हजारों योग ग्रन्थों एवं सिद्ध पुरुषों के अनुभवों का निचोड़
गायत्री महाविज्ञान का तीसरा खण्ड छपकर तैयार हो गया। अध्यात्म विद्या एवं योग साधना के गुप्त रहस्य इस ग्रन्थ में भली प्रकार समझा दिये गये हैं। योग विद्या पर इतनों सर्वांग पूर्ण और प्रामाणिक पुस्तक अन्यत्र मिलना कठिन है। हजारों योग ग्रन्थों, एवं सिद्ध पुस्तकों के अनुभवों का निचोड़ इनमें भरा हुआ है। पुस्तक में दिये हुए विषयों का संक्षित परिचय नीचे जा रहा है, इससे पाठक पुस्तक की उपयोगिता को आसानी से समझ सकते हैं
1-गायत्री के पाँच मूर्खों का रहस्य, 2-गायत्री की दस भुजाओं का मर्म, 3-अत्र मय कोश का विस्तृत परिचय 4 अत्र मय कोश को सिद्ध करने का साधन विधान, 5-उपवासों के अनेक भेद और उद्देश्य, 6 आसनों का सूक्ष्म प्रभाव, 7-प्राण मय कोश का वर्णन, 8-प्राणशक्ति बढ़ाने का वैज्ञानिक मार्ग, 9-पाँच प्राण और उपप्राणों के कार्य, 10-प्राण संयम द्वारा दीर्घ जीवन, 11-अपान वायु पर जननेन्द्रिय का प्रभाव, 12-समान का पाचक क्रिया से सम्बन्ध, 13-उदान द्वारा गुप्त ज्ञान की सिद्धि, 14-व्यान द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति, 15- नाग, कर्म, कृकल, देवदत्त और धान जय उपप्राणों की महान शक्ति, 16-मूल बन्ध, जालन्धर बन्ध और उडियान बन्धों का रहस्य, 17-महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, विपरीत करेगी मुद्रा, योनि मुद्रा, शोभित मुद्रा आदि की प्रचण्ड प्राण शक्ति, 18-लोम-विलोम सूर्य भेदन, उज्जायी, शीत्कारी, शीतली मस्त्रिका, भ्रामरी आदि 9 प्राणायामों की विधियाँ, 19- मन को वश में करने वाले अभ्यास, 20- ध्यान करने की 10 साधनाएं, 21-त्राटक द्वारा मैस्मरेजम की वेधक दृष्टि प्राप्त करना, 22- रूप तन्मात्रा की साधना से अहश्य वस्तुओं का देखना
23-छाया पुरुष सिद्ध करने की विद्या? 24-रूप तन्मात्रा द्वारा अहश्य भोजनों की प्राप्ति, 25-स्पर्श तन्मात्रा द्वारा सहनशक्ति की वृद्धि, 26-सोऽहम् महामन्त्र का अजपा जाप, 27-आत्मदर्शन करने की साधना, 28-इड़ा पिंगला और सुषुम्ना की कार्य प्रणाली, 29- स्वर विद्या के रहस्य, 30-ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थियों के खोलने का मार्ग, 31-प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश, का विस्तृत परिचय और साधन। 32-सहज समाधि, 33-अनहदनोद और सुरत योग, 34- पक्षी करण विद्या, 35- तुरीयावस्था की स्थिति 36-गायत्री का भयंकर तन्त्र प्रहार, 37-मन्त्र दीक्षा का उद्देश्य, 38-अग्निदीक्षा का प्रयोजन, 39-ब्रह्म दीक्षा का रहस्य, 40-गायत्री मअरी 41-गायत्री का मन्त्रार्थ आदि अनेक आध्यात्मिक विषयों की विवेचना, वैज्ञानिक, प्रामाणिक और अनुभव पूर्ण आधार पर की गई है साथ ही साधना विधि ऐसी अच्छी तरह लिखी गई है जिसे पढ़कर सारी बातें भली प्रकार समझने आ जाती है।
352 पुष्ट, सफेद कागज पर छपी हुई, मोटे कार्ड बोर्ड के दुरंग कवर की इस पुस्तक का मूल्य 3॥ मात्र रखा गया है। गायत्री प्रेमियों के लिए यह पुस्तक अत्यन्त ही उपयोगी है।
हमारा प्रकाशित गायत्री साहित्य
1-गायत्री महाविज्ञान-प्रथम 2॥ )
2-गायत्री महाविज्ञान-द्वितीय भाग 3॥)
3-गायत्री महाविज्ञान-तृतीय भाग 4॥)
उपरोक्त ग्रन्थों का संक्षिप्त छोटा सैट
(1) गायत्री ही कामधेनु है।=), (2) गायत्री का वैज्ञानिक आचार।=), (3) वेद−शास्त्रों का निचोड़ गायत्री।=) (4) गायत्री को सर्व सुलभ साधनाएं (5-6) गायत्री के 14 रत्न (प्र॰भा॰।=), (7) अनादि गुरु मंत्र गायत्री (8) विपत्ति निवारण गायत्री।=), (9) सर्व शक्तिवान गायत्री =)
पता-”अखण्ड ज्योति “ प्रेस, मथुरा।
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
(श्री जगदम्बा प्रसाद जी त्यागी एम. ए.)
मै मानव हूँ जग का स्वामी सीमित मेरे अधिकार नहीं।
अमृत को विष, विष को अमृत
यदि चाहूँ तो कर सकता हूँ।
पलकों के शीतल जल तल में,
मैं प्रलय ज्वाल भर सकता हूँ॥
जो इस ज्वाला को झुलसा दे, ऐसा कोई अंगार नहीं॥ मैं मानव॰॥
मेरे मुसकाने से नभ के,
तारे मुसकाने लगते हैं।
मैं सोता हूँ रवि सोता है,
हम दोनों संग-संग जगते हैं॥
मेरी इस निराकार आत्मा के, सुख-दुःख भी साकार नहीं॥ मैं मानव॥
कर इड़ा पिंगला को जागृत,
मैं अजर-अमर हो जाता हूँ।
फिर ब्रह्मरन्ध्र के महा शून्य
मैं जब चाहूँ खो जाता हूँ॥
मैं उस पथ पर भी चल सकता, जिसका कोई आधार नहीं॥ मैं मानव॰॥
भुवर्नाशो लोके सकल विपदाँ वै निगदितः।
कृतंकार्यं कर्तव्यमिति मनस्या चास्य करणम्॥
फलाशामर्त्यो ये विदधति न वै कर्म निरताः।
लभन्ते नित्यं ते जगति हि प्रसादं सुमन साम्॥
अर्थ-संसार में समस्त दुःखों का नाश ही भुवः कहलाता है। कर्त्तव्य भावना से किया गया कार्य ही कर्म कहलाता है। परिणाम के सुख की अभिलाषा को छोड़कर जो कर्म करते हैं वह मनुष्य सदा प्रसन्न रहते हैं।
गायत्री का भुवः शब्द हमें कर्म-योग का संदेश देता है। क्योंकि इसी आधार पर समस्त प्रकार के दुःखों से छुटकारा पाया जा सकता है। मनुष्य नाना प्रकार की आशाएँ, तृष्णाएँ, लालसाएँ, कामनाएँ किया करता है। वे इतनी अनियन्त्रित और अवास्तविक होती हैं कि उनकी पूर्ति लगभग असम्भव रहती है। एक इच्छा की पूर्ति भी हो जाय तो वह तुरंत ही अपना रूप बढ़ाकर और बड़ी हो जाती है। इस प्रकार वह मनुष्य सदा अभाव-ग्रस्त दीन एवं इच्छुक ही बना रहता है। तृप्ति का आनन्द उससे दूर ही रहता है।
वस्तुओं और परिस्थितियों में सुख ढूंढ़ना एक प्रकार की मानसिक मृगतृष्णा है। शरद ऋतु में जब भूमि के क्षार फूल कर ऊपर आ जाते हैं तो प्यासा मृग उन्हें दूर से पानी समझता है पर पास जाने पर उसे अपने भ्रम का पता चलता है और अभीष्ट वस्तु न पाकर दुःखी तथा निराश होता है। फिर उसे दूसरी जगह ऐसा ही भ्रम जल दिखाई पड़ता है वहाँ भी दौड़ता और निराश होता है। इसी उलझन में पड़ा हुआ वह भारी कष्ट सहता रहता है। यही दशा तृष्णा ग्रस्त फल लोभी, मनुष्यों की होती है। यद्यपि उन्हें भगवान बहुत कुछ देता है पर उस प्रभु प्रसाद को प्राप्त करने के सौभाग्य से प्रसन्न होने का अवकाश ही नहीं मिलता, उधर ध्यान ही नहीं जाता ताकि सन्तोष अनुभव कर सकें। एक के बाद दूसरी, छोटी के बाद बड़ी, तृष्णा आ पड़ने से उसे यही मालूम पड़ता है कि मैं सबसे गरीब दीन दुखी एवं अभाव ग्रस्त हूँ। काश, वह इन तृष्णाओं से मुक्ति पाकर अपनी वर्तमान स्थिति की विशेषताओं और महानताओं को ध्यान पूर्वक देख सका होता तो उसे पता चलता कि प्रभु ने कृपा पूर्वक उसे इतना देखा है जिसे प्राप्त करने के लिए इस विश्व के असंख्यों प्राणी तरसते हैं। हमारा जैसा सौभाग्य उन प्राणियों को मिल सका होता तो वे अपने सौभाग्य पर फूले न समाते उसे स्वर्गीय वैभव अनुभव करते, ईश्वर को अनेक धन्यवाद करते। एक हम है जो इतनी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, कौटम्बिक सम्पदाएँ प्राप्त होते हुए भी नई तृष्णाएँ गढ़-गढ़ उनके कारण असन्तुष्ट और दुखी रहते हैं। प्रभु को कोसते रहते हैं, उसमें हमें यह नहीं दिया, वह नहीं दिया, हम यों अभाग रहे, त्यों अभाग रहें। इन शिकायतों और तृष्णाओं का अन्त कुबेर या कल्पवृक्ष भी नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्ति स्वर्ग में भी दीन रहेंगे। सन्तोष का हेतु तो केवल आत्म-ज्ञान है उसका उदय होते ही आशक्ति, फलाशा और तृष्णा का अन्धकार मिट जाता है और मनुष्य तत्क्षण अपने को बड़ा सौभाग्य-शाली, सन्तुष्ट, ईश्वर का कृपा पात्र, सुखी एवं प्रसन्न अनुभव करने लगता है। तृष्णा सुरसा है। हनुमान जी उसके मुख में घुस और अपना रूप बढ़ाने लगे सुरसा का मुँह और बढ़ता गया। अन्त में हनुमान जी थक गये तब उनने अपना रूप बनाया और एस आसुरी गोरख धन्धे में से निकल आये। तृष्णाओं को बढ़ाते जाना और उनका तृप्त करने के लिए परेशान रहना यह एक आसुरी गोरखधन्धा है। इस तिलस्म में से वह छुट सकता है जो गायत्री के भुवः शब्द को हृदयंगम कर ले, कर्मयोग को अपना ले।
फल की इच्छा न करने का अर्थ यह नहीं है कि बिना सोचे समझे काम करते रहा जाय या उसके परिणामों पर विचार न किया जाय। ऐसा होना असम्भव है। उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कार्य किए जाते हैं। बिना उद्देश्य के क्रिया कौन करेगा। आत्मोन्नति, आत्म-सुख, आत्मानन्द मनुष्य का उद्देश्य है। जीवन यात्रा को चलाते हुए आनन्द लाभ करने के उद्देश्य से कर्म किए जाते हैं। यह उद्देश्य या फल स्पष्ट है। विवेक पूर्वक दूरदर्शिता के साथ, क्रमबद्ध योजना बनाकर अपना कार्यक्रम निर्धारित कर लेना चाहिये और उस योजना को पूरा करने के लिए उत्साह और परिश्रम पूर्वक कार्य करने में जुट जाना चाहिए। मन को क्रिया में प्रवृत्त रखना, अपनी कर्त्तव्य परायणता में कस लेना, कार्य प्रणाली को उत्तम, उच्चकोटि की बनाने में संलग्न रखना, कर्म-योग है और कार्य प्रणाली में कम ध्यान देकर मन को भविष्य के लाभों में शेखचिल्ली की तरह लगाये रहना आशक्ति या फलाशा है।
आशक्ति परायणता में दोष यह है कि मन नित नये मनमोदक बनाता और उनके लिए ललचाता है। उसके मन में नाना प्रकार की कामनाएँ उठती रहती हैं। जिनके कारण कार्यक्रमों को रोज-रोज बदलना पड़ता है फल स्वरूप उसका कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता और सभी मनोरथ अधूरे रहते हैं। इसके अतिरिक्त कार्य का परिणाम वही हो, जो चाहा गया है, इस बात का भी कोई निश्चय नहीं है। अनेक बार अच्छे प्रयत्न भी प्रारब्ध या अज्ञात कारणों से निष्फल चले जाते है। उस असफलता में उन व्यक्तियों को जो बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधे बैठे थे भारी आघात लगता है और उनका हृदय टूट जाता है। ऐसे ही लोग असफलता के अवसरों पर आत्म-हत्या जैसे भयंकर कर्म करते देखे जाते हैं।
आगे बढ़ना, उन्नति करना, अधिक उत्तम स्थिति प्राप्त करना, ऊपर उठना, विकसित होना, जीव का स्वाभाविक धर्म है। इस धर्म कर्त्तव्य को पालन किये बिना कोई प्राणी चैन से नहीं बैठता, जो इस दिशा में प्रयत्न नहीं कर रहा है उसकी आत्मा हर घड़ी चोंटती रहेगी और वह मन्द आत्म-हत्या का कष्ट सदा ही भोगता रहेगा इसलिए लोभ और तृष्णा से प्रेरित होकर नहीं, आत्म-धर्म को पालन करने के लिए, हमें अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, एवं आत्मिक उन्नति करने के लिए पूरी शक्ति पूरी दिलचस्पी और पूरी सावधानी से तत्परता पूर्वक लगे रहना कर्मयोग है। कर्मयोगी के आनन्द का केन्द्र उसकी क्रिया प्रणाली होती है। वह अपने सत्प्रयत्नों में हर घड़ी आत्मसम्मान ओर आत्मसन्तोष का रसास्वादन करता है।
तृष्णातुर लोग बड़े बड़े मनसूबे बाँधते हैं, बड़ी बड़ी आशाएँ लगाते हैं। सफलता मिलने पर जो मधुर फल मिलेगा उनके लिए लार टपकाते रहते हैं। मन की प्रवृत्ति फलाशा में इतनी अधिक लगी रहती है। क्रिया प्रणाली पर सोचने का उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता। कामी लोग विषय वास नाक उन्माद में अन्धे हो जाते हैं और अपना स्वास्थ्य, धन, यश आदि सब गवा बैठते हैं। लोभी लोग धूर्तों द्वारा प्रलोभन दिखा कर बुरी तरह ठग जाते है। कारण स्पष्ट है कि फलाशा का प्रलोभन उनके समान इतना जबरदस्त होता है कि उसके तूफान में बेचारा विवेक सूखे पत्ते की तरह उड़ जाता है और मनुष्य अन्धा होकर क्रिया प्रणाली के औचित्य को भुला कर मनमानी करने लगता है। और जब वह मनोरथ पूरे नहीं होते तो वह बेतरह निराश हो जाता है। अपनी निराशा का, अल्प सफलता का कोप वह साथियों, मित्रों, दुनिया वालों, देवताओं, दुर्दिनों आदि जो भी सामने दिखाई पड़ते हैं उन्हीं पर दोष देता है। ऐसे लोग बड़े-2 मनोरथ करते रहते हैं, प्रायः दुःखी, निराश, असन्तुष्ट, असफल एवं अशान्त देखे जाते हैं। कामनाएँ उनके लिए बंधन रूप हो जाती हैं वे एक मानसिक बीमारी अपने ऊपर अकारण लाद लेते हैं॥
इसलिए गायत्री के ‘भुवः’ शब्द का आदेश है कि हम कर्मयोगी बने। बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और विवेक पूर्वक यह निर्णय करें कि हमें सत्परिणाम के लिए, जीवन विकास के लिए क्या करना है, जो करना हो उसमें तत्परतापूर्वक जुट जावें। वैसे विद्यार्थी वार्षिक परीक्षा के बाद ही उत्तीर्ण, घोषित किया जाता है पर वर्ष भर में प्रत्येक दिन वह इस उत्तीर्णता का एक अंक संग्रह करता रहा है अन्त में जब वह संग्रह अभीष्ट मात्रा में इकट्ठा हो गया है तो वह उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया। इसी प्रकार क्रियाशीलता का प्रत्येक अंश सफलता का एक भाग है। हर रोज जितना प्रयत्न किया जाता है अभीष्ट उद्देश्य की सफलता का उतना ही अंश प्राप्त होता चलता है। आज कल लोग अपना काम बड़े उदास मन से करते हैं, अपने कार्यक्रम को तुच्छता एवं तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, बेगार की तरह उसे पूरा करते हैं, और आलस्य एवं तुच्छ लाभ के लिए अपनी रचना को बड़ी कुरूप एवं निकृष्ट कोटि की बना देते हैं। यह कर्म भगवान, का साक्षात् अपमान है। आज का मजदूर वेतन वृद्धि एवं श्रम का समय घटाने के लिए तो बड़ा संघर्ष करता है पर उसे इस बात का ध्यान नहीं है कि अपनी कृतियों को ऐसी उच्चकोटि की, मजबूत चिरस्थायी एवं कला पूर्ण बनावे कि उस कृति की तथा कर्ता की सर्वत्र प्रतिष्ठा हो। मजदूरों में ही क्यों हर क्षेत्र में यह प्रकृति बड़े व्यापक रूप से फैली हुई है। लोग फल, घी, धन की, जितनी चिन्ता करते हैं उससे आधी भी अपनी कृतियों को प्रतिष्ठित बनाने के लिए की जाय तो उसका सत्परिणाम हमारी व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय समृद्धि एवं प्रतिष्ठा पर बहुत भारी हो जाता है। भाग्य और कर्म, तकदीर और तदवीर दोनों एक ही वस्तु हैं। जैसे कल का दूध आज दही बन जाता है वैसे ही भूतकाल के कर्म आज प्रारब्ध बन कर प्रकट होते है। हम अपने भाग्य निर्माता आप हैं। अपनी कर्म रेखा के लेखक, प्रारब्ध के रचयिता हम स्वयं हैं। भूतकाल में जो कर चुके हैं उसका परिणाम आज मौजूद है। यदि हम भविष्य को अच्छा सुख शाँतिमय, आनन्द दायक बनाना चाहते है तो आज के कर्त्तव्य कर्म को मजबूती से अपनाना पड़ेगा, कर्म-योगी बनना पड़ेगा। यदि आज के कर्त्तव्य की उपेक्षा की जा रही है तो निश्चय है कि कल का प्रारब्ध हमें, अत्यन्त त्रासदायक दुर्भाग्य के रूप में भोगना पड़ेगा।
कर्म से वैराग्य लेना भूल है बुराइयों से, लिप्सा से, तृष्णा से, दुष्कर्मों से, कुविचारों से, आलस्य से वैराग्य लेना चाहिए। कर्त्तव्य कर्म से वैराग्य लेना तो वैराग्य शब्द की दुर्गति करना है। प्राचीन ऋषि मुनि निरन्तर कर्त्तव्यरत करते थे उन्होंने लोकहित में जीवन सदुपयोग जिस उत्तमता से किया था वह आदर्श है। प्रत्येक कर्मयोगी को वैसा ही वैरागी होना चाहिये घर में रह कर तपोवन का निर्माण करना, भोग के साधन होते हुए भी उनका परित्याग करना सच्चा वैराग्य कहा जा सकता है। अभाव में जो त्याग होता है उसके अपरीक्षित होने के कारण परीक्षा के समय पर विफल हो जाने का भय बना रहता है। भोग के रहते हुए त्यागी होना ही लम्बी तपस्या है।
कर्मयोगी अनुद्विग्न रहता है। वह जरा-जरा से हानि लाभों में मानसिक सन्तुलन को नष्ट नहीं होने देता। हर्ष शोक उसके लिए समान है, हानि लाभ में, सफलता असफलता में उस मानसिक विक्षोभ नहीं होता। क्योंकि उसका केन्द्र बिन्दु कर्म है। यदि अपना कर्त्तव्यपालन किया जा रहा है तो असफलता में दुखी या सफलता में हषोंन्मत्त होने का कोई कारण नहीं। फल देने वाली शक्ति दूसरी है, हम तो अपना कर्त्तव्य पूरा करें यह भावना स्थिति प्रज्ञ की है, अनासक्त योगी की है, जो इस दृष्टि कोण से सोचता है वह सदा प्रसन्न ही रहता है। दुःख या कष्ट में भी उसे अप्रसन्नता का कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता।
गायत्री का भुवः शब्द हमें कर्म-योगी बनाता है। इस आदेश को शिरोधार्य करने वाला कर्म-बन्धन में नहीं फँसता इसलिये जीवन मुक्ति सदा उसके करतल गत रहती है।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
आत्मानुसन्धान तथा अन्तरावलोकन द्वारा अपने दोषों को दूर करने की चेष्टा करो। यही सच्चा साधन है। और कठिन होने पर भी अपनी सर्वस्व देकर भी इसे प्राप्त करना होगा। पाण्डित्य प्राप्त कर लेना कोई कठिन बात नहीं। परन्तु पूर्वोक्त साधन के लिये कई वर्षों तक बड़े कठिन परिश्रम की जरूरत होगी। बहुत से पुराने दुराचरणों को परित्याग करना होगा। बड़े-बड़े मण्डलेश्वर गीता या उपनिषद् के श्लोक पर एक सप्ताह तक पाण्डित्व पूर्ण व्याख्यान दे सकते हैं। उनका बड़ा सम्मान होता है। फिर भी जनता उनको पसन्द नहीं करती क्योंकि इतना सब कुछ होने पर भी उनमें दोष होते हैं। उन्होंने कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया है। उन्होंने अपने दोष दूर करने के लिए कोई कठिन साधना नहीं की है। वे केवल बुद्धि की उन्नति में ही लग रहे हैं। कितने खेद की बात है।
अभिमान, चालाकी, कुटिलता, दम्भ, संकीर्ण, हृदयता, झगड़ालूपन, अपनी झूठी प्रशंसा, अपने आप को बहुत बड़ा समझना, दूसरों की निन्दा करना, दूसरों की बड़ाई की बातों को भी छोटा करके कहना ये सब पुराने संस्कार अब भी आपके मन में छिपे रह सकते हैं। जब तक आप इनको बिल्कुल दूर नहीं कर देते तब तक आपका विकास नहीं हो सकता। अपरा प्रकृति के इन अवाँछनीय दुर्गुणों को जब तक आप निर्मूल नहीं कर देते तब तक ध्यानयोग में सफलता प्राप्त करना सम्भव नहीं है।
जो मनुष्य बहुधा तर्क-वितर्क, शास्त्रार्थ, शब्द-कलह और खंडन-मंडन में लगे रहते हैं वे अपने सूक्ष्म शरीर को बड़ी हानि पहुँचाते हैं। इसमें शक्ति का अधिक अपव्यय होता है। समय नष्ट होता है और द्वेष बढ़ता है- उत्तेजना पूर्ण वाद-विवाद से सूक्ष्म शरीर भी वास्तव में प्रदीप्त हो जाता है। उसमें एक जख्म पैदा हो जाता है। रक्त गर्म हो जाता है। और अग्नि पर रखे हुये दूध के समान उबलने लगता है। ऐसे आवेशपूर्ण वाद-विवाद से सूक्ष्म शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है इसका अनुमान अनजान मनुष्य नहीं कर सकते। जो मनुष्य व्यर्थ के वाद-विवाद में बिना जरूरत पड़े रहते हैं उन्हें आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति की कण मात्र भी आशा नहीं करनी चाहिये। साधकों को वाद-विवाद बिल्कुल छोड़ देना चाहिये। उन्हें वाद-विवाद करने की वृत्तियों को ध्यानपूर्वक आत्मनिरीक्षण द्वारा नष्ट कर देना होगा।
आपने कई विद्वान संन्यासियों के अच्छे-अच्छे व्याख्यान सुने हैं। आपने कथा सुनी है। गीता, रामायण, भागवत और उपनिषदों के प्रवचन भी सुने हैं। अपने अनेक अमूल्य नैतिक और आध्यात्मिक उपदेश सुने हैं। परन्तु आपने किसी बात का भी विश्वास के साथ दृढ़तापूर्वक निरन्तर साधना द्वारा अभ्यास करने का प्रयत्न नहीं किया है। किसी धार्मिक सिद्धान्त में अपनी सम्मति दे देना, प्रातः और रात्रि को थोड़ी देर आंखें बन्द कर लेना, अपने आपको, अन्तर वासी और साक्षी को धोखा देने के लिये आध्यात्मिक दिनचर्या के पालन करने का थोड़ा-सा प्रयत्न करना, और बेपरवाही के साथ अन्यमनस्कता से कुछ सद्गुणों का संग्रह कर लेना और अपने धर्म गुरु के उपदेशों का पालन करने का हल्का सा प्रयत्न कर लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। इस प्रकार की मनोवृत्ति को बिल्कुल छोड़ देना होगा। साधक को शास्त्रों की आज्ञा और अपने गुरु के उपदेशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए। मन के साथ नर्मी बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिये। आध्यात्मिक मार्ग में बीच बचाव का मार्ग अवलम्बन करने से काम नहीं हो सकता। आध्यात्मिक पथ ऐन्द्रजालिक क्रियाओं से तय नहीं होने का? आप यह नहीं कह सकते कि -”मैं इन बातों को फिर देखूँगा। जब मैं अक्सर प्राप्त हो जाऊँगा तो ज्यादा समय लगा सकूँगा। मैंने इन उपदेशों का यथाशक्ति थोड़ा बहुत तो पालन किया ही है यह थोड़ा बहुत या “यथाशक्ति” की बात साधकों के लिये नाशकारी है। आध्यात्मिक उपदेशों में नियम का बचाव या किसी रियायत की बात बिल्कुल नहीं है। आपसे उपदेशों को ठीक-ठीक बेउजर पालन की आशा की जाती है।
बिना विचारे कोई बात न कहो। एक शब्द भी व्यर्थ मत बोलो। सब प्रकार की बात-चीत, जिसकी आवश्यकता नहीं हो, छोड़ दो। छोड़ दो और मौन रहो। इस क्षण भंगुर आधिभौतिक संसार में अपने कोई अधिकार मत रक्खो। अपने कर्त्तव्य की ओर विशेष ध्यान दो। और अधिकारों की बात कम करो। अधिकारों की बात राजसिक अंधकार से पैदा होती है। ये अधिकार निरर्थक है। इनके लिए झगड़ने में समय और शक्ति को खोना है। अपने जन्मसिद्ध अधिकार ईश्वर-ज्ञान “त्वं ब्रह्मासि” को प्राप्त करो। तभी आप त्यागी मनुष्य होंगे।
यदि आपके पास सदाचार, ब्रह्मचर्य, सत्य, दया, शुद्ध प्रेम, सहनशीलता, क्षमा और शान्ति प्रकृति आदि सद्गुण हैं तो यह बहुत से दुर्गुणों से भारी पड़ेंगे। धीरे-धीरे ये दुर्गुण भी दूर हो जायेंगे, यदि आप अपना पूरा ध्यान इन पर देकर इन्हें दूर करने में सतर्क रहोगे।
यदि आप किसी उन्नत महात्मा की संगति में रहोगे तो उनके आकर्षक खोज और आध्यात्मिक विद्युत शक्ति प्रभाव से आपको बड़ा लाभ होगा। उनका संग आपके लिये दुर्ग का काम देगा। आप पर बुरी बातों का प्रभाव नहीं पड़ेगा। पतन का डर नहीं रहेगा। आपकी आध्यात्मिक उन्नति जल्दी हो सकेगी। महात्मा की संगति से साधक में सात्विक सद्गुणों की वृद्धि होती है और उसे शक्ति मिलती है। जिससे वह अवाँछनीय दुर्गुणों और दोषों को दूर कर सकता है। छोटी अवस्था के साधकों को तब तक अपने गुरु या महात्माओं की संगति में रहना चाहिए जब तक कि वे आध्यात्मिक मार्ग और ध्यान में दृढ़ रूप से स्थिति न हो जाये। आजकल बहुत से नवीन साधक जहाँ तहाँ बिना किसी उद्देश्य के मारे-मारे फिरते हैं। वे अपने गुरु या महात्माओं के उपदेश नहीं सुनते। प्रारम्भ से ही वे स्वाधीनता चाहते हैं। इसलिए वे आध्यात्मिकता में कुछ उन्नति नहीं कर पाते। समाज पर वे भार बने रहते हैं। उन्होंने अपने को ऊँचा नहीं उठाया है। इनसे दूसरे लोग लाभान्वित नहीं हो सकते। उनकी गणना तो केवल स्वेच्छाचारी भद्र पुरुषों में ही की जा सकती है।
जिनमें लोक, पृथ्वी, अन्तरित और संपूर्ण प्राणियों के सहित मन ओत-प्रोत है उस एक आत्मा को ही जानों और सब बातों को छोड़ दो, यही अमृत (मोक्ष प्राप्ति) का सेतु (साधन) है।
-उपनिषद्।
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मन से ही देखो-विश्व में भेद कुछ नहीं। जो मनुष्य भेद की बुद्धि रखता है वह मृत्यु को ही प्राप्त करता है।
-वृहदारण्य कोपनिषद।
(महात्मा गाँधी)
ब्रह्मचर्य का पालन इसलिए कठिन मालूम पड़ता है कि हम दूसरी इन्द्रियों को संयम में नहीं रखते, खास कर जीभ को। जो अपनी जिव्हा को वश में रख सकता है उसके लिए ब्रह्मचर्य सुगम हो जाता है। प्राणि शास्त्रियों का यह कहना सच है कि पशु जिस दर्जे ब्रह्मचर्य का पालन करता है उस दर्जे तक मनुष्य नहीं करता। उसका कारण देखने पर मालूम होगा कि पशु अपनी जीभ पर पूरा-पूरा निग्रह रखते हैं-कोशिश करके ही नहीं बल्कि स्वभाव से ही। वे केवल घास पर ही अपना गुजारा करते हैं और सो भी महज पेट भरने के लिए लायक ही खाते हैं। खाने के लिये नहीं जीते। पर हम तो बिलकुल विपरीत ही करते है। माँ बच्चे को तरह-तरह के सुस्वाद भोजन कराती है। वह मानती है कि बालक पर परम प्रेम दिखाने का यही सर्वोत्तम तरीका है। लेकिन ऐसा करते हुए हम उन चीजों का जायका घटाते नहीं बल्कि बढ़ाते हैं। स्वाद तो भूख में रहता है। भूख के समय सूखी रोटी भी मीठी लगती है और बिना भूख के आदमी को लड्डू भी फीके लगते हैं और बेस्वाद मालूम पड़ते है। पर हम तो न जाने क्या क्या खाकर पेट को ठसाठस भरते है और फिर कहते हैं कि ब्रह्मचर्य का पालन नहीं हो पाता।
जिस घर में तरह-तरह की बातें करके हम बच्चे के मन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। उसकी शादी की बाते किया करते हैं और इसी किस्म की चीज ओर दृश्य भी दिखाते हैं। मुझे तो आश्चर्य होता है कि हम सहज जंगली ही क्यों नहीं हो गये। मर्यादा तोड़ने को अनेक साधनों के होते हुए भी मर्यादा की रक्षा हो जाती है। ईश्वर ने मनुष्य की रचना इस तरह की है कि पतन के अनेक अवसर पाते हुए भी वह कर सकते हैं। यदि वह ब्रह्मचर्य के रास्ते से यह सब विघ्न दूर कर दें तो उसका पालन बहुत आसान हो जाय।
ऐसी हालत होते हुए भी हम दुनिया से शारीरिक मुलाकात करना चाहते हैं, उसके दो रास्ते हैं। एक आसुरी और दूसरा दैवी। आसूरी मार्ग है। शरीर बल प्राप्त करने के लिए हर तरह के उपायों से काम लेना और माँस इत्यादि हर तरह की चीजें खाना। मेरे लड़कपन में मेरा मित्र मुझ से कहा करता था कि माँसाहार हमें अवश्य करना चाहिए, नहीं तो अंग्रेजों से हट्टे-कट्टे नहीं हो सकेंगे। जापान को भी जब दूसरे देशों से मुकाबला करने का मौका आया तब यहाँ गो-माँस भक्षण करने का मौका मिला। लो यदि आसुरो मत से शरीर को तैयार करना हो तो ब्रह्मचर्य ही उसका एक उपाय है। जब मुझे कोई नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहता है तब मैं अपने आप पर तरस खाता हूँ।
नैष्ठिक ब्रह्मचारी का तेज तो मुझ से कहीं अधिक होना चाहिये। मैं आदर्श ब्रह्मचारी नहीं हूँ। हों यह सच है कि वैसा बनता चाहता हूँ। ब्रह्मचर्य का यह अर्थ नहीं है कि मैं किसी स्त्री को स्पर्श न करूं। पर ब्रह्मचारी बनने का अर्थ यह है कि स्त्री का स्पर्श न करूं। पर ब्रह्मचारी बनने का अर्थ यह है कि स्त्री का स्पर्श करने पर भी मुझे में कोई किसी प्रकार का विकार पैदा न हो, जिस तरह कागज को छूने से नहीं होता। मेरी बहिन बीमार हो और उसकी सेवा करते हुए ब्रह्मचर्य के कारण हिचकिचाना पड़े तो वह ब्रह्मचर्य कोई काम का नहीं। जिस निर्विकार दशा का अनुभव हम मृत शरीर को स्पर्श करके कर सकते हैं, उसी का अनुभव जब हम सुन्दरी से सुन्दरी युवती का स्पर्श करके कर सकें तभी हम ब्रह्मचारी हैं। यदि आप चाहते है कि बालक जैसा ब्रह्मचर्य प्राप्त करें तो इसका अभ्यास कम आप नहीं बना सकते। मुझ जैसा अधूरा ही क्यों न हो, पर कोई ब्रह्मचारी ही बना सकता है।
ब्रह्मचारी स्वाभाविक संन्यासी होता है। ब्रह्मचर्याश्रम, संन्यासाश्रम से भी बढ़कर है, पर उसे हमने गिरा दिया है, इससे हमारा गृहस्थाश्रम भी बिगड़ गया है और संन्यास का तो नाम भी नहीं रहा है। ऐसी हमारी असह्य अवस्था हो गई है।
ऊपर जो आसुरी मार्ग बताया गया है उसका अनुसरण करके तो आप पाँच सौ बरस बाद भी पठानों का मुकाबला न कर सकेंगे। दैवी मार्ग यदि आज अनुसरण हो जाय तो आज ही मुकाबला कर सकते हो। क्योंकि देवी साधन से आवश्यक मानसिक परिवर्तन एक क्षण में भी हो सकता है जबकि शारीरिक साधन करते हुए युग बीत जाते हैं।
आँख यदि दोष करती हों तो उन्हें बन्द कर लेना चाहिए, कान दोष करें तो उनमें रुई भर लेनी चाहिए। आँखों को हमेशा नीची रख कर चलने की रीति हट कर है। जिससे उन्हें दूसरी चीज देखने की फुरसत नहीं मिले। जहाँ गन्दी बाते होती हों, अथवा गन्दे गीत गाये जा रहे हो वहाँ से उठ कर चल देना चाहिए। स्वादेन्द्रिय पर खूब अधिकार होना चाहिए मेरा अनुभव तो ऐसा है कि जिसने स्वाद नहीं जीता वह विषय को नहीं जीत सकता। स्वाद को जीतना बहुत कठिन है, परन्तु इस विषय की प्राप्ति पर ही दूसरी विजय की सम्भावना है। स्वाद को जीतने के लिए एक नियम तो यह है कि मसालों को सर्वथा अथवा जितना हो सके त्याग देना चाहिए, और दूसरा अधिक जोरदार उपाय यह है कि इस भावना की वृद्धि हमेशा की जाय कि हम स्वाद के लिए नहीं, केवल शरीर रक्षा के लिए ही भोजन करते हैं।
हम स्वाद के लिए हवा नहीं लेते, बल्कि श्वांस के लिए लेते हैं। पानी हम केवल प्यास बुझाने के लिए ही पीते हैं। इसलिए खाना भी सहज भूख बुझाने के लिए ही खाना चाहिए। हमारे माँ-बाप हमें बचपन से ही उलटी आदत डालते हैं। हमारे पोषण के लिए ही नहीं बल्कि अपना दुलार दिखाने के लिए तरह-तरह का स्वाद चखा कर हमें बिगाड़ देते हैं। हमें ऐसे वायुमण्डल का विरोध करना होगा। तभी ब्रह्मचर्य रखा जा सकता है।
विज्ञान का अर्थ है-विशेष ज्ञान, खास जानकारी। साधारणतया शरीर और मस्तिष्क की सहायता से हम जो जानकारी प्राप्त करते हैं वह प्रायः अधूरी होती है क्योंकि स्थूल एवं भौतिक पदार्थों का परिचय मात्र ही उनके द्वारा पाया जाना सम्भव है। हम देखते हैं कि अनेक शिक्षण संस्थाएँ अपना काम जोरों से कर रही हैं, लाखों छात्र उनमें भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास, रसायन, चिकित्सा, शिल्प, संगीत, शासन आदि की शिक्षा पा रहे हैं। इस शिक्षा में पूर्णता प्राप्त करके वे धन और पद भी प्राप्त करते हैं, इतने पर भी उन्हें उस जानकारी से वंचित रहना पड़ता है जो आत्मा को शान्ति दे सकती है, जीवन में चतुर्मुखी प्रसन्नता एवं सन्तोष की हिलोरे उत्पन्न करती है। वह शिक्षा जिससे अन्तर की बेचैनी, उद्विग्नता एवं तृष्णा का समाधान होकर स्वच्छ मनोभूमि की प्राप्ति होती है-विज्ञान, कहलाती है।
यों आज कल ‘विज्ञान’ शब्द का अर्थ पदार्थ विद्या, भौतिक विज्ञान या साइन्स किया जाता है पर आध्यात्म शास्त्र में इसका तात्विक अर्थ है-दृष्टिकोण, लक्ष्य, ध्येय, नीति, जीवन दशा।
यह दृष्टिकोण ही शरीर तथा मन को प्रेरणा प्रदान करता है। विचार और कार्यों की कुँजी दृष्टिकोण है। हमारे अन्तस्तल को जो बात सुहाती है, जिसे हम रुचिकर, हितकर, उपयोगी एवं आवश्यक समझते हैं, उधर ही विचारधारा और कार्यशक्ति मुड़ जाती है और कार्य होने लगता है।
कई व्यक्ति ऐसा कहते पाये जाते हैं- “क्या करें मन नहीं मानता, हम तो ऐसा करना चाहते हैं पर हो ऐसा जाता है।” ऐसी शिकायत के पीछे उनकी आन्तरिक और बाह्य स्थिति का भेद प्रकट होता है। यदि हमारे अन्तःकरण ने भौतिक दृष्टिकोण अपना रखा है तो हमारे आध्यात्मिक कार्य भी भौतिक लाभ को ध्यान में रखकर होंगे। आध्यात्मिकता की लीपा-पोती बार-बार फिसल जाएगी और भौतिक प्रधानता हर बार ऊपर आ जायगी। इसके विपरीत यदि हमारा आन्तरिक लक्ष्य आत्मिक है तो साधारण संसारी कामकाजों में भी आत्मिक महानता प्रकट होती रहेगी।
आन्तरिक विश्वासों से प्रतिकूल न मन जा सकता है न बुद्धि, न शरीर। हिन्दू का विश्वास है कि गौ माँस अभक्ष है वह भूखा मर जायगा पर माँसाहारी होते हुए भी उसे खाकर जीवित रहना पसन्द न करेगा। कोई कामान्ध व्यक्ति भी अपनी सगी बहिन बेटी पर कुदृष्टि न डालेगा साधारण माँस और गौ माँस में, दूसरों की बहिन बेटी और अपनी बहिन बेटी में प्रत्यक्षतः कोई खास अन्तर नहीं है फिर भी कोई भीतरी बात ऐसी है जो एक को प्राप्त करने के लिए आतुर करती है परन्तु दूसरी के लिए कल्पना भी नहीं होती। यह आन्तरिक विश्वास ही है जो मन बुद्धि या शरीर को प्रेरणा देता या प्रतिबन्ध रखता है।
जब ऐसा प्रश्न उठे कि हम ऐसा नहीं चाहते पर मन ऐसा कर बैठता है। तब समझना चाहिए कि इनके मन में दो प्रकार के कार्यक्रम सामने आते है कि इसे करें या उसे करें। दोनों में से वे उसे चुन लेते हैं जो उनके आन्तरिक लक्ष्य के अनुकूल है। दो में से एक बात वही छोड़नी पड़ेगी जो आन्तरिक दृष्टि के प्रतिकूल होगी। दो में से एक बात जो छूट गई वह अच्छी थी, वही कर ली जाती तो अच्छा था ऐसा पीछे ख्याल आता है और उसके लिए जब पश्चाताप होता है तो जब यह शब्द मुँह से निकल जाते हैं-”क्या करें मन नहीं मानता।” इन शब्दों में उसकी बेबसी तो है पर इसके लिए अपने को निर्दोष नहीं कह सकता। जब तक उसकी आंतरिक दृष्टि एक तरह की है तब तक दूसरी तरह के सब कार्य और आयोजन प्रायः अधूरे, थोड़े, भद्दे और निष्फल रहेगा जो दृष्टि भीतर की है, जिस बात में वस्तुतः लाभ और आनन्द समझा जाता है कार्य वही होगा, उसी में मन लगेगा और उसी को बुद्धि स्वीकार करेगी, चित्त में वही बात सुहावनी और सरल प्रतीत होगी।
मन एक प्रकार का विचारवान वकील है जो अपने मुवक्किल की इच्छा के अनुसार अपनी सारी चतुरता और विचार शक्ति को लगाकर नाना-प्रकार के तर्क, प्रमाण, उदाहरण ढूँढ़ता है किसी सेठ का नौकर इंजीनियर अपने मालिक की आज्ञानुसार बड़ी-बड़ी योजनाएँ तैयार कर देता है। सरकारी नौकर, जज अपनी मालिक सरकार के बनायें कानूनों के आधार पर फैसले करता है। इसी प्रकार मन की कल्पना, प्राणशक्ति, शारीरिक योग्यता द्वारा उसी दिशा में अभियान होता है।
जीवन दृष्टि का नाम ही ‘विज्ञान’ है। मैं क्या हूँ, मेरा लाभ किस में है, मुझे आनन्द देने वाली वस्तु क्या है? मेरा लक्ष्य क्या है? मुझे क्या सोचना चाहिए? क्या करना चाहिए? कैसे गुणों और स्वभाव को अपनाना चाहिए, दूसरों के प्रति मेरा व्यवहार क्या होना चाहिए आदि प्रश्नों का उत्तर अन्तरात्मा के गुप्त प्रदेश में जिस प्रकार मिलता हो उसी के अनुसार यह जाना जा सकता है कि हमारे विज्ञानमय कोश की स्थिति क्या है? कितने ही मनुष्य बहुश्रुत और बहु पठित होते हैं, उनने गणित, भूगोल, इतिहास की भाँति अध्यात्मिक बात भी बहुत पढ़ी और सुनी होती है। तदनंतर वे कई बार दूसरों को प्रभावित करने के लिए लम्बी-चौड़ी आध्यात्मिक बात भी करते हैं। पर इस बकवास से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इस व्यक्ति की वास्तविक मनोभूमि क्या है? कई जटाजूट रखाये साधु-चोर, व्यभिचारी और ठग पाये जाते हैं, कई पर उपदेश कुशल प्रवचनकारों का व्यक्तिगत जीवन बड़ा निकृष्ट पाया जाता है, इसके विपरीत कई साधारण काम काजी और अल्प शिक्षित मनुष्यों का आन्तरिक दृष्टिकोण बड़ा ही उच्चकोटि का होता है इसलिए बाह्याडंबर से नहीं वस्तुतः आन्तरिक दृष्टिकोण से ही किसी के ज्ञान-विज्ञान की वास्तविक स्थिति जानी जा सकती है।
दृष्टियाँ दो होती है-एक सत् दूसरी असत्। सत् दृष्टि वह है जो भावनाओं में सुख दुःख को समझती है और अपने अन्दर तथा दूसरों से सद्भाव बढ़ाने में सुख सन्तोष देखती है। असत् दृष्टि वह है जो वस्तुओं, धन, सौंदर्य, वैभव, भोग, ऐश्वर्य में आनन्द खोजती है। जिस व्यक्ति की जो दृष्टि होगी वह उसी आधार पर इच्छा, कल्पना, योजना एवं क्रिया करेगा। तदनुसार अभीष्ट वस्तुएँ उसकी योग्यता और कार्य क्षमता के आधार पर प्राप्त होती चलेगी। दो दिशाओं में जाने वाली रेल की पटरियाँ जहाँ मिलती है वहाँ जरा सा मोड़ और जरा सा अन्तर होता है पर इस थोड़े से अन्तर के कारण ही एक रेल कलकत्ता जा पहुँचती है तो दूसरी बम्बई। दोनों के कार्य परिणाम में सैकड़ों मील का अन्तर पड़ जाता है। दृष्टिकोण का सत् या असत् होने का थोड़ा सा अन्तर एक व्यक्ति को महापुरुष बना देता है और दूसरे को घृणित पापी के रूप में ले पहुँचता है। उच्चकोटि की सतभावना के कारण एक दुर्बल काया, हीन प्रतिभा और अल्प विद्या मनुष्य महात्मा गाँधी बन जाता है। दूसरी ओर अपनी प्रतिभा विद्या एवं समर्थ से दूसरों को हैरत में डाल देने वाले व्यक्ति रूस के धर्म गुरु रासपुटिन की भाँति नारकीय नर पिशाच बन जाते हैं। अन्तः लक्ष्य का थोड़ा सा हेर-फेर शरीर प्राण और मन की इच्छाओं एवं चेष्टाओं में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर सकता है।
एक व्यक्ति टके-टके को धर्म बेचता है। प्याज के छिलके पर मुसलमान हो जाने की कहावत चरितार्थ करता है। दूसरी ओर हकीकत राय और बन्दा वैरागी जैसे ऐसे भी लोग होते है जो अपनी मान्यता को स्थिर करने के लिए प्राणों को न्यौछावर कर देते हैं। मनुष्य की नैतिकता, सदाशयता, उदारता, कर्त्तव्य परायणता, इस बात पर निर्भर है कि उसका अन्तरात्मा श्रेय को, धर्म को, सत को प्रधानता दे। जिनका ध्येय, लक्ष्य उद्देश्य सत है जो आत्मा की प्रसन्नता एवं संतुष्टि में सफलता देखते है वे ऋतम्भरा प्रज्ञा वाले व्यक्ति कभी भी ऐसी शिकायत करते सुने नहीं जाते कि क्या करें हमारा मन नहीं मानता, ऐसा चाहते हैं और ऐसा हो जाता है।
ज्ञान की आज चारों ओर चर्चा है, स्कूल कालेज द्रुतगति से खुल रहे हैं, और उनमें छात्रों की संख्या आँधी तूफान की भाँति बढ़ रही है। यह अच्छी बात है, शिक्षा का, साक्षरता का, अधिक से अधिक प्रचार होना ही चाहिए। पर साथ ही यह भी न भूलना चाहिए कि विज्ञान इस शिक्षा से भी अधिक आवश्यक है। ‘विज्ञान’ शब्द से हमारा मतलब उस साइंस से नहीं जो सत्यानाशी अणुबम और उदबम बनाकर नृशंस प्रलय का आयोजन कर रहा है, हमारा तात्पर्य उस साइंस से है जो आन्तरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन करती है संयम, सदाचार, संतोष, पुरुषार्थ और परमार्थ की ओर प्रेरित करती है जिससे मनुष्य, मनुष्य में स्नेह, सौहार्द, भाईचारा, ईमानदारी, आदि ऐसे सद्भाव बढ़ते हैं।
(लेखक-पं॰ ब्रजनार्थ शर्मा)
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” पद व्यावहारिक सत्यता की ओर नहीं, अपितु दार्शनिक या वास्तविक सत्यता की ओर संकेत करता है।
जगत जैसा दीखता है ऐसा नहीं है यह तो आधुनिक विज्ञान को भी मान्य है। आधुनिक विज्ञान ने अपना जीवन चार तत्वों से आरम्भ किया था, जो इन्द्रियगोचर थे, खोजते खोजते 87 तत्वों का पता चला और अनुमान से उनकी संख्या 92 निश्चित की गई। यह तत्व एक दूसरे से पृथक माने जाते थे, एक दूसरे में परिणित नहीं हो सकते थे किन्तु फिर रेडियो ऐक्टिविटी का पता लगने पर यह मालूम हुआ कि एक तत्व के अणु टूट-फूट कर दूसरे तत्व के अणु बन जाते हैं जैसे रेडियम का अणु परिवर्तन करते-करते एक प्रकार के सीसे का अणु बन जाता है, जो खनिज सीसे से भिन्न प्रकार का होता है। इतना ही नहीं। पहले तो यह समझा जाता था कि अणु से छोटा टुकड़ा हो ही नहीं सकता, किन्तु अब पता लगा है कि अणु वास्तव में इलेक्ट्रान और प्रोटान के समूह का नाम है। सब प्रोटान एक ही प्रकार के होते हैं, उनमें ऋण विद्युत् शक्ति होती है। इसी प्रकार के सब इलेक्ट्रान एक से ही होते है उनमें धन विद्युत शक्ति होती है। तोल में एक प्रोटान 1835 इलेक्ट्रान बराबर होता है। संसार की सब ही वस्तुएं, इन्हीं प्रोटान और इलेक्ट्रान की बनी होती हैं। जैसे सूर्य मंडल में पृथ्वी चन्द्रमा इत्यादि नक्षत्र सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं, वैसे ही प्रोटान की परिक्रमा इलेक्ट्रान और प्रोटान करते हैं, जैसे हाइड्रोजन, किसी में अनेक होते हैं। परिक्रमा अटूट रूप से सदा ही जारी रहती है, इलेक्ट्रान की परिक्रमा का मार्ग बदलता रहता है। जब बड़े प्रोटान से दूर होता है तो अणु बाहर से शक्ति खींचता है, जब वह कूद के निकट आ जाता है तो शक्ति का ह्रास होता है और प्रकाश की लहर पैदा होती है। इस सब का निष्कर्ष यह है कि हमारी इन्द्रियों को जो वस्तुएं ठोस बिना हरकत प्रतीत होती हैं उनमें असंख्य छिद्र हैं और बड़े वेग से इलेक्ट्रान दौड़ते कूदते हैं हम नहीं देख पाते। किन्तु इनसे प्रकाश भी निकला करता है। इन्द्रियों द्वारा जाना हुआ जगत विज्ञान की दृष्टि से भी मिथ्या ठहरा।
जगत का मिथ्यात्व इतने ही पर समाप्त नहीं होता। अगर इतना ही होता तो संसार में वस्तु की स्थिति तो रहती, किन्तु उसका रूप सूक्ष्म अति सूक्ष्म हो जाता। लोहे, पारे, सीसे के स्थान में प्रोटान और इलेक्ट्रान रहते, जगत का नानात्व पिघलकर विद्युत शक्ति से परिपूर्ण कणों के एकत्व में परिणित हो जाता। हेसिर्न्बग और स्क्रोडिन्जर की गवेषणा ने इन कणों का भी आस्तित्व नष्ट कर दिया, इलेक्ट्रान कोई वस्तु ही न रही, वह केवल शक्ति और प्रकाश के निकलने का एक स्थान रह गया।
जिस जगत् को हम सत्य समझे हुए थे, वह तो वैज्ञानिकों के मत से भी वैसा ही असत्य ठहरा जैसे भूत प्रेत की कहानियाँ। तो फिर सत्य क्या है? सत्य वह ही है जिसके आस्तित्व के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, जो सदा रहे और एक रस रहे। वह क्या है, इस पर अभी विचार करना है। किन्तु इसके पहले जगत् की परीक्षा एक और प्रकार से भी कर लें तो अच्छा है।
इन्द्रिय-जन्य ज्ञान को हम साक्षात् ज्ञान समझते हैं। इसलिये भी संसार की सत्यता पर हमें भरोसा होता है। जरा देखा जाय इन्द्रिय-जन्य कैसे होता है। हमारे सामने मेज है, उससे टकरा कर प्रकाश की किरणें हमारी आँख पर पड़ती हैं। आँख के लेन्स द्वारा, उसका चित्र रेटिना पर पड़ता है रेटिना में आप्टिक नर्व के सिरे फैले होते हैं। उनका दूसरा सिरा हमारे मस्तिष्क के एक विशेष भाग में जाता है जिस भाग का काम चक्षु के भेजे हुए संदेशों का अर्थ लगाना है। रेटिना पर पड़े हुए चित्र से आप्टिक नर्व द्वारा मस्तिष्क के इस विशेष भाग में संदेशा पहुँचता है। हमें उस संदेश का ज्ञान होता है। वाह्य वस्तु मेज का नहीं। इस आन्तरिक ज्ञान से हम मेज के सामने होने का अर्थ निकालते हैं। इससे भी हमको मेज का तो ज्ञान होता ही नहीं। एक विशेष आकार, रंग, इत्यादि से समूह का ज्ञान होता है जिस समूह का नामकरण हमने मेज कर रक्खा है। समस्त इन्द्रियजन्य ज्ञान इसी प्रकार से आन्तरिक स्थिति के परिवर्तनों का होता है, जिससे हम बाह्य पदार्थ का अनुमान करते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, पाँचों का यही हाल है। इन पाँचों की जैसे इन्द्रियाँ अलग हैं वैसे ही नर्व और मस्तिष्क के भाग। यदि एक प्रकार की नर्व का संबंध मस्तिष्क के दूसरे केन्द्र से हो जाय तो हमारा ज्ञान नितान्त बदल जायगा। जो इस समय रंग प्रतीत होता है शब्द, और रंग बन जायगा, किंतु बाह्य वस्तु में रंग का रंग और शब्द का शब्द ही रहेगा। हमारे सामने लाल फूल होगा तो हम समझेंगे घंटा बजा घंटा बजेगा तो लाल फूल हमें दिखाई देगा। हमारे लिये तो संसार वही है जो हम समझते है, और हमारी समझ का यह हाल है। तो ऐसा समझा हुआ संसार तो मिथ्या ही ठहरा।
इस मिथ्यात्व के घोर अंधकार में एक सत्य सूर्य भी चमकता है, वह है “मैं”। “मेरा” नहीं। जहाँ तक “मेरा” का सम्बंध है, वह तो संसार है इनमें शरीर भी सम्मिलित है। “मैं” से अभिप्राय है उस एक रस जानने वाले से जो कहता है (भ्रम से ही सही) ‘मेरा शरीर’। इस ‘मैं’ का ज्ञान स्वतः सिद्ध है, इन्द्रिय जन्य नहीं। सोते जागते मैं का ज्ञान बना ही रहता है, यदि न रहता तो सोने के बाद उठ कर यह कौन कहता मैं सुख की नींद सोया। इस मैं में कभी परिवर्तन नहीं होता, न वह दुबला होता है न मोटा, न सोता है, न जागता, न गर्म होता है न ठंडा, भूत, भविष्य, वर्तमान में वह एक रस रहता है। वहीं “मैं” ब्रह्म है और सत्य है।
विज्ञान द्वारा सिद्ध हो ही चुका है कि जगत् का नानात्व देखने भर का ही है, इसके पीछे प्रकाश का एकत्व है। इसी प्रकार आत्म ज्ञानियों का अनुभव है कि ब्रह्म एक है। आत्म पुरुष का वाक्य हमारे लिये प्रमाण होता है, वैज्ञानिक के वाक्य विज्ञान में जैसे प्रमाणिक है वैसे ही आत्म ज्ञानी के वचन आत्म ज्ञान में प्रमाणिक हैं। वैज्ञानिक नियमों और यंत्रों को प्रयोग करके हम स्वयम् वैज्ञानिक की बातों की सच्चाई की परीक्षा कर सकते हैं। आत्म ज्ञानी की बातें भी हम जाँच सकते हैं यदि आत्म ज्ञान प्राप्ति के नियमों का पालन करें। बिना परीक्षा किये इनमें से किसी को झूठा कहना अवैज्ञानिक मूढ़ता है। विज्ञान और आत्म-विद्या दोनों के साक्षी से यह पता चलता कि ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ अर्थात् ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या है।
परलोक में सहायता के लिए माता-पिता, पुत्र, स्त्री और सम्बन्धी कोई नहीं रहते। वहाँ एक धर्म ही काम आता है। मरे हुए शरीर को बन्धु बान्धव काठ और मिट्टी के ढेलों के समान पृथ्वी पर पटक कर घर चले जाते हैं। एक धर्म ही उस के साथ जाता है। -मनुस्मृति।
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पृथ्वी की ओर देखकर पैर रखना, जल को कपड़े से छान कर पीना, वाणी को सत्य से पवित्र करके बोलना, और मन में विचार करने पर जो उत्तम प्रतीत हो वही करना चाहिये।
-श्रीमद्भागवत।
(पं॰ तुलसी राम जी शर्मा, वृन्दावन)
ततो हृष्टमना देवा ममन्थुः क्षीरसागरम्।
ततोऽलक्ष्मीः समुत्पन्ना कालास्या रक्तलोचना ॥9॥
पद्मपुराण 4/9
जब देवता प्रसन्न मन होकर क्षीरसागर मथने लगे तब अलक्ष्मी (दरिद्रता) उत्पन्न हुई जिसका काला मुख और लाल नेत्र थे॥9॥
रुक्षपिंगलकेशा च जरन्ती बिभ्रती तनुम्। साचज्येष्ठाऽब्रवीद् देवान् किं कर्त्तव्य मयेतिच॥10॥
रुखे पिंगल बाल, जलती देह को धारे हुई ये लक्ष्मी की बड़ी बहन (प्रथम उत्पन्न होने के कारण) देवताओं से बोली, कि-मुझको क्या करना चाहिये॥10॥
देवास्तथाब्रु वंस्ताँ, च देवीं दुःखस्य भाजनम्।
येषाँ नृणाँ गृहे देवी कलहः संप्रवर्तते॥
तत्र स्थानं प्रयच्छामो वस ज्येष्ठेशुभान्विता॥ 11॥
तब देवता दुःख की पात्र रूप तिन देवी जी से बोले, कि-हे ज्येष्ठ देवी! जिन पुरुषों के घर में लड़ाई होती है, तहाँ पर हम तुम्हें स्थान देते हैं, अशुभ युक्त होकर वही निवास करो॥11॥
निष्ठुर वचनं ये च वद्न्ति येऽनृतं नराः।
सन्ध्यायाँ ये हि चाश्नन्ति दुःखदा तिष्ठ तद् गृहे॥12॥
जो पुरुष मिथ्या और निष्ठुर (रखे) वचन कहते हैं और सन्ध्याकाल में भोजन करते हैं उनके घर में है, दुख देने वाली तुम रहो॥12॥
कपालकेशभस्मास्थितु षम्गाराणि यत्र तु।
स्थानं ज्येष्ठे तत्र तब भविष्यति न संशयः॥13॥
जहाँ पर ठीकरे, केश, राख, हड्डी, भूसी और अंगार हो अर्थात् मलिनता रहती हो हे ज्येष्ठ? निःसन्देह वह तुम्हारा स्थान होगा साराँश यह है, कि-वहाँ दरिता होगी॥13॥
अकृत्वा पादयोधौतं ये चाश्नन्ति नराधमाः।
तद गृहे सर्वदा तिष्ठ दुःखदारिद्रय दायिनी॥14॥
जिस घर में नीच पुरुष बिना पैर धोये भोजन करते हैं उस घर में दुःख दरिद्रता के देने वाली तुम सदैव रहो॥14॥
गुरुदेवातिथीनाँ च यज्ञदानबिवर्जितम्।
यत्रवेदध्वनिर्मास्ति तत्र तिष्ठ सदाऽशुभे॥18॥
हे अशुभे ! जहाँ पर गुरु, देवता और अतिथियोका आदर सत्कार न हो और यज्ञ दान न हो और वेदशास्त्र की ध्वनि न हो वहाँ पर सदैव तुम्हारा निवास हो॥ 18॥
दम्पत्याः कलहोयत्र पितृदेवार्चन न वै।
दुरोदररता यत्र त्रिष्ठ सदाऽशुभे॥ 19॥
जहाँ स्त्री पुरुषों में लड़ाई रहती हो, पितर और देवताओं का पूजन न हो, जुए में आसक्ति हो हे अशुभे! तहाँ तुम्हारा निवास होगा॥ 19॥
परदाररता यत्र परद्रव्यापहारिणः।
विप्रसज्जनवृद्धानाँ यत्र पूजा न विद्यते॥
तत्र स्थाने सदा तिष्ठ पापदारिद्रयदायिनी॥20॥
जहाँ पराई स्त्री में प्रेम, पर द्रव्य के हरने वाले हों, ब्राह्मण, सज्जन और वृद्धों की पूजा न होती हो तिस स्थान में हे पाप और दरिद्रता की देने वाली तुम्हारा निवास होय॥20॥
देवताओं के वचन मान दरिद्रता वहाँ से चली गई और उसी श्रेणी के लोगों में निवास करने लगी। जो लोग उन दोषों को छोड़ देते हैं उनके यहाँ से दरिद्रता भी चली जाती है। इसी प्रकार एक स्थान पर लक्ष्मी जी ने यह बताया है कि वे किन किन स्थानों पर नहीं जाती।
गृहान् यास्यामि देवानाँ युष्माकं चाज्ञया द्विजाः॥
येषाँ गेहं न गच्छामि श्रृणुघ्ब भारतेषु च॥ 18॥
(व्रह्मवैवर्तपुराण 3। 23)
तुम ब्राह्मणों की आज्ञा से देवों के गृह में मैं जाऊँगी और जिन के घर न जाऊँगी उनको सुनो॥18॥
स्थिता पुण्यवताँ गेहे सुनीति पथवेदिनाम्।
गृहस्थानाँ नृपार्णा वा पुत्रवत्पालयामि तान्॥19॥
नीति मार्ग पर चलने वाले पुण्य कर्म करने वाले, गृहस्थ व राजाओं के यहाँ मैं टिकती हूँ ओर ऐसों को मैं पुत्र की समान पालन करती हूँ॥19॥
मिथ्यावादी चयः शश्वदनध्यायी च यःसदा।
सत्वहीनश्च दुःशीलों न गेहूँ तस्य याम्यहाम्॥21॥
मिथ्यावादी, अपने धर्मग्रन्थों को न देखने वाला, पर पराक्रम से हीन, खोटे स्वभाव का, ऐसे पुरुषों के गृह मैं नहीं जाती॥21॥
सत्यहीनः स्थाप्यहारी मिथ्यासाक्ष्यप्रदायकः।
विश्वासघ्नः कृतघ्नो यो यामि तस्य न मन्दिरम्॥
सत्य से हीन, किसी की धरोहर को मारने वाला, झूठी गवाही देने वाला, विश्वास देकर मुकरने वाला, ऐसों के घर नहीं मैं नहीं जाती।
चिन्ताग्रस्तो भयग्रस्तः शत्रुग्रस्तोऽतिपात की।
ऋणग्रस्तोऽतिकृपणो न गेहं यामि पापिनाम्॥23॥
चिन्ताग्रस्त, भयग्रस्त, शत्रु ग्रस्त, पातकी, कर्ज दार, अधिक कंजूस ऐसे पापियों के घर मैं नहीं जाती॥23॥
दीक्षाहीनश्चशोकार्त्तो मन्दधीः स्त्रीजितः सदा।
न याम्यपि कदा गेहं पुँश्चल्याः पतिपुत्रयोः॥24॥
गुरु से हीन, शोकग्रस्त, मन्दबुद्धि, स्त्री का गुलाम, व्यभिचारिणी का पति और पुत्र ऐसे पुरुष के यहाँ मैं कदापि नहीं जाती॥24॥
यो दुर्वाक् कलहाविष्टः कलिः शश्वद् यदालये।
स्त्री प्रधाना गृहे यस्य यामि तस्य न मन्दिरम्॥25॥
कटु भाषी, कलह प्रिय, जिसके घर निरन्तर कलह होता रहे, जिसके यहां स्त्री की चलती रहे ऐसे पुरुष के यहाँ मैं नहीं जाती॥25॥
इससे प्रकट है कि दुष्ट, कुबुद्धि, कुसंस्कारी लोगों के यहाँ लक्ष्मी नहीं जाती और वहाँ सदा दरिद्रता का साम्राज्य छाया रहता है।
(प्रो॰ रामचरण महेन्द्र एम॰ ए॰)
आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से हम सम्पूर्ण मानव-समाज को निम्न स्तरों में विभाजित कर सकते हैं-
(1) साधारण मनुष्य।
(2) सुसभ्य मनुष्य।
(3) सुहृदय मनुष्य।
(4) आध्यात्मिक महापुरुष।
साधारण मनुष्य -
साधारण मनुष्य मानव जीवन के प्रथम स्तर पर रहता है। वह विविध-विघ्न- बाधा संकुल जगत के नाना प्रकार की व्यथाओं, मानव-विकारों द्वारा संचालित होता है। उसे केवल अधिकारों का ही ध्यान होता है। आज संसार, देश, प्रान्त और घर-घर में अधिकारों का युद्ध हो रहा है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अधिकार माँग रहा है। साधारण मनुष्य दूसरों से अधिकार के लिए लड़ता है, झगड़े-टेंटों में पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, वासना, स्वार्थ में निमग्न रहता है साधारण मनुष्य संचयी होता है वह हर प्रकार के संचय (धन, मान, जायदाद, वस्त्र, नाना वस्तुएँ, मकान) में निरन्तर निमग्न रहता है। वह केवल इस लोक में विश्वास करता है। अतः यहीं स्थायी रूप से रहने का इन्तजाम रखता है। द्वेष घृणा के विकार उस एक स्थान से दूसरे स्थान पर तरंगित करते हैं। वह परदोष दर्शन में विशेष दिलचस्पी लेता है। जब उसके स्वार्थों पर धक्का पहुँचता है, तो वह पाशविक बल का प्रयोग करता है। वास्तविक बल से वह अपना दूसरे पर अधिकार रख कर अनुचित कार्य करना चाहता है। वह पशु से कुछ ऊँचा होता है। उसमें बुद्धि का प्रयोग होता है, किन्तु निज स्वार्थ तथा व्यक्तित्व लाभ के बाहर उनका उपयोग कम से कम है। वह उसमें उलझा रहता है। उसके पास एक लम्बा कुटुम्ब है। वह अपने कुटुम्ब की आवश्यकताएँ देखता है और उसकी पूर्ति में अपनी सर्वोच्च शक्तियों का ह्रास करता है। साधारण मनुष्य से वासना तथा वासनाजन्य सुखा भास, सबसे बड़ी कमजोरी है। इसके कारण वह भोजन में उत्तेजक पदार्थ खाता है, स्पर्श, जिव्हा, श्रवण, वासना के जन जाल में लिपटा रहता है। काम वासना की पूर्ति तथा उसके कुफल भुगतने में उसका जीवन समाप्त हो जाता है।
सुसभ्य मनुष्य-
यह साधारण मनुष्य से उच्च स्तर पर निवास करता है। इसे अपने अधिकार एवं कर्त्तव्य दोनों का ध्यान रहता है। प्रत्येक अधिकार अपने साथ कर्त्तव्यों का भारी बोझ लाता है। यह कर्त्तव्य हमारी समूची शक्तियों को अपने अन्दर समाविष्ट कर लेता है। यदि हम अधिकार चाहते हैं, तो कर्त्तव्य का भी विवेक रखना होगा- यह विचारधारा सुसभ्य व्यक्ति की है।
संचय के साथ उसे दान का भी पूर्ण विवेक होता है। संचय का सबसे उत्तम उपयोग यह है कि हम अपने अर्थ धन को काम में लें, पर साथ ही साथ दूसरों की आवश्यकताओं तथा सहायता का भी पर्याप्त ध्यान रखें।
वह घृणा, द्वेष से उठ कर न्याय पर रहता है। न्याय का अर्थ वह व्यापक रखता है। उस न्याय में जो ठीक है, वह उसे अपने लाभ में उपयोग कर सकता है। वह बुरा भला दोनों देखता है।
सुसभ्य व्यक्ति समय पड़ने पर परिस्थिति के अनुसार शारीरिक बल का तो प्रयोग करता है पर उसमें आत्मबल भी होता है। आत्मबल का भी प्रयोग वह किया करता है। आत्मबल विकसित होने के पथ पर होता है।
जहाँ साधारण व्यक्ति अश्रृंखला और हठी होता है, सुसभ्य व्यक्ति नीति का पालन करता है। उसका व्यवहार विवेक मय होता है। बल तर्कपूर्ण नीति में विश्वास रखता है।
इस श्रेणी के व्यक्ति में विद्या का उचित उपयोग रहता है। विद्या उसे कर्त्तव्य के साथ अधिकार का, बुराई के साथ भलाई का, शारीरिक बल के साथ आत्मबल का, नीति के साथ विवेक का, न्याय के मार्ग का अवलम्बन दिखाती है।
वासना का उचित उपयोग वह किया करता है। प्रत्येक वासना के जन्य सुख का प्रभाव बुरा होगा, पर उससे मुक्त होना भी संभव नहीं। अतः कम से कम उसमें प्रवृत्त होना उसका काम रहता है। समाज तथा व्यक्ति के हित के अन्य कार्यों में, ललित कलाओं तथा ज्ञानार्जन में उसका समय लगता है। उसकी वासना निमन्त्रित होती है।
सुहृदय मनुष्य।
विकास की तृतीय श्रेणी में मानव अधिकार के स्तर से ऊँचा उठकर केवल कर्त्तव्यों की ही कामना करता है। वह संचय के स्थान पर दान को अधिक महत्व प्रदान करता है। न्याय के साथ दो और दैवी विभूतियों का उदय उसके हृदय में होता है-क्षमा और प्रेम। इन दोनों के शुभ प्रकाश में वह निरन्तर आगे बढ़ता है।
वह सबमें अच्छाई ही अच्छाई ही देखता है। प्रदोष दर्शन की संकुचित एवं त्रुटिपूर्ण भावना से मुक्त होकर वह दूसरों के गुणों का, उत्तमोत्तम दैवी तत्वों का विवेचन पसन्द करता है। गुणों में विहार करने से वह स्वयं अमित गुणों का स्वामी बनता है। उन गुणों का बीज उसके मस्तिष्क में प्रस्फुरित होता है। वह गुण निधान है। अच्छा चरित्र एवं शारीरिक मानसिक मानसिक का पुतला होता है।
वह केवल आत्मबल का प्रयोग करता है। उसकी आत्मा में बल क्रमशः वृद्धि पर रहता है जो उसकी आत्मा के तत्व हैं-सत् चित् आनन्द का विकास इतना हो जाता है कि साधारण जगत् सम्बन्धी कठिनाइयों, दुःख, उसे स्पर्श नहीं कर पाती।
वह आत्म संयमी होता है। अपनी वृत्तियों पर उसे पूर्ण अधिकार होता है। वह दुःख या पीड़ा देख कर कातर एवं बिह्रल नहीं हो जाता। वह जानता है कि दुःख अवश्यम्भावी है। उससे ऊँचा उठ कर वह कुशल सारथी की तरह उन्हें अपने काबू में रखता है। उसका मन इतना सुसंचालित और सुशिक्षित होता है कि वह जो कुछ चाहता है, दृढं इच्छा शक्ति के बल से अवश्य पूर्ण करता है।
वासना के पंजे से वह दूर रहता है वह वासना का परिष्कार कर उसके प्रकाश के लिए ऊँचे सुसंस्कृत मार्ग प्रदान करता है। भक्तिभाव, भजन, कीर्तन, उच्च शास्त्रीय संगीत, सात्विक, चित्रकारी, स्थापत्य, साहित्य, सृजन, कविता इत्यादि सात्विक मार्गों से वह अपने वीर्य का सदुपयोग करता है। उसकी भावना कर्त्तव्य के लिए सतत प्रेरित करती है।
आध्यात्मिक महापुरुष-
मानव होकर भी वह देवता की श्रेणी में उठता है। उसका सर्व प्रथम गुण सब मानव प्राणियों में एकत्व का अनुभव करना है। समग्र मानव समुदाय में केवल एक ही सत्ता का प्रकाश है। एक ही आत्म भाव में आबद्ध हम सब मानव उसी तेज पुँज की रश्मियाँ हैं। जन्म, कुल, स्वभाव जाति-पाँति में विभिन्न होते हुए भी आन्तरिक दृष्टि से हम सब एक हैं। हमारा सम्बन्ध एक आत्मा का है।
वह निष्काम कर्म करता है। और कर्म फल की आशा नहीं रखता। फल मिले न मिले, लोग पसन्द करें न करें, हानि हो या लाभ, व्यक्तिगत फायदा या नुकसान, किसी की परवाह न करते हुए, वह कर्म में रत है, अपन कर्मों द्वारा ही संसार में कुछ कर लेना चाहता है
उसके हृदय में सब के लिए नमन व सम्मान होता है। प्रत्येक व्यक्ति को वह अपनी आत्मा का एक अंश समझता है। सर्वत्र आत्मभाव का विस्तार कर अपनी आत्मा की परिधि में अधिक से अधिक मनुष्यों तथा प्राणियों को लेता है।
“सियाराम मय सब जग जानी” -सर्वत्र यही भाव रखने वाला दार्शनिक संसार में रहता हुआ भी कमल के पुष्प की भाँति संसार रूपी जल से ऊंचा रहता है। विवाहित और गृहस्थ में फँस कर भी अंतःवृत्ति से इन श्रृंखलाओं से उच्च स्तर पर निवास करता है। मानसिक विकारों पर उसे पूर्ण संयम तथा निग्रह होता है। वह पशु बल से ऊँचा उठ जाता है। केवल ईश्वरीय बल (गौड पावर) का प्रयोग करता है। आत्मबल वह बल है जिससे सभी बल नीचे रह जाते हैं। जो विद्वान की सभी शक्यों को पार कर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति पर अपना प्रभाव डालता है। इसका सूक्ष्म प्रभाव निरन्तर मनुष्यों के आन्तरिक केन्द्रों पर पड़ता रहता है।
वह कर्म में स्वतन्त्र है, क्योंकि बुराई उसके पास फटक नहीं सकती। उसके सब कर्म स्वयं उच्च कोटि के होते हैं।
जैसे विद्यार्थी क्रमशः एक-एक कक्षा पार करके ऊँची कक्षाओं में चढ़ता जाता है उसी प्रकार हमें प्रयत्न करना चाहिए कि अपने विकास स्तर को क्रमशः ऊँचा उठावें। आज अपनी मनोभूमि जिस स्तर पर है कल उससे ऊँचे स्तर पर पहुँचे इसी प्रयत्न की विभिन्न प्रक्रियाओं को आध्यात्मिक साधना कहते हैं।
सब ओर से मन को हटा कर भगवान के चरणों का आश्रय लेने वाले भगवान के प्रिय पुरुष में यदि कोई दोष भी हो तो हृदय में रहने वाले सर्वेश्वर भगवान् उसे नष्ट कर देते हैं।
(लेखक -पं॰ गौरीशंकरजी मिश्र, बी॰ ए॰ एल॰ एल॰ बी॰)
ईश्वरीय सत्ता के संगठनात्मक अंग को प्रकृति कहते हैं। प्रकृति वह अंकुश है, जो सारी सृष्टि के अस्तित्व को अपने नियमित नियमों में बाँधे रखती है और जो उसकी बागडोर से विचलित हुआ वह अपने उत्पत्ति मन्तव्य से गिरकर प्रायः नष्ट-हो जाता है। प्रकृति का सर्वोपरि नियम है कि सृष्टि के चला चल पदार्थों कि मित्रता, उनकी वृद्धि तथा उनका जीवन योग तथा जोड़ सिद्धान्त पर अवलम्बित है। भिन्न भिन्न परमाणु जुड़कर नाना रूपधारी अचल वस्तुओं का अस्तित्व बनाते हैं। उसी प्रकार चल संसार में भी परस्पर मेल सजीवता तथा जीवन वृद्धि के लिए अनिवार्य है। अबोध जगत के जीव अर्थात् पशु-पक्षी तथा जलकर प्रकृति-नियमानुसार अपना जोड़ा चुनते हैं, सृष्टि-कार्य का पालन करते हैं, किंतु उनमें आत्मीयता तथा द्वैत में अद्वैतता के भावाभाव के नाते उनके जोड़ो में सम्बन्ध स्थिरता की कमी होती है। परन्तु पशु संसार का वीरोत्तम पशु अर्थात् सिंह न केवल सिंहनी को साथ लेता है, बल्कि अपने निवास वन में यह अकेले रहना और विचरना पसन्द करता है। यही कारण है कि सिंहों तथा सिंहनियों का झुंड एक साथ नहीं रहता। सिंह और सिंहनी दोनों सम्बन्ध-स्थिरता के महत्व को स्वभावतः जानते हैं कि उनका प्रत्येक नर-मादा जोड़ा अपना युगल मुख जोड़कर परस्पर प्रेम में मस्त अपनी अपनी आंखें बन्द कर एक साथ बैठता है सम्बन्ध-स्थिरता तथा परस्पर प्रेम की महत्ता के ये अनूठे तथा उपदेश प्रद दृश्य हैं।
इससे आगे चलकर जब हम मानव सृष्टि की ओर दृष्टि दौड़ते हैं तो हमें स्पष्टतया मालूम होता है कि उपरोक्त सिद्धान्त यहीं विशेष रूप से समझबूझ कर बरता जाता है। मनुष्य सामाजिक जीव है और समाज प्रकृति के संगठनात्मक नियमों के ताने-बाने में बँधा होता है। स्थिरता, सजीवता तथा उन्नति शीलता संगठन के फल-फूल हैं अतएव मानव-सृष्टि ने, विशेष रीत्या संगठित होने की महत्ता समझती हुई अपने को प्रकृति की नियमावली में जकड़ रखा है। वन में रहने वाले पुरुष तथा स्त्री सभ्य संसार के पुरुषों और स्त्रियों की भाँति चाहे विकसित नहीं किन्तु दाम्पत्य-प्रेम तथा दाम्पत्य स्थिरता का महत्व वह भी विशेष रूप से समझते हैं। यही कारण है कि स्त्री और पुरुष अपना अपना जोड़ा बनाकर रहते हैं और वे जोड़े परस्पर जन्य तथा बाहरी कारणों से टूटते-फूटते नहीं रहते। असम्य तथा अविकसित जातियाँ में स्त्री-पुरुष के ऐक्य का दृश्य किसी से छिपा नहीं है। फिर, सभ्य मानव समाज में दाम्पत्य की महत्ता क्या होनी चाहिए, इसे साधारण मस्तिष्क भी बतला सकता है। परन्तु वर्तमान समय में पाश्चात्य शिक्षा के विकृत और उच्छिष्ट भाग में शिक्षित हमारे बहुत से पढ़े-लिखों ने तलाक मन्त्र की रटन’ प्रारम्भ कर दी है। दाम्पत्य-सम्बन्ध विच्छेद को तलाक कहते हैं तलाक की प्रथा अधिकतर जड़-पूजक पश्चिम में पाई जाती है। वहाँ का उत्पन्न धर्म ईसाई मत तलाक का पक्षपाती है। कारण यह है कि पश्चिमी संसार में रोटी सर्वस्व है, पैसा रोटी लाता है, इसलिए पैसा वहाँ ईश्वरत्व को भी आवाहन करता है। पुरुष इसलिए स्त्री को स्वीकार करता है कि उसे कुछ साँसारिक सुख प्राप्त होगा और स्त्री भी उसे इसी कारण स्वीकार करती है। यही कारण है कि जहाँ पैसों की कमी हुई कि स्त्री और पुरुष उसके लिए नाना प्रकार के निन्द्य साधनों का प्रयोग करते हैं। इसके प्रतिकूल हिन्दू धर्मानुसार दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य तो लौकिक, तथा परलौकिक दोनों है। इसमें साँसारिक सुख-भोग के साथ ही अध्यात्मिक उन्नति तथा संसार-सेवा प्रधान स्थान रखते हैं। इसमें पुरुष और स्त्री पैसे की दुर्बल डोर में नहीं बल्कि विशुद्ध प्रेम के अटूट धागे में बँधते हैं हिन्दू विवाह हृदयों को जोड़ता है मनों को मिलाता है और आत्माओं को एक दूसरे में विलीन करता है। इसमें लौकिक भोग का आदर्श भी अत्यन्त विशुद्ध और ऊँचा है और वह यह है कि दम्पति ऐसी सन्तान उत्पन्न करे जो समाज और संसार की सेवा करे और ईश महत्ता का प्रचार करे। पाश्चात्य संसार पैसों का पुजारी है, इसलिये वहाँ के पुरुष और स्त्री पैसे के सम्बन्ध में संबद्ध होते हैं। भारत वर्ष तथा अन्य पूर्वीय देशों में, जहाँ हिन्दू तथा उसके रूपांतरण धर्मों का प्रचार है, आत्मिक शाँति का प्राधान्य है, इसलिये यहाँ का दाम्पत्य जीवन आत्मिक प्रेम से ओत-प्रोत रहता है। परन्तु वर्तमान भारत में ‘नकल युग‘ का उदय हुआ है। अंग्रेजी पढ़ें-लिखों को आत्म-स्वरूप की परवाह नहीं, उन्हें अपने धर्मशास्त्रों की बातों को पढ़ने, जानने या सुनने की इच्छा नहीं, उन्हें लाभ-हानि, मानापमान की सुधि नहीं, उन्हें तो नकल भूत के आवेश में नक्काल बन कर संसार-मंच पर थिरकना है और अपनी सभ्यता और अपनी भारतीय शान पर पानी फेरना है। आज हमारा मस्तिष्क, हमारी भाषा, हमारा वेश, हमारा हृदय, पश्चिमी कुरूपता छूत से कुरूप हो रहा है। तलाक का शौक भी जो आज भारत के कुछ बिगड़े-दिलों को उबाल रहा है, उसी छूत का परिमाण है। यों तो तलाक की इजाजत विशेष परिस्थितियों में हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी वर्तमान है। ईसाई और इस्लामी धर्म शास्त्रों का तो यह मत है,कि जब चाहे, पुरुष या स्त्री एक दूसरे से अलग हो सके। तलाक के प्रतिपादन के दो कारण बतलाये जाते हैं।
स्त्रियाँ पुनर्विवाह नहीं कर सकती हैं, (2) अब स्त्रियाँ शिक्षित हो रही हैं अतः वे पुरुषों की अधीनता नहीं स्वीकार कर सकती। दोनों तर्क प्रायःकारण-कार्य रूपेण एक ही हैं। स्त्रियाँ शिक्षित होते ही पुरुषों की दासता अनुभव करने लगती है, इसलिये वह पुनर्विवाह करेंगी? यह तर्क विचित्र है। परन्तु स्त्रियों का पुनर्विवाह तो पुरुषों से ही सम्भव है, अतएव यदि शिक्षित स्त्रियों को विवाह से पुरुषों की आधीनता का भय है, फिर तो उसके विवाह एवं पुनर्विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता है। मुझे पूरा विश्वास है कि भारतीय स्त्री-समाज हिन्दू धर्म के दाम्पत्य जीवन की महत्ता तथा उच्चता को पूर्ण रूप से नहीं समझता तो भी धर्म तथा प्रकृति की प्रेरणा से उनका अन्तरंग उसे प्रतिक्षण अनुभव करता है और वह सहस्रों वर्षों से उसी अनुभव के अनुसार अपना जीवन-धर्म रखता चला आ रहा है।
ऊपर बतलाया जा चुका है कि हिन्दू दाम्पत्य जीवन का आदर्श क्या है। यह वही आदर्श है जिससे आज भी इस भारत में कभी-कभी पुरुष स्त्री के अनुपमेय प्रेम की झाँकी सज जाती है। ऐसा दृश्य इस देश में कम नहीं कि पुरुष मृत्यु-शय्या पर लेटा है, उसकी स्त्री सजधज कर उस मृतक शरीर के साथ लेट जाती है और इस प्रकार अपने बिछड़े पति में तल्लीन हो जाती है कि लेटे ही लेटे अपने शरीर को मृतक बनाकर अपने पति देव के चरणों का परलोक में दर्शन करती है। साथ ही ऐसे भी दृष्टान्त हैं जहाँ पुरुष अपनी सहधर्मिणी के स्वर्गारोहण पर या तो विरागी बनकर उसी के स्मरण में अपना सर्वस्व त्याग देता है या परलोक में उसका पीछा करता है। हिन्दू समाज में स्त्रियों का स्थान ऊँचा है। वह गृहिणी तथा गृहलक्ष्मी कहलाती है। वह अर्द्धांगिनी कहलाती है, बिना उसके पुरुष और बिना पुरुष के स्त्री अधूरे हैं। स्त्री और पुरुष, दोनों मिलकर पूर्णांक बनाते हैं और एक बार जब पूर्णांक बन और संवर चुका तो फिर उसका विच्छेद दोनों के लिये असुखकर और नाशकर ही होगा।
(डा॰ गोपाल प्रसाद ‘वंशी’ बेतिया)
(1) माल जिन्दगी के आराम के वास्ते है, किन्तु जिन्दगी माल जमा करने के वास्ते नहीं है। मैंने एक बुद्धिमान मनुष्य से पूछा, कि कौन भाग्यवान और कौन भाग्यहीन है? उसने उत्तर दिया कि जिसने खाया और बोया वही भाग्यवान है किन्तु जिसने भोगा नहीं लेकिन छोड़ कर मर गया वह भाग्यहीन है। उस शस्त्र के लिये ईश्वर से दुआ मत माँगो, जिसने ईश्वर भक्ति या परोपकार का काम न किया हो, तमाम उम्र रुपये जमा करने में बिता दी और उनको काम में भी न लाया।
(2) पैगम्बर मूसा ने करूं को इस तरह उपदेश दिया, कि तू लोगों के साथ उसी भाँति भलाई कर जिस भाँति ईश्वर ने तेरे साथ भलाई की है। करूं ने उसकी नसीहत पर कान न दिया। पीछे जो कुछ नतीजा निकला, वह तुम लोगों ने सुना ही है। जिसने धन से परोपकार न किया, उसने धन संग्रह करने के ख्याल में अपनी भावी आशाओं पर भी पानी फेर दिया। अगर तू संसारी धन से लाभ उठाना चाहता है तो ईश्वर ने जिस तरह तुझ पर मेहरबानी की है तू भी मनुष्यों पर दया कर। अरब लोग कहते हैं, कि दान करो किन्तु एहसान मत रक्खो। निश्चय रखो तुमको नफा जरूर मिलेगा। जहाँ परोपकार कर वृक्ष जड़ पकड़ लेता है वहीं से उसकी शाखें आसमान तक पहुँचती हैं। अगर तुम फल खाने की उम्मीद रखते हो तो मेहरबानी के साथ दरख्त लगाओ और उसकी जड़ पर आरा मत चलाओ। ईश्वर को धन्यवाद दो कि उसने तुम्हारे ऊपर मेहरबानी की और उसने तुम्हें अपनी उदारता से वंचित न रखा। इस बात की शेखी न मारो, कि हम राजा के यहाँ नौकरी करते हैं। किन्तु ईश्वर को धन्यवाद दो कि उसने तुम्हें राजा की सेवा में नियुक्त किया है।
धन वही सार्थक है जिससे परोपकार किया जाय। जिस धन से मनुष्य की भलाई न हो उस धन का होना ही व्यर्थ है। इसमें संदेह नहीं है कि परोपकार का फल हाथों-हाथ मिलता है। सत्पुरुषों का सर्वस्व ही परोपकार के लिये होता है। परोपकार के लिए ही वृक्षों में फल लगते हैं, परोपकार के लिये ही नदियाँ बहती हैं। परोपकार के लिए ही चन्द्र-सूर्य का उदय-अस्त होता है। परोपकार के लिए ही मेघ जल बरसाते हैं। साराँश यह है कि संसार में परोपकार करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
(3) दो शख्सों ने वृथा कष्ट उठाया और व्यर्थ उद्योग किया एक तो वह जिसने धन जमा किया, किन्तु उसे भोगा नहीं। दूसरा वह, जिसने अक्ल सीखी, मगर उसका अभ्यास न किया।चाहे जितनी विद्या क्यों न पढ़ लो, अगर तुम उस पर अमल नहीं करते तो तुम नादान हो। वह जानवर जिस पर किताबें लदी हुई हैं, न तो वह विद्वान है न बुद्धिमान। उस मूर्ख को क्या खबर, कि उसके ऊपर किताबें लदी हैं या ईंधन।
(4) विद्या धर्म-रक्षा के लिये है न कि धन जमा करने के लिये। जिसने धन कमाने के लिए अपनी नामवरी और विद्या खर्च कर दी, वह उस के समान है-जिसने खलिहान बनाया और उसे बिल्कुल जला डाला।
(5) विद्वान जो संयमी-परहेजगार नहीं है अन्धा मतलबी है। वह दूसरों को राह दिखाता है किन्तु उसे स्वयं राह नहीं मिलती। जिसने अपनी उम्र बेखबरी से गवाँ दी, वह उसके माफिक है जिसने रुपया तो खर्च कर डाला मगर कुछ चीज न खरीदी।
(6) बादशाहत की नामवरी अक्लमन्दों से होती है और धर्म-धर्मात्माओं से पूर्णता प्राप्त करता है। अक्लमन्दों को राज-दरबार में नौकरी पाने की जितनी जरूरत है, उससे बादशाहों को अक्लमन्दों की अधिक जरूरत है। ऐ बादशाह! ध्यान देकर मेरी नसीहत सुन, तेरे दफ्तर में इससे अधिक कीमती नसीहत नहीं है, कि अपना काम अक्लमन्दों के सुपुर्दकर, यद्यपि सरकारी काम करना अक्लमन्दों का काम नहीं है।
(7) तीन चीजें तीन चीजों के बिना कायम नहीं रहतीं, दौलत बिना सौदागरी के, इल्म बिना बहस के और बादशाहत बिना दहशत के।
(8) दुष्टों पर दया करना, सज्जनों के ऊपर जुल्म करना है। जालिमों को माफ करना, सताये हुओं पर जुल्म करना हैं। अगर तुम कमीनों के साथ मेल-जोल रखोगे और उन पर मेहरबानी करोगे, तो वे तुम्हारी हिमायत से अपराध करेंगे और तुम को उनके अपराधों का हिस्सेदार बनना पड़ेगा।
(9) बादशाहों की मीठी-मीठी बातों पर भरोसा न करना चाहिए। क्योंकि बादशाहों की दोस्ती जरा से शक पर टूट जाती है और लड़कों की प्यारी-प्यारी बातें रात भर में बदल जाती है। जिनके हजार चाहने वाले हैं। उसे अपना दिल मत दो, अगर दो तो जुदाई की तकलीफें सहने को तैयार रहो।
(10) मित्र के सामने अपना सारा गुप्त भेद मत खोल दो, कौन जाने वह कब तुम्हारा शत्रु हो जावे? इसी भाँति शत्रु को भी हर तरह की तकलीफें मत दो कौन जाने वह कभी तुम्हारा मित्र ही हो जावे? वह भेद जिसे तुम गुप्त रखना चाहते हो, किसी को भी मत बताओ, चाहे वह विश्वास योग्य ही क्यों न हो। अपनी गुप्त बात जितनी अच्छी तरह तुम खुद छिपा सकते हो, दूसरा हरगिज न छिपा सकेगा। किसी भी गुप्त बातों को एक शख्स से कहना और उसे दूसरे से कहने की मनाही करने से एक मद चुप रहना भला है। ऐ भले आदमी! पानी को निकास पर ही रोक। जब वह नदी के रूप में बहने लगेगा तब तू उसे न रोक सकेगा। जो बात सब लोगों के सामने करने लायक नहीं है उसे पोशीदगी में भी मत कर।
(11) आदमियों के छिपे हुए राज जाहिर मत करो, क्योंकि उनकी बदनामी करने से तुम्हारी भी बेऐत बारी हो जायगी।
( ले॰-श्री भाऊ जी गोरक्ष पण्डित)
ॐभूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यक्षराण्यष्टाक्षर हवा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद॥ 1॥
-वृहदारण्यक उपनिषद् 14-225
अर्थ- “भूमि, अन्तरिक्ष द्यौः” यह आठ अक्षर (द्यौः के दो अक्षर समझना) गायत्री का पहला पद आठ अक्षरों का है (तत्सवितुर्वरेण्यं) भूमि आन्तरिक दिशा यह गायत्री का प्रथम भाग गायत्री के इस (त्रैलोक्य स्वरूप) पद को जो जानता है वह त्रैलोक्य में मिलने सरीखा होता है वह सब प्राप्त कर सकता है।
ऋचो यजूँ षि सामानात्यष्टाक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्रै पदमेतदु हैवाम्या एतत्य यावतीयं त्रयी विद्या ताबद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद॥2॥
अर्थ- “ऋचों यजुषि सामानि” यह आठ अक्षर गायत्री का दूसरा पद (भर्गो देवस्य धीमहि) आठ अक्षरों का है। यह दूसरा भाग (पद) गायत्री के इस त्रयी विद्यारूपी पद को जो जानता है, वह त्रयी विद्या (ऋग॰ यजु॰ साम॰)को मिलाता है। अर्थात् तीनों वेदों को (फल को) पाता है।
प्राणोऽपानों व्यान इत्यष्टा क्षराण्यष्टाक्षर ह वा एकं गायत्रै पदमेतदु हैवास्या एतत्स योवदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पद वेदाथास्या। एतदेव तुरीयं दशत पदं परोरजा या एष तपति यद्वै चतुर्थ तत्तरीयं दर्शनं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्ये वैषरजउपर्युपरितपत्येवँ हैव श्रियो यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद॥3॥
अर्थ- “प्राण अपान व्यान” यह आठ अक्षरों का समूह गायत्री का तीसरा पद आठ अक्षरों का है (धियो योनः प्रचोदयात्) यह गायत्री का तीसरा पद है। गायत्री के इस प्राणरूप पद को जो जानता है उसको सब प्राणी मात्र वश होते है (यहाँ तक त्रिपदा-गायत्री का वर्णन किया गया है। अब चौथेपद का वर्णन करते है) आकाश में जो तपन होता है वह इन मनुष्यों से परे रहने वाला तेजरूप आदित्य स्पष्ट (प्रत्यक्ष) रूप से दिखाने वाला (दर्शतं) चौथा पद है। परोरज इसमें रज याने लोक पर ऊपर। क्योंकि आदित्य ऊपर प्रकाशता है। इससे चौथे पद को जो जानता है वह श्री (लक्ष्मी) और यश से प्रकाशित होता है
सैषा गायत्र्येतस्मँ स्तुरीये दर्शते पदे परोरजसी प्रतिष्ठिता तद्वै तत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानी द्वौ विवदमानवियाता महमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्र या दहमदर्शमिति तस्मा एवं श्रद्धध्याम। तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणों वै बलं तत्प्राणों प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादोगीय इत्येम्वेषा गायत्याधात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाँ स्तत्रे तद्यद्ग्याँ स्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम सयामेवाम् सावित्री मन्वा हैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणा स्त्रायते॥4॥
अर्थ- वह-गायत्री इस चौथे दृश्यवान ‘परोरज’ पद में स्थिर है। वह पद सत्य में स्थित है। चक्षु यह सत्य है। चक्षु को सत्य कह कर जब किसी दो व्यक्तियों में वाद होता है तब एक व्यक्ति कहता है मैंने ऐसा सुना है और दूसरा कहता है मैंने देखा है। तब देखा है ऐसा कहने वाले पर विश्वास किया जाता। वह सत्य बल पर स्थित है। बल यानी प्राण वह (बल) प्राण में स्थित है। इसीलिए कहते हैं कि बल सत्य से भी तेजस्वी है। इस प्राण से गायत्री आध्यात्मिक रूपी प्राण की जगह स्थित है। प्राण (इन्द्रियाँ) यही गया है, प्राण ने इन्द्रियों का रक्षण किया। गयकात्राण (रक्षण) किया इसी से गायत्री शिष्य को आचार्य जब इस संवित् देवनात्मक गायत्री का उपदेश करता है तब उस (शिष्य) के प्राणों की रक्षा करता है॥
ताँ हतामेके सावित्री मनुष्टुभमन्वाहुर्वाग नुष्टुवेतद्वाच मनुब्रूम म इसि न तथा कुर्याद्गायत्री मेव सवित्री मनब्रूयाद्यादि हवा अप्येवं विद्वव्हव प्रतिगृण्हाति न हैव तद्गायत्री एकं चिन पदं प्रति॥5॥
अर्थ- यह सावित्री (सवितृ देवतात्मक गायत्री) अपने शिष्यों को वाक् अनुष्टुप् है और (वाणी यह शरीरस्थ सरस्वती होने से ) वाणी के अनुसार सावित्री कहना परन्तु ऐसा न करना चाहिए। गायत्री छन्द में ही सावित्री को उपदेश किया जाना चाहिए। गायत्री जानने वालो ने अन्य बहुत सा ज्ञान अन्य किसी से कितना भी लिया जाय तो भी वह (अन्य ज्ञान) गायत्री के एक पाद के बराबर (योग्यता का) नहीं है।
सयइमाँ स्त्रींल्लोकान्पूर्णान्प्रतिगृण्हीयात्सोऽस्या एत प्रथमे पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रति गृण्हीयातसोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदीदं प्राणी यस्तावत्प्रति गृण्हीयात्सोस्या एतत्ततीयं पदमामयादयास्था पद् एतदेव तुरीयं दर्शन पदं परोरजा य एष तपति नैव केन चनाप्यं कुतउएतावत्प्रति गृण्हीयात्॥6॥
यह तीन लोक (यह ऐश्वर्य से पूर्ण ऐसे) गायत्री जानने वाले ने दान (प्रतिग्रह) लिया तो गायत्री के एक पाद का फल उसको मिला ऐसा जाने। अर्थात् -प्रतिग्रह (दान) का दोष गायत्री के एक पाद के प्रभाव से नष्ट होता है। विद्या का प्रतिग्रह लेने से उसको गायत्री के दूसरे पर के प्रभाव से दोष दूर होकर फल मिलता है। जो सब प्राणियों का प्रतिग्रह लेता है उसको गायत्री के तीसरे पाद का फल मिलता है। यह जो आदित्य तपन (प्रकाशमान) है यह दृश्यमान तथा परोरज ऐसा चौथा पद है। यह किसी को मिलना शक्य नहीं फिर उसका प्रतिग्रह किसको होगा गायत्री के प्रथम पाद के प्रभाव से तीनों लोक का ऐश्वर्य, दूसरे पद से त्रयी विद्या का ज्ञान और तीसरे पाद से प्राणिमात्र वश होना यह सब प्राप्त होता है। चौथे परोरज पद उपस्थान बताया है-
गायच्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्यद्यपदसी न हि पद्यसे। नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदोमा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्टतेऽहमदः प्रापमिति वा॥ 7॥
सूर्य के सम्मुख होकर प्रणाम करके ऊँचे हाथ उठाकर उपरोक्त मन्त्र से प्रार्थना करें। तुम एक पद हो, द्विपद हो, त्रिपद हो, चतुष्पद होकर भी पद रहित (निरुपाधिक) हो, इसी से तुम जानी नहीं जाती हो। प्रत्यक्ष देखने वाले परोरज ऐसे चौथे पद को मैं प्रणाम करता हूँ। तुम्हारी प्राप्ति में विध्नरुप ऐसा पाप रूपी शत्रु मेरे पर न आवे। गायत्री विद ब्राह्मण का जो द्वेष करेगा उसके काम कभी पूर्ण न करें। इस उपस्थान मन्त्र के प्रभाव से शत्रु के काम पूर्ण नहीं होते उपस्थान करने वालों को प्राप्त होते है॥।8॥
प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्टितं तस्मादाहुर्बलं। सत्यादोगीय इत्येवम्वेषा गायत्र्याध्यात्मं प्रतिष्ठिता॥
स हैषा गयाँस्तत्रे तद्यद्गयाँस्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम। सयामेवा मूँ सावित्री मन्वा हैषेव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राण स्त्रायते।
- वृ॰ अ॰ 5 त्रा॰ 14 मंत्र 4।
प्राण में बल है बल सत्य से भी तेजस्वी है। इसी से गायत्री आध्यात्मिक रूपी प्राण की जगह स्थित है। प्राण (इन्द्रिय) गये है। उसने (प्राण ने) इन्द्रियों का रक्षण किया। गया को र्त्राण किया इससे गायत्री कहलाती है। अपनी शिष्य को आचार्य जब इस संवित् देवतात्मा गायत्री का उपदेश करता है तब उस (शिष्य) के प्राणों की रक्षा करता है। इस महत्व के कारण गायत्री कही है। इसकी योग्यता महान है।
उपरोक्त मन्त्रों वृहदारण्यक उपनिषद्कार ने गायत्री के सम्बंध में बहुत कुछ रहस्यमय चर्चा की है। उसमें कहा गया है कि गायत्री के प्रथम पाद के मर्म को जो जानता है वह इन तीनों लोकों में जो कुछ मिल सकता है उस सबको प्राप्त कर लेता है। जो गायत्री के दूसरे पद का मार्ग समझ लेता है वह तीनों वेदों द्वारा मिल सकने वाले समस्त लाभों को प्राप्त करता है। तीसरे पद को जानने वाले के वश में सम्पूर्ण प्राणी हो जाते हैं।
गायत्री द्वारा बुद्धि की शुद्धि, और उस शुद्ध बुद्धि से आत्मोन्नति होती है। आत्मबल वह साधन है जिसकी सामर्थ्य दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु को प्राप्त कर सकता है। आत्मा परमात्मा का अंश है, उसके लिए अपने पिता को बनाई हुई कोई वस्तु अप्राप्त नहीं है। जैसे-जैसे पात्रता बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे दैवी भण्डार की कुंजियां प्राप्त होती जाती हैं।
गायत्री के तीन पद प्रसिद्ध हैं। पर उपनिषदों तथा तन्त्र, ग्रन्थों में कहीं-कहीं चार पद वाली गायत्री भी पाई जाती है। चौबीस अक्षरों वाली गायत्री के अन्त में कहीं-कहीं एक पद और भी जुड़ा हुआ मिलता है वह यह है- “परोरजसे सविंदोम्” जो इस चौथे पद को जानता है वह श्री और यश से प्रतिष्ठित होता है।
गायत्री शक्ति का स्थान प्राण है। इस शक्ति की उपासना से प्राण बलवान होते हैं। प्राणों का बल ही वास्तविक बल है। इस बल से तेजस्वी हुआ मनुष्य सत्य को प्राप्त करता है। यह सत्य ही आत्मा का दिव्य चक्षु है। सत्य की दृष्टि से जो कुछ देखा जाता है उसी के सम्यक् दृष्टि या तत्व दर्शन कहते हैं। यह जीवन का सर्वोपरि लाभ है।
यों तो शरीर में रहने वाली वाणी भी सरस्वती है। वाणी द्वारा-अन्यान्य शब्दों में भी गायत्री को तात्पर्य कहा जा सकता है। परन्तु ऐसा न करके गायत्री मन्त्र द्वारा ही उस सावित्री शक्ति की उपासना और ईश्वरीय महिमा को समझना चाहिए क्योंकि इस मन्त्र में ईश्वर की वह महिमा गायी गई है जो हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है। दुनिया में फैली हुई ढेरों जानकारियाँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी कि गायत्री के गर्भ में छिपा हुआ विज्ञान महिमामय है।
यदि तीनों लोकों की सम्पदा किसी को मिल जावे तो समझना चाहिए कि गायत्री के एक पद का पुण्य-फल मिला। यदि दान का अन्य खाकर भी लोक सेवा न करने का गुरुतर पाप नष्ट होता है वेद पढ़ कर दूसरों को न पढ़ाने का ज्ञानदान होते हुए भी यदि दूसरों को ज्ञानवान होते हुए भी यदि दूसरों ज्ञानवान न बनाने का महातम पाप भी यदि छूटता हो तो इसे गायत्री के दूसरे पद का प्रभाव समझना चाहिये। सब प्राणी यदि अपने आज्ञानुवर्ती बन जाय तो इसे गायत्री के तीसरे पद का प्रभाव समझना चाहिए। यह सब कुछ तो तीन पदों से ही प्राप्त हो गया फिर उस दुर्लभ चौथे पद से कौन सा महान लाभ प्राप्त होगा।
इस चौथे पद के लिए हमें प्रणाम करना चाहिए कि -”हे भगवती। आप छन्द बद्ध, पदों वाली होते हुए भी अज्ञेय हो। रजोगुण से परे जो “ॐ” कार है उसी की शक्तिरूप आप है पाप रूपी शत्रुओं से मेरी रक्षा कीजिए।”
इन भावनाओं के द्वारा जो व्यक्ति ब्रह्म परायणता हो गया है, ब्राह्मण बन गया है। उस निष्पाप व्यक्ति से भी जो दुष्ट-द्वेष एवं शत्रुता रखता है उसका मनोरथ कभी सफल नहीं होता वरन् अपनी दुर्भावनाओं के कारण स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
गायत्री की शक्ति महान है। वह अपने उपासक के प्राणों की रक्षा करती है और बल, तेज, अध्यात्म तथा सत्य का अमूल्य उपहार प्रदान करती है।
आजकल अनेक देशी और विदेशी सज्जन अण्डे खाने की बड़ी प्रशंसा किया करते हैं, उनकी समझ में अण्डे के समान दूसरा कोई भी शरीर को पोषण करने वाला पदार्थ नहीं है। यही नहीं वे अण्डे को निर्दोष और शुद्ध खाद्य भी बतलाते हैं बहुत से व्यक्ति तो अण्डे को फल या फल की उपमा दिया करते हैं, पर वास्तव में अण्डा क्या चीज है इस बारे में विलायती डाक्टरों के विचार ही यहाँ दे रहे हैं।
आजकल पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध से चौंधियाए हुए लोग कहा करते हैं कि दूध से अण्डा अधिक पौष्टिक है। ऐसा कह कर वे अण्डों का महत्व गाया करते हैं। आप खाते हैं और दूसरों को खाने को सलाह दिया करते हैं डॉक्टर लोग भी अपने रोगियों को आवश्यकता होने पर अण्डे का गुणगान करके उन्हें खाने की सलाह दिया करते हैं। अण्डे का महत्व जितना गाया जाता है उतना उसका महत्व नहीं है। एक हिसाब से तो अण्डा बहुत हानिकारक पदार्थ है पश्चिमी विद्वान डाक्टरों ने खोज करके अण्डे के सम्बंध में जो व्यवस्था दी है वह अंडे के प्रत्येक प्रेमी को जान लेना आवश्यक है।
पेरिस के मेडिकल विभाग क प्रोफेसर लाइनों सियर ने खोज कर लिखा है कि मुर्गी के माँस और अण्डे में एक प्रकार की विषैली अल्वूमन पायी जाती है जो जिगर और अन्तड़ियों में खराबी पैदा करती है और बहुत ही हानिकारक है। अण्डे के भीतर जो जरदी होती है उनमें नमक, चूना, लोहा और विटामिन सभी पदार्थ रहते हैं। यह पदार्थ बच्चे के पोषण के लिये भगवान ने भर दिये हैं। बहुत लोगों ने यह समझ लिया है कि यह चीजें हमारे खाने के लिये ही हैं। परन्तु यह उनकी भूल है।
अण्डे में जो प्रोटीन होती है वह दूध की प्रोटीन से कम दरजे की है क्योंकि उसके पचने में बड़ी कठिनाईयाँ आ पड़ती हैं। अधिकतर तो वह सड़कर खाने के योग्य न रह कर हानिकारक भी हो जाती है दूध तो रखा रहने पर जम जाता और खट्टा भी हो जाता है परन्तु अंडा सड़ गल जाता है। इस प्रकार का सड़ा अंडा खाने में खराब मालूम होता है और हानिकारक हो जाता है। इसके विपरीत खट्टा या जमा दूध अधिकाँश लोगों को ताजे दूध की अपेक्षा अधिक रुचि कर और सुपाच्य होता है। दूध का यह गुण उसकी मिठास का कारण है। जो अण्डे में होता ही नहीं। सात्विक भोजन के साथ आधा सेर दूध अण्डे और माँस के बिना ही प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा शरीर में पहुँचा देता है।
विलायती देशों में मक्खन निकालने के बाद मखनियाँ दूध प्रायः जानवरों को खिलाया या फेंक दिया जाता है। वहाँ के डाक्टरों ने इस मखनियाँ दूध की बाबत लिखा है कि यदि यह दूध मनुष्य के खाने के काम में लिया जाय तो इस देश के लिये माँस से अधिक लाभदायक होगा। नौ औंन्स साड़े चार छटाँक) मखनियाँ दूध शरीर में इतना चूना तथा हड्याँ बनाने वाली सामग्री पैदा कर देता है। जितना 1 दर्जन अण्डे नहीं कर पाते। एक अण्डा 30 इकाई गर्मी शरीर में पहुँचाता है। इसके विपरीत भैंस का दूध 31, गाय का दूध 38 इकाई गर्मी शरीर में पैदा करता है।
अण्डे के खाने से पाचन मार्ग में सड़न पड़ जाती है। इस सड़न से एक प्रकार की नशे की हालत पैदा हो जाती है। इससे जी मिचलाना, सिर दर्द, मुँह में बुरी गंध आना और दूसरी ऐसा ही अन्य बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। इसके बजाय दूध, बादाम, मूँगफली आदि में अण्डे से अधिक प्रोटीन रहती है। डा॰ पोलो ने यह सिद्ध कर दिया है कि जितना दूध बादाम आदि की प्रोटीन खाने पर आमाशय में पाचक रस बनता है, उतना अण्डे की प्रोटीन से नहीं बनता। अण्डे की कच्ची सफेदी पर पाचक रसों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और दूसरे भोजनों के पचने में भी रुकावट होती हैं।
वेटल क्रीक सेनेटोरियम के सुपरिन्टेन्डेन्ट जान हारवेकी लोग साहब लिखते हैं कि माँसाहारियों के सब बहाने सब प्रकार से एक-एक करके सभी जल्दी 2 लोप होते जा रहे हैं। यथार्थ में वर्तमान समय में उनका किसी प्रकार का कोई भी बहाना किसी भी दशा में स्वीकार करने योग्य नहीं है जब कि अच्छे 2 पदार्थ खाने को मिल रहे हैं। वैद्य से,
महात्मा गाँधी ने जीवन भर स्वराज्य की साधना की। वे कैसा स्वराज्य चाहते थे इसका उत्तर एक शब्द में “रामराज्य” है। रामराज्य हो उनका स्वराज्य था। केवल विदेशी शासकों को हटा कर देशी नौकरशाहों के हाथ में सत्ता चली जाय तो इतने मात्र से देश को भला नहीं हो सकता। जनता को ऐसे ही राज्य की आवश्यकता है। जो सुराज्य हो।
बाल्मीकि रामायण में रामराज्य काल की स्थिति का सविस्तार वर्णन मिलता है उसका कुछ अंश नीचे देखिये
“कौशल नाम का समृद्ध और प्रसन्न धन-धान्य से परिपूर्ण जनपद सरयू नदी के तट पर स्थित था। अयोध्या उसकी राजधानी थी। लता पुष्पों से वहाँ बड़ी शोभायमान कुशल कारीगरों द्वारा बनाई गई थी। शत्रुओं से रक्षा के लिए सैकड़ों तोपें उसके परकोटे पर लगी हुई थी। जंगली सिंहों से तलवार लेकर युद्ध करने वाले शूरवीर उसकी रक्षा में नियुक्त थे। नगरी के चारों ओर उद्यान और आम्रवन थे। अनेक प्रकार के वस्त्रों, अन्नों और रसों से भण्डार परिपूर्ण थे। मनोरंजन के लिये संगीत और अभिनय के कलाकौशल विद्यमान थे। सुन्दर वस्त्र भूषण से सुसज्जित स्त्रियाँ शोभा को बढ़ाती थी।
“रामराज्य के निवासी अत्यन्त प्रसन्न और संतुष्ट थे। वे धर्मात्मा बहुश्रुत, निर्लोभ और सत्यवादी थे। कोई कंगाल न था। कोई गृहस्थ ऐसा न था जो धन-धान्य, गौ और अश्व से रहित हो। कामी, कंजूस, क्रूर, चुगल और नास्तिक कोई भी दिखाई न पड़ती थी। सब स्त्री पुरुष पूर्ण सदाचारी थे। कानों में कुण्डल, सिर पर मुकुट, गले में माला, शरीर पर चंदनादि सुगन्धियों के लेप से रहित व्यक्तियों के दर्शन दुर्लभ थे। सब लोग अच्छा खाते थे और दान देकर खाते थे। उनमें कोई ओछी वृत्ति का चोर, कर्त्तव्य हीन और वर्ण शंकर न था। सभी लोग आस्तिक, सुशिक्षित, प्रसन्न, स्वस्थ, रूपवान और देशभक्त थे।”
राजा राम की विशेषताओं का वर्णन करते हुए नारद जी कहते हैं- “राजा राम, विद्वान हैं, संयमी हैं, बुद्धिमान हैं, वक्ता हैं। चौड़े कंधे वाले विशाल बाहु सुदृढ़ शरीर तथा सुडौल अंगों वाले हैं। वे धर्म को जानते हैं, वचन को पूरा करते हैं। रात-दिन प्रजा के हित में लगे रहते हैं। वह साधु स्वभाव, मधुर भाषी, प्रिय दर्शन, आर्य और प्रजा की भी धर्म रक्षा में प्रवृत्त रहने वाले हैं। समुद्र के समान गंभीर, हिमालय के समान धैर्यवान्, पृथ्वी के समान क्षमाशील और कालाग्नि के समान प्रतापी हैं।
एक बार किसी पिता का पुत्र छोटी आयु में भर गया। तो वह पिता राम के द्वार पर आकर रोया कि- “हे राजन् यह बड़ा अनर्थ है कि पिता के सामने पुत्र मर जाय। अवश्य ही तुम्हारे राज्य में पाप होता है तभी तो ऐसा हुआ।” यह सुनकर राम गम्भीरता पूर्वक उसके वचन में सच्चाई अनुभव की और धनुष बाण लेकर पुष्पक विमान में बैठ कर राज्य भर में यह देखने निकल पड़े कि मेरे राज्य में कहाँ ऐसा पाप होता है।
“शासन अकेला राजा नहीं करता था वरन् आठ चुने हुए मंत्री होते थे जिनमें दो पुरोहित महर्षि विशिष्ट और वामदेव भी थे। उनके गुण कर्म तथा स्वभाव सब प्रकार उज्ज्वल और संदेह रहित होते थे।”
रामराज्य का यही चित्र है। ऐसे ही शासन की स्थापना करने के लिए महात्मा गाँधी स्वराज्य का रामराज्य चाहते थे। आज स्वराज्य तो प्राप्त हो गया पर रामराज्य के दर्शन कहीं नहीं हो रहें हैं। राष्ट्र के कर्णधारों का शासकों का, नेताओं का, लोक सेवियों का, विचारकों का तथा सर्वसाधारण का कर्त्तव्य है कि वे रामराज्य की विशेषताओं वाला शासन स्थापित करने के लिए हर संभव उपाय करे तभी गाँधी जी की आत्मा को शान्ति मिलेगी और तभी स्वराज्य की सार्थकता सिद्ध होगी। सुखी प्रजा ही रामराज्य का प्रमाण हो सकता है।
कृपण लोगों को धन से प्रायः कोई भी सुख नहीं मिलता। इस लोक में तो उसके संग्रह ओर रक्षा की चिन्ता लगी रहती है और मरने पर वह (पाप से कमाया हुआ धन) नरक का कारण होता है जिस प्रकार जरा सा भी कोढ़ सर्वांगी सुन्दर रूप को बिगाड़ देता है, इसी प्रकार तनिक सा भी लोभ यशस्वियों के निर्मल यश को और गुणियों के प्रशंसनीय गुणों को कलंकित कर देता है।
-श्रीमद्भागवत
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जिसने इच्छा का त्याग किया उसको घर छोड़ने की क्या आवश्यकता? और जो इच्छा का बंधुआ है उसको वन में रहने से क्या लाभ हो सकता है? सच्चा त्यागी जहाँ रहे वही वन और वहीं भजन कन्दरा है।
-महाभारत,
(डा॰ लक्ष्मी नारायण जी टण्डन प्रेमी एम॰ ए॰)
(1) उपवास काल में एनेमा अवश्य लेना चाहिए। प्रश्न उठता है कि दो-चार दिन एनेमा लेने के बाद आंतों में रह ही क्या जायगा? जो बाहर निकले क्योंकि भोजन तो उपवास-काल में बन्द ही है। आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रत्येक स्वस्थ दिखाई देने वाला मनुष्य अपनी बड़ी आंतों में सदा दो-चार सेर मल चिपकाये रहता है।एनेमा लेने से आंतों में चिपका हुआ पुराना कड़ा मल धीरे-धीरे ढीला होकर निकलेगा। जिन लोगों ने छः-छः महीने लगातार एनेमा लिया है वे यह देख कर आश्चर्य में पड़ गए हैं कि न जाने कितना आँव सदृश चिकना पदार्थ उनकी आंतों से निकलता है।
इसके अलावा उपवास-काल में भी हमारे शरीर से हर समय भाँति-भाँति के विष तथा हर्षित पदार्थ उत्पन्न होते रहते और निकलते रहते हैं, प्राचीन संचित विजातीय द्रव्य विशेष रूप से उपवास काल में छूटता है, अतः एनेमा लेकर उन्हें निकालना अति आवश्यक है। क्योंकि उपवास काल में कोई ठोस भोजन न मिलने से पैखाने की हाजत स्वाभाविक रूप से नहीं होती। एनेमा से पेट आँतों पेडू आदि की सफाई ठीक से हो जाती है लम्बे उपवास के प्रारंभ पेट रहने से आंतों में जमा श्लेष्मा आदि ही नहीं, वर्षों पहले खाई दवाएँ एवं विष भी निकलता है। एनेमा का जल ताजे कुँए के पानी के ताम क्रम का हो और उसमें नीबू का रस मिलालें।
(2) उपवास-काल में जल का प्रयोग अधिक करना चाहिये। 2-3 सेर से कम पानी 24 घण्टे में न पिये। इससे मुँह की दुर्गन्धित श्वाँस, जीभ में पड़ी हुई पपड़ी और जीभ का बजाय कंपन दूर हो जाता है। शरीर के रक्त में से पानी पीने से, उसका विष छट कर गुर्दों में एकत्रित होता है। शरीर का विष पानी में घुल-घुल कर पेशाब तथा पसीने के मार्ग से निकलता रहता है। जल और वायु में बहुत अधिक संजीवनी शक्ति है। चूँकि पाचन-इन्द्रियों को उपवास काल में भोजन पचाना नहीं पड़ता। अतः वह विष को तथा मल को पचाने में बहुत तेजी से लग जाती हैं। अतः उपवास काल में तो पानी बहुत पीना चाहिये। पानी में नीबू का रस मिलाकर पीना उपयोगी होता है।
(3) श्री रामचन्द्र वर्मा ने उपवास-काल में रेत फाँकने को भी उपयोगी बताया है। रेत गोल और खुर्दरी शुद्ध की हुई होनी चाहिए। नुकीली और धारदार बालू के दाने न हों। सफेद की अपेक्षा भूरे रंग की रेत अधिक अच्छी होती है। खूब गरम पानी में उसे उबाल कर साफ कर लें। एक से तीन चम्मच तक रेत 24 घण्टे में फाँकी जा सकती है। उन्होंने लिखा है। “रेत फाँकने के गुणों की जानकारी पहले पहले वोस्टन नगर के प्रोफेसर सर विलियम विजन्सर ने प्राप्त की थी। उन्होंने यह सिद्धान्त निकाला था कि मनुष्य के अतिरिक्त प्रायः सभी जानवर अपने भोजन में थोड़ी बहुत रेत सदा और अवश्य मिला लेते हैं। उस रेत से उनकी भोजन वाहिनी नलिका सदा बहुत साफ और स्वच्छ रहती है और इसके कारण भोजन गुठलों में बँध कर कब्जियत नहीं उत्पन्न कर सकता। स्वयं डॉक्टर मैकफेडन ने जब यह विलक्षण सिद्धान्त सुना तब उन्हें बहुत आर्श्रय हुआ था, क्योंकि रेत को कोई मनुष्य को स्वाभाविक खाद्य नहीं मान सकता। पर डॉक्टर महाशय ने लगातार तीन वर्ष तक हजारों रोगियों को उसका व्यवहार कराया। तब उसके गुणों के सम्बन्ध में उनका पहला आर्श्रय और भी बढ़ गया। हजारों में से एक रोगी भी ऐसा न निकला जिसे रेत के व्यवहार से किसी प्रकार की हानि पहुँची हो
कब्ज के रोगियों को यदि उपवास न भी कराया जाय। तो भी रेत फाँकने से बहुत लाभ होता है।
(4) शुद्ध वायु का सेवन करें ब्रह्म मुहूर्त की वायु सबसे शुद्ध होती है। उस समय खुली हवा में प्राणायाम करने, व्यायाम करने, टहलने, दौड़ने आदि से परम लाभ होता है। उपवास कर्ता को विशेष रूप से इस बात का ध्यान रखना चाहिए। यदि अत्याधिक निर्बलता या रोग हो तो खुली छत पर ही प्रातः की वायु का सेवन करें। ठण्डी वायु से कभी हानि नहीं हो सकती। नींद लाने की सर्वोत्तम औषधि डॉक्टर फ्रान्किलन ठण्डी वायु बतलाते हैं।
(5) नित्य प्रति ठण्डे स्वच्छ जल से स्नान करें। अधिक रोगी या निर्बल खुरदुरे कपड़े से बन्द जगह में शरीर के अंगों को पोंछ लें। गरम पानी से नहाने पर रोम कूप अवश्य खुल जाते हैं पर उसकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती। अतः विशेष अवसरों को छोड़कर या विशेषज्ञ के आदेश के अतिरिक्त गरम जल से न नहाना ही उत्तम है। हमारे महर्षियों ने ब्रह्ममुहूर्त में नदी-स्नान को इसीलिये इतना महत्व दिया है। प्रातःकाल की वायु निकलते हुए सूर्य की अल्ट्रा-वायलेट किरणें, हल्का चलने का व्यायाम और स्नान तथा फिर खुले स्थान में पूजा पाठ, ईश्वराधना, आदि करें। ठण्डे जल से कभी हानि नहीं होती।
(6) उपवास-कर्त्ता को नित्य प्रति प्राणायाम तथा व्यायाम करना चाहिये। व्यायाम के अंतर्गत डण्ड-बैठक, मुगदर, डम्बल ही नहीं हैं, टहलना, तैरना, वृक्षों पर चढ़ना, पर्वतों पर चढ़ना आदि सभी हैं। पर जिस रोगी को अत्याधिक निर्बलता जान पड़े और उसका अन्तःकरण विश्राम करने का आदेश दे उसे उस समय किसी प्रकार का व्यायाम न करना चाहिये। व्यायाम से निद्रा अच्छी आती है, रोम कूपों से पसीने के रुप में विषैला पदार्थ निकल जाता है और साधारण अवस्था में शरीर बलिष्ठ, मन प्रसन्न तथा पाचन-क्रिया ठीक रहती है। छोटे उपवासों में शारीरिक श्रम तथा व्यायाम पहले का सा रखा जा सकता है पर लम्बे उपवासों में अत्याधिक श्रम तथा कसरत वर्जित ही है। उपवास के तीसरे दिन के बाद व्यायाम कर लेना चाहिये। हाँ, चलने-फिरने की कसरत निरन्तर जारी रखी जा सकती है।
(7) उपवास-कर्त्ता को नित्य प्रातःकाल की सूर्य-रश्मियों का सेवन करना चाहिये। धूप-स्नान तथा वायु स्नान से अत्यन्त लाभ होता है। हाँ, 9-10 बजे दिन के बाद की धूप हानिप्रद भी हो सकती है। धूप लेने से शरीर का विकार पसीने के रूप निकलने लगता है।
(8) उपवास-कर्त्ता को उपवास के बीच में कभी कोई दवा नहीं खाना चाहिये।
(9) कभी आलस्य या सुस्ती में न पड़े रहिये, अन्यथा खाली दिमाग शैतान का घर होता है। निठल्ले बैठे या पड़े रहने पर आपको भोजन, भूख, और अपनी कमजोरी की बात ही उपवास में सूझेगी। अतः सदा से कार्य-व्यस्त रहिये, अपना दैनिक कार्यक्रम निश्रित कर लीजिए, और तदनुसार कार्य कीजिये यदि आप नौकरी पेशा या दुकानदार हैं, अपने काम पर जाइए, अध्यापक या विद्यार्थी हैं तो विद्यालय जाइए। फालतू समय में लिखिए-पढ़िए, मनोविनोद के खेल खेलिए। उपवास काल में श्रेष्ठ पुस्तकों का मनन तथा अध्ययन और पूजा पाठ, ईश्वर-चिन्तन आदि में अपना मन लगाइये।
(10) उपवास-काल में कड़ुवे तेल को मालिश नित्य कीजिए और हो सके तो धूप में बैठकर।
(11) उपवास कर्त्ता को घबराना नहीं चाहिए यदि उपवास के प्रारम्भ में उसे कमजोरी ज्ञात हो, रक्त में जब शरीर का विष उखड़-उखड़ कर मिलता है तब बेचैनी, अनिद्रा, कमजोरी आदि
लगती है। पूरे धैर्य, शान्ति, उत्साह तथा विश्वास से उपवास का निर्धारित काल व्यतीत करना चाहिए। ऐसे लोगों से जो मित्र के रूप में जो शत्रु हों दूर ही रहें अर्थात् ऐसे लोग जो सहानुभूति दिखाने के लिए आपके भावी संकट का चित्र आपके सामने रखें, आपकी बढ़ती कमजोरी को वर्णन करें।
(12) प्रकृति के निकट रहने का प्रयत्न करो बाग-बगीचा, हरी घास, नदी-तट, पर्वत, झरना, एकान्त स्थल, जंगल, गाँव आदि में।
(श्री स्वामी श्रीविवेकानन्द जी)
सब धर्मों में ईश्वर प्रार्थना करने की रीति है। किन्तु जरा आपको यह स्मरण अवश्य रखना होगा, कि धन-सम्पति पाने, या पुत्रादि के लिए या आरोग्य होने के लिए, या स्वर्ग प्राप्ति के लिए भगवान से जो प्रार्थनायें की जाती हैं, वह विशुद्ध भक्ति में दाखिल नहीं हैं यह सब केवल बनिये की तरह क्रय-विक्रय है।
जो भगवान से शुद्ध प्रेम करना चाहते हैं, जो सच्चे अनन्य भक्त होना चाहते हैं, उनको उचित है, कि- वह इन सब साँसारिक कामनाओं का त्याग कर दें, तब उनको विशुद्ध भक्ति गृह में प्रवेश करने की आशा मिल जायगी। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि- जो जिस वस्तु की इच्छा से भगवान की प्रार्थना करते हैं उन्हें वह वस्तु प्राप्त नहीं होती। नहीं, नहीं प्रार्थना से वह जो चाहते हैं, भगवान् उन्हें देते हैं। किन्तु वह हीन बुद्धि तथा निम्न श्रेणी के मनुष्य का धर्म है।
“उषित्वा जान्हवीतीरे कृपं खनति दुर्मतिः।”
अर्थ- वह मूर्ख है जो गंगा के तट पर रहकर जल के लिए कुँआ तैयार करा रहा है। सचमुच वह अवश्य ही मूर्ख है जो हीरे की खान में आकर काँच का टुकड़ा खोजता रहता है। इसी तरह भगवान् हरि हीरे ही खान समान है और यह सब धन, मान, ऐश्वर्य काँच के टुकड़े हैं। यह सभी जानते हैं, कि- एक दिन यह देह अवश्य विनष्ट हो जायगी, फिर भी बारम्बार इसे स्वस्थ रखने के लिये इसके आराम के लिये भगवान से प्रार्थना की जाती है। इस तुच्छ प्रार्थना में ही यह अमूल्य समय क्यों नष्ट किया जाता है।
देखा गया है कि- बहुत धनी मनुष्य भी अपने धन को कम समझकर उसका पूर्णरूप से उपभोग नहीं कर पाते हैं। यदि रक्खो! हम इस जगत् की सारी चीजें नहीं पा सकते। यदि सब चीजें न मिलें, तो क्या हर्ज है? देह एक दिन नष्ट होगी ही, इन सब वस्तुओं के लिए कौन चिन्तित हो जो अपने आप आये, आने दीजिये-जावें तो जाने दीजिये। चिन्ता न कीजिये, मस्त रहिये। इनका आना भी अच्छा और न आना भी अच्छा ही है। किन्तु भगवान् के समीप जाकर यह चीज वह चीज, माँगना अनन्य भक्ति नहीं कही जायगी।
ईश्वर को प्राप्त करना उस राजेश्वर के समीप लाभ की चेष्टा करना उन सबों की अपेक्षा बहुत अच्छा है। हम भिक्षुक के वेश में वहाँ नहीं पहुँच सकते। भिक्षुक की तरह सर्वांग में धूल लपेट कर यदि हम किसी सम्राट या बादशाह के समीप जाना चाहें, तो क्या हम वहाँ पहुँच सकते हैं? कभी नहीं। दरबान हम को दरवाजे से ही मार भगाएगा। भगवान् राजाओं के राजा, सम्राटों के सम्राट हैं, वहाँ भिक्षुक की तरह कामना रूपी चीथड़ा लपेट कर प्रवेश करने का किसी को अधिकार नहीं, वहाँ सौदे का काम न होगा।
घर बैठे अ॰ भा॰ गायत्री साधक सम्मेलन देखने का स्वर्ण सुयोग
गायत्री महामंत्र में सद्बुद्धि उत्पन्न करने की अद्भुत शक्ति है उसके 24 अक्षरों में भरी हुई अमृतोपम शिक्षाएँ ऐसी हैं जिनका थोड़ा सा भाग भी हृदयंगम कर लिया जाय तो अनेक उलझने और कठिनाइयों दूर होकर जीवन सात्विकता, प्रसन्नता एवं शाँति से भरने लगता है, इसके अतिरिक्त इस रहस्यमय आध्यात्मिक साधन विद्या के आधार पर ऐसी गुप्त शक्ति प्राप्त होती है जो आन्तरिक क्षेत्र के कल-पुरजों को बदल कर मनोवृत्ति में आश्चर्यजनक सतोगुणी परिवर्तन ला देती है। गायत्री की शिक्षा और साधना के आधार पर मनुष्य को जो विशेषताएँ एवं योग्यताएँ प्राप्त होती हैं उनके कारण उसकी जीवन यात्रा तेजी से आनन्द एवं कल्याण की ओर बढ़ती है।
उपरोक्त पंक्तियों में बताये हुए तथ्य को अति प्राचीन काल के ऋषियों से लेकर अब तक के सामान्य साधकों तक समान रूप से सत्य अनुभव करते आ रहे हैं। अपने दीर्घकालीन अध्ययन, अन्वेषण और तप के आधार पर हमारा भी यही अटूट विश्वास है कि गायत्री उपासना करने वाला कभी उसके सत्परिणामों से वंचित नहीं रह सकता, सत्पुरुषों द्वारा विविध स्थानों पर विविध विधियों से जो गायत्री उपासनाएँ की गई है उनके अनुभव का निचोड़ भी यही है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। सद्बुद्धि के रूप में, सद्गुणों के रूप में, आत्मबल के रूप में एवं दैवी सहायता के रूप में किसी न किसी प्रकार उसका सत्परिणाम अवश्य प्राप्त होता है।
ऐसा विचार किया गया है कि गायत्री जयंती ज्येष्ठ सुदी 10 गंगा दशहरा के उपलक्ष में प्रति वर्ष अखण्ड ज्योति का एक गायत्री अंक निकाला जाया करे। जिसमें उपासकों के अनुभवों का निचोड़ रहा करे। साधक एक दूसरे के अनुभवों साधन विधानों, विचारों, सलाहों से लाभ लेकर अपने मार्ग को बहुत कुछ सरल कर सकते हैं, भूलों को जान सकते हैं तथा इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली अपनी अनेक शंकाओं का समाधान कर सकते हैं। यह विशेषाँक एक प्रकार से साधकों का आपसी विचार विनिमय या सत्संग सम्मेलन होगा। इस विशेषाँक से वही प्रयोजन सिद्ध होगा जो अखिल भारत गायत्री साधक सम्मेलन में सम्मिलित होने से हो सकता है।
ता॰ 1 जुलाई, 1951 अंक गायत्री अंक होगा। इसमें अपने लेख, अनुभव विचार अन्वेषण भेजने के लिए हम गायत्री के साधकों को साग्रह आमन्त्रित करते हैं। अनाधिकारी लोगों से अध्यात्मिक अनुभव छिपाना आवश्यक होता है, परन्तु अखण्ड-ज्योति का यह विशेषाँक मुख्यतः गायत्री के अनन्य प्रेमियों, श्रद्धालुओं एवं उपासकों के ही पास पहुँचेगा इसलिये उनसे अपनी गुह्य अनुभूतियाँ भी नहीं छिपाई जानी चाहिये। कुपात्रों से गुह्य तत्वों को प्रकट करना जिस प्रकार निषिद्ध है वैसे ही सत्पात्रों से उन्हें छिपाने में भी एक प्रकार से कपट करने का पाप होता है। गायत्री साधक बिना संकोच के अपने लेख भेजें।
लेखों की पृष्ठ भूमि इन प्रश्नों के आधार पर होनी चाहिये (1) आपकी गायत्री साधना में प्रवृत्ति क्यों हुई? (2) अन्य साधनाओं की अपेक्षा आप गायत्री को महत्व क्यों देते हैं? (3) आपको इस साधना द्वारा अपने गुण, कर्म, स्वभावों में क्या अन्तर हुआ प्रतीत होता है। (4) क्या आपको किसी कष्ट का निवारण या सौभाग्य का उदय गायत्री द्वारा हुआ? यदि हुआ तो इस बात का क्या प्रमाण है कि उसका कारण गायत्री ही है (5) आपकी गायत्री साधना किस विधि से होती है। (6) अन्य गायत्री उपासकों के अनुभवों एवं सफलताओं के सम्बन्ध में जो आपको जानकारी हो उसे लिखें (7) गायत्री के सम्बन्ध में भ्रमों का निवारण आदि।
लेख अप्रैल मास में आ जाने चाहिये। ताकि उन्हें व्यवस्थित करने में सुविधा रहे। लेखकों से अपने आधे शरीर की फोटो भेजने की भी प्रार्थना है।
-व्यवस्थापक-’अखण्ड ज्योति’ मथुरा।
प्रयाण वेला में
‘बेटा?’ ‘क्यों माँ, कहाँ जा रहें?’ ‘निज कर्त्तव्य निभाना है।’
‘क्या कर्त्तव्य?’ ‘पराये हित में अपना प्राण गँवाना है॥’
‘कौन बुलाता है?’ ‘जननी! दुःखियों की आह बुलाती है।
उन प्यासों की प्यास और भूखों की भूख बुलाती है॥’
‘कौन लाभ जाने से?’ ‘मैया! जग बन्धन कट जाते हैं।
तप से जो पाते हैं मुनिवर, सेवा से हम पाते हैं॥
दीनों के दर्शन में मुझको नारायण दर्शाता है।
उनकी ध्वनि मिलने के हित मुझको पुण्य बुलाता है॥
‘पथ में दुःख मिलेंगे लाखों कैसे उन्हें हटायेगा?’
‘चिन्ता नहीं लगन होगी हो शूल फूल बन जायेगा॥’
‘कब आयेगा लौट?’ ‘मात! जब अत्याचार नहीं होंगे-
दीनों पर जब बलवानों के चरण प्रहार नहीं होंगे॥
भूखों को जब अन्न मिलेगा प्यासों को शीतल पानी।
जग के ठुकराये दुःखियों को मधुर प्रेम-सानी वानी॥
शीत-काल में पड़े ठिठुरते नग्न वस्त्र जब पायेंगे।
निर्धन ग्रीष्म लू में जब थम बिन्दु नहीं ढरकायेंगे॥
जब अनाथ बच्चों को सब जग अपना कह अपना लेगा।
माता-पिता के रूप दुःखी वह प्राण मात्र को पा लेगा॥
सब प्राणी आनन्द लहें, जब कहीं मिलेगा क्लेश नहीं।
सकल विश्व सुख करेगा, होगा दुःख का लेश नहीं॥
तभी मात! मैं धन्य बनूँगा नर जीवन फल पाऊँगा।
जगत् सुखी कर तेरी गोदी में आकर मोद बढ़ाऊँगा॥’
*समाप्त*
(ले॰ श्री मदनगोपाल जी सिंहल)