मूरख का मुख बाँबिया, निकसत बचन भुजंग।
बाकी औषधि मौन है, जहर न व्यापै अड़ग्॥
कहा करै बैरी प्रबल, जो सहाय बलवीर।
दशहजार गज बल घटयो, घटयो न दशगज वीर॥
लौर लागी तब जानिये, जग सों रहे उदास।
नाम रटे निर्भय कला हरदम हीरा पास,॥
लौ लागी तब जानिये जगसों रहे उदास।
नाम रटे निरद्वन्द्व हो, अनहदपुर में बास॥
श्वास-श्वास पै नाम भज, श्वास न बिरया खोय।
ना जाने इस श्वास का, आवन होय न होय॥
गोविन्द गुण गायो नहीं, जन्म अकारथ कीन।
कह नानक हरिभज मना, जेहि विधि जल की मीन
वृद्ध भयो सूक्ते नहीं, काल जो पहुँचो आन।
कह नानक नर वाचरे, क्यों न भजे भगवान॥
घट घट में हरि जू बसै, संतन कह्यो पुकार।
कह नानक तेहि भज मना, भवनिधि उतरहि पार।
साथ न चाले बिन भजन, विषया सकली छार॥
हरि हर नाम कहो मना, नानक यह धन सार।
सुख में बहु संगी भये दुख में संग न कोय॥
कह नानक हरि भज मना, अन्त सहाई होय।
जन्म-जन्म भरमत फिरयो, मिटी न यम की त्रास
कह नानक हरि भज मना, निर्भय पावहि वास॥
कबीर मन तो एक है, चाहे जहाँ लगाय।
चाहे हरि की भक्ति कर, चाहे विष कमाये॥
दुख में सुमरन सब करै, सुख में करें न कोय।
सुख में सुमिरन करै,तो दुख काहे होय॥
सभी रसायन हम करी, नहीं नाम सम कोय।
रंचक घट में संचरे, सब तन कंचन होय॥
हरि का सुमिरन छोड़ के, पाल्यो बहुत कुटम्ब।
धन्धा करते मर गया, भाई रहा न बन्ध॥
जगन से सोवन भलो, जो को जाने सोय।
अन्तर लव लागी रहै, सहजहि सुमिरन होय॥
पढ़ना गुनना चातुरी, यह तो बात सहल्ल।
कामदहन,मन बस करन, गगन चढ़न मुशकल॥
कबीर यह मन लालची, समझे नाहिं गवार।
भजन करने को आलसी, खाने को हुशियार॥
सुख के माथे सिल, पड़े, जो नाम हृदय से जाय।
बलिहारी वा दुःख की जो पल पल नाम जपाय।
नाम जपत कन्या भली, साकित भला न पूत।
छेरी के गल गलथना, जामें दूध न मूत।
नाम जपत कुष्टी भली, चुइ चुइ पड़े जो चाम।
कंचन देही काम किस, जो मुख नाहीं नाम॥
मारग चलते जो गिरै, ताको नाहीं दोस।
कह कबीर बैठा रहै, ता सिर करडे कोस ॥
कहता हूँ कह जाता हूँ, कहाँ बजाऊ ढोल।
श्वास खाली जात है, तीन लोक का मोल॥
ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय।
ओरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय॥
हाड़ जलै ज्यो लाकड़ी, कैश जलै ज्यों घास।
सब जग जलता देखकर, भये कबीर उदास॥
तू’-तू करता तू भया, मुक्त में रहा न हूँ।
वारी तेरे नाम पर , जित देखूँ तित तूँ॥
तीरथ नहाए एक फल, सन्त मिले फल चार।
सदगुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार॥
जाको राखे साँइया, मार सके नहि कोय।
बाल न बाँका कर सके, जो जग बैरी होय॥
सुवर्ण की चोरी करे, करे सुई को दान।
ऊँचे चढ़ चढ़ देखहीं, आवत कहाँ विमान॥
कबिरा सोई पीर है, जो जाने पर-पीर।
जे पर-पीर न जानहीं, सो काफिर बेपिर॥
तरुवर सरवर संतजन, चौथे बरसे मेह।
परमारथ के कारणे, चारों धरे देह॥
कबिरा कलियुग कठिन है, साध न मानै कोय।
कामी क्रोध मचखरा, तिनका आदर होय॥
प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।
उत्तम प्रीति सो जानिये, जो सतगुरु सो होय॥
हीरा परखे जौहरी, शब्द को परखै साध।
जो कोई परखे साध को, ताकी मती अगाध॥
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
(श्री मनोहर लाल जी श्रीमान)
मैं गरीब हूँ बेशक, माना पैसे का अभिमान नहीं है।
तो क्या मानव होने का भी मुझको थोड़ा ज्ञान नहीं है॥
मिट्टी की काया पर मेरी चढ़ा नहीं सोने का पानी,
तो क्या मिट्टी और कनक की मुझको कुछ पहचान नहीं है॥
दौलत की आंखों में हँसती है यदि उन्मादों की दुनिया,
निर्धनता के प्राणों में क्या मुस्काता भगवान नहीं है।
धनिकों की महफिल में जुटते गायन वादन के सब साधन,
सड़कों पर गाने को मेरी साँसों में क्या गान नहीं है?
बंगलों की आंखों के आगे हँसती है सतरंगी कलियाँ,
आँगन में मेरे सरसों की क्या फली मुस्कान नहीं है॥
यह माना विद्युत ने जग को अनहोना आलोक दिया है।
तो क्या दीपशिखा में बाकी जलने का अरमान नहीं है।
अमीरों ने पीयूष पिया पर अमर कहाँ वे हो पाये हैं,
विषपायी के यश का कारण क्या उसका विषपान नहीं है॥
-हिन्दुस्तान
धीमहि सर्वविधं हृदये शुचि
शक्तिचयं वयमित्युपदिष्ट्वा
जो मनुजोलभते सुख शान्ति
मनेन विनेति वदन्ति हि वेदोः॥
अर्थ -हम सब लोग हृदय में सब प्रकार की पवित्र शक्तियों को धारण करें। वेद कहते है कि इसके बिना मनुष्य सुख शान्ति को प्राप्त नहीं होता।
यह सुनिश्चित तथ्य है कि शक्ति के बदले में सुख मिलता है। जिस प्रकार पैसे के बदले में खरीदे जाने वाले सभी पदार्थ प्राप्त हो जाते है। उसी प्रकार शक्ति के बदले में विविध प्रकार के आनन्द प्राप्त किये जा सकते है। जिसका शरीर शक्तिशाली है, इन्द्रियाँ सक्षम है वह ही विविध प्रकार के इन्द्रिय भोगों को भोग सकता है उसको जिसका शरीर रोगी निर्बल एवं अशक्तिशाली है उसको उत्तम से उत्तम इन्द्रियभोग भी बुरे लगते हैं। रूपवती नवयौवना तरुणी का उद्दीप्त प्रेम कोई उसी प्रकार की शक्तियों वाला नवयुवक ही प्राप्त कर सकता है। गत यौवन वृद्धों के लिए उसे आकर्षित कर सकना कठिन है। शिक्षा, स्वास्थ्य, धन संगठन, शिल्प, अनुभव, चतुरता, पुरुषार्थ, आदि शक्तियों का भंडार जिसके पास जितनी अधिक मात्रा में है वह उतना ही अधिक सम्पत्ति, वैभव, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की सुख-सामग्री प्राप्त कर सकता है। जिसके पास इन शक्तियों की जितनी कमी है वह उतनी ही मात्रा में अभाव ग्रस्त एवं कठिनाइयों का जीवन व्यतीत करेगा।
शरीर के सुख देने वाले ऐश्वर्य शरीर से संबन्ध रखने वाली शक्तियों से संबंध रखते हैं। जिसने अपने में जितनी अधिक भौतिक योग्यताएं एकत्रित कर ली हैं। वह उतना ही अधिक सांसारिक सुख भोग सकेगा। इतना होने पर भी उनसे आत्मिक सुख उपलब्ध नहीं किया जा सकता। आत्मिक सुख के लिए आत्मिक शक्तियों की आवश्यकता है। सद्गुण, सात्विक दृष्टिकोण, सत्स्वभाव, संयम, उदार एवं नम्र व्यवहार की दैवी सम्पत्तियाँ जिनके पास हैं, उनके मानसिक क्षेत्र में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य रहेगा। यह सुख शान्ति ऐसी उत्कृष्ट होगी कि साँसारिक कठिनाइयाँ भी उसे विचलित न कर सकेंगी।
गीता के सोलहवें अध्याय में 26 दैवी सम्पदाएं बताई गई हैं। वे ये हैं (1)निर्भयता (2)अन्तःकरण की स्वच्छता (3) ज्ञान में निष्ठा (4)उदारता (5)इन्द्रिय निग्रह (6)परमार्थ कर्म (7)स्वाध्याय-आत्म चिंतन (8) सत्प्रयोजन के लिए कष्ट सहना (9) सादगी (10) अहिंसा (11) सत्य (12) अक्रोध (13) अभिमान का त्याग (14) अनुद्वेग (15) निन्दा चुगली आदि से दूर रहना (16)दयालु (17)निर्लोभता (18) सहृदयता (19)दुष्कर्मों के करने में लज्जा (20) छिछोरपन से बचना (21)तेजस्विता (22) क्षमा (23) धैर्य (24) सफाई (25) शत्रुता का भाव न रखना (26) अपने को दूसरे से श्रेष्ठ न समझना, यह आत्मिक गुण है। जिनकी आत्म बलवान है, उनमें इन गुणों का अधिकाधिक विकास देखा जायेगा। यह विकास जितना ही अधिक होगा उतनी ही आत्म संतोष की मात्रा में अधिक वृद्धि होगी।
बल का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। आज कल धन को लोग बल से अधिक महत्व देते हैं। फिर भी स्वास्थ्य बल, शिक्षा बल, संगठन बल आदि की महिमा से अपरिचित नहीं हैं। खेद इस बात का है कि इन सभी की अपेक्षा अत्यधिक आवश्यक एवं स्थायी आनन्द प्रदान करने वाले आत्म बल की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। उपनिषद् का वचन है कि ‘वह परमात्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होता।’ यह अनुभव सिद्ध बात है कि निर्बलों को सर्वत्र दुखी दरिद्र और अभाव ग्रस्त रहना पड़ता है उन्हें न इस लोक में सुख है न पर लोक में न साँसारिक सुविधा मिलती है। न मानसिक शाँति। इसलिए उभय पक्षीय-बाह्य और आन्तरिक-गुणों की, योग्यताओं की शक्तियों की मात्रा को अधिकाधिक बढ़ाना उचित है।
गायत्री के ‘धीमहि’ शब्द का सन्देश यह है कि हम अपने अन्दर सद्गुणों को धारण करें। अपने स्वभाव को नम्र, मधुर, शिष्ट, खरा, निर्भीक, दयालु, पुरुषार्थी, निरालस्य, श्रमशील बनावें तथा व्यवहार में उदारता, सच्चाई, ईमानदारी, निष्कपटता, भलमनसाहत, न्याय परायणता, समानता तथा शालीनता का परिचय दें। उन सभी गुणों, विशेषताओं और योग्यताओं को अपनावें जिनके द्वारा स्वास्थ्य, कीर्ति, प्रतिष्ठा, धन, वैभव आदि की प्राप्ति होती है। यह साँसारिक सम्पत्तियाँ भी आवश्यक है क्योंकि इनसे जीवन की गतिविधि शान्ति और सुविधा पूर्वक चलती है दरिद्र व्यक्ति न संसार में सुखी रह सकता है। और न मानसिक शान्ति प्राप्त कर सकता है। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि केवल उदार परोपकारी योग्यताओं से ही केवल काम नहीं चल सकता है। ऐसी योग्यताएं तो पशु पक्षी भी प्राप्त कर लेते हैं। इनके अतिरिक्त वे सद्गुण भी संचय करने चाहियें जिनके कारण मनुष्य पूजा जाता है, महापुरुष बनता है। सबका प्रेमपात्र नेता बनता है। एवं सहज ही अपने अनेकों सहायक मित्र, शुभचिन्तक, श्रद्धालु, अनुयायी एवं प्रशंसक बना लेता है। जिसके सद्गुणों की सुगंधि चारों ओर फैल रही है, उस पर विमुग्ध होकर अनेक पारखी भ्रमर घेरे रहते हैं।
ऐसे व्यक्तियों को जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए कभी अभाव ग्रस्त नहीं रहना पड़ता जिसके अधिक सहयोगी है, जिस पर अधिक लोग विश्वास करते है। उसके जीवन का मार्ग सुगम होता है। भले ही वह अपनी त्याग वृत्ति के कारण धन कुबेर न बन पावे, य अमीरी ऐश आराम न भोग पावे पर इतना निश्चित है कि उसे दरिद्रता का दुख कभी न भोगना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त सद्गुणों की सात्विकता के कारण आत्म बल की वृद्धि, धर्म संचय, दिव्य तत्त्वों की प्रचुरता के कारण अन्तःकरण में जो अगाध शान्ति रहती है उससे आत्मकल्याण का, परमानन्द का, जीवन मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता जाता है और अन्त में यही गुरु एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना की भाँति जीव ईश्वर का सम्मिलन कराने में समर्थ हो जाते हैं।
छब्बीस देवी सम्पदाएँ गीता में बताई गई है। इनको संक्षेप में कहना चाहें तो (1) अनुत्तेजना (2)स्वच्छता (3) विचार सफलता (4) सहिष्णुता (5)संयम (6) शक्ति संचय (7) उदारता (8) कर्तव्य परायणता। इन आठ गुणों को अपने स्वभाव और अभ्यास में लाना यह एक उच्च कोटि का धन उपार्जन है।
धन उतना ही आवश्यक है जितने से शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक उत्तर दायित्व सुविधा पूर्वक पूरे होते रहें। इस मर्यादा से अधिक मात्रा में धन उपार्जन करने एवं जोड़ने की तृष्णा सुखदायक नहीं वरन् अनेकों कलह क्लेश व पापों को उपस्थित करने वाली होती है, अनावश्यक धन के संचय को पाप माना गया है और परिग्रह (अनावश्यक धन जोड़ने) को प्रधान पाँच पापों में से एक गिना गया है। जोड़ने योग्य जमा करने योग्य, कभी संतुष्ट न होने योग्य सम्पत्ति तो सद्गुणों की दैवी सम्पत्ति ही है। शिक्षा, शिल्प संगीत, रसायन, कला आदि की योग्यताएँ एक सोना भरी तिजोरी से अधिक मूल्यवान है। जो धन से विमुख होकर योग्यताएं कमाता है, शक्तियाँ उपार्जित करता है, वह घाटे का नहीं नफे का व्यापार कर रहा है। जिसने गुणों की शक्तियों की उपेक्षा करके धन कमाने का ही कार्यक्रम अपनाया हुआ है वह आत्मिक दृष्टि से मूर्ख ही ठहराया जायेगा।
धन से योग्यताओं का मूल्य अधिक है और योग्यताओं से स्वभावों का महत्व विशेष है। किसी व्यक्ति के धन और साँसारिक विशेषताएं न होने पर भी यदि उसने उच्च दृष्टिकोण सद्विचार अच्छे विवेक, सात्विक वृत्ति और मधुर व्यवहार अपने स्वभाव में परिपूर्ण कर लिया है तो अवश्य समझिए कि वह किसी भी बड़े से बड़े धन कुबेर और गुणवान से कम सम्पत्तिशाली नहीं हैं। अपनी उच्च आन्तरिक स्थिति के कारण वह अल्प साधनों में भी इतना आनंदित रहेगा जिसकी कल्पना भी असंस्कृत मस्तिष्क वाले नहीं समझ सकते। जिसकी पाचन शक्ति प्रबल है। वह मोटी रोटी में भी ऐसा आनंद अनुभव करेगा जो उदर रोगी को षट्रस व्यंजनों में भी नसीब नहीं हो सकता। मनोभूमि की शुद्धता को प्रबल पाचन शक्ति ही समझना चाहिए जिनके होने पर गरीबी में भी स्वर्गीय जीवन का रस लिया जा सकता है।
गायत्री के ‘धीमहि’ शब्द का सन्देश है कि वस्तुएं मत जोड़ो, गुणों को धारण करो। कचरे की गठरी मत बाँधो, सोने का टुकड़ा रख लो। जीवन में सर्वोपरि आनन्द देने की कुँजी सात्विक वृत्तियाँ ही है। उनका महत्व समझो, उन्हें ढूँढ़ो, उनका संचय करो और उनको अधिकाधिक मात्रा में अपने अन्तःकरण में धारण करते जाओ। जिसके पास दैवी सम्पत्तियाँ है। वास्तव में वही सच्चा धनी है।
(योगीराज अरविन्द घोष)
यदि एक तरफ से या अपने एक अंग में तुम सत्य के सम्मुख हो जाओ, और दूसरी तरफ से आसुरी शक्तियों के लिये अपने द्वार बराबर खोलते रहो तो यह आशा करना व्यर्थ है कि दयामयी दैव्य शक्ति तुम्हारे साथ रहेगी। तुम्हें इस मन्दिर को स्वच्छ रखना होगा यदि तुम इसमें चिन्मयी सत्त को प्रतिष्ठित करना चाहते हो।
हर बार जब वह दैवी शक्ति आती और सत्य को लाती है तब तुम यदि उसकी ओर पीठ फेर दो और फिर उस झूठ को बुला लो जिसे एक बार निकाल चुके हो तो दैवी शक्ति तुम्हारा साथ नहीं देगी, यह दोष दैवी शक्ति का नहीं, तुम्हारे अपने संकल्प के मिथ्याचार और शरणागति की अपूर्णता का है।
तुम तो पुकार करते हो सत्य की, पर तुम्हारे अन्दर कोई बात ऐसी चीज उठा लेती है जो झूठ है, अज्ञान है, और दिव्य भाव के विपरीत है और कुछ नहीं तो ऐसी चीज को सर्वथा छोड़ देने को तैयार नहीं होती तो यह समझो कि तुम्हारे ऊपर आक्रमण होता रहेगा और भगवती तुमसे पीछे हटती ही जायेगी। इसीलिये पहले देखो कि तुम्हारे अन्दर वह कौन सी चीज है जो असत्य है, अज्ञानमय है, और उसका सतत त्याग करो, तभी तुम अधिकारी होगे कि दिव्यत्व लाभ करने के लिये दैवी शक्ति का आवाहन करो।
यह मत सोचो कि सत्य और मिथ्या, प्रकाश और अन्धकार, शरणागति और स्वार्थ एक साथ उस गृह में रह सकते है। जो भगवती के रहने के लिये समर्पित कर दिया गया। दिव्यत्व लाभ सर्वांग में होना चाहिये इसलिये उसकी बाधक वस्तु का त्याग भी सर्वांग से होना चाहिये।
इस मिथ्या धारणा को भी त्याग दो कि, तुम जब जैसे चाहोगे और तुम स्वयं भगवान के निर्दिष्ट पथ पर न चलो तब भी, भगवती तुम्हारे लिये स्वयं ही सब कुछ करेंगी या उन्हें करना ही पड़ेगा। अपनी शरणागति सच्ची और पूरी करो, तभी तुम्हारे लिये बाकी सब कुछ किया जायेगा।
अज्ञान और आलस्य में पड़े-पड़े यह मत सोचो कि दैवी शक्ति ही तुम्हारे लिये शरणागति भी कर देगी। भगवान यह चाहते हैं कि तुम भगवती की शरण लो, पर तुम्हारे ऊपर इसका कोई बन्धन नहीं है, जब तक वह दिव्यत्व लाभ नहीं होता, जिसके प्राप्त करने पर कोई वहाँ से च्युत नहीं होता,तब तक हर समय तुम स्वतन्त्र हो, अपने पास से उसे हटा सकते हो, शरणागति करके भी चाहो तो उसे लौटा भी ले सकते हो यदि उसके आध्यात्मिक परिणामों को भोगने के लिये भी तैयार हो जाओ। तुम्हारी यह शरणागति स्वतः प्रवृत्त और बन्धन रहित होनी चाहिये, जीते-जागते जीव की-सी होनी चाहिये, चलने वाले या अचल चैतन्य रहित जड़ इंजन या यन्त्र की सी नहीं।
जड़त्व वश, कुछ न करना अनेक बार वास्तविक शरणागति सा मालूम होता है। पर जड़ अकर्मण्यता से कोई सत्य और सामर्थ्य नहीं उत्पन्न हो सकती। भौतिक प्रकृति जड़त्व वश अकर्मण्य होने से ही प्रत्येक तामस और आसुरी प्रभाव का शिकार बनती है दैवी शक्ति के कर्म करने के लिये ऐसी अधीनता होनी चाहिये जिसमें प्रसन्नता हो, बल हो और जो अधीनता में भी सहायक हो, यह आज्ञाकारिता सत्य के ज्ञानदीप्त अनुयायी की अंतर्जगत में अन्धकार और असत्य से लड़ने वाले वीर योद्धा की, देवाधिदेव के सच्चे सेवक की, आज्ञाकारिता होनी चाहिये।
यही सद्वृत्ति है और जो इसे धारण कर रख सकते है, वे ही ऐसी श्रद्धा बनाये रह सकते हैं जो निराशाओं और कठिनाइयों से विचलित न हो और इस कठिन अग्नि परीक्षा से निकल कर उस महान् विजय और उस महत् दिव्यत्व को प्राप्त कर सकते हैं।
तुम्हारा विश्वास विशुद्ध, निश्छल और पूर्ण होना चाहिये। मन में और प्राणों में यदि ऐसा अहंकारयुक्त विश्वास हो कि जिसमें बड़े बनने की वासना, अभिमान, वृथाडम्बर, मानसिक प्रगल्भता प्राणों की स्वेच्छाचारिता, व्यक्तिगत माँग निम्न प्रकृति के क्षुद्र सन्तोष प्राप्त करने की कामना के कलंक लगे हुए हो तो ऐसा विश्वास ऊर्ध्वगमना धूम और धूमाच्छत्र अग्निशिखा के सदृश है जो ऊपर स्वर्ग की ओर उज्ज्वलित नहीं हो सकती। यह समझो कि तुम्हें जो जीवन मिला है वह ईश्वरी कार्य के लिये है, ईश्वरी तत्व को प्रकट करने में सहायक होने के लिये है। और किसी बात की इच्छा मत करो, केवल यह चाहो कि ईश्वरी चैतन्य की ही पवित्रता शक्ति, ज्योति विशालता, शांति और आनन्द प्राप्त हो और वह तुम्हारे मन, प्राण और शरीर को पलट कर दिव्य और पूर्ण बनाये बिना नहीं छोड़े। और कोई चीज मत माँगो, केवल यही इच्छा करो कि वह दिव्य, आध्यात्मिक और विज्ञानमय सत्य तुम्हें प्राप्त हो, पृथ्वी पर और तुम्हारे अन्दर और उन सबों के अन्दर जो ऊपर से पुकारे गये हैं। और चुन लिये गये हैं, इस सत्य की सिद्धि हो, और इसकी सृष्टि के लिये और विरोधी शक्तियों पर इसकी विजय प्राप्त के लिये जिन अवस्थाओं की जरूरत है वे तैयार हो जाएं।
चन्दन का वृक्ष कटने पर भी गन्धविहीन नहीं होता, वृद्ध होने पर भी गजेन्द्र क्रीड़ा का परित्याग नहीं करता, ईख का माधुर्य कोल्हू में देने पर भी नष्ट नहीं होता, वैसे ही कुलीन भी, चाहे कितनी ही दुखावस्था में पड़ जाये, शील का त्याग नहीं करते।
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दूसरे का धन हरण करने में जो पंगु है, परनारी को कुदृष्टि से देखने में जो नेत्रहीन है, दूसरों की निन्दा करने में जो गूँगा है, वही संसार में सबका प्रियपात्र है।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
जीवन क्या है? खाना, पीना, पचाना, साँस लेना आदि शरीर में नित्य होने वाले काम मात्र ही क्या जीवन है? अथवा क्या धन सम्पत्ति या नाम-यश की प्राप्ति के लिए तरकीबों और उपायों का सोचना मात्र ही जीवन है? अथवा क्या सृष्टि की परम्परा को चलाने के लिए सन्तानोत्पत्ति करना ही जीवन है? अथवा क्या इन सब कार्यों का समूह ही जीवन है? वैज्ञानिक लोग जीवन का कुछ भिन्न ही अर्थ लगाते हैं और श्री शंकराचार्य सरोखे दार्शनिक तो बिल्कुल ही भिन्न अर्थ लगाते हैं।
जीवन दो प्रकार का होता है, एक तो भौतिक तथा दूसरा आध्यात्मिक। वैज्ञानिकों का कथन कि विचारना, जानना, इच्छा करना, भोजन करना और उसका परिपाक करना, साँस लेना इत्यादि जो कार्य है, वही जीवन है। परन्तु यह जीवन अमर नहीं होता। ऐसा जीवन दुःख, सुख, चिन्ता, आपत्ति, विपत्ति, पाप, बुढ़ापा, रोना इत्यादि का आखेट बना रहता है। अतएव प्राचीन महर्षियों, योगियों और तपस्वियों ने जिन्होंने अपने चित्त और इन्द्रियों को अपने वश में करके त्याग और तप वैराग्य, और अभ्यास इत्यादि के बल से आत्म निरीक्षण किया है, निश्चय पूर्वक कहा है कि जो आत्मा में रत है केवल मात्र वही स्थायी और असीम आनन्द .एवं अमरत्व प्राप्त कर सकता है। उन्होंने मनुष्य के भिन्न-भिन्न स्वभाव, योग्यता और रुचि के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिए विभिन्न निश्चित मार्ग बतलाये है। जिन लोगों को ऐसे महात्माओं में, वेदों में और गुरु के वचनों में, अटूट श्रद्धा है वे आध्यात्मिक और सत्य के मार्ग पर निर्भीक विचरते हैं और स्वतन्त्रता, पूर्णता या मोक्ष प्राप्त करते हैं, वे लौट कर फिर मृत्युलोक में नहीं आते, वे सच्चिदानन्द ब्रह्म में या अपने ही स्वरूप में स्थिर रहते हैं। यही मानव जीवन का ध्येय एवं परम उद्देश्य है, यही अन्तिम लक्ष्य है। जिसके अनेक नाम यथा-निर्वाण, परम गति, परमधाम और ब्राह्मीस्थिति है। आत्म साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।
परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम भौतिक जीवन की उपेक्षा करें। भौतिक जगत भी परमेश्वर या ब्रह्म का ही स्वरूप है जिसको कि उसने अपनी लीला के लिए बनाया है। अग्नि और ऊष्णता, बरफ और शीत, पुष्प और सुगन्धित की भाँति जड़ और चेतन अभिन्न हैं। शक्ति और शक्त एक ही है। ब्रह्म और माया अभिन्न एक हैं। ब्रह्म-मय शाश्वत जीवन प्राप्त करने के लिए भौतिक जीवन एक निश्चित साधन है। संसार आपका एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है, पंचतत्व आप के गुरु हैं। प्रकृति आपकी माता है और पथ-प्रदर्शिका है, यही आपकी ‘मूक शिक्षिका’ है। यह संसार दया, क्षमा, सहिष्णुता, विश्व-प्रेम उदारता, साहस, धैर्य, महत्वाकाँक्षा इत्यादि दिव्य गुणों के विकास के लिये एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षालय है। यह संसार आसुरी स्वभाव से युद्ध करने के लिए एक अखाड़ा है और अपनी भीतर की दैवी शक्ति को प्रकाश में लाने के लिए एक दिव्य क्षेत्र है। गीता और योग-वाशिष्ठ की मुख्य शिक्षा यही है कि मनुष्य को संसार में रहते हुए आत्म साक्षात्कार करना चाहिए। जल में कमल-पत्र की नाई संसार में रहते हुए भी उसके बाहर रहिये। स्वार्थ, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि नीच आसुरी स्वभाव को त्याग कर मानसिक त्याग और आत्म-बलिदान का दिव्य स्वभाव धारण करिये।
क्या जीवन में खाने-पीने और सोने से अधिक उत्तम अन्य कोई कार्य (उद्देश्य) है ही नहीं? मानव-योनि प्राप्त करना दुष्कर है, अतएव इसी जीवन में आत्मा को प्राप्त करने की भरपूर चेष्टा करिये। राजा महाराजाओं को भी काल कवलित कर लेता है आज युधिष्ठिर, अशोक, बाल्मीकि, शेक्सपियर, नेपोलियन आदि कहाँ हैं? इसीलिए यौगिक साधनाओं में लग जाइये, तभी आप परमानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे। ताश, सिनेमा और धूम्रपान में व्यर्थ समय बिताने से क्या आपको असली शान्ति मिल सकती हैं? इस साँसारिक जीवन में इन्द्रिय लोलुपता और विषय-वासना के क्षणिक सुख में भटके रहने से क्या आपको सच्चे सुख का अनुभव हो सकता है? आपस के लड़ाई झगड़े में या व्यर्थ की बकवास में क्या आपको सच्चा आनन्द मिल सकता है?
अपने आदर्श और लक्ष्य तक पहुंचने के लिये संग्राम करते रहना ही जिन्दगी है। इस संग्राम में विजय प्राप्त करना ही जीवन है। अनेक प्रकार की जागृतियों को ही जीवन कहते है। मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करिये। अपनी पुरानी बुरी आदतों तथा कुविचारों को, कुसंस्कारों और कुवासनाओं को अवश्य जीतना होगा, इन पैशाचिक शक्तियों से युद्ध करना होगा और विजय प्राप्त करनी होगी। अधःपतन की ओर ले जाने वाली वासनाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखना होगा।
आपका जन्म ही आत्म साक्षात्कार करने के लिये हुआ है नियमित रूप से संकीर्तन करिये और आत्मिक सुख का अनुभव करिये। निष्काम कर्म के द्वारा अपने मन और बुद्धि को शुद्ध करिये। इन्द्रिय-निग्रह से अपने ही स्वरूप में स्थित होइये। जीवन संग्राम में जब आप पर प्रति दिन चोटें पड़ती हैं, जब आप धक्के खाते हैं। तभी मन आध्यात्मिक पथ की ओर ठीक झुकता है और तब साँसारिक विषयों से अन्यमनस्कता उत्पन्न होती है, और अरुचि होती है, रस प्रवचन से उद्धार पाने की उत्कंठा जागृत होती है, विवेक और वैराग्य होता है। अतएव गम्भीर धारणा और ध्यान में लग जाइये।
मनुष्य की आयु अल्प है और समय तीव्र गति से चला जा रहा हैं संसार विपदाओं से भरा है अतएव अविद्या ग्रन्थि को काट कर निर्वाणिक आनंदामृत का छकडडडड पान करिये।
आध्यात्मिक जीवन निरा गल्प नहीं है, केवल आवेश मात्र नहीं है। यही सच्चा आत्म-स्वरूप जीवन है यह विशुद्ध आनंद और सुख का अनुपम अनुभव है। इसी को पूर्णता प्राप्त जीवन कहते हैं। एक स्थिति ऐसी होती है। जहाँ सदा शाश्वत शान्ति और केवल अनन्त आनंद ही आनन्द है, परमानंद है। वहाँ न तो मृत्यु है और न वासना ही, वहाँ न दुःख है न दर्द, न भ्रम है न शंका। क्या आप इस अक्षय आनन्द और ‘परम सुख’ के अमर पद की प्राप्ति के लिये लालायित नहीं है? यदि है तो आइये अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखिये, सद्गुणों को सीखिये, आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने की चेष्टा करिये आत्म तत्व का नियमित रूप से ध्यान करिये तभी आप उस अतीव गम्भीर, असीम आनन्द एवं अमरत्व को पा सकेंगे केवल तभी आप अमर पद तक पहुँच सकेंगे। इस शरीर को ही आत्मा समझ लेना सबसे बड़ा पाप है, इस भ्रमात्मक भाव को त्याग दीजिये। साँसारिक महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिये उपाय करना, तरकीबों का सोचना विचारना झूठे मनसूबे बाँधना ख्याली पुलाव छोड़िये, चिर-पालित मायाविनी आशाओं को तिलाँजली दीजिये, वासनाओं और इच्छाओं का दमन कर उनसे ऊपर उठिये। बुद्धि से काम लीजिये। उपनिषदों का मनन पूर्वक अध्ययन करिये। नियमित रूप से नित्य निदिध्यासन करिये अविद्या और अज्ञान के गहन अन्धकार से बाहर निकलिये और ज्ञान रूपी सूर्य की जगमगाती ज्योति में स्नान करिये। इस ज्ञान में दूसरों को भी साथी बनाइये। अपवित्र इच्छाएं और असुविधा आपको बहला लेती हैं। अतः इसे भी कभी मत भूलिये कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य और अन्तिम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार करना ही है। झूठे बाह्य आडम्बरों और माया के मिथ्या प्रपंचों में मत फंसिये। कल्पना के मिथ्या स्वप्नों से जागिये और थोथे, सारहीन प्रलोभनों के जाल में न फंस कर ठोस और जीती-जागती असलियत को पढ़िये, अपनी आत्मा से प्रेम करिये क्योंकि आत्मा ही परमात्मा या ब्रह्म है। यही सजीव मूर्तिमान सत्य है। आत्मा ही शाश्वत है। अतः आत्मा में ही स्थित होइये और ‘तत्त्वमसि’ आप ही ब्रह्म हैं इसे पहचानिये। यही वास्तविक जीवन है।
कर्मयोग का अभ्यास जिज्ञासु के मन को आत्मज्ञान ग्रहण करने के योग्य बनाता है। और उसे वेदान्त के अध्ययन का योग्य अधिकारी बना देता है। कर्मयोग की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के पूर्व ही मूढ़ मानव ‘ज्ञान-योग‘ अभ्यास में असमय ही कूद पड़ते हैं। यही कारण है ऐसे लोग सत्य की प्राप्ति में बुरी तरह फेल होते है। उनका मन अपवित्र रह जाता है तथा अनुकूल और प्रतिकूल भावनाओं से भरा रहता है। वे ब्रह्म की कोरी बात ही बात करते है। तथा व्यर्थ बकवास शुष्क वादविवाद और तत्वहीन तर्क-वितर्क में फंसे रहते हैं। उनका दार्शनिक ज्ञान उनकी जिह्वा तक ही सीमित रहता है या यों कहिये कि वे लोग केवल मौखिक वेदान्ती हैं। आवश्यकता तो ऐसे वेदान्त की हैं जिसके द्वारा सबसे आत्मभाव रखते हुए देव और मानव समाज की अनवरत निःस्वार्थ सेवा क्रियात्मक रूप से हो सके।
अपने हृदय में प्रेम की ज्योति जगाइये, सबको प्यार करिये अपनी प्रगाढ़ प्रेम की बाहुओं से प्राणीमात्र को आलिंगन करिये। प्रेम एक ऐसा रहस्यमय दिव्य सूत्र है जो सबके हृदयों को “वसुधैव कुटुम्बकं” समझ कर एक में बाँध लेता है। प्रेम ऐसी पीड़ा नाशक स्वर्गीय महौषधि है जिसमें जादू की-सी सामर्थ्य है। अपने प्रत्येक काम को विशुद्ध प्रेममय बनाइये। लोभ, धूर्त्तता, छल कपट, और स्वार्थपरता का हनन कीजिये। अनवरत दयालुता के कार्यों से ही अमृतत्व की प्राप्ति हो सकती है। प्रेम में सने हुए हृदय से सतत सेवा करने से क्रोध, दाह, ईर्ष्या आदि दूर होते है। दयालुता से भरे हुए कार्य करने से आपको अधिक बल, अधिक आनन्द और अधिक सन्तोष की प्राप्ति होगी, सब आपसे प्रेम करेंगे। दया दान और सेवा से हृदय कोमल पवित्र हो जाता है और साधक का हृदय-कमल प्रस्फुटित और ऊर्ध्वमुखी होकर ईश्वरीय प्रकाश को ग्रहण करने के योग्य बन जाता है।
ईश्वर करे आप साँसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए श्रद्धा और भक्ति से ईश्वर का गुण गाते हुए अपने आदर्श दिव्य-जीवन में चिरशान्ति और शाश्वत आनन्द का अनुभव करें।
सूर्य का उदय पूर्व की जगह पश्चिम में हो सकता हैं, सुमेरु का स्थानान्तरण हो सकता है। अग्नि शीतल हो सकती है, पर्वत की शिलाओं में कमल का फूलना सम्भव हो सकता है। किन्तु सज्जनगण का अपने वचन से टलना कभी सम्भव नहीं।
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हाथों की शोभा दान देने में है। सिर की शोभा बड़ों के चरणों में गिरने में है। मुख की शोभा सत्य भाषण में है, बलशाली की भुजाओं की शोभा असहायों की रक्षा करने में है। हृदय की शोभा सद्वृत्तियों को धारण करने में है एवं कानों की शोभा शास्त्र श्रवण में है।
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सत्पुरुष वे हैं जो अपना स्वार्थ त्याग करके दूसरों का हित करने में तत्पर रहते हैं। अपना स्वार्थ की रक्षा करते हुए भी जो दूसरों का हित साधन करते हैं वे सामान्य मनुष्य हैं। किन्तु जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का नुकसान करते हैं उनको समझ में नहीं आता क्या कहा जाये।
(ले. पं. दुर्गाप्रसाद जी शास्त्री)
मनुष्य अल्पज्ञ है, उसका ज्ञान सीमित और एक देशीय है। ऐसा आर्ष ग्रन्थों का सर्वोपरि सिद्धान्त है। बड़े-बड़े विद्वानों ने भी यही माना है कि संसार का अपार सागर हिलोरें ले रहा है, और हम उसमें से एक साधारण सा ज्ञान प्राप्त करने के लिये जीवन पर्यन्त प्रयत्न करते हैं, तब भी हमारा ज्ञान अधूरा रह जाता है। कहते हैं कि न्यूटन यही कहा करता था कि ज्ञान के अपार सागर में मैं केवल कंकड़ियाँ चुन रहा हूँ। भारत के प्रमुख वैज्ञानिक उपनिषद्कारों ने भी यही लिखा है।
‘अविज्ञातं विजानताँ विज्ञातम विजानताम्।,
अर्थात्- बुद्धिमानों के लिये तो अज्ञात है और मूर्खों के लिये ज्ञात।
महाराजा भर्तृहरि जी ने लिखा है कि जब तक मैं मूर्ख रहा तब तक मैं उन्मत्त हाथी की भाँति मदान्ध रहा परन्तु ज्यों-ज्यों मेरे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हुआ, त्यों ही त्यों मुझे अपनी अल्पज्ञता का ज्ञान होता गया। यों तो संसार का प्रत्येक मूर्ख यह समझता है कि संसार में जितनी बुद्धि है, उसके दो हिस्से मेरे पास हैं। और शेष तिहाई हिस्से में संसार अपनी गुजर कर रहा है। परन्तु जब उसकी बुद्धि के विपरीत आकस्मिक घटना घटित होती है तब वह त्राहिमाम्-त्राहिमाम् करके रोता है, और दिन-रात दुर्दैव को कोसता हुआ या अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करता है। बहुत संभव है कि लोगों का इस विषय में यह ख्याल हो कि लोगों की बुद्धि को इस प्रकार सीमा वाला बतलाकर मनुष्य को उत्साह हीन और नपुँसक कर देना है। इन विचारों से सहमत होकर बहुत संभव है कि मनुष्य के विचार तुच्छता की ओर लग जावें, जिससे पुरुषार्थ नष्ट होकर मनुष्य अपनी मनुष्यता से भी गिर सकता हैं जब कि मनुष्य ने रेल , तार, वायुयान, जलयान, बेतार के तार आदि निकाले, मनुष्य ने सृष्टि के रुख को ही बदल दिया, समुद्र पाट दिये, पहाड़ काट डाले, नदियों के बहाव को बदल दिया जंगल काट कर बड़े-बड़े शहर बसाये। विस्फोटक पदार्थों से संसार को चकाचौंध कर डाला, फिर मनुष्य की अल्पज्ञता की दिग्दर्शन कराना कहीं भूल का सन्देश तो नहीं है। हमारे विचार में यह सब कुछ ठीक है, मनुष्य अपनी वास्तविक शक्ति को न समझ कर छोटी श्रेणी को प्राप्त हो सकता है। परन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य अपनी सीमित शक्ति को कई गुना समझ कर भयंकर हानियाँ भी उठा सकता है। इसी प्रकार नैपोलियन यह कहा करता था कि असम्भव शब्द मूर्खों के कोष में मिलता है उसी नेपोलियन को न केवल राज्य करना ही किन्तु पेट भर रोटी मिलना भी असम्भव हो गया।
संसार भर पर विजय प्राप्त करने वाला सिकंदर अपनी अल्पज्ञता को समझ कर दोनों हाथ खाली करके संसार से विदा होता है। रोमन साम्राज्य के दाँत खट्टे करने वाला हार्निवल भी संसार की आकस्मिक घटनाओं से घबराता है। और अपनी अल्पज्ञता पर पश्चाताप करता है। सन् 1912 ई॰ में टाइटैनिक जहाज इतना विशाल तैयार हुआ था कि जिसकी लम्बाई 1000 फुट थी और जो समुद्रतल से 164 फुट ऊंचा था। इसके निर्माताओं का यह दावा था कि कि संसार की ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो इसको समुद्र में डुबा दे। जहाज न्यूयार्क को रवाना होता है, और 2358 मुसाफिर उसमें सफर करते हैं। मनुष्य के हाथ में जितने साधन थे उन सब विधाओं का प्रयोग किया जा चुका था। न्यूयार्क पहुँचने में केवल 24 घन्टे की देर थी जहाज रेल की गति से दौड़ रहा था। मुसाफिर शान्ति और निश्चय की नींद सो रहे थे, अधिकारियों के हृदय अभिमान से पूरित थे। परन्तु मनुष्य का अल्पज्ञान कुछ सोचता है, और ईश्वर कुछ करता है। एक बर्फ का पहाड़ आया और समुद्र में इधर से उधर निकल गया-तनिक सी ठेस लगने पर जहाज में इतना बड़ा सूराख हो गया कि अनेक प्रयत्न करने पर भी जहाज अपने को डुबाने से न बचा सका। यह है मनुष्य की अल्पज्ञता। जिसको मनुष्य नहीं समझ सकता कि एक मिनट के पश्चात् क्या होगा-और उसकी पीठ के पीछे क्या हो रहा है, अथवा 10 मील पर बैठे हुए उसके घर पर किस प्रकार की मंत्रणा की जा रही है। बड़े से बड़ा वैद्य और डॉक्टर जो बातों-बातों में बड़े बड़े रोगों का इलाज करता है यह भी नहीं जानता कि उसी क्षण उसके पेट के भीतर क्या हो रहा है अथवा उसके फेफड़ों में कौन सा रोग प्रवेश कर रहा है। हमने अनेक बार ऐसी घटनायें स्वयं देखी हैं कि जिन रोगियों को बड़े बड़े विद्वान डॉक्टर और वैद्यों ने ‘असाध्य’ कहकर परित्याग कर दिया, उसी को थोड़े दिन के पश्चात् आराम हो जाता है। ऐसे रोगियों की, जिनको डॉक्टर और वैद्य साध्य बताते थे मृत्यू हो जाती है। इसी प्रकार की आकस्मिक घटनायें हमको शिक्षा देती हैं कि मनुष्य का ज्ञान अल्प है, और उसको नहीं मालूम कि थोड़ी देर में क्या होने वाला है। जब हम यह देखते हैं कि एक खगोल विद्या का पंडित अपनी आँख में किरकिटी को भी नहीं निकाल सकता, तब वह कैसे कह सकता है कि मनुष्य का ज्ञान बहुत है।
संसार का प्रत्येक बड़े से बड़ा पराक्रमी बुद्धिमान और विज्ञान ज्ञाता इस बात को भली प्रकार जानता है कि भविष्य की उसको कुछ भी सूचना नहीं है, कि थोड़ी देर पश्चात् क्या होने वाला है। एक किसान अपनी हरी-भरी खेती देख कर अपने मन में गर्व करता है कि इस वर्ष मैं बहुत सारा धन प्राप्त कर सकूँगा परन्तु घन्टे भर के पश्चात् बड़े जोर से बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है, और ओले गिर जाते हैं। तथा उस किसान की आशा निराशा में परिणत हो जाती है। महाराज दशरथ, राम का राज्य होगा इस उत्साह में फूले नहीं समाते रात्रिभर आनन्दोत्साह होता है प्रातःकाल राम को वन जाने की सूचना मिलती है और महाराज मृत्यु शैया पर दिखाई देते हैं। बगीचे में खड़ा हुआ वक वृक्ष का पौधा बड़े से बड़े विज्ञानी को यह फटकार दे रहा है कि तुझ जैसे सहस्रों विद्वान इस धरातल पर आये और एक अंग की भी परीक्षा न कर सके।
रात्रि को शहर के लोग आनन्द से शयन करते हैं प्रातःकाल चार बज कर कुछ मिनट पर भूकम्प आता है-प्रातःकाल न नगर निवासियों का पता है और न नगर का। इस विषय में भी विज्ञान ज्ञाताओं ने बड़ी भारी छानबीन की है। परन्तु परिणाम कुछ नहीं।
महादेव गोविन्द रानाडे पूना के रहने वाले थे, वह बचपन में शरीर से बहुत ही निर्बल थे और सर्वदा गूँगों की भाँति चुपचाप बैठे रहते थे। उनकी इस दशा से उनके माता पिता बड़े दुःखी रहते थे। आखिर उन्हें पढ़ने के लिये पाठशाला भेजा गया, पढ़ने के पश्चात् जगत विख्यात विद्वान, न्यायप्रिय, प्रतिष्ठित, ऐश्वर्य वाले महापुरुष बने।
अकबर के पिता का नाम हुमायूँ था, जिस समय वह महा दुखी था उसी समय अकबर का जन्म अमरकोट में हुआ। कहते हैं, कि अकबर के जन्म के समय हुमायूँ के पास दास और दासियों को उपहार देने के लिए कुछ भी न था केवल उसके पास थोड़ी सी कस्तूरी थी, उस समय वही उसने लोगों को थोड़ी-थोड़ी बाँट दी। परन्तु वही अकबर तेरह वर्ष की अवस्था में शहंशाह बनकर गद्दी पर बैठा, कौन कह सकता है कि भविष्य में क्या होगा।
ज्योतिष के विद्वान किसी कल्पना के आधार पर कुछ कहते हैं, वे भी इन आकस्मिक घटनाओं के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते। कहते हैं, कि बनारस में एक बड़े विद्वान ज्योतिषी ने ज्योतिष के नियमों के अनुसार अपनी कन्या का पाणिग्रहण संस्कार किया, प्रातःकाल वह महाशय गंगा स्नान करने गये कि अचानक उनका सीढ़ी से पैर फिसल गया और उनकी मृत्यु हो गई। ऐसी आकस्मिक घटनाओं के सम्बन्ध में संसार के सारे विद्वान अवाक् हैं, न कुछ कह सकते हैं न समझ ही सकते है। कि कल क्या होगा।
संसार के प्रत्येक विद्वान को समय समय पर यह अनुभव होता रहता है कि वह जो कुछ भी करता है उसमें कोई ऐसी महान शक्ति है जो समय समय पर विघ्न डाल देती है। कोई ऐसी शक्ति है जो उसके हाथ और कलम को रोक कर दूसरी जगह लगा देती है। कोई ऐसी शक्ति है जो करना कुछ होता है और कुछ करा देती है। आये दिन पग पग पर आकस्मिक घटनाएं घटती हैं और उसकी अल्पज्ञता का बोध करा देती है।
इन घटनाओं से एक महान शक्ति का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा विश्व का सारा काम यथावत् रूप से चल रहा है, और जिसकी महिमा को मनुष्य सच्चे ज्ञान के बिना नहीं समझ सकता। जो उस शक्ति की महत्ता को नहीं समझा वह कितना ही ज्ञानी होने का दम क्यों न भरे सब निरर्थक है।
(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
अंग्रेजी में “ग्रास हौपर माइन्ट” एक विशेष अर्थ रखता है। टिड्डी कभी एक स्थान पर स्थिर होकर नहीं बैठती, क्षण क्षण में इधर से उधर कूदती फाँदती रहती है। एक पत्ती से दूसरी पत्ती पर जाती है। यही हाल कुछ लोगों के मन का होता है। अति चंचल मन ढुलमिल स्वभाव के व्यक्तियों को टिड्डी प्रकृति वाले व्यक्ति कह सकते हैं।
इच्छाशक्ति की निर्बलता से जिस मानसिक कमजोरी की सृष्टि होती है उसकी मूल वृत्ति चंचलता है। मन, इच्छा जनित शुभ वस्तु, उत्तम उद्देश्य पर स्थिर नहीं होता, पुनः पुनः नये प्रदेशों की ओर आकर्षित होता है।
मन की चंचलता से बड़ी कठिनाई यह होती है कि विकास नहीं हो पाता। विकास का नियम है-निरन्तर मन से एक ही दशा में काम लेना, पुनःपुनः अभ्यास करना। चंचल व्यक्ति दस पन्द्रह मिनट भी चित्त को एक स्थान पर एकाग्र नहीं कर पाता। विद्यार्थी, सिनेमा प्रिय, शौकीन, कवि, व्यापारी, यात्री, क्लर्क इत्यादि चंचलता के कारण सदैव यही शिकायत करते हैं कि अमुक पुस्तक या विषय समझ में नहीं आता, आध्यात्म कठिन विषय है इत्यादि। बालक सर्वदा अति चंचल रहते हैं। उनका मनोबल तथा एकाग्रता की शक्तियाँ अति अविकसित रहती है।
टिड्डी वृत्ति वाला व्यक्ति कभी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक सुनिश्चित, सुकल्पित उद्देश्य पर तीव्रता से नहीं चल पाता। मध्य में आने वाले प्रलोभन, आलस्य, प्रमोद, अशान्ति इत्यादि उसे एकनिष्ठ नहीं रहने देते। उसकी इच्छाएं, वासनाएं और स्मृतियाँ निरन्तर कमजोर होती जाती हैं। मनुष्य के चित्त को विचलित करने वाले दुर्व्यसनों में फँसने वाले अनगिनत मानसिक विकार और भाव हैं। बड़े-बड़े विद्वान मनोवेग और निकृष्ट विकारों से उत्तेजित हो कर बड़े-बड़े अनर्थ कर डालते है, वर्षों का किया कराया क्षण भर में नष्ट कर देते हैं। तनिक से आलस्य या प्रमाद से इतनी भारी गलती हो जाती है कि आयु पर्यन्त वह ठीक नहीं हो पाती विकारमय स्वार्थी विचारों मुक्ति।
आपका मन दो प्रकार के विचारों में भटकता है। प्रथम तो बाह्य विषयों में दिलचस्पी लेता है। विषय नाना प्रकार के हैं। इनका सम्बन्ध हमारी पाँच इन्द्रियों से है। कामेच्छा, क्षुधा, पिपासा, सुन्दर वस्त्र, गृह सामाजिक प्रतिष्ठा, मान, सौंदर्य, शृंगार, यौवन इत्यादि में मन भटकता है। वह इनका गुलाम बनता है और उद्वेगों का शिकार बनता है।
दूसरे पदार्थ आन्तरिक हैं। आप शान्ति चाहते हैं। मन के अन्दर ईर्ष्या, द्वेष, भय, स्वार्थ, क्रोध, लोभ, इत्यादि वृत्तियाँ सदैव संघर्ष मचाती हैं। वृत्तियाँ चंचल रहती है। आप दिन प्रतिदिन तुच्छ प्रसंग, पुरानी कटु स्मृतियों के कूड़े करकट में फँसे रहते हैं।
उपरोक्त वृत्तियों से मुक्ति के लिए निम्न उपाय कीजिए।
(1) ऐच्छिक ध्यान :-
हम अपनी इच्छा को एक विशेष दिशा में संग्रह पूर्वक लगायें। निकम्मे खाली बैठें वरना मन को पुनः पुनः उसी कार्य में लगाये रहें। जब कोई अनिष्ट विचार मन में आवे तो उसे अपनी इच्छा शक्ति से उत्तम विचार में परिवर्तित कर देना चाहिए। मस्तिष्क की धारणा में इस प्रकार के आग्रह से निम्न मन स्तर बदल कर उच्च स्थिति प्राप्त हो सकती है। ऐच्छिक ध्यान मन की चंचलता से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय है।
(2) एकाग्रता की सिद्धि :-
जब आप मन को ढीला छोड़ते हैं तो बुरे विचार, प्रलोभन, बल पूर्वक मनः प्रदेश में घुस आते हैं। इसका कारण मनुष्य की बहिर्मुखी प्रवृत्ति होना है। ऐसे मन के लिए एकाग्रता का अभ्यास अमृतोमय उपाय है। चंचल मन को अपने उद्देश्य पर जमाइये। ऐसी वृत्ति कीजिए कि नेत्र चाहे खुले हुए हों, अन्दर से आपका मन एक निश्चित स्थान, उद्देश्य, पात्र, परिस्थिति में एकाग्र रहे।
गीता में निर्देश है “जिस प्रकार अविचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र के प्रति नाना नदियों के जल विशाल समुद्र को अपनी हलचल से विचलित नहीं कर सकते वैसे ही स्थिर चित्त वाले महान आत्मा को संसार की हलचल उद्वेलित नहीं कर सकती मनोनियम के परिपूर्ण ज्ञान से मुक्त हो कर वह पूर्ण शान्ति में निवास करता है।”
(3) प्राणायाम :-
प्राणायाम के अभ्यास से बुद्धि विकसित होती है और मन शान्त स्थिर होता है। आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता है। प्राणायाम करने वाला सुखी रहता है। प्राणायाम से मन को अपने आधीन कर लीजिए। अनैच्छिक ध्यान ही हमारे लक्ष्य चिंतन में, ध्येय की प्राप्ति में बाधा डालती है। अतः प्राणायाम द्वारा इस विक्षेप को दूर करना चाहिए।
(4) निरन्तर अभ्यास :-
हमारा मन अभ्यास का क्रीत दास है। अतः आप नीरस विषय जिनसे मन भागता है अपने मानसिक नेत्रों के सन्मुख रखिये। आँखें बन्द कर उन्हीं को अपनी कल्पना द्वारा प्रस्तुत करने की कोशिश कीजिए। भावना को बार-बार दुहराने से मन में उत्तेजना इच्छा शक्ति के रूप में बदल जायेगी। एक समय में एक ही बात, स्थान, वस्तु, तत्व के ऊपर विचार करने का अभ्यास कीजिए। प्रारंभ में शुष्क तथा नीरस वस्तु के ऊपर चित्त को एकाग्र करना कठिन प्रतीत होता है। कालान्तर में मन स्वयं एक तत्व पर लगने लगता है।
(5) मौन का महत्व :-
चंचलता दूर करने के लिए चुप रहना, वाणी का उपवास बड़े महत्व का है। इसके द्वारा हम अपनी आत्मा और विश्व के वास्तविक स्वत्व को पहचानने में सफल हो सकते हैं। वास्तविक एकाग्रता कोलाहल पूर्व वातावरण में नहीं, शान्त और मौन वातावरण में ही हो सकती है।
प्रोफेसर डाबसन बहुधा कहा करते थे और अनेक विद्वानों का भी विश्वास है कि मनुष्य की प्राकृतिक और प्रारम्भिक बोली पद्य है, गद्य नहीं। इसके समर्थन रूप वे अपना अनुभव सिद्ध दृष्टान्त देते थे कि उन्होंने अनेक बार जर्मन भाषा की कविता फ्रेंच बालकों को और फ्रेंच भाषा की कविता जर्मन बालकों को सुनाई, तो उस भाषा का ज्ञान न होते हुए भी बालकों ने स्पष्ट रूप से बतला दिया कि कविता का तात्पर्य क्या था। इस दृष्टान्त के अंतर्गत पंचतत्वों की धारा बह रही है। मनुष्य मात्र का सम्बन्ध तत्वों से है और तात्विक धारायें चाहे किसी भी रीति से उत्पन्न की गई हों किन्तु अवश्य अपना प्रभाव दिखलाती हैं। पहिले यह देखना है कि वाक् शक्ति का पंचतत्वों से क्या संबन्ध है और तब यह अपने आप प्रकट हो जायगा कि कविता उच्चारण करने से किस प्रकार कविता का भाव समझ में आ जाता है।
विज्ञान बतलाता है कि ध्वनि एक प्रकार का कम्पन है। विविध प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए कम्पन भी अनेक प्रकार के होने चाहिए। अनेक प्रकार के कंपन से आशय यह है कि एक मिनट या एक सेकेण्ड में भिन्न भिन्न संख्या के कम्पन होने चाहिये। यदि मोटी आवाज के लिए एक सेकेण्ड में 112 कम्पन होते हैं तो दूसरी आवाज के लिए इससे कम या अधिक कम्पन प्रति सैकिंड पैदा होना जरूरी है। कम्पन किसे कहते हैं? यह प्रत्यक्ष देखने के लिए एक ढोल पर डंका मारिए और ढोल की खाल को ध्यान से देखिए, खाल पर लहरें दौड़ती दीखेंगी। प्रति मिनट ऐसी लहरें कितनी पैदा होती हैं इसी पर ध्वनि का निर्माण अवलम्बित है। संगीत यन्त्रों का निरीक्षण करने पर आप को पता लगेगा कि यह कम्पन कभी हवा में पैदा किये जाते हैं, कभी तार में और कभी धातु की छोटी छोटी पत्तियों में, और इन कम्पनों की प्रति मिनट संख्या को बदलने के लिए सितार पर अंगुली चलाई जाती है, बाँसुरी के छेद बन्द किये जाते हैं इत्यादि।
हमारा कंठ भी संगीत यन्त्र से कम नहीं है और इसका निर्माण उन यन्त्रों से भी अधिक मनोरंजक है। इसका विशेष विवरण तो ध्वनि शास्त्र के आचार्यों का अथवा डाक्टरों का विषय है, किन्तु इतना बतलाये बिना तो काम भी नहीं चलेगा कि गला एक प्रकार की नली है जिसमें सितार अथवा वीणा के तार की भाँति दो मोटे तन्तु हैं जिनमें कम्पन उत्पन्न होता है। साधारणतया वे इतने नरम हैं कि इनमें किसी प्रकार का कम्पन उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अपतत्व की धारा इन्हें कड़ा बना देती है और कम्पनशील भी कर देती है। कम्पन उत्पन्न करने वाली अपतत्व की धारायें केवल बाहर से ही नहीं आती हैं। वरन् आत्मा से भी मस्तिष्क में होती हुई आ सकती हैं और इस तरह से हम अपने विचार ध्वनि द्वारा प्रकट कर सकते हैं। संगीत यन्त्रों में अधिकतर आवाज गुँजाने के लिये एक पोला तूँबे के आकार का अथवा लम्बी हवा का बाक्स भी रहता है, हमारे मुँह और नाक का निर्माण उसी आधार पर है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जब हमें खाँसी अथवा जुकाम हो जाता है तो हमारी ध्वनि भी विकृत हो जाती है मानो सितार का तुम्बा फूटा हो।
यह तो सच है कि ध्वनि का जन्मदाता अपतत्व ही है किन्तु दूसरे तत्वों की उपस्थिति ध्वनि को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। इस तरह से मनुष्य ने 49 भिन्न-2 स्वरों का अनुभव किया है। प्रथम सात स्वर हैं इनमें तीव्र और कोमल भी हैं, और एक एक स्वर के फिर भेद हैं। इन सब स्वरों से आठ राग बनते हैं, और एक एक भाग में अनेक रागनियां हैं। इस प्रकार ध्वनि के अगणित भेद हो गये हैं किन्तु ध्यान रहे इन सब का जन्म होता अपतत्व है। और उसकी शक्ति पर अथवा दूसरे तत्वों के मिश्रण पर भिन्न भिन्न ध्वनि का निर्माण अवलम्बित है।
प्रत्येक ध्वनि का तात्विक प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। अनेक रोग इन प्रभावों से दूर किये जा सकते हैं और अच्छी वा बुरी प्रकृति भी बनाई जा सकती है। यदि कोई गीत अग्नि तत्व से रंगा हुआ है तो प्राण को वह लाल बना देगा। इसी प्रकार वायु नीला और सफेद, आकाश काला और पृथ्वी पीला रंग देती है। अग्नि से रंगा हुआ गीत गर्मी पैदा करता है, गुस्सा दिलाता है, नींद लाता है और भोजन पचाता है। आकाश से रंगा हुआ गीत डर पैदा करता है और भूलने की बान डालता है। गीतों द्वारा ऐसे ही प्रेम, शत्रुता, भक्ति, नीति और अनीति की ओर प्रेरणा होती है।
दूसरी ओर लीजिये। यदि हमारे उच्चारण किए हुए शब्द अग्नि से प्रभावित हैं तो इसकी गर्मी हमारे शरीर को जलायेगी, हमें दुबला और कमजोर बना देगी और अनेक रोग हमें आ दबायेंगे। यदि हमारे शब्द प्रेम, भक्ति, दया और नीति से भरे हुए हैं जिनसे सुनने वालों को प्रसन्नता सन्तोष होता है तो इन पृथ्वी और आपके प्रभाव से हम भी लोकप्रिय और सज्जन बन जायेंगे। वाक् शक्ति को सच्चे रास्ते पर रखना भी एक बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है।
(श्री वशिष्ठ नारायण जी चतुर्वेदी)
ब्राह्ममुहूर्त की सुशीतल वायु में कुछ ऐसी शक्ति है जिससे रक्त की चमक बढ़ती है, प्राण जीवनी शक्ति से परिपूर्ण होते हैं, समस्त शरीर में तेजस्विता की वृद्धि होती है, अधरोष्ठ रक्तानुरक्षित होते हैं और शरीर के अंग-प्रत्यंग सुगठित होते हैं।
आधुनिक युग में लोगों की स्वास्थ्य हानि के जितने कारण हैं उनमें सबसे प्रधान कारण है सोने जागने के नियम का व्यक्तिक्रम। देर में उठने से जो हानियाँ होती हैं उनका विचार आजकल के सुशिक्षित लोग नहीं करते।
यदि विचार पूर्वक देखा जाये तो सवेरे उठने के अभ्यास से मनुष्य का ‘प्रकृति-जीवन’ बहुत बढ़ जाता है। ‘प्रकृति-जीवन’ क्या है? लड़कपन की क्रीड़ा, स्नान, भोजन, निद्रा, विश्राम, मलमूत्र त्याग आदि कार्यों में हम लोगों का जो समय बीतता है उसे छोड़कर जितने समय में हम यथार्थ गौरवजनक कार्य करते हैं वही प्रकृति-जीवन कहा जा सकता है। मानव जीवन का बहुत कम समय ऐसे सत्कर्म में बीतता है। उदाहरणार्थ उन दो व्यक्तियों को लें जिनमें एक प्रतिदिन भोर में चार बजे उठ कर नियमित रूप से अपना कार्य आरम्भ कर देता है और दूसरा छह बजे उठ कर कार्य में प्रवृत्त होता है। यदि वे दोनों रात में एक ही समय शयन करें तो चालीस वर्ष समाप्त होने पर गणना द्वारा विदित होगा कि पूर्वोक्त व्यक्ति को शेषोक्त व्यक्ति की अपेक्षा दश वर्ष अधिक कार्य का समय मिला अर्थात् उसके प्रकृत-जीवन में दश वर्ष की वृद्धि हुई, क्योंकि कार्य ही जीवन का परिचायक है और अपने जीवन में जो जितना अधिक कार्य कर सकता है वह उतना ही अधिक दीर्घजीवी कहा जाता है।
इस भूमण्डल पर जितने लोग दीर्घजीवी और चिरस्मरणीय हो गये हैं वे सभी ब्राह्ममुहूर्त में उठने के लिये प्रसिद्ध थे। भोर में नहीं उठने से प्रातः-काल के कार्य-कलाप यथोचित ढंग से सम्पन्न नहीं हो सकते। देर करके उठने से प्रातः कृत्यों में ही दिन का बहुत सा समय व्यतीत हो जाता है और अन्योन्य कार्य समूह यथासमय सम्पन्न नहीं हो सकते। सुप्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक महात्मा अरस्तू का कथन है, “ भोर होने के पहिले ही शय्या त्याग करने का अभ्यास करना उचित है। ऐसा करने से धन, स्वास्थ्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। “अफ्रीका देश के नीग्रो लोगों में एक कहावत प्रचलित है कि जो भोर में उठता है उसके भ्रमण का पथ संक्षेप होता है।”
रूस के सम्राट् पीटर दि ग्रेट लन्दन में जहाज बनाने की विद्या सीखते समय जैसे सूर्योदय के पहले उठा करते थे वैसे ही सिंहासनारूढ़ होकर प्रजा पालन करते समय भी भोर में शय्या त्याग किया करते थे। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार सर वाल्टर स्काट प्रतिदिन भोर में उठ कर अपने हाथ से चिराग जलाते और कार्य करने लगते। जब नौ बजे प्रातःकालीन भोजन का समय होता तभी वे अपना कार्य बन्द करते उसके पहले कभी वह अपना कार्य छोड़कर नहीं उठते थे। यदि वह इस प्रकार नियमबद्ध कार्य नहीं करते, तो कदापि इतने ग्रंथों की रचना करने के साथ साथ अपने दैनिक कार्य समूह को सुचारु रूप से सम्पादन करने में समर्थ न होते। महात्मा गाँधी भी तीन बजे ही शय्या का परित्याग कर देते थे।
प्रसिद्ध ग्रंथकार ट्रोलोप डाकखाने में नौकरी करते थे। उन्होंने प्रतिदिन भोर में उठ कर ग्रन्थ रचना करने की प्रतिज्ञा कर ली थी। इस प्रकार नियमित रूप से कार्य करने से ही वह अंग्रेजी साहित्य भण्डार को इतने उपन्यासों, इतने जीवन चरित्रों तथा अनेकों भ्रमण वृत्तान्तों से भरने में समर्थ हुए थे।
भोर में उठने के लिये रात में नौ-दस बजे के भीतर ही सो जाना आवश्यक है। अधिक रात बीतने पर सोने से भोर में शय्या त्याग करना तो कठिन है, यदि करे भी तो उससे लाभ के बदले हानि ही होती है। शरीर दुर्बल और अस्वस्थ हो जाता है, माथा भारी हो जाता है, आँखों में जलन पैदा होती है और कार्य करने में उत्साह नहीं होता। अतएव भोर में 4, 5 बजे उठने वाले को रात में नौ दस बजे सो जाने का अभ्यास करना होगा और ऐसा ही करना उचित भी है।
रात्रि में सब भावनाओं को मन से हटाकर शान्त चित्त से शयन करने का अभ्यास करना चाहिये। ऐसा करने से अच्छी नींद आती है, जिससे सवेरे उठने पर आदमी का मन-प्रसन्न तथा उत्साहपूर्ण होता है और वह अपने कार्यों का उत्तम रूप से सम्पादन करने में समर्थ होता है। यही नहीं, इस अभ्यास से अनेक प्रलोभनों, विपत्तियों तथा आशंकाओं से रक्षा होती है।
यदि आप दीर्घजीवी बनना चाहते हो, अपने हृदय को वसन्त कालीन वायु प्रवाह की तरह आनन्दोल्लास पूर्ण करना चाहते हों, अपनी धमनियों में झरझर शब्द करती हुई प्रवाहित होनेवाली छोटी नदी की धारा की भाँति स्वच्छ रक्त की धारा प्रवाहित करने की अभिलाषा रखते हों, आयु को बढ़ाने वाली पुष्प-फलादि के सौरभ से पूर्ण प्रातः समीरण का सेवन करके अपने जीवन की तेजस्विता बढ़ाने की इच्छा रखते हों, तो खूब तड़के शय्या त्याग करने का अभ्यास करें।
यदि आप इस जीवन में कोई महत्व का कार्य करके अपने मानव जन्म को सार्थक बनाना चाहते हों, यदि अकाल मृत्यु से बचने की अभिलाषा रखते हों तो प्रतिज्ञा पूर्वक नियमित रूप से भोर में उठा करें तथा प्रातः कालीन वायु का सेवन करें और ईश्वर का नाम लेकर उत्साह पूर्वक अपने कार्य में प्रवृत्त हों।
जहाँ जाने पर भली भाँति स्वागत सत्कार न हो, कोई मधुर वचन न बोले, गुण दोष की बात न पूछे उस स्थान पर भूल कर भी नहीं जाना चाहिये।
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विश्व में सबसे बड़ा दुःख परतन्त्रता है, सबसे बड़ा सुख स्वतन्त्रता है।
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दुर्दिनों के अन्धकार के नाम पर रो-रो कर अपना उत्साह कभी नहीं भंग करना चाहिये। यह चेष्टा बुरी है।
(श्रीमती सरोज मारुवीय)
हिन्दु समाज किसी समय अत्यन्त सुसंगठित था। आज उसकी अवनत दशा का कारण भले ही राजनीतिक हो, किन्तु यह तो मानना ही पड़ेगा कि उसमें इतनी बुराइयाँ भर गयी हैं कि ऐसा मालूम होता है यदि बुराइयाँ शीघ्र दूर न की गयीं, तो वह छिन्न-भिन्न होकर ही रहेगा। यदि भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी है और इस आधुनिक काल में भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को उपयोगी बनाना है तो बुराइयों, कुरीतियों और अन्धकार को दूर करना ही पड़ेगा। इससे सम्भव है लोगों, को पीड़ा हो, हानि उठानी पड़े, किन्तु थोड़े से लोगों के लिये उज्ज्वल भविष्य को चौपट होने देना कहाँ की बुद्धिमानी होगी? क्या पीड़ा के डर से लोग अपने शरीर के फोड़े का आपरेशन नहीं कराते? आपरेशन हो जाने पर क्या आजीवन उसके निशान बने रहने की सम्भावना नहीं रहती?
हिन्दू समाज में जहाँ अनेक बुराइयाँ, नाशकारी प्रथाएँ और प्रचलित धार्मिक मनोवृत्तियाँ हैं, वहाँ दहेज का लेन देन बड़े ही भयंकर और अनिष्टकर रूप में वर्तमान है। उसकी हानियाँ देख कर लोगों को रोमाँच क्यों नहीं होता? नवयुवकों में इसका नाश करने की प्रबल इच्छा क्यों नहीं उठती? यह समाज का देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा? जो नवयुवक बड़ी बड़ी गरम बातें करते हैं, सुधारवादी बनते हैं, जो छात्र जरा-जरा सी बात पर हड़ताल कर बैठते हैं, उनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। यह देश की अजीब परिस्थिति का एक नमूना ही तो है। उच्च शिक्षा प्राप्त युवक भी जब निर्लज्ज होकर दहेज के लिये शादी करते दिखलायी पड़ते हैं, तब हम नारियों को पुरुष समाज के प्रति कितनी घृणा पैदा होती है, वह क्या लिखा जा सकता है।
भला ऐसी अवस्था में पुरुष-स्त्रियों को स्वतंत्रता देंगे? जब वे थोड़े से रुपये या मोटर-साइकिल के लिये इस प्रकार अड़ जाते हैं, जैसे वे आजादी के लिये सत्याग्रह कर रहे हों, तो शादियों की प्रथा और दहेज को त्याग देने की उनसे कौन सूखी आशा करेगा। होंगे वे देश के नौनिहाल, रहने दो उन्हें भावी भारत के भाग्य-विधाता। किन्तु स्त्री तो उनसे कुछ आशा नहीं करती।
अब कुछ लोग यह कहने लगे हैं कि वधू का पिता अपनी लड़की को कुछ भी दे सकता है। यह पाखण्ड किसी से छिपा है क्या? एक लड़की को उसका पिता चाहे सर्वस्व उठाकर दे दे, किन्तु वर्तमान सामाजिक अवस्था में क्या उसका वह भोग कर सकती है, यदि उसे बहुत सा रुपया ही दे दिया जाय तो कौन कह सकता है कि वह कुछ दिनों में पुरुष के हाथ नहीं लग जाएगा। वे रुपया लेकर करेंगी क्या? इतनी शिक्षा नहीं, इतना ज्ञान नहीं कि वे पुरुषों की यथा समय सहायता करें, या सुझावें कि किस प्रकार धन का उपयोग किया जाना चाहिये, अपने लिये कुछ खरीद सकती ही नहीं, फिर पिता का दिया हुआ रुपया ही, कभी कभी उनके लिये भार हो जाता है।
किन्तु सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि पिता का रुपया न देना, उनके जीवन के लिये महान् कष्ट कर साबित होता है। गृह कलह और पति-पत्नी मत भेद का एक यह कारण भी तो है कि एक वधू घर से रुपये और गहने नहीं लायी। स्त्रियों को कुछ समय पहले यह भ्रान्ति थी कि उनके भाई पढ़ लिख कर इस प्रथा को दूर करेंगे। किन्तु नयी रोशनी के साथ साथ दहेज माँगने की नयी-नयी तरकीबें सोच निकाली गयीं।
स्त्री -समाज को दहेज की प्रथा से जो कष्ट मिलते हैं, वे तो मिलते ही हैं, पर स्वयं पुरुष इसे अच्छी तरह भुगतता है। इस लालच के कारण उसे प्रायः अनुकूल संगिनी नहीं मिलती और सदा के लिये थोड़े से रुपयों में वह अपना सारा जीवन, शाँति और सुख बेच डालता है। धन सब वस्तुएं नहीं ला सकता। स्वार्थान्धता तो इतनी तीव्र है कि अपनी बहिन के लिये वे उतना दहेज नहीं दे सकते और तब इस प्रथा की घोर-निन्दा की जाती है, किन्तु अपने आप पर उसे लागू नहीं कर सकते यह अनुमान नहीं वरन् इसके जीते जागते उदाहरण वे स्वयं मौजूद हैं।
कितनी ही योग्य बहिनें इस कुप्रथा के कारण कौमार्य जीवन व्यतीत कर जाती हैं। किसी का विवाह वृद्ध से हो गया और उन्होंने सदा के लिये वैधव्य स्वीकार कर लिया और भी कितनी बुराइयाँ इससे उत्पन्न होती हैं, यह तो सभी मानते हैं। उन्हें दोहराना अपने हृदय को कष्ट देना है।
दहेज की घातक प्रथा ने हिन्दु समाज में कुहराम मचा रखा है। न मालूम हिन्दु-समाज की कितनी भोली-भाली युवतियों को इस निरंकुश प्रथा की बलिवेदी पर बलिदान होना पड़ता है। फिर भी, समाज का पत्थर का दिल नहीं पसीजता। आखिर दहेज के नाम पर ऊँची- ऊँची रकम पा जाने से क्या कोई परिवार धनी हो जाता है? दहेज के लिये लड़की के परिवार को बर्बाद करने में क्या कोई वर-पक्ष दौलतमन्द या खुशहाल हो सकता है? अगर किसी परिवार को बर्बाद करने से ही खुशहाली नसीब होती हो तब तो अभी तक के नीति-शास्त्र की परिभाषा शायद गलत रही है।
इस दहेज के ही सम्बन्ध में थोड़े दिन हुए उज्जैन में एक बड़ी ही रोमाँचकारी घटना हुई थी। स्वर्गीय प्रिंसिपल ताटके की लड़की विवाह योग्य हो गई थी, उम्र 17 वर्ष की थी-बिलकुल तरुणी! लेकिन जहाँ उसके विवाह की बात चल रही थी वहाँ वे लोग दहेज में इतनी बड़ी रकम तलब कर रहे थे जिसे देने में कन्या पक्ष कतई असमर्थ था। किन्तु, वर पक्ष को लड़की के परिवार की स्थिति पर कुछ भी रहम न आया और वे अपनी माँग पर अड़े ही रहे। कन्या के सम्बन्धी हैरान और परेशान थे। वे कहाँ से इतनी बड़ी रकम लाते कि उसे देकर अपनी लड़की की शादी करते। परिवार में गमी छायी हुई थी। लड़की पढ़ी लिखी थी। उसने अपने दिल में महसूस किया कि वही अपने परिवार के दुख का कारण हो रही है। अगर वह न होती तो उसके परिवार को इतनी बड़ी परेशानी का शिकार न बनना पड़ता। उसने आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया और आखिरकार अपनी साड़ी पर तेल डाल कर दियासलाई छुआ दी। अग्नि की लपटों में जल कर उसने बेरहम समाज के चंगुल में पड़ने से अपने को बचा लिया और अपने परिवार को आर्थिक कष्टों से बचा लिया। हिन्दु समाज की निरंकुशता पर, वही सती आज स्वर्ग में बैठी अट्टहास कर रही है।
(डॉक्टर लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम.ए. साहित्य-रत्न, एम.डी.)
प्राचीन समय में हमारे पूर्वज फल तथा शाकों का अधिक प्रयोग कर के स्वस्थ और दीर्घायु होते थे। आजकल भी योगी और महात्मा पर्वत की कन्दराओं में निवास करके फल, कंद, मूल तथा शाक भाजी पर ही निर्वाह करके दीर्घायु तथा स्वस्थ रहते हुए आध्यात्मिक उन्नति करते हैं। साधारण गृहस्थ भी फलों का प्रयोग करके स्वस्थ निरोग, और दीर्घायु हो सकते हैं। क्योंकि फल पेट को साफ करते, खून को साफ करते तथा शरीर बनाने का काम करते हैं। यह खाने में स्वादिष्ट तथा शीघ्र पचने वाले होते हैं। विटामिन और प्राकृतिक लवणों की तो यह खान हैं। यों तो अनाज वर्ग, दूध वर्ग आदि में भी विटामिन और लवण होते हैं पर फलों में यह प्रचुर परिमाण में होते हैं। यह आमाशय की बढ़ी हुई खटाई को मारते, गुर्दे के मल को साफ करते तथा जिगर को शुद्ध करते हैं। फलों के फुजले से कब्ज दूर होता है। प्रतिदिन एक नियमित मात्रा में फल खाने से बड़ा लाभ होता है। नारंगी, नींबू, टमाटर, आदि खट्टे फल आमाशय में पहुँचते ही क्षार बन जाते हैं। मुँह में जाते ही बहुत कुछ पच जाते हैं और लार से मिलते ही इनके रस की शर्करा बन जाती है।
फलों के सम्बन्ध में कुछ जानने योग्य बातें यह हैं कि फलों के रस को यदि रखा जाय तो शीघ्र खराब होगा या फल काट कर रखा जाय तो खराब होगा, अतः रस तुरन्त पी लेना चाहिये, तथा काट कर तुरन्त खा लेना चाहिये। फल नये कोषाणु बनाते तथा एकत्रित खनिज पदार्थों को जो रोगों तथा वृद्धावस्था के कारण हो जाते हैं उसे धो डालते हैं। हो सके तो एक दिन एक ही फल खाएं और दूसरे दिन दूसरा फल। भोजन के एक दो घंटे पहिले भी फल खाएं और भोजन के साथ भी। मौसमी फल अवश्य खाएं क्योंकि इसमें उस ऋतु में उत्पन्न होने वाले रोगों का शमन करने की शक्ति होती है। फलाहार से आयु बढ़ती तथा चरबी छँटती और मोटापा कम होता है। यदि रक्त शोधन कराना हो तो अकेले फल खाएं-भोजन के साथ न खाएं। जैसे प्रातः केवल फल खाएं। केवल फलाहार ही, बिन किसी विशेषज्ञ की सलाह के न करें क्योंकि प्रायः आजकल के मनुष्यों का रुधिर और शरीर अशुद्ध और मल-भार से पूर्ण होता है और फल रुधिर की सफाई बहुत शीघ्रता से करते हैं। अतः प्रत्येक पर इसकी प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न रूप में होती है।
फलों में निर्वाह के लिए सब आवश्यक तत्व हैं जो फल कृत्रिम रूप से पकाये, सड़ाये, या सुखाये जाते हैं उनके उपयोग से अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। स्वाभाविक रूप से प्रकृति द्वारा पकाये फलों का उपयोग भी लाभदायक होता है। अच्छा हो चाकू का प्रयोग न हो। फल दाँतों से ही काटे जाएं। गन्दे, कच्चे, सड़े हुये, बासी फल हानिप्रद होते हैं। बहुत दिन के रखे हुए फल भी अपना प्रभाव खो बैठते हैं। फल स्नायु-रोगियों तथा चर्म रोगियों को तो विशेष हितकर होता है। यह विष बाहर निकाल देते हैं। नासूर, कैन्सर, मूत्राशय सम्बन्धी रोग, अम्ल-पित्त, सिर-दर्द के दौरे, टाइफ़ाइड कीटाणुओं द्वारा उत्पन्न रोग आदि में फल बड़े लाभप्रद हैं। फलों के रस की 6 से 7 छटाँक तक की मात्रा जिसमें जल न मिला हो प्रत्येक मनुष्य के लिये पर्याप्त है। वैसे ही आधे पाव सूखी मेवा 3 छटाँक सूखे फल, एक या डेढ़ सेर मौसमी ताजे फल एक मनुष्य के लिए बिलकुल पर्याप्त होते हैं। ग्रीष्म ऋतु में ताजे फल अधिक बढ़ावे और शरद ऋतु में सूखी मेवा अधिक और ताजे फल कम किये जा सकते हैं। फलों में पानी बहुत मात्रा में होता है। केवल फलाहार करने वाले को या तो पानी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती या बहुत कम प्यास लगती है। मनुष्य यदि पका भोजन और नमक छोड़ दे तो उसे प्रायः प्यास लगे ही नहीं। प्यास तो अप्राकृतिक भोजनों तथा मसालेदार भोजनों से ही लगती है।
यदि पाचन खराब हो तो भोजन के साथ फल न खाकर कुछ समय पूर्व ही खाना चाहिए। एक विशेष याद रखने की बात यह है फलों में ठीक छिलके के नीचे, या ठीक बीजों के पास फलों का सत्व रहता है अतः फल छिलके समेत खायें। दूसरी बात यह है कि प्रायः फलों के बीजों में फलों के विपरीत गुण होते हैं। उदाहरण के लिये यदि किसी पदार्थ के उपभोग से अजीर्ण हो गया हो या हानि हुई हो तो उसके विपरीत वाला अवयव यदि दिया जाय तो अजीर्ण नष्ट हो जायगा जैसे खरबूजे का अजीर्ण खरबूजे के बीज, और खरबूजे के बीज का अजीर्ण, खरबूजे से दूर होता है। इस प्रकार प्रकृति ने प्रत्येक पदार्थ की दवा भी उसके पास ही रख दी है। तीसरे यह कि उबालने से फलों के रासायनिक गुण कम तो अवश्य हो जाते हैं पर उनमें विपरीत गुण नहीं आते।
कुछ फुटकर बातें।
1-केला खाली पेट कभी न खाएं। अधिक न खाएं। भारी होता है।
2-खीरे दो से अधिक न खाए। यह पुरुषत्व नाशक होता है तथा पथरी हो सकती है। खीरा, ककड़ी खा कर पानी पीने से हैजा तक हो सकता है।
3-बासी पेट नीबू का रस पीने से पेट, नेत्र, पथरी और निर्बलता में बड़ा लाभ होता है। अधिक प्रयोग से दिल कमजोर होता तथा दाँत की चमक जाती है।
4-आम के ऊपर दूध पीयें तो वीर्य-वर्धक है। आम का कल्प होता है।
5-निराहार अमरूद खाएं। अजीर्ण के रोगी भोजन उपरान्त खायें। साबुत बीज पेट में जाने से एपेनडी-साइटिस का डर रहता है।
6-कच्चे बेर खाने से हैजा होता है। बेर भी अधिक न खाएं। पके बेर यदि 12 घंटे पानी में भिगोकर उसका पानी पियें और बेर खाएं तो दूध सा लाभ हो।
7-मूली पर गुड़ खाने से लाभ होता है।
8-खरबूजे के ऊपर दूध पीने से हैजा हो सकता है पर शरबत पीने से उसके दोष नाश होते हैं।
9-पके कटहल के कोए के ऊपर पान खाने से विष का प्रभाव होता है। और पका कटहल क्षय नाशक है।
10-चिलगोजा अत्यन्त कफ वर्धक होता है।
11-कच्चा सिंघाड़ा पसीने के सब रोग नष्ट करता है।
12-कमरख को, दूध, अंगूर, मुनक्का, गूजर आदि के साथ नहीं खाना चाहिये।
13-कसेरु रक्त-पित्त नाशक है, रक्त के विकारों को दूर करता है।
14-पान का डंठल तथा बीच की नस विष तुल्य होती है।
15-खजूर के ऊपर मट्ठा पीने से उसकी गर्मी का शमन होता है।
शाकाहार।
जो कुछ फलों के विषय में कहा जा चुका है, बहुत कुछ वह शाकों के बारे में भी लागू होता है। खीरा, ककड़ी, गाजर, मूली, पालक, गोभी, करमकल्ला, सलाद आदि अनेक शाक, तरकारियाँ कच्ची भी खाई जाती हैं। इन्हें कच्ची ही खाना चाहिये। पकाने से इनके विटामिन नष्ट हो जाते हैं या बहुत कम हो जाते हैं। अर्थात् अपनी बहुत कुछ शक्ति खो बैठते हैं। प्राकृतिक लवण भी इनके या तो उड़ जाते हैं या पानी में आ जाते हैं। यदि तरकारियाँ पकाई ही जाएं तो वह भूनी और तली न जाएं। उन्हें केवल उबाल लें। एक बात का विशेष ध्यान रखे और वह यह कि तरकारियाँ हल्की आँच में और भाप में उबालें। चूल्हे पर चढ़ा कर बर्तन इस प्रकार तश्तरी-कटोरी आदि से ढक दिया जाय कि उसकी भाप न निकलने पावे, अन्यथा भाप के साथ लवण भी बहुत कुछ उड़ जायेंगे शाक, तरकारियों में बहुत मसाला आदि न डाला जाय अन्यथा उसका प्राकृतिक स्वाद नष्ट हो जाता है। शाक या तरकारी जिस पानी में उबाला जाय वह पानी फेंक न दिया जाय क्योंकि प्राकृतिक लवण तो उसी में आ जाते हैं और वह पानी ही तो मुख्य और महत्वपूर्ण वस्तु है। जिन तरकारियों के छिलके मोटे न हों तथा जो प्राकृतिक रूप में चिपके हों। जैसे परवल, तोरई, बैंगन आदि। उनके छिलके न काटे जायं। जिन तरकारियों के छिलके अलग किये ही जाएं वह बहुत ही सँभाल कर अलग किया जाएं क्योंकि बताया जा चुका है कि छिलके के ठीक नीचे ही उनका प्रमुख तत्व होता है। उदाहरणार्थ यदि आलू उबाला ही जाय तो हल्के से उसका छिलका अलग करके फेंक दिया जाय। यदि कच्चे आलू ही का छिलका चाकू से छीला जायेगा तो छिलके के नीचे वाले लवण और विटामिन बहुत कुछ व्यर्थ फिक जाएंगे।
कुछ तरकारियाँ जैसे लौकी, तोरई आदि कच्ची भी खाई जा सकती हैं किन्तु जिनके मेदे कमजोर हैं उन्हें कच्ची तरकारियाँ हजम करना संभव नहीं अतः उबाली हुई तरकारियाँ खाना ही उचित है। कुछ तरकारियाँ तो कच्ची खाना ही नहीं चाहिये। उनका हजम करना आजकल के मनुष्य का काम नहीं। जैसे आलू में स्टार्च इतना अधिक होता है जितने की आवश्यकता मनुष्य को नहीं। आलू उबालने से बहुत कुछ उसका स्टार्च जल जाता है और जितना शेष रहता है उतना मनुष्य के लिये आवश्यक और उपयोगी है।
अच्छा हो तरकारियों में नमक डाले ही नहीं और यदि डालें भी तो बहुत हल्का। तरकारियाँ और शाक बहुत शीघ्र पच तो जाते ही हैं, विटामिन और प्राकृतिक लवणों की खान भी हैं, उनके फुजले भी बड़े लाभ के होते हैं। आँतों की सफाई करने, मल बाँध कर पैखाना निकालने में वह बड़े सहायक सिद्ध होते हैं।
कुछ भारी बादी तरकारियाँ जैसे हरा कद्दू, घुइयाँ आदि का नित्य प्रयोग अस्वस्थ तथा निर्बल मनुष्य के लिये उचित नहीं। इनका प्रयोग न करे या नहीं के बराबर करें।
भोजन में तरकारी शाक का प्रयोग प्रचुर मात्रा में करना चाहिए। तरकारी-शाक का उपयोग केवल इसी दृष्टिकोण से नहीं करना चाहिये कि उनके साथ से भोजन स्वादिष्ट और रुचिकर हो जाता है वरन् इस दृष्टिकोण से भी करना चाहिए कि स्वास्थ्य रक्षा के लिये उनकी अवहेलना असंभव है। उनका कम मात्रा में प्रयोग हानिप्रद सिद्ध हो सकता है।
हो सकता है, निर्धन मनुष्य फल न खा सकें। किन्तु मौसमी सस्ते फल बेर, रसभरी, जामुन, आम, खरबूजा, अमरूद, फालसा, शहतूत, आदि तो अंगूर, अनार, सेब, संतरा, मौसम्बी आदि की अपेक्षा सस्ते भी होते हैं। अतः इनका प्रयोग सर्वसाधारण कर सकते हैं। जिनको अर्थाभाव के कारण यह भी संभव न हो वह शाक-तरकारी का तो प्रयोग कर ही सकते हैं। मौसमी शाक-तरकारियाँ तो काफी सस्ती हो जाती हैं। यदि मनुष्य यह भी न कर सके या न करना चाहे तो उसका केवल ईश्वर ही रक्षक है।
मनुष्य के शरीर में अप्राकृतिक जीवन बिताने, जीभ के बस में होने, गलत रहन-सहन, अनुचित आहार-विहार आदि के कारण विजातीय पदार्थों मलों तथा एक प्रकार के श्लेष्मा का जमाव हो जाता है और इस श्लेष्मा का अस्तित्व और अधिकता ही रोगों की जड़ होती है। फल और शाक तरकारियों के खाने से यह श्लेष्मा (म्यूकस) बनना ही बंद नहीं हो जाता, वरन् पहले के एकत्रित विष म्यूकस और शरीर के अंदर मौजूद अवांछनीय पदार्थ भी निकलने लगते हैं। अतः फलों और शाक भाजी के महत्व और उपयोग पर जितना अधिक जोर दिया जाए कम है। यदि हम अनुचित समय में भोजन, अनुचित मात्रा में भोजन, अनुचित भोजनों के संमिश्रण और अवांछनीय खाद्य पदार्थों से अपने को नहीं रोक सकते तो फल और शाक-तरकारियों का भी साथ-साथ उपयोग जारी रखने पर बहुत कुछ अपनी गलतियों और उसके परिणामों में कमी कर सकते हैं।
प्रेमपूर्ण व्यवहार संसार का प्रत्यक्ष अमृतरस है। जिससे प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जायेगा वह अवश्य ही प्रेमपूर्ण व्यवहार करेगा।
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धैर्य और सहिष्णुता दो महान गुण हैं। जिनके पास इनकी प्रचुरता है उसको और चाहिये ही क्या?
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अपने ही सदृश दूसरों को भी समझना चाहिये किसी को अपने से छोटा गिनना, उसकी भावनाओं का आदर न करना, अमानवोचित है।
(श्री अगर चन्द जी नाहटा, बीकानेर)
नारी शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि की जननी है। भूमि के बिना बीज की कोई उपयोगिता नहीं, इसी प्रकार पुरुष रूप बीज नारी रूप भूमि के बिना व्यर्थ सा है। फल प्राप्ति के लिए दोनों का सबल, स्वस्थ, एवं समान योग्य होना नितान्त आवश्यक है। परन्तु आज के भारतीय पुरुष-समाज के साथ नारी की तुलना करने पर वह जोड़ी समान प्रतीत नहीं होती। इसका कारण वर्षों से पुरुषों का समाज में अत्यधिक महत्व रहा है, इससे नारी अपेक्षित नहीं, यही प्रतीत होता है। नारी में शक्ति की कमी नहीं, परन्तु वह पराश्रित रहने के कारण अपना वास्तविक गौरव भुलाये बैठी है। इसी को पुनः जागृत करने की परमावश्यकता है।
त्यागी महात्माओं की बात जाने दीजिए पर साधारण गृहस्थ समाज में, सुखी जीवन-यापन में नारी का बड़ा भारी हाथ रहता है। योग्य-नारी के आगमन से घर चमक उठता है। और अयोग्य-नारी के उपस्थित होने पर वह कलह एवं अशान्ति का अखाड़ा बन जाता है। साधारणतः प्रत्येक स्त्री पुरुष की योग्यता एवं विचारों में तारतम्य रहता ही है। पर वह इतना अधिक हो जाय कि बात-बात में एक दूसरे से अनबन बढ़ने लगे तो उस घर को लड़ाई का मैदान की समझना चाहिए। बहुत बार यह अनुभव हुआ है कि आज के वातावरण में पला हुआ युवक चाहता है कि स्त्री नवीन सभ्यता के ढाँचे में ढल जाए, पर पत्नी वैसे वातावरण में न पलने व शिक्षित न होने के कारण उस बात को पसन्द नहीं करती। अतः परस्पर में अनबन रहती है। कई व्यक्ति स्त्रियों के साथ जबरदस्ती भी करते हैं। उससे जबरन मनचाहा कार्य करवाया जाता है। करना तो उसे पड़ता ही है, पर उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। मन दुर्बल हो जाता है। आशाएँ और उत्साह विलीन हो जाते हैं। अतः दोनों के विचारों में साधारणतः समानता होनी जरूरी है। अन्यथा सारा जीवन क्लेश दायक और भार रूप हो जाता है। इसके लिए नारी जाति में शिक्षा के प्रचार की बहुत आवश्यकता है। जिससे वह स्वयं अपना भला बुरा सोच समझ सके और कर्तव्य निर्धारण कर सके।
शिक्षा की उपयोगिता जीवन के प्रत्येक पल में होने पर भी वर्तमान शिक्षा में सुधार की आवश्यकता प्रतीत होती है। आज की शिक्षित कन्याएं बड़ी फैशन प्रिय हो गई हैं अतः खर्च बहुत बढ़ जाता है वे घर वालों के प्रति अपना कर्तव्य भी बिसार देती हैं अतः जिस शिक्षा से वह सुगृहिणी बनें उसी की आवश्यकता है।
वर्तमान में हमारी मातृ-जाति बड़ी हीन दशा में देखी जाती है। इधर देश के बंटवारे और साम्प्रदायिकता के नग्न नृत्य से नारी जाति को जो महान यातनाएं भुगतनी पड़ी व पड़ रही हैं। उससे शिक्षा लेकर उसे शिक्षित एवं सबल बनाना परमावश्यक हो गया है। नारी की आशा तथा अवलम्बन सब पुरुषों पर ही निर्भर है। अतः हमारा कर्तव्य है कि उसके उत्थान में पूरा सहयोग देकर सही अर्धांगिनी होने की अधिकारिणी बनाएं। अन्याय और अत्याचार को रोक कर उसे समान स्थान दें। नारी जाति मातृ-स्थानीया होने से पूज्य है इसे कभी न भूलें, उसका उचित आदर करें।
साधारणतया हमारे यहाँ कन्या का जन्म पिता के लिये बड़ा दुखद समझा जाता है क्योंकि वह पराया घर बसाती है। उसके लिये वर ढूंढ़ने व विवाह करने में एवं उसे दहेज देने में बड़ा अर्थ व्यय करना पड़ता है। वास्तव में दहेज प्रथा समाज के लिए अभिशाप बन चुकी है। बिना वर के पिता को राजी किये कन्या का विवाह करना कठिन हो गया है अतः वर्तमान समाज व्यवस्था में सुधार करना परमावश्यक है। उसके पराये घर बसाने की बात कह कर अनादर करना सर्वदा अविचार पूर्ण है क्योंकि हमारे घर में पुत्र-वधु आती है वह पराये घर से आने पर भी हमारा घर बसाती है यह तो बराबरी का सौदा है। विधवा बहिनों के प्रति तो हमें अधिक सहानुभूति रखना चाहिए एवं उन्हें समाज सेवा के योग्य बनाने का प्रयत्न करना चाहिये वे चाहें तो समाज का बड़ा कल्याण कर सकती हैं।
हमारे बच्चों के भविष्य निर्माण में मातृ जाति का प्रधान हाथ रहता है इस दृष्टि से भी उनको योग्य बनाना हमारे समाज एवं देश को उन्नत बनाना है। बाल्यकाल के संस्कार माता द्वारा पड़ते हैं और जन्म भर उनका प्रभाव हमारे जीवन में रहता है अतः यदि संस्कारदात्री को ही विचार शील बना लिया जाय तो मूल के सुदृढ़ हो जाने पर फल फूल रूप हमारे बच्चों का जो कि भावी राष्ट्र के कर्णधार हैं आदर्श पुरुष होना अवश्यंभावी है। आशा है पुरुष समाज अपने ही हित का दीर्घ-दृष्टि से विचार कर नारी के उत्थान में पूर्ण सहयोग देगा।
(पवित्र “बाइबिल” से)
-तू परमेश्वर और अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे जीव और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम कर। --मत्ती 22
-खून न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, ठगाई न करना, और अपने पिता और माता का आदर करना और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना। --मत्ती 19
-धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं। उन पर दया की जायगी।
--मत्ती 5
-जो कोई अपने भाई पर क्रोध करे, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा, और जो कोई अपने भाई से कहे-अरे निकम्मा, वह सभा में दण्ड के योग्य होगा। जो कोई कहे अरे-मूर्ख! वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा। यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए और वहाँ स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर कुछ विरोध है तो अपनी भेंट वेदी के सामने छोड़ कर चला आ, पहले अपने भाई से मेल कर, तब आकर अपनी भेंट चढ़ा। --मत्ती 5
-कहा गया था कि आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत, पर मैं तुमसे कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना, जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे उसकी ओर दूसरा भी फेर दे। जो तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे उसे दोहर भी लेने दे। जो कोई तुझे कोस भर बेगार ले जाना चाहे उसके साथ दो कोस चला जा। --लूका 17
-यदि तेरा भाई अपराध करे तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा, वह यदि न सुने तो और एक दो जन को अपने साथ ले जा, यदि वह उनकी भी न माने तो मंडली से कह दे, यदि वह मंडली की भी माने तो उसे अन्य जाति और महसूल लेने वाले के जैसा जान। मैं तुम से सच कहता हूँ जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बंधेगा और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे वह स्वर्ग पर खुलेगा।
--मत्ती 18
-अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, जो तुम से बैर करें उनका भला करो, जो तुम्हें शाप दें उनको आशीष दो और जो तुम्हारा अपमान करें उनके लिये प्रार्थना करो। जो तेरे एक गाल पर मारे उसकी ओर दूसरा भी कर दे, और जो तेरी दोहर छीन ले उसको कुर्ता लेने से भी न रोको। --लूका 3
-यदि तुम प्रेम रखने वालों के साथ प्रेम रखो तो तुम्हारी क्या बड़ाई? क्योंकि पापी भी अपने प्रेम रखने वालों के साथ प्रेम रखते हैं। --लूका 3
-तुमने सुना है कि, कहा था कि व्यभिचार न करना, पर मैं तुम से कहता हूँ कि जो कोई बुरे मन से किसी स्त्री को देखे वह अपने मन में व्यभिचार कर चुका। यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाये तो उसे निकाल कर फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यह भला है कि तेरा एक अंग नाश हो, तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाये तो उसे काट कर फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यह भला है कि तेरा एक अंग नाश हो और तेरा सारा शरीर नरक में न जाय। --मत्ती 5
-यह भी कहा गया था कि जो कोई अपनी पत्नी को त्यागे वह उसे त्याग-पत्र दे, पर मैं तुमसे कहता हूँ कि जो कोई व्यभिचार को छोड़ और किसी कारण से अपनी पत्नी को त्यागे वह उससे व्यभिचार कराता है। --मत्ती 19
-मनुष्य अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक तन होंगे। सो वे अब दो नहीं एक तन हैं, इसलिए जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।
--मत्ती 19
-अपने लिये पृथ्वी पर धन बटोर कर न रखो, जहाँ कूड़ा और काई बिगाड़ते हैं और जहाँ चोर चुराते हैं। पर अपने लिये स्वर्ग में धन बटोर कर रखो, जहाँ न कीड़ा न काई बिगाड़ते हैं और न जहाँ चोर चुराते हैं, क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा।
-तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते। --मत्ती 5
-न सोना न रूपा न ताँबा रखना। मार्ग के लिये न झोली रक्खो न दो कुर्ते न जूते न लाठी लो, क्योंकि मजदूर के लिये अपना भोजन मिलना चाहिये।
-परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सुई की नोंक में से निकल जाना सहज है।
--मत्ती 10
-धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन है। फिर तुमसे कहता हूँ कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सुई के छेद से निकल जाना सहज है। --मत्ति 19
-धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं क्योंकि वे तृप्त किये जायेंगे। --मत्ती 5
-माँगो तो तुम्हें दिया जायगा, ढूंढ़ो तो तुम पाओगे, खटखटाओ तो तुम्हारे लिये खोला जायगा।
--मत्ती 7
-धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे। --मत्ती 5
-जो मुँह में जाता है वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुँह से निकलता है वही मनुष्य को अशुद्ध करता है। जो कुछ मुँह में जाता है वह पेट में पड़ता है और सन्डास में निकल जाता है, पर जो कुछ मुँह से निकलता है वह मन से निकलता है और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है, क्योंकि कुचिन्ता, खून, पर-स्त्री-गमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही, और निन्दा मन से ही निकलती है यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, पर बिना हाथ धोये भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता। --मत्ती 15
-मैं तुम से सच कहता हूँ यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो, तो इस पहाड़ से कह सकोगे कि यहाँ से सरका कर वहाँ चला जा और वह चला जायेगा। --मत्ती 17
-धन्य हैं वे जो नम्र हैं, वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।
--मत्ती 5
संसार में सब से अधिक प्रेम संबंध का अद्वितीय उदाहरण माता है। माता अपने बालक को जितना प्रेम करती है उतना और कोई सम्बन्धी नहीं कर सकता। यौवन के उफान काल में पति पत्नी में भी अधिक प्रेम देखा जाता है पर वह वास्तविक दृष्टि से माता के प्रेम की तुलना में बहुत ही हल्का और उथला बैठता है। पति-पत्नी का प्रेम, आदान प्रदान, एक दूसरे के मनः संतोष एवं प्रति फल के ऊपर निर्भर रहता है। उसमें कमी या विघ्न हो तो वह प्रेम विरोध के रूप में परिवर्तित हो जाता है परन्तु माता का प्रेम अतीव सात्विक और उच्च कोटि का होता है। बालक से प्रतिफल मिलना तो दूर रहा उलटे अनेक कष्ट होते हैं। इस पर भी वह वात्सल्य की, परम सात्विक प्रेम की, अमृतधारा बालक को पिलाती रहती है। कुपुत्र होने पर भी माता की भावनाएं घटती नहीं।
श्रीमद्भागवत में वर्णन आता है कि कंस की सभा में जब श्रीकृष्ण जी पधारे तो सभासदों ने अपनी-2 भावनाओं के अनुरूप उन्हें देखा। रामायण में वर्णन है कि सिया-स्वयंवर के समय उपस्थित जन समुदाय राम को साक्षात् वैसा ही देखते थे जैसी कि उनकी भावना थी। ब्रह्म तत्व स्फटिक मणि के समान स्वच्छ निर्मल एवं निर्विकार है। अपनी-अपनी भावनाएं ही कंस सभा और सिया-स्वयंवर के सभासदों की भाँति भगवान में परिलक्षित होती है। दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखता है। कुएं में अपनी ही प्रतिध्वनि वापिस लौटती है। स्फटिक मणि के निकट जिस रंग की वस्तु रक्खी होगी उसी रंग की वह मणि दिखाई देने लगेगी। भगवान को हम माता, पिता, भ्राता, सखा आदि जिस किसी भाव से देखेंगे वे उसी भाव के अनुरूप हमारे लिए प्रतिध्वनित होंगे।
हम भगवान को प्रेम करते हैं और उनके अनन्य प्रेम का प्रतिदान करना चाहते हैं। माता के रूप में उन्हें भजना सबसे अधिक उपयुक्त एवं अनुकूल बैठता है। माता का जैसा वात्सल्य अपने बालक पर होता है वैसा ही प्रेम प्रति फल प्राप्त करने के लिए भगवान से मातृ-संबंध स्थापित करना आत्म-विद्या के, मनोवैज्ञानिक रहस्यों के आधार पर अधिक उपयोगी एवं लाभदायक सिद्ध होता है। कंस, भगवान को काल के रूप में देखता था उसे दिन रात सोते जागते उनका प्राण घाती शस्त्र पाणि महाभयंकर स्वरूप दिखाई पड़ता था। सूरदास के कृष्ण बाल गोपाल स्वरूप थे। हमारे लिये माता का सम्बन्ध अधिक स्नेह-मय हो सकता है। माता की गोदी में बालक या अपने को सबसे अधिक आनंदित सुरक्षित संतुष्ट अनुभव करता है। प्रभु को माता मानकर जगज्जननी वेदमाता गायत्री के रूप में उसकी उपासना करें तो उसकी प्रति क्रिया भगवान की ओर से भी वैसी ही वात्सल्य मय होगी जैसी कि माता की अपने बच्चे के प्रति होती है।
इसके अतिरिक्त एक वैज्ञानिक कारण यह भी है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है। पुरुष शरीर और मन में कुछ ऐसी कमियाँ हैं जो स्त्री से ही पूरी होती हैं। उन अभावों की पूर्ति के लिए विपरीत लिंग की ओर सदैव खिंचता रहता है। ध्यान करने में पुरुषाकृति रूप में मन की उतनी प्रवृत्ति नहीं होती जितनी कि स्त्री रूप में। गायत्री माता की उपासना में मन अपेक्षाकृत अधिक शान्त स्थिर एवं संलग्न रह सकता है इसलिए गायत्री का इष्ट शीघ्र सिद्ध होता है।
नारी शक्ति पुरुष के लिए सब प्रकार आदरणीय, पूजनीय, एवं पोषणीय है। पुत्री के रूप में, बहिन के रूप में, माता के रूप में वह स्नेह करने योग्य, मैत्री करने योग्य एवं गुरुवत पूजन करने योग्य है। पुरुष के शुष्क अन्तर में अमृत सिंचन यदि नारी द्वारा नहीं हो पाता तो वैज्ञानिक बतलाते हैं कि वह बड़ा रूखा, कर्कश, क्रूर, निराश, संकीर्ण एवं अविकसित रह जाता है। वर्षा से जैसे पृथ्वी का हृदय हर्षित होता है और उसकी प्रसन्नता हरियाली एवं पुण्य पल्लव के रूप में फूट पड़ती है। पुरुष भी नारी की स्नेह वर्षा से इसी प्रकार सिंचन प्राप्त करके अपनी शक्तियों का विकास करता है परन्तु एक भारी विघ्न इस मार्ग में बसने का है जो अमृत को विष बना देता है। दुराचार, कुदृष्टि, एवं वासना का संमिश्रण हो जाने से नर नारी के सान्निध्य से प्राप्त होने वाले अमृत फल, विष बीज बन जाते हैं। इसी बुराई के कारण स्त्री पुरुषों को अलग-अलग रहने के, सामाजिक नियम बनाये गये हैं। फल स्वरूप दोनों पक्षों को उन असाधारण लाभों से वंचित रहना पड़ता है जो नर नारी के पवित्र मिलन से, पुत्री बहन और माता के रूप में सामीप्य होने से, मिल सकते हैं।
इस विषय विकार की भावना का शमन करने के लिये गायत्री साधना परम उपयोगी है। विश्व नारी के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से अन्य इन्द्रियों का निग्रह मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है मातृ भक्त के हृदय में दुर्वासनाएं अधिक देर नहीं ठहर सकतीं।
श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी आदि कितने ही महापुरुष शक्ति उपासक थे शक्ति का धर्म भारत का प्रधान धर्म है। जन्म भूमि को हम भारत माता की, मातृ शक्ति की जय बोलते हैं और उसकी उपासना करते हैं। शिव से पहले शक्ति की पूजा है। लक्ष्मी नारायण, सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, आदि नामों में नारी को प्रथम और नर को गौण रखा गया है। माता का, पिता और गुरु से भी पहला स्थान है। इस प्रकार विश्व नारी के रूप में भगवान की पूजा करना नर पूजा की अपेक्षा अधिक उत्तम उपयोगी है। गायत्री उपासना की यही विशेषता है।
ब्रह्म निर्विकार है। इन्द्रियों से अतीत तथा बुद्धि से अगम्य है। उस तक सीधा पहुँचने का कोई मार्ग नहीं। नाम जप, रूप का ध्यान, प्रार्थना, तपस्या, साधना, चिन्तन, श्रवण, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण मायिक है। सतोगुणी माया, एवं चित् शक्ति के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है क्यों कि यह खुला रहस्य है कि, शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की ही पूजा की जाती है। पिता से सम्बन्ध होने का कारण माता है। इसलिए पिता से माता का दर्जा ऊँचा है समुद्र से जल ला लाकर मेघमालाएं ही वर्षा का आयोजन करती हैं। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का आस्वादन करने का सौभाग्य गायत्री माता द्वारा ही मानव प्राणी को प्राप्त होता है।
ब्रह्म की इच्छा, शक्ति, एवं क्रिया गायत्री है। उसी से उत्पत्ति, विकास एवं अवसान का आयोजन होता है। सुन्दरता, मधुरता, वीणा, सम्पत्ति, कीर्ति, आशा, प्रसन्नता, करुणा, मैत्री, आदि के रूप में यह महाशक्ति ही जीवन क्षेत्र को आनंदित एवं तरंगित करती रहती है। इस विश्वनारी की, महा-गायत्री की, महा माता की, आराधना करके हम अधिकाधिक आनंद की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
निःस्वार्थ सेवा अपना स्वयं पुरस्कार है। इसलिये सेवा निःस्वार्थ ही होनी चाहिये। यदि सेवा में स्वार्थ भावना का सन्निवेश हुआ तो वह सेवा ही न रही।
(लेखक-श्रीमधुकर शास्त्री, बी.ए.)
जनसंख्या की विगत रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतवर्ष के निवासियों की औसत आयु से अधिक नहीं है जब कि अन्य देशवासियों की आयु इससे कहीं अधिक है। हमारे देश में जो बच्चे पैदा होते हैं उनमें प्रति हजार दो सौ बच्चे तो तत्काल मर जाते हैं। यही हालत औरतों की है। जो महिलाएँ कम उम्र में गर्भाधान करतीं हैं वे असमय में ही काल कवलित हो जाती हैं। बहुत सी महिलाएं तो प्रसूति-गृह के बाहर भी नहीं हो पातीं और इसी बीच उनके जीवन की इतिश्री हो जाती है। खोज करने पर पता चला है कि मुस्लिम महिलाओं की अपेक्षा हिन्दू महिलाओं की असामयिक मृत्यु अधिक होती है। इसके दो कारण हैं। पहला कारण कम उम्र में शादी का होना और दूसरा कारण जो इसी कारण के अंतर्गत ही आ जाता है, कम उम्र में स्त्रियों का गर्भाधान करना है।
सर जान मेगा नामक अंग्रेज ने बहुत छानबीन के बाद बतलाया है कि भारत में एक हजार औरतों में सौ औरतें प्रसूतिकाल में बच्चा पैदा होने के पहले ही मर जाती हैं और दो लाख स्त्रियाँ प्रतिवर्ष बच्चा जनने के बाद मर जाती हैं। कुछ दिन पूर्व जेनेवा में भाषण करते हुए श्रीमती तरनी सिन्हा ने बतलाया था कि भारत की महिलायें अपने बच्चों को अफीम खिलाया करती हैं इस कारण एक हजार में 246 लड़के मौत के शिकार बन जाते हैं और जो शेष रह जाते हैं उनके अवयव अफीम खाने के कारण खराब हो जाते हैं। 57304 आदमी विक्षिप्त, 230895 लूले, 601370 बहरे और 147911 आदमी कुष्ठ रोग से पीड़ित हैं। सन् 1930 से लेकर सन् 1949 तक 77233 आदमी चेचक का शिकार हुए। 1338915 आदमी प्लेग से मरे। 227438 आदमी हैजे से मरे। 3898323 आदमी बुखार आने के कारण मर गये। इससे यह बात स्पष्ट हो गयी कि भारतवासियों के स्वास्थ्य की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है। हमारे देश की आबादी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है इसी कारण यहाँ अधिकाँश बच्चे अस्वस्थ पैदा होते हैं और जीवन भर वे रोगी ही बने रहते हैं। भले आदमियों की अपेक्षा उन लोगों की आबादी अधिक बढ़ रही है जिनके लिये भर पेट भोजनों की व्यवस्था होना भी कठिन है। फल यह हो रहा है कि भुखमरों की संख्या बढ़ रही है।
अब प्रश्न यह है कि बढ़ते हुए रोग को किस तरह से रोका जाए। किस उपाय का सहारा लेने से देश की वर्तमान स्थिति को सुधारा जा सकता है। अन्य देशों ने जिन उपायों के द्वारा अपने देश की आबादी को कम किया है यदि भारत में उन्हीं उपायों से काम लिया जाय तो बहुत लाभ हो सकता है। अन्य देशों में यदि कोई आदमी मृगी रोग से पीड़ित होता है तो देश की सरकार उसे विवाह करने की अनुमति नहीं देती, लेकिन भारत की दशा इसके सर्वदा विपरीत है। यहाँ सड़क पर भूखे पेट सो जाने वाले भिखारी भी विवाह करते हैं और वे एक नहीं दो दो चार चार सन्तानें पैदा करते हैं। मोण्टना प्रदेश में यह नियम है कि विवाह के पूर्व वर वधू की डाक्टरी परीक्षा होती है। जब डॉक्टर उन लोगों को पूर्ण स्वस्थ होने का प्रमाण पत्र दे देता है तब विवाह करने की आज्ञा दी जाती है। जर्मन इस सम्बन्ध में तनिक उदारता से काम लेता है वहाँ पर केवल उन लोगों के स्वास्थ्य की परीक्षा होती है जो कुष्ठ, मृगी या दूसरे प्रकार के किसी अन्य घातक रोग से पीड़ित होते हैं। हमारे देश के लिये यह बड़े दुःख की बात है कि यहाँ पर इस प्रकार के विवाह करने वालों पर किसी तरह का प्रतिबन्ध नहीं है।
लोग इस बात का कारण जानना चाहेंगे कि भारतवासी विवाह और सन्तान पैदा करने के लिये क्यों उत्सुक रहते हैं। इसका प्रधान कारण हिन्दुओं की यह धारणा है कि पुत्र के तर्पण किये बिना मृत व्यक्ति की आत्मा को शान्ति नहीं मिलती। मि. चाटलने ‘भारत में जन संख्या का प्रश्न’ नामक पुस्तक में लिखा है कि यदि किसी उच्च घराने की कोई लड़की अविवाहिता रह जाए तो भारतवासी उसे बहुत बुरा समझेंगे और लड़की के पिता की 3 पुश्त तक को इसका कुफल भोगना पड़ेगा। या तो वे जाति बहिष्कृत कर दिये जायेंगे या किसी अन्य रूप से समाज अपने क्रोध का बुखार उतारेगा।
ऐसे विवाह कदापि न होने देना चाहिए जिनके द्वारा विकृत सन्तानें पैदा होने की सम्भावना हो। यदि यह मालूम हो जाए कि कोई आदमी किसी ऐसे रोग से पीड़ित है कि विवाह के बाद यदि उसके सन्तान होगी तो सन्तान में रोग का अंश रहेगा तो ऐसे आदमी का विवाह हर्गिज न होने दिया जाए। यदि इस पद्धति का अनुसरण किया जाय तो थोड़े ही दिनों में भारत में स्वस्थ बच्चे पैदा होने लगें और बेकारी का प्रश्न भी बहुत कुछ मात्रा में हल हो जाए।
इन भ्रान्त विचारधाराओं का निवारण करके अविवाहित जीवन बिताने और अधिक आयु में विवाह करने को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य की उन्नति करनी है तो अधिक बच्चे पैदा करने को बुरा समझने की प्रवृत्ति पैदा करना आवश्यक है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका संसार में अनेक मनुष्यों से अनेक प्रकार से सम्बन्ध होता है। सम्बन्ध, स्नेह अथवा काम काज उपस्थित होने पर एक मनुष्य को प्रायः दूसरे के यहाँ मिलने के लिये जाना पड़ता है। कभी कभी किन्हीं परिचित व्यक्तियों के मध्य में अपरिचित व्यक्तियों से परिचय कराने का संयोग भी मिलता है। इसलिये मेल मुलाकात के समय शिष्टाचार बरतना मनुष्य की एक सामाजिक आवश्यकता है।
किसी से भेंट करने के लिये जाते समय आपको उसके सुभीते का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। बिना किसी अनिवार्य आवश्यकता के, दिन निकलते ही, भोजन के समय, ठीक दोपहरी में या अधिक रात गये, किसी के यहाँ न जाना चाहिये। किसी के घर बिना काम बार-बार जाना भी उचित नहीं है। यद्यपि घनिष्ठ मित्र एक दूसरे के यहाँ दिन में कई बार बिना संकोच जाते हैं। पर इस अवसर पर भी शिष्टाचार का ध्यान रखना पड़ता है। भेंट करते समय भेंट करने वाले के पद अथवा अवस्था के अनुसार उचित अभिवादन अवश्य करना चाहिये। बड़े मनुष्यों को छोटे के अभिवादन का उत्तर देते समय ठहरना चाहिए। अभिवादन करते समय कर्त्ता द्वारा जो शब्द प्रयोग किया जाये, बराबर वालों में उसका उत्तर उसी शब्द द्वारा दिया जाना चाहिए। बड़े लोगों की ओर से उत्तर में ‘प्रसन्न रहो’ आदि शब्द भी कहे जा सकते हैं। भेंट होने पर चुपचाप एक दूसरे का मुँह देखते रहना सभ्यता नहीं है। ऐसी अवस्था में तुरन्त कोई न कोई आवश्यक बात छेड़ देनी चाहिये।
किसी के यहाँ भेंट करने के लिये जाते हुये हमें उसके समय का भी अवश्य ध्यान रखना चाहिये। कार्यव्यस्त आदमियों के यहाँ समय की बड़ी कमी होती है इसलिये वहाँ बिना काम अधिक देर तक नहीं ठहरना चाहिये। जहाँ तक हो सके कम से कम समय में अपनी बात समाप्त करके उन्हें दूसरे कार्यों के लिये अग्रसर होने का अवसर देना चाहिये। यदि व्यक्ति बातचीत में उदासीनता शिथिलता या उकताहट दिखाये तो समझना चाहिये कि उसे अब अधिक बात करने का सुभीता नहीं है। इसलिये ऐसा संकेत पाकर वहाँ से जल्दी अपनी बात समाप्त करके चलने का उपक्रम करना चाहिये। चलते समय यदि आपसे कुछ देर और बैठने का आग्रह किया जाये तो उस अनुरोध को मान कर वहाँ कुछ देर और बैठा जाये फिर कुछ समय पश्चात आज्ञा लेकर वहाँ से चलना चाहिये। दिन में एक से अधिक बार भेंट होने पर हर बार मिलने पर अभिवादन किया जा सकता है जहाँ तक हो अभिवादन के पश्चात एक आध वाक्य द्वारा मिलने वाले कुशल मंगल पूछ लेना चाहिये।
पश्चिमी सभ्यता के अनुसार किसी के द्वार पर जाकर पुकारने के लिए साँकल खटखटाने या दरवाजा भड़काने का रिवाज है किन्तु हमारे यहाँ इस प्रकार की बात अच्छी नहीं लगती। किसी के दरवाजे पर जाकर बार-बार जोर जोर से पुकारने वाले को किसी के आने की प्रतीक्षा करनी चाहिये। मकान के अन्दर भेंट कर्त्ता को उसी कमरे में जाकर बैठना चाहिये जो इस कार्य के लिये नियुक्त हो। पुरुषों की अनुपस्थिति में किसी के घर जाकर बैठना सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है। जहाँ पर्दे का रिवाज न हो वहाँ अनुमति लेकर स्त्रियों की उपस्थिति में जाकर भी बैठा जा सकता है। घर में तभी प्रवेश करना चाहिये जब वहाँ घर का कोई न कोई सदस्य उपस्थित हो। किसी के घर में बैठ कर उसके कागज-पत्र, पुस्तकें या अन्य पदार्थों को उलट पुलट करके रखना या प्रत्येक वस्तु को घूर-घूर कर देखना सर्वथा अनुचित है।
किसी बड़े आदमी से मिलने को जाते समय आपको इस बात का पता लगा लेना चाहिये कि उसे किस समय आपसे मिलने का अवकाश है यदि पहले से मिलने का समय निर्धारित कर दिया जाये तो और अच्छा है। नियत समय पर जाकर पहले आपको अपने आने की सूचना चिट लिखकर या जबीनी किसी आदमी के द्वारा उस सज्जन के पास पहुँचा देनी चाहिये। बुलाये जाने पर उसके पास जाकर आपको उसकी अनुमति से उपयुक्त आसन ग्रहण करना चाहिये और संक्षेप में अपनी भेंट का तात्पर्य समझा देना चाहिये। कार्य हो जाने पर केवल थोड़ी देर बैठ कर पूर्वोक्त महानुभाव से आज्ञा लेकर चला आना उचित है।
जिस तरह किसी के यहाँ बार-बार जाना अनुचित है उसी तरह किसी के यहाँ कभी न जाना भी उचित नहीं है। किन्तु यदि आपको लगे कि आपके आने से गृह-स्वामी को खेद होता है तो वहाँ कभी नहीं जाना चाहिये। गोस्वामी जी ने कहा है।
“आवत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइये कंचन बरसे मेह॥”
किसी के साथ बाहर सड़क पर खड़े होकर घन्टों बातें करना उचित नहीं है। यदि आपको किसी लम्बे विषय पर आवश्यक बात करनी हो तो रास्ते में भेंट होने पर कुछ दूर साथ चल कर वह बात समाप्त की जा सकती है पर इस बात को ध्यान रखना चाहिये कि किसी को आपकी बात सुनने के लिये ही फर्लांगों और मीलों का चक्कर न काटना पड़े।
मुलाकाती के जाने के पूर्व भी आपको पान सुपाड़ी या इलाइची आदि द्वारा उसका आदर करना चाहिये और जिस समय वह जाने लगे तो उसकी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार खड़े होकर द्वार तक जाकर या 10-20 कदम साथ चल कर और उसे अभिवादन करके आदर-पूर्वक विदा देनी चाहिये। इस प्रकार शिष्टाचारों का ध्यान रखने से मनुष्य सभ्य कहलाने का अधिकारी बनता है।
जीवन को सुखी, सम्पन्न, सुव्यवस्थित और शान्तिमय बनाने वाली -
सस्ती, सुन्दर, उपयोगी और अनुभव पूर्ण पुस्तकें
बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें
(1) सूर्य चिकित्सा विज्ञान। (2) प्राण चिकित्सा विज्ञान। (3) स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या। (4) भोग में योग। (5) बुद्धि बढ़ाने के उपाय। (6) आसन और प्राणायाम। (7) तुलसी के अमृतोपम गुण। (8) महान जागरण। (9) तुम महान हो। (10) घरेलू चिकित्सा। (11) बिना औषधि के कायाकल्प। (12) पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण। (13) दीर्घ जीवन के रहस्य। (14) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा। (15) स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा। (16) दूध की आश्चर्यजनक शक्ति। (17) उन्नति का मूल मंत्र- ब्रह्मचर्य। (18) उपवास के चमत्कार। (19) स्त्री रोग चिकित्सा। (20) बाल रोग चिकित्सा।
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें
(1) मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार।
(2) धनवान बनने के गुप्त रहस्य। (3) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि। (4) मरने के बाद हमारा क्या होता है। (5) मित्र भाव बढ़ाने की कला। (6) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान। (7) संजीवनी विद्या। (8) अमृत पारस और कल्पना की प्राप्ति। (9) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं। (10) विचार करने की कला। (11) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं। (12) लेखन कला। (13) सफलता के तीन साधन। (14) शिखा और सूत्र की रहस्यमय विवेचना। (15) दैवी आपदायें। (16) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। (17) सौभाग्य बढ़ाने की कला। (18) प्रभावशाली व्यक्तित्व। (19) अमृतकरण। (20) प्रसिद्धि और समृद्धि।
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें
(1) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है।
(2) क्या धर्म? क्या अधर्म? (3) गहना कर्मण गति (4) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश। (5) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा। (6) शक्ति संचय के पथ पर। (7)आत्म गौरव की साधना। (8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। (9) आन्तरिक उल्लास का विकास। (10) आगे बढ़ने की तैयारी। (11) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन। (12) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन। (13) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग। (14) विवेक सतसई। (15) आध्यात्म शास्त्र। (16) आध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार। (17) वैज्ञानिक आध्यात्मवाद। (18) प्रेम का रहस्य। (19) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत। (20) यज्ञोपवीत द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें
(1) मैं क्या हूँ। (2) परकाया प्रवेश। (3) स्वर योग से दिव्य ज्ञान। (4) वशीकरण की सच्ची सिद्धि। (5)जीव जन्तुओं की मूक भाषा। (6) ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग। (7) यम नियम। (8) प्रत्याहार धारण ध्यान और समाधि। (9) मैस्मेरिज्म की अनुभव पूर्ण शिक्षा। (10) हस्तरेखा विज्ञान (11) गायत्री की चमत्कारी साधना। (12) गृहस्थ योग। (13) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार। (14) विचार संचालन विद्या। (15) सुखी वृद्धावस्था। (16) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग। (17)प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं। (18) योग के नाम पर मायाचार। (19) जादूगरी या छल। (20) सम्मोहन विज्ञान।
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पता-”अखण्ड ज्योति” प्रेस-मथुरा।
(श्री देवेन्द्र जी एम.ए.)
केवल एक बार मानव अन्तर में यह ज्वाला जलती है।
यों तो सुन्दर स्वर्ग धरा है, और स्वर्ग है अम्बर सारा।
सभी सुपरिचित प्रिय हैं। अपने, सकल विश्व परिवार हमारा॥
फिर भी स्नेह किसी का ही पा, अमित शून्य सा उर भर पाता।
सुन्दरता से भरे विश्व में, रूप एक ही मन को भाता॥
पल पल मचल उठा करते हैं। दीप दीप पर वे परवाने।
फूल फूल के मधु रस लोभी, सत्य साधना को क्या जाने॥
जो मानव के उर में पोषित त्याग और तप से पलती है।
केवल एक बार मानव अन्तर में यह ज्वाला जलती है॥
प्रेम वही है एक बार जो होकर शिथिल नहीं होता है।
देश काल की झंझा से जो, थक कर कभी नहीं सोता है॥
बार बार जलने वालों में प्रेम नहीं वासना प्रबल है।
प्रेम, वासना में न द्वन्द है, पर केवल वासना गरल है॥
जिसको पीकर दो प्राणों की ममता क्षय गलती है।
केवल एक बार मानव अन्तर में यह ज्वाला जलती है॥
माना परिवर्तन निश्चित है, संसृति का अनिवार्य नियम है।
एक बार जल कर जल जाना, भी तो परिवर्तन का क्रम है॥
बार बार जलना बुझना तो, पशुता, आडम्बर है, भ्रम है।
प्राणों का बंधन अविचल है, सत्य, शिवम् और सुन्दरतम है॥
जिसका रस, जिसकी सुन्दरता, नित नूतन होती चलती है।
केवल एक बार मानव अन्तर में यह ज्वाला जलती है॥
*समाप्त*