विवेक वाटिका के सुवासित पुष्प

(ले. श्री मनोहरदास जी, अआवत)

सत्यता, सद्वचन, सत्कर्म, उदारता, क्षमा, लोकहित आदि कोई न कोई कार्य करते रहना चाहिए, ये सब बहुत बड़े सहायक हैं। -स्वामी रामतीर्थ ।

तिनके के समान हलका बनने से, वृक्ष के समान सहिष्णु बनने से, मान छोड़कर दूसरों को मान देने से, इष्ट की महिमा समझने से तथा अभिमान का त्याग करने से साधना शीघ्र सफल होती है। इस प्रकार योग्यता प्राप्त करने के लिए सत्संग, धर्मग्रंथ और भक्त चरित्र का अभ्यास, गुरु ज्ञान का पालन तथा माता-पिता आदि गुरुजनों की तथा भक्तों की सेवा पूजा करना बहुत आवश्यक है।

-विजयकृष्ण गोस्वामी।

हे भगवान् ! मेरे जीवन के शेष दिन किसी पवित्र वन में शिव-शिव-शिव जपते हुए बीते, साँप और फूलों का हार, बलवान बैरी और मित्र कोमल पुष्प शय्या और पत्थर की शिला, रत्न, पत्थर, तिनका और सुन्दर कामिनी-इन सब में मेरी समदृष्टि हो जाय।

-भर्तृहरि।

लाभ क्या है? गुणियों की संगति । दुःख क्या है? मूर्खों का संग । हानि क्या है? समय को नष्ट करना। निपुणता क्या है? धर्म में प्रीति। शूर कौन है? जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है। प्रियतम कौन है? जो पवित्र है? धन क्या है? विद्या । सुख क्या है? पर देश न जाना। राज्य क्या है? अपनी आज्ञा का चलाना।

-भर्तृहरि।

रे मनुष्य ! तू दीन होकर घर-घर क्यों भटकता है? तेरा पेट तो सेर भर आटे से ही भरता है। सुना है, भगवान तो उस समुद्र को भी भोजन पहुँचाते हैं जिसका शरीर चार सौ कोस लम्बा चौड़ा है। संसार में कोई भूखा नहीं रहता, चींटी और हाथी सभी का पेट भगवान भरते है। अरे मूर्ख, तू विश्वास क्यों नहीं करता। -सुन्दरदास।

मैं न राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ग चाहता हूँ, और न मोक्ष ही चाहता हूँ, मैं दुःख पीड़ित प्राणियों के दुःख का नाश चाहता हूँ। -राजा शिवि।

मैं परमेश्वर से आठ सिद्धियों वाली उत्तम गति या मुक्ति नहीं चाहता, मैं केवल यही चाहता हूँ कि समस्त देहधारियों के अन्तःकरण में स्थित होकर उनके कष्टों को भोगूँ जिससे उन्हें कष्ट न हो। -राजा रन्तिदेव।

लोभ, दीनता, भय और धन आदि किसी भी कारण से मैं अपना व्रत नहीं छोड़ सकता - यह मेरा दृढ़ निश्चय है। -भीष्म पितामह।

सब जीवों में आत्मभावना रखने के कारण यदि समस्त गुणों के आधार अद्वितीय परमात्मा मुझ कर प्रसन्न हों तो (मुझे मारने की चेष्टा करने वाले) ये ब्राह्मण (दुर्वासजी) सन्ताप से छूट जाएं। -भक्त अम्बरीष।

तुम परमेश्वर और भोग दोनों को सेवा नहीं कर सकते, विषय न बटोरो, कल के लिए चिन्ता न करो-कल अपनी चिन्ता आप करेगा। -महात्मा ईसामसीह।

ईर्ष्या, लोभ, क्रोध और अप्रिय किंवा कटुवचन इससे सदा अलग रहो, धर्म प्राप्ति का यही एक मार्ग है। -तिरुवल्लुवर।

काम के समान व्याधि नहीं, मोह के समान बैरी नहीं, क्रोध के समान आग नहीं, और ज्ञान से परे सुख नहीं है। -श्री चाणक्य।

सत्संग से दुर्जनों में साधुता आती ही है, साधुओं ही में दुष्टों की संगत से दुष्टता नहीं आती। फूल के गन्ध को मिट्टी ही ले लेती है, मिट्टी के गन्ध को फूल नहीं धारण करते । -श्री चाणक्य।

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


साँई का पंछी बोले रे


साँई का पंछी बोले रे (kavita)

सांई का पंछी बोले रे, साँई का पंछी बोले !

तिनके के पिंजरे में मुनियाँ सुधा और विष घोले रे॥

सावन का है बाग अनूठा,

सब कुछ सच्चा, सब कुछ झूठा।

रीझा सो पछताता लौटा,

पाया मीठा ऊल जो रूठा।

खुला खेल है, देखे जब तू, घूँघट का पट खोले रे। साँई

चटक चाँदनी और दिन का,

शीतल रजनी थोड़ी बाकी।

चुनले सुमन, सजाले डाली,

प्याली भर ले शेष सुरा की।

तेरी कथा कहेंगे कल, पैरों के फूटे फफोले रे। साँई

आशा और पंथ का मारा,

हाट-हाट घूमा बनजारा।

लाद-लाद कर जीवन बीता,

जीत-जीतकर सरबस हारा।

अब भी रहे लाज जो मनुआँ, मन से मन को तोले रे। सांई

(श्री मोहन लाल महतो ‘वियोगी’)


आत्मसंयम और परमार्थ का मार्ग

योनोवास्ति तु शक्ति साधन चयो,

न्यूनाधिकश्चाथवा।

भागं नूनं तमं हितस्य विद्धे,

मात्म प्रसादायच॥

यत्पश्चाद्वशिष्ठ भाग मखिलं,

त्यक्त्वा फलाशा हृदि।

तद्धीनेष्वभिलाषवस्तु वितरे,

माँगीषु नित्यं वयम्॥

अर्थ-हमारी जो भी शक्तियाँ एवं साधन हैं वे चाहे न्यून हों अथवा अधिक हों उनके न्यून से न्यून भाग को अपनी आवश्यकता के लिए प्रयोग में लावें और शेष को निस्वार्थ भाव से अशक्त व्यक्तियों में बाँट दे।

राजा किसी अफसर से प्रसन्न होता है तो वह उसे अपने कार्यों का एक अंश पूरा करने के लिए नियुक्त कर देता है। राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को सुखी, समृद्ध, समुन्नत, सुरक्षित रखने की बुद्धिमत्तापूर्वक व्यवस्था करे। अपने इस उत्तरदायित्व को वह कुछ लोगों को सौंप देता है जिन्हें वह सुयोज्य, कर्तव्यनिष्ठ, बुद्धिमान एवं विश्वसनीय समझता है। वे व्यक्ति अफसर कहलाते हैं। अफसरों के पास राजशक्ति का महत्वपूर्ण भाग रहता है। पुलिस सुपरिटेंडेण्ट और कलेक्टर के हाथ में काफी शक्ति है। सेना, पुलिस, हथियार, कोष एवं अधिकार का उपयोग करने की राजसत्ता उनके हाथ में रहती है। राजा उन अफसरों को इतनी सुविधाओं एवं शक्तियों का स्वामी बनाता है कि वे प्रजा के हित में इनका उपयोग करें। यह सब उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है। व्यक्तिगत उपयोग के लिए उन्हें थोड़ा सा वेतन मिलता हैं तथा उतने ही अधिकार मिलते हैं जितने की प्रजा के साधारण व्यक्तियों को प्राप्त हैं।

कोई अफसर यदि राजशक्ति का उपयोग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए करने लगे तो वह कर्तव्यच्युत एवं अपराधी ठहराया जायेगा। पुलिस कप्तान यदि अपनी पुलिस को लेकर नगर की घनी बस्ती पर चढ़ दौड़े और लूट करके अपने घर भर ले। कलेक्टर अपनी शक्ति से लूट, अपहरण, बलात्कार, दमन, गबन आदि करे। जज अपने दुश्मनों को फाँसी पर चढ़वा दे या रिश्वत ले ले कर डाकुओं को बरी कर दे तो वे कप्तान, कलेक्टर, जज अपने पद पर नहीं रह सकते। राजा उन पर विश्वास-घात का, कर्तव्यच्युत होने का, शक्ति के दुरुपयोग का, अपराध लगाकर पकड़ कर उन्हें कठोर दंड देगा। कारण स्पष्ट है शक्ति उन्हें प्रजा के हित में उपयोग करने के लिए एक अमानत की तरह दी गई थी। वे राजशक्ति के केवल ट्रस्टी मात्र थे। राजा ने उन्हें इतना बड़ा अधिकार दिया था, इतना विश्वास पात्र समझा था, इतने बड़े पद पर प्रतिष्ठित किया था यही क्या कम गौरव की बात थी। इतने में ही उन्हें सम्मान, सुख और संतोष अनुभव करना चाहिए था। अमानत दी हुई शक्ति को व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करने का इन अफसरों को कोई अधिकार न था। अमानत में खयानत करने वाला कठोर दंड का, निंदा का, घृणा का, पात्र ठहराया ही जायेगा।

परमात्मा के सभी पुत्र हैं। सभी उसे समान रूप से प्यारे हैं। पर वह जिन्हें अधिक ईमानदार और विश्वसनीय समझता है उन्हें अपनी रोज शक्ति का एक भाग इसलिए सौंप देता है कि वे उसके ईश्वरीय उद्देश्यों की पूर्ति में हाथ बंटायें। धन, स्वास्थ्य, बुद्धि, चतुरता, शिल्प, योग्यता, मनोबल, नेतृत्व, भाषण, लेखन आदि की शक्तियाँ जिन्हें अधिक मात्रा में दी गई हैं वे उन्हें दैवी प्रयोजन के लिए दी गई हैं। जो अधिकार साधारण प्रजा को नहीं है वे अधिकार कलेक्टर को देकर राजा कोई पक्षपात नहीं करता वरन् अधिकारी से, योग्य से, अधिक काम लेने की नीति बनाता है। परमेश्वर कभी कुछ थोड़े से आदमियों को अधिक सम्पन्न बनाकर अपने अन्य लोगों के साथ अन्याय नहीं करता। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्यारे हैं। उसने सभी को समान रूप से विकसित होने के अवसर दिये हैं। वह पक्षपात और अन्याय करे तो फिर उसे समदर्शी, न्यायशील और दयालु कैसे कहा जा सकेगा?

भोजन वस्त्र रहने का घर, तथा जीवनयापन की उचित आवश्यकता पूरी करने वाली वस्तुएँ, यह प्रत्येक व्यक्ति का वेतन है। जो आलसी अकर्मण्य ऊटपटाँग करने वाले, अविचारी हैं उनका वेतन कट जाता है और उन्हें किन्हीं अंशों में अभाव ग्रस्त रहना पड़ता है। जो परिश्रमी, पुरुषार्थी, सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं वे अपना उचित वेतन तथा समय पाते रहते हैं। इस वेतन के अतिरिक्त जिसके पास जो भी शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक एवं अनौपचारिक शक्तियाँ हैं वे केवल मात्र इस उद्देश्य के लिए हैं कि उनके द्वारा नीचे गिरे हुये लोगों को ऊपर उठाने में लगाया गया। हर समृद्ध व्यक्ति को ईश्वर ने यह कर्तव्य सौंपा है कि अपने से जो लोग कमजोर हैं उनको ऊँचा उठाने में इन शक्तियों का व्यय किया जाय। यदि कोई व्यक्ति सुशिक्षित है तो उसका फर्ज है कि अशिक्षितों में शिक्षा का प्रसार करे। कोई व्यक्ति बलवान है तो उसका कर्तव्य है कि निर्बलों को बलवान बनाने का नेतृत्व करे और गलत कहने वालों को रोकें। धनवान के पास वह धन इसलिए अमानत रखा गया है कि उससे विद्या, व्यवसाय, संगठन, सद्ज्ञान आदि का इस प्रकार आयोजन करें कि उससे पिछड़े हुए लोग भी चतुर्मुखी उन्नति कर सकें।

पिता के अतिरिक्त बड़े बेटे का कर्तव्य भी कुटुम्ब के स्त्री बच्चों के प्रति होता है। पिता अपने छोटे बच्चों की सुव्यवस्था एवं उन्नति चाहता है बड़ा बेटा जब कुछ समर्थ हो जाता है तो वह अनुभव करता है कि पिता के उत्तरदायित्व में हाथ बटाना मेरा भी फर्ज है। इसलिए वह अपने से छोटे भाई बहिनों के प्रति कर्तव्य पालन करता है। यदि वह इस कर्तव्य को पालन नहीं करता और ब्याह होते ही बहू को लेकर अलग हो जाता है, अपनी कमाई से आप गुलछर्रे उड़ाता है और छोटे भाई बहिनों की सहायता नहीं करता तो सत्पुरुषों की दृष्टि में वह क्षुद्र, स्वार्थी, कृतघ्न एवं घृणास्पद ठहरता है और धार्मिक एवं नैतिक दृष्टि से उसे अपराधी माना जाता है। यह ठीक है कि कानून में उसके इस अपराध के लिए कोई सजा नहीं रखी गई है। पर इससे क्या, वह ईश्वरीय अदालत में दंड से नहीं बच सकता। जिसके पास धन की भरी तिजोरियाँ हैं वह सेठ किसी को कानी कौड़ी न दे और खुद ही अनाप-सनाप गुलछर्रे उड़ावे। कोई वकील, डॉक्टर, कलाकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, अपनी योग्यता से अपना ही स्वार्थ साधन करें, किसी का राई बराबर भी उपकार न करे तो कानूनन उसे इसके लिए विवश नहीं किया जा सकता, इस स्वार्थपरता के लिए उसे जेल फाँसी आदि भी नहीं दी जा सकती। पर इतना निश्चित है कि मनुष्य के बनाये हुए लंगड़े-लूले कानूनों की भी गिरफ्त में न आने पर भी वह चोर है, पापी है, अपराधी है। ईश्वरीय अदालत में उसे वैसे ही कर्तव्य भ्रष्ट ठहराया जाएगा जैसा कि राजसत्ता का दुरुपयोग करने वाले पूर्व कथित कलक्टर, कप्तान, जज आदि राजा के द्वारा अपराधी ठहराये जाते।

जब कि अधिकाँश मनुष्यों को पेट भरने और तन ढ़कने की व्यवस्था में ही जीवन का सारा समय लगाना पड़ता है और कई दृष्टियों से पिछड़ा हुआ रहना पड़ता है तब किसी समृद्ध आदमी के लिए गर्व करने का, सुखी होने का, संतोष करने का, ईश्वर को धन्यवाद देने का, यह पर्याप्त कारण है कि उसकी जीवन की आवश्यकताएँ आसानी से पूरी हो जाती हैं और उसे ऐसी योग्यताएं प्राप्त हैं जो असंख्यों मनुष्यों में नहीं है। सुसम्पन्न व्यक्ति को इतने से ही संतोष और आनन्द अनुभव करना चाहिए और भविष्य में और उत्तम स्थिति प्राप्त करने के लिए दूरदर्शिता पूर्वक अपनी शक्तियों को लोकहित में लगाना चाहिए। आज यह अवसर है कि वह रोटी की समस्या को आसानी से हल कर के परमार्थ भी कर सकती है। ऐसी स्थिति पूर्वकृत पुण्य फल से ही प्राप्त हुई है। यदि पिछला पुण्य भुगत जाये और आगे के लिए उपार्जन न किया जाय तो निश्चित है कि थोड़े दिनों में वह सम्पन्नता समाप्त हो जायगी और असंख्यों निर्धन व्यक्तियों की भाँति ऐसा अभाव ग्रस्त जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ेगा जिसमें परमार्थ के लिए अवसर पाना बड़ा ही कठिन कार्य होगा।

अधिक धन जोड़ना, अधिक भोग भोगना, यह दो ही कार्यक्रम आज कल सुसम्पन्न व्यक्तियों के देखे जाते हैं। यह मूर्खता का मार्ग है। गायत्री का ‘योनः’ शब्द कहता है कि इस खतरनाक मार्ग पर चलना किसी भी प्रकार बुद्धिमत्ता का द्योतक नहीं है। विद्रोही, उद्दंड, उच्छृंखल, मदोन्मत्त अफसर कुछ समय के लिए अपनी हेकड़ी के नशे में चूर होकर अट्टहास कर सकते हैं पर कुछ ही क्षण बाद उन्हें अपने अविवेक का कठोर मूल्य चुकाना पड़ता है। समृद्ध व्यक्ति यदि आज अपने धन, बुद्धि, विद्या, वैभव, ऐश्वर्य पर इतराते हैं और उनका उपयोग केवल मात्र “अधिक संचय और अधिक भोग“ में ही करना चाहते है तो भले ही आज उनका रास्ता कोई न रोके, वे अट्टहास करते हुए अपनी इस गतिविधि को जारी रखें पर वह दिन दूर नहीं जब उन्हें अपनी मदहोशी का पश्चाताप मर्मान्तक वेदनाओं और पीड़ाओं के साथ करना पड़ेगा। इतना अलभ्य अवसर पाकर भी मनुष्य शरीर और सुसम्पन्नता का स्वर्ण सुयोग उपलब्ध करके भी, जो उसका सदुपयोग नहीं कर सके, आत्मकल्याण का, पुण्य संचय का, साधन नहीं कर सके, वे अमार्ग इसी योग्य हैं कि अनंत-काल तक नारकीय यातनाओं में पड़े रहें। नैतिक अपराधों में सजा पाये हुए, बर्खास्त किये हुए, नौकर को पुनः सरकारी नौकरी में नहीं लिया जाता, जो लोग आज अपनी सुसम्पन्नता का दुरुपयोग कर रहे हैं वे भविष्य में फिर उसी पद पर नियुक्त किये जायेंगे इसकी आशा कैसे की जा सकती है?

गायत्री हर व्यक्ति को आगाह करती है कि ऐसी बुरी परिस्थिति में कोई आत्मकल्याण का पथिक अपने को न फँसा ले। “यो नः” की मृग तृष्णा में न भटकें। अपनी आवश्यकताएं कम से कम रखें। उन्हें पूरा करने के पश्चात बची हुई शक्ति का अधिक से अधिक भाग अपने से निर्बल, पिछड़े हुए, अविकसित, निर्धन, अल्पबुद्धि, अशिक्षित लोगों को अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठाने में खर्च करें। यह ईश्वरीय कार्य में हाथ बटाना और अपनी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता एवं कर्तव्य परायणता का प्रमाण देना है। हर आदमी किसी न किसी से ऊँचा है, सम्पन्न है, इसलिए उसे यह बहाना न ढूँढ़ना चाहिए कि मैं अमुक के बराबर धनी या शक्तिवान हो जाऊँगा तब परमार्थ करूंगा। वरन् यह सोचना चाहिए कि आज की स्थिति में किन लोगों की अपेक्षा में किस दृष्टि से अधिक सम्पन्न हूँ? इस दृष्टि से अपने में अनेकों सम्पन्नताएं प्रतीत होंगी और उन्हीं का सदुपयोग कर लेने का अवसर मिलेगा।

हमें अवसरवादी होना चाहिए। अवसर से लाभ उठाने में चूक करनी चाहिए। प्राप्त शक्तियों को अपने लिए मितव्ययिता के साथ खर्च करके उन्हें दूसरों के लिए बचाना चाहिए। यह “आत्मसंयम और परमार्थ” का दैवी मार्ग हमें ‘यो नः’ शब्द द्वारा बताया गया है। इस पर चलने वाला गायत्री उपासक जीवन लक्ष्य को प्राप्त करके रहता है।


संसार में केवल ईश्वर ही सत् है

(श्री. स्वामी रामतीर्थ जी)

जहाँ ईश्वर को मन, बुद्धि से प्रतीत कहा गया है, वहाँ विषयात्मक मन, बुद्धि और जहाँ मन, बुद्धि के गोचर कहा गया है, वहाँ विषय विकार रहित मन, बुद्धि इस प्रकार समझना चाहिए। जिस मन, बुद्धि द्वारा मनुष्य इस संसार को सत्य मान कर और देह में आत्मबुद्धि करके संसार के विषय भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानता है, उसे विषयात्मक मन, बुद्धि कहते हैं। और जिस मन बुद्धि द्वारा संसार की असारता का ज्ञान होता है। जिस बुद्धि द्वारा देही अपने आपको देह से भिन्न समझता है, और इस देह को बन्धन स्वरूप और सर्व दुखों का आधार समझ कर जन्म-मरण आदि बन्धन से मुक्ति पाने की चेष्टा करता है, और इस असार संसार के मूल में जो सार तत्व है उसको प्राप्त होने का यत्न करता है, उस मन, बुद्धि को विषय विकार रहित मन, बुद्धि कहते हैं।

इस संसार में सब कुछ ही असार है। सकल अदृश्यमान पदार्थ ही अस्थाई हैं, परिवर्तनशील हैं और कल था वह आज नहीं है, और जो आज है वह कल न होगा। जिस स्थान में किसी समय बड़े बड़े शहर बसे थे वहाँ आज उल्लू बोलते हैं, और जो आज उजाड़ वन है, वहाँ कल को सुँदर शहर आबाद होंगे। यह जो बड़े-बड़े पहाड़ दीखते हैं किसी समय में वह समुद्र के नीचे थे और जहाँ आज मीलों गहरा समुद्र है, वहाँ किसी समय बड़े पर्वत विद्यमान होंगे। परिवर्तन संसार का नियम है। दिन के पीछे रात, सुख के बाद दुख, जीवन के बाद मृत्यु इस प्रकार ही संसार का चक्कर जारी है। जो कल नहीं था, वह आज विद्यमान है और वह कल को फिर न रहेगा। बालक नेस्ती से हस्ती में आया, बालक से युवा हुआ, युवा से वृद्ध हुआ और तत्पश्चात मृत्यु।

इस संसार में सार क्या है? समुद्र में असंख्य तरंगें उठती हैं और फिर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, बुलबुले उठते हैं, लय को प्राप्त होते हैं। इन समुद्र की तरंगों और बुलबुलों में सार क्या है? और असार क्या है? तरंग क्या है? जल मात्र। बुलबुला क्या है? जल मात्र। जल आज बुलबुले के अस्तित्व में आने से पूर्व भी जल द्रव्य मौजूद था। उनकी विद्यमानता में भी उनमें जल द्रव्य मौजूद है और जब वे (तरंग और बुलबुला) लय को प्राप्त होंगे तब भी जल वैसे का वैसा बना रहेगा। अतः तरंग और बुलबुले असार हैं, उनका नाम और रूप भी उनमें जो जल द्रव्य है वही सार है। स्वर्ण से नाना प्रकार के भूषण बनते हैं। वह सब ही अनित्य हैं। अर्थात् उन स्वर्ण भूषणों में नाम और रूप अनित्य हैं और उनमें जो स्वर्ण द्रव्य है वह सदा एक-सा रहता है। नाम और रूप में परिवर्तन होने से स्वर्ण द्रव्य में किसी प्रकार का फर्क नहीं आता। इसी प्रकार इस संसार में परिवर्तन होता है केवल नाम और रूप में। इस दृश्यमान जगत के मूल में जो द्रव्य है उसका कभी परिवर्तन संबंध नहीं। वह सदा एक रस बना रहता है।

“नासतो विद्यते भ वो ना भावो विद्यते सतः।”

(भगवद्गीता 1/16)

“असत् जो न उसकी है हस्ती कभी भी।

कभी है न सद्वस्तु की नेस्ती ही॥”

पाश्चात्य भौतिक शास्त्र की नींव इसी सिद्धान्त पर है। भौतिक शास्त्र का प्रथम सिद्धाँत है- “जो पदार्थ विद्यमान है उसका कभी नाल नहीं होता, और कोई नई वस्तु पैदा नहीं की जा सकती।” अर्थात् संसार में पदार्थ का नाश नहीं होता, रूपांतर मात्र होता है।

भौतिक शास्त्र के पण्डितों ने सिद्धाँत किया है कि 66 रूढ़ पदार्थ इस पृथ्वी के समस्त पदार्थों का मूल कारण हैं। केवल 66 पदार्थ रूढ़ हैं, बाकी सब पदार्थ इन 66 पदार्थों के यौगिक मात्र हैं। चाँदी रूढ़ पदार्थ है। पारा रूढ़ पदार्थ है। प्रोफेसर प्रफुल्ल चन्द्र राय ने परीक्षा द्वारा सिद्ध किया है कि चाँदी और पारे में कई एक यौगिक पदार्थों के समान गुण हैं।

प्रोफेसर राय की इस नई शोध ने रसायन शास्त्र में एक नई लहर उत्पन्न कर दी है। क्या अजब कि बीसवीं सदी यह सिद्ध कर दे कि सोना, लोहे में, लोहा चाँदी में, अर्थात् एक रूढ़ पदार्थ दूसरे में परिणत हो सकता है।

अब भी अनेक विज्ञान-विशारद यह मानने लगे है कि संसार के समस्त पदार्थों का मूल ‘आकाश’ है और सृष्टि का आदि कारण है ‘पदार्थ’ और ‘शक्ति’ इसी पदार्थ और शक्ति को हिन्दू शास्त्र में प्रकृति और पुरुष कहा गया है, किन्तु वेदान्त शास्त्र इस से भी एक पग आगे जाते हैं। वह कहते हैं कि इन क्षेत्रों में प्रकृति और पुरुष का अभिकारण एक अद्वितीय ब्रह्म है, जो सत् है, चित् है, आनन्द-स्वरूप है।

इस प्रकार चिन्तन करते-करते जब मनुष्य को संसार के समस्त पदार्थों की असारता का ज्ञान होता है, तब वह इस संसार के मूल में जो आत्म-तत्व है उसे जानने के लिए व्याकुल होता है, और नेति-2 (यह भी ब्रह्म नहीं, वह भी ब्रह्म नहीं) इस प्रकार विचार करते-करते एक सत्ता मात्र उपलब्धि करता है, और उसे जानकर उसमें ही मग्न हो जाता है। उस सत्ता को ही श्रुति ने ब्रह्म कहा है। वह ब्रह्म ही सत् है, चित् है और आनन्द स्वरूप है।


सत्य की शोध कीजिए

(विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ जी टैगोर)

यदि आप सचमुच सत्य के प्रेमी हैं, तो उसके समस्त असीम सौंदर्य और महत्व के साथ पूर्ण रूप में उसे खोजने का साहस कीजिए। किंतु रूढ़ियों की पत्थर की दीवालों के भीतर कंजूसों के समान एकान्त स्थान में उसके (सत्य के) व्यर्थ के संकेत चिन्हों का संग्रह करके ही संतोष न कर लीजिए। महात्माओं की आध्यात्मिक उच्चता के कारण जोकि उन सबसे समान रूप से पाई जाती है, हमें विनम्रतापूर्ण सादगी के साथ उनका आदर करना चाहिए।

यह आध्यात्मिक उच्चता उन में उस समय देखी जाती है जब वे अपनी विश्वजनीन उच्च विचारों के साथ मनुष्य की आत्मा को स्वयं उसके व्यक्तिगत उसकी जाति और उसके धर्म के अहं भाव के बन्धन से छुड़ाने के लिए एकत्रित होते हैं। किंतु परंपराओं की एक नीची भूमि में जहाँ धर्म एक दूसरे के दासों और अन्धविश्वासों को चुनौती देकर ललकारते हैं और उनका खण्डन करते हैं वहाँ पर एक बुद्धिमान मनुष्य निश्चय ही संदेह ओर आश्चर्य के साथ उनके पास से चला जायेगा।

मेरा मतलब इस बात का समर्थन करने का नहीं है कि समस्त मानव जाति के लिए कोई एक ही प्रकार का प्रार्थनागृह रखा जाय अथवा कोई एक ऐसा विश्वजनीन नमूना रखा जाए जिसका अनुकरण सभी पूजा के और सद्भावना के कार्यों के द्वारा किया जाय।

साँप्रदायिकता की उद्धत भावना को जो कि बहुधा सक्रिय अथवा निष्क्रिय उत्तेजनापूर्ण अथवा विनम्र पीड़ा पहुँचाने वाले ढंगों से बहुत ही कम अथवा बिना क्रोध युक्त उत्तेजना के काम में आती हैं तथा तथ्य का स्मरण दिलाने की जरूरत है कि कविता के ही समान धर्म केवल विचार नहीं है वरन् विचारों का प्रकटीकरण है।

ईश्वर का आत्म-प्रकटी-करण सृष्टि की विभिन्नता में है और असीम के प्रकटी-करण में हमारी भावना में भी व्यक्तिगत रूप की ऐसी विभिन्नता होनी चाहिए जो अविरल और अनन्त हो। जब किसी धर्म में समस्त मानव-जाति पर अपने ही मत को लादने की महत्वाकाँक्षा उत्पन्न हो जाती है। तब उसका पतन हो जाता है और वह अत्याचार करने लगता है तथा साम्राज्यवाद का एक रूप बन जाता है। यही कारण है कि जिससे हम मार्मिक मामलों में फैजिज्म के एक विवेकशून्य को संसार के अधिकाँश भागों में फैलते हुए तथा मनुष्य की आत्मशक्ति के विस्तार को अपने अनुभव ज्ञान विहीन तलुवों से खूब कुचलते हुए करते हैं।

अपने ही एक धर्म को सभी देशों और सभी दलों में प्रधान बना देने का प्रयत्न ऐसे ही लोगों में देखा जाता है जिन्हें साँप्रदायिकता का व्यसन जाता है।

यह कहना उनको बुरा मालूम होता है। प्रेम के वितरण करने में ईश्वर उदार है तथा मनुष्यों के साथ आदान-प्रदान करने के उसके साधन एक ऐसी गली में परिमित नहीं हैं जो इतिहास के एक संकीर्ण स्थान पर जाकर अकस्मात् समाप्त हो जाती है।

मैं जिस बात का समर्थन करना चाहता हूँ वह यह है कि इस उपेक्षित सत्य को लोग जीते जागते रूप में स्वीकार करें कि धर्म की वास्तविकता का आधार बहुत आवश्यक और विश्वव्यापी आवश्यकता के रूप में मानव प्रकृति की सत्यता में है और इसीलिए मानव प्रकृति के द्वारा उस धर्म की वास्तविकता की लगातार परीक्षा होती रहनी चाहिए। जहाँ पर यह उस आवश्यकता की उपेक्षा और तर्क का उल्लंघन करती है वहाँ पर यह स्वयं अपने औचित्य को दूर भगा देती है।

मुझे इस कथन को मध्यकालीन भारतवर्ष के बहुत बड़े रहस्यवादी कवि कबीर, जिन्हें मैं अपने देश के सर्वप्रधान आध्यात्मिक विशेष बुद्धिमानों में से एक व्यक्ति मानता हूँ, की कुछ निम्नलिखित पंक्तियों को देते हुए समाप्त करने दीजिए।

“रत्न कीचड़ में खो गया है और सब लोग उसे ढूँढ़ रहे हैं। कुछ लोग पूरब की ओर खोजते हैं, कुछ पश्चिम की ओर। कुछ लोग पानी में खोजते हैं और कुछ पत्थरों में। किन्तु दास कबीर ने उस के सच्चे मूल्य को जान लिया है और स्वयं अपने हृदयरूपी वस्त्र के एक आँचल में उसे बड़े यत्न के साथ लपेट रखा है।”


धर्म के तीन स्कन्ध

(श्री. दीवानचन्द जी, एम.ए.)

छांदोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि धर्म के तीन स्कन्ध हैं।

स्वाध्याय, दान और यज्ञ, पहला स्कन्ध है। तप दूसरा और आचार्यकुल में ब्रह्मचारी तीसरा स्कन्ध है। यहाँ धर्म की एक वृक्ष के साथ उपमा दी गयी है और इसके अंगों को वृक्ष के तने या टहनियों के रूप में दिखाया गया है। यह समानता उचित है। वृक्ष एक जीवित चीज है और उसके तने भी जीवित चीजें हैं। धर्म के सम्बन्ध में पहली बात जो स्मरण रखने योग्य है वह यही है कि धर्म एक जीवित वस्तु है। जहाँ धर्म केवल रीति रिवाज का समूह बन जावे या सोच समझकर भी अन्ध श्रद्धा तक पहुँच जाय, वहाँ धर्म का पिंजर शेष रह जाता है धर्म नहीं रहता । जीवन का लक्ष्य उन्नति है, बुरी बातों को अंदर से निकालना और अच्छी चीजें धारण करना। जिस धर्म में उन्नति नहीं होती वह छोड़ देने योग्य है। आर्य-समाज के नियमों में कहा गया है कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य के त्याग करने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए-यह धर्म का तत्व है। दूसरी बात जो हम वृक्ष की अवस्था में देखते हैं वह यह है कि वृक्ष अपने जीवन के लिए ऊपर और नीचे दोनों ओर से भोजन लेता है। नीचे से जड़ें खुराक लेती हैं पत्ते वायु-मंडल से नमी और भोजन लेते हैं-इसी तरह धर्म नीचे और ऊपर दोनों ओर से जीवन ग्रहण करता है। धर्म वह है जिससे इहलोक और परलोक का भला होता है। जीते जागते धर्म का संबंध इहलोक और परलोक दोनों से है। कई लोग धर्म को केवल इस संसार की भलाई के साथ जोड़ते हैं। कई इसे केवल परलोक की भलाई का स्त्रोत बताते हैं। यह दोनों विचार धर्म के एक पक्ष का दर्शन कराते हैं अतः अपूर्ण हैं। वस्तुतः धर्म न इस लोक की उपेक्षा कर सकता न परलोक की। जिस तरह वृक्ष की खुराक पृथ्वी और वायुमण्डल से आती है इसी तरह धर्म की शक्ति-लोक और परलोक दोनों स्थानों से प्राप्त होती है।

धर्म के स्वरूप का चिन्तन करें तो हमारे सामने कई विशेषताएं आती हैं जो एक धार्मिक क्षेत्र में पाई जाती हैं। धर्म की उन्नति व्यक्तियों का ही काम नहीं यह समाज का काम भी है और समाज इस की उन्नति के लिए विशेष साधन एकत्रित करता है। उपनिषद् वाक्य में, जिस से यह लेख आरंभ होता है, सामाजिक धर्म का वर्णन किया गया है अर्थात् उन साधनों का जिन्हें एक समाज की उन्नति के लिए प्रयोग करता है। समाज प्राकृतिक तौर पर कई भागों में बंटा हुआ होता है। जन्म के हम सब शूद्र होते हैं। दूसरा जन्म जिस से हम द्विज या द्विजन्मा बनते हैं, हमें इस अवस्था से निकाल कर एक नई अवस्था में प्रविष्ट करता है। द्विजों में यही सामान्य बात है कि उन्होंने शूद्रावस्था को पीछे छोड़ दिया और आगे निकल गए है परन्तु किसी समाज में भी सारे द्विज एक से नहीं होते। भिन्नता जीवन का अंग ही नहीं परन्तु जीवन की आवश्यकता भी है। सामाजिक जीवन के लिए जो कुछ आवश्यक और उपयोगी होता है उसके आधार पर समाज को विभक्त किया जाता है। आर्य सभ्यता में द्विजों को तीन भागों में बाँटा गया - ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। इन तीनों के धर्म, शास्त्र में वर्णन किये गए हैं। मनुस्मृति के अनुसार यह धर्म निम्नलिखित हैं।

ब्राह्मण का धर्म वेद पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना, दान लेना और देना।

क्षत्रिय का धर्म वेद पढ़ना, यश करना और समाज की रक्षा करना।

वैश्य का धर्मवेद पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, वाणिज्य व्यापार, खेती-बाड़ी और शिल्प से धन की उन्नति करना।

ब्राह्मण का धर्म वेद पढ़ना और पढ़ाना। क्षत्रिय और वैश्य का धर्मवेद पढ़ना है पढ़ाना नहीं। न इनमें इसकी योग्यता है न उन्हें इस लिए अवकाश। ब्राह्मण का काम यज्ञ करना और कराना है दूसरों का काम यज्ञ करना हैं कराना नहीं। इसके लिए एक विशेष श्रेणी चाहिए। ब्राह्मण का काम दान देना हैं लेकिन अपने निर्वाह के लिए दान लेना भी उचित है। क्षत्रिय और वैश्य को दान देना चाहिए, परन्तु यह दान लेने के अधिकारी नहीं। उन्हें अपने लिए कमाना चाहिए। दूसरों की कमाई बदला दिये बिना उनके लिये नहीं। वर्णों के धर्मों में हम देखते हैं कि सब धर्म सारे द्विजों के हैं कुछ विशेष वर्ण के। जो धर्म तीनों वर्णों के हैं वह सब तरह से सारे द्विज के लिए अनिवार्य है। वह धर्म तीन हैं वेद स्वाध्याय, यज्ञ करना और दान देना। वेद स्वाध्याय के साथ सत्य ज्ञान की पुस्तकों का स्वाध्याय भी आ जाता है। यज्ञ में हर प्रकार से जनता की सेवा भी है। यज्ञ और दान में बड़ा भेद यह है कि दान करने वाला अपनी कमाई का एक विशेष भाग किसी के कष्ट निवारण के लिए व्यय करता है। उसे इस बात का ज्ञान होता है कि किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के कष्ट निवारण के लिए वह अपना धन दे रहा है। यज्ञ में उसे यह भी मालूम नहीं होता कि वह किस को फायदा पहुँचाता है। मरुभूमि में जो कुआँ बनता है वह नहीं जानता कि कौन लोग इस कुँए से अपनी प्यास बुझाएंगे। जो आदमी अच्छी-अच्छी पुस्तक लिखता या पाठशाला स्थापित करता है वह नहीं जानता कि वह किन लोगों का भला करता है। यज्ञ का दर्जा दान से ऊँचा है। स्वाध्याय समाज की सभ्यता की नींव है। यह तीनों बातें स्वाध्याय दान और उपकार, सोसायटी के धर्म का पहला स्कन्ध या तना है। कोई सोसायटी इनके बिना जीवन व्यतीत नहीं कर सकती।

धर्म का दूसरा स्कन्ध तप है। तप का भाव यह है कि सारे समाज में कठोरता सहन करने की योग्यता हो। आराम तो सब कोई चाहता है परन्तु आराम खरीदना पड़ता है। इससे मनुष्य आराम के बिना गुजारा कर सके। इसके लिए बड़े प्रयत्न की जरूरत होती है। तप का मूल्य परीक्षा के समय पता लगता है। प्रो. विलियम ने लिखा है कि प्रकृति के अनुसार मनुष्य दो प्रकार के होते हैं। एक कोमल स्वभाव और दूसरे कठोर स्वभाव वाले। कोमल स्वभाव वाले मजे में रहते हैं परंतु जब तूफान आता है तो वह बह जाते हैं। और कठोर हृदय वाले अपने स्थान पर ही डटे रहते हैं।

तपस्या जीवन बीमा के चन्दे की तरह है। जब तक मनुष्य जीता रहता है यह चन्दा पास से जाता दिखाई देता है लेकिन मृत्यु का समय निश्चित नहीं। यदि अचानक मौत आ जाती है तो बीमे के मूल्य का पता लगता है। इसी तरह तपस्या स्वयं की जाय, बाह्य अवस्थाओं की ओर से हम पर ठूँसी न गई हो। नहीं तो प्रत्यक्ष में निकम्मी और जीवन का बोझ मालूम देती है। परन्तु वास्तविकता को जानने वाले नेत्र इसकी महत्ता को जानते हैं। हमारे धर्म में तप की महिमा का स्थान-स्थान पर वर्णन किया गया है। वर्तमान युग में तपस्या की महानता पग-पग पर दृष्टिगोचर होती है। तपस्या का उपदेश हमारे पूर्वज करते रहे-परन्तु इसका प्रभाव दूसरों के जीवन में प्रकट हो रहा है।

तपस्या सारी जाति के लिए और सारे जीवन के लिए आवश्यक है। परन्तु सारी जाति को तपस्वी बनाने के लिए बहुत सारे साधनों की आवश्यकता है। वह साधन ब्रह्मचर्य है। जाति के बच्चे-बच्चे को इस भट्टी से गुजरना चाहिए। और वह भी उस अवस्था में जब कि उसमें प्रभावों को सहन करने की शक्ति हो। इसलिए उपनिषद् में कहा गया है कि गुरु के पास रहता हुआ ब्रह्मचारी धर्म का तीसरा स्कन्ध है। जाति को धार्मिक बनाने के लिए आवश्यक है कि जाति के बच्चों को आरंभ में ही तपस्वी, श्रद्धा और प्रेम की भट्टी से गुजारा जाय। यदि किसी मकान की नींव कमजोर हो तो दीवारों की मजबूती किस काम की-वह तो अपने भार से ही गिर पड़ेंगी। अतः सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि नींव दृढ़ हो। सामाजिक जीवन की नींव ब्रह्मचर्य पर स्थित होनी चाहिए। इसके पीछे दूसरे साधन सफल होंगे।


Quotation

मन रूपी पखेरू तभी तक विषय वासना के आकाश में उड़ता है, जब तक कि वह शनि रूपी बाज की झपेट में नहीं आता।

-महात्मा कबीर

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लोटे में नीचे छेद होने से सभी जल गिर पड़ता है, इसी प्रकार साधक के मन में कामनाएं होने पर साधन का फल चला जाता है।

-रामकृष्ण परमहंस


आप निराश मत हूजिए

(श्री रामचरण महेन्द्र जी, एम.ए.)

आनन्दकंद परमेश्वर की यह विशाल सृष्टि आनन्द मूलक है। सच्चिदानन्द भगवान ही सर्वत्र प्रकट हो रहे हैं उस आनंदघन का आनंदमय ज्ञान प्रत्येक वस्तु से विकसित हो रहा है। भगवान अपने आनन्दमय स्वरूप का सर्वत्र प्रसार कर रहे हैं। जब इस जगत के निर्माणकर्ता का प्रधान गुण आनंद का प्रसार करना है तो संसार में आनंद के अतिरिक्त अन्य क्या हो सकता है। प्रातःकाल हंसता हुआ सूर्य उदित होकर संसार को स्वर्ण रश्मियों से स्नान करा देता है। शीतल सुगंधित वायु मस्ती बिखेरती फिरती है, पक्षीवृन्द आनंद से सने गीत गा गा कर सृष्टिकर्त्ता की उत्कृष्ट कला का प्रकटीकरण करते हैं। विशाल नदियाँ कल कल शब्द कर आनंद बढ़ाती हैं। पुष्पों पर गुँजते हुए मदमाते भ्रमर आनंद के गीत सुना कर हृदय शान्त करते हैं। पृथ्वी का अणु-अणु सुख, ऐक्य, समृद्धि और प्रेम की शक्ति को प्रवाहित कर रहा है। प्रत्येक वस्तु जीवन को स्थायी सफलता और पूर्ण विजय से विभूषित करने को प्रस्तुत है। ऐसी सुँदर सृष्टि में जन्म पा लेना सचमुच बड़े भाग्य की बात है। सतत् तप, पुण्य इत्यादि के उपहार स्वरूप यह दुर्लभ मानव जीवन इसलिए प्राप्त होता है कि हम इसमें पूर्ण आनंद का उपभोग कर जन्म जन्म की थकान मिटा सकें, फिर बतलाइए आप निराश क्यों हैं?

निराशावाद उस महाभयंकर राक्षस के समान है जो मुँह फाड़े हमारे इस परम आनंद जीवन के सर्वनाश की ताक में रहता है, जो हमारी समस्त शक्तियों का हास किया करता है, जो हमें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर नहीं होने देता और जीवन के अंधकारमय अंश हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। हमें पग-पग पर असफलता ही असफलता दिखाता है और विजय द्वार में प्रविष्ट नहीं होने देता।

इस बीमारी से ग्रस्त लोग उदास खिन्न मुद्रा लिए घरों के कोने में पड़े दिन रात मक्खियाँ मारने का काम करते हैं। ये व्यक्ति ऐसे चुम्बक है जो उदासीन विचारों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित किया करते हैं और दुर्भाग्य की कुत्सित डरपोक विचारधारा में निमग्न रहा करते हैं। उन्हें चारों ओर कष्ट ही कष्ट दीखते हैं कभी यह, कभी वह, एक से एक भयंकर विपत्ति आती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। वे जब बातें करते हैं तो अपनी यातनाओं, विपत्तियों और क्लेशपूर्ण अभद्र प्रसंग छेड़ा करते हैं। हर व्यक्ति से वह यही कहा करते हैं कि भाई हम क्या करें, हम कमनसीब हैं, हमारा भाग फूटा हुआ है, देव हमारे विपरीत है, हमारी किस्मत में विधि ने ठोकरों का ही विधान रखा है। तभी तो हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर लज्जित और परेशान होना, अशान्त, क्षुब्ध और विक्षिप्त होना पड़ता है।’ उनकी चिंतित मुख-मुद्रा देखने पर यही विदित होता है मानों उन्होंने उस पदार्थ से गहरा संबंध स्थिर कर लिया हो जो जीवन की सब मधुरता नष्ट कर रहा हो, उनके सोने जैसे जीवन का समस्त आनंद छीन रहा हो, उन्नति के मार्ग को कंटकाकीर्ण कर रहा हो। मानों समस्त संसार की दुःख विपत्ति उन्हीं के सर पर आ पड़ी हो और उदासी की अंधकारमय छाया उनके हृदय पटल को काला बना दिया है।

इसके विपरीत आशावाद मनुष्य के लिए अमृत तुल्य है। जैसे तृषित को शीतल जल, रोगी को औषधि से, अंधकार को प्रकाश से, वनस्पति को सूर्य से लाभ होता है, उसी भाँति आशावाद की संजीवनी बूटी से मृतप्राय मनुष्य में जीवन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। आशावाद वह दिव्य प्रकाश है जो हमारे जीवन को उत्तरोत्तर परिपुष्ट, समृद्धिशाली और प्रगतिशील बनाता है। सुख, सौंदर्य एवं सफलता की अलौकिक छटा से उसे विभूषित कर उसका पूर्ण विकास करता है। उसमें माधुर्य का संचार कर विघ्न-बाधा, दुख, क्लेश और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कराने वाली गुप्त मनःशक्ति जागृत करता है। आत्मा की शक्ति से देदीप्यमान आशावादी उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रोंधता हुआ अग्रसर होता है। वह पथ-पथ पर विचलित नहीं होता, उसे कोई बात असंभव प्रतीत नहीं होती, उसे कोई कार्य असंभव प्रतीत नहीं होता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, संसार की कोई शक्ति उसे नहीं दबा सकती क्योंकि सब शक्तियों का विकास करने वाली “आशा” की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है।

संसार के कितने ही व्यक्ति अपने जीवन को उचित, श्रेष्ठ और श्रेय के मार्ग पर नहीं लगाते। किसी एक उद्देश्य को स्थिर नहीं करते, न वे अपने मानसिक संकल्प को इतना दृढ़ ही बनाते है कि निज प्रयत्नों में सफल हो सकें। सोचते कुछ हैं करते कुछ और हैं। काम किसी एक पदार्थ के लिए करते हैं आशा किसी दूसरे की ही करते हैं। करील के वृक्ष बोकर आम खाने की अभिलाषा रखते हैं। हाथ में लिए हुए कार्य के विपरीत मानसिक भाव रखने से हमें अपनी निदिष्ट वस्तु कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। बल्कि हम इच्छित वस्तु से और भी दूर जा पड़ते हैं। तभी हमें नाकामयाबी, लाचारी, तंगी, क्षुद्रता प्राप्त होती है। अपने को भाग्यहीन समझ लेना, बेबसी की बातों को लेकर झोंकना और दूसरों की सिद्धि पर कुढ़ना हमें सफलता से दूर ले जाता है। विरोधी भाव रखने से मनुष्य उन्नत अवस्था में कदापि नहीं पहुँच सकता। संसार के साथ अविरोधी रहो, क्योंकि विरोध संसार की सबसे उत्कृष्ट वस्तुओं को अपने निकट नहीं आने देता और अविरोध उत्कृष्ट वस्तुओं का एक आकर्षक बिन्दु है।

तुम्हारे भाग्य में आशावाद का स्वर्ग आया है न कि निराशावाद का नर्क। तुम अपनी जीवन यात्रा में मंदगति से घिसटते हुए पशुवत् पड़े रहने के लिए जगत में प्रविष्ट नहीं हुए हो। अपने को अशक्त असमर्थ मानने वाले डरपोक व्यक्तियों की श्रेणी में तुम नहीं हो। तुम दुर्बल अन्तःकरण वाले निराशावादियों की तरह निःसार वस्तुओं के कुत्सित चिंतन में निष्प्रयोजन अपनी शक्तियों का अपव्यय नहीं करते। संसार में तुम उस महान पद पर आसीन होगे जिस पर संसार के अन्य प्रतापी पुरुष होते आये हैं। अभी तुम इस स्थिति में पड़े हो तो क्या, शीघ्र ही उच्चतम विकास के दिव्य प्रदेश में तुम प्रविष्ट होने वाले हो। तुम सर्वेश्वर के पवित्र अंश हो और तुम्हें प्रकृति ने अपनी इष्ट-सिद्धि के लिए पर्याप्त साधन और सामर्थ्य प्रदान किए हैं। तुम एक बार प्रयत्न तो करो।

मनुष्य का स्वभाव ज्यों-ज्यों आत्मिक भाव और आत्मिक जीवन की अभिवृद्धि करता है त्यों-त्यों उसमें सामर्थ्य भी बढ़ते जाते हैं। जैसे-जैसे तुम अपने शरीर के अंग प्रत्यंगों में छिपे सामर्थ्यों को प्रकट करोगे। आविष्कार करोगे-वैसे-वैसे विशेष रूप से महान बनते जाओगे। उच्च विचारों द्वारा जितने अंशों में हम अपने जीवन का विकास कर सकेंगे, उतने ही अंशों में उसका यथार्थ उपभोग कर सकेंगे।

कहते हैं एक बार एक बड़े भारी व्यापारी की पत्नी तार लिए दौड़ी हुई उसके कमरे में, जहाँ वह बैठा व्यापार की कुछ नवीन योजनाएं सोच रहा था, आई और हाँफते हुए बोली- “प्यारे हमने सब कुछ खो दिया है। हमारे जहाज माल-असबाब इत्यादि डूब गए हैं, सारी उम्र के किये-कराये पर पानी फिर गया है हमारी सब बहुमूल्य वस्तुएं जा चुकी हैं। उफ्फ अब क्या होगा? हाय हाय ! हमें कौन पूछेगा?”

पति ने धैर्य दिखाते हुए कहा - “क्या तुम्हें भी मुझसे छीन लिया गया है?”

वह बोली - पागलों की सी बातें क्यों करते हो, मैं तो सदैव तुम्हारे पास हूँ।

और हमारी आदतें तो कहीं नहीं चली गई हैं?

नहीं ! आदतें भला कहाँ जायेंगी?

तब तो निराश होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं हैं। हमने अपनी आदतों की कमाई ही खो दी है। संसार की सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ (आशावादिता, स्वास्थ्य, उत्साह, अध्यवसाय, परिश्रम और प्रेम) अब भी हमारे पास हैं। हम शीघ्र ही सब कुछ पुनः प्राप्त कर लेंगे, तुम धैर्य रखो। कहते हैं कि कुछ वर्षों बाद उनका गृह पुनः धन-धान्य से पूर्ववत पूरित हो गया। जब उनसे सफलता का रहस्य पूछा गया तो उन्होंने कहा “मैं कभी उम्मीद नहीं छोड़ता विपत्ति के काले बादलों से चिंतित नहीं होता वरन् हँसते-हँसते उनका सामना करता हूँ। कठिनाई आने से निराशा का चिन्ह मुख मंडल पर दिखाना अच्छे से अच्छे मनुष्य को विफल बना सकता है।”

अनेक व्यक्ति थोड़ी सी कठिनाई आने पर अत्यन्त अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, घबराने लगते हैं, और ठोकर पर ठोकर खाते हैं। निराशा उनके जीवन को भार बना देती है। हमारी असफलताएँ अधिकाँश में निराशा के अभद्र विचारों से ही प्राप्त होती है और वे अयोग्य मंत्रणाओं, भयपूर्ण कल्पनाओं के ही फल हैं। यदि हम पूर्ण रूप से कल्पना को उत्तम वस्तुओं की ओर चलाया करें और चिंता, दुर्बलता, शंका, निराशा के विचारों से हटकर आशा और हिम्मत के उत्पादक वातावरण में रखना सीख लें तो हमारे जीवन का स्त्रोत एक आनन्दमय जगत में प्रवाहित होने लगे। निराशा एक भयंकर मानसिक रोग है। इससे मुक्ति पाने के लिए विचारों का रुख बदलने की परम आवश्यकता है। धीरे-धीरे अपने हृदय में नाउम्मीदी कमजोरी और निराशा के भावों के स्थान पर इनके प्रतिपक्षी-साहस, हिम्मत, सफलता और आशा के उत्साह-वर्द्धक भावों को जमाना चाहिए। उन्हें अंकुरित, पल्लवित एवं पुष्पित करने के लिए अपनी सद्इच्छाओं का अभिनय पार्ट अवश्य करना चाहिए। तुम जिस कार्य, उद्देश्य या मनोरथ में सफलता लाभ करने की चेष्टा कर रहे हो उसका अभिनय भली-भाँति करो। यदि तुम एक विद्वान बनने की चेष्टा कर रहे हो तो अपने आपको एक विद्वान की ही भाँति रखो वैसा ही वातावरण एकत्रित करो, निराशा निकाल कर यह उम्मीद रखो कि मूर्ख कालिदास की भाँति हम भी महान बनेंगे। निराशा निकाल कर तुम इस एकटिंग को पूर्ण करने की चेष्टा करो। तुम अनुभव करो कि मैं विद्वान हूँ, सोचो कि मैं अधिकाधिक विद्वान बन रहा हूँ। मेरी विद्वता की निरंतर अभिवृद्धि हो रही है। तुम्हारे व्यवहार से लोगों को यह ज्ञात होना चाहिए कि तुम सचमुच विद्वान हो। तुम्हारा आचरण भी पूर्ण विश्वास युक्त हो शंका, शुबाह या निराशा का नाम निशान भी न हो। अपने इस विश्वास पर तुम्हें पूरी दृढ़ता का प्रदर्शन करना उचित है। यह अभिनय करते-करते एक दिन तुम स्वयमेव अपने कार्य को पूर्ण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे।

जिस वस्तु को हमें प्राप्त करना है उसके लिए जितनी मानसिक क्रिया होगी, जितना उसकी प्राप्ति का विचार किया जायगा, उतनी ही शीघ्रता से वह वस्तु हमारी ओर आकर्षित होगी। प्रत्येक वस्तु पहले मन में उत्पन्न की जाती है फिर वस्तु जगत में उसकी प्राप्ति होती है। तुम अपने विषय में अयोग्यता की भावना रखते हो अतः उसी प्रकार की तुम्हारे अन्तःकरण की सृष्टि होती जाती है। तुम्हारी भय की डरपोक कल्पनाएं ही तुम्हारे मन में निराशा के काले बादलों की सृष्टि कर रही है। मनःस्थिति के ही अनुसार अन्य व्यक्ति तुमसे द्वेष अथवा प्रेम करते हैं। और संसार की, समस्त वस्तुएं तुम्हारे पास आकर्षित होकर आती या मुड़कर दूर भागती हैं।

तनिक विचार करो एकलव्य यदि गुरु द्रोण के यहाँ से निराश होकर धनुर्विद्या का अभ्यास छोड़ देता और भ्राँति के विचारों के संपर्क में होकर क्षुब्ध हो जाता तो क्या वह सफलता को प्राप्त कराने वाली वाँछनीय मनःस्थिति स्थिर रख सकता था। उसने निराशा सूचक उनके शब्दों को अपने अन्तःकरण को स्थायी वृत्ति नहीं बनाया। उसके बलवान मन पर भ्राँति का कोई विचार या तिरस्कार अपना प्रभाव न डाल सका। दुर्बल-व्यक्ति चित्त पर ही प्रतिकूल प्रसंग का कुप्रभाव पड़ता है। संसार के मनुष्य, चारों ओर से निकम्मे संदेहात्मक दरिद्र विचार लाकर उसके अन्तःकरण में डालते हैं और उसकी सफलता, प्रसन्नता और उत्साह को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। यदि हम दूसरों की निराशोत्पादक बातों पर ध्यान न दें और उधर से हमेशा के लिए पीठ मोड़ कर आशा के प्रकाश की ओर रुख कर लें तो अल्प काल में ही विकसित पुष्प की भाँति आनन्दित हो सकते हैं।

जब तुम निश्चय कर लोगे कि मेरा निराशा से जीवन का कोई संबंध नहीं होगा। मुझे नाउम्मीदों से कोई सरोकार नहीं है, मैं अब से वस्त्रभूषा पर शरीर पर, व्यवहार में, अपने कार्यों में निराशा का कोई चिन्ह भी न रहने दूँगा मैं पूर्ण शक्ति और मनोरथ सिद्धि में प्रवृत्त हूँगा, निराशापूर्ण वातावरण से मेरा कुछ लेना देना नहीं है। मैंने तो अपनी प्रवृत्ति ही उत्तम पदार्थों की ओर कर दी है। लता और मनोरथ सिद्धि मेरे बाएं हाथ का खेल है मुझे संसार की कठिनाई अपने श्रेय के मार्ग विचलित नहीं कर सकतीं तब याद रखो तुम्हारे हृदय में एक दिव्य शक्ति-शासनकर्ता शक्ति प्रसन्न होगी। आत्म-श्रद्धा और स्वाभिमान प्रबल लगेंगे और तुम आश्चर्यपूर्वक कहोगे कि यह बर्तन न जाने क्यों कर हो गया? तब तुम भी यही कहोगे कि मन को आशापूर्ण, प्रकाशित और प्रसन्न रखने से सफलता प्राप्त करते है, आशावाद की सफलता प्राप्त कराता है।

“हमारे लिए कुछ न होगा।” ऐसा निराशावादी विचार सफलता का विधातक शत्रु होता है। आशावाद बहुत बड़ी उत्पादक शक्ति है जीवन की जड़ है उसके अंदर प्रत्येक वस्तु निवास करती है। यह मानसिक क्षेत्र में प्रविष्ट करते ही बड़ा लाभ पहुँचाती है अतः जिसे नाउम्मीदी से छुटकारा पाने की आकाँक्षा हो उसे उचित है कि अपने मन की स्थिति को उत्पादक, उत्साहपूर्ण, उदार, प्रवर्द्धक और उदात्त रखे।

तुम निराश इसलिए हो कि भय ने और संदेह ने तुम्हारे अन्तःकरण पर अधिकार कर लिया है। तुम्हें अपनी योग्यता के प्रति अविश्वास हो गया है, तुम्हें सफलता और दुर्भाग्य की मानसिक प्रवृत्तियों ने परास्त कर दिया है और होनत्व की भावना ने तुम्हारे मानसिक जगत में तूफान लाकर तुम्हें अस्त-व्यस्त कर डाला है। विचारों की यह परवशता ही तुम्हें डूबो रही है। याद रखो जब-तक तुम किसी कार्य में हाथ नहीं डालोगे, तब-तक अपनी शक्ति का अनुमान कदापि न कर पाओगे। मनुष्य जब तक अपने आपको यह न समझले कि वह कार्य करने की क्षमता रखता है, तब-तक वह पंगु ही बना रहेगा। तुम्हें जो कुछ करना श्रेष्ठ जंचता है, जो कुछ तुम्हारी अन्तरात्मा कहती है उसे दृढ़ संकल्प पूर्व अवश्यमेव प्रारंभ करो। डरो नहीं, शंका, संदेह या अविश्वास की कोई बात न सोचो बल्कि कार्य शुरू कर ही डालो। प्रत्येक मनुष्य कुछ न कुछ जरूर कर सकता है और करेगा यदि अकृतकार्य होकर हिम्मत न हारें। हिम्मत हमेशा बाजी मारती है। तुम अपने सामर्थ्य और निश्चय बलों की अभिवृद्धि करते रहो। संसार में जो करोड़ों मनुष्य निराश हो रहे हैं उसका प्रधान कारण आत्मविश्वास की कमी है। श्रद्धा खो बैठे हैं और दूषित निष्प्रयोजन कल्पनाओं के ग्रास बने हैं तुम इनसे सदैव बचे रहो। सदा सर्वदा आन्तरिक मन की उन्नति भावनाओं के प्रति लक्ष्य किये रहो और अपनी समस्त शक्तियों में अखंड श्रद्धा और पूर्ण विश्वास रखो किसी विशेष मर्यादा तक केवल ऊपरी विश्वास ही मत रखो परंतु भीतरी तह में भी दृढ़ता से विश्वास की अमिट छाप जमा दो। फिर विश्वास के सुमधुर फल देखो। तुम्हारी सब निराशा रफूचक्कर हो जायेगी और अभ्यंतर प्रदेश से अन्नत शक्ति का आविर्भाव होगा।

आज से तुम अपनी क्षूद्रता का चिंतन छोड़ो जब कभी विश्व की विशालता पर विचार करने बैठो तो अपने मन, शरीर, आत्मा की महान शक्तियों पर चित्त एकाग्र करो। शक्ति के इस केन्द्र पर मन स्थिर रखने से कोई दुर्बलता तुम्हारे अन्तःकरण में प्रवेश नहीं कर सकती। जब तुम शक्ति के विशाल बिंदू पर समस्त शक्तियाँ केन्द्रित करोगे तो तुम्हें प्रतीत होगा कि पाषाण में, धातु में, वनस्पति में, प्रकृति में, पशु में और जिस किसी वस्तु में भी विशालता है, उस सब से तुम्हारी विशालता कहीं अधिक है। इन सब की विशालता की एक सीमा निश्चित है, किन्तु तुम्हारी शक्तियों की सीमा अपार है।

जीवन को एक दीप समझिये। उसकी शिखा में सजीवता तभी आवेगी किरणें तभी जगमगाएंगी जब आशा और उम्मीद उसे अपने तेल से परिपूर्ण रखे। उम्मीद के तेल के खत्म होते ही या तो दुःख दर्द के समुद्र में विलीन हो जाना होगा या फिर मृत्यु की शीतल सी गोद में हमेशा के लिए समा जाना होगा।


सुख-दुख में समभाव रखिए !

(श्री. अगर चन्द जी नाहटा)

सुख और दुख जीवन के दो विशिष्ट पहलू हैं, जिस पर भारतीय मुनियों ने बहुत गंभीर चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सूख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महापुरुषों के अतिरिक्त किसी को हो नहीं पाती, यह विश्व का सबसे महान आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तल स्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुख हैं क्या बला? और उसकी प्राप्ति का, अनुभूति का, कारण क्या है? उन्होंने इसी एक प्रश्न पर जीवन को समर्पित कर दिया कि समस्त दुखों के विनाश एवं आनन्द की अनुभूति का मार्ग क्या है?

उनकी विचारधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुख या सुख समझते हैं, यह मिथ्या कल्पना जन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर उन्होंने ऐसे ऐसे मार्ग खोज निकाले जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके।

साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

भौतिक विचारधारा से आध्यात्मिक विचारधारा की भिन्नता यहाँ अत्यंत स्पष्ट हो जाती है। भौतिक दृष्टिवाला बाहरी निमित्तों पर जोर देगा। तब आध्यात्मिक दृष्टिवाला अपनी आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता चला जायगा। उसकी दृष्टि इतनी सतेज हो जायेगी कि बाहरी पर्दे के भीतर क्या है? उसे भली भाँति देख सके और ऐसा होने पर वह मूल वस्तु को पकड़ने का प्रयत्न करेगा। दृष्टाँत के लिए दो व्यक्ति एक स्थान पर पास-पास ही बैठे हुए हैं। अचानक कहीं से उनके मस्तक पर पत्थर आ गिरे। इससे भ्रान्ति में पड़कर एक तो पत्थर को दोषी मानकर उसे हाथ में लेकर उसे पछाड़ा कि उसके खंड-खंड हो गए। दूसरे ने पत्थर पर रोष न कर वह कहाँ से आया, किसने फेंका, क्यों फेंका इत्यादि पर गंभीरता से विचार करके और मुख्यतः दोष जिसका हो, ज्ञात कर उसके शोधन में प्रगति की, दोनों व्यक्तियों के यद्यपि पत्थर लगने की क्रिया एक सी हुई, पर दृष्टि की गहराई के भेद-भावों में व फल में रात-दिन का अन्तर हो गया। यही बात बाह्यदृष्टि व अन्तर दृष्टि की है। बाह्य-दृष्टि बाहरी वस्तु पर दुख-सुख की कल्पना करती है, अंतर दृष्टि अपनी प्रवृत्तियों व भावनाओं की प्रधानता करती है। इसी दृष्टि-भेद के कारण भोगी को जिसमें आनन्द है योगी को उसमें नहीं। योगी को त्याग में आनंद है, भोगी के लिए वह कष्टप्रद है।

उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी दृष्टि को सही बनाना जरूरी है। तभी हम इस द्वंद्व से अतीत होकर समभाव का आनन्द लूट सकेंगे। सभी प्राणियों से मानव में विचारशक्ति की बड़ी भारी विशेषता है। विचारों से हम सुखी होते हैं, विचारों से ही दुखी। विचारों की धारा बदल देने से ही दुःख-सुख की कल्पना बदल जाएगी। किसी जमाने में कोई बात बहुत अच्छी समझी जाती थी पर वही आज अच्छी ही समझी जाती और वर्तमान में भी एक ही वस्तु के विषय में, सबकी राय एक सी नहीं रहती। इसका प्रधान कारण विचार भेद ही है। विचार बदला कि सारा ढाँचा बदल गया।

अधिक गहराई में नहीं भी जा सकें तो दुख-सुख में समभाव रखने के लिए हमारे विचारों को बदलने का एक शब्द मंत्र भी है, जिससे सर्वसाधारण सहज में ही लाभ उठा सकता है। उस चमत्कारी शब्द मंत्र की एक कहानी मैंने विदुषी श्री आर्याबल्लभ जी की व्याख्या में सुनी थी। उसे यहाँ उपस्थित कर रहा हूँ :-

एक बड़े भारी सम्राट थे, जिन्हें प्रतिपल विविध परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। कभी मन दुख की अनुभूति में और कभी सुख की अनुभूति में हर्ष एवं शोक से चलायमान बना रहता था, सम्राट ने यह सोचकर कि इस भीषण द्वंद्व के निवारण का कोई उपाय मिल जाय तो अच्छा हो। उसने अपने विचारक सभासदों व मंत्रियों के सामने अपने विचार रखते हुए कहा कि इसके निवारण का कोई सरल उपाय बतलाइये। जिससे समय-समय पर हर्ष एवं विषाद से मन आँदोलित होता है, वह रुक जाय। यह रोग केवल सम्राट को ही नहीं, सभी को था, पर इसके निवारण का उपाय कोई भी नहीं बतला सकें, आखिर मंत्री को आदेश दिया गया कि तुम्हें इसका रास्ता निकालना ही पड़ेगा, अन्यथा दंडित किये जाओगे। सम्राट की आशा का पालन दुष्कर था अतः मंत्री ने छः महीने की मुद्दत ली ओर लगा इधर-उधर पर्यटन में, क्योंकि पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष के बिना इसका उपाय मिलना संभव न था। अन्त में एक उच्च कोटि के योगी से भेंट हुई, जिन्होंने इसका उपाय बतलाते हुए कहा कि सम्राट को एक ऐसी अंगूठी बना के दो जिसके बीच में या चारों ओर यह मंत्र लिखा हो कि “यह भी चला जायगा”। सम्राट को कह देना कि जब भी उनका मन सुख एवं दुख से आन्दोलित हो। इस अंगूठी में लिखे हुए मंत्र पर मनन करे इससे सुख-दुख की क्षणिकता का ध्यान आने पर मन में हर्ष और शोक का द्वंद्व नहीं होगा। दुख आता और चला जाता है ओर सुख भी सदा नहीं रहता इस रहस्य के जानने से मन समभाव को पा लेता है।


भारतीय देवभाषा की विशेषताएं

(प्रोफेसर जे. पी. सिन्हा)

शब्दोच्चारण में प्रत्येक व्यंजन के साथ किसी स्वर का संयोग होता है। स्वरों की रचना हमारे सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने ऐसी दूरदर्शिता के साथ की है कि उसका प्रभाव हमारे शरीर और मन पर बड़ा ही उत्तम होता है। संसार की अन्य किसी भाषा की अपेक्षा भारतीय भाषा में यह विशेषता है कि इस भाषा को बोलने से एक प्रकार का सूक्ष्म योगिक व्यायाम होता चलता है जिसके कारण बोलने वाले के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा उत्तम प्रभाव पड़ता है। ऐसी ही विशेषताओं के कारण भारतीय भाषा को देवभाषा कहा जाता है। नीचे स्वरों संबंधी विशेषताएं दी जाती हैं।

‘अ’ का उच्चारण कंठ द्वारा होने से हृदय पर प्रभाव पड़ता है, अतएव जितनी बार ‘अ’ का उच्चारण किया जायेगा, उतना ही बार हृदय का संचालन शीघ्रता के साथ होगा। शरीर में रुधिर शुद्ध होने की क्रिया हृदय में होती है, क्योंकि किसी विकृत अंग के लिए जो रुधिर जाता है, उसको भेजने वाला हृदय ही है। यदि यह रुधिर उस विकृत अथवा रोगी अंग में पहुँचने के पूर्व शुद्ध कर दिया जाय तो उसका प्रभाव यह होगा कि रोग दूर हो जायेगा। इसके विपरीत यदि अशुद्ध अथवा दूषित रुधिर को शरीर में दौड़ने दिया जाये, तो विकृत अथवा रोगी अंग अच्छा होने के बजाय और अधिक रोगी हो जायगा। ‘अ’ स्वर प्रत्येक अक्षर में शुद्ध रक्त का संचार करता है। मंत्र-शास्त्र में ‘अ’ स्वर रचनात्मक शक्ति सम्पन्न माना गया है।

‘आ’-स्वर के उच्चारण से फेफड़े के ऊपर भाग तथा सीने पर प्रभाव पड़ता है। यह ऊपरी तीन पसलियों का बलवान बनाता, खाना ले जाने वाली नली को शुद्ध, दिमाग को संचालित, आलस्य को दूर तथा फेफड़ों को उत्तेजित करके उनके ऊपरी भाग को शुद्ध करता है। इसके अभ्यास से दमा और खाँसी के रोग अच्छे होते हैं। इस स्वर का अभ्यास उन लोगों को तो अवश्य ही करना चाहिए, जिन्हें क्षय रोग होने की संभावना हो और जो झुककर अंधेरे में काम करते हैं।

‘इ’-ई-के लम्बे उच्चारण का प्रभाव गले मस्तिष्क पर पड़ता है। इसके उच्चारण से गले, तालू, नाम और दिल के ऊपरी भाग की क्रिया विशेष रूप से उत्तेजित होती है। श्वासेन्द्रिय का कफ, बलगम एवं आंतों में जमा हुआ मल निकल कर इन अंगों की सफाई हो जाती है। इसका प्रभाव शरीर के ऊपरी भाग पर भी पड़ता है और सिरदर्द तथा दिल के रोगों के लिए लाभदायक है। विशेषकर ऐसे लोगों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है, जो उदास वृत्ति और क्रोधी स्वभाव के होते हैं।

‘उ-ऊ’-का प्रभाव जिगर, पेट और आँतड़ियों पर पड़ता है और पेठू के भार को कम करता है। जो स्त्रियाँ सदा पेठू के निम्न भाग के रोग से पीड़ित रहती हैं, उन्हें ‘उ-ऊ’ के उच्चारण से बड़ा लाभ होता है। कितने ही दिनों का कठिन कब्ज क्यों न हो, इसके द्वारा दूर किया जा सकता है। यह स्त्रियों की कोख के लिए भी बहुत उपयोगी है।

‘ए-ऐ’ के उच्चारण का प्रभाव गले और श्वास-नलिका के उद्भव स्थान पर पड़ता है और गुर्दे को उत्तेजित करता है। इसका बारम्बार का उच्चारण मूत्र संबंधी सब रोगों को दूर तथा पेशाब उतारने की औषधि का काम करता है। इस स्वर के प्रयोग का लाभ विशेष रूप से गाने वालों अध्यापकों तथा अधिक देर तक बोलने वालों को होता है और नलियों के अंदर की लुआबदार झिल्ली को स्वस्थ बनाता है।

‘ओ-ओ’-का प्रभाव उपस्थेन्द्रिय और जननेन्द्रिय पर होता है और वह उसको स्वाभाविक रूप से काम करने में सहायता देता है। जब इसके उच्चारण का अच्छा अभ्यास हो जाएगा तब यह अनुभव होगा कि जो आंतें तथा नसें सुस्त थीं, वह खुलकर स्वाभाविक कार्य करने में लगी हैं। यह सीने के मध्य भाग को उत्तेजित करता है और निमोनिया तथा प्लुरेसी के लिए बहुत लाभदायक है।

‘अं’- के उच्चारण से नासिका द्वारा ली हुई साँस के साथ जो ऑक्सीजन या प्राणवायु शरीर के भीतर जाता है, वह दूषित रुधिर को शुद्ध तथा लाल बनाता है। नासिका द्वारा साँस लेने में नासिका और श्वास नलिका काम में आती हैं, इसलिए इन अंगों को विकार रहित एवं निरोग होना अत्यावश्यक है, और इसी अभिप्राय से हमारे ऋषियों ने प्रत्येक बीज मन्त्र के अन्त में ‘म्’ अथवा अनुस्वार को रखा है तथा उसका देर तक लम्बा उच्चारण करना बताया है। स्वरों के उच्चारण करने में मुख खुलता है और अनुस्वार या ‘म्’ के उच्चारण से ओष्ठ बन्द हो जाते हैं। मानों प्रथम स्वरों के उच्चारण द्वारा शरीर के समस्त विकारों को दूर कर ‘म्’ द्वारा ओष्ठ रूपी किवाड़ बंद कर लिये जाते हैं, जिससे वह विकार पुनः प्रतिष्ठ न हो सके।

‘अः’-का उच्चारण जिह्वा तथा तालू के अग्र भाग को छूता है, जिसका प्रभाव यह होता है कि मस्तिष्क में संचालन उत्पन्न होने से एक प्रकार रस स्रावित होता है, जो कि कण्ठ द्वारा भीतर जाकर शरीर के सब विकार दूर करता है। सीने और गले में उत्तेजना होती है और वह सबल और पुष्ट बनते हैं।

इस प्रकार यह स्वर शरीर के हृदयादि मुख्य अंगों को संचालित और उत्तेजित कर रुधिर को शुद्ध कर समस्त विकारों को दूर कर देते हैं। जब नाड़ियाँ और इन्द्रियाँ स्वस्थ रुधिर के तीव्र संचार के कारण अपना-अपना काम स्वाभाविक रूप से काम करने लग जाती हैं, तब वह केवल बाह्य रूप से रूप, स्वरूप, आकार-प्रकार तथा बल में ही उन्नति को प्राप्त नहीं होतीं, बल्कि आन्तरिक गुणों में सहिष्णुता और रोगनाशक शक्ति में भी उन्नति करती हैं।


आदेश बनाम विवेक

(राजर्षि श्री. पुरुषोत्तमदास जी टंडन)

मध्ययुगीन काल में जो हिन्दू राज्य थे उनका केन्द्र अधिकतर कोई एक व्यक्ति होता था। शासन का सूत्र उसके अथवा उसकी इच्छा के अनुसार चुने हुए मंत्रियों के हाथ में रहता था। साधारणतया परम्परा शैलियों के अनुसार कार्यपालन होता था। परन्तु आवश्यकता पड़ने पर परम्परा से हटकर भी निश्चय किये जाते थे। तथ्यों का प्रभाव था किन्तु किसी काल के संबंध में यह नहीं कहा जा सकता कि शासन का संपूर्ण आधार कोई एक नियत ग्रन्थ ही रहता था। समय-समय पर स्मृतियाँ रखी गयीं और उन पर टीकाएं बनीं। उन सब का आदर होता था। परंतु यह नहीं होता था कि किसी एक ग्रन्थ की लिखित आज्ञाएं जनमत या मंत्रियों के मत की अपेक्षा शासन में अधिक अधिकार प्राप्त करती रही हों। गणराज्यों में और भी अधिक जनता का मत ग्रन्थों की अपेक्षा बलवान था।

परम्पराओं का बल रहता था। किन्तु यह भी समझना भूल होगी कि परम्पराओं से हटकर विचार करना असम्भव अथवा कठिन था। बहुत से लोग प्राचीन या मध्ययुगीन भारतीयों को और उनके धर्म को रूढ़िवादी कहते हैं। इसमें केवल आँशिक सत्य है। संसार भर के स्थायी और पुराने शासनों में रूढ़ि और परम्परा का स्थान है। इस देश में सम्भवतः उनका बल अधिक था। परन्तु मौलिक रीति से भारत बुद्धिवादी रहा है। ग्रन्थों का बहुत मान करते हुए भी उसने कभी अपनी विचार धारा को किसी ग्रन्थ में सदा के लिए सीमित नहीं किया। ग्रन्थों का गहरा प्रभाव होते हुए भी यहाँ बुद्धि का ही वैभव था। ईश्वर के नीचे बुद्धि ही परमतत्व माना गया था ओर सब शास्त्र बुद्धि की सीमा के भीतर और उसके सजग नियंत्रण के अधीन थे। गीता का यह वाक्य -

“यवानर्थ उदपान सर्वतः सम्प्लुतोदके।

तावान सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।”

“सब स्थानों में जल फैला होने पर एक गड्ढ़े का जो उपयोग है वही ब्रह्मज्ञान के लिए सब वेदों का है।”

ज्ञान अथवा बुद्धि की महिमा को वेदों के भी ऊपर रखता है। बृहस्पति स्मृति का यह वाक्य -

“केवलं शास्त्रमाश्रत्य न कर्तव्यो विनिर्णयः।

युक्तिहीन विचारेतु धर्महानिः प्रजायते॥”

केवल शास्त्र का सहारा लेकर कर्तव्य का निर्णय नहीं होता। जिस विचार में युक्ति नहीं है। उससे धर्म की हानि होती है। शास्त्र को युक्ति अथवा बुद्धि से नियंत्रित बताया है। वेदों की व्याख्या के संबंध में भास्कराचार्य का यह प्रसिद्ध वाक्य ‘तर्को वै ऋषिरुक्तः” तर्क ही वेदों के अर्थ करने वाला ऋषि कहा गया है, बुद्धि की श्रेष्ठता का निर्देश करता है। मेरा तात्पर्य यह है कि प्राचीन काल की परम्पराओं के बीच भी यह देश बुद्धि का मुख्य सहारा लेता था। जो बात समय के अनुकूल उचित होती थी उसको स्वीकार करने में हमारे देश में प्राचीन काल से बराबर ग्रन्थों और परम्पराओं से हट कर काम किया है। पुस्तकों के वाक्यों की अपेक्षा औचित्य पर कितना अधिक ध्यान दिया जाता था यह इस पुराने वाक्य से स्पष्ट है।

“उषयुक्तमनुपयुक्तं कर्त शक्यं नहि वचन सहस्रैः”

अर्थात् एक सहस्र (ग्रंथों के) वचन भी उचित को अनुचित नहीं कर सकते।

यह बात मानी हुई है कि हमें इस देश में गणतंत्र रखना है। स्पष्ट ही गणतंत्र में जनता का मत ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक चलेगा। ऐसे तंत्र की आधारशिला बुद्धि और युक्ति हो सकती है, कोई ग्रन्थ नहीं। इस सिद्धान्त को हमारा शिक्षित वर्ग जितना शीघ्र स्वीकार कर लेगा उतना ही शीघ्र हम जनता में फैले हुए मूढ़ग्राह से ऊपर उठाकर जनतंत्रीय शासन के लिए उपयुक्त बना सकेंगे।

क्या आपके अंक गुम होते हैं?

यहाँ से हर महीने ठीक समय पर दोबारा जाँच कर “अखंड ज्योति” भेजी जाती है। न पहुँचने के कारणों तथा उपायों के संबंध में यह ध्यान रखना चाहिए।

(1) डाकखाने में तलाश कीजिए।

(2) देखिए कि आपके नाम का कोई दूसरा व्यक्ति तो आसपास में नहीं है जिसे गलती से पोस्टमैन अंक दे जाता हो।

(3) अंक आपके पीछे आने पर कोई व्यक्ति दफ्तर में या घर में उसे असावधानी से गड़बड़ तो नहीं कर देता।

(4) पत्रिका की चिट पर जो पता लिखा आता है उसमें कोई भूल तो नहीं रहती? पता अशुद्ध हो तो उसे तुरंत सूचना देकर शुद्ध कराइए। अपना पूरा पता साफ अक्षरों में लिखिए।

(5) ग्राहक नंबर प्रायः हर वर्ष बदल जाता है अपना चालू वर्ष का ग्राहक नंबर याद रखिए और हर पत्र में उसको लिखना न भूलिये।

(6) पता बदलवाना हो तो ता. 25 तक उसकी सूचना मथुरा पहुँच जानी चाहिए।


लड़के और लड़की में भेदभाव मत कीजिए।

(श्री आचार्य गिजुभाई)

पुराने लोगों का आज भी यह ख्याल है कि औरतों की कोई आजादी नहीं हो सकती, न वे अकेली कहीं जा सकती हैं, न घूम फिर सकती हैं। लेकिन आज का नौजवान इसे मानने से इनकार करता है। हमारे लड़के अब कालेजों में पढ़ने लगे हैं, और वे चाहते हैं, कि उनके साथ उनकी औरतों को भी आगे बढ़ना चाहिए। इस मामले में माँ-बाप की दखलंदाजी लड़कों को अखरती है। आज के नौजवान अपने लिए अपनी ही तरह पढ़ी-लिखी पत्नियाँ चाहते हैं और सुखी और संतोषी जीवन के लिए यत्नशील हैं।

कोई कितना ही धनवान और ऐश्वर्यवान क्यों न हो, दिन भर की मेहनत के बाद घर आने पर वह थोड़े सुख की कामना जरूर करता है लेकिन अगर घर में गृहिणी अनपढ़ और अनाड़ी है, तो वह कभी सुखी हो नहीं सकता। ऐसी गृहिणी के बुरे संस्कार बच्चों पर भी असर डालते हैं, और इस तरह हमारी भावी प्रजा का भविष्य धुँधला हो जाता है। जिस घर की यह हालत हो, वहाँ अकेला पैसा क्या कर सकता है? बड़े-बड़े महलों और वस्त्राभूषणों का क्या मूल्य रह जाता है?

मकान में जो महत्व दीवालों का है, समाज में वही महत्व लड़कों की शिक्षा का है, लेकिन लड़कियों की शिक्षा तो मौलिक चीज है, और उसका संबंध जड़ से है-बुनियाद से है। कालेजों की शिक्षा भी जीवन को संवारने सजाने के लिए ही है। इसलिए लड़कियों की शिक्षा पर भी ज्यादा से ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए।

हमारे समाज में माता-पिता लड़के और लड़की के बीच बड़ा भेदभाव रखते हैं। पक्षपात की हद हो जाती है। उनका ख्याल होता है, कि लड़की पराये घर जाने वाली है। उसे कौन पुस्तकें पड़नी हैं और कचहरी जाना है? इसीलिए पढ़ाने में भी माँ-बाप भेद करते हैं। खिलाने-पिलाने और पहनाने-उढ़ाने में भी यह भेद अपना काम करता है। लड़के को अच्छा खिलाया जाता है, अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलायी जाती है, जबकि लड़कियों को घरों में बंद रखा जाता है। यह निरा अन्याय है। भगवान ने तो लड़कों और लड़कियों में एक सी ताकत रखी है। दो आँखों में कोई भेद कैसे कर सकता है? पुराने जमाने में लोगों ने न जाने कैसे इसको शुरू किया और सह लिया। लड़की बेचारी को दो पैसे की वसीयत भी नहीं मिलती, और लड़के अकेले लाखों की दौलत उड़ाते हैं। एक को बैठे बिठाये लाखों मिल जाते हैं, जब कि दूसरी पर हजार पाँच सौ का खर्च करके, उसे पराये घर भेज दिया जाता है। अगर इसे इस नजर से भी देखे, तो यह जरूरी मालूम होता है कि चूँकि लड़की माँ बाप के घर कुछ ही साल रहती है, इसलिए उसका पालन पोषण ज्यादा अच्छा होना चाहिए।

लड़कियों की शिक्षा में केवल उनकी पढ़ाई लिखाई का ही सवाल नहीं आता, बल्कि और बातें भी आती हैं। जरूरी है कि हर एक कन्या पाठशाला के अहाते में कन्याओं के लिए खेल कूद और कसरत के साधन प्रस्तुत किये जायं। मैं समझता हूँ कि हर मदरसे में लड़कियों के दौड़ने के लिए लंबे चौड़े मैदान, झूलने के लिए झूले और खेल कूद के काफी सामान होने चाहिए। आज कल हमारे औरतों की तंदुरुस्ती दिन दिन गिरती जा रही है। सुबह शाम चूल्हा फूँककर और धूल धुएँ में रहकर वे काफी दुर्बल हो रही हैं। उनकी गिरती हुई तन्दुरुस्ती को मजबूत बनाने के लिए कन्याशालाओं में शुरू से खेल-कूद और कसरत के साधनों का होना आवश्यक है। पुराने लोगों का कहना है कि हमारी संतान दिन-दिन कमजोर होती जा रही है। पुराने समय में स्त्रियाँ घर में और बाहर काफी मेहनत कर लेती थीं। घर गृहस्थी के और खेती बाड़ी के कई काम मेहनत तलब होते थे और इन सब कामों में वे पूरा-पूरा हाथ बंटाती थी। लेकिन अब ये बातें नहीं रही, नये-नये परिवर्तन हो रहे हैं। इसलिए ये सुधार आवश्यक हो गये हैं। इसलिए अब ये सुधार आवश्यक हो गये हैं।

यह हो सकता है, कि लड़कियाँ कन्या पाठशालाओं में इतिहास भूगोल वगैरह न सीखें। लेकिन यह मुनासिब नहीं कि वे कमजोर रहें और अनपंग हो जायं। सच पूछा जाय, तो आवश्यकता मन, मस्तिष्क और हृदय तीनों की शिक्षा की है। आज हमारे स्त्री-समाज में मस्तिष्क की शिक्षा का कोसों पता नहीं है। यही कारण है, कि हमारे महिला जगत का जितना विश्वास भूत-प्रेत, झाड़ फूँक और जंतर-मंतर में है, उतना वैज्ञानिक उपचार में नहीं। घर में किसी बालक या बड़े के बीमार पड़ते ही डॉक्टर और वैद्य के बदले ओझा और पंडित को बुलाया जाता है और झाड़-फूँक या गण्डें-डोरों से रोग को मिटाने की कोशिश की जाती है। इसका मतलब यही कि बुद्धि की शिक्षा का अभाव है।

जब लड़कियों के मदरसे में संगीत सिखाने या कसरत कराने की बात चलती है, तो अल्पबुद्धि लोग आज भी नाक भौं सिकोड़ते हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि यह कैसी बात है, कि हमारे लड़के तो गा भी सकते हैं, और कसरत भी कर सकते हैं लेकिन लड़कियाँ इनके पास तक नहीं फटक सकतीं? आखिर संगीत में और कसरत में नुकसान क्या है? भगवान ने जिन्हें सुँदर कण्ठ दिया है, वे सब गा सकते हैं। लड़कियों को इंकार तभी किया जा सकता है, जब लड़कों को भी इनसे वंचित रखा जाय। अन्यथा यह कैसा विचित्र न्याय होगा कि लड़के सब कुछ कर सकें और लड़कियाँ कुछ न कर सकें?

परमात्मा ने भेदभाव के लिए ये लाल नहीं दिये हैं। हम तो परमेश्वर की तरफ से अपने इन नौनिहालों के ट्रस्टी हैं और ट्रस्टी के नाते हमारा कर्त्तव्य हो जाता है कि जो चीज हमें सौंपी गई है, हम उसकी पूरी-पूरी चिन्ता रखें।

लाख, दस लाख रुपयों की वसीयत छोड़ जाने की अपेक्षा यह कहीं आवश्यक और अच्छा है, कि अपने बच्चों को सच्ची और अच्छी शिक्षा देकर उन्हें उत्तम नागरिक बनाया जाय।

लड़कों और लड़कियों के साथ माँ-बाप को एक सा बर्ताव करना चाहिए। खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने और लिखने का सारा प्रबंध लड़कियों के लिए भी हो, लड़कों और लड़कियों, दोनों को एक सी शक्ति और आत्मा दी है। अतः उन्हें विकास का समान अवसर देना चाहिए। कहा जाता है, कि लड़कियाँ लक्ष्मी की अवतार हैं। यदि उन्हें घरों में और मदरसों में अच्छी शिक्षा मिली तो वे इस संसार में स्वर्ग का निर्माण कर सकेंगी।


Quotation

जिसका मन ईश्वर परायण है वही सत्पुरुष है। जिसने कामिनी काँचन का त्याग कर दिया है वहीं सत्पुरुष है। -रामकृष्ण परमहंस,

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आवश्यकता चावल की होती है, परंतु चावल बोने से वह उपजता नहीं, चावल प्राप्त करने के लिए बोना पड़ता है धान। धान में छिलका यद्यपि अनावश्यक है परंतु छिलके बिना धान नहीं उगता। इसी प्रकार शास्त्र विहित आचारों का पालन किए बिना कभी धर्म लाभ नहीं होता।

-रामकृष्ण परमहंस,

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गाय का तुरन्त का जन्मा हुआ बच्चा जैसे बीसों बार गिरने उठने पर कहीं खड़ा हो सकता है इसी प्रकार साधना करते समय साधक अनेक बार गिर पड़ने पर कहीं अन्त में सिद्धि लाभ करता है।

-रामकृष्ण परमहंस,


आत्मोन्नति के लिए परमार्थ की आवश्यकता।

आत्मा को समुन्नत, सुविकसित बनाना, मानव जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। कारण यह है कि निरन्तर सताते रहने वाले विविध प्रकार के अभाव, दुख, शोक, पाप, ताप, आत्मोन्नति के बिना मिट नहीं सकते। यदि सांसारिक और मानसिक क्षेत्र में सुख-शान्ति प्राप्त करनी है तो एक मात्र उपाय यही है कि आत्म-ज्ञान की, आत्म बल की अभिवृद्धि की जाय। महान बनने का, आनन्द के चरम लक्ष्य तक पहुँचने का और कोई मार्ग नहीं है।

आत्मोन्नति एकाँगी नहीं होती, केवल एक से ही वह पूरी नहीं हो सकती वरन् तत्संबन्धी सभी उपकरण जुटाने पड़ते हैं। पहलवान का इच्छुक व्यक्ति केवल मात्र व्यायाम पर जुटा रहे और पौष्टिक भोजन, तेल, मालिश, ब्रह्मचर्य, विश्राम आदि की उपेक्षा करे तो उसका सफल होना कठिन है। यदि दीवार ही बिनते जायं और पटाव, किवाड़, छत, फर्श आदि बनाने की ओर ध्यान न दिया जाय तो मकान बनकर तैयार नहीं हो सकता। डॉक्टर बनने का इच्छुक यदि व्यक्ति दवाएं बनाने में ही दिन-रात लगा रहे, और निदान परिचर्या, चीरफाड़, निघंटु आदि को व्यर्थ समझ कर उनसे विमुख रहे तो उसका सफल डॉक्टर बनना असंभव है। आत्मोन्नति के सुव्यवस्थित साधनों के संबंध में आध्यात्म विद्या के तत्वदर्शी आचार्य सदा से सावधान रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्यों की सर्वांगीण उन्नति पर सदा से ही पूरा पूरा ध्यान रखा है और इस संबंध में बड़े नियमों प्रतिबंधों एवं उत्तरदायित्वों का शास्त्रों में अनेक प्रकार का वर्णन किया है। व्यवहारिक जीवन उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, लोक सेवा एवं स्वार्थ त्याग से ओत-प्रोत आचरणों का अधिकाधिक अवसर आना उन अवसरों पर अपना उत्तरदायित्व सफलतापूर्वक पूरा किया जाना प्रत्येक साधके के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस प्रकार के आचरणों को “भूमि निर्माण” कहते हैं। अच्छी उपजाऊ, नरम, भली प्रकार जोती हुई जमीन में ही बीज बोने पर अच्छी फसल पैदा होती है। उपरोक्त प्रकार के आचरणों के अधिकाधिक अवसरों को बुलाना और उनके संबंध में अपना उत्तरदायित्व अधिक से अधिक तत्परता से पूरा करना यही आत्मिक भूमिका का निर्माण है। ऐसी भूमि में ही साधना के बीज जमते हैं और जीवन मुक्ति एवं परमानंद की कल्याणकारिणी फसल उपजती है।

मनुष्य में दैवी तत्वों की अपेक्षा साधारणतः पाशविक तत्वों की ही अधिकता होती है। इसलिए वह स्वयं दूसरों से अधिक लाभ उठाने और स्वयं दूसरों के लिए कुछ न करने की इच्छा रखता है। उसके अधिकाँश कार्य इसी दृष्टिकोण से होते है। अपनी कठिनाईयों दूर करने और समृद्धियों को बढ़ाने में वह दैवी तत्वों की सहायता चाहता है पर उन तत्वों के पोषण के लिए कुछ नहीं करना चाहता। इस पशुवृत्ति को गीता में भगवान कृष्ण ने बड़ी कड़ाई और सख्ती के साथ आड़े हाथों लिया है। ‘पहले दो, तब मिलेगा, के सिद्धान्त का वज्र समर्थन करते हुए गीता में कहा है कि -

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वो ऽस्तिवष्ट कामधुक्॥

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परम वाप्स्य थ॥

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविताः।

तैर्दत्तान प्रदायैभ्यों यों भुँक्ते स्तेन एव सः॥

गीता 3/10/13/32

अर्थात्-भगवान ने मनुष्य के साथ-साथ देवी तत्व को भी उत्पन्न किया और घोषणा की कि इसके द्वारा तुम लोग उन्नति करोगे एवं अपनी सब मनोकामनाओं को पूर्ण करोगे। परन्तु स्मरण रखो इस देवी तत्व की उन्नति तुम्हें भी करनी है। तभी वह तुम्हारी सहायता करेगी। प्रत्युपकार के आधार पर ही कल्याण हो सकता है। जब मनुष्य देवत्व का पोषण करेंगे तब वे बदले में इष्ट योग प्रदान करेंगे। जो प्रत्युपकार से बचना चाहता है और दैवी सहायता की याचना करता है वह पक्का चोर है।

इससे आगे के श्लोकों में भी भगवान ने इस संबंध में और अधिक स्पष्टीकरण किया है वे कहते हैं, जैसे यज्ञ से वर्षा से अन्न उत्पन्न होता है। अन्न से प्राणियों के जीवन में स्थिरता होती है। वैसे ही दैवी तत्व (यज्ञ) के फलस्वरूप ही आत्मकल्याण हो सकता है। अपनी शक्तियाँ दैवत्व के पोषण में खर्च करो, बदले में जो मिले उसमें संतोष करो तो तुम सब पापों से छूट जाओगे। यदि अपने ही मतलब की फिराक में फिरोगे तो पाप खाओगे।

भगवान के उपरोक्त अभिवचनों में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि पहले, किस ओर से होनी चाहिए। न तो मुफ्त में लेने की व्यवस्था है और न अमुक लाभ मिलने के उपरान्त अमुक बदला चुका देने वाली शर्त ही। सिद्ध बाबा को चरण स्पर्श मात्र से प्रसन्न करके अष्ट सिद्ध, नव निद्धि प्राप्त कर लेने की इच्छा करने वाले मुफ्त खोरों और “बेटा हो जाय तो नारियल चढ़ाने” की शर्त रखने वाले मुनाफाखोरों को गीता ने बुरी तरह लताड़ दिया है। ऐसे लोगों को अध्यात्मिक भाषा में “अनाधिकारी” कहते हैं। अनाधिकारी का तात्पर्य है स्वार्थी, अनुदान, अविश्वासी, अश्रद्धालु ऐसे लोगों के हाथ में यदि दैवी शक्ति चली जाय तो वे उसके द्वारा संसार में केवल अनर्थ ही उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए सृष्टि के आदि से ही यह सावधानी बरती जाती रही है कि अनाधिकारी लोगों के हाथ में ब्रह्म शक्ति न जाने पाये।

आत्मोन्नति की शिक्षा देने के साथ-साथ ऋषियों ने यह बराबर ध्यान रखा है कि अधिकारी बनते जावें उनकी पात्रता में अभिवृद्धि होती जावे। पात्रता और साधना इन दोनों पहियों को साथ-साथ बराबर रखने में धैर्य और सावधानी से काम लेते रहे हैं। जितनी पात्रता बढ़े उतनी ही साधना का स्तर ऊंचा उठाया जाता है। कुपात्रों को अति ऊँचे स्तर की साधना बताकर आध्यात्मिक असंतुलन उत्पन्न कर देने का परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।

प्राचीन इतिहास पर दृष्टिपात करने से ऐसा प्रतीत होता है कि आत्म-ज्ञान के शिक्षकों ने अपने छात्रों को परम उपयोगी अमृतमयी शिक्षा देने के साथ-साथ उनके सद्गुणों का विकास करने वाले कष्ट साध्य अवसर उत्पन्न करने में कभी झिझक नहीं की है। क्योंकि देवत्व का पोषण करके तब दिव्य लाभ प्राप्त करने की सनातन नीति का अवलम्बन किये बिना वे सफल हो नहीं सकते थे इसलिए वे कष्ट उनके लिए आवश्यक हैं। उद्दालक, धौम्य, अरुणि, उपमन्यु, कच, श्लीमुख, जरुत्कार, नचिकेता, शैण, विरोचन, जाबालि, सुमनस, अम्बरीष आदि अनेक शिष्यों की कथाएं सर्वविदित हैं, उन्होंने अपने गुरुओं के आदेशानुसार बड़े-बड़े कष्ट सहे और बताये हुए कार्यों को पूरा किया। दशरथ का अपने प्राणप्रिय बच्चों का दे देना, हरिश्चंद्र का असाधारण कष्ट सहना, मोरध्वज का अनोखा-आदर्श उपस्थित करना, गुरुओं के आदेशानुसार ही हुआ था। स्थूल दृष्टि से यह कार्य उनके गुरुओं की हृदयहीनता के परिचायक कहे जा सकते हैं पर सच्ची बात यह है कि उन कष्टसाध्य परीक्षाओं ने ही काल के चबेना, तुच्छ मानव प्राणियों को इतना महान बनाया था। इन कष्टों से वे एक अवज्ञा मात्र से ही आसानी से बच सकते थे पर वे ऐश आराम से दिन काटते हुए मर जाने वाले असंख्य कीट पतंगों की तरह विस्मृति के अंधकार में लुप्त हो जाते और चौरासी के चक्र में घूमते रहते। उन गुरुओं की हृदयहीनता में कितनी अपार दया भरी थी इसका अनुमान लगाना कठिन है।

राजा दलीप संतान रहित थे। गुरु के आश्रम में गये कि प्रभो, हमारा वंश डूबने से बचाया जाना चाहिए। वशिष्ठ जी ने आज्ञा दी दैवी सहायता प्राप्त करने के लिए दैवत्व का पोषण आवश्यक है। रानी सहित यहाँ आकर रहो और हमारी गौएं चराने के लिए ग्वाले का काम करो। दिलीप जानते थे कि स्वार्थपरता को बनी हुई सूक्ष्म मानसिक ग्रंथियां ही जीवन में अभाव और दुख उत्पन्न करती हैं उन ग्रन्थियों का शमन त्याग उदारता और परमार्थ का आचरण करने से ही हो सकता है। उन्होंने ऋषि की आज्ञा में अपना परम कल्याण समझा और राजपाट छोड़कर गौएं चराने लगे, एक दिन तो सिंह से गौ बचाने के लिए उन्हें अपना प्राण तक समाप्त करने का साहस दिखाना पड़ा। ऐसे ही साहसों से वे मनः ग्रन्थियाँ, संस्कार पिडिकाएं फूटती हैं जो संतान न होने से अभावों का मूल कारण होती हैं।

दलीप ने यथा समय संतान पाई। कोई आज का आध्यात्मिक साधक होता तो वशिष्ठ जी की चापलूसी करने में सारी चालाकी खर्चा कर देता पर त्याग के नाम पर घंटे भर का समय या कानी-कौड़ी का नुकसान उठाने को भी तैयार न होता। वह सीधी उंगली घी न निकलते देखता तो डराता, धमकाता, यजमान न रहने की धौंस जमाता, निन्दा करता या फिर यह शर्त पेश करता कि मेरा बेटा हो जाएगा तो उसके ब्याह में आपको कुछ न कुछ दक्षिणा अवश्य दूँगा। इस प्रकार के व्यक्ति दैवी सहायताओं तक कितने लाभान्वित हो सकते हैं इस संबंध में कुछ कहा नहीं जा सकता।

मनुष्य में पशुता, स्वार्थपरता अधिक होने के कारण, सद्गुरु इस बात के लिए प्रयत्नशील रहते हैं कि शिष्य को परमार्थ के लिए प्रेरित करने में अपने व्यक्तिगत प्रभाव का भी उपयोग किया जाय। त्याग और उदारता का छोटा सा बोझ भी नहीं उठाना चाहता धीरे-धीरे करके उसे कुछ न कुछ करने को अवश्य तत्पर किया जाय सभी जानते है कि अपरिग्रही ब्रह्मपरायण एवं अपनी आत्मशक्ति से संसार पर शासन करने वाले ऋषिकल्प ब्रह्मवेत्ता का भोजन उसकी झोंपड़ी पर पहुँच सकता है। पर वे इसे पसंद नहीं करते वरन् लोगों के घरों पर जाकर भिक्षा माँगते थे ताकि लोगों को अपनी दानवृत्ति चरितार्थ करने का अवसर मिले। गुरुदक्षिणा के नाम पर भी लोग अधिक से अधिक त्याग करते थे। निर्लोभ ऋषियों को स्वर्ण और मिट्टी बराबर है वे प्राप्त धन को चिकित्सा, यज्ञ, विद्याध्ययन आदि लोकहित के कार्यों में ही खर्च करते थे उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताएं इतनी स्वल्प थी कि उसके लिए किसी के धन या दान की आवश्यकता नहीं पड़ती। दान का धन तो अमानत है जिसे सत्पुरुष एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ से खर्च कर देते हैं। आज भिक्षा की पुण्य परम्परा अत्यन्त ही दूषित हो गई है। कुपात्र एवं हरामखाऊ लोगों ने इसे अपना व्यवसाय बना लिया है। ऐसे लोगों को दान देते समय बहुत सोच विचार करने की आवश्यकता है। वस्तुतः भिक्षा का मूल उद्देश्य अत्यन्त पवित्र था। जो स्वेच्छा से नहीं देना चाहता उसे कोई अवसर उपस्थित करने के लिए तत्पर करना यह भी तो आत्मोन्नति की एक साधना कराने का ही प्रयत्न है।

राम-लक्ष्मण की ही भाँति दान पुन्य की जोड़ी है। हिन्दू धर्म में कोई भी शुभकर्म, धार्मिक कृत्य ऐसा नहीं है जिसके साथ-साथ परमार्थ का प्रत्यक्ष उदाहरण उपस्थित न करना पड़ता हो। ब्राह्मण भोजन, गौ, अन्न, वस्त्र, पुस्तक आदि का दान प्रसाद वितरण आदि का किसी न किसी अंश में त्याग करना अनिवार्य माना गया है। कहा है कि बिना दक्षिणा का यज्ञ निष्फल होता है। कारण यही है कि साधनाओं का आध्यात्मिक व्यायाम करने के साथ साधक अपनी मनोभूमि को उपजाऊ बनाने के लिए देवत्व के पोषण के लिए उदारता एवं परमार्थ का अभ्यास डालने के लिए कुछ क्रियात्मक कार्य भी करता चले, इस कार्य प्रणाली को अपनाने से साधना में प्रगति द्विगुणित वेग से होती है। पात्रता तेजी से बढ़ती है फलस्वरूप आत्मकल्याण के आनन्दमय लक्ष्य को प्राप्त करना सुलभ हो जाता है। हमारी साधना उभयपक्षीय चलनी चाहिए। जप, व्रत, उपवास, ध्यान, पूजा, अर्चना, वन्दना हम नित्य श्रद्धा और भक्ति पूर्वक करें, साथ ही अपनी उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, त्याग, परमार्थ एवं देवत्व के पोषण की भावना को समुन्नत करने के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य करते रहें।


रोगों का नामकरण तथा भेद

(डॉ. लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम.ए. एन.डी.)

संसार में रोगों का नाम भी भगवान के नामों की भाँति अनन्त हैं, किन्तु जैसे वास्तव में भगवान एक ही है। उसी प्रकार से रोगों का प्रमुख कारण तथा रोग एक ही है। विजातीय पदार्थों का भिन्न-भिन्न स्थानों में विभिन्न अवस्थाओं में, भिन्न-भिन्न मात्राओं में एकत्रित होना ही रोगों के विभिन्न नामों का कारण है। हमारे शरीर में मल, बलगम, श्लेष्मा, साँस आदि सब यहाँ विजातीय पदार्थ या विष हैं।

सब रोगों की जड़ पेट है यदि भोजन ठीक से हजम हो, उसका ठीक से रस, रुधिर, माँस, मज्जा, वीर्य, हड्डी आदि बने, व्यर्थ निस्सार भाग ठीक से नित्य पैखाने के रूप में निकल जाय तो फिर रोगी कैसा? पर ऐसा प्रायः नहीं होता, इसी से मलाधिकता के कारण गठिया, दर्द, क्षय, कैन्सर, फोड़ा, फुँसी, ज्वर, दमा, खाँसी आदि अनेक रोग होते हैं। इन रोगों को साधारणतया हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं।

यह समझ कर कि हर रोग का कारण कब्ज है तथा जिस स्थान पर अधिक ‘मल’ एकत्रित हो जाता है वहीं विशेष रोग-चिन्ह प्रकट होते हैं, मल ही रोग का कोई नामकरण हो, अब हम यह समझने का प्रयत्न करेंगे कि कब्ज से ही सब रोग कैसे हो जाते हैं। यह जानकर हमें आश्चर्य है कि प्रत्येक मनुष्य 9-10 पौंड मल सदा अपनी आँतों में चिपकाये फिरता है जो खाये भोजनों के रसों और खून में जहरीला असर डालता है। दिव्य भोजन भी विष युक्त होकर अपना असली प्रभाव नहीं डाल पाता। अप्राकृतिक भोजनों से बचपन से मल जमा होता रहता है। शरीर से मल और रोगों के हटाने के प्रयत्न को ही रोग कहते हैं। एक डॉक्टर ने सत्य कहा है ‘मुझे ज्वर दे दो और मैं सब रोगों को भगा दूँगा।’ याद ना रहे हमें ‘रोग‘ को ठीक करना नहीं है, वरन् ‘शरीर’ को ठीक करना है। हमें जड़ काटना है, डालियाँ नहीं, अन्यथा आज की कटी डाली कल फिर निकल सकती है। वर्तमान सभ्यता और भोजन पकाने की कला के फेर में खाद्य-सामग्री ठीक से हजम होती ही नहीं और विजातीय पदार्थों से आँत ढकी रहती हैं अतः अक्सर तो वह भोजन के रस को भी ठीक से शोषण करने में असमर्थ होती है।

शरीर में श्लेष्मा तथा उसके विष के अतिरिक्त यूरिक एसिड, टाकसिन्स तथा खाई हुई दवाइयाँ भी रहती हैं। भोजनों के कुछ अस्वाभाविक अंश तथा दवाइयाँ कभी शरीर से नहीं निकलती और जमा होती रहती है। प्रत्येक स्वस्थ कहे जाने वाले या समझे जाने वाले व्यक्ति में यह भोजनों का व्यर्थ भाग विष तथा दवाइयाँ होती हैं। यह उसका छिपा तथा अप्रकट रोग है। इसे हम गुप्त रोग या रोग का बीज कह सकते हैं।

जब कभी यह एकत्रित विष आदि ज्वर, जुकाम या अन्य ढंगों से प्रकृति जीवन की रक्षा और शरीर की शुद्धि के लिए निकालने लगती है हम उसे ‘तीव्र रोग‘ कहते हैं।

पर हम प्रायः दवायें खाकर प्रकृति के इस निकालने के काम को रोक देते हैं। इसके कारण प्रकृति की चिपों आदि को निकाल फेंकने की शक्ति और योग्यता का ह्रास होता है। यदा-कदा दर्द, ज्वर आदि इसके चिन्ह है। ऐसी दशा में जब प्रकृति खुलकर योग्यतापूर्वक अपना काम नहीं कर पाती तो हम उसे “मन्द रोग“ कहते हैं।

जब मलभारों की, ताप, श्लेष्मा, विष आदि पराकाष्ठा हो जाती है और उनके प्रभाव से शरीर के अंग विकृत होने या नाश होने लगते हैं तथा क्षय या कैन्सर आदि होता है तो हम उसे “नाशात्मक रोग“ कहते है।

इस प्रकार से हमने देखा कि हमारे शरीर के अन्दर के विष ही हमारे रोग और अस्वास्थ्य का कारण हैं। रोग बाहर से हमारे अंदर नहीं घुसते। पहले जमाने में लोग रोगों का कारण भूत-प्रेम समझते थे और आज कल डॉक्टर लोग कीटाणुओं के सिद्धाँतों पर ही विश्वास करते हैं जो असत्य है। यदि हमारा शरीर विजातीय द्रव्यों से युक्त है तो बाहरी कीटाणुओं को पनपने का अवसर न मिलेगा। किसी पूर्ण स्वस्थ मनुष्य को हैजे, प्लेग या क्षय के कीड़े आप पिला दें तो उसका कुछ भी न होगा। पत्थर पर बीज डाल दो या बक्से में बंद कर दो तो उसका होना न होना बराबर है। बीज तो तभी उगेगा जब उसे उपजाऊ भूमि, खाद तथा पानी मिलेगा! न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। हम भोजनों द्वारा न विजातीय पदार्थ एकत्रित होने दें, और एकत्रित मलों तथा विषों को खान-पान में संयम करके, फल और शाकों को खाकर, एनेमा लेकर, स्वाभाविक रहन-सहन अपनाकर आदि प्रयत्नों से निकाल फेंके तो कीटाणु हमारा कुछ न कर सकेंगे।


शेख सादी की सूक्तियाँ

(डॉ. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)

चौ कम खुदन तवीअत शुद कसेरा।

चौ सख्ती पेशश आयद सहस गीरद॥ (1)॥

वगर तन पर दरस्त अन्दर फराखी।

चौ तंगी वीनद अज सख्ती बमीरद ॥ (2)॥

‘अल्पाहार करने वाला आसानी से तकलीफों को सहन कर लेता है। पर जिसने सिवाय शरीर पालने के और कुछ किया ही नहीं, उस पर सख्ती की जाती है तो वह मर जाता है।”

खुरासान के दो फकीरों में खूब गाढ़ी दोस्ती थी। वे साथ-साथ सफर करते थे। उनमें से एक दुर्बल और दूसरा हट्टा-कट्टा था। जो दुर्बल था वह दो दिन तक उपवास करता और जो पुष्ट था, वह दिन में तीन बार खाता। दैव योग से ऐसा हुआ कि वे दोनों जासूस समझे जाकर, नगर के फाटक पर गिरफ्तार कर लिये गये और एक ही कोठरी में कैद कर लिये गये जिस कोठरी में वे दोनों कैद किए गए, उसका द्वार भी मिट्टी से बंद कर दिया गया। पंद्रह दिन पीछे मालूम हुआ, कि वे दोनों निर्दोष ही कैद किये गये हैं। इसलिए द्वार खोल कर बाहर निकाले गये। उनमें से जो मोटा-ताजा था वह तो मरा हुआ मिला और जो दुबला-पतला था, वह जिंदा मिला। इस घटना से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस पर एक हकीम ने कहा कि यदि मोटा मनुष्य जीता रहता और दुर्बल मर जाता तो और भी अधिक आश्चर्य की बात होती, क्योंकि वह शख्स जो बहुत खाने वाला था उपवास नहीं कर सकता था। जो मनुष्य दुर्बल था, वह उपवासों का अभ्यासी था और अपनी काया को वश में रख सकता था, इसी से वह बच गया।

जो मनुष्य थोड़ा खाने का आदी होता है वह सुख से संकट सह लेता है, लेकिन जो सुख के दिनों में नाक तक ठूँस-ठूँस कर खाता है, उसके दुख के दिनों में अपनी आदत में डूब कर मरना पड़ता है। तात्पर्य यह है कि जो थोड़े ही में संतुष्ट रहते हैं, उन्हें संसारी यातनाएं नहीं सताती।

(2)

“ऐ कनाअत तदन्गरम गरदाँ।

क वराये तो हेच नेमत नेस्त॥”

“ऐ सन्तोष! मुझे दौलतमंद बना दें, क्योंकि संसार की कोई दौलत तुझसे बढ़कर नहीं है।”

एक अफ्रीकी सानिया कपड़ा बेचने वालों के कूचे में इस तरह कह रहा था, “ऐ धनी लोगों ! अगर तुम लोगों में न्याय होता और हम लोगों में संतोष होता, तो संसार से भीख माँगने की प्रथा ही उठ जाती।” हे संतोष ! मुझे धनी बना दे क्योंकि तेरे बिना कोई धनी नहीं है। लुकमान ने एकाँतवास में संतोष धारण किया था। जिसके दिल में संतोष नहीं है, उसमें तत्वज्ञान की हिकमत नहीं है।

तात्पर्य यह है कि जगत में ‘संतोष’ ही सबसे बड़ा धन है। जिसमें संतोष नहीं है, वह भारी से भारी धनी होने पर भी निर्धन है। जिसके हृदय में असंतोष नहीं है वही सदा सुखी है। लाख, करोड़ और अरब-खरब की सम्पदा होने पर भी जो संतोषहीन है वह परम दुखी है। सन्तोषी मनुष्य ही सब सुख भोग सकता है।


मुझे माँस नहीं चाहिए!

(ले. श्री रोबर्ड चीटले)

“बेटा ! यदि तुम माँस न खाओगे, तो बीमार पड़ जाओगे और मर जाओगे” कहती हुई माता की बचपन की याद आ जाती है। जब मैं कहता था “बस, अब मैं चावल के गुलगुले और न लूँगा।” लेकिन जब मैं कहता था- “मुझे माँस नहीं चाहिए” जो आश्चर्य और भय से उसके हाथ ऊपर उठ जाते थे और वह कहती थी - “तुम त्रिकाल में भी बलवान और बड़े आदमी न हो सकोगे।” इसलिए मैं वयस्क होने तक प्रतिदिन माँस खाता रहा।

कितने लोग माँस भक्षण को स्वस्थ रहने का उपाय बताकर विवाद करते हैं। कितने लोग नहीं समझते हैं कि वह क्या कह रहे हैं, जब वे माँस को स्वास्थ्य-वर्द्धक बताते हैं? क्यों उन्होंने माँस के गुण-दोषों का अध्ययन किया है?

मैं जितना बड़ा होता जा रहा हूँ, उतना ही मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा है कि करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य उस स्वास्थ्य की छाया भी नहीं होता है, जो वास्तव में होना चाहिए। इसके साथ साथ मुझे इसमें भी संदेह नहीं है कि हमारे शरीर के उत्पन्न होने वाले रोगों में आधे रोगों का कारण अव्यवस्थित भोजन के सिवा कुछ भी नहीं है।

सत्य की खोज करने से मुझे ज्ञात हुआ है कि संसार के सबसे बड़े बलशालियों में कई निरामिषभोजी हैं। उदाहरण के लिए संसार प्रसिद्ध विचारक नाटककार जार्ज बर्नार्ड शा को ही देखिए। शा के डॉक्टरों ने कहा था कि माँस बिना तुम मर जाओगे। उसने निर्भीकता पूर्वक उत्तर दिया- ‘अच्छा, हमें केवल प्रयोग करके ही देखना चाहिए। यदि मैं जीवित रहा, तो आशा करता हूँ कि आप सब भी निरामिषभोजी हो जायेंगे।

जार्ज बर्नार्ड शा जीवित हैं तो भी आज 40 बाद डॉक्टर पुरानी बात कहते ही है ऐसे ही अवसर पर शा ने कहा था “मेरी स्थिति गंभीर है। मैं जी सकता हूँ बशर्ते माँस की बोटियाँ खाऊँ। लेकिन राक्षसी वृत्ति से मृत्यु अच्छी है। मैंने अपने मृत्यु-पत्र में अपनी अन्तिम क्रिया की विधि का भी संकेत कर दिया है जिसमें शोकार्त लोगों की घोड़ा गाड़ियाँ न जायेंगी बल्कि मेरे जनाजे के पीछे गाय, बैल, बकरी, मुर्गी, मुर्गा वगैरह पक्षी और जीवित मछलियों सहित एक छोटा सा बनावटी तालाब चलेगा। यह सब उस व्यक्ति के प्रति आदर प्रकट करने के लिए गले में सफेद रुमाल बाँधे रहेंगे जिसने उनके बन्धुओं को खाने की अपेक्षा मृत्यु को अधिक पसंद किया। मोह के आश्रय महावीर के समवशरण के बिना दृश्य संसार के लिए अभूतपूर्व होगा।

जार्ज बर्नार्ड शा अपनी मजबूत तन्दुरुस्ती के लिए मशहूर है। वह कहते हैं कि मैं हमेशा अन्त में एक सन्तरा खाकर अपना भोजन समाप्त करता हूँ। वह लिखते हैं जब हम उन लोगों का स्मरण करते हैं जिनके जीवन गाय, बकरी और बैल वगैरह को पालने में बीतते हैं - वे इन पशुओं को चराते हैं, जोतते हैं, रोगों से बचाते हैं और उनके लिए हजारों दिक्कतें उठाते हैं- और इस तरह उन्हें उन लोगों सरीखा ही हृष्ट पुष्ट और वयस्क बना देते हैं जिनके लिए वह व्यर्थ बलि चढ़ा दिए जाते हैं। मैं अपने से पूछता हूँ कि वह दिन कब आयेगा जब मारे जाने के लिए ही पशु-पालन अपराध घोषित किया जायेगा।

प्रसिद्ध साहसिक अभिनेता जोना-बीसमूलर को देखिए। उसने डॉक्टरों की सलाह के अनुसार अपने को आदर्श स्वस्थ बनाने के लिए तैरने को ही अपनाया था। वह पानी में इतना अधिक रहा है कि उसे सबसे अधिक उत्तम जल-थलचर मनुष्य कह सकते हैं। उनका कहना है कि मैं कभी मछली नहीं खाता हूँ क्योंकि वे वह कलियाँ हैं जिनसे मैं फूल बनकर निकला हूँ।

जॉर्ज अरलिस प्रसिद्ध अभिनेता ही नहीं हैं। बल्कि वह अपने पशु-प्रेम के लिए भी बहुत विख्यात हैं। वृद्धावस्था आ जाने पर भी उनकी तंदुरुस्ती और बुद्धि बहुत अच्छी है। उनका कहना है कि मैंने उन पशुओं को कभी नहीं खाया जिनमें से मैं प्रत्येक को पुचकार और दुलार सकता हूँ।

माँस भोजन के विरुद्ध होने वाला आँदोलन एक सुअवसर है। जब हम क्रमशः विकास करके इस बला से छुटकारा पा सकते हैं। आज अनेक बलवान पुरुष माँस नहीं छूते हैं। मुनि और योगी माँस की छाया से भी दूर रहते हैं पर उनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। जो उन्हें देखता है उस पर उनकी मधुर ध्वनि, प्रकाशमय नेत्र, निर्मल वर्ण और स्वस्थ सात्विक शरीर का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता है। तिब्बती साधु बर्फ में नंग बैठकर भी ठंड से बचे रहते हैं। सैकड़ों मील बिना ठहरे, दौड़कर भी वे थकान का अनुभव नहीं करते हैं। भारतीय साधु ऐसे साहसिक कार्य करते हैं जिन्हें हम पश्चिमी लोग मानते भी सकुचाते हैं।


Quotation

जल में नाव रहे तो कोई बात नहीं पर नाव में जल नहीं रहना चाहिए। साधक संसार में रहे तो कोई हानि नहीं परन्तु साधक के भीतर संसार नहीं रहना चाहिए।

-रामकृष्ण परमहंस

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किसी चीज से भी न चिढ़ो काम उसी निर्लिप्त भाव से करो जिस तरह वैद्य लोग अपने रोगियों की चिकित्सा करते हैं और रोग का अपने पास नहीं फटकने देते। सब उलझनों से मुक्त अथवा दृष्टा साक्षी की भावना से काम करो।

-स्वामी रामतीर्थ

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बाहरी मदद पर कभी भरोसा मत करो, केवल अपने पर, अपने अन्तरात्मा पर भरोसा करो, इसी की आवश्यकता है।

-स्वामी रामतीर्थ


गृहस्थों को भी ब्रह्मचारी रहना चाहिए।

(ले. महात्मा गाँधी)

हम लोगों के लिए, जो स्थिति को जानते हैं, ऐसे बुरे वातावरण में बच्चे पैदा करना क्या उचित है? जब तक हमें ऐसा मालूम होता है कि हम बेबस, रोगी और अकाल पीड़ित हैं, तब तक बच्चे पैदा करते जाकर हम निर्बलों और दुखियों की ही संख्या बढ़ाते हैं। जब तक हिन्दुस्तान सम्पन्न देश नहीं हो जाता, जो अकाल के समय अपने आहार का प्रबंध कर सके, मलेरिया, हैजा, इन्फ्लुएंजा और दूसरी बीमारियों का इलाज करना जान जाय, तब तक हमें बच्चे पैदा करने का अधिकार नहीं है। पाठकों से मैं यह दुख छिपा नहीं सकता, जो इस देश में बच्चों का जन्म सुनकर मुझे होता है। मुझे यह मानना ही पड़ेगा कि मैंने वर्षों तक धैर्य के साथ इस पर विचार किया है कि स्वेच्छा-संयम के द्वारा हम सन्तानोत्पत्ति रोक लें। हिन्दुस्तान को आज अपनी मौजूदा आबादी की भी खोज-खबर लेने की ताकत नहीं है।

सन्तानोत्पत्ति रोकी क्योंकर जा सकेगी? यूरोप में जो अनैतिक और अप्राकृतिक या कृत्रिम साधन काम में लाए जाते हैं, उनसे नहीं बल्कि आत्म-संयम और नियमित जीवन से। माता-पिता को अपने बालकों को ब्रह्मचर्य का अभ्यास कराना ही पड़ेगा। हिन्दू-शास्त्रों के अनुसार बालकों के लिए विवाह करने की उम्र कम से कम 25 वर्ष की होनी चाहिए। अगर हिन्दुस्तान की मातायें यह विश्वास कर सकें कि लड़के-लड़कियों को विवाहित जीवन की शिक्षा देना पाप है, तो आधे विवाह तो अपने-आप ही रुक जाएंगे। फिर, हमें अपनी गर्म जलवायु के कारण लड़कियों के शीघ्र रजस्वला हो जाने के झूठे सिद्धाँत में भी विश्वास करने की जरूरत नहीं है। इस शीघ्र परिपक्वता के समान दूसरा भद्दा अंधविश्वास नहीं देखा है। मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि यौवन से जलवायु का कोई संबंध ही नहीं है। असमय के यौवन का कारण हमारे पारिवारिक जीवन का नैतिक और मानसिक वायुमंडल है।

माताएं और दूसरे संबंधियों द्वारा अबोध बच्चों को यह सिखलाना धार्मिक कर्त्तव्य सा मान बैठते हैं कि ‘इतनी बड़ी उम्र होने पर तुम्हारा विवाह होगा।’बचपन में ही, बल्कि कई बार माँ की गोद में ही, उनकी सगाई कर दी जाती है। बच्चों के भोजन और कपड़े भी उन्हें उत्तेजित करते है। हम अपने बालकों को गुड़ियों की तरह सजाते है। उनके लिए नहीं, बल्कि अपने सुख और घमंड के लिए। मैंने बीसों लड़कों को पाला है। उन्होंने बिना किसी कठिनाई के जो कपड़ा उन्हें दिया गया। उसे सानन्द पहन लिया है। लेकिन हमें उससे संतोष नहीं होता। उन्हें सैकड़ों तरह की गर्म और उत्तेजित चीजें खाने को देते है। अपने अन्धप्रेम में उनकी शक्ति की कोई परवाह नहीं करते। इसका निश्चित परिणाम होता है शीघ्र यौवन, असमय संतानोत्पत्ति और अकाल मृत्यु। माता-पिता पदार्थ पाठ देते हैं, जिसे बच्चे सहज ही सीख लेते है। अधिकारों के सागर में वे आप डूबकर आदर्श बन जाते हैं। घर में किसी लड़के के बच्चा होने पर भी खुशियाँ मनाई जाती हैं, बाजे बजाने और दावतें उड़ती हैं। आश्चर्य तो यह है कि ऐसे वातावरण में रहने पर भी हम और अधिक स्वच्छन्द क्यों हुए?

मुझे इसमें जरा भी शक नहीं है कि अगर उन्हें देश का भला मंजूर है और वे हिंदुस्तान को सबल, सुँदर और सुगठित स्त्री-पुरुषों का राष्ट्र देखना चाहते हैं, तो विवाहित स्त्री-पुरुष पूर्ण संयम से काम लेंगे और कम से कम अभी तो संतानोत्पत्ति करना बंद कर देंगे। नव-विवाहितों को में सही सलाह देता हूँ। कोई काम करते हुए छोड़ने से उसे शुरू में ही न करना सहज है, जैसे कि कभी किसी ने शराब न पी हो उसके लिए जन्म भर शराब पीना शराबी या अल्पसंयमी से शराब छोड़ने से कहीं सहज है। गिर कर उठने से लाख दर्जे सहज सीधे खड़े रहना है। यह कहना सरासर गलत है कि ब्रह्मचर्य की शिक्षा केवल उन्हीं को दी जा सकती है जो भोग भोगते-भोगते थक गए हों। निर्बल को तो ब्रह्मचर्य की शिक्षा देने का कोई अर्थ ही नहीं है। फिर मेरा तो मतलब यह है कि हम बूढ़े हों या जवान, भोगों से ऊबे हुए हों या नहीं, हमारा इस समय धर्म है कि हम अन्धाधुन्ध बच्चे पैदा न करें।

माता-पिताओं को मैं यह ख्याल दिला दूँ कि वे अपने पति या पत्नी के हकों के तर्क के जाल में न पड़े। भोग के लिए रजामन्दी की जरूरत पड़ती है, संयम के लिए नहीं। यह तो प्रत्यक्ष सत्य है।

नैतिकता को आत्मिक उन्नति का साधन न मानते हुए भी अंग्रेज शरीर से तो उसका पालन वे खूब ही करते हैं। देश के राजनैतिक जीवन जितने अंग्रेज लगे हुए हैं, उनमें हमसे कही अधिक एक ब्रह्मचारी और कुमारियाँ हैं। हमारे यहाँ कुमारियाँ तो प्रायः होती ही नहीं जो थोड़ी साधुनी कुमारियाँ होती हैं, उनका कोई असर राजनैतिक जीवन पर नहीं रह जाता, मगर यूरोप में हजारों ही ब्रह्मचर्य को मामूली रूप में ग्रहण करते हैं।

अब में पाठकों के सामने थोड़े सीधे-सादे नियम रखता हूँ, जिनका आधार मेरा और मेरे कितने साथियों का अनुभव है :--

(1)-लड़के लड़कियों का पालन सीधे-सादे और प्राकृतिक-रूप से यह पूरा विश्वास रख कर करना चाहिए कि ये पवित्र हैं और पवित्र रह सकते हैं।

(2)- अचार-चटनी या मिर्च-मसाले जैसे गर्म और उत्तेजक आहारों तथा मिठाई और तेल भुने हुए चिकने व भारी पदार्थों से हर किसी को परहेज करना चाहिए।

(3)-पति-पत्नी को अलग कमरों में रहना और एकान्त से बचना चाहिए।

(4)-शरीर और मन दोनों को बराबर अच्छे काम में लगाये रहना चाहिए।

(5)-जल्दी सोने और जल्दी उठने के नियम कर सख्ती पालन होना चाहिए।

(6)-सभी बुरे साहित्य से बचना चाहिए। बुरे विचारों की दवा भले विचार हैं।

(7)-विचारों को उत्तेजना देने वाले थियेटर, सिनेमा, नाटक, तमाशों से बचना चाहिए।

(8)-स्वप्न-दोष से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। साधारण बलवान आदमी के लिए हर रोज ठण्डे पानी से स्नान कर लेना ही इसका सबसे अच्छा इलाज है। यह कहना गलत है कि स्वप्न-दोष से बचने के लिए कभी-कभी संभोग कर लेना चाहिए।

(9)-सबसे बड़ी बात तो यह है कि पति-पत्नी तक के बीच भी ब्रह्मचर्य को कोई असम्भव या कठिन न मान लें। इससे विपरीत, ब्रह्मचर्य को जीवन का स्वाभाविक और साधारण अभ्यास समझना होगा।

(10)-प्रति दिन सच्चे दिल से पवित्रता के लिए की गई प्रार्थना से आदमी दिनों दिन पवित्र होता है।


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अखण्ड ज्योति का विशेषांक

अखण्ड ज्योति का जनवरी सन् 51 का अंक “जीवन विद्या अंक” होगा। इसमें जीवन को सुख शान्तिमय बनाने वाली विचार धारा एवं कार्यप्रणाली का बड़ा ही महत्वपूर्ण विवेचन होगा। यह अंक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए. द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है। उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा कीजिए।


Kavita

मधु का प्याला


मधु का प्याला (kavita)

चन्द्र चमकता ही रहता है,

तारे टिम-टिम करते है।

रवि के रथ के चक्र सर्वदा,

चक्र बने ही रहते हैं॥(1)॥

खिलता ही रहता है सजनी!

ऊषा के सुहाग का फग।

मधुप-मिथुन कमलों पर आते,

गाते ही रहते है रोग ॥ (2)॥

निर्झर भरता ही जाता है,

सरिता राग सुनाती।

पत्ते मर-मर करते रहते,

मलियानिल मन-भाती॥ (3)॥

यहाँ सिकन्दर आया करते,

तनिक जिया करते हैं।

महलों में जमशेद सरीखे,

मद्य पिया करते हैं ॥ (4)॥

प्रेयसि ! इसी रंगशाला में,

रुस्तम इतराते हैं।

आते हैं बहराम शिकारी,

और चले जाते हैं॥ (5)॥

संयोगिता सरीखी कलियाँ,

मुसकाया करती हैं।

झूम-झूम कर प्रतिफल आखिर

मुरझाया करती हैं ॥ (6)॥

प्रेमी मानव यहाँ प्रेम के,

साज सज्जा करते हैं।

राजा आते, कुछ घड़ियों तक,

राज किया करते हैं ॥ (7)॥

मानव आते ही रहते हैं,

जाते भी रहते हैं।

सुख-दुख न्यूनाधिक मात्रा में,

सभी यहाँ सहते हैं॥ (8)॥

कुछ घड़ियों का मेला सजनी।

विश्व एक मधुशाला।

आज भरा, कल खाली होता,

इसमें ‘मधु का प्याला”॥ (9)।

*समाप्त*

(लेखक-श्री ‘बन्धु’)