जीवन की परिभाषा


जीवन की परिभाषा (Kavita)

जो मरण को जन्म समझे मैं उसे जीवन कहूँगा।

वह नहीं बंधन कि जो अज्ञानता में बाँध ले मन।

और फिर सहसा कभी जो टूट सकता हो अकारण॥

मुक्ति छू पाये न जिसको मैं उसे बन्धन कहूँगा॥

जो मरण को जन्म समझे मैं उसे जीवन कहूँगा।

वह नहीं नूतन कि जो प्राचीनता की जड़ हिला दे।

भूत के इतिहास का आभास भी मन से मिटा दे॥

जो पुरातन को नया कर दे उसे नूतन कहूँगा॥

जो मरण को जन्म समझे मैं उसे जीवन कहूँगा।

वह नहीं पूजन कि जो देवत्व में दासत्व भर दे।

सृष्टि के अवतंस मानव की प्रगति को मन्द करदे॥

भक्त को भगवान कर दे मैं उसे पूजन कहूँगा॥

जो मरण को जन्म समझे मैं उसे जीवन कहूँगा।

(श्री बलबीर सिंह, रंग)


विपत्तियों के प्रयोजन का तत्त्व ज्ञान

भगवान को दया सिन्धु एवं करुणा सागर कहा जाता है। उनके वात्सल्य, दान और उपकार का कोई अन्त नहीं। साधारण प्राणियों का जब अपनी कृतियों पर, अपनी संतति पर इतना ममत्व होता है तो उस महान प्रभु का अपने बालकों पर कितना स्नेह होगा इसकी कल्पना करना भी सहज नहीं है। चित्रकार अपने चित्र को, माली अपने बाग को, मूर्तिकार अपनी मूर्ति को, किसान अपने खेत को, गडरियाँ अपनी भेड़ों को अच्छी, उन्नत, विकसित स्थिति में रखना चाहता है। उन्हें अच्छी स्थिति में देखकर प्रसन्न होता है, फिर परमात्मा अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को अच्छी स्थिति में न रखना चाहे, ऐसा नहीं हो सकता है। निश्चय ही प्रभु का यह प्रयत्न निरन्तर रहता है कि हम सब सुखी एवं सुविकसित हों। उनकी दया और करुणा निरन्तर हमारे ऊपर बरसती रहती है।

इतना होते हुए भी देखा जाता है कि कितने ही मनुष्य अत्यन्त दुखी हैं। उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट और अभाव सता रहे हैं। भय, पीड़ा, वियोग, आस, अन्याय एवं अभाव से संत्रस्त हुए कितने ही व्यक्ति बुरी तरह दुख सागर में गोते लगा रहे हैं किसी किसी पर ऐसी आकस्मिक विपत्ति आती है कि देखने वालों का हृदय दहल जाता है। ऐसे अवसरों पर ईश्वर की दयालुता पर सन्देह होने लगता है। कई बार तो कष्टों को दैवी कोप, ईश्वरीय निष्ठुरता मान लिया जाता है। परन्तु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है। प्रभु एक क्षण भर के लिए भी करुणा रहित नहीं हो सकते उनकी अनन्त दया का निर्झर एक क्षण के लिये भी नहीं रुक सकता। जिसे हम विपत्ति समझते हैं, वह भी एक प्रकार से उनकी दया ही होती है।

माता का अपने बच्चे पर असाधारण प्यार होता है, वह उसे सुखी बनाने के लिए अपनी समझ के अनुसार कोई बात उठा नहीं रखती तो भी उसके कई कार्य ऐसे हैं जो बालक को अप्रिय होते हैं। बालक किसी स्वादिष्ट भोजन को बहुत अधिक मात्रा में खाना चाहता है, माता जानती है कि अधिक खाने से यह बीमार पड़ जायेगा। इसलिए वह बच्चे के रूठने, रोने, हाथ पाँव पीटने की कुछ भी परवा न करके उतना ही खाने देती है जितना कि आवश्यक है। आग, हथियार, बारूद आदि से बच्चे को दूर रखा जाता है वह उनसे खेलना चाहे तो बलपूर्वक रोक दिया जाता है, घर के पशुओं के साथ खेलना चाहे तो भी उसे रोका जाता है ताकि उनके पैरों की चपेट में आकर कहीं कुचल न जाए। बच्चा खिड़की छज्जे में से बाहर की ओर झुक कर देखना चाहे तो उसकी स्वाधीनता को तुरन्त रोक दिया जाता है। कोई अनुचित काम करने पर चपत भी लगाये जाते हैं और डराने के लिए कोठरी में भी बन्द कर दिया जाता है। कई बार उसे मुर्गा बनाना, धूप में खड़ा होने, कान पकड़ कर उठने बैठने, भूखा रहने, आदि की सजा दी जाती है। बीमार होने पर माता उसे कड़वी दवा जबरदस्ती पिलाती है और उसके कष्ट की परवाह न करके आवश्यक होने पर इंजेक्शन या आपरेशन कराने के लिए भी छाती कड़ी करके तैयार हो जाती है।

बालक समझता है कि माता बड़ी निष्ठुर है, मुझे अमुक वस्तु नहीं देती, अमुक प्रकार सताती है और अमुक कष्ट पड़ने पर भी मेरी सहायता नहीं करती। अल्पज्ञता के कारण वह माता के प्रति अपने मन में दुर्भावना ला सकता है, उस पर निष्ठुरता का दोषारोपण कर सकता है, पर निश्चय ही उसकी मान्यता भ्रमपूर्ण होती है, यदि वह माता के हृदय को देख सकता तो उसे प्रतीत होता कि उसमें कितनी अपार करुणा भरी हुई है और इतना ऊँचा वात्सल्य न होता तो उसके हित याचना के लिए बच्चे के लिए कष्ट के समय होने वाले अपने दुख को, वह किस प्रकार छाती कड़ी करके सहन करती?

गायत्री को ‘सद्बुद्धि’ कहते हैं। माता जिसके मनः क्षेत्र में अपना पर्दा पण करती है उसे बाल बुद्धि से ऊँचा उठाकर दूरदर्शी और बुद्धिमान बना देती हैं। बालक और माता की खींचतान में किसका पक्ष उचित है, इसे कोई भी बुद्धिमत्ता प्राप्त हो जाती है तो वह अपने कष्टों को दैवी कोप या आपत्ति नहीं मानता वरन् माता द्वारा अपने सुधार का अत्यन्त सहृदयता एवं वात्सल्य पूर्ण महान प्रयत्न मानता है। वह तात्कालिक कठिनाइयों को प्रभु की अपार कृपा समझ कर हँसते हँसते सहन कर लेता हैं।

माता के दुलार के तरीके दो प्रकार के होते हैं। एक वे जिनसे बालक प्रसन्न होता है। जब उसे मिठाई, खिलौने, बढ़िया कपड़े आदि दिये जाते हैं और सैर कराने या तमाशे दिखाने ले जाया जाता है तो बालक प्रसन्न होता है और सोचता है कि मेरी माता कितनी अच्छी है। परन्तु जब माता काजल लगाने के लिए हाथ पकड़ कर जबरदस्ती करती है, जबरदस्ती नहलाती है, स्कूल जाने के लिए धमकी फटकार कर विवश करती है तो बच्चा झल्लाता है और माता को कोसता है। बाल बुद्धि नहीं जानती कि कभी मधुर कभी कठोर व्यवहार उनके साथ क्यों किया जाता है। वह माता के वात्सल्य पर शंका करता है जो ‘वस्तु स्थिति’ को जानते हैं उन्हें पता है कि माता बच्चे के प्रति केवल उपकार का व्यवहार ही कर सकती है। मधुर और कठोर दोनों ही व्यवहारों में वात्सल्य भरा होता है। प्रभु की कृपा भी दो प्रकार की होती है एक सुख दूसरी दुख। दोनों में ही हमारा हित और उसका स्नेह भरा होता है। अल्पज्ञता उस वस्तुस्थिति से हमें परिचित नहीं होने देती, पर गायत्री की जब कृपा होती है, सद्बुद्धि का हृदय में प्रकाश हो जाता है, तो ‘कष्ट’ नाम की दुख देने वाली कोई वस्तु शेष नहीं रहती। कठोर एवं प्रतिकूल परिस्थितियाँ एक भिन्न प्रकार का दैवी उपहार प्रतीत होता है और उनसे डरने या दुखी होने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

सुख से मनुष्य को कई लाभ हैं, चित्त प्रसन्न रहता है, इन्द्रियाँ तृप्त होती हैं, मन में उत्साह रहता है, उन्नति करने के साधन उपलब्ध होते हैं, इच्छाएँ पूरी करने में सुविधा रहती है, मित्र बढ़ जाते हैं साहस बढ़ता है, मान बड़ाई के अवसर मिलते हैं। इस प्रकार के और लाभ भी कम नहीं हैं। दुख से मनुष्य की खोई हुई प्रतिभा का विकास होता है, कष्ट से निवारण पाने के लिए मन के सब कल पुर्जे बड़ी तत्परता से क्रियाशील होते हैं, शरीर भी आलस्य छोड़कर कर्म निष्ठ हो जाता है। घोड़े को अच्छी चाल सिखाने वाले रईस उसके चूतड़ पर हंटर फटकारते हैं जिससे घोड़ा उत्तेजित होकर जल्दी जल्दी कदम बढ़ाता है, इसी समय लगाम के इशारे से उसे बढ़िया चाल चलाने का अभ्यास कराया जाता है। दुख, एक प्रकार का हंटर है जो हमारी शिथिल हुई शारीरिक और मानसिक शक्तियों को भड़का कर क्रियाशील बनाता है और साथ ही धर्माचरण की शिक्षा देकर चाल चलना सिखाता है।

फोड़ा चिर जाने से उसमें भरा हुआ मवाद निकल जाता है, दस्त हो जाने से पेट में संचित मल की शुद्धि हो जाती है, लंघन हो जाने से कोष्ठ गत दोषों का शमन हो जाता है। दुख भोगने से संचित पाप भार उतर जाता है और अन्तः चेतना बड़ी शुद्ध, निर्मल एवं हल्की हो जाती है। सोने को अग्नि में डालने से उसके साथ चिपटे हुए दूषित पदार्थ छूट जाते हैं और कान्तिमान तपा हुआ तथा शुद्ध स्वर्ण प्रत्यक्ष हो जाता है। मनुष्य की कितनी ही बुराइयाँ बुरी आदतें, दूषित भावनाएं और विचार धाराएं तब तक नहीं छूटती जब तक कि वह किसी विपत्ति में नहीं पड़ता। कुदरत का एक बड़ा तमाचा खाकर उस बेहोश को होश आता है और तब वह उस बेढंगी चाल को संभालता है। जो ज्ञान बड़े बड़े उपदेशों, प्रवचनों और कथाओं के सुनने से नहीं होता वह विपत्ति की एक दुलत्ती खा लेने पर बड़ी सरलता से हृदयंगम हो जाता है। इस प्रकार कई बार काल दंड का एक आघात, हजार ज्ञानी गुरुओं से अधिक शिक्षा दे जाता है।

सुख में जहाँ अनेक अच्छाइयाँ हैं वहाँ यह एक भारी बुराई भी है कि मनुष्य उन सुख साधनों को सत्कर्म बढ़ाने में लगाने का सदुपयोग भूल कर, ऐश उड़ाने, अहंकार में डूब जाने, अधिक जोड़ने, के कुचक्र में पड़ जाता है। उसके समय का अधिकाँश भाग तुच्छ स्वार्थों में लगा रहता है। परमार्थ की ओर से वह प्रायः पीठ ही फेर लेता है। इस बुरी स्थिति से अपने पुत्र को बचाने के लिए ईश्वर उसकी धन सम्पत्ति छीन लेते हैं। पढ़ने से जी चुराकर हर घड़ी खिलौने से उलझे रहने वाले बालक के खिलौने जैसे माता छीन कर छिपा देती है वैसे ही धन, सन्तान, स्त्री, वैभव आदि के खेल खिलौनों को छीनकर ईश्वर हमें यह प्रेरणा करता है कि इस झंझट की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करने को आपके लिए पड़ा हुआ है। ‘खेल छोड़ो और स्कूल जाओ’ की शिक्षा के लिए कई बार हानि का, आपत्ति का दैवी आयोजन होता है।

कितनी ही उच्च आत्माएँ तप रूपी कष्ट को अपना परम मित्र और विश्व कल्याण का मूल समझ कर उसे स्वेच्छापूर्वक छाती से लगाती हैं। इससे उनकी कीर्ति अजर अमर हो जाती है और उस तप की अग्नि युग-युगान्तरों तक जनता को प्रकाश देती रहती है। हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, शिव, मोरध्वज, दधीचि, प्रताप, शिवाजी, हकीकतराय, वन्दावैरागी, भागीरथ, गौतम बुद्ध, ईसामसीह आदि ने जो कष्ट सहे, वे उनने स्वेच्छापूर्वक शिरोधार्य किये थे। यदि वे अपनी गति-विधि में थोड़ा सा परिवर्तन कर लेते तो इन आपत्तियों से सहज ही बच सकते थे। पर उनने देखा की यह कष्ट या हानि, उस महान लाभ की तुलना में तुच्छ है इसलिए उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपने कष्टसाध्य मार्ग पर दृढ़ रहना उचित समझा। दूसरे लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि उन्होंने बड़े कष्ट सहे, पर यदि उनकी मनोभूमि का कोई ठीक प्रकार परिचय प्राप्त कर सकेगा तो उसे प्रतीत होगा कि उनकी अन्तरात्मा प्रसन्नतापूर्वक उस सब को सहन कर रही थी।

भगवान जिसे अपनी शरण में लेते हैं, जिसे बन्धन मुक्त करना चाहते हैं, उसके अनिवार्य कर्म भोगों को जल्दी जल्दी भुगतवा कर उसे ऐसा ऋण मुक्त बना देते हैं कि भविष्य के लिए कोई बन्धन शेष न रहें और भक्त को फिर जन्म मरण के चक्र में न पड़ना पड़े। एक ओर तो विपत्ति द्वारा प्रारब्ध भोग समाप्त हो जाते हैं दूसरी ओर उसकी आन्तरिक पवित्रता बहुत बढ़ती है। इन उभय पक्षीय लाभों से वह बड़ी तीव्र गति से परम लक्ष्य की ओर प्रगति करता है। तपस्वी लोग ऐसे कष्टों को प्रयत्नपूर्वक अपने ऊपर आमंत्रित करते हैं ताकि उनकी लक्ष्य यात्रा शीघ्र पूरी हो जाए।

साधारणतः अनेक सद्गुणों के विकास के लिए भगवान समय समय पर अनेक कटु अनुभव कराते हैं। बच्चे की मृत्यु होने पर उसके शोक में ‘वात्सल्य’ का हृदय गत परम सात्विक तत्व उमड़ता है जिसके कारण वह अन्य बालकों पर अधिक प्रेम करना सीखता है। देखा गया है कि जिसकी पहली पत्नी गुजर जाती है वह अपनी दूसरी पत्नी से अधिक सद्व्यवहार करता है क्योंकि एक पत्नी खोने के कारण जो भावोद्रेक मन में हुआ उसके कारण दाम्पत्ति कर्त्तव्यों का उसे ज्ञान हुआ है और अपने प्रथम दाम्पत्य की अपेक्षा दूसरे दाम्पत्ति जीवन में अधिक सफल सिद्ध होता है, एक वियोग उसे उस खोई हुई वस्तु के महत्व को भली प्रकार हृदयंगम करा देता है। धन खोकर मनुष्य यह सीखता है कि धन का सदुपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। रोगी हो जाने पर आदमी यह जान पाता है कि संयत आहार विहार का क्या महत्त्व है। गाली देने पर जिसका मुँह पीट जाता है, उसी को यह अकल आती है कि गाली देना बुरी बात है। जिसको अत्याचार सहना पड़ा है वही जानता है कि दूसरों पर यदि जुल्म करूं तो उन्हें कितना कष्ट होगा। जब हम आपत्ति ग्रस्त होकर दूसरों की सहायता के लिए हाथ पसारते हैं और दो नेत्रों से दूसरों की ओर ताकते हैं तब यह पता चलता है कि दूसरे दुखियों की सहायता करना हमारे लिए भी कितना आवश्यक कर्तव्य है।

जब गायत्री माता सद्बुद्धि के रूप में साधक के हृदय कमल पर अवस्थित होती हैं तो अज्ञान जन्य अधिकाँश दुख दरिद्र तो मनोभूमि में से अपने आप पलायन कर जाते हैं तथा अनेक प्रकार की सुख सम्पत्तियों का द्वार स्वयमेव खुल जाता है।


अकेले दुकेले मत भटको

(लेखक श्री स्वामी भोले बाबा जी महाराज)

सुनते हैं कि पूर्वकाल में एक महाभयानक वन था उसमें पाँच बहिनें और एक भाई, छः लुटेरे रहते थे। इनकी एक बुढ़िया माँ थी, सड़क पर बैठी रहती थी। वहाँ दस पन्द्रह मनुष्य मिलकर ही गुजर सकते थे, अकेले दुकेले आदमी की वहाँ गुजर न थी। जब कभी दैवयोग से कोई अकेला दुकेला आदमी उस सड़क पर होकर गुजरता था तो लुटेरों की बुढ़िया उसको देखकर ऊंचे स्वर से पुकारती थी-’अकेले दुकेले का ईश्वर ही संरक्षक है।’ बुढ़िया के ये शब्द सुनकर छुओ बहिन-भाई लुटेरे दौड़कर आ जाते थे और उस अकेले मनुष्य का सब धन लूट लेते थे, कपड़े तक छीन लेते थे, एक लंगोटी लगा कर उसे वहाँ से उसकी इच्छा पर छोड़ देते थे। एक बात अच्छी थी, जान नहीं लेते थे। बेचारा जंगल में दो चार दिन भूखा प्यासा घूमता रहता, जंगल के फल फूल खाकर जीता रहता, अन्त में जब कोई ग्राम मिल जाता, तो वहाँ पर मेहनत मजूरी करके अपना पेट भरता रहता था। कोई कोई जिसका भाग्य अच्छा होता, वह धन कमा कर कुछ साथी मिल जाते, तो उनके साथ अपने देश भी पहुँच जाता था, नहीं तो प्रायः बहुत से तो लुटेरों के पंजों से छूटकर किसी ग्राम में ही अपनी शेष आयु पूरी करते थे।

पूर्व काल में तो यह वन था ही, आजकल भी यह वन विद्यमान हैं, छहों लुटेरे और उनकी बुढ़िया भी प्रत्यक्ष देखने में आयी है, आती है और जायेगी। संसार ही यह वन है, शरीर का अभिमान करने वाली अस्मिता लुटेरों की बुढ़िया हैं, श्रोतादि पाँच ज्ञानेंद्रियां लुटेरी और छठा मन लुटेरा है। अकेले दुकेले मनुष्य को जहाँ देखते हैं वहाँ ही छओं आकर लूट लेते है। बुढ़िया उसको देखकर पुकारती है, ‘अकेले दुकेले का ईश्वर संरक्षक हैं, इसका अभिप्राय है कि यह अकेला है, विवेक वैराग्य आदि कोई उसके साथ नहीं है, उसको लूट लेना चाहिए। पाँचों इन्द्रियाँ और मन उसे विवेक आदि से रहित देखकर पाँचों विषयों में फँसाकर उसके छक्के छुड़ा देते हैं। मनुष्य अपने आत्म-धन को भूल जाता है अथवा यों कहना चाहिए कि लुटवा बैठता है, अन्त में जब सब पुण्य समाप्त हो जाता है, तब यहाँ से मरकर दूसरे लोक में चला जाता है। इस प्रकार छओं लुटेरों के वश हुआ जीव चौरासी योनियों के चक्र में घूमता रहता हैं, अपने घर अपने धाम अपने स्वरूप ब्रह्मतत्त्व में नहीं पहुँचता, निरन्तर जन्मता मरता और दुःख उठाता रहता है।

ऐसा देखकर वेदवेत्ता ऐसे नर-पशुओं पर दया करुणा करते हुए यहाँ अकेले दुकेले रहने को निषेध करते हैं, कहते हैं कि अकेले दुकेले मत रहो, मूढ़ बनकर रहना अकेले रहना है, विषय भोगों की इच्छा सहित रहना दुकेले रहना है, सीधी सी बात यह है कि पामर-प्रकृति शास्त्र संस्कार रहित पुरुष अकेला है और विषयी पुरुष दुकेला है। पामर पुरुष तो अपना और अपने कुटुम्बियों का बोझा ही ढोते हैं, कमाते हैं, परन्तु खाते पीते पहिनते नहीं, मात्र धन जमा करने में ही रहते हैं। विषयी पुरुष कमाते हैं, खाना पीना आदि भोग भी करते हैं। फिर भी जो कुछ ये कमाते हैं, इन्द्रियों के भोगों में खर्च करते हैं यानि पांचों इन्द्रियों को और छठे मन को ही तृप्त करते रहते हैं। इनको परलोक की खबर नहीं है। जब परलोक की खबर नहीं तो उनको अपने आत्म धन की खबर होगी ही कहाँ से? ये तो इन छओं लुटेरों के वश हुए अपने को ऐसे भूल जाते हैं, मानो ये स्वयं हैं ही नहीं, छओं इन्द्रियाँ ही इनका इष्टदेव है, इनका स्वरूप हैं, इनसे भिन्न ये अपने को जानते ही नहीं, दिन-रात उनके ही पूजन में तृप्त करने में, पालन पोषण करने में लगे रहते हैं। मरने तक इनका धर्म इनकी चाकरी करना ही है। ऐसों का जीवन मरण पशु के समान ही है।

वेदवेत्ता गला फाड़-2 कर कह रहे हैं कि अकेले दुकेले मत रहो, सुहृदों के-सन्मित्रों के साथ रहो तो तुमको ये छओं लुटेरे नहीं लूट सकेंगे। परन्तु भावी बलवान है, दुर्भाग्यवश वेदवेत्ताओं का कथन-हित वचन इनके कान तक नहीं पहुँचता, कान तक पहुँचता भी है, तो उनके गले में नहीं उतरता, इसलिए ये छओं लुटेरों के पंजे में से नहीं छूटते और जब तक छूटते नहीं, तब तक इनके छक्के भी छूटते रहेंगे। हरीच्छा! जैसे कुछ हो-हो, विद्वानों का इसमें कुछ वश नहीं चलता। जिनके ऊपर ईश्वर की कृपा है, जिनका भाग्य उदय होने वाला है, वे वेदवेत्ताओं के इस कथन को सुनकर चले जाते हैं, सुहृद-सन्मित्रों की खोज करते हैं और उनको पाकर निश्शंक हो जाते हैं, लुटेरों से छूट जाते हैं, अपने धन को पाकर सर्वदा के लिए धनी, सुखी, स्वतंत्र और सम्राट हो जाते हैं।

पहला सन्मित्र विचार है। विचार बिना मनुष्य मरा हुआ सा बेहोश सा होता है, विचार के प्राप्त होते ही मनुष्य जीता हुआ सा हो जाता है, समझने लगता है कि अविचार से मैं अपने को साढ़े तीन हाथ का मान रहा हूँ, नहीं तो मैं देह से भिन्न हूँ, आशा ने मुझे दीन दुःखी कर रखा है, यदि मैं आशा छोड़ कर निराश हो जाऊँ तो धनियों का भी धनी और ऐश्वर्य वालों का भी परम ऐश्वर्य वाला हूँ। आशा के कारण ही मुझे दर दर भटकना पड़ता है, नहीं तो मैं स्वतन्त्र ही हूँ।

ऐसा विचार कर मनुष्य आशा त्याग कर देता है तो उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, शुद्ध अंतःकरण में सत्य असत्य का विवेक हो जाता है। सत्या सत्य का विवेक होने से सत्य में मनुष्य राग करने लगता है और असत्य से उसको वैराग्य हो जाता है।

प्रिय पाठको! विवेक वैराग्य आदि सन्मित्रों के साथ ही संसार रूपी वन में विचारो, अकेले दुकेले पामर विषयी पुरुषों के समान मत भटको।


मानव जीवन की अशान्ति का हेतु

(श्री रामनाथ जी, ‘सुमन’)

कहा जाता है और मैं मानता हूँ, कि आधुनिक सभ्यता ने, अनेक नवीन सुविधायें हमारे जीवन में पैदा कर दी हैं। यातायात के द्रुत साधनों ने संसार को बहुत छोटा कर दिया है। यात्रा बहुत सुखद हो गई है। रेल में आप घर का सुख प्राप्त कर सकते हैं, जहाजों पर टेनिस खेल सकते हैं और सिनेमा देख सकते हैं, घर बैठे हुए दुनिया के समाचार सुन सकते हैं। प्रत्येक कार्य के लिए मशीन बन गई है। प्रेम की परीक्षा मशीन से होने लगी है। टेलीविजन ने मेघदूत को व्यर्थ बना दिया है। शहरों में बिजली की मोटरें दौड़ने लगी हैं और अत्यन्त सस्ती मनोविनोद, सिनेमा एवं टाकी के रूप में हमारे सामने है। विज्ञान ने शरीर-तत्वों की पूरी खोज कर ली है, और कल चिकित्सा-शास्त्र जिन बातों को असम्भव कहता था, वे संभव हो गई हैं। बुढ़ापे में यौवन की कलम लगने लगी हैं और बड़े गर्व के साथ विज्ञान ने दावा किया है कि वह दिन दूर नहीं जब मनुष्य मृत्यु पर विजय पा लेगा और काम-चलाऊ आदमी बनाये जा सकेंगे। मामूली काम करने वाले मशीन के आदमी तो बन भी गये हैं।

पर जहाँ नित्य नये-नये आविष्कार हो रहे हैं और विज्ञान ने प्रकृति पर विजय पाने की घोषणा की है, और जहाँ आराम की सुविधायें हैं, वहाँ यह मनुष्य इतना अशान्त क्यों है? ऐसा असंतुष्ट क्यों है? इतना प्यासा क्यों है? उसके अन्दर शान्ति क्यों नहीं? तृप्ति क्यों नहीं? वह इतना खोया-2 कैसे है? और उसका सन्तोष एवं सुख बढ़ता क्यों नहीं है? आधुनिक सभ्यता एवं विद्वान के सामने यह सवाल एक चैलेंज है।

पाश्चात्य सभ्यता ने जीवन को उन्माद से भर दिया है। लोग एक नशे में, जल-धारा के तिनके की भाँति, बहे चले जा रहे हैं- अपनी शक्ति से नहीं, एक प्रबल धारा के वेग से। मनुष्य मशीन बन गया है। उसने अपना आत्म विश्वास, अपना ईश्वरत्व खो दिया है और असहाय-सा, पर अपनी शक्ति के दंभ का प्रदर्शन करते हुए, न जाने कहाँ जा रहा है। पाश्चात्य सभ्यता ने सबसे बड़ा अकल्याण- जिसे पाप कहने में अत्युक्ति न होगी, जो किया है, वह यह कि उसने मनुष्य को बिल्कुल अचेत कर दिया है और उसकी दैवी सम्भावनाओं को हर लिया है। आज किसी से ब्रह्मचर्य की बातें करो, वह अविश्वास की हँसी हँस देगा-’यह हम जैसे साधारण मनुष्यों का काम नहीं।’ जीवनहीन मूर्खता से भरे हुए ये शब्द क्यों? मनुष्य, जो जगत् का श्रेष्ठ उपादान है, जो भगवान की श्रेष्ठ विभूति है, उसके मुख से ऐसे दीनता, दुर्बलता और असहायता के शब्द क्यों?

बात यह है कि जीवन की बाह्य तड़क-भड़क में हम भूल गये। आधुनिक सभ्यता के विष ने, हमारे अन्दर जो दिव्य ईश्वरीय विरासत थी, उसे गदा मार कर चकनाचूर कर दिया है। उसने हमें रेलगाड़ियाँ दी, हवाई जहाज दिये। उसने घर में बैठे हुए पृथ्वी के उस छोर तक हमारी आवाज मिनटों-क्या सेकेण्डों में पहुँचाई। उसने सुबह कलकत्ता तो शाम को हमें बगदाद में ले जाकर बैठाया। यह मायाविनी बिजली में चमकती है, वायुयानों पर हवा खाती है, मोटरों में दौड़ती है, तोपों में दहाड़ती और अट्टहास करती है। उसकी मुस्कराहट पर भूल बैठे, उसके आलिंगन ने हमारा विवेक हर लिया। हम उसकी सुविधाओं का गान गाते हैं, पर हम यह भूल गये कि हमारा जो कुछ परमतत्व था, हममें जो जीवित मनुष्य था, वह निष्प्राण हो गया है। उसने हमें विश्व के संग्रहालय में संसार की प्रदर्शिनी में मोहक रूप में सजे हुए मुर्दे की भाँति रख छोड़ा है। सुविधायें जरूर बढ़ी, पर सुख न बढ़ा, शान्ति न बढ़ी। उलटे हमारी चिन्तायें ज्यादा हो गई हैं, हमारे दुःख बढ़ गये हैं मानसिक, नैतिक और शारीरिक शक्तियाँ बरफ की भाँति गल गई हैं। मानवता दुःख, दंभ, ईर्ष्या, द्वेष के अन्धकार में भटक रही है।

बात यह है कि हमने सुविधाएँ देखी, पर प्रकाश को ग्रहण न किया। दुनिया के बाजार जीवन की अहंकार सामग्री से भरे हुए हैं, पर हमको जीवन को पुष्ट करने वाला खाद्य नहीं मिल रहा है। इस चमक-दमक में उस चीज को हम भूल गये हैं जिससे मनुष्यता महत्त्वशाली है और जिसका प्रकाश अन्धा नहीं करता है। आज हमें अपने अन्दर की बिल्कुल सुधि नहीं है। हमारा जीवन ऐसे बन्धनों से बँध गया हैं जो अन्तः करण की आवाज को दबाते हैं और आत्मा को मूर्छित करते हैं। जीवन के प्रति सारा दृष्टिकोण अत्यन्त स्थूल स्वार्थ-भावनाओं से भर गया है। फलतः मनुष्य श्रेय को भूल कर प्रेय के पीछे दौड़ रहा है। इस लिए यह दुःख है और इसलिए यह अतृप्ति है।

जगत् में ऐसा कौन है जो सुख नहीं चाहता? पर ऐसे कितने हैं जिनको सुख मिलता है? ऐसी बात नहीं कि सुख कोई अत्यन्त अलभ्य वस्तु है। जो आनन्द मनुष्य के लिए अत्यन्त स्वाभाविक है और जिसकी खोज में, जिसकी साधना में, जिसकी प्राप्ति के लिए सृष्टि के आरम्भ से मनुष्य लगा हुआ है, जिसके लिए उसने समाज की रचना की और सभ्यता का विकास किया और खान में, अज्ञान में प्रतिक्षण जिस आनन्द की खोज और यात्रा जारी है, उसे हम पाते क्यों नहीं हैं? उसका आज इतना अभाव क्यों हो रहा है? गृह-गृह में कलह क्यों है? स्त्रियाँ पुरुषों को दोष देती हैं, और पुरुष स्त्रियों को ताना देते हैं। युवक बूढ़ों को कोसते हैं, और बूढ़ों का कहना है कि यह सारी आफत युवकों की लाई हुई है। पुत्र का कहना है कि जमाना पिता की आज्ञा के विरुद्ध जाने को प्रेरित करता है। पिता का चार्ज है कि पुत्रों में गुरुजनों के प्रति अवज्ञा की भावना फैलती जा रही है। पति स्त्री से और स्त्री पति से असन्तुष्ट है, और स्नेह के स्थान पर अधिकार उसका लक्ष्य बन गया है। बहू सास की सेवा में अपनी गुलामी और दासता का अनुभव करती है, और सास की शिकायत है कि आजकल की बहुएँ तो तस्वीरों की तरह केवल दर्शन की चीज रह गई हैं। मतलब यह कि समाज शरीर का प्रत्येक अंग बेचैन एवं अतृप्त है। सर्वत्र अशान्ति है, सर्वत्र असन्तोष है, सर्वत्र पीड़ा है।

सुख को पहचानने में जो भूल आज हो रही है, उससे सुख चाहने एवं सुख प्राप्त करने की प्रबल इच्छा होने पर भी, हम अतृप्त हैं। हमने सुख को वहाँ समझ रखा है, जहाँ वह नहीं है। हम भूल गये हैं कि आनन्द का स्त्रोत प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर में ही है। भ्रमित कस्तूरी-मृग की नाईं हम सुख की सुगन्ध में पागल, उसकी खोज में फिर रहे है, जब कि आनन्द हमारे अन्दर ही पड़ा है। हमने इसका सुख ढ़क रखा है। यदि उसके मुख पर से ढक्कन हटा दें तो स्त्रोत निर्बन्ध होकर बह निकले और आनन्द का फव्वारा हमारे जीवन को ओत प्रोत कर दे।

अवश्य ही दुनिया में धन का भी महत्व है, और चीजों का भी महत्व है, जो वैभव के सामूहिक नाम से पुकारी जाती है। मैं यह नहीं कहता कि तुम धन की अपेक्षा करो और न मैं यह कहता हूँ कि तुम दुनिया और उसकी तड़क-भड़क की ओर से आंखें बन्द कर लो। मैं कहता केवल यह हूँ कि ये सब चीजें अपनी-अपनी जगह पर ठीक हैं और इनका अपना उपयोग है। मैं कहता यह हूँ कि इन चीजों को उतना ही महत्त्व देना चाहिए, जितने की वे अधिकारिणी हैं। मैं यह नहीं कहता कि धन उपेक्षणीय है, और इसका कोई उपयोग नहीं। मैं कहता यह हूँ कि धन ही सुख नहीं हैं। केवल धन से सुखी होने की कल्पना करना मिथ्या है। आनन्द वह चीज नहीं, जो चाँदी के टुकड़ों से खरीदा जा सके। आनन्द तो दिल का बीज हैं, वह बाजारों में नहीं बिकता, दिलों में बसता है। वह आत्मानुभव की चीज है, वह अपने में अपनी परिपूर्णता देख लेने का परिणाम है।

कहा यह जाएगा की क्या दुनिया पागल है, जो धन के पीछे दौड़ रही है, जो अधिकारों के लिए बेचैन है। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हाँ, दुनिया यदि धन के पीछे लग कर सुख प्राप्त करना चाहती है, तो पागल है। हम देखते हैं और रोज देखते हैं कि संसार में कितने ही साधारण स्थिति के आदमी बड़े सुखी हैं। उनके जीवन में अशान्ति नहीं, अतृप्ति नहीं, वितृष्णा नहीं, सब ठीक-ठीक चल रहा है। मामूली गृहस्थी हैं, पैसा अधिक नहीं, पर उनको धन का अभाव इतना नहीं खलता कि हमारे जीवन को विषम कर दे। घर में हंसी का दरिया बहता रहता है और दिलों में प्रेम और तृप्ति भरी हुई है। यहाँ पत्नी यह अनुभव नहीं करती कि वह दासी है और काम करते-करते मरी जा रही है। यहाँ जीवन का मार्ग प्रेम के फूलों से मृदुल है और उससे सर्वत्र आनन्द की सुगन्ध है।

इसके विरुद्ध समाज में ऐसे आदमियों की कमी नहीं है, जिसके पास वैभव का संपूर्ण विलास थिरक रहा है, सब प्रकार की सुविधायें उनके लिए एकत्र हैं। मोटरें हैं, बंगले हैं, नौकर हैं, यश है, भरा-पूरा कुटुम्ब है, अच्छा व्यापार या जमींदारी है, धन की कोई चिन्ता नहीं। कल क्या होगा, इस चिन्ता के तीव्र दंश का उनको कभी अनुभव नहीं हुआ। फिर भी जीवन अतृप्त और अशान्त है, वैभव का बोझ ऐसा लद गया है कि जीवन दिन-दिन अचेतन होता जाता है। जीवन का सौख्य धन एवं वैभव की वितृष्णाओं में, और उससे पैदा होने वाले मानो विष प्रलोभनों में डूब गया है। सब कुछ है, पर न जाने क्या नहीं है, जिससे सब कुछ फीका, सब कुछ बेस्वाद हो गया है। रात दिन एक नशे में भूली हुई आत्मा जीवन यात्रा पूरी कर रही है। सुख नहीं, शान्ति नहीं, तृप्ति नहीं, आनन्द नहीं।

यह स्पष्ट है कि मनुष्य का आनन्द उसकी अपनी चीज है और उसके अन्दर ही समाई हुई है, इसे खोजने कहीं दूर नहीं जाना है और यह धन पर, अथवा सुख के नाम पर बाजार में बिकने वाली सुविधाओं पर निर्भर नहीं करता। यह आकाँक्षाओं को निर्बन्ध छोड़ देने से न कभी मिला है, न मिलेगा। क्योंकि जहाँ शान्ति और तृप्ति नहीं है, वहाँ और आनन्द भी नहीं है।

इसलिए यदि तुम सुख चाहते हो तो पहली बात यह है कि जहाँ वह है वहाँ उसको देखने एवं पाने की ओर ध्यान दो। यह जो सुख की छाया है और जिसको तुम रुपयों से खरीदना चाहते हो उसे भूल जाओ। आनन्द का सौदा रुपयों से नहीं हुआ करता, यहाँ तो दिल का सिक्का चलता है। दिल निर्मल, विशुद्ध, खरा होगा तो आनन्द की धारा तुम्हारे जीवन को ओत प्रोत कर देगी।


आनन्द का स्रोत-सेवा धर्म

सेवा धर्म की चर्चा जब कानों पर पड़ती है तब स्वभावतः प्रश्न हो उठता है कि आखिर सेवा धर्म को किस उद्देश्य से अपनाया जाये और उससे अपनाने वाले को क्या लाभ मिलेगा। लेकिन लाभ हानि की चर्चा करने वाले सेवा धर्म के रास्ते पर चल ही नहीं सकते क्योंकि सेवा करने वाले के पास तोल नाप की न तराजू होती है और न तोल नाप करने की भावना। वह तो स्वभाव सिद्ध होती है। माँ अपने बच्चे की सेवा में तल्लीन रहती है, मल मूत्र उठाती है। दूध पिलाती है और देख भाल करती है। उसके बीमार हो जाने पर रात दिन सेवा-सूश्रुषा में एक कर डालती है। क्या किसी लाभ हानि के लिए? क्या किसी बदले की भावना से? कोई भी माँ अपने कार्य में इनमें से किसी की कल्पना तक नहीं करती। लेकिन उसके स्वभाव में यह वृत्ति आ गई है इसलिए वह ऐसा करती है। यह भी कहा जा सकता इसलिए ऐसा करती है और आखिरी बात जो कही जा सकती है, वह यह है कि उसे ऐसा करने में आनन्द आता है इसलिए ऐसा करती है।

लेकिन अपने ही शिशु के साथ क्यों? क्या कोई स्त्री जिसका विवाह नहीं हुआ है या विवाह हो जाने पर भी जिसने गर्भ धारण नहीं किया है, इस प्रकार के सेवा धर्म को अपना सकती है? क्या कोई बहू अपनी ननद और जिठानी के बच्चे के प्रति इतनी तन्मयता एवं सेवा भावना, और लगन दिखला सकती है। आमतौर से ऐसा देखा नहीं जाता इसलिए ‘नही’ में ही इसका उत्तर मिलता है। तब क्या कारण है कि माँ अपने शिशु के साथ इतनी तन्मय रहती है।

इसका कारण है, और वही कारण जब उत्पन्न होता है तभी सेवा धर्म पालन होता है अन्यथा जो कुछ होता है उसमें दिखावा होता है और उससे स्वार्थ सिद्धि की मंशा पूरी की जाती है। माँ की सेवा में जो कारण होता हैं वह हैं-”स्व” का विस्तार। अपनी आत्मा को जब वह अपने शिशु की आत्मा में देखती है, जब वह शिशु को अपने से भिन्न नहीं समझती तब वह जिस निष्ठा से अपनी बात सोचती, उसी निष्ठा से वह शिशु का चिन्तन करती है कभी कभी तो यह निष्ठा इतनी अधिक हो जाती है कि शिशु के चिन्तन में वह अपने आप को भी भूल जाती है।

अपने आपको भूले बिना, अपने ‘स्व’ की संकुचित सीमा को तोड़े बिना, जिस प्रकार माँ अपने शिशु के लिये कुछ नहीं कर सकती उसी प्रकार कोई भी व्यक्ति सेवा धर्म अपनाने के लिए आत्म त्याग किये बिना कदम नहीं बढ़ा सकता। आत्म जो सर्वव्यापी है और सब में समाया हुआ है जिनको इनका दर्शन नहीं होता वे सेवा धर्म का पालन कर ही नहीं सकते। अपनी आत्मा जहाँ-जहाँ, जिस-जिस को दिखाई देती है सेवा का क्षेत्र उसका वहाँ वहाँ तक विस्तृत होता है। उपनिषदों में इसी तत्त्व का वर्णन करते हुए कहा है कि-”पति, स्त्री, पुत्र, मित्र, बान्धव ये सब पति, स्त्री, पुत्र, मित्र और बान्धवों के कारण प्रिय नहीं होते बल्कि इनका प्रियत्व इस पर निर्भर करता हैं कि उनमें प्रेम करने वाले की आत्मा दिखाई देती है या नहीं। क्योंकि “आत्मनस्तु का काम सर्व प्रिय भवति”-आत्मा के लिए ही सब कुछ प्रिय होता है।

जिन लोगों की आत्मा का विस्तार होता है, जिनका “स्व” अपने प्रसार में संलग्न रहता है वे उतने ही महान् एवं शक्ति सम्पन्न होते हैं। अपनी क्षुद्रता को भूलना, अपनी लघुता को भूलना, ही महानता का चिन्ह है। जैसे-जैसे मनुष्य अपना स्वार्थ छोड़ता जाता है, अपनी आत्मा का विस्तार करता जाता हैं वैसे-वैसे ही उसके आनन्द की सीमा बढ़ती जाती है। इसीलिये सेवा धर्म तो आनन्द मार्ग की कुँजी है। श्रुतियों में इसीलिए कहा है कि-’भूमैव सूखम् नाल्पे सुख मस्ति’-भूभा में- विस्तार में सुख है, अल्पता स्वार्थ परायणता में सुख नहीं है। इसलिए आदेश दिया गया है- आत्मा वाऽरे दृष्टव्यः, श्रोतव्यः मन्तव्यः निध्यासितव्यः-’आत्मा का दर्शन, श्रवण, मनन एवं चिन्तन करो।’

महात्मा शैखसादी की सूक्तियाँ

(संकलन कर्त्ता-डा. गोपाल प्रसाद ‘वंशी,’ बेतिया)

(1) अगर कोई निर्बल शत्रु तुम्हारे साथ मित्रता करे और तुम्हारी आज्ञानुसार चले तो तुमको समझना चाहिए कि वह अपना बल बढ़ाना चाहता है। क्योंकि कहा है- मित्रों की सच्चाई पर भी विश्वास न करना चाहिए, तब शत्रुओं की लल्लो-चप्पों से क्यों भली उम्मीद की जा सकती है? जो निर्बल शत्रु को तुच्छ समझता है, वह उसके माफिक है जो आग की छोटी सी चिनगारी की परवाह नहीं करता। अगर तुम में शक्ति है तो आग को आज ही बुझा दो, क्योंकि जब वह प्रचण्ड रूप धारण करेगी, तब संसार को जला देगी। जब कि तुझमें शत्रु को बाण से छेदने की शक्ति हो, तब तू उसको कमान खींचने का मौका मत दे।

(2) दो दुश्मनों के दरमियान अगर कुछ बात कहो, तो इस भाँति कहो कि यदि आपस में दोस्त भी हो जावे तो भी तुम्हें लज्जित न होना पड़े। दो मनुष्यों की दुश्मनी आग के समान है और जो बातें बनाता है, वह आग में ईंधन डालता है। जब दो दुश्मन आपस में सुलह कर लेते हैं तब वे दोनों ही चुगलखोर को बुरी नजर से देखते है। जो शक्स दो आदमियों के बीच में आग लगाता है, वह खुद अपने तई उसमें जलाता है। अपने मित्रों से इस तरह चुपचाप बात करो कि तुम्हारे खून के प्यासे शत्रु तुम्हारी बात न सुन ले। अगर दीवार के सामने भी कुछ बात करो, तो होश रखो कि दीवार के पीछे कान न लग रहे हों।

(3) जो मनुष्य अपने मित्र के शत्रुओं से मित्रता करता है वह अपने मित्र को नुकसान पहुँचाना चाहता है। ऐ, बुद्धिमान मनुष्य! तू उस मित्र से हाथ धो ले, जो शत्रुओं से मेल-जोल रखता है।

(4) जब तुम्हें किसी काम के आरम्भ करने के समय ऐसा सन्देह उठ खड़ा हो कि इस काम को किस ढंग से जारी करें, तब तुम्हें वह ढंग अख़्तियार करना चाहिए, जिससे तुम्हें नुकसान न पहुँचे। कोमल स्वभाव के मनुष्य से कड़ाई से बातें न करो और वह शक्स जो तुम से मेल रखना चाहता है, उससे लड़ाई झगड़ा मत करो।

(4) जब तक रुपया खर्च करने से काम निकल सके, तब तक जान को खतरे में न डालना चाहिए। जब हाथ से किसी तरह काम न निकले तब तलवार खींचना भी मुनासिब है।

(5) दुष्ट मनुष्य सदा शत्रु के हाथ में गिरफ्तार है। वह चाहे कहीं जावे, किन्तु अपनी सजा के चंगुलों से रिहाई नहीं पा सकता। अगर दुष्ट आदमी आफत से बचने के लिए आसमान पर भी चला जावे, तो भी अपनी दुष्टता के कारण आफत से नहीं बच सकता।

(6) जो शख्स खुद-पसन्द घमण्डी आदमी को नसीहत देता है, वह खुद नसीहत का मुहताज है।


प्राणशक्ति का विकास कैसे हो?

प्राण का अर्थ है-शक्ति सामर्थ्य बल, जीवन एवं क्रियाशक्ति। कई व्यक्ति शरीर से बड़े स्थूल, मोटे-ताजे और लम्बे तगड़े दिखते हैं पर उनके भीतर जीवन शक्ति बड़ी न्यून होती है। एक दो कोस चलने में उनका दम फूल जाता है, पिंडलियाँ भड़कने लगती हैं, जरा सी सर्दी गर्मी से बीमार पड़ जाते हैं। दो दिन बुखार आ जाय तो महीनों तक कमजोरी नहीं जाती। जरा सा भय होने पर आशंका और घबराहट से कलेजा काँपने लगता है। किसी से लड़ाई झगड़ा हो जाय या कोई विशेष घटना घटित हो जाए तो उसका विचार बुरी तरह मन में घर कर लेता है। चित्त को उस बात पर से हटाया जाय तो हटता नहीं, तुच्छ सी बात मन को घेर बैठती है, मस्तिष्क खाली नहीं होता कि दूसरी बात सोची जा सके। रात को नींद आना कठिन हो जाता है। किसी की छोटी सी धमकी या भावी अनिष्ट की मामूली सी सूचना, मानसिक संतुलन बिगाड़ देती है। ऐसे लोगों के लिये कहा जाता है कि वे निष्प्राण हैं। जीवित मृतक हैं। अन्नमय कोष की दृष्टि से वे सुडौल हैं परन्तु प्राणमय कोष की निर्बलता के कारण वे एक प्रकार से निर्जीवों में ही गिने जाते हैं।

कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जो शरीर की दृष्टि से बड़े दुबले पतले, हलके, कम रक्त माँस के होते है, हड्डियों का ढाँचा दिखते हैं और गाल पिचके होते हैं फिर भी उनमें जीवनी शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। ताँतिया डाकू इतना पतला था कि उसके शरीर की तुलना रुई धुनने की ताँव से करके ‘ताँतियाँ’ नाम रखा गया था। फिर भी वह जेल की ऊंची दीवार पर छलांग मार कर चढ़ गया था, उसकी स्फूर्ति, जीवनी शक्ति, छरहरापन और ताकत देखकर आश्चर्य करना पड़ता था। महात्मा गाँधी की शारीरिक दुर्बलता प्रसिद्ध है, वे हलके, नाटे, दुबले और कमजोर थे। थोड़ा सा बकरी का दूध और जरा से फल खाते थे फिर भी उनकी प्राणशक्ति असीम थी। अंग्रेजी सरकार उनकी शक्ति को देखकर थर्राया करती थी, विदेशी राजनीतिज्ञ उन्हें 96 पौण्ड का बम गोला बताया करते थे। सदियों से गुलामी में सड़ने वाली भारतीय जनता में उन्होंने प्राण फूँक दिया और युग को पलट डाला। और भी ऐसे कितने ही मनुष्य हैं जो शरीर की दृष्टि से तुच्छ हैं पर उनका साहस, ओज, तेज, पराक्रम, पुरुषार्थ, महान है। ऐसे लोग जन समूह के मुकुट मणि बनते हैं, अपने पराक्रम से संसार का पथ प्रदर्शन करते हैं। अपने ऊपर उन्हें अटूट विश्वास होता है, अपने भाग्य का वे आप निर्माण करते हैं, आत्म सम्मान, आत्म गौरव, आत्म कल्याण का वे स्वयं आयोजन करते हैं।

प्राणशक्ति का चमत्कार मनुष्य के शरीर पर भी चमकता है। किसी का मुर्दा सा, मुरझाया हुआ, डरता सा, सकपकाया हुआ, दीनतापूर्ण या उजड़ा चेहरा देख कर यह आसानी से जाना जा सकता है कि यह भीतर से खोखला है। जिसके नेत्रों में भीतर से एक बिजली सी चमक रही है, जिसके होठों पर प्रसन्नता के स्फुल्लिंग उड़ रहे हैं, जिसके चेहरे पर गंभीरता और दृढ़ता जमी हुई है, उसकी ऊँची गर्दन और स्थिर भवें विश्वासमीयता, निर्भयता और आत्मसम्मान प्रकट कर रही है, जिसकी वाणी में प्रभाव और प्रामाणिकता है उसे हम ओजस्वी, तेजस्वी या प्राणवान कह सकते हैं।

यह प्राण ही जीवन है। प्राण के निर्बल होते ही जीवन लड़खड़ा जाता है। प्राण निकलते ही देह ऐसी हो जाती है कि उसे छूना तक अशुभ समझा जाता है और उसे जल्द से जल्द जलाकर या गाढ़ कर नष्ट कर डालने का प्रबन्ध किया जाता है क्योंकि यदि कुछ समय वह यों ही रखी रहे तो सड़कर भारी दुर्गन्ध एवं रोग विस्तार का कारण बन जाती है। प्राणवान भीष्म जी ने उत्तरायण सूर्य में देह त्याग करने की इच्छा से अपने प्राणों को शरशैय्या पर कई महीने प्राण को रोक रखा था।

जैसे उचित आहार, उचित श्रम, उचित विश्राम, उचित स्वच्छता द्वारा शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है वैसे ही (1) निर्भयता, (2) प्रसन्नता, (3) ईमानदारी और (4) आत्म निर्भरता, द्वारा प्राण शक्ति को सुस्थिर रखा जा सकता है।

निर्भयता का अर्थ है कि किसी से भी न डरें। समुचित साहस, और शौर्य हममें होना चाहिए। जब बेचारी मृत्यु तक हमें नष्ट नहीं करती तो इन तुच्छ से क्षण-क्षण में धूप छाँह की तरह आने जाने वाले सुख दुखों की क्या बिसात है जो हमें डरावें। जो परमात्मा से, और उसके दंड से डरता है उसे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं। विपत्ति, कागज के हाथी के समान है। जो दूर से बहुत डराती है पर जब वह पास आ जाती है तो तुच्छ मालूम पड़ती है। कोई न कोई रास्ता ऐसा निकल आता है कि वह मुसीबत बात की बात में कट जाती है। ईश्वर की अपार दया, करुणा, और शक्ति शालीनता पर जिन्हें भरोसा है वे जानते हैं कि कोई भी दुख, कष्ट, नुकसान, अनिष्ट या अभाव ऐसा नहीं है जो इतना अधिक दुख दे सके कि हमें उससे डरने की आवश्यकता पड़े। साहसी बाजी मारता है। गायत्री का महाप्राण जिसके पास है उसे तो साधारण साहसी नहीं दुस्साहसी होना चाहिए, वह किसी से डरना तो दूर, कठिनाइयों से उलझनों से जूझने में एक विशेष प्रकार का आनन्द अनुभव करता है, उसे दुखों में तितीक्षा और तप की सुखद सरसता की अनुभूति होती है।

प्रसन्नता मनुष्य के आन्तरिक सन्तोष, उचित दृष्टिकोण, सद्भावना, सुव्यवस्था, और मधुर स्वभाव की प्रतीक है। जो प्रसन्न रहता है उसकी जीवनी शक्ति बढ़ती है उसमें प्राण तत्त्व का निरन्तर अभिवर्धन होता है। जो निडर है, जो सन्तुष्ट है, जो हँसता है, उसकी मनोभूमि अपने आप प्राणपूर्ण होती चली जाती है। अच्छे स्वभाव की, सुलझे हुए दृष्टि कोण की छाया ही प्रसन्नता है। जो हँसता रहता है, प्रसन्नता जिसकी सहचरी है वह प्राण शक्ति से वंचित नहीं रह सकता।

ईमानदारी, निष्कपटता, सरलता सच्चाई एक ऐसी वृत्ति है जो जीवन का खुले पन्ने की तरह रखती है। जहाँ चोरी, ठगी, धूर्तता, कपट, धोखेबाजी, बेईमानी, की इच्छा नहीं वहाँ कोई गोपनीयता भी नहीं रहेगी। एक झूठ को छिपाने के लिए बीस नये झूठों की रचना करनी पड़ती है, वह खुल न जाए इसके लिए बड़े प्रयत्नों की आड़ बनानी पड़ती है पर जहाँ सरलता है, सच्चाई है, खरा व्यवहार है वहाँ कोई मायाजाल बनाने की जरूरत नहीं है। कहते हैं कि “सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है” पर वास्तविक बात यह है कि सच्चाई में अकूत बल भरा हुआ है। जिसके मन में बेईमानी नहीं, जिसके कार्य में चोरी नहीं उसका मन सदा हल्का रहेगा और उसे किसी से भी डरने की आवश्यकता न रहेगी। इस प्रकार की पवित्र मनोभूमि में प्राण का स्वाभाविक संचय होता है और वह ईमानदार व्यक्ति दिन-दिन प्राणवान् होता जाता है।

आत्म निर्भरता का मतलब है-दूसरों के ऊपर निर्भर न रह कर अपने प्रयत्न पुरुषार्थ, उद्योग और परिश्रम पर विश्वास करना। जो लोग अपनी योग्यताओं, शक्तियों और सामर्थ्यों को तो बढ़ाते नहीं और दूसरों से यह आशा करते रहते हैं कि अमुक की कृपा से हमारे सब काम हो जाएँगे वे सदा घाटे में रहते हैं। भले ही किसी की कृपा से कोई अनायास, लाभ हो जाए परन्तु पराश्रयी, परमुखापेक्षी रहने पर उनकी अपनी प्राणशक्ति न बढ़ेगी और प्राणमय कोष सुव्यवस्थित न हो सकेगा। सफलता चाहे छोटी हो, थोड़ी हो, पर होनी चाहिए अपने बाहुबल द्वारा उपार्जित। ऐसी दशा में ही साहस, उत्साह और आत्म विश्वास बढ़ सकता है। जिसे अपनी महानता का, अपने आत्म गौरव का ध्यान है, वह नीच विचारों और पतित कर्मों को नहीं अपना सकता अतएव उसकी उच्च विचारधारा और उत्तम कार्यप्रणाली अपने आप ही स्वचालित डायनुमा की तरह प्राणशक्ति की बिजली उत्पन्न करती है और साधक का प्राणमय कोष सुविकसित होता चलता है।

विशेष साधनाओं द्वारा भी प्राण शक्ति का विकास होता है। परन्तु जीवन में उपरोक्त चार सद्गुणों को अधिकाधिक मात्रा में सम्मिलित करते चलना भी एक ऐसी व्यवहारिक एवं सर्वसुलभ साधना है जिसको अपना कर हर कोई मनुष्य बिना यौगिक साधनाओं के भी प्राणमय कोष को सुव्यवस्थित कर सकता है। प्राण शक्ति का विकास कर सकता है।

जिसमें निर्भयता, प्रसन्नता, ईमानदारी और आत्म निर्भरता के गुण होंगे उसका अन्तःकरण निरन्तर प्रफुल्ल, उत्साहित एवं सन्तुष्ट रहेगा। ऐसी ही मनोभूमि में प्राण शक्ति का विकास होता है। यह सद्गुण मनुष्य को प्राणवान बनाते है उसकी प्रतिभा, तेजस्विता और पुरुषार्थ शक्ति को बढ़ाते हैं। फलस्वरूप वह व्यक्ति व्यवहारिक जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर सफल होता है। उसकी वाणी में, भावभंगिमा में, चेष्टा में, क्रिया में, विचारधारा में सर्वत्र प्राण ही प्राण, परिलक्षित होता है। ऐसे ही सद्गुणी एवं प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों के द्वारा संसार में महान कार्यों का संपादन होता है और वे ही महापुरुष कहलाते हैं।


वैराग्य की वास्तविकता

(श्री डॉक्टर चतुर्भुज सहाय जी)

जब वासनायें प्रबल होती दिखाई पड़ें तो विवेक शक्ति द्वारा उनका शमन करो। मन को समझाओ, उसे डाँटो, कहो कि यह झूठे झमेले क्यों हमारे सम्मुख लाता है? हम तेरे प्रलोभनों को समझते हैं, तू हमको इसी झूठे संसार में फँसाये रखना चाहता है, तू हमको सुखी नहीं देखना चाहता इत्यादि। ऐसा करने पर मन की शैतानी ताकत कुछ भय खा सकती है और तुम्हारा पीछा छोड़ सकती है।

वैराग्य को प्राप्त करने के लिये ‘त्याग‘ का मार्ग पकड़ना होता है। यह त्याग धीरे धीरे बढ़ाया जाता है। प्रथम कुछ ऐसी बातें जिसको हम बुरा समझते हों, छोड़ें और उनके स्थान पर अच्छी बातें लें। बुरे कर्म को त्यागें, शुभ को ग्रहण करें। इसी तरह आगे बढ़ते जाएँ। शास्त्र इन्हीं को ‘यम’ और ‘नियम’ कहते हैं।

जब सारे बुरे कर्म और बुरी वासनायें हमसे छूट जायें और स्वभाव सात्विक बन जाए, बुराइयाँ संपर्क में भी न आवें उस समय से अच्छे विचारों को भी त्यागना आरम्भ कर दें। यहाँ तक कि अच्छे और बुरे, अपने-पराये सबसे वैराग्य हो जाय। मैं और तू का झगड़ा ही जाता रहे यही वैराग्य की अन्तिम सीढ़ी होती है।

वैराग्य के दो दर्जे होते हैं। एक तो वह जो केवल अभ्यास के ही समय पर रहे, और दूसरा जो हर समय रहे। हर समय रहने वाला स्थिर और उत्तम वैराग्य होता है। अभ्यास के समय में जो वैराग्य या उदासीनता हृदय में आती है उसे ही धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की कोशिश करने और जीवन की घटनाओं पर विचार करते रहने से दृढ़ वैराग्य की प्राप्ति होती है।

प्रत्येक वस्तु का ठीक उपयोग होना ही धर्म है। अनेक लोग अपने आधीन (स्त्री-पुत्र अथवा माता-पिता इत्यादि) प्राणियों को निराश्रय छोड़ वैरागी बन जाते हैं या अपने घर में रहते हुए भी मिथ्या वैराग्य के मद में उनके दुख-सुख की परवाह नहीं करते, यह भारी पाप है। हमारे जिन कामों से दूसरों का दिल दुखे उन्हें कष्ट पहुँचे तो यह सब ‘हिंसा’ ही है, ऐसा हिंसक मनुष्य कभी महात्मा नहीं बन सकेगा।

विवेकी-सेवा में कमी नहीं करता, प्रेम और मुहब्बत का सबके साथ व्यवहार करता है, परन्तु दिल से अपना किसी को नहीं समझता इसलिए उसे मोह या ममत्व दबोच नहीं सकता। सबसे मिला हुआ और सबसे अलग। सब अपने और कोई अपना नहीं। सबकी यथाशक्ति सेवा, सूश्रुषा परन्तु धर्म और कर्तव्य समझते हुये।

जहाँ तक इन सब को अपना समझते हैं तभी तक उनके दुःखों में हमको दुःख होता है, उनकी जरा सी तकलीफ में हम घबरा जाते हैं और तन-मन-धन सभी कुछ उन पर अर्पण करते हुए भी परेशान रहते हैं। यदि इनको विवेक दृष्टि के द्वारा हम भगवान को देखें और भगवान की आज्ञा समझ के उनकी सेवा करें, उनको हर तरह का आराम पहुँचाएँ तो इतने से ही हमको बहुत कुछ शान्ति मिलेगी और हम गृही होते हुए भी वैरागी कहे जा सकते हैं।

मेले ठेलों में तुमने देखा होगा कि दूर दूर से आये हुए कई मुसाफिर जिनमें न कोई आपस में पिछली जान पहचान है, न कोई रिश्तेदार या बिरादरी का है, एक स्थान पर ठहर जाते हैं। उनमें मर्द-औरत और बच्चे-बूढ़े सभी प्रकार के मनुष्य होते है। कई दिन के समागम से प्रेम उत्पन्न हो जाता है। मेले के दूसरे आदमियों के मुकाबले उनसे कुछ घनिष्ठता हो जाती है और सम्बन्ध सा हो जाता है। यही संबन्ध कभी-कभी इतना बढ़ जाता है, कि वियोग के समय हृदय दुखते हैं, आँखों से अश्रु बरसते हैं। क्यों? इसलिए कि उनसे थोड़ा ममत्व हो गया था। हम असलियत को भूल गये थे और उन्हें अपना ही समझने लगे थे। यदि हम दिल में यह बात भी रखते कि यह सब परदेशी हैं, किसी न किसी दिन अपने अपने स्थानों को चले जायेंगे। जब तक हैं जो कुछ सेवा हम कर सकते हैं इनकी करें, इनको आराम पहुँचायें, परन्तु इनको अपना निजी, ऐसा सम्बन्धी न जाने कि जो कभी हमसे छूटेंगे ही नहीं तो इतनी दुख नहीं हो सकता था इसी तरह यहाँ की दशा है।

यह संसार एक मेला है। गृहस्थी का घर एक धर्मशाला या मुसाफिरखाना है। चारों दिशाओं से प्राणी आकर यहाँ इकट्ठे होते हैं। कुछ दिवस साथ रहते हैं फिर अपने देश को चलते बनते हैं। इन्हीं में से कोई स्त्री का रूप धारण कर पत्नी बन जाती है, कोई बाल रूप से तोतली भाषा में ‘पिता जी’ कहने लगता है, मातृभाषा का नक्शा आँखों के सामने पेश करने लगता है इत्यादि। प्राणी (गृही) अपनी अज्ञानता से उनको अपना मानने लगता है। मोहपाश में फँसा हुआ वह मूर्ख उनको आराम पहुँचाने के लिये अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। दिन-रात परिश्रम से धन व दूसरी सामग्री लाता है और उनको जुटाता है, फिर भी उनकी जरूरतें पूरी होते हुए नहीं देखता तो अपनी विवशता पर अफसोस करता है, परेशान होता है। वह सब भी जब तक उनकी इच्छायें पूरी होती रहती है खुश रहते हैं, दिखावटी प्रेम दर्शाते हैं और जिस दिन उनकी लालसाओं में विघ्न पड़ता है फिर बुरी तरह लड़ाई-झगड़े ठान देते हैं, तंग करते है और उसकी ओर से मुख मोड़ लेते हैं इत्यादि

क्या! यह तमाशा इस संसार में हर समय नहीं होता रहता! जो विवेक पुरुष इनमें रहता हुआ, इनको अपना नहीं समझता, इनके मोह जाल में नहीं फँसता वही ‘वैरागी’ है।


मधु-संचय

(संकलनकर्ता-श्री गंगा प्रसाद जी अग्रवाल आरंग)

(1) परस्त्री का स्पर्श न करो।

(2) अपनी बड़ाई न सुनो। (इससे अहंकार बढ़ता है।)

(3) दूसरों की निन्दा न सुनो। (इससे घृणा, द्वेष, क्रोध वैर आदि दोष मन में पैदा होते हैं।)

(4) परचर्चा फालतू बातें न सुने। (इससे मुँह से झूँठे शब्द निकल सकते हैं, फालतू समय जाता है।)

(5) भोगों की बातें न सुनें।

(6) स्त्रियों के रूप को बुरी दृष्टि से न देखे।

(7) गन्दी चेष्टा एक भी न रखें।

(8) कड़वा न बोलें (इससे दूसरे की आत्मा को दुख पहुँचता है और बैर बढ़ता है।)

(9) किसी की निन्दा या चुगली न करें।

(घृणा, द्वेष, हिंसा आदि दोष पैदा होते हैं।)

(10) अपनी बड़ाई न करें। (खुशामद पसन्दगी आती है।)

(11) मिथ्या न बोलें (इससे समस्त धर्मों का नाश होता है वाणी का तेज घट जाता है।)

(12) ताना न मारें! आक्षेप न करें! अपशब्द न बोलें! अश्लील न बोलें! अपने लिये किसी से कुछ न माँगें।

(13) ज्ञान तीर्थ है, धैर्य तीर्थ है तथा पुण्य भी तीर्थ कहा गया है किन्तु जो मन की उत्कृष्ट शुद्धि है-यही तीर्थों का भी तीर्थ है।

(14) सब आते हैं और चले जाते हैं न कुछ ले आते हैं न कुछ ले जाते हैं परन्तु एक क्षणिक मोह के लिए तरसते रह जाते हैं।

(15) अधिक से अधिक योग्यता प्राप्त कर समाज की अधिक से अधिक सेवा करना और निर्वाह मात्र के लिए कम से कम लेने के मायने “भीख” है। पहले के ब्राह्मण ऐसे ही भीख माँगते थे-आज भी ऐसे ही लोग भीख माँगने के पात्र हैं-उन्हीं को वह दी भी जाए और दी जाय अन्धे, लंगड़ों, लूलों, अपाहिजों को! औरों को नहीं इसके अतिरिक्त जो भीख माँगते हैं, वह समाज के चोर हैं!

सत्य और तथ्य

(1) वायु से भी शीघ्र गामी क्या है-मन (2) तिनकों से भी अधिक असंख्य कौन है-चिन्ता (3) प्रवासी का मित्र कौन है-साथी (4) गृह वासी का मित्र कौन है-भार्या (5) बीमार का मित्र कौन है-वैद्य (6) मरे आदमी का मित्र कौन है-दान (7) सब प्राणियों का अतिथि कौन है-अग्नि (8) धर्म का स्थान क्या है-सब के अनुकूल रहना (9) यश की चरम सीमा क्या है-किसी की बुराई न करना (10) सब बातों में उत्तम बात क्या है-सब के अनुकूल रहना (11) उत्तम धन क्या हैं- शास्त्र ज्ञान।


मनुष्य का स्वभाव कैसे पहचानें

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर अपने इर्द-गिर्द के व्यक्तियों के सम्बन्ध में अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। मनुष्य जैसा अन्दर से होता है, उसका अन्तःकरण, रुचि, मानसिक विकास, या इन्द्रिय भोगों की मर्यादा के अनुसार इन निष्कर्षों पर आया जाता है।

पहले वस्त्रों को लीजिए। जिन व्यक्तियों की पोशाक बाहर से चटकीली भड़कीली होती है, उनकी रुचि विकास मानसिक और शिक्षा सम्बन्धी स्तर बहुत नीचा होता है। भड़कीले वस्त्र बचपन की निशानी है। प्रायः देखा जाता है कि अशिक्षित मनुष्य रंग बिरंगे वस्त्र धारण करते हैं। स्त्रियाँ लाल रंग की ओढ़नी, लहंगा, या साड़ियाँ धारण करती हैं। अविकसित कलात्मक रुचि वाली स्त्री अधिक से अधिक रंग वाले वस्त्रों को धारण कर वह मानसिक दृष्टि से अपने आपको महत्ता प्रदान करना चाहती है। अधिक रंग ध्यान आकृष्ट करने, विशेषतया स्त्री का पुरुषों को, तथा पुरुषों का स्त्रियों को आकृष्ट करने का एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। जैसे-2 मनुष्य का साँस्कृतिक विकास होता है, वैसे-2 वह श्वेत या हलके रंग के वस्त्रों पर आता जाता है। अधिक रंग से हलके रंग पर आना और फिर सफेद वस्त्रों पर आना साँस्कृतिक एवं मानसिक विकास का प्रतीक है। प्राचीन रोमन, ग्रीक तथा अंग्रेज पादरियों की पोशाक सफेद रंग की रही है। श्वेत रंग पवित्रता, सात्विकता, मानसिक विकास का द्योतक है।

सुगन्ध का चरित्र से संबंध है। गन्ध की ओर आकृष्ट होना मानव स्वभाव है। कीट पतंग तक गन्ध के दास होते हैं। जो व्यक्ति तेज गन्ध की ओर आकृष्ट होते हैं, वे कलात्मक दृष्टि से नीचे स्तर के हैं। तेज महक पसन्द करने वालों में वह कलात्मक विकास नहीं पाया जाता। इत्र फुलेल, या सुगन्धित तेल, साबुन बेचने वाले जानते हैं कि तेज सुगन्ध वाले इत्र, तेल इत्यादि अनपढ़ मूर्ख या दिखावटी मन वाले अधिक मात्रा में खरीदते हैं। भोजन के पश्चात् जो पैसा बचेगा उसे वे इत्र की एक फुरेरी को खरीदने में व्यय करेंगे। एक आने का सुगन्धित तेल लेकर केशों में मलना, भोजन लेकर खाने से अधिक पसन्द करेंगे। परिष्कृत रुचि के व्यक्ति कम गन्ध पसन्द करते हैं, या बिल्कुल ही पसन्द नहीं करते। सर्वोत्कृष्ट कलात्मक रुचि उस व्यक्ति की है, जो कम गन्ध के इत्र, साबुन, तेल, पसन्द करते हैं। यही बात पुष्पों के सम्बन्ध में भी है। नागचम्पा, मौलपुरी गुलाब आदि तेज महक वाले पुष्प कम परिष्कृत रुचि के परिचायक है। चमेली मोगरा, रात की रानी अपने रंग की सफेदी और हलकी भीनी सुगन्ध से उच्च रुचि के परिचायक है। जो व्यक्ति अधिक गहरे रंग, तथा तेज महक वाले पुष्पों को प्रेम करते हैं, वे मोटे, असंस्कृत, अविकसित, स्वभाव के हैं। सफेद रंग तथा कम महक पसन्द करने वाले उच्च परिष्कृत रुचि के परिचायक हैं। प्रायः पुष्प का नाम देकर चरित्र पढ़ने का विज्ञापन किया जाता है। इसमें यही रहस्य छिपा है। यदि आपका प्यारा पुष्प रंगों से भरा हुआ है, तेज महक वाला है, तो इसका अभिप्राय यह है कि आपका स्वभाव एवं मानसिक विकास बाल्यावस्था में ही है। स्थिर वृत्ति एवं सुसंस्कृत स्वभाव वाला व्यक्ति हल्की भीनी भीनी गन्ध और हलके रंगों को पसन्द करता है।

जो व्यक्ति बातचीत में गाली या अपशब्दों का प्रयोग करता है, वह अपनी दलित वासना को प्रकट करता है। उसके गुप्त मन में बनी हुई ये वासनाएँ भाँति भाँति के अपशब्दों, गन्दी क्रियाओं तथा गुप्त अंगों के स्पर्श से प्रकट होती हैं। ऐसे व्यक्ति के समीप का समस्त वातावरण दूषित होता है। यह अपरिपक्वता का द्योतक है।

अधिक बनाव श्रृंगार करने वाली स्त्री या पुरुष, पुष्पों, इत्र, फुलेल, तेल, पाउडर, क्रीम इत्यादि मलने वाला, चटकीले कपड़े पहिन कर, या फैशन परस्त-गुप्त वासना को प्रकट करते है। जो व्यक्ति आंखें फाड़ फाड़ कर स्त्रियों की ओर ध्यान से देखता है अथवा उनमें दिलचस्पी दिखाता है, सिनेमा देखता है, अभिनेत्रियों की जीवनियाँ पढ़ता है, उनके चित्र कमरे में लगाता है, सिनेमा के गीत गुनगुनाया करता है, वह वासना प्रिय है। उनकी वासना के प्रकाशन के ये भिन्न भिन्न प्रकार हैं। आजकल सिनेमा की पत्र पत्रिकाओं, जिनमें उत्तेजक चित्रों की भरमार रहती है, युवक-युवतियाँ बड़े उत्साह से पढ़ते हैं। यह उच्छृंखलता का चिन्ह है। भड़कीले चरित्र वाले अस्थिर, दूषित प्रकृति वालों में ये तत्त्व प्रचुरता से पाये जाते हैं-पान खाना, बढ़िया पालिशदार जूता पहिनना, गले में माला डालना, बनाव श्रृंगार को ही सब कुछ मान बैठना इत्यादि। स्त्रियों में मुँह पर अधिक सुर्खी लगाना, केशों का अत्यधिक ध्यान, रंगीन साड़ियों का प्रयोग, शरीर को अधिक खोले रखना, अंग-प्रत्यंगों का अधिकाधिक प्रदर्शन, श्रृंगार प्रियता, गन्दे गीत गान, पान-चबाना, चटपटे मिर्च मसालों वाले भोजनों में रुचि, पुरुषवर्ग से अधिक संपर्क रहना क्लब या सोसाइटियों में घूमना इत्यादि विलासी स्त्रियों के लक्षण हैं। उपरोक्त सब तत्त्व यौन-क्षुधा व्यक्त करते हैं।

जो व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सफाई के बारे में लापरवाह है, वह या तो मूर्ख और असंस्कृत हो सकता है, अथवा दार्शनिक। अधिक विकसित व्यक्ति बनाव श्रृंगार से ऊंचे उठने के कारण साधारण तथा अनेक बार अतिसाधारण हो जाते हैं। सादी वेशभूषा में उन्हें पहचानना कठिन हो जाता हैं। सरलता, आदमी की सज्जनता की निशानी है।

गन्दे वस्त्रों वाला व्यक्ति आलसी, अशिक्षित एवं मूर्ख हो जाता है। वह कलात्मक अभिरुचि से बहुत दूर रहता है। इसलिए उसके कीमती वस्त्र भी गन्दे रहते हैं।

किसी व्यक्ति के घर में आकर यदि आप प्रत्येक वस्तु यथा स्थान पाते हैं, तो समझ लीजिए कि वह योजना बनाकर चलने वाला मानसिक दृष्टि से स्थिर संतुष्ट कलात्मक है। अस्त व्यस्त गृह रखने वाला लापरवाह, कला-शून्य, तथा जल्दबाजी उनके जीवन के हर पहलू में प्रदर्शित होती रहती है।

हजामत बनाने में असावधानी, या लापरवाही लम्बी मूंछें रखना, या केशों को न संवारना दो बातें प्रकट करता है। या तो व्यक्ति इतना निर्धन है कि यह सब व्यय नहीं कर सकता, अथवा उसे इतना अवकाश नहीं है कि वह इनकी ओर ध्यान दे सके। नाक में निकले हुए बाल असभ्यता के द्योतक हैं। बढ़े हुए नाखून मनुष्य की असंस्कृति, बहसीपन और आलस प्रकट करते हैं।

जो व्यक्ति बार बार मुँह पर हाथ रखता है, कपोलों का स्पर्श करता हैं, नाक में उंगली डालता है, कान कुरेदता है, वह हीनत्व की भावना से ग्रसित है। इन क्रियाओं द्वारा बड़प्पन की, शरीर तथा आत्मा की निर्बलता ही प्रकट किया करता है।

जो व्यक्ति मुँह खोल कर डकार, या जमुहाई लेते हैं अथवा अपान वायु अधिक निकाला करते हैं वे प्रायः आन्तरिक पेट की बीमारियों के मरीज होते हैं । अधिक खाने से आलस्य तथा उसी प्रकार की घृणित बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

जो व्यक्ति जरा जरा सी बात पर ही ही कर दाँत निकाला करते हैं, अथवा वे बात करते समय मखोल करते रहते हैं, वे अस्थिर और थोथे ज्ञान वाले होते हैं। किस बात पर हंसना उचित है, किस पर नहीं हंसना चाहिए, उन्हें इतना विवेक नहीं होता।

कुछ व्यक्ति आपसे अल्पकाल में ही मित्रता गाँठ लेते हैं। हंसकर, कुछ चीजें जैसे-लैमन सोडा, सिगरेट पान, या सिनेमा दिखा कर आपको अपना परम मित्र दिखाना चाहते हैं, ऐसे व्यक्ति स्वार्थी होते हैं। अपनी स्वार्थ सिद्धि के निर्मित प्रायः यह उपकरण किया करते हैं। मतलब पूर्ण होने के पश्चात् किसी से न बोलते हैं, न लेन देन स्थिर रखते हैं। ऐसे व्यक्ति खतरनाक होते हैं। आपकी हानि-लाभ से उन्हें कोई अभिप्राय नहीं।

अधिक थूकने वाला व्यक्ति एक घृणित आदत का गुलाम है। उत्तम स्वास्थ्य वाले व्यक्ति कभी नहीं थूकते फिरते। जिन्हें खाँसी जुकाम आदि कोई बीमारी है, उन्हें भी नियत स्थान पर ही थूकना चाहिए। खाँसी के समय रुमाल का प्रयोग करने वाले सभ्य, सुनिश्चित होते हैं।

कुछ व्यक्ति दूसरों के प्राइवेट कमरों में, या आफिस में बिना पूर्व सूचना चले जाते हैं। किसी के प्राइवेट कमरे में यों ही चले जाना बड़ी भारी असभ्यता है। जाने से पहले पूर्व सूचना तथा समय सम्बन्धी बातें तय कर लेनी चाहिए। इसी प्रकार दूसरों के गुप्त या साधारण पत्र पढ़ना, या कमरे की वस्तुओं को उलट-पलटना एक बुरी आदत है।

कुछ व्यक्ति चलते समय दोनों ओर हाथ फैला कर हाथी की सी शान दिखाते हुए अपनी शक्ति, सौंदर्य, तथा महत्त्व का प्रदर्शन करते हुए चलते हैं। जूतों को पटक पटक कर रखते हैं, चूँ चूँ करने वाले जूतों का व्यवहार करते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रदर्शन के शौकीन, झूठी शान, व्यर्थ की टीपटाप रखने वाले, साँस्कृतिक दृष्टिकोण से अविकसित होते हैं। पूर्ण विकसित व्यक्ति साधारण सी चाल से चलता है। उसमें शक्ति, उत्साह, क्षिप्रता रहती है, पर व्यर्थ की शेखी नहीं।

अधिक चूड़ियाँ, कान नाक हाथ में भारी गहने पहनने वाली स्त्रियाँ, आभूषणों की चमक दमक में अपनी कुरूपता छिपाया करती हैं। पूर्ण सुन्दर स्त्री आभूषण पहनना बिल्कुल ही नहीं पसन्द करती, या अत्यधिक कम करती है। वह प्राकृतिक रूप से ही सहज सुन्दर है। इसी प्रकार अंगूठियां, या गले में सोने की जंजीर डाले फिरने वाले पुरुष भी कुरूपता के शिकार होते हैं। इस कुरूपता को ढ़कने के लिए तरह तरह के बाह्य प्रसाधन काम में लाये जाते हैं। पाउडर, क्रीम, सुर्खी इत्यादि कुरूपता को छिपाने के बाह्य साधन हैं। प्राचीन असंस्कृत आदिम जातियों के जो अंग अवशेष रह गये हैं, वे आज भी चाँदी, गिलट लकड़ी या हाथी दाँत के अधिक से अधिक गहनों का व्यवहार करते हैं। आभूषणों से क्षणिक, आकर्ष उत्पन्न हो सकता है, किन्तु शरीर की स्थायी कुरूपता नहीं ढ़क सकती। अपने शरीर को सहज, स्वाभाविक स्वास्थ्य मूलक सौंदर्य दिखाने वाली स्त्री या पुरुष ही परिष्कृत और सुसंस्कृत रुचि के परिचायक हैं।

आकर्षक वस्त्र, आभूषण, या मकान आदि में रह कर मनुष्य यह आकाँक्षा करता है कि उक्त वस्तुओं के लिए उसकी प्रशंसा की जाए। वह इन वस्तुओं के लिए विशेष गर्व करता है। ऐसे व्यक्ति प्रशंसा के भूखे रहते हैं। यदि कोई इन वस्तुओं के संबंध में कुछ बातचीत करता है, तो वे बहुत बढ़ा चढ़ा कर उनका बखान करते हैं। आपके इर्द गिर्द का प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार की कोई न कमजोरी अवश्य रखता है। तीतर का पिंजरा हाथ में लेकर निकलने वाले चाहते हैं कि उनके तीतर की प्रशंसा की जाए। पहलवान नग्न बदन रख कर यह आकाँक्षा करते हैं कि उनके पुट्ठों की तारीफ की जाए। दुकानदार की “शो विन्डो” ग्राहकों को खींच खींच कर लाया करती है। स्त्रियों में प्रशंसा की भूख उग्र होती है यदि कोई प्रातः से लेकर साँय तक उनकी पोशाक, घर की सफाई, प्रबन्ध, भोजन बाल शिक्षा आदि की प्रशंसा करता रहे, तो वह दुगुना चौगुना कार्य सम्पादित कर सकती है। बच्चे प्रशंसा की खुराक पाकर कठिन कार्यों की ओर अग्रसर हो जाते हैं। ये अपने पढ़ने लिखने में प्रशंसा से ही विकसित हो सकते हैं। उनके प्रत्येक सुधार पर प्रोत्साहन देने वाली माता अपने बच्चे को ऊँचे से ऊँचा उठा सकती है।

शरीर का मोटापन, या दुबलापन चरित्र के विषय में कुछ संकेत दे सकता है। मोटा व्यक्ति आराम तलब, आलसी, शक्तिशाली, मानसिक रूप से कम भावुक होता है। वह काम करने में झींकता है, जल्दी थक जाता है, साहसिक कामों में कम दिलचस्पी लेता है, क्रुद्ध कम होता है। दैनिक जीवन में प्रायः आलस्य में पड़ा रहता है। इनके विपरीत दुबला आदमी अधिक फुर्तीला, काम करने वाला, विचारशील और दीर्घायु होता है। वह आनन्दप्रिय नहीं होता। आलस्य की मात्रा कम होती है, विचारशीलता और दूरदर्शिता अधिक होती है। वह उग्र स्वभाव का होता है, आसानी से क्रोधित हो जाता है। शेर देखिए, पतला दुबला होते हुए भी शक्ति, स्फूर्ति, तेजी, उग्रता, क्रोध से परिपूर्ण होता है, इसके विपरीत हाथी स्थूल शरीर हो कर भी आलसी, शान्त, शक्तिशाली, गंभीर, बुद्धि का मोटा, काम से चिढ़ने वाला, धीमा होता है। ये ही गुण प्रायः पतले मोटे मनुष्य में पाये जाते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रभाव लाता है। जब वह आपके सम्मुख आता है, तो आपकी अन्तरात्मा तुरन्त यह बताती है कि वह अच्छा है, बुरा है, पवित्र है, या लफंगा है। गन्दी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अपने हाव भाव, नेत्रों, मुख, क्रियाओं, तथा दृष्टि भेद से अपनी आन्तरिक गन्दगी स्पष्ट कर देता है। स्त्रियों में मनुष्य के चरित्र को पढ़ लेने की अद्भुत क्षमता होती है। वे गन्दे व्यक्ति को एक दम ताड़ लेती है। सात्विक मनुष्य का दिव्य प्रभाव भी सूक्ष्म तरंगों में निकल कर दूसरों पर पड़ता है। उसकी क्रियाओं तथा वेशभूषा एकदम उसकी सत् प्रवृत्तियाँ प्रकट कर देती हैं। दूसरे के विषय में आपका अन्तःकरण जो गवाही देता है वह सौ में नब्बे प्रतिशत ठीक होता है।


बुरे विचार कैसे रुकें

(प्रो. लाल जी राम जी शुक्ल, एम. ए.)

हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन का व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की क्लिष्ट तथा अक्लिष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

बुरे विचारों के निरोध का उपाय सबसे प्रथम उनको पहचानना ही है। जिनके विचारों को हम बुरे विचार मानते ही नहीं, उन्हें हम अपने मन-मन्दिर में प्रवेश करने से क्यों कर रोक सकेंगे? यदि दूसरों के धनापहरण के विचार को हम उत्तम विचार मानते हैं तो उसे अपने मन में आने से रोकने की जगह भली प्रकार से उसका स्वागत करेंगे। जो विचार बुरे होते हैं वे उनके प्रथम स्वरूप में ही बुरे नहीं लगते उनके परिणाम भी बुरे होते हैं। विचारवान व्यक्ति ही इस बात को जान सकता है कि अमुक विचार अन्त में दुःखदायी होगा।

संसार के अत्यधिक मनुष्यों को यह समझाना ही कठिन है कि उनके विचार ही उनके सुख-दुःख के कारण हैं। मनुष्य मात्र में अपने आप पर विवेचना करने की शक्ति का अभाव होता है। हम सब ही बहिर्मुखी हैं। इसलिए अपने कष्टों का कारण दूसरों को मानने में सन्तोष पाते हैं। अपने दोषों को दूसरों में देखते हैं। जिस अवाँछनीय घटना की जड़ हमारे विचारों में ही है उसे हम दूसरे व्यक्तियों में देखते हैं। इस प्रकार की मानसिक प्रवृत्ति को दोषारोपण की प्रवृत्ति कहते हैं अथवा प्रोजेक्शन कहते हैं। वही मनुष्य बुरे विचारो के निरोध में समर्थ होता है, जो अपने विषय में सदा चिन्तन करता है और जो परोक्ष रूप से भी यह जानता है कि मनुष्य का मन ही सुखों और दुःखों का कारण है। ऐसे ही मनुष्य में भले और बुरे विचारों के पहचानने की शक्ति उत्पन्न होती है।

किसी भी ऐसे विचार को बुरा विचार कहना चाहिए जो आत्मा को दुःख देता हो, उसको भ्रम में डालता हो। बीमारी के विचारों और असफलता के विचारों को सभी बुरा कहेंगे यह प्रत्यक्ष ही है कि इन विचारों से मन को दुःख होता है और अनहोनी घटना हो के रहती है। किन्तु इस बात को मानने के लिए कम लोग तैयार होंगे कि शत्रुता के विचार, दूसरों को क्षति पहुँचाने के विचार भी बुरे विचार है। ये विचार भी उसी प्रकार हमारी आत्मा का बल कम कर देते हैं जिस प्रकार कि असफलता और बीमारी के विचार आत्मा का बल कम कर देते हैं।

हमारा मन अभ्यास का दास है। जिस प्रकार का अभ्यास मन द्वारा कराया जाता है उसी प्रकार उसका अभ्यास सदा के लिये बन जाता है। जिस मनुष्य को पढ़ने लिखने का अभ्यास रहता है, उसका मन रुचि के साथ ऐसे काम को करने लगता है। ऐसे व्यक्ति से बिना पढ़े-लिखे रहा ही नहीं जाता। जिस मनुष्य को दूसरों की निन्दा करने का अभ्यास है, जो दूसरों के अहित का सदा चिन्तन किया करता है, वह भी उन कर्मों को किये बिना रह नहीं सकता। ऐसे कार्य उसके लिए एक प्रकार के नशा जैसे व्यसन हो जाते हैं। वह व्यक्ति अनायास ही दूसरों की निंदा और अकल्याण सोचने में लग जाता है। दूसरों की स्तुति सुनकर उसे बुखार जैसा आ जाता है।

जिस व्यक्ति का इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है वह जब अपने आप के विषय में अशुभ विचार लाता है तो उन विचारों का भी विरोध नहीं कर सकता। जिसको दूसरों की बुराई का चिन्तन भला लगता है वह अपनी बुराई का भी चिन्तन करने लगता है। फिर इस प्रकार के विचार उनके मन को नहीं छोड़ते। अब यदि वह चाहे कि अमुक अशुभ विचार को छोड़ दे, तो भी अब वह उसे छोड़ने में असमर्थ होता है। वही मनुष्य अपने विचारों पर नियंत्रण कर सकता है जिसकी आत्मा बलवान और विवेकी है। जो यह जानता है कि जिस साँप को हम दूसरों के काटने के लिए पाले हैं, वही साँप किसी असावधानी की अवस्था में हम को काट सकता है। दूसरों को दुःख देने के विचार साँप के सदृश हैं। अतएव सबका सदा कल्याण सोचना, किसी का भी अहित न सोचना, बुरे विचारों के निवारण का पहला उपाय है।

जिस व्यक्ति के प्रति हम बुरे विचार लाते हैं उससे हम घृणा करते लगते हैं। घृणा की वृत्ति उलट कर भय की वृत्ति बन जाती है। जो दूसरों की मान-हानि का इच्छुक है उसके मन में अपने आप ही अपनी मान हानि का भय उत्पन्न हो जाता है। जो दूसरों की शारीरिक क्षति चाहता है, उसे अपने शरीर के विषय में अनेक रोगों की कल्पना अपने आप उठने लगती है। जो दूसरों की असफलता चाहता हैं वह अपनी सफलता के विषय में सन्देहात्मक हो जाता है।

हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, सम्भव है वह व्यक्ति हमारा कुछ भी बुरा न कर सके, वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाए। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी। अब हम जितना भय पहले व्यक्ति के प्रति रखते थे उतना ही दूसरों के प्रति रखने लगेंगे। दूसरों को अपने समीप से चले जाने की चाह न रख कर उसे अपने बुरे विचारों को ही विदा कर देना चाहिए। स्थान के बदल देने से भी दुखी मनुष्य सुखी नहीं हो जाता, जैसा कि इमर्सन महाशय ने लिखा है -”उसका भूत सदा ही उसके साथ चलता रहेगा, वह जहाँ भी जाएगा, वहीं अपने दुखों को पायेगा। यदि कोई मनुष्य सुखी हो सकता है तो परिस्थिति परिवर्तन से नहीं, अपने आपके परिवर्तन से।”

बुरे विचार के प्रवेश को रोकने का दूसरा उपाय यह है कि मनुष्य सदा अपने आपको किसी न किसी भले काम में लगाए रहें। श्रीमद्भागवत् में जो मन रूपी भूत को वश में करने का उपाय बताया गया है वह बड़ा ही शिक्षाप्रद है। मन को सर्वदा नेक कामों में लगाये रहने से ही वह बस में रहता है। एक मेरे परिचित, देश सेवक सज्जन एक दिन कुछ लोगों के बीमार होने पर बातचीत करते समय कहने लगे कि आप लोगों को बीमार होने की फुरसत कहाँ मिल जाती है, हमें तो बीमार होने की फुरसत ही नहीं मिलती। वास्तव में, बीमारी एक फुरसत का विचार है। जब हमारा मन फुरसत में रहता है, तब हम अनेक प्रकार की दुर्भावनाएं अपने मन में लाने लगते हैं, जो बीमारी के रूप में प्रादुर्भूत हो जाती हैं।

बुरे विचारों के रोकने का तीसरा उपाय प्रतिभावान है। प्रत्येक मनुष्य को अपने आपके प्रति सचेत रहना चाहिए। जब भी कोई विचार उसके मन में आये, उसे उसका भली प्रकार से निरीक्षण करना चाहिए। सम्भव है कि जिसे वह अपने कल्याण का विचार समझता हो वही उसके अकल्याण का विचार हो। शत्रु के प्रति घृणा करना यह हमारे मन का सहज स्वभाव है उसका अकल्याण चाहना स्वाभाविक है। विचारवान् व्यक्ति को शत्रु के गुणों का चिन्तन करना चाहिए। कृष्ण भगवान् ने दुर्योधन का वध कराया, किन्तु यह उसके कल्याण के लिए। जो व्यक्ति किसी का स्वप्न में भी अकल्याण नहीं चाहता वह अपने विषय में भी अकल्याण के विचार न पायेगा। यदि ऐसे व्यक्ति के मन में अपने विषय में अकल्याण का विचार आ भी जाए, तो वह उस विचार के अपने पूर्व अभ्यास के कारण शीघ्र ही मुक्त हो जाएगा। ऊपर कहा जा चुका है कि अभ्यास के कारण ही मनुष्य अपने आपके अकल्याण के विचारों को रोकने में असमर्थ होता है।

भलाई में बुराई और बुराई में भलाई देखने का नाम ही प्रति भावना है। किसी भी प्रकार के लाभ से अत्यानन्दित न होना और किसी भी प्रकार की हानि से अति उद्विग्न न होना प्रतिभावान का परिणाम है। लाभ की अवस्था में जो मनुष्य अति सुख मनाता है उसका मन कमजोर हो जाता है और वह हानि अथवा उसकी सम्भावना की अवस्था में अति दुःख मनाए बिना नहीं रह सकता। किसी प्रकार की साँसारिक वाँछनीय परिस्थिति में दोष छिपा रहता है तथा अवाँछनीय परिस्थिति में गुण रहता है। इस गुण को ढूँढ़ निकालना चाहिए।

इसी नियम का एक स्वरूप यह है कि हम सभी परिस्थितियों को भला समझें। वास्तव में मनुष्य सुखी-दुखी, असफल सफल अपने दृष्टिकोण के कारण होता है। हमें अपने जीवन को सफलीभूत बनाने के लिए सदा यह विचार करना चाहिए कि जो कुछ अभी तक हुआ, सब हमारे भले के लिए ही हुआ। हमारे दुश्मन भी हमारी भलाई अप्रत्यक्ष रूप से कर रहे हैं। यदि हमारा कोई दुश्मन न होता तो हमारे दुर्गुणों को बताने वाला भी कोई न होता। हमारी शक्ति हमारे दुश्मनों के कारण ही बढ़ती है। जिस व्यक्ति को किसी से लड़ना ही नहीं उसे शक्ति संचय की आवश्यकता ही क्या? अतएव प्रत्येक लड़ाई हम अपने आपकी और दूसरों की भलाई के लिए करते हैं।

बुरे विचारों के निरोध का एक भारी उपाय उनके प्रति साक्षी भाव प्राप्त करना है। कितने लोग ऐसे हैं जो किसी विशेष भाव से मुक्त होना चाहते हैं उससे इसलिए ही मुक्त नहीं होते, क्योंकि इससे वे मुक्त होना चाहते हैं। इस प्रकार की दशा निम्नलिखित कथानक से जो श्रीमद्भागवत में आता है, स्पष्ट हो जाएगी।

“कोई एक पुरुष किसी रूपवती महिला को किसी प्रकार अपने वंश में करना चाहता था। इसके लिए वह एक योगी के पास वशीकरण मन्त्र सीखने के लिए गया। योगी जी ने एक मन्त्र उसे बताया और कहा कि एकान्त स्थान में बैठ कर उसका एक हजार बार जप करो। स्थान ऐसा हो जहाँ किसी तरह की आहट न हो और उसे कोई देख नहीं पाये। वह व्यक्ति बड़ी प्रसन्नता के साथ योगी महात्मा के पास से चलने लगा, वह थोड़ी ही दूर गया था कि उसे योगी जी ने फिर बुला कर कहा कि इस जाप में एक शर्त यह है कि इसे जपते समय बन्दर का ध्यान मन में न आने पावे, नहीं तो सिद्धि प्राप्त नहीं होगी।

उस व्यक्ति ने झट एकान्त स्थान में जप का आयोजन किया। किन्तु ज्यों ही उसने पहली बार मन्त्र कहा, उसी समय बन्दर का विचार मन में आ गया। वह इस विचार से जितना ही लड़ा उतना ही वह विचार और दृढ़ होता गया। बेचारा निराश होकर योगी महात्मा के पास आया और कहने लगा कि-महाराज यदि आप यह विचार न सुनाते कि बन्दर का ध्यान न आने पावे तो मुझे कदापि बन्दर का विचार को मन में न आता अब तो हम जितना ही बन्दर के विचार आने देने से रोकते हैं उतना ही वह और दृढ़ होता जाता है।”

कितने ही नींद की बीमारी ( इन्सोमिनिया) वाले लोगों को नींद इसलिए नहीं आती, कि वह नींद लाना चाहते है। अर्थात् अपनी जाग्रत अवस्था से मुक्त होना चाहते हैं किन्तु यह जाग्रत अवस्था से मुक्त होने का विचार ही, उन्हें उस अवस्था से मुक्त नहीं होने देता। जिस व्यक्ति को (इन्सोमिनिया) की बीमारी हो यदि, उस बीमारी के प्रति उदासीन कर दिया जाए तो वह अपने आप सो जायेगा। यही नीति बुरे विचारों के सम्बन्ध में बरतनी चाहिए।


Quotation

-बाप की इज्जत पर लड़की जैसे बहुत समय तक नहीं जूझ सकती, उसी तरह प्रजा अकेले प्राचीन हिन्दुस्तान के गौरव पर हमेशा अपनी शान नहीं दिखा सकती।

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-आत्मा अमर है, देह क्षण-भंगुर है। कोई प्रवृत्ति परिणाम प्राप्त किये बिना, रहती नहीं। यह सब हम बचपन से सीखते हैं। फिर मौत से क्यों डरें?


योगी अरविन्द की अमृतवाणी

आत्मा को बिना जाने या बिना प्राप्त किये जो नवीन समाज के गठन का स्वप्न देखा जा रहा है वह सफल न होगा। आत्मा को लेकर ही मानव का जीवन है। जीवन के आडम्बर के भीतर सत्य वस्तु ढ़क गई है। ज्ञान का विकास होने पर ही आत्म-लाभ होगा। इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है। यह शिक्षा योग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

-योग के पथ में अग्रसर होने पर, जो समृद्धि और सम्पत्ति उद्भूत होगी, उसी का बाहरी रूप स्वराज्य है। अपने को पा जाने और जान लेने से स्वराज्य प्राप्त होता है, स्वराज्य प्राप्त होने के पश्चात् ही सामाजिक रचना हो पाती है।

-हमारी साधना किसी जाति विशेष के लिए नहीं होगी। जितनी जातियाँ हैं, उन सब की मुक्ति और शुभ कामना ही हमारी चिन्ता का मुख्य उद्देश्य होगा।

-यह साधना किसी एक आदमी पर निर्भर नहीं है, एक आदमी के सिद्धि प्रवाह में बहने से तो प्राचीन युग के समान जाति का जीवन मिट्टी में मिल जायेगा। सब के जीवन का समान रूप से उन्नायक होना चाहिए।

-साधनावस्था में साधक को सहनशील रहना चाहिए, सिद्धावस्था में केवल शक्ति की ही साधना करनी पड़ती है। क्योंकि इसी शक्ति ने जीव के साथ ईश्वर के व्यवधान की सृष्टि करके दरवाजा बन्द कर रखा है।

-इस बन्द दरवाजे को हम लोग अपने आप नहीं खोल सकते। इसे तो शक्ति ही खोल सकती है। किंतु यह शक्ति विश्वशक्ति है।

- जो लोग इस शक्ति का दर्शन सिद्ध कर लेते हैं, उनकी वाणी तलवार की धार के समान और कर्म आनन्द की लहरी के तुल्य हो जाता है।

-प्रकृति की सहायता से ही धीरे-धीरे ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होगी। जीवन की समूची लीलाओं को आत्मा की लीला में परिणत कर देना चाहिए।

-भगवान् को आत्मसमर्पण करके, एक इसी की ओर दृष्टि रखकर, संघबद्ध होकर, काम करते जाओ। ध्यान रखो कि कर्म ही जीवन का उद्देश्य नहीं है, ज्ञान का उदय ही सृष्टि का मूल मन्त्र होगा।

-ज्ञान जिस समय भक्ति और शक्ति के सम्मिश्रण का स्वरूप धारण करेगा, उस समय यह विश्व सार्थक हो जाएगा।

-भाव और कर्म की तरंग से ही काम नहीं चल सकता, उस के साथ ज्ञान का मिश्रण चाहिए। ज्ञान का मिश्रण हुए बिना सब निष्फल हो जाएगा। पूर्ण साधना में ही ज्ञान और शान्ति है।

-अक्षर ब्रह्म का जो ज्ञान है उसमें कर्म एवं भक्ति का आनन्द नहीं है। किन्तु पूर्ण ज्ञान में दोनों का ही स्थान है।

-इस अवस्था में दूसरों के हृदय का कार्य भी स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है। कुछ भी कमी नहीं रह जाती।

-और हम उस समय स्वभावतः यह उद्गार प्रकट करने लगते हैं-’यह शरीर, मन, वचन, बुद्धि सब कुछ वही है और जो कुछ वह हैं वही मैं हूँ।’

-इस प्रकार शुद्ध, सिद्ध, आनन्दमय पद को प्राप्त कर, इस जीवन को भगवान का समझ कर साधना करनी होगी। बिना इस साधना के कहीं भी किसी को सिद्धि नहीं मिली है।


सहस्त्राँशु गायत्री ब्रह्म यज्ञ का परिचय

गत अंक में ‘सहस्त्राँशु गायत्री ब्रह्म यज्ञ’ के एक मार्ग पर प्रकाश डाला गया था। अब उसकी पूरी जानकारी एवं विधि व्यवस्था का उल्लेख किया जा रहा है।

चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण पूरे करने पर हमने गत आश्विन सन् 2008 की नवरात्रियों में पूर्ण निराहार, केवल जल के आहार पर जो आवास तपश्चर्या की थी, उसमें माता का कुछ विशेष संदेश एवं प्रकाश प्राप्त हुआ। गुरु देव के आदेशानुसार 24 महापुरश्चरणों का जो संकल्प किया था, वह पूरा हो जाने पर अपने आध्यात्मिक पिता (गुरु) के आदेश की पूर्ति हो गई। अब माता की बारी थी, उनके चर्णो में मस्तक रखकर आदेश माँगा तो उन्होंने “सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ” करने का आदेश दिया और उसका सारा विधान भी बताया। आज्ञा को शिरोधार्य करना ही एक मात्र हमारा कर्त्तव्य था। उनके चरणों की साक्षी लेकर इस महायज्ञ का संकल्प कर लिया गया। एक मास तक योजना बनाने के उपरान्त कार्तिक सुदी 11 (देवोत्थान) सन् 2008 से इसका प्रारम्भ भी कर दिया गया है।

माता की प्रेरणाओं से आरम्भ हुए इस “गायत्री सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ” की योजना इस प्रकार है। (1) यह यज्ञ किसी एक ही स्थान तक सीमित न रह कर एक हजार स्थानों में होगा, (2) जैसे सूर्य की सहस्र रश्मियाँ होती हैं, शेष जी के सहस्र मुख हैं, मस्तक के ब्रह्म रंध्र में अवस्थित ब्रह्मकमल में सहस्र पंखुड़ियां होती हैं, उसी प्रकार यह यज्ञ भी सहस्रों ऋत्विजों द्वारा पूर्ण होगा, (3) इस यज्ञ में 125 करोड़ गायत्री महामन्त्र का जप किया जायेगा। (4) 125 लाख आहुतियों का हवन होगा। (5) 125 हजार उपवास होंगे (6) 125 हजार (सवालक्ष) व्यक्तियों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान कराया जाएगा।

यह कार्य इतना विशाल है कि कल्पना मात्र से मस्तक चकरा जाता है। आज के युग में भोग और स्वार्थ की प्रधानता है, धार्मिक प्रवृत्ति के मनुष्य कोई बिरले ही होते हैं। ऐसी दशा में इतनी बड़ी संख्या में ऋषियों का तत्पर होना कठिन प्रतीत होता है। परन्तु दूसरे ही क्षण नव आशा का संचार होता है कि महाशक्ति अपना काम स्वयं करेगी। हमें तो केवल निमित्त मात्र बनना है।

प्राचीन काल में महाप्रभु अंगिरा के आदेशानुसार नारद जी ने अधार्मिकता का परिमार्जन करने के लिए 24 करोड़ भगवद्भक्त बनाने का व्रत लिया था। नारद जी ने अपनी शक्ति से नहीं दैव शक्ति की सहायता से उसे पूरा किया था। हमें “सहस्त्राँशु ब्रह्म यज्ञ” का प्रेरणा देने वाली प्रेरक शक्ति ही प्रधान साधन बनेगी। हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति तो अपनी अयोग्यता और कार्य की महानता-इन दोनों की तुलना करने मात्र से काँप जाते हैं।

यह बात भली प्रकार समझ लेने की है कि यह महायज्ञ अत्यन्त गम्भीर सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला है। इसमें युग परिवर्तन के बीज छिपे हुए हैं। जैसे नव प्रभात की पूर्व सन्ध्या में ब्राह्मी साधना आवश्यक होती है, उसी प्रकार नानाविधि पाप तापों से आस देने वाली इस घनघोर अन्धकारमयी निशा का परिवर्तन करके शान्तिदायक, सतोगुणी उषा के स्वागत में यह यज्ञ किया जा रहा है। इसमें सम्मिलित होना हर एक जागृत आत्मा का पवित्र कर्त्तव्य है।

तप से ही शक्ति उत्पन्न होती है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक जिस किसी ने भी कोई भौतिक या आत्मिक वरदान पाया है वह तप द्वारा ही पाया है। समस्त सुखों, सम्पत्तियों, सफलताओं, शक्तियों का कारण तप है। जब तप की पूँजी समाप्त हो जाती हैं तो बड़े-बड़े प्रतापी कटे हुए वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़ते हैं। वह आत्मबल जिसके द्वारा परमात्मा को प्राप्त किया जाता है, वह ब्रह्म तेज जिससे समस्त संसार काँपता है, वह दिव्य शक्ति जिसके कारण समस्त सम्पदाएँ करतलगत होती हैं, इस सहस्रांशु यज्ञ द्वारा एक महान् तपश्चर्या का आयोजन किया गया है। सहस्रों ऋत्विजों की सम्मिलित शक्ति उत्पन्न होगी, उसके द्वारा लोक कल्याण का भारी प्रयोजन सिद्ध होगा।

त्रेता युग में ऋषियों ने अपना थोड़ा थोड़ा रक्त संचय करके एक घट भरा था और उसे भूमि में गाड़ दिया था, उससे सीता जी उत्पन्न हुईं और रावण के विनाश एवं राम राज्य की स्थापना का कारण हुईं। देवताओं की सम्मिलित शक्ति से ही “दुर्गा” उत्पन्न हुई थी, जिनके द्वारा भयंकर असुरों का विनाश हुआ। आज भी अनेक प्रकार के पाप-तापों से, अनीति, अभाव और अविचारों से मानव जाति पीड़ित है, इनको हटाने के लिए इसे सहस्रों ऋत्विजों के सम्मिलित तप से एक ऐसी प्रचण्ड शक्ति का आविर्भाव होगा जो दुरितों का विध्वंस करके शान्तिदायक भविष्य का निर्माण करेगी।

इस युग का यह असाधारण, एक अभूतपूर्व यज्ञ है, इसके परिणाम अत्यन्त महान होंगे। इसके पीछे प्रभु की प्रचण्ड प्रेरणा एवं महान योजना सन्निहित है। इसमें सम्मिलित होकर साधना करना अपनी अलग अकेली साधना की अपेक्षा अनेक गुना उत्तम है। लंकाध्वंस के लिए वानरों को और गोवर्धन उठाने में ग्वाल बालों को जो श्रेय प्राप्त हुआ था, वह इस महान यज्ञ के ऋत्विजों को भी प्राप्त होगा। यों साधारण रीति से भी जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का आँचल पकड़ते है उन्हें आशाजनक परिणाम प्राप्त होता है। हमें अपने दीर्घ कालीन अनुभव के आधार पर यह सुनिश्चित विश्वास है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। परन्तु इस यज्ञ में सम्मिलित होकर साधना करने के सत् परिणाम की आशा तो बहुत अधिक की जा सकती है।

इस यज्ञ में किसने कितना भाग लिया? इसका परिणाम संसार के लिए कितना कल्याणकारक सिद्ध हुआ? सम्मिलित होने वालों को व्यक्तिगत रूप से क्या लाभ हुआ? इन सब बातों का एक सचित्र इतिहास भी बनेगा और युग युगान्तरों तक इसमें सम्मिलित होने वालों का यश प्रकाशवान रहेगा।

यह यज्ञ सम्भवतः 24 मास में पूरा हो जाने की आशा है। पर आवश्यकतानुसार यह तीन वर्ष भी चल सकता है। इसमें धार्मिक प्रवृत्ति के कोई भी द्विज, स्त्री-पुरुष प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकते है। कम से कम एक वर्ष तक सम्मिलित रहना आवश्यक है। अधिक चाहे जितने समय तक शामिल रहा जा सकता है। किसी भी मास की अमावस्या या पूर्णमासी से साधना प्रारम्भ करके इस यज्ञ में सम्मिलित हो सकते है।

इस यज्ञ में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति ‘ऋत्विज’ कहे जाएंगे। प्रत्येक ‘ऋत्विज’ को एक वर्ष तक नियमित रूप से यह पाँच व्रत पालन करने होंगे- (1) व्रत, (2) हवन, (3)उपवास, (4) आराधना, (5)ब्रह्म संदीप।

जप कम से कम गायत्री की 5 माला (540 मन्त्रों का) नित्य कराना चाहिये। और रविवार को 1 माला अधिक जपनी चाहिये। इस प्रकार एक वर्ष में 2 लाख जप पूरे होंगे। जिन सज्जनों को अवकाश और उत्साह हो उन्हें अधिक जप करना चाहिए। जो पूरा गायत्री मन्त्र न जप सकें वे लघु पंचाक्षरी गायत्री (ॐ भूभुर्वः स्वः) का साधन करें।

प्रत्येक मास की पूर्णमासी या अन्तिम रविवार को 108 गायत्री मन्त्रों का हवन करना चाहिए। जो सज्जन हवन न कर सकें वे हमारे लिए एक हजार अस्सी (दस माला) जप कर दें। बदले में हम उनके लिए 108 आहुतियों का हवन कर देंगे। एक वर्ष में सवा हजार आहुतियों का हवन होना चाहिए।

उपवास प्रत्येक रविवार को रखना चाहिए फल दूध पर रहने की जिन्हें सुविधा न हो वे एक समय बिना नमक का अन्नाहार लेकर उपवास कर सकते हैं।

गायत्री माता का चित्र स्थापित करके उसकी प्रतिदिन धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प आदि से पूजा आरती वन्दना आदि करने को आराधना कहते हैं। ऋत्विज के लिए आराधना भी आवश्यक है। जो सज्जन निराकार उपासक हों, वे धूप बत्ती आदि में अग्नि की ज्योति प्रज्ज्वलित करके उसे माता का प्रतीक मान कर उसकी पूजा आराधना कर लें।

ब्रह्म संदीप का अर्थ है गायत्री विद्या के गुप्त ज्ञान का समुचित प्रकाश करना।(1) गायत्री साहित्य का स्वयं सर्वांगपूर्ण स्वाध्याय बार बार करना जिससे इस विद्या के अनेकों गुप्त रहस्यों की भली प्रकार जानकारी हो जाए तथा (2) दूसरे धार्मिक प्रवृत्ति के सत्पुरुषों को अपना साहित्य देना, जिससे उनकी अभिरुचि भी इस परम कल्याणकारी मार्ग में हो। यह दोनों कार्य ब्रह्म संदीप कहलाते हैं।

हो सके तो पूरी 17 पुस्तकें जो करीब 21/- की हैं मँगा लेनी चाहिएँ। न हो सके तो 11 छोटी पुस्तकें जो 3/- की हैं मँगाकर अपना छोटा सा गायत्री पुस्तकालय बना लेना चाहिए। पुस्तकों की जिल्द बनवाकर रख लेनी चाहिए और अपने निकट जो भी धार्मिक प्रवृत्ति के मनुष्य हैं, उन्हें एक एक करके यह पुस्तकें पढ़ाना चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए कि वे भी सहस्रांशु यज्ञ में भागीदार बनें। इस प्रकार जितने ऋत्विज बढ़ाये जा सकें बढ़ाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए ताकि यज्ञ का इतना विशाल कार्यक्रम पूरा हो सके। एक वर्ष में कम से कम 5 ऋत्विज बना कर ब्रह्म संदीप पूरा करना भी प्रत्येक साधक का वैसा ही आवश्यक कर्तव्य है, जैसा कि जप, वचन, उपवास और आराधना को पूरा करना।

अपनी गायत्री पुस्तकें दूसरों को पढ़ने की सूचना के लिए नोटिस बाँटने से काम सरल हो जाता है। आपके गायत्री पुस्तकालय के लिए ऐसा विज्ञापन गाँव हो तो 250, शहर हो तो 500 हम अपने खर्च से छाप कर अपने पोस्टेज से आप के पास भेज सकते हैं। इसके लिए अपने मकान का पूरा पता और पुस्तकें मिलने का समय भी लिखना चाहिए, जो नोटिसों में छाप दिया जाए।

कुछ ऐसे प्रतिष्ठित एवं धार्मिक प्रवृत्ति के स्वाध्यायशील सज्जनों के पते हमें लिखने चाहिए जिन तक आप की पहुँच न हो पाती हो, उनको यहाँ से गायत्री उपासना के लिए प्रेरणा दी जायगी।

आश्विन और चैत्र की नवरात्रि में साधारण साधना की अपेक्षा कुछ अधिक जप और तप करना चाहिए।

नियत समय पर जप या हवन न कर सकें तो उतना हमसे उधार लेकर अपनी साधना पूरी की जा सकती है और हमारा उधार पीछे चुकाया जा सकता है।

इस यज्ञ में सम्मिलित होने वालों को एक अलग कागज पर अपना संकल्प लिख कर भेजना चाहिए, जिसमें (1) आरम्भ करने की तिथि, (2) प्रतिदिन की जप संख्या, (3) उपवास किस प्रकार करेंगे, (4) हवन पूर्णमासी को या महीने के अन्तिम रविवार को करेंगे। (5) आराधना किस प्रकार करेंगे, (6)ब्रह्म संदीप के लिए किस प्रकार, कितना कार्य करेंगे। यह सब बातें विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपना पूरा नाम, पूरा पता, आयु, वर्ण आदि का उल्लेख करना चाहिए और हर महीने अपने कार्य की सूचना मथुरा भेजते रहनी चाहिए जिससे यज्ञ की प्रगति का ठीक विवरण विदित होता रहे। कोई बात पूछनी हो तो जवाबी पत्र भेजना चाहिए।

यह यज्ञ सहस्र अश्वमेधों से अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें सम्मिलित होने वाले ऋत्विजों को जो शक्ति और शान्ति मिलेगी वैसी अकेली स्वतन्त्र साधना से मिलनी सम्भव नहीं है। इस सम्मिलित तपश्चर्या से संसार का भी लाभ होगा और अपना भी। लोक कल्याण के लिए किया हुआ पुण्य परमार्थ अपने लिए भी कल्याणकारक ही होता है। तप का धन ही मनुष्य जीवन का वास्तविक धन है। इसे संचित करना धन जमा करने से अधिक बुद्धिमानी की बात है।

हमारे अनेक मित्र हमसे बहुधा पूछते रहते हैं कि ‘हमारे योग्य कोई सेवा हो तो बताइए’। हमारी आवश्यकताएँ बड़ी सीमित हैं इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमें कभी किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए उन पूछने वाले सज्जनों को धन्यवाद देकर चुप हो जाते हैं। पर आज वह अवसर आया है, जिसके लिये हम अपने सभी मित्रों और समस्त संबन्धियों को सहायता और सेवा के लिए आमन्त्रित करते है, क्योंकि जितना बड़ा बोझ कन्धे पर लिया है वह अनेक साथियों के हार्दिक सहयोग से ही उठाया जाना सम्भव है। यदि यह यज्ञ पूरा न हुआ तो हमें मर्मान्तक कष्ट होगा और उसकी शान्ति के लिए हमें ऐसा प्रायश्चित करना पड़ सकता है जो हमारे प्रेमियों के लिए दुख का कारण होगा।

जप, हवन, उपवास की पूर्ति आसानी से हो जाएगी, पर सवालक्ष सत्पात्रों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान देना निश्चित ही कठिन है। इस कार्य में विशेष रूप से हाथ बटाने की अपने हर प्रेमी से हमारी हार्दिक प्रार्थना है।

इस महान यज्ञ में साझीदार बनने के लिए हम उन सभी आत्माओं को आमंत्रित करते हैं जिसके अन्दर दैवी प्रकाश काम कर रहा हो, जिनके अन्तःकरण में माता की दिव्य प्रेरणा काम कर रही हो। इस आमन्त्रण को स्वीकार करना, इस साझेदारी में सम्मिलित होना कितना श्रेयष्कर है इसकी कोई भी सत्पात्र परीक्षा कर सकता है।


Quotation

-आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना हमारा सबसे पहला और आवश्यक कर्त्तव्य है। आत्मज्ञान चरित्र द्वारा प्राप्त होता है। चरित्रवान् व्यक्ति सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह निर्भयता आदि व्रतों का पालन करते हुए देखे जाते हैं। वे प्राण दे देने पर भी सत्य को न छोड़ेंगे। स्वयं नरक जाएँगे, स्वयं दुःख उठाएंगे, परन्तु दूसरों को दुःख न देंगे।

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-बिना धर्म का जीवन, बिना सिद्धान्त का जीवन होता है, और बिना सिद्धान्त का जीवन वैसा ही है जैसा कि बिना पतवार का जहाज। जिस तरह बिना पतवार का जहाज इधर से उधर मारा-मारा फिरेगा और कभी उद्दिष्ट स्थान तक नहीं पहुँचेगा, उसी तरह धर्म हीन मनुष्य भी संसार में इधर से उधर मारा मारा फिरेगा और कभी उद्दिष्ट स्थान तक नहीं पहुँचेगा।

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-सबल की सबलता विरोधी को प्रेम से जीत लेने में है, मद से कुचल डालने में नहीं।


गायत्री मन्दिर की पुणय प्रगति

आप भी अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने में,

पीछ न रहिए।

गत मास के अड़क में श्री रामदास विष्णु पाटिल का गायत्री मन्दिर सम्बन्द्यी लेख प्रकाशित हुआ था। जिसमें इस पुण्य तीर्थ की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गयी थी। सचमुच यह एक अद्भुत अभाव है कि भारतीय संस्कृति आर्य सभ्यता, हिन्दू ज्ञान विज्ञान की उदूगम ज्ञान गंगा गायत्री--का भारत वर्ष में कोई ऐसा केन्द्रीय स्थान नहीं है जहाँ इस विद्या का साधन,अध्ययन,शोव,अन्वेषण,तप एवं आराधना की सुविधा हो।

गायत्री-1 भारत भूमि को भारतीय धर्म की आत्मा है। यह आत्मा जब से प्रसुप्त अवस्था में चली गई तभी से हमारा ज्ञान विज्ञान,बल,पौरुष,धन,यश सब कुछ लोगाया। जब वह आत्मा जागेगी तभी हमारे देश, धर्म एवं समाज का जागरण होगा। इस जागरण के लिये हमें गायत्री की शंखध्वनि का तुमुल नाद करना होगा। इस योजना के लिए एक केन्द्रीय तीर्थ की कितनी भारी आवश्यकता है, इन संबंध में इदो मत नहीं हो सकते।

ऐसे तीर्थ का निर्माण करना असाधारण पुण्य है। कारण की भारतीय धर्म की आत्मा को जगाने का आध्यात्मिक अनुष्ठान, जहाँ पर नियोजित हो, उस स्थान के निर्माताओं को इसी एक पुण्य से इतना महान फल मिल सकता है, जिसकी तुलना में अन्य सहस्रों पुण्य मिल कर भी हलके बैठें। यश की दृष्टि से देखा जाय ते भी उन महानुभावों को इतिहास में अमर रहने का अवसर मिलेगा। इस पुण्य तीर्थ द्वारा असंख्य आत्माओं का जो कल्याण होगा उसमें से एक एक कण भी ब्याज रूप से उन निर्माताओं को मिलता रहे तो उनके कल्याण के लिए पर्याप्त है। इस संवंध में जुलाई के अकं में श्री गरीवदास जी तथा नवम्बर के अें में श्री रामदास जी पटेल समुचित प्रकाश डाला है।

प्रसन्नता की बात है कि कई सुविधा सज्जनों का यह बहुत महत्व की प्रतीत हुई है और उन्होंने अपनी समर्थ के अनुसार अपनी श्रद्धाँ जलिभट की है। आर्थिक दृष्टि से लाचारण होते हुए भी जिन सज्जनों न इतना साहस किया है, उन्होंने एक प्रकार से धनी सज्जनों को चुनौती दी है कि वे चाहें तो अपने पैसे को सफल बनाने के इस अलभ्य अवसर से लाभ उठा सकते हैं, जिससे यज्ञ का, पुण्य का, लोकहित का, आत्म कल्याण का र्ध्मा वृद्धि का, ईश्वर उपासना का इतनी अधिक संमिश्रण हो ऐसे पुण्य कार्य कभी कभी ही सामने आते हैं और उनसे कोई विरले भाग्यशाली ही अपने आप को धन्य कर पाते हैं।

गायत्री तीर्थ निमार्ण में अपनी श्रद्धाँजलि अर्पित करना ऐसा ही अवसर है, जिनकी आत्मा में प्रेरणा हो, वे कंजूसी पर विजय प्राप्त करके माता के चरणों पर अपनी भेंट प्रस्तुत करें। प्राप्त हुई सहायताएं अखंड ज्योति में प्रकाशित होती रहेंगी।

इस मास में प्राप्त हुई सहायताएं-

501) श्री हरमान भाई सोमाभाई पटेल सापदानपुरा, 120)श्रीमती प्रेमकली देवी धर्मपत्नी बा. ओश्मप्रकाश जी मुख्तार, नुकड़ 101) श्री जे. एच. हैजस्टे अहमदाबाद 101) श्री अयोया प्रसाद जी दीक्षित खलासी लेन, कानपुर, 101) श्री मुनिनाथ सिंह जी सब इंस्पेक्टर पुलिस, बायरलैस इंचार्ज, मिर्जापुर 11) रश्री रामनिवास खंडेलवाल, सोहिवगंज 10) श्री वृज मोहन जी गुप्ता, हजारी बाग, 10) मुन्शी वैजनाथ जी तिवारी, जबलपुर, 5) महात्मा निर्भयानन्द जी अकटईया।


मानव से कुछ


मानव से कुछ (Kavita)

मानव होकर मानवता से तुमने कितना प्यार किया है।

इस जीवन में तुमने कितना औरों का उपकार किया है॥

सुन पाये हो इन कानों से जग की कितनी करुणा कहानी।

डाल सके पर दुख-दावा में तुम कितना आँखों का पानी॥

कितनों के अवलम्ब बने हो, कितनों को भर अंक मिलाया।

स्वयम् गरल पी-पी कर कितना औरों को पीयूष पिलाया॥

बन कर निर्देशक कितनों को तुमने भली राह बताई।

कितनों के तमसा वृत मन में तुमने जीवन ज्योति जगाई॥

लोभ, मोह, मद कितना छोड़ा, नाता काम-क्रोध से तोड़ा।

विषय-वासनाओं से हट कर कितना प्रेम प्रभू से जोडा॥

जीवन का क्या अर्थ यहाँ है, क्यों कंचन सा तन पाया है।

क्या इसको कुछ समझ सके हो क्यों नर भूतल पर आया है।

क्या अपने की परिभाषा में सीमित है परिवार तुम्हारा।

क्या न सुनी यह अमृत वाणी है ‘कुटुम्ब संसार तुम्हारा’॥

कितनी त्याग करी पर निन्दा कितना अपना अन्तर देखा।

कितना रख पाये हो अब तक अपने पाप पुण्य का लेखा॥

*समाप्त*

(श्री देवी प्रसाद र्श्मा ‘दिव्य’)