जिसने तुमको किया महान,
देकर लक्ष्य प्राप्ति का ज्ञान,
प्राची को दे दीप्य विहान,
जिसने पुलकित किये मिलिंद, कलियों में मधु-मस्ती घोल!
जीवन जागृति की जय बोल!
चरणों में भर करके शक्ति,
प्राणों में भर कर अनुरक्ति,
अधरों को देकर अभिव्यक्ति,
अस्थिर श्वासों का अवसाद अक्षरता को गया टटोल!
जीवन जागृति की जय बोल!
सीमायें हो गईं मलीन,
व्योम हुआ पंखों में लीन,
नव आशा, उत्साह नवीन,
फिर बोलो, क्यों करें विहंग, डाली या नीड़ों का मोल!
जीवन जागृति की जय बोल!
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
गायत्री के ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस प्रथम पाद की शिक्षा यह है कि सर्वत्र तीनों लोकों में परमात्मा व्याप्त है। इसलिए उसको सर्वव्यापी एवं निष्पक्ष न्यायकारी समझकर पापों से उसी प्रकार बचना चाहिए जैसे कि राजा को सामने खड़ा देखकर चोर को चोरी करने का साहस नहीं होता। इसके अतिरिक्त सब में जब अपना आत्मा, अपना प्रभु ही व्यापक है, तो किसी के साथ अनुचित, अनीतिपूर्ण, अनिष्ट व्यवहार न करना चाहिए। हम अपने लिए जैसा व्यवहार दूसरों द्वारा होने की आशा करते हैं, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए। दूसरों के हितों को आघात पहुँचाकर अपना स्वार्थ साधन करने की नीति से हमें प्रयत्न पूर्वक बचना चाहिए।
यह प्रकट है कि संसार में अधिकाँश दुःख हमारे पापों के परिणामस्वरूप होते हैं। कई बार कर्मफल तुरन्त मिल जाता है, जिसके साथ बुराई की गई है उसके द्वारा प्रत्याक्रमण द्वारा, सामाजिक अपकीर्ति द्वारा, लोगों के असन्तोष एवं असहयोग के कारण होने वाली हानि द्वारा, राजदंड द्वारा उस बुराई का दंड मिल जाता है। इनसे भी कोई व्यक्ति बच जाय तो ईश्वरीय निष्पक्ष न्याय द्वारा प्राप्त होने वाले दंड से कोई बच नहीं सकता। अंग-भंग, अपूर्ण, रोग ग्रस्त, हीन बुद्धि लोगों को देखकर यह सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि इनको दैवी दण्ड भुगतना पड़ रहा है। अपना कर्तव्य ठीक प्रकार पालन करते हुए भी कई बार अनायास कोई आकस्मिक दैवी विपत्ति आ जाती है या प्रयत्न करते हुए भी सफलता नहीं मिलती तो यही कहना पड़ता है कि यह हमारे पूर्व कृत कर्म का, प्रारब्ध का फल है।
यदि मनुष्य पाप कर्मों से बचा रहे तो निश्चय ही वह दुखों से बचा रहेगा। यद्यपि दुखों के अन्य कारण भी हैं। निर्दोष व्यक्ति भी कभी कभी अत्याचारियों द्वारा सताये जाते हैं या सामूहिक दोषों का फल भी व्यक्ति को भोगना पड़ता है, परन्तु यह बात ध्रुव सत्य है कि पाप का परिणाम तो दुःख ही हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति पाप न करे, तो उसके प्रारब्ध में दुखों का विधान, किस प्रकार हो सकता है?
काँटे में लिपटी हुई आटे की गोली खाते समय मछली अपने आपको बुद्धिमान समझ सकती है कि मुफ्त में ही मैंने इतना आटा पा लिया। जाल में फैले हुए दानों को खाते समय चिड़िया गर्व कर सकती है कि मैंने बिना परिश्रम के एक स्थान पर पड़ा हुआ इतना अन्न सहज ही पा लिया, पर उसे थोड़ी ही देर में अपनी भूल का पता चल जाता है। आटे की गोली के साथा पेट में पहुँचा हुआ काँटा जब मछली का पेट फाड़ता है तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं बुद्धिमान हूँ या नहीं। चिड़िया जब जाल में फँसकर बहेलिए के हाथ में पहुँचती है, तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं चतुर एवं सौभाग्य शाली हूँ या नहीं? पापी लोग जब जरा से प्रयत्न से बहुत सा लाभ कमा लेते है तो फूले नहीं समाते। धर्म अधर्म के पचड़े से बचकर अपना काम बना लेने की चतुरता पर उन्हें गर्व होता है। पर जब उन कर्मों का प्रारब्ध भोग कराल काल दण्ड की तरह उनके पीछे पड़ता है, तब उनकी समझ में आता है कि वे उस दिन कमा रहे थे या गँवा रहे थे, वे चतुर थे या फूहड़, उनने बुद्धिमानी का मार्ग चुना था या बेवकूफी का।
गायत्री खतरे की घंटी है, चौराहे पर खड़ी पुलिस है। वह बताती है कि पाप की ओर मत चलो। ईश्वर सर्व व्यापक है, वह किसी का पक्षपात नहीं करता, उससे तुम्हारा कोई पाप छिपा नहीं रह सकता। और तुम किसी पाप के प्रतिफल से बच नहीं सकते। ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ के अक्षर निरन्तर हमें यही शिक्षा देते हैं। रेल की पटरी के किनारे पर जो सिग्नल खड़े होते हैं, वे बताते हैं कि किधर जाना चाहिए किधर नहीं। यदि सिग्नल का आदेश न मानकर कोई ड्राइवर अपनी रेल गाड़ी को मनमानी रीति से दौड़ा ले जाय तो परिणाम कितना भयंकर होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वह रेल किसी से टकरा जायगी या उलट जायेगी और ड्राइवर को अपनी हेकड़ी का नतीजा भोगना पड़ेगा। गायत्री का सिग्नल हमें सावधान करता है कि अपनी जीवन नीति की रेल को सही मार्ग पर ले चलो अन्यथा अपने स्वाभाविक सुखों से हाथ धोना और दुखों की यातनाओं से पीड़ित होना पड़ेगा।
गायत्री के प्रथम चरण में दूसरों के प्रति आत्मीयता, ममता, प्रेम, उदारता, ईमानदारी, सेवा एवं मधुरता का व्यवहार करने की शिक्षा जिसके अन्तःकरण में विराज गई होगी, माता ने जिसको अपने प्रथम चरण का स्पर्श करने दिया होगा, वह अनेक सामाजिक कष्टों से अनायास ही छूट गया होगा।
अपने कुटुम्बियों, पड़ौसियों, समीपवर्ती लोगों, के साथ यदि विरोध, मनोमालिन्य, द्वेष, संघर्ष, कलह, चलता हो तो वे हमें इतना सहयोग नहीं देंगे जितना कि देना चाहिए। जबकि उनकी सद्भावना की आशा की जाती है, तब भी वह प्राप्त नहीं होगी। इसके अतिरिक्त वे विरोधी होने के कारण तरह-तरह की बाधाएं उत्पन्न करते रहेंगे और हानि पहुँचाने वाले आयोजन, षड़यन्त्र या आक्रमण करने का जब भी उन्हें अवसर मिलेगा, न चूकेंगे। मुकदमा, फौजदारी, चोरी, डकैती, कत्ल, बहिष्कार, अपमान, शिकायत, चुगली, निन्दा, दोष प्रदर्शन आदि हानियाँ अकस्मात तो कभी कभी ही होती है, अधिकाँश उनके पीछे पुरानी शत्रुता या किसी विरोधी का गहरा मनोमालिन्य काम करता रहता है। जो व्यक्ति अपने से असंतुष्ट हैं या द्वेष रखते हैं, बहुधा उन्हीं का ऐसे कार्यों में विशेष हाथ रहता है।
यदि शत्रुता न हो तो इस प्रकार की आपत्तियों की संख्या अत्यन्त ही न्यून हो जाय। अपनी उन्नति में सबसे बड़ी बाधा यह होती है कि जो लोग हमारी सहायता कर सकते हैं, वे अपना हाथ खींच लेते हैं। यदि थोड़े से व्यक्ति किसी की पीठ पर सहायक होते हैं, तो वह उनके थोड़े थोड़े सहयोग का सहारा पाकर आशाजनक उन्नति कर सकता है। संसार में जितने भी सफल और समुचित व्यक्ति हुए हैं, उनकी सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण उनके सहायक भी हैं। कोई व्यक्ति चाहे कितना ही विद्वान, बुद्धिमान, चतुर, शक्तिवान क्यों न हो, पर सहयोग के अभाव में लुँज-पुँज ही रहेगा, उससे कोई महत्वपूर्ण कार्य न बन सकेगा। असहयोग भले ही द्वेष के बराबर हानिकारक न हो पर वह भी जीवन की प्रगति को रोक देने में एक विशाल पर्वत की तरह अड़ कर खड़ा हो जाता है। द्वेष तीव्र रोग है, असहयोग मंद रोग। दोनों एक ही जाति के हैं। अन्तर केवल तापमान का है। परिणाम दोनों का ही अनिष्ट-कारक होता है।
द्वेष और असहयोग जन्य विपत्तियाँ, बाधाएँ अकारण नहीं आतीं। संसार में बुरे आदमी भी कम नहीं हैं पर उनकी बुराई तभी उग्र रूप में प्रकट होती है, जब सामने से उनके प्रकट होने का कोई अवसर हो। सिंह खूँखार है पर उसकी खूँखारी प्रकट तभी होती है जब उसका आहार सामने आए। पेड़, पत्थर, नदी, तालाब के प्रति वह खूनी नहीं होता। अग्नि में जलाने का गुण है, पर वह जलाती उन्हीं चीजों को है जो जलने लायक हों। यदि ईंधन न मिले तो प्रचण्ड अग्नि को भी हार माननी पड़ेगी, वह बुझकर ठंडी हो जायगी। इसी प्रकार दुष्ट प्रकृति के मनुष्य भी अपनी दुष्टता का पूरा प्रकाशन करने में तभी सफल होते हैं, जब सामने वाले के स्वभाव में पर्याप्त त्रुटियाँ मौजूद हों। यदि गायत्री के प्रथम चरण की आराधना करके हमने अपने स्वभाव को आत्मीयतापूर्ण एवं मधुर बना लिया है, तो बुरे व्यक्तियों की उग्रता देर तक नहीं रह सकती, वे भी सद्व्यवहार से पिघलाये जा सकते हैं, और उनके अन्दर जो थोड़ी बहुत भलमनसाहत है उससे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
आत्मीयता का अर्थ है-दूसरों के प्रति हार्दिक रूप से सद्व्यवहार करना। यह सम्मोहन अस्त्र है, जिसके द्वारा अनेक व्यक्तियों को वशवर्ती बनाया जा सकता है। कई धूर्त इस स्वभाव से अनुचित लाभ भी उठा लेते हैं, और कई बार अपने को ठगा जाना पड़ता है, पर इस हानि से कुछ बहुत बिगाड़ नहीं होती। इस प्रकार ठग जाने से भी अपनी कीर्ति, साधुता एवं प्रतिष्ठा बढ़ती है, जो पीछे जाकर उस हानि से कई गुना लाभ दे जाती है।
जिसके अधिक मित्र हैं, अधिक सहयोगी और स्वजन हैं, उसके प्रारब्ध भोग भी इसके हो जाते हैं और सुनिश्चित भवितव्यता का जो कष्ट होना चाहिए, उससे कहीं कम होता है। कल्पना कीजिए कि दो व्यक्तियों को प्रारब्ध वश एक साथ रोग होता है, इनमें से एक को सब घृणा और द्वेष करते हैं। बीमारी की हालत में उसे कोई सहायता नहीं मिलती। यह भूखा, प्यासा, मल मूत्र से सना हुआ, सर्दी-गर्मी के दुःख सहता हुआ, बिना दवादारु अकेला पड़ा रहता है। ऐसी दशा में उसका शारीरिक और मानसिक कष्ट अनेक गुना बढ़ जायेगा। प्रारब्धवश उसे एक सप्ताह रोगी रहना था तो एक सप्ताह में ही उसे रौरव नरक के दर्शन हो जाते हैं। इसके विपरीत दूसरा वह रोगी, जिसे प्रारब्धवश इतना ही रोगी रहना था, अपने स्वजन सहयोगियों से घिरा हुआ है। उसे उचित परिचर्या, चिकित्सा, सेवा, मनोरंजन आदि मिलता रहता है। उसका दुख हँसते बोलते बातों ही बातों में कट जाता है। दूसरों की सेवा और सहानुभूति में अपने कष्टों को भूला रहता हैं। अब इन दोनों रोगियों के एक समान प्रारब्ध की तुलना की जाय तो पता चलता है एक ने बहुत अधिक और दूसरे ने बहुत कम कष्ट सहकर अपना भोग पूरा किया। दैवी आपत्तियाँ, जो अनिवार्य है, आती हैं, परन्तु गायत्री के प्रथम चरण में अपने उच्च स्वभाव के कारण वे भी कम कष्ट देकर भुगत जाती हैं।
आत्मीयता को एक विशेष स्थान पर केन्द्रित कर देने से प्रेम का लोप होकर मोह उत्पन्न हो जाता है। मोह ही शोक का कारण है। जिस मनुष्य के हृदय में सच के प्रति व्यापक एवं विस्तृत सहानुभूति होती है। सब की आत्माओं में से अपनेपन की आत्मीयता परिलक्षित होती है, ऐसी दशा में अपने बच्चे की मृत्यु का उतना ही शोक हो सकता है, जितना कि पड़ौसी के बच्चे के मरने का। यदि उस व्यापक आत्मीयता को दूसरों पर से हटा कर किसी एक ही व्यक्ति तक सीमित कर लिया जाय तो ही ऐसा हो सकता है कि दूसरों के मरने पर जरा भी दुख न हो और अपने सम्बन्धियों के मरने पर शोक विह्रल हो जाया जाय। गायत्री का प्रथम चरण हमें व्यापक आत्मीयता प्रदान करता है और बताता है कि कोई भी प्राणी किसी दूसरे की सम्पत्ति नहीं, सब ईश्वर के अंश हैं और अपने स्वतन्त्र कर्म भोग के आधार पर जन्म मरण के चक्र में घूम रहे हैं।
गायत्री का प्रथम चरण जब हृदय में आता है, तो मनुष्य इस प्रकार की अनेक कुबुद्धियों से बच जाता है, जो समय-समय पर दुःखों के पर्वत सिर पर पटकती है। आस्तिकता और आत्मीयता के कारण वह पाप करने से बच जाता है। जो पापों से बचा होगा वह दुःखों से भी बचा रहेगा। माता का प्रथम आशीर्वाद वह सद्बुद्धि देता है, जिससे हमारे सामाजिक दुःख दूर होते हैं। दूसरे व्यक्तियों के संपर्क से उत्पन्न होने वाले व्यवहार की भूल से मिलने वाले, दुःखों की जड़ गायत्री के प्रथम प्रकाश से ही कट जाती है।
(श्री स्वामी रामतीर्थ)
धन चुराया गया, रोता क्यों हैं? क्या चोर ले गए? रो, इस समझ पर प्यारे! और कोई नहीं है लेने ले जाने वाला, एक ही एक, शुक्र की आँख, यार प्यारा अनेक बहानों से तेरा दिल लिया चाहता है। गोपिकाओं के इससे बढ़ कर और क्या सुकर्म होंगे कि कृष्ण मक्खन चुराये। धन्य है वे जिनका सब कुछ चुराया जाय, मन और चित्त तक बाकी न रहे।
राजा बलि ने जल का करवा हाथ में लेकर तीनों लोक भगवान को दान कर दिये, तुम से एक असुर के बराबर भी नहीं सरती। अपने शिर रूपी खप्पर को हथेली पर ले, सारे संसार की सत्ता दृष्टि कर दो ब्रह्म के हवाले। बला टली, बोझ हटा, और फिर ईश्वर को भी ईश्वरत्व देने वाले तुम हो, सूर्य-चन्द्रमा भी तुम्हारे भिखारी हैं।
लोग कहते हैं जी! भजन में मन नहीं ठहरता, एकाग्रता नहीं होती। एकाग्रता भला कैसे हो, कृपणता के कारण बन्दर की तरह मुट्ठी से पदार्थों को तो छोड़ते नहीं और मुट्ठी में लिया चाहते हैं राम को आखिर ऐसा अनजान (भोला) तो वह भी नहीं कि अपने आप ही हत्ते चढ़ जाए।
जहाँ काम तहाँ राम नहिं, जहाँ राम नहिं काम।
राम तो उसको मिलता है जो हनुमान की तरह हीरों और जवाहरातों को फोड़ कर फेंक दें, ‘यदि उनमें राम नहीं हैं तो इस इनाम को कहाँ धरुँ, क्या करूं।’
भाई! समाधि और मन की एकाग्रता तो जब होगी, जब तुम्हारी तरफ से माल, धन, बँगले मकान पर मानो हल फिर जाए, स्त्री-पुत्र, बैरी मित्र पर सुहागा चल जाए, सब साफ हो जाए, राम ही राम का तूफान आ जाए, कोठे-दालान बहा ले जाए। जाने की कोई ठौर ही न रही तो फिर भँडुवे मन को कहाँ जाना है? सहज समाधि है।
‘अब यह त्याग रूपी उपासना भी और त्यागो या दानों की तरह होगी, करें या न करें, किसी को पैसा दें या न दें, हमारी इच्छा पर हैं ‘जो ऐसा समझे हैं धोखे में हैं, यह त्याग रूपी उपासना आवश्यक है। आवश्यक क्योंकि और कहीं ठंड पड़ने की नहीं।
वृत्ति तब तक एकाग्र नहीं हो सकती जब तक मन में कभी यह आशा रहे और कभी वह इच्छा। शान्त वह हो सकता है जिसे कोई कर्तव्य और आवश्यकता खींच घसीट न रही हो। अपने आप तो इन वासनाओं को पीछा छोड़ना ही नहीं, जब पल्ला छूटेगा, आप छुड़ाना पड़ेगा। इसलिए जीने तक की आशा को भी त्याग कर मन को ब्रह्मानंद में डाल दो। एक दिन तो शरीर को जाना ही है सदा के लिए, तो पट्टा लिखवा कर लाये ही नहीं थे, आज ही से समझ लो कि यह है नहीं और ब्रह्मानंद के सागर में शंका रहित होकर कूद पड़ो। आश्चर्य यह है कि जब हम इन कामनाओं को छोड़ ही बैठते हैं, वह अपने आप पूरी होने लग पड़ती हैं।
जब दिल में त्याग और ज्ञान भरता है और शान्ति साक्षी बन कर विचार शक्ति में आती है तो वही दुनिया जो माया का पर्दा हो रही थी, राम की झाँकियों का लगातार प्रवाह बन जाती हैं। ‘दर्शन धारा’ कहला सकती है, एक रस अभिव्यंजक हो जाती है। वह लोग जो भेदभाव और अभेदवाद के शास्त्रार्थ में लीन हैं, उनको झगड़ने दो। उस अवस्था के लिए यह बुद्धि की छान बनो भी अयुक्त नहीं, परन्तु जब बुद्धि (अर्थात् सूक्ष्म शरीर) के तल से उतर कर कारण शरीर में ज्ञान भाव का दिवा जलता है तो यह झगड़े तै हो जाते हैं, और जब तक मनुष्य के अन्तर हृदय में राम का डंका नहीं बजता तब तक उसे न उपासना ही रस देगी, न ज्ञान, न वेद की संहिता का अर्थ आयेगा, न उपनिषद् का।
(श्री धर्म देव जी शास्त्री)
कुछ दिनों की बात है, भारत के एक प्रसिद्ध समाजवादी नेता से मैं ‘अध्यात्म’ के सम्बन्ध में बात कर रहा था। बात-चीत के दौरान में मैंने उनसे पूछा कि आप गरीबों की गुर्बत को नहीं देखते, सो क्यों? यह प्रश्न मैंने ऊँची भूमिका पर ही किया था। प्रश्न का जो उत्तर उन्होंने दिया वह असंतोषजनक नहीं था। प्रायः ऐसे प्रश्नों का उत्तर ‘मानवीय मनोवैज्ञानिक स्थिति’ ही बताया जाता है। परन्तु जब मैंने उक्त महानुभाव से इस मनोवैज्ञानिक स्थिति का भी दार्शनिक पहलू पूछा, तब वे बोले इतना आगे जाने की आवश्यकता नहीं हैं।
मैंने कहा-आप अपने विचारों को वैज्ञानिक रीति से सिद्ध नहीं कर सकते, अर्थात् ‘अमुक स्थिति तक ही तर्क का दखल मानते हैं, आगे नहीं। इतना कह कर मैंने उन्हें बताया कि हम आध्यात्मवादी लोग भी संसार में गुर्बत और दुःख को सदा के लिए दूर करना चाहते हैं और उन्हें सहन नहीं कर सकते। आप इसका कारण नहीं बता सकते, परन्तु हमारे पास इसका वैज्ञानिक, दार्शनिक समाधान है।
‘वह क्या है?’ जब ऐसा प्रश्न उन्होंने किया तब मैं बोला ‘हम अध्यात्मवादियों का मत हैं कि हम में से प्रत्येक में वह तत्व है जो सब में समान है। इस प्रकार हम सब का एक अद्भुत तादात्म्य है। न चाहते हुए भी हमें यही ‘अभेद’ ही दूसरे के दुःख को न देख सकने की स्थिति में डाल देता है यहीं कारण है कि मनुष्य अपने शत्रु के साथ भी किये जाने वाले अन्याय को नहीं देख सकता। कम-से-कम शत्रु की भी मृत्यु पर यह भावना दुःख मानने पर विवश कर देती है।
साँप हमारा अन्तक है। इसीलिए साँप को ‘मृत्यु’ कहा जाता है। परन्तु जब हम मरे हुए साँप को देखें तो उसके प्रति भी करुणा उत्पन्न होती है। कम-से-कम इतना तो होता है कि यदि कोई मरे हुए साँप को डंडे से मारने लगे, तो उसे सब बुरा मानते हैं। यह सब क्यों होता हैं? इसका कारण केवल आध्यात्मवाद ही बता सकता है। सब में एक आत्मा है। हम सब एक ही माता-पिता की सन्तान है। यह भावना ही ‘समाज’ का दार्शनिक आधार है और हो सकती है। इसीलिए वेद के ऋषि ने मनुष्यों को उपदेश दिया है- ‘सम्भा्रतरः समनसः यूयम्’ ‘अन्याऽन्यमीभहर्यत पुत्रं जात मिवाध्न्या’। अर्थात्- तुम सब आपस में भाई हो, इसलिए एक दूसरे को इस प्रकार चाहो जैसे नवजात वत्स को गाय चाहती है।
गीताकार ने जो मानव के लिए ‘सर्वभूत हितेरताः’ का आदर्श रखा है, उसका भी दार्शनिक आधार उपयुक्त एकात्म ही है। वास्तव में बड़े से बड़ा नास्तिक भी व्यवहार में ऐसा आचरण करता हुआ भी इसके मूल का ही उच्छेद करता है। भारतीय महात्माओं की यही विशेषता है कि उन्होंने विश्व के इस ऐकमत्य का साक्षात्कार किया और उसी के आधार पर समाज राजनीति और समस्त व्यवहार का प्रसाद खड़ा किया है। वेदान्त का यह व्यावहारिक रूप ही ‘धर्म’ हैं।
वस्तुतः जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर प्राकृतिक सत्यों का शोधन होता है, उसी प्रकार प्रकृति से भी परे जो एक तत्व है उसको भी हमारे आचार्यों ने शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर देखा है-ऐसे देखा है कि जैसे हाथ पर रखी किसी चीज को देखा जाता है।
आज भी जो चाहे इस अध्यात्म शास्त्रीय वैज्ञानिक-पद्धति के अनुसार इस सत्य का साक्षात्कार कर सकता है। व्यवहार से ही यह ‘वेदान्त’ अधिकाधिक मँजता है। ‘भेद में अभेद’ का साक्षात्कार करना ही वेदान्त का निखरा रूप है। गीताकार ने निम्न श्लोकों से इसी व्यवहारिक वेदान्त का निर्देश किया है-
‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योग-युक्तात्मा सर्वत्र सम-दर्शनः॥
योमाँ पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति।
तस्याऽहं न प्रणश्यामि सच में न प्रणश्यति॥
सर्व भूत स्थितं यो माँ भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
आज के राजनीतिज्ञ कहते हैं कि सब देशों की आर्थिक, राजनैतिक तथा सामाजिक अवस्थाएँ एक दूसरे से पृथक नहीं की जा सकतीं। ‘वेदान्त’ ही इसका दार्शनिक आधार हो सकता है। ‘वेदान्त’ तो कहता है केवल मनुष्य ही नहीं-चेतन ही नहीं समस्त विश्व एक दूसरे से जुदा नहीं किया जा सकता। क्यों कि समस्त विश्व उस आत्मा का शरीर है और जीवित शरीर का लक्षण ही है अभेद।
‘यः विश्वे तिष्ठन् विश्ववस्य अन्तरः यस्य विश्वं शरीरं यं विश्वं न वेद’ जब संसार के लोग इस उच्च भूमिका पर आ जायेंगे तब आज की संकीर्ण राष्ट्रीयता से (जिसका रूप सदा परिवर्तित और परिवर्धित होता रहता है) तथा संकीर्ण समाजवाद’ से ऊपर उठ कर मानवता की दृष्टि से देखेंगे, तब ही वास्तविक समाज बनेगा, जिसमें गुर्बत नाम को भी नहीं होगी। थोड़ा सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो विश्व की सब समस्याएँ एक दूसरे से अभिन्न हैं, इसलिए सबका समाधान भी एक है। पूर्ण दृष्टि के बिना पूर्ण समाधान असम्भव है।
‘वेदान्त’ की विशेषता ही यह है कि वह वह ‘भूमा’ का ‘पूर्णत्वः’ का साक्षात्कार करता है। ‘भूमात्सेव विजिज्ञासितव्यः’। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश होने पर सब पदार्थ स्पष्ट हो जाते हैं, तब दीपक, चन्द्र, विद्युत किसी के प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती। सबकी उपयोगिता सूर्य के प्रकाश में समा जाती है। इसी प्रकार ‘वेदान्त’ का व्यवहारिक रूप जब मनुष्य को ज्ञात हो जाता है, तब वह इस आलोक को व्यक्ति, समाज, देश और विश्व के साथ किये जाने वाले प्रत्येक व्यवहार में प्रयुक्त करता है। यही ‘समाज का ‘गुर’ और ‘सिद्ध योग‘ है। पश्चात्य अविभौतिकवाद भेद को व्यापक बनाकर अभेद का साक्षात्कार करने पर विश्वास करता है। वस्तुतः ‘नेह नानाऽस्ति किश्चन’ यह दर्शन ही समाज का आधार बन सकता है। गाँधी-विचार धारा का यही आधार है।
दुर्भाग्य से भारत में और विश्व में आज भेद-दृष्टि की प्रचुरता है। और इस भेद-दृष्टि को राष्ट्रीयता सांप्रदायिकता और वर्ण आदि के आधार पर प्रमाणिक तथा ग्राह्य बनाया जा रहा है। उपनिषद् के ऋषियों ने आज से हजारों वर्ष पूर्व जो उपदेश सुनाया था आज फिर से उसे सुनने का समय उपस्थिति हुआ है। यह उपदेश पुराना होने पर भी नया है, सनातन है। सनातन, का अर्थ है नित्यनूतन। वह उपदेश है-’ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्वमसि’। यह विश्व एक ही आत्मा का शरीर है, वह आत्मा ही ‘सत्य’ है। इसलिए अपने और पराये का भेद भी मिथ्या है- ‘तत्त्’ वह अर्थात् ‘पर’, ‘त्वम्’ तू ही है, ‘तू’ और ‘वह’ एक है। अर्थात् कोई पर नहीं। हिन्दू-मुस्लिम समस्या, हरिजन-सवर्ण समस्या, किसान-जमींदार समस्या आदि सभी का समाधान यही दर्शन कर सकता है।
ऐतादात्म्यमिदं् सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्वमसि
वेदान्त को उपनिषत् कह कर हमारे आचार्यों ने उसे बहुत मान दिया है। जिस भारत ने वर्षों तक वेदान्त की व्यावहारिकता का सफल प्रयोग किया है, उसमें आज अवसरवादियों और आत्मा-नास्तिकवादियों का बढ़ता हुआ प्रवाह और प्रभाव अखरन की चीज है। हमारा तो दृढ़ मत है कि आज भारत वर्ष में जो अवसाद और दैववाद-भाग्ययैकवादिता का आधिपत्य हैं, उसका वास्तविक प्रतीकार -वेदान्त’ का प्रचार ही है। यूरोप का केवल आधिभौतिकवाद और उपाय यहाँ किसी प्रकार कारगर नहीं हो सकते। यूरोपीय विद्वानों द्वारा प्रतिपादित भय और भ्रम-मूलक अध्यात्मवाद भारतीय वेदान्ताऽध्यात्म से भिन्न वस्तु है। भारत की उन्नति के लिए आवश्यक है कि भारतीयों का दृष्टिकोण व्यापक हो और व्यापक दृष्टिकोण का ही दूसरा नाम वेदान्त’ है।
दुर्भाग्य से आज ‘वेदान्त’ उन लोगों के हाथ में है जो व्यावहारिकता से कोसों दूर हैं, जिन्होंने वेदान्त का केवल यही अर्थ समझा है, कि जहाँ भी कुछ संघर्ष हो उससे दूर भागना ही ‘वेदान्त’ है। जब की सच्चा वेदान्त इससे विपरीत है।
विश्व की समस्त समस्याओं का समन्वयात्मक सच्चा समाधान करने वाला शास्त्र ही ‘वेदान्त शास्त्र’ है। आज भारतवासी झंझटों से ऊब जाने की हालत में मनबहलाव का साधन भर-’वेदान्त’ को समझते हैं, जब कि सच्चा वेदान्त बुराई के विरुद्ध केवल भगवान् के विश्वास पर अकेले भी लड़ते-लड़ते मरने की दशा में परीक्षित होता है।
(श्री स्वामी विधानन्द की सरस्वती)
छान्दोग्योपनिषद में एक कथा है कि-एक समय प्राण, कान आँख आदि इन्द्रियों में इस बात पर पारस्परिक बातचीत हो गई कि-
‘हम सब में श्रेष्ठ कौन हैं?’
बढ़ते-बढ़ते इस बात ने कलह अर्थात् झगड़े का रूप धारण कर लिया, और वह खूब बढ़ा, यहाँ तक कि मार पीट की नौबत आ गई। इनमें से कान ने कहा कि ‘मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ’ वाणी आगे बढ़ कर कहने लगी-रे कान! चुप रह बहुत बढ़ कर बातें न बना, नहीं तो कान में अंगुली डाल कर तुझे बेकार कर दूँगी-तू नहीं जानता कि ‘मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ।’ वाणी अभी कह ही रही थी कि लाल लाल रूप धारण करके आँखें वाणी की और झपटी-और तपाक से कहने लगी ‘री जीभ! तू कैसे पटापट बोले जा रही है। मुँह संभाल! नहीं तो जबड़े में से खीज कर बाहर फेंक दूँगी। तूने अभी तक भी नहीं जाना कि ‘मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ।’ जब इस प्रकार इन्द्रियों में परस्पर झगड़ा तूल पकड़ने लगा, तो वे सब मिलकर प्रजापति के पास गई और उनसे बोली, कि-
‘हे प्रजापति! हम सब में श्रेष्ठ कौन है? हम अपना झगड़ा अपने आप नहीं मिटा सके इसीलिए आप के पास आई हैं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं-कि जो निर्णय आप करेंगे वह हम सबको स्वीकार होगा।’
पाठक वृन्द! यह कैसा करुणाजनक दृश्य है। अपना पारस्परिक झगड़ा अपने आप न सुलझाकर इसी प्रकार दूसरों की शरण में जाना पड़ता है। इस देश के इतिहास के पन्ने 2 पर अनेक वीभत्स चित्र दिखाई दे रहे हैं। वास्तव में ‘कान’ आदि इन्द्रियों को आपस में झगड़ने का कोई कारण उपस्थित नहीं था-क्योंकि भगवान ने प्राणी के शरीर में उनको यथा स्थान पृथक-पृथक जगह दी है तथा नाम भी निश्चित कर दिया है। उनको सोचना चाहिए था कि हम जहाँ पर है और जैसे हैं वही हमारे लिए उपयुक्त है। किन्तु यदि उन्होंने अपने अविवेक से कोई झगड़ा कर भी लिया था, तो उनको स्वयं ही सुलझा लेना चाहिए था। परन्तु एक बार झगड़े में पड़ जाने पर भूत-भविष्यता का कुछ भी विचार न करके पागल की नाईं अपना सर्वनाश कर लेता है। परन्तु इन्द्रियों के लिए यह सौभाग्य की बात है कि वे जिसके पास न्याय के लिए गई थीं-वह निःस्वार्थ और न्याय परायण था। दूसरों की लड़ाई से उन्होंने अनुचित लाभ नहीं उठाया। उनकी लड़ाई बड़ी सुन्दरता से निपटा कर उनमें मेल करा दिया। उन इन्द्रियों में ‘सर्वश्रेष्ठ कौन हैं? इसका निर्णय स्वयं न करके उन इन्द्रियों से ही कराया। उनको एक युक्ति स्मरण आई और वे इन्द्रियों से बोले कि-
‘तुम में से जिनके चले जाने पर शरीर तेजहीन हो जाय-और उसका सब काम बन्द हो जाये उसी को तुम सर्वश्रेष्ठ जानो।’
ऐसी युक्ति सुझाने पर सब इन्द्रियों ने प्रजापति का बड़ा आभार माना मन ही मन बड़ी प्रसन्न हुई-क्योंकि सभी को अलग-अलग यह पूरा-पूरा निश्चय था कि मेरे यहाँ से चले जाने पर शरीर का काम नहीं चल सकेगा।
इस परीक्षा के लिए सब से प्रथम वाणी तैयार हुई। यह स्वभाविक ही है कि वाणी-सा लड़ाकू और आग में घी डालने वाला संसार में दूसरा कौन हो सकता है? वाणी स्वप्रतिज्ञानुसार शरीर को छोड़ कर एक वर्ष तक बाहर रही।
एक वर्ष के पश्चात् वाणी बड़े अभिमान के साथ वापिस लौटी। वापिस आते हुए वह मन ही मन सोचती थी कि जिस प्रकार चिड़िया के बच्चे बड़ी उत्सुकता से चिड़िया के वापिस आने की बाट जोहते हैं-इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ मेरी राह देखती होंगी। केवल मेरे लौटने मात्र की देरी है, वे मेरा जय-जयकार करेंगी। इन्हीं सुख स्वप्नों में लीन वाणी लौटी। किन्तु जब उसने यह सुना कि मेरी अनुपस्थिति में भी समस्त इन्द्रियों का काम बे रोक टोक अच्छी तरह से चलता रहा है-तो उसके अभिमान पर तुषारापात हो गया। उसने अन्य इन्द्रियों से पूछा कि-
‘इन्द्रियों! मेरे बिना तुम्हारा काम कैसे चल सका?’
इन्द्रियों ने उत्तर दिया, कि-
‘ठीक उसी प्रकार चला-जैसे गूँगे का काम चलता है। तेरे बिना हमारे किसी काम में बाधा नहीं पड़ी।’
ये शब्द सुनते ही कि -गूंगे का काम मेरे बिना चलता है-वाणी ने लज्जा के साथ अपने स्थान को ग्रहण किया।
वाणी तो पराजित हुई-किन्तु आँखों ने सोचा कि वाणी बे-समझ है, इसलिए उसके पराजित हो जाने से कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हम वैसे थोड़े ही हैं। आँखों के बिना अन्धा शरीर क्या कर सकता हैं? शरीर से बाहर जाने से पूर्व ही आँखें अपने आप ही यह कल्पना करने लगीं कि हम एक वर्ष के बाद वापिस लौट आई हैं, और सारी इन्द्रियाँ हमारा श्रेष्ठतम का अभिषेक कर रही हैं। आँखें बाहर गईं और एक वर्ष के पश्चात जब वे वापिस आई और देखा कि हमारी अनुपस्थिति में भी शरीर को किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई और उसका काम भले प्रकार चलता रहा। इससे आँखों का भी अभिमान टूट गया और उसके श्रेष्ठत्व के अहंकार का मान मर्दन हो गया।
वाचक वृन्द! आँखों की तरह कई मनुष्य अपने बाद हमारे कुटुम्ब का क्या होगा? इसी चिन्ता से भावी दुःख की आशंका में अपना आधा सुख नष्ट कर डालते हैं। ऐसे लोगों को यह अभिमान होता है कि इस कुटुम्ब का भरण-पोषण करने वाले हम ही है। वे ईश्वर को भूल जाते हैं। उनको यह ज्ञान नहीं रहता की जिसको हम अपना कहते हैं वह अपना न होकर परमेश्वर का है। यदि उनसे कोई कहे कि कुटुम्ब का पालन-पोषण करने वाला ईश्वर है, तो उनको इस पर विश्वास नहीं होगा। वे नहीं समझते कि ईश्वर ने हमारा जिस देश, जाति या कुटुम्ब में जन्म दिया है, उसकी निष्काम-वृत्ति से सेवा करना हमारा कर्तव्य है। उनके इस विचार और विश्वास से कि उनके पीछे देश, जाति या कुटुम्ब का कार्य करने वाला कोई नहीं है-देश का अहित होता है। ऐसे लोग मरने के पश्चात् आकर देखें तो उन्हें अवश्य पता चल जाय कि उनकी चिन्ता करना सर्वथा व्यर्थ था।
आँखों को जब आश्चर्य हुआ और उन्होंने अन्य इन्द्रियों से कहा कि-”तुम हमारे बिना कैसे जीवित रहीं?” तो उन्होंने उत्तर दिया कि “जैसे एक अन्धा जीता है, वैसे ही हम भी जीवित रहीं।”
यह सुनते ही कि अन्धे का काम हमारे बिना चलता है, और उसका कोई काम रुका नहीं रहता- आँखें झेंप गईं और चुपके से अपने स्थान में आ गई।
आँखों की आँखें खुल गईं अब कानों की बारी आई। कानों ने सोचा कि हमारे बिना शरीर का कोई काम न चलेगा और वे बाहर चले गये। एक वर्ष तक समस्त सृष्टि, स्मृति और श्रुति की मधुर 2 बातें सुनकर वे वापिस आये। इस एक वर्ष में कानों को बहुत से बहरे मिले थे और उन्होंने देख लिया था कि कानों के बिना उनका काम ठीक 2 चल जाता है। अतः वे सोचते आते थे कि हमारे लौटने पर हमें कानों और आँखों जैसा ही अनुभव हो तो आश्चर्य क्या है? इसलिए कानों ने प्रण किया कि अब ये कभी आपस में इस बात के लिए झगड़ा नहीं करेंगे कि ‘हम में श्रेष्ठ कौन है ? और वे अपने स्थान पर चले गये।
पाठकों ने देखा कि वाणी चुप हुई किन्तु तब भी आंखों की कुछ समझ में न आया। आँखों की आंखें अच्छी तरह से खुल गई, फिर भी कान न समझ सके और कानों के पराजित होने पर भी मन का अभिमान दूर न हुआ। वह भी बाहर निकला और एक वर्ष तक पृथ्वी की प्रदक्षिणा करता रहा।
मनुष्य गिन कर शरीर के बालों की संख्या बता सकता है, किन्तु इस द्रुत वेगी मन ने संसार की कितनी प्रदक्षिणाएँ की हैं, इनको कोई नहीं बता सकता। किन्तु मन के शरीर से बाहर आने पर एक बड़ा लाभ हुआ-वह यह कि इस अवधि में उसको हर बार नवजात शिशु सैकड़ों और हजारों की संख्या में मिले। इन बच्चों को देख कर मन शान्त हो गया। उन बच्चों का सारा व्यवहार ऐसा ही था, मानो वे मन को पहचानते भी न हों। सूक्ष्म मन को यह देखने में देर न लगी कि बच्चे अपने व्यवहार में अच्छे-बुरे काले-गोरे किसी का भी कुछ विचार नहीं रखते। मन को तो यह अभिमान था कि यह शक्ति ही उसका विशेष हेतु है, किन्तु वह लक्षण बच्चों में दिखाई नहीं दिया-और उसका सारा काम अच्छी तरह से चल रहा था, वे दिनों दिन बढ़ते जाते थे और अपनी बाल क्रीड़ा से अपने माता पिता को स्वर्गीय सुख दे रहे थे। मन ने इस विषय का खूब अध्ययन किया। जैसे पका हुआ फल डाल से छूट कर गिर जाता है, उसी प्रकार मन का अहंकार भी टूट गया। उसने अवधि समाप्त होते ही शरीर में प्रवेश किया।
अन्त में प्राणों की बारी आईं। सारी इन्द्रियाँ पराजित होकर अपने 2 स्थान में नियुक्त थीं, फिर भी उनको यह पूरा विश्वास था कि एक वर्ष में प्राणों पर काफी संकट आयेंगे, वे मन ही मन सोचने लगीं कि -प्राण, न तो वाणी, न कान, न आँख, न मन तो फिर उसके बिना आँख, नाक, कान, मन और वाणी के रहते हुए शरीर को प्राण की क्या परवाह है? बेचारा प्राण वर्ष भर भटक कर वापिस आयेगा ही, इसमें उनको रत्ती भर भी शंका न थी।
इन्द्रियाँ अभी ऐसा विचार करें न करें, इतने में तो उन्हें लगा कि मानो किसी ने जोर का धक्का दिया हो। प्राण ने शरीर से बाहर अभी पैर रखा भी न था कि सारी इन्द्रियों को ऐसा लगा कि मानो हमारे ही प्राण जा रहे हों। वाणी गूँगी हो गई, आँखें सफेद पड़ गईं, कान बहरे हो गये, मन बेमना हो गया। इन इंद्रियों को सब शक्ति क्षीण हो गई, तब उनके मस्तिष्क में प्रकाश पड़ा। वाणी की समझ में आया कि मैं जिस गिरा से बोलती थी, वह मेरी शक्ति न होकर प्राण की थी। वाणी की तरह ही अन्य इन्द्रियों ने भी जाना कि हम जिस सामर्थ्य से काम करते थे-वह हमारा न होकर प्राण का ही है। अब उनको प्रजापति से यह कहलवाने की आवश्यकता नहीं रही कि - “प्राण ही सर्वश्रेष्ठ है।” सब इन्द्रियों की ओर से वाणी ने प्राण की स्तुति की और बोली, कि -
“हे भगवन्! तू हम में से अन्यत्र कहीं न जा। एक वर्ष तो क्या एक क्षण भी हम तेरे बिना नहीं रह सकते। तू हम सब से श्रेष्ठ है। हम तुझे प्रणाम करते हैं।”
वाणी द्वारा स्तुति समाप्त होते ही अन्य इन्द्रियों ने प्राण जी जय! प्राण की जय!! आदि जयघोष आदि जयघोष से वाणी की स्तुति का समर्थन किया।
उपरोक्त कथा से पाठकों ने भली भाँति समझ लिया होगा कि वास्तव में प्राण ही सब इन्द्रियों में श्रेष्ठ और शरीर का आधार है। जैसे घर का दिया बुझ जाने पर घर में घोर अन्धकार छा जाता है- वैसे ही प्राण ज्योति के बुझते ही सारे शरीर में अन्धेरा हो जाता है। प्राण शक्ति है। इसलिए जब हम थक जाते हैं तब कहते हैं कि अब जान नहीं रही। शक्ति पर ही सब काम अवलम्बित हैं। इसलिए आप लोग भी उस प्राण रूपी ईश्वर की उपासना करके उसे प्रसन्न करें। यह ध्यान रखो कि तुमने यह शक्ति प्राप्त की-कि अभ्युदय और निःश्रेयस तुम्हारे हाथों में हैं। संसार में अनेक भौतिक शक्तियाँ अपने अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, पर सर्वश्रेष्ठ तो आत्म शक्ति ही है। हमें इसके संचय और विकास की ओर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए।
(श्री दौलत राम कटरहा बी.ए. जबलपुर)
हमारे देश के बहुत से लोगों का यह विश्वास है कि भारतवासी स्वभाव तया अध्यात्मवादी और पाश्चात्य देशवासी भौतिकवादी होते हैं। इस धारणा का पोषण बहुत समय से होता आ रहा है और इसके कारण बहुत से लोग भावुकता वश कह उठते हैं कि हमारे देश का एक भिखारी भी पाश्चात्य विद्वानों से अधिक अच्छा दार्शनिक होता है। इस भावुकतापूर्ण धारणा में किस सीमा तक सच्चाई है और हमारे देश ने समय समय पर किस कोटि के दार्शनिक पैदा किए हैं, यह बात यह विचार करते ही प्रकट हो जायगी कि दार्शनिक की क्या योग्यता होती है ?
दार्शनिक, इन्द्रियातीत गूढ़ विषयों पर विचार कर वस्तु सत् के दर्शन करना चाहता है अतएव उसमें प्रचण्ड मानसिक क्षमता का होना आवश्यक है अर्थात् उसमें विचारों के निरोध (चित को एकाग्र) करने की अत्यधिक क्षमता होनी चाहिए। यह गुण योग साधना में लगे हुए बहुत से व्यक्तियों में होता है किंतु एकाग्रता धारण करने मात्र से ही कोई व्यक्ति परम दार्शनिक नहीं हो जाता। उसमें पक्षपात-हीनता का होना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। जो व्यक्ति किसी विषय के एक ही पहलू को देखता है और दूसरे पक्ष की विशेषताओं की ओर से आँख बन्द कर लेता है उसमें देर तक किसी विषय पर चिंतन करने की योग्यता होने पर भी हम उसे दार्शनिक न कहेंगे क्योंकि पक्षपातपूर्ण होने के कारण वह वस्तु सत् के दर्शन न कर सकेगा। अतएव निष्पक्ष होना दार्शनिक का दूसरा गुण है। दार्शनिक के इस दूसरे गुण पक्षपातहीनता का दूसरा भाव यह है कि दार्शनिक में मानसिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए अर्थात् वह किसी का पिछलग्गू न हो और उसमें किसी भी मत अथवा आचार्य के विचारों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करने की क्षमता हो।
दार्शनिक में इन दो गुणों के अतिरिक्त यह गुण होना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि वह अपने ज्ञान का भारवाहक मात्र न हो बल्कि वह जिस सिद्धान्त या ज्ञान का प्रतिपादन और प्रचार करे, उसे क्रियात्मक रूप से अपने जीवन में उतार कर, स्वयं ही उस सिद्धान्त की परख कर ले। यदि किसी व्यक्ति के विचारों का उसके जीवन से कोई सम्बन्ध न हो, तो हम उस व्यक्ति को, चाहे उसमें दूसरी योग्यताएं कितनी भी अच्छी क्यों न हों, वाचिक ज्ञानी मात्र ही कहेंगे और सम्भवतः कुछ लोग उसे एक अच्छा लालबुझक्कड़ भी कहना चाहेंगे। यदि किसी व्यक्ति के ज्ञान का उसके जीवन से कोई सम्बन्ध न हो, तो उसका ज्ञान निर्जीव कहा जायगा और वह उसके लिए एक परिग्रह मात्र ही होगा। वैसे तो एक पशु भी अपनी पीठ पर बोझ ढोता है, किन्तु वह उसका उपयोग नहीं कर पाता। जैसे शक्कर के बोरों को पीठ पर ढो ले जाने वाला पशु शक्कर का स्वाद नहीं जानता, उसी तरह अपने ज्ञान को क्रियात्मक रूप न देने वाला व्यक्ति भी वस्तु सत् के दर्शन नहीं कर सकता। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि करछुली (दर्वी) पाक रस में डूबी रहते हुए भी पाक रस को नहीं जानती। कहा भी है।
अधीत्य चतुरो वेदार्न्सव शास्त्राण्यशेषतः
ब्रह्मतत्वं न जानाति दर्वी पाकरसंः यथा।
अतएव दार्शनिक के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपने ज्ञान का स्वयं उपयोग करे। उसका ज्ञान केवल दूसरों को उपदेश देने के लिए ही न हो, बल्कि वह अपने ज्ञान के प्रयोग से उत्तरोत्तर अपने दर्शन के लक्ष्य के समीप पहुँचता जावे। सजीव ज्ञान वह है, जिसमें आगे बढ़ाने की योग्यता विद्यमान हो। चीदना ज्ञानलक्षणम्ः।
दार्शनिक के उपर्युक्त तीनों गुणों को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यक्ति की योग्यताओं पर विचार करने पर हमें यह पता लगाने में कठिनाई न होगी कि वह दार्शनिक है अथवा नहीं।
(कुँ.बादाम सिंह गौर, चाँचोड़ी)
मानवता का सुखद आभास आज किन्हीं विरलों को अपने जीवन में प्राप्त होता है। इसका कारण हमारी संदिग्ध आस्तिकता है। कहने भर को तो हम आस्तिक हैं, किन्तु क्रियात्मक रूप में आस्तिकता का प्रभाव जीवन में अंश मात्र होता है। अच्छी आस्तिकता का लक्षण यह है कि हम ईश्वर में दृढ़ विश्वास करें, उसका सर्व व्यापकता, नियामकता, दिव्यता को पल भर भी विस्मृत न होने दें।
यदि हम सर्वकाल में उस परम पिता की ओर देखते हुए उसके आदेशानुसार कर्म में प्रवृत्त रहें तो हमसे कभी कोई अकर्म बन ही नहीं सकता और हमारा जीवन शुभ कर्म के फल स्वरूप सत्यं शिवं सुन्दरम् की दिव्यता से मुखरित हो उठे। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम प्रभु की सेवा में कर्त्तव्य कर्मों द्वारा संलग्न रहें। कोई भी कर्म क्यों न करते हों, सबमें ईश्वरीय आदेश की अनुभूति रहे तो मानवोचित धर्म, सत्य, सदाचार, संयम, नियम का पालन हमारे द्वारा स्वाभाविक रूप से होता रहेगा, क्योंकि शासक रूप से परमात्मा हमारे समक्ष उपस्थित रहेगा तो हम अकर्म नहीं कर सकेंगे। कुकर्म में मनुष्य तभी प्रवृत्त होता है, जबकि वह शासन से अपने को निर्भय समझता है।
जल प्रवाह की भाँति मानव जीवन का प्रवाह उस परम दिव्यताति दिव्य परमेश्वर की ओर प्रवाहित हो रहा है। प्रभु ने मानव जीवन का परम ध्येय ही यह निर्मित किया है कि हम उसके द्वारा प्रतिपादित मार्ग में प्रतिष्ठित रहें, यही हमारा कर्त्तव्य कर्म है। मानव शरीर ईश्वर प्रदत्त विशेष कृपा है। इस शरीर द्वारा शुभ कर्म ही हमें अभीष्ट हैं। भारत में योग भोग का अनुपम सादृश्य है, किन्तु भारतीय मानवता हमें संयम पूर्वक जीवन यापन का आदेश करती है। अनियमित जीवन दुख का हेतु है। भोग भोगने के लिए अवश्य है, पर उसका दुरुपयोग किसी भी दशा में वाँछनीय नहीं है। प्रमाद और आलस्य जीवन के भयंकर शत्रु हैं। उनके चंगुल में पड़कर मानव पशुवत हो जाता है। समस्त आपदाएं उसे अपना निवास स्थान बना लेती हैं। व्यर्थ भोग, व्यर्थ व्यवहार इनकी देन है, जिनसे अन्तःकरण में कुत्सित विचार एवं निष्क्रियता उत्पन्न होती है। यदि ईश्वर की उपासना करते हुए भी अंतःकरण में विशिष्ट दिव्यता का आभास नहीं हुआ, तो आस्तिक कहने का हम दावा नहीं कर सकते। इसके साफ माने हैं कि जिन नियमों के पालन करने से मनुष्य में दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होता है, हमने उन नियम का पालन नहीं किया।
भारत में सब नहीं तो अधिकाँश में प्रत्येक गृह का एक सदस्य तो अवश्य ही अपनी कुल गत विधि अनुसार ईश्वरोपासना करता है, किन्तु अधिकाँश व्यक्तियों में उस दिव्य आभा का आभास प्राप्त नहीं होता, जिसका वर्णन हमने अपने धर्म ग्रंथों में पढ़ा है। इसके मूल में अनिश्चित धारणा असंयमित आचार एवं आलस्य ही कारण है। यदि हमको मानव बनना है तो सर्वप्रथम अन्तःकरण में यह दृढ़ विश्वास सदैव, सब काल के लिए धारणा करना होगा कि परम प्रेमी परमात्मा, जो सबका प्रभु है, सब जगत में, सब काल में ओतप्रोत है, वह हमारी प्रत्येक गतिविधि को हजारों नेत्र से देख रहा है। वह परम दिव्य है, सबका हितैषी है, सबमें व्यापक है, संसार का समस्त व्यापार उसी में निहित है, संपूर्ण जगत उसी के प्रकाश से प्रकाशित है एवं उसके द्वारा प्रतिपादित शुभ कर्म एवं शुभ भाव में ही हमें प्रवृत्त रहना है। इस धारणा को मूर्त रूप से अन्तःकरण में प्रतिष्ठित करना होगा। हमारे शरीर द्वारा कोई भी कार्य ऐसा न हो जिसे अधार्मिक अथवा अनियमित कहा जा सके। हमारी इन्द्रियों के द्वारा कोई भी अग्राह्य विषय ग्रहण न किया जावे। प्रत्येक कर्म करने के शुरू में विचारपूर्वक उसकी औचित्यता पर बुद्धि द्वारा निर्णय प्राप्त होने पर ही उसे किया जावे। आरंभ में तो कुछ दिक्कत सी प्रतीत होगी किन्तु अभ्यास वश शनैः शनैः यह दिक्कत स्वाभाविकता में परिवर्तित हो जायेगी।
‘जहाँ पर वासना है वहाँ पर सत्य कभी रह नहीं सकता।’ -महात्मा युद्ध
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‘मन से बाहर संसार की किसी चीज का आस्तित्व नहीं।’ -वर्कले
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‘अगर अपने अन्दर खोज करोगे तो तुम्हें सब चीजें वहीं मिल जायेंगी।’ -गेटे
(श्री रामवली सिंह जी सुजानीपुर)
हम चाहे आशावादी हों या निराशावादी, यह सांसारिक जीवन हमारे लिए दुःखपूर्ण अवश्य प्रतीत होता है। बच्चा जब से अपनी माँ के उदर में आता है उसे दुःख का अनुभव होने लगता है। मनुष्य अपने जीवन के शुरू से लेकर अन्त तक दुःख के अनेकों जागृत स्वप्न देखा करता है। मनुष्य इन दुःखों से मुक्त होना चाहता है और इस सम्बन्ध में नाना प्रकार की कल्पनायें किया करता है, जो निम्न लिखित हैं-
1.इस लोक के बाहर परन्तु व्यक्त जगत के अन्दर ही किसी दूसरे लोक में।
2. इस लोक के भीतर ही परन्तु अतीत के क्षेत्र में।
3. इस गोचर जगत से परे अभौतिक और अव्यक्त क्षेत्र में।
4. इस लोक के भीतर परन्तु भविष्य के गर्भ में।
1. यही कारण है कि कुछ लोग इस संसार को दुःखमय समझ कर एक स्वर्ग की कल्पना करते हैं जो हमारे व्यक्त जगत के भीतर किसी अन्य लोक में होता है। उस स्वर्ग में हम उन्हीं सुखों की अधिकता देखते हैं, जिनका यहाँ अभाव होता है। उस स्वर्ग में हमें वही आनन्द प्राप्त होता है, जो इन साँसारिक दुःखों के अभाव में प्राप्त होता है। स्वर्ग के प्राणी हमें अजर और अमर दिखाई पड़ते हैं। वहाँ खाने पीने के लिए बहुत सुन्दर स्वादिष्ट पदार्थ-अमृतादि मिलते हैं। स्वर्ग का सुख इन भौतिक दुःखों का अभाव ही है।
2. दूसरे प्रकार के लोग वे हैं, जो इस समय तो दुःख ही दुःख देखते हैं, परन्तु उनकी निगाह में अतीत का युग सुख ही सुख का युग था। वे राम राज्य को अपना सब कुछ समझते हैं और उसी की प्राप्ति के लिए चिन्तित दिखाई पड़ते हैं। ऐसे लोगों की सम्मति से यह दुःख, जिसका भयानक रूप हम अपनी आंखों के सामने देखते हैं अतीत के युग में न था। पुराणों में ऐसे सुखों का वर्णन है, सभी धर्मात्मा ऐसे सुखों का उपभोग करेंगे।
3. तीसरे तरह के व्यक्तित्व के मनुष्य अतीत युग के युग को सुख का युग नहीं मानते। वे भविष्य में सुख का युग (स्वप्न) देखते हैं। ऐसे मनुष्य जिस प्रकार के सुखों की कल्पना किया करते हैं अथवा कर सकते हैं, वह उन्हें भविष्य में ही प्राप्त होंगे। उनके लिए भविष्य बड़ा ही सुन्दर है, वहाँ वर्तमान की आशा भविष्य पर निर्भर है। इतना सब होते हुए भी उनके भविष्य के सुखों का रूप निश्चित नहीं हैं। ऐसे अनिश्चित सुखों के लिए बहुत से लोग वर्तमान के प्रति विद्रोह करते दिखाई देते है।
4. इन तीन प्रकार के मनुष्यों के अलावा कुछ चौथे प्रकार के भी मनुष्य हैं, जो व्यक्त जगत और ज्ञात कारण में सुख के रूप का दर्शन नहीं पाते। वे अनन्त और किसी अव्यक्त स्थल में अनादि प्राप्ति की आशा करते हैं। हमारे छायावादी लेखक इसी चतुर्थ श्रेणी में आते हैं। छायावादी लेखक का प्रेम एक अनन्त, अव्यक्त और अनिश्चित वस्तु के प्रति होता है। अतः वहाँ तृप्ति का प्रश्न ही वहीं उठता।
अमुक स्थान में, अमुक काल में, अमुक वस्तु में सुख ढूँढ़ने वाले वस्तुतः दुःख के वास्तविक रूप को नहीं समझते, इसीलिए उसके संबंध में विविध प्रकार की कल्पनाएं किया करते हैं। सुख-दुःख का स्थान, काल एवं वस्तु से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। वह तो एक मनोवृत्ति, भावना एवं मान्यता है, जिसे मनुष्य स्वेच्छा पूर्वक किसी में भी आरोपित करके सुखी या दुखी बन सकता हैं। लोभी के लिए धन सब कुछ है, त्यागी के लिए वही भार है। कामी के लिए कामिनी में स्वर्ग है, ब्रह्मचारी को वही नरक दिखाई पड़ती है। आत्म वादी के लिए स्वाध्याय और तप में जीवन लाभ है, भौतिकवादी के लिए जप-तप में समय लगाना एक प्रकार की बेवकूफी है। आज जो घोड़ा अपना होने के कारण परम प्रिय लगता है, कल उसके बिक जाने पर ममत्व न रहने के कारण उससे कोई संबंध नहीं। गरीबों के मस्त रहते और अमीरों को चिन्ता में कुढ़ते देखा जाता है। सतयुग आदि पूर्व युग में भी दुष्ट लोग तथा कष्टकारक कारण मौजूद थे और इस युग में भी सज्जन तथा आनन्द के हेतु मौजूद हैं। स्वर्ग में भी देवता लोग, मनुष्यों की भाँति ही मानसिक उद्वेगों से दुखी रहते हैं, वहाँ भी भोग वस्तुएं उन्हें पूर्ण सन्तोष नहीं दे पातीं। इससे प्रगट है कि सुख-दुःख किसी बाह्य कारण पर अवलम्बित नहीं हैं।
स्ख का एक मात्र केन्द्र मनुष्य के अन्तःकरण में है। जब वह अपनी मनोवृत्ति का समुचित परिमार्जन करके उन्हें पवित्र बना लेता है, तो उसे हर घड़ी, हर परिस्थिति में, दर वस्तु में आनन्द, प्रेम और सन्तोष का दर्शन होता है। उस स्थिति को प्राप्त करने के जो मनोवैज्ञानिक प्रयत्न है, उन्हें ही धर्म धारणा या आत्म साधना कहते हैं।
(श्री ओंकार प्रसाद जी सीरा गाँव)
संसार की चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि जीव को प्राप्त होती है। जन्म जन्माँतर पापों का प्रायश्चित करता हुआ जीव, अनेकों दुखों के सहने के बाद मनुष्य तन को पाता है। मनुष्य जीवन पाकर जीव भविष्य निर्माण करने के लिए स्वतंत्र रहता है। देवत्व प्राप्त करने के लिए मनुष्य जीवन ही प्रथम सोपान है। यदि साँसारिक माया-मोह में ग्रस्त होकर मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य को भूल जाता है, तो उसे सदैव रोना ही रोना है।
यह निश्चित है कि मनुष्य जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने में सैकड़ों कठिनाइयों का हमें सामना करना पड़ता है, पर यदि हम क्षणिक सुखों में फँस कर अपने लक्ष्य का ध्यान छोड़ दें तो हमें सदैव पछताना पड़ेगा। बाद में हमारे इस पश्चाताप का कोई महत्व न रहेगा। इससे अच्छा यही है कि हम अपने आप को पहचानें और उद्देश्य प्राप्ति के लिए कमर कस लें।
यह संसार एक रंगभूमि है। हम सब इस साँसारिक रंगभूमि पर अपना-अपना पाठ याद करने के लिए आये हैं। यदि हम अपने सुपुर्द किये गये कार्य को ठीक तरह से न निभा सकेंगे तो नाटककार, सूत्रधार हम पर अप्रसन्न होगा और अधिक अप्रसन्न हो जाने के बाद वह फिर कभी हमें रंगभूमि पर अपना कौशल दिखाने के लिए न भेज सकेगा। नाटक मंडली का पात्र जिस तरह अपने मालिक से डर कर कार्य करता है, उसी तरह हमें भी परब्रह्म परमात्मा का भय मानते हुए वह कार्य करना चाहिए। यह तो हम सब जानते हैं कि इस संसार में जन्म लेने के बाद मरना तो अवश्य पड़ेगा, फिर हम इस छोटे जीवन काल को क्यों दुख प्रद बनावें? हमें सदैव धर्म कार्यों में व्यस्त रहना चाहिए।
हमारे प्राचीन समय के ऋषि मुनियों ने हमारे इस मनुष्य जीवन को चार अवस्थाओं में विभाजित कर प्रत्येक के कार्य निर्धारित कर दिये हैं। हमें महान पुरुषों के उपदेशों का पालन सदैव करना चाहिए। हमारी आयु का लगभग एक चौथाई भाग तो हमारी बाल्यावस्था के रूप में बिलकुल बेकार ही चला आता है। बाकी की एक चौथाई आयु यौवन के द्वारा मदान्घ किये गये रूप में व्यतीत हो जाता है। उद्देश्य साधना के लिए हमारे पास बहुत ही थोड़ा समय रहता है, हम साँसारिक उलझनों में ही फंसे रहते हैं। एक दिन काल का नगाड़ा बज उठता है और हमें इस संसार से पराधीन अवस्था में विदा होना पड़ता है। विदाई के समय हम नाना प्रकार के विचारों में पड़ कर पश्चाताप करते हैं, पर “अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत” वाली कहावत के अनुसार हमारा रोना बेकार साबित होता है। इसी बात को स्पष्ट करने एवं ठीक तरह से समझने के लिए मैं एक लघु कथा सन्मुख प्रस्तुत करता हूँ। पाठक उस कहानी के द्वारा अपने कर्तव्यों को पहचान सकेंगे।
एक देश की रीति थी कि उस राज्य के लिये एक राजा प्रति पाँचवें वर्ष चुना जाता था। पाँच वर्ष निकल जाने के बाद वह राजा एक भयंकर घने वन में छोड़ दिया जाता था। इस तरह उस देश का राज्य चलाया जाता था। राज्य पाने के लिए लोग लालायित रहते थे। राज्य प्राप्त हो जाने के बाद आनन्द के साथ ऐश आराम से अपना समय व्यतीत कर सुख लेते थे। पाँचवे वर्ष इच्छा न रहते हुए भी पराधीन अवस्था में वह नृपति अपने महल तथा राज्य से निकाल दिया जाता था। अपने सुख के समय को याद कर आँसू बहाता हुआ राजा घने जंगल में समय काटता था।
भाग्यवश बुद्धसेन नामक एक व्यक्ति को भी उस देश का राजा होने का सौभाग्य प्राप्त हो सका। राजा हो जाने के बाद बुद्धसेन ने अपने भविष्य की ओर विचार किया तो उसे मालूम हुआ कि देश की प्रथा के अनुसार वह पाँच वर्ष बाद इस राज्य से अलग कर दिया जाएगा और अमुक जंगल में छोड़ दिया जायेगा। बुद्धसेन ने अपने राज्यकाल में सुखों पर लात मार कर भविष्य उज्ज्वल बनाने का प्रयत्न किया। उसने उस जंगल में जहाँ कि पाँच वर्ष बाद वह भेजा जाने वाला था, एक उत्तम महल तैयार करवा कर राज्य की सब सम्पत्ति वहाँ भिजवा दी। ऐश आराम का सब सामान उस जंगल में पहुँचा दिया गया। राजा होने के कारण कोई कुछ न कर सका। अपने राज्य काल में पाँच वर्ष में अविराम परिश्रम करने के बाद वह अपने उद्देश्य को सफल बना सका। उस देश के लोग उस पर हँसते थे, कहते थे कि किसी पुण्य के बल से यह राज्य प्राप्त हो गया है, पर बुद्धसेन राज्य का सुख नहीं भोग रहा है। यह अभागा है। बुद्धसेन कहता था, मैं पाँच वर्ष के सुख को छोड़ कर जीवन भर का सुख प्राप्त कर रहा हूँ। बात भी ऐसी हुई। जब वह पाँच वर्ष बाद राज्य से निकाल कर जंगल में पहुँचाया गया, तो उसे बिलकुल दुःख नहीं हुआ। वह वहाँ भी राज्य करने लगा।
मनुष्य जीवन पाकर जो लोग बुद्धसेन की तरह अगले जन्म के लिए पुण्य रूपी निधि को एकत्रित करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। मनुष्य तन पाकर ऐश आराम में जो समय बिताते हैं, वे बाद में बहुत दुःखी होते हैं।
मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य यही है कि किसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा के चरणों में प्रेम हो। शास्त्रीय रीति से सब प्राणी मात्र पर दया करते हुए जो भगवान के चरणों में स्नेह रखकर जीवन समाप्त करता है, वह मनुष्य अगले जन्म में नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त होता है। ईश्वर को सदैव याद रखना चाहिए।
(श्री अशर्फीलाल जी मुख्तार, बिजनौर)
आज हम कलयुग के प्राणियों के मनःस्थल के कोने कोने में घुसकर उसकी दुर्बलताओं का पता लगाने के लिये उद्यत हुए हैं। जब तक अपनी दुर्बलताएं मालूम न हों, कोई अपनी दशा को संभाल नहीं सकता। समस्त प्राणियों में मनुष्य की ही दशा शोचनीय है, क्योंकि यह पुरुषार्थ में स्वतंत्र है, जिससे वह श्रेय मार्ग गामी हो सकता है और इसी उद्देश्य से उसको बुद्धि विशेष प्राप्त हुई है। दूसरे प्राणी तो परतंत्र हैं और केवल भोगने के लिए जन्मे हैं। मनुष्य अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने से क्यों घबराता है, इसका कारण अज्ञात रूप से कहीं न कहीं उसके मन में ही है। वह निकल जाये तो यह खट-खट श्रेय मार्ग की सीधी सड़क द्वारा बहुत जल्दी लक्ष्य पर पहुँच जायगा।
एक पक्षी अन्धेरी भयानक रात्रि में निर्भय बियाबान जंगल में बैठा रहता है, परन्तु मनुष्य का ऐसे अवसरों पर भय के मारे क्या हाल होता है, अपने दिल से पूछिए। अव्वल तो मनुष्य को ऐसे स्थान पर जाने का साहस ही नहीं होता और यदि दैव योग से ऐसा अवसर आ प्राप्त हो तो हार्ट फेल हो जाना कोई अचम्भे की बात नहीं। शीतोष्ण के सहन करने की शक्ति उसमें नहीं रही। यदि झूठमूठ भी उसको यह मालूम हो जाये कि कुछ दिनों बाद उस पर कोई आफत आने वाली है, तो आफत आये या न आये उसके लिए तो आज ही से उस आफत से भी अधिक आफत आ गई और वह आफत जिसका इन्तजार था यदि न आई तो यह दिन अपने आप ही मुसीबत के बना लिए। यदि किसी को कोई अच्छी बात बताई जाय तो वह उस अच्छी बात की कदर न करके उसकी अहमियत को घटाकर अपने अन्दर उससे भी अधिक गुण जाहिर करने लगता है और बजाय उस अच्छी शिक्षा के ग्रहण करने के, स्वयं उपदेश करने लगता है। इस तरह प्रत्येक प्राणी उपदेशक की पदवी लिये हुए है तो फिर उपदेश सुनने वाला कहाँ से आये? यह भी मानसिक दुर्बलता ही का कारण है, क्योंकि वह अपनी त्रुटियों को स्वीकार करता हुआ भय खाता है और उसका निर्बल मन अपने को उपदेश के ग्रहण करने योग्य न पाकर उपदेश को अनसुने के नाईं कर देता है।
जैसे यदि किसी बलवान मनुष्य को गाली दो तो वह सुनकर चुप नहीं रह सकता, परन्तु यदि किसी निर्बल मनुष्य को गाली दो तो वह सुनता हुआ चला जायगा, ताकि लोग समझें कि इसने सुना नहीं। यदि कोई आगे चलकर कहे भी कि अमुक मनुष्य तुमको गाली दे रहा था तो बातें ऐसी करेगा कि मानों उसे कुछ खबर ही नहीं है, और फिर बनावटी शान की दो चार बातें कह कर चलता बनेगा यह कमजोरी और कायरता का चिन्ह है (ऐसे अवसर ज्ञानी महात्माओं के साथ भी हो सकते हैं परन्तु वे छिपाते नहीं। यही दोनों में अन्तर है) इस सारे विचार से यह पता चलता है कि मनुष्य के अन्दर कोई कमजोरी अवश्य है, जिससे वह भययुक्त रहता है।
वह कमजोरी है-आत्म अनात्म का विवेक न होना। वह अनात्म में आत्म बुद्धि किये हुए है, अर्थात् अपने को शरीर समझता है इसलिए शरीर के नाश होने में अपना नाश होना जानकर शरीर को हर तरह की आपत्ति और कष्ट से बचाने की फिक्र में लगा रहता है। यदि उसे यह निश्चय हो जाये कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैंने तो असंख्य शरीरों में रह कर भोग भोगे और नहीं मालूम कितने और शरीर में भोग भोगेगा। मेरा तो कभी नाश नहीं हुआ और न होगा, तो वह शरीर के नष्ट होने के भय से मुक्त हो जायगा और निर्भय होकर विचरेगा। शरीर की कमजोरी या गलती स्वीकार करने में उसको कदापि संकोच न होगा। जब यह दुर्बलता उसके मन से निकल जायेगी तो वह परमपद का अधिकारी होगा।
(श्री हजारीलाल जी कोठारी, राजनाँद गाँव)
प्रायः यह देखा जाता है कि भारतवर्ष में स्त्री शिक्षा का प्रचार कम है। यदि हम अन्य देशों के सामने अपने देश को रखें, तो मालूम होता है कि हमारा देश अन्य देशों से स्त्री शिक्षा में कितना पिछड़ा हुआ है। अब हमारे देश में भी स्त्री शिक्षा का प्रचार दिन प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है और ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ दिन के पश्चात हमारा देश अन्य देशों की भाँति स्त्री-शिक्षा में अपना स्थान ले लेगा।
प्राचीन काल में स्त्रियाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करती थीं और बड़े 2 महत्वपूर्ण कार्य करती थीं। इसका ज्वलन्त उदाहरण सती, सीता, सावित्री, अनुसूया, लक्ष्मीबाई इत्यादि हैं। जो कार्य पुरुष करता है, ठीक वही कार्य स्त्रियों ने किया, जबकि वे शिक्षित थीं। शिक्षा जीवन की बहुत बड़ी चीज है। शिक्षा से मस्तिष्क का विकास होता है साथ-साथ ज्ञान का भण्डार भर जाता है। वास्तविक रूप से देखा जाय तो शिक्षा ही से मूर्ख विद्वान बनता है, हृदय के ज्ञान रूपी द्वार खुल जाते हैं। पढ़-लिखकर मानव संसार के प्राणियों में अग्रगण्य हो जाता है। मानव सब प्राणियों से उच्च माना भी गया है, इसका कारण उसके ज्ञान की अधिकता ही है।
स्त्रियों को भी शिक्षा देना नितान्त आवश्यक है, परन्तु शिक्षा किस प्रकार देनी चाहिये, इसका विचार भी करना जरूरी है। मेरी समझ में स्त्री तथा पुरुषों की शिक्षा पृथक-पृथक होनी चाहिये। लड़कियों को भी लड़कों की भाँति उच्च से उच्च शिक्षा देनी चाहिये। यदि लड़कियों को उच्च शिक्षा दी जायेगी तो वे आगे चलकर अपना जीवन सुखमय तथा सरलता से व्यतीत कर सकती हैं।
स्त्रियाँ यदि शिक्षित होंगी तो उनकी सन्तान भी शिक्षित होगी। प्रारम्भ में बच्चा अपनी माता की ही गोद से सीखता। उनका प्रारम्भ में बच्चे की गुरु उनकी माता ही है। यदि माता सद्गुण सम्पन्न होगी, शिक्षित होगी, तो बच्चा भी अच्छे गुण वाला होगा। इसके अनेकों ज्वलन्त उदाहरण सामने ही मौजूद हैं।
स्त्री-पुरुष की अर्द्धांगिनी मानी जाती है और है भी ठीक। यदि स्त्री शिक्षित है, कार्य कुशल है तो अपने पतिदेव के कार्य में हाथ बंटा सकती है, दोनों पति-पत्नी शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं और गृहस्थ जीवन सफल बना सकते हैं। स्त्री यदि शिक्षित होगी तो पुरुष के कार्य को सरलतापूर्वक निपटा सकती है। शिक्षित स्त्री अपने कुटुम्ब की, राष्ट्र की भलाई में भी हाथ बंटा सकती है।
यदि स्त्रियों में पुरुष के समान शिक्षा प्रचार हो जायेगा, तो स्त्रियों की गणना पुरुष से भी श्रेष्ठ हो सकती है तथा पुरुष और स्त्री मिलकर कार्य करें तो अपनी उन्नति एवं राष्ट्र की उन्नति होगी, साथ ही अपना नाम विख्यात बना लेगी।
परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि लड़कियों और लड़कों की शिक्षा एक साथ, एक स्कूल में और एक जैसी न होनी चाहिए। स्त्रियों का कार्य क्षेत्र भिन्न है, इसलिए उनके शिक्षा क्रम में वे बातें सम्मिलित की जानी चाहिए, जो उनके गृह जीवन में उपयोगी हो सकें। आजकल की शिक्षा पद्धति में लड़की-लड़कों की शिक्षा एक सी होने के कारण लड़कियों को बहुत सी ऐसी बातें रटनी पड़ती हैं, जो उनके गृह जीवन में काम नहीं आतीं और ऐसी अनेक बातों से वंचित रह जाती हैं, जिन्हें जानना प्रत्येक सुगृहणी के लिए आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त लड़के और लड़कियों की पाठशालाएं अलग-अलग होनी चाहिए। सहशिक्षा के दुष्परिणाम विदेशों में भली-भाँति प्रकट हो चुके हैं। उनकी पुनरावृत्ति इस देश में भी करना भारत से साँस्कृतिक गौरव के अनुकूल न होगा। संयम, सदाचार एवं शील संरक्षण की दृष्टि से सहशिक्षा को उचित नहीं कहा जा सकता।
स्त्री शिक्षा आवश्यक है, क्योंकि उससे हमारे भविष्य का भारी संबंध है। अशिक्षित नारी राष्ट्र निर्माण में, गृह व्यवस्था में तथा जीवन के अन्य कार्यों में उतना सहयोग नहीं दे सकती, जितना कि शिक्षित नारी। इसलिए हमें उत्साहपूर्वक स्त्री शिक्षा को आगे बढ़ाना चाहिए, साथ ही शिक्षा पद्धति को सुधारने का भी ध्यान रखना आवश्यक समझना चाहिए।
(श्री राधेश्याम जी टाटिया, कलकत्ता)
लड़की के विवाह के अवसर पर दहेज देने की प्रथा हमारे देश में बहुत वर्षों से चली आती है। यह प्रथा हमारे पूर्वजों द्वारा बड़ी आदर और उत्साह से मानी जाती थी। लड़की को अपने घर विदा करते समय अपने धन का कुछ हिस्सा दहेज के रूप में दे देना वे अपना धर्म समझते थे। वे अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दहेज देते थे उन पर लड़के वालों की तरफ से कोई पाबन्दी नहीं होती थी। परन्तु ज्यों ज्यों समय व्यतीत होता गया, त्यों-त्यों इस प्रथा ने भीषण रूप धारण कर लिया और अब यह प्रथा सौदे के रूप में हम लोगों के सामने है। यदि लड़की वाला लड़के वाले की माँग को पूरा करने में समर्थ है तो उसकी लड़की की शादी इच्छानुसार हो सकती है। लड़के वाले की नाजायज माँग को चाहे वह कर्ज लेकर पूरा करे, चाहे अपने पूर्वज की जायदाद बेचकर पूरा करे। अगर वह उसकी माँग को पूरी करने में असमर्थ है तो उसकी लड़की की शादी इच्छानुसार नहीं हो सकती। इस तरह विवाह, जिस को हम लोग जन्म जन्मान्तर का पवित्र सम्बन्ध समझते हैं, इस तरह रुपयों और गहनों पर बिक्री होता है, अब यदि हम इसे गहनों और रुपयों का सम्बन्ध कहें तो कोई अनुचित नहीं होगा, क्योंकि इस तरह के विवाहों में लड़की और लड़के के रूप और गुण को नहीं देखा जाता है।
आजकल अपनी लड़की की शादी क्या करनी है, अपनी इज्जत और शान को बेचना है। समाज के चन्द धनीमानी व्यक्तियों को छोड़कर सबको ही अपनी लड़की के विवाह की चिन्ता लगी रहती है। घर में लड़की के पैदा होते ही घरवालों के मुँह पर विषाद की रेखा नजर आती है इस महँगाई के समय में शायद ही कोई (साधारण वर्ग और मध्यम वर्ग) अपनी आय में से खर्च के बाद दे बचा सकता है। फिर वह अपनी लड़की के विवाह के लिए कैसे उतने रुपये जमा कर सकता है, जितनी कि लड़के वाले की माँग होती है। लड़की का विवाह करना अनिवार्य होने पर भी कई मनुष्य उसका विवाह नहीं कर सके और दहेज की चिन्ता करते 2 ही दुनिया से चले गये। दहेज देने में असमर्थ होने के कारण कई मनुष्यों ने अपनी लड़की का अनमेल विवाह करना शुरू किया, जिससे बाल विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी और इससे दुराचार भी फैलने लगा। अपनी लड़की की शादी की चिन्ता में हमारे समाज के लाखों माता-पिताओं को दिन रात आँसू बहाने पड़ने हैं और लड़कियाँ अपने यौवन काल में अपने माता-पिता को इस तरह आँसू बहाते देखकर अपने भाग्य को कोसती हैं और कभी 2 आत्म हत्या तक कर बैठती हैं।
इस विषय को सुधारने के लिए हमारे समाज में अनेक सभा, सोसाइटी और पंचायतें बनी हुई हैं, जिन पर हमारे देश का हजारों रुपया हर साल खर्च होता है, परन्तु अब तक कोई भी संस्था इस प्रथा को सुधारने में सफल नहीं हुई, क्योंकि इन संस्थाओं में सुधार के प्रस्ताव केवल कागजों तक ही बने हुए हैं, वे मनुष्यों के हृदय पर अपना अधिकार नहीं जमा सके और मनुष्य के हृदय पर प्रभाव पड़ने से ही इस प्रथा में सुधार हो सकता है।
आजकल इस प्रथा का सुधार एक विचित्र ढंग से हुआ है। आजकल बहुत से मनुष्य विवाह के अवसर पर दहेज प्रदर्शनी नहीं करते हैं, वे लड़की वालों से दहेज के रूप में एक निश्चित रूप रकम ले लेते हैं और बाहर से दुनिया को दिखाते हैं कि उन लोगों ने दहेज नहीं लिया है।
हमारे समाज के नवयुवकों का कर्तव्य है कि वे इस प्रथा का अनुशोधन करने के लिए तन-मन से चेष्टा करें। नवयुवकों के द्वारा इन कुप्रथाओं में सुधार हो सकता है। युग-युग की इस भयंकर बीमारी को, जो समाज के लाखों मनुष्यों को दिन-रात कष्ट दे रही है, नवयुवक ही नष्ट कर सकते हैं। उन्हें इसके विरुद्ध एक जबर्दस्त क्रान्ति मचानी होगी। वे अपने माता-पिता को दहेज न लेने पर बाध्य करें। नवयुवकों को चाहिए कि वे जल्दी से जल्दी इस सत्यानाशी प्रथा को रोकने की चेष्टा करें, जिससे दहेज के कोल्हू में पेली जाती हुई नारी जाति का उद्धार हो सके।
(श्री मनोहरदास जी अग्रावत, उमेदपुरा)
मानव जीवन अनूठा है, अलभ्य है, देव दुर्लभ है, सर्वश्रेष्ठ है, यह बात प्रायः सभी बुद्धिमान लोग कहते हैं, सुनते हैं और धर्म शास्त्रों में पढ़ते हैं। मानव जीवन ही एक ऐसा अनमोल रत्न है जिसके द्वारा हम सभी परम दुर्लभ पदार्थ प्राप्त कर सकते हैं। मनुष्य को परमात्मा ने सर्वांग पूर्णता, व्यवहार कुशलता तथा अन्यान्य अत्यन्त आवश्यकीय उपकरणों के सिवा एक ऐसी अलौकिक महान् शक्ति प्रदान की है, जिसके द्वारा वह मानव जीवन को विशाल बनाते हुए निखिल विश्वविधायक परमात्मा को भी अपने वश में कर सकता है। यह महान् शक्ति मानव देह धारियों को छोड़कर औरों को नसीब नहीं है। जिसे उस शक्ति का सदुपयोग करना आ जाता है, वह आनन्द स्वरूप बन जाता है। जगत के द्वंद्वों से, मायिक विघ्न बाधाओं से सदा के लिये सर्वथा विमुक्त हो जाता है।
एकान्त में बैठकर शान्त चित्त से अपने जीवन के यथार्थ ध्येय का विचार तो करो, आन्तरिक शोध तो लगाओ, जरा देखो तो सही तुम्हारे हृदय मन्दिर में कैसी-कैसी अनूठी वस्तुएं भरी हैं। प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, विश्वास, शील, सन्तोषादि दैवीय गुणों का विचित्र भण्डार है। अज्ञान के घनान्धकार में छिपे हुए प्रभाकर को पहचाने की कोशिश तो करो। ऐसा करने से तुम्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का विमल विज्ञान होगा। अज्ञान की, दुःखों की संकटों की घनी घटनाएँ छिन्न-भिन्न हो जायगी, हृदय भवन के कोने-कोने में प्रकाश छा जायगा, शरीर में सच्चे जीवन का संचार होगा, सद्गुणों का विकास होगा, अन्त में सत्य श्रद्धा के प्रताप से उस परम प्रदीप्त ज्ञान के भण्डार, आनन्द के स्रोत आत्मा का और तदन्तर्यामी परमात्मा प्रभु का साक्षात् दर्शन प्राप्त कर कृतार्थ हो जाओगे।
याद रखो, तुम निर्विकारी हो। आत्मा ईश्वर का अंश है, उसमें कभी किसी प्रकार की विकृति पैदा नहीं हो सकती। शरीर ही आत्मा को विकारी बनाये हुए है। मन बुद्धि तथा विषय लोलुप इन्द्रियाँ विकार जगत की रचना करती हैं तथा आत्मा को अपने जाल में फँसाने की चेष्टाएं करती हैं, परन्तु आत्मा जब अपने स्वरूप को ठीक-ठीक पहचान लेता है तब वह उनके फैलाये हुए माया जाल को तोड़-फोड़कर विमुक्त हो जाता है, अपने नित्य निकेतन प्रभु धाम की प्राप्ति के लिए अत्यंत उत्कण्ठित हो उठता है, और मानव जीवन को सार्थक कर जगत में महान आदर्श उपस्थित करता हैं।
(श्री राम खेलावन जी चौधरी बी.ए.एल.टी)
अमेरिकन विद्वान डेला कार्नेगी ने मनोवैज्ञानिक आधार पर खोज करते हुए कुछ ऐसे सिद्धान्त तैयार किये हैं, जिनके अनुसार चलने से मनुष्य दूसरों का प्रेमपात्र, स्नेह भाजन और प्रिय बन सकता है। उन सिद्धान्तों का साराँश निम्नलिखित हैं-
1-प्रत्येक व्यक्ति की कुछ न कुछ कठिनाइयाँ और समस्यायें ऐसी होती हैं, जिनके कारण वह चैन से बैठ नहीं सकता। कभी-कभी वह बिना किसी की सहायता के हल नहीं कर सकता, साथ ही वह उन्हें और उनके भेद को हर एक से नहीं कह सकता। यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा मिल जाय, जो उनके भेदों को छिपा सके और केवल उनकी कठिनाइयों में रुचि लेकर उससे सहानुभूति प्रकट करे - पर यह सहानुभूति सच्ची होनी चाहिए, तो वह बड़ी आसानी से उसका विश्वास पात्र और स्नेह भाजन बन सकता है। साथ ही मौखिक सहानुभूति काफी नहीं है कभी-कभी चालाक लोग इसका सहारा लेकर सस्ता प्रेम और विश्वास प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे के हृदय पर स्थायी विजय तभी पाई जा सकती हैं जब मौका पड़ने पर उसका कुछ क्रियात्मक रूप भी देखने को मिले।
2-संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति होते हैं। एक तो वे हैं, जो दूसरों का हित करते हैं, अपने लाभ हानि की उन्हें परवाह नहीं होती। ऐसे उच्च कोटि के लोग हजारों में एक होते हैं। दूसरे प्रकार के वे लोग हैं, जो परले सिरे के स्वार्थी होते है। यह लोग मौका पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं और काम बन जाने पर तोते की तरह आँख फेर लेते हैं। इनकी भी संख्या कम है। तीसरे प्रकार के व्यक्ति वे हैं जो अपने हित के बदले में दूसरों का हित करते हैं और बुराई के बदले बुराई। इनकी संख्या सबसे अधिक होती है। ऐसे लोगों को वश में करने के लिए पहले उनके हितों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये। उनसे संपर्क रखते हुये, उनसे बात करते हुये या किसी प्रकार का सम्बन्ध रखते हुये, उनके हितों को धक्का न पहुँचने देना चाहिये। उनकी पूर्ति में यथा-शक्ति सहायता करने से सभी लोग आसानी से वश में आते हैं।
3-दूसरों से बातचीत करते समय खुद बोलने की अपेक्षा, चुप रह कर, पूरी संगति और सन्तोष के साथ, अभ्यागत की बात सुनना, उसके मन पर अधिकार जमा लेने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। याद रखिये, आप के पास जो भी आता है, किसी न किसी रूप से वह कुछ प्राप्त करने आता है। वह आपकी सहानुभूति चाहता है, जिसमें नहाकर वह अपने दुख-दर्द की थकावट को दूर करना चाहता है। आपसे बातें करके उसके मन का भार हल्का पड़ जाता है। यानी आप उसकी चेष्टाओं और आकृति का ध्यान से अध्ययन कीजिए तो आपको पता चल जायगा कि यदि आपने उसकी बात को ध्यान से सुना है, उसकी योजना की दाद दी है, तो वह दूने उत्साह से बात करेगा और पूरा वार्तालाप समाप्त होने पर, आपकी मन नहीं मन प्रशंसा करता हुआ जायेगा। यदि आप उदास भाव से उसकी बात सुनेंगे, तो उसे पता चल जायगा, क्योंकि मनुष्य मनुष्य के ‘हृदय’ को परखने में प्राकृतिक रूप से पटु होता है। यदि आप स्वयं अपनी राम कहानी कहने में लग जाँयगे, तो दूसरे आये हुये मनुष्य को निराशा होगी और आप उसके मन पर कभी भी अधिकार न कर सकेंगे। जहाँ तक हो आप उसे अधिक से अधिक बात करने के लिये उत्साहित करें।
4-हर एक व्यक्ति जब मिलता है, चाहे वह थोड़ी देर के लिये या जीवन में एक ही बार मिले, तो वह आशा करता है कि दूसरा व्यक्ति उसे याद रक्खे। दुबारा मिलने पर यदि वह अपने उस पूर्व परिचित को पहचान लेता है, तो उस परिचित व्यक्ति को एक अपूर्व सुख मिलता है और यदि कहीं उसका नाम दूसरे ने याद रखा है, तो उसे पूर्ण विश्वास हो जाता है कि उसकी याद सच्चे दिल से रक्खी गई है। इसलिये आप अपने मित्रों और परिचितों का नाम अवश्य याद रखें।
5. तुलसीदासजी ने एक स्थल पर लिखा हैः-
आवत ही हर्ष नहीं नैन नहीं स्नेह,
तुलसी तहाँ न जाइये कंचन बरसे मेह।
यदि तुम किसी मित्र या सम्बन्धी के घर जाओ और यह समझ लो तुम्हारे आने से उसकी आँखों में स्नेह नहीं उमड़ आया, उसका हृदय उल्लास से नहीं भर गया, तो ऐसी जगह भूल कर भी न जाओ, चाहे वहाँ सोना ही क्यों न बरसे। जो भी आदमी आपके पास आता है, वह आपका प्रेम प्राप्त करना चाहता है। जब वह आपसे मिलता है, तब वह आपके चेहरे और आँखों को देखकर फौरन पहचान लेता है कि आप उसके आने से प्रसन्न हैं या अप्रसन्न, इसलिये आप उसके आने पर प्रसन्नता अवश्य प्रकट कीजिये। प्रसन्नता प्रकट करने का साधन है मुस्कुराना। सबसे मुस्कुरा कर मिलिये, आपके चेहरे पर एक आकर्षक शक्ति उत्पन्न हो जायेगी, पर ध्यान रखिये, यह मुस्कुराहट बनावटी नहीं होनी चाहिये।
6-हर एक मनुष्य को आत्म सम्मान प्रिय होता है, वह अपने महत्व को जाने नहीं देना चाहता, इसलिये दूसरों का आदर करना आवश्यक है-पर ऊँच हो या नीच, अमीर हो या गरीब, सबको अपनी कला, कुशलता की किसी न किसी चीज पर नाज होता है। बस उसी चीज का यदि आपने आदर किया, तो आपके आत्म सम्मान की परख मालूम हो गई। आत्म सम्मान का आदर करने से दूसरे वश में हो जाते हैं।
क्रोध दिलाने पर भी चुप रहना बड़ी भारी बुद्धिमानी है। इससे बढ़कर बुद्धिमानी मन की चंचलता को रोकने में है।
1.दान 2. पश्चाताप 3. संतोष 4. संयम 5. नम्रता 6. सत्य 7. दया। ये सात बैकुँठ के दरवाजे हैं।
(श्री राम शर्मा आचार्य)
हमारे जीवन का अधिकाँश भाग गायत्री माता की गोदी में व्यतीत हुआ है। इस महामंत्र के सम्बन्ध में हजारों आर्ष ग्रन्थों का अनुसंधान करके यह पाया है कि आध्यात्मिक साधनाओं में गायत्री से बड़ी साधना दूसरी नहीं। महात्मा, तपस्वी और सिद्ध पुरुषों के चरणों में बैठकर उनका मन्तव्य भी यही पाया है कि गृही और विरागी दोनों ही प्रकार के योगी गायत्री द्वारा जो शान्ति पाते हैं, वह अन्य मार्ग से नहीं। अनेकों साधारण साधकों को छुटपुट साधनाओं से जो आत्मिक और साँसारिक लाभ प्राप्त करते अपनी आंखों से देखा है, उससे भी यही निष्कर्ष निकला है कि गायत्री सर्व शक्तिमान है। वह वस्तुतः भूलोक की कामधेनु है। दार्शनिकों, धर्मज्ञों और तत्व दर्शियों का मत है कि गायत्री के अक्षरों में छिपी हुई शिक्षाएं इतनी सर्वांगपूर्ण हैं कि उनके आधार पर संसार की समस्त उलझी हुई समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त हमें व्यक्तिगत रूप से जो अनुभव हुए हैं, उनने हमारी श्रद्धा को असंख्य गुनी बढ़ा दिया है। अब हमारा सुनिश्चित विश्वास है कि गायत्री साधना करने वाले व्यक्ति का श्रम और समय कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता, उसे आशा जनक सत्परिणाम प्राप्त होकर रहते हैं।
इन निश्चयों पर पहुँचने के उपरान्त हमारे लिए दो मार्ग रह जाते हैं। 1. एकान्त उपासना में प्रवृत्त हो जाया जाय 2. इस महाशक्ति की महत्ता का व्यापक प्रचार करके अनेक आत्माओं को लाभान्वित किया जाय। इन दो विकल्पों के सम्बन्ध में बहुत दिनों तक विचार करते रहने के उपरान्त माता की प्रेरणा यही प्राप्त हुई है कि दूसरे मार्ग को अपनाया जाय। ब्रह्मदान एवं ज्ञान यज्ञ भी उतना ही महान् है, जितना कि जप, तप, ध्यान और साधन। अपने अनेक पुत्रों को ब्रह्म ज्ञान का अमृत बाँटते देखकर माता उतनी ही संतुष्ट हो सकती है, जितना कि कठोर तपश्चर्याओं की श्रद्धाँजलि पाकर प्रसन्न होती है। अतएव हमारा भावी कार्यक्रम प्रधानतया गायत्री प्रचार होगा।
गायत्री महिमा प्रसार के कार्यक्रम का प्रारंभ किया जा रहा है, जिसकी योजना इस प्रकार है-
1. गायत्री में सन्निहित मानव धर्म के महान सिद्धान्तों का व्यापक प्रसार किया जाय, जिससे मनुष्य अपने भूले हुए धर्म कर्तव्यों को अपना कर जीवन की अनेक उलझी गुत्थियों को सुलझा सके।
2. गायत्री प्रसार करके मनुष्य का मनोवैज्ञानिक आत्म निर्माण किया जाय, जिससे वह संयम, सदाचार, सद्भाव, शिष्टाचार, सेवा, सहयोग आदि सद्गुणों को बढ़ाता हुआ जीवन को सुखी और समृद्ध बना सके।
3. गायत्री साधना और तपश्चर्याओं द्वारा उन गुप्त आत्मिक शक्तियों का विकास किया जाय, जो मनुष्य को महान बनाती हैं, अनेक सिद्धियों का द्वार खोलती हैं और परमात्मा के समीप ले पहुँचती है।
इन तीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य-प्रणाली इस प्रकार निर्धारित की गई है -
1. गायत्री साहित्य का अधिकाधिक प्रचार किया जाय, जिससे लोगों की जानकारी इस सम्बन्ध में बढ़े।
2. गायत्री जप, व्रत, साधन, अनुष्ठान, यज्ञ, पुरश्चरण, तप, आदि के अनेक आयोजन किये जायें।
3. एक ऐसी केन्द्रीय गायत्री तपोभूमि मथुरा में हो, जहाँ गायत्री के गूढ़ तत्वों का अध्ययन, एवं विशिष्ठ साधनाओं का साधन जिज्ञासु लोग कर सकें। साथ ही इस केन्द्र पर विद्यालय, चिकित्सालय, पुस्तकालय आदि सेवा संस्थाएं भी रहें। इस केन्द्रीय तीर्थ में एक गायत्री मन्दिर भी हो।
इस सब कार्यों को चलने के लिए एक अ. भ. गायत्री संस्था की स्थापना की गई है, जो उपरोक्त सब कार्यों का संचालन करेगी। उपरोक्त योजना को कार्यान्वित करने में हमने अब अपना अधिकाँश समय देना निश्चय किया है।
केन्द्रीय तीर्थ निर्माण सम्बन्धी योजना बड़ी है। यह धीरे धीरे पूरी होगी, पर अभी तुरन्त जो कार्य प्रारम्भ किया जा रहा है, वह है - “गायत्री भक्तों का संगठन”। इस संगठन में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति “गायत्री संस्था के सदस्य” समझे जायेंगे। सदस्यता की कोई फीस नहीं होगी, पर एक उत्तरदायित्व हर सदस्य को अनिवार्य रूप में पूरा करना पड़ेगा। वह यह है कि - वह अधिकाधिक लोगों को गायत्री की समुचित जानकारी करावें। इस कार्य की पूर्ति के लिए उसे अपना एक छोटा ‘गायत्री पुस्तकालय’ रखना पड़ेगा जिसमें पूरा गायत्री साहित्य रहे। इस साहित्य का वह बार 2 स्वयं अध्ययन करता रहेगा, ताकि हर बार पढ़ने में उसे नये-नये रहस्य समझ में आते रहें। साथ ही वह इन पुस्तकों को धार्मिक प्रवृत्ति के दूसरे लोगों को भी पढ़ावेगा, ताकि वे भी इस विद्या की समुचित जानकारी प्राप्त कर सकें। अधूरी जानकारी वाले ‘ले भगू’ साधक कभी सफल नहीं होते। जिसे समुचित लाभ उठाना है, उसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि गायत्री विद्या कि पूरी पूरी जानकारी प्राप्त करे।
अखण्ड ज्योति ने जो गायत्री साहित्य छापा है, उससे एक अच्छा गायत्री पुस्तकालय बन सकता है। बीस रुपये से भी कम की लागत में ब्रह्म विद्या का एक महत्व पूर्ण भंडार जमा कर लेना किसी भी गायत्री प्रेमी के लिए कठिन नहीं हो सकता। कई साधक मिल कर भी एक पुस्तकालय स्थापित कर सकते हैं।
यह निश्चय किया गया है कि पुस्तकों से जो कुछ भी लाभ होगा, उसकी पाई-पाई गायत्री संस्था के कार्य में व्यय होगी। उस लाभ की एक पाई भी व्यक्तिगत खर्च में न लाई जायगी। इस प्रकार संस्था के महान उद्देश्यों और विशाल कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए एक मात्र साधन, गायत्री साहित्य का लाभाँश ही है। अतएव गायत्री संस्था के सदस्यों को चाहे धर्म प्रचार के रूप में, चाहे अपनी जानकारी पूर्ण करने के रूप में, चाहे अपने यहाँ गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने के पुण्य रूप में, चाहे अ.भा. संस्था की सहायता के रूप में यह आवश्यक है कि वे अपने पास तो पूर्ण गायत्री साहित्य रखें ही, साथ ही जहाँ तक हो सके अन्य लोगों को भी इस साहित्य को मँगाने के लिए उत्साहित करें। गायत्री संस्था के सदस्यों का यह अनिवार्य कर्तव्य है। जो सज्जन इस अ.भा. संगठन में सम्मिलित होंगे, उनमें आत्मोन्नति के लिए विशेष रूप से सहयोग और पथ प्रदर्शन किया जायगा।
इस वर्ष सदस्यों की संख्या बढ़ाकर सुदृढ़ संगठन बनाना प्रधान कार्यक्रम है। हम चाहते हैं कि कम से कम एक हजार गायत्री पुस्तकालय देश के कौने कौने में स्थापित हो जायं, जहाँ से निरन्तर गायत्री प्रचार होता रहे। यह पुस्तकालय, केन्द्रीय संस्था की शाखाओं के रूप में काम करेंगे। इसके अतिरिक्त व्यापक रूप से अधिकाधिक व्यक्तियों को गायत्री की उपयुक्त साधनाएं करके आत्मकल्याण की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जायगा। केन्द्रीय तीर्थ मथुरा में भी स्थापित करने के लिए जितना कुछ प्रयत्न बन पड़ेगा, किया जायगा। आशा है कि माता की कृपा से वह भी पूरा हो जायगा और इस महान् तत्व ज्ञान की वास्तविक शोध करने वालों के लिए एक उत्तम तपोभूमि उपलब्ध होगी।
हमारा गायत्री प्रेमी से आग्रह पूर्वक अनुरोध है कि वे गायत्री संस्था के सदस्य बनकर एक महत्व पूर्ण संगठन के अंग बनें। साथ में सदस्यता का फार्म भेजा जा रहा है। इस भराने के साथ साथ जो गायत्री पुस्तकें आपके पास न हों उन्हें मँगाने का आदेश भी भेजें। जो सज्जन गायत्री साहित्य का पूरा सैट मँगाकर अपने यहाँ पुस्तकालय स्थापित करेंगे, उनके नाम सधन्यवाद अखंड-ज्योति के गायत्री चर्चा स्तंभ में प्रकाशित होते रहेंगे।
(प्रो रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
आज मनुष्यों के व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं उपस्थित हैं। अनेक गुत्थियाँ उलझी हुई हैं, हर एक उलझन ऐसी विषम है कि उसकी परेशानी से सब कोई चिन्ता ग्रस्त एवं दुखी हो रहे हैं। इन कठिनाइयों को हल करने के लिए नाना प्रकार के उपाय काम में लाये जा रहे हैं, पर सफलता की कोई आशा किरण दिखाई नहीं पड़ती।
समस्त कठिनाइयों, व्यथाओं और वेदनाओं का एक ही कारण है और उनके निवारण का उपाय भी एक ही है। काँटा चुभना दर्द का कारण है तो उसे निकाल देना ही दर्द से छुटकारा पाने का उपाय है। मनोवृत्तियों का संकुचित, स्वार्थ ग्रस्त, हो जाना ही उलझनों का कारण है। संसार में तब तक शान्ति स्थापित नहीं हो सकती, जब तक कि मनुष्य का अन्तःकरण परमार्थ की ओर न झुके, सात्विकता, धार्मिकता, उदारता को न अपनावें।
गायत्री सात्विकता की प्रतीक है। गायत्री भक्त होने का अर्थ है - जीवन को सतोगुणी, धार्मिक बनाने का लक्ष्य स्थिर करना। गायत्री उपासना का अर्थ है-उन आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन करना जो अन्तःकरण में सतोगुणी परमार्थ भावना का बीजारोपण करते हैं। गायत्री का आश्रय लेने का तात्पर्य बुद्धि को उस सात्विकता की गोद में डाल देना है जो मनुष्य के समस्त विचारों, गुणों, स्वभावों और आचरणों को दिव्य तत्वों से परिपूर्ण कर देती है। इस प्रक्रिया को अन्तस्तल में गहराई तक प्रतिष्ठित करने से मनुष्य उस स्थिति में पहुँच जाता है, जिससे कि उसके सामने कोई उलझन शेष नहीं रहती। आइए, अब जीवन की प्रमुख समस्याओं पर विचार करें और देखें कि गायत्री रूपी सद्बुद्धि को अपना लेने पर वे किस प्रकार सुलझ सकती हैं।
1. विश्व युद्ध की घटाएं आकाश में घुमड़ रही हैं। कह नहीं सकते कि किस क्षण विस्फोट हो जाय और परमाणु बम दुनिया को तहस-नहस कर दें, इन युद्धों का कारण साम्राज्यवादी लालसाएं ही हैं। एक देश दूसरे देश पर अपना प्रभुत्व जमाने, उसका शोषण करने की मनोवृत्ति को छोड़ दे और न्याय पर दृढ़ रहें तो इन युद्धों का कोई कारण नहीं रह जाता।
यदि आज विश्व राजनीति में गायत्री प्रतिपादित ‘न्याय’ का समावेश हो जाय, तो युद्ध की तैयारी पर जो शक्ति लगी हुई है वह रचनात्मक कार्यों में लग कर जीवन की सुविधाओं को बढ़ावें और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के आधार पर विश्व बन्धुत्व के प्रेम भाव का समुचित विकास हो सकता है। महायुद्ध की आशंका से आज समस्त संसार संत्रस्त है। इस त्रास को कूट-नैतिक माथा पच्ची से नहीं, गायत्री की निर्मल भावनाओं द्वारा सुलझाया जा सकता है।
2. विश्व युद्ध के बाद दूसरी समस्या खाद्य पदार्थों की कमी की है। कुछ देशों को छोड़ कर प्रायः सर्वत्र अन्न की कमी पड़ रही है। सिंचाई, रासायनिक खाद, वैज्ञानिक यंत्रों आदि की सुविधा बढ़ा कर अधिक अन्न उपजाने का प्रयत्न किया जा रहा है। इससे कुछ तात्कालिक सुधार भले ही हो जाय, पर स्थायी सुधार न होगा, क्योंकि जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसकी पूर्ति करने लायक शक्ति पृथ्वी में नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि योग्य सारी जमीन पर वैज्ञानिक कृषि कर लेने से भी सिर्फ इतनी उपज बढ़ सकती है, जो आगामी चालीस वर्षों तक लोगों का पेट भर सके। इसके बाद फिर भुखमरी फैलेगी।
इस प्रश्न का एक मात्र हल सन्तान निग्रह है। सभी बुद्धिमान एक स्वर से यह स्वीकार करते हैं कि संतान पैदा करना रोका जाय। इसके लिए गर्भपात, औषधियाँ, रबड़ की थैली आदि उपाय काम में लाये जा रहे हैं, पर इनका परिणाम और भी भयंकर होगा। अनैतिकता एवं व्यभिचार में वृद्धि होने से रहे बचे स्वास्थ और भी नष्ट हो जायेंगे। सन्तान निग्रह का सर्वश्रेष्ठ उपाय ब्रह्मचर्य है, जो तभी संभव है जब गायत्री भावना के अनुरूप नारी के प्रति विकार दृष्टि को त्याग कर पूज्य भाव स्थापित किया जाय। इससे खाद्य संकट की समस्या हल होगी, जनसंख्या की वृद्धि रुकेगी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधरेगा। गायत्री की साप्ताहिक उपवास साधना को यदि समर्थ लोग अपना लें तो आज की आवश्यकता पूरी हो जाय और विदेशों से एक दाना भी अन्न न मँगाना पड़े।
3. तीसरी व्यापक कठिनाई अनैतिकता की है। ठगी, विश्वासघात, वचनभंग, खुदगर्जी, बेमुरव्वती, अहंकार, परपीड़न, कर्तव्य त्याग की बुराइयाँ बेतरह बढ़ रही हैं। सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, धर्म प्रचारक, नेता, मजदूर आदि सभी वर्गों में इस प्रकार की दूषित मनोवृत्ति बढ़ रही है। अविश्वास, असंतोष और आशंका से हर एक का मन भारी हो रहा है।
इस स्थिति को कानून, पुलिस, फौज या सरकार नहीं सुधार सकती। जब अन्तरात्मा में ईश्वरीय वाणी जागृत होकर धर्म भावना, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, त्याग, प्रेम, और सेवा की भावना पैदा करेगी, तभी व्यापक अनैतिकता की दुखदायक स्थिति का अन्त होगा, यह परिवर्तन गायत्री की आत्मविज्ञान सम्मत प्रक्रिया द्वारा सुगमता पूर्वक संभव हो सकता है।
पाप, अनाचार, कुकर्म एवं दुर्बुद्धि के कारण ही मनुष्य नाना प्रकार के दुख भोगता है। जब जड़ कट जाती है, पाप वृत्ति में परिवर्तन हो जाता है तो नाना प्रकार के दैविक, दैहिक, भौतिक दुखों से मानव जाति को सहज ही छुटकारा मिल जाता है। कलह, संघर्ष, द्वेष के बीज स्वार्थ परता में है। जहाँ परमार्थिक दृष्टिकोण होगा, वहाँ प्रेम गंगा की शान्ति दायक निर्मल धारा प्रवाहित होगी।
4. भ्रान्ति, अविद्या, अन्ध परम्परा, अदूरदर्शिता, लोलुपता, संकुचित दृष्टि को “कुबुद्धि” कहते है। सुशिक्षित और चतुर समझे जाने वाले लोग भी इस कुबुद्धि में ग्रसित रहते हैं फलस्वरूप उन्हें अकारण अनेक प्रकार के त्रास प्राप्त होते हैं। आज के युग में सन्तान न होना एक ईश्वरीय वरदान है, पर लोग इसमें भी दुख मानते हैं। कुरीतियों का अन्धानुकरण करने के लिए धन न मिलने पर दुख होता है। परिजनों की मृत्यु पर ऐसा शोक करते हैं, मानो कोई अनहोनी घटना घटी हो। धन की कामना में ही व्यस्त रहना, जीवन के अन्य अंगों का विकास न करना, विलासिता, फिजूलखर्ची, व्यसन, फैशनपरस्ती आदि में डूबे रहना लोग अपनी बुद्धिमानी समझते हैं।
गायत्री रूपी सद्बुद्धि जिस मस्तिष्क में प्रवेश करती है, वह अन्धानुकरण करना छोड़ कर हर प्रश्न पर मौलिक विचार करता है। वह उन चिन्ता, शोक, दुख आदि से छुटकारा पा लेता है, जो कुबुद्धि की भ्रान्त धारणाओं के कारण मिलते हैं। संसार में आधे से अधिक दुख कुबुद्धि के कारण हैं, गायत्री की सद्बुद्धि जब छटा देती है, तो मनुष्य सरलता शान्ति, संतोष और प्रसन्नता से परिपूर्ण रहने लगता है।
5. बीमारी और कमजोरी आज घर-घर में घुसी हुई है। इसका कारण आहार विहार का असमय है। पशु-पक्षों प्रकृति को आदर्श मान कर चलते हैं और निरोग रहते हैं। प्रकृति के आदेशों का उल्लंघन करने से ही मनुष्य बीमार पड़ता है, कमजोर होता है और जल्दी मर जाता है।
गायत्री मंत्र की शिक्षा में आहार-विहार का संयम और प्राकृतिक जीवन की विशेष प्रेरणा है। सादगी और सात्विकता के ढांचे में ढली हुई जीवन चर्या निरोगता की प्रमाणिक गारंटी है।
चिड़चिड़ापन, आलस्य, लापरवाही, अनुदारता, अहंकार, कटुभाषण, निराशा, चिन्ता, आवेश, द्वेष आदि मानसिक बीमारियों से आन्तरिक स्वास्थ्य खोखला हो जाता है और व्यवहारिक जीवन में पग पग पर ठोकरें लगती हैं। गायत्री साधना मनुष्य के स्वभाव में सात्विक परिवर्तन करती है, सद्गुण बढ़ाती है, फलस्वरूप मानसिक अस्वस्थता नष्ट होकर मनोबल बढ़ता है और उसके द्वारा अनेकों लाभ प्राप्त होते रहते हैं।
6. आन्तरिक निर्बलता एक ऐसी व्यक्तिगत कमी है, जिसके कारण मनुष्य इच्छा करते हुए अपनी त्रुटियों के कारण कुछ कर नहीं पाता। मानव तत्व का पूर्ण विकास कुछ ऐसे तथ्यों पर निर्भर है, जो बहुधा अपने हाथ में नहीं होते। सूक्ष्म शरीर में उसकी जड़ें होने के कारण ऐसा मानना पड़ता है कि अमुक विशेषताओं से भाग्य ने या भगवान ने हमें वंचित कर रखा है। गायत्री साधना का प्रवेश सूक्ष्म शरीर के उस भाग तक हो जाता है, जहाँ भाग्य को फेरने वाली कुँजी छिपी रहती है।
गायत्री साधना के फलस्वरूप सूक्ष्म शरीर के कुछ गुप्त कोषों, चक्रों, गुच्छकों, ग्रंथियों का विकास होता है, जिसके कारण दिव्य शक्तियों का बढ़ना अपने आप शुरू हो जाता है। बुद्धि की तीव्रता, शरीर की स्वस्थता, सत्पुरुषों की मित्रता, व्यवसायिक सफलता, कीर्ति, प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुख-शान्ति, सुसन्तति, व्याधियों से निवृत्ति, शत्रुता का निवारण सरीखे अनेकों लाभ अनायास ही मिलने लगते हैं। कारण यह है कि आत्मबल बढ़ने से, दिव्य शक्तियाँ विकसित होने से, गुण, कर्म, स्वभाव में आशाजनक परिवर्तन हो जाने से, अनेक ज्ञात एवं अज्ञात बाधाएं हट जाती हैं और ऐसे सूक्ष्म तत्व अपने में बढ़ जाते हैं, जो दिन 2 उन्नति की ओर ले जाते हैं।
आज शासन पर जनता की कठिनाइयों का जितना उत्तरदायित्व है, उससे कहीं अधिक जनता की मनोवृत्तियों पर है। जनता प्रतिमा है, राज्य उसकी छाया है। जनता की प्रबल इच्छा के प्रतिकूल कोई राज्य जम नहीं सकता, इसलिए हमें जड़ को सोचना चाहिए। जन साधारण का चरित्र ऊँचा उठा कर, उनकी मनोदशा में श्रेष्ठ तत्वों को बढ़ाकर, सम्पूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय, अन्तर्देशीय, देशीय, सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। केवल कानून या सरकार में हेर फेर कर देने से स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हो सकता।
मानव जीवन की जितनी भी गुत्थियाँ उलझी पड़ी हैं, उन सब को गायत्री रूपी सद्बुद्धि, सात्विकता एवं सत्प्रवृत्ति को अपनाने से सुलझाया जा सकता है। इसी विश्वास के आधार पर अखण्ड ज्योति द्वारा गायत्री का महान् ज्ञान यज्ञ आरम्भ किया गया है। अन्य अनेक विचार वान व्यक्तियों की भाँति मेरा भी यही विश्वास है कि गायत्री के अध्यात्मिक तत्व-ज्ञान का प्रसार करके मानवता की महत्व पूर्ण सेवा की जा सकती है और मानव जीवन की सभी उलझनों को सुलझाया जा सकता है।
(संकलन कर्ता श्री दाऊ गंगा प्रसाद जी अग्रवाल, आरंग)
-चलो-चलो की पुकार तो सभी करते हैं, परन्तु पहुँचता कोई ही है-क्योंकि इस मार्ग में “कनक” और “कामिनी” दो बड़ी घाटियाँ हैं।
-तप करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, दान देने से से ऐश्वर्य मिलते हैं, ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है-और तीर्थ स्नान से पाप नष्ट होते हैं।
-ऊँची जाति का अहंकार कोई न करे-क्योंकि मालिक के दरबार में केवल भक्ति ही प्यारी है।
-चित्त में शुभ विचारों को भरो, शुभ विचारों के साथ खेल करो, उसके साथ जीवन बिताओ।
-अपनी बढ़ती चाहने वाले को कभी अभिमान न करना चाहिये।
-जगत के विषय प्रपंच में उलझे जीव जगत के केन्द्र में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर लगाते ही रह जाते हैं। मनुष्य केवल सदाचार के प्रभाव से दीर्घायु, धनवान और दोनों लोकों में यशस्वी होते हैं।
-घाव को बार-बार खोलकर देखने-कुरेदने से घाव अच्छा नहीं होता। मानव जीवन में भूल तो होती ही है परन्तु भूल हो जाने के पश्चात् फिर भूल करना पाप है।
-याद रखना चाहिए कि दूसरों का भला करने वालों का परिणाम में कभी बुरा हो ही नहीं सकता।
-आप चाहते हैं कि आपको बीमारी न सतावें तो स्वास्थ्य के नियमों पर दृढ़ता पूर्वक चलना प्रारम्भ कर दीजिए।
-आप चाहते हैं कि बहुत से मित्र हो, तो अपना स्वभाव आकर्षक बनाइये।
-आप चाहते हैं कि प्रतिष्ठा प्राप्त हो, तो प्रतिष्ठा के योग्य कार्य कीजिए।
-आप चाहते हो कि ऊँचा पद प्राप्त हो, तो उनके योग्य गुणों को एकत्रित कीजिए।
1. गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, गायत्री और यज्ञोपवीत का संबंध, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
2. गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्रनाम आदि का भाषा टीका समेत संकलन है।
3. गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) इसमें गायत्री द्वारा योग साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
4. गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री की कृपा से अनेक प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले तथा सुख सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के निजी अनुभव इस पुस्तक में हैं। इस मार्ग का अनुकरण करके आशाजनक लाभ उठाया जा सकता है।
5. गायत्री का मंत्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की शास्त्रीय विस्तृत व्याख्या है, राक्षस राज रावण, सायण, उब्वट, महीधर, व्यास, वशिष्ठ, शंख, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, आदि के द्वारा किये हुए गायत्री के अनेकों अर्थ दिये हैं। पहले यह पुस्तक ‘गायत्री रहस्य’ नाम से छपी थी।
6. गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियों तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव।
7. गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत आधार उपस्थित करके गायत्री का गुप्त विज्ञान तथा मर्म समझाया गया है।
8. गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं- सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।
9. वेद शास्त्रों का निचोड़-गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक एवं गायत्री चालीसा का संग्रह।
10. गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)- गायत्री के ॐ, भूः, भुर्वः, स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो शब्दों की शिक्षात्मक व्याख्या।
11. गायत्री के चौदहरत्न (द्वितीय भाग)- गायत्री के देवस्य, धीमहि, धियो, यो, नः, प्रचोदयात् शब्दों की व्याख्या।
12. अनादि गुरुमंत्र गायत्री - गायत्री साधक के लिये गुरु की आवश्यकता का प्रतिपादन।
13. विपत्ति निवारिणी गायत्री- सम्पूर्ण विपत्तियों और कष्टों को नष्ट करने वाला तत्वज्ञान।
14. स्त्रियों को गायत्री का अधिकार- इस पुस्तक में वेद शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों से यह सिद्ध किया है कि स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही गायत्री का अधिकार है।
15. सर्वशक्तिमान गायत्री- यह अत्यन्त सस्ती पुस्तक ब्रह्मदान के रूप में अधिकाधिक संख्या में वितरण करने योग्य है।
पता - “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा।
उनसे, उनकी याद मधुर है॥
अवगुँठन के वातायन से झाँक रही थी कोमल कलिका।
लाज भरी सिमटी, सिकुड़ी सी, नन्ही सी मधु भरी मृदुलिका॥
मूर्तिमान सौंदर्य मधुरिमा अर्ध सुप्त सी धवल नवलिका।
अनुपम रूप अनूप छटा लखि प्रेम विभोर हुआ मन अलि का॥
तरल स्नेह की सरल स्निग्धता से पूरित सम्मोहित उर है।
उनसे, उनकी याद मधुर है॥
(2)
दीपक की नव रूप शिक्षा पर चला पतिंगा घूम-घूम कर।
स्नेह-सलिल-उन्माद-ज्वार से भरा हृदय ले झूम-झूम कर॥
अमित साध थी, प्रेम-मिलन का सुख लूँगा मुँह चूम-चूम कर।
मन मयूर मस्ती में मानो नाचा छन छन छूम छूम कर॥
भोला प्राणी, जान न पाया, नियम नियति का महा निठुर है।
उनसे, उनकी याद मधुर है॥
(3)
झंकृति अंतर वाणी का उल्लास मुखर हो लगा निकलने।
मंडराया प्रेमी रस याचक तृषित उमंगें लगीं मचलने॥
बढ़ा कली की ओर, किंतु रुक गया, प्रेरणा दी यह मन ने।
नहीं स्पर्श से नष्ट करूंगा, यह सौंदर्य न दूँगा ढलने॥
अमर साधना का साधक बन गया, उगा नव प्रेमाँकुर है।
उनसे, उनकी याद मधुर है॥
*समाप्त*
(स्वर्गीय आ. फूल चन्द्र जी जैन, लखनऊ)