आहार निद्राभयमैथुनञ्च
सामान्यमेतत्पषुभिर्नराणाम्।
धर्म्मो हि तेषमधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
खाना, सोना, डर, सन्तान पैदा करना ये बातें मनुष्यों और पशुओं में समान ही होती हैं। धर्म ही मनुष्य में विशेष होता है। इसके बिना वे पशु हैं।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी--
र्दैवेन देयमिति कापुरुषा बदाँते।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोत्र दोषः॥
उद्योगी पुरुषसिंह को लक्ष्मी मिलती है। भाग्य का भरोसा कायर लोग किया करते हैं। भाग्य को दबा कर पुरुषार्थ करो। यत्न करने पर काम न बने तब विचारना चाहिए कि इसमें दोष किसका है।
उद्योगेनहि सिध्यन्ति कार्याणि न मकोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविषन्ति मुखे मृगाः॥
उद्योग से ही काम बनते हैं मन में सोचने मात्र से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में कही कोई मृग आ सकते हैं?
काव्यशास्त्रविनोदेन कालोगच्छति घीमताम्
व्यसनेन च मूर्खाणाँ निद्रया कलहेन या॥
बुद्धिमानों का समय काव्य शास्त्रों के पढ़ने सुनने में जाता है और मूर्खों का व्यसन, निद्रा और झगड़ों में।
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्य घृति क्षमा।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः॥
धर्म के 8 मार्ग हैं - यक्ष करना, पढ़ना, दान देना, तप, सत्य, धैर्य, क्षमा और निर्लोभ।
मातृत्वत्परदारेषु पन्द्रव्येषु लोष्ठवत।
श्रात्मवर्त्सवभूतेषु यः पष्यति स पण्डितः ॥
जो पराई स्त्रियों में माता, पराये धन में मिट्टी का और सब जीवों में अपने आत्मा का भाव रखता है, वही पण्डित है।
ईर्ष्या घृणी त्वसन्तुष्टः क्रोधना नित्यशंकितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः॥
विपदि धैर्यमथाम्युदये क्षमा
सदसि वाक्टुता युधि विक्रमः
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतो
प्रकृतिसिद्धमिदं द्दि महात्मनाम्॥
विपत्तिकाल में धैर्य, सम्पत्ति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि, सुनने में शोक ये बातें महात्माओं में स्वभाव से ही होती हैं।
सम्पदियस्यनहर्षों विपदि विषादो रणेचधीरत्वम्।
तंभुचनश्रयन्लिकं जनयतिजननी सुतंविरलम्।
जिसको सम्पत्ति में हर्ष और विपत्ति में दुख न हो, तथा रण में धीरता हो, ऐसे त्रिलोकातिलक पुत्र को कोई विरली ही माता जनती है।
षडोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
ये छः दोष कल्याण चाहने वाले मनुष्य को छोड़ देने चाहिए। निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता (देर से काम करना)।
माँसमूत्रपुरीषास्थिनिर्मितेऽस्प्रिनू कलेवरे।
विनश्वरे विद्दायास्थाँ यशः पालय मित्र में॥
माँस विष्ठा मूत्र और हड्डी से बने हुए इस नाशमान शरीर का मोह छोड़कर हे मित्र ! तू यश का पालन कर अर्थात् यश के लिए शरीर की परवाह मत कर।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
(श्री विनोद रस्तोगी)
गीत का सृष्टा स्वयं मैं गान लेकर क्या करूंगा?
मैं स्वयं आराध्य, क्या मुझको किसी आराधना से?
साध्य क्यों साधक बने? क्या कार्य मुझको साधना से?
केन्द्र मैं, गति का, नियति का, क्यों किसी को सिर नवाऊं?
पूजिनों का पूज्य मैं, पाषाण लेकर क्या करूंगा? गान
नीर सागर का मथा, विष भी मिला, पाई सुधा भी !
अमृत लोभी, तम, गरल में नीलकंठ सदृश गया पी!!
तुम अचिर, मैं चिर हुआ, विषश्रमृत, अमृत हुआ गरल सा-
मर्त्य से अमरत्व का वरदान लेकर क्या करूंगा? गान?
मैं नियति-नाय किया संकेत जलते चाँद तारे!
मंत्र-बल से सृष्टि के गतिशील चलते कार्य सारे!!
मैं मनुज, देवत्व पद व्यर्थ है मनुज्ञत्व पाकर--
भक्त क्षितिका, क्षितिज का भगवान लेकर क्या करूंगा?
गीत का सृष्टा स्वयं मैं गान लेकर क्या करूंगा?
ततोवैनिष्पत्ति स भुविमतिमान् पण्डितवरः। विजानन् गुह्यं जीवन मरण्योयंस्तुनिलिखम्॥ अन्नते संसारे विचराते भयासक्कि रहितः। तथा निर्माणं वै निजगति विधीनाँ प्रकुरुते॥ गायत्री गीता के उपरोक्त श्लोक में गायत्री मन्त्र के प्रथम पद ‘तत्’ की विवेचना करते हुए बताया है कि - “इस संसार में वही बुद्धिमान है जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता है। भय एवं आसक्ति रहित होकर जीता है और उसी आधार पर अपनी गतिविधियों का निर्माण करता है।”
देखा जाता है कि लोग जीवन से बहुत अधिक प्यार करते हैं और मृत्यु से बहुत डरते हैं। फाँसीघर की कोठरियों में रहने वाले कैदियों और असाध्य रोगों के निराश रोगियों से मिलते रहने के हमें अनेक अवसर प्राप्त होते हैं, उनके अन्तस्तल की दशा की वेदना को समझ सकने के कारण हम यह जानते हैं कि लोग मृत्यु से कितना डरते हैं। कभी खतरे की संभावना सामने आवे, सिंह, व्याघ्र, सर्प, चोर, डाकू, भूत, अन्धकार आदि का भय सामने आने पर प्राण संकट अनुभव करके लोग थर थर काँपने लगते हैं। होश-हवाश उड़ जाते हैं, मृत्यु चाहे प्रत्यक्ष रूप से सामने न हो पर उसकी कल्पना मात्र से इतना भय मालूम होता है जो मृत्यु के वास्तविक कष्ट से किसी प्रकार कम नहीं होता।
प्राणों का भय सामने उपस्थित होने पर अधिकाँश लोक अपने कर्तव्य, उत्तरदायित्व, धर्म, आचार, आत्म गौरव आदि को तिलाँजलि देने में नहीं झिझकते। हम ऐसे धर्म प्राण बनने वाले व्यक्तियों को जानते हैं जिन्होंने डॉक्टर द्वारा रोग को प्राण घातक बताने पर शरीर जाने के भय से माँस, अंडे, मछली का तेल, मद्य आदि का सेवन किया। हमने ऐसी घटना देखी है कि घर में अग्नि लगने पर अन्य साथियों की रक्षा की बात सोचे बिना केवल अपनी प्राण रक्षा के लिए समर्थ लोग भाग निकले और असहाय निर्बल बाल-वृद्ध उसमें जल गये। पिछले भारत विभाजन के समय धर्मोन्माद से उन्मुक्त लोगों द्वारा जो पैशाचिकताएं बरती गईं उनका सबको पता है। उन घटनाओं के जो लोग समीप रहे हैं उन्हें मालूम है कि अत्याचारियों के चंगुल में फंसने पर कितनों ने ही अपना आत्म गौरव, धर्म कर्तव्य, उत्तरदायित्व आदि को छोड़कर बड़े से बड़ा अत्याचार अपनी आँख से देखते हुए भी प्राण भिक्षा के लिए गिड़गिड़ाते हुए आत्मार्पण किया। प्राण संकट के समय लोग धर्म, कर्तव्य आदि की बात तो दूर रही अपने स्त्री बच्चों तक को दुर्दशायुक्त मृत्यु पाते देखते रहते हैं और अपने प्राण ले भागते हैं।
मृत्यु का भय साधारण भय नहीं है। अधिकतर कुपित, क्षुद्र हृदय व्यक्ति तो उससे भयभीत रहते ही हैं। पर वे लोग जो अपने को सिद्धान्तवादी, धीर, कर्तव्य परायण और धर्मप्रेमी समझते हैं परीक्षा का समय आने पर विचलित हो जाते हैं। जब एक ओर आदर्श दूसरी ओर प्राण संकट की तुलना हो रही हो तो विरले ही मनुष्य ऐसे निकलते हैं जो खरे उतरें। महात्मा ईसामसीह ईश्वर से प्रार्थना किया करते थे कि ‘हे प्रभु, हमें बुराइयों से बचा, पर परीक्षा में न डाल’ क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य बड़ा डरपोक है। उसे शरीर से इतना अधिक मोह है कि प्राण त्याग तो दूर थोड़ा सा शारीरिक कष्ट आर्थिक क्षति या इच्छा पूर्ति में प्रतिरोध दिखाई पड़ता हो तो भी वह विचलित हो जाता है।
जीवन का निर्माण इस प्रकार हुआ है कि निरन्तर खतरे उपस्थित होते रहते हैं। निर्माण और विनाश दोनों ही एक दूसरे से प्रगाढ़ रूप से संबद्ध है। बीज गले बिना वृक्ष नहीं होता और फल टूटे बिना बीज नहीं बनता। नया जीवन धारण तब होता है जब किसी की मृत्यु होती है, और मृत्यु तब होती है जब कोई जीवन नष्ट होता है। एक को धन तब मिलता है जब किसी हाथ से वह धन निकलता है। जब समुद्र सूखता है तब बादल बनते हैं और जब बादल गलते हैं तो समुद्र भरता है। एक की हानि ही दूसरे का लाभ है। इस प्रकार के ज्वार भाटे ही जीवन सौंदर्य के प्रतीक हैं। रात्रि और दिन की भांति, सुख दुख का, हानि लाभ का भी जोड़ा है। जैसे सुख, शान्ति, लाभ, भोग, ऐश्वर्य प्राप्ति के अवसर आते रहते हैं वैसे ही कर्म मार्गों के अनुसार एवं परिस्थितियों के अनुसार रोग, हानि, संकट, क्लेश और मृत्यु के अवसर आना भी स्वाभाविक है। किन्तु देखा जाता है कि लोग सुखकर अवसरों का तो प्रसन्नतापूर्वक उपभोग कर लेते हैं पर जब दुख का अवसर आता है तो तरह रोते, चिल्लाते, डरते, काँपते, भयभीत रहते हैं।
विनाशात्मक परिस्थितियाँ हर एक के जीवन मैं आती रहती हैं क्योंकि वे आवश्यक, स्वाभाविक दृष्टिक्रम के अनुकूल एवं अनिवार्य हैं। परन्तु लोग उनसे बुरी तरह डरते हैं। विपत्ति आने पर तो डरते ही हैं पर अनेक बार विपत्ति की आशंका, संभावना, कल्पना मात्र से भयभीत होते रहते हैं और इस प्रकार जीवन का अधिकाँश भाग भय-चिन्ता, आशंका, घबराहट और दुख में व्यतीत होता है। यहाँ पर यह आश्चर्य होता है कि विनाश जब जीवन का एक स्वाभाविक व अनिवार्य अंग है तो लोग उससे इस प्रकार डरते क्यों हैं कि धनी और निर्धन, सम्पन्न और असम्पन्न सभी का जीवन असंतोष, अतृप्ति, खिन्नता, हीनता, निराशा आदि से भरा रहता है। पूर्ण दुखी मनुष्य ढूंढ़ निकालना आज असंभव नहीं है, साध्य अवश्य है।
विघटनात्मक, विनाशात्मक स्थितियों से डरने घबराने का कारण मनुष्य की एक आध्यात्मिक भूल है। वह भूल यह है कि-वह शरीर को ही ‘मैं’ मान बैठता है, अपने आपको शरीर समझने के फलस्वरूप, आत्मलाभ, आत्माचन्द, आत्मरक्षा, आत्मपरायणता, आत्मप्रतिष्ठा जैसी वृत्तियां दूसरे ही रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। उनका स्वरूप शरीर लाभ, शारीरिक आनन्द, शरीर रक्षा, शरीर परायणता, शरीर प्रतिष्ठा बन जाता है। चूँकि आत्मलाभ अन्तःकरण का ईश्वर प्रदत्त गुण है, इस ओर जीव की स्वाभाविक रुचि होती है, इसी में उसे आनन्द आता है और इसमें विक्षेप पड़ने से दुख होता है। संत, महात्मा, ब्रह्मवेत्ता ऋषि, मुनि, सज्जन, लोकसेवक, सत्पुरुष इसी मार्ग पर चलते हैं और जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करते हुए सदा आनन्द निमग्न रहते हैं। परन्तु जब आत्म लाभ की परिभाषा शरीर शाम हो जाती है, जब आत्म रक्षा का तात्पर्य शरीर रक्षा समझा जाता है तो बड़ी अज्ञान संभव परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसमें आज जनसाधारण अस्त हो रहा है।
स्वार्थ मनुष्य की सर्वप्रिय वस्तु है। ‘अपनापन’ सबको प्यारा है। संसार का जो भी पदार्थ प्रिय लगता है वह अपनेपन की भावना के कारण ही प्रिय लगता है। शत्रु की सुन्दर-सुन्दर चीजें भी आँखों में काँटे की तरह चुभती है। जब शरीर को ‘स्व’ मान लिया गया तो उसके नष्ट होने का भय आत्मनाश के समान लगना ही चाहिए, जब शरीर ही ‘स्व’ है तो शारीरिक इन्द्रियों के भोग विलासों को आत्मानन्द समझा ही जाना चाहिए। शरीर की सुन्दरता, आकर्षण, मोहकता, वैसी ही प्रिय मालूम होनी चाहिए, जैसी कि आत्मप्रतिष्ठा प्रिय होती है। आत्मानन्द के लिए बड़ी से बड़ी वस्तु का त्याग करना बड़े से बड़ा कष्ट सहना, आत्मपरायण पुरुषों के लिए शारीरिक साँसारिक, धन ऐश्वर्य द्वारा सुख पाने के लिए धर्म, कर्तव्य आदि का छोड़ देना और हत्या, डकैती और खतरे से भरे हुए दुस्साहसी कार्य कर डालना साधारण बात होती है। यदि कोई आदमी शरीर को ही “मैं” मानता है उससे ही “स्व” अनुभव करता है तो उसके लिए यह उचित ही है कि शरीर को सुखी करने वाली वस्तुओं और परिस्थितियों में सुखी रहे उनके लिए प्रयत्न करे और इस मार्ग में जो बाधा उपस्थित हों उसमें दुखी एवं भयभीत हो। इस स्थिति में मृत्यु और हानि का भय यदि बुरी तरह संत्रस्त बनाये रहे तो उसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
परमात्मा को सत् चित आनन्द, सच्चिदानन्द कहते हैं। उसका अंश आत्मा-स्वभावतः आनन्दमय है। उसमें आनन्द की कोई कमी नहीं, यह संसार परमात्मा की पुण्य कृति है। आनन्द रूप परमात्मा के हाथ से बना हुआ संसार आनन्दरहित नहीं हो सकता। जीवन का अर्थ है-जीव और प्रकृति के सम्मिलन की, आलिंगन की पुण्य बेला। इन क्षणों में आनन्दमय आत्मा और आनन्द कृति संसार के उभयपक्षीय आनन्दों का मिलन होने से अपार आनन्द उमड़ पड़नी चाहिए। स्त्री और पुरुष के समागम का आनन्द बड़ा आकर्षक है। आत्मा और प्रकृति के समन्वय का नाम ही जीवन है। जीवन इतना आनन्द मय, इतना आकर्षक, इतना उल्लासमय, इतना सरल है कि उसका आस्वादन करने के लिए जीव संसार में बार-बार आता है, बारबार जन्म लेता है। यदि ऐसी बात न होती, यदि वस्तुतः जीवन का मूल रूप दुख, भय, चिन्ता और क्लेशमय होता तो निश्चय ही परमात्मा का अमर युवराज आत्मा उसे ग्रहण करने को कदापि तैयार न होता।
आनन्द का रसास्वादन करने के लिए प्राप्त हुआ जीवन आज कितने कम लोगों के लिए आनंदमय रह गया है यह आश्चर्य की बात है। इसी प्रकार यह बात हैरत में डालने वाली है कि कितने अधिक लोग अपनी जिन्दगी के दिन असंतोष, भय, निराश और उदासीनता के साथ व्यतीत कर रहते हैं। यह भूल-भुलैया, यह माया-बन्धन, आत्मा के लिए कितना उलझन भरा है, कितना मर्मभेदी है, इस तथ्य को समझ कर हमारा शास्त्र हमें इस खतरे से आगाह कर देता है। गायत्री मन्त्र के प्रथम पद में ‘तत’ शब्द में इसी अन्धकारमय विभीषिका पर प्रकाश डाला है, इसी पर्दे को उठा कर सच्चाई के दर्शन कराये गये हैं। गायत्री गीता के अनुसार “तत” शब्द हमें बताता है कि जीवन और मरण के रहस्य को समझो, भय और आसक्तिरहित होकर जियो और वास्तविकता के सुदृढ़ आधार पर अपनी गतिविधियों का निर्माण करो।
-अपूर्ण
भक्ति का मूलरूप मज् है जिसका अर्थ सेवा करना होता है। सेवा के दो हेतु होते हैं - अनिष्ट विनाश और इष्ट प्राप्ति
इष्ट भी दो प्रकार का होता है-श्रेयस्कर तथा प्रेयस्कर। प्रियत्व तो हो पर श्रेयस्कर न हो ऐसा इष्ट स्वार्थ कहलाता है। श्रेयस्कर होने पर आरम्भ में ऐसा संभव हो सकता है कि वह प्रिय न हो, भक्तियोगी उसे प्रिय बनाकर अपनी साधना आरंभ करता है। कल्याणकारी लक्ष्य को अपना इष्ट बनाकर उसमें प्रियत्व का रस घोल देना भक्ति की यही साधना है।
योग का सीधा-सादा अर्थ है - मिलना । लक्ष्य के साथ पक्य सम्बन्ध स्थापित करना तथा उसे सघन बना देना।
भक्तियोग के तीन पहलू होते हैं? 1-ज्ञान मूलक, 2-स्वार्थ मूलक तथा 3-इन दोनों में भिन्न-अन्य भक्ति। इनमें से हमारे बाप दादा मानते आये है, हमारे कुटुम्ब में प्रचलित है इसलिए इसे भी माननी है। इसमें एक मात्र जड़ता का ही निवास रहता है। इसलिए वह रूढ़ि मात्र रह जाती है। ऐसी भक्ति में दृढ़ता ही ग्रहण करने योग्य है। शेष को सम्पूर्ण रूप से बदलने की आवश्यकता है यह परिवर्तन ज्ञान के द्वारा होता है। जब तक इसमें ज्ञान का प्रवेश न कराया जावेगा तब तक भक्ति होते हुए भी अन्धी होने के कारण वह अधिक से अधिक अनर्थ को भी उत्पन्न कर सकेगी।
स्वार्थमूलक भक्ति भयात्मक होती है। यह दो प्रकार की होती है - अनिष्ट निवारक तथा इष्ट कारक। मान लो किसी ग्रह की कुदृष्टि है उसे कुदृष्टि से दुःख है, परेशानियाँ हैं, अभाव हैं और भी अनेक प्रकार की हानियाँ होती हैं। इन सबसे बचने के लिए उस ग्रह की पूजा की जाती है।
इष्ट कारक भक्ति में हमें जो चाहिए- धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य वैभव, मान, प्रतिष्ठा अथवा और कुछ उसकी प्राप्ति के लिए किसी की पूजा करना अथवा वह नाराज होकर किसी आपत्ति को न भेज दे इसलिए उसको सन्तुष्ट करने के लिए किया गया व्यवहार। ऐसा व्यवहार भय के कारण भी होता है। अफसर और मातहतों के बीच में इस व्यवहार को देखा जा सकता है। आजकल के शिष्टाचार में भी इसका विराट रूप देखने को मिल सकता है। मिथ्या प्रशंसा द्वारा भी इष्ट प्राप्ति की ओर बढ़ते हैं और इसलिए भी भक्ति के दृश्य दिखलाई देते हैं। इसमें असलियत कम और नकलियत अधिक देखने को मिलती है। कभी यह भक्ति आत्मप्रवंचना के रूप में भी देखने को मिलती है। परन्तु इस प्रकार की भक्ति मनुष्य को निरन्तर अशक्त करती जाती है।
स्वार्थमूलक इस भक्ति में देवी और मानवी दो रूप और हो सकते हैं। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए देवता की उपासना करना देवी भक्ति कहलाती है और मनुष्य की उपासना करना मानवीय भक्ति कहलाती है।
एक बात और है। ज्ञान-विज्ञान आदि तत्वों की प्राप्ति के लिए अथवा इनके साधनभूत अन्य तत्वों की प्राप्ति के लिए भक्ति की जाती है, वह यदि मनुष्य के आत्म कल्याण की इच्छा से किए गए हों तो वे मनुष्य की भक्ति के रूप में किये जाने पर भी दैवी भक्ति में गिने जा सकते हैं। परन्तु भोगोपभोग की सामग्री प्राप्ति के लिए दिए गए साधन जिनसे आत्म कल्याण की संभावना नहीं रहती मानवी भक्ति में ही शुमार किए जाते हैं। मानव कल्याण और दिव्यता प्राप्ति ये दोनों एक ही तत्व हैं। मानव का कल्याण तभी हो सकता है जब कि वह इन भौतिक तत्वों की गुलामी से छूट जावे। इनसे मुक्ति पाना ही उसका परम स्वार्थ है। इसी को परमार्थ कहते हैं। परन्तु भौतिक साधनों को प्राप्त करने करने के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं वे सभी परम स्वार्थ के विरोधी होते हैं क्योंकि उनसे भौतिक तत्वों की गुलामी दिन प्रति-दिन बढ़ती ही है।
भज् धातु से भजन करने का जो अर्थ निकलता है वह इस बात की सूचना देता है कि आदमी भजन करते करते वही हो जाता है जिसका कि वह चिन्तन करता है। जिस समय वह भौतिक पदार्थों का चिन्तन करता है उस समय उसके सामने भोग पदार्थों का ही विचार रहता है और उसमें भोग भावना ही काम करती रहती है। इसलिए भोग भावनायुक्त होकर जब वह उसकी भक्ति में तल्लीन होता है तो मनुष्य के लिए वही लक्ष्य बन जाता है। लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए चिन्तन की सघनता के कारण वह साधक स्वयं ही माँग पदार्थों का भोग पदार्थ बन जाता है। इसलिए उनके चक्कर से मुक्ति पाने की अपेक्षा वह उनमें अधिक से अधिक फंसता हुआ चला जाता है। इसलिए गुलामी से मुक्ति न मिलकर उसकी जंजीरें अधिक कस जाती हैं।
संज्ञान भक्ति का दृष्टिकोण भिन्न होता है। वह इस सम्पूर्ण रहस्य को समझ कर आगे बढ़ता है। हो सकता है कि देखने में दोनों एक ही तरह चल रहे हों लेकिन साधक की भावना में भिन्नता होने के कारण दोनों के फल भिन्न-भिन्न ही होते हैं।
सज्ञानी की भक्ति में स्वार्थ नहीं, परम स्वार्थ रहता है। वह दुनिया की सब वस्तुएं चाहता है। वह तो सब वस्तुओं की जड़रूप जो भगवान हैं उन्हें ही चाहता है। भगवान यदि मिल जावें या साधना करते-करते वह स्वयं भगवान बन जाये तो उसे जीवनोपयोगी साधन सामग्री की अलग साधना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। और उस समय वह साधक उन पदार्थों की परतन्त्रता में नहीं आता क्योंकि तब वह उन सबके उत्पादक भगवान को प्राप्त कर लेने या आत्मसात् हो जाने के कारण वह उनका सृष्टा तथा उपभोक्ता दोनों ही हो जाता है।
ज्ञान भक्ति मनुष्यों में भी स्थापित की जाती है। आत्म-कल्याण की भावना से जो व्यक्ति अधिक साधन सम्पन्न होता है, उसका शिष्यत्व स्वीकार करके भी यह साधना आरम्भ होती है। इसलिए गुरु भक्ति का यह रूप ग्रहण कर लेती है। परन्तु जैसा कि बताया गया है यह गुरुभक्ति अन्य विश्वास के रूप में भी होती पाई गई है। भक्ति के लिए जहाँ यात्रा पात्र या योग्य अयोग्य की पहचान या भावना रहती है वहाँ अन्धविश्वास नहीं पनपता। अयोग्य की भक्ति सिर्फ इसलिए करने से कि यह हमारे कुल में चली आई है, अन्धविश्वास होने के कारण बड़ा दुखद होती है। परन्तु अन्ध विश्वास की दृढ़ता में यदि ज्ञान का पुट मिल जाए और वह गुरु की योग्यता तथा अयोग्यता का ज्ञान करके तब यदि वह अपने उपयुक्त हो तो उसका शिष्यत्व स्वीकार करे तब ही वह अपनी साधन शक्ति से शिष्य का कल्याण कर सकता है अन्यथा गोस्वामी तुलसीदास जी शब्दों में ऐसे गुरु जहाँ अपना विनाश करते हैं वहाँ शिष्य को भी ले डूबते हैं।
गुरु शिष्य बधिर अंध कर लेखा। एक सुनहि एक नहिं देखा॥ हरहिं शिष्य धन, शोक न हरहीं। ते गुरु घोर नरक मँह परहीं॥
भजन करने में या भक्ति में अपने आपको जिसकी भक्ति या भजन किया जाता है उसके प्रति समर्पित करना होता है। जब तक समर्पण नहीं होता तब तक भक्ति में एकाग्रता नहीं आती और एकाग्रता के बिना योग सिद्ध नहीं होता। फल की प्राप्ति नहीं होती। ज्ञानी भक्त समर्पण के पूर्व यह जानता है कि जिसको वह आत्म समर्पण कर रहा है वह उसकी नाव को पार लगा भी देगा या नहीं। उनके गुण अवगुणों की खोजबीन करके तब आगे कदम रखता है। गुणों व कारण जो उनकी प्राप्ति के लिए आत्म समर्पण करता है वह उनकी शक्ति या गुणों को अपने भीतर बुलाने और बसा लेने की तैयारी किए रहता है इसलिए आत्म समर्पण करने के साथ जिसकी भक्ति की जाती है उसकी शक्तियाँ या गुण साधना आरम्भ होते ही साधक के अन्त में प्रवेश करना तथा स्थित होना आरम्भ कर देते हैं। लेकिन जहाँ भक्ति तो होती है परन्तु या तो साधक के अनुकूल जिसकी भक्ति की जाती है उसमें गुण या शक्ति नहीं होती तो उसके अंदर उन गुण और शक्तियों का ही प्रवेश होना आरम्भ होता है जो कि जिसकी साधना की जाती है, उसमें होती है। इसलिए अंधविश्वास अयोग्य के साथ सम्बंध स्थापित कर पतन के मार्ग पर ही अग्रसर होते हैं। पर ज्ञानी जीवन भर अपने विश्वास को लेकर योग्य पात्र के साथ जब संबंध स्थापित करता है तब निरंतर प्रगति करता जाता है।
आत्म समर्पण में लेना और धारण करना ये दोनों ही क्रियायें होती हैं। लेने की योग्यता देखकर जिसकी भक्ति की जाती है वह अपनी शक्तियों को शिष्य के अंतर में प्रवाहित करना आरंभ कर देता है यदि न भी करे तो भी सजातीय अकर्षण के कारण वे दौड़-दौड़ कर उसके अन्तर में प्रविष्ट एवं स्थिर होना आरंभ कर देती हैं। इसलिए भक्त को अपना अन्तर जान लेने की सबल माँग तथा आगत शक्तियों को रोके रखने-या बसा लेने की दृढ़ इच्छा को जगाये रखने की आवश्यकता होती है। ज्ञान में जितनी तीव्रता होती है, साधना में उतनी ही सरलता आती है और सिद्धि में उतनी ही दृढ़ता आती है।
किसी भी योग की साधना की जावे जब तक मनुष्य को सिद्धि नहीं मिल जाती तब तक उसे कष्ट सहने पड़ते हैं। पर साधक जब ज्ञानपूर्वक भक्तियोग की साधना में दत्तचित्त हो जाता है तब उन कष्टों की ओर से उसका मन ऊपर उठ जाने के कारण कष्टों का उसे अनुभव नहीं होता। सिद्धि की आरंभिक अवस्था का श्री गणेश यहीं से होता है। इसलिए भक्ति योग की साधना का आरंभ तभी से समझना चाहिए जब से उसमें कष्ट सहिष्णुता बढ़ती जावे। लक्ष्य की ओर मन लग जाने से वासनायें भी अपना घर नहीं बना पातीं इसलिए आरंभ से ही मनुष्य की निवृत्ति दुर्वासनाओं से होने लगती हैं। दुर्वासनाओं की निवृत्ति शान्ति का सृजन करती हैं उधर कष्ट सहिष्णुता शान्ति का दृढ़ करती है। योग का लक्ष्य या पूर्ण शाँति है वह मिलना आरम्भ हो जाता है। इसलिए साधना को सिद्धि का तुरंत ही अनुभव मिलने से दृढ़ता उत्पन्न होती है और मनुष्य अन्त तक अपनी साधना पर दृढ़ रहता है।
ज्ञानी भक्त का लक्ष्य हमेशा आत्मोपलब्धि की ओर होता है क्योंकि आत्मा ही सब पदार्थों, सब शक्तियों का केन्द्र और सर्जक है इसलिए वह सर्वशक्तिमान बन जाता है। सर्वशक्तिमान बनकर भी उसमें दूसरों को हड़पने की वृत्ति नहीं आती क्योंकि वह समस्त संसार को अपने से भिन्न देख ही नहीं पाता। वह तो संसार के कण-कण में अपने को ही प्रतिबिम्बित देखता है, इतना ही नहीं सबके सब उसके अन्तर में भी समाये रहते हैं। इसलिए उसमें किसी को हड़पने की वृत्ति जन्म ही नहीं लेती। वह वासनाओं और इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। इसलिए वह मुक्त पुरुष अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ आत्मा के विराट-सम्पूर्ण विश्व के प्रति समर्पित कर देता है और अपने इस समर्पण द्वारा परम स्वार्थ की सिद्धि करता है। यही भक्तियोग की साधना का अंतिम लक्ष्य है। इसीलिए अन्य सभी योगों की अपेक्षा इस ज्ञान-भक्ति योग की प्रशंसा की गई है और इसे मानव के लिए कल्याणकारी माना गया है।
(महात्मा गाँधी)
इंग्लैंड की कोलम्बिया ग्रामोफोन कंपनी ने महात्मा गाँधी का एक महत्वपूर्ण भाषण को रिकार्ड में भरा था। जो इस प्रकार है :-
“संसार में एक ऐसी अपूर्व शक्ति विद्यमान है जो प्रत्येक वस्तु का संचालन करती है। यद्यपि मैं उस शक्ति को देख नहीं सकता पर उसका अनुभव करता हूँ। वह ऐसी गुप्त शक्ति है जो अपना अनुभव स्वयं ही करा देती है। वह ज्ञान प्राप्त कराती है कि ईश्वर भी कोई चीज है।”
“साधारणतः लोग यह नहीं जानते कि शासन कौन करता है और वह (ईश्वर) क्या और कैसे शासन करता है। फिर भी लोग समझते हैं कि ऐसी कोई शक्ति अवश्य है जो हमारे ऊपर शासन करती है। कुछ वर्ष पूर्व मैंने मैसूर में भ्रमण किया और मुझे कुछ गरीब देहातियों से भेंट करने का अवसर मिला। पूछने पर मुझे मालूम हुआ कि वह यह नहीं जानते कि मैसूर में शासन कौन करता है। उन्होंने केवल इतना उत्तर दिया- “कोई देवता शासन करता है,” यदि उन लोगों को अपने राजा का भी ज्ञान नहीं है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सम्राटों के सम्राट परमात्मा का ज्ञान मुझे नहीं है। पर जैसे मैसूर के देहाती यह जानते हैं कि उन पर कोई राजा शासन अवश्य करता है वैसे ही मैं भी यह अनुभव करता हूँ कि प्रत्येक वस्तु का संचालक कोई अवश्य है।”
“वह कोई अन्धा कानून नहीं है क्योंकि कोई भी अन्धा कानून जीवित प्राणियों पर शासन नहीं कर सकता। वह कानून क्या है। ईश्वर ! कानून और कानून का रचने वाला दो नहीं एक ही है। मैं कानून के रचयिता के अस्तित्व को इन्कार नहीं कर सकता, क्योंकि मैं उस (ईश्वर) के सम्बन्ध में कम जानता हूँ। जैसे पृथ्वी के राजा का अस्तित्व न मानने से मुझे कोई खास लाभ नहीं हो सकता, उसी प्रकार ईश्वर का अस्तित्व न मानने से उसकी प्रतिक्रिया में कोई अन्तर नहीं डाल सकता। ईश्वर को अन्तिम मान लेने से जीवन यात्रा सुलभ हो जाती है। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरे आस-पास जो भी चीजें हैं सभी परिवर्तनशील हैं पर उन सबका परिचालन करने वाली ऐसी एक वस्तु है जो अपरिवर्तनीय है। वही सबको रचती है और फिर बिगाड़ देती है और दुबारा फिर उसी प्रकार रचना कर देती है। वह वस्तु ईश्वर है जिसमें ज्ञान द्वारा देख सकता हूँ वह और कुछ नहीं केवल ईश्वर है। मृत्यु में जीवन है, असत्यता में सत्य है। अन्धकार में प्रकाश है। इसलिये मैं सोचता हूँ कि ईश्वर-जीवन सत्य, और प्रकाश है। वह प्रेम है, वह सर्वोत्तम है। वह हृदय का नियन्त्रण करता है। उसके प्रत्येक कार्य में उसकी झलक है। हमारे पाँच ज्ञान हमें जो भी प्रकाश दे सकते हैं उससे भी अधिक प्रकाश उसकी भक्ति अनुभव करने में है। हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ हमें जो प्रकाश देती हैं वह चाहे हमें कितना ही वास्तविक मालूम पड़े, पर वह नकली भी हो सकती हैं। जब हमें ज्ञानेंद्रियों से भी अधिक कुछ अनुभव होता है। तो वह उस शक्ति को ही अनुभव होता है। पर यह अनुभव वही कर सकता है जो अपने में ईश्वर का अस्तित्व मानता है। उसका अस्तित्व सभी देशों और सभी वायुमण्डलों में है। इसको इन्कार करना अपने ही अस्तित्व को इंकार करना है। उसके अस्तित्व का अनुभव विश्वास से हो सकता है और विश्वास सहज में उत्पन्न नहीं होता। इसका एकमात्र उपाय संसार के अध्यात्मिक शासन में विश्वास करना है। अर्थात् सत्य और प्रेम के कानून पर विश्वास करना सत्य और प्रेम के विपरीत जो भी हो, उसे न मानना और अपने विश्वास के अनुसार कोई काम करना सबसे सुगम उपाय है। मैं मानता हूँ कि ईश्वर का अस्तित्व तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता है। विश्वास ही तर्क है। मैं जो भी कह रहा हूँ वह असंभव नहीं है।”
“मैं बुराई को मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि संसार में उसने ही बुराई फैलाई, पर उसमें स्वयं कोई बुराई नहीं और वह उससे दूर ही है। मैं जानता हूँ कि जब तक मैं अपने प्राणों तक की भी बलि देकर बुराइयों का सामना करने को तैयार नहीं रहूँगा तब तक मैं ईश्वर को नहीं जान सकता। मैंने अपने निज के अनुभव से ऐसा ही ज्ञान प्राप्त किया है। जितना ही मैं अपने को अधिक से अधिक गरीब बनाता जाता हूँ, उतना ही ईश्वर नजदीक दिखलाई देता है। जब मेरा विश्वास हिमालय की भाँति अचल और बर्फ की भाँति स्वच्छ हो जायगा तब मैं ईश्वर के निकट अधिक पहुँच सकूँगा।”
उदार होना दृढ़ रहना, बड़ों का मान करना और मीठे वचन बोलना सर्वप्रिय बनने के साधन हैं।
-भीष्म
(श्री. अशर्फीलालजी मुख्तार, बिजनौर)
सत्यनारायण की कथा का उत्तर भारत में बहुत प्रचार है। ईश्वर पूजा को एक मध्यवर्ती मार्ग सत्य नारायण की कथा का माना जाता है। कोई प्रसन्नता की, संतोष की, सफलता की, भार निवृत्ति की बात होने पर, तीर्थ यात्रा आदि से लौटने पर अथवा स्वाभाविक श्रद्धा से प्रेरित होकर लोग सत्य नारायण की कथा कराते हैं।
यह कथा नारद और विष्णु के संवाद से आरंभ होती है। नारदजी मनुष्य शोक के निवासियों को अनेक प्रकार के दुखों से ग्रस्त देखकर उन्हें दुख से छुड़ाने का उपाय भगवान से पूछते हैं। भगवान नारद जी की उपाय के रूप में सत्य नारायण का व्रत बताते हैं। इसके बाद विष्णु ने नारद को और सूतजी शौनकादयों को वे उपाख्यान सुनाते हैं जिनमें इस व्रत के करने वालों को मनोवाँछित लाभ हुए है। शतानन्द, ब्राह्मण, काष्ठ विक्रेता भील, साधु वैश्य, लीलावती कलावती, गौ चराने वाले गोप, अंगध्वज राजा आदि के द्वारा सत्यनारायण की आराधना करने से मनोवाँछित लाभ मिलने एवं आराधना का तिरस्कार करने पर दुख दारिद्र एवं संकट में पड़ने की कथा इन उपाख्यानों में है। जिससे यह प्रकट होता है कि जो उस व्रत को करेंगे वे लाभ उठावेंगे और जो उसका तिरस्कार करेंगे वे घाटे में रहेंगे।
यहाँ एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह कथा कौन सी थी जो शतानन्द, भील, साधु वैश्य, लीलावती, कलावती, गोप, अंगध्वज आदि ने कराई थी। यह प्रश्न उचित भी है क्योंकि वर्तमान कथा का निर्माण तो तभी हुआ होगा जब उपरोक्त व्यक्ति उसे करा चुके होंगे। यह हो नहीं सकता कि उनने जो कथा कराई हो उसमें उन्हीं का वर्णन रहा हो, तब उस असली कथा का पता चलना ही चाहिए जो विष्णु द्वारा नारद को और सूतजी ने शौनकादि को सुनाई थी। इस प्रश्न का उत्तर कथा वाचकों से पूछा जाता है तो वे या तो निरुत्तर हो जाते हैं या ऐसा कहते हैं कि प्रत्येक कल्प में शतानन्द, साधु, काष्ठ विक्रेता , लीलावती, कलावती, गोप आदि हुए हैं। पूर्व कल्प के शतानन्द आदि की कथा इस कला के शतानन्द ने सुनी होगी। ऐसे उत्तरों से भली प्रकार समाधान नहीं होता।
तात्विक बात यह है कि विष्णु भगवान ने नारद को और सूतजी ने शौनकाद को सत्य का व्रत लेने की, सच्चाई का जीवन बिताने की शिक्षा दी थी और सत्य को ही सब प्रकार के दुखों का हर्ता बताया था। उनका कथन था कि लोगों के सम्पूर्ण दुख असत्यमय आचरण के कारण है। बेईमानी, दुराचार, झूठ, छल, दंभ आदि की दुर्भावनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य नाना प्रकार के दुष्कर्म करते हैं और उन पापों के फलस्वरूप तरह-तरह के रोग, शोक, दुख, दारिद्र, क्लेश, कलह सामने आते हैं यदि मनुष्य का जीवन सत्य युक्त, सात्विक, शुद्ध निर्मल हो तो कोई कारण नहीं कि उसे दुखों की यातना सहनी पड़े। इस ध्रुव तथ्य की शिक्षा देते हुए विष्णु ने नारद को कहा था कि सत्य ही नारायण है। सच्चाई पर उतनी श्रद्धा आस्था, निष्ठा होनी चाहिए जितनी की ईश्वर पर होती है। इसलिए सत्य को नारायण कहा गया और सत्य नारायण का व्रत लेना, दुखों का निवारक और सुख समृद्धियों का संवर्धक बताया गया।
लीलावती, कलावती आदि की कथाएँ सत्य का महात्म्य बताने के लिए उदाहरण रूप से हैं। कोई सिद्धाँत केवल विवेचनात्मक ढंग से या शुष्क उपदेश के ढंग से समझाया जाय तो सर्वसाधारण की समझ में वह वैसी अच्छी तरह नहीं आता जैसा कि उदाहरण एवं घटनाएं सुनने से समझ में आ जाता है। मनुष्य का स्वभाव लोभ और भय से बचने और लोभ को प्राप्त करने के लिए ही अधिकाँश कार्य करता है। इस मनोवैज्ञानिक रहस्य को हमारे शास्त्रकार भली प्रकार जानते थे इसलिए उन्होंने सत्य नारायण का व्रत लेने के साथ साथ उन कथाओं को भी संबद्ध कर दिया जिनके कारण लोगों को इस महा अभियान द्वारा लाभ प्राप्त करने का लोभ बढ़े और विमुख रहने पर अनिष्ट होने का भय उपस्थित हो। इन दोनों आधारों के कारण सुनने वाले की रुचि सत्य नारायण की ओर बढ़े।
जिस दिन सत्य नारायण का व्रत लिया जाता है उस दिन पवित्रता पूर्वक व्रत उपवास रख कर उत्सव का आयोजन किया जाता है। गुरु जन, ब्राह्मण, देवता, भगवान की प्रतिमा, अग्नि, वरुण (जल) आदि का आवाहन, स्थापन इसलिए किया जाता है कि इन श्रेष्ठ सत्ताओं की उपस्थिति में, साक्षी में, जो प्रतिज्ञा की जा रही है, उसके पालन में अधिक दृढ़ता और लोक-लाज रहे और जब भी व्रत भंग का अवसर आवे तब यह ध्यान तुरन्त ही उठ आवे कि जो प्रतिज्ञा इतने देवताओं और सत्पुरुषों के सामने की गई थी उसे तोड़ना मेरे लिए लज्जा की बात होगी।
बार-बार सत्यनारायण की कथा इसलिए कहलाई जाती है कि कालान्तर में प्रतिज्ञा का प्रभाव मस्तिष्क में से हटने लगता है लोग पुरानी प्रतिज्ञा को विस्मरण कर देते हैं इसलिए बार-बार, वह प्रण करने से मनोभूमि का पुनर्जागरण होता रहता है और चित्त पर हर बार नया संस्कार जम-जम कर सत्य पालन की उस विचार धारा को धीरे-धीरे अधिक परिपुष्ट करता रहता है इसीलिए जीवन में अनेकों बार जल्दी-जल्दी सत्यनारायण के व्रत का उत्सव कराने की परम्परा चली आ रही है।
कई आदमी इस वास्तविकता को समझ कर ऐसा भय करेंगे कि हमारा जीवन अभी असत्यपूर्ण है, और वर्तमान परिस्थितियों में हम पूर्ण तथा सत्यनिष्ठ हो भी नहीं सकते, ऐसी दशा में सत्य नारायण का उत्सव कराना या कथा कहलाना निरर्थक होगा। ऐसा शंका करने वाले सज्जनों को समझना चाहिए कि पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को रोकने के लिए व्रत ही एकमात्र उपाय है। नीचे की ओर तेजी से बहते हुए पानी के आगे अगर बाँध खड़ा न किया जाय तो पानी किस प्रकार रुक सकेगा? बाँध कई बार टूट भी जाता है, उस टूट फूट की दुरस्ती बराबर की जाती रहती है और पानी थोड़ा बहुत निकल भी जाय तो भी अधिकाँश तो रु का ही रहता है। इसी प्रकार व्रत न लेने वाले की अपेक्षा व्रत लेने वाला अपेक्षाकृत सत्य का पालन अधिक ही कर लेता है और जितना कुछ भी सत्य के समीप रहता है उतना तो पुण्य फल के द्वारा मिलने वाला आनंदों को प्राप्त कर ही लेता है। इस प्रकार यदि कभी व्रत भंग भी होता रहे तो भी व्रतहीनों की अपेक्षा तो उत्तमता ही रहती है।
सत्य का व्रत लेने की आवश्यकता ही इसलिए है कि हमारा आज का जीवन अधिकाँश में असत्य ग्रस्त है। असत्य एक रोग है, व्रत एक दवा है। व्रत रूपी औषधि सेवन करते रहने से धीरे-धीरे सत्य रूपी निरोगता प्राप्त होती है पूर्ण तो एक परमात्मा है। मनुष्य सभी अपूर्ण है। इस अपूर्णता को दूर करके पूर्णता को प्राप्त करने का जो प्रयत्न है उसे ही साधन या व्रत कहते हैं। किसी बात का व्रत लेने से, निश्चय करने से, ही तो उस ओर प्रगति होती है। फेल हो जाने के भय से स्कूल में भर्ती न होना कोई बुद्धिमानी नहीं है। इसी प्रकार “व्रत टूट गया तो कैसा होगा?” इस भय से व्रत ही न लेना कोई उचित कारण नहीं है।
हमारा बाह्य एवं भीतरी जीवन सच्चाई से भरा हुआ हो, उसमें प्रेम, पवित्रता, निष्कपटता, ईमानदारी, उदारता, त्याग, पुरुषार्थ, सरलता और सादगी की प्रधानता रहे यह सत्य नारायण का पथ है। यही समस्त सुख शान्तियों का मूल उद्गम है। इस पथ पर चलने का संकल्प करने का ही दूसरा नाम सत्य नारायण व्रत है। यह व्रत धार्मिक परम्पराओं के अनुसार जब किया जाता है तो और भी उत्तम होता है। सत्य नारायण व्रत कथा का यही रहस्य है।
(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र, एम.ए.)
आपका जीवन किधर जा रहा है?
मानवी जगत् में आकर आपने क्या किया है? क्या कोई ऐसा कार्य किया है जिससे आपको मनः शान्ति का चरम सुख प्राप्त हो? क्या आपकी मनोवृत्ति सात्विक वस्तुओं पर एकाग्र होती है, या वह अब भी निंद्य एवं वासनामय पदार्थों की ओर मारी-मारी फिरती है? संसार में जिन दो स्थानों पर रह कर आपको आत्म विकास करना पड़ा, उन स्थानों पर रह कर क्या आपने कुशलता और चातुर्य का परिचय दिया है? क्या आप उस परिपक्वता में आ गये हैं कि आपकी राय दूसरे लेते हैं? निर्णय करते समय क्या भावावेश, या जल्दबाजी में आ जाते हैं, या ‘करूं या न करूं’ की स्थिति में पड़े रहते हैं? जीवन में क्या आपके कोई निश्चित या अनिश्चित उद्देश्य हैं? उस तक पहुँचने के लिए क्या आपने कुछ प्रयत्न किया है?
एक संतुलित और विवेकशील व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेक प्रश्न आते हैं। वासना या क्षणिक आवेश से मुक्त होकर जब वह जीवन की जटिलताओं पर विचार करता है, तो उसे ज्ञान होता है कि वास्तव में अभी उसमें कुछ नहीं किया है। यों ही निरुद्देश्य जीवन-यात्रा चली जा रही है।
यह अनिश्चित प्रवृत्ति मानव की सबसे बड़ी निर्बलता है। मनुष्य अपने आपको बड़ा बुद्धिमान समझता है किन्तु वास्तव में उसके जीवन का 50 प्रतिशत जीवन यों ही आलस्य और बेकारी में नष्ट होता है।
जीवन में विकास कीजिए -
आपका शरीर प्रतिदिन विकसित हो रहा है। प्रत्येक दिन शरीर में नए रक्त, मज्जा, तन्तुओं का विकास हो रहा है पर खेद है कि शारीरिक अनुपात में मानसिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो रहा। आपका शरीर बड़ा होता जा रहा है किन्तु मन बच्चों जैसा अविकसित ही पड़ा है। उसमें उन तत्वों का विकास नहीं हुआ, जिनसे मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है।
मन विकसित हुआ या नहीं, यह जानने के लिए निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिए-
1. क्या आप आत्मनिर्भर हैं, या हीनता के भाव को, लोगों से बात करते या व्यवहार करते हुए अनुभव करते हैं?
2. मन की शान्ति या उत्साह के लिए आप दूसरों के विचारों और मन्तव्यों पर कहाँ तक निर्भर रहते हैं? दूसरों के कुत्सित संकेत क्या आपको पस्त हिम्मत कर देते हैं या आप बिना उनकी परवाह किए अविचल भाव से अपने कर्तव्य-पथ या निर्दिष्ट मार्ग पर आरुढ़ हैं?
3. क्या आप मिथ्या घमंड, अहंकार या दूसरों की तारीफ के आदी बन गये हैं? बच्चे प्रायः जरा सी तारीफ से प्रसन्न हो उठते हैं, तनिक सी कठोर बात से विक्षुब्ध हो उठते हैं। क्या आप भी अपने को इसी श्रेणी में रक्खे हुए है? क्या दूसरों की झूठी तारीफ का जादू आप पर चलता है? यदि चलता है तो आप अभी अविकसित ही हैं।
4. क्या आप अपनी पोशाक की बहुत देखभाल रखते हैं? बाहर से शृंगार बनाकर अंदर का खोखलापन छिपाना चाहते हैं? क्या आपको आभूषणों, फेस पाउडर, रोज हजामत, टीप-टाप का शौक अभी तक बना हुआ है? क्या आप बच्चों की तरह अब भी चटकीले, रंग बिरंगे वस्त्र पहनने के आदी हैं?
5. जिह्वा के स्वाद में, स्वादिष्ट मिष्ठान्न और मेवे पकवान चाट पकौड़ी बीड़ी पान क्या इनमें आपको रुचि है? यदि हाँ, तो आप अभी रुचि में परिष्कार नहीं हुआ है। परिपक्वता और विकास इस दिशा में नहीं हुए हैं।
ऊपर लिखे हुए प्रश्नों पर विचार कीजिए। इनसे आपको अपने रुचि परिष्कार एवं विकास का कुछ ज्ञान होगा।
आत्मविकास के कुछ उपाय :-
यदि आप आत्मनिर्भर हैं, तो स्मरण रखिए आपने ऐसी सम्पदा प्राप्त कर ली है, जो सम्पद् में, विपद् और आनन्द के क्षणों में आपको सदैव ऊँचा उठायेगी। बस, आपको आवश्यक यह है कि प्रतिदिन कुछ नवीन, कुछ उपयोगी ज्ञान की अभिवृद्धि करते रहें, ज्ञान के कोष को बढ़ाते रहें, आगे बढ़ते रहें।
यदि आप आत्म प्रताड़ना करते हैं, अपने विषय में हीनभाव रखते हैं, तो आप भावनाओं की बीमारी से त्रस्त है। यह बीमारी आपको आपकी महत्ता का अनुभव नहीं होने देती। इससे मुक्ति का उपाय यह है कि आप कार्यों को बिना भावना की परवाह किए सम्पन्न करते जाइए। यह नियम बना लीजिए कि अपने किए हुए किसी भी कार्य की बुराई न करेंगे, अपने विषय में उच्च और पवित्र धारणाएँ बना लीजिए और उन्हें पुष्ट करते रहिए। कार्य करने से आप की हीनता लुप्त होगी। अधिक सोचने से वह पुष्ट होती है। सोचिए कम कार्य अधिक कीजिए । जो व्यक्ति अपनी अधिक टीका-टिप्पणी करता है, और गलतियाँ निकाला करता है, वह आपका विकास एवं परिष्कार रोक लेता है।
आप अपने संतोष और उत्साह के लिए दूसरों पर निर्भर मत रहिए। दूसरों का अनुकरण कीजिए। ऐसा करने से आपकी मौलिकता, गुण और विशेषताएं सभी प्रकट न होंगी। स्वयं सोचिए कि क्या उत्तम है? वही कीजिए चाहे कोई कुछ भी कहे। आपकी विशेषताएं प्रकाश में आयेंगी और लोग चमत्कृत होंगे।
यदि आप घमंडी, अहंभाव से भरे हुए, दूसरों से प्रशंसा चाहने वाले या क्रोधी हैं, तो उसका अभिप्राय यह है कि आप अंदर ही अंदर अपनी हीनता से डरते हैं। हीनता की प्रतिक्रिया आपके मानसिक जगत् में ही हो रही है।
अपनी वेशभूषा और शृंगार की अधिक देख-रेख करने वाला व्यक्ति बाहरी टीपटाप में विकास और गंभीरता की कमी छिपाता है। वास्तविक परिपक्वता आन्तरिक एवं बौद्धिक है। जो व्यक्ति सही अर्थों में विकसित हुआ है, उसकी पोशाक साधारण होती है, वह गहरे रंग नहीं पसंद करता, आभूषणों से घृणा करता है, सरल सीधा स्वच्छ और भले मानुषों जैसा पोशाक पहनता है।
यदि आप अपने प्रति ईमानदार हैं, तो न तो आप अपनी अच्छाई छिपायेंगे, न झूठा शेखी बघारेंगे। आप समझेंगे कि मनुष्य होने के नाते आपकी भी दूसरों की तरह कुछ कमजोरियाँ हैं। आप अपने को दूसरों से यदि अच्छा नहीं समझेंगे, तो बुरा भी न मानेंगे। आप अपनी विशेषताएं प्रकट करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषताएं रखता है। यदि व्यक्तित्व का ठीक तरह अध्ययन किया जाय, तो आप भी महान बन सकते हैं।
यदि आप झूठे दिखावे को पसन्द नहीं करते हैं, इसका अभिप्राय यह है कि आप अपने मन में आत्मा की आवाज के अनुसार सत्य का अन्वेषण कर रहे हैं। आप उन्नति की ओर उठ रहे हैं।
यदि आप सच्चे हैं, तो आप अपने या दूसरे किसी के विषय में भी बढ़ा-चढ़ा कर मिथ्या भाषण करेंगे। आपके कार्य कुशलता लिए हुए होंगे और आप दूसरों को दिखाकर व्यर्थ का उपहास न करेंगे। यदि आज अपने प्रति सच्चे नहीं हैं, तो आप स्वार्थ की रीतियों से दूसरों को धोखा देने का प्रयत्न करेंगे। जैसे आप वास्तव में नहीं हैं, वैसा दिखाकर आप अपनी महत्ता कम कर रहे हैं। यदि आप जैसे आप हैं, वैसे ही दूसरों को दिखाते हैं, तो आपका व्यक्ति अपने स्वाभाविक रूप में विकसित होता रहेगा।
जब तक मनुष्य अपने मानसिक जगत् में परिपक्वता प्राप्त नहीं करता, छोटी-मोटी बातों में फंसा रहता है, अपनी भावनाओं पर संयम नहीं रख पाता तब तक वह बच्चा ही बना हुआ है।
मानसिक दृष्टिकोण से बालक न बनिए। संसार की विभीषिकाओं, आपत्तियों और संघर्ष को सहन करने की आत्मशक्ति का निरन्तर विकास करते रहिए।
(श्री नैनूरामजी याज्ञिक, रोहेरा)
प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।
मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।
अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।
अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।
अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे। बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।
इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
(अनु. -श्री भदन्त आनन्द कौसल्यायन)
पूर्व समय में वाराणसी में (राजा) ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, एक गाँव में एक ब्राह्मण वैदर्भ नामक मन्त्र जानता था। वह मन्त्र बेशकीमती था, महा मूल्यवान् था। नक्षत्रों का योग होने पर, उस मन्त्र को जपकर, आकाश की ओर देखने से सात रत्नों की वर्षा होती थी। उस समय बोधिसत्व उस ब्राह्मण के पास विद्या सीखते थे। सो एक दिन वह ब्राह्मण किसी भी काम से, बोधिसत्व को (साथ) लेकर, अपने ग्राम से निकल चेतिय राष्ट्र (की ओर) गया। रास्ते में, एक जंगल की जगह में, पाँच सौ पेसनक चोर मुसाफिरों पर डाका डालते थे। उन्होंने बोधिसत्व और वैदर्भ ब्राह्मण को पकड़ लिया। ये चोर, ‘पेसनक चोर’ क्यों कहा थे? वे दो जनों को पकड़कर, उनमें से एक धन लाने के लिए भेजते थे, इसलिए पेस (=प्रेषनक=भेजने वाले) चोर कहलाते थे। वे, पिता-पुत्र को पकड़कर, पिता को कहते हमारे लिए धन लाकर, पुत्र को ले जाना, इस प्रकार माँ-बेटी को पकड़ कर, माँ को भेजते। ज्येष्ठ-कनिष्ठ भाइयों को पकड़कर ज्येष्ठ भाई भेजते (और) गुरु-शिष्य को पकड़कर शिष्य को भेजते। सो, उस समय भी, उन्होंने ब्राह्मण को पकड़े रखकर, बोधिसत्व को भेजा।
बोधिसत्व ने आचार्य का प्रणाम कर कहा ‘मैं एक-दो दिन में आ जाऊँगा। आप डरिये नहीं। और मेरा कहना करना। आज धन बरसने का नक्षत्र-योग होगा। आज दुःख को न सह सकने के कारण, मन्त्र का जाप कर, धन मत बरसाना। यदि बरसाइयेगा, तो आप और ये पाँच सौ चोर-सभी-नाश को प्राप्त होंगे।’ इस प्रकार आचार्य को सलाह देकर, वे धन लाने के लिए चले गए। चारों ने सूर्यास्त होने पर ब्राह्मण को बाँधकर लिटा दिया। उसी समय पूर्व दिशा की ओर से परिपूर्ण चन्द्रमण्डल उगा। ब्राह्मण ने तारों की ओर देखते हुए धन बरसाने के नक्षत्र-योग को देख, सोचा-- “मैं किसलिए दुःख सहन करूं? क्यों न मन्त्र का जाप करूं और रत्नों की वर्षा बरसाकर चोरों को धन देकर, सुखपूर्वक चला जाऊं।” उसने चोरों को सम्बोधित किया--चोरों ! तुमने मुझे किस लिए पकड़ रखा है?’
आर्य ! धन के लिए।”यदि धन की आवश्यकता है, तो शीघ्र ही मुझे बन्धन से खोल, सिर से नहला, नवीन वस्त्र पहना, सुगन्धियों का लेप कर, फूल-मालायें पहनाकर, बिठाओ।’ चोरों ने उसकी बात सुन, वैसा ही किया।
ब्राह्मण ने नक्षत्र-योग जान, मन्त्र जाप कर आकाश की ओर देखा। उसी समय आकाश से धन गिरे। चोर उस धन को इकट्ठा कर, (अपने-अपने) उत्तरीय में गठरी बाँध, चल दिये। ब्राह्मण भी इनके पीछे ही पीछे गया। तब उन चोरों को दूसरे पाँच सौ चोरों ने पकड़ लिया।
‘हम पर किस लिए हमला करते हो?’ पूछने पर, उत्तर मिला, ‘धन के लिए पकड़ा है।’ ‘यदि धन की आवश्यकता है, तो इस ब्राह्मण को पकड़ो। यह, आकाश की ओर देखकर धन बरसावेगा। हमें यह धन इसी ने दिया है।’
चोरों ने उन चोरों को छोड़कर ब्राह्मण को पकड़ा और कहा--’हमें भी धन दो।’ ‘मैं तुम्हें धन दूँ, लेकिन धन बरसाने का नक्षत्र-योग (अब) एक वर्ष बाद होगा। यदि धन से मतलब है, तो सब्र करो, मैं तब धन की वर्षा बरसाऊंगा।’ चोरों ने क्रुद्ध होकर, अरे ! दुष्ट ब्राह्मण! औरों के लिए अभी धन वर्षा कर, हमें अगले वर्ष तक प्रतीक्षा कराता है वह (वहीं) तेज तलवार से ब्राह्मण के दो टुकड़े कर (उसे) रास्ते पर डाल दिया। (फिर) जल्दी से उन चोरों का पीछा कर, उनके साथ युद्ध किया और उन सबको मारकर धन ले फिर (आपस में) दो हिस्से हो, एक दूसरे से युद्ध किया और ढाई सौ जनों को मारा। इस प्रकार जब तक (केवल) दो जने बाकी रह गए, तब तक एक दूसरे को मारते रहे।
इस प्रकार उन (एक) सहस्र आदमियों के विनष्ट होने पर, उन दोनों जनों ने उपाय से धन को लाकर, एक ग्राम के समीप, जंगल में छिपाया। (उन दोनों में से) एक खड्ग लेकर धन की हिफाजत करने लगा। दूसरा, चावल लेकर, भात पकवाने के लिए गाँव में गया। लोभ-विनाश का मूल ही है। धन के पास बैठे हुए ने सोचा-- ‘उसके आने पर धन के दो हिस्से करने होंगे। क्यों न मैं, उसे आते ही खड्ग के प्रहार से मार दूँ।’ सो वह खड्ग को तैयार कर और उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा। दूसरे ने भी सोचा- ‘उस धन के दो हिस्से (करने) होंगे। सो, मैं, भात में विष मिलाकर, उस आदमी को खिलाऊँ इस प्रकार उसका प्राण नाश कर, सारे धन को अकेला ही ले लूँ।’ उसने भात के तैयार हो जाने पर, अपने खा, शेष भात में विष मिला, (उसे) लेकर वहाँ गया। उसके भात उतारकर रखते ही, दूसरे ने खड्ग से दो टुकड़े करके, उसे छिपी जगह में छोड़, अपने भी उस भात को खा, वहीं प्राण गंवाये।
इस प्रकार उस धन के कारण सभी विनाश को प्राप्त हुए। बोधिसत्व भी एक दिन में धन लेकर (आचार्य को छुड़ाने) आ गये। (उन्होंने) वहाँ आचार्य को न पा, और बिखरे धन को देख (सोचा)-- ‘आचार्य ने मेरी बात न मान धन बरसाया होगा। और सब विनाश को प्राप्त हुए होंगे।’ (यह सोच) महा-मार्ग से चले। चलते-चलते आचार्य को, सड़क पर दो टुकड़े हुए पड़ा देख, ‘मेरा कहना न मानकर मग‘ (सोच) लकड़ियाँ, चुन, चिता बना, आचार्य का दाह-कर्म किया और उसे वन-पुष्पों से पूजा। आगे चलकर, पाँच सौ मरे हुए, उससे आगे ढाई सौ, इसी प्रकार क्रम से आखिर में दो जनों को मरा देखकर, सोचा -- ‘यह दो कम एक हजार (जने) विनाश को प्राप्त हुए। दूसरे दो जने (भी) चोर होंगे, और वे भी ! संभल न सके होंगे। वे कहाँ गये?’ सोचते हुए उनके धन लेकर जंगल में घूमने के मार्ग को देख, जाकर, गठरी बंधी धन की राशि को देखा। वहाँ एक को भात की थाली को परोसकर, मरा पाया। जब उन्होंने ‘यह किया होगा’-- यह सब जान, ‘वह (दूसरा) आदमी कहाँ है?’ सोचते हुए उसे भी जंगल में फेंका हुआ देख, सोचा हमारे आचार्य ने मेरी बात न मान, असामयिक वचन के कारण, अपने भी प्राण गंवाये, और दूसरे हजार जनों का भी नाश किया। अयोग्य मार्ग में अपनी उन्नति चाहने वाला हमारे आचार्य की तरह महाविनाश को ही प्राप्त होता है।
(श्री अवधबिहारीलाल वानप्रस्थी, लखनऊ)
आज हमारे देश की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण समस्या है अन्न की कमी। इस कमी को दूर करने के लिए हमारी राष्ट्रीय सरकार को विदेश से करोड़ों रुपये का अनाज मंगाना पड़ता है जिससे अन्य उपयोगी कार्यों में लगाने के लिए रुपया नहीं बच पाता। अतः यदि कोई ऐसा उपाय निकाला जाय जिससे यह रुपया भी बचे, अनाज की भी आवश्यकता न पड़े और जनता का स्वास्थ्य भी सुधरे तो अवश्य ही ऐसे उपाय की ओर हमारी सरकार और जनता का ध्यान जाना चाहिए।
आज वास्तव में स्वास्थ्य, रोग और शरीर की क्रिया-शक्ति के सम्बन्ध में भ्रम फैला हुआ है। सबने प्रायः माँसल या थल-थल शरीर को ही स्वस्थ शरीर मान लिया है। रोग को हम एक ऐसी भयंकर विभीषिका मान बैठे हैं जिसके चिन्हों को शीघ्र से शीघ्र दवा देने में ही हम ऋण मानते हैं। अतः नई-नई दवाइयों और इन्जेक्शनों से बाजार भरा पड़ा है। शरीर की क्रिया-शक्ति को हम भोजन द्वारा प्राप्त शक्ति ही समझ बैठे हैं। परिणाम यह हुआ है कि हम कहने और सोचने लगे हैं। “अधिक भोजन तो अधिक काम।” परन्तु इससे अधिक भयंकर व हानिकर मिथ्या धारणा और दूसरी न होगी। प्राकृतिक चिकित्सा और उपवास के इतिहास से जो व्यक्ति थोड़ा बहुत भी परिचित है, वे जानते हैं कि केवल पानी पीकर पूरे दिन का उपवास करने वाले एक अमेरिकन नागरिक ने उसी बीच में वाशिंगटन से शिकागो नगर की सैकड़ों मील की दूरी को पैदल पार किया और वो भी मुस्कराते हुए, अत्यन्त प्रसन्नता पूर्ण मन से। महात्मा गाँधी के उन अनेक उपवासों की बात सर्वविदित है। जिनके बाद सदैव उन्हें अपूर्व आत्म-शक्ति व क्रियाशक्ति प्राप्त होती रहती थी। यदि भोजन ही क्रिया शक्ति की दाता है, तो हमारे ऋषियों और उनकी परम्परा का अनुसरण करने वाले इस युग के भी अनेक महापुरुषों की अथक क्रियाशीलता और सूक्ष्म-सात्विक आहार के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया जायेगा? केवल आत्मिक शक्ति का चमत्कार कहकर इसे युग-युगों से सिद्ध सत्य की इस “युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु” के गीतोक्त सिद्धाँत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। हमें इसको समझना होगा। तभी हमारा शरीर ठीक स्वास्थ्य को और हमारा मन सही चेतना को प्राप्त कर सकेंगे।
वास्तव में ‘युक्ताहार, क्या है? किसी ने ठीक ही लिखा है कि यदि हम उचित ढंग से उचित मात्रा में, उचित वस्तुओं को न खायें, तो वह खाना स्वयं हमें ही खाने लगता है। वह उचित ढंग क्या है? इसे ही हमें खोजना है। वास्तव में देखा यह गया है कि जैसे ही आहार पेट में पहुँचता है, एक बहुत ही शक्ति का व्यय करने वाली पाचन-क्रिया का आरम्भ हो जाता है। परिणाम यह होता है कि जो शक्ति अभी तक हमारे अंग-प्रत्यंग में परिव्याप्त होकर शरीर का संचालन कर रही थी, वह सिमट-सिकुड़ कर पाचन-क्रिया में लग जाती है। अब प्रश्न केवल यह रह जाता है कि क्या हम शक्ति के उपयोग से केवल यह समझते हैं कि वह पाचन-क्रिया में लगे, या यह कि अन्य गंभीर, जीवन निर्माणकारी कार्यों में लगे? यदि हम धनात्मक, सरलता से पचने वाले, थोड़ी मात्रा में होने पर भी अधिक रसों को देने वाले, फल शाकादि को पेट में पहुँचायेंगे, और उन्हें भी भूख लगने पर ही समुचित मात्रा में खायेंगे, और ऐसे समय में इनका सेवन करेंगे जब हमारे अंदर एकत्र शक्ति का प्राण-शक्ति को अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर इनके पचाने के लिए न दौड़ आना पड़े, तभी भोजन अपना ठीक कार्य शरीर में पहुँच कर करेगा और तभी हम पूर्ण स्वस्थ, प्रसन्न और क्रियाशील रह सकेंगे। जिस अनुपात में हम उक्त नियम से दूर जा पड़ेंगे उसी अनुपात में हमारा स्वास्थ्य डाँवाडोल होगा, हमारी सभी प्रसन्नता का स्थान अवसाद आलस्य और उदासीनता ले लेगी और हमारी क्रियाशक्ति क्षीण से क्षीणतर होती जायेगी। यही नहीं हम, उन अनेक रोगों के शिकार बड़ी सरलता से बन जायेंगे, जो इस ताक में हमारे चारों ओर दुबके रहते हैं कि कब हम अशक्त हों और कब वे हमें अपने चंगुल में दबोच लें।
ऊपर मैंने कहा- “कब हम अशक्त हों... और यह भी कि भोजन का शक्ति से सम्बन्ध है तो यही कि हम भोजन को खाते हैं और भोजन हमारी शक्ति को खाता है। यह संबंध विचित्र हो सकता है, पर सत्य यही है। और यह भी सत्य है कि रोग हमारी शक्ति को खाते हैं। शक्ति के अन्य भोक्ताओं में हमारे दैनिक कार्य भी हैं। हमारे दफ्तर, हमारे खेत, खलिहान, हमारे कल, कारखाने सभी हमारी शक्ति की माँग करते हैं-सभी को शक्ति की अत्यंत भूख है। अतः निष्कर्ष यह निकला कि यदि हमें जीवन मिला है, यदि जीवन का कोई उद्देश्य रखना है यदि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना है, यदि उस प्रयत्न की सफलता के लिए शरीर, मन और प्राणों को स्वस्थ, प्रसन्न और क्रियाशील रखना है तो हमारे अंदर शक्ति का एक ऐसा कोष संचित होना चाहिए जिसका उपयोग हम हर समय, हर परिस्थिति में हम आकस्मिक अवसर पर कर सकें। यों सामान्यतः यह कोष व्यय न किया जाय। यह हमारे बैंक-बैलेन्स के समान हो जिसका उपयोग केवल अत्यावश्यकता होने पर ही होता है परन्तु रोग आने पर उसकी जड़ मूल से काट फेंकने में, आलस्य मार्ग पर उसका अदभ्य क्रियाशीलता द्वारा परास्त करने में, न्याय और बलिदान का अवसर आने पर प्राणों की संपूर्ण चेतना को उस दिशा की ओर उन्मुख करने में हम संचित प्राणशक्ति का उपयोग कर सकें यह प्रयत्न हमें अवश्य करना ही चाहिए।
यह कोरा सिद्धाँत ही नहीं। विश्व में इस प्रकार के प्रयोग पहले भी हो चुके हैं और आज भी हो रहे हैं। वास्तव में यदि हम यह आधारभूत सिद्धाँत समझ लें कि भोजन का कार्य शरीर को किसी प्रकार की शक्ति देना न होकर केवल शरीर के क्षत-अंश की पूर्ति करना मात्र है तो शक्ति-संयम का मार्ग स्पष्ट व सरल दिखाई देने लगेगा। पार्थिव शरीर की चिन्ता में अत्यधिक व्यस्त हो जाने से हम आत्मिक शक्तियों चेतनाओं और प्रेरणाओं की ओर देख तक नहीं पाते। पर यदि देख पायें तो हमें मालूम होगा कि शरीर को आज हमने जो महत्व दे रखा है, उसी से हमारा संपूर्ण जीवन और युग भी घोर असमंजस और परेशानियों से घिर रहा है। शरीर को उसका प्राप्य देते हुए जब हम मन और मन से ऊपर उससे भी परे, आत्मा की ओर झाँकेंगे तब हमें ज्ञान होगा कि अखण्ड शक्ति, अटूट प्राण का स्त्रोत तो वही है। उसी स्त्रोत से प्राप्त प्राण मन और शरीर के स्वस्थ रखने, क्रियाशील बनाने और उन्हें उचित दिशा की ओर ले जाने का कार्य आत्मा कर रहा है। इस प्राण का, इस चेतना का, जितना गहरा अनुभव होता जायगा, आप नई और चमत्कारी शक्तियों के कोष बनते जायेंगे। प्राण-शक्ति का यही चमत्कार हम एक शिशु के जीवन में प्रतिक्षण देखते हैं। बच्चे का आहार कितना सूक्ष्म और स्वाभाविक है किन्तु उसके जीवन में कितनी निश्चिन्तता, कितना उल्लास, कितनी कौतूहलप्रियता, कितनी सहनशीलता होती है? शैशव के समस्त उल्लास, आनन्द और निश्चिन्तता को प्राप्त करके आप भी शाँत स्वस्थ और सुँदर जीवन व्यतीत कर सकते हैं यदि आप आज से, इसी क्षण से, निश्चय कर लें कि जीवन में महत्व भोजन का नहीं प्राणशक्ति का है और प्राण शक्ति का स्त्रोत भोजन नहीं, आत्म-तत्व का चिन्तन है।
यदि आपने प्राण शक्ति के संचय का महत्व भली भाँति समझ लिया तो उपवास आपके लिए कष्ट और पीड़ा न रह कर जीवन निर्माण का सबसे सस्ता, सरल और शान्तिदेय साधन बन जायगा। और अन्न-संग्रह या अन्न बचाव आँदोलन के आप सबसे अधिक प्रचारक और भक्त बन जायेंगे। उपवास से, चाहे वह वर्ष में पाँच दिन का हो या घंटे का, आप न केवल अन्न बचायेंगे, बल्कि उस प्राण शक्ति की भी रक्षा करेंगे जो आपको कहीं बाहर से नहीं लानी बल्कि जो प्रतिक्षण उपस्थित है, भले ही आपकी उसकी उपस्थित की चेतना न हो। कोई भी शारीरिक शिथिलता रोगादि होते ही उपवास भूख लगने पर ही भोजन, नाश्ते का परित्याग चबाकर भोजन करना, एक समय एक ही प्रकार का भोजन करना, मिर्च-मसाले का परित्याग संयम व्रत का अधिकाधिक पालन, हरे व कच्चे भोज्य पदार्थों की मात्रा की भोजन में अधिकता दिन में केवल एक ही पूरा भोजन, ये कुछ ऐसे नियम हैं जिनका पालन करने से प्राणशक्ति का संचय खूब ही होता जायेगा। यह संचय हो जाने पर और आपके द्वारा उस पर स्वामित्व हो जाने पर न आपको भोजन खा सकेगा, न रोग, न आलस्य, न निद्रा, न भय।
संसार में सबसे अधिक रोग अधिक भोजन करने से होते हैं। यदि मनुष्य सप्ताह में एक और केवल एक समय भोजन न करे तो सप्ताह भर की खराबी दूर हो जाती है और मनुष्य स्वस्थ हो जाता है।
उपवास की महिमा तो महात्मा गाँधी अपने जीवन भर स्वयं करके बतलाते रहे और इसी उपवास की बदौलत उन्होंने देश और जाति को समय-समय पर कैसी-कैसी आपत्तियों से बचाया, उसे यहाँ पर दुहराने की आवश्यकता नहीं है। उसी उपवास के शस्त्र को लेकर इस मिली हुई स्वतन्त्रता की जड़ को दृढ़ कर दीजिए और अपने देश के इस आर्थिक संकट को हल कीजिए जिससे आप 1951 के अंत तक भोजन के विषय में आत्मनिर्भर हो जावें। जो करोड़ों रुपया अन्न मंगवाने के लिए बाहर जाता है वह बचेगा और देश के दूसरी उन्नति के कामों में लगेगा। अन्न बरबाद न करना आदि उद्देश्यों को लेकर हम काम करेंगे तो अपने देश को अन्न और धन से भर देंगे।
स्वयं भारतवर्ष का कौन सा ऐसा मनुष्य है जो उपवास की उपयोगिता को नहीं जानता? मुसलमान 30 रोजे धर्म समझ कर रखते हैं तो उनका शरीर साल भर के लिए निरोग हो जाता है। साल भर बाद फिर रोजों का समय आ जाता है। उसी प्रकार करोड़ों हिंदू मातायें सैकड़ों प्रकार के उपवास रखती हैं और उन्हीं के कारण अनेक रोगों से बची रहती हैं। आप लोग धार्मिक उपवास चाहे जिस विचार से रखते हों। इन स्वास्थ्य सुधार के उपवासों से निम्नलिखित लाभ होंगे।
1. बहुत बड़ी आर्थिक सहायता।
2. देश के लोगों के स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन।
3. देश और जाति को अन्न का उचित उपयोग और बरबाद न करने के नियमों की सीख।
4. उपवास से बढ़कर इन्द्रियों को वश में रखने का कोई साधन नहीं है।
इस प्रकार के कम से कम स्वास्थ्य सुधारक उपवास साल में केवल 5 होंगे।
1. 30 जनवरी महात्मा गाँधी का बलिदान दिवस।
2. 26 जनवरी भारत राष्ट्र नव-विधान दिवस।
3. 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस के उपलक्ष्य में।
4. 13 अप्रैल जलिया वाला बाग की स्मृति में।
5. अप्रैल का अन्तिम शुक्रवार या इस बार पंजाब मार्शल लॉ दिवस। यथार्थ में स्वास्थ्य सुधारक उपवास साल में 52 होंगे। अर्थात् प्रत्येक सप्ताह में केवल एक समय का भोजन न करना।
भारतवर्ष की जनसंख्या 40 करोड़ थी। पाकिस्तान बन जाने के कारण अब वह 35 करोड़ रह गई है। इसमें 8 करोड़ नागरिक और 27 करोड़ ग्रामीण कुल जनसंख्या का चौथाई बच्चे हैं अर्थात् 14 करोड़ हुए। बाकी 21 करोड़ रहे। उनमें भी एक करोड़ बूढ़े आदमी और औरतें निकाल डालिए तो 20 करोड़ बाकी रहे अर्थात् 4 करोड़ शहरी और 16 करोड़ देहाती जो स्वास्थ्य सुधारक उपवास रख सकते हैं। भली प्रकार अनुमान किया जा सकता है कि यदि इतने व्यक्ति नियमित रूप से उक्त दोनों प्रकार के उपवास आरम्भ कर दें तो इतने अधिक धन व अन्न की बचत हो जायेगी कि देशव्यापी अन्न संकट सहज ही निराकरण हो जायगा। उपवास की यह योजना कार्यान्वित करना स्वास्थ्य रक्षा का एक उत्तम साधन और आज की स्थिति में उत्कृष्ट देशभक्ति का कार्य होगा।
(श्री. गणेशदत्त गौड़ “इन्द्र” आगरा)
नाक से बिना किसी चोट या आघात के खून गिरने को “नकसीर” कहते है। मस्तिष्क की किसी केशिका के फट या फूट जाने से उसके द्वारा रक्त बहने लगता है। वह रक्त नाक के जरिए बाहर टपकने या बहने लग जाता है।
कोशिका के इस प्रकार अकस्मात फट जाने का मुख्य कारण गर्मी होती है। जो व्यक्ति उष्ण प्रकृति के होते हैं उन्हें गर्मी के मौसम में प्रायः नकसीर फूटने की शिकायत होती है। कभी-कभी खून का दबाव बढ़ जाने से भी नाक से खून बह सकता है। मलेरिया ज्वर के पुराने होने पर भी कभी-कभी नकसीर बहने लगती है। साराँश यह है कि जब तक शरीर में गर्मी की वृद्धि होकर मस्तिष्क पर उसका प्रभाव नहीं होता तब तक नकसीर नहीं फूटती। जिन लोगों का खान-पान गर्म है, जो लोग गर्मी या धूप में काम-काज करते हैं उन्हें नकसीर की प्रायः शिकायत रहती है।
जिन्हें नकसीर की बीमारी हो, उन्हें कोई भी अधिक श्रम का काम नहीं करना चाहिए, धूप में नहीं घूमना चाहिए। गर्म प्रकृति के पदार्थ नहीं खाने पीने चाहिए। तेल, गुड़, मिर्च, मसाले, लहसुन, पूरी कचौरी, मिठाई वगैरह से दूर रहना चाहिए। बाजारू पेय जैसे आइस्क्रीम, मलाई का बर्फ, पानी का बर्फ, चाय वगैरह नहीं पीने चाहिए। तमाखू, गाँजा, भाँग, शराब, कोकीन, अफीम, पान, बीड़ी, सिगरेट वगैरह नहीं पीने चाहिए। पेट को भारी करने वाले भोजन से बचना चाहिए। लघुपाक और ठंडी प्रकृति का भोजन करना चाहिए। जब कभी पेट भारी जान पड़े तब 6 माशा त्रिफला का चूर्ण या छोटी पाँच सात हर्रे का चूर्ण 3 माशा काले नमक के साथ सोते वक्त रात को लेकर ऊपर से ठंडा पानी पीकर सो जाना चाहिए। सुबह दस्त साफ होकर पेट हल्का हो जावेगा। खान-पान और रहन-सहन की ओर विशेष ध्यान देने से नकसीर फूटने का भय नहीं रह जाता। इतने पर भी नकसीर फूटे तो-
1. सिर पर ठण्डे पानी की धार देना चाहिए पानी यदि काफी ठंडा न हो तो थोड़ा सा पानी का बर्फ डालकर उसे शीतल बना लेना चाहिए। पानी डालने से रक्त गाड़ा होकर बहने से रुक जावेगा। सबसे सरल और अच्छा यही उपाय है।
2. जिन लोगों को नकसीर की शिकायत रहती हो उन्हें गर्मी के दिनों में सायंप्रातः दोनों समय शीतल जल से स्नान करना चाहिए। यदि दो वक्त स्नान न बन पड़े तो सिर को दोनों समय ठंडे पानी से धोना चाहिए।
3. अनन्तमूल और सूखे आँवलों के चूर्ण को पानी में मिलाकर मस्तक पर लेप करने से नकसीर रुक जाती है।
4. गुलकन्द (बिना नशे का) नित्य एक तोला खिलाइये। नकसीर की शिकायत न सेवती का गुलकन्द विशेष लाभ पहुँचावेगा।
5. गाय के दूध की लस्सी नित्य चाहिए। दूध के बराबर पानी मिलाकर बनाने योग्य देशी शक्कर डालने से लस्सी जाती है। अथवा गोदुग्ध नित पीने से भी नकसीर मिटती है। स्मरण रहे भैंस का दूध नकसीर फूटने में सहायक होता है।
6. अंगूर, संतरे, मौसम्बी, केले आदि फल नकसीर में परम लाभदायक है। किन्तु खिरनी, खजूरे, प्रमृत गर्मी के मौसम में आने वाले फल हानिकारक है।
नकसीर रोग को साधारण नहीं मानना चाहिए। इससे मस्तिष्क में निर्बलता और स्मरणशक्ति का नाश, चित्त भ्रम, मूर्च्छा, चक्कर आना, दृष्टिमाँद्य आदि विविध रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीर भी कमजोर हो जाता है। लिये इसका उपचार अवश्य करना चाहिए। हाँ, यदि खून के दबाव से नकसीर चली हो तो उसे निकलने देना चाहिए। इसके अलावा निमित्त वैद्य डाक्टरों के यहाँ पहुँचने की जरूरत नहीं है। साधारण उपचार और तनिक सी सावधानी से इससे बचा जा सकता है।
इसके उपचार में इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गर्मी उत्पन्न करने वाले खान-पान आहार-विहार से बहुत बचा जाय तथा शीतलता देने वाले पदार्थों को विशेषतया उपयोग में लाया जाय। यही सबसे अच्छा इलाज नकसीर का है।
जो कर्म तुम्हारे लिये निश्चित है, उसे कर, कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कम करने से शरीर का स्वास्थ्य भी स्थिर नहीं रह सकता।
-गीता
(श्रीमती रत्नेशकुमारी जी नीराँजना, मैनपुरी)
महाकवि तुलसीदास ने महाभक्त हनुमान की स्तुति करते हुए एक स्थान पर लिखा है ‘सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा’ इसमें ये गौर करने की बात है कि “तपस्वी” और “राजा” ये एक दूसरे के विरोधी से प्रतीत होने वाले विशेषण क्यों राम की प्रशंसा को रखे गये हैं?
“राजा” शब्द का उच्चारण करते ही कल्पना क्षितिज पर एक ऐसी मूर्ति उदित होती है जो कि जीवन के प्रभाव में ऐश्वर्य वैभव के बीच ही उत्पन्न होती है उसमें पलती है और सुख की खोज तथा चिर अतृप्त लालसाओं की पूर्ति में ही संलग्न रह कर उत्तरदायित्वहीन जीवन व्यतीत करके एक दिन न जाने किस अन्धकार में विलीन हो जाती है। पर ये तो हमारी कल्पना पर वातावरण का कुप्रभाव तथा बुरे वातावरण में ही पले हुए कुछ पथ भ्रान्त व्यक्तियों के चित्र मात्र है। “राजा” शब्द की ये परिभाषा तो है नहीं यह तो उपरोक्त चित्र से बहुत ऊँची है। “प्रजा अनेती राजा” अर्थात् जो प्रजा को आनन्द दे वही राजा। प्राचीन राजाओं के चरित्र चित्रों को यदि हम स्मरण करें तो हमें ये स्वाभाविक सा प्रतीत होगा। हम स्वयं ही मुक्त कण्ठ से स्वीकार करेंगे कि यथार्थ राजा के साथ तपस्वी शब्द सहज रूप से ही जुड़ जाता है।
क्या संपूर्ण राज्य-निवासियों को सुखी रखने का व्रत ग्रहण करना सरल है? सद् उद्देश्य हेतु कष्ट सहन करना ही तो तप है देखिए राजा रन्तिदेव को दुर्भिक्ष के दिनों में अनेक दिनों बाद अन्न प्राप्त हुआ नन्हें बच्चों तक के भूख के मारे प्राण निकले जा रहे थे। पर उसी समय कुछ क्षुधा-पीड़ित प्रजाजन आ गये। भला वह कैसा मनुष्य होगा जो दूसरों को भूख से दम तोड़ते देखकर भी स्वयं पेट भरने बैठ जाये। ऐसा व्यक्ति तो मनुष्य-भक्षी राक्षसों के ही समान होगा। राजा रन्तिदेव ने सारा अन्न बाँट दिया, कथा तो यहाँ तक है कि पात्र का धोवन तक भी न पास के वह भी उन्होंने एक क्षुधार्त व्यक्ति को दे दिया। भला कौन मननशील व्यक्ति ऐसा होगा जो उनको तपस्वी नहीं स्वीकार करे।
अब हम “तपस्वी राजा” जिनकी प्रशंसा में व्यवहृत हुआ है उन राम का भी जरा रस कसौटी पर कस देखें। कहावत है “होनहार बिरबान के होत चीकने पात” पहिले युवराज राम का ही एक चित्र लीजिए राज्याभिषेक होते-होते चौदह वर्ष का वनवास मिलता है पर वे पूर्ववत ही प्रसन्न हैं। सारी अयोध्या शोक से अभिभूत तथा आश्चर्य-चकित एवं किंकर्तव्यविमूढ़ तथा अधीर है पर इस क्षुब्ध वातावरण में भी वे हिमालय की भाँति अडिग हैं। क्या ये तप साधारण हैं? महाकवि तुलसी के शब्दों में ही जरा तपस्वी युवराज के पुण्य चित्र को क्षण भर के लिए अपने हृदय पटल पर खींच कर पवित्र कर लीजिए-
“प्रसन्नकताँ या न गताभिषेकस्तथा न मस्ले वनवास दुःत्रतः। मुखाम्बुजं श्री रघुनन्दम्य से सदाऽस्तु मंजुल मंगल प्रद।”
जब राम राजा हुए तो उनके सम्मुख और भी कठिन परीक्षा आई जिस जीवन संगिनी ने वनवास में भी साथ नहीं छोड़ा जिसने चलते समय साफ-साफ कह दिया था--
“राखिय अवधि जो अवधि लनि रहत जानिये प्रान,
प्राणनाथ करुणायतन शील सनेह निधान।”
ये कोरी धमकी ही नहीं थी जैसी कि बहुत सी स्त्रियाँ बात-बात में दिया करती हैं ये तो एक आकुल हृदय के अंतरतम् के उद्गार थे जिनकी कि सत्यता पर राम को पूर्ण विश्वास था। जिसके लिए राम के हृदय में इतना अभिन्नता का भाव था कि प्रेम संदेश में वे कहलाते हैं-
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
आनत प्रिया एक मन मोरा॥
सो मन रहत सदा तोहि पाही।
जानु प्रीति रस इतनेहि माहीं॥
उसी सीता का प्रजा की प्रसन्नता हेतु परित्याग करना अपने हृदय को ही निकाल फेंकने के समान है। फिर भी राजा राम इस मर्म पीड़ा को दबाये हुए प्रजा के सुखी करने के व्रत का तन-मन-धन से पालन करते रहे। आज भी हम जब एक आदर्श शासन की कल्पना करते हैं तो हमें ‘राम राज्य’ की उपमा देने को विवश होना पड़ता है, ऐसी थी उस सर्वस त्यागी की आदर्श की उपासना। क्या ये तप नहीं है?
उनके मन का वह ज्वालामुखी कदाचित मन में ही दबा चला जाता संसार को उसका आभास तक नहीं मिलता पर जब कुलगुरु ने कहा कि अश्वमेध यज्ञ की पूर्ति सहधर्मिणी के बिना नहीं हो सकती। तब राम का धैर्य जो बड़ी-बड़ी विपत्तियों में भी अडिग रहा था वह भी साथ न दे सका। उन्होंने कहा-भगवन् ! भले ही अश्वमेध यज्ञ अपूर्ण रह जाये आमन्त्रित-जन निन्दा करते हुए फिर आर्य और मुझको अनन्त काल तक नर्क में निवास करना पड़े फिर अब इस जीवन में मेरा दूसरा विवाह नहीं हो सकता है। देव ! मैंने कभी भी आपकी आज्ञा नहीं टाली है पर आप ये आदेश न करें नहीं तो मुझे टालने के लिए विवश होना पड़ेगा।
देखिये इन शब्दों से सीता के प्रति राम का कितना गहन अनुराग झलक रहा है। पर सीता जब राज सभा में आती है तो राजा प्रजा के संतोष के लिए आज्ञा देते हैं कि अपने निष्कलंक पतिव्रत का प्रमाण देवे। राम ‘तपस्वी राजा’ न होते तो इन दोनों वृतों को (प्रजा-रञ्जन और एक पत्नी वृत) कदापि भी इतनी दृढ़ता से नहीं निभा पाते।
अब उन्हीं तपस्वी राजा राम के चरणों सभक्ति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस लेख को समाप्त करती हूँ। हम सब को चाहिए कि हम व्यक्तिगत जीवन में राम के आदर्शों को अपनाएं। साँसारिक उत्तरदायित्वों को वहन करते हुए तपस्वी रहें। साथ ही हमारी सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था भी इन्हीं आदर्शों से ओत-प्रोत होनी चाहिए। महात्मा गाँधी राम-राम की स्थापना के लिए जीवन भर साधना करते रहे, जनता ने रामराज्य के लिए अभित बलिदान करके स्वराज प्राप्त किया। हमारे शासकों में उचित है कि वे राम का आदर्श अपनावें रामराज्य के आदर्श उपस्थित करें।
(श्री मनोहरदास अग्रावत उम्मेदपुरा)
प्रत्येक मनुष्य को विचार करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ’ और मेरा क्या-कर्तव्य है? मैं नाम, रूप-देह, इन्द्रिय, मन या बुद्धि हूँ या इनसे कोई भिन्न वस्तु हूँ विचार पूर्वक निर्णय करने से यही बात ठहरती है कि मैं नाम नहीं हूँ मुझे आज मनोहर कहते हैं परन्तु जब प्रसव हुआ या उस समय इसका नाम मनोहर नहीं था यद्यपि मैं उपस्थित था। घरवालों ने कुछ दिनों के पश्चात नामकरण किया। उन्होंने उस समय मनोहर नाम न रखकर मोहन रखा होता तो आज मोहन कहलाता और अपने को मोहन ही समझता। मैं न पूर्वजन्म में मनोहर था, था और न शरीर नाश के बाद मनोहर रहूँगा। यह तो केवल घर वालों का निर्देश किया साँकेतिक नाम है। यह नाम एक ऐसा कल्पित है कि जो चाहे जब बदला जा सकता है, और उसी में उसका अभिमान हो जाता है। जो विवेकवान् पुरुष इस रहस्य को समझ लेता है कि मैं नाम नहीं हूँ वह नाम की निन्दा-स्तुति से कदापि सुखी-दुखी नहीं होता। जब मनुष्य ‘नाम’ की निन्दातुति में सम नहीं है, निन्दा-स्तुति में सुखी-दुखी होता है तब वह नाम न होने पर भी ‘नाम’ बना। बैठा है जो सर्वथा भ्रमपूर्ण है। जो इस रहस्य को जान लेता है उसमें इस भ्रम की गन्ध मात्र भी नहीं रहती। इसीलिए भगवान कृष्ण ने गीता में तत्व-वेत्ता पुरुषों के लक्षणों को बतलाते हुए उन्हें निन्दा और स्तुति में सम बतलाया है--
‘तुल्य निन्दा स्तुतिः....................’ (गीता 12।19)
‘तुल्य निन्दात्मसंस्तुति.................’ (गीता 14।28)
फिर यह प्रसिद्ध भी है कि मनोहर मेरा नाम है ‘मैं’ मनोहर नहीं हूँ। इससे यह सिद्ध हुआ नाम ‘मैं’ नहीं हूँ।
इसी प्रकार रूप-देह भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि देह जड़ है और मैं चेतन हूँ, देह क्षय, वृद्धि, उत्पत्ति और विनाश धर्म वाला है, मैं इनसे सर्वथा रहित हूँ। बालकपन में देह का और ही स्वरूप या और अब युवापन में दूसरा ही है तथा कुछ समय बाद वृद्धावस्था में कुछ और ही हो जायगा। किन्तु मैं तीनों अवस्थाओं को जानने वाला तीनों में एक ही हूँ। किसी पुरुष ने मुझको बाल्यावस्था में देखा था, अब वह मुझसे मिलता है तो मुझे पहचान नहीं सकता। देह का रूप बदल गया। शरीर बढ़ गया। दाढ़ी मूंछें आ गईं। इससे वह नहीं पहचानता! किन्तु मैं पहचानता हूँ मैं उससे कहता हूँ आपका शरीर युवावस्था से वृद्ध होने के कारण उसमें कम अंतर पड़ा है, इससे मैं आपको पहचानता हूँ। मैंने आपको अमुक जगह देखा था। उस समय मैं बालक था अब मेरे शरीर में बहुत परिवर्तन हो गया, अतः आप मुझे नहीं पहचान सकें। इससे यह सिद्ध होता है कि शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ। ‘शरीर-मैं, ऐसा अभिमान भी पूर्वोक्त नाम के समान ही सर्वथा भ्रमपूर्ण है। जो पुरुष इस रहस्य को जानते हैं वे शरीर के मानापमान और सुख-दुःख में सर्वथा सम रहते हैं। क्योंकि वे इस बात को समझ जाते हैं कि मैं शरीर से सर्वथा पृथक हूँ।
“समः शत्रोचमित्रेच तथा मानापमानयोः।”
(गीता 1298)
“मानापमानयो स्तुल्यः” (गीता 1425)
“सम दुःख सुन्त्रः” (गीता 1428)
अतएव विचार करने से यह प्रत्यक्ष सिद्ध होता है कि यह जड़ शरीर मैं नहीं हूँ, मैं इस शरीर का ज्ञाता हूँ और प्रसिद्ध भी यही है कि शरीर ‘मेरा’ है।
मनुष्य भ्रम से ही शरीर में आत्मोभिमान करके मानापमान और सुख-दुख से सुखी-दुखी होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मैं शरीर नहीं हूँ। इसी तरह इन्द्रियाँ भी मैं नहीं हूँ। हाथ पैरों के कट जाने, आँखें नष्ट हो जाने और कानों के बहरे हो जाने पर भी मैं ज्यों का त्यों पूर्ववत रहता हूँ, मरता नहीं। यदि में इन्द्रिय होता तो उसके विनाश में मेरा विनाश होना सम्भव था। अतएव थोड़ा सा भी विचार करने पर यह प्रत्यक्ष प्रतीत है कि मैं जड़ इन्द्रिय नहीं हूँ। वरन् इन्द्रियों का दृष्टा या कर्ता हूँ।
इसी प्रकार मैं मन भी नहीं हूँ। सुपुति काल में मन नहीं रहता, परन्तु में रहता हूँ इसीलिए जागने के बाद मुझको इस बात का ज्ञान है कि मैं सुख से सोया था। मैं मन का ज्ञाता हूँ। दूसरों की दृष्टि में भी मन के अनुपस्थिति काल में (सुपुप्तिया मूर्छित अवस्था में) मेरी जीवित सत्ता प्रसिद्ध है। मन विकारी है इसमें भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्प होते रहते हैं। मन में होने वाले इन सभी संकल्प-विकल्पों का मैं ज्ञाता हूँ। खान-पान, स्नान आदि करते समय यदि मन दूसरी ओर चला जाता है तो उन कामों में कुछ भूल हो जाती है फिर सचेत होने पर मैं कहता हूँ मेरा मन दूसरी जगह चला गया था, इस कारण मुझसे भूल हो गई। क्योंकि मन के बिना केवल शरीर और इन्द्रियों से सावधानीपूर्वक काम नहीं हो सकता। अतएव मन चंचल और चल है, परन्तु मैं स्थिर और अचल हूँ। मन कहीं भी रहे, कुछ भी संकल्प-विकल्प करता रहे, मैं उसको जानता रहता हूँ, अतएव मैं मन का ज्ञाता हूँ, मन नहीं हूँ।
इसी तरह मैं बुद्धि भी नहीं हूँ क्योंकि बुद्धि भी क्षय और वृद्धि स्वभाव वाली है मैं क्षय वृद्धि से सर्वथा रहित हूँ। बुद्धि में मन्दता, तीव्रता, पवित्रता, मलिनता, विकार, व्यभिचारादि होते हैं परन्तु मैं उसकी इन सब स्थितियों को जानने वाला हूँ। मैं कहता हूँ उस समय मेरी बुद्धि ठीक नहीं थी अब ठीक है। बुद्धि कब क्या विचार रही है और क्या निर्णय कर रही है, इसको मैं जानता हूँ। बुद्धि दृश्य है मैं उसका दृष्टा हूँ। अतएव ‘बुद्धि का मुझसे पृथकन्ध सिद्ध है मैं बुद्धि नहीं हूँ।
इस प्रकार मैं नाम, रूप, देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्रभृति नहीं हूँ। मैं इन सबसे सर्वथा अतीत, इनसे सर्वथा पृथक, चेतन, साक्षी, सबका ज्ञाता, सत् नित्य, अविनाशी, अधिकारी, अक्रिय सनातन, अचल और समस्त दुःखों से रहित केवल शुद्ध आनन्दमय आत्मा हूँ। यही मैं हूँ। यही मेरा सच्चा स्वरूप है। क्लेश, कर्म और सम्पूर्ण पापों से विमुक्त होकर परमशान्ति और परमानन्द की प्राप्ति के लिए ही मनुष्य शरीर की प्राप्ति हुई है। इस परम शान्ति और परमानन्द को प्राप्त करना ही मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य है। मनुष्य शरीर के बिना अन्य किसी भी देह में इसकी प्राप्ति संभव नहीं है। इस स्थिति की प्राप्ति तत्वज्ञान से होती है, और वह तत्वज्ञान विवेक, वैराग्य, विचार, सदाचार और सद्गुण आदि के सेवन से होता है। और इन सबका होना इस घोर कलिकाल में ईश्वर की दया के बिना सम्भव नहीं। यद्यपि ईश्वर की दया संपूर्ण जीवों पर पूर्णरूप से सदा-सर्वदा है किन्तु बिना उनकी शरण हुए उस दया के रहस्य को मनुष्य समझ नहीं सकता। एवं दया के तत्व को समझे बिना उस दया के द्वारा होने वाले लाभ को वह नहीं कर सकता।
अतएव तत्वज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रकार से ईश्वर के शरण होकर उनकी दया रहस्य को समझ कर उससे पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। ईश्वर की शरण से ही हमें परम शाँति मिल सकती है। भगवान कृष्ण कहते हैं--
तमेवशरणं गच्छ सर्व भावेन भारत।
तत्प्रसादात्पराँ शान्ति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतः॥
(गीता 18/62)
“हे भारत! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो, उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।”
जब यह मनुष्य परमेश्वर के शरण होगा। परमेश्वर के तत्व को जान जाता है, तब उस परमेश्वर की कृपा से अज्ञान नाश होकर वह परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है। जैसे निद्रा नाश से मनुष्य जागृति को, दर्पण के नाश से प्रतिबिम्ब को, तथा घट के फूटने से घटाकाश महाकाश को प्राप्त हो जाता है, इसी प्रकार अज्ञान के नाश से यह जीवात्मा, विज्ञानान्दघन परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। जब यह साधन, नाम, रूप, देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि से अपने को सर्वथा पृथक समझ लेता है, तब यह ईश्वर के शरण होकर ईश्वर की कृपा से, देहादि संबंध से होने वाले समस्त क्लेशों और पापों से सदा के लिए सर्वथा मुक्त हो जाता है, एवं विज्ञानानन्द घन परमात्मा का सनातन अंश होने के कारण सदा के लिए उस विज्ञानानन्द घन प्रभु को प्राप्त हो जाता है। प्रभु को प्राप्त करने के लिए अनन्य भाव से इस प्रकार यत्न करना और प्रभु को प्राप्त हो जाना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।
(श्री मातादीनजी अग्रवाल, राजनाँद गाँव)
अनेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य वैसे मधुर संबंध नहीं देखें जाते जैसे कि होने चाहिएं। अनेकों घरों में आये दिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं। कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं। दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है।
जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है। उत्तर-प्रत्युत्तर, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन् दूसरे को अधिक दोषी, प्रधान दोषी, प्रथम दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को बढ़ाते रहते हैं। इस रीति से कभी भी झगड़े का अन्त नहीं हो सकता। अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है।
जो पति-पत्नि अपने संबंधों को मधु रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की, योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति में मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें तो झगड़े के अनेकों अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जावेंगे। हमें भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती। भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है। यह भिन्नता पूर्णतया मिट कर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावें यह हो नहीं सकता। कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जायेगी।
अनुदार स्वभाव के स्त्री-पुरुष कट्टर, एवं संकीर्ण मनोवृत्ति के होने के कारण यह चाहते हैं कि हमारा साथी हमारी किसी भी बात में तनिक भी मतभेद न रखे। पति अपनी स्त्री को पतिव्रत पाठ पढ़ाता है और उपदेश करता है कि तुम्हें पूर्ण पवित्रता, इतनी उग्र पतिव्रता होना चाहिए कि पति की किसी भी भली-बुरी विचारधारा, आदत, कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न हो। इसके विपरीत स्त्री अपने पति से आशा करती है कि पति के लिए भी यह उचित है कि स्त्री को अपना जीवनसंगी, आधा अंग समझ कर उसके सहयोग एवं अधिकार की उपेक्षा न करे। यह भावनाएं जब संकीर्णता और अनुदारता से संमिश्रित होती हैं तो एक पक्ष सोचता है कि मेरे अधिकार का दूसरा पक्ष पूर्ण नहीं करता। बस यहीं से झगड़े की जड़ आरम्भ हो जाती है।
इस झगड़े का एकमात्र हल यह है कि स्त्री पुरुष को, और पुरुष स्त्री को, अपने मन का अधिकाधिक उदार भावना से बरते। जैसे किसी व्यक्ति का एक हाथ या एक पैर कुछ कमजोर, रोगी, या दोषपूर्ण हो तो वह उसे न तो काट कर फेंक देता है न कूट डालता है और न उससे घृणा, असंतोष, विद्वेष आदि करता है अपितु उस विकृत अंग को अपेक्षाकृत अधिक सुविधा देने और उसके सुधारने के लिए, स्वस्थ भाग की भी थोड़ी उपेक्षा कर देता है। यह नीति अपने कमजोर साथी के बारे में बरती जाय तो झगड़े का एक भारी कारण दूर हो जाता है।
झगड़ा करने से पहले आपसी विचार विनिमय के सब प्रयोगों को अनेक बार कर लेना चाहिए। कोई वज्रमूर्ख और घोर दुष्ट प्रकृति के मनुष्य तो ऐसे हो सकते हैं जो दंड के अतिरिक्त और किसी वस्तु से नहीं समझते। पर अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो प्रेम भावना के साथ, एकान्त स्थान में सब ऊँच नीच समझने से बहुत कुछ समझ और सुधर जाते हैं। जो थोड़ा बहुत मतभेद रह जाय उसकी उपेक्षा करके उन बातों को ही विचार क्षेत्र में आगे देना चाहिए जिनमें मतैक्य है। संसार में रहने का यही तरीका है कि एक दूसरे के सामने थोड़ा-थोड़ा झुका जाय और समझौते की नीति से काम लिया जाय। महात्मा गाँधी, उच्चकोटि के आदर्शवादी संत थे, पर उनके ऐसे भी अनेकों सच्चे मित्र थे जो उनके विचार और कार्यों से मतभेद ही नहीं विरोध भी रखते थे। यह मतभेद उनकी मित्रता में बाधक न होते थे। ऐसी ही उदार समझौतावादी नीति के आधार पर आपसी सहयोग संबंधों को कायम रखा जा सकता है।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि साथी में दोष, दुर्गुण, हो उनकी उपेक्षा की जाय और उन बुराइयों को अबाध रीति से बढ़ने दिया जाय। ऐसा करना तो एक भारी अनर्थ होगा। जो पक्ष अधिक बुद्धिमान, विचारशील एवं अनुभवी है उसे अपने साथी को सुसंस्कृत, उमुन्नत, सद्गुणी बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही अपने आपको भी ऐसा मधुरभाषी, उदार, सहनशील एवं निर्दोष बनाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए कि साथी पर अपना समुचित प्रभाव पड़ सके। जो स्वयं अनेक बुराइयों में फंसा हुआ है वह अपने साथी को सुधारने में सफल कैसे हो सकता है? सती सीता परम साध्वी उच्चकोटि की पतिव्रता थीं, पर उनके पतिव्रता होने का एक कारण यह भी था कि वे एक पत्नी व्रतधारी अनेक सद्गुणों से सम्पन्न राम की धर्मपत्नी थीं। रावण स्वयं दुराचारी एवं उसकी पत्नी मंदोदरी सर्वगुण सम्पन्न एवं बुद्धिमान होते हुए भी पतिव्रता न रह सकी। रावण के मरते ही उसने विभीषण से पुनर्विवाह कर लिया।
जीवन की सफलता, शाँति, सुव्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि हमारा दाम्पत्य जीवन और संतुष्ट हो। इसके लिए आरंभ में ही सावधानी बरती जानी चाहिए और गुण स्वभाव की समानता के आधार पर लड़के-लड़कियों के जोड़े चुने चाहिए। अच्छा चुनाव होने पर भी पूर्ण समता तो हो नहीं सकती, इसे हर एक स्त्री-पुरुष के लिए इस नीति को अपनाना आवश्यक है कि अपनी बुराइयों को कम कर साथी के साथ मधुरता उदारता और सहनशीलता का आत्मीयतामय व्यवहार करें। साथ ही उसकी बुराइयों को कम करने के लिए धैर्य, दृढ़ता और चतुरता के साथ प्रयत्नशील रहे। इस मार्ग पर चलने से असंतुष्ट दाम्पत्य जीवनों में संतोष की मात्रा बढ़ेगी और संतुष्ट संपत्ति स्वर्गीय जीवन का आनन्द उपलब्ध करेंगे।
मनुष्य समाज की सब में मूल्यवान सम्पत्ति सौम्यता है। सौम्यता का आधार ज्ञान है। ज्ञान को उज्ज्वल रखने का मुख्य साधन है- आचरण। इसलिए श्रुति कहती है उसकी चर्चा, उसका विस्तार स्वाध्याय करो, प्रवचन करो। तप, दम, शभ, अग्निहोत्र, अतिथि सेवा, सन्तानोन्नति करो।
*****
तैत्तिरीयोपनिषद्
जिस के पास श्रद्धा है, जिसने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया है उसे ही ज्ञान मिलता है। ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही शान्ति पा लेता है।
-गीता
सृष्टि के आदि में ब्रह्म ने इच्छा की कि ‘एकोऽहं बहुस्याँम’ मैं एक से बहुत हो जाऊँ। यह इच्छा की शक्ति के रूप में परिणत हो गई। ब्रह्म और माया दो हो गये। यह माया या शक्ति दो विभागों में बंटी। एक संकल्पमयी गायत्री, दूसरी परमाणुमयी सावित्री। संकल्पमयी गायत्री का उपयोग आत्मिक शक्तियों को बढ़ाने एवं दैवी सान्निध्य प्राप्ति करने में होता है। आत्मिक गुणों और विशेषताओं के बढ़ने के कारण साधन को साँसारिक कठिनाइयाँ पार करना, स्वल्प साधन में भी सुखी रहना एवं सुखकर स्थिति को उपलब्ध करना सहज होता है। अब तक इसी विधि-विधान की चर्चा अखण्ड ज्योति के पिछले अंकों में की गई है। यह योग-विज्ञान है, इसे दक्षिण मार्ग भी कहते हैं। यह सत् प्रधान होने से हानिरहित एवं व्यक्ति तथा समाज के लिए सब प्रकार हितकर है।
शक्ति की दूसरी श्रेणी, परमाणुमयी सावित्री है। इसे स्थूल प्रकृति, पंचभूत, भौतिक सृष्टि आदि नामों से भी पुकारते हैं। इस प्रकृति के परमाणुओं के आकर्षण, विकर्षण से संसार में नाना प्रकार के पदार्थों की उत्पत्ति, वृद्धि और समाप्ति होती रहती है। इन परमाणुओं की स्वाभाविक साधारण क्रिया में हेर-फेर करके अपने लिए अधिक उपयोगी बना लेने की क्रिया का नाम विज्ञान है। यह विज्ञान दो भागों में विभक्त है। एक वह जो यंत्रों द्वारा प्रकृति के परमाणुओं को अपने लिए उपयोगी बनाता है। रेल, तार, टेलीफोन, रेडियो, हवाई जहाज, टेलीविजन, विद्युत शक्ति आदि अनेकों वैज्ञानिक यंत्र आविष्कृत हुए हैं और होने वाले हैं। यह सब विज्ञान है। दूसरा है - तंत्र विज्ञान। जिसमें यंत्रों के स्थान पर मानव अन्तराल में रहने वाली विद्युत शक्ति को कुछ ऐसी विशेषता सम्पन्न बनाया जाता है। जिससे प्रकृति के सूक्ष्म परमाणु उसी स्थिति में परिणत हो जाते हैं जिसमें कि मनुष्य चाहता है। पदार्थों की रचना परिवर्तन और विनाश का बड़ा भारी काम बिना किन्हीं यंत्रों की सहायता के तंत्र विद्या द्वारा हो सकता है। विज्ञान के इस तन्त्र माँग को सावित्री विद्या, तन्त्र साधना, वाममार्ग आदि नामों से पुकारते हैं।
यन्त्र विज्ञान एक स्वतंत्र विद्या है। इस पुस्तक में उसके आधार और कार्य की चर्चा नहीं की जा सकती। इन पंक्तियों में तो हमें केवल विज्ञान के तंत्र भाग का पाठकों को थोड़ा सा परिचय कराना है। प्राचीन काल में भारत के विज्ञानाचार्य अनेक प्रयोजनों के लिए इसी मार्ग का अवलम्बन करते थे। प्राचीन इतिहास में ऐसी अनेक साक्षियाँ मिलती हैं जिन से प्रकट होता है कि उस समय बिना यन्त्रों के भी ऐसे अद्भुत कार्य होते थे जैसे आज यन्त्रों से भी संभव नहीं हो पाये हैं। युद्धों में आज अनेक प्रकार के बहुमूल्य वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्र प्रयोग होते हैं पर प्राचीनकाल जैसे वरुणास्त्र, जो जल की भारी वर्षा कर दे, आग्नेयास्त्र, जो भयंकर अग्नि ज्वालाओं का दग्वानल प्रकट कर दे, सम्मोहनास्त्र- जो लोगों को संज्ञाशून्य बना दे, नागपाश, जो लकवे की तरह जकड़ दे, आज कहाँ है? इसी प्रकार बिना इंजिन, भाप, पेट्रोल आदि के आकाश में भूमि पर और जल में चलने वाले रथ आज कहाँ हैं? मारीच की तरह मनुष्य से पशु बन जाना, सुरसा की तरह बहुत बड़ा शरीर बड़ा लेना, हनुमान की तरह मच्छर के समान अतिलघु रूप धारण करना, समुद्र लाँघना, पर्वत उठाना, नल-नील की भाँति पानी पर तैरने वाला पत्थरों का पुल बनाना, रावण अहिरावण की भाँति बिना रेडियो के अमेरिका और लंका के बीच वार्तालाप होना, अदृश्य हो जाना आदि अनेकों एक अद्भुत कार्य थे जो आज यन्त्रों से भी नहीं हो पाते पर एक समय बिना किसी यन्त्र की सहायता के केवल आत्मशक्ति का ताँत्रिक उपयोग होने से सुगमतापूर्वक हो जाते थे। इस क्षेत्र में भारत भारी उन्नति कर चुका था उसके संसार पर चक्रवर्ती शासन करने एवं जगद्गुरु कहलाने का एक यह भी कारण था।
नागार्जुन, गोरखनाथ, मछीन्द्रनाथ आदि सिद्ध पुरुषों के पश्चात भारत से इस विद्या का लोप होता गया और आज तो इस क्षेत्र में अधिकार रखने वाले व्यक्ति कठिनाई से ढूंढ़े मिलेंगे। इस तन्त्र महाविज्ञान की कुछ लंगड़ी-लूली, टूटी-फूटी शाखाएँ-प्रशाखाएँ जहाँ तक मिलती हैं, उनके चमत्कार दिखाने वाले जहाँ-तहाँ मिल जाते हैं। उनमें से एक शाखा है- ‘दूसरों के शरीर और मन पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालना’ है। जो इसे कर सकते हैं वे यदि अभिचार करें तो स्वस्थ आदमी को रोगी बना सकते हैं, किसी भयंकर प्राणघातक पीड़ा-वेदना या बीमारी में अटका सकते हैं, उस पर प्राणघातक सूक्ष्म प्रहार कर सकते हैं, किसी भी बुद्धि को फेर सकते हैं, उसे पागल, उन्मुक्त, विक्षिप्त, मंदबुद्धि या उलटा सोचने वाला कर सकते हैं। भ्रम, भय, संदेह आशंका और बेचैनी के गहरे दलदल में फंसा कर उसके मानसिक धरातल को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं। इसी प्रकार किसी अप्रत्यक्ष चेतना शक्ति द्वारा किसी व्यक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ा हो तो उसे वे दूर भी कर सकते हैं। नजर लगना, उन्माद, भूतोन्भाव, ग्रहों का अनिष्ट, बुरे दिन किसी के द्वारा प्रेरित अभिचार, मानसिक उद्वेग आदि को शान्त किया जा सकता है। शारीरिक रोगों के निवारण, सर्प बिच्छू आदि का दंशन, एवं विषैले कीड़ों का समाधान भी तन्त्र द्वारा होता है। छोटे बालकों पर इस विद्या का बड़ी आसानी से भला या बुरा भारी प्रभाव डाला जा सकता है। तंत्र साधना द्वारा सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाली अनेक चेतना ग्रन्थियों में से किसी विशेष प्रकार की ग्रन्थि को अपने लिए जागृत, चैतन्य, क्रियाशील एवं अनुचरी बनाया जा सकता है। देखा गया है कि कई ताँत्रिकों को मसान, पिशाच, भैरव, छाया पुरुष, सेबड़ा, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कर्ण पिशाचिनी, त्रिपुर, सुन्दी, कालरात्रि, दुर्गा आदि की सिद्धि होती है। जैसे कोई सेवक प्रत्यक्ष शरीर से किसी के यहाँ नौकर रहता है और मालिक की आज्ञानुसार काम करता है वैसे ही यह शक्तियाँ अप्रत्यक्ष शरीर से उस तंत्र-सिद्ध पुरुष के वश में होकर सदा उसके समीप उपस्थित रहती है और जो आज्ञा दी जाती है उसको वे अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा करती हैं। इस रीति से कई बार ऐसे-ऐसे अद्भुत काम किये जाते हैं कि उनके कारण आश्चर्य से दंग होना पड़ता है।
होता यह है कि अदृश्य लोक में कुछ ‘चेतना ग्रन्थियाँ’ सदा विचरण करती रहती हैं। ताँत्रिक साधना विधानों के द्वारा अपने योग्य ग्रन्थियों को पकड़कर उनमें प्राण डाला जाता है। जब वह प्राणधान हो जाती हैं तब उसका सीधा आक्रमण साधक पर होता है, यदि साधक अपनी आत्मिक बलिष्ठता द्वारा उस आक्रमण को सह गया, उससे परास्त न हुआ तो प्रतिद्दत होकर वह ग्रन्थि उसके वशवर्ती हो जाती है और चौबीस घंटे के साथी आज्ञाकारी सेवक की तरह काम करती है। ऐसी साधनाएं बड़ी खतरे से भरी हुई होती हैं। निर्जन, श्मशान आदि भयंकर प्रदेशों में ऐसी रोमाँचकारी विधि-व्यवस्था का प्रयोग करना पड़ता है जिससे साधारण मनुष्य का कलेजा दहल जाता है। उस समय में ऐसे-ऐसे घोर अनुभव होते हैं जिनमें डर जाने पर बीमार पड़ जाने, पागल हो जाने या मृत्यु के मुख में चले जाने की आशंका रहती है। ऐसी साधनाएं हर कोई नहीं कर सकता। कोई कर ले तो सिद्धि मिलने पर उन अदृश्य शक्तियों को साथ रखने की जो कष्टसाध्य शर्तें होती हैं उनका पालन नहीं कर सकता। यही कारण है कि इस मार्ग में चलने का कोई विरले ही साहस करते हैं, जो साहस करते हैं उनमें से कोई विरले ही सफल होते हैं, जो सफल होते हैं उनमें से कोई विरले ही अन्तकाल तक उनसे समुचित लाभ उठा पाते हैं।
यहाँ तन्त्र साधना की किन्हीं विधियों को बताने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि उन गुप्त रहस्यों को जनसाधारण के लिए अनधिकारियों के लिए प्रकाशित कर देने का अर्थ है- बालकों ने क्रीड़ा-स्थल में बारूद बिखेर देना, जिसमें वे बेचारे क्रीड़ा कौतुक करने के उपलक्ष में सर्वनाश का उपहार प्राप्त करें। यह परम्परा तो अधिकार और अधिकारी के आधार पर एक-दूसरे को सिखाने की रही है। हमें स्वयं इस मार्ग पर प्राण घातक खतरों में होकर गुजरने का कड़वा अनुभव है, फिर भोले-भाले पाठकों को कोई खतरा उपस्थित कर देने के लिए उस शिक्षण-विधि को लिख मारने की भूल हम कैसे कर सकते हैं? इन पंक्तियों में तो हमारा इरादा केवल यह बताने का है कि प्रकृति की परमाणुमयी सावित्री शक्ति पर भी आत्मिक विद्युत शक्ति द्वारा भूतकाल में अधिकार प्राप्त किया जा चुका है और आगे भी प्राप्त किया जा सकता है।
यह ठीक है कि आज ऐसे व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ते जो प्रत्यक्ष रूप से यह प्रमाण दे सकें कि किस प्रकार अमुक यन्त्र का काम, अन्दर की बिजली से हो सकता है। यह विद्या जगत दो हजार वर्षों से धीरे-धीरे लुप्त होती चली आई है और अब तो ऐसे उस विद्या के ज्ञाता, ढूंढ़े नहीं मिलते, वैसे तो वैज्ञानिक यन्त्रों के अनेक आविष्कारों के कारण उनकी उतनी आवश्यकता आज नहीं रही है फिर भी उस महाविद्या का प्रकाश तो जारी रहना ही चाहिए। वह आज के ताँत्रिकों का कर्तव्य है कि इस लुप्त प्रायः सावित्री विद्या को अथक परिश्रम द्वारा पुनर्जीवित करके भारतीय विज्ञान की महत्ता संसार के सामने प्रतिष्ठित करें। आज के ताँत्रिक जितना कर लेते हैं यद्यपि वह भी कम महत्वपूर्ण और कम आश्चर्यजनक नहीं है। फिर भी इस मार्ग के पथिकों को तब तक चैन नहीं लेना चाहिए जब तक कि परमाणु प्रकृति पर आत्म शक्ति द्वारा अधिकार करने के विज्ञान में पूर्वकाल जैसी सफलता प्राप्त न हो जाए।
वर्तमान काल में तन्त्र का जितना अंश प्रचलित, ज्ञात एवं क्रियान्वित है उसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। मनुष्यों पर अदृश्य प्रकार से भला या बुरा प्रभाव डालना आज के तंत्र विज्ञान की मर्यादा है। वस्तुओं का रूपांतर, परिवर्तन, प्रकटीकरण, लोप एवं विशेष जाति के परिमाणुओं का एकीकरण करके उनके शक्तिशाली प्रयोग की माँग आज लुप्तप्राय है। चैतन्य ग्रन्थियों का जागरण और उनकी वशीवर्ती बनाकर आज्ञा पालन कराने में विक्रमादित्य के समान सफल साधक तो आज नहीं हैं पर किन्हीं अंशों में इस विद्या का अस्तित्व मौजूद अवश्य है।
तन्त्र शास्त्र में अनेक मंत्र है। पर उन सब मन्त्रों का कार्य गायत्री से भी हो सकता है। गायत्री की, संकल्प सृष्टि की, साधना भविष्य में सविस्तार कभी लिखेंगे क्योंकि वह सर्वहितकारी, सर्वसुलभ और सर्व मंगलमय है। परमाणुपथी तन्त्र प्रधान, वाममार्गी सावित्री विद्या का विषय गोपनीय है। उसका परिचय मात्र इन पंक्तियों में करा दिया है। इस संबंध की गुप्त बातों पर अधिक प्रकाश डालना और तत्संबंधी साधनाएं प्रकाशित करना जनसाधारण के हित में अनुपयुक्त है, इसलिए इस लेख को अधिक न बढ़ाकर यहीं समाप्त किया जाता है।
लोभ और मोह को छोड़ने पर ही मनुष्य अपने मन को वश में कर सकता है।
-भीष्म
(श्री विनोद सन्तोषी)
महामृत्यु सो काली रजनी नम परिवार प्रलय के बादल।
तड़प रही विद्युत, बहती पुरवैश, बरस रहा भीषण जल॥
है तूफान भयानक, ढह ढहकर गिरते हैं वृक्ष विचारे।
शेषनाग से क्रुद्ध हो रहे हैं निर्झर नद सत्वर सारे॥
काँप रही है अवनी, मुघर घँसते, अम्बर डोल रहा है।
तांडव की तालों पर पुलकित महाकाल कुछ बोल रहा है॥
तुझको मिला संदेसा किसका, ओ मेरे एकान्त बटोहा।
महा सिन्धु को पार कर रहा तिनके का बनकर आरोही॥
बोल बोल कुछ बोल शून्य से छिपकर किसने तुझे बुलाया।
किसके संकेतों से पागल महामृत्यु से लड़ने आया॥
आँखों में जल का सागर ले अंतर में ले प्यार किसी का।
पर्वत सा दृढ़ बढ़ा जा रहा ढोता तू सुधि-भार किसी का॥
जल को जल न समझना आँधी को तूने तूफान न माना।
महाप्रलय से टक्कर लेने निकल पड़ा पागल दीवाना॥
कौन वस्तु खो गई खोजता फिरता है जिसको बनाने में।
कौन छू गया है अन्तर को, कौन बसा है युग लोचन में॥
किससे मिलने चला जा रहा बोल बोल कुछ तो मस्ताने।
रूठा तुझसे कौन, और तू चला जा रहा किसे मनाने।
समझ गया मैं किस पीढ़ा से व्याकुल है तेरा अन्तस्थल।
समझ गया निर्बल प्राणों में कौन भर रहा है नूतनपल॥
महाप्रलय का सिन्धु बुन्द सा है आँखों के जल के आगे।
आँधी मलय समान, हृदय की पीड़ाओं के बल के आगे॥
मेघ रुई के जाल सदृश हैं सुधि के श्यामल धन के आगे।
झंझावात शक्ति से वंचित है मानस-मन्थन के आगे॥
*समाप्त*