(श्री रत्नेश कुमारी जी, मैनपुरी)
जीव को बन्धन में बाँधने वाली “माया” के संबंध में अनेक आचार्यों ने अनेक प्रकार से वर्णन किया है। इन सब विवेचनाओं में महात्मा तुलसीदास जी की रामायण में की हुई विवेचना अधिक हृदय आडी और सुबोध है, रामायण में कहा है-
मैं और मोर, तोर, यह माया।
परा जासु बश जीव निकाया॥
मैं, मेरा, तेरा की भावना संकीर्ण हृदय और तुच्छ स्वार्थ की द्योतक है। जो लोग अपना सुख, अपना लाभ, अपना स्वार्थ, इतना प्रधान रखते हैं कि उसकी अधिकाधिक पूर्ति में उन्हें अन्य किसी की हानि की परवाह नहीं होती ऐसे लोग मायाबद्ध कहे जा सकते हैं। अपने सुख का वास्तविक तात्पर्य है- अपनी आत्मा का सुख। ऐसा सुख, आत्म त्याग और लोक सेवा द्वारा प्राप्त होता है। अपनी शक्तियों को केवल अपने शरीर के भोग में वो अपने लिए अधिक भौतिक साधन सामग्री एकत्रित करने में लगे रहते हैं। ऐसे मनुष्य आत्मसुख का आनन्द नहीं प्राप्त कर सकते चाहे वे साँसारिक दृष्टि से कितने ही बड़े सम्पन्न क्यों न हों।
संसार की सभी वस्तुएं भगवान की हैं। इनका सदुपयोग करके जीवन को सफल एवं सुविकसित बनाने में ही बुद्धिमानी है। क्योंकि प्रत्येक वस्तु गतिशील, परिवर्तित होने वाली एवं नाशवान है। इनको जो व्यक्ति अपनी मान लेता है, उसका स्वामी बनता है, उसके प्रति ममता का भाव स्थापित कर लेता है वह भूल करता है। इस भूल का नाम ही माया है। पानी की चंचल लहरें क्षणक्षण में पैदा और विलीन होती रहती हैं। प्रत्येक लहर के पैदा होने पर जो प्रसन्न होता है और उसके मिटने के साथ रोता है उसे मूर्ख ही कहा जायेगा। इसी प्रकार धन वैभव, कुटुम्ब, शरीर आदि भी परिवर्तनशील और नाशवान हैं जो इनको अपनी अचल सम्पत्ति मान बैठता है उसे इनका वियोग होने पर बड़ा दुखी होता है। मायाबद्ध जीव इसलिए संसार के स्वाभाविक परिवर्तनों में अपना हानि-लाभ देखकर रोते हंसते रहते हैं, यह भ्रान्त दृष्टिकोण ही माया है।
माया के बन्धन में, अज्ञान की भूलभुलैयों में फंसाने वाली ममता ही है। यह मेरा है यह तेरा है, लघु चेतना वाले ही ऐसा हिसाब लगाते हैं, जिनका हृदय उदार है विवेक जागृत है वे संसार भर को अपना कुटुम्ब मानते हैं। यह सब पसारा अपना ही है। सब में अपना ही आत्मा समाया हुआ है। सब अपने ही हैं, ऐसा समझ कर आत्म विस्तार की भावना से मनुष्य सहज ही त्रिलोक का स्वामी होने जैसा आनन्द प्राप्त करता है। इसके विपरीत जो थोड़ी सी वस्तुओं को ही अपना समझते हैं वे सदा दीन, दरिद्र, अभावग्रस्त रहते हैं उन्हें प्रतीत होता रहता है कि उनके पास बहुत ही कम धन है, उनकी जाति बड़ी छोटी है, उनका वैभव बड़ा सीमित है ऐसे लोग अपने को दरिद्रता ग्रस्त अभागा ही मानते रहते हैं।
अपने पराये का भेद मिटाकर अपने को विनम्र विश्व नागरिक, समाज का एक अविच्छिन्न अंग, विश्वात्मा परमात्मा का एक अंश आत्मा मानते हैं वे समुद्र में मिलकर अपने को महान सिन्धु अनुभव करने वाली बूँद की तरह सदा आनन्दित रहते हैं ऐसे ही लोग जीवन मुक्त या माया रहित कहे जाते हैं। जो संकुचित हैं, ममता मगन हैं, अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाते हैं, रामायण ने उन्हें ही मायाबद्ध बताया है।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) एक अंक का।)
सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य
(श्री शाँति मेहरोत्रा एम. ए.)
अब वैभव के गीत न गाना और न करुणा कराहें।
अब अतीत में लीन हो चुकी, परवशता की आहें॥
जिसे चरण से कुचला तूने, वह विषधर बन जागा।
अपना खोया स्वत्व पुनः जग करके उसने माँगा॥
जिसका भी साहस हो आगे बढ़कर उसे दबाये।
देवासुर संग्राम छिड़ा जिसको आना हो आये॥
आज राज महलों पर फिर से कुटियों ने जय पाई।
जर्जरता पर विजय पा चुकी है युग की तरुणाई॥
अधरों पर प्रतिबंध हटा वाणी ने है स्वर पाया।
अब मिट्टी की मूर्ति बनी कल की कंचन की माया॥
फिर से भारत में आई है अब ममता की सीता।
पौरुष और कर्म मिलकर के आज रचेंगे गीता॥
अरुणोदय के साथ व्योम ने यही दिया है नारा।
टूट चुकी अब तो सदियों की लौह शृंखला कारा॥
शेष नहीं मानव मानव में अब है कोई अन्तर।
घुमड़ घुमड़ कर बादल कहते गरज गरज कर सागर॥
कंधे से कंधे मिल जायें फिर बाँहों से बांहें॥
अब वैभव के गीत न गाना और न करुणा कराहें॥
सवितुस्तु पदं वितनोतिध्रवं,
मनुजोबलवान् सवितेतिभवेत्।
विषया अनुभूतिपरिस्थितय,
सदात्मन एवगणेदति सः॥
अर्थ- गायत्री का ‘सविता’ पद यह बतलाता है कि मनुष्य को सूर्य के समान बलवान होना चाहिए और सभी विषयों की अनुभूतियां तथा परिस्थितियाँ अपने अन्दर है ऐसा मानना चाहिए।
परिस्थितियों का जन्मदाता मनुष्य स्वयं है। हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करता है। कर्म रेख, भाग्य, तकदीर, ईश्वर की इच्छा, अहदशा, दैवी आपत्ति, आकस्मिक लाभ आदि की विलक्षणता देखकर कई आदमी भ्रमित हो जाते हैं वे सोचते हैं कि ईश्वर की जो मर्जी होगी कर्म में जो लिखा होगा वह होगा हमारे प्रयत्न या पुरुषार्थ से प्रारब्ध को बदला नहीं जा सकता, इसलिए कर्तव्यपालन का श्रम करने की अपेक्षा चुप बैठे रहना या देवी देवताओं की मनौती मनाना ठीक है। ऐसे आदमी यह भूल जाते हैं कि भाग्य, प्रारब्ध ईश्वरेच्छा आदि की अदृश्य शक्तियाँ खुशामद या पक्षपात पर आधारित नहीं है कि जिस पर प्रसन्न हो जाए उसे चाहे जो देदें और जिस पर नाराज हो जाय उससे बदला लेने के लिए उस पर आपत्तियों का पहाड़ पटक दें।
हर व्यक्ति अपने गज से दूसरों को नापता है। हम स्वयं पक्षपाती, खुशामद पसंद, रिश्वती, पूजाकाँक्षी, बदले की भावना से भरे हुए होते हैं इसलिए सोचते हैं कि अदृश्य शक्तियों को भी ऐसा ही होना चाहिए। पर यह अनुमान सत्य नहीं है। सत्य यह है कि ईश्वर पूर्णतया निष्पक्ष है, वह हर प्राणी को समान दृष्टि से देखता है। जिसका जैसा प्रयत्न और पुरुषार्थ है पाप पुण्य है उसी के अनुसार उसे सुख-दुख देने की न्याय मूर्ति न्यायाधीश की भाँति व्यवस्था कर देता है। प्रारब्ध की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है हमारा कल का पुरुषार्थ आज प्रारब्ध बन जाता है, रात को जमाया हुआ दूध सबेरे दही बन जाता है। दूध और दही के नाम रूप में फर्क है यद्यपि दोनों ही वस्तुएं वस्तुतः एक हैं। पुरुषार्थ और प्रारब्ध यद्यपि दो अलग अलग वस्तुएं प्रतीत होती है पर वस्तुतः वे एक हैं। हरा कच्चा खट्टा आम जब पाल में लगा दिया जाता है तो कुछ दिन बाद वह पीला, पका, मीठा आम बन जाता है। समय के परिपाक से यह परिवर्तन हो गया फिर भी वह आम एक ही है। पुरुषार्थ और प्रयत्न का भेद भी ऐसा ही अवास्तविक है। इसी जन्म के, पिछले जन्म के कुछ कर्म अपने परिपाक का समय लेकर जब अनायास प्रकट होते हैं तब उन्हें प्रारब्ध कह दिया जाता है। यह प्रारब्ध किसी दूसरे की कृपा या रोष का परिणाम नहीं अपितु निश्चित रूप से हमारे अपने भूतकाल के कर्मों का फल है। इस प्रकार हम स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता ठहरते हैं भले ही यह निर्माण हमने निकट भूतकाल में किया हो या सुदूर भूतकाल में।
संसार दर्पण के समान है। जैसे कुछ हम स्वयं हैं वैसा ही हमारा संसार है। कहते हैं कि हर आदमी की दुनिया अलग है, ठीक भी है जैसा वह स्वयं है वैसी ही उसकी दुनिया होगी। जो मनुष्य क्रोधी है उसका सबसे झगड़ा होगा फलस्वरूप उसे सारी दुनिया झगड़ालू मालूम पड़ेगी। बेईमान, चोर-ठग और दुष्ट प्रकृति के मनुष्य दूसरों को अपने ही जैसा समझते हैं और दूसरों पर तरह तरह के आक्षेप लगाया करते हैं। आलसी, दरिद्री, ओछे, मूर्ख प्रकृति के लोग अपने आसपास के लोगों पर तरह तरह के दोषारोपण करते रहते हैं कि वे उन्हें उठने नहीं देते, बढ़ने नहीं देते, रोकते हैं, सताते हैं। सच बात यह है कि संसार का व्यवहार कुंए की आवाज की तरह है। पक्के कुंए में मुँह करके जैसी आवाज हम करते हैं ठीक वैसे ही शब्दों की प्रतिध्वनि वापिस लौट आती है। जो प्रशंसा योग्य है उसे प्रशंसा प्राप्त होती है, जो सहायता का अधिकारी है उसे सहायता मिलती है, जो आदर का पात्र है उसे आदर मिलता है और जो निन्दा, घृणा, तिरस्कार, अपमान और दंड का पात्र है उसे यह वस्तुएं जहाँ भी जायगा वहीं पहले से ही तैयार रखी हुई मिलेंगी।
संसार में बुरे तत्व बहुत हैं पर अच्छे तत्व उनसे भी अधिक हैं। यदि ऐसा न होता तो कोई आत्मा यहाँ रहने को तैयार न होती। जो गुणवान है, शक्तिवान है, विचारवान है, सहृदय और उदार हैं उन्हें निश्चित रूप से अपना भाग्य उत्तम मिलेगा। मनस्वी इन्सान कहा करते थे कि मुझे नरक में रखा जाय तो मैं वहाँ भी अपने सद्गुणों के कारण स्वर्ग बना लूँगा। जो बुरे आदमी हैं, वे स्वर्ग में रहकर भी नरक की यातना भोगेंगे। कितने ही अमीर चिन्ताओं की ज्वालाओं में जलते रहते हैं और कितने ही गरीब स्वर्गमय सुख में दिन काटते हैं। अमेरिका का धनकुबेर हेनरी फोर्ट, धन की लिप्सा में अपनी पाचन शक्ति गंवा बैठा था। वह जब अपने सुविस्तृत कारखानों के मजदूरों को मोटी रोटी खाते देखता था तो वह कहता था कि ‘इन मजदूरों के भाग्य पर मुझे ईर्ष्या होती है। वह हाथ मलता था कि हे ईश्वर काश मैं हेनरी न होकर बलवान पाचन शक्तिवाला मजदूर होता तो कितना सुखी होता।
फोर्ट के उदाहरण से यह भली प्रकार समझ में आ जाता है कि अमीरी ही मनुष्य को सुखी नहीं बना सकती। सुखी बनाने की क्षमता ‘शक्ति’ में है। शक्ति ही वास्तविक सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति के बदले में हम जो भी वस्तु चाहें प्राप्त कर सकते हैं। जिसकी पाचन शक्ति ठीक है नमक रोटी में कचौड़ी का आनन्द आवेगा। जिसका पेट दुर्लभ है उसे बहुमूल्य स्वादिष्ट पदार्थ भी कडुए लगेंगे और हानिकारक सिद्ध होंगे। पुँसत्व शिथिल हो जाने पर इन्द्र की अप्सरा भी कुरूप लगती है और बाह्य बल से परिपुष्ट होने पर कुरूप दम्पत्ति भी सरस जीवन का आस्वादन करते हैं। सौंदर्य को देख कर वहीं आनन्द अनुभव कर सकता है जिसके नेत्र सक्षम हैं, मधुर ध्वनियाँ वहीं सुन सकेगा जिसके कान सक्रिय हैं। आँख और कान की शक्ति नष्ट हो जाय तो समझिये कि सारा संसार अन्धकारमय और स्तब्धतामय ही हो गया।
(1) शरीरबल, (2) बुद्धिबल, (3)विद्याबल, (4) धनबल, (5) संगठनबल, (6) चरित्रबल, (7) आत्मबल, यह सात बल जीवन को प्रकाशित, प्रतिष्ठित, सम्पन्न और सुस्थिर बनाने के लिए आवश्यक हैं। सविता-सूर्य के रथ में सप्त अश्व जुते हुए हैं। सविता की सात रंग की किरणें होती है जो इन्द्र धनुष में तथा बिल्लौरी काँच में देखी जा सकती हैं। गायत्री का सविता पद हमें आदेश करता है कि हम भी सूर्य के समान तेजस्वी बने और अपने जीवन रथ को चलाने के लिए उपरोक्त सातों बलों को घोड़े के समान जुता हुआ रखें। जीवन रथ इतना भारी है कि एक दो घोड़ों से ही उसे नहीं चलाया जा सकता यदि जीवन की गतिविधि ठीक रखनी है तो उसे खींचने के लिए सात अश्व, सात बल जोतने पड़ेंगे।
(1) स्वस्थ शरीर (2)अनुभव, विवेक, दूरदर्शितापूर्ण व्यवहार बुद्धि (3) विशाल अध्ययन, श्रवण, मनन और सत्संग द्वारा सुविकसित किया हुआ मस्तिष्क (4) जीवनोपयोगी साधन सामग्रियों का समुचित मात्रा में संचय (5) सच्चे मित्रों, बान्धवों एवं सहयोगियों की अधिकता (6) ईमानदारी, मधुरता, परिश्रम सफलता, आत्मसम्मान की रक्षा, सद्व्यवहार, उदारता जैसे गुणों से परिपूर्ण उत्तम चरित्र (7) ईश्वर और धर्म में सुदृढ़ आस्था, ओमज्ञान, कर्मयोगी दृष्टिकोण, निर्मल मनोभूमि, सतोगुणी विचार व्यवहार, परमार्थ परायणता, यह सात प्रकार के बल प्रत्येक मनुष्य के लिए अतीव आवश्यक हैं। इन सबका साथ-साथ संतुलित विकास होना चाहिए। स्वादिष्ट भोजन वह है जिसमें नमक, मसाला, घी, मीठा, आटा, बेसन, मावा आदि संतुलित मात्रा में हो यदि इनमें से कोई वस्तु आवश्यकता से बहुत ज्यादा और कोई बहुत कम होगी तो भोजन चाहे कितने ही श्रम से क्यों न बनाया गया हो वह असंतुलित होने के कारण अखाद्य बन जायगा। शरीर का कोई अंग बहुत मोटा और कोई बहुत पतला रह जाय तो ऐसा असंतुलित शरीर रोगी ही समझा जायगा। इसी प्रकार यह सातों बल उचित मात्रा में संचय करने चाहिए।
जो धनी तो बहुत है पर दुर्बल हो रहा है। जो स्वस्थ तो काफी है पर मूर्ख है, जो विद्वान तो बहुत है पर चरित्र भ्रष्ट है, जो चतुर तो बहुत है पर नास्तिक है, जो दुष्ट और अधम फल है, जो उच्च पद पर तो है पर कोई सच्चा मित्र नहीं, ऐसे लोग अधूरे हैं। एकाँगी उन्नति चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो किसी को सच्चे अर्थों में सुखी नहीं बना सकती। जो लोग केवल धन कमाने के पीछे पड़े हैं और शरीर, विद्या, मैत्री, चरित्र आदि बलों की उन्नति नहीं कर रहे हैं वे यह भूल जाते हैं कि केवल एक धन का ही होना ऐसा है जैसे दसों इन्द्रियों में केवल एक इन्द्री का सजीव तथा अन्य सबका निर्जीव होना। सप्ताह में एक दिन बढ़िया भोजन मिल और छह दिन भूखा रहना पड़े तो वह कोई आनन्द की बात न होगी, चाहे रूखा सूखा भोजन मिले पर सातों दिन मिले तभी काम चल सकता है इसी प्रकार सातों बलों का संतुलित विकास होना ही जीवन को सुख शान्ति मय बना सकता है।
गायत्री का “सवितु” पद हमें उपदेश करता है कि सूर्य के समान तेजस्वी बनो सप्त अश्वों को, सप्त बलों को अपने जीवन रथ में जुता रखो। सूर्य केन्द्र है और अन्य समस्त ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं वैसे ही तुम भी अपने को कर्ता, केन्द्र और निर्माता मानो। परिस्थितियाँ, वस्तुएं, घटनाएं तो हमारी परिक्रमा मात्र करती हैं। जैसे परिक्रमा करने वाले ग्रह सूर्य को प्रभावित नहीं करते वैसे ही कोई परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं करती। अपने भाग्य के, अपनी परिस्थितियों के निर्माता हम स्वयं हैं, अपनी क्षमता के आधार पर अपनी हर एक अच्छा और आवश्यकता को पूरा करने में हम पूर्ण समर्थ हैं। गायत्री माता हम बालकों को गोदी में लेकर उंगली के संकेत से सविता को दिखाती है, और समझाती है मेरे बालकों, सविता बनो, सविता का अनुकरण करो।
मनुष्य को सब प्राणियों से श्रेष्ठ माना गया है। वह दो हाथों और दो पैर वाले शरीर के कारण नहीं, परन्तु अपने देवी स्वभावों के कारण है। अधिक मोटे तथा बलवान पशु इस जगत में मौजूद हैं कि जिन पर स्थूल दृष्टि से मनुष्य का स्वामित्व नहीं चल सकता। परन्तु उसने स्वाभाविक रीति से मिली मानसिक, नैतिक तथा आत्मिक शक्ति का उपयोग करके इन पशुओं के ऊपर वह अपना स्वामित्व चला सकता है। जो काम शरीर बल से नहीं हो सकता वह मनोबल से हो सकता है। जिस प्रमाण में मनुष्य अपने को जड़ शरीर मानता हुआ अटका नहीं रहता और आत्मा की शक्ति का परिचय पाता हुआ चलता है तथा उसी प्रकार जीवन यापन करता है उसी प्रमाण में दूसरे मनुष्यों की अपेक्षा अधिक शक्तिवान होकर चलता है।
जिस काम को एक मनुष्य कर सकता है, उसे दूसरा मनुष्य भी कर सकता है, क्योंकि सब जगह एक-सा ही नियम फैल रहा है। हाँ, शक्तिमान होना अथवा शक्तिहीन होना यह तो मनुष्य के स्वयं अपने हाथ में है। जिस मनुष्य को पूर्ण विश्वास होता है कि मैं उच्च स्थिति प्राप्त कर सकता हूँ, वही मनुष्य उच्च स्थिति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य जो-जो मर्यादायें अपने लिए बनाता है वे मर्यादाएं ही उसे आगे बाँधकर रखती है, जिस प्रकार दूध की मलाई दूध की अपेक्षा उत्तम होने से ऊपर तैर आती है, उसी प्रकार संसार में जिसे अपने में रहने वाली उच्च शक्तियों को प्राप्त करने की इच्छा हो, वह दूसरों की अपेक्षा उत्तम होने के कारण सामान्य मनुष्यों के ऊपर आ जाता है।
आप बाहरी संयोगों के सम्बन्ध में अनेक बार चर्चाएं करते हैं लेकिन इस बात को निश्चयपूर्वक समझ रखिए कि कोई संयोग मनुष्य को नहीं बनाता मनुष्य स्वयं ही संयोगों को बनाता है। जो इस बात को अच्छी तरह समझता है उसे यह बात मालूम होगी कि अपने परिस्थिति में से अनेक बार तो निकलना आवश्यक भी नहीं होता क्योंकि स्वयं को इस परिस्थिति में से बहुत कुछ सीखने को रहता है। और यदि प्राप्त शक्तियों को योग्य उपयोग किया जावे तो इस वर्त्तमान स्थिति में से वह हितकारी संयोगों को भी उत्पन्न कर सकता है।
उपर्युक्त बात वंश परंपरागत संस्कारों के लिए भी लागू होती है इसीलिए यह प्रश्न बारंबार पूछने में आता है कि क्या वंश परंपरागत ओछे संस्कारों पर विजय प्राप्त की जा सकती है? परन्तु जिसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं होता वही ऐसा प्रश्न पूछता है। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जो अपने को ऐसा मानता है कि वंश परंपरागत संस्कारों को हम नहीं जीत सकते तो आप उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते तथा जैसी की तैसी ही स्थिति रहेगी। आपको जैसे-जैसे अपने स्वरूप का ज्ञान होता जायेगा तथा अपनी प्रचंड शक्तिओं का ज्ञान होता जायेगा। वैसे - वैसे ही ओछे वंश परम्परागत संस्कार कम होना आरम्भ हो जायेंगे।
ऐसा एक भी उच्च पद नहीं है कि जिसे आप प्राप्त न कर सकते हों, समय आते ही सब पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आप से चाहे जितनी भूल हुई हों और हो रही हों फिर भी सुस्त होकर पड़ा नहीं रहना चाहिए, ईश्वर की रक्षण रूपी ढाल पर आधार रखकर प्रयत्नवान होना चाहिए।
अपनी प्रत्येक आदत एवं वासना के ऊपर आप जय पा सकते हैं क्योंकि आप अनन्त परमात्मा के एक अंश है और परमात्मा के बल के आगे ऐसा कुछ भी नहीं है जो टिक सके। अनेक मनुष्य इस प्रकार का जीवन इस तरह बिताते हैं जिसमें व्यक्ति स्वतन्त्र होता ही नहीं है। क्या तुम्हें इस संसार में प्रभावशाली बनना है। तो आप अपने आप पर निर्भर रहो और स्वतन्त्र बनने का प्रयत्न करो। अपने आपको साधारण मनुष्य मत समझो, हम गरीब है, हमसे क्या होगा, ऐसा मत कहो।
यदि आप परमात्मा के ऊपर विश्वास रखकर लोगों की आलोचना से नहीं डरोगे तो प्रभु अवश्य आपको सहायता देगा। यदि लोगों को खुश करने के लिए अपना जीवन बितावेंगे तो लोगों से आप कदापि खुश नहीं रहेंगे बल्कि जैसे-जैसे आप इन्हें खुश रखने में लगेंगे वैसे-वैसे ही आप गुलाम बनते जायेंगे, वैसे वैसे ही आपसे उनकी माँग भी बढ़ती जायगी।
जो कोई स्वाभाविक रीति से अपनी सामर्थ्य का उपयोग करता है वह निश्चित रूप से महान-पुरुष है। जिन मनुष्यों को अपनी मूल शक्ति आत्मशक्ति का भान होता है, वे ओछे और बेकार काम करते हुए नहीं दिखाई देते।
सर्वोत्तम शक्ति को प्राप्त करने का मुख्य रहस्य तथा साधन यह है कि कार्य करने के बाहरी साधन के साथ आपकी आन्तर शक्ति का सम्बन्ध मिलाया जावे। यदि तुम चित्रकार हो तो जितने प्रमाण में तुम अपने इस कार्य के साथ अपनी आन्तर शक्ति का उपयोग करते हो उतने ही प्रमाण में उत्तम प्रकार के चित्रकार बनोगे। तुम्हारी आत्मा द्वारा तुम्हें जो प्रेरणा मिलेगी उसकी अपेक्षा और अच्छा चित्र तुम दूसरी प्रकार से कदापि नहीं बना सकोगे। तुम्हारे अन्तर में उच्च प्रेरणा लाने के लिए तुम्हारे करने के लिए सिर्फ इतना ही है कि तुम अपने अन्तःकरण रूपी दरवाजे को परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए योग्य बनाकर उसकी ओर उसे खुला रखो। ईश्वर की प्रकाश किरणों को अपने अन्तस्तल में आने दो, उसकी प्रेरणा और शक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा को केन्द्रित होने दो। ऐसे दिव्य अन्तःकरण के साथ तुम जो कुछ भी कार्य करोगे वह सफल होगा, शान्तिदायक होगा, ऊँचा उठाने वाला और आगे बढ़ाने वाला होगा। अपनी आत्मा और क्रिया में सामंजस्य स्थापित करने वाले मनुष्य ही महापुरुष बनते हैं।
(श्री मनोहरदास अभावत, उम्मेदपुरा)
जिस बात को हम नहीं चाहते हैं और देवगति से वह हो जाती है, उसके होने पर भी जो दुखी नहीं होते किन्तु उसे देवेच्छा समझ कर सह लेते हैं, वही धैर्यवान पुरुष कहलाते हैं। दुःख और सुख में चित्त की वृत्ति को समान रखना धैर्य कहलाता है। जिसने शरीर धारण किया है उसे सुख-दुःख दोनों का ही अनुभव करना होगा। शरीर धारियों को केवल सुख ही सुख या केवल दुःख ही दुःख कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात है, शरीर धारण करने पर सुख-दुःख दोनों का ही भीग करना है, तो फिर दुःख में अधिक उद्विग्न क्यों हो जायँ ? दुख-सुख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं। हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें जिन्होंने इस रहस्य को समझ कर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है, संसार में वे ही सुखी समझे जाते हैं। धैर्य की परीक्षा सुख की अपेक्षा दुःख में ही अधिक होती है। दुःखों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है। किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता वही ‘पुरुषसिंह’ धैर्यवान् कहलाता है। आखिर हम अधीर होते क्यों है? इसका कारण हमारे हृदय की कमजोरी के सिवा और कुछ भी नहीं है। इस बात को सब कोई जानते हैं कि आज तक संसार में ब्रह्मा से लेकर कृमिकीट पर्यन्त सम्पूर्ण रूप से सुखी कोई भी नहीं हुआ। सभी को कुछ न कुछ दुःख अवश्य हुए हैं। फिर भी मनुष्य दुःखों के आगमन से व्याकुल होता है, तो यह उसकी कमजोरी ही कही जा सकती है। महापुरुषों के सिर पर सींग नहीं होते, वे भी हमारी तरह दो हाथ और दो पैर वाले साढ़े तीन हाथ के मनुष्यकार जीव होते हैं। किन्तु उनमें यही विशेषता होती है कि दुःखों के आने पर वे हमारी तरह अधीर नहीं हो जाते। उन्हें प्रारब्ध कर्मों का भोग समझ कर वे प्रसन्नता पूर्वक सहन करते हैं। पाँडव दुःखों से कातर होकर अपने भाइयों के दास बन गये होते, मोरध्वज पुत्र शोक से दुःखी होकर मर गये होते, हरिश्चन्द्र राज्यलोभ से अपने वचनों से फिर गये होते, श्री रामचन्द्र वन के दुःखों की भयंकरता से घबरा कर अयोध्यापुरी में रहे गये होते, शिवि राजा ने यदि शरीर के कटने के दुःख से कातर होकर कबूतर को बाज के लिये दे दिया होता, तो इनको अब तक कौन जानता? ये भी असंख्य नरपतियों की भाँति काल के गाल में चले गये होते, किन्तु इनका नाम अभी तक ज्यों का त्यों ही जीवित है। इसका एक मात्र कारण उनका धैर्य ही है।
अपने प्रियजन के वियोग से हम अधीर हो जाते हैं। क्योंकि हमें छोड़कर चल दिया। इस विषय में अधीर होने से क्या काम चलेगा? वह हमारे अधीर होने का कोई समुचित कारण भी तो नहीं। क्योंकि जिसने जन्म धारण किया है, उसे मरना तो एक दिन है ही। जो जन्मा वह मरेगा भी। सम्पूर्ण सृष्टि के पितामह ब्रह्मा है चराचर सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है। अपनी आयु समाप्त होने पर वे भी नहीं रहते। क्योंकि वे भी भगवान विष्णु के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। अतः महाप्रलय में वे भी विष्णु के शरीर में अन्तर्हित हो जाते हैं। जब यह अटल सिद्धान्त हैं कि जायमान वस्तु का नाश होगा ही, तो फिर तुम उस अपने प्रियजन का शोक क्यों करते हो? उसे तो मरना ही था, आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों। सदा कोई जीवित रहा भी है जो वह रहता? जहाँ से आया था, चला गया। एक दिन तुम्हें भी जाना है। जो दिन शेष है, उन्हें धैर्य के साथ गुणागार के गुणों के चिन्तन में बिताओ।
शरीर में व्याधि होते ही हम विकल हो जाते हैं। विकल होने से आज तक कोई रोग-विमुक्त हुआ है? यह शरीर व्याधियों का घर है। जाति, आयु, भोग को साथ लेकर ही तो यह शरीर उत्पन्न हुआ है। पूर्व जन्म के जो भोग हैं, वे तो भोगने पड़ेंगे।
दान पुण्य, जप, तप, और औषधि-उपचार करो अवश्य, किन्तु उनसे लाभ न होने पर अधीर मत हो जाओ। क्योंकि भोग की समाप्ति में ही, दान, पुण्य और औषधि कारक बन जाते है। बिना कारण के कार्य नहीं होता तुम्हें क्या पता कि तुम्हारी व्याधि के नाश में क्या कारण बनेगा? इसलिये प्राप्त पुरुषों ने शास्त्र में जो उपाय बताये हैं उन्हें ही करो। साथ ही धैर्य भी धारण किये रहो। धैर्य से तुम व्याधियों के चक्कर से सुखपूर्वक छूट सकोगे।
जीवन की आवश्यक वस्तुएं जब नहीं प्राप्त होती है तो हम अधीर हो जाते हैं। घर में कल को खाने के लिए मुट्ठी भर अन्न नहीं है। स्त्री की साड़ी बिलकुल चिथड़ा बन गई है। बच्चा भयंकर बीमारी में पड़ा हुआ है, उसकी दवा-दारु का कुछ भी प्रबन्ध नहीं। क्या करूं? कहाँ जाऊँ? इन्हीं विचारों में विकल हुए हम रात रात भर रोया करते हैं और हमारी आँखें सूज जाती है। ऐसा करने से न तो अन्न ही आ जाता है और न स्त्री की साड़ी ही नई हो जाती है। बच्चे की भी दशा नहीं बदलती। सोचना चाहिये हमारे ही ऊपर ऐसी विपत्तियाँ हैं सो नहीं। विपत्तियों का शिकार किसे नहीं बनना पड़ा? त्रिलोकेश इन्द्र ब्रह्म हत्या के भय से वर्षों घोर अन्धकार में पड़े रहे। चक्रवर्ती महाराज हरिश्चन्द्र डोम के घर जाकर नौकरी करते रहे। उनकी स्त्री अपने मृत बच्चे को जलाने के लिये कफ न तक नहीं प्राप्त कर सकी। जगत के आदि कारण, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी को चौदह वर्षों तक घोर जंगलों में रहना पड़ा। वे अपने पिता चक्रवर्ती महाराज दशरथ को पावभर आटे के पिंड भी न दे सके। जंगल के इंगुदी फलों के पिंडों से ही उन्होंने चक्रवर्ती राजा की तृप्ति की।
शरीरधारी कोई भी ऐसा नहीं है जिसने विपत्तियों के कड़वे फलों का स्वाद न चखा हो। सभी उन अवश्य प्राप्त होने वाले कर्मों के स्वाद से परिचित हैं। फिर हम अधीर क्यों हों हमारे अधीर होने से हमारे आश्रित भी दुःखी होंगे, इसलिये हम धैर्य धारण करके क्यों नहीं उन्हें समझावें? जो होना होगा। बस, विवेकी और अविवेकी में यही अन्तर है। जरा, मृत्यु और व्याधियाँ दोनों को ही होती हैं किन्तु विवेकी उन्हें अवश्यंभावी समझ कर धैर्य के साथ सहन करता है और अज्ञानी व्याकुल होकर विपत्ति से विफल होकर विपत्तियों को और बढ़ा लेता है- महात्मा कबीर ने इस विषय पर क्या ही रोचक पद्य रचना की है यथा-
ज्ञानी काटे ज्ञान से, अज्ञानी काटे रोय।
मौत, बुढ़ापा, आपदा, सब काहु को होय॥
जो धैर्य का आश्रय नहीं लेते, वे दीन हो जाते हैं, परमुखापेक्षी बन जाते हैं। इससे वे और भी दुःखी होते हैं। संसार में परमुखापेक्षी बनना दूसरे के सामने जाकर गिड़गिड़ाना, दूसरे से किसी प्रकार की आशा करना, इससे बढ़कर दूसरा कष्ट और कोई नहीं है। इसलिए विपत्ति आने पर धैर्य धारण किये रहिए और विपत्ति के कारणों को दूर करने एवं सुविधा प्राप्त करने के प्रयत्न में लग जाइए। जितनी शक्ति अधीर होकर दुखी होने में खर्च होती है उससे आधी शक्ति भी प्रयत्न में लगा दी जाय तो हमारी अधिकांश कठिनाइयों का निवारण हो सकता है।
(श्री दौलतरामजी कटरड़ा, बी. ए. दमोह)
इस सत्य के बावजूद कि मनुष्य अपने मनोविकारों का फल भोगने से बच नहीं सकता और उसकी आत्मा ही उसके पाप पुण्यादि अनेक कर्मों के फल की विधाता है यह कहना कि वह केवल अपने मनोविकारों और कर्मों का ही फल भोगता है, विचार करने पर गलत मालूम होता है। ऐसी कई आपत्तियां हैं जो मनुष्य पर केवल प्रकृति में होने वाली हलचलों के कारण आती हैं। कभी अतिवृष्टि होती है और कभी अनावृष्टि। कभी सदफल अधिक बढ़ता है और कभी गमफल। कहीं भूकम्प होता और ज्वालामुखी का विस्फोट होता है और लोग बेघरबार हो जाते हैं। कहीं भीषण बाढ़ आती है और गाँव के गाँव जलमग्न हो जाते हैं। कही अकाल पड़ते है और संक्रामक बीमारियाँ फैलती हैं और सैंकड़ों घरों के लोग बरबाद हो जाते हैं। अंतिम दो को छोड़ शेष सारी की सारी घटनाएं पूर्णतया प्रकृति की गतिविधि में अचानक होने वाले परिवर्तनों के फल-स्वरूप होती है और उन्हें सभी लोग क्या पुण्यात्मा और क्या पापात्मा समान रूप से भोगते हैं। यह दूसरी बात है कि एक ही परिस्थिति में पड़ जाने पर भी दोनों का दृष्टिकोण इस विपत्ति के प्रति भिन्न भिन्न रहता है जिसके कारण एक का दुःख हल्का और दूसरे का भारी होता है।
परिस्थितियों के प्रति दृष्टिकोण भिन्न भिन्न भले ही हों पर परिस्थितियाँ का प्रभाव तो पापी और पुण्यात्मा सब पर एक जैसा पड़ेगा ही। भूमंडल पर रहते हुए भौगोलिक परिस्थितियों से दूर कैसे रहा जा सकता है? चाहे कोई जीव मुक्त हो या बद्ध जीवन, पर वह इन भौगोलिक परिवर्तनों के प्रभाव से कैसे बचेगा। अतएव यह कहना कि मनुष्य केवल अपनी भूलों और मनोविकारों का ही परिणाम भोगता है गलत मालूम होता है। वह ऐसे कारणों से भी कष्ट भोगता है, जिनके लिए वह तनिक भी उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। वह अपने संपूर्ण ज्ञान का प्रयोग कर भी उन कष्टों से नहीं बच सकता। ऐसी अवस्था में मनुष्य पर जो आपत्तियाँ पड़ती है उन्हें हम उसके पूर्व-कृत कर्मों का फल नहीं कह सकते।
मनुष्य की अनेक आपत्तियों का कारण सामाजिक और राजकीय दुर्व्यवस्था होती है। जिस प्रकार एक मनुष्य का भाग्य इस पृथिवीमंडल के भाग्य से जुड़ा हुआ है उसी प्रकार उसका भाग्य संपूर्ण मानव समाज के भाग्य से भी संबद्ध है। यदि किसी देश में गृह-युद्ध आरंभ होता है तो उसमें सभी को बराबर शामिल होना पड़ता है और उसका सुपरिणाम अथवा दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। गृह-युद्ध को न चाहने वाले अनेक व्यक्ति भी उसके शिकार हो जाते हैं। यदि कहीं साम्प्रदायिक दंगे होते है तो उनका विरोध करने वाले अनेक निडर व्यक्ति भी मारे जाते है। पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सीमा प्राँत और सिंघ के निष्क्रमणार्थियों ने जो मुसीबतें भोगी हैं क्यों उन्हें ईश्वर की न्याय-परायणता पर विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति उन सभी व्यक्तियों के पूर्वकृत कर्मों का न्यायोचित फल कह सकता है?
क्या कोई यह कह सकेगा कि अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोगने के लिए ही उन सबने एक साथ इन प्रान्तों में जन्म लिया था, नहीं। उनके साथ तो घोर अन्याय हुआ है और इस संबंध में हमारा ईश्वरवादी दोस्त तो कहेगा कि ईश्वर इनके प्रति किए गए अन्याय का अन्यायियों को दंड देगा। पर उन्हें इसका दंड मिले या न मिले हम ये पूछते हैं कि अन्याय के कारण हमारी जो क्षति हुई है उसकी पूर्ति भी होने की क्या कोई संभावना है। यदि नहीं तो हमारे दुश्मन को दंड मिलने से और इस तरह की प्रतिशोधात्मक आशा दिलाकर हमारे आँसू पोंछने से क्या लाभ? यदि यह भी मान लिया जाय कि भविष्य में पापी को जब दंड मिलेगा तब किसी प्रकार उसे पता लग जावेगा कि उसे वह दंड अमुक पाप के लिए मिला है और इस तरह उसका आत्म सुधार होगा और उसकी विनाशात्मक प्रवृत्ति भी क्षीण हो जायेगी तो उसकी विनाशात्मक प्रवृत्ति के भविष्य में क्षीण होने से आज हमें क्या लाभ? हमारी तो हानि हो ही चुकी और हम अपराध को बिना किए ही कष्ट उठा चुके। अपराधियों को भले ही न्याय मिला हो पर हमें तो न्यायकारी परमेश्वर द्वारा न्याय नहीं मिला। क्या हम यह आशा करें कि भयंकर अत्याचारों का शिकार होने के कारण हमें अगले जन्म में बड़ा सुख मिलेगा, यदि ऐसा हो तो फिर अन्याय सहने में कोई पाप न होगा - प्रत्युत वह धर्म ही हो जायेगा।
इन सब बातों पर विचार करने से पता चलेगा कि जिन पर अन्याय होता है और जो इस प्रकार कष्ट उठाते हैं उनका कष्ट सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम होता है। बेकारी, निर्धनता और बंगाल के अकाल सदृश अकाल से कष्ट भोगने वाले व्यक्ति बहुधा सामाजिक और राजकीय दुर्व्यवस्था के कारण कष्ट भोगते हैं सर्वथा अपने पूर्वकृत कर्मों के कारण नहीं। ऐसे अकाल आदि ईश्वर कृत नहीं होते बल्कि मनुष्य-कृत होते हैं सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के परिणाम होते हैं। यदि कोई शासक अपनी प्रजा के बहुत से लोगों को, उनकी सुधारवादी आकाँक्षाओं का दमन करने के लिए जेल के सीकजों के भीतर बन्द कर नाना प्रकार की यातनाएं दे अथवा कृत्रिम अकाल फैलाकर लोगों को मौत के घाट उतार दे, अथवा किसी संक्रामक बीमारी को रोकने में प्रमाद कर सैकड़ों को सहज ही मर जाने दे तो यह कथन कि कष्ट भोगने वाले लोगों ने केवल अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भोगा है क्या उन व्यक्तियों का कथन न कहा जायगा जो कि अन्याय के दुवृत्त समर्थक हैं। अन्याय को निजकृत कर्मों का फल भोग कहने वाले व्यक्तियों का क्या यह अभिप्राय नहीं है कि शासकों की हरकतें जारी रहें, सामाजिक लूट बरकरार रहे और जनता उसके खिलाफ आँदोलन करने का विचार छोड़ चुपचाप उन कष्टों को सहती रहे। क्या अन्याय को ईश्वर और भाग्य के नाप पर मढ़ने वाले व्यक्ति धूर्त नहीं हैं और उनका, जनता को असली बात न बताकर उन्हें भुलावे में रखना कोई नशीली वस्तु पिलाकर उन्हें बेहोश रखना जैसा नहीं हैं।
ठीक उसी प्रकार जब एक राज्य से दूसरे राज्य की नीति का सामंजस्य न होने से युद्ध ठन जाता है तब युद्ध का सक्रिय विरोध करने वाले निरपराध व्यक्तियों को भी विदेशी शत्रु के भयंकर बमों और गैसों से जो कष्ट भोगना पड़ता है क्या उसके लिए हम उन व्यक्तियों को ही उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। इन व्यक्तियों का यदि कोई अपराध है तो केवल यही कि वे युद्ध चाहने वाले राज्य के प्रमुख व्यक्तियों को युद्ध से विरत कराने के लिए उनके विरुद्ध यथेष्ट मात्रा में जनमत को संगठित नहीं कर पाते। ऐसी दशा में यदि हम मनुष्य की कमजोरी और सीमित शक्ति को ही पाप का पर्यायवाची मानते तो उस हालत में हम अवश्य ही यह कह सकेंगे कि मनुष्य अपने पूर्वकृत पाप का परिणाम भोगता है, अन्यथा नहीं। समाज के अन्य मनुष्य जो मूकवत् राज्य की इच्छाओं को शिरोधार्य करते हैं उनके लिए भी हम यह अवश्य कहेंगे कि उन्हें अपनी अज्ञानता, कमजोरी, सीमित शक्ति, उदासीनता तथा मूकाचरण का दण्ड अपराध से कई गुना अधिक भोगना पड़ता है। सच तो यह है कि बहाना लेकर आक्रमण करने वाले देश का शासक वर्ग अपने हित को दृष्टि में रखकर दूसरे राज्य से युद्ध छेड़ता है और यह प्रचार करता है कि वह युद्ध देश हित को दृष्टि में रखकर दूसरे राज्य से युद्ध छेड़ता है और यह प्रचार करता है कि वह युद्ध देश हित को दृष्टि में रख कर छेड़ा गया है। क्या आल्हा और ऊदल मोबे की आन की रक्षा के लिए अपने सैनिकों को प्रचारित नहीं करते थे और वस्तुतः उनके द्वारा युद्ध क्या व्यक्तिगत मर्यादा की रक्षा के लिए नहीं लड़े जाते थे? अकबर के देश की जनता का प्रताप ने क्या बिगाड़ा था कि उन पर चढ़ाई कर लाखों व्यक्तियों को कटवाया गया। सच तो यह है कि पहले के राजा लोग अपनी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए युद्ध करते आए हैं और पुरोहित वर्ग बहुधा जनता को भुलावे में रखता हुआ उनका पद-चुँबन करता आया है। ऐसी दशा में हमें कभी-कभी छुटपन से ही जो यह पाठ पढ़ाया जाता है कि प्रत्येक मनुष्य सदा अपने कर्मों का ही फल भोगता है, गलत मालूम होता है। किन्तु यदि उपरोक्त वाक्य में यह संशोधन कर दिया जावे कि “प्रत्येक मनुष्य अपने कर्मों का भी फल भोगता है” तो हम समझते हैं कि इस कथन पर फिर किसी को कोई आपत्ति न होगी।
यह स्पष्ट कर देने पर भी कि मनुष्य जो फल भोग करता है वह सब उसके किए का फल नहीं होता, यह सिद्ध करने के लिए रह ही जाता है कि उस फल का विधायक अकेला उसका आत्मा ही नहीं हो सकता। यह सत्य है कि आत्मा उसके कर्म के फल के विधान में सहायक होता है उसके कर्मों का संस्कारों के रूप में रिकार्ड सा रखता है और फिर इन संस्कारों के कारण हमें परिस्थिति के अनुसार अधिक या कम, दंड या पुरस्कार दिलाता है। लेकिन यदि यह कहा जावे कि आखिर दंड या पुरस्कार को दंड या पुरस्कार के रूप में मन से ही तो देखा जाता है। (क्योंकि मनोनाश होने पर न कुछ दंड है और न पुरस्कार) अतएव आत्मा ही समस्त कर्मफल का विधाता हुआ तो इस तर्क से उलटे ही मन का विधातृत्व सिद्ध होता है, आत्मा का नहीं।
यदि विदेशी आक्रमण के बम के विस्फोट से किसी व्यक्ति की आँख जाती रहे और उसे चोट के कारण भयंकर शारीरिक पीड़ा हो तो उस पीड़ा को केवल मनोजन्य या मनोनिर्मित नहीं कहा जा सकता। यह अवश्य सत्य है कि जब तक शरीर में आत्मा और मन विद्यमान है अर्थात् जब तक वह व्यक्ति जीवित है और उसके मस्तिष्क के ज्ञान-तंतु चेतन अवस्था में हैं तब तक उसे पीड़ा का अनुभव अवश्य होता है तथा समाधि ले लेने पर अथवा मूर्छित अवस्था में वह भुलाई भी जा सकती है पर वह हटाई नहीं जा सकती। मूर्छित अवस्था हटने पर पीड़ा फिर से मालूम होने लगती है। यदि मन उसका जनिता (उत्पन्न करने वाला) होता तो वह उसका संहरण करने वाला भी होता। किंतु मन में ऐसी शक्ति नहीं है। यदि यह आक्षेप हो कि मन में संहरण शक्ति है इसका प्रमाण यही है कि उसके रहने पर पीड़ा मालूम होती है और न रहने पर नहीं मालूम होती तो इस तरह के तर्क से तो हम सब वस्तुओं के विद्यमान रहते हुए भी उनके सहंरणकर्ता होने का दुस्साहस कर सकेंगे। उदाहरण के लिए कोई भी व्यक्ति भयंकर ग्रीष्मकालीन आतप से तपते हुए भी आँख बंद कर यह कहने का दुस्साहस करेगा कि मैंने सूर्य का संहरण कर लिया। अतएव यदि आत्मा जैसी कोई वस्तु है तो वह और मन, पीड़ा के निर्माता या जनिता नहीं है केवल उसके साक्षी है। वस्तुतः चोट तो बली ही रहती है पर मूर्छित अवस्था में मस्तिष्क, जो कि शरीर के भीतर अनुभूतियों के लिए केवल एक घटना प्रबन्ध है और शरीर का केवल एक अवयव मात्र है, जब अपना कार्य नहीं करता तो शरीर में पीड़ा (अनुभूति) नहीं होती। अतएव बम विस्फोट से आँख जाती रहती है और हमारा मकान नष्ट हो जाता है तथा प्रिय परिजनों की मृत्यु हो जाती है तो नेत्र की चोट की अनुभूति का तथा जन-धन नाश को हानि मानने के इस दृष्टिकोण का विधायक हमारा मन अथवा आत्मा अवश्य होता है किंतु चोट या जन-धन-नाश का विधायक नहीं। हम यह अवश्य मानते हैं कि अनेक अवसरों पर अपनी परिस्थितियों के या अपने पर घटने वाली घटनाओं के जन्मदाता हम स्वयं होते हैं किन्तु यदि मन और आत्मा को समस्त परिस्थितियों और घटनाओं की अनुभूति कराने वाले मानने के स्थान में हम उन्हें अपनी प्रत्येक परिस्थिति या घटना का विधायक, जन्म-दाता या कारण मान ले तो भूल करेंगे।
इस भूल के कारण हम एक बड़े जाल में फंस गए है। प्रत्येक घटना को हम अपने पूर्वकृत कर्मों का फल मानकर निश्चेष्ट होकर बैठे रहते हैं और अपने भाग्य को दोष देते हैं। हम अपनी गरीबी का कारण, अपनी अक्षमता और अपमान जनक दुरावस्था का कारण पूर्णतया अपने आपको ही मान लिया है तथा यह समझने की पूरी पूरी कोशिश नहीं की है कि हमारी इन परिस्थितियों को जन्म देने वाली अन्य शक्तियाँ भी हैं जो संसार में कार्य कर रही हैं, जिनका हमारे लिए ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है तथा जिनको अपने वश में लाकर हमें अपने अनुकूल बनाना है अथवा स्वयं ही उनके अनुकूल बनकर आचरण करना है। दुःख की बात है कि हम सदा अपने आपको अपनी दुरावस्था परिस्थितियों का जन्मदाता मानते रहें किन्तु अब हमें सचेत होना चाहिए और जीवन को प्रभावित करने वाली भौतिक तथा अन्य शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर अपनी दशा को सुधारना चाहिए।
(श्री लालजीराम शुक्ल, एम.ए.)
हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन को कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिए बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने-लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता ऐसे कार्य उसकी एक प्रकार की नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं, वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।
जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आपके विष में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिनको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है, वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है फिर इस प्रकार के विचार उसके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को हम छोड़ दें तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वहीं मनुष्य अपने विचारों पर नियन्त्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिये पाले हैं, वहीं साँप किसी असावधानी की अवस्था में अपने आपको काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश है। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निराकरण का पहला उपाय है।
जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करने लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मानहानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता है वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।
हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।
हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।
अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।
बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को। हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मनोमन्दिर में प्रवेश करने से क्योंकर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं। वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगेंगे, उनके परिणाम बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुखदायी होगा।
संसार के अत्याधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुख के कारण हैं। मनुष्यमात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सभी बहिर्मुखी हैं। हम अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरे में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते है। वही मनुष्य बुरे विचारों के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने आपके विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही दुख और दुखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले ओर बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।
किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिये जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुख होता है और अनहोनी घटना होके रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिये कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुंचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
क्रोध प्राणहरः शत्रुः क्रोधऽमित्रमुखो रिपुः।
क्रोधोऽसि महातीक्षणः सर्व क्रोधोऽर्षति॥
त्पते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति।
क्रोधेन सर्व हरति तस्मात क्रोधं विवजयेत्॥
(बाल्मीकि रामायण उत्तर. 71)
अर्थात् क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु, क्रोध अमित्र - मुखधारी बैरी है, क्रोध महा तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिराने वाला है, क्रोध तप, संयम, और दान सभी हरण कर लेता है। अतएव, क्रोध को छोड़ देना चाहिए।
क्रोध त्याग की महिमा बताते हुए श्री शुक्राचार्य जी अपनी कन्या देवयानी से कहते हैं- “देवयानी! जो नित्य दूसरों के द्वारा की हुई अपनी निन्दा को सह लेता है, तुम निश्चय जानो कि उसने सब को जीत लिया। जो बिगड़ते हुए घोड़ों के समान उभरे हुए क्रोध को जीत लेता है, उसी को साधु लोग जितेन्द्रिय कहते हैं, केवल घोड़ों की लगाम हाथ में रखने वाले को नहीं। देवयानी! जो पुरुष उभड़े हुए क्रोध का अक्रोध के द्वारा शान्त कर देता है, तुम निश्चय जानों, उसने सब जीत लिया। जो पुरुष उभरे हुए क्रोध को क्षमा के द्वारा शान्त कर देता है और सर्प के द्वारा पुरानी केंचुली छोड़ने के समान क्रोध का त्याग कर देता है, वास्तविक अर्थों में वहीं “पुरुष” कहलाता है। जो क्रोध को रोक लेता है, निन्दा को सह लेता है और दूसरों के द्वारा सताये जाने पर भी उनको बदले में नहीं सताता, वहीं परमात्मा की प्राप्ति का अधिकारी होता है। जो सौ वर्षों तक हर महीने बिना थके लगातार यज्ञ करता रहे और (जो कभी किसी पर क्रोध न करे- इन दोनों में क्रोध न करने वाला पुरुष ही श्रेष्ठ है।
(महाभारत आदिपर्व)
क्रोध दुःख के चेतन कारण के साक्षात्कार से उत्पन्न होता है। कभी-2 हम दुःख के अनुमान मात्र से उद्विग्न हो उठते हैं। अमुक ने हमारे लिए ऐसा बुरा सोचा, या कोई षड्यन्त्र बनाया-ऐसा सोच कर हम क्रोध से तिलमिला उठते हैं, आँख भौं सिकोड़ लेते हैं, चेहरा सुर्ख हो उठता है और हम यह अवसर देखा करते हैं कि कब वह व्यक्ति आये और कब हम प्रतिशोध लें।
क्रोध में दो भाव मूल रूप से विद्यमान रहते हैं- (1) साक्षात्कार के समय दुःख (2) उसके कारण के सम्बन्ध का परिज्ञान। दुःख के कारण की स्पष्ट धारणा जब तक न हो, तब तक क्रोध की भावना का उदय नहीं होता। कारण का ज्ञान क्रोध की उत्पत्ति में सहायक होता है। यदि किसी ने हमारा अहित किया है और हम उससे अप्रसन्न हैं, तो क्रोध का भाव मन की किसी गुप्त कन्दरा में छिपा रहता है।
क्रोध का सम्बन्ध मन के अन्य विकारों से बड़ा घनिष्ठ है। क्रोध के वशीभूत होकर हमें उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता और हम हाथापाई कर उठते हैं बातों-बातों ही में उखड़ उठना, लड़ाई झगड़ा साधारण सी बात हैं। यदि तुरन्त क्रोध का प्रकाशन हो जाय, तब तो मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है, पर यदि वह अन्त प्रदेश में पहुँच कर एक भावना ग्रन्थि धन जाय, तो बड़ी दुःखदायी होती है। बहुत दिनों तक टिका हुआ क्रोध वैर कहलाता है। वैर एक ऐसी मानसिक बीमारी है जिसका कुफल मनुष्य को दैनिक जीवन में भुगतना पड़ता है। वह अपने आपको संतुलित नहीं रख पाता। जिससे उसे वैर है, उसके उत्तम गुण, भलाई, पुराना प्रेम, उच्च संस्कार इत्यादि सब विस्मृत कर बैठता है। स्थायी रूप से एक भावना ग्रन्थि बन जाने से क्रोध का वेग और उग्रता तो धीमी पड़ जाती है किन्तु दूसरे व्यक्ति को सजा देने, नुकसान पहुँचाने या पीड़ित करने की कुत्सित भावना निरन्तर मन को दग्ध किया करती है।
वैर पुरानी जीर्ण मानसिक बीमारी है, क्रोध तत्कालीन और क्षणिक प्रमाद है। क्रोध में पागल होकर हम सोचने का समय नहीं देखते, वैर उसके लिए बहुत समय लेता है। क्रोध में अस्थिरता, क्षणिकता, तत्कालीनता, बुद्धि का कुँठित हो जाना, उद्विग्नता, आत्म रक्षा, अहं की पुष्टि असहिष्णुता, दूसरे को दंडित करने की भावनाएं संयुक्त हैं। वैर में सोचने समझने प्रतिशोध लेने का समय होता है। हम अच्छी तरह सोचते हैं, कुछ समय लेते है और तब बदला लेते हैं। पं. रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “दुःख पहुँचने के साथ ही दुःखदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा करने वाला मनोविचार क्रोध और कुछ काल बीत जाने पर प्रेरणा करने वाला भाव वैर है, किसी ने आपको गाली दी यदि आपने उसी समय उसे मार दिया तो आपने क्रोध किया। मान लीजिए कि वह गाली देकर भाग गया और दो महीने बाद आपको मिला। अब यदि आपने उससे बिना फिर गाली सुने, मिलने के साथ ही उसे मार दिया तो यह आपका वैर निकालना हुआ।”
वैर में धारणा शक्ति अर्थात् भावों को संचित कर मन में रोक रखने की शक्ति की आवश्यकता होती है। जिन प्राणियों में पुराने क्रोध का संचित रखने की शक्ति विद्यमान हैं, वे ही वैर कर सकते हैं। क्रोध तो पशु, पक्षी, मनुष्य, अर्थात् सभी प्राणियों को अस्थिर और पागल करने में पूर्ण समर्थ है किन्तु वैर यह कार्य नहीं कर सकता। वैर में स्थायित्व है।
क्रोध की मात्रा कम या अधिक, तेज या हलकी हो सकती है। चिड़चिड़ाहट क्रोध का हलका रूप है। साधारण भूलों या मामूली खराबियों, कमजोरियों या भद्दी बातों पर हम उद्विग्न तो होते हैं पर यह उग्रता उतनी तेज नहीं होती। थोड़ी देर रह कर शान्त हो जाती है। कभी हम अन्य किन्हीं कारणों से परेशान रहते हैं, कुछ अप्रिय हो जाने से दुःखी होते हैं, ऐसी मनोदशा में साधारण सी बात होते ही हम चिड़चिड़ा उठते हैं।
चिड़चिड़ाहट में सामान्य कारण ही उद्विग्नता उत्पन्न करने में समर्थ हैं। वह एक मानसिक दुर्बलता है जो अनेक कारणों से उत्पन्न हो सकती हैं। जिस व्यक्ति को पुनः पुनः डराया, धमकाया, या अधिक कार्य लिया जाय, क्रोध के अधिक अवसर प्राप्त हों और मन शान्त दशा में न आ सके, तो क्रोध स्वभाव का एक अंग बन जाता हैं। यह फिर जरा जरा सी असुविधा या कठिनाई में हलके रूप में प्रकाशित हुआ करता है।
चिड़चिड़ाहट प्रायः वृद्धों में अधिक देखने में आती है। रोगी अपनी दुर्बलता के कारण जरा-2 सी बात पर तिनक उठते हैं, औरतें काम से परेशान होकर इतनी उद्विग्न रहती हैं कि मामूली सी बात पर चिड़चिड़ा जातीं हैं। अध्यापक विद्यार्थियों की काँव-कांव सुनते-2 इतने दुःखी से हो उठते हैं कि तिनक उठते हैं। दुकानदार प्रायः ग्राहकों से जलभुन कर इस मानसिक दुर्बलता के शिकार बनते हैं। धार्मिक वृत्ति वाले रूढ़िवादी दुनिया की प्रगति देख-देखकर जीवन भर बड़बड़ाया करते हैं।
क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई स्थिति में रख देता है जिसके परिणामस्वरूप मन दूषित विकारों से भर जाता है। क्रोध से प्रथम तो उद्वेग उत्पन्न होता है। मन एक गुप्त किन्तु तीव्र पीड़ा से दुग्ध होने लगता है। रक्त में गमफल आ जाती है, और उसका प्रवाह बड़ा तेज हो जाता है। इस गमफल में मनुष्य के शुभ भाव, दया, प्रेम, सत्य, न्याय, विवेक, बुद्धि जल जाते हैं।
जिस पर क्रोध किया गया है यदि वह क्षमावान् और शान्त प्रकृति का हो और क्रोध से विचलित न हो, तो क्रोध करने वाले को बहुत दुःख होता है। वह जलभुन कर राख हो जाता है। मन में एक प्रकार का तूफान सा उठता है जिसका वेग इतना प्रबल होता है कि मनुष्य अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाता। विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है, शिष्टता एवं शान्ति से वह हाथ धो बैठता है। कई बार क्रोध से उत्तेजित होकर क्रोधी व्यक्ति दूसरे की हिंसा और आत्मघात तक कर बैठते हैं।
क्रोध एक प्रकार का भूत है जिसके संचार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता। उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हो जाता है। मन की निष्ठ वृत्तियाँ उस पर अपनी राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बेचारा इतना हत बुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है।
आधुनिक मनुष्य का आन्तरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यन्त विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उनसे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है, जीवन पर्यन्त इधर उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक दुःख, चिंता, अविश्वास, उद्वेग, व्याकुलता आदि विकारों के वशीभूत होता रहता है। ये क्रोध जन्य मनोविकार अपना विष फैलाकर मनुष्य का जीवन विषैला बना रहे हैं। उसकी आध्यात्मिक शक्तियों का शोषण कर रहे हैं। साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का महाराक्षस ही है।
क्रोध शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। एक बार क्रोध आते ही मन को अवस्था विचलित हो उठती है, श्वासोच्छवास तीव्र हो उठता है, हृदय विक्षुब्ध हो उठता है। यह अवस्था आत्मिक विकास के विपरीत है। आत्मिक उन्नति के लिए शान्ति, प्रसन्नता, प्रेम और सद्भाव चाहिए।
जो व्यक्ति क्रोध के वश में है, वह एक ऐसे दैत्य के वश में है, जो न जाने कब मनुष्य को पतन के मार्ग में धकेल दे। क्रोध तथा आवेश के विचार आत्म बल का ह्रास करते हैं।
विचार प्रायः दो प्रकार के होते हैं (1) शान्त और दृढ़ तथा (2) संशयात्मक और डाँवाडोल। दूसरे प्रकार की स्थिति उद्वेग और शंकाशील है। इसी में क्रोध भी सम्मिलित है। उस उद्विग्न मनः स्थिति में मनुष्य कुछ भी उत्कृष्ट बात नहीं सोच सकता, उन्नति की भावना में संलग्न नहीं हो सकता। उसकी शारीरिक मशीनरी यकायक झंकृत हो उठती है। वह समूचा काँप उठता है।
धर्म नीति और शिष्टाचार-तीनों ही दृष्टिकोणों से क्रोध निकृष्ट है। क्रोधी मनुष्य धर्म कार्य किस प्रकार कर सकता है? उसमें धर्म निष्ठा, पूजन, मनन कीर्तन, अध्ययन, चिंतन, इत्यादि कैसे आ सकते है? जिसका शरीर और मन वश में नहीं वह नीति के अनुसार सत्-असत् का विवेक किस प्रकार कर सकता है? जिसे क्रोध आता है वह दूसरे के मान अपमान का विचार क्या करेगा।
एक विद्वान् का विचार है- “एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता हैं। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अभाव का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी त्यौरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है, वह उचित है या अनुचित। इसी से धर्म और नीति में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने जितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं तो, क्रोध के चिन्ह दिखाये दबाये जाते हैं। इस प्रकार का प्रतिबन्ध समाज की सुख−शांति के लिए बहुत आवश्यक है।
क्रोध के प्रेरक दो प्रकार के दुःख हो सकते है - अपना दुःख और पराया दुःख। जिस क्रोध के त्याग का उपदेश दिया जाता है वह पहले प्रकार का क्रोध है।”
क्रोध के द्वारा हम दूसरे व्यक्ति में भय का संचार करना चाहते है। यदि हम दूसरे को डराने में सफल हो जाते हैं और वह विनम्र होकर आत्मसमर्पण कर देता है, तब हमें विशेष प्रसन्नता होती है। यदि दूसरे व्यक्ति में भय उत्पन्न नहीं हो पाता, तो हमें अन्दर ही अन्दर एक प्रकार की गुप्त पीड़ा होती है। कभी-2 क्रोध दूसरे का गर्व चूर्ण करने के हेतु किया जाता है।
क्रोध असुरों की सम्पदा है। यदि हम क्रोध को काबू में न करेंगे तो तामसी, निराशापूर्ण और दुःखित दशा में पड़े रहेंगे। हमारे स्वभाव का राक्षसत्व ही प्रकट होगा। हम ईश्वर के राज्य में प्रवेश न पा सकेंगे। क्रोध के अधम विचारों से हमारी नैतिक, आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक अवनति होती है, अन्तःकरण के क्लेश बढ़ते हैं। क्रोध को मन में छिपाये रखने से प्रतिशोध, अतृप्ति, उद्वेग, शत्रु भाव, ईर्ष्या, असूया आदि विकार मन में उद्दीप्त होते हैं। छिपा हुआ क्रोध अनेक बार जटिल मानसिक रोगों का कारण बनता है। अनेक भावना ग्रन्थियाँ इसी शत्रुभाव की वजह से हमारे अन्तःप्रदेश में निर्मित होती है।
“क्रोधान्द्रवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रण्श्यति॥
-गीता
“अर्थात् क्रोध से अविवेक होता है, अविवेक से स्मरण में भ्रम हो जाता है, स्मृति के भ्रमित हो जाने से बुद्धिनाश होता है, बुद्धि के नष्ट होने से प्राणी नष्ट हो जाता है।”
जिसके पास ज्ञान नहीं हैं, श्रद्धा नहीं है और मन संशय से भरा हुआ है। वह नष्ट हो जाता है। संशय वाले पुरुष के लिए न सुख है, न लोक है और न परलोक है -गीता
योगी पुरुष आत्मशुद्धि के लिए शरीर मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते है, परन्तु वे इन कर्मों को आसक्ति छोड़ कर ही करते हैं।
-गीता
शिक्षा चाहे स्त्री की हो और चाहे पुरुष की जो हृदय को नहीं खोल सकती वह शिक्षा नहीं हो सकती। देश में आज शिक्षितों की कमी नहीं है, चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष दोनों ही पढ़ते लिखते नजर आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे पढ़े-लिखों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही जीवन की अशान्ति भी बढ़ती जाती है। ऐसा मालूम होता है जैसे ये सारे विद्यालय और विश्वविद्यालय अशान्ति की ही शिक्षा दे रहे हों। अशान्ति की शिक्षा पालने के बाद उनके जीवन में कितनी विपत्तियाँ सामने आती हैं इसे तो भुक्त भोगी ही बतला सकते हैं।
जीवन संघर्ष में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का संपर्क अधिक होता है। पुरुष का काम तो कमाई के क्षेत्र तक ही सीमित है लेकिन स्त्रियाँ तो समाज का निर्माण करती हैं इसलिए यदि स्त्रियों की वास्तविक शिक्षा न हुई हो तो समाज में अशान्ति का वातावरण फैलना स्वाभाविक है। इसलिए पुरुषों की शिक्षा की अपेक्षा स्त्रियों की शिक्षा का महत्व अधिक है।
लेकिन आज के विद्यालय स्त्रियों की शिक्षा के काम को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पा रहे। उनके सामने शिक्षा का अर्थ पुस्तकीय विद्या है, शायद अक्षर ज्ञान या साहित्यिक ज्ञान। ये शिक्षालय स्त्री को भावुक तो बना देते हैं परन्तु व्यावहारिक बनाने की शिक्षा देने की ओर ध्यान नहीं देते। इसलिए स्कूल या कालेज से प्रमाणपत्र या उपाधि लेकर निकली हुई नारी इतनी कल्पनामय होती है कि वह प्रायः तितलियों की तरह जीवनभर फुदकना और नाचना पसन्द करती है और जरा सा आघात लगते ही प्रलय वर्षा करने की तैयारी कर डालती है। जीवन की वास्तविकता से दूर, बहुत दूर, ऐसी नारी समाज में अशान्ति का बीज बोने के अतिरिक्त और कुछ भी करती नजर नहीं आती।
जबकि समाज के बाहरी तथा भीतरी निर्माण का सारा श्रेय नारी को है तो नारी की ऐसी शिक्षा समाज के विध्वंस का कारण हो उठी है। इसलिए नारी की शिक्षा में तात्विक परिवर्तन की आवश्यकता है।
नारी को यदि रमणी बनाना हो तो कल्पना मूलक शिक्षा की आवश्यकता है लेकिन नारी का चरम लक्ष्य माँ बनना है। नारी समाज की निर्मात्री है, हम समाज में रहते हैं इसलिए घर में रहते हुए इन सबके यथायोग्य निर्माण का काम नारी को करना है। क्योंकि ये सब ही आगे जाकर समाज के सदस्य बनेंगे और समाज संगठन में इनका व्यापक हाथ रहेगा, इसलिए यदि इनमें पिता, पुत्र, भाई, बहिन, माँ और पत्नी की कर्त्तव्य मूलक भावना जाग्रत होगी तो यह दुनिया थोड़े दिनों में ही नन्दनवन बनकर चारों और शान्ति का प्रवाह प्रवाहित कर सकेगी।
बालपन की जिन्दगी पराश्रित जिन्दगी होती है, इसमें उसके सिर पर किसी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं होती। हमेशा खाना और बालपन ही नहीं रहता, जवानी भी आती है और बुढ़ापा भी आता है। ऐसा समय भी आता है जब कि जीवन की शक्तियाँ विकसित होती हैं और जवाब भी दे जाती हैं इसलिए जो शिक्षा शक्तियों का व्यावहारिक उपयोग करना सिखाती हैं, जीवन संघर्ष में विजय दिलाती है वही जीवन में निर्माण और शान्ति का कारण होती हैं।
आजकल स्त्रियों को जो शिक्षा दी जाती है उसमें भावनाओं और वासनाओं को तो उत्तेजना मिलती है लेकिन कर्मठता एवं कर्त्तव्य के लिए कोई स्थान नहीं होता, इसका परिणाम यह निकल रहा है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ स्कूल तथा कालेजों से एक इस प्रकार का कल्पनामय जगत को लेकर बाहर आती हैं जिसका निर्माण करना उन्हें नहीं सिखाया गया है। इन्हें यदि कुछ सिखाया गया है तो उपभोग करना। बिना निर्माण किये उपयोग के लिए स्थान ही कहाँ हो सकता है। लेकिन उन्हें इसका ज्ञान ही नहीं होता, परसी हुई पातर पर खाने की कल्पना के कारण अब उन्हें परसी हुई पत्तल नहीं मिलती तो वे बौखला उठती हैं और अपनी जिम्मेदारियों से बचती हुई अपने लिए दुःखों की अजेय सुदृढ़ दीवार खड़ी कर लेती हैं।
प्रायः शिक्षित स्त्रियाँ विवाह बन्धन से बचना चाहती हैं। विवाह को वे पुरुष के अधीन होना मानती हैं जब कि किसी के अधीन होकर रहना उन्हें सिखाया ही नहीं जाता। लेकिन भारतीय वातावरण में बिना विवाह किये रहना संभव नहीं है इसलिए जबरदस्ती विवाह के फन्दे में फंस जाने के कारण जीवन भर उनमें छटपटाहट भरी रहती हैं। आनन्द के स्रोत विवाहित जीवन को वे दुख से भर डालती हैं और जिस घर को स्वर्ग बनाकर जहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहिए वहाँ कल्पना जगत में विचरण करने के कारण उस घर को नरक बना देती हैं साथ ही जीवन भर तड़पते-तड़पते अपनी जीवन लीला समाप्त कर डालती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम शिक्षा के विरोधी हैं। दाम्पत्य जीवन के सुख के लिए स्त्री शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। परन्तु यह शिक्षा किताबी शिक्षा नहीं होनी चाहिए। यह शिक्षा व्यावहारिक होनी चाहिए। ऐसी व्यावहारिक जिसमें दाम्पत्य जीवन का महत्व समझा जा सके और अपनी जिम्मेदारी को समझ कर उसे निबाहने की तथा पूरा करने की कला प्राप्त हो सके।
स्त्री को समझने के लिए सबसे मुख्य बात है सहिष्णुता, सहनशीलता। जिन्दगी में, संसार में क्या, अकेले परिवार में ही अनेक रुचियों तथा स्वभाव वाले व्यक्तियों से संपर्क होता है, सभी तरह की स्थितियों में होकर स्त्री को गुजरना पड़ता है। आनन्द का समय भी आता है और शोक तथा दुख का भी। इस प्रकार की दुनिया में भावुकता वाली कोरी किताबी शिक्षा पार नहीं पाड़ सकती। वहाँ तो समस्त कल्पनाओं और हवाई महलों को छोड़कर सचाई, प्रेम और आत्मविश्वास के साथ परिवार के सभी लोगों को सन्तुष्ट करने और सुख देने में लगना पड़ता है। जो ईमानदारी के साथ उस सबको अपना समझ कर उसके निर्माण में अपने को लगा देती हैं, बड़ी स्त्री वास्तविक सुख का उपयोग कर सकती है तथा स्वयं शान्ति पा सकती है। इस शान्ति और सुख का सृजन उसकी अपनी शिक्षा-दीक्षा पर निर्भर है और जो सुख तथा शाँति का सर्जन कर सकती है वही गृहस्थ जीवन की देवी है।
सहिष्णुता तथा सहनशीलता की शिक्षा देने की जिम्मेदारी कन्या के माता-पिता पर सबसे पहले आती है। और उसके बाद दूसरा नम्बर उसके पति का होता है। विवाहित जीवन में सबसे बड़ी चीज जिसे सीखना होता है वह है संतोष। क्षमा ओर संतोष के द्वारा अपनी रक्षा करती हुई वह गृह स्वामिनी समस्त विपदाओं को पार कर जाती है। उदार हृदय होना तो गृहस्थी जीवन में स्त्री के लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि स्त्री अपने हृदय को संकुचित करके अनेक विपत्तियों को मोल लेती है। नारी के अन्तर की संकुचित मनोवृत्ति को दूर करके उसे उदार बनाने का काम पति का है। यह काम पति का अपना उदार चरित्र बनाकर पूरा करना पड़ता है। सिर्फ उपदेश से इसकी पूर्ति नहीं होती।
नारी अकेली रमणी नहीं है। न अकेली पुत्री। पिता के घर को छोड़ देने के बाद उसे अनेक प्रकार के सम्बन्धों को धारण करना पड़ता है। जितने सम्बन्ध उतनी ही उसकी जिम्मेदारियाँ। वह किसी की पत्नी है, किसी की भाभी, किसी की माँ तो किसी की पतोहू। हर एक व्यक्ति उससे भिन्न-2 प्रकार की अपेक्षायें रखता है। विनय, प्रेम, सरलता, बुद्धिमत्ता से वह सबकी इच्छायें पूरी कर सकती है। सास-ससुर को मान देकर तथा उनकी सेवा करके उन्हें सन्तुष्ट कर सकती है। उनकी पुत्रियाँ जो कि विवाह कर दूसरे घरों में चली जाती हैं, माँ उनकी याद कर व्याकुल हो उठती है, इसलिए बहू का काम होता है कि वह अपने व्यवहार से उनका स्थान ग्रहण कर ले और सास को कभी ऐसा मौका न दे जिससे वे अपनी पुत्री के लिए व्याकुल हो उठे। ननदें भी उसे अपनी बहिन मानने लगें। पति को भी आश्वस्त कर सकने की क्षमता उसे चाहिए और उनकी आवश्यकताएं समझ कर तथा उसकी व्यवस्था करके उनके काम को सम्हाल सके ऐसी शक्ति भी होनी चाहिए। एक साथ एक समय में अपनी अनेक जिम्मेदारियों को पूरी करने के लिए कितनी विशाल शिक्षा, व्यवहार पटुता सहिष्णुता एवं आत्म संयम की आवश्यकता है। स्त्री जीवन की सार्थकता के लिए उसे इन सब को ही अपनाना और सीखना आवश्यक है।
गृहस्थ जीवन वास्तव में एक कठोर कर्मक्षेत्र है। जो अधीर हो जाते हैं वे अपना विवेक खो देते हैं ओर इस जीवन को कष्टपूर्ण कर लेते हैं पर जो धैर्य धारण किये रहते हैं वे अपने विवेक को बनाये रखकर अपनी जीवन नौका को सुख पूर्वक पार लगा जाते हैं। इसलिए स्त्री धैर्य धारण को यथा संभव बनाये रहे तभी उसका वास्तविक कल्याण संभव हो सकता है।
स्त्री की चरम साधना माँ बनने पर ही पूरी होती है। अपनी कुक्षि से सन्तान का प्रभाव तो संसार को सन्तान स्वरूप मानने के लिए तथा उसकी सेवा में खपा देने के लिए केवल एक व्यावहारिक स्कूल का काम देता है। निःस्वार्थ सेवा की व्यावहारिक शिक्षा भी उसे उसी समय मिलती है। माँ की पुकार सुनकर जिस प्रकार नारी का हृदय उमड़ उठता है और फिर लाख रोकने पर भी स्थिर नहीं रहता। उसी प्रकार नारी का शिक्षित हृदय जिस समय समस्त विश्व की अपनी सन्तान मानकर उसके लिए उमड़ पड़े उसी समय समझना चाहिए कि उसकी शिक्षा पूरी हुई। दूसरे शब्द में स्त्री जीवन की सार्थकता भी तभी पूरी हुई समझना चाहिए।
नारी के रक्त माँस से तथा हृदय से ही समस्त संसार की सृष्टि हुई है। समाज के निर्माण में उसने तिलतिल करके अपने आपको बलिदान किया है। नारी जीवित जागृत यज्ञवेदी है। उसने अभी तक दिया ही दिया है, लेकिन शिक्षा हीन दान और शिक्षा संस्कार युक्त दान में अन्तर है। नारी का धर्म हैं दान देना। अपने इस धर्म को संस्कारवान बनाकर उसे देना है जिससे उसे भी शान्ति मिले और समाज को भी। नारी शिक्षा के अभाव में जहाँ नारी अशान्ति के गड्ढे में पड़ी हुई है वहाँ समाज भी सुखी नहीं है, उलटे वह निरन्तर पतन की ओर ही गिरता चला जा रहा है।
नारी शिक्षा की जिम्मेदारी जितनी उसके माँ-बाप पर है उतनी ही नहीं उससे अधिक ही समझिए पति के ऊपर है। जो जितनी शिक्षा की जिम्मेदारी को पूरा करता है वह उतना ही उसे आश्वस्त एवं सुखी बनाता है।
बुद्धिमान पुरुष रात्रि के पहले और आखिरी पहर में भगवान का ध्यान करता है, भोजन कम करता है और मन को शुद्ध बनाता है। इस तरह वह अपनी आत्मा में ही परमात्मा के दर्शन करता है।
-वशिष्ठ
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शत्रु, ऋण, अग्नि और रोग को कभी थोड़ा नहीं समझना चाहिए, ये बढ़ते ही जाते हैं इसलिए इन्हें कम करने का यत्न करना चाहिए।
(कविराज हरनामदास बी. ए.)
मनुष्य की यह स्वाभाविक ही इच्छा रहती है कि लोग उसे आदर की दृष्टि से देखें और वह जनता में सर्व-प्रिय बने। परन्तु सर्व-प्रिय कोई विरला ही मनुष्य बनता है। बहुत थोड़े मनुष्य जान सकते हैं कि वे सर्वप्रिय हैं भी कि नहीं। बहुत से लोगों को तो भ्रम ही बना रहता है कि वे सर्वप्रिय तथा भद्र पुरुष हैं, परन्तु वास्तव में उन्हें कोई भी पसंद नहीं करता विवशता और लाचारी के बिना कोई उनके पास तक भी नहीं फटकता।
नीचे कुछ प्रश्न दिये जाते हैं, जिनके उत्तर देने से प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है कि वह जनता में सर्वप्रिय है या नहीं। आप भी इन प्रश्नों का उत्तर एक कागज पर लिख कर हिसाब लगाएं तो आपको अपनी सर्वप्रियता का अनुमान सहज ही हो जायगा। आप अपने शुद्ध हृदय से और न्याय पूर्वक अपने नम्बर स्वयं ही निश्चित करके उन्हें गिनें, 120 नम्बरों में से कम से कम 80 नम्बर पाने वाला आदमी सर्वप्रियता की कसौटी पर पूरा उतर सकता है।
यदि इससे कम नम्बर प्राप्त करें तो आप अपने स्वभाव को बदलने के लिये यथा शक्ति प्रयत्न करें। इस प्रकार आप भी कुछ समयान्तर में अधिक नम्बर प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे। यह अपना स्वभाव परखने की एक बढ़िया कसौटी है। इस प्रकार अपने आप को परखते रहने और अपनी भूलों को सुधारते रहने से बहुत ही जल्दी अपने जीवन में एक बड़ा भारी परिवर्तन पायेंगे।
1-क्या आप पर विश्वास किया जा सकता है कि आप जो प्रण करेंगे या वचन देंगे उसे पूरा करके दिखा देंगे ? 2
2-आप हठी तो नहीं हैं ? 2
3-आपको लोग स्वार्थी और अपना काम निकालने वाला तो नहीं समझते ? 3
4-आपको अपने धन अथवा अपनी शक्ति, पदवी, विद्या या अन्य किसी बात का अभिमान तो नहीं ? 3
5-यदि आप पुरुष हैं तो स्त्रियों को देख कर और यदि आप स्त्री हैं तो पुरुषों को देखकर आपके मन में बुरे विचार तो नहीं उठते? 3
6-आप दूसरों से बल प्रयोग करने या उनका हक मार लेने का यत्न तो नहीं करते? 2
7-आप में झूठ बोल कर या चतुराई से अपना स्वार्थ सिद्ध करने का दोष तो नहीं हैं? 3
8-क्या आप क्रोध करने से बचते हैं ? 3
9-क्या आप सादगी को पसंद करते हैं ? आप फैशन के गुलाम तो नहीं? 3
10-आप इधर की बात उधर और उधर की बात इधर तो नहीं किया करते? 2
11-क्या आपके नौकर तथा अन्य सेवक आपको देख कर प्रसन्न होते हैं? या आपको देख कर प्रसन्न होते हैं? या आपको देखकर उनकी दशा ऐसी हो जाती है जैसी बिल्ली को देखकर चूहे की? 2
12-आपकी स्त्री, बच्चे और छोटे भाई-बहन आपके पास बैठ कर प्रसन्न रहते हैं या अप्रसन्न? क्या आप हंसमुख हैं ? 3
13-क्या आप अपना और दूसरों का समय गप्पों में नष्ट करना बुरा समझते हैं? आपको लगातार बातें करते जाने का व्यसन तो नहीं? क्या आप हर समय किसी अच्छे काम में लगे रहते हैं?
14-आपको लोग ‘कोरा बातूनी’ तो नहीं समझते? आपमें बहाना बनाने की आदत तो नहीं? 2
15- क्या आप दूसरों से कुछ माँगने या परिचितों और रिश्तेदारों का एहसान लेने अथवा उनसे रियायतें माँगने को बुरा समझते हैं? 2
16-आप ऋणी (कर्जदार) तो नहीं? 2
17-क्या आप प्रसन्नतापूर्वक दूसरों की सहायता करते हैं? 3
18-क्या आप परिश्रमी और साहसी हैं? सुस्त और सुखप्रिय तो नहीं? 2
19-आपमें अपनी बातों को बढ़ा चढ़ाकर कहने का दोष तो नहीं? 2
20-क्या आप दूसरों के झमेलों में पड़ने से बचे रहते हैं? 2
21-क्या आप नौजवान बहू-बेटियों और बेटों के इस नये युग के परिवर्तित आचार-विचार को सहन करते हैं? 2
22-क्या आप दूसरों को उनके दोष सहानुभूति पूर्व बतलाते हैं?
23-क्या आप दूसरों का सुधार करते समय या अपनी बात मनवाते समय इस बात का विचार रखते हैं कि किसी प्रकार की कटुता उत्पन्न न हो। 2
24-क्या आप लड़ाई-झगड़ों से दूर रहने की कोशिश करते हैं? 2
25-क्या आप इस सिद्धान्त के पक्षपाती हैं कि ‘बराबर से ही कीजिये प्रीति ब्याह ओर बैर’। 2
26-किसी विषय पर वाद-विवाद करने से कई बार आपस में द्वेष उत्पन्न हो जाता है। इसलिए क्या आप वाद-विवाद से बचने का यत्न करते हैं। 2
27-आप ऐसी ठट्ठा करने के दोषी तो नहीं हैं कि जिस से दूसरे दुःखी हों या सुनने वाले आपको उच्छृंखल तथा घटिया विचारों वाला समझें? 2
28-क्या आप सूर्य निकलने से एक दो घंटे पहले उठते हैं? 2
29-क्या आपमें अपने मन की बात कह देने का साहस है? क्या आप में बुराई का सामना करने की शक्ति है? 3
30-आपमें दूसरों की खुशामद या झोली उठाने का अथवा हाँ में हाँ मिलाने का दोष तो नहीं? 2
31-आपमें किसी मनुष्य की पीठ पीछे बुराई करने या सुनने का व्यसन तो नहीं? 3
32-क्या आप अपने दुःख की कथा ऐसे मनुष्यों के सामने कहने में संकोच करते हैं जो वास्तव में आपकी कोई सहायता कर ही नहीं सकते? 2
33-आप किसी सभा में ऐसे स्थान पर तो नहीं बैठते जो स्थान आपकी योग्यता के उपयुक्त न हो या जहाँ पर आपका बैठना दूसरों को खटकता हो? 2
34-क्या आप हमेशा अपने कपड़े साफ-सुथरे रखते हैं? 2
35-आपको लोग कंजूस तो नहीं समझते? 2
36-क्या आप दूसरों को रुपया उधार देते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि रुपया भी जाय और सम्बन्ध भी टूट जाय ? या फिर केवल इतना उधार देते हैं कि यदि वापिस न मिले तो आपको रंज न हो। 2
37-आप तम्बाकू तो नहीं पीते? 3
38-आप शराब तो नहीं पीते? 3
39-क्या आप प्रत्येक प्रकार के जूए से दूर भागते हैं? 3
40-आप ताश शतरंज इत्यादि खेलने में अपना समय नष्ट तो नहीं करते ? 2
41-क्या आप प्रति दिन अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं।
42- क्या आप प्रतिदिन भ्रमण कर व्यायाम करते हैं और अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखते हैं? 2
43-आपको चटोरेपन का चसका तो नहीं? 2
44-क्या आप इस बात का ध्यान रखते हैं कि आप के जीवन में कोई दिन ऐसा व्यतीत न हो जिस दिन आपने किसी की भलाई न की हो? 2
45-क्या आप अपने माता-पिता को प्रसन्न रखते हैं।
46-क्या आप अपनी सन्तान की शिक्षा सम्बन्धी, धार्मिक और चरित्र की उन्नति का विशेष ध्यान रखते हैं?
47-क्या आप अपने कार्य व्यापार खेती नौकरी आदि में सफल हैं? 2
48-क्या आप प्रतिदिन जगत पिता परमात्मा का अपने धर्म और सिद्धान्त के अनुसार ध्यान और पूजन करते हैं और उसके अनुकूल आचरण करते हैं? 3
49-क्या आप अपने पड़ोसियों के साथ आदर और प्रेम का व्यवहार करते हैं? 3
50-क्या आप सदैव अपने देश और जाति की भलाई के लिए कुछ समय देते हैं? 3
51-क्या आप प्रतिमास अपनी आय में से कम से कम चार प्रतिशत दान करते हैं? 2
52-आप दूसरे धर्म और जाति वालों से घृणा तो नहीं करते? 2
अमेरिका में कार्नस विश्वविद्यालय के विख्यात डॉक्टर मैके ‘भोजन और अधिक जीने’ के विषय पर आठ वर्ष से प्रयोग कर रहे थे। इन प्रयोगों के फलस्वरूप डॉक्टर साहब इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि भूखे रहने वाले अधिक समय तक जीयेंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि ये एक दम बिल्कुल खाना ही बंद कर दें। खाये तो लेकिन पेट भर कर न खायें। वह भोजन जिसमें शरीर के लिये आवश्यक पदार्थ तो सब हों किन्तु भोजन की मात्रा कम होनी चाहिए। कम खाने से तुम पतले तो हो जाओगे-बहुत पतले नहीं-किन्तु यह पतला होना तुम्हारे जीवन-काल को बढ़ा देगा। यह प्रयोगशाला में 2,500 सफेद चूहों पर किया था। क्योंकि चूहों पर भोजन का प्रभाव मनुष्यों के समान ही होता है इसलिये प्रयोग के लिये इनको चुना गया था। चूहे के जीवन के दस दिन मनुष्य के जीवन के एक वर्ष के समय के समान समझने चाहियें।
सब चूहों को खाने के लिये एक से ही भोज्य पदार्थ दिये गए थे। उनको खाने के लिये के तीन, अनाज का श्वेतसार, काड मछली के यकृत का तेल, खमीर, चीनी, चावल, अल्प घास के पत्तों से बना भोजन, यकृत और कुछ फालतू भाग जैसे पिसी हुई हरिद्रा मिला हुआ भोजन दिया गया था। जिन चूहों को भूख से आधा भोजन मिलता था वे अधिक समय तक जीवित रहे, किन्तु उनके भूखे रहने के कारण उनकी शारीरिक शक्ति क्षीण हो गई थी। उनके रक्त में श्वेत अणु कम हो गए थे तथा उनके हृदय की धड़कन 400 के स्थान पर 300 रह गई थी। इस प्रकार उनका जीवन धीरे-धीरे चलता है जिसके कारण आयु बढ़ जाती है। किन्तु उनका मस्तिष्क उस समय में अधिक कार्य करता था। शरीर की कार्य करने की शक्ति कम हो गई थी किन्तु मस्तिष्क की कार्य करने की शक्ति में वृद्धि हो गई थी।
एक प्रयोग में 200 चूहों को चार 50-50 के समूह में रखा गया। ये सबके सब चूहे एक ही कमरे में और एक ही परिस्थिति में रखे गए थे सबको खाने की चीजें भी एक सी दी गई थी। यह भोजन शरीर के लिये आवश्यक पदार्थों से तो पूर्ण था किन्तु मात्रा में कम दिया जाता था। ये चूहे प्रयोग के प्रारम्भ होने के समय ढलती उम्र के अर्थात् उस अवस्था के थे जिस अवस्था के 40 वर्ष के मनुष्य होते हैं। क्या इन चूहों को आधे पेट भोजन दिया जाता इसलिए ये भूखे रह जाते हैं इस भूख को पूरा करने के लिए इनको केवल एक भोज्य पदार्थ दिया गया। एक समूह को एक भोज्य पदार्थ दिया गया। तो दूसरे को और कोई तीसरा। चूहों के एक समूह को भूख पूरी करने के लिए जो भोजन दिया गया वह केवल चीनी थी, दूसरे समूह के लिए श्वेत सार था, तीसरे समूह के लिए दूध का चूर्ण था और चौथे समूह के लिए यकृत था। चूहों के एक समूह को भूख पूरी करने के लिए जो भोजन दिया गया वह केवल चीनी थी, दूसरे समूह के लिए श्वेतसार था, तीसरे समूह के लिए दूध का चूर्ण था और चौथे समूह के लिए यकृत था।
इस प्रकार का भोजन इसलिए दिया गया था कि जिससे यह मालूम हो सके कि किस प्रकार के भोजन से अधिक दिन जीवित रहा जा सकता है और किस प्रकार के भोजन से जल्दी मृत्यु हो जाती है। क्योंकि जो चूहे अधिक दिन जीवित रहते उनका भोजन अधिक दिन जीवित रहने के लिये अच्छा होता और जो चूहे शीघ्र मर जाते वह भोजन हानिकारक होता, किंतु इन दोनों में से एक भी बात न हुई। प्रायः सभी चूहे बराबर दिनों तक जीवित रहे। इसके अतिरिक्त इस प्रकार भर पेट भोजन देने के कारण सब चूहे जल्दी मर गए। जिन चूहों को आवश्यक पदार्थों से पूर्ण भोजन कम मात्रा में दिया गया था और फिर पेट भरने के लिये कोई दूसरा पदार्थ जैसे चीनी, स्टार्च इत्यादि नहीं दिया गया था वे चूहे अधिक दिन जीवित रहे। इससे यह सिद्ध हुआ कि अधिक भोजन चाहे वह कुछ भी क्यों न हो हमेशा आयु को कम करता है।
इस प्रयोग के फलस्वरूप एक बात और भी हुई। जिन चूहों को पेट भरने के लिए बाकी खाना दूध का चूर्ण और यकृत दिया गया था वे अधिक दिनों तक बच्चे पैदा कर सकते थे। जिन चूहों को पेट भरने के लिए चीनी और स्टार्च (श्वेतसार) दिया गया था वे इन चूहों से केवल सीधे दिनों तक बच्चे पैदा करने के योग्य रहे थे। दूध चूर्ण और यकृत खाने वाले चूहे 600 दिन तक बच्चे पैदा कर सकते थे किन्तु चीनी और स्टार्च खाने वाले केवल 300 दिन तक ही बच्चे देने योग्य रहे।
इन प्रयोगों के फलस्वरूप और भी बहुत से प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो सका है, क्या प्रोटीन वाले भोजन आयुवर्द्धक हैं। क्या फालतू भोजन जैसे छिद्रोज अधिक दिन जीवित रहने में सहायक है ? क्या व्यायाम का भी कुछ प्रभाव पड़ता है ?
आठ वर्षों तक प्रयोग करने के पश्चात् डॉ. मैके ने बताया कि अधिक प्रोटीन या कम प्रोटीन वाले भोजनों का आयुवर्द्धन या आयु कम करने पर कोई प्रभाव होता नहीं देखा गया। इससे पहले वैज्ञानिकों का मत था कि अधिक प्रोटीन वाले भोजन जैसे माँस जीवन को कम कर देते है। डॉ. मैके के अनुसार व्यायाम का आयुवर्द्धन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। प्रयोगशाला में 65 मन भोजन में जो चूहों का प्रतिवर्ष दिया जाता था, फालतू पदार्थ-ब्रैन और गोल-छिद्रोज के रूप में भिन्न-भिन्न मात्रा में मिलाकर दिया गया इस प्रकार की मिलावट से चूहों की आयु पर कोई विशेष प्रभाव नहीं मालूम हो सका।
डॉ. मैके से एक प्रश्न पूछा जाता था कि यदि भूखे रहने से मनुष्य अधिक दिनों तक जीवित रहता है तो चीन निवासी जिनका भोजन ऐसा है कि वे सदा भूखे ही रहते हैं, संसार की अन्य जातियों के मनुष्यों से अधिक समय तक क्यों नहीं जीवित रहते ? इसका उत्तर यह है कि चीन निवासियों के भोजन में शरीरवर्द्धन के लिए आवश्यक सब पदार्थ मौजूद नहीं होते हैं। प्रयोगशाला के चूहों को भोजन तो भर पेट से कम दिया गया किन्तु उनके भोजन में शरीर के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सब पदार्थ मौजूद थे। जब इन चूहों को भरपेट से आधा भोजन दिया गया था शरीर से ये कमजोर हो गए थे किन्तु जीवित अधिक दिनों तक रहे। यदि 800 दिन या 1000 दिन तक के बाद भी - वह चूहों की आयु मनुष्यों की 80 या 100 वर्ष की आयु के समान है - इन चूहों को पूरा भरपेट भोजन दिया जाय तो वे शरीर से वैसे ही मोटे हो जाते हैं जैसे भरपेट भोजन खाने वाले चूहे रहते हैं। इस प्रयोगशाला में एक चूहा 1,460 दिन तक जीवित रहा। यदि इस अनुपात से आदमी जीवित रहे तो उसकी आयु 153 वर्ष की होगी।
डॉ. मैके की खोजों का अमेरिका में बड़ा स्वागत हुआ है। एक संस्थान ने उन्हें प्रयोग जारी रखने के लिए 160,000) रुपये प्रदान किये हैं।
उनके प्रयोगों का फल थोड़े में इस प्रकार कहा जा सकता है-
“पहले वह भोजन खाओ जो खाना आवश्यक है, फिर वह जो तुम्हें रुचता है - किन्तु कभी भी अति मत करो। “ -विज्ञान से
ईश्वर की अनेक शक्तियाँ हैं। उनमें से कितनी ही रचनात्मक और कितनी ही विनाशात्मक हैं। जिन विनाशात्मक शक्तियों के द्वारा युद्ध, महामारी, भूकम्प, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बीमारी, मृत्यु, विस्फोट संघर्ष हानिकारक जीवों की उत्पत्ति आदि होती हैं वे मनुष्यों के लिए अरुचिकर एवं दुखदायक होती है। सृष्टा का प्रयोजन चाहे कितना ही महान क्यों न हो पर उन ईश्वरीय शक्तियों से मनुष्य घबराता है और चाहता है कि वे जितनी दूर रह सकें उतना ही अच्छा है।
ईश्वर की कुछ शक्तियाँ ऐसी हैं जिनके द्वारा मनुष्य जाति को अतीव आनन्द और सन्तोष होता है। अन्न, दूध, फल, जल, रस, वनस्पति, रत्न, धातु आदि की वृद्धि करने वाली ईश्वरीय शक्तियाँ सबको पसंद है। आरोग्य, बल, श्री, समृद्धि, निर्विघ्नता, एवं सुख शान्तिमय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाली देवी शक्तियों की सभी सत्ता को सब लोग चाहते हैं। योग साधना, पूजा, उपासना, यज्ञ, तप आदि का प्रयोजन यह होता है कि व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयत्नों द्वारा उन ईश्वरीय शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त किया जाय जो मनुष्य के लिए हितकर, लाभदायक एवं आनन्दप्रद हैं।
धरती माता के गर्भ में अनेक प्रकार की हानिकारक और लाभदायक वस्तुएं भरी पड़ी हैं। जो जिस वस्तु को जितने पुरुषार्थ से लेना चाहता है प्रसन्नता पूर्वक ले लेता है। हाथी दिन भर में मन पत्ते खाता है बकरी को पाँच सेर काफी रहता है। धरती पर वनस्पति का अपार भंडार भरा पड़ा है हाथी अपने पुरुषार्थ के अनुरूप और बकरी अपने पुरुषार्थ के अनुरूप पदार्थ हजार जन्मों तक लेते रहें तो भी धरती माता को कोई हानि या आपत्ति कभी नहीं हो सकती। इसी प्रकार ईश्वर के महान शक्ति भंडार में अकूत वैभव श्री भरी पड़ी है। जो चाहे अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ से जिस वस्तु को चाहे, जिस शक्ति को चाहे जितनी मात्रा में ले सकता है। ईश्वर की उपयोगी, लाभदायक, आनन्दप्रिय शक्तियों को यदि हम चाहें तो व्यक्तिगत प्रयत्न द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए और सामूहिक प्रयत्न द्वारा सामूहिक लाभ के लिए प्राप्त कर सकते हैं। हमारे प्रयत्न और पुरुषार्थ को देख कर परमपिता और अधिक प्रसन्न होता है तथा हमें सफलता का पुरस्कार देने में अधिक उदारता एवं उत्साह दिखाता है।
मनुष्य के लिए लाभदायक ईश्वरीय शक्तियों में गायत्री शक्ति का स्थान सर्वोपरि है। यह मानव प्राणी की इच्छा, अभिलाषा, उन्नति, आवश्यकता, समृद्धि, सुरक्षा एवं शान्ति को पूरा करने में इतनी अधिक सक्षम है कि सूक्ष्मदर्शी, आत्मविद्या के पारंगत ऋषि मुनियों ने उसको अधिकाधिक मात्रा में ग्रहण करना, नित्य उसके संपर्क में रहना एक अत्यन्त आवश्यक कर्त्तव्य बताया है। शास्त्रों में वर्णन है कि जो गायत्री को नहीं जानता वह शूद्र है। शूद्र को निन्दित और बहिष्कृत ठहराने का अर्थ यही है कि गायत्री, को त्यागने की हानि उठाने की भूल करने वाला सामाजिक बहिष्कार का दंड भुगते।
अन्य बातों में शास्त्र तथा ऋषियों के बीच मतभेद रहे हैं पर गायत्री के संबंध में सभी शास्त्र तथा ऋषि मुनि एक मत हैं नित्य की उपासना में सबने गायत्री को प्रमुख स्थान दिया है। उपासना क्या है। उपासना एक ऐसी वैज्ञानिक विधि को कहते हैं जिसके द्वारा अपने शरीर और मन में निवास करने वाली अनेक प्रसुप्त शक्तियों का जागरण एवं एकीकरण करके उनकी आकर्षण शक्ति द्वारा ईश्वरीय शक्ति भंडार में से किसी विशेष शक्ति को खींच लाया जाय।
अध्यात्म विज्ञान वेत्ताओं ने शरीर और मन के अंतर्गत रहने वाले अनेक कोषों, प्रत्यावर्तनों, चक्रों, घटकों, ग्रन्थियों आवरणों भूमिकाओं, मातृकाओं एवं संधियों की भारी शोध करने के पश्चात गायत्री साधना की महत्वपूर्ण प्रक्रिया का निर्माण किया है। इस साधना द्वारा कुछ ऐसी सुप्त शक्ति ग्रंथियाँ जागृत हो जाती हैं जिनके चुम्बकत्व द्वारा ईश्वरीय महाशक्ति भण्डार से मंगलमयी गायत्री शक्ति प्रचर मात्रा में साधक के पास एकत्रित हो जाती है। इस शक्ति द्वारा वह अनेकों प्रकार के भौतिक और आत्मिक लाभ प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
सृष्टि के आदि से लेकर अब तक असंख्य विज्ञ पुरुषों ने गायत्री की साधना की है और इन सभी ने आशातीत लाभ उठाया है। समस्त ऋषि-मुनि एक स्वर से गायत्री की महिमा गान करते हैं, समस्त धर्म शास्त्रों में गायत्री की गुणगरिमा भरी पड़ी है। अनेक साधकों को जो लाभ हुए हैं उनका संक्षिप्त सा वर्णन “गायत्री ही कामधेनु है।” पुस्तक में किया जा चुका है। हमारा अपना दीर्घ कालीन अनुभव इस संबंध में है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि-गायत्री ही भूलोक की कामधेनु है। यही मन्त्र पृथ्वी का कल्पवृक्ष है। लोहे को स्वर्ण बनाने वाली तुच्छ को महान बनाने वाली पारस मणि गायत्री ही है। यह वह अमृत निर्झरिणी है जिसका आचमन करने वाले को परम तृप्ति और अगाध शान्ति प्राप्त होती है। गायत्री की आध्यात्मिक ज्ञान गंगा में स्नान करके मनुष्य अनेक प्रकार के पाप-तापों से छुटकारा पा सकता हैं। हमारा सुदृढ़ विश्वास है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। प्रारब्ध वश प्रधान कामना पूरा न हो तो भी अनेकों अन्य प्रकारों से आपत्तियों की निवृत्ति और सम्पत्तियों की प्राप्ति होती है। इन्हीं सब आत्मिक और भौतिक लाभों के कारण गायत्री को माता की उपमा दी जाती है मातृभाव से गायत्री की पूजा की जाती है।
छोटे और बड़े साधन अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार किये जाते हैं। नित्य की दैनिक उपासना माता का नित्य दूध पीने के समान, नित्य व्यायाम करके शरीर पुष्ट करने के समान नित्य कर्म है। उसमें भूल नहीं करनी, चाहिए। साथ ही कभी कभी विशेष शक्ति का उपार्जन एवं संचय का आयोजन करने के लिए विशेष साधन भी करने चाहिए। अपनी निष्ठा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, अवकाश, मानसिक स्थिति आदि का ध्यान रखते हुए छोटे या बड़े साधन किये जाते हैं। कोई विशेष कार्य माता से कराना होता है तो बालक विशेष मनोयोग विशेष भावनाओं के साथ माता से प्रार्थना करता है ऐसी ही विशेष प्रार्थना जब गायत्री माता से की जाती है तो उसे अनुष्ठान या पुरश्चरण कहते हैं। जैसे प्रत्येक मनुष्य नित्य के साधारण कार्यक्रम में परिवर्तन करके कभी कभी यात्रा, पर्यटन, उत्सव, त्यौहार, आदि का विशेष आयोजन उत्साह पूर्वक करते हैं वैसे ही समय पर विशेष साधना करने की भी आवश्यकता है। यह विशेष रूप से किया गया आत्मबल का संचय, विशेष संचित पूँजी की तरह जमा रहता है और किसी विशेष अवसर पर दैवी वरदान की तरह बड़ी महत्व पूर्ण सहायता देता है।
अनुष्ठान कैसे करें?
गायत्री का पूर्ण पुरश्चरण 24 लक्ष जप का होता है जो प्रायः एक वर्ष में पूरा होता है। इससे छोटा एक मध्यम पुरश्चरण है जो सवालक्ष जप का होता है और चालीस दिन में पूरा होता है। कोई-कोई इसे एक मास में भी कर लेते हैं। सब में छोटा अनुष्ठान 24 हजार का है यह 9 दिन में पूरा हो जाता है। चौबीस लक्षण और सवालक्ष की साधना के बारे में फिर कभी लिखेंगे इस अंक में सबसे छोटे 24 हजार के साधन के संबंध में लिख रहे हैं।
जेष्ठ सुदी 10 को गंगादशहरा है। यह गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इसी महापर्व के दिन विश्वामित्र ऋषि ने गायत्री का महाविज्ञान मनुष्यों के सम्मुख प्रकट किया था और इसी दिन भागीरथ ने पुण्य श्लोका गंगा का अवतरण लोक में किया था। जैसे आश्विन और चैत्र की ऋतु संध्याएं -नवदुर्गाएं -गायत्री साधना के लिए उपयुक्त अवसर हैं वैसे ही जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक 24 हजार जप पूरे कर लेने चाहिए और गायत्री जयन्ती-गंगादशहरा-के दिन पूर्णाहुति का हवन एवं ब्रह्मदान करना चाहिए।
नौ दिन में 24 हजार जप पूरे किये जाये जो प्रति दिन करीब 2667 मंत्र जपने होते है मात्रा में 108 दाने होने से 24 मालाएं प्रति दिन जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। इतने मन्त्र जपने में करीब 2 घन्टे लगते हैं। आजकल गर्मियों के दिनों में प्रातःकाल शौच स्नान से निवृत्त होकर 4 बजे साधना पर बैठ जाना कुछ कठिन नहीं हैं। 7 बजे जप पूरा हो जाता है। जिन्हें प्रातःकाल जल्दी ही कोई काम करना हो वे 1 घन्टे सवेरे 1 घन्टा शाम को अपना समय विभाजित कर सकते हैं।
साधना आरंभ करने से पूर्व किसी सुयोग्य गायत्री उपासक को पथ प्रदर्शक आचार्य नियुक्त कर लेना चाहिए। उसके संरक्षण पथ प्रदर्शन के साधन करना उचित होता है। गायत्री को माता, आचार्य को पिता, मानकर आत्मोन्नति के व्रत का प्रतीक यज्ञोपवीत कंधे पर धारण करके साधना करनी चाहिए। अनियंत्रित, मनमानी, अविधिपूर्वक की हुई ऊटपटाँग साधना प्रायः निष्फल रहती है।
शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करके साधना के लिए कुश के या खजूर बेत आदि वनस्पतियों से बने आसन पर बैठना चाहिए। मुख प्रातःकाल पूर्व को, सायंकाल 2 घन्टे सूर्योदय से पूर्व और शाम को सूर्यास्त के 1 घन्टे पश्चात् इन तीन घन्टों को छोड़ कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री जप नहीं करना चाहिए। पालथी मार कर बैठें रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। खुली हवा का एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिए। यदि बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो तो कपड़े से माला को ढक लेना चाहिए या गौमुखी में हाथ डाल लेना चाहिए।
माला चन्दन या तुलसी की लेनी चाहिए। तर्जनी उंगली से जप के समय माला का स्पर्श नहीं करना चाहिए। बीच का बड़ा दाना (सुमेरु) उल्लंघन नहीं करना चाहिए। माला पूरी हो जाने पर उसे पीछे को ही लौटा लेना चाहिए। जहाँ माला न हो वहाँ उंगलियों के पौरों से भी जप की गणना की जा सकती है। जप इस प्रकार करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होती रहे होठ हिलते रहें पर पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को न सुन सके। जो ब्रह्म संध्या की विधि जानते हैं वे पहले ब्रह्म संध्या करके तब जप आरंभ करें जो नहीं जानते हैं वे उसे छोड़ दे और गायत्री और गुरु का ध्यान एवं पूजन करके जप आरम्भ कर दें।
अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य में रहना आवश्यक है। बीच में स्वप्न दोष हो जाय तो उसके प्रायश्चित्य स्वरूप एक माला अधिक जप लें। सिर के बाल नहीं कटाने चाहिए। ठोड़ी की हजामत अपने हाथ से बनाई जा सकती है। चारपाई या पलंग त्याग कर तख्त या जमीन पर सोना चाहिए। आहार-विहार सात्विक रखें। अपने शरीर और वस्त्रों को जहाँ तक हो सके कम ही स्पर्श होने देना चाहिए। अनुष्ठान के दिनों में एक समय अन्नाहार एक समय दूध फल इस प्रकार का अर्ध उपवास चल सके तो और भी उत्तम है।
जप के समय हृदय या मस्तक से ज्योतिर्मयी गायत्री का भक्ति भावपूर्वक ध्यान करते चलना चाहिए। जप पूरा हो जाने पर कम से कम 108 आहुतियों का हवन करना चाहिए, हवन बिना किसी पंडित आदि की सहायता के स्वयं भी किया जा सकता है। अकेले करना हो तो घी और सामग्री दोनों वस्तुएं मिला लेनी चाहिए। कई व्यक्ति शामिल होकर करें तो एक घी ले लें अन्य लोग सामग्री ले लें। गायत्री मन्त्र से ही आहुति डाले। प्रति आहुति में कम से कम 3 मासे सामग्री तथा 1 मासे घी होना चाहिए इस प्रकार हवन में कम से कम 6 छटाँक सामग्री और 2 छटाँक घी अवश्य होना चाहिए। पूर्णाहुति में मेवों मिष्ठान्नों की विशेष आहुति अन्त में देनी चाहिए यज्ञ की भस्म को किसी पवित्र स्थान में विसर्जित कर दें।
शास्त्रों में उल्लेख है कि बिना दान का यज्ञ निष्फल होता है। इसलिए अनुष्ठान के अन्त में कुछ न कुछ दान करना आवश्यक है। ब्रह्मभोज, गुरु पूजा, दक्षिणा, महाप्रसाद विवरण आदि अनेक प्रकार से अपनी श्रद्धा और सामर्थ्यानुसार दान किया जा सकता है। इनमें एक अच्छा सस्ता और सर्वोत्तम सुपरिणाम उत्पन्न करने वाला दान यह है कि गायत्री साहित्य का सत्पात्रों को दान किया जाय, जिनमें साधना की ओर प्रवृत्ति है वे चाहे ब्राह्मण हों या अब्राह्मण ऐसे ब्रह्मदान के अधिकारी है। (1) गायत्री ही कामधेनु है (2) वेद−शास्त्रों का निचोड़ गायत्री (3) गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएं, यह छह-छह आने मूल्य की हमारी सस्ती पुस्तकें इस प्रकार के दान के लिए बहुत ही उपयुक्त है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 24 या कम से कम 14 पुस्तकें सत्पात्रों का दान करने से अनुष्ठान के अन्त में ब्रह्मदान का उद्देश्य भली प्रकार पूरी हो जाता है। किसी के शरीर को भोजन करा देने की अपेक्षा उसको कल्याण के आनन्द मय मार्ग पर ले जाने वाला ज्ञान-दान देना अधिक महत्व पूर्ण है।
अनुष्ठान प्रत्यक्ष धर्म है। इसका परिणाम तुरन्त दिखाई देता है। इससे अधिक फलदायिनी, नास्तिकों को आस्तिक बनाने वाली साधना दूसरी नहीं हैं। जिन्हें श्रद्धा न हो वे परीक्षा के तौर पर एक छोटा अनुष्ठान करके देखें। इससे उन्हें सन्तोष जनक परिणाम की प्राप्ति होगी।
निर्धन होकर बहुत की कामना करना और बल हीन होकर क्रोध करना शरीर को सुखा देने वाले दो काँटे हैं।
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उदार होना, दृढ़ रहना, बड़ों का मान करना और मीठे वचन बोलना सर्वप्रिय बनने के साधन है।
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राग,द्वेष, मोह, हर्ष, शोक, अभिमान, क्रोध और आलस्य अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। इसलिए इन्हें छोड़ना चाहिए। - भीष्म
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जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने अन्दर समेट लेता है, वैसे ही इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच लेने पर मनुष्य की बुद्धि स्थिर हो जाती हैं *****
काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरक के दरवाजे हैं। ये आत्मा का नाश करने वाले है इसलिए इनसे बचना चाहिए।
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संसार में यज्ञ, दान और तप ये तीनों ही ऐसे कर्म हैं जिनके करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है। इसलिए इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। - गीता
(प. मदनमोहनजी विद्याधर)
(1) विद्वान् लोग प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करके जिस प्रकार स्वयं परम गुणमय, सुखदायक, विद्यानन्द का उपयोग करते हैं, उसी प्रकार वे दूसरों को भी उसका अनुभव कराते हैं। विद्वानों को चाहियें कि अपने सत्य, उपदेश, विद्या, धर्म और आनन्द से प्रजा को भी लाभ पहुँचाएं।
(2) राजा तथा अन्य सब मनुष्यों को उचित है कि मृगया एवं मद्यपानादि दुष्कर्मों में न फंसे तथा दुर्व्यसनों से दूर रहकर धर्मयुक्त गुण, कर्म और स्वभावों में बर्तते हुए सदा अच्छे काम किया करें।
(3) वे ही लोग धन्यवाद के पात्र एवं कृतकृत्य हैं, जो ब्रह्मचर्य, उत्तम शिक्षा और विद्या के द्वारा अपनी सन्तानों के शारीरिक तथा आत्मिक बल को पूर्णतया बढ़ाते हैं, जिससे कि वे माता, पिता, पति, सास, ससुर, राजा, प्रजा, पड़ोसी, दुष्ट-मित्र एवं अपनी सन्तानों के साथ यथायोग्य धर्मानुकूल व्यवहार करने में समर्थ होते हैं।
(4) सब मनुष्यों को सर्वदा सच्चे, मीठे, कल्याणकारी और प्रिय वचन बोलने चाहिये। उन्हें यह निश्चय कर लेना चाहियें कि उनकी जानकारी में जो बात जैसी हो, वे उसे जीभ से उसी प्रकार प्रकाशित करें, उससे विपरीत नहीं। सब लोगों को अपनी ही वस्तु को अपनी बतानी चाहिये, दूसरों की चीज को नहीं। अर्थात् उन्हें धर्मानुकूल पुरुषार्थ से जितना प्राप्त हुआ है, उतने ही में सन्तोष रखें। सब दिन सुगन्धादि द्रव्यों का अच्छी प्रकार संस्कार कर उन्हें सारे जगत के उपकार के लिये होम किया करें तथा मिथ्या वादकों को छोड़कर सत्य ही भाषण करें।
(5) प्रत्येक को केवल अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहियें।
(6) सच तो यह है कि इस अनिश्चित एवं क्षणभंगुर जीवन में परायी हानि करके लाभ से स्वयं वंचित रहना और दूसरों को भी रखना मनुष्यता के विरुद्ध है।
(7) जो यथार्थ वक्ता, धर्मात्मा और सबके सुख के लिये प्रयत्न करता है, उसी को मैं आप्त समझता हूँ।
(8) जो छलादि दोषों से रहित धर्मात्मा, विद्वान् और सत्य का उपदेश करने वाला पुरुष सब पर कृपादृष्टि करके अविद्यान्धकारकों को निवृत्त कर अज्ञानी लोगों की आत्माओं में सर्वदा विद्या रूपी सूर्य को प्रकाश करे उसे आप्त कहते हैं।
(9) जिससे सब लोगों के दुराचार और दुःख दूर हों तथा श्रेष्ठ आचरण एवं सुख की वृद्धि हो, ऐसे कर्म को मैं परोपकार कहता हूँ।
(10) वे मनुष्य परम धन्य हैं, जो अपने ही समान दूसरे लोगों के सुख में सुख और दुःख में दुःख का अनुभव कर धार्मिकता को कभी नहीं छोड़ते।
(11) जितने मनुष्येत्तर प्राणी हैं, उनमें दो प्रकार का स्वभाव देखा जाता है -बलवान से डरना और निर्बल को डराना तथा उसे पीड़ा देकर अर्थात् उसके प्राण तक निकाल कर अपना मतलब साध लेना। जिस मनुष्य का ऐसा ही स्वभाव है, उसे तो इन्हीं में गिनना उचित है। मनुष्य का निजी गुण तो निर्बलों पर दया करना तथा उन्हें पीड़ा देने वाले अधर्मी बलवानों से तनिक भी भय या शंका न करके उन्हें उस दुष्कर्म से हटाकर तन-मन-धन से सर्वदा निर्बलों की रक्षा करना है।
निर्गुणेधषि सर्वेषु दयाँ कुर्वन्ति साधवः।
नहि संहरते ज्योत्सनाँ चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः॥
गुणहीन प्राणियों पर भी सज्जन दया ही किया करते हैं। चन्द्रमा चाँडाल के घर पर से अपनी चाँदनी हटा नहीं लेता।
यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाध्यस्तत्रालधीरषि।
निरस्तपादपे देशे एरण्डोपिद्रु भायते॥
जहाँ विद्यावान् मनुष्य नहीं होता, वहाँ थोड़ी बुद्धि वाला भी सराहा जाता है। जहाँ पेड़ नहीं होते वहाँ एरंड ही पेड़ मान लिया जाता है।
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स वान्धकः॥
उत्सव में, व्यसन में, दुर्भिक्षम में, गदर के समय, कचहरी में और श्मशान में जो साथ है, वही बान्धव है
रहस्य भेदो याञ्चा च नैष्ठुर्य चलचित्तता।
क्रोधा निःसत्यता द्यू तमेतन्मित्रस्य दूषणम्॥
मित्र में यह दोष न होने चाहिए-गुप्त बातों का प्रकट करना, माँगना, कठोरता, चित्त की चपलता, क्रोध, असत्य ओर जुआ खेलना।
प्रनस्यन्यत्वचस्यन्यत्क मएयन्यद् दुरात्मनाम्।
मनस्येकं वचस्यकं कर्मण्यक महात्मनाम्॥
दुरात्मा लोगों के मन में कुछ, वाणी में कुछ, कर्मों में कुछ ओर ही होता है। पर महात्माओं के मन में, वाणी में और कम में एक ही बात होती है।
अर्थनाशं मनस्तापं गृह दुश्चारतानि च।
यश्चन चापमानं च मातमात्र प्रकाशयंत्॥
धन का नाश, मन का दुःख, घर के दुःश्चरित, ठगी और अपमान की बातें बुद्धिमान किसी से न कहे।
कःकालः कानि मित्राणि को देशःकौ व्ययागमौं।
को वाष्द्वं का च में शक्तिरिति चित्यंमुर्ह्मुहुः॥
क्या समय है, कौन मित्र है, कौन सा देश है, आय-व्यय कैसे हैं, मैं कौन हूँ और मेरी शक्ति कितनी है ? ये बातें मनुष्य को बार-बार सोचनी चाहिएं।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
हमे संसंविते येन सफलं तस्य जीवनम्॥
माता और जन्मभूमि ये दोनों स्वर्ग से भी बड़ी हैं। जिसने इन दोनों की सेवा कर ली, उसका जन्म सफल हो गया।
कुप्रामवासः कुजनस्य सेवा
कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या
मूर्खश्च पुत्रों विधवा च कन्या
विनाग्निना संदडते शरीरम्॥
बुरे गाँव का वास, बुरे आदमी की सेवा, बुरा भोजन, क्रोध वाली स्त्री, मूर्ख पुत्र और विधवा कन्या ये सब आग बिना ही शरीर को भस्म करते हैं।
घनिनोष्पि निरुन्मादा युवानोपि न चंचलाः। प्रभवःष्ध्यप्रमप्ताभ्तें महामहिमशालिनः॥
बड़ी महिमा वाले उत्तम पुरुष धनी होने पर उन्मत्त, युवावस्था में चंचल और प्रभुता पाने पर प्रमादी नहीं होते।
अपुत्रस्य गृहं शून्यं सन्मित्र रहितस्य च।
मूर्खस्य च दिशः शून्याः सर्वशून्या दरिद्रता॥
पुत्र और सन्मित्र के बिना घर सूना है मुख की सब दिशायें सूनी है और दरिद्रता सब से सूनी है।
बज्रादपि कठोराणि मृदूणि कुसुमादी॥
उत्तम पुरुषों का हृदय वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल होता है। उसे नचाने में समर्थ कौन है?
(श्री हरिकृष्णजी प्रेमी)
बन-बन में, औ कण-कण पर, इन चरणों के भी नीचे।
जाने किस-किसने कब कब, है निर्मल आँसू सींचे॥
जग कुचल-कुचल कर उनको, चलता है आँखें मीचे।
अवकाश किसे है उनकी तसवीर बैठ कर खींचे।
जिस हरियाली झुटमुट में कर रखी तरु ने छाया।
जाने उस के प्राणों में किस समता की है माया॥
उस सूने बन में किसने करुणा का दीप बुलाया?
किसने जग की आँखों से है अपना रूप छिपाया?
सूनी समाधि के ऊपर वह कौन अकेली रोती।
उज्ज्वल करने को किसकी स्मृति-रेखा हग से धोती?
तब रहे भूमि के नीचे कितने ‘प्राणों से प्यारे!
कितने ही महल मिले हैं रज में, अभाग्य के मारे॥
परिवर्तन के मनमाने भूचाल अचानक आकर।
चल दत हैं, चुपके से गिरि-शृंगों तक को ढाकर॥
यह समय-सिंधु अनजाने भीषण तूफान उठा कर।
गंभीर शाँत बन जाता कितने ही पोत डुबा कर॥
है मौन शून्य के उर में जाने किन-किन के गाने?
किसने दुनिया-दुनिया के अन्तर के स्वर पहचाने?
टूटे पत्तों से उड़ते फिरते कितने दीवाने।
कितनी ही वीणाओं में हैं विकल व्यथा के गाने॥
जो खड़े हुए है निश्चल पर्वत से मन को मारे।
उनके भी डर से झरते रहते कितने फव्वारे!
मुसकान अधर पर दिखती, प्राणों में व्यथा सघन है।
जग के दीपक के तल में छाया तम-तोम गहन है॥
ऐ काल, कौन सुन पाया है तेरी पूर्ण कहानी।
ए व्यथा, जगत में करती फिरती है तू मनमानी॥
वैभव के सिंहासन पर चढ़कर हँसते अभिमानी।
कहते हैं ईश्वर का भय है दुनिया की नादानी॥
- अनन्त के पथ पर,
*समाप्त*