(श्री मनोहर दास अग्रावत, उम्मेदपुरा)
1-जो नदी मर्यादा छोड़ कर चलती है यह अपना ही तट खिसका कर गंदली होती है और तट के वृक्षों को गिराकर अपनी ही शोभा बिगाड़ती है।
-भगवान श्री रामचन्द्र,
2-जिस प्रकार दवा के बिना बीमारी को सहन करना कठिन है, उसी प्रकार ज्ञान के बिना साँसारिक प्रभुता संभालना भी दुस्साध्य है। मनुष्य चारों ओर अज्ञान से घिरा हुआ है, इसलिये वह भोग-लिप्सा में पड़ जाता है।
-महात्मा बुद्ध,
3-सत्य बात का विश्वास करो और पापों का तिरस्कार करो, जो शब्द सच्चे हृदय से नहीं निकलते हैं उनका न निकलना ही अच्छा है।
-महात्मा बुद्ध,
4-चित्त से निरन्तर परमात्म तत्व का चिन्तन करते रहो, अनित्य धन की चिन्ता छोड़ दो। क्षण भर के साधु संग को भी भवसागर से तारने के लिये नौका स्वरूप समझे।
- श्री शंकराचार्य,
5-जिस वस्तु के नाश से बड़ा दुःख होता है उसके प्राप्त होने से पूर्व सुख या दुःख कुछ भी नहीं होता। अतएव उसकी प्राप्ति के पूर्व की अवस्था को ध्यान में रखकर मन को दुःखी नहीं करना चाहिये।
- देवर्षि नारद,
6-जीवित अवस्था में शरीर को लोग देव (नरदेव भूदेव) शब्दों से पुकारते हैं। परन्तु मर जाने पर उस शरीर के या तो (सड़ जाने पर) कीड़े हो जाते हैं या (जला देने पर) राख हो जाती है, अथवा (पशु आदि के खाने पर उनकी) विष्ठी बन जाती है, ऐसे शरीर के लिये जो मनुष्य दूसरे प्राणियों से द्रोह करता है जिससे नरक की प्राप्ति होती है वह क्या अपने स्वार्थ को जानता है?
देवर्षि नारद,
7-संसार में न तो कोई किसी का मित्र है, न शत्रु है। जो मनुष्य किसी को अपना शत्रु मान कर उस पर क्रोध करते हैं वे वास्तव में अपनी ही हानि करते हैं, संसार विष्णुमय है। शरीर का एक अंग दूसरे अंग का शत्रु कैसे हो सकता है।
प्रह्लाद,
8-गंगा सागर में मिलने के लिये जाती है परन्तु जाती हुई जगत का पाप ताप निवारण करती और किनारे के पेड़ों को पोसती जाती है। अथवा सूर्य भगवान नित्य परिक्रमा करते हुये संसार का अंधकार दूर करते और कमलों को विकसित करते जाते हैं। इसी प्रकार आत्म-ज्ञानी सन्त अपने सहज कर्मों से संसार में बँधे बन्दियों को छुड़ाते, डूबे हुओं को निकालते और आर्तों का दुःख दूर करते रहते हैं।
श्री ज्ञानेश्वर,
9-परद्रव्य और परनारी की अभिलाषा जहाँ हुई वहीं से भाग्य का ह्रास आरम्भ हुआ। बड़े बड़े इनके चक्कर में मटियामेट हो गये इसलिए इन दोनों को छोड़ दे, इसी से अन्त में सुख पावेगा।
-श्री तुकाराम,
10-काम, क्रोध, मद और लोभ जब तक मन में बसे हैं तब तक पंडित और मूर्ख दोनों ही एक समान हैं।
गोस्वामी तुलसीदास,
11-स्वयं ठगाओ, दूसरों को न ठगो, ठगाने से सुख उत्पन्न होता है और ठगने से दुख।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
(ले.-श्रीमति विद्यावती मिश्र)
खुल पड़ा प्रलय का पंथ और भूतल पर उतरा आसमान।
मैं मंत्र मुग्ध देखती रही, यह कैसा परिवर्तन महान॥
सोये जड़ चेतन जाग उठे, जग में नवीन जीवन छाया।
मंगल ध्वनि चहुँ दिश गूँज पड़ी, नव युग आया! नव युग आया॥
तममयी निशा का हुआ अन्त ले ज्योति पुँज आया विमान।
खुल पड़ा प्रलय का पंथ और भूतल पर उतरा आसमान॥
इस जीर्ण-शीर्ण खँडहर जग की, छाती पर नूतन लोक बसा।
वह महाकाल का इष्ट बना, निर्माण काल क्षण में सहसा॥
विश्वास नये, संबल नवीन, संदेश नया, फिर नया ज्ञान।
खुल पड़ा प्रलय का पंथ और भूतल पर उतरा आसमान॥
मानव की नूतन काया ने लो रंग मंच पर चरण धरा।
पुलकित लख कर के सूत्रधार, उल्लास ह्सडडडडड जग में बिखरा॥
कह रहा नियति से जरा सँभल, मैं आता हूँ, हो सावधान!
खुल पड़ा प्रलय का पंथ और भूतल पर उतरा आसमान॥
अब यह मानवता मेरी है, वह मेरी पूजा का प्रसाद।
जिसको फिर मैंने पाया है कितने युग कितने जन्म बाद॥
यह मेरी है, यह मेरी है, कोई न कहेगा इसे दान।
खुल पड़ा प्रलय का पंथ और भूतल पर उतरा आसमान॥
धियो वोन्मथ्याच्छागम निगम मंत्रान सुमतिवान् विजानीयात्तत्वं विमल नवनीतं प्ररिमिव॥ यतोस्मिन् लोके वै संशयगत विचार स्थलशते मतिः शुद्धैवाँछा प्रकट यति सत्यं सुमन से॥
अर्थ- वेद-शास्त्रों को बुद्धि से मथकर मक्खन के सामान उत्कृष्ट तत्व को जाने। क्योंकि शुद्ध बुद्धि से ही सत्य को जाना जाता है।
कई बार ऐसे अवसर सामने आते हैं कि परस्पर विरोधी विचारधाराओं के सामने आ जाने पर बुद्धि भ्रमित हो जाती है और यह निर्णय नहीं हो पाता कि इनमें किसे स्वीकार तथा किसे अस्वीकार करें।
वेद-शास्त्रों में अनेकों ऐसे स्थल हैं जिनमें आपसी मतभेद बहुत भारी है। एक ग्रन्थ में एक बात का समर्थन किया गया है तो दूसरे में उसका विरोध है। इसी प्रकार ऋषियों, सन्तों, महापुरुषों, नेताओं के विचारों और आदर्शों में कभी-कभी असाधारण विरोध होता है। इन उलझनों में साधारण व्यक्ति का मस्तिष्क भ्रमित हो जाता है। किस शास्त्र को, ऋषि को, महापुरुष को, नेता को वह गलत ठहरावे किसे सही ठहराये। सभी का अनुकरण हो नहीं सकता, क्योंकि विरोधी मतों को एक साथ मानना और उनका अनुसरण करना असंभव है।
गायत्री का ‘धियो’ शब्द ऐसे अवसरों पर विवेक की कसौटी हमारे हाथ में देता है और आदेश करता है कि किसी भी पुस्तक या व्यक्ति की अपेक्षा विवेक का महत्व अधिक है। इसलिए जो बात बुद्धि संगत हो, विवेक सम्मत हो, व्यवहार में आने योग्य हो, उचित हो, केवल उसी को ग्रहण करना चाहिए।
देश काल और परिस्थिति का ध्यान रख कर समय समय पर आचार्यों ने उपदेश किये हैं। इसलिये जो बात एक समय के लिए बहुत ही उचित एवं आवश्यक थी वह दूसरे समय में अनुचित और अनावश्यक हो गई। जाड़े के दिनों में पहने जाने वाले गरम ऊनी कपड़े गर्मी में हानिकारक हैं, इसी प्रकार गर्मी की हलकी पोशाक को ही जाड़े के दिनों में पहने रहना निमोनिया को निमंत्रण देना है। अपने समय में जो पोशाक आवश्यक होती है वही काल और परिस्थिति बदल जाने पर त्याज्य हो जाती है।
अग्नि का आविष्कार होने पर आदिम काल में मनुष्य इस दैवीतत्व को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ उसने अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अग्नि को घृत, मेवा, मिष्ठान, पकवान, सुगंधित वनस्पतियों का भोजन कराने का विधान, यज्ञ, आरंभ किया। समय के साथ उस पवित्र यज्ञ व्यवस्था में विकार आया और गौ, अश्व, नर आदि का वध करके हवन किया जाने लगा। इस विकृति को रोकने के लिए गौतमबुद्ध ने यज्ञों का खंडन किया। कालान्तर में बौद्ध-धर्म में भी विकार आये और उनका शंकराचार्य को खंडन करना पड़ा। शंकर मतानुयायी भी धीरे धीरे शुष्क वेदान्ती मात्र रह गये तब प्रेम और भावना को जागृत करने के लिए भक्ति मार्गी संतों ने वेदान्त का विरोध करके भक्ति की ध्वजा फहराई। भक्ति में अन्धविश्वास आ गया तो स्वामी दयानन्द ने उसका भी खंडन किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक आचार्य दूसरे का खंडन करता चला आया है। जैसे एक समय का स्वादिष्ट भोजन कालान्तर में विष्ठा बन जाता है वैसे ही एक समय की व्यवस्था कालान्तर में जीर्ण-शीर्ण हो जाती है और उसका पुनरुद्धार करना पड़ता है। अपने अपने समय का प्रत्येक शास्त्रकार सच्चा है, पर कालान्तर में उसने सुधार होना अवश्यंभावी है। देश-काल का ध्यान न रखते हुए जब हम सब शास्त्रों को समकालीन मान कर चलते हैं तब उनमें विरोध दिखाई पड़ता है। किन्तु काल भेद और परिस्थिति भेद को ध्यान में रखते हैं तो सभी व्यवस्थाएँ सही मालूम पड़ती हैं।
केवल विवेक ही हमें यह बता सकता है कि आज की स्थिति में क्या ग्राह्य है क्या अग्राह्य? यह हो सकता है कि अपरिष्कृत विवेक कुछ भूल कर जाए और उसका निर्णय पूर्णतया निर्दोष न हो फिर भी यदि निष्पक्ष विवेक को जागृत रखा जायगा तो बहुत शीघ्र ही वह भूल प्रतीत हो जायगी और सच्चा मार्ग मिल जाएगा। यह डर, कि हमारा विवेक गलत होगा तो गलत निर्णय पर पहुँच जायेंगे, उचित नहीं। क्योंकि विवेक के अतिरिक्त और कोई मार्ग सत्यासत्य के निर्णय का है ही नहीं। यदि किसी शास्त्र, सम्प्रदाय, महापुरुष के मत का अनुकरण किया जाय तो भी अनेक शास्त्रों, सम्प्रदायों, महापुरुषों में से एक को अपना पथ प्रदर्शक चुनने का काम विवेक पर ही आ पड़ेगा। विवेक का अनुगमन कभी भी हानिकारक नहीं होता क्योंकि बुद्धि का पवित्र, निस्वार्थ, सात्विक भाग होने के कारण विवेक द्वारा वही निर्णय किया जाता रहेगा जो आज की हमारी मनोभूमि की अपेक्षा श्रेष्ठ हो। उसका अनुगमन करने से मनोभूमि दिन दिन अधिक पवित्र एवं विकसित होती जाएगी तदनुसार हमारा विवेक भी अधिक सूक्ष्म होता जाएगा। यह उभय पक्षीय उन्नती धीरे धीरे आत्मबल को बढ़ाती चलेगी और क्रमशः हम सत्य के अधिक निकट पहुँचने जाएंगे। इसी मार्ग पर चलते चलते एक दिन पूर्ण सत्य की प्राप्ति हो जाएगी।
अनेकों परम्पराएँ, प्रथाएँ, रीति-रिवाजें ऐसी प्रचलित हैं जो किसी समय भले ही उपयुक्त रही हों पर आज तो वे सर्वथा अनुपयोगी एवं हानिकारक ही हैं। ऐसी प्रथाओं एवं मान्यताओं के बारे में ऐसा न सोचना चाहिए कि “हमारे पूर्वज इन्हें अपनाते रहे हैं तो अवश्य इनका भी कोई महत्व होगा इसलिए हम भी इन्हें अपनाये रहें।” हमें हर बात पर वर्तमान काल की आवश्यकताओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही कोई निर्णय करना चाहिए।
भारतीय दर्शन शास्त्र का सदा से यह आदेश रहा है कि-व्यक्तियों और विचारों को आपस में संबद्ध मत करो। संभव है कि कोई उत्तम चरित्र का व्यक्ति भ्रान्त हो और उसके विचार अनुपयुक्त हों, इसी प्रकार यह भी संभव है कि कोई हीन चरित्र का व्यक्ति सारगर्भित बात कहता हो। उत्तम चरित्र के मनुष्य का व्यक्तिगत सम्मान करने में कभी संकोच न करना चाहिए, किन्तु उस सम्मान का अर्थ यह नहीं है कि उसके विचारों को स्वीकार करने के लिए हम बाध्य हों। यहाँ विवेक ही प्रधान है। भगवान बुद्ध के उत्तम चरित्र और महान तपश्चर्या से श्रद्धान्वित होकर हिन्दू जाति ने उन्हें सर्वोपरि सम्मान की “अवतार” उपाधि से विभूषित किया है। इससे बड़ा सम्मान और कृतज्ञता यापन हिन्दू जाति के पास और कोई है ही नहीं। इतना होते हुए भी बौद्ध सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं किया गया। ईश्वर पर अनास्था, शून्यवाद, गृह-त्याग में मोक्ष, यज्ञ निषेध, आदि बुद्ध की शिक्षाओं को हिन्दू जाति अस्वीकार ही नहीं करती वरन् उनका कटु विरोध भी करती है। चार्वाक ऋषि हुए हैं। उनका नास्तिक दर्शन भी अन्य शास्त्रों की तरह ही आदरणीय है परन्तु यह आवश्यक नहीं कि उनके प्रति आदर बुद्धि रखने वालों को वे विचार भी स्वीकार हों। गाँधी और सुभाष दोनों के प्रति आन्तरिक आदर रखते हुए भी वह हमारे विवेक के ऊपर निर्भर रहेगा कि हिंसा का सिद्धान्त माना जाय या अहिंसा का।
संसार में अनेक धर्म, सम्प्रदाय, नेता और विचारक हैं। उनकी अपने अपने ढंग की अनेक मान्यताएँ हैं। इनमें से अपने लिए आज किसका, किस अंश में, किस प्रकार, अनुसरण करना चाहिए, यह निर्णय करना हमारे विवेक के ऊपर है। हमारा निर्णय जिसके पक्ष में हो उसके अतिरिक्त भी अन्य धर्मों या महा-पुरुषों के लिए घृणा या द्वेष करने की आवश्यकता नहीं है। उनका उपदेश आज भले ही हमारे लिए अनुकूल न हो पर अपनी समझ से अपनी परिस्थितियों में उन्होंने भी शुभ उद्देश्य से ही अपना मत निर्धारित किया था। उनका उद्देश्य पवित्र था इसलिए वे स्वभावतः हमारे आदर के अधिकारी हो जाते हैं। विवेक की कसौटी पर कस कर हम बुराई भलाई को हर जगह परख कर सकते हैं। किसी देश, जाति या मनुष्य के कुछ बुरे काम देख कर उसे पूर्णतया बुरा मान लेना ठीक नहीं।
जिस समुदाय में कुछ लोग दुष्ट या प्रतिपक्षी हैं उसके सभी लोगों को वैसा मान लेना ठीक नहीं। अमुक जाति बहुत बुरी है ऐसी मान्यता अनुचित है। क्योंकि न्यूनाधिक मात्रा में सभी समुदायों में अच्छे और बुरे होते हैं। विवेक ही हमें यह बता सकता है कि शत्रुओं के बीच भी मित्र हो सकते हैं और मित्रों में भी आस्तीन के साँप होना संभव है।
भले और बुरे की, हानि और लाभ की, मित्र और शत्रु की, सच्चे और झूठे की पहचान केवल विवेक ही करा सकता हैं। आकर्षणों, प्रलोभनों, तृष्णाओं, विकारों, भ्रान्तियों, खतरों से सावधान करके हमें पतन के गहरे गड्ढ़े में गिरने से बचाने की शक्ति केवल विवेक में ही है। विवेक हमारा सच्चा-मित्र है। वह भूलें सुधारता है, मार्ग दिखाता है, उलझनें सुलझाता है, खतरों से बचाता है, और सफलता की ओर अग्रसर करता है। ऐसे मित्र की आवश्यकता समझना उससे प्रेम करना और उसे अधिक से अधिक आदर के साथ समीप रखना यह हमारे लिए सब प्रकार से कल्याण कारक हो सकता है।
गायत्री के ‘धियो’ शब्द का आदेश है कि हम विवेकवान बनें। विवेक को अपनायें, विवेक की कसौटी पर कस कर अपने विचार और कर्मों का निर्धारण करें इस शिक्षा को स्वीकार करना मानो अपनी जीवन दिशाओं को शीतल, शान्तिदायक, मलय मरुत के लिए उन्मुक्त कर देना है।
रूखा सूखा खाय कर, ठण्डा पानी पी
देख पराई चोपडी, क्यों ललचावें जीय
आधी अरु रूखी भली, सारी सो संता
जो चाहेगा चोपडी, तो बहुत करेगा पाप
दोष पराया देख कर चले हसंत हसंत
अपना याद न आवही जाका आदि न अंत
साँई आग साँव हो, साँई साँव सुहाय
भावै लंबे केश रख, भावे घोट मुँडाय
संचे कोई न पतीजा, झूँठे जग पतियाय
गली गली गोरस फिरे मदिरा बैठ बिकाय
साँचे शाप न लागही, साँचे काल न खाय
साँचे को साँचा मिले, साँचे माँहि समाय
प्रेम प्रीति का चोलना, पहिर कबीरा नाच
तन मन वा पर वारहीं जो कोई बोलै साँच साँच बिना सुमरण नहीं, भाव बिन भक्ति न होय
पारस में परदा रहै, कंचन किस विधि होय
ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करें, आपा शीतल होय
बोली तो अनमोल है जो कोई जाने बोल
हिय तराजू तौल कर तब मुख बाहर खोल।
शब्द बराबर धन नहीं जो कोई जाने बोल
हीरा तो दामों मिले शब्द का मोल न तोल॥
जहाँ दया तहँ धर्म है जहाँ लाभ तहँ पाप
जहाँ क्रोध तहँ काल है जहाँ क्षमा तहँ आप॥
चलो चलो सब कोई कहै, पहुँचे बिरला कोय
एक कनक औ कामनी, दुर्गम घाटी दोय॥
कामी क्रोधी लालची इनसे भक्ति न होय
भक्ति करे कोई शूरमा, जात वरण कुल खोय॥
कंचन तजना सहज है, सहज जिया का नेह।
मान बड़ाई ईर्ष्या, दुर्लभ तजनी येह।
चाह मिटी चिन्ता गई मनुबाँ वे परवाह।
जिनको कछु न चाहिये सोई शाहनशाह।
माँगन गए सो मर रहे मरे सो माँगन जाहिं।
तिनसे पहले वे मरे जो होत कहत है नाहिं॥
(श्री स्वामी रामतीर्थ)
किसी भी प्रकार की सफलता प्राप्त करने के लिये सत्य व्यापार परम आवश्यक है। बिना सत्य-व्यापार की तरक्की के, देश की तरक्की नहीं हो सकती। चाहे जिस उन्नत मुल्क की ओर दृष्टि डालो, सत्य-व्यापार ही उसका मूल कारण दिखलाई देगा। हिन्दुस्तान में व्यापार बड़ी बुरी दशा में है, झूठ, प्रवंचना, एवं छल-कपट से भर-पूर है। प्रायः हिन्दुस्तानी सत्य-व्यापार करना नहीं जानते। उद्योग और पुरुषार्थ को काम में न लाकर क्षुद्र-ब्याज के लोभ में हिन्दुस्तानी अपनी पूँजी लगा देते हैं, और आप सुस्त आलस्यग्रस्त होकर चारपाई पर पड़े पड़े, मक्खी हाँका करते हैं। दूसरे देश वाले अपने उद्योग पुरुषार्थ और सत्य-व्यापार से गरीब से धनी, और धनी से कुबेर हो रहे हैं और हिन्दुस्तानी ठीक इसके विपरीत दूसरे मुल्क वालों के सत्य व्यापार एवं उद्योग के फैलाव को देखकर आश्चर्य होता है। शिकागो में मार्शल फील्ड की एक दुकान है। यह 20 मंजिल ऊँची और एक मील लम्बी चौड़ी है। यहाँ नित्य करोड़ों रुपयों का सौदा होता है। इतनी भारी और आला दर्जे की दुकान होने से इतना आश्चर्य नहीं होता जितना कि-ग्राहकों के साथ इतना सद्व्यवहार देखकर होता है। लाखों रुपयों का माल खरीदने वाले से और एक पैसे की दियासलाईयाँ खरीदने वाले से एक सा बर्ताव करते हैं। चाहे कोई कितने ही का खरीदार हो, जब वह दुकान के फाटक पर जायेगा तो शीघ्र ही एक दर्खान कुछ आगे बढ़कर उसकी अगवानी करेगा, और बड़ी नम्रता से उससे विनय करेगा, कि क्या हुक्म है? जब वह कहेगा कि मुझे फलानी चीज की दरकार है या मैं अमुक वस्तु केवल देखना चाहता हूँ तो वह दर्खान उसको उस कमरे में, जहाँ उसके लायक सौदा है, या जहाँ जहाँ वह देखना चाहता है , ले जाएगा, पश्चात् फाटक के कुछ दूर तक उसको पहुँचाकर अदब से सलाम करके वापिस होगा। यह बराबरी का सलूक, यह सच्चाई, यह प्रेम ही व्यापार की उन्नति के मुख्य अंश हैं। वह इनका पूर्ण व्यवहार करते हैं, और इसलिए ही वह व्यापार में इतना बढ़े चढ़े हैं, कि-उनकी बराबरी करना मुश्किल जान पड़ता है। यहाँ हिन्दुस्तानियों की अजब कैफियत है? यहाँ ग्राहकों के साथ एक सा बर्ताव नहीं होता। बड़ी दुकानों से थोड़ा सौदा खरीदने का किसी को हौसला नहीं होता। इसका कारण यह है कि-बड़ी दुकान वाले थोड़ा सौदा खरीदने वाले के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते। छोटी-छोटी दुकान वाले अक्सर झूठ कहा करते हैं। इन लोगों का यह ख्याल है कि बिना झूठ के व्यापार चल ही नहीं सकता। एक पैसे का सौदा खरीदने में घन्टे भर तक मगज मारना पड़ता है। मुफ्त में तकरार बढ़ती और समय नष्ट होता है। यदि सच्चाई के साथ व्यवहार किया जाय, तो क्यों न व्यापार में तरक्की हो?
हिन्दुस्तान में व्यापार की तरक्की क्यों नहीं होती? इसका एक कारण है कि हिन्दुस्तानी लोग, जो लिख पढ़ सकते हैं वह केवल नौकरी किया करते हैं व्यापार करना वह अपनी बेइज्जती समझते हैं, या उधर ध्यान नहीं देते। चाहे दुकानदारों की वह नौकरी करें पर दुकानदारी कभी नहीं करेंगे। यह भी क्या मजे की बात है, कि-जिस पेशे को स्वयं नहीं करना चाहते, उस पेशे वाले की नौकरी तो वह कर लेंगे, पर वह इज्जत का पेशा न करेंगे। हिन्दुस्तानियों को सत्य व्यापार की ओर ध्यान देने की अत्यन्त आवश्यकता है। व्यापार नीति का रहस्य जानने के लिये सिर तोड़ परिश्रम तथा अनुभव करने की निहायत जरूरत है, कि किस प्रकार कौन से व्यापार से किस देश में कितना लाभ होगा, हमको ग्राहकों के साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये। इस बात की ओर पूरा पूरा ध्यान देना चाहिये, इस बात पर दृढ़ विश्वास करना चाहिये, कि-सच्चाई के साथ व्यापार करने से जो लाभ होता है, वह कदापि झूठ से नहीं। झूठ से एक दफे रकम आनी संभव है, पर पश्चात वह चलता नहीं। काठ की हाँडी दूसरी दफे आग पर नहीं रखी जाती, एक दफे चाहे उस में बना भी लो। बरसाती नदी जैसे किनारों को तोड़ फोड़ कीचड़ तथा लकड़ी बहा कर सनसनाती हुई धूम-धाम के साथ थोड़े दिनों तक अपना प्रवाह रखती है, और फिर उसमें पानी पीने को भी नहीं रहता, इसी प्रकार झूठा व्यवहार थोड़े दिनों तक दुनिया को ठगकर लोगों की नजर में अपना वैभव दिखाता है, पश्चात वह स्वयं नष्ट हो जाता है। और साथ ही इज्जत और आबरू को भी अपने में लय-कर देता है। पर सत्य व्यापार करने से धन की प्राप्ति होती है, प्रतिष्ठा बढ़ती है, धर्म होता है, और मुक्ति मिलती है। यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं।
काशी के महात्मा तुलाधार वैश्य का इतिहास किस को मालूम नहीं? सत्य व्यापार करते करते यह इस दर्जे के धर्मात्मा और ज्ञानी हो गये थे, कि बड़े बड़े तपस्वियों को कितने ही वर्ष तपस्या करने पर भी वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था। एक तपस्वी एक दफे महात्मा तुलाधार की धर्म व ज्ञान की कीर्ति सुनकर उनके सत्संग की इच्छा से उनके पास आया। ज्यों ही उस महात्मा को तुलाधार से मिलना हुआ कि मुझे जो ज्ञान कितने ही वर्ष तपस्या करने पर भी प्राप्त नहीं हुआ, इस नीच वृत्ति से इसे कैसे प्राप्त हुआ? दर्याफ्त करने पर महात्मा तुलाधार ने कहा “आपको आश्चर्य होगा, कि-इस पेशे के करने वाले को ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? पर इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। “मैं हमेशा सत्य का व्यवहार करता हूँ अपने ग्राहकों को ठगने की इच्छा नहीं करता मामूली नफा लेकर अपने ग्राहकों को सौदा देता हूँ मैं कभी कम या ज्यादा किसी को नहीं देता और न किसी से लेता हूँ, सब के साथ सच्चा व्यवहार करता हूँ। सत्य ही सब धर्मों में श्रेष्ठ है, और उसी का मैं सेवन करता हूँ। छल कपट कभी नहीं करता। यही कारण है कि मुझ को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है जिससे आप जैसे महात्माओं को मुझे घर बैठे दर्शन मिलता रहता है।” आह।़ सत्य का कैसा माहात्म्य है। यदि हिन्दुस्तानी वैश्य लोग तुलाधार के इस पवित्र उपाख्यान की ओर दृष्टि दें, यदि वह तुलाधार की तरह सत्य व्यवहार करें, सत्य बोलें, तो उनको तपस्या के लिये जंगल में जाने का क्या प्रयोजन है? सत्संग के लिये महात्माओं के ढूंढ़ने का क्या मतलब है दुकान पर बैठे हुए धन, धर्म, काम, मोक्ष, सत्संग वगैरह सब अपने आप चले आते हैं, क्योंकि अक्सर यह देखा गया है, कि-जो भले आदमी होते है वह बहुधा उसी दुकान से लेन देन रखते हैं। भले आदमियों के ही समागम को सत्संग कहते हैं, सत्संग ही से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष व प्राप्ति होती है। तो प्यारो। तुम सत्य व्यवहार प्रेम का बर्ताव क्यों न करो। यह देखिये, आजकल गैर मुल्क वाले तुलाधार की तरह सत्य व्यवहार से कैसे मालामाल हो रहे है, उनका कैसा ऐश्वर्य बढ़ रहा है। इसी व्यापार की बदौलत सारी दुनिया उनकी हस्तगत हुई चली जा रही है। तुम लोग भी व्यापार करो व्यापार की वृद्धि करो। क्षुद्र व्यापार के लोभ में पूँजी लगाकर आलसी मत बनो। गैर मुल्क वाले व्यापार में इतने रुपये लगा रहे हैं कि बुद्धि काम नहीं करती। उतना रुपया तुम्हारे पास है ही नहीं। मतलब यह है कि जितना भी रुपया तुम्हारे पास है, वह सब व्यापार के लिए बहुत कम है। ब्याज में न लगा कर उन रुपये को व्यापार में लगाने से तुमको आशातीत लाभ होगा, तुम्हारे मुल्क को फायदा पहुँचेगा।
परन्तु यह बड़े अफसोस की बात है कि हिन्दुस्तानी लिखे पढ़े आदमी व्यापार करना नहीं चाहते पर इससे भी ज्यादा शोक इस बात पर है कि हिन्दुस्तानी व्यापारी लोग विद्या की ओर ध्यान नहीं देते। विद्या को वह कोई चीज नहीं समझते। उनका ख्याल है कि-हम को किसी की नौकरी थोड़ी करनी है जो पढ़ने में इतना सिर मारें यह उन लोगों का बड़ा ही बेहूदा ख्याल है। अनपढ़ा आदमी जितना रुपया लगाकर जितना नफा कर सकेगा, लिखा पढ़ा आदमी उतने ही रुपयों से बीस गुना नफा कर सकता है।
व्यापार के लिए धन की जैसी जरूरत है, विद्या की भी वैसी ही जरूरत है कठिन समस्या है कि-विशेष लिखे पढ़े आदमी तो व्यापार नहीं करते और व्यापारी लिखना पढ़ना नहीं चाहते। व्यापार के लिए नित्य नई नई तदवीरें सोचनी पड़ती हैं, और नई नई तदवीरें को सोचने के लिए विद्या चाहिए। विद्या न होने के कारण हिन्दुस्तान का व्यापार तरक्की में नहीं है गैर मुल्क वाले नित्य नई नई तदवीरें सोच कर नया कौशल रचकर व्यापार में आशातीत उन्नति करते हैं। हिन्दुस्तान को भी उनसे शिक्षा लेकर अपनी उन्नति करनी चाहिए।
(श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)
संसार में जो कुछ भी है सभी में ईश्वर का वास है, वह भले ही चर हो या अचर। ईश्वर का न कहीं अन्त है और न आदि। वह सर्वव्यापी, अन्तर्यामी, सर्वशक्तिमान है, वह अन्तरात्मा द्वारा नियंत्रण करता है। अमरत्व, स्वतंत्रता पूर्णता, शान्ति, स्वर्ग प्रेम आदि शब्द ईश्वर के पर्याय हैं।
जीवन की सफलता का प्रधान रूप स्वधर्म का निष्काम प्रतिपालन है। निष्काम कर्म से हृदय शुद्ध होता है। मन को एकाग्र करने के लिए उपासना करनी होगी और अन्त में निष्काम कर्म द्वारा मोक्ष मिलेगा।
शुकदेवजी ने विवाह नहीं किया और घर बार छोड़कर जंगलों में विचरते रहे। व्यास से उनका वियोग सहा न गया और उनकी तलाश में बाहर निकले। जिस समय व्यासजी एक सरोवर के तट से जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि जो अप्सराएँ सरोवर में नंगी स्नान कर रही थीं बाहर निकल आयीं और कपड़े पहन लिये। उन्हें शर्माते देखकर व्यासजी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा-जब मेरा जवान लड़का इधर से गया तो तुम लोगों को शर्म न आयी लेकिन मुझ बूढ़े को देखकर तुम लोग शर्मा गयीं। अप्सराओं ने उत्तर दिया-’आपके लड़के को स्त्री पुरुष की विभिन्नता का ज्ञान नहीं है लेकिन आपको है।’
संन्यासी भाव शुकदेव की भाँति होना चाहिए, न कि आज कल के संन्यासियों की तरह, जो बगैर किसी आन्तरिक सुधार के ही संन्यासी का रूप धारण कर लेते हैं। ‘मन ना रंगाये जोगी कपड़ा रंगायें” यह तो पाखण्ड है।
यदि प्राण स्थिर हो जाए तो मन भी स्थिर हो जाता है। यदि दृष्टि स्थिर है तो मन भी स्थिर हो जाता है। यदि वीर्य स्थिर है तो मन भी स्थिर है। इसलिये प्राण दृष्टि और वीर्य संयमित रखे। धारणा और ध्यान के अभ्यास से मन की चंचलता दूर होती है।
ईश्वर की प्राप्ति की प्रबल अभिलाषा ही भक्ति है। ईश्वर में अपने को लीन कर देना चाहिए। शरीर रहते विदेह बन जाना चाहिये।
यह शरीर बनता बिगड़ता रहता है। यह पाँच तत्वों द्वारा निर्मित है, इसके आदि-अन्त दोनों हैं। विशुद्ध आत्मा न आता है और न जाता है, न बनता है और न बिगड़ता है। आत्म-ज्ञान पाने की चेष्टा करनी चाहिये। कर्म, पीड़ा आदि उसे स्पर्श भी नहीं कर पाते। कर्म से आत्मा का सम्बन्ध नहीं है। उस पर कुछ प्रभाव नहीं करता, उसे कोई उत्पन्न नहीं करता और न उसमें सुधार ही ला सकता है। आत्म-ज्ञान से अविद्या का नाश होता है। साँसारिक आघातों का मूल स्रोत अविद्या है। प्राचीन कवियों में आत्मज्ञान था। अज्ञान और अविद्या दूर करने का एक मात्र साधन आत्म-ज्ञान है।
ब्रह्म जानने वाला स्वयं भी ब्रह्म ही है। जीवित रहकर ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लेने से वह जीव मुक्त हो जाता है। ब्रह्म-ज्ञान ही मोक्ष का साधन है।
वासना के विनाश से मनोनाश हो जाता है और जब मन का विनाश हो जाता है तो संस्कारों का विनाश भी हो जाता है तभी जीवन मुक्ति मिल जाती है। ईश्वर में अनन्य भक्ति और साधुओं की संगति से परमानन्द मिलता है।
यह आत्मा या बुद्धि स्वप्रकाशित है। वही कान, वही आँख, वही जिह्वा, मन तथा प्राण है। प्राण, इन्द्रिय, मन आदि सभी उसी से शक्ति पाते हैं। वही अन्तर्यामी है।
सूर्य उसी से चमकता है, सागर उसी से सीमित रहता है, इन्द्र, वायु, यम तथा अन्य देवता उसी की आज्ञा से अपने कर्तव्य करते हैं, उसी की आज्ञा से अग्नि जलता है तथा मन, प्राण और इन्द्रियाँ कार्य करती हैं।
विश्व नियन्ता वही है, वह घट-घट व्यापी है। विश्व का सहारा वही है, वही पालक है वही संहारक है। वह शासक है। वही शान्ति और अमरत्व प्रदान करता है। वही ओज, तेज, बल, ऐश्वर्य यश, आरोग्य, दीर्घायु, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति, श्रेय, विद्या, मोक्ष आदि का दाता है।
भगवान की शक्ति ‘काल’ है। वह स्वयं कालातीत है। अन्य सभी जीव और वस्तु नश्वर हैं। भगवान अविनाशी हैं।
यदि समय से वृत्तियाँ लोप हो जायें तो ‘काल’ का भी लोप हो जायेगा। भगवान की अचिन्तय शक्ति माया का प्रादुर्भाव ‘मन’ है। मूल-प्रकृति अव्यक्त, प्रधान प्रकृति, आदि शक्ति, महाशक्ति, पराशक्ति आदि माया, महामाया आदि भगवान की लीला के लिये विभिन्न रूप धारण करती है। माया विचित्र है। उससे भी विचित्र स्वयं ईश्वर और उसकी लीला है। जो तन, मन, धन से ईश्वर की भक्ति करता है वही अमरत्व फल पा सकता है।
सत्व ज्ञान-शक्ति है। राजस क्रिया-शक्ति है। तामस द्रव्य-शक्ति है। मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ सत्व से उत्पन्न होती हैं। प्राण और पाँचों कर्मेन्द्रियाँ राजस से उत्पन्न होती हैं पंच भूतों की उत्पत्ति तामस से होती है। आकाश वायु जल पृथ्वी और अग्नि पंच भूत है।
दिक् श्रोत्रेन्द्रिय के देवता हैं, वायु स्पर्श के, सूर्य दृष्टि के, वरुण स्वाद के, अश्विनी कुमार घ्राण के अग्नि वाक् के, इन्द्रिय पाणि के, उपेन्द्र अथवा विष्णु पाद के, यम गुदा के, और प्रजापति उपस्थेन्द्रिय के।
ईश्वर का अवतार मनुष्य की उन्नति के लिये होता है। जब कभी संसार में अधर्म की, पापाचार की वृद्धि होती है तो ईश्वर धर्म की संस्थापना के लिये विश्व पर अवतरित होते हैं और जब अवतार धारण कर पृथ्वी पर आते हैं मनुष्य का रूप धारण कर आते हैं। अवतार कई प्रकार के होते हैं, जैसे-पूर्णावतार, अंशावतार आवेशावतार और लीलावतार।
कर्मयोग रूपी वृक्ष का बीज श्रद्धा है जड़ विश्वास है। भागवतों की सेवा जल-वृष्टि है, आत्म-समर्पण फूल है और भगवत् मिलन ही उसका फल है।
विपत्तियों में धैर्य, विभव में क्षमा, सभा में वाक् कुशलता, युद्ध में वीरता, शास्त्रों में व्यसन सज्जनों में ये बातें स्वभाव से ही होती हैं।
(श्री स्वामी कृष्णानन्द जी महाराज, केकडी,)
एक विषय-लोलुप मनुष्य दिन में 1-3 या 4 समय स्वादिष्ट भोजन पेट भर भले ही कर ले, परंतु मन की तृप्ति न होने पर भी अधिक समय या अधिक परिमाण में भोजन बार-बार नहीं कर सकेगा। ऐसे ही अन्य विषयों के सेवन में भी मर्यादा रहती है। इन विषयों के प्रत्येक पदार्थ पर बार-बार मर्यादा रखने पर भी उपरामता आ जाती है और नये-नये पदार्थों की वासना तैयार हो जाती है, जिससे सर्वदा मन चिंतातुर और दुःखमय ही रहता है परन्तु दया आदि दैवीसंपत्तिजन्य सुखों में मर्यादा नहीं है। उन्हें जितने परिमाण में बढ़ाओ, उतने ही बढ़ सकते हैं। जन्मप्रभृति मरण पर्यंत दैवी वृत्ति का विकास कदापि दुःखप्रद नहीं होता अपितु सुखप्रद ही होता है। कदाचित प्रारम्भ में सुख अप्रतीत हो, तथापि परिणाम में सुख ही मिलता है।
जैसे पाठशाला में प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों को पहले-पहले अ, क, ख आदि अक्षरों के शिक्षण का लाभ अनुभव में नहीं आता, किन्तु ज्ञान वृद्धि के पश्चात समाजसेवा और परमार्थिक कल्याण के कार्य करने लगता है, तब उसे ‘इस शिक्षण से ही लाभ मिला है” ऐसा निश्चय हो जाता है। वैसे ही धृति, दया, क्षमा, भक्ति, प्रीति, उदारता आदि वृत्तियों से होने वाला भावी लाभ प्रथम समझ में न आवे, तो भी ज्ञान वृद्धि होने पर दैवी-वृत्तियों के सुख का अनुभव होने लगता है।
दीन जनों को सहायता, पीड़ितों की सुश्रूषा स्वदेश और स्वधर्म की सेवा, विश्व वात्सल्यता, इत्यादि संवेदना शक्ति के विकास के लिए सहायक साधन माने गये हैं। इन सब कर्त्तव्यों से शारीरिक और मानसिक शक्ति का विकास होता है, बुद्धि की संकीर्णता और स्वार्थान्धता नष्ट होकर विश्व के प्राणी मात्र के साथ साम्यता, मैत्री का अनुभव होता है ऐसा होने पर ही हृदय की संवेदना शक्ति की उन्नति मानी जाती है।
दूसरों के दुःख का असर होना इसको दया कहते हैं। अथवा दुःखी जीवों के प्रति जो प्रीति-भाव रखा जाता है, उसको दया कहते हैं। इस दयावृत्ति से संवेदना-शक्ति की उन्नति होती है। दयावृत्ति का भक्ति और प्रीति के साथ अतिघनिष्ठ सम्बन्ध है। जो मनुष्य प्राणीमात्र के अंतःकरण में ईश्वर का निवास मानकर भक्ति करता है वही सबसे प्रेम भाव रख सकता है, और उसी से दूसरों का दुःख नहीं देखा जाता। दूसरों के दुःख को देखकर उसको अपने अंतर में दुःख का असर होता है, जिससे तत्काल हृदय द्रवीभूत होकर अपने अंतर के दुःख की निवृत्ति के लिये दुःखी प्राणी की सहायता करने के लिये तत्पर होता है। अतः भक्ति से प्रीति और दयावृत्ति की पुष्टि होती है। तद्वत् प्रीतिवृत्ति उत्पन्न होगी तभी मनुष्य भक्ति और दया करते हैं, जब दयावृत्ति होगी, तब ही भक्ति और प्रीतिवृत्ति स्पष्ट बनेगी इस रीति से इन तीनों वृत्तियों का परस्पर संबंध है। इसी हेतु से सज्जन विवेकी जन दूसरों के प्रति दया रखते हैं। इस विषय में नीतिकार कहते हैं, कि :-
प्राणी यथात्मनाँ·भीष्टा भूतानामपि ते तथा।
आत्मौपम्येन भूतेषु दयाँ कुर्वन्ति साधवः॥
जैसे अपने को अपना जीवन प्यारा है वैसा ही अन्य प्राणी मात्र को है। अतः दूसरों को अपने आत्मा के समान समझ कर सज्जन लोग सर्वदा दया करते ही रहते हैं।
दया, भक्ति और प्रीति इन वृत्तियों का विकास परोपकार करने से ही होता है। परोपकार करने पर अन्तर में जो सुख उत्पन्न होता है, वह सुख संसार की सर्वोत्तम सुन्दरी के सहवास से भी नहीं मिल सकेगा, ऐसा प्राचीन नीतिकारों का कथन है। परोपकार करने से दयावृत्ति का जितना अधिक विकास होता जायेगा, उतने अंश में सुख शान्ति भी संबंधित होती जायेगी।
प्रीति कर भोजन, गुलाबादि पुष्पों की सुवास, नाटक देखना, पति पत्नी सम्मिलन, मनोहर गीत श्रवण इत्यादि विषयों से जो आनन्द मिलता है यह चन्द मिनटों में ही विसर्जित हो जाता है तब सज्जनों का समागम, धार्मिक ग्रंथ का मनन, शरणागत रक्षण, दीन जनों पर दया, पीड़ितों की शुश्रूषा, स्वदेश या स्वधर्म की सेवा, विश्व प्रीति भक्ति, ईश्वरोपासना इत्यादि कर्तव्यों से मिलने वाला आनन्द सकाम भाव से किया जाय तो घन्टों पर्यन्त बना रहता है। और यदि इस विश्व सेवा आदि कर्मयोग का पालन निष्काम भाव से करते रहने का स्वभाव हो जाए, तो निरन्तर आनन्द का नशा बना ही रहता है। इस रीति से आनन्द की जाति और स्थिरता में अंतर रहता है। इनमें से विवेकी जन विचार शक्ति द्वारा विवेक करके तुच्छ विषयों के आनन्द का त्याग करते हैं और अपनी संवेदनावृत्ति के अनुकूल क्रमशः अधिकाधिक श्रेष्ठ कोटि के आनन्द की जिज्ञासा करते हैं।
महर्षि व्यास के जीवन चरित्र से अवगत होता है कि आपने विश्व कल्याण में ही अपने सुख को तिलाँजलि देकर सारा जीवन विश्वसेवा में ही समर्पित किया था। आपके निष्काम परिश्रम से ही वेदों का रक्षण हुआ, स्मृति, महाभारत और पुराणों की रचना हुई। एवं भारत की प्राचीन संस्कृति आज भी सजीव दिखाई दे रही है। इसी हेतु से व्यास भगवान को श्रद्धालु ग्रन्थकारों ने बार-बार नमस्कार किये हैं। श्री मद्भगवद्गीता के माहात्म्य में लिखा हैं कि :-
नमो·स्तु ते व्यास विशाल बुद्धे!
फुल्लार विंदायतपत्रनेत्र।
येन त्वया भारततैल पूर्णः
प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥
हे कमल नेत्र के समान सुन्दर नेत्र वाले। महा बुद्धिमान! व्यास-भगवन्, आपने भारत रूपी तैल को भर कर ज्ञान रूप दीपक जलाया है, अतः आपके प्रति नमस्कार है।
विवेकी जनों को निबिड़ अज्ञानान्धकार से आच्छादित ऐहिक, पारलौकिक, कर्त्तव्यपथ से गमन करने के समय यदि ज्ञान दीपक के प्रकाश का अभाव हो, तो भ्रम, प्रमादवश पथच्युत होकर गर्त में गिरने की और काम, क्रोध, मोहादि रात्रिचर असुरों की फैली हुई मायापाश के पाश में फंसकर, संचित धर्म धन लुट जाने की भीति रहती है।
इस नीति का सद्ज्ञान प्रदीप द्वारा निवारण करने वाले लोक सेवी व्यास जी तथा अन्य ऐसे ही परमार्थी दयालु सज्जन निस्संदेह वन्दनीय हैं।
सब भूतों के महान ईश्वर रूप मेरे परम् भाव न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ परमात्मा को नहीं पहचानते।
भगवान श्री कृष्ण,
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मेरी यह त्रिगुणमयी दैवी माया बड़ी हो दुस्तर है। जो पुरुष मुझ को ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया से तर जाते हैं।
भगवान श्री कृष्ण,
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मुझ में मन लगा दो और मुझ में ही बुद्धि लगा दो, फिर तुम निस्सन्देह मुझको ही प्राप्त हो होओगे।
भगवान श्री कृष्ण,
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जिन लोगों में फूट है वे न तो धर्म का आचरण कर सकते हैं, न सुख प्राप्त कर सकते है, न गौरव प्राप्त कर सकते हैं और न शक्ति ही प्राप्त कर सकते है।
(विश्वकवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर)
साँप्रदायिकता एक भयानक अमरबेल के समान उसी धर्म में से अपना आहार लेती रहती है जिसके अनुसार वह अपना रंग ग्रहण करती है और उसे इस ढंग से बिल्कुल समाप्त कर देती है कि उसे (उस धर्म को) यह बात विदित नहीं होने पाती कि रस के चूस लिये जाने के कारण कब उस की प्राणशक्ति सूख गई है। यह अपने निकटवर्ती लोगों के द्वारा विश्वसनीय मानी जाने वाली बातों से बहुत अधिक घृणा करती हुई उस धर्म की मरी हुई खाल का उपयोग अपने निवास स्थान के रूप में करती है तथा उसी के द्वारा लड़ने झगड़ने की अपनी अपवित्र भावना की, और अपनी पवित्रता की झूठी प्रशंसा की रक्षा करती है।
जब किसी विशेष धर्म के मानने वाले साम्प्रदायिक भक्तों को अपने भाइयों के प्रति किये जाने वाले उस विषम व्यवहार के लिए जो मानवजाति को बहुत अधिक आघात पहुँचाता है तथा उसे अपमानित करता है, जवाब देने को मजबूर किया जाता है तब वे तुरंत ही अपने धर्मग्रन्थों में से न्याय, शील और मनुष्य में विद्यमान देवत्व का उपदेश देने वाले उत्तम उद्धरणों को पेश करके औरों के मन को दूसरी ओर फेर देने का प्रयत्न करने लगते हैं। किन्तु यह देखकर हँसी आती है कि उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि ये ही सब बातें उन की बुद्धि के प्रायः बन रहने वाले ढंग में बहुत अधिक हानि पहुँचाने वाली गड़बड़ी उत्पन्न करती हैं।
अपने धर्म के अभिभावक बनते समय एक ओर तो वे ऊपरी रीति रिवाजों को जो प्रायः पुराने समय के होते हैं, झूठमूठ स्थायी महत्व देकर भौतिक संपत्तिवाद को तथा दूसरी ओर नैतिक औचित्य से रहित जन्म और सादृश्य के आधार पर बनाये हुए विशेष सुविधाओं के मजबूत घेरे के भीतर अपने पूजा के ढंगों को पवित्रता का रूप देकर नैतिक संपत्तिवाद को उस धर्म पर आक्रमण करने देते हैं। इस प्रकार का पतन किसी एक ही विशेष धर्म में नहीं, वरन् किसी न किसी न मात्रा में सभी धर्मों में पाया जाता है और इसके अपवित्र कारनामों का इतिहास भाइयों के खून से लिखा गया है तथा उसमें उन पर किये गये तमाम अत्याचारों की मुहर लगा दी गई है।
मनुष्य के समस्त इतिहास में यह बात दुःखद रूप में स्पष्ट है कि धर्म, जिनका उद्देश्य जीवात्मा को मुक्त कर देना है, किसी न किसी रूप में सदा मन की स्वतंत्रता को और यहाँ तक कि नैतिक अधिकारों को भी शिथिल करने के साधन रहे हैं। अयोग्य हाथों में पड़कर सत्य का अधिकार, वह सत्य जो मानव-जाति को पशुता के अन्धकारमय प्रदेश से बाहर निकाल कर उसकी आर्थिक और नैतिक उन्नति करने के लिए बनाया गया था-समुचित दण्ड देने लग गया है, और इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक कुटिलता के कारण जितनी अधिक तर्क-शून्यता और नैतिक विवेकहीनता फैल रही है उतनी हमारी शिक्षा में पाई जाने वाली किसी अन्य कमी के कारण नहीं।
इसी प्रकार जब विज्ञान के द्वारा बतलाये हुए सत्य का प्रयोग बुरे व्यापारों में किया जाने लगा है तब वह हमें विनाश करने की धमकी दे रहा है। मनुष्य के लिए ये बड़े दुःखदाई अनुभव हैं कि सभ्यता से उत्पन्न होने वाली सभी वस्तुओं को ऐसे दुरुपयोग से देखा जाय तथा धर्म के अभिभावक एक तरफ से हत्याकाण्ड तथा दासत्व की स्थापना करने के लिए उद्यत और शस्त्रास्रिसज्जित लौकिक शक्ति को आशीर्वाद देते हुए पाये जायं, तथा विज्ञान भी उन्हीं विचारहीन शक्तियों के उपद्रवों से युक्त घातक जीवन में भाग लें।
जब हम इस बात में विश्वास करने लगते हैं कि हमने किसी विशेष संप्रदाय को मानने के कारण ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, तब तो हमें इसी बात से पूर्ण शान्ति मिल जाती है कि अब आगे और भी ज्यादा जोर के साथ उन लोगों के, जिनका ईश्वर संबन्धी मत सिद्धान्तों में भिन्न है, खोपड़ों को फोड़ना ही ईश्वर की एक मात्र सेवा है।
इस प्रकार प्रत्येक धर्म जो कि बन्धन से छुड़ाने वाले के रूप में आरम्भ होता है, अन्त में एक विशाल कारागार बन जाता है। उस के संस्थापक के त्याग की नींव के आधार पर उसकी इमारत खड़ी होती है, किन्तु उसके पुरोहितों के हाथ में पड़ कर वह एक संग्रह करने वाली संस्था बन जाती है और विश्वजननी होने का दावा करते हुए वह मतभेद और झगड़ों का एक सक्रिय केन्द्र बन जाती है। धीरे-धीरे बहने वाली एक धारा के समान मनुष्य की आत्मशक्ति सड़ती हुई कीचड़ से भर जाती है, और उन छोटी छोटी छिछली तलैयों में विभक्त हो जाती है जो केवल मूर्खता के घातक कुहरे को ही उत्पन्न करने का काम करती है। यह विचारान्धता के अनुसार पवित्र है, किन्तु आध्यात्मिक नहीं है। यह तर्कशून्यता की उन कल्पित भावनाओं से घिरी रहती है जो धर्म के भद्दे अनुकरण के द्वारा दुर्बल मनों में अपना अड्डा जमा लेती है।
यही साम्प्रदायिक भावना है जो धर्म जैसी दिखाई पड़ती हैं पर वस्तुतः धर्म तत्व से कोसों दूर है। साम्प्रदायिकता तो धर्म की सड़ी हुई विकृत भक्ति ही कही जा सकती है।
(आचार्य श्री सुरेन्द्र मोहन जी, बी.ए.)
महर्षि चरक ने स्वास्थ्य प्राप्त के उपायों का वर्णन करते हुए एक स्थान पर लिखा है :-
त्रयः अपस्त भा इत्याहारः स्वप्नों ब्रह्मचर्यमिति,
एंभिस्त्रिमिर्युक्तै रुपस्तब्धनुपस्तंभः शरीरं।
बलवर्णोपचितमनुवर्त्तते यावदायुः संस्कारात्
संस्कार महितमनुपसेवमानस्य, य इहैवोपदेयश्ते॥
आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य- यह तीन जीवन के स्तम्भ हैं। जो मनुष्य इन तीन स्तम्भों से निज शरीर को इनको युक्तियुक्त प्रयोग करके धारण करता है, वह बल और वर्ण से उपचित (पुष्ट) हुआ 2 आयुपर्यन्त सुखी रहता है। अहित संस्कारों को सेवन नहीं करना चाहिए।
प्रथम स्तम्भ -
जीवन का प्रथम स्तम्भ आहार है। शरीर आहार से ही बनता है। जो कुछ भी हम खाते हैं, उससे हमारा रस, माँस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य बनता है। जैसा आहार हम करेंगे, उसके गुणानुसार ही हमारे यह धातु बनेंगे। यदि आहार में अहितकर पदार्थ होंगे तो हमारे रसादि धातु दूषित होकर नानाविधि रोगों की उत्पत्ति करेंगे। यदि आहार अच्छे और प्रकृति के अनुकूल द्रव्यों से युक्त होगा, तो रसादि धातु ठीक परिमाण में और अच्छे उत्पन्न होंगे और स्वास्थ्य स्थिर रहेगा, तथा शरीर में बल वर्ण की वृद्धि होगी। अच्छा आहार भी मात्रा से एवं ठीक परिणाम में और समय पर खाना चाहिए। चरक ने कहा है :-
हिताशी स्यान्मिताशीस्यात्कालेभोजी जितेन्द्रियं।
पश्यन्रोगान् बहूनकष्टन् बुद्धिमान् विषमाशनादिवि॥
अर्थात् मनुष्य को हित वस्तुओं का सेवन करना चाहिए। मित अशन (आवश्यकतानुसार परिमित मात्रा में खाना) समय पर भोजन करना और जितेन्द्रिय रहना-यह सब कुछ मनुष्य के लिए आवश्यक है, क्योंकि विषमाशन (नियम विरुद्ध भोजन करने) से घोर रोग उत्पन्न होते हैं।
द्वितीय स्तम्भ -
दूसरा स्तम्भ है निद्रा। यह भी मनुष्य के लिए बड़े कल्याण की वस्तु है। जिस प्रकार ईश्वर ने दिन रात उत्पन्न किए हैं, इसी प्रकार परमात्मा ने प्राणियों के लिए स्वप्न और जागरण दो दशाएं नियत की हैं। रात्रि विश्राम करने के लिए है और दिन कार्य करने के लिए है। जो लोग अति लोभ वा अन्य कारणों से रात्रि को जागते हैं, वह अपनी आयु का ह्रास करते हैं और अनेक रोग उन्हें लग जाते हैं। कुछ तो पागल भी हो जाते हैं। क्या हम यूनिवर्सिटी की परीक्षा के दिनों में नहीं देखते कि कुछ लड़के बहुत रात तक वा सारी रात बैठे रहते हैं और अगले दिन उन्मत्त से होकर वा शिरोवेदना के कारण परीक्षा में नहीं बैठ सकते वा बैठ कर कुछ नहीं लिख सकते। यदि वह रात्रि को विश्राम करें, तो अगले दिन मस्तिष्क स्वच्छ होने से लड़के परचे अच्छी प्रकार कर सकते हैं। रोगियों को यदि निद्रा न आवे, तो रोग बढ़ता है। यदि निद्रा आवे तो रोग घटता है। जिन्हें निद्रा पूर्ण मात्रा में नहीं आती, उन का स्वास्थ्य भी विकृत हो जाता है। जैसे अन्धे “बाबा” आँखें बड़ी नियामत हैं कहते रहते हैं, वस्तुतः निद्रा भी बड़ी नियामत है। इसे व्यर्थ में नष्ट करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए।
पुनः अतिनिद्रा भी स्वास्थ्य के लिए अहितकर है। जो लोग निश्चित होकर बहुत सोते हैं, उन्हें स्थ्यौल्य (मोटापन), प्रतिश्याय (जुकाम), मधुमेह आदि अनेक रोग हो जाते हैं। बहुत सोना अच्छा नहीं। निद्रा का सामान्य नियम भी ध्यान में रखें, अर्थात् रात्रि को जल्दी सोएं और प्रातः काल सवेरे उठकर बाहर भ्रमणार्थ जावें। सूर्योदय होते समय सर्वप्रथम रश्मियों का प्रकाश ग्रहण करें। वह बहुत स्वास्थ्यवर्धक होती है। श्री वागभट्ट ने कहा है :-
‘ब्रह्म मुहुत्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थ मायुषः।’
स्वस्थ मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त (घड़ी रात रहते) में आयु की रक्षा के लिए उठना चाहिये। यह नियम रोगियों के लिए नहीं वह देर तक सो सकते हैं। रात को जल्दी सोना और प्रातः सवेरे उठना मनुष्य को आरोग्य और धन दोनों देता है।
तृतीय स्तम्भ -
तीसरा स्तम्भ ब्रह्मचर्य है। इसे वीर्य रक्षा भी कहा जाता है। वस्तुतः इस का अर्थ है “ब्रह्मणि चयर्तिकनेनेति ब्रह्मचर्यम्”-अर्थात् ब्रह्म में विचरना ही ब्रह्मचर्य है। जो व्यक्ति ब्रह्म को सर्वव्यापक और सर्वश ज्ञान कर विचारता है, वह वीर्य नाश जैसा अपराध कहाँ कर सकता है। वीर्य रक्षा केवल ब्रह्मचारियों के लिए ही नहीं, प्रत्युत विवाहितों के लिए भी आवश्यक है। जो विवाहित पुरुष वीर्य का व्यय ध्यान से करता है, वह भी महर्षि चरक के कथनानुसार ब्रह्मचारी कहलाता है। वीर्य रक्षा से, हृदय और मस्तिष्क दोनों सबल रहते हैं। ब्रह्मचारी मनुष्य कष्ट के समय में नहीं घबराता। बड़ी बड़ी समस्याओं को सुगमता से हल कर सकता है।
मुझ अव्यक्त मूर्ति से यह सब जगत परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्दर स्थित है, मैं उनमें स्थित नहीं हूँ और वे भूत भी मुझ में स्थित नहीं हैं, मेरी योग माया और प्रभाव को देखो कि सब भूतों को धारण, पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला मेरा आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं हैं।
-भगवान श्री कृष्णा,
सदाचरण से मनुष्य की संपत्ति की वृद्धि होती है। लोक में उसकी कीर्ति बढ़ती है।
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी वर्धा)
उपनिषद् में एक वाक्य है जिसका अर्थ है कि जो जगत को भिन्न समझता है उसे मौत मिलती है, यह वाक्य दर्शन शास्त्र के एक सिद्धान्त की घोषणा ही नहीं है, और न अतिशयोक्ति अलंकार का नमूना है, किन्तु यह धर्म-शास्त्र का ध्रुव सत्य है।
माना कि जगत में भिन्नता है हर एक चीज अपनी विशेषता रखती है, पर हमें यह भूलना न चाहिये कि भिन्नता और विशेषता की सार्थकता समन्वय में है एकता में है अन्यथा वह जीवन न होगी मौत होगी।
हमारे शरीर के जितने अंग हैं वे कुछ विशेषता रखते हैं, भिन्नता रखते हैं, परन्तु अगर उनमें समन्वय न हो, एकता न हो तो वे माँस के लोथड़े के सिवाय और क्या रहे? समन्वय होने से जिन्दे मनुष्य का रूप दिखाई दे रहा है। जो बात मनुष्य के अंगों के बारे में सत्य है वही बात मनुष्य जाति के अंगों के बारे में भी सत्य है।
आज मनुष्य जाति का दायरा बढ़ गया है पहिले आसपास के दो चार जिलों में ही आना जाना होता था इसलिये मनुष्य जातीयता की दृष्टि से उतने ही क्षेत्र में समन्वय की साधना करता था। अब यातायात का समन्वय सारी दुनिया से हो गया है, सारी दुनिया का एक बाजार बन गया है इसलिये मानवता का समन्वय हमें सारी दुनिया के साथ करना है। अगर समन्वय रूप इस अद्वैत को हम न पा सकें तो हमें मौत ले जायगी।
आज हम मौत की राह से विरक्त नहीं हो रहे हैं। हम समन्वय की चेष्टा नहीं करते, किन्तु विशेषताओं या भिन्नताओं की पूजा करते है उन्हीं की साधना करते हैं, विशेषता शिव है या अशिव, सुन्दर है या असुन्दर, इसकी हमें परवाह नहीं है।
इसमें सन्देह नहीं कि मनुष्य अहंकार का पुतला है और अहंकार किसी विशेषता पर टिकता है पर हर एक विशेषता अहंकार की पूजा सामग्री नहीं बन सकती विशेषताएं तीन तरह की होती हैं। प्रशंसनीय विशेषता ही को अपनाना चाहिये।
पर मनुष्य में प्रशंसनीय विशेषताएं इतनी और ऐसी नहीं है कि उससे मनुष्य जाति के टुकड़े टुकड़े हो सकें । ईमानदारी, सत्यवादिता, शील त्याग, दान, स्वच्छता आदि प्रशंसनीय विशेषतायें हैं, पर इनकी ठेकेदारी किसी के पास नहीं, और न इनके कारण मनुष्य जाति के टुकड़े हुए हैं। जातियाँ इन विशेषताओं में स्पर्द्धा भी नहीं करतीं।
जातियों का भेदभाव टिका हुआ है अपेक्षणीय विशेषताओं पर, जिनमें नाम की विशेषता भी शामिल है। तुम्हारी भाषा कैसी है, तुम कैसे कपड़े पहनते हो, कैसा खाते हो, कैसा शिष्टाचार पालन करते हो आदि बातों की निःसार विशेषताओं पर ये जातियाँ टिकी हुई हैं। मजहब में इन विशेषताओं का रूप बन गया है। इन्हीं के अहंकार के कारण मनुष्य अद्वैत की, विश्व-प्रेम के उपासना छोड़कर द्वैत का, भेदभाव का शिकार बना हुआ है।
सच पूछा जाय तो ये उपेक्षणीय विशेषताएं नष्ट हो जानी चाहिये अगर किसी कारण ये अनिवार्य हों तो इनका घमण्ड तो कदापि न रहना चाहिए। अगर आज संसार भर की एक भाषा बन जाए तो इससे यह सहूलियत ही होगी कि मनुष्यमात्र एक दूसरे से मिल जुल सकेंगे। मानव की भलाई एक दूसरे के समझने में है न कि एक दूसरे के न समझने में। तब जुदी-2 भाषा लिपि की टेक क्यों? जन्म से प्रत्येक मनुष्य अपनी-2 भाषा या लिपि सीखकर तो आता नहीं आसपास के लोगों से बह सीखता है, और जो भी भाषा लिपि सीखता है उसे अपनी कहने लगता है, तब संसार भर के सब मनुष्य किसी एक भाषा लिपि को अपना लें तो इसमें किसका क्या जाता है? हाँ! भाषा सरल और अधिक से अधिक व्यवस्थित होनी चाहिये। अगर हम भाषा की दृष्टि से अद्वैत की ओर बढ़ें तो मनुष्यमात्र की एक जाति और राष्ट्र बनने में सुभीता हो जाए।
खाने पीने पहनने आदि की विशेषताएं भी उपेक्षणीय हैं, ये जलवायु तथा खाद्य पदार्थों की उत्पत्ति पर निर्भर हैं। जहाँ जो चीज पैदा हो और प्रकृति के अनुकूल हो वही खाना चाहिये इसमें घमण्ड की क्या बात है। अगर कहीं कोई अच्छी चीज पैदा होती है और हम वहाँ रहते नहीं हैं इसी से निन्दा करने की क्या जरूरत है? अगर सब चीजें सब जगह उपलब्ध होने लगें तो स्वास्थ्य के अनुसार उनका उपभोग करने में हमें हिचक क्यों पैदा होनी चाहिये। इसी प्रकार हमें अमुक तरह की टोपी या पगड़ी का पक्षपात क्यों होना चाहिये। हमारे प्रान्त में अगर किसी खास तरह की पोशाक का चलन है या बापदादे किसी चलन की पोशाक के अनुयायी रहे हैं तो रहे होंगे हमें उसका पक्षपात क्यों होना चाहिये। जलवायु तथा आर्थिक स्थिति के अनुसार पोशाक चुनने में बाधा क्या है?
कैसा झूठा मोह और कैसा झूठा अहंकार है यह-कि हम इन उपेक्षणीय विशेषताओं के लिये दिल से दिल मिलाने में हिचकते हैं। रूढ़ि मोह और अहंकार के शिकार बनकर किसी भलाई को भी नहीं अपना सकते।
आज बंगाली, बिहारी, हिन्दी भाषी, मराठी भाषी, राजस्थानी, गैर राजस्थानी आदि का द्वंद्व जोर पर हैं। सम्प्रदायों से तथा जातिभेदों से यह देश वैसे ही तबाह है अब यह तीसरा रोग और पनप रहा है। सच पूछा जाए तो हमें ये सब भेद जड़ से उखाड़ फेंकना है, क्योंकि ये मनुष्य की जन्मजात विशेषताएं नहीं है और न ऐसी विशेषताएं हैं जो परस्पर पूरक होती हैं। स्त्री पुरुष की विशेषताएं जन्मजात हैं और परस्पर पूरक हैं। स्त्री में जो कमी है उसे पुरुष पूरी करता है और पुरुष में जो कमी है उसे स्त्री पूरी करती हैं। दोनों की विशेषता मानव जाति के अस्तित्व के लिये, सुख के लिये जरूरी है पर जातिभेद देशभेद प्राँत भेद, भाषाभेद आदि के नाम पर चलने वाली विशेषताएं न तो परस्पर पूरक हैं न अनिवार्य-कि उनके बिना मनुष्य की दुर्दशा हो जाए। तब इन्हें क्यों चालू रखना चाहिये ?
जब मैं पढ़ता हूँ कि अरब यहूदी बुरी तरह आपस में लड़ते हैं, हिलमिल कर एक कौम नहीं बन पाते तब मुझे मनुष्य की बुद्धि पर तरस आता है। यहूदी दुनिया भर में फैलकर पीढ़ियों से बसे हुये हैं पर वे वहाँ के लोगों से मिलकर एक नहीं हो पाते। सब राष्ट्रों में फैलकर भी अपनी अंतर्राष्ट्रीय जाति बनाये हुये हैं, इसे मनुष्य की कम मूर्खता नहीं कह सकते। इससे दोनों मौत के मुँह में जा रहे हैं। यह अद्वैत को न मानने का फल है।
हमें इन उपेक्षणीय विशेषताओं से पिंड छुड़ाना है और जो रह जाये उन पर किसी तरह का जोर नहीं देना है बल्कि उन की पूरी तरह उपेक्षा करना है। इतना ही नहीं दूसरों की नवीनता का प्रेम पूर्वक आनन्द लेना है उन से द्वेष नहीं करना है, परायापन नहीं दिखाना है। यही सच्चा अद्वैत है, इसी अद्वैत की ओर बढ़ने की दुनिया को सख्त जरूरत है।
हमारी संस्कृति डूब जायगी, हमारी सभ्यता डूब जायगी, हमारी जाति डूब जायगी, हमारी भाषा डूब जायगी, इस प्रकार की भद्दी विभीषिकाएं प्रकट करते समय लोग यह नहीं सोचते कि यह सब तो डूब जायगा पर इसके स्थान पर जो आ जायगा वह अपने और जगत के कल्याण के लिए कितना जरूरी है। हमारा बंगालीपन, बिहारीपन मराठापन डूब जाय और उसके स्थान पर हिन्दुस्तानीपन या मानवपन आ जाय तो शान्ति सहयोग शक्ति आदि सब दृष्टियों से हमारा विकास ही होगा। पर लोगों के हृदय में इतनी क्षुद्रता स्वार्थपरता भर गई हैं कि वे विशाल हित और विकास की तरफ दृष्टि भी नहीं डाल पाते। वे कल्पित और क्षुद्र स्वकीयता के आत्म गुणों का, सत्य का मूल्य ही नहीं कर सकते। इस क्षुद्रता के कारण वे जगत में असत्य को, पाप को बढ़ने देते है। पग पग पर धक्के देते हैं पग पग पर धक्के खाते हैं।
एक बार एक विद्वान कहलाने वाले भाई ने ऐसा हास्यास्पद तर्क उपस्थित किया कि आप जातिपाँति तोड़ कर सबको एक बना देंगे, ठीक है। पर इससे पोरबार तो मर ही जायेंगे, अग्रवाल तो मर ही जायेंगे इनका इससे क्या फायदा हुआ, वे तो एक तरह से अपने जीवन से ही गये।
वे एक अध्यापक थे इसलिए मैंने उनसे कहा आप एक अपढ़ विद्यार्थी को पढ़ा लिखा कर विद्वान बना देंगे तो इससे अपढ़ का क्या फायदा हुआ। माना कि एक विद्वान पैदा हो गया पर अपढ़ तो मर ही गया, अपढ़ तो न रहा, वह तो एक प्रकार से अपने जीवन से ही गया।
अध्यापक जी झेंप तो गये पर झेंप दबाने के लिये उसने झेंप पर हँसी पोत ली। इस प्रकार के हास्यास्पद तथा मूर्खतापूर्ण तर्कों से मानव का मानस भरा पड़ा है और इसी से यह दुनिया खण्ड खण्ड होकर टकरा रही है, धूल में मिल रही हैं।
मानवता की जो शक्तियाँ जगत को स्वर्ग बना सकती हैं वे नरक बना रही हैं। जगह जगह टुकड़े करने की वृत्ति काम कर रही है। एक देश के दो देश, एक प्रान्त के दो प्रान्त, एक राज्य के अनेक राज्य, आदि द्वैत की उपासना में मानव लगा हुआ है। उपनिषद् के शब्दों में यह द्वैत की उपासना मौत को निमन्त्रण देना है। अमरत्व के लिये, दिव्यता के लिये, सुख शान्ति के लिये हमें अद्वैत की ओर बढ़ना चाहिये।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
बहुत से बड़ी उम्र के व्यक्तियों में एक प्रकार का रोग होता हैं जिसे हम अपरिपक्वता कह सकते हैं। ये लोग अपनी आयु के साथ अपने मस्तिष्क और विचार का तदनुकूल विकास नहीं कर पाते वे वृद्ध हो जाते हैं, किन्तु उनके विचार बच्चों जैसे बने रहते हैं। उनका स्वभाव, दिलचस्पी, आसक्ति, भावनाएं, मनोविकार, भय इत्यादि बच्चों जैसे बने रहते हैं।
इस प्रकार देखा गया है कि कुछ बड़ी आयु के व्यक्ति तनिक-तनिक सी बात पर रो देते हैं, दवाई पीते हुए आनाकानी करते हैं, ऑपरेशन कराते हुए भयभीत हो जाते हैं, या तनिक सी भी कठिनाई देखकर हाथ पाँव फुला लेते हैं। उद्विग्नता उन्हें कुछ भी काम नहीं करने देती। कुछ व्यक्ति छोटी छोटी वस्तुएं पाकर बच्चों की भाँति खिल उठते हैं। छोटा सा उपहार, कोई चटपटा भोजन, कोई रंग बिरंगा पदार्थ, या वासनाजन्य चित्र उन्हें उद्दीप्त कर देता है। अक्सर देखा गया है कि बड़ी उम्र वालों में भी कामवासना का ताँडव और मादकता वैसी ही चलती रहती है जैसी नवयुवकों में होती है। जहाँ कहीं किसी आकर्षक युवती को देखा कि उनका चित्त विकारों से परिपूर्ण हो उठता है। इसी प्रकार स्त्रियाँ वृद्धा हो कर भी चटकीले वस्त्र, रंग बिरंगे गहने, चित्र, चटपटे पदार्थ, खेल तमाशे, उत्सव, इत्यादि में बच्चों जैसी रुचि रखती हैं। यदि कोई उन्हें कोई अप्रिय बात कह दे तो वे तुरन्त उद्विग्न हो जायेंगी। घर भर में तूफान मच जायेगा। कुछ इतनी फरमाइश करती हैं कि बेचारा पति उनकी इच्छाएं पूर्ण करता-2 थक जाता है।
बच्चे और वृद्ध में क्या अन्तर है? बच्चे तनिक 2 सी बात पर मचलते हैं, रोते जिद करते, अहं का विस्तार करते, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, जिद के शिकार रहते हैं। इसके विपरीत ज्ञानवृद्ध व्यक्ति में संयम, आत्मनियंत्रण, इच्छा और विकारों पर शासन करने और उच्च विषयक विचार धारा होती है। प्रत्येक व्यक्ति को यह देखना चाहिये कि उसकी उम्र क्या है? उस उम्र के अनुसार उसकी इच्छाएं, स्वभाव, मानसिक बनावट, दैनिक कार्य व्यवहार है या नहीं ?
मान लीजिये आपकी आयु 25-30 वर्ष की है। इस आयु में परिपक्वता आनी चाहिये। आपको अपने स्वाद और छोटी मोटी इच्छाओं पर नियंत्रण करना चाहिये। वस्त्रों में से रंग रंगीलापन दूर होना चाहिये। 30-40 वर्ष के व्यक्ति को और भी आत्म विकास करना श्रेयष्कर है। उसे कामवासना से मुक्ति प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिये, स्वाद में से अधिक तप्त, कड़ुवे, तीखे, खट्टे-मीठे पदार्थों से रुचि ऊँची उठा कर ऊपर ले जाना चाहिये। वस्त्र सरल सादे सफेद रंग के होने चाहिये, ज्ञान की उन्नति निरन्तर होनी चाहिये। उसके व्यवहार में बड़प्पन, दूसरों को सान्त्वना देना, उत्साहित करना, सहानुभूति प्रदर्शन आना चाहिए। व्यर्थ के निरुपयोगी बकवास से मुक्त होना चाहिए। आज बड़ी उम्र वालों को असंतोष, दुःख, कष्ट, भ्रान्ति, शंका, संदेह और चिंता घेरे हुए हैं। उदासीनता के अनिष्ट विचार निरन्तर उथल पुथल मचाते रहते हैं एक क्षण भी शान्ति नहीं रहने देते। इसका क्या कारण है ?
इसका कारण यह है कि उन्होंने शारीरिक विकास के साथ-2 मानसिक और बौद्धिक विकास उसी अनुपात में नहीं किया है। शरीर से तो वे बूढ़े हो चले, किन्तु मन बच्चा ही बना हुआ है। शरीर पर सफेद बाल आ गये पर मन बच्चों की तरह मचलता है, प्रलोभनों में जाता है, परेशान करता है, कभी मन यौवन के सुनहरे स्वप्न देख कर आपको बरबस सिनेमा में खेंच ले जाता है। वह सुन्दर चित्र देखकर आपकी वासना की पूर्ति करता है। आप पान खाते हैं, सुगंधित तेल लगाते हैं, पुनः पुनः शीशे में अपनी शक्ल देखते हैं। यह सब इसलिए है कि बूढ़ा शरीर बच्चों जैसा अपरिपक्व, भ्रान्त, प्रलोभनों का शिकार, ढिलमिल स्वभाव का मन लिए बैठा है।
यदि आप परिपक्व उम्र पाकर शारीरिक दृष्टि से आगे बढ़ कर अपनी आयु से कम स्टैन्डर्ड वाले पदार्थों में रस लेते हैं मिथ्या अहंकार, द्वेष, प्रेम विकार में फँसते हैं कुवासनाओं के शिकार बनते हैं तो आप बड़ा बुरा करते हैं। आपकी मानसिक आयु नहीं बढ़ रही हैं। एक पदार्थों से आसक्ति हटी नहीं कि दूसरी ने धर दबाया। कभी आपका मन अमुक पदार्थ का शृंगार चाहता है, कभी अमुक प्रकार का वस्त्र अलंकार माँगता है, रुचिकर भोजन चाहता है, सब कुछ प्राप्त हो जाने पर भी संतुष्ट नहीं होता, आपके चित्त की अवस्था स्थिर नहीं रहती, संसार की मान सम्मान प्रतिष्ठा धन−जन कीर्ति के पीछे पागल हैं तो आप अपने मन को बच्चों का भोग दे रहे हैं।
यदि हम बुड्ढ़े लोग अपने बचपन (अपरिपक्वता मूढ़ता इन्द्रियों की गुलामी) को निकाल डालें तो हमें कोई विषमता परेशान नहीं कर सकती। मानसिक आयु में पिछड़े रहना एक भयानक नैतिक अपराध है। आध्यात्मिक जीवन में तो इससे बड़ा अपराध दूसरा नहीं हो सकता। आध्यात्मिक जीवन ही पूर्ण जीवन है जीवन एक विकास है। एक यात्रा है। इसमें एक एक स्टेज को पार करना पड़ता है। हमारा प्रत्येक दिन हमें निरन्तर आगे बढ़ा रहा है, अब यदि हम उम्र में बड़े हो कर भौतिक वस्तुओं में लिप्त रहें या घर घर में मनुष्य मनुष्य में बैर, द्वेष और झगड़ा चलता रहे तो हमारे समान मूर्ख और कौन हो सकता है। हम बच्चे ही कहे जायेंगे।
असंख्य बूढ़े मनुष्य तो पशु की स्थिति में पड़े हुए हैं। आध्यात्म पथ पर एक पग भी आगे बढ़ना नहीं चाहते। उनमें वास्तविक सामर्थ्य विद्यमान है उसका एक करोड़वाँ हिस्सा भी अपने जीवन में प्रकट नहीं करते यह बड़ी बुरी स्थिति है।
हे ज्ञानी आत्माओं ! तुम्हारी उम्र का तकाजा है कि अपनी रुचि-परिष्कार करो। बौद्धिक और मानसिक उन्नति शरीर के साथ ही बढ़नी चाहिये। प्रेम, शील, संतोष, हर्ष, सरलता, विनम्रता, सौम्यता, सत्यता, पवित्रता, निस्वार्थता का निरन्तर और सहज अभ्यास करो। हृदय को अपने काबू में रखो। पहिले यदि आप देह पूजा में लगे रहते थे, भोजन खान-पान विषय विकार में जीवन व्यतीत करते थे, तो अब आध्यात्मिक जीवन आरम्भ करो। आत्मा के दिव्य गुणों का विकास करो। सच्चा ज्ञान तुम्हें आत्मा में प्रवेश करने से ही प्राप्त हो सकेगा। आत्म-दृष्टि हुई तो रोग, शोक, भौतिक दुःख पास नहीं फटकते। आत्मा के जानने पर अन्य कुछ अवशेष नहीं रहता। सर्वत्र विश्व में सच्चा प्रकाश आत्म-विकास से ही हो सकता है।
आइये, हम उसी प्रशस्त पथ का ओर अग्रसर हों।
(श्री दौलतराम जी कटरहा, बी. ए.)
परस्पर एक दूसरे के संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों को हम बहुधा दो प्रकार की भावनाओं से प्रेरित पाते हैं। कभी हम देखते हैं कि सारा कुटुम्ब एक बालक को बचाने या पढ़ाने में अपने आपको मिटा देता हैं तो कभी कुटुम्ब का एक व्यक्ति सारे कुटुम्ब के लिये अपने आपको मिटा देता है। यहाँ एक पक्ष तब बचता है जब दूसरा अपना बलिदान कर देता है किन्तु इतना होते हुए भी हम यह नहीं कह सकते कि उस कुटुम्ब में वर्ग संघर्ष चल रहा है क्योंकि दोनों पक्षों का एक ही सा समान उद्देश्य है और वे एक ही भावना से प्रेरित हैं। किन्तु यदि दो पक्ष ऐसे हों कि उनके समान उद्देश्य न हो दोनों अपने अपने हित का अलग अलग ख्याल रखते हों तो एक साथ रहते हुए भी हम उन्हें एक ही वर्ग का नहीं कह सकते यदि मैं अपने घर में गाय को पालता हूँ और उस पालन में यदि यह भावना ही प्रधान हो कि इससे अधिक से अधिक लाभ हो तो गाय को खूब भरपेट भोजन देने के बावजूद मुझ में और गाय में वर्ग भेद मौजूद है। मुझे उस गाय से ममता होने के स्थान में “शुभ-लाभ” से अधिक ममता है किन्तु यदि मेरे हृदय में यह ख्याल हो कि गाय भले ही बूढ़ी होकर मर जाए, भले ही वह दूध और बछड़े देकर मेरी आर्थिक सहायता न कर सके पर मैं उसे अपने घर से अलग न करूंगा तो वह पशु होते हुए भी मेरी कुटुम्बिनी है और मुझमें और उसमें कोई भेद नहीं है। जहाँ दो पक्ष में प्रत्येक पक्ष दूसरे के हित में अपना हित मानते हैं तथा उसके लिए कुछ हानि भी उठाने के लिए तैयार रहता है वहाँ दोनों में उस समान उद्देश्य की दृष्टि से कोई वर्ग भेद नहीं रहता। किन्तु जहाँ उद्देश्यों की विभिन्नता होती है वहाँ उन उद्देश्यों की दृष्टि से उनमें वर्ग भेद होता है। यदि ये उद्देश्य ऐसे हों कि एक पक्ष का उद्देश्य सिद्ध होने पर दूसरे का उद्देश्य विफल होता हो जहाँ दो पक्ष के हितों में भेड़ और भेड़िये के हितों जैसा संबंध हो, जहाँ एक शोषक और दूसरा शोषित हो, जहाँ एक पीड़ित और दूसरा पीड़ित हो, वहाँ वर्ग संघर्ष तीव्र हो जाता है। अतएव भिन्न-2 वर्ग भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के होने से ही बन जाते हैं।
इस दृष्टिकोण से देखने पर हम कहेंगे कि यदि किसी पूँजीपति का अधिक से अधिक व्यक्तिगत सम्पत्ति जुटना ही प्रधान लक्ष्य है तो वह मजदूर वर्ग का विरोधी है किन्तु यदि वह “सब ईश्वर का है (ईशावास्यमिदं सर्वं)” ऐसा मान कर अपना व्यवसाय चलाता है, यदि उसका व्यवसाय के द्वारा यह उद्देश्य है कि मजदूर तथा वह स्वयं सुख सहित जीवन व्यतीत करें तो वह पूँजीपति मजदूर वर्ग का कदापि विरोधी न कहलावेगा। मार्क्स इस बात को अच्छी तरह नहीं समझे। उन्होंने अपने जमाने के पूँजीपतियों को देखकर एक दम कह दिया कि मजदूरों और उनके हितों में पारस्परिक विरोध है अतएव उनके बीच में वर्ग-संघर्ष अनिवार्यतः मौजूद है और मजदूरों की स्थिति को सुधारने के लिए उसे बढ़ाने की आवश्यकता है। जैसे बादशाहों में नासिरुद्दीन और औरंगजेब थे जो कि राज्य-कोष का अपने व्यक्तिगत सुख के लिए कोई उपयोग न करते थे, वैसे ही पूँजीपतियों में भी कुछ पूँजीपति उन्हें देखने को मिल जाते जो कि अपने पास की सम्पत्ति को अपनी न समझते और जिनका कि मजदूरों के साथ ही एक समान उद्देश्य होता तो वे वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त को वैसा अटल महत्व प्रदान न करते जैसा कि आज मार्क्सवादी दर्शन में हमें देखने को मिल रहा है। उसमें उनका संशोधन होता कि मजदूरों को संघर्ष केवल उन्हीं पूँजीपतियों से करना चाहिए जो मजदूरों को बहुत कम वेतन देते हों, जिनके उद्देश्य भिन्न हों, पर दूसरों से नहीं, किन्तु मार्क्स ने यह मान लेने की भूल की कि प्रत्येक पूँजीपति का अनिवार्यतः मजदूर वर्ग से भिन्न उद्देश्य होगा। इस कारण वे स्वयं भूल भुलैयों में पड़ गये और उन्होंने गलत निष्कर्ष निकाले।
आज वर्ग संघर्ष की चर्चा जोरों पर है। अपने वर्ग का संगठन, अपने वर्ग का लाभ, अपने वर्ग का स्वार्थ, अपने वर्ग का गौरव, अपने वर्ग की सत्ता, पर आज बहुत जोर दिया जा रहा है। अनेक वाद और संघ इस दशा में प्रयत्नशील हैं। पर लोग यह भूल जाते हैं कि सार्वजनिक सामूहिक लाभ, पारस्परिक सहयोग और विभिन्न वर्गों में कौटुम्बिक एकता का आयोजन करके भी वर्ग भेद को मिटाया जा सकता है। लाठी बल पर स्थापित किये गये साम्य की अपेक्षा भावनाओं से उत्पन्न हुआ साम्य अधिक श्रेयष्कर है।
महात्मा गान्धी जी भी साम्यवादी थे। वे भी वर्गविहीन समाज चाहते थे पर वे इसके लिए वर्ग संघर्ष को अनिवार्य नहीं समझते थे। उनका विश्वास था कि मानवीय सद्भावनाओं को विकसित करके वर्ग साम्य की स्थापना की जा सकती है। भारत गान्धी-वादी पद्धति से ऐसा साम्य स्थापित कर सका तो “अहिंसा द्वारा स्वराज्य प्राप्ति” के समान यह उसकी दूसरी आध्यात्मिक विजय कही जाएगी।
जो पुत्र बूढ़े माता-पिता की, पति अपनी साध्वी स्त्री की, पिता अपने छोटे बच्चों की, शिष्य गुरु की, समर्थ पुरुष ब्राह्मणों की और शरणागत की रक्षा नहीं करता, वह जीता हुआ ही मुर्दे के समान है।
-भगवान् श्री कृष्ण,
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जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग के द्वारा सच को निरन्तर भजता है, वह सत्य-रज-तम तीनों गुणों को भली भाँति लाँघकर ब्रह्म को प्राप्त होता है।
-भगवान् श्री कृष्णा,
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वह सभा, सभा नहीं है जिसमें वृद्ध न हो, वह वृद्ध वृद्ध नहीं है जो धर्म की बात नहीं करता, वह धर्म धर्म नहीं है जिसमें सत्य नहीं है, वह सत्य सत्य नहीं है जिसमें छल है।
-भगवान् श्री कृष्णा,
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अगर गिरों तो अपने कुकर्मों को दोष दो, अगर ऊँचे चढ़ो तो परमात्मा का गुण गाओ।
-महर्षि व्यास
(श्री स्वामी श्रद्धानंद जी के आत्म-चरित्र से)
उन्हीं दिनों मेरे मामू महाशय ने मुझे कुछ-कुछ मद्य-पान का अभ्यास शुरू करा दिया था। अब तो मैंने मद्यपवीर का पूरा रूप धारण कर लिया, यदि उस रामायण पर से श्रद्धा न उठ गई होती जिस में सीता के आदर्श पतिव्रत पर मैंने बार बार पवित्र अश्रुधारा बहायी थी तो मुझे निश्चय है कि गड्ढे से बच जाता जिसमें गिरने के पीछे मुझे घोर प्रायश्चित करने पर ही शान्ति प्राप्ति हुई थी। यदि अपने प्राचीन इतिहास पर श्रद्धा होती तो पीड़ित स्त्री जाति का रक्षाबन्धन भाई बन कर उनकी रक्षा का व्रत लेता। परन्तु मैंने तो अपनी सभ्यता को जंगलीपन और अपने साहित्य को मूर्खता का भण्डार समझ रखा था, फिर उनसे मुझे सहायता कब मिल सकती थी ?”
“बरेली आने पर शिवदेवी (मेरी धर्मपत्नी) का यह नियम हुआ कि दिन का भोजन तो मेरे पीछे करती ही, परन्तु रात को जब कभी मुझे देर हो जाती और पिता जी भोजन कर चुकते तो मेरा और अपना भोजन ऊपर मंगा लेती और जब मैं लौटता उसी समय अंगीठी पर गर्म करके मुझे भोजन करा पीछे स्वयं खाती। एक रात मैं आठ बजे मकान लौट रहा था। गाड़ी दर्जी चौक के दरवाजे पर छोड़ी। दरवाजे पर ही बरेली के बुजुर्ग रईस मुंशी जीवन सहाय का मकान था। उनके बड़े पुत्र मुंशी त्रिवेनी सहाय ने मुझे रोक लिया। गजक सामने रखी और जाम भर कर दिया । मैंने इन्कार किया। बोले - “तुम्हारे ही लिए तो दो अतिशा खिंचवायी है। यह जौहर है। त्रिवेनी सहाय जी छोटेपन के मेरे मित्र थे। उनको मैं बड़े भाई के तुल्य समझता था न तो अतिशा का मतलब समझा न जौहर का। एक गिलास पी गया फिर गपबाजी शुरू हो गयी और उनके मना करते करते मैं चार गिलास चढ़ा गया। असल में वह बड़ी नशीली शराब थी। उठते ही असर मालूम हुआ। दो मित्र साथ हुये। एक ने कहा चलो मुजरा करायें। उस समय तक न तो मैं कभी वेश्या के मकान पर गया था न कभी किसी वेश्या को बुलाकर अपने यहाँ बातचीत की थी, केवल महफिलों में नाच देख कर चला आता था। शराब ने इतना जोर किया कि पाँव जमीन पर नहीं पड़ता था।”
एक वेश्या के घर में जा घुसे। कोतवाल साहब के पुत्र को देख कर सब सलाम करके खड़ी हो गयीं। घर की बड़ी नायिका का हुक्म हुआ कि मुजरा सजाया जाए। उसकी नौची के पास कोई रुपये देने वाला बैठा था उसके आने में देर हुई। न जाने मेरे मुँह से क्या निकला सारा घर काँपने लगा। नौची घबड़ायी हुई दौड़ी आई और सलाम किया तब मुझे किसी अन्य विचार ने आ घेरा। उसने क्षमा माँगने के लिये हाथ बढ़ाया और मैं “नापाक नापाक” कहते हुए नीचे उतर आया। यह सब पीछे साथियों ने बताया, नीचे उतरते ही घर की ओर लौटा, बैठक में तकिये पर जा गिरा और बूट आगे कर दिये जो नौकर ने उतारे। उठ कर ऊपर जाना चाहा परन्तु खड़ा नहीं हो सकता था। पुराने भृत्य बूढ़े पहाड़ी पाचक ने सहारा देकर ऊपर चढ़ाया। छत पर पहुँचते ही पुराने अभ्यास के अनुसार किवाड़ बन्द कर लिये और बरामदे के पास आया ही था कि उल्टी होने लगी। उसी समय एक नाजुक छोटी अँगुलियों वाला हाथ सिर पर पहुँच गया और मैंने उलटी खुलके की। अब शिवदेवी के हाथों में मैं बालकवत् था। कुल्ला करा, मेरा मुँह पोंछ ऊपर का अँगरखा जो खराब हो गया था बैठे ही बैठे फेंक दिया, और मुझे आश्रय देकर अन्दर ले गई। वहाँ पलंग पर लिटाकर मुझ पर चादर डाल दी और बैठ कर सिर दबाने लगी। मुझे उस समय का करुणा और शुद्ध प्रेम से भरा मुख कभी न भूलेगा। मैंने अनुभव किया मानो मातृशक्ति की छत्रछाया के नीचे निश्चिंत लेट गया हूँ। पथराई हुई आँखें बन्द हो गयी। और मैं गहरी नींद सो गया। रात को शायद एक बजा था जब मेरी आँख खुली। वह चौदह पन्द्रह वर्ष की बालिका पैर दबा रही थी। मैंने पानी माँगा। आश्रय देकर उठाने लगी, परन्तु मैं उठ खड़ा हुआ। गरम दूध अँगीठी पर से उतार और उसमें मिश्री डाल कर मेरे मुँह से लगा दिया दूध पीने पर होश आया। उस समय अंग्रेजी उपन्यास मगज में से निकल गये और गुसाँई जी के खींचे दृश्य सामने आ खड़े हुये। मैंने उठ कर और पास बैठ कर कहा- ‘देवी! तुम बराबर जागती रहीं और भोजन तक नहीं किया। अब भोजन करो।’ उत्तर ने मुझे व्याकुल कर दिया। परन्तु उस व्याकुलता में आशा की झलक थी। शिवदेवी ने कहा “आपके भोजन किये बिना मैं कैसे खाती ? अब भोजन करने में क्या रुचि है। उस समय की दशा का वर्णन लेखनी द्वारा नहीं हो सकता। मैंने अपनी गिरावट की दोनों कहानियाँ सुना कर देवी से क्षमा की प्रार्थना की परन्तु वहाँ उनकी माता का उपदेश काम कर रहा था-आप मेरे स्वामी हो यह सब कुछ सुनाकर मुझ पर पाप क्यों बढ़ाते हो ! मुझे तो यह शिक्षा मिली है कि मैं आप की नित्य सेवा करूंगी। उस रात बिना भोजन किये दोनों सो गये और दूसरे ही दिन से मेरे लिये जीवन बदल गया।
“वैदिक आदेश से गिर कर भी जो सतीत्व धर्म का पालन पौराणिक समय में आर्य महिलाओं ने किया है उसी के प्रताप से भारत भूमि रसातल को नहीं पहुँची और उसमें पुनरुत्थान की शक्ति अब तक विद्यमान है-यह मेरा निज का अनुभव है। भारत-माता का ही नहीं, उसके द्वारा तहजीब की ठेकेदार संसार की सब जातियों का सच्चा उद्धार भी उस समय होगा जब आर्यावर्त की पुरानी संस्कृति जागने पर देवियों को उनके उच्चासन पर फिर से बिठाया जायेगा।”
(डॉ. लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए. साहित्य-रत्न, एन. डी.)
शरीर रोग का मन्दिर है-यह बात गलत है। शरीर स्वास्थ्य का घर है। रोग तो हमारी गलतियों और अज्ञानता का परिणाम है। ऊपर कहे हुए वाक्य का केवल यही मतलब है कि यदि हमने प्रकृति का विरोध किया, हमारे खानपान तथा रहन सहन में अस्वाभाविकता आई तो शरीर में रोग घुलते देर नहीं लगेगी। शरीर को रोगी बनाना तथा स्वस्थ रखना बहुत कुछ हमारे हाथ में है।
शरीर की साधारण अवस्था स्वास्थ्य है। यदि हम तनिक सा ध्यान रखें तो स्वस्थ रह सकते हैं। हम प्रायः मोटे और गठीले बदन के लोगों को स्वस्थ समझते हैं पर अक्सर ढोल में पोल होती है। प्रायः ऐसे लोगों के शरीरों में भी विदेशीय पदार्थों तथा मलों का भार होता है। यह दूसरी बात है कि प्राण तत्व की अधिकता के कारण उनके कुप्रभाव को हम जान न सके।
आये दिन जुकाम, खाँसी, कब्ज से पीड़ित मौसम बदलने पर ढीले मनुष्य स्वस्थ नहीं कहला सकते। स्वस्थ मनुष्य की एक साधारण पहचान है उसका पैखाना। यदि न बहुत कड़ा न पतला, बँधा हुआ एक मोटी बत्ती के रूप में हल्का भूरा और हरा एक मिनट के अन्दर ही एक साथ टट्टी घर में जाते ही पैखाना हो जाय और गुदा-भाग वैसा ही साफ रहे जैसा कि स्वस्थ पशुओं का पैखाना होने के बाद रहता है। उसे जल से शौच लेने या कागज से पोंछने की आवश्यकता न पड़े (मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि शौच जल से न लिया जाय) तो हम उस मनुष्य को स्वस्थ समझ सकते हैं।
अस्वास्थ्य क्या है ?
शरीर में किसी प्रकार का विकार होना चाहे वह प्रकट हो या अप्रकट हम उसे जानें या न जानें वह ही अस्वास्थ्य है। रोग का प्रकट अप्रकट, तीव्र, मंद तथा नाशात्मक किसी रूप में होना रोग तथा अस्वास्थ्य का लक्षण है। शरीर संबंधी विकार ही अस्वास्थ्य के द्योतक नहीं है। हमें क्रोध अधिक आता है, हम निराशावादी हैं, हम चिड़चिड़े हैं, हमारी बुद्धि मंद है, हमारी मानसिक तथा मस्तिष्क संबंधी दशाएं भी सूचित करती हैं कि हम अस्वस्थ हैं। वास्तविक स्वस्थ मनुष्य दुष्कर्म तथा अवांछनीय कर्म कर ही नहीं सकता। झूठ, फरेब, बेईमानी, ढोंग आदि सबके भीतर यही अस्वस्थता का कारण है।
यह रोग तथा अस्वास्थ्य क्यों ?
बिना किसी कारण के कोई कार्य नहीं होता। भले ही प्रयत्न करने पर भी हम अपने रोग और स्वास्थ्य का कारण समझ न पावें किन्तु प्रकृति परम न्यायी है। ईश्वर हमें रोग के रूप में व्यर्थ दण्ड नहीं देता। पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध ने हमारा मस्तिष्क और हृदय ही नहीं बदल दिया है, हमारा खान-पान, रहन-सहन यहाँ तक कि सोचने, विचारने का ढंग भी बदल दिया है। हम अपने आहार-विहार तथा कार्य व्यवहार में सुधार करना ही नहीं चाहते। हम कूप मंडूक ही रहना चाहते हैं। (बंधे बंधाये जैसा ही हो रहा है वैसा ही) नियमों में परिवर्तन ही नहीं करना चाहते, हम सोचने समझने से ही इंकार कर देते हैं। यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। समय की गति के साथ आवश्यक परिवर्तन उचित ही है किन्तु जब तक हम अपने को बहुत अंशों में अपने आदर्शों पर वापिस नहीं लायेंगे हमारी दयनीय दशा में सुधार असम्भव है।
हमारे अस्वास्थ्य का प्रमुख कारण भोजन है। बिना इस विचार के भोजन करना कि वह हमारे शरीर के उपयुक्त है या नहीं, यही वास्तव में रोग और अस्वास्थ का प्रमुख कारण होता है। हम नित्य भोजन करते हैं। अलग अलग जो चाहते हैं भर लेते हैं। कुछ दिनों तक तो पाचन यंत्र मर खप कर हमारा साथ देते हैं किन्तु अंत में बाध्य होकर अपना काम उचित रीति से करने में असमर्थ हो जाते हैं। फल अस्वास्थ्य तथा रोग होता इस प्रकार से हमने देखा कि रोग बुलाने प्रमुख कारण हमारी जीभ ही है।
बासी, अधिक मसालेदार, बेवक्त, अनियमित रूप से भोजन करना आदि हमें छोड़ना पड़ेगा। यदि हम स्वास्थ्य चाहते हैं। अस्वास्थ्य को दूर रखने के लिए हम किन किन भोजन सम्बन्धी नियमों का पालन करना चाहिए तथा कौन कौन उचित और कौन अनुचित भोजन हैं, यह जाना हमारे लिये परम आवश्यक है।
हमारे शरीर का संगठन प्रकृति ने ऐसा किया है कि अनेक अनिष्टकारी वस्तुयें और स्वतः शरीर अपने अन्दर उत्पन्न होने वाले भाँति भाँति के विष अपने आप निकलते रहते हैं। यह विष आदि पैदा तो होते ही हैं। यह हम जानते हैं कि मनुष्य का शरीर प्रतिक्षण बदला करता है। यहाँ तक कि सात वर्ष में शरीर में प्राचीन वस्तु का नाम भी नहीं रह जाता। हड्डी, माँस, मज्जा, रुधिर सभी नित्य कुछ बिगड़ते तथा कुछ बनते रहते हैं। यह विनाश और निर्माण का कार्य साथ ही साथ चलता है। प्राचीन कोषाणुओं का नाश होते रहता है उनका मृतक भाग शरीर में से निकलता ही रहता है और निकलना चाहिये भी। जब-2 विदेशी पदार्थों के पूर्ण रूप से बाहर निकालने में किसी प्रकार की बाधा आती है तो यह ही हमारे रोग और अस्वास्थ्य का कारण बनती है। अभाग्यवश कुपथ्य तथा अप्राकृतिक रहन-सहन आदि के द्वारा हम इन विषों की संख्या और भी बढ़ा लेते हैं याद रहे कि यदि यह विष तथा अनिष्टकारी वस्तुओं का शरीर से निकलना कुछ देर के लिये भी बन्द हो जाए तो हमारी मृत्यु हो जाये।
अम्ल ही हमारी मृत्यु का कारण बनता है अर्थात् जब उसकी पराकाष्ठा हो जाती है तभी हमारी मृत्यु होती है। शरीर में अम्लता जिस अनुपात से होगी प्रायः उसी अनुपात से हम रोगी तथा अस्वस्थ होंगे। अम्ल ही रोग, बुढ़ापे तथा मृत्यु का कारण है।
अत्याधिक परिश्रम करने, विश्राम न करने, निद्रा सम्बन्धी नियमों को भंग करने, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि बुरे भावों को अपनाने आदि से हमारे शरीर का ह्रास होता है तथा अनेक प्रकार का विष पैदा होकर हमारे रुधिर में मिलकर उसे दूषित करता रहता और इस प्रकार आयु को कम करता है। चिन्ता, शोक, निराशा, आदि भी रोगों का कारण बनते हैं। वैसे ही मान लीजिए आप परिश्रम करते हैं जिससे आपके शरीर का ह्रास होता है। आप रात को गहरी नींद सोते हैं और उस नींद और विश्राम में ही नष्ट कोषाणुओं के स्थान पर नये कोषाणु बन कर कार्य को पूर्ति हो जाती है। मान लीजिये आप ऐसा नहीं करते या नहीं कर पाते तो घाटे में रहेंगे ही रात को बारह बजे सोना, दिन को आठ बजे उठना, रात को थियेटर, सिनेमा, नाच रंग में समय बिताना, दिन को सोना, कचालू मटर, चाट चने उड़ाना, सिगरेट, पान की भरमार, किसी प्रकार का नशा तथा दुर्व्यसन, चाय काफी का अधिक प्रयोग, बाजारू तथा टीन के डिब्बों के स्वाद के लिए भोजन बिस्कुटों मिठाइयों आदि का प्रयोग आदि अनेक कारण हमारे रोग और अस्वास्थ्य के हैं।
अच्छा हो हम इन्हें समझें जितना खो चुके खो चुके, अब भी सँभल जाएं और भविष्य के लिये समझदारी, संयम और उचित आदर्शों को अपनावें तो हमारी दीर्घायु तथा स्वास्थ्य निश्चित है।
हम सहायक बनें -
मल, मूत्र, थूक, खकार, पसीना, साँस, छींक आदि के द्वारा शरीर के विभिन्न भागों से सदा अनेक प्रकार के विकार निकलते रहते हैं। हमें चाहिए कि किसी प्रकार से प्रकृति के इस निकालने के काम में बाधा या प्रतिबन्ध न करें। अन्यथा हमारी शरीर जवाब दे जाएगा।
जब हमारा शरीर ठीक होगा तो मन ठीक होगा, और जब मन ठीक रहेगा तो आत्मा ठीक रहेगी। अतः आध्यात्मिक उन्नति के लिए मानसिक, और मानसिक उन्नति के लिये शारीरिक उन्नति की आवश्यकता है। शरीर आत्मा का मन्दिर है। अतः शरीर को स्वस्थ और ठीक रखना इस लोक के सुख और परमात्मा की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
फोड़े-फुन्सी से लेकर प्रत्येक प्रकार के रोग प्रकृति द्वारा हमारे शरीर से विकारों को हटाने का प्रयत्न हैं। हमें तो रोगों का स्वागत करना चाहिये। क्योंकि पहले जो खान पान आदि सम्बन्धी गलतियाँ की हैं, उससे प्रकृति हमें मुक्त करना चाहती है। साधारण जुकाम, प्रारंभिक कब्ज आदि खतरे की घंटी हैं। हमें इन्हें सुनकर अवहेलना न करनी चाहिए, वरन् तुरन्त सोचना चाहियें कि हमने खान-पान, रहन-सहन आदि में क्या गलती की है, और तब तदनुसार हमें इनमें आवश्यक परिवर्तन करना चाहिये। इस प्रकार से हमें प्रकृति के इस सफाई के काम में सहायता देनी चाहिये। प्रकृति के ऊपर ही हम सफाई का काम छोड़ दें और खान-पान तथा अन्य स्वाभाविक नियमों में प्रकृति के ही आदेशों के अनुसार चलें तो हमें दवा खाने की आवश्यकता ही न रहेगी। भोजन सम्बन्धी सुधार तथा उपवास से हम अनेक रोगों को मार भगा सकते हैं।
गायत्री की महिमा अपार है। सभी धर्म शास्त्रों ने उसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है, सभी ऋषि उसके अनन्य उपासक रहे हैं। मंत्रों की यह मुकुट-मणि है, जो कार्य संसार के किसी भी मंत्र से हो सकता है वह गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। गायत्री भूलोक की कामधेनु है। इसे कल्पलता भी कहा गया है। यह अदृश्य पारस मणि तथा जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाली दिव्य सुधा धारा है। यह सब प्रकार के पाप तापों, शोक सन्तापों से मुक्त करने वाली, परम शान्ति दायिनी महा महिमामयी आध्यात्मिक ज्ञान गंगा है।
वेद पुराणों में वर्णन किया हुआ समस्त ज्ञान विज्ञान इसके चौबीस अक्षरों में सूत्र रूप से विद्यमान है, अगणित साधकों का अनुभव है कि परम कल्याण को इससे सरल, सीधा, स्वल्प श्रमसाध्य एवं शीघ्र फलदायी मार्ग दूसरा कोई नहीं है।
प्रमाण के आधार पर एवं आप्त-पुरुषों की साक्षी के अनुसार जीव को दुःख शोकों के भव- सागर में से पार करने वाली यह सुरक्षित नौका है। हमें अनेक गायत्री साधकों को प्राप्त हुए सत्परिमाणों का पता है। अनेक घटनाएं तो ऐसी घटित हुई हैं कि माता की कृपा से पर्वत के समान कठिनाई, राई बन कर समाप्त हुई और अनेक बार रत्ती भर प्रयत्न का परिणाम असंख्य गुने सुख-सौभाग्य में प्रकट हुआ, कई बार अटल प्रारब्धवश कोई अभीष्ट पूरा नहीं हुआ तो उसके अन्य प्रकार से अनेक आशाजनक परिणाम प्राप्त हुए। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। हमें व्यक्तिगत रूप से अपनी निष्ठामयी दीर्घकालीन गायत्री तपश्चर्या में जिन जिन दिव्य चमत्कारों का दिग्दर्शन हुआ है उन्हें गोपनीय रखना ही उचित समझ कर प्रकट नहीं किया जा रहा है। अपने निजी अनुभव के आधार पर हमारी सुनिश्चित धारणा एवं अटूट श्रद्धा है कि मानव प्राणी का परमहित गायत्री का आश्रय लेने में सुरक्षित है।
जो वस्तु हमें लाभदायक प्रतीत होती है उससे अपने स्वजनों को भी लाभान्वित करने की हमारी आन्तरिक इच्छा रहती है। इसलिए हम सदा यह प्रयत्न करते रहते हैं कि गायत्री महाविद्या का जितना अधिक विस्तार हो उतना अच्छा है। इस महाशक्ति से जितने अधिक व्यक्ति लाभान्वित हों उतना ही उत्तम है। हमारी अपने प्रत्येक पाठक को यह सलाह है कि वे किसी न किसी रूप में अपने को गायत्री शक्ति से संबद्ध करने का प्रयत्न करें। जिन्हें इस सम्बन्ध में अरुचि, उपेक्षा, अविश्वास या विरोध हो वे केवल परीक्षा एवं प्रयोग के रूप में कुछ समय वेद-माता की उपासना करें और देखें कि साधना में उनका जितना समय खर्च हुआ, उतने मूल्य का प्रतिफल आत्मिक एवं साँसारिक शक्ति के रूप में उन्हें मिला या नहीं ? हमारा विश्वास है कि यह बेजोखिम का परीक्षण हर किसी को संतोष एवं उत्साह प्रदान करने वाला ही सिद्ध होगा।
जैसे खेत बोने के लिए एक विशेष अवधि ऐसी आती है कि उस समय को बुद्धिमान किसान चूकता नहीं है। क्योंकि उन दिनों बोया हुआ बीज अच्छा उगता है। वैसे ही शरीर विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि स्त्री के ऋतु स्नान के तुरन्त बाद के समागम में गर्भस्थापना की संभावना अधिक रहती है। यों तो कभी भी बीज बोया जा सकता है और कभी भी गर्भ स्थापित हो सकता है पर विशेष अवसरों पर किये गये प्रयत्नों से सत्परिणाम की संभावना अधिक रहती है। इसी प्रकार गायत्री साधना के लिए भी कुछ विशेष अवसर बड़े महत्वपूर्ण होते हैं, यह अवधि नवदुर्गाओं की है।
वर्ष में तीन ऋतु संध्याएं होती हैं। वर्षा के अन्त और शीत के आरम्भ में आश्विन सुदी 1 से 9 तक, शीत के अन्त और ग्रीष्म के आरम्भ में चैत्र सुदी 1 से 9 तक, ग्रीष्म के अन्त और वर्षा के आरम्भ में जेष्ठ सुदी 1 से 9 तक, ये तीन नवदुर्गाएं होती है। इनमें से आजकल दो ही का विशेष प्रचलन है। जेष्ठ की संध्या को तो लोग भूलते ही जा रहे हैं। इन नवदुर्गाओं में न्यूनाधिक मात्रा में गायत्री उपासना करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।
चौबीस हजार का छोटा अनुष्ठान इन 9 दिनों में बड़ी आसानी से हो सकता है। प्रतिदिन 25 मालाएं जपने से 9 दिन में 24 हजार जप हो जाते हैं। यह जप ढाई घंटे में बड़ी आसानी से हो जाता है। जिन्हें प्रातः काल ढाई घंटे न मिल सके वे डेढ़ घंटा प्रातः एक घंटा सायं काल जप करके इस साधना को बिना किसी कठिनाई के पूरा कर सकते हैं।
प्रातः काल स्नान करके कुश के आसन या लकड़ी की चौकी पर पूर्व को मुँह करके साधना के लिए बैठे। गायत्री के चित्र को शीशे में मढ़वा कर उसका धूप, दीप, चंदन, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प आदि माँगलिक द्रव्यों से पूजन करके जप आरंभ कर देना चाहिए। जिनके पास चित्र न हो या पूजन सामग्री उपलब्ध न हो सके, वे नेत्र बन्द करके ध्यान द्वारा मानसिक पूजा कर सकते हैं। जल से भरा पात्र पास में रखा रहे। आचमन करके तब जप किया जाए। माला तुलसी या चंदन की लेनी चाहिए। जप के अन्त में जल को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य के रूप में देना चाहिए। संध्या को पश्चिम में मुँह करके जप करना चाहिए। प्रातः काल 4 बजे से पूर्व और शाम को आठ बजे पीछे जप न करना चाहिए। जप के समय शून्य आकाश में या मस्तिष्क के मध्य भाग में गायत्री तेज पुँज का ध्यान करते रहना चाहिए।
नवदुर्गाओं में दुग्धाहार, फलाहार, एक आहार, अस्वाद आहार का जो भी नियम अपने से बन पड़े, उस आधार पर उपवास कर लेने चाहियें। इन दिनों दूसरे के हाथ से बाल बनवाना, चमड़े के जूते पहनना, तेल मालिश, चारपाई पर सोना, काम सेवन एवं मद्य-माँस आदि तामसिक आहार वर्जित है। समय का अधिकाँश उपयोग स्वाध्याय, सद्विचार एवं सत्कार्यों में ही करना चाहिए। दसवें दिन हवन तथा पूर्णाहुति के उपलक्ष में यथाशक्ति दान करना चाहिये। शास्त्र में कहा गया है कि बिना दक्षिणा का यज्ञ निष्फल होता है। केवल जप मात्र का अनुष्ठान, जिसमें दान का कोई प्रयोग न हो एक प्रकार से लंगड़ी, लूली, कानी, एकाँगी साधना है।
अस्त्र, शस्त्र, पात्र आदि के दान की अपेक्षा ब्रह्म-दान अधिक श्रेष्ठ है। गायत्री ज्ञान का आध्यात्मिक साहित्य सत्पात्रों को दान करना किसी भी ब्रह्म-भोज, अन्न-दान, गौदान से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस प्रयोजन के लिये एक अत्यन्त सस्ती लागत मूल्य की ‘सर्वशक्तिमान गायत्री’ नामक दो आना मूल्य की पुस्तिका छापी गई है। 24 हजार अनुष्ठान के उपलक्ष में कम से कम 24 प्रतियाँ वितरण करने में तीन रुपया मात्र खर्च होते हैं। सामर्थ्य और श्रद्धानुसार इस संबंध में अधिक खर्च भी किया जाना चाहिए।
नवदुर्गाओं की साधना के उपरान्त भी अपनी उपासना जारी रखी जा सके तो बड़ा ही उत्तम है। वर्ष में 3 नवदुर्गाओं के छोटे अनुष्ठान तथा प्रतिदिन 11 मालाएं जपते रहने से एक वर्ष में पाँच लाख का ‘अभियान’ नामक जप-यज्ञ पूरा हो जाता है। प्रतिदिन दो मालाएं नियम पूर्वक जपते रहने से वर्ष में सवालक्ष का एक पूर्ण अनुष्ठान हो जाता है। इतना भी न बन पड़े तो प्रातः सोकर उठते समय रात को सोते समय गायत्री का मानसिक जप और ध्यान करके नियमित साधना को चालू रखा जा सकता है। एक वर्ष तक नियमित रूप से माता से संबंध बनाये रखा जाय तो साधक की मनोभूमि इतनी परिमार्जित हो जाती है कि उसमें दैवी तत्वों की स्थापना समुचित रूप से हो सकती है।
आश्विन की नवदुर्गाएं समीप हैं। इस सुअवसर पर एक छोटा अनुष्ठान कर लेना और आगे के लिये किसी न किसी यानि रूप में नियमित साधना जारी रखना एक उत्तम शुभारंभ होगा। इसे करने का साहस एवं उत्साह अपने में उत्पन्न करना हमारे लिये एक परम कल्याणकारी दिव्य आयोजन सिद्ध हो सकता है। अखण्ड ज्योति अपने पाठकों को इस आयोजन के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहती है।
गायत्री महाशक्ति की साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। अन्य विज्ञानों के भाँति इसके भी दो भाग हैं (1) सिद्धान्त (2) क्रिया। इनमें से केवल एक भाग को ही अपनाने से कोई व्यक्ति पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। गायत्री की उपासना करने का जितना महत्व है, उतना ही उसकी समस्त जानकारी को प्राप्त करना भी आवश्यक है। अधूरी शिक्षा के आधार पर की हुई क्रिया में अनेकों शंकाएं, भ्रान्तियाँ , त्रुटियाँ, भूलें रह जाती हैं जो कई बार बड़ी अनिष्टकर साबित होती हैं। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हमने बीस वर्ष तक लगातार परिश्रम करके दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप गायत्री महाविद्या का ज्ञान भली प्रकार करा देने वाली 9 पुस्तकें प्रकाशित कर दी है। अनुभवी गुरु की भाँति सच्चा पथ-प्रदर्शन करने वाली इन पुस्तकों को पढ़ना हर गायत्री-प्रेमी के लिए आवश्यक है।
(श्री मालचन्द्र जी शर्मा)
आर्य धर्म के प्राचीन इतिहास को गवेषणा पूर्वक देखा जाय तो आधुनिक परदे के आकार-प्रकार का विवेचन कहीं नहीं मिलता। परदे का समर्थन या विरोध किसी भी शास्त्रीय ग्रन्थ में दिखाई नहीं पड़ता। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि पुरातन काल में परदे का अस्तित्व था ही नहीं जिसका विरोध या समर्थन करने की आवश्यकता पड़ती। रामायण तथा महाभारत काल में तो स्त्रियों ने पुरुषों की तरह युद्ध क्षेत्र में जाकर शत्रुओं से युद्ध किया था, उच्च शिक्षा में महिलाएं पुरुषों से भी बाजी मार ले गयी हैं। पुरुषों की अनुपस्थिति में राजकीय कार्यों का संचालन भी वे किया करतीं थीं। अगर उस समय वर्तमान काल की तरह परदा-प्रथा का भी प्रचार होता तो, महारानी कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध क्षेत्र में जाकर अपना कौशल न दिखला सकतीं, सावित्री जैसी पतिव्रता अपने मृत पति की आत्मा को यमराज से वापिस नहीं ला सकतीं, सीता, अनुसूया, दुर्गा, गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी आदि के एक से एक बढ़ कर कार्यों से लिखित इतिहास के सुनहले पृष्ठ आज भी अन्य देशों के इतिहास को नतमस्तक करते दिखलाई नहीं पड़ते। उस समय भी दुर्भाग्यवश यदि परदे की बीमारी होती तो भारताकाश में स्त्री रत्न-रूपी अनेक नक्षत्र चमकते हुए नहीं दिखाई पड़ते, वरन् उनके स्थान पर होते काले रक्त बिन्दु, जिनकी दूसरे देशों के इतिहासाकाश में कमी नहीं हैं। विदेशी लोग भी पुरातन भारतीय स्त्रियों की शक्ति, साहस, बुद्धिमत्ता, विलक्षणता की प्रशंसा मुक्त कंठ से करते हैं। इसका कारण यही है कि उस समय के पुरुष वर्तमान की तरह स्त्रियों को परदे में आच्छादित कर घर की चहारदीवारी में अपने पशु बल से बन्द नहीं कर देते थे, वरन् उनको विद्या-बुद्धि प्राप्त करने की पूर्ण सुविधा दे रखी थी। अस्त्र शस्त्र चलाने, कला कौशल के सीखने के लिये पूरा प्रबन्ध था। यही कारण था कि उनका विकास हुआ, और इतना हुआ कि आज भी उनकी चरितावली घर घर में गायी जा रही है।
हिन्दू जाति ने अपने देश में बड़े-बड़े साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा है। जिस समय आचार-विचार, रहन-सहन में जैसे परिवर्तन की आवश्यकता हुई, उसे अंगीकार करने में हिन्दू जाति जरा भी पश्चात्पद नहीं हुई। पंजाब के हिन्दुओं का आचार-विचार, रहन-सहन मद्रास के हिन्दुओं से आपको भिन्न मिलेगा, इसका कारण यही है कि पश्चिमी जाति के आक्रमणों में पंजाब ही सर्व-प्रथम मोरचे का स्थान रहा है, अतः पंजाब को अपनी सामाजिक परिस्थिति, वेशभूषा, रहन-सहन, उस ढाँचे में परिवर्तित करते जरा भी हिचकिचाहट न हुई, जिसकी वास्तविक आवश्यकता था। आपको धर्म के विषय में पंजाब के हिन्दुओं के विचार उतने ही उदार तथा सुसंस्कृत मिलेंगे, जितने मद्रासी, और उड़िया ब्राह्मणों के संकीर्ण कट्टरपन्थी। परदा-प्रथा यवन साम्राज्य का एक तोहफा है, जो उनके अतीत साम्राज्य की स्मृति इस प्रथा द्वारा हिन्दुओं को दिलाता है। मुसलमानी सल्तनत में हिन्दू स्त्रियों की धर्मरक्षा के लिये यह आवश्यक था कि वे नख-शिख तक पर्दे में रह कर घर में बन्द रहें ताकि उनके सौंदर्य की चर्चा तत्कालीन शासक सैनिकों के कान में न पड़ जाए और हाथ में कानून रखने वाली शासक जाति हिन्दू स्त्रियों के पवित्र धर्म को भ्रष्ट न कर सके। और तो क्या उस समय भगवान के मन्दिर भी पर्दे में रखे जाते थे। अर्थात् मकान के भीतरी हिस्से में या सुरंग में जिससे धर्म प्राण हिन्दू स्त्रियों को देव-दर्शन करने के लिए भी बाहर न जाना पड़े और परदे करने के लिये भी बाहर न जाना पड़े और पर्दे में भगवान के दर्शन कर सके। कुछ जातियों में पर्दे का इतना भयंकर साम्राज्य था कि आठ वर्ष का लड़का भी गृहस्थियों के अन्तःपुर में प्रवेश नहीं कर सकता था। लड़कियाँ भीतर ही भीतर बड़ी होती रहती थीं किन्तु बाहरी आदमियों को इतना भी पता नहीं लग सकता था कि अमुक व्यक्ति के घर में इतनी स्त्रियाँ हैं। तत्कालीन समाज में आत्म रक्षा के लिये परदे को करना भी कुलीनता का चिन्ह तथा प्रतिष्ठा का स्तम्भ समझा जाने लगा। लोगों के मस्तिष्क तथा भोली स्त्रियों के हृदय में इस बात को भली प्रकार पैठा दिया गया कि “परदा कुल की शान है, परम्परा की रीति है।” मुसलमानी सल्तनत आयी और अपने करिश्मे दिखाकर रसातल को बिदा हो गयी, किन्तु अपनी विदाई में शासित हिन्दुओं को परदा की प्रथा उपहार में दे गयी, जिसे लेकर आज के हिन्दु भी गर्वित हैं। अंग्रेजी सल्तनत कायम हो जाने पर हिन्दुओं ने अपनी वेश भूषा, रहन-सहन में परिवर्तन कर लिया, कई कुप्रथाओं को तिलाँजलि दे दी, शिक्षा को अपनाया, किन्तु परदे के पाप को हिन्दुओं ने अपने प्राणों से चिपटा कर रख लिया। बड़े-बड़े वकील बैरिस्टर, पंडित, डॉक्टर, जज, मजिस्ट्रेटों के घर में से पुरानी सभ्यता की सब निशानी एक-एक कर विदा हो गई किन्तु यह प्रथा अभी भी उनकी सहेली बन कर उनके घरों में खेल कूद रही है।
क्या ही अच्छा हो कि भारत का वर्तमान समाज भी अपने घरों के अन्दर से इस बनावटी पर्दे को हटा कर उस भीषण भूल का प्रतिशोध करे जिसके कारण हमारे घर की देवियाँ एक न एक रोग से पीड़ित रहती हैं। घर के बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ रह कर आत्म-भीरु बनी हुई हैं। परमात्मा के नाम पर उनको भी प्रातः काल की उस स्वच्छ वायु का सेवन करने दो, जो संसार के समस्त प्राणियों के लिये प्रकृति ने समान रूप से उपयोग के लिये दे रखी है। उनको भी देश और समाज में होने वाले परिवर्तनों से अवश्य परिचित कराओ जिसके बिना उनमें तथा पशु में कोई भेद नहीं रह जाता। समय पर बल और साहस का उनमें संचार करो जो उनकी आकस्मिक आत्मरक्षा का कवच बन सकें। कितने ही लोगों का भ्रम अब भी नहीं मिटा कि “परदा छोड़ देने से स्त्रियाँ स्वतन्त्र हो जाती हैं।” किन्तु यह उनका भ्रम ही नहीं, अन्धा विश्वास है। गुजरात महाराष्ट्र, मद्रास की स्त्रियों ने परदा हटा कर कौन से शील धर्म को नष्ट किया है ? वरन् यों कहिये कि भारत के नारी धर्म का वास्तविक मान इन्हीं प्रान्तों ने रख लिया। आज स्त्री अपहरण, बलात्कार की जितनी घटनाएं बंगाल, मालवा, राजपूताना में होती हैं, क्या उनसे शताँश घटनाएं परदा हटाने वाले प्रदेशों में घटित हुई हैं? यह तो माना हुआ सिद्धान्त है कि जो वस्तु जितनी छिपा कर रखी जायेगी, बाहरी परिस्थिति उसे प्रकाश में लाने के लिए उतनी ही विशेष उत्कण्ठा दिखाएगी और भीतरी परिस्थिति उसे छिपाने के लिये उतनी ही संकीर्ण और निर्बल होती रहेगी। रेलवे के प्लेटफार्म या सार्वजनिक स्थानों में परदे वाली कुरूप स्त्री को देखने तथा आवाजकशी करने के लिये उतनी भीड़ सहज ही में एकत्र हो जाती है जितने कि मदारी द्वारा किये जानेवाले बन्दर-बन्दरी के नाच में। इसके प्रतिकूल परदा-रहित सुन्दर स्त्री के सम्मुख आँख उठाकर देख लेने का साहस भी कोई व्यक्ति सहसा नहीं कर सकेगा।
मर जाऊँ माँगू नहीं, अपने तन के काज।
परमारथ के कारणे, मोहि न आवे लाज॥
कबीर यह मन मसखरा, कहूँ तो माने रोस।
जा मारग साहिब मिले, ताहि न चाले कोस॥
कबीर सो मुख धन्य है, जेहि मुख निकसे राम।
देही किसकी बापुरी, पवित्र होय सब ग्राम॥
बात बनाई जग ठग्यो, मन परबोध्यों नाँहि।
कबीर यह मन रे गया, लख चौरासी माहि॥
कबीर मन मैला भया मन में बहुत विकार।
यह मन कैसे धोइयो, साधो करो विचार॥
गुरु धोबी शिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार।
सुरत सिला पर धोइये, निकसे रंग अपार॥
यह तो गति है अटपटी, झटपट लखे न कोय।
जो मन की खटपट मिटै, चटपट दशन होय॥
साधू भया तो क्या हुआ, माला पहरी चार।
बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भँगार॥
दाड़ी मूछ मूडाय कर, हो गया घोटम घोट।
मन को क्यों नहि मूडिये, जो में भरी है खोट॥
रात गँवाई सोय कर, दिवस गँवायो खाय।
हीरा जन्म अमल था, कौडी बदले जाय॥
इस दुनिया में आय कर, छोड़ देय तू एंठ।
लेना होय सो जल्द ले उठी जात है पैंठ॥
अजगर करै न चाकरी पक्षी करै न काम।
दास मलूका यो कहै सबके दाता राम॥
कबीर सब जग निरधना, धनवंता नहिं कोय।
धनवन्ता सोई जानिये, जाके राम नाम धन होय॥ कबीर ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रुठे गुरु मेलसी, गुरु रुठे नहिं ठौर॥
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागत है मोर॥
हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।
हारा तो हरि से मिले, जीता यम के द्वार॥
गोधन, गजधन, बाजिधन और रत्न धन खान।
जब आवै संतोष धन, सब धन धूल समान॥
एक घड़ी आधा घड़ी, आधी में पुनि आध।
भोखा संगति साधु का, कटें कोटि अपराध॥
करत करत अभ्यास के, दुर्मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ही शिल पर करत निशान॥
भोजन छादन का नहीं सोच करें हरिदास।
विश्व भ्रमण प्रभु करते है ऐसा क्या रहें निरास॥
जननी जन तो भक्त जने, के दाता के शूर।
नाही तो तू बोझ रह, काहि गँवावैं नूर॥
गिरह गाठ नहि बाधते, जब दवे तब खाहि।
गोबिन्द तिन पाछे फिरें, मत भूख रह जाहि॥
गायत्री महाशक्ति की साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। जैसे बिजली का विज्ञान जाने बिना कोई आदमी बिजली उत्पन्न करने की मशीन चलाने लग जाय तो यह एक खतरनाक बात होगी। डाक्टरी पढ़े बिना जो आदमी आपरेशन करने लग जाय वह कोई अच्छा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता। इसी प्रकार गायत्रीमहाविद्या को भली प्रकार जानने के बाद ही साधना करनी चाहिए।
गायत्री महाशक्ति की अत्यन्त आवश्यक जानकारियाँ और साधना विधियाँ इतनी विस्तृत एवं विशद हैं कि उन्हें चिट्ठी-पत्री की दस-बीस लाइनों में किसी को समझना या समझाना असंभव है। इसलिए गायत्री विद्या का अत्यन्त आवश्यक विज्ञान, विधान, साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई सुन्दर, सस्ती, अनुभव पूर्ण एवं सच्चा पथ प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।
गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)- गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, गायत्री और बातचीत का संबंध, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामंत्र की सिद्धि, गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शापमोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋषि सिद्धियों का योग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएं, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुंडलिनी जागरण, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू. 3॥)
गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)- गायत्री माहात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री तंत्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी, गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्र नाम आदि का भाषा टीका समेत संकलन है। मू. 3॥)
3 गायत्री ही कामधेनु है - ऋषियों, शास्त्रकारों, महापुरुषों तथा अनेक स्त्री-पुरुषों के गायत्री संबंधी अनुभव। मू.1॥)
4 गायत्री का वैज्ञानिक आधार - अनेक तर्क प्रमाण उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत आधार उपस्थित करके गायत्री का गुप्त विज्ञान तथा मर्म समझाया गया है।
मू. 1॥)
5 गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं - सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।
मू. 1॥)
6 वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री - नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक एवं गायत्री चालीसा का संग्रह। मू.1॥)
7 गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग) - गायत्री के ॐ, भूर्भुवः, स्वः, तत्, सवितु, वरेण्यं शब्दों की जीवन को सुविकसित, सात्विक, आदर्श महान एवं सुख शान्तिमय बनाने वाली शिक्षात्मक व्याख्या। मू. 1॥)
8 गायत्री के चौदह रत्न (द्वितीया भाग)- गायत्री के भर्गो, देवस्य, धीमहि धियो, यो, नः प्रचोदयात् शब्दों की व्याख्या द्वारा आत्म-कल्याण का महत्वपूर्ण पथ-प्रदर्शन। मू.1॥)
9 सर्व शक्तिमान गायत्री - गायत्री विद्या के महत्व को प्रतिपादित करने वाली यह अत्यन्त सस्ती पुस्तक ब्रह्मदान के रूप में अधिकाधिक संख्या में वितरण करने योग्य है। मू.1॥)
मूल्य में कमी के लिए लिखा−पढ़ी करना बिलकुल व्यर्थ है। छः रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ ।
गया एक दिन मैं जो गंगा के पार,
किनारे पर देखा भयानक अपार
किसी का कपाल,
पड़ा था बेहाल।
न मस्तिष्क था, अरु न थे उसके बाल,
रुधिर था, न मज्जा, न थी उस पर खाल
फ़ कत खोपड़ी
वहाँ थी पड़ी।
गढ़े आँख के, आँख जिससे लड़ी,
खुला मुँह, दंतन की भयानक लड़ी,
न थी जीभ पर,
जो देती खबर।
उसे इस तरह से पड़ा देख कर,
मैं भयभीत हो के गया जी में डर,
यह सोच कर,
यही क्या है नर!
लगा सोचने पास फिर बैठ कर,
कभी होगा मुझ सा ही यह कोई नर,
यह अंजाम है!
न कुछ नाम है!
कोई मर्द रावण है या राम है?
कोई नेक है या कि बदनाम है?
नहीं भेद अब,
मिटा फर्क सब।
हमेशा दिखाते हो गैजों गज़ब,
न भूले से भी याद आता हो रब,
कि फानी है यह,
निशानी है यह।
कदाचित् कि राजा कि रानी है यह?
है कंजूस यह, या कि दानी है यह?
निर्धन या निबल,
धनी या सबल?
हुई देह रोमाँच सहसा सकल,
नज़र में थी बस खोपड़ी, या अजल,
इक आवाज़ है,
यह क्या राज़ है?
इसी जिन्दगानी पर यह नाज है,
यही खोपड़ी जीस्त का साज है,
खुदा की बनाई।
अजब ये है राज।
यही ‘राम’ क्या जिन्दगानी है? आह!
इस अंजाम पर जिन्दगानी की चाह!
यह करता विचार
चला घर को हार।
*समाप्त*
(डॉ. रामबिहारी लाल, कलकत्ता)