिक उपयोग करें और अन्त में आराम के लिए पदार्थों का उपभोग कर सकते हैं।

किस कुटुम्ब में कितना व्यय हो, इसका ठीक अनुमान कठिन है। कोई कुछ, तो कोई कुछ व्यय करता है। फिर भी कुछ आदेश दिये जा सकते हैं। पं. लक्ष्मीधर वाजपेयी ने 20) रु. की आमदनी के व्यय का ब्योरा इस प्रकार दिया है-

भोजन 12), घर का भाड़ा, 1), वस्त्र 3), नाई धोबी तथा फुटकर खर्च 1), बच्चों की पढ़ाई लिखाई 1), आकस्मिक खर्च 1), बचत 1)। इसमें प्रत्येक कम आमदनी पाने वाला व्यक्ति इच्छानुसार न्यूनाधिक कर सकता है।

इन बातों को स्मरण रखिये-

पारिवारिक व्यय करते समय सब खर्चों का खूब अनुमान लगा लीजिये। जो स्थायी व्यय हैं, उन्हें मास के प्रारम्भ ही में कर डालिये, भोजन और स्थायी खर्च प्रारम्भ में कर लेने से मास के अन्त तक आनन्द रहता है। यदि आप प्रति दिन दूध खरीदते हैं, तो दूध वाले को रुपया अग्रिम ही दे देना उचित है, अन्यथा इस मास का भार दूसरे मास पर पड़ेगा। अर्थात् यह रुपया एक प्रकार का कर्ज सा बना रहेगा। चीजें नकद लेने की आदत डालिये क्योंकि उधार आप भूल जायेंगे और फिर माँगने वाले किसी ऐसे समय आकर आपको तंग करेंगे, जब आप का हाथ तंग होगा। उधार या कर्ज ऐसी नंगी तलवार है जो आप पर सदैव लटकती रहती है। प्रायः दुकानदार उधार वाले को चीजें भी महंगी देते हैं।

त्यौहार, उत्सव, और धर्मादय में फिजूल खर्ची से बचना चाहिए। प्रायः मुसलमान तथा हिन्दू निर्धन व्यक्ति कर्ज लेकर त्यौहार मनाते हैं। कर्ज का एक पैसा खाना भी पाप है। उधार की एक कौड़ी भी भार स्वरूप है। जो स्थिति परमेश्वर ने आपको दी है, उसी के अनुकूल त्यौहार और उत्सव मनाइये। आत्मनिग्रह और संयम आपकी सहायता करेंगे। विवाह तक में जमाने की परवाह न कर अपनी हैसियत के अनुकूल व्यय करना चाहिए।

तीर्थ यात्रा, ब्राह्मण भोजन, रूढ़ियों, बिरादरी को प्रसन्न करने में विश्वास छोड़ दीजिये। इसी प्रकार अतिथि सेवा आपका धर्म है पर कर्ज लेकर मेहमानदारी करना एक मूर्खता है। बाहरी टीपटाप से बचिये। नाना प्रकार के गन्दे व्यक्ति साधु संन्यासियों का वेश बनाकर अनुचित लाभ उठाते हैं।

साधारण गृहस्थी के खर्च विभाग :-

तीन लम्बे लिफाफे लीजिये और उन पर यह लिखिये (1) चालू खर्च का रुपया (2) अचानक खर्च (3) प्रासंगिक खर्च। अपनी आमदनी के हिसाब से इन तीनों मदों में पृथक् 2 रुपया डालिये। चालू खर्च में सब से अधिक व्यय होगा पर प्रतिमास आपको 5-5 प्रतिशत अन्य दोनों मदों में भी व्यय करना होगा। यहाँ हम तीनों खर्चों की पूरी सूची देते हैं-

चालू व्यय-यह व्यय प्रतिमास व्यय करना होगा। इसमें कमी नहीं हो सकती। इसमें भोजन का बजट, किराया मकान, बच्चों की फीस, नौकरों का खर्चा, वस्त्रों का व्यय, चिरागबत्ती, धोबी, साइकिल का व्यय, बीमा पॉलिसी, गाय भैंस का खर्च, सूद इत्यादि, टैक्स, टायलेट (तेल, साबुन, बाल काटना) पोस्टेज, चाय, लकड़ी कोयला इत्यादि मसाले, चन्दा, लाइब्रेरी, पानी, बिजली का खर्च, साबुन कपड़ा धोने के लिए, बच्चों को पाकेट का खर्च, कर्जे की अदायगी, ताँगा खर्च।

अचानक व्यय-दैनिक स्थायी व्यय के अतिरिक्त कुछ ऐसी बातें भी है जिनमें मनुष्य को व्यय करना होता है। ये खर्चें अचानक मनुष्य पर टूट पड़ते हैं। यदि हमारे पास इस मद में रुपया न हो तो कर्जे की नौबत आ सकती है। इस मद में निम्न लिखित व्यय हैं-बीमारी, मेहमानदारी, अचानक कहीं जाना पड़े तब उस यात्रा का खर्च, कोई अन्य आपत्ति आ पड़े जैसे मुकदमेबाजी, किसी को कर्ज देना पड़े, या किसी की मृत्यु हो जाय, उसका व्यय, मकान गिर पड़े उसकी मरम्मत इत्यादि के लिए, घर में चोरी हो जाय उसके लिए व्यय। इसके अतिरिक्त जीवन की अनेक दुर्घटनाएँ हैं जिनके लिए आपको रुपये की जरूरत पड़ सकती है।

प्रासंगिक खर्च तथा बचत-तिथि त्यौहार, भोज, मानता, श्राद्ध, शादी-विवाह, दान, यात्राएं, उत्सव, धर्मदाय, आभूषण इत्यादि बनवाना।

अपनी आमदनी को इन तीनों विभागों में बाँट कर बचत करनी चाहिए जिसके पास बचा हुआ रुपया जमा नहीं है, वह कभी सुख की नींद नहीं सो सकेगा चाहे थोड़ी ही सही, बचत के मद में कुछ न कुछ अवश्य रखना बुद्धिमानी है। बचत को सदैव नकद रुपयों के रूप में ही रखना चाहिए। चाहे एक समय भूखे रहें, साधारण पोशाक और मकान में रहें किन्तु कुछ न कुछ अवश्य बचाकर अपने पास रक्खें।

संकट के समय में-संकट के समय में, ज्यों-ज्यों आमदनी कम हो त्यों-त्यों अपने खर्चे कम करने के लिए प्रस्तुत रहिये। अपनी आदतें बनाना आपके हाथ की बात है। अपनी कृत्रिम आवश्यकताओं, मनोरंजनों, आमोद-प्रमोद वासनाओं की तृप्ति, जिव्हा के स्वाद, फैशनपरस्ती, दान, यात्राएं कम आमदनी होने पर काट देने के लिये आपको तैयार रहना चाहिये।

सब से पहले अपने मनोरंजन कम कीजिये। किसी क्लब के मेम्बर हों, तो छोड़ दीजिये, सिनेमा जाना बन्द कर दीजिये, स्वाद के लिए चाट पकौड़ी, फल, सिगरेट, मद्य, पान, सुपारी, छोड़ दीजिये, फैशन में कमी कीजिये। यदि फिर भी बजट ठीक न बैठे तो फुटकर खर्चों को कम कीजिये, नौकर छुड़ा कर स्वयं घर का काम कीजिये। यदि घर के आस-पास कुछ जमीन है, तो शारीरिक परिश्रम से उसमें शाक−भाजी इत्यादि उगाइये। बच्चों को स्वयं पढ़ाइये। वस्त्र स्वयं धो लिया कीजिये। रोशनी में कमी कर सकते हैं। दिन में काम कर लीजिये। जल्दी सोना ओर जल्दी जगना स्वास्थ्यप्रद है।

यदि फिर भी खर्च कम न हों, तो मकान बदल कर सस्ता मकान लेना होगा। लेकिन मकान हवादार और स्वच्छ स्थान पर होना चाहिये। बीमार न पड़ना होगा। बीमारी बड़ी महंगी बैठ जायेगी। वस्त्रों तथा जूते को सावधानी से रख कर अधिक से अधिक चलाना होगा। जितना ही आर्थिक संकट होगा, उतना ही मर्यादित और मितव्ययी आपको बनना होगा। मितव्यय, आत्म संयम, इंद्रिय निग्रह के समान सुख देने वाला कोई गुण संसार में नहीं है।

बीमारियों में हमें अनापशनाप व्यय करना होता है। पास पैसा नहीं होता तो ऋण लेकर व्यय करना होता है। बीमार पड़ना अत्यन्त महंगा है। चीजें इतनी महंगी नहीं हैं, जितनी बीमारियाँ। अतः आपको अधिक से अधिक अपने स्वास्थ्य की देख रेख करनी होगी। संकट में सबसे पूर्व अपने स्वास्थ्य की चिंता कीजिये। यदि बीमार पड़ियेगा, तो आपकी सारी मितव्ययिता और बजट रक्खी रह जायेगी। बजट तभी कम रहेगा, जब आपके सब घर वाले स्वस्थ और प्रसन्न हों, आत्म निग्रह और संयम कर सकें। बीमारियों से सावधान रहिये।


हमारे तीन बड़े खर्चे।

हमारे जीवन पर व्यय होने वाले 87 प्रतिशत रुपया विवेक पूर्ण व्यय होता है। भोजन कहीं अत्यन्त महंगा है, कहीं असंतुलित है। प्रायः भोजन के नाम पर ऐसी वस्तुएं ले ली जाती है जो आवश्यक नहीं हैं, और ऐसी पौष्टिक चीजें छोड़ दी जाती हैं, जिनके बिना मनुष्य का शरीर अविकसित रहता है। कुछ वर्ष हुए डॉ॰ कैरेमेकोर्ड ने मजदूरों के भोजन व्यय का विशेष अध्ययन किया था। उनके अनुसार मजदूर लोग अनावश्यक पदार्थ खरीदते हैं, उनका स्वास्थ्य खराब रहता है और वे अल्पायु होते हैं।

संतुलित आहार-

भोजन की सफलता उसकी महंगाई पर नहीं, संतुलन और सही चीजों के प्रयोग पर निर्भर है। यदि आप अपने भोजन का ठीक प्रयोग करें तो आपके पेट की शक्तियाँ यथेष्ट मात्रा में बढ़ सकती हैं। वाल्टर वी. पिटकिन ने अपनी पुस्तक “जीवन 40 वर्ष की आयु के पश्चात् प्रारम्भ होता है?” में लिखा है कि मनुष्य अपनी जीवन शक्ति भोजन के ठीक चुनाव द्वारा अपनी शारीरिक शक्ति से दुगुनी बना सकता है। अच्छा भोजन सस्ता और सरल होता है।

एक संतुलित व्यक्ति का आहार इस प्रकार होना चाहिए-चावल 10 औंस, अनाज 5 औंस, दालें 3 औंस, दूध 8 औंस, बिना पत्ती की तरकारी 6 औंस, पत्तीदार सब्जियाँ 4 औंस, चिकनाई 2 औंस, फल 2 औंस।

गुरुकुल काँगड़ी के विद्यार्थियों का भोजन देखिये-चावल 2 छटाँक आटा 7 छ., घी 1 छ., दूध 12 छ. चीनी 1 छ., शाक तरकारियाँ 3 छटाँक। यह भोजन 18 से 25 वर्ष तक की आयु के लिए अच्छा है।

प्रातःकाल नाश्ते में पाव भर दूध लें या किसी फल के रस का नाश्ता करें, दोपहर को पाव डेढ़ पाव फल, रोटी दाल और हरी तरकारियों के सलाद रखिये। चार बजे यदि क्षुधा प्रतीत हो तो एक प्याला सन्तरे या टमाटर का रस या मट्ठा लें। सायं काल सब्जी और फलका लें। सोने से पूर्व पाव भर दूध पियें। यथाशक्ति सूखे फल तथा मेवों का प्रयोग करें।

भोजन के बजट में एक चौथाई आमदनी व्यय करनी चाहिए अतएव यदि आप केवल रक्षात्मक भोजन (बिना चटोरी आदतों को संतुष्ट किये) चाहते हैं, तो वह बखूबी हो सकता है। यदि आमदनी बहुत कम है, तो अधिकाँश तो भोजन में ही व्यय हो जायेगी।

भोजन तथा बचत-

क्या हमें भोजन के बजट से बचत करनी चाहिए? कदापि नहीं। आप वस्त्र या मकान में से भले ही बचत कर लें, किन्तु संतुलित भोजन में से कमी न कीजिए। यदि इसमें कंजूसी करेंगे, तो बीमार पड़ेंगे और दुगुना रुपया दवाई या डॉक्टर की फीस में व्यय हो जायगा। हम आपको कीमती चीजें-मिठाई, अचार, शराब, चाय, बिस्किट, चाय पकौड़ी, शौकीनी के शरबत, चुसकी, माँस, कार्नफ्लौर, पकवान, मुरब्बे-खाने की सलाह नहीं देते किन्तु स्वास्थ्यवर्द्धक सरल प्राकृतिक रक्षात्मक भोजन की सलाह देते हैं। यह भोजन सस्ता रहेगा।

यदि रामलाल 300) रु. प्रतिमाह कमाते हैं और श्रीकृष्ण केवल 100) रु. मासिक और दोनों खर्चें का हिसाब रखते हैं, तो वह स्वभाविक ही है कि रामलाल श्रीकृष्ण से तिगुनी खाने में व्यय कर सकते हैं। इसका यह अभिप्राय नहीं कि श्रीकृष्ण को एक तिहाई भोजन खरीदने चाहिये। इसका यही अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण को रामलाल की बनिस्बत खाने के बजट पर अधिक सावधानी रखनी होगी और मूल वस्तुओं तथा जरूरी चीजों पर ही व्यय करना होगा। रामलाल अधिक स्वाद और ऊँची तरह के भोजन का स्वाद ले सकते हैं। लेकिन जहाँ तक रक्षात्मक भोजन का प्रश्न है, वह दोनों में समान ही रहेगा। अन्य भोजन पेट या स्वास्थ्य के लिए नहीं जिव्हा के स्वाद के लिए ही होते हैं। स्वास्थ्य या दीर्घ जीवन की दृष्टि से उनकी कुछ भी उपयोगिता नहीं है।

महीने भर के लिए आप भोजन इस प्रकार लीजिये-(100) मासिक और 5 व्यक्तियों के कुटुम्ब के लिए) गेहूँ डेढ़ मन, चार प्रकार की दालें दस सेर, दो सेर चावल, फल तरकारियाँ 7 रु., दूध 5 चीनी 4 सेर, मसाले 1 रु., चिकनाई 5 रु. फुटकर 2)

भोजन के आवश्यक पदार्थों को खरीदने में संभव है कुछ अधिक व्यय हो जाय, अतः यह बढ़ती अन्य मदों में कमी करके निकाल लेनी उचित है। सुविधानुसार व्यय करें पर विलासप्रियता ओर चटोरी आदतों में न फंसें। मन पर कठोर नियंत्रण रक्खें और मिठाई वालों की दुकानों के आसपास न टहलें, अन्यथा प्रलोभन में फंसेंगे।

इकठ्ठा वस्तु खरीदना

फसल पर वर्ष भर के लिए वस्तु खरीद कर रखना किफायतशारी है। हम यह नहीं कहते कि आप कर्ज लेकर ये वस्तुएँ खरीदें। थोड़ा-2 बचा कर आप घर की ऐसी वस्तुएँ-दालें, गेहूँ, मिर्च, चावल, तेल, चीनी, लकड़ी, आलू, अरबी, सूखे मेवे-खरीद कर रख सकते हैं। अपनी गृहस्थी का वार्षिक बजट बनाइये और अनुमान लगाइये कि कितनी किस वस्तु की आवश्यकता आपको पड़ेगी। प्रत्येक वस्तु को बड़ी सफाई से रखिये अन्यथा सूखी हुई तरकारियाँ खराब हो जायेंगी, चावल में कीड़ा पड़ जायगा, गेहूँ घुन जायगा।

यदि आप स्वयं अकेले अधिक मात्रा में वस्तुएँ नहीं खरीद सकते, तो अपने मित्रों और सम्बन्धियों को मिला कर एक सहकारी सभा बना लीजिये और परस्पर मिलकर वस्तुओं को खरीदिये। वर्ष के प्रारम्भ में पढ़ने वाले बच्चे कापियाँ, स्टेशनरी, पुस्तकें खरीदते हैं। यदि सब लोग साथ-2 खरीदें तो कुछ कमीशन भी मिल सकता है। यदि आप के कुछ मित्र या रिश्तेदार कुछ नित्य काम में आने वाली वस्तुएँ आप से खरीदने का प्रबन्ध कर लें, तो आपको कुछ आमदनी भी हो सकती है। थोड़े से ही एक दुकान खोली जा सकती है।

सावधानी से मालूम कीजिये कि वे कौन सी वस्तुएं हैं जिन्हें आप एक साथ खरीद सकते हैं। अपने घर की वस्तुएँ खरीद कर प्रारम्भ कीजिये। घी, शक्कर, तेल, गरी, छुहारा, मखाना, बादाम, इलायची, मिर्च, गुड़, अरहर, मसूर, मक्का, ईंधन, फसल पर ही खरीदना उचित है। फुटकर सामान लेने से जो हानियाँ होती हैं, वे पं. लक्ष्मीधर वाजपेयी के शब्दों में इस प्रकार हैं-

“थोड़ा-2 करके बारबार सौदा खरीदने से वह महंगा मिलता है क्योंकि फुटकर और थोक के भाव अलग-2 होते हैं। बार-बार बाजार जाने से समय नष्ट होता है। सौदा जब थोड़ा खरीदना होता है, तो हम चार जगह देख कर नहीं खरीदते। इसलिए सौदा भी अच्छा नहीं मिलता। जैसा कोई दुकानदार दे देता है, वैसा ही ले लेते हैं। समय पर वस्तु न होने से घर की व्यवस्था बिगड़ती है, गृहस्थी में बरकत नहीं रहती।”

हमारे वस्त्रों का व्यय-

भोजन के पश्चात् वस्त्र महत्वपूर्ण हैं। पेट भर जाने के पश्चात् मानव का तन ढकने की सूझती है। हवई कैसन ने लिखा है-“एक भूखा रोटी के टुकड़े के लिए अपना पाजामा प्रसन्नता से दे डालेगा, लेकिन जब उसका पेट भर जायगा, तो वह दूसरा पाजामा खरीदने का प्रयत्न करेगा।” इस मद में 10 प्रतिशत आमदनी कुछ अधिक प्रतीत होती है किन्तु अपनी आवश्यकता के अनुसार इसे कम या अधिक किया जा सकता है। इसमें वस्त्रों की सफाई, मरम्मत, और नये कपड़े सिलाना सम्मिलित है।

अच्छे वस्त्रों का आदर होता है, अपनी अवस्था और हैसियत के अनुसार साफ -सुन्दर कपड़े पहनने उचित और न्याय संगत हैं। इनसे आपका व्यक्तित्व निखर उठता है, गुप्त शक्तियाँ जाग्रत हो उठती हैं, मनुष्य अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, पहला प्रभाव अच्छे कपड़ों का ही पड़ता है। अज्ञात स्थान में, जहाँ कोई नहीं जानता कि आप क्या है, आपके वस्त्र ही आपके सहायक होते हैं। सफर में अच्छे कपड़े पहनने की सलाह इसी लिए दी जाती है। वेशभूषा और वस्त्र आपके चरित्र की विषय सूची की भाँति हैं। पश्चिमी सभ्यता के संसर्ग से नाना प्रकार के फैशन और काट छाँट के वस्त्र हमारे देश में प्रचलित हैं। आप ऐसे वस्त्र पहनें जो आपकी हैसियत के अनुसार ठीक रहें। न अधिक ऊँचे, न नीचे। अच्छा पहनिये, सादगी और सरलता से, सफाई से कपड़ों को रखिये। इसी में आपकी इज्जत है।

इस सम्बन्ध में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। आप कीमती वस्त्र ले लें, किन्तु उन्हें इतने यत्न और ध्यान पूर्वक रखिये कि उन्हें आप अधिक से अधिक दिन अच्छी से अच्छी हालत में चला सकें। वस्त्र की भी आयु होती है। प्रत्येक कपड़े को पूरी आयु भर जीने का अवसर दीजिये। इतनी अच्छी तरह इस्तेमाल कीजिये कि वह कम मैला हो, और कम धुले। रोज-2 धुलवाना अमितव्ययता है। स्वयं धो लीजिये। धोबी कपड़े स्वयं पहनता है, किराये पर दूसरों को देता है, उबालता है और ठोक पीट कर आधी जान समाप्त कर देता है। जितना कम धुलें उतना ही अच्छा।

दूसरी बात फैशन है। फैशनपरस्ती आधुनिक मनुष्य की बड़ी कमजोरी है। वह फैशन बनाते समय अपनी जेब नहीं देखता, क्षण भर के दंभ में फंस कर वस्त्रों पर फिजूलखर्ची कर बैठता है। हमारी बहिनें इस दिशा में बड़ी असावधान होती हैं। अहंकार के कारण वे अपने आपको बड़े चढ़े रूप में देखने और दिखाने के लिए इच्छुक रहती हैं। अन्दर से खोखले चने चबाने और एक वक्त भोजन करने वाले अनेक युवक धनवान सा लिफाफा बनाते हैं। इस ढोंग बनाने और दूसरों को धोखा देने की प्रवृत्ति के कारण वे अपने सर पर इतना भारी फिजूल खर्ची, कर्ज और लेन देन को सिर पर ले लेते हैं, जिसके बोझ से उनकी कमर और गर्दन वर्षों झुकी रहती है। छल, कपट, दंभ, धूर्तता, मायाचार, धोखेबाजी एवं असत्यता युक्त पोशाक से कुछ लोग क्षणिक सफलता प्राप्त कर लेते हैं, पर आर्थिक स्थिति के खुलते ही उस मायाचार का भंडा फट जाता है।

साधारणतः सादी स्वच्छ पोशाक पहनिये, बदन के आराम तथा अपनी रक्षा के लिए वस्त्र बनवाइये, फैशन के माया जाल में न फंसिये। फैशन तो जनता को धोखा देने के लिए दिखावा है। समझदार व्यक्ति आपकी असली हैसियत खूब जानता है। उसे अभिनय की जरूरत नहीं है।

धुलाई-अनुभव से आपको प्रतीत होगा कि कुछ कपड़ों को घर पर ही धो लेना कितना सुविधा जनक है। कमीजें, बनियान, लंगोट, रुमाल, यदि घर पर ही धो लिए जायं, तो काफी दिन काम में लाये जा सकते हैं धोबी के घर का धुला प्रत्येक वस्त्र कम से कम आठ दिन तक मैला न होने दीजिये। आपकी चतुराई और सतर्कता इसी में है कि वस्त्र मैला न होने पाये। द्वितीय महायुद्ध में योरोप में यह अनुमान लगाया गया था कि 30 प्रतिशत धुलाई केवल सफाई तथा सतर्कता से रह कर मिटाई जा सकती है, 20 प्रतिशत कपड़े की गन्दगी ठीक प्रकार से भोजन न करने और पेय पदार्थों के गिर जाने से प्रारम्भ होती है, 10 प्रतिशत रात्रि और दिन के कपड़े न बदलने, या उतारे हुए कपड़ों को तह कर लोही न करने की असावधानी से प्रारम्भ होती हैं। वस्त्र कहते हैं, “आप हमारी इज्जत कीजिये, हम आपकी इज्जत करायेंगे।” इसका अभिप्राय यही है कि उनकी उचित देखभाल से ही आपकी इज्जत बनेगी, पैसा कम खर्च होगा और मितव्यय की आदत पड़ेगी। सिल्क, रेशम, और दिखावे के कपड़े न खरीदें, मैले तो कम से कम करें क्योंकि इनकी धुलाई बहुत ली जाती है।

स्वयं धोकर स्वस्थ बनिये और रुपया बचाइये। एक लोहा खरीद लीजिये। इससे आप धोबियों से भी अच्छा कपड़ा धो कर काम में ला सकेंगे।

मकान और किराये की समस्या-

आजकल किराया मकान की समस्या भोजन जैसी ही उग्र हो उठी है। अतः हमने बजट में 20 प्रतिशत तक इसमें व्यय करने की सलाह दी है। डॉक्टर एंजिल ने योरोपीय देशों के लिए 12 प्रतिशत की राय दी है। डॉ. एंजिल की राय है कि किराये, रोशनी, और ईंधन में प्रत्येक परिवार में प्रतिशत खर्च बराबर हो सकता है। महंगाई से पूर्व 10 प्रतिशत में काम चल जाता था अब 10 से 20 प्रतिशत इस मद में व्यय करना होता है। यदि घर अपना है तो मरम्मत, पुताई, सफाई और उसे ठीक हालत में खड़ा रखने में काफी व्यय हो जाता है। कच्चे घरों में प्रतिवर्ष छप्पर और कवेलू चढ़ाने में व्यय अधिक आता है। यथा संभव सस्ता मकान लीजिये किन्तु स्वास्थ्य और अच्छा पड़ौस महत्वपूर्ण बातें हैं। घर की सजावट अपनी आमदनी के अनुसार कीजिये।

कुछ अन्य खर्चे जिनके विषय में सावधान रहें-

मादक द्रव्यों के सब खर्च तुरन्त त्याग देने योग्य है। चाय, पान, बीड़ी, सिगरेट, शराब, तम्बाकू, सोड़ा वाटर, शरबत, इत्यादि पर कुछ भी व्यय न करें। हम बहुत देखते हैं कि मजदूरों या भिखारियों के लड़के बाजारों में मुँह में सिगरेट दबाये, बालों में तेल डाले घूमते हैं। जूता गाँठने वाले चमार भी सिनेमा नित्य देखते हैं, दरिद्र बन्धु शराब खानों में पड़े रहते हैं, किसानों के लड़के अंग्रेजी ढंग की कमीज, कोट, तथा बूट जूते से बात करते हैं, बर्फ पीते हैं-ये सब फिजूल खर्ची त्याज्य हैं।

विलासिता पर होने वाला व्यय प्रत्येक मनुष्य को कम कर देना चाहिए। आतिशबाजी, खरीदकर जलाना व्यर्थ है। आभूषण यथासंभव कम बनाइये। कहीं-कहीं दावतों में भोजन इतना परोसा जाता है कि ढेर की ढेर जूठन के रूप में पड़ा रहता है। मृत्युभोज में भी अपव्यय बन्द कीजिए।

पुस्तकों पर कम खर्च करें। केवल उपयोगी और ठोस काम में आने वाली पुस्तकें ही खरीदें। शेष को ऐसे ही चलाने दें। पत्र पत्रिकाएं एक बार पढ़ कर रद्दी की टोकरी में फेंकने योग्य हो जाती है। सद्ज्ञान और मनोविज्ञान की पत्रिकाएं खरीदिये। कहानी की पत्रिकाओं से बचिये। पोस्टेज में कार्ड का प्रयोग ही कीजिये। लिफाफा भी एक प्रकार से विलासिता की वस्तु है। रेल का सफर यथासंभव रूप से ही करें।

हमारे कृषक भाई मुकदमे बाजी में बरबाद हो जाते हैं। दत्तक और गोद के मामलों में बहुत अपव्यय होता है। मुकदमेबाजी में नष्ट होने वाला अपार धन पंचायतों से बचाया जा सकता है। इत्र फलेल, क्रीम, पाउडर, शेविंग, सिनेमा, बनाव शृंगार, वैसलीन, सिर के तेल, साबुन, मिठाई के खर्चे कम से कम कीजिये।


रहन सहन का स्तर कैसे ऊँचा करें?

रहन सहन का दर्जा ऊँचा करने के लिए हमें अपनी आदतों को देखना होगा। जिसकी जैसी आदतें हैं, उन्हीं के अनुसार आवश्यकताएँ बढ़ती घटती रहती हैं। प्रायः देखा गया है कि निम्न श्रेणी के व्यक्ति पान बीड़ी, मद्यपान, माँसाहार और मिठाइयों में रुपया व्यय कर डालते हैं, सिनेमा देखते हैं पर उनके बदन पर फटे कपड़े के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। घर कच्चा और अंधेरा होता है। आदत मनुष्य का दूसरा स्वभाव कही गई है। जिसे पीने की आदत है, वह बिना पीने के संतुष्ट नहीं होगी, जो सिनेमा या मद्य का आदी है, वह उसी से संतुष्ट रहेगा। दो मनुष्य जिन्हें एक समान ही वेतन प्राप्त होता है, अपनी आदतों के कारण ऊँचे नीचे गरीब या समृद्ध दीखते हैं।

आदतें हमारे विवेक से बनती हैं। जो व्यक्ति समझदारी से अपनी आदतों का निर्माण करता है, वह आदतों का गुलाम नहीं, आदतें उसकी गुलाम होती हैं, वह उन पर राज्य करता है। रहन-सहन निर्धारण करने वाले दो प्रमुख तत्व हैं-(1) रुपया खर्च करने में विवेक बुद्धि का प्रयोग (2) व्यय की जाने वाली आमदनी। जो व्यक्ति अधिक रुपया पाता है, वह तो रहन सहन शिक्षा इत्यादि का दर्जा ऊँचा रख ही सकता है, किन्तु वह व्यक्ति भी जो विवेक बुद्धि से समझदारी से रुपया व्यय करता है, वह भी अपनी रहन सहन का दर्जा ऊँचा कर सकता है। खर्चीला रहन सहन यह नहीं बताता कि दर्जा वास्तव में ऊँचा है, या नहीं। कुछ अमीर लोग आमदनी न होने पर भी अमीरों की भाँति व्यय करते हैं।

प्रो॰ अमरनारायण अग्रवाल ने विवेक पूर्ण और अविवेक पूर्ण व्यय करने वाले दो व्यक्तियों के उदाहरण बड़े सुन्दर दिए हैं। वे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं-“अजीत को 200) और आशीष को केवल 100) रु. प्रतिमास मिलते हैं। किन्तु अजीत बेपरवाह और बिना सोचे विचारे व्यय करता है। उसे शराब खोरी, सिनेमा आदि की बुरी लत हैं और वह उन पर अपनी आधी, या आधी से भी अधिक आय खर्च कर देता है। वह शेष को भी बिना विचारे होटल में खाना खाकर कीमती कपड़े पहन कर और सस्ते विलासिता के पदार्थों का प्रयोग कर व्यय करता है। उसके कुल उपयोग की गतिविधि बहुत नीची है, उसके रहन-सहन का दर्जा अवश्य नीचा होगा।

आशीष बहुत सोच समझ कर खर्च करता है। वह अपनी आय का उचित भाग स्वास्थ्य-वर्द्धक एवं शक्ति दायक आहार पर व्यय करता है, सस्ते पर खुले हवादार घर में रहता है और साफ टिकाऊ कपड़े पहनता है। वह कुछ रुपया शिक्षा पर भी व्यय करता है और आपातकाल के लिए भी कुछ बचा कर रखता है। उसके रहन सहन का दर्जा निःसंदेह ऊँचा है। यद्यपि अजीत की आय आशीष से दुगुनी है, तथापि आशीष के रहन सहन का दर्जा अजीत से ऊँचा है। इसका कारण यही है कि आशीष विवेक से खर्च करता है और अजीत बिना समझे बुझे लापरवाही से। अतः यह समझना मिथ्या है कि खर्चीला रहन सहन का दर्जा आवश्यक रूप से ऊँचा भी होता है, मिथ्यात्व पूर्ण है।”

भारतवर्ष एक निर्धन देश है। यहाँ नब्बे प्रतिशत गरीब बसते हैं। प्रति व्यक्ति की औसत आय भी न्यून है। आजकल महंगाई तेजी से बढ़ रही है। ऐसे समय में खर्चीले स्वभाव वाले गरीब आदमी बरबाद होने से नहीं बच सकते।

ऊँचा रहन-सहन का सच्चा अभिप्राय यही है कि मनुष्य की सभी विवेकशील आवश्यकताएँ आसानी से पूर्ण हो जाय, पौष्टिक भोजन, स्वस्थ हवादार घर और उचित शिक्षा, मनोरंजन एवं बचत हो। वह भविष्य में उन्नति और आत्म विकास के साथ संतोष और तृप्ति पा सके।

इन साधनों से काम लीजिये-

रहन सहन ऊँचा करने का प्रथम साधन है-विवेक। अर्थात् हमें चाहिये कि आप अधिक बचत करने में प्रयत्नशील रहें। इससे भी अधिक यह आवश्यक है कि जो कुछ हमें प्राप्त हो उसका विवेक पूर्ण व्यय किया जाय। प्रत्येक पैसे से अधिकतम लाभ उठाया जाय। विवेकहीनता के कारण भारतवासियों को सबसे अधिक कष्ट उठाना पड़ रहा है।

शिक्षा की वृद्धि की जाय। अर्थ शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। उद्योग धंधों की शिक्षा का प्रबन्ध होना चाहिए। प्रत्येक स्त्री पुरुष को उद्योगी बनाया जाय, आलस्य या पर्दे में न बैठने दिया जाय। स्त्रियाँ घरेलू धन्धे जैसे-कताई, बुनाई, रंगाई, पढ़ना, लिखना, सीना, पिरोना, कटाई इत्यादि का कार्य करें। कुछ बाहर नौकरियाँ भी कर सकती हैं। तीज त्यौहारों, विवाह, मृत्यु, और मुकदमेबाजी में, शराबखोरी और सस्ती चटोरी दिखावटी वस्तुओं से रुपया बचाकर निपुणता दायक पदार्थों में व्यय किया जाय।

समाज से झूठा दिखावा विलासिता फैशन निकाल दिया जाय। और ठोस पौष्टिक खाद्य पदार्थों, हवादार मकानों, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि पर व्यय किया जाय।

सादा जीवन और उच्च विचार-इस नियम के अनुसार समाज का जीवन ढाला जाय। जैसे-2 मितव्ययिता और सादगी ग्रहण की जायेगी पर्याप्त भोजन, वस्त्र, शिक्षा प्राप्त होगी, हमारा स्तर ऊँचा होता जायेगा। मितव्ययिता को तो स्वभाविक एक अंग बना लेना चाहिए। जो आवश्यक खर्चे हैं, उन पर व्यय किया जाय, फिजूल खर्ची और विलासिता की संतुष्टि न की जाय।

जितना ही कम रुपया प्राप्त हो, उतनी ही विवेकशीलता से बजट बना कर जीवन रक्षक पदार्थों, तत्पश्चात् प्रतिष्ठा रक्षक और निपुणता रक्षक पदार्थों में व्यय करना चाहिए। पारिवारिक बजट बहुत सोच समझ कर विवेक पूर्ण रूप से बनाना चाहिए। बचत की रकम पहले ही पृथक् कर लेनी चाहिए।


Quotation

धीमी धीमी वर्षा बहुत देर तक होती है, किन्तु एक दम आने वाला तूफान थोड़ी देर रहता है।

-शेक्सपियर

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मितव्ययिता दरिद्रों को भी धनवान बना सकती है।

-सेनेका

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जो दान किसी दाता को ऊंचा न उठावे वह वास्तविक दान नहीं है।

-नारायण

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दान, पछतावा, संयम, संतोष, दीनता, सच्चाई और दया ये बैकुंठ के सात दरवाजे हैं।

-हितोपदेश

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जीवन का अर्थ है-दान।

-धर्मशास्त्र


नकद सौदा लीजिये ।

ऋण ग्रस्त होने से बचने का एक उपाय है-नकद सौदा खरीदना। यदि आप जीवन में यह नियम बना लें कि हम जो कुछ लेंगे नकद लेंगे, उधार नहीं लाएँगे, हाथ में पैसा होगा, तभी खरीदेंगे, तो आप ऋण से मुक्त रहेंगे। अनेक लोग इसीलिए बरबाद हुए हैं कि वे अनाप शनाप उधार लेते रहे।

चूँकि उधार एक दम मिल जाता है, हम प्रायः ऐसी वस्तुएँ भी ले लेते हैं जिनकी हमें आवश्यकता नहीं होती, या जो हमें अनायास ही लुभा लेती है। दुकानदार तो दुकान में से माल निकालने को उत्सुक रहते हैं। आपकी तनिक सी दिलचस्पी देखते ही, तुरन्त दे देंगे। पैसे आपसे वसूल कर ही लेंगे। यदि नहीं देंगे, तो मुकदमा चलेगा, बदनामी होगी, पर उनका रुपया मारा नहीं जा सकता। आपको देना ही होगा। उनकी चीज बिक जायेगी।

प्रो॰ स्टुअर्ट केन्जी अपनी पुस्तक “आपका जीवन” में लिखते हैं-“रुपया बचाने का एक निर्दोष और सरल उपाय यह था कि हमने उधार लेना बिल्कुल बन्द कर दिया। हमारे पास दो स्टोर ऐसी वस्तुओं से भर गये थे, जिन्हें दुकानदारों ने हमारी दिलचस्पी से अनुचित लाभ उठा कर बेच दिया था। हमें उस समय तो यह प्रतीत न हुआ कि रुपया व्यय हो रहा है, अतः हम खुले हाथ से खर्च करते रहे। जब पत्नी ने बिसाती की दुकान पर नकद सौदा कम करना प्रारम्भ किया, तो उसने उपयोगी चीजों को ही खरीदा, शौक और मजेदारी की चीजों को छोड़ दिया। केवल दुकानदार को टेलीफोन कर चीजें उधार मंगाने की आदत छोड़ कर हम रुपया बचाने लगे।”

कुछ लोग व्यापारियों द्वारा दिये गये कमीशन, या “गिरे हुए भाव” के चक्कर में फंस कर वस्तुएँ खरीद लाते हैं। कभी-2 दुकानदार कैलेंडर, चित्र, विज्ञापन या छोटी छोटी वस्तुएँ उपहार में देकर ग्राहकों को पटाते हैं। रुपया एक माह पश्चात् देने का प्रलोभन देते हैं। चीजों का मूल्य अधिक रख कर आधा दाम देने का विज्ञापन करते हैं, माल बेचने वालों को बड़े कमीशन दिये जाते हैं। अतः आगे देने के प्रलोभन में पड़े अनावश्यक खर्चों में पड़ना उचित नहीं।

किश्तों में वस्तु खरीदना-

जो चीज किश्तों में ली जाती है, उसकी मूल्य नकद से अधिक देना होता है। रेडियो, सीने की मशीनें, शिक्षा के कोर्स, पुस्तकें इत्यादि जब किश्तों से लिये जाते हैं, तो उनमें 30 प्रतिशत अधिक रुपया व्यय होता है। आप ऐसी दुकानों का एहसान मानते हैं, पर इस एहसान का मूल्य प्रायः बहुत होता है। एक खास बात भी है, जब तक आप वस्तु का पूरा मूल्य नहीं चुका देते, तब तक बड़ी फर्म या दुकान उस वस्तु की मालिक भी होती है। यदि किश्त न दी जाय तो वह वस्तु पुनः आपसे ले ली जाती है और आपका सब रुपया मार लिया जाता है।

यदि आप कोई महंगी वस्तु खरीदना चाहते है, तो प्रतिमास बजट में कुछ रुपया उसके लिए बचाते जाइये। नकद चीज सस्ती मिलेगी और आपको अधिक मजा आयेगा। किश्त देने वाले अपने रुपये का करारा सूद और चार्ज करते हैं। उन्हें करना पड़ता है क्योंकि उन्हें उसी में से बचा कर अपना खर्चा निकालना है। अमेरिका में यह पद्धति बहुत साधारण है। थोड़ा सा रुपया देकर लोग चीज काम में लाने लगते हैं, प्रतिमास कुछ देते हैं, प्रायः चीज नष्ट हो जाती है पर उसका कर्ज चला करता है। यह अपना आवश्यकताएं न जानने, प्रलोभनों में फंसने और अपनी चादर के अनुसार पाँव न पसारने के कारण होता है।

पर्चा लिख कर वस्तु उधार लेना-

आप होटल या दुकानदार के नाम एक चिट पर चीजें लिख देते हैं, और तुरन्त वह आपके पास आ जाती है। आपके मित्र आपके साथ हंसी खुशी खा लेते हैं। उस समय आपको यह ज्ञात नहीं होता कि कितने का बिल बना। पान, सिगरेट, चाय, मिठाई, इत्यादि में व्यय होते-छोटे होटलों का यह खर्चा 25)-30) रुपये तक पहुँचता है। अनेक कालेज के विद्यार्थी, अध्यापक, क्लर्क लोग कैंटीन से सामान मंगाते रहते हैं अधिक कर्ज होने पर अपना मुँह दिखाते शर्माते हैं।

उधार की पर्ची फिजूलखर्ची का एक सरल उपाय है। आप उधार लेंगे, थोड़ी देर मजा लेंगे, बाद में पछतायेंगे। क्लबों के कर्ज आदमी को बड़ा परेशान करते हैं। बिजलीघर में बिजली के कर्ज, पानी के व्यय, दुकानों के कर्ज निरन्तर वृद्धि पर रहते हैं। न पर्चा लिख कर उधार चीजें मंगाइये, न किसी दूसरे को खुश करने के लिए अपने को कर्ज में डालिये। यदि आप चीज लेते हैं, तो तुरन्त दाम देने की आदत बना लीजिये।

अपनी साख बना लीजिये-

आपके लिए बाजार की साख बड़ी महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार व्यापारियों के लिए उसी प्रकार आपके लिए साख ही सब कुछ है। जब साख नहीं रहती, तो कुछ नहीं रहता, न कुछ भी कभी उधार मिलता है। जब जरूरत ही आ पड़े तो संकट के समय भी कोई कुछ नहीं देता। किसी भी व्यापारिक संस्था, दुकान या फर्म या व्यक्ति को अपनी साख का सबसे पहला ध्यान देना चाहिये।

यदि आप चीजें नकद लेने के आदी हैं, तो प्रत्येक जगह, हर दुकानदार आपको चीज देने को प्रस्तुत रहेगा। आपकी अच्छी साख बनी रहेगी। तभी उधार लीजिये, जब कुछ भी न हो सके। साथ ही यह भी सोच लीजिये कि आगे जाकर यह कर्ज आप कैसे चुकाएंगे।

एक स्पेनिश कहावत है-

“यदि आप अपने सब कर्जों को अदा कर सकते हैं तो आपको अपनी वास्तविक आर्थिक अवस्था का ज्ञान हो जायेगा।”

तीन स्थानों पर दाम मालूम कीजिये-

यदि कोई व्यापारिक संस्था कोई माल लेना चाहती है तो वह कई व्यक्तियों से भाव मालुम करती है, सोचती विचारती है, तब माल खरीदती है। इसी प्रकार आप जब वस्तु खरीदने निकलें, तो अवश्य तीन चार दुकानों पर मूल्य पूछ लीजिये। इस गुर से आप वस्तुओं का अधिक दाम देने से बच जायेंगे। वस्तु खरीदते समय मूल्य, किस्म, गारन्टी, मजबूती और बेचने वाले की ईमानदारी का विशेष ध्यान रखिये। वास्तविक दामों से यदि आप अधिक पैसा देते हैं, तो उसकी विशेषता अवश्य मालूम कर लीजिये।


Quotation

दान की अपेक्षा दान देने के ढंग से दाता के चरित्र का पता चलता है।

-लवेटेर

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दुःख से घबरा कर आत्महत्या करना तो दुःख को जीतना नहीं है।

-शरद बाबू

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घर ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

-जोजेफ कुक

राष्ट्र का बल उसके लोगों का सज्ञान और सुव्यवस्थित घर है।

-सिडनी

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परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया का नाम ही चरित्र है।

-डॉ॰ पट्टाभिसीतारमैया


शृंगार की वस्तुएँ ।

विज्ञापन द्वारा लूट-

जब आप एक आकर्षक विज्ञापन देखते हैं, तो उसी वस्तु की आवश्यकता अनुभव करने लगते हैं। तरह तरह के क्रीम, वैसलीन, साबुन, पाउडर, बाल बढ़ाने के तेल, इत्र, दाँत के मंजन भाँति 2 की दवाइयाँ आपको ठगने के लिए विज्ञापित किये जाते हैं। इन सब में मूल तत्व प्रायः एक से ही होते हैं। इनके विज्ञापन प्रायः इतने आकर्षक होते हैं, उनकी भाषा इतनी बनावटी, धोखे में डालने वाली होती है कि मूर्ख पाठक एकदम बहकावे में आ जाते हैं। अमेरिकन और अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं में 20-20 पृष्ठ विज्ञापनों से भरे रहते हैं। विज्ञापन लिखना भी एक कला है। वही व्यक्ति अच्छे विज्ञापन लिख सकते हैं जो दूसरों को धोखे में डाल सकते हैं। आकर्षक विज्ञापन से रद्दी, गिरा हुआ, सड़ा गला माल भी निकल जाता है। कुछ लोग केवल विज्ञापन छपाते हैं, आर्डर आने पर माल बाजार में खरीद लेते हैं और अपना कमीशन लगा लेते हैं। अनेक बार लिखा कुछ और, भेजा कुछ और जाता है। खरीदने वाला दूसरे शहर में होता है रद्दी माल को वापस नहीं लौटा सकता। उसे जैसा मिला उसी से संतुष्ट होना पड़ता है।

भिन्न-2 प्रकार के विज्ञापन

हमें कैसे बेवकूफ बनाते हैं?

दवाओं के विषय में विज्ञापन बहुत लुटते हैं। हाजमे के चूर्ण, दस्त रोकने और बन्द करने, ऐंठन मेटने, या खट्टी डकारों, भूख कम लगनी, उदर रोगों के लिए उपयुक्त हैं, बड़ी मात्रा में विज्ञापित की जाती है। पुरुषत्व बढ़ाने, वीर्य वर्द्धक स्तम्भन प्रदीप्त करने वाली मदन मंजरी रमणी विलासिनी गोलियों की भरमार है, सिरदर्द के बाम हजारों बिक रहे हैं। अनेक वैद्य कविराज नामर्दों, प्रसूत, गर्मी, बच्चा होने की दवायें ऊँचे मूल्य पर बेच कर जनता को लुट रहे हैं। स्त्रियों को लूटना और भी आसान है। विज्ञापन किसी स्त्री के नाम से दिया जाता है। स्त्रियाँ अनेक भयानक रोगों से परेशान रहती हैं। बेचारी चुपचाप से दवाइयाँ मंगाया करती हैं। संतान प्राप्ति के बहाने भारत में प्रतिवर्ष हजारों रुपया लूटा जाता है। समाज की गन्दगी पत्रिकाओं में वीर्य विकार, धातु क्षीणता, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, नपुँसकता, दमा, जीर्ण ज्वर, यक्ष्मा के विज्ञापनों से देखी जा सकती है। इन दवाइयों में प्रायः कुछ भी सत्यता नहीं होती। मामूली उत्तेजक पदार्थ होते हैं, जिनसे लाभ के स्थान पर हानि अधिक होती है।

कलुषित और अश्लील प्रवृत्तियों को उत्तेजना देने वाली कामशास्त्र के नाम पर बिकने वाली गन्दी पुस्तकों का व्यापार खूब चल रहा है। ये लोग काम शास्त्र (जो अपने सही रूप में बुरा नहीं है) के नाम पर समाज को गन्दे रास्ते पर ले जा रहे हैं। प्रायः नग्न स्त्रियों के फोटो, रंगीन आसन, अलबम, चुम्बनों के चित्र, गर्भनाशक औषधियाँ, बर्थ कन्ट्रोल की वस्तुओं के विज्ञापन बड़ी मात्रा में समाज को धोखे में डाल रहे हैं। इन पुस्तकों में काम का तथ्य बहुत कम और शैतानी की बातें बहुत रहती हैं। इनसे बड़े सावधान रहने की आवश्यकता है।

गोरे और खूबसूरत होने की दवाओं में वैसलीन या क्रम और खुशबूदार फलों का इत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। क्षणिक सुगन्ध के फेर में पड़ कर हम अपने पसीने की कमाई इन वस्तुओं में नष्ट करते हैं। न इनसे गाल के मुंहासे, दाग फुँसियाँ, खुजली दूर होती हैं, न त्वचा ही साफ निकलती है।

कुछ लोग खिजाव द्वारा अपने बालों को काला बनाने के बड़े शौकीन होते हैं। वे नौजवान होने का अभिनय करना चाहते हैं। यह नितान्त मूर्खता है। बाल एक दिन बाद फिर सफेद हो जाते हैं।

जिन जेवरों का विज्ञापन आप पढ़ते हैं, वह सोने का नहीं है। उसमें केवल सोने का झोल चढ़ा रहता है, जो कुछ दिन बाद साफ हो जाता है। अतः इनसे सावधान रहें।

कभी-2 माल बेचने के लिए लाटरी और इनामों का सहारा लिया जाता है। इनामी टिकट के लोभ से लोग उन वस्तुओं को खरीदते हैं, न कि उपयोगिता की दृष्टि से। यह इनाम भी खोखला होता है। प्रायः कोई सस्ती सी वस्तु दे दी जाती है।

वशीकरण मन्त्र, कवच, ऋद्धि−सिद्धि यन्त्र, जो आपकी दुष्ट ग्रहों, दुःख दारिद्रय से बचाते, या घर में अंधाधुन्ध धन दौलत फैलाते हैं, जिसे चाहो वश में करने का वायदा करते हैं, वे सब झूठा धन्धा करते हैं। भला सोचिये कि क्या बिना पुरुषार्थ किसी कवच मात्र से विद्या, बुद्धि, धन, ज्ञान, स्मरण शक्ति, की वृद्धि, या प्रतियोगिता में फस्ट आना, मुकदमें में जीत हो सकती है, पुरुष स्त्री को वशीभूत कर सकता है, कोई घमड़ी आपके वश में आ सकती है। यह नितान्त असंभव है, झूठ और फरेब है। कभी किसी यंत्र या कवच के, जादू की अंगूठी के चक्कर में न फसिये।

धोखे का एक और ढंग देखिये- विज्ञापन है- “दीपावली की खुशी में 3॥) रु. में 8 पुस्तकें- “हुक्मीइलाज, सुहागरात, तिलस्मी पिटारा, सौ रुपये की बात चुम्बन, गुप्त एलबम”। आप 3॥) रु॰ में पार्सल मंगा लेते हैं। आपको पार्सल खोलने पर आश्चर्य होता है क्योंकि वहाँ 10-15 पृष्ठों की बादामी कागज पर छपी हुई रद्दी पुस्तकें निकल जाती हैं इस प्रकार सैकड़ों लोग भोली जनता को धोखा दे देकर अमीर बन गये हैं। खेद है कि सरकार भी इस धोखे को प्रतिबन्ध द्वारा नहीं रोकती।

घड़ियों के विज्ञापनों में भी सार कम होता है। प्रायः देखा गया है कि ऐसी घड़ियाँ बिल्कुल नहीं चलतीं। न ठीक ही होती हैं। सस्ती घड़ियाँ खरीदने वाले रोते हैं।

आजकल सबसे अधिक विज्ञापन सिनेमा सम्बन्धी होते हैं। दो एक अभिनेत्रियों की तसवीरें, एक फड़कता हुआ गाना, और जनता को धोखे में डालने वाले वर्णन लिख-लिख कर लोगों को आकर्षित किया जाता है। प्रत्येक फिल्म में घुमा−फिरा कर वही प्रेम कहानी वासना को उद्दीप्त करने वाले गाने, रति चेष्टाएं, कुरुचिपूर्ण रुचि भ्रष्ट करने वाले दृश्य। इस निर्धन देश के युवक इस विषैले मनोरंजन से वेश्यागामी होते हैं, कुपथ पर चलते हैं और राग रंग में मस्त रहते हैं। हमारी फिल्मों का स्तर अभी तक ऊँचा नहीं उठ पाया है।

विज्ञापनों की मोहनी माया से दूर ही रहना श्रेष्ठ है। इनमें न कोई सार है, न लाभ। प्रत्येक व्यक्ति को माल स्वयं देख कर खरीदना चाहिये। यदि कोई वस्तु उपयोगी हो, तभी उसे खरीदने में लाभ है। केवल क्षणिक प्रलोभन के, आनन्द अथवा मनोरंजन के लिए रुपये की होली नहीं खेलनी चाहिये। नियंत्रण और आत्मसंयम ही हमारी सहायता कर सकते हैं। जब तक किसी वस्तु की नितान्त आवश्यकता ही अनुभव न करें, और जब कार्य आगे न चले, तभी इन वस्तुओं का क्रय करना उचित हैं।


Quotation

मनुष्य का चरित्र ही उसकी भावी सफलता या विफलता का निर्णायक है।

-रहीम

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उच्च जीवन ही से उच्च चरित्र वाले उत्पन्न होते हैं।

-पोप

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चरित्र से बढ़ कर और कोई उत्तम पूँजी नहीं है।

-स्माइल्स


अधिक रुपया किस प्रकार कमाया जा सकता है?

अपने जीवन में प्रतिदिन हम अपनी सेवाएं दूसरों को बेचते हैं और बेच कर रुपया पैदा करते हैं। हममें से कोई अपना शरीर, कोई विचार, कोई योजनाएं, शक्तियाँ, उत्साह, प्रेरणाएँ शिक्षाएं-कुछ न कुछ रोज बेच रहे हैं। खरीदार है जनता, जिसे हमारी सेवाओं की आवश्यकता पड़ती रहती है।

खेद का विषय है कि हम अपनी योग्यताओं की वृद्धि नहीं करते इसीलिए हमें समाज में अपनी शक्तियाँ बेचकर रुपया कमाते हुए तकलीफ होती है। हम अच्छे विक्रेता नहीं हैं, न हमारे पास बेचने के लिए अच्छा माल ही है।

हजारों व्यक्ति मेरे पास आते हैं और पूछते हैं-“हम व्यापार करना चाहते हैं, किन्तु हम अच्छे विक्रेता नहीं हैं। हम लोगों से मिल कर उन्हें पटाना और अपनी माल बेचना नहीं जानते।” इन सभी को मेरा उत्तर यह होता है-“यदि आप यह तत्व नहीं जानते तो किसी अनाथालय में चले जाइये क्योंकि आप सम्पूर्ण जीवन यही रोना रोते रहेंगे।” जब तक मनुष्य विक्रेता के गुण, ग्राहक का मनोविज्ञान अच्छी तरह न समझ ले, वह जीवन में रुपया नहीं कमा सकता। विक्रेता के गुणों की हम, आप, सभी को जीवन के प्रत्येक विभाग में आवश्यकता है।

नौकरी कैसे मिले?

यदि आप बेकार है और नौकरी की तलाश में हैं, तो एक काम कीजिये। किसी व्यापारी से नौकरी देने के लिए मिन्नत या खुशामद न कीजिये, विनती कर दूसरे के हृदय में दया उकसा कर आप नौकरी नहीं पा सकेंगे। यदि व्यापारी को किसी आदमी की नितान्त आवश्यकता है और उसे कोई नहीं मिल पा रहा है, तभी वह आपको नौकरी देगा। अतः नौकरी उपहार स्वरूप न लीजिये। अपनी सेवाएं उसे बेचिये जो उसके सबसे अधिक पैसे देता है, उस संस्था की तलाश में रहिये जो आपको अपनी योग्यताओं का ऊँचे से ऊँचा मूल्य चुका सके।

यदि आपकी नौकरी छूट भी जाये, तो भयभीत हो, इधर उधर भीख की तरह नौकरी मत माँगिये। आपके पास अनुभव है। आप उस अनुभव को बेचने के लिए अधीर मत हूजिये। कुछ ठहरिये और सोचिये।

आप यह सोचिये कि आपको अपनी पुरानी नौकरी से क्यों निकाला गया? शायद आप कटौती में आ गये हैं? या आप पुराने पड़ गये? आप समय के साथ अपनी योग्यताएं न बढ़ा सके और पीछे रह गये? जब हमारी मशीन पुरानी हो जाती है, तो हम उसे रद्दी वाले कबाड़ी को बेच देते हैं। हम कहते हैं कि वह खर्चा अधिक करती है, उत्पत्ति उससे कम होती है। संभव है यही बात आपके साथ हो? आप काम उतना नहीं कर पाते, जितना चाहिए। फिर आप अपने को समय के परिस्थिति के अनुसार क्यों नहीं ढाल लेते। आप चाहें तो अपने व्यक्तित्व में कुछ नया ज्ञान, कुछ अनुभव, कुछ शिक्षा प्राप्त कर उसे अप-टू-डेट बना सकते हैं। आप अपनी योग्यता ऐसी ठोस कर सकते हैं कि हर कोई आपकी सेवाएं खरीदने को प्रस्तुत रहेगा।

श्री आर.एफ. ग्रान्ट लिखते हैं-“संसार अवसरों से भरा है। यदि मनुष्य अवसर और परिस्थिति के साथ साथ अपने आप को ढाल ले, या अवसर को अपने पर फिट बैठा ले, तो वह उससे अवश्य लाभ उठा सकता है। हमें अपनी कटु आलोचना खरी और तीखी आलोचना कर व्यक्तित्व की कमजोरियाँ मालूम करने और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये।”

संसार में बहुत कम ऐसे निर्भय व्यक्ति हैं, जो अपने दोष देखते, उन पर सोचते विचारते, टीका टिप्पणी करते हैं। आप इन्हीं व्यक्तियों में बनिये। अपनी कमजोरियों को छाँट 2 कर निकाल डालिये। अपने व्यक्तित्व को पुनः निर्मित कीजिये। संक्षेप में, अपनी कमजोरियाँ निकाल कर अपने आप को नवीनतम नमूने का आदमी, नवीन व्यक्तित्व, विचारों और दृष्टिकोण वाला व्यक्ति बना लीजिये। व्यापारियों को ऐसे ही नये नमूने की जरूरत रहती है। इसी के सबसे अधिक पैसे मिलते हैं।

आप व्यापारी बन सकते हैं?

संभव है आत्म परीक्षा द्वारा आपको यह प्रतीत हो कि आपमें एक कुशल व्यापारी के गुण है। उनके विकास के लिए व्यापारियों के यहाँ कुछ दिन मुफ्त काम कीजिये, अनुभव ग्रहण कीजिये। उनके गुर मालूम कीजिये। देखिये कि वे किस सावधानी से एक-एक पैसे का हिसाब रखते हैं, प्रत्येक खर्च पर खूब सोचते विचारते और बही में लिखते हैं। बिना बजट के एक पाई व्यय नहीं करते।

व्यापार में सतर्कता, मितव्ययिता, जागरुकता बड़े आवश्यक गुण हैं। फिजूलखर्ची से या उधार देने से आपका मूलधन भी नष्ट हो सकता है। अपना खर्चा कम से कम रखिये। आपको जो लाभ हो, उसी को व्यय करने का अधिकार आपको है। प्रत्येक ग्राहक को संतुष्ट करना आपका उद्देश्य होना चाहिए। यह सदैव ध्यान रखिये कि आप दूसरे व्यक्ति को कुछ न कुछ सेवा बेच रहे हैं। उसके दृष्टिकोण से तथ्य को देखिये। ग्राहक वहीं जाएगा, जहाँ उसे अधिकतम लाभ होगा।

लोग आपके विषय में बातें करना चाहते हैं। उन्हें बातें करने के लिए कुछ चाहिए। उन पर अच्छा प्रभाव डालिये, सज्जनता, दयालुता, शराफत के विचार एक मुँह से दूसरे, दूसरे से तीसरे पर लगातार फैलते हैं। यह विज्ञापन आपके विषय में अच्छा होता रहे, यह ध्यान रखिये।

मित्रों की संध्या निरन्तर बढ़ाइये। उनके द्वारा आपको आत्म-विज्ञापन में बहुत अधिक सहायता मिलेगी। मित्र आपको आगे ठेलने में सदैव तत्पर रहेंगे।

संसार उसकी सहायता करता है, जो स्वयं सशक्त और सफल हो चुका है। उन्हें उसी की मदद करने में मजा आता है, जो ऊपर है। बाइबिल में एक स्थान पर कहा गया है-“जिसके पास है, उसी को और दिया जायेगा।” जिन्हें कम से कम सहायता की आवश्यकता होती है, उन्हीं की अधिक से अधिक सहायता की जाती है। अतः स्वयं अपनी सहायता से ऊँचा उठिये, संसार आपके पीछे पीछे चलेगा।

विकास के लिए जो तथ्य सब से जरूरी है, वह है, “योजना बनाना” और फिर चाहे कुछ हो उस पर टिके रहना, चट्टान की तरह अड़े रहना। पूर्ण करना अधूरा न छोड़ना। लोग अच्छी योजनाएँ प्रारम्भ करते हैं, पर बीच से ही छोड़ भागते हैं। यह बुरा है इससे सावधान रहिये।

हमारे घरेलू उद्योग धन्धे-

आपका समय आपका धन है। यदि आपके पास बचा हुआ समय है, तो परिश्रम और प्रयत्न से उसे रुपये के रूप में परिणत कर सकते हैं। समय बचाइये, रुपया बच जायेगा। समय बचाने के लिए समय का हिसाब रखना पड़ेगा। जो समय बचेगा, उसका उचित उपयोग करना पड़ेगा तब वही धन बन जायेगा।

मान लीजिये, आपके पास अवकाश है। आप चाहते हैं कि इस समय में कुछ ऐसा कार्य करें जिससे आपको आर्थिक सहायता प्राप्त हो।

इस फालतू समय में आप निम्न कार्य कर सकते हैं-

(1) छोटे-छोटे व्यापार कीजिये। मौसम पर वस्तुओं का संग्रह कर लीजिये, मंडी में भाव की ऊंचाई की प्रतीक्षा कीजिये। भाव ऊँचा होने पर वस्तु बेच दीजिये। अनेक कम पूँजी के बनिये यह व्यापार करते हैं। छोटे पैमाने पर कोई घरेलू धन्धा शुरू कीजिये।

(2) किसी की दुकान पर थोड़े समय की नौकरी कर लीजिए। बिक्री में आप सहायता कर सकते हैं। बड़े शहरों में रात्रि में अनेक दुकानें खुली रहती हैं। इनमें सदैव, अच्छे ईमानदार आदमियों की जरूरत रहती है। इन दुकानों पर आपको काम मिल सकता है।

(3) टाइप का काम सीख लीजिये। इसके लिए थोड़े से परिश्रम और अभ्यास की आवश्यकता है। प्रतिदिन एक दो रुपये रोज कमा सकते हैं।

(4) दवाइयाँ, क्रीम, हेयर आइल, वैसलीन इत्यादि बनाना सीखिये। मंजन, अंजन, अवलेह, घरेलू, दवाइयाँ, तैयार कीजिये इनकी बिक्री अच्छी रहेगी। यह व्यापार बढ़ाया जा सकता है।

(5) फाउन्टेन पेन की रक्षा और दुरुस्ती का व्यापार बहुत व अच्छा और खूब पैसे देने वाला है। इससे अच्छी आमदनी होती है। घर बैठे लोग आयेंगे। फाउन्टेन पेन की स्याही बनाने का कार्य भी सीख लिया जाय तो सोने में सुगन्ध है।

(6) साबुन बनाने में थोड़ी सी मेहनत की आवश्यकता है और अच्छी आमदनी होती है।

(7) फलों के शर्बत, बादाम, पिस्ता इत्यादि के शर्बत बनाना, सोडा लेमन इत्यादि बनाना तरह तरह की रंगाई का काम, गर्म कपड़े धोना सीखिए। बिस्किट बनाना अच्छा घरेलू धन्धा है।

(8) आतिशबाजी और सुगंधित अगरबत्ती का सामान आप घर पर बना सकते हैं। इसके लिए शोरा, गन्धक, कोयला ओर पोटाश की जरूरत है। इसमें लोहा, एल्युमिनियम, मैग्नेशियम, पष्टिमनी, तांबा, जस्ता आदि धातुओं का बुरादा मिलाने से अनार, फुलझड़ी आदि का मिश्रण तैयार होता है। राष्ट्रीय दिवस, रजत महोत्सव, दीपावली पर आतिशबाजी की वस्तुओं की अतीव आवश्यकता होती है। यह आप घर बैठे कर सकते हैं।

(9) मुर्गियों के अंडों का व्यापार साधारण दर्जे के व्यक्ति कर सकते हैं। मुर्गियों के अंडे से चूजे प्राप्त किए जा सकते हैं। जो चाहें, वे इस व्यापार को कर सकते हैं।

(10) थोड़ा स्थान हो तो पपीते के पेड़ लगा कर उनसे कुछ रुपया प्राप्त किया जा सकता है। अन्य फलों की तरकारियों की खेती भी की जा सकती है।

(11) रेडियो, टाइपराइटर, घड़ी या छोटी-2 मशीनों को सुधारने का काम काफी पैसे देने वाला है। पढ़े-लिखे आदमी यह काम कर सकते हैं।

(12) अचार, मुरब्बे, शहद, पापड़ का व्यापार कीजिए।

(13) सोचिये और मालूम कीजिए कि आपके निवास स्थान के आस-पास कौन से हस्त व्यवसाय, घरेलू उद्योग धन्धे, अथवा ग्रामोद्योग चलते हैं? किस उद्योग धन्धे की जानकारी आपके उपयोग में आ सकेगी? खेती, व्यापार, घरेलू उद्योग धन्धे आप कौन-2 से कर सकते हैं? अपने मुख्य कार्य के अतिरिक्त इनमें से किसी न किसी को चुनना चाहिए। सोच समझ कर कुछ न कुछ आमदनी का उपाय आपको निकाल ही लेना चाहिए। यदि आपके पास पूँजी की कमी है, तो नौकरी ही कीजिए। यदि आप लेख, कहानी, कविताएं लिख सकते हैं, तो अच्छे पत्रों में (जैसे, आजकल, सरिता-रानी, उद्यम प्रदीप, नया समाज, प्रवाह) इत्यादि में भेज कर कुछ रुपया कमा सकते हैं।

(14) दो चार मित्र मिलकर एक होटल खोल सकते हैं। आदर्श स्वच्छता आपके होटल का प्रथम गुण होना चाहिए। सर्वसाधारण होटलों में जहाँ ग्राहकों को गन्दगी का मुकाबला करना पड़ता है, आपके होटल में सफाई और मधुर भाषण होना चाहिए। कुछ दिन माल सस्ता देने पर ग्राहक बंध जाते हैं, फिर उनसे अधिक भी लिया जा सकता है। होटल, कैंटीन, तथा जलपान की दुकानों में बड़ा लाभ है।

(15) दवाइयों के स्टोर, किराने के माल की दुकानें भी सहकारी समिति द्वारा खोली जा सकती हैं। अपनी कोई खास विशेषता रखिये। सच्चा हिसाब न रखने और उधार देने से अनेक धन्धे डूब जाते हैं। अमेरिका में दिवाला निकालने वाले वे लोग होते है जो साफ हिसाब रखना नहीं जानते।

(16) जिस पैमाने पर धन्धा चलाने की महत्वाकांक्षा है, उससे आधे प्रमाण पर धन्धा प्रारम्भ कीजिए। बड़े कारखाने छोटे पैमाने पर प्रारम्भ हुए है। जो व्यापार या धन्धा करना हो उसके विषय में अधिक से अधिक ज्ञान पुस्तकें पढ़ कर, और वैसे ही व्यापारियों के साथ रह कर अनुभव प्राप्त कीजिये। जैसे-2 आप का अपने ऊपर विश्वास जमता जाए, वैसे-2 आप उसी धन्धे को चलाने के साधन एकत्रित करते जाइये।

मान लीजिये, आप बाइसिकल की दुकान खोलना चाहते हैं। इसके लिए आप पहिले साइकिल मरम्मत करना सीखिए, किसी दुकान पर उम्मीदवार के रूप में कार्य कीजिए, भिन्न-भिन्न हिस्सों के दाम, फर्मों के पते, भाव इत्यादि मालुम कीजिए। तब दुकान खोलिये। अपने धन्धे के अतिरिक्त और भी दूसरे धन्धा करने वाले व्यापारियों से अपना संबंध बढ़ाइये।

(17) विज्ञापन शास्त्र तथा विक्रय कला से परिचित होना आवश्यक है। विज्ञापन द्वारा लोगों की आँखों में धूल मत डालो। वरन् विश्वास पूर्वक अच्छा खरा माल दो, उनकी कठिनाइयों एवं शिकायतों को प्रेम से सुनो और ग्राहकों को संतुष्ट रक्खो।

(18) स्वतन्त्र धन्धे का स्थान सम्मानपूर्ण और ऊँचा है। अतः यथासंभव अपना कोई धन्धा अपना लो। दुकानदारी में भी काफी बचत होती है।

(19) डेयरी (घी दूध) का धन्धा छोटे स्केल पर किया जा सकता है। सर्वत्र दूध का दुर्भिक्ष पड़ जाने से खालिस दूध की आवश्यकता आज बहुत बढ़ गई है। जिनके पास स्थान है और चारे का प्रबन्ध कर सकते हैं, उन्हें दो भैंसे लेकर यह धन्धा प्रारम्भ करना चाहिए।

(20) अपनी योग्यता किसी विशेष दिशा में निरन्तर बढ़ाते रहिए। योग्यता-रुपया। अधिक योग्यता का अर्थ है-अधिक रुपया। जो योग्यता और अनुभव में बढ़े हुए हैं, उन्हीं को अधिक रुपया प्राप्त होता है।

संसार का कोई भी व्यक्ति आपको बिना परिश्रम, योग्यता की योजना के रुपया प्राप्त करने का उपाय नहीं बतला सकता। फ्रेंक बी. गिलरेट कहते हैं कि “रुपया कमाने के लिए सबसे सफल धनी मानी व्यक्तियों को देखिये, उनकी रीतियों, कार्यों और बनाई हुई चीजों का गंभीर अध्ययन कीजिए।”

वास्तव में यदि हम रुपया प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें उन व्यक्तियों के कार्य और साधनों का अध्ययन करना चाहिए जो अपने बल और योग्यता से बड़े बने हैं। हमें यह मालुम करना चाहिए कि उनके धन प्राप्त करने का क्या रहस्य है।

जुआ, सट्टा, दाँव-पेंच, रिश्वत किसी को धनी नहीं बना सकते। इनसे अपनी गाँठ का भी जाता रहता है। लॉटरी के टिकट, वर्ग पहेली, भाग्यशाली नम्बर कभी आपकी सहायता नहीं कर सकते। जो फकीर सट्टे के नम्बर बताकर ठगते हैं, वे यदि स्वयं कुछ कर सकते तो अवश्य धनी बन जाते, उनसे सावधान रहिए। नीति का वचन है-“उद्योगिन” पुरुष सिंह मुपैति लक्ष्मीः-“ अर्थात् “उद्योगी पुरुष को ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।” उद्योग कीजिए लक्ष्मी आपके पास आयेगी।


घरेलू मितव्ययिता द्वारा गृहस्थी में स्वर्ग की सृष्टि।

मितव्ययिता का क्रियात्मक उपयोग कठिन नहीं है। जो आमदनी हो, उससे कम व्यय कीजिये। जितना बचाना हो, उसे पहले ही डाकखाना सेविंग्स बैंक में जमा कर देना उचित है। चाहे एक रुपया ही क्यों न बचे महीने की पहली तारीख को ही अपने से दूर कर दीजिये। पास उतना ही रखिये जितना आवश्यकताओं में व्यय हो।

हर वस्तु को नकद खरीदा कीजिये, इससे आपको मालूम होता रहेगा कि कितना रुपया व्यय हुआ, कितना पास शेष बचा है। उस बचे हुए रुपये में से ही कार्य चलाना है, यह स्मरण रक्खें। जो अपना कर्ज देता है, लेता नहीं, वही अमीर है।

जब तक किसी से आने वाले रुपये आपके पास जेब में न आ जाय, आप उन्हें खर्च करने की बात न सोचें। व्यापार प्रारम्भ करते ही लाभ होने लगेगा, रुपया सूद पर देते ही ब्याज आने लगेगा, मकान किराये पर देते ही किराये से आप मालामाल हो जायेंगे, नौकरी लग गई है, अब तो कमाई आती ही रहेगी-ये बात अनिश्चित हैं। प्रत्येक दिन हो सकता है कि कोई नई आर्थिक अड़चन आपके सम्मुख आ खड़ी हो। व्यापार में जरा भी मूर्खता से लाखों की हानि हो सकती है, ब्याज का रुपया डूबने के अनेक कारण हो सकते हैं, किरायेदार किराया दिये बिना भाग सकता है, और नौकरी तो किसी भी दिन छूट सकती है। सब कुछ अनिश्चित है। अतः जो रुपया आपके हाथ में है, उसी को अपना समझिये, उसी को खर्च करने के लिए तैयार रहिये, उसी पर आशा रखिये। रुपये के सम्बन्ध में सबसे अधिक अनिश्चित रहना चाहिये। लाभ, फायदा, सूद का रुपया, मकान किराया अनिश्चित है, किन्तु उधार का लिया हुआ रुपया सिंघवाद की कहानी में वृद्ध की तरह सिर पर सवार रहेगा।

घरेलू मितव्ययिता का एक स्वर्ण सूत्र यह है कि स्वच्छ हिसाब रखिये। आप जो व्यय करते हैं, चाहे वह एक पैसा ही क्यों न हो, उसे अवश्य दर्ज कीजिये। आपकी जो आय है वह भी लिखिये। आय व्यय का हिसाब रखना फिजूलखर्ची से बचने का श्रेष्ठ उपाय है। एक चतुर व्यक्ति अपने बजट और पिछले हिसाब द्वारा अपनी भावी आवश्यकताएँ समझ सकता है। उसका घरेलू बजट संतुलित रहता है। उसका व्यय आमदनी से कम रहता है।

जौन वेस्ले निरन्तर इसी क्रम से चले। यद्यपि उनकी आय कम थी, तथापि उन्होंने अपनी आय-व्यय पर सदैव तीव्र दृष्टि रक्खी। अपनी मृत्यु से एक वर्ष पूर्व उन्होंने काँपते हुए हाथ से अपनी डायरी में लिखा था-“गत वर्षों में मैंने अपनी आय-व्यय के हिसाब को संतुलित रक्खा है। अब भविष्य में मैं इसी कार्य क्रम को चलता नहीं रहने देना चाहता क्योंकि अब मितव्ययिता मेरे आदत और स्वभाव का एक अंग हो गई है। मैंने जो भी बचाया, वह मितव्ययिता की आदत के बल से ही हो सका है।”

आपकी पत्नी को भी मितव्ययी बनना, अपने शृंगार, शौक और विलास की सामग्रियों को कम करना होगा। वास्तव में पति से पत्नी का उत्तरदायित्व अधिक है। घर में जरा-जरा सी अनेक वस्तुएं बरबाद की जाती हैं, जिन्हें बचाने से कई दिन और काम चल सकता है। भोजन अधिक पका कर नष्ट किया जाता है, वस्त्र बेनाप के बना कर सिलाये जाते हैं, कपड़ों को मैला कर पुनः पुनः धो कर फाड़ दिया जाता है, फकीरों को ढेर का ढेर दान दिया जाता है, तीर्थों, मृतक संस्कारों, पण्डे पुजारियों, झूठा दिखावा, और विशेषतः आभूषण बनवाना-इनमें अनाप शनाप व्यय किया जाता है। स्त्रियाँ एक दूसरे के वस्त्र और आभूषण देखकर बहुत जल्दी लुभा जाती हैं और अपने पति को कर्ज के बोझ से दबा डालती हैं। स्त्रियों को प्रसन्न करने की असफल चेष्टा में हजारों व्यक्ति बरबाद हुए हैं और गृहस्थी को नर्क में बदल बैठे हैं। आभूषण बनवाने में हमेशा आनाकानी कीजिये। उत्तम तो यह है कि टाल दीजिये। पत्नी को प्रेम से आर्थिक कठिनाई और बजट दिखा देने से अनेक आर्थिक कठिनाइयों से बचा जा सकता है। पत्नी के हाथ में हिसाब दे दीजिये। उसी से बजट बनवाइये। फिर यदि 25 तारीख को ही वेतन समाप्त हो जाय, तो उसे अपने साथ आर्थिक संकट अनुभव करने दीजिये। आर्थिक कड़वाहट से वह नया पाठ सीख लेगी। जिस गृहस्थी में स्त्रियाँ मितव्ययी और समझदार है, परिश्रमी विनयशील, और सीधी-सादी सुशिक्षिता है, वह स्वर्ग के समान सुन्दर है। खर्चीली पत्नी, धनी घर की पत्नी, गरीब पति के लिए खतरनाक चीज है। बड़े घर की पुत्रियाँ फैशनपरस्त, अविवेकशील, आलसी, खुले हाथ व्यय करने वाली होती हैं। वे निर्धन पति के लिए सर का दर्द बन जाती हैं।

अपनी पुत्रियों और पुत्रों को फैशन के रोग से बचा लीजिये। उन्हें साफ सुथरा अवश्य रखिये पर फैशन परस्त नहीं। जो पुत्र पुत्री समझदार हैं, उन्हें अपने खर्च का ब्योरा दिखा सकते हैं। उनके खेल तमाशे, सिनेमा इत्यादि मनोरंजनों में उन्हीं से किफायत करने को कहिये। उनके ऊपर कोई बात थोपिये मत, संकेत देकर उन्हें आत्म संयम करने दीजिये।

गृहस्थ में रहने वाले जब तक सभी व्यक्ति रुपया बचाने की योजना में दिलचस्पी न लें, तब तक एक का प्रयत्न सफल नहीं होता।

आपका घर सुव्यवस्थित होना चाहिए। व्यवस्था क्रम, खर्च में विवेक उत्पन्न करता है। वह घर धन्य है जिसमें एक बच्चे की शिक्षा और विकास के लिए सभी आदमी अपने व्यक्तिगत व्यय न्यूनतम कर थोड़ा-2 बचा कर आगे बढ़ते हैं। व्यवस्था से यह संभव है। अपने अधिकार और कर्तव्यों का ज्ञान व्यवस्था उत्पन्न करता है। संसार की सृष्टि व्यवस्था से हुई। जहाँ अव्यवस्था और अविवेक है, वहाँ गरीबी भी है। जीवन के प्रत्येक क्षण में नियम, व्यवस्था और क्रम प्रगति ओर उन्नति का मार्ग है। क्रम और व्यवस्था में स्त्रियों का पुरुष की अपेक्षा आधिक हाथ है। वे ही सम्पूर्ण दिन घर रह कर कार्य सम्हालतीं और खाद्य पदार्थों की व्यवस्था करती हैं। गृहस्थी की आर्थिक समृद्धि भी उन्हीं के ऊपर आश्रित है। चतुर पति को बड़े यत्न से प्रारम्भ से ही पत्नी में मितव्ययिता और क्रम व्यवस्था इत्यादि की आदत डालनी चाहिए।

निम्न श्रेणी के व्यक्तियों को अपनी आय के अनुकूल रहना सरल है। वे साधारण भोजन ले सकते हैं, मैले वस्त्रों से भी गुजारा कर सकते हैं, मामूली गृह में निवास कर सकते हैं। किन्तु गरीबी में भी यदि वे आय के साथ व्यय बढ़ाते-घटाते जायं तो सम्पन्न रह सकते हैं।

मध्य वर्ग महंगाई से परेशान है। पढ़े लिखे सभ्य व्यक्तियों को हाथ का कार्य करने वाले मजदूरों की अपेक्षा अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपनी आय वृद्धि में बड़ा सचेत रहना पड़ता है। उन्हें सामाजिक स्थिति के अनुसार वस्त्र, गृह, स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा इत्यादि का ख्याल रखना होता है। मध्य श्रेणी के व्यक्तियों को संयम और व्यवस्था की नितान्त आवश्यकता है। यदि वे सतर्क न रहें, तो अपनी टीपटाप बनाये रखने में वे कर्जदार हो सकते हैं।

आमदनी की कमी या अधिकता का रहन-सहन पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना रुपये का अधिक से अधिक सद्-उपयोग करने का पड़ता है। एक व्यक्ति दिन में तीन आने की सिगरेट पीता है, दूसरा उसी पैसे से घर के लिए सब्जी दूध इत्यादि खरीदता है या एक समय के ईंधन का प्रबन्ध करता है। निश्चय ही दूसरे ने अपने पैसे का सदुपयोग किया और अधिक स्थायी आनन्द प्राप्त किया। इसी प्रकार छोटे-विलासिता के खर्चे जैसे-पान, कैंटीन के व्यय, मिठाई, चाट पकौड़ी, सिनेमा, मित्रों की आवभगत के व्यय, सोडा शरबत-हिसाब लगाने से इतने अधिक हो जाते हैं कि इन्हीं के बचे हुए रुपये से एक मकान बन सकता है। इस दृष्टिकोण से देखने से उत्तम बुद्धि, उच्च स्वभाव, संयम, नियन्त्रण और मानसिक संस्कृति हमारे सबसे अच्छे सहायक है।

डॉ. आइटन लिखते हैं कि उनके पिता ने दस-बारह बच्चों के कुटुम्ब को 900 पौंड वार्षिक में पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया था। उन्होंने अपनी पुस्तक अपने पिता को समर्पित करते हुए लिखा है-“यह पुस्तक सादर एक ऐसे पिता को समर्पित है, जो अब 83 वें वर्ष में है, और जिसने 900 पौंड वार्षिक आय में 12 बच्चों में से चार को उच्चतम शिक्षा दिलाई और जो अपने अन्तिम शिलिंग तक को उनके खर्च के लिए कालेज में भेजता रहा है।”

श्री सैमुअल स्माइल्स लिखते हैं कि मितव्ययिता के उदाहरण के लिए स्वयं उनका जीवन लिया जा सकता है। उनकी माता जब उसका अन्तिम 11वाँ बच्चा केवल तीन मास का था, विधवा हो गई। उन पर किसी की जमानत देने के कारण कुछ कर्ज भी था पर इस कठिनाई और 12 बच्चों के बोझ के बावजूद वे धैर्यपूर्वक अपनी सामाजिक स्थिति और मान के लिए प्रयत्नशील रहीं और अन्त में विजय प्राप्त की। यद्यपि उनकी आय साधारण सी थी, तथापि उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा में कमी नहीं की, इन्हें शील गुण सम्पन्न बनाया। यदि उनमें से कोई योग्य न बन सका, तो इसमें उस महिला रत्न का कोई अपराध नहीं था।

प्रसिद्ध इतिहासकार ह्यूम के पिता उसे छोटा सा छोड़ कर स्वर्गवासी हुए थे, उसकी माता ने ही उनकी शिक्षा का प्रबन्ध किया था। 26 वर्ष की अवस्था में ह्यूम फ्राँस में विद्या अध्ययन के लिए गये। वहाँ के विषय में आप लिखते हैं-“मैंने यह प्रण कर लिया कि मैं मितव्ययिता से काम लूँगा, प्रत्येक पाई का उचित उपयोग करूंगा और अपनी समृद्धि के लिए सतत उद्योगशील रहूँगा। मैं उन सभी विलास की वस्तुओं को घृणा करूंगा जो मेरी योग्यताओं की अभिवृद्धि नहीं करेंगी।” उनकी पहली कृति सफल न रही, किन्तु वे कार्य में जुटे रहे। वे वियना में राजदूत के मिलिटरी सेक्रेटरी हो गए। वे 26 वर्ष की आयु में अपने आपको अमीर समझने लगे। उनके शब्द देखिये-“मेरी मितव्ययिता, सतत उद्योग, परिश्रम और संयम ने मुझे सम्पदा का मालिक बना दिया था और अब मैं अपने पाँवों पर खड़ा हो सकता था। मेरे पास अब लगभग डेढ़ हजार पाउन्ड जमा हो चुके थे। पाँच प्रतिशत के हिसाब से मुझे 60 पाउन्ड प्रतिवर्ष सूद के प्राप्त हो सकते थे।” ह्यूम की मितव्ययिता में कभी दान या दूसरों की सहायता में कमी नहीं हुई, न कभी व्यर्थ उन्होंने एक पेनी बरबाद किया।

संसार के असंख्य व्यक्ति अपने आपको आगे बढ़ाने के लिए और समाज में अपना स्तर ऊँचा करने के लिए परिश्रमशील रहे हैं और आनन्द को घृणा करते रहे हैं। वे विनयशील ओर मितव्ययी रहे, कितने ही पुरुषार्थियों ने अपने शारीरिक बल से अपना निर्वाह किया यहाँ तक कि वे योग्य और विद्वान बन गए। उनके पास केवल एक शक्तिशाली वस्तु थी - वह थी दृढ़ इच्छा और आत्म विश्वास।

सफलता की कुँजी हमारी संयत और संयमित आदतें हैं। जो आदत के अनुसार अनुचित विलासिता से मुक्त रहता और सरल सादा जीवन व्यतीत करता है, वही गृहस्थ दीर्घ काल तक अपने आत्म सम्मान को स्थिर रख सकता है।


इन रद्दी चीजों की रक्षा कीजिये।

घर में रक्खी हुई छोटी से छोटी वस्तु की उपयोगिता है। कभी न कभी वह अवश्य काम दे जायगी। अपने घर की चीजों का निरीक्षण कीजिए और उन्हें किस प्रकार काम में लाया जा सकता है, यह मालूम कीजिये।

रद्दी कागजों को व्यर्थ मत फेंकिये। सम्हाल कर रखिये और बाजार में बेचिये। रद्दी कपड़ों का संग्रह करते जाइये। औरतें इनकी सहायता से नीचे बिछाने की चटाई तैयार कर सकती हैं। कागज बनाने के लिए बिक सकते हैं, फकीरों को दिए जा सकते हैं। टूटी फूटी अनेक वस्तुएँ पुनः मरम्मत कर काम में लाई जा सकती है। कितनी ही बार कबाड़ियों के यहाँ से ऐसी मूल्यवान चीजें कौड़ियों के मोल मिल जाती हैं जो मरम्मत के बाद अच्छे दामों में निकल जाती है। रेडियो, बाइसिकल के हिस्से, टाइपराइटर, बिजली का सामान, ताले, अनेक बार कोड़ियों के मोल कबाड़ी के यहाँ से मिल जाते हैं जो मरम्मत से वर्षों तक काम देते हैं।

चाय छानने के बाद बची हुई पत्तियाँ न फेंकिये। संग्रह करके सुखा लीजिए। उनका काड़ा निकाल लीजिए। यह काढ़ा दर्पण साफ करने के लिए और फर्नीचर पर पालिश करने से पूर्व सफाई के काम आता है। चाय के सूखी पत्तियों से अग्नि तैयार की जा सकती है।

इमली के बीजों को भून कर उनके ऊपर की छाल निकाल डालिए और सरोते से काट कर सुपारी मुलेठी के साथ प्रयोग में लाइये।

संतरे के छिलके को व्यर्थ न फेंकिये। उन्हें धूप में सुखा लीजिए। उनका महीन चूर्ण तैयार कर मिष्ठान्न में डालने से संतरे जैसी सुगंध आती है।

बबूल की छाल सुखाकर या बादाम के छिलके जलाकर पीस डालिए। यह दंत मंजन उत्तम होता है।

कड़ुवे नीम की हरी पत्तियों को उबाल कर उनका काढ़ा शीशियों में भर कर रख दीजिए। इस काढ़े से नालियाँ और फर्श धोकर स्वच्छ किए जा सकते हैं। इनका उपयोग फोड़े आदि धोने के काम में किया जा सकता है। गंधक के धुएँ से मच्छर मारे जा सकते हैं।

दियासलाई की सींकों को तीक्ष्ण रेजर ब्लेड के द्वारा मध्य से चीर लीजिए। दियासलाई दुगुनी हो जायेगी।

आपकी अनेक बीमारियाँ घरेलू दवाइयों से दूर हो सकती है। अतः घरेलू दवाइयों पर एक शास्त्रीय पुस्तक पढ़ डालिए। स्वयं दवाइयाँ बना कर पैसा बचाइये।

साबुन को काम लाने के लिए निम्न बातें याद रखिए-(1) कपड़ा धोने की साबुन के टुकड़े काट कर सुखा लीजिए। सूखी साबुन अपेक्षाकृत कम घिसती है। (2) अपनी साबुन को पानी में न पड़ा रहने दीजिए। स्नान के पश्चात् अपने कमरे में लाकर सूखे स्थान पर सम्हाल कर रखिये (3) स्नान की साबुन का अंतिम शेष बचा हुआ भाग नई साबुन पर चिपका लीजिए (4) कपड़ा धोने की साबुन के छोटे-2 टुकड़ों को एक टीन के डिब्बे में रखिए और उसी में पानी डाल कर उन्हें घोल लीजिए। इससे कपड़े धोये जा सकते हैं (5) साबुन का पानी मत फेंकिए। उससे फर्श धो डालिए।

एक शेविंग ब्लेड से आप एक मास मजे में हजामत बना सकते हैं। जब ब्लेड खोटा हो जाय, तो तेज करने का आलस्य न कीजिए। हजामत करने के बाद धोकर पोंछना कदापि न भूलिए, हो सकें तो थोड़ा वैसलीन भी धार पर लगा दीजिए। रद्दी ब्लेड का चाकू बनाया जा सकता है। इस प्रकार का एक चाकू बाजार में मिलता है। उसी में यह फिट किया जा सकता है।

आपके पास जो लिफाफे आते हैं, उन्हें अन्दर से खोल डालिये। अन्दर से वे साफ हैं इस लिए मामूली तौर पर लिखने के काम में लाये जा सकते हैं।

साग सब्जी की पत्तियों को न फेंकिये। मूली, शलजम, फूलगोभी, इत्यादि सब्जियों की पत्तियाँ पका लीजिए। पत्तियों में विटामिन अपेक्षाकृत अधिक होता है। यदि सम्हाल कर पकाई जाय तो वे बड़ी स्वादिष्ट बनती हैं। सस्ती सब्जियों जैसे गाजर, मेथी पालक इत्यादि का अधिक प्रयोग कीजिए। कीमती सब्जियों की ओर न जाइए। “तेते पाँव पसारिये, जेती लम्बी सौर।”

वर्षा के पश्चात् मकानों की मरम्मत, कुछ नया हेर फेर, रंग सफेदी, शोभा-सजावट आदि करना उचित है। यदि स्वयं आप इन कार्यों को करने में हाथ बंटायें, कुछ काम स्वयं सीख लें, तो बहुत कम खर्च पर टिकाऊ और आधुनिक ढंग पर सजावट कर सकते हैं। जो मजदूर आपके यहाँ 3) रु. रोज पर काम करते हैं, वे आपसे बहुत कम समझदार होते हैं। जब वे यह कार्य कर सकते हैं, तो आप कैसे नहीं कर सकेंगे? आप अवश्य यह कार्य कर सकते हैं। थोड़ा अभ्यास, सम्हाल, बुद्धिमानी, और परिश्रम-बस आपका काम हो गया।

लीपने के लिए गोबर का प्रयोग अच्छा है। उसमें कुछ संरक्षक गुण है, दरारों को जोड़ता है पर स्मरण रहे ये गुण ताजे गोबर में ही होते हैं। जहाँ गोबर बासी हुआ कि सड़ने लगता है। गोबर में गरमाहट को कायम रखने का गुण भी पाया जाता है। चूने की सफेदी जन्तु-नाशक होती है। चूने की सफेदी धीरे-धीरे हवा में से कार्बनडाइऑक्साइड खींच लेती है जिससे दीवारें मजबूत बनती हैं।

घर की तस्वीरों, शीशों, छायाचित्र, सीन-सीनरी पुतलों की भीड़-भाड़ कलात्मक नहीं। ये चीजें बिल्कुल इनी-गिनी होनी चाहिए, इनके ऊँचे नीच अथवा छोटे बड़े आकारों के होने से सजावट में असंगति पड़ती है, प्रकाश में रुकावट आती है। गृह शोभा की असली नींव है सफाई वह आप स्वयं कर सकते हैं।

गेहूँ, मक्का, या ज्वार का आटा छानिये मत, दाल भी छिलकेदार खाने की आदत डालिए। चोकर और अनाज के छिलके में सबसे अधिक पौष्टिक पदार्थ हैं। इन्हें यों ही फेंक देना मूर्खता है। इसमें आपकी आर्थिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से हानि है। अनाज रखने के स्थान ऐसे स्वच्छ रखिये कि किसी प्रकार के छोटे जानवर उसमें न पड़ें और वह चूहों द्वारा नष्ट न किया जाय।

छाछ या दूध को एक दम गटक कर न निगल लीजिए। मुँह में डालकर धीरे धीरे चूस-चूस कर पीजिए। जिव्हा से आनन्द लीजिए। इससे आप उसका पूरा लाभ उठा सकते हैं।

अपने यहाँ मेहमानों को पानी और खाने के लिए गुड़ देने की प्रथा अत्यन्त उत्कृष्ट और शास्त्रोक्त है। धूप में घूमने के पश्चात् घर आने पर गुड़ खाकर पानी पीना गुड़ में रहने वाले क्षारों के कारण अधिक लाभ दायक होता है।


Quotation

प्रजातंत्र का अन्त, भोग विलासी स्वभाव की प्रजा से हो जाता है।

-मानेस्की

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पाँडित्य के दर्प को छोड़ कर बच्चे की तरह सरल रहने वाला ही ब्राह्मण है।

-उपनिषद्

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मनुष्य की सेवा करना ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है।


परिवार की आर्थिक सुव्यवस्था।

वह व्यक्ति धन्य है जिसकी आवश्यकताएँ परिमित हैं और उपभोग के लिए उसे अपना अधिक समय नष्ट नहीं करना पड़ता। उसका अधिक समय अध्ययन, चिंतन, उच्च विषयों के ध्यान तथा दूसरों की सहायता में व्यतीत होता है।

वह गृहस्थ धन्य है, जिसके यहाँ फैशन नहीं, झूठा दिखावा, थोथी टीपटाप, या फिजूलखर्ची नहीं। जहाँ प्रत्येक पैसे का उचित उपयोग होता है और पति-पत्नी बन्धु-बान्धव सभी उसमें सहयोग प्रदान करते हैं। पति कमा कर लाता है, पत्नी घर की दैनिक वस्तुओं का संग्रह, सदुपयोग, ओर वर्गीकरण करती है, सामान को नष्ट होने से बचाती है और पुत्र घर का हिसाब-किताब रखता है। यह हिसाब प्रत्येक मास खातों में डाला जाता है और फिर यह मालूम किया जाता है कि किस मद में कितना रुपया व्यय हुआ? कितना अधिक हुआ? उसका क्या कारण है? भविष्य में किस प्रकार व्यय रोका जा सकता है? मास के अन्त में जो आर्थिक कठिनाई हुई, उससे कैसे मुक्त हो सकते हैं?

जिसे आर्थिक सामर्थ्य का ज्ञान है, जो अपनी चादर देख कर पाँव फैलाता है, वह अधिक काल तक जीवित रहता है, और आन्तरिक शान्ति का उपभोग करता है।

नियंत्रण करना सीखिये। कुछ लोग कहा करते हैं कि हमें अपने आप पर नियंत्रण नहीं होता। इसका कारण यह है कि वे कृत्रिम या विलासिता की आवश्यकताओं की पूर्ति में लगे हैं। उन्होंने अपनी आदतें इतनी अधिक बढ़ा ली हैं कि उस आमदनी में उनका गुजारा नहीं होता। यदि आदमी अपने विवेक को जागृत करें और गंभीरता से सोचे कि मैं किन-किन खर्चों से बच सकता हूँ। कौन सी विलासिताओं में डूबा हुआ हूँ? तो वह नियंत्रण में सफल हो सकता है। नियंत्रण में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई अवश्य होती है, किन्तु ज्यों-ज्यों विवेक बुद्धि और दुनियादारी जागृत होती है, त्यों-त्यों वह शक्ति, धन और जीवन, परहित साधन में लगाता है। अपव्यय से मुक्ति पाने का अमोघ उपाय एक मात्र विवेक जनित नियंत्रण है।

क्षणिक भोग विलास की पूर्ति के लिए, जिह्वा की तृप्ति के लिए, मिथ्या गौरव के प्रदर्शन के लिए कभी कर्ज न लीजिये। आप भारतीय हैं, भारतीय जनता सादगी पसन्द तथा निर्धन है। शादी, गर्मी, या नुकता-इत्यादि में अपव्यय हमारी मूर्खता का परिचायक है। चाहे आप जितना भी बढ़ चढ़ कर विवाह कीजिये। समय के प्रवाह के साथ जनता सब कुछ विस्मृत कर देती है। विवाह में जो कर्ज लेते हैं, वह तो पर्वत के समान हमारे ऊपर बोझ डालता रहता है, विवाहित जोड़ा सब कुछ विस्मृत कर देता है। घर का मकान तक बिक जाता है।

आभूषणों से सावधान । गृहणी का सच्चा आभूषण है उसका स्वास्थ्य, पारस्परिक प्रेम, सद्भावनाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, योग्यता। वह युग गया जिसमें आभूषणों द्वारा ही बड़प्पन प्रतीत होता था।

क्या आपके घर में जूठन छोड़ी जाती है? क्या प्रत्येक थाली में दाल सब्जी छोड़ी जाती है? खाद्य पदार्थ चूहों के लिए खुले पड़े रहते हैं? भोग पदार्थ घर पर आने वाले अनेक फकीरनुमा आलसी व्यक्तियों को दिया जाता है? क्या आपके घर बासी रोटी रखने और उसे कुत्ते बिल्लियाँ को देने की प्रथा है? यदि ऐसा है, तो तुरन्त आपको गरीबी और तंगी के लिए तैयार हो जाना चाहिए। जो व्यक्ति रोटी का एक टुकड़ा भी फेंकता है, वह गरीब जनता के रक्त से अर्जित अनाज-राशि को नष्ट करता है। वह महापापी है।

धन को गाड़ कर रखना भी एक प्रकार से अपव्यय है। यदि धन है, तो उसका उचित उपयोग कीजिये। यदि आप बैंक में रखते हैं, तो एक तो वह सार्वजनिक काम में आता है दूसरे आपको उस पर ब्याज मिलता है। आपके हाथ से रुपया दूर रहने के कारण आप पर नियंत्रण रहता है।

वस्तुओं के उपभोग के सम्बन्ध में साधारणतः सरकार द्वारा नियंत्रण होना चाहिए। दाल, आटा, शक्कर, दियासलाई, मिट्टी का तेल इन सभी को प्रत्येक नागरिक को नाप-तोल कर मिलना चाहिए। इससे मनुष्यों को नियंत्रण की आदत सिखाई जा सकती है। मादक वस्तुओं पर तो इतना कड़ा नियंत्रण होना चाहिए कि कोई उसे बिना लाइसेंस के खरीद ही न सके।

मादक द्रव्यों-बीड़ी सिगरेट, चाय, तम्बाकू शराब, गाँजा, भाँग, चरस, अफीम-में आप जो रुपया व्यय करते हैं, उससे व्यक्तिगत हानि तो होती ही है, घर वालों पर भी दूषित प्रभाव पड़ता है। जिस रुपये का उपयोग-रोटी, दाल, सब्जी, दूध या अन्य पौष्टिक पदार्थों के खरीदने में होता, वह एक व्यक्ति की नशीली आदत में स्वाहा हो जाता है। मादक द्रव्यों की कीमत तथा उसका टैक्स इतना अधिक होना चाहिए कि साधारण व्यक्ति उधर जाने की कल्पना ही न करे।

आपके घर का रुपया व्यर्थ मादक द्रव्यों में तो बरबाद नहीं होता? कौन सिगरेट पान, इत्यादि लेते हैं? कहीं आपके पुत्र चुपचाप आप से छुप कर तो सिगरेट का प्रयोग नहीं करते? इन सभी प्रश्नों पर खूब सोचिये अपने आपको शैतान की इस माया से दूर रखिये।

फिजूल खर्च व्यक्ति सारे समाज को दूषित करता है। उसकी देखा-देखी साधारण आय वाले भी उसका अनुकरण करते हैं। कर्ज में फंस कर सब कुछ नष्ट कर देते हैं।

हिन्दु धर्म कहता है-“तुम अपनी जीवन यात्रा के लिए आवश्यक वस्तुओं का उपयोग करो। व्यक्तिगत सुखवाद अनर्थ की जड़ है। अनुचित, अप्राकृतिक, कृत्रिम विलासप्रियता से बचो। मर्यादा का ध्यान रक्खो। विलास प्रिय न बनो, उपयोग में त्याग भाव रक्खो, दूसरों के हित की अवहेलना न करो, किसी दूसरे के हिस्से की वस्तु के उपभोग की लालसा न करते हुए, केवल अपनी मर्यादा के भीतर रह कर ही संतुष्ट रहना सुखी रहने का उपाय है।” हमारे पुराने धर्म में संयम, नियंत्रण, और आत्म त्याग का बड़ा महत्व है। हम “खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ”-वाले आदर्शों से सर्वथा दूर रहते आये हैं।

अपने ऊपर ही सबको आश्रित न रखिये वरन् घर के प्रत्येक व्यक्ति को कमाने योग्य अपने पावों पर खड़ा होने योग्य बनाने में सतत प्रयत्नशील रहिए। स्त्रियों की शिक्षा भी आवश्यक है। उन्हें औद्योगिक शिक्षा दीजिए। कताई, बुनाई, स्वेटर मोजे बुनना, काढ़ना, कपड़े सीना, चित्रकला, संगीत, अध्यापिका, नर्स, डॉक्टर के कार्य सिखाकर आपके योग्य कमा सकने लायक बना दीजिए। श्रीमती हीरादेवी ने लिखा है-“निम्न वर्ग की बहिनें खाली समय में कागज या मिट्टी के खिलौने बनाना, उन पर रंग करना, चीनी की रेवड़ियां बनाना रस्सी बटना आदि का काम कर सकती हैं। कुछ काम ऐसे हैं जो खाली समय में सभी वर्गों की बहिनें सरलता से कर सकती हैं-जैसे बरतनों पर कलई करना, तस्वीरों पर फ्रेम लगाना, किताबों की जिल्दसाजी करना, रुचि के अनुसार पापड़ और अचार घड़िया बनाना। रुचि और समय के अनुसार यदि हमारी बहिनें इनमें से कोई भी काम अपने फालतू समय में करने लगें, तो मुझे विश्वास है कि वे अपने परिवार को न केवल खर्च कम करने में सहायक होंगी, बल्कि पारिवारिक सुख में भी चार चाँद लगा सकेंगी।” शरणार्थी भाइयों के लिए जो महिला उद्योग शालाएँ खोली जा रही हैं, उनमें भी अनेक शिक्षित और परिश्रमी महिलाएँ कार्य कर सकती हैं।

प्रतिदिन एक ही प्रकार का कार्य करते रहने से जीवन में नीरसता आ जाती है। इससे कार्य कुशलता का ह्रास होता है। अतः चतुर गृहस्थ को भिन्न भिन्न प्रकार से धन प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।

जहाँ तक हो सके संतान निग्रह कीजिए। घर के कुटुम्बियों की संख्या न बढ़ने दीजिए। संयम, ब्रह्मचर्य इत्यादि इसके अमोघ उपाय है। अधिक कुटुम्बी होने से कुछ थोड़ी ऊँची योग्यता वाले व्यक्तियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, उन्नति, में बाधा पड़ती है।


हमारी आर्थिक कठिनाईयाँ कैसे दूर हों?

वर्तमान आर्थिक संकट से मुक्ति का एक मात्र उपाय है-मितव्ययिता। इसका जन्म सभ्यता के साथ-साथ हुआ है मनुष्यों को तब इस महान् गुण का ज्ञान हुआ जब उन्हें आज के संतोष के साथ “कल की चिंता” हुई। मितव्ययिता का जन्म मुद्रा के जन्म से पूर्व हुआ है।

“मितव्ययिता” का अर्थ है व्यक्तिगत रूप से किफायतशारी। इसमें घरेलू आय-व्यय, बचत, और भविष्य के लिए कुछ रखना शामिल है इसका मूल अभिप्राय मनुष्य को अधिक से अधिक सुखी बनाना, उन्नति और विकास के अवसर प्रदान करना, और व्यक्ति के साथ-साथ राष्ट्र की धन सम्पत्ति की अभिवृद्धि करना है।

धन की वृद्धि परिश्रम से होती है। यदि किसी के पास धन कम है तो इसका दूसरा अर्थ है कि उसने परिश्रम कम किया है, या कर रहा है। अधिक श्रम का अर्थ है-अधिक धन। धन को मितव्यय से खर्चे करने से बचत होती है। यही बचत धीरे धीरे पूँजी बनती है, जिससे बड़े व्यापार चलते हैं।

धन संग्रह करके रखने की वृत्ति स्वभाविक वृत्ति नहीं है। यह तो अनुभव, उदाहरण तथा भविष्य को कठिनाइयों से बचने की इच्छा से उत्पन्न होती है। चतुर और बुद्धिमान अपने धन को बड़ी सतर्कता से एकत्र कर रखते हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य चतुर और अनुभवी होता रहता है, त्यों-त्यों वह मितव्ययी बनता चलता है, मनोनिग्रह से अपनी कृत्रिम आवश्यकताओं को दूर करता, और वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, प्रलोभनों से बचता है, और धन को उठाकर कल के लिए रख छोड़ता है।

मितव्ययिता और कंजूसी में बड़ा अन्तर है। मितव्ययी समझदारी से उचित स्थानों पर जितना व्यय करना चाहिए, खर्च करने से नहीं चूकता, कंजूस उचित खर्चों-खाना, पहिनना, साफ मकान-में भी धन व्यय नहीं करता। हम कंजूसी से घृणा करते हैं। कंजूस में धन संग्रह की अतृप्त इच्छा रहती है, मितव्ययी धन को एक साधन मात्र समझता है और उससे अधिक से अधिक आनन्द प्राप्त करता है।

जो आदमी केवल आज के लिए जीता है, कल की चिंता नहीं करता, इन्द्रिय सुखों और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति के लिए आमदनी से अधिक व्यय करता है, वह इन्द्रियों का गुलाम है। वह पशु के समान नीच वृत्तियों में फंसा हुआ है। इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं, वह स्वयं इन्द्रियों और वासनाओं का दास है।

बिना पढ़े-लिखे आगा पीछा न सोच कर खर्च करते हैं। महीने में कठिनता से निर्वाह हो पाता है। कुछ व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा मितव्यय से जोड़कर धनी हो जाते हैं। मितव्ययी आवश्यक खर्चे अवश्य करता है। अतिथियों की सेवा, परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा, विवाह इत्यादि, बीमारी, अकाल, मुकदमा, सभी कुछ का विधान रखता है किन्तु उसके सब खर्च मर्यादा के भीतर ही रहते हैं। वह अपने द्रव्य का पूरा-पूरा लाभ उठाता है।

आर्थिक कठिनाइयों से बचने के दो मुख्य उपाय हैं-(1) अपनी आय वृद्धि कीजिये। जितना प्रयत्न और परिश्रम आप इस समय कर रहे हैं, उससे अधिक कीजिये। नये कारबार, छोटे मोटे काम, मजदूरी दूसरों की सहायता, दूसरों के पत्र व्यवहार, टाइप का काम, अखबारों के दफ्तरों में कार्य कीजिये, बच्चों को पढ़ाइये, छोटी दुकान कीजिये, रात्रि पाठशालाओं, या सिनेमा में कोई नौकरी कीजिये। धन के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न कीजिये, योजनाएं बनाइये।

(2) दूसरा उपाय यह है कि जीवन की जिन आवश्यकताएं के लिए पैसे की जरूरत है, उन्हें कम कीजिये। जितनी कम आवश्यकताओं रहेंगी, आप उतनी ही शक्ति बचा सकेंगे। इस बची हुई शक्ति के बहुत से उपयोग हो सकते हैं। जितनी कम आमदनी है, उससे भी कम आपकी आवश्यकताएं होती जानी चाहिए। शान-शौकत, विलास, और ऐशोआराम तो बिल्कुल त्याग देने चाहिये।

मजदूर लोग प्रायः कमाते बहुत अधिक है किन्तु चूँकि वे आमदनी के अनुपात में आवश्यकताएँ नहीं घटा पाते, वे गरीब ही दीखते हैं। प्रायः मद्यपान, और बिना बजट में रुपया खर्च करने की आदत उनका सत्यानाश कर देती है। वे बीमार अधिक रहते हैं, उन्हें आलस्य अधिक दबाता है, उनका घरबार गन्दा और उनका दैनिक काम अस्त-व्यस्त रहता है। उनकी शारीरिक और मानसिक दशा सोचनीय होती है। यदि ये जरा संयम और मनोनिग्रह का अभ्यास करें, और सादा जीवन व्यतीत करें, तो काफी सम्पन्न हो सकते हैं। मितव्ययिता का अभ्यास उन्हें ऊँची तरह का जीवन प्रदान कर सकता है।

जो लोग “हम रुपया नहीं बचा सकते।” महंगाई मारे डालती है, कहते फिरते हैं, वे वास्तव में अपनी कृत्रिम आवश्यकताएँ कम करना नहीं चाहते, न अधिक प्रयत्न और परिश्रम से वस्तुओं के चढ़ते हुए मूल्य के अनुपात में आमदनी ही बढ़ाना चाहते हैं। कैसे शोक का विषय है कि हम लोगों ने अपने व्यक्तिगत व्यय आवश्यकता तथा आमदनी से अधिक बढ़ा लिये हैं।

जब आप रुपये के लिए दूसरे के सन्मुख हाथ फैलाते हैं तो स्मरण रखिये, आप दूसरे की मजदूरी हड़पना चाहते हैं। साथ ही अपनी आत्मप्रतिष्ठा, पौरुष, मान, प्रसन्नता भी दूसरे के हाथ बेचते हैं। माँगने से आपके चरित्र की कमजोरी और दीनता प्रकट होती है। माँगना प्रत्येक दृष्टिकोण से हेय है। सज्जन व्यक्ति भूखा रह कर दिन काट लेगा, पर किसी के सन्मुख हाथ नहीं फैलायेगा। जो लोग रुपया उधार लेकर उत्सव और मेलों में व्यय करते हैं, वे अपने साथ बड़ा अत्याचार करते हैं।

मजदूर और साधारण श्रेणी के लोगों की आय प्रायः काफी होती है। यदि उनमें इच्छा शक्ति हो, तो वे मध्य श्रेणी के प्रतिष्ठित नागरिकों की भाँति आदर का जीवन व्यतीत कर सकते हैं। उन्हें ऊँचा उठने से कौन वंचित रखता है? कारण यही है कि वे अपने फालतू बचे हुए समय का उपयोग अपने मस्तिष्क के विकास में, नई व बातें सीखने में नहीं लाते। उनके पास रुपया काफी है। उन्हें तो मानसिक विकास द्वारा संयम इन्द्रियनिग्रह, कृत्रिम और वास्तविक आवश्यकता का अन्तर सीखना है। उन्हें संस्कृति और सभ्यता सीखना है। उन्हें यह सीखना है कि समाज में मनुष्य की स्थिति केवल रुपये पर ही नहीं वरन् हृदय की पवित्रता, निष्कपटता, सेवाभाव, साहस, सद्विवेक, सत्यनिष्ठा, त्याग, उदारता, सद्भावना पर निर्भर है।

रुपये को सुख का एक साधन मानिये। उससे जीवन में सुख मिलता है पर रुपये से ही सब कुछ मिलता हो, सो बात नहीं है। जीवन अनेक है, इसके अनेक पहलू हैं आपको इन सभी दिशाओं में अपनी शक्तियाँ लगानी चाहिए। जो व्यक्ति दिन रात धन उपार्जन की चिंताओं में ही लगे रहते हैं, और रुपया जोड़-जोड़ कर रखते हैं, वे कभी आन्तरिक शान्ति प्राप्त नहीं कर पाते। उन्हें यह विदित नहीं होता कि इस कमाई की धुन में वे कैसी महत्वपूर्ण चीजें नष्ट कर देते हैं। स्वास्थ्य, सुख, सच्चे मित्रों की मैत्री, दम्पत्ति का हार्दिक एकीकरण, घर के बाल बच्चे-धन से कहीं अधिक महत्व रखते हैं।

अर्थोपार्जन में मर्यादित शक्ति का व्यय होना चाहिये। पैसे की लोलुपता, तृष्णा, और चिंता कम कीजिये। सुख रुपये पैसे में नहीं। हाँ, रुपया पैसा कभी-2 सुख के मार्ग को सरल बनाता है। रुपये की हाय-हाय से समय बचा कर आत्मा के सद्गुणों के विकास में समय व्यय करना चाहिए। अपने चरित्र का निर्माण इस प्रकार कीजिये कि उचित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कभी धन की कमी न पड़े, और व्यर्थ की विलासमयी आवश्यकताओं के लिए धन खर्च करने की आवश्यकता ही प्रतीत न हो। रुपये का काम थोड़ी देर का आनन्द मजेदारी नहीं, प्रत्युत मनुष्य की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना है।

फिजूलखर्ची, एक रोग है। बड़े रईस और ताल्लुकेदार इसी के कारण गरीब बने हैं। इसे छोड़ देना ही उचित है। घरेलू बजट, आय-व्यय का हिसाब ही हमारा मार्ग प्रदर्शन कर सकता है। खेद का विषय है कि लोगों को अपनी आमदनी, मासिक वेतन का तो ज्ञान रहता है किन्तु आज क्या व्यय हुआ? कैसे हुआ? कृत्रिम आवश्यकताओं या विलास-मनोरंजन में हुआ? उससे स्थायी लाभ हुआ या नहीं? कल खर्च करने के लिए कहाँ से आयेगा? यदि हाथ में कुछ न हुआ तो किससे कर्ज लेंगे? किसके सामने हाथ फैलायेंगे?-इन प्रश्नों पर हम तनिक भी विचार नहीं करते।

कम आय से मत डरिये वरन् उसी को सावधानी से व्यवस्था-पूर्वक व्यय कीजिये। सावधानी से बजट बना कर अपनी आवश्यकताओं को मर्यादित कर संयमित एवं व्यवस्थित जीवन व्यतीत करना जीवन में दक्षता का रहस्य है।


देखने में छोटी पर महान् ।

विद्वानों ने अपने अनुभव के बल पर अनेक उक्तियाँ लिखी हैं। इनमें बड़े पते की बाते बतलाई गई हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इन उक्तियों को स्मरण रखना चाहिए। कुछ अच्छी उक्तियाँ देखिये-

ऋण लेने वाले का मनोविज्ञान :-

झूठा मीठे वचन कहि, ऋण उधार ले जाय।

लेत परम सुख ऊपजै, लेके दियो न जाय॥

लैके दियो न जाय, ऊँच अरु नीच बनावै।

ऋण उधार की नीत, माँगते मारन घावै॥

कह गिरिधर कविराय, जानि रह मन में रुठा।

बहुत दिना है जात, कहै तेरा कागज झूठा॥

माया की अस्थिरता-

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान।

चंचल जल दिन चारि को, ठाउँ न रहत निदान॥

ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में यश लीजै।

मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै॥

कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत।

पाहुन निसि दिन चार, रहत सब ही के दौलत॥

बिना विचारे फजूलखर्ची से हानि-

बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।

काम बिगारे आपनो, जग में होत हँसाय॥

जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।

खान-पान सम्मान, राग-रंग मनहि न भावै॥

कह गिरिधर कविराय, दुःख कछु टरत न टारे।

खटकत है जिय माहिं, कियो जो बिना बिचारे॥

थोड़ा जोड़ने से धनवान् बनना-

कौड़ी कौड़ी जोड़ि कै, निधन होत धनवान।

अक्षर अक्षर के पढ़े, मूरख होत सुजान॥

रुपये के बिना जीवन धारण कठिन हैं-

नीतिकार का वचन है-

विभुक्षितैः व्याकरणं न भुज्यते।

पिपासितैः काव्य रसो न पोयते॥

अर्थात् “भूखे व्यक्ति का व्याकरण के भोजन से काम नहीं चलता और न प्यासे की तृप्ति काव्य रस पीने से होती है।” इस युग में अर्थ के बिना जीवन धारण किये रहना कठिन है।

खाली बोरी सीधी खड़ी नहीं होती-

बोरी अन्न शक्कर आदि से भरी हुई होगी तो सीधी खड़ी रहेगी, पर जिस बोरी में कुछ नहीं है, वह धरती पर गिर पड़ेगी। उसी मनुष्य की नैतिकता स्थिर रह सकती है, जिसके पास जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक धन मौजूद है। जो भूखा है, अभाव ग्रस्त है, दीन दरिद्र है, वह कब तक धर्म पर स्थिर रहेगा? उचित कार्य के लिए पास में पैसा नहीं होता तो परमार्थ की वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। और मनुष्य चोरी, बेईमानी, धोखेबाजी, रिश्वत की ओर झुकता चला जाता है। समाज में रह कर सम्मान सहित जीवन बिताने लायक धन न हो तो चित्त में आत्मग्लानि अपमान, हीनता, दीनता, दुर्भाग्य, चिंता, ईर्ष्या, घृणा के विकार जागते रहते हैं।

भूखा आदमी क्या पाप नहीं करता !

संस्कृत में एक कहावत बड़े काम की है-

“विभुक्षितः किं न करोति पापम्”-भूखा आदमी क्या पाप नहीं करता। अर्थात् “जब आदमी दरिद्र हो जाता है, उसको खाने पहनने को नहीं मिलता, तब वह चोरी, डाका, घूस, बेईमानी जिस तरह भी होता है, धन प्राप्त कर अपना काम चलता है।

छोटी वस्तुओं का महत्व-

जो व्यक्ति दुराग्रह से छोटी वस्तुओं को बरबाद करता है, उनका उचित उपयोग नहीं करता उसे कभी उनकी आवश्यकता के लिए दुःखी होना पड़ता है।


आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत।

आप आर्थिक रूप से सफल होना चाहते हैं, तो समृद्धि के विचारों को बहुतायत से मनोमंदिर में प्रविष्ट होने दीजिये। यह मत समझिये कि आपका सरोकार दरिद्रता, क्षुद्रता, नीचता से है। संसार में यदि कोई चीज सबसे निकृष्ट है तो वह विचार-दारिद्रय ही है। जिस मनुष्य के विचारों में दरिद्रता प्रविष्ट हो जाती है, वह रुपया पैसा होते हुए भी सदैव भाग्य का रोना रोया करता है। दरिद्रता के अनिष्टकारी विचार हमें समृद्धिशाली होने से रोकते हैं, दरिद्री ही बनाये रखते हैं।

आप दरिद्र, गरीब या अनाथ जैसे हीन अवस्था में रहने के हेतु पृथ्वी पर नहीं जन्मे हैं। आप केवल मुट्ठी भर अनाज या वस्त्र के लिए दासवृत्ति करते रहने को उत्पन्न नहीं हुए हैं।

गरीब क्यों सदैव दीनावस्था में रहता है? इसका प्रधान कारण यह है कि वह उच्च आकाँक्षा, उत्तम पवित्र कल्पनाओं, स्वास्थ्यदायक स्फूर्तिदायक विचारों को नष्ट कर देता है, आलस्य और अविवेक में डूब जाता है, हृदय को संकुचित, क्षुद्र, प्रेमविहीन और निराश बना लेता है। सीमाक्रान्त दरिद्रता आने पर जीवन ठहर सा जाता है, प्रगति अवरुद्ध हो जाती है, मनुष्य ऋण से दब कर निष्प्रभ हो जाता है, उसे अपने गौरव, स्वाभिमान को भी सुरक्षित रखना दुष्कर प्रतीत होता है। दरिद्री विचार वाले असमय में ही वृद्ध होते देखे गये हैं। जो बच्चे दरिद्रों के घरों में जन्म लेते हैं, उनके गुप्त मन में दरिद्रता की गुप्त मानसिक ग्रन्थियाँ इतनी जटिल हो जाती हैं, कि वे जीवन में कुछ भी उच्चता या श्रेष्ठता प्राप्त नहीं कर सकते। दरिद्रता कमल के समान तरोताजा चेहरों को मुर्झा देती है, सर्वोत्कृष्ट इच्छाओं का नाश हो जाता है। यह दुःखद मानसिक दरिद्रता मनुष्य को पीस देने वाली है। सैकड़ों मनुष्य इसी क्षुद्रता के गर्त में डूबे हुए हैं।

आर्थिक सफलता के लिए भी एक मानसिक परिस्थिति, योग्यता एवं प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। लक्ष्मी का आवाह्न करने के हेतु भी मानसिक दृष्टि से आपको कुछ पूजा का समान एकत्रित करना होता है।

दीपावली के लक्ष्मी पूजन के अवसर पर आप घर झाड़ते, लीपते, पोतते, सजाते हैं। नई-नई तसवीरें, कलात्मक वस्तुओं से घर को चित्रित करते हैं, अपने शरीर पर सुन्दर सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करते हैं। इसी भाँति मानसिक पूजा भी किया कीजिये। अर्थात् मन के कोने-कोने से दरिद्रता, गरीबी, क्षुद्रता, संकुचितता, ऋण, के जाले विवेक की झाडू से साफ कर दीजिये, मानसिक पटल को आशावादिता की सफेदी से पोत लीजिये। मानसिक घर में आनन्द, आशा, उत्साह, प्रसन्नता, हास्य, उत्फुल्लता, खुशमिजाजी के मनोरम चित्र लगा लीजिये। फिर श्रम और मितव्ययिता के नियमों के अनुसार लक्ष्मीदेवी की साधना कीजिये। आर्थिक सफलता आपकी होगी। सब विद्याओं में शिरोमणि वह विद्या है जो हमें कुत्सित और निकृष्ट विचारों से मन को साफ करना सिखाती है।

परमपिता परमात्मा की कभी यह इच्छा नहीं कि हम आर्थिक दृष्टि से भी दूसरों के गुलाम बने रहें। हमें उन्होंने विवेक दिया है, जिसे धारण कर हम उचित अनुचित खर्चों का अन्तर समझ सकते हैं, विषय वासना और नशीली वस्तुओं से मुक्त हो सकते हैं, अपने अनुचित खर्चे, विलासिता और फैशन में कमी कर सकते हैं, घर में होने वाले नाना प्रकार के अपव्यय रोक सकते हैं। अपनी आय वृद्धि करना हमारे हाथ की बात है। जितना हम परिश्रम करेंगे, योग्यताओं को बटायेंगे, अपनी विद्या में सर्वोत्कृष्टता, मान्यता, निपुणता प्राप्त करेंगे, उसी अनुपात में हमारी आय भी बढ़ती चली जायेगी। संसार में अन्याय नहीं है। सबको अपनी अपनी योग्यता और निपुणता के अनुसार धन प्राप्त होता है। फिर क्यों न हम अपनी योग्यता बढ़ाये और संघर्ष में अपने आपको हर प्रकार से योग्य प्रमाणित करें।

श्री ओरिसन मॉर्डन ने अपनी पुस्तक ‘शान्ति शक्ति और समृद्धि’ में कई आवश्यक तत्वों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए लिखा है-

“विश्व के अनेक दरिद्र लोगों के कारण को खोजो तो पता लगेगा कि उन्हें आत्म विश्वास नहीं है, उन्हें यह विश्वास नहीं है कि वे दरिद्रता से छुटकारा पा सकते हैं। हम गरीबों को बताना चाहते हैं कि वे ऐसी कठोर स्थिति से भी अपने आप को उन्नत बना सकते हैं। सैकड़ों नहीं प्रत्युत हजारों ऐसी स्थिति में उन्नत-धनवान बने हैं और इसलिए हम कहते हैं कि इन गरीबों के लिए भी आशा है। वे दुर्धर्ष परिस्थिति को बदल सकते हैं। संसार में आत्म विश्वास ही ऐसी कुँजी है कि सफलता का द्वार खोल देती है।

प्रकृति ने मनुष्य को ऊपर देखने की आशा प्रदान की है, नीचे की ओर नहीं। मानव जन्म ऊपर चढ़ने के लिए हुआ है, नीचे गिरने के लिए नहीं।

दरिद्रता वास्तव में एक मानसिक रोग है। इस रोग से प्रयत्न करने पर प्रत्येक व्यक्ति छुटकारा पा सकता है। एक गरीब युवक ने अमीर बनने के लिए अपनी आत्मा और योग्यता पर भरोसा करना आरम्भ किया। उसने निश्चय किया कि उसके अन्दर वह योग्यता-शक्ति विद्यमान है जिसके द्वारा मनुष्य संसार में नामांकित होते हैं। वह निरन्तर अपनी शुभ कल्पनाओं को साकार रूप देता गया। और सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँच गया। हिम्मत और सतत उद्योग के उत्पादक और उत्साही वातावरण में रहने से प्रत्येक मनुष्य समृद्धिशाली बन सकता है।


रुपया बचा कर कहाँ रक्खें?

रुपये का यह नियम है कि पास रहने से व्यय करने को तबियत चाहती है, वासनाएँ भड़कती हैं। तबियत मचलती है अतः उसे उतना ही पास रखिये जिसकी नितान्त आवश्यकता हो। गरीबी से रहिये। बचे हुए रुपये को पोस्ट आफिस के सेविंग्स बैंक में रखिये।

उत्तम तो यह है कि मासिक वेतन का सभी रुपया प्रारम्भ में बैंक में डाल दिया जाये और प्रति सप्ताह हफ्ते के खर्च के लिए एक निश्चित रकम निकाल ली जाया करे। बीमारी, विपत्ति, वृद्धावस्था और विश्रान्ति के समय यह रुपया बड़ा काम देता है। घर खर्च मात्र के लिए रुपया हाथ में रख कर शेष को अवश्य बचाइये। बचा हुआ रुपया ही आपकी कमाई है। जो आया और गया, वह आपके लिए कुछ नहीं। जो रह गया, बच गया और आपके पास सुरक्षित है, वही आपका है।

यदि प्रतिमास 10 प्रतिशत जोड़ते रहें, प्रारम्भ ही में किसी ऐसी जगह डाल दें कि वहाँ से न निकले, तो आपको उतना रुपया बचाने की आदत पड़ जायगी। लोग लालच में आकर कुछ न कुछ अनावश्यक चीजें खरीद लेते हैं, मास के अन्त में हाथ में कुछ भी नहीं रहता, तो रोते पछताते हैं। वह स्थिति अत्यन्त दयनीय है। बचत का विधान तो प्रारम्भ ही में हो जाना उचित है। बचत भी एक प्रकार का खर्च ही है। यदि आप मासिक खर्च के खाते में ही उसे डाल लें, तो रुपया अवश्य बचेगा जो आदमी कुछ नहीं बचाता सब खर्च देता है, वह बड़ा पाप करता है। वह अनिश्चित भविष्य के लिए कुछ भी नहीं कर रहा है। यदि आमदनी कम है, तो कोई हर्ज नहीं। अपनी आमदनी कम है, तो अपनी आवश्यकताओं को कम कर दीजिये पर कुछ न कुछ बचना अवश्य चाहिये।

पोस्ट आफिस सेविंग्स बैंक-

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्थिति के विचार से बचे हुए रुपये को रखने का प्रबन्ध करना चाहिए। किसी महाजन, संस्था, या व्यापारी के पास रुपया रखना खतरनाक हो सकता है। वे समय पर आपको कुछ भी न दे सकेंगे। अतः बैंक सबसे उत्तम है। छोटी बचत को डाकखाने सेविंग्स बैंक में रखना उचित है। सरकार इस रुपये की जिम्मेदारी लेती है, जमा करने और निकालने की सुविधा रहती है, मरने पर मनुष्य के कुटुम्ब वालों को तुरन्त रुपया प्राप्त हो सकता है, सेविंग्स बैंक में जो रुपया रहेगा, उसे गुप्त रक्खा जाता है, कोई जानने नहीं पाता।

बीमा पॉलिसी :-

जो व्यक्ति प्रतिमास रु. से ऊपर बचा कसते हैं, उनके लिए जीवन का बीमा कराना श्रेष्ठ उपाय है। इसमें हमें निश्चित रूप से कुछ न कुछ देना होता है अन्यथा सब रुपये के डूबने का भय होता है। मरने पर निश्चित अवधि पूर्ण होने पर पूरा रुपया मिल जाता है। बाल बच्चों और पत्नी के लिए यह बड़े काम की चीज है।

कंपनी के चुनाव में स्वामित्व, प्राचीनता, पूँजी, और व्यवस्था के विषय में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। यद्यपि रुपया लगा कर एक दम बीमे से कोई लाभ नहीं होता, आगे चल कर बुढ़ापे में, और मृत्यु के पश्चात् बच्चों और पत्नी को इस रुपये से बड़ा लाभ होता है। बीमा करा लेने से रुपया एकत्र हो जाता है। बैंक तथा अन्य महकमें के बाबुओं, छोटे व्यापारियों को बीमा अवश्य कराना चाहिए।

बैंक में रुपया रखिये :-

ऊपर सरकारी पोस्ट ऑफिस में रुपया रखने की सलाह दी गई है। बड़ी रकम के लिए आपको किसी बड़े बैंक की तलाश करनी होगी। बैंक कभी-कभी फेल हो जाता है। इसलिए अपना रुपया अच्छी बैंक देख कर ही रखना चाहिए। अच्छी बैंकें सूद कुछ कम देती हैं पर रुपया सुरक्षित रहता है। बैंक में रक्खा हुआ रुपया निकालना न चाहिये। इन्द्रिय निग्रह जितना अधिक हो सके करना चाहिये। जितने अधिक खाने वाले हों, उतनी ही अधिक सावधानी की आवश्यकता है। अधिक से अधिक रुपया जमा करने की आदत से मनुष्य विलासिता, नाच, सिनेमा, मिठाइयों, शौकीनी और फिजूल की कृत्रिम आवश्यकताओं से बचा रहता है।

कंपनियों के शेयर खरीदना-

शेयर खरीदना अच्छा है, पर इसमें अपटूडेट ज्ञान, सतर्कता और कुशलता की नितान्त आवश्यकता है। कौन सी कम्पनी के शेयर आप ले रहे हैं, इसके विषय में खूब जाँच पड़ताल कर लेनी चाहिए। साधारण कम्पनियों के शेयर का भाव गिरते ही रुपया डूब जाता है। कम्पनियों के एजेन्ट शेयर बेचते समय बड़े सब्ज बाग दिखलाते हैं पर उनके फन्दे में न आना चाहिए। भारी लाभ के बदले थोड़े लाभ से भी वंचित क्यों होते हैं? अधिक ब्याज का लालच करना मानों पूँजी को भी डुबोना है।

साहूकारी-

दूसरों को रुपया उधार देने में, या ब्याज पर गहना गिरवी रखने में कई बातों का ध्यान रखिये। कही माल खोटा न हो, किसी का चुराया हुआ न हो, या कम मूल्य का न हो। इस प्रकार के स्वतन्त्र व्यवसाय में खतरा बहुत है। जिन्हें आप रुपया उधार देते हैं, वे रुपया मार लेने की फिराक में होते हैं। यदि काफी सिक्योरिटी न हुई तो या तो रुपया मारा जायगा, या मुकदमेबाजी करनी पड़ेगी। मानसिक अशान्ति का अलग शिकार होना पड़ेगा। अक्सर डाकू लोग साहूकारों के यहाँ ही डाका मारते हैं।

आभूषण बनवाना-

आभूषणों में कुछ रुपया अवश्य बच जाता है किन्तु उनकी रक्षा के लिए मनुष्य को बड़ी फिक्र रखनी पड़ती है। जो लोग पैसे को किसी प्रकार नहीं बचा सकते, उन्हें थोड़ी-2 बचत कर आभूषणों के रूप में कुछ द्रव्य अपने पास रखना चाहिये। आभूषण में निम्न हानियाँ हैं। (1) सुनार खोट कर देता है और सोना बिगाड़ डालता है (2) व्यवहार में लाने में बोझ कम होता जाता है (3) बाजार में बेचने में पैसा कम मिलता है। (4) जो पैसा आभूषणों में लगता है वह कम होता जाता है। इसके विपरीत व्यापार में या बैंक में कुछ सूद मिलता है (5) हिन्दू स्त्रियों को आभूषणों के कारण पराये व्यक्तियों द्वारा बेइज्जत होना पड़ता है। बच्चे चुरा लिये जाते हैं। चोर डाकुओं और गुँडों का भय बना रहता है। (6) गहने प्रायः स्त्रियों की असावधानी से खो जाते हैं।

अन्य साधन

शेयर, जमीन मोल ले लेना, मकान खरीदना, सरकारी कागज, बैंक का ‘फिक्सड डिपॉजिट, चीजों को गिरवी रखना इत्यादि रुपये को अटकाये रखने के अनेक उपाय हैं। जिनके पास आवश्यकता से बहुत अधिक धन है, उन्हें समझदारी से इनमें व्यय करना चाहिये। इनमें लगा हुआ रुपया अटका रहता है। यकायक आवश्यकता पड़ने पर नहीं मिल पाता। चतुर व्यक्ति को डाकखाना सेविग्सं बैंक में (400-500) रुपये तैयार सदैव रखने चाहिये। बीमारी मृत्यु, यात्रा, विवाह, भोज-इत्यादि के समय डाकखाने की संचित सामग्री ही काम आती है, वृद्धावस्था में बीमा पॉलिसी की रकम एक बड़ा सहारा होती है। सर्व साधारण को इन दो उपायों से लाभ उठाना चाहिये।


जीवन रक्षक पदार्थ तथा उनका उपयोग।

संसार में सबसे पहले मनुष्य को अपने जीवन-रक्षण की इच्छा होती है। वह अन्त तक इस विविध विघ्न बाधा संकुल जगत् से जाना नहीं चाहता। अंधा अपाहिज, कैसा ही दीन-हीन व्यक्ति क्यों न हो वह अपने शरीर को नष्ट होने से बचाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहता है।

अतः उपयोग के पदार्थों में मुख्य स्थान उन पदार्थों का है, जिन पर मनुष्य के प्राण, स्वास्थ्य, और भावी सुख निर्भर हैं। परमेश्वर को धन्यवाद है कि उन्होंने जीवन रक्षक तत्व सस्ते और सर्व सुलभ रक्खें है। गरीब से गरीब इन वस्तुओं को प्राप्त कर सकता है।

यह आवश्यक नहीं कि तुम अमीर हो, तुम्हारे पास रुपयों के ढेर लगे हों, आलीशान कोठी रहने के लिए हो, या बढ़िया रेशम और सिल्क के वस्त्र तुम्हारे शरीर पर हों। पीने के लिए बढ़िया शरबत, सोडा वाटर या मद्य हो। स्मरण रखिये, आपको जल, अन्न, वस्त्र, मकान इत्यादि आवश्यक है किन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे सुन्दर, महंगे या आलीशान हों।

सर्वोत्कृष्ट जीवन सरल सादा उच्च विचार और शुभ चिंतन प्रधान होता है। बड़े-2 दार्शनिक, विचारक, आविष्कारक और कलाकार निर्धन होते हुए भी जीवन रक्षक पदार्थों का उचित उपयोग कर जीवन को पूर्ण बना सकते हैं।

प्रथम जीवन रक्षक पदार्थ आपका भोजन है। पौष्टिक भोजन में अधिक व्यय नहीं होता। कीमती चीजें हैं-मिठाई, नमकीन, चाट-पकौड़ी, विविध माँस, हलुवा, पनीर, अंडा, चाय, इत्यादि। क्या जरूरत है कि आपके सुबह के नाश्ते में चाय, बिस्किट या नमकीन-मिठाइयाँ इत्यादि हों, या दोपहर के खाने में दो अचार, मुरब्बे, पापड़, गोश्त, इत्यादि हों। उत्तम पौष्टिक भोजन में आटा, दूध, घृत, तरकारियाँ दाल चावल चाहिए यदि ये चीजें भी महंगी हैं, तो इन्हें फिजूल बरबाद न करें। आवश्यकता के अनुसार उतनी ही पकावें और खरीदें, जितनी चाहिए। बिना खराब किये, ये चीजें सस्ती ही बैठेगी। फल और तरकारियाँ विशेषकर हरी पत्तीदार तरकारियाँ सबसे आवश्यक है। आप सस्ती तरकारियाँ-मेथी, पालक, मूली, शलजम, लीजिये, सस्ते फल खूब खाइये। महंगे फलों के स्थान पर अमरूद, टमाटर, नाशपाती, खीरा, गन्ना, ककड़ी खाइये। सूखे मेवों के स्थान पर सस्ते मेवे, अखरोट, मूँगफली, खोपरा, किशमिश लीजिए।

यदि विवेकपूर्वक आप अपने भोजन का चुनाव करें, तो वह सस्ता और पौष्टिक हो सकता है। स्वाद तथा चटोरी आदतों वाला भोजन त्याग दीजिए। क्रीम, हलुवे तथा होटल की प्लेट लेना छोड़ दीजिये, चाट-पकौड़ी की ओर दृष्टि मत कीजिए।

जीवन रक्षक भोजन के लिए इन चीजों की व्यवस्था कर रखिये-गेहूँ, चावल, पाँच तरह की दालें, अच्छा साफ गुड़, घी या मक्खन, दूध, शाक तरकारियाँ और कुछ सूखे मेवे। मौसम के फल खाया कीजिए। ऊँचे दर्जे के शक्ति उत्पादक पदार्थ में हैं-अखरोट, बदाम, काजू, नारियल, चिरौंजी, पिस्ता, मूंगफली, किशमिश। खजूर, मुनक्का से उत्तम चीनी प्राप्त होती है। मुनक्का, किशमिश, अंजीर से उत्तम लोहा मिलता है।

मिर्च का प्रयोग त्याग दीजिये। यह उत्तेजक और पाचन शक्ति को निर्बल करने वाला मसाला है। यदि आप चाय, सिगरेट, पान, होटल, सिनेमा, चाट, पकौड़ी, मित्रों के साथ चटोरे भोजन छोड़ देंगे, तो रक्षात्मक-भोजन को खरीदने के निमित्त यथेष्ट धन बचा सकेंगे। अभक्ष्य पदार्थ खाकर आप क्यों आत्म हत्या करते हैं, पौष्टिक अन्न लीजिए जिनसे शरीर में बल, उत्साह और स्फूर्ति उत्पन्न होती है, रोग दूर भागते हैं और कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। विलास आराम तलबी और मिथ्या दर्प की वस्तुओं से रुपया बचाना आपके विवेक पर निर्भर है।

यदि संभव हो तो जीवन रक्षक पदार्थों की मात्रा अधिक कर दीजिए और अधिक ऊँचे दर्जे की चीजें खरीदिये। साधारण भोजन के स्थान पर दूध घी और ऊँची प्रकार के मेवों से युक्त भोजन लीजिए, फलों की मात्रा में वृद्धि कर दीजिए, दूध दो बार पीजिये। भोजन में दही भी सम्मिलित कर लीजिये। अच्छा अन्न, भिन्न-भिन्न प्रकार की दाल, फल, मेवे खरीदिये।

द्रव्य खर्च करने का उत्तम तरीका यह है कि आपको अपने प्रत्येक पैसे का अधिकतम लाभ, आनन्द, मजा आये, आपका शरीर और आत्मा प्रसन्न हो, आपके बच्चे, पत्नी और स्वयं आप शरीर से पुष्ट रहें। इसके लिए प्रत्येक पैसे का सदुपयोग कीजिए। ऐश, आराम, विलासिता, फैशन, खान-पान में असंयम करना दूरदर्शिता और बुद्धिमानी नहीं है। शराब, गाँजा, चाय, माँस में पैसा व्यय करना अपव्यय है।

मि. काबडेन ने सत्य ही निर्देश किया है- “दुनिया में अमीर गरीब का भेद नहीं है। अमीर गरीब का यथार्थ नाम मितव्ययी और अपव्ययी है। जो विवेकशील बचाने के सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं, वे एक न एक दिन अवश्य समृद्ध बन जाएंगे और जिन्हें फूँकने उड़ाने का चस्का है, वे गरीब रहेंगे। खर्च के विषय में सावधान रहने वालों ने मिलें, कारखाने और जहाज बनवाये हैं। एक तुम हो जो शराब पीने, और दूसरी बेवकूफियों में अपने पैसे समाप्त कर देते हो।”

बेवकूफियों से-केवल भोजन ही की नहीं वस्त्र, मकान, मनोरंजन सब की असावधानियों से बचिये। बेवकूफी हमारा सब से प्रधान शत्रु है।


Quotation

भूलों के साथ संग्राम करना ही जीवन है।

-महात्मा गाँधी

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झूठ को इज्जत देकर जितना ऊंचा बनाये रखोगे, उसमें उतनी ही ग्लानि, उतना ही अनाचार, उतना ही कीचड़ इकठ्ठा होता रहेगा।

-शरद बाबू

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जिसे कभी पहले दुःख नहीं हुआ वह सुख अनुभव नहीं कर सकता।

-पर्लबक

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यदि दुःख के बाद सुख न आता तो उसे कौन सहता?

-डॉ. जॉनसन


हमारे प्रमुख घरेलू उद्योग-धन्धे।

भारत के आर्थिक पुनर्निर्माण हेतु घरेलू उद्योग धन्धों का बड़ा महत्व है। इनसे बेकारी की समस्या सुगमता से हल हो सकती है, उत्पादन शक्ति का स्थानीय तथा प्रादेशिक वितरण सुगमता से हो सकता है और जन साधारण को आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त हो सकता है।

डॉ॰ राधाकमल मुखर्जी ने भारत के घरेलू उद्योग धन्धों के विषय में एक बड़ी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। उसी के आधार पर कुछ उपयोगी सामग्री यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। इस पुस्तक में भारत के घरेलू उद्योग धन्धों की एक विस्तृत तालिका दी गई है। जैसे कुछ उपयोगी कार्य इस प्रकार हैं।

“कानपुर, प्रयाग तथा बनारस के जिलों में टोकरी बनाना मालाबार तथा दक्षिणी-पूर्वी बंगाल में नारियल की जटा काटना, लालटेन की बत्तियाँ बनाना और चटाइयाँ तैयार करना, आसाम में रेशम के कीड़ों को पालना, यू.पी. में खिलौने बनाने का काम, अमृतसर, बनारस व मिर्जापुर में दरियाँ बुनने का काम, रेशम बुनना, ढाका में शंख की चूड़ियाँ, सीपी के बटन, यू.पी. मिर्जापुर, तथा बंगाल में सुन्दर कलापूर्ण मिट्टी की वस्तुएं बनाना, मद्रास के तिनेवली में लुँगी तथा साड़ियां बनाना, फिरोजाबाद में काँच की चूड़ियों का काम।”

पंजाब में बहुत सी वस्तुएं घर पर तैयार की जाती हैं। मुल्तान और अमृतसर में मोजे, दरियाँ, नाले, होजरी, चर्खा कातना, आसन बनाना, सींकों की सुन्दर टोकरियाँ, शीतल पाटियाँ, खद्दर बुनना इत्यादि तैयार होती हैं। प्रत्येक परिवार को अपनी दिलचस्पी के अनुकूल कुछ न कुछ ढूँढ़ कर प्रारम्भ करना चाहिए।

समस्त घरेलू धन्धों में कपड़े वाला वर्ग महत्वपूर्ण है। रुई काँतकर दरियाँ, इजारबन्द, खद्दर बनाना चाहिए। स्त्रियाँ चाहें, तो घर पर दर्जी का कार्य भी सफलता पूर्वक सम्पन्न कर सकती है। हाथ का कागज बनाना भी अच्छा धन्धा है। जीवन में स्त्रियाँ घर पर अनेक काम किया करती हैं। शिल्पकारी, ऊन के मोजे, बनियान बुनना, बेलबूटे, कढ़ाई, रंगाई का कार्य प्रत्येक प्रतिभा सम्पन्न परिश्रमी स्त्री कर सकती है। अलीगढ़ में तालों, बनारस में बेलबूटों का काम, मुरादाबाद में कलई के बरतनों का काम तेजी से उन्नति कर रहा है। इस सब में सरकार को भी हाथ बटाना उचित है।

दियासलाई और साबुन के छोटे-2 कारखाने घरों पर खोले जा सकते हैं। अन्य छोटी -2 वस्तुएं-मोम की वस्तुएं, कागज के खिलौने, कन्दील, बेलें, फूलों के गुच्छे, बिजली के शेड, कागज की तश्तरियाँ, किरमिच के थैले बनाना, पुस्तकों की जिल्दबन्दी का काम, छापेखाने, पुस्तक प्रकाशन, कागज के लिफाफे बनाना, रद्दी कागज के बड़े लिफाफे मेवा सब्जी और मिठाई के लिए, बढ़ियाँ, पापड़, अचार, मुरब्बे आदि घरेलू धन्धों के लिए सरकार को प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए। हममें से प्रत्येक को अपने परिवार के लिए किसी एक धन्धे को चुन लेना चाहिए।

भारत संसार के सबसे बड़े औद्योगिक देशों में से एक है? केवल 8 प्रतिशत जनसंख्या उनमें लगी हुई है। वाणिज्य के परिमाण का जहाँ तक प्रश्न है, उसमें भारत का स्थान 5वाँ है। निर्मात में कच्चे, माल का परिमाण सबसे अधिक है, जिसमें पाट, रुई, चाय, चमड़ा, और चावल कुल निर्यात का आधा भाग ले लेते हैं। आयात का 75 प्रतिशत मशीनों की बनी हुई चीजों के रूप में आता है।


‘टूटे को बनाना और रूठे को मनाना’ बुद्धिमानी है।

समय का एक टाँका, नौ टाँकों की मेहनत बचा लेता है-यह एक अंग्रेजी कहावत है। इसमें जो गूढ़ तथ्य छिपा है उसे भली भाँति जान लेना चाहिये।

यदि वस्तुओं की मरम्मत करानी है तो यथा समय तुरन्त ही करा लेना उचित है। तत्कालीन मरम्मत, चीजों को तुरन्त ठीक करा लेना मानव मस्तिष्क की सुन्दरतम उपज है। वस्तुएँ तथा बीमार मनुष्य खराब होते ही सहानुभूति की अपेक्षा करते हैं। यदि आप अल्प काल के लिए भी रुकेंगे, तो यह हानि, खराबी, या व्याधि शनैः शनैः परिपुष्ट होकर अधिक व्यय और चिंतन की अपेक्षा करेंगे। एक स्पेनिश कहावत है कि-वह व्यक्ति जो एक नाली की मरम्मत नहीं कराता, उसे पूरे मकान की मरम्मत करानी पड़ती है।

यदि आपके दाँत में एक छोटा सा छेद है, तो तुरंत दंत डॉक्टर को दिखा कर उसकी चिकित्सा करा लीजिये और दाँतों को स्थायी रूप से निरोग कीजिये। जितना अधिक आप टालेंगे, उतना ही अधिक भविष्य में परेशानी हो सकती है।

यही हाल मरम्मत का है। आपकी कुर्सी, किवाड़, शीशा, घड़ी, सन्दूक, टाइप की मशीन, सीने की मशीन, साइकिल, यदि जरा भी खराब होते हैं, तो तुरन्त उनकी मरम्मत या तो स्वयं कीजिये, या किसी अन्य व्यक्ति से कराइये। अपनी मशीनों में हर तीसरे दिन तेल दीजिये, जूते पर पालिश कीजिये, टोपी को ब्रश कीजिये, घर की वस्तुओं को, अपने स्वास्थ्य को, सँभालिये।

मरम्मत करने वाले आपको सबसे अधिक धोखा देते और रुपया लेते हैं। जरा सी खराबी के लिए, बहुत दाम लिये जाते हैं। रेडियो, या सीने की मशीनों में तनिक भी खराबी से कार्य बन्द हो जाता है, थोड़ी ही देख-रेख से, मामूली मरम्मत से वे ठीक भी हो जाती हैं। मरम्मत करने वाले मशीनों को रख लेते हैं, और आपके पीछे मामूली सा काम कर आपसे बहुत पैसा लेते हैं। अतः आप अपनी मशीन कई कारीगरों को दिखाइये तत्पश्चात् ठीक कराइये। मामूली मशीनों के पुर्जों को समझ लीजिये, यह मालूम कीजिये कि क्या चीज टूटी या बेकार हुई है? उसका क्या मूल्य है? आपको मरम्मत के नाम पर लूटा तो नहीं जा रहा है।

नित्य प्रति काम में आने वाली अपनी चीजों को सावधानी के साथ बरतिये। उन पर निगाह रखिए कि वे कहीं से बिगड़ तो नहीं रही है। जहाँ बिगाड़ आरंभ हुआ हो वहाँ आरम्भ में ही मरम्मत कर दीजिए। कहते हैं कि जो “टूटे को बनाना और रूठे को मनाना” जानता है वह बुद्धिमान है। अपने हाथ अपनी चीजों की मरम्मत करना सीखिए। यदि दूसरे से ही ठीक कराना पड़े तो ध्यान रखिए कि अनुचित रूप से आपको ठग न ले। एक सुधार करके अन्य बिगाड़ खड़े न कर दे।

“या तो सबसे अच्छा या कुछ नहीं” की नीति अपनाने से काम नहीं चलता। जो लोग बढ़िया आकर्षक और अनुकूल को ही पसंद करते हैं और उससे कम की वस्तुओं को ग्रहण नहीं करते वे जीवन क्षेत्र में प्रायः असफल ही रहते हैं। टूटे को बनाना एक ऐसा काम है जिसमें नाम मात्र की लागत से पर्याप्त मात्रा में लाभ हो जाता है। इसी प्रकार ‘रूठे को मनाना’ एक ऐसी कला है जो शत्रु को मित्र बना देती है और हानि पहुँचाने वाले को लाभदायक सहायक के रूप में परिणत कर देती है।


मानव से-


मानव से

(श्री. एम.एम. शाण्डल, बी. ए. ‘सोम’)

रजकणों के रूप मानव !

पंच तत्वों से बनी काया न कंचन सी रहेगी,

सिद्ध होगा साम्य का कटु सत्य जीव अनूप मानव!

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 1॥

मोह, माया, लोभ, लिप्सा में गया जीवन न आता,

खोल अंतर्चक्षु, मानव! बन न दादुर कूप, मानव !

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 2॥

क्या हुआ यदि भाग्य है विपरीत, किसका दोष? अपना।

छाँह शीतल कल द्रुमोकी, आज मरुकी धूप, मानव !

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 3॥

क्रोध, निद्रा, काम, चिन्ता में पुरुष ! भूला डगर क्यों?

वासुदेवमयी धरा है, वर अचर तद्रूप मानव !

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 4॥

ढूँढ़ता तू चर्च, मस्जिद, मन्दिरों में मूर्ख ! जिसको-

मूक पशुओं, दीन दुखियों में ‘प्रकाशस्वरूप’ मानव !

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 5॥

प्रार्थनाएँ हैं अनाथों की पुकारें श्रवण के हित,

झोपड़े असहाय के हैं वन्दना के स्तूप मानव !

रजकणों के रूप मानव ! ॥ 6॥

*समाप्त*