सेवा धर्म।

(जार्ज सिडनी अरेण्डल)

जब तुमने जितनी तुममें शक्ति थी उतनी परिणता और उदारता से सेवा की है तो उसके परिणाम के लिये लालायित न रहो क्योंकि तु{हारी सेवा की पवित्रता सुख-शान्ति के रूप में सेवक के पास लौट कर चली आवेगी और पुरुष के चारों ओर यह सुख छा जायगा।

प्रेम का केन्द्र सुविस्तृत बनाने की क्षमता ही सेवा के आदर्शभूत परिणाम हैं। अहा! किस काम का वह गुल जिस में कि खुशबू नहीं। किस काम का वह दिल जिस दिल में कि तू नहीं”। प्रेम बिना सेवा कैसे होगी? सुगन्ध बिना पुष्प चित्त-विनोद कैसे कर सकेगा? जो मनुष्य वास्तविक सुखी नहीं है वह दूसरों को कहाँ तक सुखी बनाने में समर्थ हो सकेगा।

सेवा यदि प्रेम भरे हृदय से की गई हो चाहे वह अज्ञानता भरी ही क्यों न हो, उस सेव्य पुरुष की कुछ भी हानि नहीं कर सकती। प्रेम की शक्ति उसकी अज्ञानता-जनित हानि से रक्षा कर लेगी।

यदि तुम आध्यात्मिक उन्नति की जाँच करने की इच्छा रखते हो तो ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया करो कि पहले से अब तुम सेवा करने में कमी तो नहीं कर रहे हो। तुम्हारी सेवा प्रणाली कुछ क्षीण तो नहीं होती जाती है।

यह मत समझ बैठो कि केवल वही लोग सेवा करने में दक्ष हैं जिनकी सेवा रीति चर्मचक्षु गोचर है। सेवा के महतो-महीयान् कार्य वही हैं जो सर्वथा अगोचर हैं। बड़ों की बात तो जाने दीजिए, भला कहिये तो गंगा ही की सेवा प्रणाली अन्तरिक्ष होने पर भी कैसी सुहावनी और कितनी सुखदायिनी है।

जो सेवा तुम्हें आज सुलभ हुई है उसे कल के लिये मत रख छोड़ो। ऐसा करने से तुम सेवा के उचित सुअवसर को सुचारु रूपेण व्यवहृत करने से चूकते हो। हो सकता है कि कल उस सेवा की आवश्यकता नहीं रहे जो आज किसी तरह पूरी नहीं हो सकी।

हो सकता है जितना तुम अपनी सेवा रीति पर ध्यान रखते हो उतना संसार तुम्हारी सेवा के ऊपर न रखता हो। तो इससे क्या? तुम अपने सत्य के पथ पर अचल होकर अग्रसर होते जाओ।

बहुत से मनुष्य ऐसे है जो कतिपय स्थानों पर सेवा के लिए पहुंचने को उत्सुक हैं, किन्तु, भला ऐसे कितने हैं जो सब जगह सर्वदा सेवा के लिये प्रस्तुत रहने के इच्छुक हों?

जिस दशा में तुम वर्तमान काल में हो यदि उस समय तुम्हें सेवा करने का सुअवसर प्राप्त न हो सका तो यह निश्चय है कि तुम भविष्य में चाहे किसी (भली या बुरी) दशा में भी क्यों न रहो तुम सेवा करने में सर्वदा असमर्थ बने रहोगे।

वह व्यक्ति इस संसार में नितान्त शून्य, अधम और दुःखभागी है जो बहुत तरह से अपनी सेवा करा कर भी उसके उपलक्ष्य में दूसरे की सेवा नहीं करता। यदि तुम्हारे दुःख पर दया करके किसी ने सहायता कर दी तो उस सहायता के बदले में तुम अपने तन-मन-धन से उसकी सेवा कर देने को उद्यत रहो। जो दूसरों की सेवा की जाती है उससे अपने आपको परखने की शक्ति प्राप्त होती है।

जो सेवा स्वभाविक बुद्धि से की जाती है वही सेवा सच्ची और सुहावनी है। जिसमें बनावट का बुबास न हो बल्कि सर्वांग में सर्वतोभावेन प्रेम ही का आभास, विकास और प्रकाश हो।

दूसरों के विषय में ऐसी बात कभी मत कहो जो उस आदमी के समक्ष न कह सको।

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


मेरी ममता को ज्ञान मिले।


मेरी ममता को ज्ञान मिले

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)

मृदु भावों की लोलुपता को

संयम की पावन शक्ति मिले,

सौरभ के प्यासे अंतर को

चिर शान्ति दायिनी भक्ति मिले,

इन भूले भटके चरणों को, पथ का निश्चित अनुमान मिले!

मेरी ममता को ज्ञान मिले!

मेरे मन की दुर्बलता को

दृढ़ निश्चय का आधार मिले,

मरु के पीड़ित मानव मृग को

शीतल करुणा की धार मिले,

विश्वास सीप को, कर्मों की उन्मुक्त स्वाति का दान मिले!

मेरी ममता को ज्ञान मिले!

विश्राम नहीं, इन चरणों को

संदेश मिले नव जागृति का,

प्रति पग मेरा इतिहास लिखे

युग की पवित्र संस्कृति का,

अभिशापों को शीतल कर देने का मुझको वरदान मिले!

मेरी ममता को ज्ञान मिले!


केवल अच्छाई को ही ग्रहण कीजिए।

वरेण्यञ्चैतद्वै प्रकट यति श्रेष्ठत्वमनिशम्।

सदा पश्येच्छ्रेष्टं मनन मपि श्रेष्ठस्य विद्धेत्॥

तथा लोके श्रेष्ठं सरलमनसा कर्म च भजेत्।

तदेत्थं श्रेष्ठत्वं व्रजति मनुजः शोभित गुणैः॥

अर्थ- ‘करेण्यं’ शब्द प्रकट करता है कि प्रत्येक मनुष्य को नित्य श्रेष्ठता की ओर बढ़ना चाहिए, श्रेष्ठ देखना, श्रेष्ठ चिन्तन करना, श्रेष्ठ विचारना और श्रेष्ठ कार्य करना, इस प्रकार मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।

दुनिया को दुरंगी कहा जाता है। इसमें भले और बुरे दोनों ही तत्व हैं। पाप पुण्य का, सुख-दुख का, हानि लाभ का, उन्नति अवनति का, प्रकाश अन्धकार का युग्म सर्वत्र उपस्थित रहता है। इन युग्मों में से केवल वही पक्ष ग्रहण करना चाहिए जो हमारे लिए हितकर है। एक ओर नीचता, विलासिता, शैतानी, दुराचार, स्वार्थपरता, का निकृष्ट मार्ग है। दूसरी ओर आत्म गौरव सदाचार महानता परमार्थ का श्रेष्ठ मार्ग है। गायत्री मंत्र का वरेण्यं शब्द बताता है कि इन दो मार्गों में से श्रेष्ठता का मार्ग ही कल्याण कारक है।

कितने व्यक्ति अशुभ चिन्तक होते हैं। उनकी विचारधारा बहुधा अनिष्ट की दिशा में प्रवाहित होती रहती है। दूसरे उन्हें सताते हैं, बुराई करते हैं, शत्रुता रखते हैं, हानि पहुँचाते हैं, स्वार्थ के कारण ही सम्बन्ध रखते हैं, ऐसी मान्यता बनाकर वे दूसरों की शिकायत ही किया करते हैं। भाग्य का उलटा है, ईश्वर का कोप है, गृहदशा खराब है ऐसा सोचकर वे अपने भविष्य को निराशा, चिन्ता, भय से ओत-प्रोत देखा करते हैं। भोजन को स्वादरहित, घर वालों को अवज्ञाकारी, कर्मचारियों को चोर, मित्रों को मूर्ख, परिचितों को दुर्गुणी समझ कर वे सदा निन्दा, आक्षेप, व्यंग झुँझलाहट प्रकट करते रहते हैं। ऐसे लोग चाहे कितनी ही अच्छी स्थिति में क्यों न रहें उन्हें सदा दुर्भाग्य एवं असंतोष ही सामने खड़ा दिखाई देगा उनके चित्त को क्षुब्ध करने के कोई न कोई कारण उपस्थित होते ही रहेंगे और उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण, और दुखी जीवन जीना पड़ेगा। कोई सुअवसर उन्हें सुखी नहीं बना सकता, स्वर्ग भेज दिया जाय तो वहाँ भी कुछ न कुछ छिद्रान्वेषण करते रहेंगे, किसी न किसी बात पर नाक भौं सिकोड़ते रहेंगे।

इस स्थिति का कारण उस व्यक्ति का अशुभ चिन्तन ही है। हरा ऐनक आँख पर चढ़ा लेने से हर चीज हरी दिखलाई पड़ती है, अशुभ दृष्टिकोण को अनिष्ट चिन्तन को अपना लेना एक ऐसी ही रंगीन ऐनक चढ़ा लेना है जिसके कारण सारे संबद्ध पदार्थ और मनुष्य पुरे अनुपयुक्त और कष्ट दायक दीखने लगते हैं। इस मानसिक कष्ट से छुटकारा उन्हें मिल नहीं सकता क्योंकि जिन पदार्थों परिस्थितियों और मनुष्यों से उन्हें काम पड़ता है उन्हें बदल दिया जाय, उनके स्थान पर नवीनता उपस्थित कर दी जाय तो भी संतोष नहीं हो सकता, कारण कि संसार का कोई भी पदार्थ, स्थिति अथवा मनुष्य ऐसा नहीं है जो पूर्णतया निर्दोष हो, नाक भौं सिकोड़ने के लिए उसको भी कुछ न कुछ कारण निकल ही आवेगा।

हमारे अनेकों मानसिक कष्ट इसी प्रकार के अशुभ चिन्तन के परिणाम होते हैं। बहुत ही साधारण सी कठिनाइयाँ पहाड़ सी दुर्गम दिखाई पड़ती हैं। भविष्य में किसी कष्ट के आने और उसके असह्य होने की कल्पना करके कितने ही मनुष्य आत्म हत्या तक कर लेते हैं। जो लोग जेल की बड़ी भारी यंत्रणा समझ कर उसके डर से थर थर काँपते थे वे जब जेल गये तो उन्होंने देखा कि वहाँ भी साधारण दैनिक जैसी ही गतिविधि रहती है और बड़ी आसानी से समय गुजर जाता है। आरम्भ में अनाथों, विधवाओं, आपदाग्रस्तों को ऐसा लगता है कि न जाने हमारे ऊपर अब क्या बीतेगी पर ईश्वर की ऐसी लीला है कि सभी को अपनी जीवन यात्रा चलाने का कोई न कोई मार्ग मिल जाता है और यों ही हंसते-खेलते वे बुरे दिनों को निकाल देते हैं। अपनी अशुभ चिन्तन वृत्ति के कारण मनुष्य जितना दुखी रहता है उसका सौवाँ भाग भी वास्तविक कष्ट उसे प्राप्त नहीं होता।

इसलिए गायत्री के वरेण्यं शब्द का संदेश हैं कि अशुभ चिन्तन को छोड़ कर ‘शुभ चिन्तन’ को अपनाया जाय। हर वस्तु की, हर परिस्थिति की, हर व्यक्ति की श्रेष्ठता, उत्तमता, उपयोगिता, अच्छाई को तलाश किया जाय। यदि शुभ दृष्टि से संसार के विविध अंगों पर दृष्टिपात किया जाय तो उनमें से सुन्दरता, मनोहरता, उपयोगिता का निर्झर झरता हुआ दृष्टिगोचर होगा और आनन्द से चित्त प्रफुल्लित हो जायगा। कवि लोग नदी, तालाब, पर्वत, आकाश, चाँद, तारे, घास, ओस, पुष्प, लता, वृक्ष, संध्या, ऊषा, बादल, बिजली आदि प्रकृति की साधारण सी कृतियों को देख कर आनन्द विभोर हो जाते हैं और उनका वर्णन करते हुए रस की धारा प्रवाहित कर देते हैं। अशुभ दृष्टि से इन्हीं चीजों को देखा जाय तो यह निर्जीव-उपेक्षणीय और डरावनी प्रतीत होंगी। वह तत्व ‘शुभ दृष्टि’ ही है जो इन साधारण वस्तुओं से हृदय की कली को खिला देती है।

अपने स्वजनों में हमें स्वार्थ और दुर्व्यवहार बड़ी मात्रा में दिखाई पड़ता है पर अब तक के उनके उपकारों और सहयोगों का भी विचार करें तो वह भी इतनी बड़ी मात्रा में मिलेगा कि उनके प्रति मस्तक श्रद्धा से नत हुए बिना नहीं रह सकता। आज अपने सम्मुख अनेकानेक अभाव और कष्ट दिखाई पड़ते हैं। परन्तु यदि यह तलाश किया जाय कितने सुख और साधन हमें प्राप्त हैं, असंख्यों की अपेक्षा हम कितनी अच्छी स्थिति में हैं, तो यह पता चलेगा कि वर्तमान स्थिति भी कम आनन्ददायक, कम महत्वपूर्ण, कम सुविधा जनक नहीं है। यदि शुभ चिन्तन की दृष्टि से अपनी सुविधाओं पर विस्तार-पूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि भगवान ने अपरिमित सुसाधन हमें दे रखे हैं। अन्धे, लूले, लंगड़े, कोढ़ी, अनाथ, असहाय, दरिद्र, अशिक्षित, रोगी, अछूत, वृद्ध, कैदी, ऋण ग्रस्त, पराधीन आदि कितने ही प्रकार के व्यक्तियों की अपेक्षा हम कहीं साधन सम्पन्न हैं। हमारी स्थिति में पहुँचने के लिए भी हजारों लाखों प्राणी आतुर हैं, पशु-पक्षियों, कीट पतंगों को हमारी स्थिति मिल जाय तो वे अपना कितना बड़ा सौभाग्य समझेंगे इसकी यदि ठीक प्रकार कल्पना की जा सके तो पता चलेगा कि अपना वर्तमान सौभाग्य कितना उच्च कोटि का है, और प्रसन्न होने के कितने अधिक अवसर अपने को उपलब्ध हैं।

गायत्री के ‘वरेण्यं’ शब्द द्वारा हमारे लिए यह शिक्षा है कि हम अनिष्ट को छोड़ कर श्रेष्ठ का चिंतन करें। अशुभ चिंतन को त्यागकर शुभ चिंतन को अपनाएं जिससे मानसिक कुढ़न और असंतोष से छुटकारा मिले और सर्वत्र सब परिस्थिति में, आनन्द ही आनन्द उपलब्ध हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने का प्रयत्न ही न किया जाय। वैसा प्रयत्न तो अवश्य जारी रखना चाहिए क्योंकि आत्म उन्नति करना, आगे बढ़ना, शक्ति संचय करना यह तो मनुष्य का कर्तव्य धर्म है जो उसे नहीं करता वह धर्मघात का अपराधी बनता है। उन्नति के लिए हंसी, खुशी, संतोष, उत्साह एवं कठोर परिश्रम के साथ प्रयत्न करना एक बात है और अपनी स्थिति से असंतुष्ट, दुखी, निराश रह कर सौभाग्य के लिए तरसते रहना दूसरी बात। निश्चित रूप से इनमें से पहली बात ही श्रेयष्कर है।

यह पहले ही कहा जा चुका है कि दुनिया दुरंगी है। उसमें अच्छाइयों की भाँति बुराइयाँ भी कम नहीं है। बुराइयों को दूर करने और अच्छाइयों को बढ़ाने के हमारे सभी बुद्धिमत्ता पूर्ण प्रयत्न जारी रहने चाहिए। साम, दाम, दंड, भेद के नरम-गरम तरीकों को बरतते हुए पदार्थों के, परिस्थितियों के, मनुष्यों के दोषों को दूर करने और उन्हें अच्छा बनाने के लिए शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए पर इन प्रयत्नों में एक बात ध्यान रखने की है ईर्ष्या, शत्रुता, घृणा, प्रतिशोध, प्रति अहंकार आदि की नीच भावनाओं के साथ इस प्रकार का संशोधन कार्य नहीं होना चाहिए।

वरन् अध्यापक का विद्यार्थियों के प्रति, डॉक्टर का रोगियों के प्रति, न्यायाधीश का अपराधियों के प्रति, जिस प्रकार अपार प्रेम और कठोर व्यवहार होता है उसी श्रेष्ठ भावना के साथ हम भी अपनी निकटवर्ती बुराइयों का संशोधन और अच्छाइयों का स्थापन करें। कार्य भले ही कठोर हो पर भावनाएं उसमें कठोरता की नहीं श्रेष्ठता की ही होनी चाहिए।

प्रत्येक क्षेत्र में अच्छाई और बुराई मिली हुई है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जो पूर्णतया ग्राह्य या पूर्णतया त्याज्य हो। साहित्य में अच्छी पुस्तकें भी हैं और कुविचारों को भड़काने वाली घासलेटी किताबें भी। गायन, नृत्य, वाद्य में अन्तरात्मा को ऊंचा उठाने की शक्ति भी है और गिराने की भी। संगति से कुसंगत भी होता है और सत्संग भी। इन दोनों पक्षों में से हमें केवल श्रेष्ठ को ही ग्रहण करना चाहिए। सब वस्तुओं का श्रेष्ठ भाग ग्रहण और निकृष्ट भाग त्याज्य करना चाहिए। पानी और दूध मिला हुआ हो तो हंस उसमें से दूध को पीता है और पानी को छोड़ देता है यही कार्यपद्धति हमारी भी होनी चाहिए।

हम अपनी अच्छाइयाँ बढ़ावें। सद्गुणों को सब से बड़ी सम्पत्ति समझें। धन और सद्गुणों की तुलना में वरेण्यं को श्रेष्ठ समझें। दूसरों का बड़प्पन उनके धन से नहीं, वरन् गणों के आधार पर नापें। हमारा पूरा और पक्का विश्वास होना चाहिए कि सुख का वास्तविक हेतु ‘वरेण्यं’ है, ‘हिरणयं’ नहीं, श्रेष्ठता है स्वर्ण नहीं।

हमारी आकाँक्षाएं, भावनाएं, विचारधाराएं, अभिलाषाएं, चेष्टाएं, क्रियाएं, अनुभूतियाँ, श्रेष्ठ होनी चाहिए। हम जो कुछ सोचें जो कुछ करें वह आत्मा के गौरव के अनुरूप हो। दुरंगी दुनिया में केवल ‘वरण्यं’ ही वरण करने योग्य हैं, श्रेष्ठ ही ग्रहण करने योग्य हैं। स्मरण रक्खो गायत्री के

‘वरेण्यं’ शब्द की शिक्षा है ‘अशुभ’ का त्याग और ‘शुभ का ग्रहण’ इस शिक्षा को हृदयंगम किये बिना कोई मनुष्य सुख-शान्ति का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता।


बहुमत की अपेक्षा धर्म श्रेष्ठ है।

(लोकमान्य तिलक)

यह प्रत्यक्ष अनुभव की बात है कि यद्यपि आधिभौतिक विषयक सुख प्रत्येक को इष्ट होता है तथापि जब हमारा सुख अन्य लोगों के सुखोपभोग में बाधा डालता है तब वे लोग बिना विघ्न किये नहीं रहते। इसलिए कई आधिभौतिक पण्डित प्रतिपादन किया करते हैं कि यद्यपि स्वयं अपना सुख या स्वार्थ साधन ही हमेशा उद्देश्य है तथापि सब लोगों को समान रियायत दिए बिना सुख का मिलना संभव नहीं है। इस लिए अपने सुख के लिए ही दूरदर्शिता के साथ अन्य लोगों के सुख की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हमें दुःख हुआ तो हम रोते हैं और दूसरों को हुआ तो हमें दया आती है। क्यों? इसलिए न कि जब हम पर भी आ बीतेगी तब वे हमारी सहायता करेंगे। हम अन्य लोगों पर इसलिए प्यार रखते हैं कि वे भी हम पर प्यार करें। और कुछ नहीं तो हमारे मन में अच्छा कहलाने का स्वार्थमूलक हेतु अवश्य रहता है। परोपकार और परार्थ दोनों शब्द केवल भ्रान्ति हैं। यदि मूलतः कुछ सच्चा है तो स्वार्थ। और स्वार्थ कहते है। अपने लिए सुख प्राप्ति या अपने दुःख निवारण को। माता बच्चे को दूध पिलाती है इसका कारण यह नहीं है कि वह बच्चे पर प्रेम रखती हो सच्चा कारण तो यही है कि उसके स्तनों में दूध के भर जाने से उसे जो दुःख होता है उसे कम करने के लिए अथवा भविष्य में यही लड़का मुझे प्यार करके सुख देगा इस स्वार्थ सिद्धि के लिए ही बच्चे को वह दूध पिलाती है। इस बात को दूसरे वर्ग के आधि भौतिकवादी मानते हैं कि स्वयं अपने ही सुख के लिए भी क्यों न हो परन्तु भविष्य पर दृष्टि रखकर ऐसे नीति धर्म का पालन करना चाहिए कि जिससे दूसरों को भी सुख हो। मनुष्य केवल विषय सुखरूप स्वार्थ के साँचे में ढला एक पुतला है। इंग्लैण्ड में हाब्स और फ्राँस में हेल्वेशियस ने इस मत का प्रतिपादन किया है। परन्तु इस मत के अनुयायी अब न तो इंग्लैण्ड में ही और न कहीं बाहर ही अधिक मिलेंगे।

हाब्स के नीतिधर्म की उत्पत्ति के प्रसिद्ध होने पर वाल्टर सरीखे विद्वानों ने उसका खण्डन करके सिद्ध किया कि मनुष्य स्वभाव केवल स्वार्थी नहीं है, स्वार्थ के समान ही उसमें जन्म से ही पर दया, प्रेम, कृतज्ञता आदि सद्गुण भी कुछ अंश में रहते हैं। इसलिए किसी का व्यवहार या कर्म का नैतिक दृष्टि से विचार करके केवल स्वार्थ या दूरदर्शी स्वार्थ की ओर ही ध्यान न देकर, मनुष्य स्वभाव के दो स्वाभाविक गुणों स्वार्थ और परार्थ की ओर नित्य ध्यान देना चाहिए। जब हम देखते हैं कि व्याघ्र सरीखे क्रूर जानवर भी अपने बच्चों की रक्षा के लिए जान देने को तैयार हो जाते हैं तब हम यह कभी नहीं कह सकते कि मनुष्य के हृदय में प्रेम और परोपकार बुद्धि जैसे सद्गुण केवल स्वार्थ ही से उत्पन्न हुए हैं। इससे सिद्ध होता है कि धर्म-अधर्म की परीक्षा केवल दूरदर्शी स्वार्थ से करना शास्त्र की दृष्टि से भी उचित नहीं है।

एक ही मनुष्य के सुख को न देख कर, किन्तु सब मनुष्य जाति के आधिभौतिक सुख-दुःख के तारतम्य को देख कर ही नैतिक कार्य-अकार्य का निर्णय करना चाहिए। एक ही कृत्य से एक ही समय में समाज के या संसार के सब लोगों को सुख होना असंभव है। कोई एक बात किसी को सुखकर मालूम होती है तो वही बात दूसरे को दुःखदायक हो जाती है। इसीलिए सब लोगों का सुख इन शब्दों का अर्थ “अधिकाँश लोगों का अधिक सुख” करना पड़ता है। जिससे अधिकाँश लोगों का अधिक सुख हो, उसी बात को नीति की दृष्टि से उचित और ग्राह्य मानना चाहिए और उसी प्रकार का आचरण करना इस संसार में मनुष्य का सच्चा कर्त्तव्य है कोई काम अच्छा है या बुरा, धर्म है या अधर्म नीति का है अथवा अनीति का इत्यादि बातों का सच्चा निर्णय उस काम के केवल बाहरी फल या परिणाम अर्थात् वह अधिकाँश लोगों को अधिक सुख देगा कि नहीं इतने ही से नहीं किया जा सकता, उसके साथ-साथ यह भी जानना चाहिए कि उस काम को करने वाले की बुद्धि वासना या हेतु कैसा है। एक समय की बात है कि अमेरिका में एक बड़े शहर में, सब लोगों के सुख और उपयोग के लिए, ट्रामवे की बहुत आवश्यकता थी, परन्तु अधिकारियों की आज्ञा पाये बिना ट्रामवे नहीं बनाई जा सकती थी। सरकारी मंजूरी मिलने में बहुत देरी हुई तब ट्रामवे के व्यवस्थापक ने अधिकारियों को रिश्वत देकर जल्द ही मंजूरी ले ली, ट्रामवे बन गई और उससे शहर के सब लोगों को सुविधा और फायदा हुआ, कुछ दिनों के बाद रिश्वत की बात प्रकट हो गई और उस व्यवस्थापक पर फौजदारी मुकदमा चलाया गया। पहली ज्यूरी पंचायत का एक मत नहीं हुआ इसलिए दूसरी ज्यूरी चुनी गई। दूसरी ज्यूरी ने व्यवस्थापक को दोषी ठहराया, अतएव उसे सजा दी गई। इस उदाहरण में अधिक लोगों को अधिक सुख वाले नीति तत्व से काम चलाने का नहीं क्योंकि यद्यपि घूस देने से ट्रामवे बन गई यह बाह्य परिणाम अधिक लोगों को अधिक सुख दायक था, तथापि इतने ही से घूस देना न्याय नहीं हो सकता। दान करने को अपना धर्म समझ कर निष्काम बुद्धि से दान करना और कीर्ति के लिए तथा अन्य फल की आशा से दान करना इन दो कृत्यों का बाहरी परिणाम यद्यपि एक सा हो, तथापि श्रीमद्भगवतगीता में पहले दान को सात्विक और दूसरे को राजसिक कहा है (गी-17-20-21) और यह भी कहा गया है कि यदि वही दान कुपात्रों को दिया जाय तो वह तामसिक अथवा अर्हित है।

हमारा यह कहना नहीं है कि अधिकाँश लोगों का अधिक शुभ या हित वाला तत्व बिल्कुल ही निरुपयोगी है। केवल बाह्य परिणामों का विचार करने के लिए उससे बढ़कर दूसरा तत्व कहीं नहीं मिलेगा, हमारा तो यह कथन है कि जब नीति की दृष्टि से किसी बात को न्याय अथवा अन्याय कहना हो तब केवल बाह्य परिणामों को देखने से काम नहीं चल सकता उसके लिए और भी कई बातों पर विचार करना पड़ता है, अतएव नीतिमत्ता का निर्णय करने के लिए पूर्णतया इसी तत्व पर अवलम्बित नहीं रहते। इसलिए इससे भी अधिक निश्चित और निर्दोष तत्व को खोज निकालना आवश्यक है।

गीता में जो यह भेद कहा गया है कि कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है (गी 2-47)। उसका भी यही अभिप्राय है, यदि केवल बाह्य कर्मों पर ध्यान दें तो वे बहुधा भ्रामक होते हैं “स्नान, संध्या, तिलक, माला” इत्यादि ब्राह्म कर्मों के होते हुए भी, पेट में क्रोधाग्नि, का भड़कते रहना असंभव नहीं है। परन्तु यदि हृदय का भाव शुद्ध हो तो बाह्य कर्मों का कुछ भी महत्व नहीं रहता, सुदामा के मुट्ठी भर चावल सरीखे अत्यन्त अल्प बाह्य कर्म की धार्मिक और नैतिक योग्यता, अधिकाँश लोगों को अधिक सुख देने वाले हजारों मन अनाज के बराबर ही समझी जाती है।

इस बात को अधिक भौतिक सुखवादी भी मानते हैं कि शारीरिक सुख से मानसिक सुख की योग्यता अधिक है। पशु को जितने सुख मिल सकते हैं वे सब किसी मनुष्य को देकर उससे पूछो कि क्या तुम पशु होना चाहते हो, तो वह कभी इस बात के लिए राजी न होगा इसी तरह ज्ञानी पुरुषों को यह बतलाने की आवश्यकता नहीं कि तत्व ज्ञान के गहन विचारों से बुद्धि में जो एक प्रकार की शांति उत्पन्न होती है उसकी योग्यता, साँसारिक संपत्ति और बाह्योपभोग से हजार गुनी बढ़ कर है। यदि लोक मत को देखें तो भी यही ज्ञात होगा कि नीति का निर्णय करना केवल संख्या पर अवलम्बित नहीं है, लोग जो कुछ किया करते हैं वह सब केवल आधिभौतिक सुख के ही लिए नहीं किया करते। वे आधिभौतिक सुख ही को आपका परम उद्देश्य नहीं मानते। बल्कि हम लोग यही कहा करते हैं कि बाह्य सुखों की कौन कहे, विशेष प्रसंग आने पर अपनी जान की भी परवाह नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ऐसे समय में आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार जिन सत्य आदि नीति धर्मों की योग्यता अपनी जान से भी अधिक है, उनका पालन करने के लिए मनोनिग्रह करने में ही मनुष्य का मनुष्यत्व है।


ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए।

(महात्मा गान्धी)

शास्त्रकारों ने साधारण ब्रह्मचर्य को भी बड़ा कठिन बताया है। यह बात 99 फीसदी सब है, इसमें एक फीसदी कमी है। इसका पालन कठिन जान पड़ता है क्योंकि हम दूसरी इन्द्रियों का संयम नहीं करते। दूसरी इन्द्रियों में मुख्य है, जीभ। जो अपनी जीभ को वश में रख सकता है उसके लिये ब्रह्मचर्य सुगम हो जाता है। प्राणि शास्त्र-विशारदों का कहना है कि जिस हद तक पशु ब्रह्मचर्य का पालन करता है उस हद तक मनुष्य नहीं करता। यह बात सच है। इसका कारण मालूम करने पर पता चलेगा कि पशु अपनी जीभ पर पूरा काबू रखते हैं। इच्छा से नहीं, स्वाभाविक तौर पर। जानवर केवल चारे पर गुजर करते हैं। वे उतना ही खाते हैं जितने में उनका पेट भर सके। वे असल में जीने के लिये खाते हैं, खाने लिये नहीं जीते। परन्तु हम तो इससे बिल्कुल उलटा काम करते हैं। माँ अपने बच्चे को तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन कराती है। वह समझती है कि बच्चे के साथ प्रेम दिखाने का यही सबसे अच्छा रास्ता है। वास्तव में स्वाद तो रहता है भूख में, भूख के वक्त सूखी रोटी भी मीठी लगती है और बिना भूख के आदमी को लड्डू भी फीके और बेस्वाद मालूम पड़ेंगे। हम बहुत-सी चीजें खा-खा कर पेट को खूब ठूँस-ठूँस कर भर लेते हैं और फिर कहते हैं कि ब्रह्मचर्य का पालन नहीं होता। ईश्वर ने हमें देखने के लिए जो आँखें दी हैं, उनको हम मलिन करते हैं और देखने की चीजों को देखना नहीं सीखते। माता को गायत्री क्यों न पढ़नी चाहिये और वह बच्चों को गायत्री क्यों न सिखावें, इस विवाद के पचड़े में पड़ने की अपेक्षा हम उसके तत्व-सूर्योपासना को समझकर, सूर्योपासना करावें तो क्या ही अच्छा हो। सूर्य की उपासना तो सनातनी और आर्यसमाजी ही कर सकते हैं। यह तो मैंने आप के सामने स्थूल अर्थ रखा है। इस उपासना का अर्थ क्या है? अपना सिर ऊंचा रखकर, सूर्यनारायण के दर्शन करके आँखों को शुद्ध और स्वस्थ करना।

गायत्री के रचयिता ऋषि थे, द्रष्टा थे। उन्होंने देखा कि सूर्योदय में जो नाटक है, जो सौंदर्य है, जो लीला है, और कहीं नहीं देखी जा सकती। ईश्वर जैसा सुन्दर सूत्रधार और कहीं नहीं मिल सकता और प्रकाश से बढ़कर भव्य रंगभूमि कहीं नहीं मिल सकती, परन्तु आज कौन सी माता बालक को आँखें धोकर उसे आकाश-दर्शन कराती है? माता के भावों में तो बहुत-से प्रपंच भरे रहते हैं। बड़े-बड़े घरों में जो शिक्षा मिलती है उसके फलस्वरूप तो लड़का शायद बड़ा अधिकारी होगा। परन्तु इस बात पर कौन विचार करता है कि जाने-बेजाने घर में जो शिक्षा बालकों को मिलती है उससे वे कितनी बातें सीख जाते हैं। माता-पिता हमारे शरीर को कपड़ों से ढकते हैं, सजाते हैं, परन्तु इससे कहीं शोभा बढ़ सकती है? कपड़े शरीर को ढकने और सर्दी-गर्मी से उसकी रक्षा करने के लिये हैं सजाने के लिये नहीं। सर्दी से ठिठुरे हुये लड़के को जब हम अंगीठी के पास बैठा लेंगे, या मुहल्ले में कहीं खेलने-कूदने को भेज देंगे, तभी उसका शरीर वज्र की तरह मजबूत होगा। जो ब्रह्मचर्य का पालन करता है उसका शरीर वज्र की तरह मजबूत जरूर होना चाहिए। हम तो बच्चों के शरीर को नष्ट कर डालते हैं। हम उसे घर में बन्द रखकर गरम कर देना चाहते हैं। इससे तो उसके चमड़े में ऐसी गर्मी भर जाती है जिसे हम छाजन के नाम से पुकार सकते हैं। हमने शरीर को लाड़-प्यार से खराब कर दिया है।

घर में तरह-तरह की बातें करके हम बालकों के मन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। हम उनकी शादी की बातें करते हैं और इसी तरह की चीजें और अनेक दृश्य भी उन्हें दिखाते हैं। मुझे तो ताज्जुब होता है कि हम जंगली ही क्यों न हो गये? ईश्वर ने मनुष्य की रचना इस प्रकार की है कि पतन के अनेक अवसर आने पर भी वह बच जाता है। उसकी लीला ऐसी गहन है। यदि हम ब्रह्मचर्य के रास्ते से ये सब विघ्न दूर कर दें तो उसका पालन बहुत सुगमता से हो जाय।

इस दशा में, हम संसार के साथ शारीरिक मुकाबला करना चाहते हैं, उसके दो मार्ग हैं। एक आसुरी, दूसरा दैवी। आसुरी मार्ग है-शारीरिक बल प्राप्त करने के लिये हर तरह के उपायों से काम लेना-माँस आदि हर तरह की चीजें खाना। मेरे बचपन में एक दोस्त मुझसे कहा करता था कि हमें माँस जरूर खाना चाहिये, अन्यथा हम अंगरेजों की तरह हट्टे-कट्टे और मजबूत न हो सकेंगे। जापान को भी जब दूसरे देश के साथ मुकाबला करना पड़ा तब वहाँ माँस खाने की प्रथा चल पड़ी। यदि आसुरी ढंग से शरीर को तैयार करने की इच्छा हो तो इन चीजों का सेवन करना पड़ेगा। परन्तु यदि दैवी साधन से शरीर तैयार करना हो तो उसका एक मात्र उपाय ब्रह्मचर्य है। जब मुझे कोई नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहकर पुकारता है तब मुझे अपने ऊपर दया आती है। इस मानपत्र में मुझे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहा गया है। जिन लोगों ने इस अभिनन्दन-पत्र का मसौदा तैयार किया है उन्हें पता नहीं है कि नैष्ठिक ब्रह्मचर्य किसे कहते हैं? और जिसके बाल बच्चे हो गये हैं उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कैसे कह सकते हैं? नैष्ठिक ब्रह्मचारी को न तो कभी बुखार आता है, और न कभी उसके सिर में दर्द होता है। उसे न कभी खाँसी होती है और न कभी पेट के फोड़े की शिकायत ही होती है। डॉक्टर लोग कहते हैं कि नारंगी का बीज आँत में रह जाने से भी पेट का फोड़ा हो जाता है। परन्तु जिसका शरीर स्वच्छ और नीरोग होता है उसमें ये बीज टिक ही नहीं सकते।

मैं चाहता हूँ कि मुझे नैष्ठिक ब्रह्मचारी बताकर कोई मिथ्या-वादी न हों। नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का तेज तो मुझसे कई गुना अधिक होना चाहिये। मैं आदर्श ब्रह्मचारी नहीं हूँ। हाँ, मैं वैसा बनना जरूर चाहता हूँ। मैंने तो ब्रह्मचर्य की सीमा बताने वाले अपने अनुभव के कुछ कण आपके सामने रखे हैं।

ब्रह्मचारी रहने का यह मतलब नहीं है कि मैं किसी स्त्री को छु न सकूँ, या अपनी बहन को स्पर्श न करूं। ब्रह्मचारी रहने का अभिप्राय यह है कि स्त्री का स्पर्श करने से किसी तरह का विकार ऐसे न पैदा हो जैसे कि कागज को छू लेने से नहीं होता। मेरी बहन बीमार हो, और ब्रह्मचर्य के कारण उसकी सेवा करने या उसे छूने में मुझे हिचकना पड़े तो ऐसा ब्रह्मचर्य तीन कौड़ी का है। हम मुर्दा शरीर को छूकर जिस प्रकार निर्विकार दशा का अनुभव करते हैं उसी प्रकार किसी सुन्दर युवती को छूकर हम निर्विकार दशा में रह सकें तभी हम ब्रह्मचारी हैं। यदि आप यह चाहते हैं कि बालक ऐसे ब्रह्मचारी बनें, तो इसका कार्यक्रम आप नहीं बना सकते, ऐसा अभ्यास क्रम, तो मुझ ऐसा चाहे वह अधूरा ही क्यों न हो कोई ब्रह्मचारी ही बना सकता है। ब्रह्मचारी स्वाभाविक संन्यासी होता है। ब्रह्मचर्याश्रम तो संन्यासाश्रम से भी बढ़कर है। परन्तु हमने उसे गिरा दिया है। इससे हमारे गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम दोनों ही बिगड़ गये हैं, और संन्यास का तो नाम भी नहीं रह गया है। हमारी ऐसी असहाय अवस्था हो गई है।

ऊपर जो आसुरी मार्ग बताया गया है उस पर अनुगमन करके तो आप पाँच सौ वर्षों में भी पठानों का मुकाबला न कर सकेंगे। यदि आज दैवी मार्ग का अनुकरण हो तो आज ही पठानों का मुकाबला किया जा सकता है क्योंकि दैवी साधन से आवश्यक मानसिक परिवर्तन एक क्षण में हो सकता है। परन्तु शारीरिक परिवर्तन करने के लिये तो युग बीत जाते हैं। हम दैवी मार्ग का अनुकरण तभी कर सकेंगे जब हमारे पहले पूर्व जन्म का पुण्य होगा और हमारे लिये माँ-बाप उचित साधन पैदा करेंगे।


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भोजन अकेले न खाये। धन इस प्रकार कमाने का विचार करे जो किसी को साथ मिला ले। गाथा भी अकेला करे। जहाँ सब सोते हों वहाँ अकेला जागरण न करें।

-भीष्म

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काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरक के दरवाजे हैं। ये आत्मा को नाश करने वाले हैं। इसलिये इनसे बचना चाहिए। -गीता

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मृत्यु नवीन जीवन का आरंभ मात्र है।

-नारायण


अणुबम या योग साधना।

(श्री रामप्रताप ‘नि’ हजारीबाग)

परमाणु क्या है? वस्तु के कण अणु होते हैं जो मानव चक्षुओं द्वारा दिखलाई नहीं पड़ते। उसके भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग को परमाणु कहते हैं इसकी सूक्ष्मता का अन्दाज इस बात से लगाया जा सकता है कि एक सुई के छेद में करोड़ों अणु के कण निहित हैं।

अणु की विशेषतायें भी बड़ी विचित्र हैं। अणु ठोस नहीं होता। यह सौरमण्डल से मिलता है। जिस तरह सूर्य के चारों ओर ग्रह नक्षत्र-चक्कर काटा करते हैं। ठीक उसी तरह अणु के केन्द्र में एक पिण्ड होता है। इस केन्द्रीय पिण्ड में दो मुख्य बातें पायी जाती हैं 1- प्रोट्रॉन (विद्युत सहित) 2-इलेक्ट्रॉन (विद्युत रहित)। केन्द्र पिण्ड के चारों ओर ग्रह नक्षत्र की तरह एक दूसरे प्रकार के कण जिसे ‘न्यूट्रॉन’ कहते हैं निरन्तर घूमा करते हैं। इस तरह यह अणु सौरमण्डल से बिल्कुल मिलता है।

अणुबम का जब विस्फोट होता है तो अणु बम में निहित केन्द्र पिण्ड को दूसरे प्रकार के कण ‘न्यूट्रॉन’ द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है। जिससे असाधारण उष्णता और चमक पैदा हो जाती है और विनाशलीला होने लगती है।

प्रश्न होता है कि सूक्ष्मातिसूक्ष्म अणु के कण में इस कदर शक्ति कहाँ से आई? इसका उत्तर संसार प्रसिद्ध विद्वान वेत्ता आइन्सटाइन साहब ने दिया है। जो हाल ही में अखबारों में प्रकाशित हुआ था। इनकी गवेषणा ने वैज्ञानिक जगत के सिद्धान्त का रूप ही बदल डाला है।

आज तक तो यह माना जाता था कि संसार में पाए जाने वाले तत्वों का नाश कभी नहीं होता पर अब यह निश्चित हो गया है कि मूलतत्वों को वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा बदला भी जा सकता है। तत्व के लुप्त हो जाने पर वह शक्ति में परिणत हो जाता है। आइन्सटाइन साहब ने अपनी नई खोजों द्वारा यह भलीभाँति सिद्ध किया है कि मूल तत्वों को वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा बदला जाता है। इसी सिद्धान्त पर हाइड्रोजन बम बनाया गया है।

वैज्ञानिकों के अवलोकन के फलस्वरूप यह पता चला है कि सूर्यलोक में हाइड्रोजन गैस बराबर एक दूसरी गैस में परिणत होते रहते हैं जिसे ‘हिलियम’ कहते हैं। इस परिवर्तन का मूल कारण सूर्यलोक में पाया जाने वाला तापमान है।

अणुबम में अणु का विस्फोट होता चला जाता है परन्तु हाइड्रोजन बम में इसके विपरीत अणु के कण उच्च तापमान से मिलते हैं। अणु से उच्च तापमान पैदाकर हाइड्रोजन बम बनाने में आसानी होती है।

योग में हम स्थूल से सूक्ष्म की और क्रमशः बढ़ते जाते हैं। स्थूल शरीर से प्राण, प्राण से मन, और मन से आत्मा में पहुँचते हैं। इस तरह स्थूल शरीर के लोप होने पर प्राण में, प्राण के लोप होने पर मन में और मन के लोप होने पर आत्मा में पहुँच जाते हैं।

अतः ज्यों-2 हम योग प्रणाली की ओर बढ़ते जाते हैं एक-एक तत्व का लोप होता जाता है और तत्व के लोप होने पर वह अधिक में परिणत होता जाता है और अन्त में शक्ति के केन्द्र आत्मा में पहुँचकर पूर्ण शक्तिशाली होकर लौट जाता है। अतः योग द्वारा भी यह सिद्ध है कि तत्व के लोप होने पर वह शक्ति में परिणत होता जाता है। यही योग का रहस्य है।

योग साधन में बहिर्मुखी जीवन को अन्तर्मुखी बनाने का अभ्यास इसलिए किया जाता है सूक्ष्म शक्ति को बाह्याडम्बरों में खर्च होने से बचाकर तत्वों को सूक्ष्म बनाने की प्रक्रिया में लगाया जा सके। तीव्र इच्छा, चित्त की एकाग्रता, लक्ष्य की तन्मयता के आधार पर हमारे शारीरिक और मानसिक तत्व क्रमशः सूक्ष्म होते चलते हैं। और उस सूक्ष्मता के आधार पर हमारे उपकरण पदार्थ से शक्ति में परिणित होते चलते हैं। यह शक्ति ही यदा-कदा आश्चर्यजनक योगिक सिद्धियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। योगी आध्यात्मविज्ञान पर अवलंबित साधना द्वारा अपने तत्वों को शक्ति में परिणित कर लेता है और शक्तिपुँज बनकर प्रत्यक्ष या परोक्ष में ऐसे कार्य करता है जो सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं होते।

योग एक सुव्यवस्थित विज्ञान है। अणु का शक्ति में परिवर्तन होना वैज्ञानिकों ने कुछ रासायनिक पदार्थों यंत्रों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा संभव किया है। इस कार्य को भारतीय आध्यात्मवेत्ता योग विज्ञान द्वारा चिरकाल से करते आ रहे हैं। अणु बम या हाइड्रोजन बम से केवल भयंकर विनाश की ही कल्पना की जा सकती है पर योग द्वारा अपने बाह्य उपकरण को स्थूल से सूक्ष्म में, अणु से शक्ति में परिणित करके योगी प्रबल शक्ति और ऐश्वर्य का स्वामी बनकर विश्वव्यापी महाशक्ति हो जाता है। एक ही वैज्ञानिक सिद्धान्त “अणु का शक्ति में परिणित होना” योगियों और वैज्ञानिकों द्वारा दो भिन्न प्रकार से होता है और उसके परिणाम भी अलग-2 प्रकार से हो रहे हैं।

वह दिन दूर नहीं जब विश्व के सार्वभौम विवेक को यह निर्णय करना पड़ेगा कि अणु को शक्ति में बदल कर प्रलयकर बम तैयार किये जायं या क्षुद्र जीव को आत्मा- महान आत्मा- परम आत्मा- बनाया जाय। इस अन्तिम निर्णय पर ही संसार का भविष्य निर्भर है।


सफल नेतृत्व-एक साधना।

(प्रोफेसर राम चरण महेन्द्र एम. ए.)

सफल नेतृत्व एक प्रकार की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया का फल है जिसके कारण नेता की आध्यात्मिक शक्तियाँ विकेन्द्रित होकर विशाल जनसमूह को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक नेता कहाने वाला व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के प्रभाव से जनता और समाज में उन्नति करता है। समाज तथा जनता में होने वाले परिवर्तन उसके मन की भावना एवं सूचना के अनुसार होते हैं।

सफल नेता की शिवत्व भावना, सबका भला “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” से प्रेरित होती है। प्रत्येक मनुष्य में शिवत्व है। इस शक्ति से भर कर जब कोई सज्जन संसार के कल्याण के लिए अग्रसर होता है तो अनेक प्रकार की गुप्त शक्तियाँ उसके व्यक्तित्व में स्वयं विकसित हो उठती हैं। संसार की प्रत्येक शक्ति का स्वभाव है कि वह दुष्ट के हाथ से अपना विघातक स्वरूप स्पष्ट करती है तथा सचित्र सज्जन व्यक्ति के हाथ में विधायक स्वरूप धारण करती है। शक्ति के परिणाम चाहे कितने ही हों पर स्वरूप एक ही होता है। चरित्र की उदात्तता के अनुसार, मन की भावना के सामर्थ्य से नेतृत्व की शक्तियों का उदय होता है। ज्यों ही सद्भावना के सामर्थ्य का प्रवाह योग्य दिशा में प्रवाहित होता है त्यों−ही शक्तियाँ विकसित होती हैं।

नेतृत्व की साधना का प्रारंभ

सफल नेता होने से पूर्व आप अपने से पूछिये कि क्या आप वास्तव में समाज की सेवा करना चाहते हैं? आप जनता को आश्चर्यचकित करने मात्र के लिए या अपने विज्ञापन के लिए ही तो आप नेतागिरी नहीं कर रहे हैं? जिस क्षेत्र में आप नेतृत्व करना चाहते हैं, उस संबन्ध में आपकी जानकारी पूर्ण है या नहीं? अन्य देशों में उस प्रकार का जागरण उत्पन्न करने वालों के सम्बन्ध में आपने पूरी तरह पढ़ लिया है या नहीं? अपनी शक्तियों एवं साधनों के प्रति आपको पूर्ण विश्वास है या नहीं? आपका शरीर पूर्ण स्वस्थ, इन्द्रियाँ कार्य में सतर्क, बुद्धि कुशाग्र और मन में समस्वरता है या नहीं?

उपरोक्त प्रश्नों द्वारा अपने व्यक्तित्व की जाँच के पश्चात् यदि आप अपने अन्दर गुप्त शक्ति का असाधारण प्रभाव पायें, तब इस क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। मान लीजिये आपने शारीरिक व्यायाम द्वारा शरीर को पुष्ट बना लिया है, आपके पास पुरे कद का स्वस्थ और निरोग शरीर है। मन में उत्साह और आशा है और आप सद्इच्छा से प्रेरित हैं। आगे क्या करें?

पहले अपना क्षेत्र तलाश कीजिये। आप किस क्षेत्र में जनता का मार्ग प्रदर्शन करना चाहते हैं - धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक या साहित्यिक क्षेत्र में। अपने आपको उच्चतम, महत्तम सबसे आगे समझते हैं। सावधान, अपनी साधनायें तोल लीजिये। जब तक आपने उपरोक्त क्षेत्रों में मन लगा कर दीर्घकालीन अभ्यास नहीं किया है, उच्चतम ज्ञान और बुद्धि की एकाग्रता से उस विषय को अपना नहीं बना लिया है, तब तक इस क्षेत्र में पदार्पण करना नितान्त मूर्खता है। जिसकी जिस क्षेत्र में जितनी अधिक साधनायें हैं, जिसने जितना अधिक अभ्यास किया है और जिसके पास जितना अधिक ज्ञान है वह उतना ही सफलता से नेतृत्व कर सकता है। क्षेत्र का चुनाव आपकी शिक्षा एवं रुचि का व्यक्तिगत प्रश्न है। इसे बड़ी सतर्कता से हल करना चाहिये।

प्रारंभ में नेपोलियन समझता था कि उसे साहित्य के क्षेत्र में नेतृत्व करना है। उसने 27 से 28 वर्ष की आयु के मध्य साहित्यिक प्रसिद्धि लाभ करने का पुनः पुनः यत्न किया। उसे लेखन कला में कीर्ति लाभ करने का मार्ग निश्चित और शायद सबसे छोटा जान पड़ता था। ग्रंथकार बनने का पहला प्रयत्न उसने 1786 में किया था। कई छोटी-छोटी पुस्तकें लिख चुकने के पश्चात् उसने “प्रेम” पर एक निबन्ध लिखा, उसके बाद आनन्द पर। ल्थोन्स की विद्वत् परिषद ने “आनन्द” पर निबन्ध के लिए 1500 लिबरे का एक पारितोषिक रक्खा था। नेपोलियन ने भी अपना लेख प्रतियोगिता में भेज दिया। वह इतना निकम्मा था कि उससे घटिया केवल एक निबन्ध और था। निबन्ध परीक्षकों में से एक ने उस पर इस प्रकार की टिप्पणी लिखी थी - “यह इतना अव्यवस्थित है, इतना ऊबड़-खाबड़ है, इतना असंबद्ध है और इतनी बुरी तरह लिखा हुआ है कि इस पर कुछ भी ध्यान देना ठीक नहीं।” इस पर नेपोलियन ने अपने भाई जोसेफ को लिखा - “अब मुझे ग्रन्थकार बनने की आकाँक्षा नहीं रही।” उसने दूसरा क्षेत्र पकड़ा। सैनिक क्षेत्र में आकर उसे विदित हुआ कि यही परमेश्वर ने उसके लिए बनाया है। इसी में उसने - अक्षय कीर्ति लाभ की। ठीक क्षेत्र का चुनाव आधी सफलता है।

जो व्यक्ति कभी कुछ कभी कुछ करते हैं, वे अन्ततः कहीं भी नहीं पहुँच पाते। बहुत सोच समझ कर अपनी रुचि के अनुकूल क्षेत्र का चुनाव करना चाहिए। वह नेता धन्य है जिसने अपने सही क्षेत्र की पहचान कर ली है, शक्तियों को तोल लिया है।

नेता में किन आध्यात्मिक सम्पदाओं की आवश्यकता है? सर्वप्रथम आत्म विश्वास है यह नेता का प्रथम देवी गुण है जिससे वह जीवन में प्रतिकूल और अप्रिय अवस्थाओं पर, विजय प्राप्त करता चलता है। विपरीत प्रतिकूलताएं नेता के आत्म विश्वास का जीता जागता शक्तिपिंड होता है। उसे अपनी भुजाओं, अपने शरीर, अपनी कार्य प्रणाली, सम्पादिका शक्तियों, तर्क और बुद्धि में अक्षय विश्वास होता है। उसके अन्तस्थल में निश्चयात्मक तत्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं। उसके नेत्र, मुखमंडल एवं कर्मों से तनिक भी सन्देह या भय के भाव नहीं प्रकट होते।

उसे विश्वास होता है कि मैं जिस कार्य को कर रहा हूँ, मैंने जो योजनाएं जनता के लाभ और सेवा के लिए बनाई है, वे गलत नहीं हो सकती। संसार उनकी आलोचनाएं करता है, किन्तु वे आलोचनाएं उनके अक्षय आत्म विश्वास को ठेस नहीं पहुँचा सकतीं।

संसार में जो जो नेता हुए हैं, उन्हें घोर प्रतिकूलता तथा तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। जितना भी अद्भुत प्रतिभा का प्रकाशन हुआ, वह सब प्रतिकूलता में ही हुआ। बड़े-बड़े धार्मिक नेता, राजनैतिक और समाजिक नेता, बड़े-बड़े आविष्कार, कला कौशल, उन्नति, वैभव, सब प्रतिकूलता के प्रदेश से ही प्रकट हुए। श्रेष्ठ नेता का अखंड विश्वास जनता के विचार प्रवाह को अपने पक्ष में मोड़ लेता है।

सच्चे नेता आध्यात्मिक सिद्धियों द्वारा आत्मविश्वास फैलाते हैं। वही फैलकर अपना प्रभाव मुहल्ला, ग्राम, शहर, प्रान्त और देशभर में व्याप्त हो जाता है। उसके आत्म तेज की परिधि में जितने भी व्यक्ति आते हैं, वे उस तेज से प्रभावित हो जाते हैं। आरंभ में नेताओं के विचारों से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या अल्प होती है। धीरे-धीरे इन विचारों का गुप्त प्रवाह दूर-दूर तक फैल जाता है।

महात्मा गाँधी जी, गुरु नानक, गौतम बुद्ध, प्रभृति लोक मान्य नेताओं को मानने वाले व्यक्तियों की संख्या प्रारम्भ में न्यून थी। जनता उनकी हंसी उड़ाती थी। धीरे-धीरे लोगों को इनकी योग्यताओं की सत्यता विदित हुई और जनता की आलोचनाएं, इनकी आध्यात्मिक शक्तियों के सन्मुख न ठहर सकीं। अधिक से अधिक संख्या में जनता ने इनका साथ दिया। प्रायः नेताओं के जन्म साधारण परिवारों में हुए हैं किन्तु अपने (1) ज्ञान और मानसिक शक्तियों (2) आत्म विश्वास और लगन (3) सततोद्योग के कारण ऊपर चढ़े हैं। उन्हें धीरे-धीरे सफलता प्राप्त हुई है। एक विजय के पश्चात् दूसरी विजय मिली। संसार विजयी पर विश्वास करता है। लोग उस व्यक्ति पर विश्वास करने लगते हैं। जिसके मुख मंडल पर विजय के भाव झलकते हैं। मनुष्य का मनोविज्ञान है कि हम उन लोगों पर स्वभावतः विश्वास करने लगते हैं, जो अपनी शक्ति का प्रभाव डालते हैं। बिना आत्मविश्वास के वे ऐसा नहीं कर सकते। वे उस अवस्था में हम सब पर प्रभाव नहीं डाल सकते, जब कि उनका मन भय और शंकाओं से परिपूर्ण हो।

कुछ मनुष्यों में थोड़ी सी ऐसी अलौकिक शक्ति होती है, जिसके दर्शन मात्र से हमारा हृदय उनके प्रति श्रद्धा और आदर से भर जाता है मन स्वयं झुक कर उनसे कुछ सीखना चाहता है, उनके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पर स्वयं चलना चाहता है। यह उनकी परिपक्व एवं प्रदीप्त आध्यात्मिक शक्तियों (ज्ञान, सत्कर्म, निस्वार्थता, दिव्यता, आत्मतेज, वासनाओं से मुक्ति) का अद्भुत प्रभाव है। हमें उनमें एक अजीब दिव्यता प्रतीत होती है। जो हमारे विश्वास को अपनी ओर खींचती है।

सफल नेता के अन्य दो अध्यात्मिक तत्व हैं सच्ची निष्ठा एवं लगन। प्रथम गुण द्वारा वह एक स्थान पर, एक विचार, योजना मन्त्रण पर ठहरता है, मन को अपनी सम्पूर्ण मानसिक शक्तियों द्वारा केन्द्रित करता है। सच्चे नेता जिन योजनाओं का निर्माण करते हैं उनमें पर्याप्त विचार, तर्क और दूरदर्शिता का समन्वय होता है। इन योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिये वह इन्हीं पर निष्ठ होकर ठहरता है, परिवर्तन नहीं करता।

जो व्यक्ति अपने मन्तव्यों के प्रति सच्चा है, जिसे अपने आदर्शों के प्रति सच्ची लगन है, जो बलिदान के लिए सदैव प्रस्तुत है, वह अवश्य जनता को सच्चे मार्ग पर चलायेगा।

सफल नेतृत्व के लिए मिलनसारी, सहानुभूति और कृतज्ञता जैसे दिव्य गुणों की अतीव आवश्यकता है। उसे तो मानव मात्र का हितैषी, सेवक बनना है, सबके कष्टों की सुन कर दूर करने का उद्योग करना है, सुख तथा शांति के मार्ग पर चलाना है। जो नेता इस नियम को भंग करता है। वह घृणा तथा स्वार्थ का शिकार बनता है। जनता का सहयोग छल, कपट, धोखे या जादू से संभव नहीं है जनता बड़ी कटु आलोचक है। वह नीर−क्षीर विवेक करना जानती है। अतः अन्य जिस किसी के संपर्क में आयें उसी को अपने मृदु, सहानुभूतिपूर्ण शब्दों से अपना बनाइये। इन दैवी तत्वों का चुम्बक स्त्रोत दूसरों के मन में भी सर्वत्र समान रूप से प्रवाहित हो उठेगा। दीर्घ आशा और विश्वास जागृत होगा विपरीत आलोचनायें घुल जायेंगी।

विश्व कार्य में नेतृत्व ग्रहण करना, जीवन कर्तव्यों का सम्यक् सम्पादन करना, प्रतिकूल परिस्थिति के विषम प्रभाव के परे उठना, भय का निर्वासन करना यह सब आपकी मिलनसारी, सहानुभूति, कृतज्ञता एवं प्रेम पर निर्भर हैं। आपका प्रेम फलता-फूलता है। प्रकट किया हुआ प्रेम दुगुना चौगुना होकर लौटता है।


कहिए कम-करिये ज्यादा

(ले. श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)

मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी प्रदर्शन प्रियता है। बाहरी दिखावे को वह बहुत ज्यादा पसन्द करता है। यद्यपि वह जानता और मानता है कि मनुष्य की वास्तविक कीमत उसकी कर्मशीलता, कर्मठता है। ठोस और रचनात्मक कार्य ही स्थायी लाभ, प्रतिष्ठा का कारण होता है। दिखावा और वाक शूरता नहीं। यह जानते हुये भी उसे अपनाता नहीं। इसीलिये उसे एक कमजोरी के नाम से सम्बोधित करना पड़ता है।

प्रकृति ने मनुष्य को कई अंगोपाँग दिये हैं और उनसे उचित काम लेते रहने से ही मनुष्य एवं विश्व की स्थिति रह सकती है। पर मानव स्वभाव कुछ ऐसा बन गया है कि सब अंगों का उपयोग ठीक से न कर केवल वाक्शक्ति का ही अधिक उपयोग करता है। इससे बातें तो बहुत हो जाती हैं, पर तदनुसार कार्य कुछ भी नहीं हो पाता। हो भी कैसे वह करना भी नहीं चाहता और इसीलिये दिनों दिन वाक्शक्ति का प्रभाव क्षीण होता जाता है। कार्य करने वाले को बोलना प्रिय नहीं होता, उसे व्यर्थ की बातें बनाने को अवकाश ही कहाँ होता है? वह तो अपनी वाक्शक्ति का उपयोग आवश्यकता होने पर ही करता है। अधिक बोलने से वाक्शक्ति का महत्व घट जाता है। जिसकी जबान के पीछे धर्म शक्ति का बल होता है उसी का प्रभाव पड़ता है।

वस्तुतः कार्य करना एक साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।

वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गाँधी के जबरदस्त प्रभाव का कारण उनका कर्मयोग ही है। वे जो कुछ कहते उसे करके बताते थे। इसी में सचाई का बल रहता है। इस सचाई और कर्मठता के कारण ही गाँधी जी के हजारों लाखों करोड़ों अनुयायी विश्व में फैले हुये हैं। गाँधी जी अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न खोकर किसी न किसी कार्य में लगे रहते थे। और आवश्यकता होने पर कार्य की बातें भी कर लेते थे। इसी का प्रभाव है कि बड़े-बड़े विद्वान-बुद्धिमान एवं श्रीमान् उनके भक्त बन गये।

इसे हम बराबर देखते हैं कि केवल बातें बनाने वाला व्यक्ति जनता की नजरों से गिर जाता है। पहले तो उसकी बात का कुछ असर ही नहीं होता। कदाचित उसकी ललित एवं आकर्षक कथन शैली से कोई प्रभावित भी हो जाय तो बाद में अनुभव होने पर वह सब प्रभाव जाता रहता है। वाकशूर के पीछे यदि कर्मवीरता का बल नहीं तो वह पंगु हैं। जो बात कहनी हो उसको पहिले तोलिए फिर बोलिए। शब्दों को बाण की उपमा दी गई। एक बार बाण के छूट जाने पर उसे रोकना बस की बात नहीं। लोहे का बाण तो एक ही जन्म और शरीर को नष्ट करता है पर शब्द बाण तो भविष्य की युग युगीन परम्परा को भी नष्ट कर देता है।

यह सब ठीक होते हुए भी प्रश्न उठता है कि विश्व में वाकशूर ही क्यों अधिक दिखाई देते हैं। उत्तर स्पष्ट है-बोलना सरल है। इसमें किसी तरह का कष्ट नहीं होता। कार्य करने में कष्ट होता है अपनी रुचि वृत्ति-स्वभाव बुरी आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। और यह बड़ा कठिन कार्य है इन्द्रियाँ स्वच्छंद हो रही हैं, विषय वासनाओं की ओर लपलपाकर बढ़ना चाहती हैं। इनका दमन किये बिना इच्छित और उपयोगी कार्य नहीं किया जा सकता। कष्ट एवं कठिनता होने पर भी जो हमारे व विश्व के लिये आवश्यक है वह तो करना ही चाहिये। अतः सच्चे कर्म योग का अभ्यास करने की आदत डालना आवश्यक है। अभ्यास ही सिद्धि का मूलमंत्र है।

कहना हम सब को बहुत आता है। पर करना नहीं आता या चाहते नहीं। केवल दूसरों की आलोचना एवं अपनी बातें बघारना ही हमारा मनसूबा बन गया है। हमारे पांडित्य में परोपदेश और विद्या ‘विवादाय’ चरितार्थ हो रहे हैं। इन्हें हमें आत्मसुधार और विश्व उद्धार में लगाना है। अन्यथा हमारा अध्ययन ‘आप बाबाजी बैंगन खावे औरों को प्रबोध सुनावें’ सा ही रहेगा।

कई कहते हैं- “हमारी कोई सुनता ही नहीं, कहते-कहते थक गये पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता”। मेरी राय में इसमें सुनने वालों से अधिक दोष कहने वालों का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत्मनिरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे जा रहे हैं। अतः कहिये कम, करिये अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा पर कार्य का स्थायी होता है। जैन योगी चिदानन्द जी ने क्या ही सुन्दर कहा है-

कथनी कथै कोई। रहणी अति दुर्लभ होई॥

अन्य कवियों ने भी कहा है-


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जैसे जल से अग्नि को बुझाया जाता है उसी प्रकार ज्ञान से मानसिक दुःख को शांत करना चाहिए। मन के शाँत हो जाने पर शारीरिक दुःख भी दूर हो जाता है। -महाभारत

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जिस मनुष्य ने अपने आपको जीत लिया है वही अपना मित्र है परन्तु जिसने अपने आपको नहीं जीता वह शत्रु है। -गीता


अपने लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

(श्री सीता राम जी ठेकेदार, भिण्ड)

किसी भी मनुष्य के जीवन में- आदर्श केवल एक ही होता है लेकिन विशेषताएं अनेक हो सकती हैं। जीवन में जितनी अधिक विशेषताएं होगी उतना ही अधिक जीवन प्रभावशाली बनेगा और उतनी ही अधिक सुगमता के साथ वह अपने आदर्शों तक पहुँच सकेगा। महात्मा गाँधी के जीवन में सत्य, अहिंसा आदर्श थे लेकिन विभिन्न मतों का एकमत करना उनके सामने आने पर शत्रु का मित्र बन जाना आदि ये उनकी विशेषताएं थी। आदर्श तो मनुष्य द्वारा विचारा हुआ उसका एक लक्ष्य है और विशेषतायें प्रकृति द्वारा दी हुई तथा अभ्यास एवं पुरुषार्थ विनिर्मित शक्तियाँ। जिस प्रकार से पांचों उंगली बराबर नहीं उसी प्रकार से प्रत्येक मनुष्य में एक सी विशेषतायें नहीं होती। किसी में कोई विशेषता है तो किसी में कुछ और।

आदर्श एवं विशेषता के अन्तर को न समझने के कारण दूसरों की विशेषताओं पर मुग्ध होकर अपने आदर्श से गिर जाना हमारी कमजोरी का चिन्ह है। कोई विशेषता जीवन में न लाने के कारण हम दूसरों की इस विशेषता के सामने अपनी बुद्धि को झुका कर घुटने टेक देते हैं और उसके सामने अपने को कमजोर पाते हैं। हम उसकी श्रेष्ठता पर मुग्ध होकर अपने निश्चित आदर्श को भूल जाते हैं और उस विशेषता को ही जीवन की सफलता की कुँजी जान लेते हैं। मैं क्या-2 बनूँ? जैसा मैं दूसरों को देखता हूँ वैसा ही बनने की चेष्टा करता हूँ। लेकिन बन कुछ भी न पाता। अतएव जीवन में असंतोष है कि दूसरे सब कुछ हैं कोई तैराक है तो कोई गायक, कोई धनी है तो कोई बड़ा अफसर है, कोई खिलाड़ी है तो कोई बड़ा नेता है, लेकिन मैं कुछ नहीं। बस यही विचार कि मैं कुछ नहीं हमारी शक्तियों को मुरझा देता है सफलता मिले तो कैसे? मैं कुछ भी नहीं वे सब कुछ हैं। अतएव जीवन में दूसरों के प्रति यह व्यर्थ की चिन्तायें उत्पन्न हो जाती हैं, इन्हीं चिन्ताओं से शारीरिक स्वास्थ्य पर आघात पड़ता है और तरह तरह की अशुभ कल्पनाएं मानसिक व्यथाएं सताने लगती हैं। कार्य करने की शक्ति का धीमा हो जाना, एकान्त की प्रियता, स्वभाव का चिड़चिड़ापन, सामाजिक जीवन में लोगों से मिलते समय एक प्रकार की कायरता व झेंप का अनुभव, आपस में बातचीत में हीनता के भव, निर्भयता का अभाव, आदि-2 त्रुटियों हमारे जीवन में प्रवेश करती हैं।

इसलिए यदि आप वास्तव में अपने जीवन को सुखी शान्त एवं सफल बनाना चाहते हो तो सर्वप्रथम अपना केवल एक ही आदर्श विचारपूर्वक निश्चित करिये कि मैं यह चाहता हूँ और यह बनूँगा। केवल अपनी ओर देखते रहिये अपनी दृष्टि अर्जुन की भाँति अपने लक्ष पर ही केन्द्रित कीजिए। दूसरों की विशेषता या अवगुणों पर ध्यान मत दीजिये दूसरों की कोई विशेषता देखकर ही वैसा बनने की मत सोचिये। यदि किसी में अच्छे गाने की विशेषता है तो एक अच्छा गायक बनने की मत सोचिए यदि वास्तव में संगीत तुम्हें प्रिय है तो अपने आदर्श की सीमा के भीतर गाने कि विशेषता अपने में लाने का प्रयास कर सकते हो।

अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए सच्चाई, ईमानदारी एवं निरंतर परिश्रम से काम करिए सोचिए कम करिये अधिक। प्रत्येक काम को बिना घबराये निश्चित भाव से कीजिए सन्तोष से काम लीजिये मन को निर्द्वन्द्व एवं प्रसन्न रख कर आत्म बल को जागृत कीजिए। अपनी दृष्टि लक्ष्य की ओर गढ़ा कर सारी शक्तियाँ उस पर केन्द्रित कर दीजिए।

मनुष्य के हाथ में कर्म करना है। जो व्यक्ति पूरी ईमानदारी और पूरी श्रमशीलता के साथ अपने आदर्श की प्राप्ति में जुटा हुआ है वह असंख्यों विशेषताओं वाले आकर्षक मनुष्य की अपेक्षा किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं है। फल देने वाला परमेश्वर है। सफलता असफलताओं का होना, शक्तियों एवं योग्यताओं का न्यूनाधिक होना अनेक आधारों पर अवलम्बित है यह हो सकता है कि कोई आदर्शवादी व्यक्ति असफल रहे और कोई धूर्त सफलता के शिखर पर जा चढ़े। जिनका विवेक कुँठित है दृष्टि स्थूल है वे आदर्श की अपेक्षा सफलता और विशेषता की ओर आकर्षित होते हैं परन्तु अन्ततः आदर्शवान् ही यशस्वी होता है। ईसामसीह, सुकरात, देवजनों, बन्दा बैरागी, भगत सिंह आदि कितने ही आदर्शवादी अपने जीवन में पराजित हुए, सफलता का सेहरा उनके सिर पर न बंध सका। फिर भी आज वे पराजित वीर हैं बड़े से बड़े दिग्विजयी सिकन्दर और आदर्शवादी राजा हरिश्चन्द्र में कौन बुद्धिमान था इसका निर्णय करना कुछ अधिक कठिन नहीं है।

आप अपना लक्ष्य स्थिर कीजिए। किस आदर्श के लिए अपना जीवन लगाना चाहते हैं यह निश्चित कीजिए, तत्पश्चात उसी की पूर्ति में मन, कर्म, वचन से लग जाइए। “लक्ष के प्रति तन्मय रहना” यह मनुष्य की इतनी बड़ी विशेषता, प्रतिष्ठा, सफलता, महानता है कि उसकी तुलना में अनेकों प्रकार के आकर्षक गुणों को तुच्छ ही कहा जायेगा।


आत्मसंयम से जीवन लक्ष्य की सफलता

(श्री सुरेन्द्र नाथ शर्मा)

आत्म-संयमी होना किसी भी श्रेष्ठ पुरुष को प्रथम लक्षण होता है। क्या आप किसी भी ऐसे महान व्यक्ति का उदाहरण इतिहास के पृष्ठों में दे सकते हैं जो आत्मसंयमी न रहा हो पर श्रेष्ठ हो। बिना आत्मसंयम के मनुष्य अपने ध्येय को, जो ऊंचा उठना है, कभी पहुँच ही नहीं सकता।

संसार में कोई भी नियम बिना आत्मसंयम के संभव नहीं। शारीरिक संयम भी उसकी बिना सहायता के नहीं चल सकता, यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति तनिक से आवेश में आकर अपनी शारीरिक शक्ति वृद्धि के लिये व्यायाम इत्यादि करना प्रारम्भ करदे परन्तु कुछ दिनों के पश्चात् वह अपनी क्रिया स्वयं ही शिथिल होती जायेगी। क्योंकि वहाँ पर आत्म-संयम की न्यूनता है जिसकी पूर्ति अन्य शक्ति नहीं कर सकती। आधुनिक समय में हम चारों ओर मनुष्यों को इन्द्रियों का दास ही पाते हैं।

अधिकतर मनुष्य ऐसे हैं जो इन्द्रियों के प्रति अपने दासत्व में गौरव भी समझते हैं। वे बहुत शान और झूठे बड़प्पन के साथ कहते हैं क्या करें भाई सिगरेट तो हमारे जीवन की आवश्यकता बन गई है। बिना उसकी सहायता के हमें तो दस्त भी नहीं होता। एक और कालेज के छात्र को कहते हुये हमने सुना था कि बिना चाय के वह जीवित ही नहीं रह सकता। कितनी थोथी और लज्जास्पद बातें हैं। क्या मानव को इन छोटी-छोटी वस्तुओं का दासत्व इतना ग्रहण कर लेना चाहिये कि उनके बिना उसे अपना जीवन दूभर प्रतीत होने लगे। क्या ऐसे ही आत्म-बल पर किसी बड़ी सफलता की आशा की जा सकती है।

समाचार पत्रों में नित्य-प्रति ऐसी ही घटनायें देखने में आती हैं कि अमुक व्यक्ति ने रेल से कट कर आत्म-हत्या कर ली अथवा आवेश में आकर स्वयं भी मरा और अपने भाई को भी मार डाला। यह सब आत्मसंयम की कमी के कारण ही होता है। यदि परिस्थिति में मनुष्य सोच-विचार तथा दृढ़ता से काम ले तो वह अनेक संकटों से बच सकता है। क्रोध हमें चुनौती देता है कि देखो तुम प्रबल हो अथवा मैं शक्तिशाली हूँ। ईर्ष्या हमारी दबी हुई क्षुद्रताओं को पुनर्जीवित करना चाहती है। क्या इनके प्रभुत्व को स्वीकार करके हम अपने आप को कापुरुष सिद्ध करना चाहते हैं। हमारे लिये इससे अधिक बुरी बात क्या हो सकती है कि हम इन्द्रियों की दासता में पड़े रहने के कारण अपनी उन्नति में स्वयं बाधक बनें। हमारी कितनी ही छोटी से छोटी कमजोरियाँ जीवन को भ्रष्ट कर नाश करने में उतनी ही सफल हो सकती हैं जैसे बड़े जहाज को डुबोने के लिये एक लघु छिद्र की उपस्थिति। कठिनाई के समय ही तो आत्म-संयम की परीक्षा है और उस समय अभ्यासी ही विजयी होते हैं आत्मसंयम के लिए हमें निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए और जिस तरह अपनी वासनायें, बुराइयों, कमजोरियों और बुरी आदतों पर काबू पाया जा सके उसके लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। पूर्ण संयमी तो ईश्वर ही कहा जा सकता है। परन्तु हर पिता अपने पुत्र में गुण देखकर प्रसन्न होता है। ईश्वर भी अपने गुण अपने पुत्र में उदित देख कर अत्यन्त प्रसन्न होता है और उसकी पर्याप्त सहायता करता है। मनुष्य को चाहिये कि वह ईश्वर की दी हुई आन्तरिक प्रेरणा पर अग्रसर रहे इस मार्ग पर चलने वाला एक दिन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।


भोजन की सूक्ष्म शक्ति

(डॉक्टर लक्ष्मी नारायण टंडन, प्रेमी, एम.डी.)

विषय के स्पष्टीकरण के लिए भोजन तथा उपवास सम्बंधी दो-चार वस्तुयें मोटे तौर पर जान लेना चाहिए। अन्न उसे कहते हैं जिसे लोग खाएं या जो लोगों को खाएं, बेसमय, बेहिसाब तथा अखाद्य हम खाते हैं इससे शरीर में विकार संचित होता है। विटामिनों की कमी तथा प्राकृतिक लवणों के अभाव से भी ऐसा होता है। इससे शरीर में रोग होता है। जो अन्न के ही दुरुपयोग का कारण है तब अन्न हमें खाने लगता है। यदि प्राकृतिक ढंग से अन्न का प्रयोग हम करें तो हम उसे खायेंगे। भोजन की वस्तु, मात्रा और कब खाएं? आदि बातें हम ठीक से नहीं समझते तो भोजन हमें खायेगा ही।

भोजन सम्बन्धी दो दृष्टि कोण हैं-एक पूर्वीय तथा दूसरा पाश्चात्य। मोटे तौर पर भोजन का भारतीय विभाजन है - सूक्ष्म भोजन तथा स्थूल भोजन। आकाश तत्व, वायु तत्व, अग्नि तत्व तथा जल तत्व द्वारा भी हम भोजन पाते हैं। यह भी भोजन है जिसे सूक्ष्म भोजन कहते हैं। स्थूल भोजन में शाक, कंद, तरकारी, फल, दूध, अन्न आदि हैं। पाश्चात्य लोग स्थूल भोजन को ही भोजन मानते हैं। उनका विचार है कि स्थूल भोजन से ही शरीर कायम है। तथा प्रोटीन सब से अधिक आवश्यक है - यह हमें शक्ति देता, गर्मी देता तथा कोषाणु आदि बनाता है - भोजन के विषय में यह तो रहा पश्चिमीय मत। पर पूर्वीय मत से प्रोटीन शक्ति और गर्मी देता है, यह बात मान्य नहीं है। वह केवल माँस बनाती है तथा कोषाणुओं की पूर्ति आदि करती है यह पूर्वीय मत है। हम जानते हैं कि लम्बे उपवास काल में मनुष्य का माँस तथा वजन तो अवश्य कम होता जाता है, पर मनुष्य की स्फूर्ति तथा शक्ति में कमी नहीं होती, वरन् उल्टे वृद्धि होती है। सम्भव है हमारी बात सुन कर कुछ लोग हंसे, किन्तु सत्य सदा सत्य ही रहेगा।

भोजन से तीन वस्तुयें बनती हैं- (1) पैखान (2) उससे सूक्ष्म से माँस आदि (3) तथा उससे भी सूक्ष्म से मन बनता है - यह शास्त्रीय मत है। उपवास काल में गर्मी का ज्यों का त्यों बना रहना तथा शक्ति का भी ज्यों का त्यों बना रहना यह प्रमाण पूर्वीय मत की सत्यता का कि (केवल माँस घटना) भोजन से केवल माँस बनता है प्रतीक है।

हिमालय पर्वत की खोहों में अनेक योगी आकाश, वायु, अग्नि तत्व, तथा जल से ही सूक्ष्म भोजन प्राप्त करके जीवित ही नहीं, दीर्घजीवी रहते हैं। सूक्ष्म भोजन होने का तथा उसकी अपेक्षा अधिक महत्ता का यह प्रमाण है।

स्थूल भोजन के भी दो भेद होते हैं- (1) क्षार प्रधान (2) अम्ल प्रधान। यह अम्ल शरीर में खुरचने का काम करते हैं एक प्रकार की गर्मी तथा एक प्रकार का विष अम्ल पैदा करते हैं। दूसरे प्रकार के भोजन क्षारमय है। यह रक्त को शुद्ध करते और बढ़ी हुई गर्मी को कम करते हैं।

नारियल की गरी को छोड़ कर शेष गरीदार मेवे सब एसिड हैं। गरी सूखी हो या कच्ची क्षारमय हैं। अनाज भी अम्ल पैदा करते हैं। केवल मात्रा कम और अधिक होती है। विभिन्न अनाजों में दालें (द्विदल) सब से अधिक अम्ल पैदा करती हैं। दालों में उत्तमता की दृष्टि से मसूर, फिर मूँग, फिर उरद, फिर अरहर और फिर चना है। इसके बाद गेहूँ का नम्बर आता है। और तब जो। चावल में एसिड सब से कम होता है। मनुष्य को 80 प्रतिशत क्षार तथा 20 प्रतिशत अम्ल चाहिए। पर प्रायः अनाज ही अधिक खाया जाता है। यह हानिप्रद होगा या लाभप्रद इसे हम सरलता पूर्वक समझ सकते हैं। क्षार प्रधान भोजन में सब से अधिक शाक में, फिर हरी तरकारी में, फिर सूखी तरकारी (आलू, घुइंया, शकरकंद) और तब दूध में है। अधिक औटाया दूध भी अम्ल प्रधान होने लगता है। मिट्टी और मिट्टी से उत्पन्न हुई वस्तुएं ही अनाज और फिर कंद तथा मूल ही पृथ्वी तत्व में है। क्षार युक्त चीज भी यदि अधिक तली-भुनी जायं तो अम्ल हो जाती है। इसे स्वाभाविक रूप से ही खाएं अधिक महीन न करे न नफरत दिखावें। 1 अनाज 2 कंद मूल, 3 फल तथा शाक यह उत्तमता का क्रम है। इनके प्रयोग में धीरे-2 कमी करते जाय-अर्थात् अनाज की मात्रा घटाई जाय धीरे-2 से और फल तथा शाक आदि की मात्रा बढ़ाता जाय। ऐसा करते ही प्रकृति की ओर लौटो, का सिद्धान्त हमारे द्वारा पालन होने लगेगा।

इन्द्रिय-जन्य-ज्ञान प्रायः बड़ा भ्रामिक होता है। तभी एक समय न खाने पर कमजोरी लगने को हम वास्तविक कमजोरी मान बैठते हैं। इसी से साधक को धीरे-धीरे 1 से 2, 2 से 4 और 4 से 8 तक आने पर यकायक उथल पुथल नहीं होगा। इसी से यकायक भोजन में परिवर्तन करके धीरे-धीरे हेर फेर करना उचित है।

उपवास का सिद्धान्त भी यहीं से प्रारंभ हो जाता है। उपवास के माने ही हैं (उप-समीप-वास-बैठना) आत्मा के अधिक से अधिक समीप बैठना लम्बे उपवास करने के पूर्व चाहिए कि कुछ दिनों सुबह 9-10 बजे तक फलों या शाकों का रस 12-1 बजे तक कंद, मूल, फल, शाक आदि तथा तीसरी बार 7-8 बजे रात को अन्न लिया जा सकता है। यदि यह क्रम मनुष्य जीवन भर रखे तो कभी अस्वस्थ न हो। दूध, जल तथा रस भी घूँट-घूँट पीने से अधिक पोषण देगा।

एक दम गट-गट तथा बहुत सा पीने से वह पोषण और शक्ति नहीं देगा। जल से पेशाब, फिर उससे सूक्ष्म से रक्ताँश (यह रक्त का घनत्व ठीक रखता) और उससे सूक्ष्म से प्राण बनता है ऐसा शास्त्र कहते हैं। अग्नि से हड्डी, फिर मज्जा और उससे सूक्ष्म वाक् (बोलने की शक्ति) का निर्माण होता है। पानी को शरीर अधिक शोषण नहीं करता और अधिक लाभ न करेगा यदि हम अधिक अन्न खाते हैं या शरीर में अधिक विकार है तो जल की अधिक मात्रा आवश्यक है।

जब गर्मी अधिक होती है तब भूख कम लगती है। यह प्रमाणित करता है कि अग्नि (सूक्ष्म) होने पर अन्न की कम आवश्यकता है। हम जाड़ों में अधिक खाते हैं क्योंकि कपड़े अधिक पहनने से हमारे शरीर के रोंये ढके रहते हैं और वायु तत्व को वह कम ग्रहण कर पाते हैं। रोम कूपों से अग्नि शरीर में कम पहुँच पाती है क्योंकि सूर्य कम देर आकाश में रहता है। जाड़े में आदमी जल कम पीता है। अतः सूक्ष्म भोजनों की कमी के कारण प्रकृति द्वारा बाध्य होकर हम जाड़ों में स्थूल भोजन अधिक खाते हैं।

यह बात यदि हम याद रखें तो बड़ा लाभ हो कि जितनी ही सूक्ष्म वस्तु हम ग्रहण करते हैं उतनी ही हममें शक्ति बढ़ती है। सेब या अनार फल के रूप में खाने से सेब या अनार का रस अधिक लाभ प्रद होता है।


गायत्री अभियान की साधना

गायत्री को पंच मुखी कहा जाता है। कई चित्रों में आलंकारिक रूप से पाँच मुख दिखाये गये हैं। वास्तव में यह पाँच विभाग हैं (1) ॐ (2) भूर्भुवः स्वः, (3) तत्सवितुर्वरेण्यं (4) भर्गो देवस्य धीमहि (5) धियो यो नः प्रचोदयात्। यज्ञोपवीत के भी पाँच भाग हैं। तीन सूत्र, चौथी मध्य ग्रंथियाँ, पांचवीं ब्रह्मग्रंथि। पाँच देवता भी प्रसिद्ध हैं। ॐ गणेश, व्याहृति-भवानी-प्रथम चरण ब्रह्मा द्वितीय चरण-विष्णु तृतीय चरण महेश इस प्रकार यह पाँच देवता गायत्री के पाँच प्रमुख शक्ति पुँज कहे जा सकते हैं। प्रकृति के संचालक पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) जीव के पाँच कोष (अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच कर्मेन्द्रियाँ, चैतन्य पंचक (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आत्मा) इस प्रकार की पंच, प्रवृत्तियाँ गायत्री के पाँच भागों से प्रस्फुटित, प्रेरित, प्रसारित होती हैं। इन्हीं आधारों पर वेदमाता गायत्री को पंच मुखी कहा गया है।

पंच मुखी माता की उपासना एक नैष्ठिक अनुष्ठान है। जिसे “गायत्री अभियान” कहते हैं। पाँच लाख का जप होता है। यह एक वर्ष में पूरा किया जाता है। एक वर्ष की यह तपस्या साधक को उपासनीय महाशक्ति से तादात्म्य करा देता है। श्रद्धा और विश्वास पूर्वक की हुई अभियान की साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। “अभियान” एक ऐसी तपस्या है जो साधक को गायत्री शक्ति से भर देती है और फलस्वरूप वह अपने अन्दर बाहर तथा चारों ओर एक देवी वातावरण का अनुमान करता है।

अभियान की विधिः-

एक वर्ष में पाँच लाख जप पूरे करने का अभियान किसी भी मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरम्भ किया जा सकता है। गायत्री का आविर्भाव शुक्ल पक्ष की दशमी को मध्य रात्रि में हुआ है इसलिये उसका उपवास प्रायः दूसरे दिन एकादशी को माना जाता है। अभियान आरम्भ करने के लिए यही मुहूर्त सब से उत्तम है। जिस एकादशी आरम्भ किया जाय एक वर्ष बाद उसी एकादशी समाप्त करना चाहिए।

महीने की दोनों एकादशियों को उपवास करना चाहिए। उपवास में दूध-दही, छाछ, फल, शाक, आदि सात्विक पदार्थ लिये जा सकते हैं। जो एक समय भोजन करके काम चला सकें वे वैसा करें, बाल, वृद्ध, गर्भिणी या कमजोर प्रकृति के व्यक्ति दो बार भी सात्विक आहार ले सकते हैं। उपवास के दिन पानी कई बार पीना चाहिए।

दोनों एकादशियों को 24 मालाएं जपनी चाहियें। साधारण दिनों में प्रतिदिन 10 मालाएं जपनी चाहिये। वर्ष में तीन संध्याएं होती हैं उन्हें नवदुर्गाएं कहते हैं। इन नवदुर्गाओं में चौबीस-चौबीस हजार के तीन अनुष्ठान कर लेने चाहिये। जैसे प्रतिदिन प्रातः काल, मध्याह्न, सायंकाल की तीन संध्याएं होती हैं वैसे ही वर्ष में ऋतु परिवर्तनों की संधियों में तीन नवदुर्गाएं होती हैं। वर्षा के अन्त और शीत के आरम्भ में आश्विन शुक्ला 1 से लेकर 9 तक। शीत के अन्त और ग्रीष्म के आरम्भ में चैत्र शुक्ला 1 से लेकर 9 तक। ग्रीष्म के अन्त और वर्षा के आरम्भ में ज्येष्ठ शुक्ला 1 से लेकर 9 तक यह तीन नवदुर्गाएं हैं। दशमी गायत्री-जयन्ती का पूर्णाहुति का दिन होने से वह भी नवदुर्गाओं में ही जोड़ दिया गया है इस प्रकार दस दिन की इन संध्याओं में चौबीस माला प्रतिदिन के हिसाब से चौबीस हजार जप हो जाते हैं। इस प्रकार एक वर्ष में पाँच लाख जप पूरा हो जाता है। संख्या का हिसाब इस प्रकार और भी अच्छी तरह समझ में आ सकता है।

(1) बारह महीने की चौबीस एकादशियों को प्रतिदिन 24 मालाओं के हिसाब से 24 & 24 = 576 माला।

(2) दस-दस दिन की तीन कुल 30 दिन की नवदुर्गाओं में प्रतिदिन की 24 मालाओं के हिसाब से 30 & 24 =720 माला।

(3) वर्ष के 360 दिनों में से उपरोक्त 30 + 24 = 54 दिन काट कर शेष 306 दिनों में 10 माला प्रतिदिन के हिसाब से 3060 माला।

(6) प्रति गुरुवार को पाँच मालाएं अधिक जपनी चाहिये। अर्थात् 10 की जगह पन्द्रह माला गुरुवार को जपी जायें। इस प्रकार एक वर्ष के 52 गुरुवारों में 52 & 5 = 560 मालाएं।

इस प्रकार कुल मिलाकर (576+720+3060+260) 4616 मालाएं हुईं एक माला में 108 दाने होते हैं। मालाएं 4616 & 108 = 498128 कुल जप हुआ पाँच लाख में करीब उन्नीस सौ कम है। चौबीस मालाएं पूर्णाहुति के अन्तिम दिन विशेष जप एवं हवन करके पूरी की जाती हैं।

इस प्रकार पाँच लाख जप पूरे हो जाते हैं। तीन नवदुर्गाओं में काम सेवन, पलंग का सोना, दूसरे व्यक्ति से हजामत बनवाना, चमड़े का जूता पहनना, मद्य माँस का सेवन आदि बातें विशेष रूप से वर्जित हैं। शेष दिनों में सामान्य जीवन क्रम रखा जा सकता है। उसमें किसी विशेष तपश्चर्या का प्रतिबन्ध नहीं है।

महीने में एक बार शुक्ल पक्ष की एकादशी को सौ मन्त्र से हवन कर लेना चाहिये। हवन की विधि “गायत्री महाविज्ञान” में तथा गायत्री की सुलभ साधना पुस्तक में बता चुके हैं।

अभियान एक प्रकार का लक्ष्यवेध है। इसके लिए किसी पथ-प्रदर्शक एवं शिक्षक की नियुक्ति आवश्यक है। जिससे कि बीच-बीच में जो अनुभव हो उनके सम्बन्ध में परामर्श किया जाता रहे। कई बार जब कि प्रगति में बाधा उपस्थित होती है तो उसका उपाय अनुभवी मार्गदर्शक से जाना जा सकता है। एकाकी यात्रा की अपेक्षा विश्वस्त पथप्रदर्शक की सहायता सदा ही लाभदायक सिद्ध होती है।

शुद्ध होकर प्रातः सायं दोनों समय जप किया जा सकता है। प्रातः काल उपासना में अधिक समय लगाना चाहिए, सन्ध्या के लिए तो कम भाग ही छोड़ना चाहिये। जप के समय मस्तक के मध्य भाग अथवा हृदय में प्रकाश पुँज ज्योति स्वरूप गायत्री का ध्यान करते जाना चाहिए।

साधारणतः एक घन्टे में दस मालाएं जपी जा सकती हैं। अनुष्ठान के दिनों में एक घण्टे प्रतिदिन और साधारण दिनों में एक घण्टा प्रतिदिन उपासना में लगा देना कुछ विशेष कठिन बात नहीं है। सूतक, यात्रा, बीमारी आदि के दिनों में बिना माला के मानसिक जप चालू रखना चाहिये। किसी दिन साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।

फिर भी यदि वर्ष के अन्त में कुछ जप कम रह जाय तो उसके लिये ऐसा हो सकता है कि उतने मन्त्र अपने लिए किसी से उधार जपाये जा सकते हैं। जो सुविधानुसार लौटा दिये जाएं। इस प्रकार हवन आदि की कोई असुविधा पड़े तो वह भी इसी प्रकार सहयोग के आधार पर पूरी की जा सकती है। किसी साधक की साधना खंडित न होने देने, उसका संकल्प पूरा करने के लिये अखण्ड ज्योति से भी समुचित उत्साह, पथप्रदर्शन तथा सहयोग मिल जाता है।

अभियान एक वर्ष में पूरा होता है। साधना की महानता को देखते हुए इतना समय कुछ अधिक नहीं है। इस तपस्या के लिये जिनके मन में उत्साह है उन्हें इस शुभ आरम्भ को कर ही देना चाहिये। आगे चल कर माता अपने आप सम्भाल लेती है। यह निश्चित है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।


लू लगने का उपचार

(प्रो. मोहनलाल वर्मा, एम.ए.)

स्वास्थ्य की दृष्टि से गर्मी का मौसम खराब है। पेट कुछ ऐसा हो जाता है कि किसी भी गरिष्ठ पदार्थ को सही रूप से पचा नहीं पाता। पाचन-विकार, कब्ज, हृदय दौर्बल्य, लीवर की खराबी, सिर एवं शरीर का भारी होना ये गर्मी के मौसम में अधिकतर पाये जाते हैं। गर्मी का शरीर के ऊपर प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता है। सिर में चक्कर, थकावट, काम में अरुचि, आलस्य इनसे तो हम परेशान रहते ही हैं, पर कुछ ऐसे रोग हैं जिनसे सावधान न रहने से भारी नुकसान हो सकता है।

लू लगने के प्रधान कारण।

लू लगना एक ऐसा रोग है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को सावधान रहना चाहिये। इसका प्रधान कारण अत्यधिक गर्मी में बाहर निकलना, सिर पर सूर्य की तीव्र किरणों को आने देना, तेज धूप अथवा गर्म हवा में बिना सिर ढके आना, तेज गर्मी के समय हवा का बन्द हो जाना है। कभी-कभी यह गर्मी के समय मद्यपान अथवा अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करने से उत्पन्न होता है। प्रायः देखा गया है कि रेल के छोटे से डिब्बे में गर्मी के समय अनेक यात्रियों को वृहत् संख्या में बुरी तरह से ठुँस जाना होता है, डिब्बा गर्म हो जाता है, साँस नहीं आता और दम घुटने लगता है, उस समय रक्त में उष्णता की अभिवृद्धि होकर ज्वर हो जाता है, उसे “लू लगना” कहते हैं।

यह रोग गर्मियों में प्रायः दोपहर को अधिक होता है किन्तु वैद्य गोपीनाथ जी का विचार है कि गर्म देशों में रात्रि में भी लू लगने की सम्भावना है। राजपूताने के उन भागों में जहाँ रात में गर्म रेत उड़ता है, रात्रि में भी लू लगने की गुँजाइश है। जो व्यक्ति गर्मी के समय काले रंग के वस्त्र पहन कर धूप में निकलते हैं, या घूमते हैं, उन्हें लू लगने का अधिक भय रहता है क्योंकि काला रंग गर्मी को शीघ्रता से ग्रहण करता है।

इन लक्षणों को याद रखिये।

धूप में आने या गर्म वायु के झोंकों में आ जाने के कारण तुरन्त सिर दर्द होता है और सिर में चक्कर आने लगते हैं। नेत्र लाल वर्ण के हो जाते हैं और तत्पश्चात् जोर का ज्वर चढ़ता है। ज्वर काफी तीव्र होता है, साँस में अभिवृद्धि होती है, हृदय की धड़कन तीव्र होती है, बेचैनी और घबराहट अत्यधिक होती है, श्वांस में भी कठिनाई प्रतीत होती है, मूत्र पुनः आता है यदि तत्कालीन चिकित्सा न की जाय तो सम्भवतः रोगी को बेहोशी हो जाती है। यदि गर्मी का प्रभाव न्यून है, तो ज्वर नहीं होता, नेत्रों के सन्मुख अंधेरा आता है, जी मिचलाता है, वमन या उल्टी होती है, नेत्रों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और रोगी निर्बलता से आक्रांत हो जाता है। किसी-किसी को खूब पसीना आता है तथा दम फूल जाता है। कभी-कभी इस दशा में भी बेहोशी होकर और दिल की धड़कन बन्द होकर मृत्यु हो जाती है। यह रोग बड़ी शीघ्रता से अपना प्रभाव प्रदर्शित करता है। इससे बड़ा सावधान रहना चाहिये। बच्चों की देखभाल करना अपेक्षित है।

लू लगे हुए रोगी का इलाज

अत्यधिक गर्मी से यह रोग होता है। अतः सर्व प्रथम उस कारण को दूर कीजिये। अर्थात् रोगी को तुरन्त किसी शीतल स्थान में आराम सहित लिटा दीजिये। साँत्वना भरे शब्दों से उसे उत्साहित कीजिये। उसे यह न बताइये कि वह भयंकर रोग के कुचक्र में फंस गया है। शीतल जल पिलाइये, यदि सम्भव हो तो उसे बर्फ चूसने के लिये दीजिये। सिर पर बर्फ की टोपी रखने से लाभ होगा। यदि यह टोपी उपलब्ध न हो, तो ठण्डे पानी की पट्टी का प्रयोग आप कर सकते हैं। ठण्डा पानी भी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में डाला जा सकता है पर अधिक नहीं। यदि आप रोगी की दशा सुधरती हुई देखें तो ठीक है, अन्यथा किसी योग्य डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिये।

मान लीजिए, रोगी बेहोश हो चुका है। अब क्या करें? पुनः पुनः उसके मुख पर शीतल जल के छींटे दीजिये। ठण्डे जल की पट्टी से नेत्र धोएं। सिर पर पानी डालें। पंखे से हवा करें। यदि रोगी के गले के बटन कसे हों तो उन्हें खोल दें। लोगों को चारों ओर से हटा दें। यह सावधानी रखिये कि यदि रोगी को ठण्डे पसीने आते हों, या श्वाँस तेजी से चलने लगे, तो केवल मुख पर ही शीतल जल छिड़कें। अमोनिया अथवा अन्य इसी प्रकार के सुगन्धित पदार्थ सूँघने से लाभ होता है। जब बुखार तेज हो तो ऊपर वाला ठण्डा इलाज करें। जब तक कि ज्वर हल्का हो जाय और रोगी होश में आ जाय।

यदि ज्वर तेज हो, तो यह मानना चाहिये कि रोग घातक नहीं है। उस अवस्था में निम्न उपचारों से लाभ होना चाहिये। ये उपचार स्वर्गीय वैद्य गोपीनाथ जी द्वारा अनुभव पर लिखे गये हैं और मैंने स्वयं इनके द्वारा रोगियों को लाभ पहुँचाया है। प्रत्येक व्यक्ति इनमें से जो भी इलाज हो सके, वक्त पर वही कर सकता है।

कुछ परीक्षित नुस्खे।

एक दो तोला प्याज का रस पीने से लू का प्रभाव शीघ्रता से उतर जाता है। यदि यह न हो सके तो प्याज को जरा आग में भून लीजिये और एक कच्ची को लेकर सिल पर पीस लीजिये। इसमें जरा सा जीरा और एक तोला मिश्री पीस कर मिला लीजिये। इस चटनी से बहुत लाभ होता है। बर्फ से इसे ठण्डा कर लिया जाय तो और भी अच्छा है।

एक कच्चा बड़ा सा आम लेकर भूवल (गर्म राख) में दबा दें। जब वह नरम हो जाय तो छील कर गुद्दा निकाल दीजिये और ठण्डे पानी में मिला कर, मसल दीजिये। मिश्री या खाण्ड में मिलाकर रोगी को पिलाइये। यदि कब्ज हो तो इसमें दो तोले इमली का गुद्दा भी मल छान कर लीजिये और पिलाइये। यदि यह न हो सके तो गाय के ताजे दही में ठण्डा पानी मिला कर लस्सी बना कर पिलाइये।

शरबत चन्दन पिलाइये। इसे ठण्डे पानी में मिला कर या बर्फ से ठण्डा करके पीने से दिल की घबराहट और गर्मी दूर होती है, लू और गर्म हवा से हानि पहुँचने का भय नहीं रहता जिगर और आमाशय की गर्मी कम होती है।

शरबत अनार भी यथेष्ट लाभ पहुँचाता है। मीठे अनार के दानों को निचोड़ कर आधा सेर रस निकाल लें। इसे मन्द आग पर पका कर आधा रखें और फिर आधा सेर खाण्ड़ या मिश्री मिलाकर पका कर शरबत बना लें। गर्मी के दिनों में पानी मिला कर पीने से प्यास कम लगती है, गर्मी और लू का असर कम होता है। इसी प्रकार शरबत फालसा भी ठण्डा उपयोगी है। फालसे के शरबत से वमन, प्यास और उल्टी सभी को बहुत लाभ होता है।

पके फालसों को निचोड़ कर निकला हुआ पानी 4 तोले, गुलाब का अर्क 4 तोले और थोड़ा सा ठण्डा पानी मिला कर हो सके तो बर्फ से ठण्डा करके पिला दें। इससे लू के विकार नष्ट होते हैं।

गुलाब अर्क में सफेद चन्दन घिस कर उसमें रुमाल भिगोकर रोगी के सिर पर रखें और उसे सूखने न दें। इसी पानी को पंखे पर छिड़क कर उससे हवा करें। लू की बेहोशी दूर हो जायेगी। रोगी को केले के हरे पत्तों पर सुलाने से भी लाभ होता है। इसी प्रकार जरा सा धनिया पानी में ठण्डाई की तरह पीस कर मिसरी से मीठा करके पिलाने से लाभ होता है।

रोगी की नाभि पर चाँदी या ताँबे का गहरा कटोरा या थाली रखकर उसमें ऊपर से ठण्डे पानी की धार छोड़ते रहें।

आप लू से सुरक्षित रह सकते हैं।

यदि आप गर्मी के दिनों में नंगे सिर और धूप में न फिरें, या छतरी का प्रयोग करते रहें तो लू का प्रभाव न होगा। साफा बाँध कर निकलिये और उसका छोर कमर तक लटकते रहने दीजिये जिससे रीढ़ की हड्डी धूप के प्रभाव से बची रहे। काले रंग का कपड़ा पहिन कर मत निकलिये।

गर्मी के मौसम में माँस, मछली, अण्डा, गर्म मसाला, चाय और शराब आदि गर्म चीजों का प्रयोग त्याग दीजिये। कब्ज न रहने दीजिये। प्रतिदिन प्रातः सायं ठण्डे जल से स्नान किया कीजिये। प्रातः काल या दोपहर में ठण्डी छाछ, दही या लस्सी पिया कीजिये।

प्याज को अपनी जेब में रखिये। इसमें ऐसे रासायनिक गुण हैं कि यह शरीर की गर्मी सोख कर आप की रक्षा लू से करता है। यदि आपको एक बार लू लग चुकी है, तो और भी अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

खमीर गाजवाँ सादा एक तोला, चाँदी के वरक में लपेट कर सुबह के वक्त खाया कीजिये। आँवले का मुरब्बा चाँदी के वरक में लपेट कर खाया करें। मुक्तावटी की गोलियाँ अपने पास रखिये। इनको बनाने का उपाय यह है- जहर मोहरा असली, पाथरवेर, दरयाई नारियल, बड़ी हर्र की बक्कल, पद्याख बंसलोचन और गुलाब के फूलों की केसर 6-6 मासे इलायची के दाने और अनबिधे मोती 3-3 मासे लेकर मोती और जहरमोहरे को गुलाब के अर्क में अच्छी तरह खरल करें। फिर अन्य चीजों का चूर्ण मिलाकर दुबारा गुलाब के अर्क में घोटकर मूँग के बराबर गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ गर्मी के दिनों में बहुत लाभ पहुँचाती हैं। बच्चों के लिये तो अतीव गुण कारी हैं।


दहेज की प्रथा का विरोध होना चाहिए।

हिन्दू समाज की अनेक कुरीतियों में आजकल दहेज की प्रथा अत्यधिक दुखदायी बनी हुई है। सभी लोग इससे दुखी हैं, साथ ही सभी लोग इससे बेतरह चिपके हुए हैं। कुत्ता जैसे सूखी हड्डी चबाने से अपने ही गलफटे छिलने से निकले हुए खून को पीकर प्रसन्न होता है और इस दुखदायी हड्डी को छोड़ना नहीं चाहता। वही बात हिन्दू समाज और दहेज प्रथा के सम्बन्ध में कही जा सकती है।

प्रत्येक परिवार में लड़के हैं और प्रत्येक परिवार में लड़कियाँ। लड़की की शादी में जो लोग दहेज देते हुए कुड़कुड़ाते हैं, इस प्रथा को बुरा बताते हैं वे ही अपने लड़के की शादी के समय लम्बी चौड़ी रकम माँगते हैं और यह भूल जाते हैं कि अपनी लड़की के लिए दहेज देते समय हमें कितनी कसक हुई थी, तथा आगे की लड़कियों को दहेज देते समय कितनी कठिनाई उठानी पड़ेगी लड़के का विवाह करते समय एक प्रकार के विचार मानना और लड़की के विवाह में दूसरे प्रकार का विचार बनाना, एक ऐसी विडम्बना है जिसकी छूत देखा-देखी औरों को भी लगती है और सभी लोग इस द्विविधा के कुचक्र में उलझे हुए दूसरों के लिए दुखदायी परिस्थितियाँ उत्पन्न किया करते हैं।

दहेज के पाप में कन्या-पक्ष और वर-पक्ष दोनों ही दोषी हैं। हाँ वर-पक्ष को अधिक दोषी मान लेने में कुछ हर्ज नहीं। लड़के वाले लड़की वाले से दहेज माँगते हैं। लड़के वाले, लड़की वाले से बढ़िया कपड़े, कीमती जेवर, ठाठ-वाट की बरात, बाजे, आतिशबाजी आदि चाहते हैं। दहेज का जो रुपया बेटे वाले ने लिया था वह इन खुराफातों में फुँक गया। बेटी वाला तबाह हो गया, बेटे वाले से हिसाब पूछिये तो वह बतायेगा कि दहेज के अतिरिक्त इतनी रकम घर से और लग गई। दोनों ही दुखी हैं। पर बाहरी मन से दोनों ही मिथ्या अभिमान में फूलते हैं। बेटी वाला शेखी मारता है- मैंने इतनी रकम देकर शादी की, मैं इतना अमीर आदमी हूँ। बेटे वाला कहता है मेरी “बात” इतनी बड़ी है, मेरी इज्जत “आबरू” इतनी बढ़ी चढ़ी है कि बेटे के विवाह में इतना दहेज आया। इस शेखी खोरी से-दोनों पक्ष मन बहलाते हैं, पर दोनों ही दुखी हैं। एक मर मिटा दूसरा खाली हाथ रह गया।

दहेज के नाम पर जो कुछ दिया जाता है उसमें नकद-रकम के अतिरिक्त बर्तन, कपड़े, मिठाई, जेवर, फर्नीचर आदि सामान का भी बड़ा भाग रहता है, यह सामान बेटे वाले के यहाँ एक निरर्थक कूड़े के समान घर में जमा हो जाता है। क्योंकि जीवनोपयोगी वस्तुएं तो प्रायः सभी लोग अपने घरों में रखते हैं। यह नई चीजें आ जाने से परिग्रह अधिक जमा भले ही हो जाय पर इसकी कोई विशेष उपयोगिता नहीं होती। इसी प्रकार बेटे वाले की ओर से बेटी वाले के यहाँ जो चीजें भेजी जाती हैं उनका कोई खास उपयोग नहीं है। वे क्षणिक वाहवाही के साथ बर्बाद हो जाती हैं और परिश्रम से उपार्जित की हुई कमाई का एक महत्वपूर्ण भाग यों ही बर्बाद हो जाती हैं।

इसमें सन्देह नहीं कि दहेज की प्रथा सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और राष्ट्रीय दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक और घोर निंदनीय है। इसके कारण गरीब घर की सुयोग्य कन्याएं, साधन सम्पन्न परिवारों में नहीं पहुँच सकतीं। जिस पिता के पास कई कन्याएं हैं वह अत्याधिक चिंतित रहता है, अनीति से, अति परिश्रम से, धन कमाने का प्रयत्न करता है जिससे उसका जीवन बड़ा दुखमय बन जाता है। इस पर भी यदि धन जुटाने में सफलता न मिली तो कई बार बड़ी लोमहर्षक, हृदयद्रावक घटनाएं घटित हो जाती हैं कई बार इसी उलझन में सुयोग्य कन्याओं को अयोग्य वरों के साथ और सुयोग्य वरों को अयोग्य कन्याओं के साथ बंधना पड़ता है। इन असमान जोड़ों को सदा असंतुष्ट और अशान्त जीवन बिताना पड़ता है।

कन्या विक्रय के समान ही वर विक्रय भी एक नैतिक पाप है। यह पाप जाति को पददलित, अपमानित और निरुत्साही करने वाला है। इसी कुप्रथा के कारण आज कन्या को जन्म दुर्भाग्य सूचक माना जाता है और उसकी मृत्यु पर लोग खुशी मनाते हैं। पिछले दिनों तो कई जातियों में जन्मते ही कन्या को मार डालने का रिवाज चल पड़ा था और कहीं-कहीं तो गुप-चुप रूप से यह अब भी होता है। इतना तो निश्चित है कि खाते-पीते लोग भी पुत्र की अपेक्षा कन्या के लालन-पालन तथा शिक्षण में उपेक्षा तथा कंजूसी करते हैं। वे सोचते हैं कि उसके विवाह का ही इतना भारी बोझ सिर पर रखा है तो अन्य बातों में भी उसके लिए खर्च करके उस बोझ को क्यों बढ़ाया जाय।

जहाँ कन्या के सम्बन्ध में उसके अभिभावकों को इस प्रकार सोचना पड़े वहाँ कन्या को सुसंस्कृत बनाने के लिये प्रयत्न होने की क्या आशा की जा सकती है? फलस्वरूप उपेक्षित कन्याएं ज्यों-त्यों बढ़ती रहती हैं। यदि पिताओं पर दहेज का भार न होता तो अवश्य ही वे उन्हें सुयोग्य बनाने के लिए अधिक प्रयत्न करते। आज जो कन्या पिता के लिए दुर्भाग्य की प्रत्यक्ष प्रतिमा बनी हुई है वह पति के लिए भी दुर्भाग्य से अधिक और क्या सिद्ध होगी। यदि दहेज का राक्षस हमारे समाज में न होता तो हमारी कुसुम सी कलियाँ कन्याएं पिता के घर में भी मोद करतीं और पतिओं के यहाँ भी गृहलक्ष्मी सिद्ध होतीं।

प्रत्येक विचारशील व्यक्ति दहेज की निन्दा करेगा। प्रत्येक भारत वासी इससे दुखी है क्योंकि कोई विरला ही ऐसा होगा जिसके घर में कन्या न हो। इतना होते हुए भी आश्चर्य है कि यह कुप्रथा कम होने की अपेक्षा दिन-दिन अधिक रूप से बढ़ती जाती है इस कुचक्र को तोड़ने में सफलता नहीं मिलती। यदि चक्र इसी प्रकार चलता रहा तो हिंदू जाति का भारी अहित होगा। दहेज आर्थिक दृष्टि से एक शैतानी चक्र है जिसमें फंसा हुआ हमारा समाज दिन-दिन निर्धन, अस्थिर और अव्यवस्थित होता जाता है। सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से जनता और सरकार का समान रूप से कर्तव्य है कि इस कुप्रथा के विरुद्ध वातावरण तैयार करें। इसके लिए निम्न उपाय किए जाने चाहिए।

(1) दहेज के सम्बन्ध में अधिक दोष वर-पक्ष वालों का है। उनकी ओर से इसे हटाने का विशेष प्रयत्न किया जाना चाहिए। लड़के वालों को चाहिए कि गुप्त या प्रकट रूप से दहेज लेने से इन्कार कर दें।

(2) कन्या-पक्ष वाले विवाह के समय जेवर, बहुत बढ़िया कपड़े तथा अन्य ऐसी चीजें लेने से इन्कार कर दें जिनमें वर-पक्ष वालों को दिखाने के लिए खर्च करने को विवश होना पड़े। यदि वर-पक्ष वालों को जेवर पहनाना ही हो तो अपने घर जाकर पहनावें। उन्हें दिखाने के लिए न लावें।

(3) कन्या-पक्ष वर-पक्ष के और वर-पक्ष कन्या-पक्ष के उन खर्चों को कम कराए, जिन्हें कम कराया जा सकता है।

(4) युवक, विचारशील और उदार बनें। वे अपने अभिभावकों को स्पष्ट कह दें कि यदि उनके विवाह में दहेज लिया गया तो वे विवाह नहीं करेंगे।

(5) कन्याएं शिक्षा की ओर अग्रसर हों और अध्यापन एवं समाज सेवा कार्य करने में रुचि लेकर अधिक समय तक कुमारी रहने का आदर्श उपस्थित करें ताकि 15-16 वर्ष की आयु देख कर पिता को घबराहट न हो और जहाँ-तहाँ जल्दी-जल्दी में जैसे-तैसे विवाह करके कोई दुःखदायी परिणाम उपस्थित न करें।

(6) दहेज के विरुद्ध लेखनी और वाणी द्वारा घोर घृणा उत्पन्न की जाय। जो लोग ऐसा करें उनका सामाजिक असहयोग किया जाय।

(7) सरकार कानून बनाकर दहेज लेना-देना दण्डनीय घोषित कर दे।

(8) उपजातियों के बन्धन ढीले किये जायं। ब्राह्मणों के ब्राह्मणों में, क्षत्रियों के क्षत्रियों में इसी प्रकार प्रत्येक वर्ण में बिना उपजातियों के बंधन का विचार किये हुए विवाह हों।

(9) कुछ सम्पन्न और नेतृत्व करने वाले परिवार इस दशा में पहल करके समाज का पथ प्रदर्शन करें।

(10) जो उपरोक्त विचारों से सहमत हों उनका एक संगठन बने और यह संगठन अपने सदस्यों से सुयोग्य जोड़े चुन कर आदर्श विवाहों की प्रथा चालू करे।

इन सुझावों के आधार पर यदि दहेज प्रथा के विरुद्ध धर्म-युद्ध छेड़ा जाये तो हमारा विश्वास है कि इस सत्यानाशी कुरीति से हिंदू जाती अपना पीछा छुड़ा सकती है और अपने समाज के पारिवारिक तथा दांपत्ति जीवनों को सुख-शाँतिमय बना सकती है।


स्वार्थ सिद्धि का सच्चा साधन

कई व्यक्ति सोचते हैं कि “हमें अपने मतलब से मतलब रखना चाहिये। दूसरों के दुख दर्द में सहायक बनने से, दूसरों की समस्याओं में सिर पचाने से हमारा क्या लाभ? अपना समय या धन दूसरों की भलाई में लगाने से हमें कुछ लाभ न होगा वरन् नुकसान ही रहेगा। इसलिये नुकसान के काम में पड़ने से बचने के लिये हमें परमार्थ से दूर ही रहना उचित है। “

इस प्रकार से सोचने वालों को यह देखना चाहिये कि क्या दूसरों की उपेक्षा करने पर हमारे स्वार्थ की रक्षा हो सकती है? मनुष्य सामाजिक प्राणी है। दूसरों का सहयोग लिये बिना और दूसरों को सहयोग दिये बिना उसका काम नहीं चल सकता। पशु पक्षियों के बच्चों को अपने माता पिता की सेवा बहुत ही स्वल्प मात्रा में अपेक्षित होती है परन्तु मनुष्य के बालक की यदि घड़ी-घड़ी समुचित परिचर्या न हो तो उसका जीवित रह सकना कठिन है। दूसरे प्राणी अपने आप अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं परन्तु मनुष्य की शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएं इतनी अधिक है कि बिना दूसरे के सहयोग के उनकी पूर्ति नहीं हो सकती। परस्पर सम्बंध रख कर, एक दूसरे के लिये कार्य करने की नीति को अपनाकर ही मानव जीवन व्यवस्था सुचारु रूप से चलती है। यदि हर आदमी अपना दृष्टिकोण समुचित कर ले और सोचे कि मुझे सिर्फ अपने मतलब से मतलब रखना चाहिये तो यह स्पष्ट है कि हमारे सामाजिक जीवन की शृंखला टूट जायेगी और आदि काल की जंगली सभ्यता की ओर लौटना पड़ेगा।

कोई व्यक्ति कितना ही स्वार्थी क्यों न हो अपने स्त्री बच्चों के कुटुम्बियों के सुख-दुख को अपने सुख-दुख में संबद्ध मानता है। उनके सुख-दुख में स्वयं सुखी-दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। उसी प्रकार इन कुटुम्बियों को सहयोग देने और उनका सहयोग लेने को भी वह निताँत उचित और आवश्यक मानता है। परन्तु वह यह भूल जाता है कि समाज भी एक बड़ा कुटुम्ब है और उसके सुख-दुख भी एक दूसरे से बहुत अंशों में संबन्धित हैं। उनकी उपेक्षा करने से जहाँ दूसरों के स्वार्थों को क्षति पहुँचेगी वहाँ अपने स्वार्थ भी सुरक्षित न रह सकेंगे।

जैसे घर के एक व्यक्ति को कोई छूत का रोग हो जाय तो घर में अन्य व्यक्तियों को भी उस रोग का शिकार होना पड़ता है वैसे ही नगर या मुहल्ले में कोई हैजा, चेचक, प्लेग आदि महामारी फल जाय तो अपना जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। हैजा यद्यपि गंदगी से फैलता है पर गंदी बस्ती से आरम्भ हुआ हैजा पड़ौस के स्वच्छ रहने वाले लोगों को भी धर दबोचता है। यदि पड़ौसी अज्ञान, दारिद्रय या गंदगी से ग्रस्त रहेगा तो अपनी स्वस्थता को संकट ही बना रहेगा इसलिए यदि अपनी आरोग्यता की रक्षा करनी है तो मुहल्ले की दुर्दशा का सुधारना आवश्यक है। मुहल्ले के लोगों में यदि दुर्व्यसन फैले हुए हैं तो यह भय बना ही रहेगा कि कहीं अपना लड़का भी कुसंग में पड़ कर वैसा ही दुर्व्यसनी न हो जाय। अपने वंश, ग्राम या जाति के लोगों द्वारा कोई लज्जाजनक घृणित कुकर्म किये जायें तो अपना मस्तक भी शर्म से नीचा हो जाता है।

यदि हमारे घर में आग लग जाय और पास पड़ौस के लोग अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाकर उसे बुझाने न आवें तो क्या उनकी यह नीति हमारे लिए सुखकर होगी? साथ ही जो लोग हमारा घर जलने का तमाशा निष्क्रिय होकर देख रहे थे अपने घर की सुरक्षा के लिये निश्चित रह सकेंगे? किसी विशेष प्रदेश में बाढ़, अकाल, भूकम्प, अग्निकाण्ड, बलवा महामारी आदि का संकट उपस्थित हो जाय और वहाँ के पीड़ितों की सहायता न की जाय तो उसके बड़े गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। यह आपदा ग्रस्त अन्यत्र जाकर चोरी, लूट, भिक्षा, सतीत्व विक्रय आदि अनैतिक कार्य करके सामूहिक शाँति को खतरे में डाल सकते हैं। उजड़े हुए प्रदेशों का नाश और बेकार बेघरबार लोगों की वृद्धि यह एक व्यापक संकट होगा। इसे रोकने का एक मात्र उपाय उनकी सहायता करना ही हो सकता है।

साधारण पशु-पक्षियों की अपेक्षा मनुष्य में दैवी-तत्व अधिक है। इसी तत्व के कारण वह सामाजिक प्राणी बना है। और एक-दूसरे की सहायता करने की अपनी विशेषता के कारण वह उन्नति के इतने ऊंचे शिखर तक चढ़ने में समर्थ हो सकता है। यह दैवी तत्व, यह मानवी विशेषता “प्रेम” है। प्रेम का लक्षण है दूसरों के प्रति उदार होना, उनके दुख-सुख को अपना दुख-सुख समझना, दूसरों की सेवा सहायता करना, यह प्रेमतत्व अन्य जीव जंतुओं में बहुत ही स्वल्प मात्रा में होता है। मादा की अपने बच्चे में तब तक ममता रहती है जब-तक वह असहाय रहता है उसके अतिरिक्त वे अपने साथियों के बिछुड़ने पर कुछ समय तक याद भी करते हैं। बंदर आदि जीव अपनी जाति बन्धुओं को छेड़ने पर विरोधी से लड़ने भी आते हैं। इतना कुछ तो वे करते हैं पर एक दूसरे को अपने अनुभवों का लाभ देने, परस्पर प्रगाढ़ प्रेम रखने, उदारता का व्यवहार करने सहायता देने, आपसी विश्वास और सहयोग के आधार पर कार्य करने का भाव उनमें नहीं होता। इसी प्रभाव के कारण सिंह, व्याघ्र, हाथी, घोड़ा जैसे बलवान जानवर भी विनाश और दासत्व में ग्रस्त हो गये। उनकी तुलना में बहुत ही कमजोर प्राणी मनुष्य अपनी प्रेम भावना के कारण आपसी सहयोग अर्जित करके इतना सबल समुन्नत और स्वतंत्र बन गया।

आज अनेकों प्रकार के साधन मनुष्य के पास है। वैज्ञानिक यंत्र, जल, थल और नभ के वाहन, बिजली, रेडियो, बम, युद्ध-शस्त्र, कानून, धर्म, भाषा, साहित्य, रसायन, चिकित्सा, शासन, शिल्प, संगीत, कला आदि की उपलब्धि किसी एक व्यक्ति ने स्वतंत्र रूप से नहीं की है। असंख्यों बुद्धिमानों का प्रयत्न परिश्रम और सहयोग मिल कर यह सब जन साधारण के उपयोग में आने योग्य हो सका है। यदि मनुष्य स्वभावतः स्वार्थी होता, ‘दूसरों के लिए झंझट में क्यों पड़े’ की उसकी वृत्ति होती तो निश्चय ही आज मनुष्य जाति भी शृंगाल या खरगोशों की तरह किसी तरह किन्हीं भूखण्ड में देखने को मिल जाती। शारीरिक दुर्बलता का कारण वह प्रकृति के आघातों और बलवान हिंसक पशुओं के आक्रमण से अपनी रक्षा करने में समर्थ न होने पर संभवतः वह इस भूतल पर से अन्य अनेक जीवधारी जातियों की तरह मिट भी गई होती।

“प्रेम” मनुष्य की बड़ी भारी विशेषता महत्ता एवं शक्ति है। इसी के द्वारा वह स्वार्थों की रक्षा कर सकता है, इसी के द्वारा वह उन्नत हुआ, इसी के कारण वह आनंदित रहता है और पुण्य परमार्थ का दिव्य धन संचित करता है। इस ईश्वर प्रदत्त स्वाभाविक प्रवृत्ति से विमुख होकर जब मनुष्य सोचता है कि “मुझे अपने मतलब से मतलब” तब वह भूल जाता है कि दूसरों का सुकून बिगाड़ने के लिये अपनी नाक काटने का प्रयत्न कर रहा है। किसी की हम सहायता न करेंगे तो दूसरों का काम रुका न पड़ा रहेगा। परमात्मा इतना दीन-हीन नहीं है कि वह आपकी सहायता के बिना अपनी सृष्टि की सुव्यवस्था चला सके। वह अपनी व्यवस्था आप कर लेगा पर हम उस प्रेम और परमार्थ के दैवी तत्व से वंचित हो जायेंगे जो हमारे लिए दूसरों के हृदय में श्रद्धा और सहायता का भाव पैदा करता है। स्वार्थी मनुष्य दूसरों की घृणा, उपेक्षा, और तिरष्कृति का ही पात्र हो सकता है। ऐसे अभागे मनुष्य दूसरों का जितना अहित कर सकते हैं उससे अनेक गुना अपना अहित कर लेते हैं। दूसरों को अपनी सहायता से जितना वंचित रखते हैं उससे अनेक गुना घाटा दूसरों के सहयोग के अभाव में स्वयं उठाते हैं।

स्वार्थ की रक्षा का सबसे अच्छा तरीका परमार्थ है। संचय का सबसे उत्तम मार्ग त्याग करना है। स्मरण रखिए हमारा सबसे बड़ा हित साधन, स्वार्थ साधन, सुख साधन, केवल मात्र यही हो सकता है कि हम दूसरों के लिये उदार बनें, उनसे सहयोग रखें और यथाशक्ति सेवा करने को तत्पर रहें।


आनन्द शक्ति का विकास कैसे हो?

आम-तौर से लोग आनन्द को बाहर से लाने के लिये प्रयत्न करते हैं पर प्राणी मात्र के भीतर आनन्द का निवास है, उसे बाहर से प्राप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन अपने भीतर से आनंद को प्राप्त करने में अनेक बाधायें काम करती रहती हैं इसलिए मनुष्य अन्तर्मुखी हो नहीं पाता। और इन्द्रियाँ बहिर्मुखी होती हैं इसलिए बाहर से सुख पाने के लिए दौड़ पड़ता है। सुख का अनुभव इन्द्रियों से जो किया जाता है।

इन्द्रियों की भी महान इन्द्रिय-मन है। असल में अनुभव का प्रमुख साधन मन है। मन का इन्द्रियों के साथ संयोग होता है तो सुख या दुःख का अनुभव होता है अगर मन का इन इन्द्रियों के साथ लगाव न रहे तो सुख या दुःख का भी मनुष्य को बोध नहीं होता। अक्सर देखा जाता है कि मनुष्य का मन कहीं अन्यत्र अटका हो और खाने के लिए थाली पर बैठा हो तो इत्तफाक से साग या दाल में नमक ज्यादा हो या कतई न पड़ा हो तो उसे उसका कोई अनुभव न होगा। दूसरे अवसर पर यदि ऐसा हो जब मन का सम्बन्ध स्वादेन्द्रिय के साथ हो तो वह भोजन उससे नहीं खाया जायेगा। इससे सिद्ध होता है कि सुख और दुःख के अनुभव का प्रधान यन्त्र मन है।

मन बड़ा चंचल है, इसलिये उससे ऐसा कोई काम आसानी से नहीं हो पाता जिसमें श्रम करना पड़े। श्रम उसकी चंचलता का सबसे बड़ा शत्रु है। श्रम एकाग्र बनाता है। इसी श्रम का दूसरा नाम “तप” है और इसी कारण-एकाग्र बनाकर उज्ज्वल कर देना, विकारहीन बना देना, चमका देना तप का काम है। तप का आरम्भ ही मन को एकाग्र करने के उद्देश्य से होता है। जो फैला है, छिन्न है, उसको एक सिलसिले से जमा देना पूर्ण बना देना एकाग्रता का लक्षण है। इसलिए जिस समय मानव की प्रवृत्ति तप की ओर होती है मन की चंचलता कम होना आरम्भ हो जाता है। एकाग्रता बढ़ती है। मनुष्य संयमी बन जाता है। यहीं से मन इन्द्रियों की ओर से हट कर अन्दर की ओर घूमता है और आनन्द की ओर अभिमुख होता है।

सृष्टि की उत्पत्ति का आदि बीज स्वयं आनंद है। तत्वदर्शी ऋषियों का कहना है कि प्राणी की आनन्द में से उत्पत्ति होती है, आनन्द में विस्तार होता है और अन्त में आनन्द में ही वह समा जाता है यहाँ तक कि संसार में यदि आनन्द न हो तो आज किसी भी प्राणी का अस्तित्व न दिखाई देता। संसार में जो आनंद दिखाई दे रहा है वह निरंतर भीतर से प्रवाहित हो रहा है, जितना और जैसे वह प्रवाहित होता है मनुष्य उसी के अनुसार उसका अनुभव करता एवं बाहरी वस्तुओं में उसकी प्रतिष्ठा करता है।

किसी भी वस्तु में किसी बीज की प्रतिष्ठा करने का काम बुद्धि का है। मन तो सिर्फ अनुभव करने का यंत्र मात्र है इसलिए आनंद का स्वाद सिर्फ मन के द्वारा ही नहीं लिया जा सकता। उसके लिए बुद्धि को भी उसका उपयुक्त पात्र बनाना होता है। शुद्ध आनंद के लिए शुद्ध-बुद्धि की आवश्यकता होती है। बुद्धि की शुद्धि मन को भी अचंचल बना देती है और उसे विकारी होने से भी बचा लेती है।

मन और बुद्धि इस शरीर के दो झरोखे हैं। मूल तत्व इससे भी विलक्षण है। इसका नाम चित्त है। चित्त ही वस्तुतः संस्कारों को ग्रहण करता है। चित्त को जैसा ये दोनों यंत्र बना देते हैं, मनुष्य वैसा ही बनता जाता है, उसके अन्दर वैसे ही संस्कार पड़ते जाते हैं। इसलिए जब भी कभी संस्कार बनने की चर्चा की जाती है तब इस चित्त का ही जिक्र होता है। जैसे-जैसे संस्कार बनते जाते हैं मन और बुद्धि वैसे-वैसे ही काम करते जाते हैं।

जैसे संस्कार होते हैं मन वैसा ही अनुभव करता है और बुद्धि उसी प्रकार का अपना निर्णय देती है। चार अन्धों की कहानी लोगों ने सुनी होगी। चार अलग-अलग संस्कार हीन व्यक्तियों ने हाथी को देखा। उनके चित्त पर हाथी का संस्कार नहीं था। घड़ा, डण्डा, सूप, खम्भा के संस्कार उनके अन्दर मौजूद थे इसलिये उनके मन और बुद्धि ने हाथी के विभिन्न अंगों को स्पर्श करके उसे घड़ा, डंडा सूप और खम्भे की शक्ल में बतलाया। धनी व्यक्ति को देख कर सभी व्यक्ति उसके सुखी होने की कल्पना करते हैं क्योंकि उनके चित्त पर धन के संस्कार संस्कारित हो चुके हैं पर उस धनी से पूछो कि क्या वह सुखी है तो वह बताएगा कि उससे बढ़ कर शायद कोई दूसरा दुःखी नहीं है। उसके पास अमुक नहीं है, तमुक नहीं आदि की सूची कभी उससे सुनी जा सकती है। अमुक-तमुक की प्राप्ति हो जाने पर भी उसकी वह तृष्णा और अभाव का बोध संसार की समस्त सुविधा मिल जाने तक भी बढ़ता ही जाता है जो सम्पन्न हैं उनका ऐसा अनुभव है इसलिये सुख का स्थान संसार की वसुधा की प्राप्ति नहीं है बल्कि चित्त को संस्कार हीन बनाना है। संस्कार विकार हैं। जो शुद्ध है, उस पर बाहरी संस्कार ठहर ही नहीं सकेंगे। इसलिये चित्त शुद्धि की ओर दृष्टि देना ही आनंद शक्ति के विकास का मूल साधन है। असल में तप ही आनंद प्राप्ति का मूल मंत्र है।


हे प्रेरणामयी


हे प्रेरणामयी

(श्री राधा मोहनजी मिश्र)

मेरे उर दर्पण में विम्वित शुभ कामनामयी!

आनन की भोली भाषा में अंचल की छाया में,

तुम हिलोर ले रहीं वल्लरी हेम सदृश काया में,

अधरों से वह रही मधुरतम वाणी प्राणमयी।

हे प्रेरणा मयी !

तुम प्रभात की उषा अरुणिमा मुखरित वन का कलख,

तुम उड़ेलती सुन्दरता की शुचिता की श्री नव-नव,

मंगल गीतों से आपूरित हे वन्दनामयी!

हे प्रेरणामयी !

भरी पवन में तुम सुगन्धि सी दिशा-दिशा के मुख सी,

यौवन की असीम अमृतमयी! तुम रूपान्वित सुख सी,

मेरे हृदय स्पन्दन में तुम-हो कल्पनामयी!

हे प्रेरणामयी !

पावनि! तुम गंगा की लहरों में सुख से लहराती,

धवल हिमालय की काया में तुम कंचन बरसाती,

संस्कृत के कण-कण की गरिमा हे अर्चनामयी!

हे प्रेरणामयी !

वाली के विसर्ग में युग-युग से नव स्वर झनकाती,

तुम जागृति तुम प्रतिभा बन कर लोक ललाम बनाती,

साथिनि! तुम मेरी यात्रा के पथ में किरणमयी।

हे प्रेरणामयी !

प्रथम स्वप्न की विन्दु हमारी आशाओं की रेखा,

मुझ किशोर के प्रथम स्नेह ने सुन्दरी! तुमको देखा,

सखि! मैं झटका किन्तु अकेली तुम साधनामयी।

हे प्रेरणामयी !

तुम न कामिनी मेरे उर में विश्व कामिनी छवि में,

हंस वाहिनी! विहर रहीं तुम मेरे मानस कवि में,

रानी! हृदय कुँज में मेरे तुम भावनामयी।

हे प्रेरणमयी !

हिन्दी

*समाप्त*