अखंड ज्योति द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।
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इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति, गहरे अनुभव और अनुसंधान के साथ लिखी गई है।
(1) मैं क्या हूँ।
(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान।
(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान।
(4) परकाया प्रवेश।
(5) स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या।
(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार।
(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान।
(8) भोग में योग।
(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय।
(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य।
(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि।
(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि।
(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?
(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना।
(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?
(17) गहना कर्मणो गतिः
(18) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर प्रकाश।
(19) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा।
(20) शक्ति संचय के पथ पर।
(21) आत्मगौरव की साधना।
(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान।
(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला।
(24) आन्तरिक उल्लास का विकास।
(25) आगे बढ़ने की तैयारी।
(26) अध्यात्म धर्म का अवलोकन।
(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन।
(28) ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग।
(29) यम नियम।
(30) आसन प्राणायाम।
(31) प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि।
(32) तुलसी के अमृतोपम गुण।
(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान।
(34) मैस्मरेजम की अनुभव पूर्ण शिक्षा।
(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग।
(36) हस्त विज्ञान।
(37) विवेक सतसई।
(38) संजीवनी विद्या।
(39) गायत्री की चमत्कारी साधना।
(40) महान जागरण।
(41) तुम महान हो।
(42) गृहस्थ योग।
(43) अमृत, पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति।
(44) घरेलू चिकित्सा।
(45) बिना औषधि कायाकल्प।
(46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण।
(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?
(48) विचार करने की कला।
(49) दीर्घ जीवन के रहस्य।
(50) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?
(51) लेखन कला।
(52) प्रार्थना के चमत्कार।
(53) विचार संचालन विद्या।
(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।
(55) अध्यात्म शास्त्र।
(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।
(57) सफलता के तीन साधन।
(58) शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य।
(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति।
(60) दैवी सम्पदाएं।
(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार।
(62) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान।
(63) सुखी वृद्धावस्था।
(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग।
(65) वैज्ञानिक आध्यात्मवाद।
(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनायें।
(67) योग के नाम पर मायाचार।
(68) जादूगरी या छल।
(69) सौभाग्य बढ़ाना।
(70) सम्मोहन विज्ञान।
(71) ब्रह्मचर्य विज्ञान।
(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व।
(73) प्रेम का रहस्य।
(74) अमृत कण।
(75) उपवास के चमत्कार।
(76) प्रसिद्धि और समृद्धि।
(77) स्त्री-रोग-चिकित्सा।
(78) बाल-रोग-चिकित्सा।
(79) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत।
(80) यज्ञोपवीत से धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।
मूल्य में कमी के लिये लिखा पढ़ी व्यर्थ है। छः रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा।
गायत्री मन्त्र भारतीय धर्म की आत्मा है, जड़ है। हिन्दु धर्म गंगा है तो उसका उद्गम स्रोत-गंगोत्री-गायत्री में है। गायत्री से चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार श्रुति, स्मृति, उपनिषद्, शास्त्र, पुराण, दर्शन आदि में जो ज्ञान भण्डार भरा हुआ है वह सब गायत्री गायत्री के छोटे से अक्षरों में मौजूद है। इसीलिए गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मन्त्र माना गया है, और उसकी नित्य उपासना करने के लिए विशेष जोर दिया गया है।
गायत्री महाविज्ञान की विस्तृत जानकारी के लिए अब तक कोई ऐसा संकलन दृष्टि गोचर नहीं हो रहा था जिसमें वह सब गायत्री संबंधी ज्ञान एकत्रित किया गया हो जो विभिन्न शास्त्रों में फैला हुआ है। हर्ष की बात है कि ‘अखण्ड ज्योति’ ने इस कार्य को पूरा किया है। लगभग दो हजार ग्रन्थों का दस वर्ष में मंथन करके इस संबंध में महान ज्ञान एकत्रित किया गया है। उसे अब प्रकाशित करके सर्व साधारण के लिए सुलभ बना दिया गया है।
(1) गायत्री विज्ञान-
गायत्री शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन तथा परिचय, गायत्री की सरल, सुबोध एवं नित्य करने योग्य साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)
(2) गायत्री रहस्य-
गायत्री मन्त्र के एक-एक अक्षर में ज्ञान का गाध समुद्र भरा हुआ है। इन चौबीस अक्षरों में ऐसी विस्तृत व्याख्या, विवेचना एवं मीमाँसा की गई है कि उनके गर्भ में छिपे हुए ज्ञान भंडार का परिचय भली प्रकार प्राप्त हो जाता है। अनेकों ऋषियों ने, शास्त्रकारों ने, वेद भाष्यकारों ने, दक्षराज रावण ने गायत्री के जो विभिन्न अर्थ किये हैं। वे सब भी इस इस पुस्तक में मौजूद हैं। ‘गायत्री रामायण’ भी पुस्तक रूप में संकलित है। (मूल्य 2)
(3) गायत्री के अनुभव-
वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में वर्णित गायत्री की महिमा तथा प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के महापुरुषों ने गायत्री के संबंध में जो अपने अनुभव और अभिमत प्रकट किये हैं उन सबका इस पुस्तक में वर्णन है। साथ ही अनेक साधकों ने गायत्री की उपासना करके जो अद्भुत लाभ प्राप्त किये हैं, उनके स्वयं बताये हुए वर्णन भी दिये गये हैं। (मूल्य 2)
(4)गायत्री तन्त्र-
गायत्री तन्त्र को ‘मन्त्र राज’ कहा है। उससे बड़ा कोई मन्त्र नहीं है। जो कार्य संसार के अन्य किसी भी मन्त्र से हो सकता है वह गायत्री मंत्र से भी हो सकता है। इस पुस्तक में दक्षिण मार्गी वेदोक्त, तथा वाम मार्गी तंत्रोक्त दोनों प्रकार की विधियाँ बताई गई हैं जिसके द्वारा सात्विक, राजसी और तामसिक तीनों ही प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। पुरश्चरण, अभिचार, कवच कीलक, मारण, सम्मोहन आदि सभी साधनाओं का पथ-प्रदर्शन किया गया है। (मूल्य 2)
(5)गायत्री योग-
गायत्री द्वारा 12 योगों की साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यान योग, सूर्ययोग, प्राणयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नादयोग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमतापूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह विधि भी बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)
पाँचों पुस्तकें एक साथ लेने पर डाक खर्च माफ व्यवस्थापक-’अखण्ड ज्योति’ कार्यालय, मथुरा।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
(विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर)
अनसुनी करके तेरी बात, न दे जो कोई तेरा साथ।
तो तूही कसकर अपनी कमर, अकेला बढ़ चल आगे रे।
अरे ओ पथिक अभागे रे॥
अकेला चल, अकेला चल, अकेला ही चल आगे रे।
देखकर तुझे मिलन की बेर, सभी जो लें अपने मुख फेर
न दो बातें भी कोई करे, समय हो तेरे आगे रे।
अरे ओ पथिक अभागे रे॥
तो अकेला ही तू जी खोल, सुरीले मन मुरली के बोल।
अकेला गा-अकेला सुन, अरे ओ पथिक अभागे रे।
अकेला ही चल आगे रे॥
और सुन तेरी करुण पुकार, अँधेरी पावस निशि में द्वार।
न खोले ही, न दिखावें दीप, न कोई भी जो जागे रे॥
अरे ओ पथिक अभागे रे॥
तो तूही वज्रानल में डाल, जलाकर अपना उर-कंकाल।
अकेला जलता रह चिरकाल, अरे ओ पथिक अभागे रे।
अकेला ही चल आगे रे॥
देवस्येति तुब्याकरोत्यमरताँ, मर्त्योऽम्पि संप्राप्यते
देवानाभिव शुद्ध दृष्टि करणात् सेवोपचाराद्भुवः
निःस्वार्थ परमार्थ कर्म करणात् दीनाय दानात्तथा वाह्याभ्यन्तरमस्यभुवनं संसृज्यते चैवहि॥
अर्थ- “देवस्य” यह पद बतलाता है कि मरणधर्मी मनुष्य भी अमरता अर्थात् देवत्व को प्राप्त हो सकता है। देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से, प्राणियों की सेवा करने से, परमार्थ कर्म करने से, निर्बलों की सहायता करने से-मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सृष्टि होती है।
“देव” उसे कहते हैं जो दे। ‘लेव’ उसे कहते हैं जो लेवे। सुर और असुर में, देव और दानव में अन्तर केवल इतना ही है कि दैव की मनोवृत्ति अपने लिये कम लेने की और दूसरों को अधिक देने की रहती है, इसके विपरीत दानव अपने लिये अधिक चाहते हैं और दूसरों को देने में बड़ी अनुदारता बरतते हैं। इन दोनों में से जिस गति को चाहे मनुष्य स्वेच्छापूर्वक प्राप्त कर सकता है, वह चाहे तो देव बन सकता है चाहे तो असुर पदवी प्राप्त कर सकता है।
देवताओं को अमर कहते हैं। अमर वह जो कभी मरे नहीं। अपने को अविनाशी आत्मा मान लेने से, आत्म साक्षात्कार कर लेने से वह शरीरों की मृत्यु को मृत्यु अनुभव ही नहीं करता। उसे सदा यही अनुभव होता है कि मैं अमर हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप अविनाशी, अविछिन्त, अभेद्य, अशोष्य है। इसके अतिरिक्त देव मनोवृत्ति के मनुष्य के कर्म भी दैवी-आदर्श-धर्म युक्त होते हैं। ऐसे विचार और कर्मों वाले महापुरुषों का यश शरीर ‘यावत् चन्द्र दिवाकरौ’ बना रहता है। शिव, दधीच, हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, प्रहलाद बुद्ध, गाँधी आदि का यश शरीर अमर है उनकी मृत्यु कभी भी नहीं हो सकती, इसलिए उनकी अमरता में किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता। ऐसे अमर पुरुष सदा देव श्रेणी में ही गिने जायेंगे।
संसार की वस्तुओं को, समस्याओं को, परि स्थिति को, लाभ हानि को, परखने की समझने की दो दृष्टियाँ, दो कसौटी होती हैं। एक को शुद्ध दूसरी को अशुद्ध कहते हैं। शुद्ध दृष्टि से देखने वाला मनुष्य हर काम को आत्मलाभ या आत्महानि की तराजू पर तोलता है, वह देखता है कि इस कार्य को करने में अत्यन्त कल्याण है या नहीं, जिस कार्य में स्थायी सुख होता है उसे ही वह ग्रहण करता है भले ही उसे स्वल्प तात्कालिक लाभ एवं कम भौतिक सुख में संतोष करना पड़े। इसके विपरीत अशुद्ध दृष्टिकोण वाला मनुष्य अधिक धन, अधिक सुख, अधिक भोग उपार्जन में लगा रहता है। इन वस्तुओं को अधिक संख्या अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिये वह इतना विमुग्ध होता है कि धर्म अधर्म तक की परवाह करना छोड़ देता है। आज के सुख के लिए वह कल के दुःख को नहीं देखता। अशुद्ध दृष्टिकोण रखने वाले मनुष्य के विचार और कार्य अति स्वार्थपूर्ण-अनर्थपूर्ण होते हैं इसीलिए उसे निंदनीय, दण्डनीय, असुर माना जाता है। देववृत्ति का मनुष्य शुद्ध सात्विकता को अपनाता है, फलस्वरूप उसके समस्त विचार और कार्य पुण्य की परमार्थ की श्रेणी में आने योग्य होते हैं। अतएव उस देवता की सर्वत्र पूजा प्रशंसा, प्रतिष्ठा, श्रद्धा प्राप्त होती है।
गायत्री के पाँचवें पद “देवस्य” का सन्देश है कि अशुद्ध दृष्टिकोण से बच कर शुद्ध विचारधारा को अपनावें। असुरता की नीति को छोड़ कर देवत्व की गतिविधि को स्वीकार करें। उन क्षणिक सुखों, आकर्षणों और प्रलोभनों से बचें जो भविष्य में दुख देने वाले हों जिनके कारण आत्मा को पतन के गहरे गर्त में गिरना पड़ता हो।
देवता स्वर्ग में निवास करते हैं। स्वर्ग उनका जन्म सिद्ध अधिकार है। ये जहाँ भी रहेंगे छाया की तरह स्वर्ग उनके पीछे-पीछे फिरेगा देव और स्वर्ग का आपस में इतना घनिष्ठ एवं अटूट संबंध है कि वह किसी भी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता। दैवी वृत्तियां इतनी शीतल शान्तिदायक, उल्लासमयी एवं आनन्द युक्त हैं कि वे जहाँ रहती हैं वहाँ अमृत का निर्झर हर घड़ी प्रवाहित करती रहती हैं। साँसारिक परिस्थिति भी कितनी ही साधारण क्यों न हों फिर भी दैवी वृत्तियों वाला मनुष्य इतना आनन्द अनुभव करेगा जितना अशुद्ध दृष्टिकोण वाले कुबेर को भी नसीब नहीं हो सकता। महापुरुष इमर्सन कहा करते थे कि ‘मुझे नरक में रहना पड़े तो भी मैं अपने लिये वहाँ स्वर्ग की रचना कर लूँगा’ उनका कथन सोलह आना सच था। उच्च आँतरिक स्थिति वाले मनुष्य के लिये संसार के कण-कण में अपार आनन्द भरा पड़ा है। उसे कोई भी साँसारिक कठिनाई, भय चिन्ता उन्हें क्लेश में नहीं डाल सकती।
देवता लोग द्रवित होने वाले होते हैं उनके स्वभाव में असीम करुणा और दया भरी होती है। दूसरों को अभावग्रस्त, दुखी, निर्बल, विपन्नता ग्रस्त देख कर उनकी अन्तरात्मा रो पड़ती है, और उन्हें उबारने के लिये वे अपनी तुच्छ सामर्थ्य का अधिकाधिक भाग खर्च कर डालने को आतुर हो जाते हैं। समय, शक्ति, योजना एवं सम्पत्ति तो हर एक के पास सीमित ही होती है, उसे चाहे कोई भोग ले। दयालु मनुष्य की अन्तरात्मा दूसरे के कष्ट को कम करने के लिये कचोटती है फलस्वरूप दूसरों की सेवा और सहायता में उसे लगना पड़ता है। एक ओर शक्ति का अधिक भाग खर्च कर दिया जाय तो दूसरी ओर कम शक्ति लगेगी। अपने शौक मौज के लिये उनके पास न समय बचता है न सम्पत्ति, न शक्ति फलस्वरूप वे संयमी त्यागी अपग्रही का साधु जीवन बिताते हैं। देव स्वभावतः आत्म संयमी होते हैं। क्योंकि अपने लिये कम से कम शक्ति व्यय करने पर ही तो वे शेष को लोक सेवा में लगा सकेंगे। भोग और परमार्थ साथ-साथ नहीं हो सकते। दोनों में से एक को प्रधानता देनी पड़ती है। जो विलास प्रिय है वह उदार नहीं हो सकेगा जो उदार होगा उसे विलासिता फूटी आँखों से न सुहायेगी।
क्षण भंगुर शरीर की चटोरी इन्द्रियों को तृप्त करने में “सुरदुर्लभ मानव जीवन” को व्यतीत कर डालना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। सामाजिक कुरीतियों के खर्चो के आडम्बरों को पूरा करने के लिए जैसे तैसे करके धन जोड़ते रहना और फिर एक दिन में उसे बारूद की तरह फूँक देना यह भी कोई दूरदर्शिता की बात नहीं है। गायत्री कहती है कि मेरे प्रिय पुत्रों! परमात्मा के अमर राजकुमारों! तुम देव हो, दिव्यता का आचरण करो। अपने दृष्टिकोण को दिव्य बनाओ, शुद्ध बनाओ, जिन बालक्रीड़ाओं में अनेकों अज्ञान ग्रस्त अविवेकी उलझ रहे हैं उन्हीं में तुम भी मत फंस जाओ। अशुद्धि दृष्टि अपना कर केवल मूर्ख या दुष्ट बना जा सकता है। ईश्वर ने शरीर बुद्धि और जीवन रूपी बहुमूल्य सम्पत्ति इसलिए दी है कि दैवी गतिविधि को अपना कर स्वर्गीय आनन्द का आस्वादन किया जाय। तृष्णा, भोग, लोभ, अहंकार, मोह आदि के जंजालों में फँसकर इन बहुमूल्य शक्ति सम्पत्तियों को अपव्यय या दुर्व्यय करना सर्वथा अनुचित है।
हमारा जीवन देवत्व से परिपूर्ण होना चाहिए। हमारी विचारधारा में दिव्य दृष्टि का, परमार्थ बुद्धि का समावेश होना चाहिए। हम अपने साथ प्यार करें, अपनी आत्मा के साथ प्यार करें, अपने जीवन के साथ प्यार करें। मोहवश कुपथ्य कराके रोगी बालक को मृत्यु मुख में ढकेल देने वाली माता का प्रेम सच्चा प्रेम नहीं है उसे तो मोह ही कहा जायेगा। हम अपना लाभ सोचें, अपना हित पहिचानें, अपना स्वार्थ साधन करें, पर कुपथ्य करने वाली माता की तरह न करें।
संसार में दो ही प्रकार से आनंद अनुभव किया जाता है (1) ख्याल से (2) माल से। दुनिया माल की मस्ती में मस्त है। सम्पत्ति से सुख मिलता है यह मान्यता लोगों के मस्तिष्क में घर कर गई है इस अशुद्ध दृष्टिकोण के फेर में पड़ कर वे सम्पत्ति के आस पास चक्कर काटते रहते हैं, वह भी मिल तो किसी बिरले को पाती है पर उसकी मृगतृष्णा में सभी भटकते रहते हैं। यह बालबुद्धि मूढ़मति लोगों के लिए उपयुक्त हो सकती है। गायत्री के साधक से बुद्धिमान होने की आशा की जाती है वह प्रौढ़ परिपक्व शुद्ध विचारों का होना चाहिए। तदनुसार उसे यह सद्विचारों की, ख्याल की, ज्ञान की मस्ती में मस्त होने का मार्ग ग्रहण करना चाहिए।
लोग समझते हैं कि अपना लाभ करने के लिए दूसरों की हानि करनी पड़ती है और दूसरों का लाभ करना हो तो स्वयं हानि उठानी पड़ती है।
यह मान्यता ठीक नहीं। वास्तव में भलाई और बुराई के इस प्रकार खंड नहीं किये जा सकते वह दो परस्पर विरोधी भागों में नहीं बंट सकती। जो दूसरों की भलाई है उसी में अपनी भलाई है। जो वास्तव में अपनी भलाई है उसमें दूसरों की भलाई भी समाई हुई है। जिस कार्य से दूसरों का बुरा होता है उससे अपना भी बुरा ही हो सकता है। इसलिए हमें सार्वभौम भलाई को अपना कर परम स्वार्थ का परमार्थ का संपादन करना चाहिए।
हमारे भीतर देव और असुर दोनों का निवास है। दोनों में नित्य प्रति संघर्ष होता रहता है। गायत्री कहती है कि हम देव तत्व को विकसित करें, देवत्व को प्रोत्साहन दें, दैवीय आत्म संकेतों का अनुसरण करें। यही कल्याणकारी संदेश “देवस्य” शब्द में दिया हुआ है।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
अपने जीवन में सबसे बड़ी और मूल्यवान बात जो मैंने सीखी है वह है-साध्य से अधिक साधना की ओर ध्यान देना। यही सफलता का रहस्य है। हम लोगों में सबसे बड़ा दोष यही है कि हम लोग लक्ष्य की ही ओर ध्यान देते हैं और साधन की, कार्यप्रणाली की, ब्यौरे की बातों को भूल जाते हैं। और इसीलिये इसका परिणाम यह होता है कि यदि हम अपने लक्ष्य पर एक बार पहुँच भी गये, यदि हमको एक बार सफलता मिल भी गयी तो भी हमारी वह सफलता स्थायी नहीं होती और हम शीघ्र ही फिसल जाते हैं। हमें सबसे पहले यह बात ध्यान में बैठा लेनी चाहिये कि हमारी कार्यप्रणाली की शुद्धता और अशुद्धता पर ही कार्य का फलाफल निर्भर करता है। यदि हमारी प्रणाली ठीक न रही तो फल कभी ठीक नहीं हो सकता। पद्धति पर ध्यान देने से परिणाम आशा और अभिलाषा के अनुरूप ही होगा इसमें तनिक भी संशय नहीं। प्रणाली की विशुद्धता ही फल है।
अतः हमें चाहिये कि अपना सारा ध्यान कर्म और उसकी प्रणाली पर ही रखें, उसकी पूर्ति के प्रलोभन में तनिक भी न फंसें। गीता का भी यही उपदेश है कि हमें निरन्तर अपने कर्म में लगे रहना चाहिये, फल की स्पृहा करना उसके पीछे अन्धा होना पतन की जड़ है। इसीलिये गीता का कथन है कि सब कर्मों को करते हुए भी उनसे अनासक्त रहें। आसक्ति होना ही बुरा है। संसार में हम कर्म करने के लिये आते हैं। किन्तु कर्मफल के लिये हमारे अन्दर जो स्पृहा, जो लोभ होता है वह हमारा सत्यानाश कर देता है। हम नित्य देखते हैं कि मधुमक्षिका फूलों का रस चूसने के लिये आती है किन्तु चलते समय उन फूलों के रस में उसके पर फंस जाते हैं और वह विवश हो जाती है इसका कारण उसके अन्दर मधु के प्रति आसक्ति है। उसी प्रकार हम भी इस विश्व में केवल कर्म करने के लिये आते हैं किन्तु अपनी मूर्खता से उसके फल के प्रति आसक्ति रखने के कारण संसार में ही फंस जाते हैं। फल इसका बड़ा घातक होता है। हमारी स्वतंत्रता छिन जाती है, हम गुलाम हो जाते हैं। प्रकृति से हम सब चीजें प्राप्त करना चाहते हैं, किन्तु अन्त में प्रकृति हमसे सभी चीजें छीन लेती है और हमको ठुकरा देती है।
अतः हमारे दुःखों का, कष्टों का सबसे बड़ा कारण आसक्ति है। इसीलिये, भगवान कृष्ण ने कहा है कि अनासक्त होकर कर्म करो। कर्म करो। कर्म करो। किन्तु उसके फल के प्रलोभन में न पड़ो जब चाहे उस कर्म-चक्र से अलग हो जाने की क्षमता अपने अन्दर रखो। चाहे कोई हो उससे अपने को अलग कर लेना होगा। जीवन का नाम ही संघर्ष है अशक्तों, अपाहिजों और दुर्बलों के लिये यह जीवन या कर्म-क्षेत्र संसार नहीं बना है। दुर्बलता से ही सब प्रकार की तकलीफें, चाहे वे शारीरिक हों या मानसिक, उत्पन्न होती हैं। दुर्बलता मृत्यु है, शक्ति समृद्धि है, जीवन है, अमरत्व है।
साँसारिक आनन्द आसक्ति से ही हमको प्राप्त होते हैं हम अपने सम्बन्धियों के प्रति, अपने सत्कार्यों के प्रति एवं संसार के प्रति आसक्त हो जाते हैं और फिर अन्त में यही सुख, यही आनन्द दुःख में करुणा में परिणत हो जाता है। सुख भोगने के लिये आसक्ति हीन होना अत्यावश्यक है। यदि कोई अनासक्त हो तो वह कभी दुःखी हो ही नहीं सकता। संसार में वही व्यक्ति अत्यधिक सुखी और सम्पन्न है जिसके अन्दर साँसारिक पदार्थों से अपने को आसक्त रखते हुए भी अनासक्त कर लेने की सामर्थ्य हो। जो संसार में रहते हुए भी, संसार के पदार्थों का उपयोग करते हुए भी, जब चाहे अपने को उनसे विरक्त करले और उसके मनमें उनके प्रति तनिक भी अनुराग न रखे उसी का जीवन सफल है।
कितने ऐसे मनुष्य होते हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी लौकिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्मम, निष्ठुर होते हैं। निस्सन्देह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों, मुसीबतों से बच जाते हैं। किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती। लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर की चट्टान से कर सकते हैं? ऐसा कभी नहीं हो सकता। मनुष्य मनुष्य ही है पत्थर पत्थर ही है। जो कुलिषवत् कठोर होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का भी उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा भी जीवन क्या कोई जीवन है? कुशल चतुर व्यक्ति तो वही है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम पूरा कर, सब की सेवा कर, सब से प्रेम कर फिर भी सब से अलग रहता है।
भिक्षुक क्या कभी सुखी रह सकता है? यदि उसको कोई कुछ देता है तो वह घृणा के भाव से। और इसीलिये भिक्षुक को जो कुछ मिलता है उसका आनन्द वह नहीं उठा सकता। उसी प्रकार हम सभी भिक्षुक हैं। हम जो कुछ भी करते हैं उसका बदला पाने की आशा करते हैं। हम लोगों की बुद्धि व्यापारिक हो गयी है। जीवन में, सुकृति में प्रेम में सब में हम लोग व्यापारी बन गये, तो जब हमारे अन्दर व्यापारिक बुद्धि का प्रवेश होगा तो फिर व्यापार की सभी अवस्थाओं का सामना भी करना पड़ेगा। व्यापार में आदान-प्रदान, क्रय-विक्रय, मन्दी-तेजी, हानि-लाभ सभी होते हैं और हमें उन सबको भोगना पड़ेगा। बस यहीं मनुष्य फंसता है, इसी जगह उसकी कठिनाई आरम्भ होती है। स्पृहा, अभिलाषा और आशा जहाँ शुरू हुई कि दुःख स्रोत उमड़ पड़ा। अतः जो निस्वार्थ कर्म करेगा, जो पुनः वापस पाने कि इच्छा रखकर कार्य नहीं करेगा वही सफल होगा, वही दुःखों से मुक्त रहेगा। कितने ही लोग कहेंगे, “यह तो विचित्र बात है, असम्भव है, गलत है। रोज ही हम देखते हैं कि सीधा सादा, सरल निस्वार्थ कर्मी ठगा जाता है, हानि उठाता रहता है। भगवान ईसा ने सेवा की भावना रख कर कर्म किया, उनका कर्म केवल कर्म के लिये था। फल के लिये उनके अन्दर तनिक भी आसक्ति न थी फिर भी उनको प्राण गंवाना पड़ा। किन्तु साथ ही साथ यह भी हम जानते हैं कि ईसा के आत्मबलिदान ने जगत को वह अमूल्य निधि दी जिसका ठिकाना नहीं। ईसा का उद्देश्य सफल हुआ, अपने लक्ष्य को उन्होंने प्राप्त कर लिया।
आप जो कुछ भी करो, जो कुछ भी दो उसका बदला न चाहो। जो कुछ भी दे सको दो, जहाँ तक हो सके करो, इसका फल आपको हजार गुना मिलेगा किन्तु आप आशा न करो, अभिलाषा न करो, माँगो नहीं। जीवन देना ही तो है और क्या है? यदि आप देना बन्द कर दोगे या नहीं देना चाहोगे तो प्रकृति आपका गला दबा कर आपसे ले लेगी। आप सोचते हो कि जीवन संग्रह करने के लिये है, हाथ बन्द करने के लिये हैं किन्तु जब प्रकृति आपका गला दबा कर आपका हाथ खोल देती, तब आपको इस बात का ज्ञान होता कि वास्तव में जीवन देने के लिये बना था। मरने के बाद सिकन्दर के दोनों हाथ खुले हुए बाहर निकल कर लटक रहे थे। उसने इस ध्रुव सत्य को समझ लिया था कि जीवन में कुछ संचय नहीं किया जा सकता, यह तो देने के ही लिये बना था। इसी को प्रारम्भ में लोग नहीं समझते किन्तु एक समय ऐसा आता है जब विवश होकर उन्हें समझना पड़ता है। लेकिन यदि हममें इतनी बुद्धि होती कि हम प्रकृति के इस रहस्य को समझते, भगवान के उपदेशों के अनुसार चलते तो दुःख किस बात का था। अतः, हमें ऐसा नियम बना लेना चाहिये कि हम जो कुछ भी दें उसको पुनः प्राप्त करने की आशा से न दें और न उसे माँगे ही। नदी जब तक बहती रहती है एवं अपना जल समुद्र में उड़ेलती रहती है तभी तक उसमें बाहर से जल आता रहता है किन्तु जिस क्षण वह समुद्र को जल देना बन्द कर देती है। उसी क्षण उसमें बाहर से जल का आगमन रुक जाता है। जब तक आप देते रहोगे, जब तक बाहर निकालते रहोगे तब तक आपके पास संचय होता रहेगा।
अतः भिक्षुक न बनो, देने में कृपणता न करो। इसी का लोग ख्याल नहीं करते। कठिनाइयों का पहिले से ही ध्यान रखना चाहिये। और हम रख भी सकते हैं। यह तो बहुत ही सरल कार्य है फिर भी अपनी ही भूल से हम गड्ढे में गिरते हैं। प्रकृति हमें घूँसे का जवाब घूँसे से, लात का लात से और थप्पड़ का थप्पड़ से देने के लिये प्रेरित करती है किन्तु बुद्धिमानी यही है कि हम मौन रहें, अनासक्त रहें, निर्विकार रहें। अपने पर नियन्त्रण रखें।
कठिनाइयाँ तो बहुत पड़ती हैं इसमें सन्देह नहीं। और इन्हीं के द्वारा हमारा साहस, उत्साह, भंग हो जाता है। किसी के कटु शब्द कह देने पर हमसे निर्विकार शान्त, मौन नहीं रहा जाता। असाधारण स्थिति में मनुष्य और भी भूल करता है, उद्विग्न हो जाता है, किन्तु उस असाधारण स्थिति के पार जाना ही वीरता है। इनसे पार जाने पर, इनसे छुटकारा पाने पर ही वास्तविक सुधार सम्भव है। इसके लिये अपेक्षा है आध्यात्मिक बल की, आध्यात्मिक शक्ति की। इन सब बन्धनों से, दुर्बलताओं से, मायाजाल से छुटकारा प्राप्त करने के लिये हमें, चाहे कितने ही कष्टों का सामना करना पड़े, अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिये। वरन् विघ्न-बाधाओं के, कठिनाईयों के आने पर अविचल भाव से उनका सामना करना चाहिये और उसी समय अपनी तत्परता का, शान्ति का, अनासक्ति का परिचय देना चाहिये।
यह कार्य कठिन है तो अवश्य किन्तु अभ्यास से क्या नहीं हो सकता। हमें अपनी भावना ही ऐसी बना लेनी चाहिये कि चाहे कुछ भी हो हमारे ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम अपनी अहंमन्यता को मिटा सकें तो हमारे लिये सब कुछ सम्भव है। यदि हम अपने अन्दर यह विचार बैठा रखें कि दुःख और मुसीबतें अकस्मात् और असम्भावित रूप से नहीं आतीं वरन् वे अनिवार्य हैं, हमारे पूर्व कर्मों के फल अच्छे या बुरे हमें अवश्य मिलेंगे, तो फिर हम निश्चिन्त रहेंगे। हमें कोई परेशानी न होगी।
दूसरी बात यह है कि हम लोगों की यह एक विचित्र आदत-सी पड़ गयी है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने हैं, जो भी कठिनाईयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिये हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरों के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास होता है कि इसका कारण हमारे दुष्कृत्य नहीं है। दूसरों को हम दोष देते समय न जाने क्या क्या कह डालते हैं, “अन्धा अपनी नेत्रविहीनता की ओर ध्यान न देकर काने को दोष देता है, कैसी विडम्बना है। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यही हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायगा कि यदि आप स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आपका वास असम्भव था। किसी हरिश्चन्द्र के सामने झूठ बोलने का साहस कोई नहीं कर सकता हमें तो जो कुछ भी मिलता है वह हमारे कर्मों के अनुसार। दूसरों को इसके लिये दोष देना व्यर्थ है। हम अच्छे हो और संसार जिसमें हम रहते हैं, बुरा हो यह हो नहीं नहीं सकता। इससे बढ़ कर असत्य कथन नहीं हो सकता।
अतः सबसे पहली बात यह है कि हमें दूसरों को किसी प्रकार भी दोषी नहीं ठहराना चाहिये। क्योंकि यदि हमारे कर्म वैसे न होते तो वह दुष्परिणाम हमको न भोगना पड़ता। इसलिये ऐसे समय आत्मनिरीक्षण करना चाहिये और अपने अन्दर जो दोष हों उनको दूर करना चाहिये।
ऐसा करने से, अनासक्त रहने से, निर्लिप्त रहने से ही हम सुधर सकते हैं। दूसरों की चिन्ता छोड़ कर हमें अपनी चिन्ता करनी चाहिये। संसार के प्राणी ही हमारा अभिप्राय यहाँ मनुष्य से है, संसार को बनाते हैं। यदि मनुष्य का सुधार हो जाये तो संसार में सुख प्राप्त कर सकता है, जीवन में सफल हो सकता है एवं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
जीवन भर में आनन्द प्राप्त करने के लिए बुद्धि ने जितने साधन जुटाये हैं उनमें मित्रता की प्राप्ति सबसे महत्व की वस्तु है।
यदि दुनिया की भूलें और उसके दोषों को दूर करना चाहते हो तो इस कार्य में माताओं को प्रवृत्त करो।
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बच्चे का भावी भाग्य बनाना सदा माता का कार्य होता है।
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महान मन वाले व्यक्ति विचारों पर विवाद करते हैं। मध्यम मन वाले वस्तुओं पर लेकिन क्षुद्र बुद्धि वाले व्यक्तियों पर बहस करते हैं।
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जो अपने को तुच्छ समझता है वह केवल अपना ही मूल्य नहीं घटाता किन्तु समस्त मनुष्य जाति को अप्रतिष्ठित करता है।
(योगीराज श्री अरविन्द)
रुपया एक विश्वजनीन शक्ति का दृश्य-चिन्ह है। यह शक्ति भूलोक में प्रकट होकर प्राण और जड़ के क्षेत्र में अपना काम करती है। बाह्य जगत की पूर्णता के लिये यह अनिवार्य है। मूलतः और अपनी यथार्थ क्रिया में यह शक्ति है ईश्वर की ही। पर ईश्वर की अन्य शक्तियों के समान यह शक्ति भी पृथ्वी पर प्रेरित की गयी है और अपरा प्रकृति के अज्ञानान्धकार में अहंकार के उपयोगों के लिये इसका अपहरण हो सकता है या असुरों के कब्जे में आकर उनके मनोरथ को सफल करने के लिये यह विकृत की जा सकती है। यथार्थ में यह उन तीन शक्तियों में से-अधिकार, धन और स्त्री-एक है जिनकी ओर मानवी अहंकार और असुर सबसे अधिक आकर्षित होते हैं। और जो प्रायः ऐसे लोगों के हाथ में रहती हैं जिनके हाथ में ये न रहनी चाहिये और इन लोगों के द्वारा इन शक्तियों का बड़ा ही दुरुपयोग होता है। धन के चाहने वाले या धन के रखने वाले प्रायः धन के अधिकारी नहीं बल्कि धन के अधिकार में (वश) में रहते हैं, धन को असुरों ने जो इतने काल से अपने कब्जे में रखा है और इसका दुरुपयोग किया है, उससे धन पर उसकी ऐसी आसुरी छाप पड़ी हुई है कि इसके विकृत करने वाले प्रभाव से पूरे तौर पर शायद ही कोई बचता हो। इसीलिये अनेक साधन-मार्गों में धन के विषय में बड़े संयम, अनासक्ति और त्याग का कड़ा नियम है और धन रखने की वैयक्तिक और अहंकारयुक्त इच्छा का बड़ा निषेध है। कुछ तो धन को छूना ही पाप समझते हैं और दरिद्रता एवं अपरिग्रह को ही एक मात्र, अध्यात्मजीवन की अवस्था मानते हैं। पर वह भूल है, इससे यह शक्ति दानवी शक्तियों के ही हाथ में रह जाती है। सारा धन ईश्वर का है और साधक के लिये श्रेष्ठ परा बुद्धि का मार्ग यही है कि ईश्वर के लिये इसे फिर जीत ले और दैवी पद्धति से दैवी जीवन के लिये इसका उपयोग करे।
धन की शक्ति, उसके द्वारा प्राप्त साधनों और उससे बनने वाले काम से तुम्हें वैरागियों की तरह भागना भी नहीं चाहिये, न इन चीजों के प्रति तुम्हारे मन में कोई राजसिक आसक्ति ही हो चाहिये और न इनके भोग की दासता में ही पड़े रहना चाहिये। धन को केवल यह समझो कि यह एक शक्ति है जिसे माता की सेवा लिये फिर जीत लाना होगा और लाकर माता के ही चरणों में अर्पण करना होगा।
सारा धन भगवान् का है और आज यह जिन लोगों के हाथ में है वे केवल उसके ट्रस्टी हैं, मालिक नहीं। आज यह उनके पास है कल और किसी के पास हो सकता है। जब तक यह इनके हाथ में है तब तक इस ट्रस्ट को ये लोग कैसे निबाहते हैं, किस भाव से निबाहते हैं, किस चेतना से उसका उपयोग करते हैं-इसी एक बात पर सारी बात निर्भर करती है।
अपने वैयक्तिक काम में जब तुम इस धन का उपयोग करो तब यह समझो कि जो कुछ तुम्हारे पास है, जो कुछ तुम्हें मिलता है या जो कुछ तुम ले आते हो, वह सब माता का है। स्वयं कुछ भी मत चाहो, जो कुछ वह तुम्हें दे दे उसी को ग्रहण करो और उसी काम में उसका उपयोग करो जिस काम के लिये वह तुम्हें दिया गया हो। नितान्त निःस्वार्थ, पूर्ण प्रामाणिक, पूरा-पूरा हिसाब रखने वाले और तफसील की एक एक बात में पूरी सावधानी रखने वाले उत्तम ट्रस्टी बनो, सदा यह ध्यान रखो कि यह उनका धन है, तुम्हारा नहीं जो तुम व्यवहार कर रहे हो। इसके विपरीत, जो कुछ तुम्हें उनके लिए मिलता है, श्रद्धा के साथ उसे उनके सामने रखो, अपने किसी काम में या किसी गैर के काम में उसे मत लगाओ।
कोई मनुष्य धनी है केवल इसीलिए उसके सामने अपना सिर नीचा नहीं करो, उसकी चमक-दमक शक्ति या प्रभाव के वशीभूत मत हो। जब तुम माता के लिये माँगते हो तब तुम्हें यह ध्यान रखना चाहिये कि तुम्हारे द्वारा माता ही माँग रही हैं और अपनी ही चीज का किंचित अंश माँग रही है, इस तरह जिस आदमी से तुम माँगो वह इसका क्या प्रत्युत्तर देता है उसी से उसकी परीक्षा होगी।
यदि धन की आसक्ति के लेप से तुम मुक्त हो, पर वैरागियों की तरह तुम उससे भागते भी नहीं हो तो ईश्वरीय कर्म के लिए धन प्रस्तुत करने की अधिकतर शक्ति तुम्हें प्राप्त होगी मन-में समता हो, पूरी निस्पृहता हो और जो कुछ तुम्हारे पास है और जो कुछ तुम्हें मिले और जितनी भी अर्जन करने की शक्ति तुम्हारे अन्दर है, वह सब माता के चरणों में माता के ही कार्य के लिये पूर्ण समर्पण हो ये ही तो इस मुक्ति के लक्षण हैं। धन और उसके उपयोग के सम्बन्ध में मन की कोई चंचलता, कोई माँग, कोई ईर्ष्या किसी-न-किसी अपूर्णता या बद्धता का निश्चित लक्षण है।
इस विषय में उत्तम साधक वही है जो दरिद्रता के साथ रहने को कहा जाय तो दरिद्रता के साथ रहे, किसी भी अभाव की वेदना उसे न हो और उसकी दैवी स्थिति के पूर्ण आन्तरिक आनन्द की क्रीड़ा में उससे कुछ भी बाधा न पड़े और वही फिर, वैभव के साथ रहने को कहा जाय तो वैभव के साथ रहे और अपने धन की आसक्ति या वासना में एक क्षण के लिये भी पतित न हो, या उन चीजों से भी आसक्त न हो जिनका वह उपयोग करता है, या उस भोग की दासता में न हो या धन की अधिकारिता द्वारा निर्मित अभ्यासों से दुर्बल की तरह आसक्त न हो। उसके लिये तो भगवान् की इच्छा और भागवत-आनन्द ही सब कुछ है।
दिव्य सृष्टि में धन शक्ति भगवती को ही पुनः प्राप्त कर देनी होगी और उसे एक सत्यमय, सुन्दर और सामंजस्यमय सजावट (संघटन) के लिये, उपयोग में लाना होगा। भगवती माता अपनी सृष्टिशक्ति-सम्पन्न दृष्टि के अनुसार जैसी व्यवस्था करेगी उसी व्यवस्था के अनुसार एक नवीन दिव्यालोकित प्राणमय और जड़मय जीवन का सिलसिला बाँधने के लिये इसका उपयोग करना होगा। पर इससे पहले यह धनशक्ति उनके लिये जीत कर लौटा लानी होगी और इस विजय यात्रा में वे ही सबसे अधिक बलवान होंगे जो अपने स्वभाव के इस अंश में प्रभावशाली और उदार और अहंकार रहित होंगे और अपने लिये कुछ माँगे बिना या बचाकर रखे बिना, निःसंकोच आत्मसमर्पित होकर भागवत महाशक्ति के युद्ध और बलवान् साधन बनेंगे।
जो दीन दुखियों को अपनाता है वही साधु है।
-तुकाराम
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कठिनाईयों पर विजय पाने के संघर्ष ही से व्यक्तित्व बढ़ता है।
-हेरल्ड डाउन्स
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जो लेखक अपने पाठक को अधिक ज्ञान प्रदान करता है ओर उसका समय कम लेता है, वही बड़ा लेखक है।
-सिडनी स्मिथ
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प्रत्येक जाति की पुण्य कीर्ति उसके लेखकों से उत्पन्न होती है।
-एस. जॉनसन
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जो लोग अपने और ईश्वर के बीच में जान बूझकर पाप कर्म करने का पर्दा डालते हैं। वे शाँति पूर्वक नहीं रह सकते।
-जार्जइलि
आज हमारे पास जो कुछ है भले ही उसे तुम्हारी बुद्धि ने, तुम्हारे श्रम ने कमाया हो, परन्तु उसको देने वाली न तुम्हारी बुद्धि है और न तुम्हारा श्रम। तुमसे भी बड़े-बड़े बुद्धिमान दुनिया में हैं और तुमसे भी अधिक श्रम करने वाले दुनिया में हैं लेकिन तुम्हारी कमाई उनसे भिन्न है। यदि सब कुछ बुद्धि या श्रम होती तो करने वालों की कमाई एक जैसी होती लेकिन ऐसा नहीं देखा जाता इससे स्पष्ट हो जाता है कि देने वाला तो कोई और ही है, हाँ देने के रास्ते बुद्धि या श्रम हैं। लेकिन यह देने वाला है कौन?
प्रायः सुना जाता है और देखा भी गया है कि जब मनुष्य का बुद्धिबल, श्रमबल, धनबल थक जाता है या चुक जाता है तब वह अपने लिए भगवान से माँगता है, और यह माँग उसकी पूरी होती है। लेकिन भगवान से हम चाहे माँगे चाहे न माँगे भगवान तो निरंतर हमें दे रहे हैं। हाँ यदि हम माँगेंगे तो हमें जो कुछ मिलेगा उसका ज्ञान रहेगा, यदि माँगेंगे नहीं तो भी जो कुछ मिलेगा उसके देने वाले भगवान ही होंगे, भले ही उसकी प्राप्ति में हम अपने ही किसी पुरुषार्थ को शामिल कर लें परन्तु इस पुरुषार्थ रूपी चित्रित पदार्थ के दाता भी तो एक मात्र भगवान ही हैं।
पहली चीज तो यह है कि भगवान स्वयं ही दाता रूप से मानव के अन्तस्तल में, हृदय देश में बैठे हुये मनुष्य की सारी कामनाएं पूरी करते रहते हैं। जब प्राणी मात्र को उत्पन्न करने वाले स्वयं भगवान हैं तब उसका भरण पोषण भी तो वे करेंगे। और करते हुए प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। जब प्राणी का जन्म होता है तब उसके योग क्षेम के लिए माता के स्तनों में दूध उत्पन्न कर देते हैं। यदि दूध वे उत्पन्न नहीं करते तो कौन सी प्रक्रिया है जिससे माँ के स्तनों से दूध भर दिया जाता है। क्या किसी मानव ने या किसी वैज्ञानिक ने ऐसा कोई आविष्कार किया है जिससे मानव यंत्र बनाकर उसमें अपने आप उत्पन्न होने वाले दूध को भर दिया हो।
मस्तिष्क में बुद्धि, मन आदि तत्वों को देकर प्राणी को क्रियावान् बनाना भगवान की प्राणी को महत्वपूर्ण देन है। शरीर में बल का संचार कौन कर जाता है जिसमें शरीर क्रियावान् होकर काम धाम करता है। उपयोग में आने वाले हवा-पानी-अग्नि को किसने बनाया है। क्या कोई व्यक्ति इन्हें बना सकता है। मनुष्य में ज्ञान की भावना को उत्पन्न करने वाला सिवाय भगवान के और कौन हो सकता है। तात्पर्य यह है कि देने में भगवान ने कतई कंजूसी का उपयोग नहीं किया। उन्होंने जो कुछ दिया है और सृष्टि में जो कुछ बनाया है, वह सारा का सारा मुक्त हस्त होकर प्राणी के उपभोग के लिए दे डाला है।
प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर जीवन और जीवनी शक्तियाँ बीज रूप से भगवान ने दे डाली हैं। बीज का जब तक उपयोग न किया जावे, जब तक उसकी शक्तियों को जगाया न जावे तब तक वह मूर्च्छित अवस्था में ही रहता है। मनुष्य के पास भगवान ने जो कुछ दिया है, वह महान है, अनन्त है लेकिन मूर्च्छित अवस्था में जो, उसे जगा कर उसका उपयोग करना जानते हैं, दुनिया में उनके लिए किसी प्रकार का भी अभाव नहीं रहता लेकिन जो बिना जगाये हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, वे भगवान की कृपा के अनाधिकारी होने के कारण उनकी दी हुई शक्ति को अपने लिए पंगु बना डालते हैं।
भगवान पूर्ण हैं और शक्ति के खजाने हैं जितनी शक्तियाँ भगवान में हैं, जो काम भगवान कर सकते हैं उन सबको बीज रूप से भगवान ने प्राणी को दे डाला है। इसीलिए उसके अन्दर अगाध ज्ञान का भंडार है, अगाध कर्म शक्ति है। जिस प्रकार माँ के स्तनों से दूध का भंडार भरा रहता है पर बालक जब तक उन्हें अपने मुँह से लगाकर उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं करता है तब तक स्तनों में दूध भरा रहने पर भी बच्चे को वह प्राप्त नहीं होता है उसी प्रकार कर्म शक्ति और ज्ञान शक्ति का निवास होने पर भी जब तक उनको दुहने की कला से प्राणी अपरिचित रहता है, तब तक भगवान की इस दिव्य देन का वह उपयोग नहीं कर पाता।
जिसे कि हम शिक्षा कहते हैं, वह भगवान की दी हुई शक्तियों को जो कि प्रत्येक प्राणी में बीज रूप से मूर्च्छित अवस्था में मौजूद है, उनको जगा-कर काम में लेने की विद्या सिखाती है। उपयोग में लाने की कला का हमें जितना अधिक ज्ञान होगा प्राप्त शक्तियों को जगाकर हम उतनी ही अधिक शक्तिमान हो सकते हैं।
यह हम पर ही निर्भर है कि हम उन शक्तियों का कितना उपयोग कर सकते हैं। भगवान ने शक्तियों का दान देने में किसी पक्षपात का आश्रय नहीं लिया है उन्होंने जो कुछ दिया है, समस्त प्राणियों को समान रूप से दिया है जैसे कि एक पिता अपने पुत्र को अपनी संपत्ति का बंटवारा समान रूप से करता है। लेकिन संपत्ति की रक्षा करना पिता पर ही नहीं पुत्र पर भी निर्भर करता है। कोई पुत्र संपत्ति को चौगुनी अठगुनी या सौ गुनी अधिक कर लेता है और कोई अपना सर्वस्व तक खो देता है। इसी प्रकार भगवान से पाई हुई शक्तियों का हाल है। जो उन शक्तियों को जगाकर उनका उपयोग करते हैं वे संसार के महान से महान व्यक्ति बन जाते हैं पर जो उन शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं वे पतन के गहरे गड्ढ़े में गिर पड़ते हैं तथा जो उन्हें जगाते ही नहीं, वो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते तथा भगवान को अथवा अपने भाग्य को कोसते रहते हैं वे अकर्मणा पुरुष दुनिया में जैसे आते हैं वैसे ही चले जाते हैं। उनकी वे शक्तियाँ उनके साथ ही सुप्तावस्था में समाप्त हो जाती हैं।
दान दाता ने तो प्राणी को इतना दिया है कि फिर उसे कही से कुछ भी माँगने अथवा पाने की आवश्यकता नहीं है लेकिन मूढ़ता एवं अज्ञानतावश प्राणी आज भी भिखारी बना हुआ है। उसने अपनी भीतर के अपार श्रद्धा स्रोत को सुखा कर भगवान की ओर से पीठ फेर ली है। जो शक्ति मानव के भीतर भरी हुई है और बाहर निकल कर उसे माला माल कर देने के लिए उछल रही है उसकी उपेक्षा करके मानव दर दर का भिखारी न बनेगा तो और क्या करेगा? भगवान को भूल कर उनकी शक्तियों को जागृत कर लेना कदापि संभव नहीं है। जिस दाता ने अपनी संपत्ति का दान दिया है उसकी कुँजी उसने अपने ही पास रख छोड़ी है और वह तभी प्राप्त हो सकती है जब मनुष्य श्रद्धा पूर्वक उसकी ओर मुड़े। क्या कोई बालक माँ की ओर पीठ फेर कर उसके स्तनों से दूध प्राप्त कर सकता है? दूध पाने के लिए सिर्फ रोना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि माँ की ओर मुँह करके स्तन चूसना भी आवश्यक हो जाता है। यही उसके उपयोग करने का तरीका तथा सोती हुई शक्तियों को जगाने का ढंग है। भगवान की ओर मुड़ कर श्रद्धापूर्वक उसके साथ सम्बन्ध स्थापित करके ही मनुष्य भगवान की दी हुई शक्तियों को जाग्रत कर सकता है।
भगवान की शक्तियाँ जब भगवान के साथ सम्बन्ध स्थापित करके जाग्रत कर ली जाती है और उनका उपयोग भगवान के लिए ही किया जाता है तो मनुष्य में अनेक दैवी गुणों की उत्पत्ति होना आरंभ हो जाता है। जैसे जैसे इन गुणों की वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे मनुष्य का हृदय दैवी भावनाओं से भर जाता है, यहाँ तक कि एक दिन ऐसा आता है जब कि वह भगवान के निवास करने की दिव्य पीठ बन जाता है, उस समय मनुष्य आनन्द की मूर्ति बना हुआ अपने आस-पास के सभी प्राणियों को मुक्त हस्त होकर आनन्द का वितरण करता है। तब दुःख और शोक नष्ट होकर भगवान के ताल स्वर के साथ मनुष्य अपने ताल स्वर को मिला कर नाचता हुआ अपनी जीवन लीला का संवरण करता है।
भगवान की सम्पत्ति पा लेने पर भी जो भगवान के लिए व्यय करने में कोताही करते हैं या उससे मुँह मोड़ लेते हैं, वे देकर विकास करने की कला से अनभिज्ञ रहने के कारण प्राप्त सम्पत्ति को निरंतर संकुचित करते रहते हैं और एक दिन ऐसा होता है जब कि उनके पास कुछ भी नहीं बचा रहता है।
जितनी सम्पत्ति है, जितनी शक्तियाँ हैं-समस्त भगवान की है, भगवान ने ही उसे दिया है लेकिन भगवान को भूलकर अज्ञानी लोग अपने अहंकार से देने की क्रिया भुलाकर अपने आनन्द को नित्य प्रति खोते रहते हैं और अपने लिए शोक और दुःख का बीज बोते रहते हैं। दाता की सम्पत्ति का उसकी इच्छानुसार वितरण न करके मनुष्य अपने इस लोक के सुखों से तो वंचित होता ही है साथ-साथ परलोक को भी बिगाड़ देता है।
भगवान ने संसार के समस्त प्राणियों को अपार आनन्द शक्ति का दान किया है लेकिन मानव अपनी ही मूढ़ता से उसका वितरण न करके उसे खो बैठता है। बिना वितरण किये उसे स्वयं भी आनन्द का अनुभव नहीं हो पाता। इस प्रकार वह नित्य प्रति मृत्यु का आह्वान करता रहता है। लेकिन मानव जीवन का लक्ष्य मृत्यु नहीं है, लक्ष्य में अमरता। परन्तु भगवान को भुलाकर जहाँ वह उनकी देन को ठुकराता है वहाँ वह अपने लक्ष्य से भी हट जाता है।
(ले. पं. दुर्गाप्रसाद जी शास्त्री)
संसार में सुख और शान्ति उत्पन्न करने के लिये मनुष्य को परम पुरुषार्थ की बड़ी भारी आवश्यकता है। यह संसार भलाई और शक्ति से घिरा हुआ है और यह सज्जन और बलवान मनुष्य की रक्षा भी करता है। जो मनुष्य सब से अधिक बलवान होता है, उसी की विजय होती है-जो मनुष्य अपने को भलाई और परोपकार में लगा देता है उसे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि झूठ और अनर्थ का नाश हुआ। इसलिये वह उस स्थान पर खड़ा होता है, जहाँ त्याग का अन्त होता है, और चारों तरफ लाभ दिखाई देता है।
अज्ञानी मनुष्य अपनी शक्तियों को विषय वासना और क्षणिक विचारों और निष्प्रयोजन दूसरों को हानि पहुँचाने में नष्ट कर देते है, और दूसरों को सुखी देख कर हमेशा अपने भाग्य को कोसते हैं। ऐसे मनुष्य संसार में न तो स्वयं सुखी होते हैं, और न किसी की भलाई ही कर सकते हैं। ऐसे मनुष्य आकृति मात्रा से तो मनुष्य दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु वास्तव में वे मनुष्य नहीं हैं।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य साहस, सभ्यता, दयालुता और आत्म निर्भरता है। जिन मनुष्यों में यह गुण नहीं है, वे मिट्टी के खिलौने की भाँति हैं, उनमें कुछ भी शक्ति और स्थिरता नहीं होती। वे सच्चे जीवन का कुछ भी सुख नहीं भोग सकते, और न स्वतन्त्रता का सच्चा आनन्द अनुभव कर पाते हैं मनुष्य जीवन का उद्देश्य गिरे हुओं को उठाना, निर्बलों की सहायता करना, दीनों और अनाथों को अपनाना तथा दूसरों की सदैव सेवा करना है। समझदार मनुष्यों को यह भली प्रकार समझ लेना चाहिये कि यह संसार सृष्टि है न कि प्रलय। वह किसी निश्चित नियम पर निर्धारित है। यही कारण है कि इसमें अन्यायी और अत्याचारी बहुत समय तक नहीं ठहर सकते।
क्या कोई भी मनुष्य संसार में सुखी हो सकता है, यदि उसके साथी दुखी हों। जैसे यदि कोई यह समझ ले कि संसार भर में अज्ञानरूपी अंधकार छाया रहे और प्रकाश उस तक पहुँचता रहे। रोग के कीटाणुओं की भरमार हो जाय और वह स्वस्थ बना रहे। देश में दुर्भिक्ष हो और वह आनन्द करता रहे। देश भर का वायुमण्डल दुराचार से भर जाये और उस पर कोई प्रभाव न पड़े। देश अवनति के घोर रसातल में चला जाये और वह उन्नति के उच्च शिखर पर बैठा रहे देश में दारिद्रय और दुर्भिक्ष का वास हो, और वह आनन्द से अपना जीवन व्यतीत करता रहे यह कदापि नहीं हो सकता। जो दूसरों की भलाई नहीं कर सकता, वह सुखी कभी नहीं रह सकता जो संसार को अज्ञान में रखना चाहता है, उसे ज्ञान की आशा छोड़ देनी चाहिए। जो दूसरों को अशुद्ध देख कर उनसे घृणा करता है, वह संसार में कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जो दूसरों को नीच और अस्पृश्य कह कर उनकी छायामात्र से भय खाता है, वह एक दिन अवश्य ही अस्पृश्य हो जायगा। जो दूसरों को गिराना चाहता है, उसका एक दिन पतन अवश्यंभावी है। इसलिये मनुष्य को चाहिये कि जो उसके जीवन का उद्देश्य है, उसे भले प्रकार समझ कर सद्विचार, साहस, शान्ति और स्वतन्त्रता से अपना जीवन व्यतीत करे।
मनुष्य के भीतर एक प्रकार की पाशविक शक्ति पाई जाती है जो समय-समय पर रूप बदलती रहती है। परन्तु क्रोध और आवेश के समय वह मनुष्य को अन्धा बना देती है, जिससे वह मनुष्यता को भूल कर आत्म-गौरव और श्रेष्ठता को भी तिलाँजलि दे बैठता है। मनुष्य अपना शत्रु आप है। वह काम-क्रोधादि दोषों से अपना स्वयं नाश कर बैठता है। ऐसा मनुष्य सदैव अपने को धिक्कारता रहता है, और इसी प्रकार अपने आत्म गौरव को भी खो बैठता है। संसार तत्व पर स्थिर है, यदि हम इस नियमबद्ध संसार में स्वतन्त्र और स्वाधीन रहना चाहते हैं, तो हमारे स्वतन्त्र विचार होने चाहिये, और हमें दूसरों के स्वतन्त्र विचारों का आदर करना चाहिये। यदि हम दृढ़ और पुरुषार्थी बनाना चाहते हैं, तो हमको दृढ़ और उदार होना चाहिये। और यदि हम जीवन के दुःखों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें तुच्छ और घृणित विचारों का समूह नाश कर देना उचित है। यही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। मनुष्य को अपना जीवन अपनी मुट्ठी में रखना चाहिये कि उसे जब चाहे उठाले और जब चाहे नीचे रख दे। जो मनुष्य प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है, वह बड़ा अपराध करता है और यही सब दुःखों का मूल है। अज्ञानतावश वह यह समझता है कि मैं प्रकृति के नियमों पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ। यह उसकी बड़ी भारी भूल है।
मनुष्य को यह भली भाँति जान लेना चाहिये कि वह बाह्य पदार्थों पर शासन नहीं कर सकता हाँ, अपने ऊपर शासन कर सकता है। वह दूसरों की इच्छाओं को अपने वश में नहीं कर सकता, परन्तु अपनी इच्छाओं को अपने वश में कर सकता है। तुम्हारी शक्ति तुम्हारे साथ है, तुम चाहो तो उसे बुरे कामों में लगा सकते हो। चाहे उसके द्वारा अपना स्वार्थ सिद्ध करो चाहे भलाई के मार्ग में लगा दो। इसी से तुम पशु बन सकते हो और इसी से देवता। अपने विचारों को सन्मार्ग पर लगाओ, अपनी कुत्सित इच्छाओं को मन से निकाल दो। यही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
बदले की इच्छा की आशा से पुण्य या परमार्थ करना ठीक नहीं। परमार्थ का सब से बड़ा लाभ आत्म संतोष, बल वर्धन है। सेवा की महानता और पवित्रता को कायम रखने के लिए इसी भाव से उन्हें करना चाहिए।
लोक सेवा के तीन प्रकार हैं, (1) परोक्ष सेवा (2) प्रत्यक्ष सेवा (3) सह सेवा। परोक्ष सेवा वह है-जो अपना कार्यक्रम निर्दोष निष्पाप, लोक हितकारी रखते हुए जीवन यापन किया जाये। प्रत्यक्ष सेवा उसको कहते हैं-जिसमें जीवन का प्रधान कार्य, सार्वजनिक कार्यों में लगे रहना होता है। सहसेवा वह है जिसमें मनुष्य अपना बचा हुआ समय दूसरों की सहायता में लगाता है या आवश्यकता पड़ने पर अपने दैनिक कार्यों में से परहित के लिए समय निकाल लेता है।
जो व्यापारी अभक्ष, मिलावटी नकली, खराब, कमजोर चीजें नहीं बेचता वरन् उपयोगी वस्तुएं बेच कर जनता की अभाव पूर्ति करता है, तौल, नाप, प्रामाणिकता और भाव में ईमानदारी बरतता है वह व्यापारी परोक्ष लोक सेवक है। यद्यपि वह अपने व्यापार को व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से ही चलाता है पर उसमें यह ध्यान रखता है कि यह कार्य दूसरों के लिए भी उपयोगी हो। ऐसे व्यवसाय से व्यापारी अपना उतना लाभ नहीं कर पाता जितना बेईमान दुकानदार कर लेते हैं फिर भी निश्चित रूप से उसकी ईमानदारी एक प्रकार की लोक सेवा है। इसी प्रकार कोई भी किसान, मजदूर, वकील, वैद्य, सरकारी कर्मचारी, कारीगर, अध्यापक, वैज्ञानिक, ईमानदारी से अपने कर्त्तव्य का पालन करता हुआ अनीति के द्वारा धन संचय का लाभ त्याग कर परोक्ष लोक सेवा के पुण्य का भागीदार हो सकता है।
प्रत्यक्ष सेवा की प्रत्यक्ष सेवाओं की, वर्तमान समाज में अत्यधिक आवश्यकता है। कारण यह है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में ऊंच नीच, धनी निर्धन, शासक शोषित, शिक्षित अशिक्षित, किसान जमींदार, सेठ मजदूर की बड़ी भारी विषमता फैली हुई है। सरकारी ढाँचा भी ऐसा बोदा है कि वह निर्बलों, गिरे हुए लोगों एवं विपत्ति ग्रस्तों की अधिक सहायता नहीं कर सकता। ऐसी दशा में कमजोरों की हिमायत करने उनकी तकलीफें दूर करने और ऊंचा उठाने के लिए सार्वजनिक कार्यकर्ता न हों तो पीड़ितों के कष्टों का ठिकाना न रहेगा। कितने ही उदार हृदय, दयालु भावना वाले, स्वार्थ त्यागी मनुष्य अपने आराम और लोभ को त्याग कर सार्वजनिक आन्दोलनों, संस्थाओं, सेवा केन्द्रों का संचालन करते हैं और गुजारे के लिए अनायास जो प्राप्त हो जाता है उसमें जीवन यात्रा चलाते रहते हैं। इस वर्ग को लोक सेवक न कह कर लोक सैनिक कहना उपयुक्त होगा। सैनिक अपना सारा समय राष्ट्र रक्षा में लगाता है और प्राण देने तक का त्याग करने के लिए हर घड़ी तैयार रहता है यही स्थिति लोक सैनिकों की होती है।
तीसरे सह सेवक हैं जो अपना कार्य ईमानदारी और समाज हित का ध्यान रखते हुए करते हैं साथ ही सार्वजनिक कार्यों के लिए यथाशक्ति कुछ न कुछ समय निकालते रहते हैं। उपयोगी संस्थाओं के कार्य में हाथ बटाना, सद्गुणों को बढ़ाने की सहायता करने एवं सत्कार्यों में प्रोत्साहन देने के लिए प्रयत्नशील रहना सद्सेवकों को बड़ा रुचिकर होता है। अपनी जीवनचर्या चलाने के लिए वे कमाते हैं साथ-साथ सेवा के अवसरों को भी हाथ से नहीं जाने देते। कोई विशेष आवश्यक सेवा सामने आ जाये तो अपना काम हर्जा करके भी उसे पूरा करते हैं।
परोक्ष सेवक होने की प्रत्येक नागरिक से आशा की जाती है। जो बेईमानी, बदमाशी ओर अनीति का आश्रय लेकर कमाता है वह कानूनी पकड़ एवं जनता की घृणा से बचा रहते हुए भी पापी एवं लोक घाती है। उसका वैभव कितना ही बढ़ जाये, चाटुकार उसे कितना ही घेरे रहें पर वह आत्म हत्यारा धर्मद्रोही होने के कारण ईश्वर के दरबार में अपराधी ठहराया जायगा। धर्म की, आत्मा की हर व्यक्ति से यह पुकार है कि वह पुण्य पथ पर अधिक अग्रसर न हो सके तो कम से कम ईमानदार नागरिक, चरित्रवान मनुष्य एवं परोक्ष लोक सेवक तो अवश्य ही बने। इस मर्यादा से नीचे गिरने वाला मनुष्य तो अपनी महानता के उत्तर दायित्व से भी गिर जाता है।
लोक सैनिकों को अपने पारिवारिक भारों को कम से कम रखना चाहिए। ऐसे व्यक्ति अविवाहित रहें तो सबसे अच्छा। विवाहित हों तो आगे के लिए संतान पैदा करना बंद कर दें। आश्रितों के लिए कोई ऐसा आधार बना सके कि वे उसकी सहायता की अपेक्षा न रखें तो सबसे अच्छा है। आश्रितों के आर्थिक उत्तरदायित्वों से लदा हुआ मनुष्य प्रायः ईमानदारी से, पूरी दिलचस्पी और शक्ति के साथ सार्वजनिक सेवा नहीं कर पाता। प्राचीन काल में वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था इसी लिए थी कि उस समय तक पर्याप्त मात्रा में अनुभव और ज्ञान इकट्ठा कर लें और छोटे बालकों के पालन पोषण के भार से निवृत्त होकर अपना शेष समय सार्वजनिक सेवा में लगाया जा सके । पर अब तो वह शृंखला भी टूट गई हैं इसलिए गृहस्थों को ही लोक सैनिक, सार्वजनिक कार्यकर्ता बनना पड़ता है। ऐसी दशा में वे कामचलाऊ वेतन लें तो इसमें कुछ अनुचित बात नहीं है।
सह सेवकों के लिए आकस्मिक या स्वल्पकालीन सेवाओं का वेतन या मुआवज़ा लेना निषिद्ध है। यदि लोग ऐसी छोटी मोटी सेवाओं का भी प्रतिफल माँगने लगे, लेने देने का प्रचलन हो गया तो सेवा की प्रथा और पवित्रता पूर्णतया नष्ट हो जायगी।
किसी के यहाँ मृत्यु हो जाने पर पास पड़ोस के लोग बिना कुछ मुआवज़ा लिए उस मृतक की अंत्येष्टि करने के लिए श्मशान को ले जाते हैं। यदि मुआवज़ा लेकर मुर्दा उठाने का रिवाज चल पड़े तो आज अंत्येष्टि में जाना जैसा पवित्र धर्म कार्य माना जाता है फिर वैसा न रहेगा। लोग मुर्दाफरासी का पेशा करने लगेंगे। इससे तो निर्धन जो अपने स्वजन की मृत्यु से दुखी है और भी अधिक कष्ट में पड़ जायेंगे। विवाह, शादी, रंजगमी, बीमारी मुसीबत में लोग एक दूसरे की सहायता बिना कुछ लिए करते हैं। पर्वों, उत्सवों, मेलों पर आने वाले स्त्रियों के लिए लोग सेवा समितियों द्वारा जल आदि की व्यवस्था करते हैं।
बाढ़, अग्निकाण्ड, भूकम्प, अकाल, मैला प्रबंध आदि में स्वयं सेवक सेवा कार्य करके दुखियों की सेवा करते हैं। सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यकर्ता प्रायः अवैतनिक ही होते हैं। धार्मिक कथा, कीर्तन, यज्ञ, प्रचार जुलूस आदि में लोग श्रद्धा पूर्वक अपना समय देते हैं। यदि इन सब बातों के लिए वेतन मुआवज़ा या मजदूरी लेने की प्रथा चल पड़े तो एक ऐसी सत्यानाशी परम्परा कायम हो जायगी जिसके कारण सेवा नाम के पवित्र तत्व के लिए मानव जीवन में कोई स्थान ही न रह जायगा।
आत्मिक समृद्धियों में दैवी सम्पदाओं में सेवा सबसे बड़ी संपदा है। लोग भौतिक धन, ऐश्वर्य को इकट्ठा करने के लिए दिन रात चिन्ता और परिश्रम करते हैं। पर खेद की बात है कि आत्मा के साथ रहने वाली जन्म−जन्मांतरों तक सुख देने वाली आत्मिक सम्पत्ति सेवा की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। जब तक सेवा भावना का जीवन में पर्याप्त संमिश्रण नहीं किया जाता तब तक कोई व्यक्ति आत्मिक शक्ति नहीं पा सकता, चाहे वह कितना ही धनी या पदाधिकारी क्यों न हों।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
सम्भाषण काल का सर्वप्रथम नियम यह है कि दूसरे के “अहं” के विस्तार या फैलाव का खुला अवसर मिले। हममें से प्रत्येक अपने “अहं” के प्रकाश का अवसर देखा करता है। उसके मन में नाना प्रकार के कटु और मधुर अनुभव, भाँति-2 की स्मृतियाँ, अपनी दिलचस्पी, खूबियाँ या मजबूरियाँ प्रकट करने की गुप्त इच्छा वर्तमान रहती है। जब आप बातें करें, तो यह ध्यान रखिये कि दूसरे को भी अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर प्राप्त हो। अपनी ही अपनी मत हाँकते रहिये प्रत्युत दूसरे की भी सुनिये। दूसरे के “अहं” को कुचल कर आप बातें आगे नहीं चला सकते। यदि आप दूसरे की न सुनेंगे तो कुछ काल पश्चात् उसका ढाढ़स विलुप्त हो जायगा और वह आपकी बातचीत में दिलचस्पी न लेगा।
अपना दृष्टिकोण इस प्रकार कीजिए कि दूसरे पर अनावश्यक जोर न पड़े। वह उन्मुक्त गति से बोलता रहे तथा अपनी व्यथा का भार हलका कर सके ।
आप दूसरों की सुनिये। संसार में सब लोग अपनी बात दूसरों को सुनाने के लिए आतुर हैं। दूसरों को सुनाने से वे एक संतोष, एक हलके पन का अनुभव करते हैं। उन्हें इस हलके पन का अनुभव करने दीजिये। इसके लिए यह आवश्यक है कि आप उनसे ऐसे प्रश्न पूछे जो उन्हीं से सम्बंधित हों। जिनमें उनकी थकी हुई मनोवृत्तियाँ तथा गुप्त अनुभव आपके सामने प्रकट हो सके। दूसरे की सब बातों को ध्यान से सुनिये, सम्वेदना और सहानुभूति का शीतल जल उनके घावों पर छिड़किए उनकी वीरता, तर्क, बुद्धिमता, ईमानदार विश्वास की उच्चता पर प्रसन्नता प्रकट कीजिये।
सत्यता और यथार्थवादिता की प्रशंसा कीजिये, ज्ञान, विज्ञता, और अध्ययन को स्वीकार कीजिये, उदारता, कुलीनता और प्रचुरता की दाद दीजिये जितनी दिलचस्पी आप उसकी आत्मनिर्भरता, स्थिरता, संतुलन सुस्थिरता में लेंगे, उतने ही आप उसे आकर्षक प्रतीत होंगे। चुपचाप दूसरे की सुनना बातचीत की कला की सफलता का एक गुण है। यदि आप शान्ति से दूसरों के दुख दर्द, पारिवारिक समस्याएं और कठिनाइयाँ सुनेंगे, तो सदैव उनके प्रिय बन सकेंगे।
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आयु, स्वभाव, पेशा, दिलचस्पी, काल, परिस्थिति, मनोभाव के अनुसार बातचीत करना पसन्द करता है। बच्चों में गंभीर दर्शन शास्त्रों का विवेचन व्यर्थ है, विद्वान से बच्चों जैसी सरल बातें करना मूर्खता है। आनन्द में आनन्द और दुःख निराशा में सम्वेदना तथा सहानुभूति पूर्ण बातें ही रोचक प्रतीत होती हैं। अतएव सर्वप्रथम यह अनुमान लगाइये कि दूसरा व्यक्ति किस मनःस्थिति में है। उसकी मुखमुद्रा अनुभव, अंग संचालन, देख कर आप यह अनुमान बहुत अंशों में कर सकते हैं। यदि मूड पहचानने में आप गलती नहीं करते हैं, और उसी से मेल खाने वाला विषय प्रतिपादन करते हैं, तो बात आगे चलेगी अन्यथा दूसरा व्यक्ति एक संक्षिप्त उत्तर के पश्चात् चुप हो जायगा।
सम्भाषण में मुख मुद्रा चेहरे पर नाना भाव-विभाव का प्रकाशन विशिष्ट स्थान रखता है, साहित्य में जिन नव रसों का विधान हैं उनका प्रकाशन मुखमुद्रा एवं भाव भंगिमा से होना अपेक्षित है। यदि दूसरे की हास्यात्मक उक्ति सुन कर आप उत्फुल्लित न हुए, करुण कहानी सुन कर व्यथा की सम्वेदना के भाव आपके मुख पर प्रतिबिम्बित न हुए, या तर्क और गंभीर चिंतन ने आपको विचारशील न बनाया, तो दूसरे को आप पर कैसे विश्वास हो सकता है? वह आपका हृदय नहीं, मुख देखता है, उसकी प्रत्येक मुस्कान, लकीरें, भाव-भंगिमा, नेत्र संचालन, भ्रू-भंगिमा पढ़ता है। आपको अपने नाना भावों को एक सफल अभिनेता की भाँति चेहरे पर प्रकाशित करने की कला सीखनी चाहिए। करुणा, क्रोध, प्रेम, शान्ति, उल्लास, रौद्र, वीभत्स, इन सभी भावों के प्रकाशन की आवश्यकता सम्भाषण में पड़ सकती है। चुने हुए स्थानों पर विशेषतः भावावेश में अंग संचालन करना बातचीत को प्रभावशाली बनाता है। पत्थर की मूरत की भाँति निश्चेष्ट न खड़े रह कर सजीव भावुक की भाँति क्रियाकलाप करना बातचीत में नव स्फूर्ति नई-चेतना और उत्साह भरता है।
सम्भाषण कला एक सजीव, सप्रमाण कला है। सजीवता के तत्व का अधिक से अधिक समावेश बातचीत में कीजिये। सजीवता की सृष्टि करने वाले तत्वों को समझ लीजिए- (1) हास्य और प्रसन्नता (2) चुटीलापन-आपकी बातचीत में सरसता होनी चाहिए (3) ऐसे प्रसंगों, व्यक्तिगत अनुभवों, प्रमाणों, पुराने दृश्यों का उल्लेख कीजिये जिससे बातचीत का प्रवाह और क्रम अबाध रहे। दूसरों के साथ हंसिये और उसी भाव का प्रकाशन मुख पर कीजिये।
आपकी बातचीत संक्षिप्त, मर्मस्पर्शी, वाक् वैदग्ध्यमुक्त हो और मुख्य विषय को आगे बढ़ाने वाली हो। उसमें क्रमानुसार चढ़ाव हो तथा वह एक चरम सीमा पर परिसमाप्ति प्राप्त करे।
बातचीत में स्वाभाविकता की नितान्त आवश्यकता है। ऐसे शब्दों का प्रयोग मत कीजिये जो अति गूढ, साहित्यिक या जटिल हों, या ऐसे अवतरणों का प्रयोग मत कीजिये जिसे दूसरा व्यक्ति न समझता हो। यदि आप विद्वान हैं, तो अपनी विद्वता कठिन, भारी भरकम, जटिल, शब्दावली द्वारा प्रदर्शित न कीजिए प्रत्युत सरल, सीधी, रोजमर्रा की भाषा का प्रयोग कीजिये।
यह ध्यान रखिये कि आपकी बातचीत वाद-विवाद का रूप ग्रहण न कर ले। बहस होने से कटुता और क्रोध की उत्पत्ति हो सकती है। इसी प्रकार वह भी ध्यान रखिये कि कहीं आप उपदेशक का रूप ग्रहण कर व्याख्यान न झाड़ने लगें, जिससे आपके वक्तव्य लम्बे, और निष्प्राण न हो जाय।
मित भाषण के साथ आपकी उक्तियों और विषय प्रतिपादन में तड़प व मर्म स्पृश्यता अनिवार्य है। आपका प्रत्येक वाक्य छोटा होते हुए भी अपना निजी महत्व रखता हो, चुस्त और सजीव हो, आपके चरित्र, तथा मनोभावनाओं का, प्राणों का उसमें स्पंदन हो।
(डॉक्टर लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एन. डी.)
यह तो हम जानते ही हैं कि अन्न को जठराग्नि पचाती है। और अन्न न देने पर वह दोषों को पचाती है। वस्तु, मात्रा तथा समय का ध्यान रख कर यदि भोजन न किया जायेगा तो खाने से विकार पैदा होगा। उदाहरणार्थ यदि ‘वस्तु’ का ध्यान रख कर हम नहीं खाते, अर्थात् अन्न के साथ यदि फल, फूल, शाक, तरकारी नहीं खाते, या मात्रा का ध्यान रख कर हम नहीं खाते अर्थात् भोजन वास्तविक भूख समाप्त होते ही हम बंद नहीं कर देते या समय का ध्यान हम नहीं रखते अर्थात् बिना भूख लगे ही हम खाते हैं तो ऐसा भोजन हमें हानि पहुँचायेगा। प्रकृति के सारे कार्य धीरे-धीरे और वास्तविक भूख समाप्त होने ही हम बंद नहीं कर देते या समय का ध्यान हम नहीं रखते अर्थात् बिना भूख लगे ही हम खाते हैं तो ऐसा भोजन हमें हानि पहुँचायेगा। प्रकृति के सारे कार्य धीरे-धीरे और बंधे नियमों के आधार पर होते हैं। आज ही हम गलत भोजन करें और आज ही हम रोगी हो जायें ऐसा प्रायः नहीं होता।
उपवास एक प्रकार से गलत भोजन करने का प्रायश्चित है। दोषों को पचाने वाली चीजें उपवास में हैं। दोषों को पचाने में कुछ कष्ट होता है। दोष हमारी गलती से होते हैं। यदि दोष भीतर जलते हैं तो हम उसे ‘ज्वर’ कहते हैं और जब दोष बाहर निकलता है तो हम उसे ‘कफ’ आदि कहते हैं। इस प्रकार से ‘रोग‘ प्रकृति द्वारा शरीर के अन्दर संचित विजातीय द्रव्यों के बाहर निकालने के प्रयत्न का रूप है अस्तु ‘रोग‘ जिसका नाम सुन कर काँप जाते हैं, एक प्रकार से हमारे मित्र हैं, शत्रु नहीं।
तीनों विकारों-पित्त, कफ, वायु को जठराग्नि पचाता है वैश्वानर को यदि हम अवकाश दें तो वह दोषों को पचायेगा। यह उपवास है। तेज बुखार हमसे कहता है-अब मत खाना, यह अंतिम चेतावनी है।
लगातार भोजन करने से दोष अधिक हो जायेंगे तब यदि हम पेट को भोजन न देंगे तो कष्ट होगा। जितना ही शरीर में विजातीय द्रव्य होगा, उपवास काल में उतना ही कष्ट होगा। याद रहे झाडू गर्द नहीं होती, गर्द तो पृथ्वी में होती है। इसी भाँति शरीर में उपवास के कारण कष्ट नहीं होता वरन् कष्ट तो उन विकारों के कारण होता है जो हमारे शरीर में होते हैं।
उपवास करने से सफाई होती है। एक तो हम नित्य-नित्य घर में झाड़ू लगाते हैं। फिर हर इतवार को अर्थात् प्रति सप्ताह पर्याप्त सफाई करते हैं। और वर्ष भर में एक बार दीपावली के अवसर पर तो पूरे घर भर की सफाई होती है सफेदी आदि पोत कर। यही लाभ उपवास के संबंध में होना चाहिए। नव दुर्गाओं के अवसर पर ऋतु परिवर्तन होता है तथा रोगों का तब प्रकोप होता है। अतः 9 दिन नव रात्रि में हम बड़ी सफाई (वार्षिक) उपवास द्वारा करें। नित्य प्रति के उपवास यह है कि 12 बजे दोपहर के पहले भोजन न करे तो हमारा अर्ध उपवास हो जायगा। सप्ताह में एक बार या प्रति प्रदोष तथा एकादशी आदि का व्रत रखें तो यह साप्ताहिक उपवास हुआ।
शरीर में विकार के कारण ही कष्ट होता है। जितना ही हमारा शरीर मल रहित होगा, या मल रहित होता जायेगा, उतना कम कष्ट भय होगा या होता जायेगा। जैसे गर्द वाले फर्श में झाड़ू देने से तो गर्द उड़ेगी, पर साफ आँगन में झाड़ू देने पर गर्द नहीं उड़ेगी। गर्द उड़ेगी, इस डर से क्या हम झाड़ू ही न लगाएं? प्रारंभ में गर्द का कष्ट तो उठाना ही पड़ेगा और उसके बाद फिर ‘सफाई’ का आनन्द प्राप्त होगा।
बारह बजे दोपहर तक (मल बाहर निकालने का) काल है। अब जब माँस ही बनाता है तो सुबह ही क्यों खाया जाये? पानी शरीर के विकार को घोल कर बाहर निकालता है। इसी से जो प्रातःकाल पर्याप्त जल पीते हैं वह जानते हैं कि कितना खुल खुल कर पेशाब होता है।
ठंडा जल शक्तिवर्धक होता है और गरम जल संचारक होता है। ठंडे जल से जो जितना नहायेगा उतना ही शरीर मजबूत बनेगा। परन्तु ‘अहिंसा’ का सदा ध्यान रखे। यदि कमजोर शरीर के ठंडा पानी माफिक न पड़े तो बहुत ठंडे पानी से नहाना शरीर के साथ ‘हिंसा’ होगी। धीरे-धीरे वह ठंडे जल का अभ्यास करे।
क्रिया के बाद प्रतिक्रिया सदा होती है। जितनी ही प्रतिक्रिया हो और अच्छी प्रतिक्रिया हो, उसी हिसाब से ठंडा पानी दे। उपवास के साथ पीने नहाने या एनेमा के रूप में जल का अटूट सम्बंध है अतः जल का महत्व अत्यधिक है।
जब पेट को भोजन मिलता है तो वैश्वानर भोजन को पचाने का कार्य करने लगता है। भोजन न मिलने पर वह दोषों को उभार कर उन्हें पचाने में लग जाता है। जब उसने दोषों को पचाने का कार्य आरम्भ कर दिया है और उन उखड़े हुए दोषों के रूप में परिभ्रमण के कारण हमें कष्ट हो रहा हो जैसे जी मिचलाना, सरदर्द आदि और तब हम भोजन कर लें, तो नतीजा यह होगा कि उभरे हुए दोष झट से दब जायेंगे। हमारा वैश्वानर दोषों को पचाना छोड़ फिर अन्न पचाने में लग जायेगा तथा हमारे शारीरिक कष्ट शाँत हो जायेंगे।
यदि इतनी सी बात हम समझ लें तो भोजन तथा उपवास के सिद्धान्त को हम समझ गए। भोजन केवल माँस बनाता है, शक्ति नहीं देता। शक्ति तो केवल उस रहस्यमयी वस्तु से प्राप्त होती है जिसे हम प्रकृति, ईश्वर या ऐसा ही कुछ नाम देते हैं। मेरी बात संभव है 99 प्रतिशत लोगों को ठीक न जंचे। किन्तु बहु संख्या ही, सत्यता का प्रमाण नहीं है। आत्म शुद्धि तथा ईश्वर परायणता से वास्तविक शक्ति प्राप्त होती है। शरीर की शक्ति इससे उतरती है और इसके उतरने पर शरीर स्वतः स्वस्थ हो जाता है। यही कारण है कि उपवास काल में मनुष्य आत्मा या ईश्वर के अति निकट होता है।
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(प्रो. मोहन लाल वर्मा, एम.ए., एल.एल.बी.)
जितनी तेज गर्मी पड़ेगी, उतनी ही रोगों से ग्रसित होने की संभावना अधिक है। तेज धूप तथा गर्म हवा में आने से, तेज गर्मी के समय हवा बन्द हो जाने से, गर्मी में मद्य का उपयोग करने से अथवा रेल के छोटे से डिब्बे में बैठने से भेड़ बकरियों की भाँति भर जाने से एक दम शरीर गर्म हो जाता है। रक्त में गर्मी का ताप क्रम अधिक होने के कारण कभी-कभी ज्वर तथा लू लगना, सर दर्द, जी मिचलाना, हैजा, वमन, प्यास, नकसीर इत्यादि प्रारंभ हो जाती हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्दी अधिक लाभदायक है। गर्मी में स्वास्थ्य बनाने के लिए प्रायः अमीर लोग ठण्डे प्रदेशों में जाया करते हैं।
गर्मी का सबसे प्रधान रोग हैजा है। साधारणतः एक साथ दस्त और फैडडडड होना इसके लक्षण हैं। किन्तु इतना ही यथेष्ट नहीं है। कभी-कभी मामूली बदहजमी को हैजा मान कर लोग अनावश्यक रूप से भयभीत हो जाते हैं। सबसे बड़ी पहचान यह है कि हैजे की उल्टी एवं दस्तों से शीघ्र ही बड़ी कमजोरी का अनुभव होता है। रोगी का बदन टूटता है, तबियत बहुत घबराती है, प्यास निरन्तर वृद्धि पर रहती है। हैजे में रोग वृद्धि पर मूत्र बन्द हो जाता है। ज्वर प्रायः नहीं रहता। प्रारम्भिक अवस्था में मूत्र आता रहता है, पर वमन के अतिरिक्त पेट में दर्द बढ़ जाता है। प्यास तो रुकती तक नहीं। यदि इस रोग का आक्रमण तीव्र हो जाय तो मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है। निर्बलता और प्यास यदि वृद्धि पर ही रहे तथा नेत्र भीतर धंस जायें, तो जान का खतरा समझना चाहिए और तुरन्त किसी वैद्य या डॉक्टर से सलाह करनी चाहिए।
हैजा छूत का रोग है और जिनका उदर ठीक नहीं रहता, उन पर प्रायः इस रोग का आक्रमण शीघ्र होता है। अतः हैजे के दिनों में शरीर, वस्त्र, गृह की स्वच्छता का पूर्ण ध्यान रखिये। मन में भयभीत न रहें। साधारण सावधानी रखने से काफी बचाव हो जाता है। यह रोग प्रायः पानी के द्वारा फैलता है अतः जल को उबाल कर काम में लीजिए। बिना उबला हुआ जल कभी न पिएं। इन दिनों बाजार में बिकने वाला बर्फ, सोडा, दूध इत्यादि भी न पीना चाहिए। बाजार की मिठाइयां, चाट, कच्चा दूध, चुसकी और गुड़ इत्यादि काम में न लें। जो खाद्य पदार्थ खुले हुए बाजार में बिकते हैं, उन्हें न लेना ही हितकर है। खीरा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज इत्यादि फल और मेवे ताजा ही काम में लेवें। चाट पकौड़ी तथा आवश्यकता से ज्यादा खाना छोड़ दें। इसका यह अभिप्राय भी नहीं कि आप बिल्कुल खाली पेट रहें। साधारण रूप से उतना ही खाइये जितना पच सके। मक्खियों से सावधान रहिये। हैजे के दिनों में कोई दस्तावर दवा न लें। कसरत और अधिक परिश्रम न करें। साधारण गति से जीवन क्रम चलने दें। जो रोगी ठीक अच्छा हो जाय, उसके वस्त्रों को खूब गर्म जल में धुलाना और मकान को खूब स्वच्छ रखना चाहिए।
हैजे के दिनों में थोड़ी थोड़ी मात्रा में सिरका, अदरक, प्याज और हींग प्रयोग में लाना बड़ी गुणकारी है। ये सभी वस्तुएं उदर तथा स्वाद को बनाये रखती हैं।
वैद्य श्री गोपीनाथ के अनुसार निम्न इलाज बड़े गुणकारी हैं। प्रारम्भ में एक दम दस्त और कैडडडड बन्द करने का प्रयत्न न करें प्रत्युत मल निकलने दें आवश्यकता हो और वैद्य सलाह दे तो एक सेर गर्म जल में 2-1 तोला खाने का नमक मिला कर पिलाएं और गले में उंगली डाल कर वमन करा दें।
प्याज के 6 माशे रस में 1 रत्ती हींग अथवा 6 माशा शहद मिला कर घंटा घंटा भर पश्चात दस्त और वमन बन्द होने तक देते रहें। लाल मिर्च का एक बीज जरा से मोम में लपेट कर देने से भी लाभ होता है।
कपूर हैजे की सबसे श्रेष्ठ औषधि माना जाता है। पीने के जल में कपूर की एक डली डाल कर देना अच्छा है। वह पानी में घुलेगा नहीं परन्तु पानी में उसका असर आ जायेगा।
एक तोला तिल के तेल में 3 माशे कपूर डाल कर अच्छी तरह हिला दीजिए। जब कपूर मिल जाये तो इसमें 5-5 बूँद आध आध घंटे बाद दस्त बन्द होने तक चटाते रहिये।
पोदीने की पत्ती 30 काली मिर्च 3 काला नमक एक माशा इलायची इमली 9 माशा लेकर पानी या अर्क गुलाब के साथ बारीक पीस कर चटनी सी बनाले इसमें से जरा सी चटनी चटाते रहें। उल्टी, प्यास, और दस्त ठीक हो जायेंगे।
सफेद जीरा एक तोला और जायफल एक तोला लेकर दोनों को बारीक पीस कर आधा सेर पानी में घोल कर छान लें और 4-5 बार में सब पिला दें।
पीने के लिए 2 सेर पानी में 30-40 पोदीने की पत्तियाँ, 8-10 लौंग और 4-5 बड़ी इलायची डाल कर उबाल लें और छान कर ठंडा कर के रख लें। इसे पिलाने से हैजे में बड़ा लाभ होगा। दो सेर जल में 6-7 लौंग औटा लें और पानी को छान कर पिलाएं प्यास शान्त होगी।
जब तक लज्जा हमारी निगरानी करती है जब तक हृदय में सद्गुण बने रहते हैं। -.....वर्क
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आज कल आधी बीमारियाँ शरीर को भूल जाने और मस्तिष्क से ज्यादा काम लेने से उत्पन्न होती हैं। -बुल्वर
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रोग वे दंड हैं जो स्वास्थ्य के सम्बंध में भूल करने या संयम से दूर रहने के कारण भोगने पड़ते हैं।
-अज्ञात
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कुरीति के अधीन होना कायरता है और उसका विरोध करना पुरुषार्थ है। -महात्मा गाँधी
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
जीवन बड़ा बहुमूल्य है। एक बार जीवन मिलने के पश्चात् किसे मालूम पुनः कब जन्म हो। अतएव पग पग पर असावधानी से आप भारी संकट में फंस सकते हैं।
सतर्क और सावधान पुरुष आने वाली आपत्ति के विषय में चौकन्ना रहता है। यह सही है कि वह उसे दूर नहीं कर सकता, किन्तु उसके वेग को बहुत कुछ क्षीण कर सकता है। सतर्कता से भविष्य दृष्टा बनते हैं। भविष्य में आने वाली घटनाओं के बारे में बुद्धि लगती है।
क्या आपने अपने जीवन का बीमा करा रखा है? यदि नहीं तो इसका अभिप्राय यह है कि आप अपनी वृद्धावस्था के लिये कोई भी आर्थिक सहायता नहीं रख रहे हैं। क्या मालूम आपके पुत्र आपसे किनारा काट लें। हाथ तंग रहे, या कोई अप्रत्याशित खर्चा आकर आपको पस्त कर दे। वृद्धावस्था में बीमारियाँ हो सकती हैं। इनके लिए आप कितनी तैयारी करते हैं? बैंक में या आभूषण, गृह इत्यादि के रूप में आपके पास कितनी सम्पत्ति सहायता के लिए है?
क्या आपने भविष्य के बारे में सोच कर अपने पद से त्याग पत्र दिया है? जो व्यक्ति क्षणिक आवेश के वशीभूत होकर अपने पद से पृथक हो जाते हैं, वे बेकारी के दिन काटते हैं। जब तक अगला कदम दृढ़ता से न जमा लें, पहला न उठावें।
क्या आप स्वास्थ्य के विषय में सतर्क हैं? मामूली सी कब्ज बढ़ कर असंख्य छोटी बड़ी बीमारियों का रूप धारण कर सकता है। आपके सिर में रहने वाला दर्द किसी आने वाली बीमारी का सूचक है। यदि आप वीर्यपात से परेशान हैं, तो संभव है यही रोग बढ़ कर आपके सब दाँतों को हड़प ले।
क्या आप किसी अजनबी को कोरी भावुकता से वशीभूत होकर रुपया उधार दे देते हैं? क्या आप बिना गिने हुए धोबी को कपड़े देते हैं? क्या आप रुपया भुनाते समय पैसों को अच्छी तरह गिनते हैं? जो व्यक्ति फूँक-फूँक कर कदम रखने वाले हैं, वे इनमें से प्रत्येक बात के लिए सावधान रहते हैं।
सौदा खरीदते समय क्या आप दो चार दुकानों पर वस्तुओं के मूल्यों के विषय में पूछताछ करते हैं? जो व्यक्ति आराम तलबों में आकर एक ही दुकान से माल खरीदा करते हैं, उधार के आदी होते हैं, वे कर्जदार होकर जन्म भर दुःख उठाते हैं।
जीवन में लाखों ऐसी बातें हैं जिन पर आपको सब सोच-विचार करना है। इन सभी समस्याओं को निम्न रूप में रखा जा सकता है-(1) घरेलू को निम्न रूप में रखा जा सकता है-(2) हमारी आर्थिक समस्याएं (3) हमारी स्वास्थ्य सम्बन्धी चिन्ताएं (4) हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक शंकाएं।
अपनी घरेलू गुत्थियों को न्यून कीजिए। क्या आप जीवन पर्यन्त घर के छोटे से दायरे में ही आबद्ध रहेंगे और अपनी शारीरिक गुत्थियों में उलझे रहेंगे। जीवन स्वार्थ सिद्धि और सम्पूर्ण आयु घर के झंझटों में रहने के लिए नहीं बना है। यह हिस्सा तो एक छोटा सा फासला है। इसके आगे महत्वपूर्ण सफर है।
रुपया पैसा भले जीवन के लिए आवश्यक है। इसका सदुपयोग फूँक-फूँक कर कीजिये। मितव्ययिता से काम कीजिए। किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि रुपये के ही भक्त बन कर रह जाएं। रुपया उन्नति का साधन है। अपनी उन्नति के लिए उसका उपयोग कीजिए।
स्वास्थ्य सम्बन्धी चिंताएं अवश्य विचारणीय हैं। जीवन का सम्पूर्ण आनन्द उन्हीं पर अवलम्बित हैं। खान, पान, विहार, रहन-सहन में फूँक-2 कर चलने की आवश्यकता है। तनिक भी गलती का परिणाम घातक हो सकता है। व्यभिचार एक आकर्षण विष है जो प्रत्येक नवयुवक को हड़पने के लिए अपनी ओर खींचता है। सावधान रहें।
आपकी धार्मिक और आध्यात्मिक शंकाएं ही वास्तविक शंकाएं हैं। आप क्यों आये? जीवन में क्या कर रहे हैं? आपके दैवी तत्वों की कहाँ तक वृद्धि हुई है? आवश्यकताएँ कम कर संतोष, सुख, समता, निस्वार्थता, प्रेम शाँति कितना प्राप्त कर सके हैं? मनोविकारों पर कितनी विजय प्राप्त हुई है? यह कार्य अब आपके करने योग्य हैं? इन पर क्रमशः विचार कीजिए।
मानव का ध्येय लघु से महान, महान से देवत्व प्राप्त करना है। जो व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी निर्बलताओं को निकाल कर, सद्गुणों की वृद्धि करता है, अपनी मनः स्थितियों पर काबू पा लेता है उसे जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त होता है।
अपने समय के विषय में बड़े सतर्क रहिये। जीवन की घड़ियाँ गिनी चुनी है। एक एक पल दुबारा आने वाला नहीं है। यदि आप अन्य बातों में सावधानी बरतते हैं, तो इस मामले में बहुत सावधान रहिए। जो दिन आज गया, वह सदैव के लिए नष्ट हो गया। आगे जो अनिश्चित समय है, उसका एक एक पल आपकी जागरुकता का विषय होना चाहिए।
सतर्कता दैवी गुण है। निरन्तर सतर्क रहने से मनुष्य अपने जीवन के अनेक कंटक दूर कर सकता है।
(श्री. किशोरी लाल घ. मश्रूवाला)
केन्द्रीय धारा सभा में पं. ठाकुर दास भार्गव ने ‘वनस्पति’ याने तेलों की जमाने की क्रिया और धंधे को बन्द करने के लिये एक विधेयक (बिल) पेश किया है। यदि यह विधेयक मंजूर होगा तो वनस्पति के सब कारखाने बन्द किये जायेंगे। और विदेश से भी उसकी आयात करने की मनाही होगी। इसके बारे में लोकमत क्या है इसे समझने के लिये सरकार ने इस विधेयक को अखबारों आदि द्वारा प्रकाशित किया है। और ता0 31 अगस्त तक के भीतर अपनी राय जाहिर करने के लिये सूचना दी है।
वनस्पति हमारे देश का एक बड़ा महत्व का पदार्थ बन गया है। इसके पैदा करने वाले व्यापारियों को यह धंधा इतना फायदेमंद साबित हुआ है कि तेजी से उसके कारखाने बढ़ाने की कोशिश हो रही है और उसके प्रचारार्थ आकर्षक विज्ञापन आदि में लाखों रुपया खर्च करना आसान हो गया है। थोड़ा भी महत्व रखने वाले किसी भी अखबार को देखिये, वनस्पति के सच्चे झूठे गुणगान करने वाले बड़े-बड़े विज्ञापन पाठकों के ध्यान को आजकल आकर्षित कर देते हैं। इसके अलावा उसके विषय में तरह तरह की जानकारी देने वाली, बड़े आकर्षक और महंगे कागज पर छपी हुई सचित्र पत्रिकायें भी प्रकाशित की गई हैं। और ता0 31-अगस्त की अवधि के भीतर उसके पक्ष में अनुकूल लोकमत प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के प्रयत्न किये जा रहे हैं।
दूसरी तरफ से यह पदार्थ जितना धंधेवालों को फायदेमंद हुआ है, उतना ही लोगों के लिये शकमंद हो गया है। खेती और गो-पालन का धंधा चलाने में इस पदार्थ ने बाधायें पैदा कर दी हैं। घानी का धंधा तोड़ दिया है। आरोग्य की दृष्टि से उसको कोई महत्व सिद्ध नहीं होता। फिर भी अपने मायावी रूप से मोह में डाल कर वह खाने वाले को बिना जरूरी खर्च में डालता है। और एक भ्रम में फंसाता है। शुद्ध तेल और शुद्ध घी प्राप्त करना जनता के लिये उसने बहुत ही मुश्किल कर दिया है। व्यापार धंधे से नीति की भावना निर्मल करने में यह काव्योक्ति यहाँ ठीक लागू होती है। मावी राक्षस ने सुवर्ण-मृग का रूप धारण करके जानकी को आकर्षित किया, राम जानते थे कि सुवर्ण-मृग नहीं हो सकता। फिर भी मजबूर होकर उसके पीछे दौड़े परिणाम में जिसने वह माया पैदा कर दी थी वह रावण, जानकी जी को हरण कर ले गया और उनका शील और जीवन दोनों को उसने जोखिम में डाल दिया। इसी तरह मायावी तेल भी घी का रूप लेकर जनता को आकर्षित करके, यह घी नहीं बल्कि नकली पदार्थ है जैसा जानते हुये भी गृहस्थ को उसके खरीदने के लिये मजबूर कर देता है। परिणाम में जिसने यह माया पैदा की है, उस उद्योगपति जनता की नीति, आजीविका, धन और आरोग्य चारों जोखिम में डाल दिये हैं।
इसके दूसरे नुकसान भी बहुत हैं। उसने तेल कारखानों को अनिवार्य बना दिया है। कारखानों में जो कचरा निकलता है उसे तेली लोग सस्ते में खरीद कर अच्छे तेल में मिलाते है। चीजें भी मिलाते हैं और मिलावटी तेल करते हैं। वनस्पति को घी में मिला कर उसे मिलावटी करते हैं। शुद्ध करने का और जमाने का खर्च करके भी न शुद्ध तेल मिलता है न शुद्ध घी। फिर लोग सोचते हैं कि सब झंझट छोड़कर वनस्पति का ही उपयोग करना बेहतर है। इस तरह दूसरे खाद्यों को बिगाड़ कर वह अपना स्थान जमाता है।
स्थानिक धानियाँ बन्द होने से उनकी खली भी नहीं मिल सकती, मिल की खली में तेल का अंश कम रहता है, अशुद्धियाँ ज्यादा होती हैं। फिर वह निर्यात की जाती है और खाद में जाती है। यानि मवेशी की खुराक की एक आवश्यक चीज समुद्र पार जाती है और भूमि में वैसी ही जाती है। जिससे कितना लाभ होता है इस पर कुछ शंका भी है। इस तरह कृषि और गो पालन दोनों का नुकसान होता है।
अनीति का तो कहना ही क्या? मिलावट और काला बाजार आदि चीजों की शर्म ही नहीं रह गई। झूठ प्रचार की एक कला बनाई गई है।
इन सब बातों का ख्याल करके लोगों को, विशेष कर सार्वजनिक सेवा की संस्थाओं, म्युनिसिपालिटियों, पंचायतों आदि को अपनी राय ता0-31 अगस्त के पहले केन्द्रीय सरकार के अन्न मंत्री केन्द्रीय धारा सभा के सभापति को भेज देनी चाहिये।
केवल रीति रिवाज ही से सदाचार बनता है।
-एनाटन
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नैतिकता, प्रतिष्ठाओं में सबसे अधिक मूल्यवान है। कर्म ही हमारे पुत्र हैं।
-वाइरन
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जीवन का मूल शुद्ध विश्वास है, बिना विश्वास के सारी तदवीरें और उद्देश्य विलीन हो जाते हैं।
-हेरल्डडाउन्स
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शंकायें कायरता का चिन्ह है और विश्वास वीरता का। -वुल्बर लिटन
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विपत्ति मनुष्य को पक्का करती है और सच्चे झूठे की पहचान कराती है।-सुकरात
-प्रजा को, निर्बल को, सता कर कोई पुण्यवान् नहीं होता, जिसे पापी होना हो उसे पाप करने का अख़्तियार है। पाप होने की आजादी होने पर भी जो पाप नहीं करता वही पुण्यवान कहलाता है और उसी से देश का लाभ होता है।
-जो अपराध हमने किये हैं उनसे भली भाँति घृणा न करें, तब तक दूसरे के दोष देखने या बताने का हमें हक ही नहीं हो सकता।
-चाहे जितना गुस्से का कारण मिलने पर भी जो मनुष्य गुस्से के आधीन न होकर-नुकसान नहीं करता-वही जीतता है। उसी ने नियम का पालन किया कहा जायगा।
-जो मदद बदला चाहे वह भाड़े की मदद है। भाड़े की मदद भाई-चारे का चिन्ह नहीं कहाती। मिलावट की सीमेंट जैसे पत्थर नहीं जोड़ सकती उसी तरह “किराये की मदद से भाई बन्दी नहीं होती।”
-एक पशु दूसरे को केवल अपने शारीरिक बल से ही वश में कर लेता है। उसकी जाति का यही कायदा है। मनुष्य-जाति का स्वाभाविक कायदा प्रेम-बल से-आत्मिक-बल से-दूसरे को जीतने का है।
-क्रोध के आवेश में आकर जब मनुष्य दूसरे पर प्रहार करता है, तब वह आप परास्त होता है, और अपना सामना करने वाले का अपराधी होता है। जब मनुष्य क्रोध से पीड़ित होकर अपने आप दुःख सहन करता है तब वह अपने ऊपर पवित्र असर पैदा करता है।
-क्षत्रियता सीखने के लिये पुष्ट शरीर की (उतनी) जरूरत नहीं पर मजबूत निडर दिल की जरूरत है। क्रूरता-कठोरता-क्षत्रियता का गुण नहीं परन्तु सहनशीलता, क्षमा, दया, उदारता, अ-पलायन और मूसलाधार मेघ बरसता हो तब भी स्थिर होकर निर्भयता से खड़े रहने की शक्ति में क्षत्रियता है।
-सबल की सबलता विरोधी को प्रेम से जीत लेने में है, मद से कुचल डालने में नहीं।
-पवित्र और ईमानदार मनुष्य, अपने आप जिसको न्याय मान लिया, उसके लिये, हमेशा अपने भोग देने को तैयार रहता है। क्या तुम तैयार हो? अपना आराम, अपना आनन्द, अपना व्यापार, अपना जीवन तक, न्याय प्राप्त करने को दे देने के लिये तुम तैयार हो? जो ऐसे हो तो तुम सत्याग्रही हो और तुम जीतोगे ही।
-केवल शान्ति और अटल निश्चय का मिलाप जब न्याय-पूर्ण कारण के साथ होता है तब उसके परिणाम में सदा विजय ही होती है। न्याय के लिये मरना-मनुष्य का नियम है, मारना जानवर का नियम है।
-जैसे जुल्म और न्याय का विरोध करना अपना धर्म है, उसी तरह जुल्म करने वाले से द्वेष न करना अपना धर्म है।
-जो मैं अन्यायी को सहायता दूँ तो मैं अन्याय में शामिल होऊं। इस कारण अन्याय का स्वरूप जब उग्र हो तब सहायता बन्द करना हमारा धर्म है।
-जिस धर्म की सीमा देह में या क्षेत्र में हो उसे मैं नहीं मानता। इसे सिद्ध करने में मैं समर्थ होऊं-यह मेरी प्रभु से प्रार्थना है।
-तमोगुण का लक्षण ही यह है कि उसमें किसी भोग का त्याग न करना पड़े, कैसी भी कठिनता न सहन करनी पड़े।
-विपत्ति अपराधों की दासी नहीं होती।
भगवान की अनन्त शक्तियां हैं। उनमें से कुछ हमारे लिए अनुकूल और कुछ प्रतिकूल पड़ती हैं। भगवान ने सिंह व्याघ्र भी बनाये हैं और गाय घोड़े भी। सृष्टि में सिंह व्याघ्र की भी उपयोगिता है परन्तु वे मनुष्य के लिए तो प्रतिकूल ही पड़ते हैं। पशुओं की सहस्रों जातियों में से केवल गाय सब से अधिक उपयोगी सिद्ध हुई है। वृक्ष वनस्पतियों को भी भगवान ने ही बनाया है पर उनमें से बहुत से तो विषैले, कटीले और कष्टदायक होने से प्रतिकूल हैं। फल, अन्न, फुलवारी, औषधि आदि के पौधे मनुष्य के लिये उपयोगी पड़ते हैं और वे सावधानी के साथ पाले पोसे जाते हैं।
ईश्वर की अगणित अदृश्य दैवी शक्तियों में कितनी ही ऐसी हैं जो हमारे लिए उपयोगी नहीं पड़तीं। भूकम्प, वज्रपात, विस्फोट, युद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, दाह, अग्निकाँड, संहार, एवं टिड्डी मूषक आदि की उत्पादक ऐसी अनेक शक्तियाँ हैं जिनमें सृष्टि का कोई और प्रयोजन भले ही पूरा होता हो पर मनुष्य को त्रास ही मिलता है। मानव प्राणी के लिए तो वही शक्तियाँ उपयोगी होती हैं जो उसकी समृद्धि और सुख शान्ति में सहायक होती है। सूर्य भी शक्तियों का भंडार है। उस की किरणों का विश्लेषण कर वैज्ञानिकों ने प्राण घातक “मृत्यु किरण” उपलब्ध की है। साथ ही अल्ट्रावायलेट, अल्फा वायलेट, एक्स रेज, ओजोन आदि ऐसी किरणें भी ढूंढ़ निकाली गई हैं जो असाध्य रोगियों को प्राण दान कर सकती हैं।
संसार में जो कुछ है वह सभी हमारे लिए हितकर नहीं है। अपने लाभ की वस्तुओं को हमें ढूंढ़ना होता है, यह पहचानना होता है और प्रयत्न पूर्वक उनको अधिक मात्रा में उपलब्ध करके उपयोग करना होता है तब हम ईश्वर की अगणित लाभदायक वस्तुओं से सुख प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। गाय, घोड़े, अन्न, फल, औषधि, कपास, खनिज द्रव्य, धातुएं, रत्न आदि को प्राप्त करने के लिए मनुष्य प्रयत्नशील रह कर सुख समृद्धि का अधिकारी हुआ है। यदि उसने इनकी ओर उपेक्षा बरती होती या हानिकार वस्तुओं से जा उलझना होता तो हानि, दुख, दुर्भाग्य, संकट और नाश के अतिरिक्त और कुछ हाथ न आता।
संसार स्थूल और सूक्ष्म दो भागों में बँटा हुआ है। स्थूल पदार्थ वे हैं जो आँखों से दिखाई पड़ते हैं। सूक्ष्म वे हैं जो आँखों से दिखाई नहीं पड़ते फिर भी उनका अस्तित्व मौजूद है। सर्दी, गर्मी, वायु, ईथर, शुद्ध, विद्युत, परमाणु, रोग कीट, रेडियो तरंगें आदि अदृश्य होते हुए भी दृश्य के समान ही मौजूद हैं। मृत्यु होने पर आत्मा शरीर से निकल जाता है फिर भी वह अदृश्य रूप से मौजूद रहता है।
ईश्वर की ऐसी ही अनेक अदृश्य शक्तियाँ हैं उन्हें योग शास्त्र और अभ्यास विद्या के वैज्ञानिक आचार्यों ने अपनी सूक्ष्म दिव्य दृष्टि से देखा और समझा है। और गुणों के आधार पर उनका नाम रूप स्थिर किया है। इन्हीं का नाम देवता है। ईश्वर की धन शक्ति को लक्ष्मी, बुद्धि शक्ति को सरस्वती, युद्ध शक्ति को दुर्गा, उत्पादन शक्ति को ब्रह्म, पालन शक्ति को विष्णु, संहार शक्ति को शिव, बाल शक्ति को हनुमान, सिद्धि शक्ति को गणेश, शासन शक्ति को इन्द्र कहते हैं, उनसे संबंध स्थापन करने का उनको अधिक समीप लाकर लाभ उठाने का जो प्रयत्न किया जाता है उस प्रयत्न का नाम ही देवी वासना है।
जैसे गाय सब पशुओं में, गंगा सब नदियों में, तुलसी सब औषधियों में हमारे लिए विशेष लाभदायक हैं वैसे ही ईश्वर की गुप्त दैवी शक्तियों में गायत्री शक्ति मनुष्य जाति के लिए सब से अधिक उपयोगी है। गायत्री वह ज्ञानमयी अदृश्य चेतना है जिसमें सात्विकता, शान्ति और आनन्द का प्रधान अंश है। गायत्री त्रिपदा कही जाती है। ह्रीं-अर्थात् ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रेम संयम, सदाचार। श्रीं-अर्थात् धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा, भोग, ऐश्वर्य। क्लीं-अर्थात् स्वास्थ्य बल, साहस, पराक्रम, पुरुषार्थ, तेज। इन तीन विशेषताओं वाली त्रिगुणात्मक ईश्वरीय शक्ति ही गायत्री है। चूँकि यह तीनों ही तत्व मनुष्य के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं आवश्यक हैं इसलिए ऋषियों ने गायत्री उपासना को भी वैसा ही आवश्यक नित्य कर्म बताया है जैसा साँस लेना, अन्न जल ग्रहण करना, शौच स्नान से निपटना एवं निद्रा लेना आवश्यक है। इन क्रियाओं से शरीर की रक्षा एवं वृद्धि होती है। गायत्री उपासना से आत्मबल की रक्षा और अभिवृद्धि का लाभ मिलता है।
शरीर परिपुष्ट, सबल, सतेज, स्वस्थ सक्षम हो तो उस शारीरिक बल के बदले में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। शत्रुओं को पछाड़ना, कड़ी मेहनत करके अधिक कमाना, दूर-दूर की यात्राएं कर लेना, रोगों से बचे रहना, दीर्घजीवी होना, सौंदर्य कायम रहना, इन्द्रिय भोगों का भरपूर आनन्द उठाना, किसी की सहायता के लिए आश्रित न होना, आदि अनेकों लाभ शारीरिक बल के हैं। उन लाभों का कितना महत्व है इस बात को वह समझता है जिसने अपना स्वास्थ्य गँवा दिया है और रोज-रोज की शारीरिक पीड़ा, बेचैनी, हानि, एवं असफलताओं की दुर्भाग्यपूर्ण निराशा से दुखी रहता है। आत्मिक बल तो शरीर बल से और भी अधिक महत्वपूर्ण है उसके लाभों की गणना नहीं हो सकती। मनुष्य जीवन में जितना सुख दुख है उसमें तीन चौथाई मानसिक और एक चौथाई शारीरिक होता है। स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, यश, पद, प्रतिष्ठा, नेतृत्व, वैभव आदि के सुख वस्तुतः मानसिक सुख हैं। शरीर को इनसे कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होता। इसी प्रकार शोक, वियोग, हानि, भय, चिन्ता, तृष्णा, अपमान, पराजय, असफलता आदि के दुख भी मानसिक हैं। शरीर स्वस्थ होते हुए भी मन में यह रोग लगे रह सकते हैं। आत्मिक बल बढ़ जाने से मानसिक सुखों में वृद्धि और दुःखों में कमी होने का क्रम चल पड़ता है। फलस्वरूप गायत्री साधना द्वारा आत्मिक बल की वृद्धि कर लेने वाला मनुष्य अनायास ही दुखों से छुटकारा पाकर सुख शान्ति की ओर अग्रसर होता रहता है।
स्थूल वस्तुओं की सहायता से स्थूल वस्तुएं पकड़ने की विधि को सब लोग जानते हैं। हाथ से कलम पकड़ना, पैर को जूते में घुसा देना, चिमटी से अग्नि उठाना, परिश्रम से पैसा कमाना, रुपये से वस्तुएं खरीदना सभी को मालूम है, पर अदृश्य को अपने लाभ के लिए किस प्रकार प्रयुक्त किया जाय, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है। वैज्ञानिक आविष्कारों से पूर्व भी बिजली, भाप गैस, परमाणु आदि की शक्तियाँ मौजूद थीं पर लोग उनको पकड़ना और प्रयोग करना न जानते थे फलस्वरूप उनके लाभों से वंचित थे। वैज्ञानिकों ने किसी नई शक्ति का निर्माण नहीं किया है केवल उनसे लाभ उठाने की विधि का आविष्कारों से सर्वत्र लाभ उठाया जा रहा है। दैवी शक्तियाँ भाप-बिजली गैस, अणु आदि से भी सूक्ष्म होने के कारण यंत्रों की पकड़ में नहीं है फिर भी ऐसी तरकीबें हैं जिनके द्वारा उन्हें पकड़ा जा सकता है और उनसे लाभ उठाया जा सकता है। अध्यात्म विद्या, योग साधना ऐसी ही वैज्ञानिक पद्धतियाँ हैं जिनका आविष्कार हमारे पूजनीय पूर्वजों ने युगों तक घोर अध्यवसाय करने के उपरान्त किया था।
ऋषियों ने यह देखा कि सूक्ष्म शक्तियाँ उस जाति की हैं जिस जाति की हमारी आत्मा है। इसलिए आत्मा को ही ऐसी विशेष परिस्थिति में ढाला जाय जो उन दिव्य शक्तियों के अनुकूल हो इस प्रकार उन दोनों में साम्य एवं चुम्बकत्व उत्पन्न होने से पकड़ना संभव हो सकेगा। आत्म विद्या के अनेक वैज्ञानिक-ऋषि सहस्रों वर्षों के उत्कट प्रयत्न और अध्यवसाय के साथ इस संबंध में शोध करते रहे और अन्त में उन्हें सफलता मिली। उन्होंने वह तरीके ढूंढ़ निकाले जिनके आधार पर अपनी आन्तरिक सत्ता को ऐसी योग्यताओं एवं विशेषताओं में ढाल लिया जाता है कि जिस दैवी शक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित करना हो तद्नुकूल बन कर उसे अपने चुम्बकत्व द्वारा पकड़ सकेगा। जमा हुआ मोम, तेल में नहीं मिलता पर यदि मोम को अग्नि पर पिघला दिया जाय तो वह तेल में घुल जायगा। इसी प्रकार दैवी सूक्ष्म शक्तियाँ साधारणतया हर किसी को प्राप्त नहीं होतीं पर यदि साधना द्वारा अन्तस्तल को पिघला दिया जाय तो वह शक्ति आत्मसात हो सकती है। इसी विधि व्यवस्था को, क्रिया को आध्यात्मिक भाषा में “साधना” कहते हैं।
योग महाविज्ञान के आधार पर अब तक असंख्य व्यक्तियों ने ईश्वर की अभीष्ट शक्तियों को प्राप्त करने योग्य आत्म निर्माण किया है, प्राचीन इतिहास पुराणों में ऐसे अनेक वर्णन आते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि भिन्न देवताओं की, भिन्न विधियों से साधना करके अनेक व्यक्तियों ने भिन्न वरदान पाये थे। इसका अर्थ है उन लोगों ने साधना द्वारा अपनी अन्तः चेतना को इस योग्य बनाया था कि ईश्वर की अभीष्ट शक्ति को वे पकड़ सके और उससे लाभ उठा सके । गायत्री साधना एक वैज्ञानिक पद्धति है इसके द्वारा ईश्वर की ह्रीं, श्रीं, क्लीं विज्ञान, वैभव और बल की सम्मिलित शक्ति को पकड़ कर, खींच कर अपने में धारण कर सकते हैं और उसके आधार पर जीवन में अनेक मानसिक एवं साँसारिक आनन्दों का उपभोग कर सकते हैं।
गायत्री साधनाएं स्थूल दृष्टि से देखने में सामान्य क्रिया मालूम होती हैं इनके द्वारा किसी प्रकार कोई लाभ मिल सकता है, साधारणतः यह बात समझ में नहीं आती पर अवश्यम्भावी परिणामों को देखकर यह मानना पड़ता है कि इसमें कोई तथ्य अवश्य है। गायत्री के चौबीस अक्षरों का गुँथन इस प्रकार से हुआ है कि उनके उच्चारण से जिह्वा, मुख, कंठ, तालु की ऐसी नाड़ियों का क्रमबद्ध संचालन होता है जिनके कारण शरीर के विभिन्न भागों में अवस्थित योगिक लघु चक्र जागृत होते हैं। जैसे कुँडलिनी जागरण के लिए षट् चक्रों को जागृत करके दिव्य शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं वैसे ही गायत्री के उच्चारण मात्रा से यह लघु ग्रंथियां जागृत होकर आशाजनक परिणाम उपस्थित करती हैं। “गायत्री महाविज्ञान” पुस्तक के प्रथम भाग में चित्र देकर सविस्तार यह बताया जा चुका है कि शरीर के किस-किस भाग में कौन-कौन सी गुप्त ग्रंथियाँ हैं और गायत्री के किन-किन अक्षरों के उच्चारण से उनमें कौन-कौन ग्रंथि जागृत होती है और उस ग्रंथि चक्र के जागरण से हमें कौन-कौन सी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। उस सब का वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता पर इतना बताया जा सकता है कि गायत्री के चौबीसों अक्षर बड़े ही रहस्यपूर्ण ढंग से ऋषियों ने गूँथे हैं। उनके उच्चारण से शरीर के भीतर ऐसी सूक्ष्म प्रक्रिया होती है जिसके कारण आसानी से हमारी अन्तः भूमि ऐसी चुम्बक शक्ति से परिपूर्ण हो जाती है जिसमें ईश्वर की गायत्री शक्ति को आसानी से खींच कर अवस्थित किया जा सके ।
सृष्टि के आदि से लेकर अब तक असंख्य मनस्वी महापुरुषों ने गायत्री की साधना की है। विचार विद्या के ज्ञाता यह बात सहज ही समझ सकते हैं कि इतने अधिक मनस्वी पुरुषों का इतने अधिक काल तक, इतना अधिक मनोबल रहा है वह गायत्री मंत्र अपनी ज्ञानपूर्ण संचित पूँजी के कारण भी कितना अधिक प्रभावशाली हो गया होगा। विचार कभी नष्ट नहीं होते उनके बादल आकाश में मँडराते रहते हैं, वे विचारों की प्रचुरता देखते हैं वहीं स्वयं भी बरस पड़ते हैं। इसी से भले और बुरे विचारों को अदृश्य रूप से बल मिलता रहता है। नये गायत्री साधक पर पूर्वकाल के गायत्री साधकों के विचार बादल बरसते हैं और वह शीघ्र ही सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है।
विविध रेडियो स्टेशनों द्वारा विविध प्रोग्राम हर घड़ी प्रसारित होते रहते हैं। पर सुनाई वहीं पड़ते हैं जहाँ रेडियो यंत्र रखा हो। उस यंत्र में भी जिस नम्बर पर सुई होगी उसी स्टेशन की खबरें सुनाई पड़ेंगीं। ईश्वर की अनेक शक्तियाँ अनेक केन्द्रों से प्रचारित होकर सर्वत्र व्याप्त रहती हैं, पर उनको ग्रहण वही कर सकता है जिसने साधना द्वारा अपने आपको रेडियो यंत्र बना लिया है। जिस दैवी शक्ति को प्राप्त करना है उसी की विशेष साधना करना मानो रेडियो की सुई उस नंबर पर लगा देना है। इस प्रक्रिया द्वारा ईश्वर के महाशक्ति सागर में से, विपुल वैभव में से, हम अपनी आवश्यक शक्तियाँ एवं सम्पदाएं प्राप्त कर सकते हैं। प्रभु के अक्षय भंडार में किसी वस्तु की कमी नहीं है। ईश्वर के अमर युवराज-मनुष्य को अपने पिता की प्रत्येक वस्तु पर पूरा पूरा अधिकार है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी पात्रता सिद्ध करें अपने प्रयत्न, श्रम, अध्यवसाय और साधना द्वारा यह साबित कर दें कि हम अभीष्ट वस्तुओं के अधिकारी हैं तो कोई कारण नहीं कि हमें सन्तोष जनक सुख शान्ति प्राप्त न हो।
गायत्री साधना ठोस अध्यात्मिक महाविद्या की वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। उसका श्रद्धा और विश्वासपूर्वक परीक्षण किया जाये तो परिणाम सदा ही आशाजनक होता है।
(प्रो. श्री अगर चन्द नाहटा)
निन्दक नियरे राखिए, आँगन कुटी छबाय।
बिना साबुन पानी बिना, निरमल करे सुभाय॥
श्रवण, नयन, मुख, नासिका, सबही का इक ठौर।
हँसियौ, रभिवौ, वोलिवौ, चतुरन को कछु और॥
जो विषया सन्तन तजी, मूढ ताहि लपटात।
जो नर डारत वमन करि, स्यान स्वाद सौं स्रात॥
नानक नन्हें हे रहो, जैसी नन्हीं दूब।
बड़ी घास जल जायगी, दूब खूब की खूब॥
चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबित रहा न कोय॥
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साधु की, काटे कोटि उपाधि॥
तुलसी सोई चतुरता, सन्तचरन लवलीन।
परधन परमन हरन को, वेश्या बड़ी प्रवीन॥
रहिमन पाई बजे न को, लघु न दीजिए डार।
जहाँ काम आबे सुई, का करै तलवार॥
बालक हूँ तै सीखिए, उचि कहत जो होय।
सूर्य प्रकाशै जहाँ नहीं, दीप प्रकाश सोय॥
करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान।
रसरी आबत जात है सिल पर होत निशान॥
जैसी दृष्टि हराम पै, तैसी हर पै होय।
चला जाय बैकुँठ में, रोकि सकै नहिं कोय॥
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
सत्य अहिंसा के पालन में यह जीवन हो जाये व्यतीत।
पक्षपात से दूर रहे मन दुःस्वार्थों से रहे अतीत॥
बुद्धि विवेक न छोड़ूं क्षण भर आने दूँ न अन्धविश्वास।
कालमोह से दूर रहूँ मैं करूं न मानवता का ह्रास॥ (1)॥
सर्व धर्म सभ भाव न भूलूँ अहंकार का कर अवसान।
मन-मंदिर में सब धर्मों के तत्वों का मैं गान गान ॥
सकल महात्माओं के जीवन हरते रहें बैर दुख खेद।
हैं वे विश्व-विभूति न इनमें हो मेरे तेरे का भेद ॥ (2)॥
राम महात्मा के पथ पर हो तन-मन-मन जीवन कुर्बान।
मर्यादा में रहूँ निरंतर हो जंगल में मंगल गान॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण से पूछूँ कर्मयोग की राह।
योग भोग का करूं समन्वय आशाओं का रह न दाह ॥ (3)॥
महावीर स्वामी से सीखूँ परम अहिंसा शम तप ध्यान।
रहूँ निरंतर सहन-शील मैं पापी का कर दूँ अवसान॥
बुद्ध महात्मा के जीवन से पाऊं बोधि करूं कल्याण।
निरतिवाद का पाठ पढूँ मैं मध्यम पथ पर करूं प्रणाम॥(4)॥
सीखूँ सेवा पाठ सर्वदा रख ईसा मसीह का ध्यान।
जग के दुख में दुखी रहूँ मैं करूं न अपने दुख का मान॥
सीखूँ नबी मुहम्मद से मैं भाईचारे का व्यवहार।
साम्यवाद का पाठ पढूँ मैं मानवता का करूं प्रचार ॥ (5)॥
देवजयी जरथुस्त महात्मा कन्फयूसियत नीति दातारं।
सकल महात्मा वंद्य मुझे हो विश्वबन्धुता के अवतार॥
मंदिर जाऊं मस्जिद जाऊं जाऊं गिरजाघर के द्वार।
मन में हैं भगवती-अहिंसा है सत्येश्वर का दरबार॥ (6)॥
*समाप्त*