सन्तों की अमृत वाणियाँ।


सन्तों की अमृत वाणियाँ

साँई इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय॥

कागो काको धन हरे, कोयल किसको देत।

लसी मीठे वचन से। जग अपनों कर लेत॥

तरुवर, सरबर, सन्तजन, चौथौ वरसे मेह।

परमारथ के कारणों, चारों धारी देह॥

तुलसी आय संसार मे, कर लीजे दो काम।

दिन का टुकड़ा भली, लेन को हरि नाम॥

तुलसी इस संसार में, भाँति-भाँति के लाग।

सबसे हिलमिल चलिये, नदी-नाव संयोग॥

लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर।

लघुता बिन प्रभुता नहीं, लघुता घट में पूर॥

हारा उसको हरि मिला, जीता उसको यम।

कहत कबीर सुणो भाईसाधो, सबसे बड़ी है गम

चिड़ी चोंच भर लेगई, नदी न घटियो नीर।

दान दिये धन ना घटे, कह गये भक्त कबीर॥

दया धर्म हिरदे बसै, बोले अमृत बैन।

हो ऊंचे जानिये, जिनके नीचे नैन॥

हरि सा हीरा छाड़ि के, करे और की आस।

जो नर यमपुर जाइ हैं, सत्भाषे रैदास॥

जाकी जैसी बुद्धि है, वैसा कही बताय।

उसका बुरा न मानिये, अधिक कहाँ से लाय॥

आत्म समर्पण होत जहाँ, जहाँ विशुभ्र बलिदान।

पर मिटवे की साध जहाँ, तहाँ है श्री भगवान॥

मन, बड़ाई, प्रेमरस, गरुआपन और निहुँ।

पाँवौ तब ही गये, जब कहा-कछ देहुँ॥

सहज मिले से दुग्ध सम, माँगे मिले से पानी।

कहे कबीर वह रक्त सम, जिसमें खींचा तानी॥

तिय माता सम गिने, पर धन धूरि समान।

अपने सम सबको गिने, यही ज्ञान विज्ञान॥

रहिमन विपदा हूँ भली, जो थोड़े दिन होय।

हित अहित या जगत में, जानि परे सब कोय॥

अस्थि, चर्ममय, देह मम, तामें जैसी प्रीत।

वैसी जो श्री राम में, हो तो क्यों भवभीति॥

उद्यम कबहुँ न छोड़िये, पर आशा के मोद।

गगरी कैसे फोड़िये, उनयो देखि पयोद॥

पर नारी पैनी छुरी, कोई मत लागो अंग।

रावण के दस शिर गये, पर नारी के संग॥

पर नारी पैनी छुरी, नीन ठौर ते खाय।

धन हरे, योवन हरे, मरे नरक ले जाय॥

माला मन से लड़ पडी, क्या फेरे तू मोहि।

तेरे हृदय में साँच हैं, तो राम मिलादू तोहि॥

मनका फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।

करका मन का छोड़िके, मन का मन का फेर॥

तीर्थ गये जो तीन जन, मन चंचल चित चोर।

एका पाप न काटिया, सौ मन लादा और॥

निरवल युगल मिलाय करि, काम कठिन बनजात।

अंध कंध पर बैठि के, पंगु यथा फल खात॥

अति परिचय ते होत हैं, अरुचि, अनादर, भाय।

मलिया गिरि की भीलनी, चन्दन देत जराय॥

अति अनीति लहिये न धन, जो प्यारो मन होय।

पाये सोने की छुरी, पेट न मारत कोय॥

अपनी पहुँच विचार के, करतब करिये दौर।

तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर॥

अर्ध नाश गृहणी चरित, औ मन को संतोप।

नीच वचन अपमान को, बुध जन कहत न आप॥

अतिहिं काप कटु वचन हू, दारिद नीच मिलान।

सुजन बैर अकुलिन टहल, यह पर नर्कनिशान॥

अस्परधा बलवन्त सों, परनारी परतीत।

स्वजन बैर, अकुलिन टहल, यही मृत्यु की रीति॥

आवत ही हर्षे नहीं, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइये, कंचन बरसे मेह॥

(श्री हरखचन्द्र जैन, गुन्तूर)

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


प्रयाण-गीत


प्रयाण-गीत

सुलगता पवन है, धधकता गगन है, धरा जल रही, मैं चला जा रहा हूँ।

निरन्तर रहे लक्ष्य ही दृष्टि-पथ में,

लिये मैं अमिट राग, आगे बढूँगा।

चलूँगा विषम कराटाकों को कुचलता,

शयन सान्द्र चिनगारियों पर करूंगा॥

निविड़ हैं तिमिर, पर लिये लौ अचंचल, उसी ओर हँसता चला जा रहा हूँ।

उमड़कर घटायें करें वन्हि वर्षा,

गिरें बिजलियाँ व्योम-तल से तड़पकर।

रहें फूटते पाँव के तप्त छाले,

रहूँगा प्रगतिमान मैं इष्ट पथ पर॥

शिला-भृंगशत्त चुभे जा रहे किन्तु, मैं मुस्कराता चला जा रहा हूँ।

सुधा के कलश की नहीं चाह मुझको,

विषम प्यास मेरी चुभेगी गरल से।

खिली वाटिकाएँ डिगा क्या सकेंगी,

अमय खेलता मैं अनिल से, अनल से॥

मुझे हार भी हार हैं,मै निरन्तर, विजय-गीता गाता चला जा रहा हूँ।

(श्री महाबीर प्रसाद विद्यार्थी, बी. ए. साहित्यरत्न)


ईश्वरीय सत्ता का तत्व ज्ञान।

ओमित्येव सुनामध्येय मनघं विश्वात्मनो ब्रह्मणः सर्वेष्वेव हितस्य नामसु वसोरेतत्प्रधानं मतम्।

यं वेदा निगदन्ति न्याय निरत श्री सच्चिदानंदकम्॥ लोकेशं समदर्शिनं नियमिनं चाकार हीनं प्रभुम्॥

अर्थ- जिसको वेद न्यायकारी, सच्चिदानंद संसार का स्वामी, समदर्शी, नियामक, और निराकार कहते हैं। जो विश्व की आत्मा हैं। उस ब्रह्म के समस्त नामों से श्रेष्ठ नाम, ध्यान करने योग्य “ॐ” यह मुख्य नाम माना हैं।

गायत्री मंत्र के प्रारम्भ में ‘ॐ’ लगाया जाता है। ‘ॐ’ परमात्मा का प्रधान नाम है। ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है। “एकं सद्विप्रा बहुधा वद्न्ति” उस एक ही परमात्मा की ब्रह्मवेत्ता विविध प्रकार से कहते हैं। विभिन्न भाषाओं और सम्प्रदाओं में उसके अनेक नाम हैं। एक-एक भाषा में ईश्वर के पर्यायवाची अनेक नाम हैं फिर भी वह एक ही है। इन नामों में ‘ॐ’ को प्रधान इसलिए माना हैं कि प्रकृति की संचालक सूक्ष्म गतिविधियों को अपने योग बल से देखने वाले ऋषियों ने समाधी लगाकर देखा है कि प्रकृति के अन्तराल में प्रतिक्षण एक ध्वनि उत्पन्न होती है जो “ॐ” शब्द से मिलती जुलती हैं। सूक्ष्म प्रकृति इस ईश्वरीय नाम का प्रतिक्षण जप और उद्घोष करती है इसलिए यह अकृत्रिम, दैवी, स्वयं घोषित, ईश्वरीय नाम सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।

ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ, परम स्वाभाविक, स्वयं घोषित नाम ‘ॐ’ गायत्री के आरम्भ में इसलिए लगा है कि इस महामन्त्र की उपासना करने वाले, इस महा शक्ति की आराधना करने वाले साधक ईश्वरीय महाशक्ति को आगे रखकर, अग्रसर हों, परमात्मा को साक्षी लेकर जो कार्य किये जाते हैं वही कल्याण कारक होते हैं।

आस्तिकता का अर्थ है-- सतोगुणी, दैवी, ईश्वरी, परमार्थिक भावनाओं को हृदयंगम करना। नास्तिकता का अर्थ है- तामसी, आसुरी, शैतानी, भोगवादी, स्वार्थपूर्ण वासनाओं में लिप्त रहना। यों तो ईश्वर भले बुरे दोनों तत्वों में हैं पर जिस ईश्वर की हम पूजा करते हैं, भजते हैं, ध्यान करते हैं यह ईश्वर सतोगुण का प्रतीक है। जैसे किसी सुविस्तृत राष्ट्र ध्वज (झंडा) होता हैं। कोई विदेशी, किसी देश के झंडे का मान या अपमान करे तो यह उस राष्ट्र का मान या अपमान समझ जायगा जिसका कि वह झन्डा हैं। इसी प्रकार मानव प्राणियों के अन्तःकरण में निवास करने वाली व्यापक सात्विकता का प्रतीक वह ईश्वर है जिसकी हम पूजा करते हैं।

ईश्वर की प्रतिष्ठा, पूजा, उपासना, प्रशंसा, उत्सव, समारोह, कथा, यात्रा, लीला आदि करने का तात्पर्य है--सतोगुण के प्रति अपना अनुराग प्रकट करना, उसको हृदयंगम करना, उसमें तन्मय होना। इस कृपा से हमारी मनोभूमि पवित्र होती हैं और हमारे विचार तथा कार्य ऐसे हो जाते हैं जो हमारे व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में स्थायी सुख शान्ति की सृष्टि करते हैं। ईश्वर उपासना का महा प्रसाद साधक की अन्तरात्मा में सतोगुण की वृद्धि के रूप में, तत्क्षण मिलना आरम्भ हो जाता हैं।

गायत्री गीता के उपरोक्त प्रथम श्लोक में ईश्वर की अन्य अनेक विशेषताएं बताई गई हैं। वह न्यायकारी, समदर्शी, नियामक तथा निराकार हैं। विश्व की आत्मा है। विश्व के समस्त प्राणियों में आत्मा रूप से वह निवास करता है। मन बुद्धि चित अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय विकृत हो जाने से अज्ञान और माया का, स्वार्थ और भोग का, मैल चढ़ जाने से अनेकों मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों में ग्रस्त देखे जाते हैं, फिर भी उनका अन्तरात्मा ईश्वर का अंश होने के कारण भीतर से उन्हें सत्मार्ग पर चलने का आदेश देता रहता हैं। यदि उस अन्तरात्मा की पुकार को सुना जाय, उसके संकेतों पर चला जाय तो बुरे से बुरा मनुष्य भी थोड़े ही समय में श्रेष्ठतम महात्मा बन सकता है। गीता में भगवान ने कहा है कि- “सब छोड़कर मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा।” अन्तरात्मा, की परमात्मा की शरण में जाने से, आत्म समर्पण करने से, दैवी प्रेरणाओं को हृदयंगम करने से, मनुष्य ईश्वर का सच्चा भक्त बनता है। भक्त तो भगवान का प्रत्यक्ष रूप है।

चूँकि भगवान हर एक की आत्मा में निवास करता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को मूलतः दुष्ट नहीं मानना चाहिए, न उससे द्वेष ही करना चाहिए। दुष्ट विचारों और कार्यों से ही हमारा द्वेष होना चाहिए। दुष्टता एक रोग है, रोग को मार भगाने और रोगी को जीवित रखने के लिए काफी प्रयत्न किया जाता है। ऐसा ही प्रयत्न दुष्टता को मिटा कर दुष्ट मनुष्य का सज्जन बनाने के लिए होना चाहिए। प्रयत्न करने पर बुराइयाँ दूर हो सकती हैं क्योंकि आत्मा का मूल स्वरूप देवी है। उसमें ईश्वर का निवास है। फोड़ा चिरवाने की तरह दंड द्वारा भी सुधार किया जा सकता है पर घृणा एवं द्वेष को किसी के लिए भी मन में स्थान नहीं देना चाहिए। ईश्वर सर्वव्यापी है। इसलिए वह एक देशीय नहीं हो सकता। वह आत्म रूप हैं इसलिए निराकार हैं। फिर भी यह सब पसारा उसी का होने से, सब में समाया होने से साकार हैं। किन्हीं महापुरुषों में उसकी विशेष शक्तियाँ, विशेष कलाएं होती हैं तो उन्हें उतनी कलाओं का अवतार कहते हैं। परशुराम जी में तीन कलाएं, राम में बारह कलाएं, कृष्ण में सोलह कलाएं बताई गई हैं। एक ही समय में कई अवतार, कई महापुरुष, हो सकते हैं। रामचन्द्र जी और परशुराम जी एक ही समय में दो अवतार थे। गीता के अनुसार “जब अधर्म की वृद्धि हो जाती है तब धर्म की स्थापना के लिए अवतार होते हैं।” वे अवतारी महापुरुष अकेले ही सब कुछ नहीं कर लेते वरन् जनता को नवीन विचार एवं उत्साह देकर जागृत करते हैं और अनेक सहयोगियों की सहायता से उस ईश्वरीय उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। कृष्ण द्वारा कौरवों का नाश, राम द्वारा राक्षसों का नाश, अकेले ही नहीं किया था वरन् उनके विरुद्ध अपार जन समूह खड़ा करके ही सफलता प्राप्त की गई थी। बुराइयों के निवारण एवं अच्छाइयों के स्थापन के लिए जहाँ भी कार्य होता हैं, ईश्वरीय प्रेरणा से ही होता हैं। अवतारी सत्पुरुष उसे पूरा करने में जुट जाते हैं और अन्त में जन सहयोग से वह उद्देश्य पूरा होता है। ऐसी अवतारी प्रक्रिया छोटे मोटे रूप में सदा होती रहती है और बड़े रूप में कभी कभी विशेष आवश्यकता के समय होती है। अवतारी कार्यों में सहायता करना, हनुमान अर्जुन की तरह अपने को यश तथा प्रतिष्ठा का भागी बना लेना है।

परमात्मा खुशामद पसंद नहीं। किसी की निन्दा स्तुति की उसे आवश्यकता नहीं। वह किसी पर प्रसन्न अप्रसन्न नहीं होता। पूजा उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है जिसके करने से हमारा आत्मबल बढ़ता है। सतोगुण की मात्रा में वृद्धि होती है ईश्वर को सर्व व्यापक समझने वाला पापों से डरेगा। कोतवाल सामने खड़ा हो तो चोर प्रकृति का मनुष्य भी उस समय साधु सा आचरण करता है। सबसे बड़े कोतवाल ईश्वर को जो अपने अन्दर बाहर चारों ओर व्यापक देखता हैं वह उसके दंड से डरेगा और पाप न कर सकेगा। प्राणिमात्र में ईश्वर को व्यापक देखने वाला व्यक्ति सब के साथ सद्व्यवहार ही कर सकता है। यह ईश्वरीय दृष्टि प्राप्त करना, ईश्वराधना का प्रधान उद्देश्य है। ध्यान, प्रार्थना, पूजा, कीर्तन, जप आदि ऐसी मनोवैज्ञानिक क्रियाएं हैं जिनके द्वारा मनोभूमि में चिपके हुए अनेकों कुसंस्कार छूटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कारों की स्थापना होती है। ईश्वर के नाम पर लोक हितकारी कामों के लिए दान देना अपनी ही व्यक्तिगत और सामूहिक सतोगुणी उन्नति करना हैं।

वह समदर्शी और न्यायकारी है। सभी पुत्र उसे परम प्रिय हैं और सभी समान हैं। निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह वह सबको उनके कर्मों के आधार पर फल देता हैं। अपने भले बुरे कर्मों का परिपाक ही कालान्तर में प्रारब्ध, भाग्य, कर्म रेखा ईश्वर की कृपा, देवी वरदान, ग्रहदशा, आदि के रूप में प्रकट होता है। कर्म चाहे आज का हो चाहे पुराना, उस का फल हमें मिलेगा। ईश्वर अपनी ओर से किसी के साथ विशेष क्रोध या प्रेम प्रकट नहीं करता। उसने सब को अत्यन्त बहुमूल्य तथा शरीर, अत्यन्त विलक्षण वस्त्र मस्तिष्क, संसार से उपस्थित अत्यंत सुखदायिनी वस्तुएं देकर अपनी दयालुता का परिचय दिया है। यह हमारा काम हैं कि अपने भले बुरे कर्मों द्वारा अपने जीवन को सुखी या दुखी चाहे जैसा बनायें। वह किसी की क्रियाशीलता में हस्तक्षेप नहीं करता, अपनी इच्छानुसार काम करने के लिए सबको पूर्ण स्वतन्त्र छोड़ दिया है, पर कर्म फल से कोई बच नहीं सकता। वह हर एक को अवश्य भुगतना पड़ता है। न्यायाधीश ईश्वर के न्याय से कोई भी बच नहीं सकता।

वह नियामक हैं। स्वयं नियम रूप हैं, उसका हर काम नियमपूर्वक हो रहा है। ग्रह नक्षत्र क्षण भर आगे पीछे उदय अस्त नहीं हो सकते। गेहूँ से गेहूँ ही उत्पन्न होता हैं, वस्तुएं अपने-अपने गुण धारण किये रहती हैं। कभी कभी जो अनियमितता दिखाई देती है वह भी किन्हीं सूक्ष्म नियमों आधार पर ही होती हैं। जो व्यक्ति ईश्वरीय नियमों पर चलते हैं, प्राकृतिक जीवन बिताते हैं, कर्तव्य धर्म में स्थिर रहते हैं वे ईश्वर की आनन्द की सृष्टि का आनन्द आस्वादन करते हैं जो उन नियमों को उल्लंघन करते हैं वे हानि उठाते हैं। अग्नि बंडी दयालु हैं वह हमारा शीत निवारण करती हैं। भोजन पकाती हैं, वाष्प यंत्र चलाती हैं अन्य अनेक प्रकार लाभ पहुँचाती हैं पर यदि अग्नि से नियम विरुद्ध हुआ जाय तो हाथ जला देगी। बिजली से हमें अनेकों लाभ होते हैं पर उसे गलत तरह छुएं तो प्राण लेने में कोई रिआयत नहीं करेगी। उसी प्रकार ईश्वर हमें अनेक सुख देता हैं पर यदि उसके नियमों का उल्लंघन करें तो वह नरक की भयंकर अग्नि में तपा डालने वाला क्रूर यमराज भी बन जाता है। उसके नियमों पर चलना ही ईश्वर की सर्वोत्तम पूजा है।

साधारण मनुष्यों का अन्तःकरण आत्मा कहलाता है। अविकसित होने के कारण उसकी जीव संज्ञा है। जब उसका विकास होता है तो अहंभाव विस्तृत होकर बसुधैव कटुम्बकम् के रूप में परिणत हो जाता है। सब अपने आत्मीय दिखाई पड़ने लगते हैं, सबमें आत्मा और आत्मा में सब, समाये हुए दिखाई पड़ते हैं तो वह लघु आत्मा परम आत्मा (परमात्मा) महान आत्मा (महात्मा) बन जाता है। विश्व की दृष्टि में आत्मा ही विश्वात्मा या परम आत्मा हैं। इसे ही समाज पुरुष, विराट भगवान, जनता जनार्दन, आदि नामों से भी पुकारते हैं। विश्व मानव की उपासना, समाज पुरुष की सेवा, भगवान ‘ॐ’ की ही आराधना है। गीता के 10 वे अध्याय में भगवान ने बताया है कि- वृक्षों में पीपल, पशुओं में गौ, मनुष्यों में ब्राह्मण, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ग्रहों से सूर्य, इंद्रियों में मन, पर्वतों में हिमालय, पक्षियों में गरुड़, नदियों में गंगा, मन्त्रों में गायत्री मंत्र, ऋतुओं में बसन्त मैं हूँ। अर्थात् जो जो श्रेष्ठ, सात्विक, सुदृढ़ एवं उपयोगी विभूतियाँ हैं उनमें मेरे ही अंश की अधिकता हैं। जिन विचार धाराओं में, व्यक्तियों में, वस्तुओं में इस प्रकार के तत्व अधिक हैं उनमें ईश्वरीय कलाओं की विशेषता अनुभव की जा सकती हैं। जहाँ प्रभु का निवास होगा वहाँ निर्णय पूर्वक श्रेष्ठता, सात्विकता, दृढ़ता एवं परोपकार की प्रधानता होगी। तलाश करने पर अनेक स्थानों पर हम प्रभु का ऐसा निवास ढूँढ़ सकते हैं और उसकी झाँकी करके अपने को तृप्त कर सकते हैं। इसीलिए कहा गया हैं कि सत्संग में भगवान का निवास होता हैं। प्राचीन काल में सत्पुरुषों का निवास अधिक रहने के कारण तीर्थों की महिमा हुई भी और तीर्थयात्रा को पुण्य फल माना जाता था। आज भी जहाँ महापुरुषों का निवास है वह स्थान प्रत्यक्ष तीर्थ ही हैं।

राम, कृष्ण आदि की सुन्दर छवियाँ एवं उनकी गुणावली का ध्यान करना अपनी, अन्तिम उन्नति का आदर्श एवं लक्ष्य स्थापित करना हैं। बड़े बड़े भवन बनाने होते हैं तो पहले उनका छोटा मॉडल बना लिया जाता हैं, उस के आधार पर विशाल भवन बनता हैं। हमें स्वास्थ्य, सौंदर्य, बल, गुण, विशेषता आदि की दृष्टि से आत्म निर्माण के जिस लक्ष्य तक पहुँचना हैं उस मॉडल से अनन्य प्रेम एवं प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न करने के लिए भगवान की कल्पित मूर्तियों का ध्यान किया जाता है। मंदिर मठ आदि आत्मिक ज्ञान के प्रचार केन्द्र हैं। उस केन्द्र के कार्यकर्ताओं की सम्मानपूर्वक आजीविका चलाने के लिए मंदिरों में भोग, चढ़ावा, पूजा आदि की विधि व्यवस्था बनाई गई थी। आज वह सब पद्धतियाँ बड़ी गड़बड़ हो गई हैं। अनाचार धूर्तता और मूर्खता का बोल बाला हैं पर प्रयत्न करने पर आदर्शों को पुनः सजीव किया जा सकता है, और भगवत् पूजा के आधार पर धर्म, समाज, राष्ट्र संस्कृति एवं सामाजिक सदाचार के पुनः उद्धार के विशाल आयोजन किये जा सकते हैं। इसके लिए मन्दिरों, मठों एवं पुरोहितों को सुधार कर उनसे केन्द्र बिन्दु का कार्य लिया जा सकता है।

गायत्री का प्रथम अक्षर ‘ॐ’ हमें इन्हीं बातों की शिक्षा देता है। यह ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ चेतना के साथ संबंधित होने की साधना अपने आप होती चलती है। यह ईश्वर का स्वयं घोषित सबसे छोटा नाम है। साथ ही गायत्री गीता में बताया हैं कि वह ईश्वर न्यायकारो, प्रभु, समदर्शी, अविनाशी, चैतन्य, आनंदस्वरूप, नियमरुप, निराकार एवं विश्व आत्मा हैं। इन नामों में जो महत्वपूर्ण तत्व ज्ञान छिपा हुआ है उसे जान कर उस को आचरण रूप से लाकर हमें ॐ की उपासना करनी चाहिए।

‘ॐ’ में तीन अक्षर मिले हुए हैं अ, उ,म्। ‘अ’ का अर्थ हैं आत्म परायणता, शरीर के विषयों से मन हटा कर आत्मानंद में रमण करना। ‘उ’ का अर्थ हैं- उन्नति, अपने को शारीरिक मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवं आत्मिक सम्पत्तियों से सम्पन्न करना। ‘म’ का अर्थ हैं- महानता, क्षुद्रता संकीर्णता, स्वार्थ परता, इंद्रिय लोलुपता को छोड़ कर प्रेम, दया, उदारता, सेवा, योग, संयम एवं आदर्श के आधार पर जीवन यापन की व्यवस्था बनाना। इन तीनों अक्षरों में जो शिक्षा है उस अपना कर व्यवहारिक रूप से ‘ॐ’ की, ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।


आदर्श जीवन जिएं

(ले.-श्री स्वामी शिवानन्द जी)

जीवन क्या है? खाना, पीना, पचाना, साँस लेना आदि शरीर में नित्य होने वाले काम मात्र ही क्या जीवन हैं? अथवा क्या धन सम्पत्ति या नाम यश की प्राप्ति के लिए तरकीबों और उपायों का सोचना मात्र ही जीवन है? अथवा क्या सृष्टि की परम्परा को चलाने के लिये सन्तानोत्पत्ति करना ही जीवन है? वैज्ञानिक लोग कुछ भिन्न ही अर्थ लगाते हैं और श्री शंकराचार्य सरीखे दार्शनिक तो बिल्कुल ही भिन्न अर्थ लगाते हैं।

जीवन दो प्रकार का होता है, एक तो भौतिक तथा दूसरा आध्यात्मिक। वैज्ञानिकों का कथन है कि विचारना, जानना, इच्छा करना, साँस लेना इत्यादि जो कार्य हैं वही जीवन है। परन्तु यह जीवन अमर नहीं होता। ऐसा जीवन दुःख, सुख, चिन्ता, आपत्ति, विपत्ति, पाप, बुढ़ापा, रोग इत्यादि का आखेट बना रहता हैं। अतएव प्राचीन महर्षियों, योगियों और तपस्वियों ने, जिन्होंने अपने वित्त और इन्द्रियों को अपने वश में करके त्याग और तप, आरोग्य और अभ्यास इत्यादि के बल से, अपने आत्मा को पहचान लिया है, निश्चयपूर्वक कहा है कि जो आत्मा में रत है केवल मात्र वही स्थायी और असीम आनन्द एवं अमरत्व प्राप्त कर सकता हैं। उन्होंने मनुष्यों के भिन्न भिन्न स्वभाव, योग्यता और रुचि के अनुसार आत्म-साक्षात्कार के लिए विभिन्न निश्चित मार्ग बतलाया है। जिन लोगों को महात्माओं में, वेदों में और गुरु के वचनों में अटूट श्रद्धा है वे आध्यात्मिक और सत्य के मार्ग पर निर्भीक विचरते हैं और स्वतन्त्रता, पूर्णता या मोक्ष प्राप्त करते हैं, वे लौट कर फिर मृत्युलोक में नहीं आते, वे सच्चिदानन्द ब्रह्म में या अपने ही स्वरूप में स्थिर रहते हैं। यही मानव-जीवन का ध्येय एवं परम उद्देश्य है, यही अन्तिम लक्ष्य है, जिसके अनेक नाम यथा--निर्वाण, परमगति, परमधाम और ब्राह्मी स्थिति। आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।

परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम भौतिक जीवन की उपेक्षा करें! भौतिक जगत भी परमेश्वर या ब्रह्म का ही स्वरूप हैं जिसको कि उसने अपनी लीला के लिए बनाया है। अग्नि और उष्णता, बरफ और शीत, पुष्प और सुगन्धित की भाँति जड़ और चेतन अभिन्न और एक हैं। ब्रह्ममय शाश्वत जीवन प्राप्त करने के लिये भौतिक जीवन एक निश्चित साधन हैं। संसार आपका एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं, पंचतत्व आप के गुरु हैं। प्रकृति आपकी माता और पथ-प्रदर्शिका हैं, वही आपकी ‘मूक-शिक्षिका’ हैं। यह संसार दया, क्षमा, सहिष्णुता, विश्व-प्रेम, उदारता, साहस, धैर्य महत्वाकाँक्षा इत्यादि दिव्य गुणों के विकास के लिये एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षालय हैं। यह संसार आसुरी स्वभाव से युद्ध करने के लिए एक अखाड़ा है और अपने भीतर की दैवी-शक्ति को प्रकाश में लाने के लिये एक दिव्य क्षेत्र है। गीता और योग-वाशिष्ठ की मुख्य शिक्षा यही है कि मनुष्य को संसार में रहते हुए आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए। जल में कमलपत्र की भाँति संसार में रहते हुए भी उसके बाहर रहिये। स्वार्थ, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि नीच आसुरी स्वभाव को त्याग कर मानसिक त्याग और आत्म-बलिदान का दिव्य स्वभाव धारण करिये।

क्या जीवन में खाने पीने और सोने से अधिक उत्तम अन्य कोई (उद्देश्य) है ही नहीं? मानव-योनि प्राप्त करना दुष्कर है, अतएव इसी जीवन में आत्मा को प्राप्त करने की भरपूर चेष्टा करिये। राजा महाराजाओं को भी काल कवलित कर लेता है। आज युधिष्ठिर, अशोक, बाल्मीकि, शेक्सपियर, नेपोलियन आदि कहाँ हैं? इसीलिये यौगिक साधनाओं में लग जाइये, तभी आप परमानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे। ताश, सिनेमा और धूम्रपान में व्यर्थ समय को बिताने से क्या आपको असली शाँति मिल सकती है? इस साँसारिक जीवन में इन्द्रियलोलुपता और विषय-वासना के क्षणिक सुख में भटकते रहने से क्या, आपस के लड़ाई झगड़े में या व्यर्थ के बकवास में क्या आपको सच्चा आनन्द मिल सकता है?

अपने आदर्श और लक्ष्य तक पहुँचने के लिये संग्राम करते रहना ही जिन्दगी है। इस संग्राम में विजय प्राप्त करना ही जीवन है। अनेक प्रकार की जागृतियों को ही जीवन कहते है। मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करिये, ये ही आपके असली शत्रु हैं। अपनी वाह्य और पुरानी बुरी आदतों तथा कुविचारों को, कुसंस्कारों और कुवासनाओं को अवश्य जीतना होगा, इन पैशाचिक शक्तियों से युद्ध करना होगा और विजय प्राप्त करनी होगी। अधःपतन की ओर ले जाने वाली वासनाओं पर पूर्ण नियंत्रण रखना होगा।

आपका जन्म ही आत्म-साक्षात्कार करने के लिए हुआ है। नियमित रूप से संकीर्तन करिये ओर आत्मिक सुख कर अनुभव करिये। निष्काम कर्म के द्वारा अपने मन और बुद्धि को शुद्ध करिये। इन्द्रिय-निग्रह से अपने ही स्वरूप में स्थिर होइये। जीवन संग्राम में जब आप पर प्रतिदिन चोटें पड़ती हैं, जब आप धक्के खाते हैं। तभी मन आध्यात्मिक पथ की ओर ठीक झुकता है और तब साँसारिक विषयों से अन्यमनस्कता उत्पन्न होती है, और अरुचि होती है, इस प्रपंच से उद्धार पाने की उत्कृष्टता जागृत होती है, विवेक और वैराग्य होता है। अतएव गम्भीर धारणा और ध्यान में लग जाइये।

मनुष्य की आयु अल्प है और समय तीव्र गति से चला जा रहा है। संसार विपदाओं से भरी हैं। अतएव अविद्या ग्रन्थि को काट कर निर्वाणिक आनन्दामृत का छक कर पान करिये।

आध्यात्मिक जीवन निरोगल्प नहीं है, केवल आदेश मात्र नहीं हैं। यही सच्चा आत्म स्वरूप जीवन हैं, यह विशुद्ध आनन्द और सुख का अनुपम अनुभव है। इसी को पूर्णता-प्राप्त जीवन कहते हैं। एक स्थिति ऐसी होती हैं जहाँ सदा शाश्वत शान्ति ओर केवल अनन्त आनन्द ही आनन्द हैं, परमानन्द हैं। वहाँ न तो मृत्यु हैं और न वासनायें ही वहाँ न दुःख हैं न दर्द, भ्रम हैं न शंका। क्या आप इस अक्षय आनन्द और ‘परम सुख’ के अमरत्व की प्राप्ति के लिए लालायित नहीं है? यदि हैं तो आइये अपने मन और इन्द्रियों पर संयम रखिये, सद्गुणों को सीखिये, आत्मा के सच्चे स्वरूप को जानने की चेष्टा करिये तभी आप उस अतीव गम्भीर असीम आनन्द एवं अमरत्व को पा सकेंगे, केवल तभी आप अमर पद तक पहुँच सकेंगे। इस शरीर को ही आत्मा समझ लेना सबसे बड़ा पाप है, इस भ्रमात्मक भाव को त्याग दीजिये।साँसारिक महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए उपाय करना, तरकीबों का सोचना, विचारना, झूठे मनसूबे बाँधना ख्याली पुलाव बनाना छोड़िये, चिर-पालित मायाविनी आशाओं को तिलाँजली दीजिये, वासनाओं और इच्छाओं का दमन कर उनसे ऊपर उठिये। बुद्धि से काम लीजिए उपनिषदों का मननपूर्वक अध्ययन करिये। नियमित रूप से नित्य निदिध्यासन करिये।

अविद्या और अज्ञान के गहन अन्धकूप से बाहर निकलिए और ज्ञानरूपी सूर्य की जगमगाती ज्योति में स्नान करिए। इस ज्ञान में दूसरों को भी साथी बनाइये। अपवित्र इच्छायें और अविद्या आपको बहका लेती हैं। अतः इसे भी कभी मत भूलिये कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य और अन्तिम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार करना ही है। झूठे बाह्य आडम्बरों और माया के मिथ्या प्रपंचों में मत फसिये। कल्पना के मिथ्या स्वप्नों से जागिये और थोथे, सारहीन प्रलोभनों के जाल में न फंसकर ठोस और जीती-जागती असलियत को ही पकड़िये। अपने आत्मा से प्रेम करिये क्योंकि आत्मा ही परमात्मा या ब्रह्म हैं, यही सजीव मूर्तिमान सत्य है। आत्मा ही शाश्वत हैं। अतः आत्मा में ही स्थित होइये और तत्वमसि आप ही ब्रह्म हैं इसे पहिचानिये। यही वास्तविक जीवन है।

कर्मयोग का अभ्यास जिज्ञासु के मन को आत्मज्ञान ग्रहण करने के योग्य बनाता है और उसे वेदान्त के अध्ययन का योग्य अधिकारी बना देता है। कर्म योग की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के पूर्व ही मूढ मानव ‘ज्ञान-योग के अभ्यास में असमय ही कूद पड़ते हैं। यही कारण हैं ऐसे लोग सत्य की प्राप्ति में बुरी तरह फेल होते हैं। उनका मन अपवित्र रह जाता हैं तथा अनुकूल और प्रतिकूल भावनाओं से भरा रहता है। वे ब्रह्म की कोरी बात ही बात करते हैं, तथा व्यर्थ बकवाद शुष्क वाद-विवाद और तत्वहीन तर्क-वितर्क में फँसे रहते हैं। उनका दार्शनिक ज्ञान उनकी जिहृा तक ही सीमित रहता है या कहिये कि वे लोग केवल मौखिक-वेदान्ती हैं आवश्यकता तो ऐसे वेदान्त की है जिसके द्वारा सब में आत्मभाव रखते हुए देश और मानव समाज की, अनवरत निःस्वार्थ सेवा क्रियात्मक रूप से हो सके।

अपने हृदय में प्रेम की ज्योति जगाइये, सबको प्यार करिये, अपनी प्रगाढ़ प्रेम की बाहुओं से प्राणी मात्र को आलंगन करिये। प्रेम एक ऐसा रहस्यमय दिव्य सूत्र है जो सबके हृदय को ‘वसुधैव कुटुम्बकंम्’ समझ कर एक में बाँध लेता है। प्रेम ऐसी पीड़ानाशक स्वर्गीय महौषधि है जिसमें जादू की सी सामर्थ्य है। अपने प्रत्येक काम को विशुद्ध प्रेममय बनाइये। लोभ, धूर्तता, छल, कपट और स्वार्थ-परता का हनन कीजिये। अनवरत दयालुता के कार्यों से ही अमृतत्व की प्राप्ति हो सकती है। प्रेम में सने हुए हृदय-कमल प्रस्फुटित और ऊर्ध्वमुखी होकर ईश्वरीय प्रकाश का ग्रहण करने के योग्य बन जाता है।

ईश्वर करे आप साँसारिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए श्रद्धा और भक्ति से ईश्वर का गुण गाते हुए अपने आदर्श दिव्य-जीवन में चिरशान्ति और शाश्वत आनन्द का अनुभव करें।


हमारी संकुचित मनोवृत्ति

(श्री बाबा राघवदास जी)

भारतीय समाज के और खासकर हिन्द-समाज की ओर देखा जाय तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि हमारे समाज में धर्म की चर्चा भिन्न-भिन्न ढंग से होने पर भी हम धार्मिक नहीं बन रहे हैं। तीर्थ, स्नान, व्रत, नियम, उद्यापन, पूजा-पाठ आदि बातों में धर्म का नाम तो बड़े जोरों से लिया जाता हैं पर गौर से देखा जाय तो हमारे हृदय के एक कोने में यह सारा धर्म अपने या अपने कुटुम्ब के भौतिक सुख की कल्पना के अतिरिक्त आगे बढ़ना नहीं चाहता है। जो साधु संन्यासी हैं उनका धर्म भी घूम फिर कर अपने या अपने माने हुए परिवार तक ही सीमित रहता है। यही कारण है कि वेदान्त के सुन्दर, गम्भीर प्रवृत्त ज्ञान की थाली हमारे पास होने पर भी हम दोनों मलीन से बने हैं। इतने पूर्वकाल में संत हुए और आज भी हमारी आंखों के सामने ऐसे अनेक महापुरुष हैं फिर भी हमारा राष्ट्र पंगु ही बना बैठा हैं। इसका कारण वेदान्त के उपदेश का दोष नहीं पर वह दोष हमारे मनोवृत्ति में ही है कि हमें न कुटुम्बियों से बल्कि जिनको हम अपना बड़ा गुरु मानते हैं उन से भी यही शिक्षा मिलती है कि हमारा जीवन हमारे अपने लिये या उसके बाद कुटुम्ब के लिये ही बना हुआ हैं। उससे आगे चल कर देखें। मानव-समाज के सेवा की चर्चा तक उन्हें नहीं सुहाती। खासकर हमारे धार्मिक अगुवा बड़े, आचार्य, सन्त, महन्त सार्वजनिक सेवा तथा देश सेवा के काम में बाधा उपस्थित करने में अपना गौरव समझते हैं, अपना बड़प्पन मानते हैं। और हम भी अन्धे की तरह उनके पीछे-पीछे चलने में अपना भला समझते हैं। वे हमारे बड़े, हमारे धर्म के नाम पर हमें कैसी उदण्डता सिखाते हैं और फिर वे ही हमें या हमारे युवकों को नास्तिक कह कर उलाहना देते हैं। ये दोनों दृश्य दयनीय हैं।

मैंने पहले-पहले प्रयागराज में इन बड़े-बड़े साधु संन्यासी, उदासी, गदियों के मालिकों की उदण्डता देखी। कहाँ त्रिवेणी स्नान। और उसके लिए आये हुए लाखों धार्मिक भावना से युक्त स्त्री पुरुष बच्चे यात्री। दूर-दूर से अपने घर के करोड़ों का नुकसान करके गाड़ी या रास्तों में किस्म-किस्म के कष्ट उठा कर आये हुए यात्री। केवल इस भावना से कि प्रयागराज में संतों का दर्शन होगा, त्रिवेणी स्नान होगा और कहाँ वे हमारे ये संत महंत जो त्रिवेणी स्नान करने के लिए भी हाथी घोड़ों या सोने-चाँदी की पालकियों में बैठ कर जा रहे हैं। क्या उनका यह वैभव त्रिवेणी जी को दिखाना जरूरी हैं? क्या वे अपने स्थानों तक ही उसको सीमित नहीं रख सकते हैं? आखिर उनके इस वैभव प्रदर्शन की मंशा क्या है? क्या वे भोली-भाली जनता को अपना वैभव ही दिखलाकर मूढ़ना चाहते हैं? क्या दूसरे प्रभाव डालने वाले साधन, त्याग, तपस्या, भगवद्भाव के ज्ञान की चर्चा, विद्या आदि उनके पास नहीं रहती? दूसरी बात क्या यह वे नहीं अनुभव करते हैं कि चाहे वे थोड़ी देर के लिए इसे अपना ‘धर्म’ समझें। पर उसका अन्तिम परिणाम क्या यह होना सम्भव नहीं हैं कि देश के करोड़ों भुक्खड़ और नंग जिनको दिन भर काम करने पर भी पेट भर अन्न और तन भर कपड़ा नहीं मिलता है उनसे ईर्ष्या करने लग जायँ।

आज हम यह देखते हैं कि आज हमारे युवक समाज में यहाँ क्रान्ति का प्रचार करने में श्री रामकृष्ण परमहंस तथा भी स्वामी रामतीर्थ जैसे त्यागी संन्यासियों ने जहाँ काम किया हैं वहाँ इन हाथी घोड़े वाले महन्तों ने युवकों के हृदय में ईर्ष्या ही पैदा नहीं की बल्कि नास्तिकता का भी बड़े जोरों से प्रवाह प्रत्यक्ष रूप से किया है। हमारा राष्ट्र ध्येय से च्युत करने वाला राष्ट्रीय पाप भी।

इस प्रदर्शन से हम एक बात देखते हैं कि हमारा मौजूदा धर्म अपने में ही किस प्रकार समाया हुआ है। हमारा अखाड़ा, हमारी गद्दी, हमारा पंथ बस इसी में ही हमारा अभिमान, बड़प्पन रह गया। कहाँ हमारे लिए वसुधैव कुटुम्ब का पाठ पढ़ाने साले सन्त साधु संन्यासी और कहाँ ये साँसारिक कुटुम्ब को छोड़ कर उसके स्थान पर दूसरा परमार्थिक कहे जाने वाले कुटुम्ब की स्थापना करने वाले ये साधु संन्यासी उदासी। इस शिक्षा का स्वभाविक परिणाम हमारे समाज पर पड़ा हुआ है श्री भगवान ने श्री गीता में “बड़े जैसा आचरण करते है उसका अनुकरण छोटे भी करते हैं” यह जो कहा है वही हमारे समाज में हो रहा है यह है वेदान्त का प्रचार करने वालों की तरफ से वेदान्त का परिहास, उसकी घोर से घोर अप्रत्यक्ष रूप से निन्दा॥ जिनके सुपुर्द यह थाती की गई थी वे ही उसको बुरी तरह से लुटवा कर हिन्दू-समाज का ही सब खजाना खाली करवा रहे हैं। इसको देख कर कौन न तड़प उठेगा?

आज संसार में चारों ओर जो अशान्ति का उत्पीड़न अभाव अज्ञान एवं दारिद्रय के कारण करोड़ों स्त्री पुरुष उत्पन्न हो रहे हैं और हमारे ब्रह्म को ही सत्य और जगत को मिथ्या मानने वाले या चारों ओर राम ही देखने वाले साधु संन्यासी उदासी चुपचाप बैठ रहे हैं इस राक्षसी कृत्य के विरुद्ध ये आवाज उठाने के लिए भी तत्पर न हो इससे बढ़ कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम के’ सिद्धान्त का अपमान और क्या होगा? क्या ये करोड़ों नर नारी वसुधा के अंतर्गत नहीं है? उसके बाहर हैं! फिर इतनी उदासीनता क्यों? क्या समय बीतने पर ही हमारा यह सर्वव्यापी धर्म हमारे काम आयेगा। बात असल में यह है कि हमारे इन आचार्यों का, महन्तों का वेदान्त या सत्संग अपने ‘कुटुम्ब’ तक ही सीमित रह गया है। उसके लिये शरीर में लकवा हो गया हैं। इस कारण उस पर बार-बार आघात होने पर भी उस पर कुछ असर नहीं होता है, वह अंग सुन्न हो गया है।

गृहस्थी में जो कुटुम्ब के भाव हमारे मन में थे वे ही भाव साधु संन्यासी उदासी होने पर भी हमारे अन्दर भरे पड़े हैं उसको छोड़ने में हम समर्थ नहीं हुए हैं और उसका कारण क्या है? उसका कारण थोड़ा ध्यान से, देखने से मालूम हो जायगा कि जैसे श्री स्वामी रामतीर्थ जी महाराज ने हमें हमारे विकास का परिचय कराने के लिए कई छोटे बड़े वर्तुल के बाद भगवान के चारों ओर या ब्रह्म का जो अन्तिम वर्तुल है उसी को लिए हुए बैठे हैं। बीच के बर्तुलों को हमने सर्वथा छोड़ दिया हैं।

जैसे एक आदमी सीढ़ी के पहले डंडे पर पैर रख के अपना दूसरा पैर उसके ऊपर के आखिरी डंडे पर रखे इस अवस्था में उस गरीब की जो दुर्गति होती है वह दुर्गति हमारी हो रही है। हमारा पड़ोसी, हमारा देश, हमारी मानव जाति ये सब सीढ़ियों के डंडे उन्नति के लिए बेकार ही हो जाते हैं।

क्या हमारे वेदांती धर्म का अध्ययन अध्यापन करने वाले महात्मा, पण्डित तथा साधु संन्यासी, उदासी इस वेदान्त के इस अंश पर भी ध्यान देने की कृपा करेंगे?


अनेकता में एकता की झाँकी

(स्वर्गीया श्रीमती सरोजिनी नायडू)

उद्गम, मूल और पृथ्वी की गहराई के भीतर से पानी निकलता है, किन्तु वह बहुत सी धाराओं, नदियों और सहायक नदियों में चला जाता है। पृथ्वी के गर्भ से अनेक बीजों को जन्म देने वाला एक बीज छोटे से वृक्ष के रूप में निकलता है और वह वृक्ष बढ़ता जाता है तथा शाखाएँ फैलती जाती हैं। कुछ शाखाएँ नीचे की ओर मुड़ जाती हैं और कुछ ऊपर चली जाती हैं। नीचे की ओर झुकी हुई और कुछ सीधी चली जाती हैं। नीचे की ओर झुकी हुई और थके हुए लोगों को आश्रय देने वाली तथा ऊपर की ओर बढ़ने वाली सभी शाखाओं का पोषण उसी एक जड़ से होता है जो पृथ्वी के भीतर से निकलती है। किन्तु क्या कोई शाखा यह कहेगी कि मैं भिन्न हूँ? बसन्त ऋतु में सभी में एक सी कलियाँ और एक सी कोपलें निकलती हैं किन्तु बसन्त ऋतु भी सीधी शाखा से यह कह कर उनमें भेद नहीं रखती हैं कि “देखो” मैंने अपना सौंदर्य तुम को दिया है, दूसरी शाखाओं को नहीं दिया हैं।” और इसी से हम कहते हैं कि सभी धर्म और मत एक ही उद्गम से निकलते हैं।

मैं यह नहीं कहती कि यह ईश्वर से आती हैं। मैं तो यह कहती हूँ कि यह हमारे लिए ईश्वर की आवश्यकता से आती हैं। मैं यह नहीं कहती हूँ कि ईश्वर ने मनुष्य अत्यधिक आवश्यकता के वशीभूत होकर नित्यप्रति ईश्वर को उत्पन्न करता है। आखिरकार सर्वोच्च तत्व के हमारे अनुभव के अतिरिक्त ईश्वर है ही क्या? सौंदर्य, सत्य, प्रेम, बुद्धिमता और साहस की हमारी आवश्यकताओं के मूर्तरूप के अतिरिक्त ईश्वर और क्या हैं?

सर जगदीशचन्द्र के बगीचे में पत्थर का बना हुआ एक खाली मन्दिर है। जब मैं (कलकत्ता) विश्वविद्यालय में लेक्चर दे रही थी उसी बीच में एक दिन, यह बात अन्तिम दिन की है, मैं उनके साथ घूमती हुई उनके बगीचे में गई। उन्होंने मुझ से कहा, “क्या आप को आज के भाषण का विषय मिल गया है?”

मैंने उत्तर दिया, “नहीं।”

तब उन्होंने कहा कि, “यहाँ पर आप को अपने भाषण का विषय मिल जायगा।”

मैं उनके साथ घूमती रही और चिड़ियों, पेड़ों और प्रतिमाओं को देखती रही। अन्त में मैं उस खाली मन्दिर के सामने जा खड़ी हुई। उस समय उन्होंने कहा- “हे कवि, क्या आपको अपना सन्देश मिल गया है?”

मैंने उत्तर दिया- “हाँ मिल गया हैं।” इस खाली मन्दिर में प्रत्येक पुजारी को ज्ञान हो जायगा कि मैं स्वयं अपनी ही जीवात्मा के प्रतिबिम्ब में ईश्वर को उत्पन्न करता हूँ? संसार के सब बड़े-बड़े सन्तों और धर्मोपदेशकों का विश्व के लिए यही सँदेश है उनके लिए मन्दिर सदैव खाली रहता था, क्योंकि वह सदैव तैयार रहता था। वह उनके देवता को सदैव रखने के लिए तैयार रहता था, क्योंकि वह सदैव तैयार रहता था। इस बात की कोई परवाह न थी कि वे एक क्षण के लिए मुसलमान, ईसाई, कनफ्यूसियन धर्मानुयायी, पारसी, सिक्ख अथवा अन्य किसी धर्मावलम्बी की आत्मा में प्रवेश कर जाते थे। वे कहते थे कि ‘यहाँ मानव-जाति का एक मन्दिर हैं और मानव जाति को एक ईश्वर अवश्य चाहिए। केवल प्रेम ही ईश्वर का एक प्रतिबिम्ब उत्पन्न कर सकता है और उस प्रेम से तुम परिमित नहीं हो जाते, वरन् तुम अनेक नामों से ईश्वर की पूजा करने वाली विशाल मानव जाति के एक अंग बन जाते हो। चाहे तुम ‘अल्लाह अकबर’ कहो या पारसियों के अग्नि मन्दिरों के सामने प्रणाम करो, ईसाइयों के क्रास के सामने झुको या गुरुद्वारा में ग्रन्थ साहब के पास जाओ तुम सब में एकता का अनुभव करोगे। और तुम यह भी अनुभव करोगे कि तुम्हारी सहानुभूति समझ और ग्रहण शक्ति की तत्परता के सीमित हो जाने के अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति तुम्हारी मानवता की सीमा नहीं निर्धारित कर सकता है।

केवल यही सँदेश मैं तुम्हें देख सकती हूँ, क्योंकि यही एक सँदेश मेरे पिता ने धर्म के रूप में मुझे सिखाया था। अपने लिए मैंने केवल यही एक धर्म जिसकी पुष्टि लड़कपन की मेरी शिक्षाओं से होती है, पाया है। वह सँदेश है एकता- अनेकता में एकता ढूंढ़ने की ही शिक्षा आदि काल से महापुरुष देते चले आये हैं।


इन उलझनों को सुलझाइए

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)

अशिक्षा, अज्ञान और गरीबी अत्यन्त निंद्य हैं, किन्तु सबसे बुरी अवस्था उस मानव की है जिसे अपनी वासना पर संयम नहीं है। आज देश में भिखारी, निर्धनता, व्याधि और असन्तोष की छाया है। इन विपत्तियों की जड़ है- अधिक सन्तानोत्पत्ति। वह व्यक्ति बड़ा मूर्ख है, जो बिना सोचे समझे अविवेक से वशीभूत हो अपनी संतान में वृद्धि करता रहता है।

कपड़ों और मकान की समस्या से पिसने वाले परिवार वे हैं जिसमें प्रति वर्ष एक दो व्यक्ति की वृद्धि हुआ करती है। भारत के रहन-सहन का स्तर नीचा इसीलिए है कि प्रत्येक परिवार में कमाने वालों की संख्या न्यूनतम और उनके आभितों की संख्या बृहत् है।

स्मरण रखिये, प्रत्येक आने वाला बच्चा आप के ऊपर जिम्मेदारी का एक बोझा लाता है। क्षणिक आवेश में आकर आप एक ऐसी मुसीबत मोल ले लेते हैं, जो आयु पर्यन्त पर्वत सदृश आपके ऊपर पड़ी रहती हैं। पुत्र हो या पुत्री, दोनों का भार बराबर है। पुत्र तो पूरी आयु भार बन कर रहता है। खराब पुत्र अनमारना शत्रु है।

श्री रतनलाल साधु ने क्या पते की बात लिखी है- “इस आबादी की बाढ़ को मैं विपत्ति की जड़ समझता हूँ। इस रोग ने इस स्वर्ण भूमि को कंगाल बनाने में सबसे अधिक सहायता दी है। हमने बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह आदि चला कर आबादी की वृद्धि पर लगाये प्रतिबन्धों को तोड़ा है। अपनी विपत्ति में और भी निर्दोष प्राणियों को लाकर ठूँसने का हमें क्या अधिकार है? इससे एक ओर हमारी समस्याएँ उलझती हैं, दूसरी ओर एक बड़ी शर्मनाक नसीहत हम आगे की नस्लों के लिये करते हैं। इस बाढ़ को रोके बिना सुख और शान्ति की स्थापना करने के प्रयास को मैं बहते पानी में नींव डालकर मकान खड़ा करने के प्रयत्न जैसा ही समझता हूँ। हमें रोग का मूलोच्छेदन करना हैं। अपने अपने वंशजों के तथा देश के हित के लिये हमें सन्तानोत्पत्ति पर प्रतिबन्ध लगाना है।

जो परिवार गृहस्थी में ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उच्चनैतिक स्तर में रहते हैं, स्त्रियों को पवित्र शिक्षा उन्नति, प्रगति के वातावरण में रखते हैं, वे भोग विलास और वासना अन्य सुखों से ऊंचे रहते हैं।

वासना के सुख निकृष्ट पशुओं की कोटि के हैं। उनसे मनुष्य की आयु, स्वास्थ्य, बल तथा पौरुष का क्षय होता है। चतुर व्यक्ति को इस मिथ्या मोह जाल के चक्र से जितनी जल्दी हो मुक्त होने का प्रयत्न करना श्रेयस्कर है। अन्यथा लोग तब चेतते हैं, जब बाल-बच्चों कि संख्या 10-12 हो जाती है तथा उनके उत्तरदायित्व के भार से कमर टूट जाती है। इस विषैले, मोहक, मोदक अनर्थकारी मायाजाल के मोहपाश से मुक्त रहिये।

हृदय की अन्धी संकरी गलियाँ

बड़े शहरों की भाँति मनुष्यों हृदयों में अन्धी संकरी गालियाँ और कुकर्म के अड्डे होते हैं। तनिक से प्रलोभन मात्र से ये कुकर्म के बीज विकसित हो उठते हैं। प्रारम्भ में इनका जोर धीमा होता हैं, किन्तु शनैः शनैः यह विकसित होते जाते हैं। विवेक, ज्ञान, तर्क का नियन्त्रण नहीं मानते। मनुष्य विषय-भोग आलस्य का दास हो जाता है। विपत्ति का प्रारम्भ पहले मन की इन गन्दी गलियों से होता हैं। जो इनको जान लेता है वह बहुत सी तकलीफों और दिक्कतों से बच जाता है।

पतन का प्रारम्भ प्रायः इस प्रकार होता है। 1- सिनेमा के गन्दे और अश्लील चित्रों, कुचेष्टाओं और अभिनेत्रियों के प्रति आकर्षण से, 2- व्यभिचार 3- व्यसन और नशीली वस्तुओं के सेवन द्वारा 4- कुसंगति द्वारा 5- गन्दे साहित्य से। विषय वासना को उद्दीप्त करने वाले साहित्य से बड़े सावधान रहें। गन्दी तसवीरों, अश्लील गानों, दुश्चरित्र व्यक्तियों से विष की तरह बचते रहें।

दूसरों को खुश करने की मूर्खता

आपके पास पैसे नहीं हैं, फिर भी आप बढ़िया सूट पहनते हैं, पान खाते और सिगरेट लेकर पीते हैं, अपना बाहरी लिफाफा ऐसा रखते हैं जैसे 1000 रु मास प्राप्त करते हों, जबकि आमदनी से मुश्किल से सौ रुपये मास हैं। इस आडम्बर तथा मिथ्याचार से क्या तो आप अपना लाभ कर सकते हैं, और क्या पड़ौसी, समाज या नगर का? कोई सत्कार्य के लिए चन्दा माँगने आता है, तो अपनी जेब उलटकर दिखा देते हैं, पर जब चटकीली भड़कीली फिल्म आती है, तो आप न जाने कहाँ से रुपया पा लेते हैं? घी, दूध, मक्खन, दही के लिये आपके पास पैसे नहीं, पर पान, सिगरेट, चाय या मित्रों में खर्च करने के लिये आपके पास रुपयों की कमी नहीं होती? वैसे तो आप टूटी झोपड़ी में रहते हैं, पर रेशमी वस्त्रों के बिना बात नहीं करते? यह कृत्रिमता आपके जीवन की एक बड़ी कमजोरी है। समाज में आप वैसा ही प्रदर्शित कीजिए, जैसे आप वास्तव में हैं। आडम्बर, मिथ्याचार, कृत्रिमता से पूर्ण मुक्त व्यक्ति ही समाज में प्रतिष्ठा पाता है। मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र हैं, किन्तु समाज और अपने अहंकार के फैशन रूपी जंजीरों से जकड़ा है।

जैसे सींचा हुआ खेत बीज को अंकुरित कर सकता है, वैसे ही मनुष्यों को सत्कर्म और शील से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। जैसे घुना बीज सींची हुई जमीन में पड़ने पर भी अंकुरित नहीं हो सकता, वैसे ही विषयों, फैशनों, मायाचार में रहता हुआ ज्ञानी पुरुष भी ज्ञानरूपी बीज को अंकुरित नहीं होने देता।

परीक्षाओं से भयभीत न हों-

समस्याओं को कठिनाइयाँ मानकर न चलिये। यह मानिये कि वे आपकी परीक्षा ले रही हैं। तो क्या आप परीक्षा से डर जायेंगे? परीक्षा में उत्तीर्ण होना आपकी शान के अनुकूल है। परीक्षा से आपको अनुत्साहित, निराश नहीं होना है। परीक्षा आपकी दृढ़ता, दयालुता, निर्भयता, त्याग, बलिदान, उद्योग इत्यादि गुणों की हैं। कठिनाइयाँ आपको उन्नत और परिपुष्ट करने का सुअवसर प्रदान करती हैं।

किसी भी मामले में जब आप अपनी आखिरी कोशिश कर चुके हों, तो उसके पश्चात् परिणाम पर सोच विचार करने की वृत्ति को टालना चाहिए। उसे भूल जाइए तथा उसके आगे की दूसरी समस्या या कार्य को आगे बढ़ाइये।

कार्य, मनोरंजन और आराम-ये तीन महत्वपूर्ण जीवन-कार्य हैं। खूब परिश्रम करें। कम से कम 12 घंटे कठोर काम करने की आदत डालें। संसार में हम सब मौजूद हैं। कोई शारीरिक, कोई मानसिक परिश्रम करता हैं। बिना श्रम के जीने का अधिकार आपको नहीं है। जिस दिन आप 12 घंटे काम नहीं करते, उस दिन आपको क्या हक है कि भोजन कर लें? अपने आपसे सख्ती से काम लीजिये। मन को कठोर स्वामी बना कर पूरा काम लिया कीजिये।

जिन समस्याओं के बारे में आप कुछ नहीं कर सकते, उनकी चिन्ता में न पड़िये। आरामतलब सेनापति युद्धों में नहीं जीता करते। हाँ, वे विषैली चिन्ता से अवश्य जर्जर रहते हैं।

दिवा स्वपन् की वृत्ति का सर्वथा त्याग कर दीजिए। हवाई किले बनाना, अनहोनी बातों को सोचना, सिनेमा के फिल्मों या प्रेम कहानियों में वर्णित प्रेम प्रसंगों को पढ़कर यह कल्पना करना कि हम भी किसी स्त्री से ऐसा ही प्रेम करते, ऐसे ही काल्पनिक लोक में विहार करते, रँगरँगलियाँ मनाते, मस्त तराने गाते, मजेदारियाँ करते फिरते- यह सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाएँ हैं। आज पढ़े-लिखे युवक अपने प्राचीन साहित्य में आये हुए प्रेमों या ख्यालों के चरित्रों को पढ़कर, या अश्लील फिल्म देख कर किसी भी स्त्री से प्रेम करने को इच्छुक से प्रतीत होते हैं। वासना लोलुप दृष्टि से स्त्रियों को देखते हैं, गुपचुप यह सोचा करते हैं कि क्या अच्छा होता यदि हम वे होते। किन्तु इस प्रकार कुरुचिपूर्ण कल्पना की प्रचिर स्थानी उड़ान भर कर वे सभ्य समाज में अपना उपहास करते हैं। ऐसे गन्दे और मूर्खतापूर्ण कार्य कर डालते हैं कि उससे उन्हें आत्महत्या तक कर डालनी होती हैं। इन रोमाँटिक वासनाजन्य कल्पनाओं से सावधान रहें। हवाई किले बनाना त्याग दीजिये।

झिझक में न पड़िये। किसी भी अरुचिकर कार्य को कल पर डालना अपनी कल्पना को तिल का ताड़ बनाने का अवसर देना है। अरुचिकर कार्य को पहले समाप्त कीजिए। जब मन ताजा है, तो अरुचिकर कार्य भी अच्छा कर सकेगा। यदि थका हुआ है, तब भी रुचिकर कार्य करने को वह प्रस्तुत रहता है। अरुचिकर कार्य करने के लिए मन को मुस्तैद कीजिए। शक्ति और उत्साह से उसे भरे रखिये। जहाँ वह कुछ शिथिल हो उसे दृढ़ता से अरुचिकर कार्य पर पहले एकाग्र कीजिए। श्री बसंतलाल शर्मा ने इस विषय पर बड़ी सुन्दर बात कही है- “जिन कामों को करना पसंद नहीं करते, पर यह मानते हैं कि उन्हें करना चाहिये, उन्हें करने में प्रवृत्ति हो जाने से इच्छा शक्ति तो दृढ़ होती ही है, मानसिक और कई प्रकार के लाभ होते है। कोई काम पूरा कर लेने पर आपका मन लापरवाही की दोष भावना से मुक्त हो जाता है। अन्तःकरण पर जो भार बना रहता है, वह दूर हो जाता है। यह एक तरह का आत्मानुशासन सिद्ध होता है और आपकी इच्छा शक्ति तथा आत्मविश्वास काफी बढ़ जाता है। क्योंकि ऐसा कार्य कर लेने पर आप निश्चयात्मक रूप से यह जान जाते हैं कि जिन कार्यों को करने से आप हिचकते थे, उनको आप मजे में कर सकते हैं।”

अपनी गुप्त बातें हर किसी से न कहिए

अपनी चिन्ताओं और दुःखों को हर किसी से न कहिये। अपनी गुप्त बातों को अपने तक ही सीमित रखना इसलिए आवश्यक है कि उनमें ऐसी भी चीजें हो सकती हैं, जिनकी दवा किसी के पास नहीं, जिनके प्रति कोई सहानुभूति प्रदर्शित नहीं कर सकता। ये गुप्त बाते दूसरों के पास जाकर आपका सारा आकर्षण, विद्वता, चरित्र की ऊँचाई विनष्ट कर देंगी। यह चीज आपकी खिन्नता और विषाद को घटाने के स्थान पर उनकी अभिवृद्धि ही करेगी। दूसरे आपकी मूर्खताओं, कमजोरियों, न्यूनताओं, गरीबी, भुखमरी पर व्यंग्य करेंगे। आप समाज में अपनी उच्च स्थिति विनष्ट कर देंगे।

छोटी-छोटी योजनाएँ बनाया कीजिए

यदि कोई योजना बहुत बड़ी और पेचीदा प्रतीत हो, तो उसे छोटी-छोटी योजनाओं में विभक्त कर लीजिए, और तब कार्य को धीरे-धीरे अग्रसर कीजिये। जब तक ठीक सामने की सीढ़ी को पार न कर लें, तब तक अगली सीढ़ी की कठिनाइयों की निन्दा को अपने मन पर न आने दें।

दिन भर का कार्य-क्रम पहले ही निश्चित कर लें, ताकि आप जल्दबाजी में न पड़ें जल्दबाजी चिन्ता की सगी बहिन हैं। वह आपकी शक्ति और आत्मविश्वास को भंग करने में मदद पहुँचाती हैं तथा भय और चिन्ता को बढ़ाती है।

जब आपकी निद्रा खुल जाय, तो आप उठ बैठिये। उसके पश्चात् भी यदि बिस्तर पर पड़े रहेंगे, तो सम्पूर्ण दिन के कार्य में जितनी स्नायु शक्ति व्यय होती है, उस समय बिस्तर में पड़े रह कर पहले ही से व्यय कर डालेंगे।

स्मरण रखिये, बिना रगड़ें हीरे पर चमक नहीं आती, और बिना संघर्ष और कसौटियों के मनुष्य को पूर्णता प्राप्त नहीं होती।

सब परिवार को अपनी स्थिति का ज्ञान कराइए।

संसार में सब कार्य जैसा आप समझते हैं, वैसे ही हो जायेंगे, यह न समझ लीजिए। संसार के दुःख-सुख और संघर्ष से अपने कुटुम्ब, बच्चे, स्त्रियां, घर के परिवार के प्रत्येक सदस्य को परिचित रखिये। यदि आप उन्हें काल्पनिक मोह जाल में रखेंगे, तो जीवन संघर्ष-जीवन का कटु अनुभव उन्हें अकस्मात प्रतीत होगा। जीवन के कटु सत्यों का अनुभव उन्हें होना ही चाहिये। अपने आप तथा हैसियत से उन्हें परिचय होना जरूरी है। अमीरों के बच्चे अनावश्यक देखभाल, प्रशंसा बड़प्पन और महत्व की भावना से इतने डीठ हो जाते हैं कि अनाप-शनाप व्यय करते हैं। उनकी प्रत्येक दृष्टता और असभ्यता पर नियन्त्रण होना चाहिये। यदि घर गरीब है, तो प्रत्येक बच्चे का कर्त्तव्य हैं कि कठिनाइयों को अपने सहयोग से न्यूनतम करने का प्रयत्न करे।

श्रीमती सावित्री देवी ने उचित ही निर्देश किया है- “गृहस्थाश्रम ही एक ऐसी शाला है, जहाँ बच्चे, आदर्श पति-पत्नी, कर्तव्यशील माता पिता तथा जिम्मेदार नागरिक बनने का पाठ पढ़ते हैं। उस शाल के शिक्षक हैं माता-पिता। अपने उदाहरणों, त्याग, आदर्शों से ही वे सन्तान का जीवन सफल बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। ममतावश यदि वे विफल नियन्त्रक, और नियामक रहे, तो सन्तान बेकाबू हो ही जायगी, साथ ही उनका जीवन भी उपहासास्पद हो जायगा जिसकी कसक उन्हें उम्र भर रहेगी। आपकी हैसियत से विपरीत यदि कोई बच्चा असन्तोषी दिखाई दे और आपकी अवहेलना करता हुआ सहयोग करें, उस समय गृहस्था रूपी मशीन के खटखट करने वाले पुर्जे को कसना ही पड़ेगा। अर्थ के सम्बन्ध में दूसरों को अन्धकार में रखना क्षणिक आवेश में पागल बन जाने के सदृश है। इससे बड़ी मूर्खता और कौन सी हो सकती है। गैर-जरूरी फैशन और विलासिता की वस्तुओं को इस्तीफा दे दीजिए। आप इस प्रकार जिएँ कि आपकी आय में दूसरे भी जीवित रह सकें।

श्रम को ही धर्म मानिये, क्योंकि श्रम ही सत्य है। किसी स्वप्न जगत के काल्पनिक परमेश्वर से श्रम की पूजा अधिक पवित्र और आवश्यक है।


कर्मयोग जीवन की एक कला है।

(डा. रामस्वरूप गुप्त, कासगंज)

निष्क्रियता अथवा अकर्मण्यता, जड़ता का लक्षण है। जितना भाग हम में जड़ है, वही हम में निष्क्रियता उत्पन्न करता है। इसका अर्थ हुआ “आत्मा” में निष्क्रियता अथवा अकर्मण्यता का नाम भी नहीं हैं। जिस प्रकार सूर्य में प्रकाश के अतिरिक्त अन्धकार को लेश मात्र भी स्थान नहीं, उसी प्रकार वरन् उससे भी बढ़कर “आत्मा” में निष्क्रियता के लिए रंच मात्र भी स्थान नहीं, दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिस प्रकार सूर्य का स्वभाव ही प्रकाश है उसी प्रकार “आत्मा” का स्वभाव ही कर्म है। क्योंकि स्वभाव से कोई भी थकान की प्राप्त नहीं होता, अतः सत्कर्म करते रहने पर भी आत्मा कभी थकता नहीं अथवा आराम नहीं चाहता।

स्वभाव का मान भी नहीं होता और न उसकी प्रतीति होती है। यदि सूर्य का स्वभाव प्रकाश करना है, तो उसे इस बात की कदापि प्रतीति नहीं हो सकती कि मैं प्रकाश कर रहा हूँ, इसी प्रकार ‘आत्मा’ जो जड़ता से सर्वांश में अछूता है-और जिसके स्वभाव में जड़ता आई ही नहीं है, जिसका स्वभाव ही कर्म करना है, उसे इस बात की प्रतीति हो नहीं सकती कि मैं कर्म कर रहा हूँ। श्रेय, यदि हमें इस बात की प्रतीति होती है कि हम कर्म कर रहे हैं, तो हमें समझ लेना चाहिये कि हम में ‘आत्मा’ (निजी-स्वरूप) के अतिरिक्त कुछ ऐसा अवश्य मिल गया है जो ‘अनात्मा’ हैं और उसी के कारण यह प्रतीति है। जो कुछ ‘अनात्मा’ है वही दोष है। इसलिए कर्म करने की प्रतीति के साथ ही दोष का आरम्भ मानना पड़ेगा।

यदि आपको पीने के लिए गरम जल मिले, तो आप झट पूछेंगे कि जल क्यों गरम हैं। इसी प्रकार जान लीजिए कि जहाँ-जहाँ ‘क्यों’ के लिए स्थान मिलता है वहीं-वहीं स्वभाव से हट कर कुछ न कुछ अस्वाभाविक हुआ करता है। इसीलिये जब हम कर्म करते हैं, तब हम कर्म की शर्त से बाँध देते हैं, और तब ही तब हम स्वभाव के विरुद्ध करते हैं। हम खाने के लिये कमाते हैं। यह कर्म करने की एक शर्त हुई। इसका स्वाभाविक निष्कर्ष हुआ कि खाना रुक जाने के साथ-साथ कमाना भी रुक जायगा। फिर कमाना हमारा और कमाने में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध स्थापित हो गया। यदि कमाना हमारा स्वभाव है, तब चाहे हम खायें और चाहे दूसरे ही भले ही खाँय, परन्तु हमारा कमाना सतत् रूप से चलता रहेगा, क्योंकि कमाना हमारा स्वभाव है। इस दशा में कमाते-कमाते न तो कमाने की हमें कभी प्रतीति ही होगी और न कभी थकेंगे ही, ऐसा इसलिये क्योंकि कमाना हमारा स्वभाव है।

इसके प्रतिकूल यदि कमाते-कमाते हम यह प्रतीत करने लगते हैं कि हम कमा रहे हैं, तो समझ लीजिए दोष (अकर्मण्यता) यहीं से आरंभ हो गया। यहीं से थकान भी आरम्भ हो गई। अर्थ यह हुआ कि हम में अहंकार के साथ-साथ दोष घुस आता है, और दोष के आते ही चिन्ता और थकान (निष्क्रियता) आ जाती है।

अब यह स्पष्ट हो गया कि निष्काम कर्म ही ‘आत्मा’ का स्वभाव है, और यही निर्दोष तथा निष्पाप है। अतः आपको किसी फल के लिये कर्म न करना चाहिए। यदि आप किसी ‘क्यों’ के उत्तर के लिए कर्म करते हैं, तो यही सकाम कर्म हुआ, क्योंकि किसी ‘क्यों’ का उत्तर ही किसी कर्म का फल जानने का सरल साधन है।

अब यदि हम अहंकार रूपी दोष को निकालना चाहते हैं, तो हमें चाहिए कि हम अपनी कर्म करने की प्रतीति को कर्म करने की क्रिया के साथ ही साथ निकालते जाएं। हमारी प्रतीति है कि ‘हम कर्म कर रहे हैं।’ इसके निकालने का अर्थ हुआ इसके प्रतिकूल प्रतीति करना अर्थात् यह प्रतीति करना कि ‘हम कर्म नहीं कर रहे हैं’ जब हमारी यह प्रतीति कि ‘हम कर्म नहीं कर रहे हैं’ जम जायगी, तब स्वभावतः कर्म करते हुए हमें कर्म करने की प्रवृत्ति नहीं होगी। यही कर्मों का ईश्वरार्पण करना हुआ। और जब हमारे कर्म बिना प्रतीत के होने लग जायेंगे, तो फिर हम में सतत कर्म करते हुए भी थकान नहीं आयेगी, अर्थात् श्रम नहीं होगा। और इस प्रकार हमारे सब कर्म बिना किसी प्रकार की थकान के और बिना प्रतीति के स्वाभाविक प्रकार से, न कि किसी फल के लिये वरन् सम्पूर्ण जीवन प्रवाह के लिये उसी की ओर बहेंगे जिधर को सतत् रूप से ज्ञान पूर्वक और अज्ञान पूर्वक भी सभी बहे जा रहें है, और जिधर से सत-चित-और आनन्द से परिपूर्ण समीर आ रही है।

सत्कृतियों को ही कर्म संज्ञा में लेना उचित है, अर्थात् जो सत्कर्म हैं उन्हीं को कर्म कहा जा सकता है, अन्य को नहीं। अब प्रश्न होता है कि कौन-कौन से कर्मों को सत्कर्म और कौन-कौन सी को असत्कर्म कहें,? उत्तर हो सकता है कि जिनके करने में आत्म-स्वीकृति हो, वे सब सत्कर्म, शेष असत्कर्म। अब सोचना यह है कि आत्म-स्वीकृति किस प्रकार जानी जाय? तब जिन-जिन कर्मों के करने से आत्मा को संकोच हो, अथवा झिझक हो वे सब अशुभ कर्म कहे जाएंगे। और जिनके करने में प्रफुल्ल चित्तता, आनन्द और निर्भयता प्राप्त हो वे सब सत्कर्म जाना जायेगा और यही आत्म-स्वीकृति समझी जायगी। संकोच का होना ही आत्म-अस्वीकृति का सूचक है। भय और लज्जा संकोच का साथ देने में भिन्न-भिन्न हैं। इस प्रकार हमने जाना कि आत्म स्वीकृति आत्म-अनुकूलता में सन्निद्ध हैं। और अनुकूलता साधारणतः स्वभाव के प्रति होती हैं। अतः स्वभाव सिद्ध कर्म ही स्वभाव सिद्ध कर्म ही स्वधर्माचरण, शुभ तथा अशुभ कर्म कहे जाँयगे। ऐसे ही कर्म हमारा सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से जोड़ देते हैं, और इन्हीं के करने से आत्म-तृप्ति होती है।

बच्चों को खेलने में बड़ा आनन्द आता है। वे खेलों में इतने तन्मय हो जाते हैं कि खाना-पीना पढ़ना-लिखना सब भूल जाते हैं, यहाँ तक कि संसार में सबसे प्यारी माता को भी भूल जाते हैं। हमारे हृदय में ईश्वर का निवास है, और ईश्वर सृष्टि कर्म अपनी लीला मात्र से किया करता है, अर्थात् लीला-प्रिय है। लीला कहते हैं खेल को, इसलिये हमें भी खेल-प्रिय होना ही चाहिए। मानव मात्र को खेल से अतीव प्रियता है, क्योंकि खेल हमारे हृदयों की निधि है। और खेल में वह सब कुछ हैं जो आत्म-वत प्रिय होने में आवश्यक हैं। खेल सर्वथा फलासक्ति से दूर और अभिमान से अछूता है, क्योंकि तन्मयता जितनी ठसा-ठस भरी होती हैं, अभिमान उतना ही उसमें कम समाता है। खेल जैसी तन्मयता कदाचित ही अन्य कहीं देखने में आती हो, यही कारण है कि खेल आनन्द की चाशनी से लबालब भरा रहता है। इसलिए हमारे आचरण हमारे कार्य यदि खेल मात्र बना लिए जाएं तो उनमें आनन्दमयी स्वाभाविकता बिना आये नहीं रह सकती।

फलासक्ति वह दोष है जो कार्य-शक्ति का बुरी तरह अपहरण करता है। यह दोष कार्य-शक्ति को कार्य से हटा कर अपनी ओर ले आता है। यदि फला शक्ति किसी प्रकार त्यागी जा सके तो हमारी शक्ति का शत-प्रतिशत भाग कार्य के करने में खर्च हो, और हमारा कार्य पूर्णरूपेण सफलता प्राप्त करे। परन्तु होता क्या है? हमारे ध्यान का अधिकाँश भाग फलासक्ति अपनी और खींचे रहती है। यदि किसी प्रकार फल से दृष्टि हट जाय तो कर्म में स्वभावतः तन्मयता बढ़ जायगी।

कर्म में फल त्याग करना जीवन की एक कला है। हमने ऊपर निर्देश किया है कि ‘आत्मा’ से निरन्तर सूर्य प्रकाश की भाँति कर्म निकलता रहता है, और वह कर्म सर्वथा फलासक्ति से विहीन और सर्व दोषों से रहित, समाज, देश तथा लोक सबके लिए सदा कल्याणकारी ही सिद्ध होता है। अतः यह प्रत्यक्ष है कि जब तक आत्म-शुद्धि अर्थात् अन्तःकरण की शुद्धि नहीं हो जाती, तब तक पूर्णतः निष्काम कर्म नहीं बन सकता। निष्काम कर्म के लिए शुद्ध अन्तःकरण अत्यन्त अनिवार्य है इससे निष्कर्ष निकलता है कि यदि किसी प्रकार फल को त्याग करके कर्म करना आरम्भ कर दिया जाय, तो जिन अंशों में हम फलासक्ति त्यागने में सफल होंगे, उन्हीं अंशों में हमारे अन्तःकरण के दोष हट करके अन्तः शुद्धि होना आरम्भ हो जायगी।

अब समस्या फल-त्याग की सम्मुख है। यह किस प्रकार हल हो? इसके एक प्रकार के ऊपर पहले ही प्रकाश डाला जा चुका है कि हम अपनी कर्म करने की प्रतीति के विरुद्ध अपनी इस प्रतीति को दृढ़ करते रहें कि ‘हम कर्म’ नहीं कर रहे।’ कर्म करने वाली शक्ति हमसे इतर और महान् है। जब हम कर्म करते ही नहीं है, हम तो उस महान् शक्ति के हाथों के उपकरण मात्र हैं, तो फिर फलासक्ति होने की बात ही नहीं उठती।

दूसरा प्रकार यह है कि हमारी मान्यता ऐसी हो जाय कि हमें केवल कर्म करने मात्र का अधिकार है, फल में हमारी कोई अधिकार नहीं। फल का मिलना अथवा न मिलना किसी दूसरी अज्ञात, महान् परन्तु हमसे सर्वथा इतर शक्ति के वश में है। इस मान्यता के अनुसार भी फलासक्ति से हमारा ध्यान हटकर केवल कर्म में ही व्यय हो सकने की पूर्ण सम्भावना है।

तीसरा प्रकार यह है कि हम कर्म केवल भगवान की प्रीति उपार्जन करने के लिए ही करें, अन्य हमारा कोई उद्देश्य न रहे। यदि हो सके तो हम उन्हीं कर्मों को करेंगे जिनसे भगवान प्रसन्न हों। शास्त्रोक्त कर्मों के करने की शास्त्रों में भगवान की आज्ञा है। अतः भगवान् की आज्ञानुसार कर्म होने से भगवान स्वभावता प्रसन्न होंगे। और इस प्रकार भी हमारा ध्यान फलासक्ति से हट कर कर्म-सम्पादन में पूर्णतः लग सकता है।

यदि लोक-कल्याण अथवा सबके कल्याण की दृष्टि करने में रक्खी जाय, तब भी अपने कल्याण अर्थात् स्वार्थ से, जो फलासक्ति का दूसरा नाम है, हमारी दृष्टि हट जायगी और व्यग्रता, दुष्चिन्ता तथा संशय जो फलासक्ति अपहरण कर लेती थी, वह अब सुरक्षित रह जायगी।

इस प्रकार के कर्मों के करने वाले को हम गीता की भाषा में कर्मयोगी कह सकते हैं। कर्मयोगी सतत् रूप से कर्म करता हुआ भी, उनसे सर्वथा अलिप्त रहता है। यह बात नहीं है कि उसे उसके कर्मों का फल नहीं मिलता। उसे सकाम करने वाले से अधिक ही नहीं अनन्त-गुना होकर फल मिलता है, क्योंकि उसका कर्म पूरी तन्मयता के साथ हुआ है, इसलिए वह पूर्ण है। जहाँ कर्मयोगी का शरीर संसार की सतत् कर्म में प्रवृत्त दीखता है, वहाँ उसका मन भी शरीर के साथ एकी-भाव किये रहता है। सकाम कर्मों की नीति ऐसा नहीं होता कि शरीर से कर्म हो रहा है, परन्तु मन दूसरी जगह फल के परिणाम की बातों में व्यग्र तथा चिन्तित हो रहा है। जिस प्रकार बच्चा खेलता है, तो उसे व्यायाम का फल तो पूरे का पूरा स्वतः ही मिल जाता है, परन्तु जो आनन्द उसे स्वयं आया, और माता-पिता, कुटुम्बियों और अन्य परिवार वालों को जो अपार आनन्द उसको खेलते हुए देखने से हुआ सो अतिरिक्त हुआ जानो। परन्तु बच्चा व्यायाम के फल लिए नहीं खेलता, वह तो खेल के लिये खेलता है।

इसी प्रकार कर्म-योगी, कर्म समष्टि के कल्याण की दृष्टि से अथवा भगवान् की प्रसन्नता सम्पादन के लिए करता है, परन्तु सबके कल्याण में उसका कल्याण भी निहित होता है, इसलिये उसका निज का स्वार्थ भी सबके स्वार्थ के साथ ही साथ सिद्ध हो जाता है। परन्तु कर्म करने की तन्मयता से जो अपार आनन्द उसे होता है वह उसे लभाव में होता है।


साहित्य का वास्तविक रूप

(श्री केशव बलवन्त किलेदार, ग्वालियर)

साहित्य का वास्तविक रूप देखते हैं कि साहित्य किसे कहते है। इस कोटि में कौन सा साहित्य माना जा सकता है। वैसे तो लघु कथा, कहानी, उपन्यास, आत्म चरित्र, निबन्ध आदि सभी वाँगमय या साहित्य के अंतर्गत आते हैं, किन्तु वास्तविक साहित्य के विद्वानों ने 3 भेद किये हैं -

1-क्षणिक, 2-अक्षर, 3-प्रासादिक।

अन्य प्रकार का लिखित ब्योरा (धोबी की डायरी, हिसाब की बही) आदि साहित्य नहीं कहलाये जा कहते।

जिस वाँगमय में सत्यं, शिवं, सुन्दरं की मात्रा समान तथा पूर्ण रूप से निहित होती है वही साहित्य साहित्य की कोटि में आ सकता है।

क्षणिक वाँगमय में आकर्षण होता हैं। उसमें सुंदरम् का गुण विशेष रूप से व्याप्त रहता है, इसीलिए उसमें आकर्षण होते हुए उसका अस्तित्व भी क्षणिक रहता है। इस प्रकार का साहित्य समाज में संकल्प-विकल्प की प्रवृत्ति निर्माण करके चंचलत्व उत्पन्न करता है। अतएव साहित्यिक दृष्टि से इस प्रकार के साहित्य का कोई मूल्य नहीं हैं।

वास्तविक साहित्य वही हैं जो समाज को उन्नत अवस्था में ले जावे। इस प्रकार का साहित्य अक्षर वाँगमय हो सकता है। अक्षर वाँगमय आदर्श होता है। आदर्श होने के कारण ही वह अक्षर, अमिट या स्थिर कहलाता है। जिस वाँगमय में सत्यता का गुण अधिकाँश में हो, वही अक्षर या आदर्श साहित्य कहलाता है। जिस साहित्य का प्रभाव पाठक पर एक मार्ग प्रदर्शन के रूप में कार्य करता है, तथा अनेक भ्रमोत्पादक आकर्षक साधनों से पाठक सत्य से दूर हो जाता हैं, ऐसी अवस्था में नायक के सहारे, उसके चरित्र चित्रण के आधार पर वह सत्यता की खोज करके उसके अधिक समकक्ष पहुँचने का प्रयास करता है। इसे हम उच्चतर साहित्य की कोटि में रख सकते हैं।

इस प्रकार के साहित्य के भण्डार से पशुता से मानवता तथा मानवता से देवता के कोटि तक पहुँचने की क्षमता प्रदान करने का समर्थ इसी प्रकार के साहित्य में हो सकती है।

इसके अतिरिक्त एक प्रासादिक वाँगमय होता है जिसमें यह दैवी शक्ति रहती है कि पाठक को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करके उसको उन्नत अवस्था में पहुँचाती है। इसे हम उच्चतम साहित्य कहते हैं।

पाठक स्वयं का विकास जिन अनुभव सिद्ध, दैवी स्फूर्ति से सृजित वाँगमय को आधारित करके अपना जीवन लक्ष्य सिद्ध करता है, वही है प्रासादिक वाँगमय। जैसे-मीरा, कबीर, तुकाराम, एकनाथ आदि अशिक्षित किन्तु सिद्ध-सन्तों का साहित्य मानव को बिना प्रयास के ही साधक से सिद्ध बना देता है। इसी प्रकार का आध्यात्मिक साहित्य अन्य, महापुरुषों का प्रासादिक साहित्य कहलाता है।

किन्तु आधुनिक युग में प्रायः देखने में यह आता है कि साहित्यक केवल ऐसे ही साहित्य का सृजन करते हैं जैसी लोगों की अभिरुचि होती है। यह केवल धनोपार्जन की दृष्टि से हितकर हो सकता है, किन्तु वास्तविक सच्चे साहित्यकारों का कर्तव्य यह नहीं कहलाता कि जैसी रुचि हो वैसा साहित्य निर्माण करें। यह तो इसी प्रकार हुआ कि जिस प्रकार रोगी जो चाहे वही दवा डॉक्टर देवें किन्तु प्रायः ऐसा नहीं हुआ करता। डॉक्टर जो चाहता है वही दवा रोगी को दी जाती है।

उसी प्रकार साहित्यकारों को जिस प्रकार का समाज निर्माण करना है उसी प्रकार का साहित्य सृजन उन्हें करना चाहिये।

एक ही बात को कलात्मक पूर्ण ढंग से प्रदर्शित करना यह चतुर साहित्य कलाकार की चतुरता है।

गूढ़ विषय को सरलता से प्रतिपादन करके पाठक के हृदय में बैठने की कला कुछ इने-गिने व्यक्तियों को ही साध्य होती है।

कला पूर्ण तथा रसप्लावन युक्त साहित्य का तर-तम रूप ही मानवीय समाज का भविष्य उज्ज्वल तथा उच्च धरातल पर पहुँचने का रहस्य हो सकता है।

हमें उच्च कोटि के साहित्य से ही प्रेम करना चाहिये, न कि केवल मनोरंजन के लिये लघुकथा व उपन्यास पढ़ कर अपना दिल बहला लिया।

इस प्रकार के साहित्य से अर्थ तथा समय की हानि के अतिरिक्त बहुमोल जीवन का भी नाश होने की पूर्ण संभावना होती है।


आहार का संयम भी एक उपवास है।

(डा. श्री लक्ष्मी नारायण टण्डन ‘प्रेमी’)

उपवास अनेक प्रकार के होते हैं। जो समय बेसमय अनाप-शनाप सभी करा करते हैं, ऐसे लोग यदि नियमित रूप से बँधे समय चौबीस घंटे में हल्का और सात्विक भोजन करें, तो उनके लिये वही उपवास है। उनके उपवास का श्री गणेश यहीं से होता है। बाद में धीरे-धीरे वह आगे और बढ़ सकते हैं।

जो लोग 12 घंटे के बाद दोपहर को भोजन करते हैं उनका भी नित्य आधा उपवास हो जाता है। यह भी एक प्रकार का उपवास ही है।

जो लोग प्रातःकाल पाखाने तथा कुल्ला-दातौन के बाद चाय-बिस्किट या मठरी-लड्डू मिठाई, पराँठे, पकवान आदि भारी नाश्ता करते हैं और फिर दुकान या दफ्तर जाने के लिए 9-10 बजे फिर ठूँस कर भोजन करके भागते हैं वे लोग यदि इस भारी नाश्ते को छोड़ कर केवल फलों और मेवा आदि का हल्का नाश्ता करें तो वह भी एक प्रकार से उपवास की पहली सीढ़ी पर कदम रखते हैं।

ज्यादा अच्छा हो कि नाश्ता करना बन्द ही कर दिया जाय। केवल नाश्ता बन्द कर देने से ही अनेक रोगी अच्छे हो चुके हैं। बात यह है कि रात को जब हम सोते हैं तो हमारा पाचन अंग भी विश्राम करता है। यदि सोकर उठते ही जब-तक आप में कुछ देर बाद स्फूर्ति न आ जाये आलस्य और खुमारी वाली स्थिति में यकायक आप पर भारी परिश्रम का काम डाल दिया जाय तो आप घबरा जायेंगे। उसी प्रकार इसके पूर्व कि हमारा पाचन-यन्त्र भोजन पचाने के योग्य हो, तैयार हो, यदि आप उस पर अन्न पचाने का भार डाल देंगे और वह भी हल्का-फुल्का नहीं। तो पाचन-यंत्र अपना कर्तव्य ठीक न कर सकेंगे। अस्तु नाश्ता छोड़ देना भी एक प्रकार का उपवास ही है। यदि आप सच्ची आरोग्यता चाहते हैं तो खूब तेज भूख लगने पर ही, सादा भोजन, खूब चबा कर शान्त और प्रसन्न मन से खाइए।

अमरीका तथा इंग्लैंड में अनेक ऐसी संस्थाएं बनी हैं जो जल-पान छुड़ा कर लोगों को स्वस्थ करती हैं। स्वयं महात्मा गाँधी जब अफ्रीका में थे, तब उन्होंने भी जल-पान करना छोड़ कर स्वास्थ्य-लाभ किया था। प्रसिद्ध प्राकृतिक-चिकित्सक डॉक्टर डेबी कहते हैं -

“जिस दिन मैंने पहले पहल जल-पान छोड़ा था उस दिन मेरा शरीर और मन इतना हल्का और प्रसन्न हुआ जितना कभी बाल्य या युवा अवस्था में नहीं हुआ था। दोपहर के समय खूब भूख लगने पर मैंने बहुत अच्छी तरह भोजन किया। उस समय भोजन बहुत स्वादिष्ट जान पड़ता था। रात भर सोने के बाद प्रातःकाल कभी स्वाभाविक भूख नहीं लगती। सोना कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिससे कि उसकी समाप्ति पर ही भूख लग आवें।

अनेक साधारण लोग तो केवल जल-पान छोड़ देने से ही अच्छे हो जाते हैं।

कुछ लोग अन्न छोड़ देते हैं और केवल फलाहार करते हैं। अनेक धार्मिक व्रतों में भी ऐसा होता है। यह भी एक प्रकार का उपवास ही है। प्रोफेसर एरनाल्ड एहरेड ने कहा है- “यदि किसी को बचपन से ही श्वेतसार-विहीन खाद्यों पर पाला जाय और उसे केवल फल खिलाये जाय तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि न तो वह कभी बीमार पड़ेगा न कभी बूढ़ा होगा।” शाक-भाजी खाकर रहना भी इसी के अंतर्गत है। पर लम्बा उपवास केवल फल, शाक-भाजी, कन्द-मूल आदि पर, किसी विशेषज्ञ की देख-रेख में रहना चाहिए। कुछ लोग ठोस फल भी नहीं केवल रसाहार पर ही रहते हैं। यह तो फलाहार से भी अच्छा उपवास है। हम जानते हैं कि पृथ्वी (मिट्टी) से सूक्ष्म जल, जल से सूक्ष्म, वायु से सूक्ष्म सूर्य का प्रकाश (अग्नि) और सबसे सूक्ष्म आकाश तत्व है। और जो तत्व जितना ही सूक्ष्म होगा उतना ही अधिक महत्वपूर्ण होगा। फल को हजम करने में तब भी कुछ शक्ति पाचन-यंत्रों को लगानी पड़ती है पर फल के रस तो अपेक्षाकृत न्यूनतम परिश्रम के ही पाचन-यंत्र हजम कर लेते हैं और रक्त की शुद्धि करते हैं।

कुछ लोग निर्जल व्रत करते हैं। निर्जल रहने पर शरीर के विकार बड़ी तेजी से निकलते हैं। हिन्दुओं के यहाँ निर्जला एकादशी का व्रत होता है। जिन लोगों के शरीर में जल अधिक हो उन्हें ऐसा व्रत विशेष लाभदायक है। पर निर्जल उपवास दो-तीन दिन से अधिक नहीं चलाना चाहिये। इसमें कमजोरी तेजी से बढ़ती है और वजन तेजी से घटता है। निर्जल व्रत में एनेमा लेना बहुत जरूरी है क्योंकि संचित मल सूखने भी न पाये और विजातीय मल तथा विष आँतों से निकलता रहे।

जो लोग माँस, मदिरा, अंडे, मछली, तेज, मसाला, मिर्च, खटाई और गरिष्ठ भोजन अर्थात् राजसिक भोजन करते हैं या बासी, सड़ा-भुला, झूँठा तथा दुर्गन्धित आदि तामसिक भोजन करते हैं, वे लोग यदि तामसिक तथा राजसिक भोजन को छोड़ दें तो यह भी एक प्रकार का उपवास ही है। हम जानते हैं कि खान-पान का प्रभाव न केवल हमारे शरीर और स्वास्थ्य पर पड़ता है वरन् हमारे स्वभाव, आचरण, आचार-विचार आदि पर भी पड़ता है। माँस खाने वाले शेर, भेड़िया आदि के स्वभावों की और घास आदि खाने वाले गाय तथा हिरन के स्वभावों की तुलना कीजिए। माँस खाने वाले तथा केवल चावल और दूध पर रहने वाले कुत्तों की भी तुलना कीजिए। पर जिस जीव का जो आहार निश्चित है वह वही खाता है। शेर घास और फल नहीं खायेगा और गाय हिरन माँस नहीं खायेंगे। कुछ बन्दरों को जर्मनी में माँस पर रखा गया। भूख से बाध्य होकर खाया तो उन्होंने, पर वे शीघ्र ही मर गये। केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जो सब कुछ खाता है। कंजड़ लोग तो छिपकली, चूहे, साँप, कुत्ते, बिल्ली सभी खा लेते हैं। माँसाहारी लोग स्वभाव हिंसक, लड़ाकू, उग्र, उदण्ड तथा क्रोधी अवश्य होते हैं पर शारीरिक बल और स्वास्थ्य में शाकाहारियों का मुकाबला नहीं कर सकते। प्रायः माँसाहारी ही भाँति-भाँति के भयंकर रोगों में फँसे रहते हैं। अभी हाल में ही एक सरकारी रिपोर्ट से पता चला है कि क्षय रोग से पीड़ितों में माँसाहारियों की ही संख्या अधिक है। शरीर-शास्त्र के विद्वानों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि शरीर-संगठन के विचार से मनुष्य शाकाहारी ही जीव है। लाचारी की दशा में जहाँ अन्न पैदा नहीं होता जैसे ग्रीनलैंड आदि, वहाँ के लोग यदि माँस-मछली पर जियें तो कुछ कारण भी समझ में आता है पर भारत जैसे अन्न प्रधान देश में माँसाहार का जिव्हा स्वाद के अतिरिक्त कोई उद्देश्य ही नहीं है। यदि पशु रोगी हुआ तो उसके माँस के साथ उसका रोग भी हम पेट में उतारते हैं। माँस पचता भी देर में है। अतः माँस, मदिरा आदि का परित्याग करके सात्विक भोजन करना भी एक प्रकार का उपवास ही है।

24 घंटे में केवल एक बार ही मुख्य आहार करना भी एक प्रकार का उपवास है। जो लोग दुकानदार हों या नौकरी पेशा हों, चाहे कुली और मजदूर या दिमागी काम करने वाले, दफ्तर के बाबू या वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर आदि, उन्हें अपना मुख्य भोजन दिन भर काम खत्म करने के बाद या साँय काल को या सूर्यास्त के पहले या सूर्यास्त के बाद करना चाहिये। भोजन करने के बाद तुरन्त शरीर या मस्तिष्क संबन्धी परिश्रम करने में पाचन-क्रिया में गड़बड़ी होती है यह अन्यत्र लिखा गया है। इससे दिन भर के परिश्रम के उपरान्त रात्रि के समय खूब तेज भूख लगने पर भोजन करने से बड़ा लाभ होगा। हमें इस बात का प्रमाण मिलता है कि प्राचीन काल में एक बार ही भोजन करते थे। दिन में फल या दूध आदि हल्का भोजन किया जा सकता है। क्योंकि भरे पेट पर परिश्रम नहीं करते बनता, न करना ही चाहिए। अनेक छोटे-मोटे रोग, एक बार भोजन करने से जाते रहते हैं।

यह सारे उपवास आँशिक उपवास कहला सकते हैं। उदासी, हिस्टीरिया, कण्ठशोथ, दुष्ट, पाण्डु, पुरानी गर्मी का यदि असर रीढ़ तक पहुँच गया हो, हृदय की सूजन या कमजोर परालिसिस एजीटेंस, क्षय, खाँसी, गले के कौए का सूजना, नाक के मसने आदि रोगों में आँशिक तथा फलोवयास बहुत लाभप्रद होता है। तब तीन बार 3 संतरे, तीन बार पाव-पाव भर फलों का रस, तीन-चार बार रसभरी, नीबू आदि खट्टे फल, सुबह दोपहर मक्खन निकला एक-एक गिलास दूध, तीन बार एक-एक गिलास मट्ठा तथा खूब पानी पियें। यह आँशिक तथा फलोपवास के अंतर्गत होगा।


Quotation

जिसमें गो लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और संपूर्ण प्राणों के सहित मन ओत-प्रोत है उस एक आत्मा को ही जानो और सब बातों को छोड़ दो। यही अमृत ‘मोक्ष प्राप्ति’ का सेतु (साधन) है।

-उपनिषद्।

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मन से ही देखो-विश्व में भेद कुछ नहीं। जो मनुष्य भेद की बुद्धि रखता है वह मृत्यु के बाद मृत्यु को ही प्राप्त करता है।


दाँतों से अपनी कब्र न खोदिए।

(ले.-श्री वासुदेव शर्मा)

वर्तमान सभ्य समाज की अव्यवस्थित भोजन प्रणाली और भोजनातुरता की भयंकरता से दुखित होकर एक विद्वान ने सत्य ही कहा है कि- “हम अपने दाँतों से अपनी कब्रें खोद रहे हैं।”

बढ़ती हुई विलासिता, मिष्ट और नरम भोजन हमारे दाँतों को रसातल में पहुँचा रहे हैं। जंगली जाति के दाँत आज भी ईर्ष्या की वस्तु है। प्रकृति उनकी रक्षा कर रही है, परन्तु उनमें भी जिन-जिन लोगों के सिर पर सभ्यता, देवी का चक्कर चढ़ गया है उनके दाँत इस देवी की बलि चढ़ रहे हैं। असमय में बूढ़ा बनाने वाले इन दाँतों को क्या कहें, जो जिन्दगी के मजे को किरकिरा कर देते हैं, परन्तु इनका कोई अपराध नहीं। हमें जंगली जातियों से आज बहुत कुछ सीखना है। भले ही हम कितने ही सभ्य बनते जाएं, कितने ही रंग-बिरंगे भड़कदार शीशियों में भरे हुए नये-नये डेन्टल क्रीम, टूथपेस्ट बनाते जायें, परन्तु उनसे हम अपने दाँतों की रक्षा न कर सकेंगे। आज बेचारे टूथब्रश भी असहाय हो अपनी असमर्थता के लिये अत्यन्त दुखित है। न्यूजीलैण्ड के स्कूल मेडीकल सर्विस रिचमन्ड डून डैंटल रिकार्ड में अक्टूबर, 1920 में इन दाँतों के ब्रश और पेस्ट आदि की निरर्थकता पर लिखते हैं- “क्यों हम जनता को दाँतों के मज्जन और ब्रशों के झूठे विज्ञापन दे दे कर ठगते हैं। क्या यह सत्य नहीं है कि इनके द्वारा आज कल कोई भी दाँत का रोगी अच्छा नहीं हुआ? हम क्यों व्यर्थ इनका उपयोग किये जाते हैं। यह कैसी बात है कि जो सज्जन नियम पूर्वक इन ब्रशों और पाउडरों का उपयोग करते हैं वे ही डेंटिस्टों को अच्छी कमाई देने वाले हैं। क्या इनसे हमारे दाँतों के रोग बढ़ नहीं रहे हैं।”

चिन्ता करने की कोई बात नहीं। जो दाँत अभी जुड़ा है, जिसमें अभी जीवन है वह अच्छा हो सकता है। ऐसे कई उदाहरण हैं। होरेस फ्लेवर ने तो संसार को चकित कर दिया। उसके नियम कितने सरल हैं-’खूब चबाओ।’ खूब चबाने के गुण निवर्णनीय हैं। जो भोजन आदि नहीं चबाते उनके दाँत और उनकी जड़ें खुली हुई पायी जाती हैं। दाँतों में खोल, उनकी रंगत पीली व काली, मसूड़े काले, दाँत और मसूड़ों के पाल पर काले कीट की पर्त जमी मिलती है। ये सब अच्छा न चबाने वाले की अवस्थाएं हैं। अच्छा चबाने वालों के दाँत दृढ़, चौड़े, सफेद, चमकीले, मसूड़े लाल रँग के और सब दाँत एक पंक्ति में पाये जाते हैं। बैल, गाय, भैंस आदि पशु बड़े अच्छे चबाने वाले हैं उनके दाँत ऐसे ही होते हैं। क्या वे कभी दाँतौंन करते हैं? सूखी घास को चबाकर उससे पूरे शरीर का पोषण कर लेते हैं। और मनुष्य जाति दूध, घृत मिठाई से पौष्टिक पदार्थों को निगल कर भी भूखों मरती और कृशांगि बनी रहती है। पशुओं को कभी कब्जियत नहीं होती न दस्त ही उनके गुदाद्वार के आस-पास लिपटा रहता है। बारीक चबाने वाले का मल सूक्ष्म चिकना और बँधा हुआ निकलता है तथा एक ही बार में आँत साफ हो जाती है।

खूब चबाने से मीठे, तीखे, चटपटे पदार्थ भी हानि नहीं पहुँचा सकते। कारण कि वे इतने चबाये जाते हैं कि चबाते-चबाते घुल जाते हैं। और उनका मीठापन या चटपटापन सब रोल में मिल जाता है। अब उनका वह प्रदाहीपन या मीठापन शेष रहा ही कहाँ? इससे यह न समझना चाहिये कि इन हानिकारक पदार्थों का भर पेट सेवन किया जाये। अन्य भोजन के साथ और दाँत के स्वास्थ्य के अनुसार ये खाये जायें तो हानि की संभावना कम रहती है। अच्छा चबाना दांतों का बीमा है यह आपको हृदयंगम कर लेना चाहिये।

1-दाँतों में खोल आदि शक्कर-मैदा आदि पदार्थों से होती है अतः इनका सेवन सोच समझ कर करें।

2-अच्छा भोजन न चबाने से दाँत ऊंचे नीचे रहते हैं। पुष्ट नहीं होते और चर्वण करने वाले स्नायु निर्बल पड़ जाते हैं। अतः अच्छा चबाने की आदत डालें।

3-भोजन का अन्त कड़ी रोटी, फल, तरकारी आदि के द्वारा करें।

4-दो भोजन के बीच कुछ न खायें।

5-रात्रि को सोने के पूर्व दूध न पियें, यदि पीना ही हो तो मुँह को नमक आदि के कुल्ले से साफ करना चाहिये।

6-मुँह से साँस लेना छोड़ दें।

7-दिन में दो या अधिक तीन बार भोजन करें।

‘ऐड्स टू फिटनेस’ नामक एक छोटे से पर्चे के द्वारा दन्त-स्वास्थ्य के कुछ सरल और उत्तम नियम जनता में प्रचारित किये गये थे। और 15 मई, 1912 ई. को टाइम्स ने भी विशेष लेख लिख कर जनता का ध्यान इन पर आकृष्ट किया था। उन नियमों का यहाँ देना अत्यन्त लाभकारी होगा।

1-अपने दाँतों की ओर ध्यान दें। शरीर के दूसरे अंगों के समान इन्हें भी व्यायाम की आवश्यकता है। बिना व्यायाम के वे नष्ट हो जाते हैं।

2-बिना व्यायाम के आपके जबड़े भी पूरे विकास को प्राप्त नहीं होंगे। मुलायम भोजन निगलने से दाँतों को व्यायाम नहीं मिलता और न जबड़ों का ही विकास होता है।

3-प्रसिद्ध अमेरिकन होरेस फ्लेचर का किस्सा याद रखें कि वह 40 वर्ष की अवस्था में जीवन से निराश हो गया, उसने बारीक चबाना आरम्भ किया 50 वर्ष की अवस्था में वह बलिष्ठ होने लगा और 59- वर्ष की अवस्था में उसने कई कालेज और यूनिवर्सिटी के शक्ति और सहनशीलता के रिकार्ड तोड़े।

4-यदि फ्लेचरिज्म का पालन पूर्णतया न हो तो जितना पालन हो उतना करने का भरपूर प्रयत्न करना चाहिये।

5-सूखी और अच्छी कड़ी से की हुई रोटी के चबाने के मौके को कभी हाथ से न जाने दें। हलुवा, मिठाई, मुरब्बा कम खायें। फल से भोजन का अन्त करना सीखें। अन्त में रसदार ताजे फल नारंगी आदि के खाने से दाँत प्राकृतिक रूप से अच्छे साफ होते है। प्रत्येक भोजन के अन्त में मुँह को खूब कुल्ले करके साफ करें।

6-भोजन के साथ जितना कम हो सके उतना कम पानी पियें। भोजन में पानी का विशेष भाग रहता है और अच्छा चबाने वाले को पानी की आवश्यकता नहीं रहती।

7-दो भोजनों के बीच के समय में और प्रातः काल उठते ही तथा रात को सोने के पूर्व पानी पीना अच्छा है।

8-मुरब्बे, मिठाई आदि की अपेक्षा शहद, मीठे और ताजे फलों का उपयोग करें और उन्हें अच्छा समझें।

9-माँस खाना भी आवश्यक नहीं है।

10-अचार, खटाई, मसालों का सेवन संयम से करें।

11-जब भूख न हो बिलकुल न खायें और भोजन कर चुकने पर जब-तब पेट में कुछ न कुछ ठूँसा न करें।

12-विशेषकर भोजन करने के बाद बिस्किट, चाकलेट, शक्कर, गोली, मिठाई, दूध, रबड़ी, खोया, चाय आदि नहीं लें। ये वस्तुएं रात को सोने के प्रथम भी न खायें।

13-मिठाइयों की दुकानें, होटल आदि स्वास्थ्य को चौपट कर देने वाले भयंकर शत्रु हैं। जिन कालेजों में ये हों उन्हें इन दुकानों को एकदम हटा देना चाहिए इन नियमों का पालन करने से साधारण रोग जैसे सिरदर्द, दाँत-दर्द, अजीर्ण, जीमिचलाना, उबकाई आना आदी शीघ्र ही दूर हो जाते हैं।

नीम की दातौन दाँतों के लिए अमृत तुल्य है। इसका प्रयोग इस प्रकार किया जावे-

1-दाँतों से चबाकर इसकी अच्छी कूँची बनानी चाहिये।

2-एक गिलास पानी में थोड़ा नमक घोलकर उस पानी के साथ दाँत साफ करें। पानी को मुँह में भर कर नीम की कूँची आहिस्ते-आहिस्ते दाँतों पर फेरनी चाहिये। मैला पानी थूक दें। फिर दूसरा पानी लेकर दाँतों को कूँची से साफ करें।

3-दातौन को दाँतों के बीच अच्छी तरह दबा कर दातौन का दूसरा सिरा हाथ से पकड़ कर बाहर की ओर खींचना चाहिये। इससे दाँतों का व्यायाम होगा। अब उसी प्रकार दातौन को दाँतों में दबाकर अन्दर की ओर धक्का देना चाहिए।

4-दातौन जोर से सब दाँतों से चबायी जानी चाहिए। रस नीचे टपकाना चाहिये।

5-दातौन को चीर कर उसकी एक चीप से दाँत का मैल निकाल डालें।

6-नमक के पानी से कुल्ले कर मुँह साफ करें। उँगली को मसूड़ों पर फेरे जिससे वे मजबूत हों।

7-सावधानी रहे कि मसूड़ों से खून न आने पाये। आरम्भ में आहिस्ते-आहिस्ते काम लेना चाहिए। बबूल की कूची अच्छी बनती है, यह मसूड़े मजबूत कर मुख के छाले मिटाती है।

प्रातःकाल, दोपहर और सोने के पहले इस प्रकार दाँत साफ करने वाले कभी दन्त रोगी हो ही नहीं सकते। खराब दाँत वालों के दाँत अच्छे हो गये हैं और उन्होंने दाँत के डाक्टरों को आश्चर्य में डाल दिया है। पायरिया रोग तक से मुक्ति मिल जाती है।

एक अमरीकन के बाईस वर्ष की अवस्था में दाँत बिगड़ गये। वह कालेज का एक परिश्रमी विद्यार्थी था। उसे फुर्सत नहीं थी कि वह अपने दाँतों को साफ करें। दाँतों के खराब होने से उसकी स्मरण शक्ति जाती रही। किसी काम में उसका चित्त नहीं लगता था। डॉक्टर ने उसे सलाह दी कि सब दाँत धीरे-धीरे उखड़वा डालों। दाँत को उखड़वा देना और नकली दाँत उस उम्र में बिठाना इस बात की कल्पना से ही उसके रोंगटे खड़े हो गये। क्या वह और किसी उपाय से अपने प्रकृति दत्त दाँतों को बचा नहीं सकता? वह घर आया और शान्त चित्त से विचार करने लगा। उसने दन्त स्वास्थ्य पर बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़े और इस तथ्य पर पहुँचा कि दांतों से काम न लेने से वे निर्बल पड़ जाते हैं और यदि उनसे अच्छा काम लिया जावे तो वे कभी नष्ट नहीं होते। चबाने से दाँतों, के नीचे का मास विभाग और नसों में रक्त संचार की वृद्धि होती है शुद्ध रक्त के संचार से दाँत भी बलवान बनते हैं। अतः उन्हें व्यायाम देना चाहिये। उसने चार कसरतें जो नीचे दी गई है करना आरम्भ किया। इन कसरतों के करने में एक बार में दो से तीन मिनट लगते हैं और दिन में दस बार वह इन कसरतों को करता था। वह लिखता है कि - “पहले महीने तो मेरे दाँत कुछ दर्द करते रहे पर दूसरे महीने से उनका दर्द दूर हो गया। छः महीने बाद जब मैंने डॉक्टर को दाँत दिखाएं तो वह बड़ा विस्मित हुआ और बोला कि तुम्हारे दो तीन दाँत रोगी है शेष सब अच्छे हैं। दो वर्ष के बाद एक भी दाँत खराब न रहा। मेरे दाँत स्वास्थ्य, दृढ़, चमकीले और सफेद हो गये और मेरे स्वास्थ्य में कई गुना अन्तर पड़ गया। इन व्यायामों को मैं दिन में दस बार खास कर भोजन के पूर्व और पश्चात् तथा प्रातः उठते ही और रात को सोने से पूर्व और भोजनों के बीच के घंटों में किया करता था। मैंने धार्मिक रूप से अनिवार्य समझे बिना नागा इन व्यायामों को किया है।”

पहली बात यह है कि मसूड़ों के चारों और खून की अच्छी तरह दौरा हो इसके लिए-

1-झूठमूठ चबाना-मान लीजिए कि कुछ वस्तु मुँह में है। और उसे आप चबा रहे हैं। नीचे के जबड़े को इधर-उधर फेर कर दाँतों पर दबाव दें। सब दाँतों को इस प्रकार व्यायाम दें। नीचे के दाँत ऊपर के दाँतों को हल्के-हल्के दबाएंगे इससे जबड़े और दाँतों के नीचे के गद्दी और नसों में रक्त का संचार होगा। बार-बार इस प्रकार के आने से दाँत की जड़े पुष्ट होंगी और उनका पोषण होगा।

2-अब एक दाँत को उँगली से पकड़कर आगे पीछे धीरे-धीरे हिलाये। इस प्रकार सब दाँतों को बारी-बारी से हिलाओ।

3-उंगलियों के सिरे से मसूड़ों पर धीरे-धीरे रगड़कर मालिश करें। (तैल की जरूरत नहीं है)

4-प्रातः साँय दाँतों को दातौन से साफ करें।

5-पानी के कुल्ले से मुख साफ कर लें।

यहाँ यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि दातौन सबसे अच्छी नीम की होती है। इसलिये यथासम्भव उसी का उपयोग करना चाहिये।


स्त्री शिक्षा का उद्देश्य क्या हो?

(श्री विनायक राव बागडे बम्बई)

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि पुराने जमाने में भी हिन्दू औरतें ऊँचे दर्जे की शिक्षा पाती और बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी का काम करती थी। ब्रह्मवादिनी, गार्गी, उभय भारती, लोपामुद्रा, सुनाभा, अनुसूया और ऐसी बहुत सी देवियों के नाम हम ले सकते हैं-यहाँ तक कि इनमें से कुछ ने वेद के मंत्रों के अर्थ किये थे और वे “मन्त्रदृष्टा” कहलाती थी।

परन्तु हम इस बात पर विचार करना चाहते हैं कि आज कल की ऊँचे दर्जे तक पढ़ी-लिखी बहिनों से हमारे जीवन में क्या लाभ हुआ है।

विद्या और शिक्षा जिन्दगी की सबसे बड़ी चीज है, इससे आत्मा ऊपर उठती है, ज्ञान बढ़ता है, सन्देह दूर होता है। पढ़-लिख कर इन्सान दुनिया के हर जीव से बहुत ऊंचा उठ जाता है। इसलिये इन्सान होने के नाते बहिनें-बेटियों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ने-लिखने की सुविधा देना बहुत ही जरूरी और इन्साफ की बात है। हाँ, इस मामले में हमें यह जरूर देख लेना है कि बहिनें और बेटियाँ जो कालेजों में ऊंचे दर्जे तक पढ़ कर मर्दों की तरह आजाद होकर पेशेवर बनना चाहती हैं, उसका हमारे समाज के संगठन पर क्या असर पड़ता है। मेरा ख्याल है कि इनसे हमारे समाज के संगठन पर धीरे-धीरे एक भारी मुसीबत पास आ रही है।

शिक्षा में दो बातों का होना बहुत जरूरी है। एक तो यह कि वह हमारे जीवन की साथ हो, हमारा जीवन जिस वातावरण में हो, देश और काल को देखते जैसी परिस्थिति हमारे सामने हो, हमारी शिक्षा बिल्कुल उसी के माफिक हो, दूसरी बात यह है कि पढ़-लिख कर हम अपनी जिंदगी को अपने लिये बाँझ न बना लें। लेकिन हम देखते हैं कि हमारी स्कूली और कालेजों की ऊँचे दर्जे की पढ़ी-लिखी बहिनों की हालत ऐसी ही है। चूँकि कालेजों की इस पढ़ाई में भाषा और विचार दोनों विदेशी है, इसलिये इन पढ़ी-लिखी बहिनों के विचार और उनकी जानकारी अपनी जाति और देश से दूर होते चले जा रहे हैं। साथ ही इस शिक्षा ने उनके जीवन को बहुत बोझीला बना दिया है।

यह बात तो साफ जाहिर है कि हमारी अनपढ़ बहिनों की बनिस्वत, चाहे वह कितने ही ऊँचे दर्जे के घराने की क्यों न हों, इन पढ़ी-लिखी बहनों की जरूरतें बहुत ज्यादा होती है। उनके रहन-सहन खर्चीले और जरूरतें बढ़ी हुई होती है। उनकी हालत द्विविधा में भरी हुई और जिन्दगी असन्तुष्ट होती है।

शिक्षा का सबसे बड़ा गुण तो यह होना चाहिये कि वह हमारी आत्मा में मिल जाय और हमारा जीवन उसमें डूब जाय, लेकिन हमारी इन बहिनों के ऊपर शिक्षा एक ऐसा बोझ बन गयी है कि उसे जिन्दगी भर ढोना उनके लिये सबसे बड़ी मुसीबत बन गयी है।

इन बातों ने हमारी बहिनों के सामने बहुत भारी मुश्किलें रख दी हैं। उनमें पहली मुश्किल तो यह है कि हिन्दुस्तान में भारतीय दृष्टिकोण से जिन्दगी भर कुँआरा रहना एक बहुत ही असाधारण बात है। यूरोप में तो लड़कियां आमतौर पर कुँआरी रहती है-बहुत सी तमाम जिन्दगी और बहुत-सी बहुत बड़ी उम्र तक। कुँआरी रहते भी अगर उनका जीवन बिलकुल पाक-साफ न रहे तो यहाँ की सोसायटी में यह बात बहुत ज्यादा बुरी नहीं समझी जाती, न ऐसी लड़कियों से कोई घृणा ही करता है। लेकिन यहाँ की हालत ऐसी नहीं है। जो माँ-बाप अपनी लड़कियों के ऊंची से ऊंची शिक्षा देना और स्वतंत्र रखना भी पसन्द करते हैं, वे भी पुरानी परिपाटी के प्रभाव से यह जरूर चाहते हैं कि उनकी लड़कियों का चाल चलन पवित्र और मर्यादा में रहे, और अन्त में वे एक इज्जतदार गृहस्थिन बनें। लेकिन कालेजों में पढ़ने वाली लड़कियाँ 20-25 साल तक तो कुँआरी ही रह जाती हैं और इस उम्र में कुँआरी रहना-साथ ही सोसायटी जितना उन्हें मौका दे सकती है उतना ही आजाद रहना-उन्हें इस मुश्किल में डाल देता है कि फिर ब्याह के बाद वे उतनी विश्वसनीय बहुएँ नहीं रहती, जितना की एक हिन्दुस्तानी बहु को रहना जरूरी है।

अब रही यह बात कि शादी पर भी ऐसी बहिनें नौकरी कर सकती हैं-वे अगर ज्यादा कमा सकती हैं तो क्यों घर के नौकरों जैसे काम करें, वे खूब रुपया कमायें, मर्द कमायें और दोनों मिल कर मजे की जिन्दगी काटें। अपनी आमदनी के बहुत थोड़े हिस्से से वे कई नौकर-चाकर रख कर अपने रहन-सहन को आरामदेह बना सकते हैं। इस किस्म की जिंदगी कुछ लोग बना रहे हैं। पर अनुभव ने बताया है कि वे सुखी नहीं हैं। नागरिकता की सबसे बड़ी चीज गृहस्थी है। अगर गृहस्थी ठीक नहीं है तो नागरिकता नहीं कायम रह सकती। क्या हम ऐसी बहिनों को नहीं जानते जो ऊँचे दर्जे की लीडर, विदुषी हैं, पर उनकी गृहस्थी बरबाद हो चुकी है, उनके पतियों से उनके बन्धन ढीले हो चुके हैं। मैं कहूँगा कि अगर यह ऊंची शिक्षा हमारी बहिनों के मस्तक में बस कर हमारी गृहस्थी के संगठन को बिगाड़ती है तो उसे दूर से ही नमस्कार है।

पुराने जमाने में भी बहिनें ऊँचे दर्जे की विदुषी होती थी, पर वे विद्या को बाजार में नहीं बेचती थी। उनकी विद्या उनके ज्ञान और सन्तोष के लिए थी। स्त्रियाँ त्याग की मूर्ति हैं। जो मूर्ख हैं वे छोटा त्याग करती हैं, उनके पास त्याग करने को सिर्फ देह है और वे जिन्दगी भर तप और सेवा की मूर्ति बन कर अपनी गृहस्थी में अपनी देह दान करती हैं, परन्तु ऊंचे दर्जे की विदुषी देवियों का त्याग और तप से सदियों की मरी हुई कौमें जी उठती हैं, दुनिया उनके चरणों की पूजा करती हैं। ऊंचे दर्जे की पढ़ी-लिखी बहिनें अगर रोजगार धंधे की झूँठी स्वतंत्रता का लोभ त्याग कर आदर्श पत्नी, माता और संबन्धिनी बन जाय तो हजारों गृहस्थियों में स्वर्ग के फूल खिल उठें। पढ़े-लिखें लोग अब दासी स्त्री नहीं चाहते, वे एक मित्र साथी चाहतें हैं, इसलिये ये विदुषी बहिनें अपनी विद्या और स्त्री-जीवन को सार्थक करें, तप, त्याग और प्रेम की देवियाँ बनें तो हजारों वकील, प्रोफेसर, जज, बैरिस्टर डॉक्टर, अफसर जो थकेमादे दफ्तरों से आकर घर के बाहरी हिस्से में चाय-पानी पी क्लबों, थियेटरों, नाचघरों एवं सिनेमाओं में दिल बहलाने वाले फिजूलखर्ची करते हैं, घर में अपनी प्यारी पत्नी और बच्चों में दिल बहलावें, फिर उनसे ज्यादा प्यारी और खुशनुमा चीज दुनिया में दूसरी कौन हैं?

शिक्षा की प्रत्येक मनुष्य को आवश्यकता है। पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी सुशिक्षित होना चाहिए। पर जिस शिक्षा पर इतना धन समय और श्रम लगाया जाता है वह ऐसी होनी चाहिए जिससे जीवन का उत्कर्ष हो और सुख शान्ति की वृद्धि हो। आज शिक्षा के साथ-साथ, जिस विलासिता एवं भौतिकता से भरे हुए पश्चिमी दूषित दृष्टिकोण को अपनाया जा रहा है उससे हमारे लड़के और लड़कियाँ दोनों ही एक उलझी हुई पेचीदगी में फँसते जा रहे हैं। निरुद्देश्य शिक्षा से भला और किस परिणाम की आशा की जा सकती है?


आध्यात्मिकता की वास्तविकता।

(श्री सत्यभक्त जी सम्पादक, ‘सतयुग‘)

संसार में दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं। एक वे जो साँसारिक सुख की लालसा रखते हैं और दूसरे वे जो पारलौकिक कल्याण को अधिक महत्व देते हैं। अथवा यों कहिये कि एक स्वार्थवादी होते हैं और दूसरे परमार्थवादी। आजकल की परिभाषा में यह भी कह सकते हैं कि एक शरीर को ही सब कुछ समझते हैं और दूसरे आत्मा को दृष्टिगोचर रख कर आचरण करते हैं।

हमारे भारतवर्ष के अधिकाँश लोगों का यह ख्याल है कि हम लोग संसार के सब देश वालों की अपेक्षा अधिक आध्यात्मिक हैं। हमारी निगाह में यूरोपियन, अमरीकन आदि तो घोर भौतिकवादी हैं, स्वार्थ पराण हैं, नास्तिक हैं। मुसलमानों और यहूदियों आदि को भी हम आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत नीचे दर्जे पर समझते हैं। चीनी, जापानी, रूसी आदि के विषय में हमको विशेष ज्ञान नहीं, पर यह बात हम छाती ठोक कर कह देते है कि आध्यात्मिकता के मामले में वे हमारे मुकाबले में जरा भी नहीं टिक सकते।

अगर आध्यात्मिकता का अर्थ, ईश्वर, परमात्मा परब्रह्म की चर्चा करना, भाग्य और कर्म के सिद्धांतों का निरूपण करना, पाप-पुण्य, सत्य-असत्य, हिंसा-अहिंसा आदि की मीमाँसा करना, स्नान, ध्यान, देवदर्शन, तीर्थयात्रा में अनुराग रखना, चौका-चूल्हा, शुद्धि-अशौच आदि के नियमों का पालन करना आदि बातों से ही तो हमको इस बात के मान लेने से इन्कार नहीं कि हमारे भाइयों का दावा पूर्णतः नहीं तो अनेकाँश में ठीक माना जा सकता है।

पर हमको कुछ संकोच पूर्वक कहना पड़ता है कि आध्यात्मिकता का एक दूसरा पहलू भी है। हमारी सम्पति से आध्यात्मिकता केवल अध्ययन, मनन, तथा निरूपण की चीज नहीं वरन् कार्य रूप में पालन करने की चीज है। जिस प्रकार बड़े से बड़े स्वास्थ्य संबन्धी ग्रन्थ को पढ़ कर और कण्ठस्थ करके भी हम जब तक अपना आहार विहार न सुधारें, नियमित रूप से कोई शारीरिक व्यायाम न करें, स्वच्छता और सफाई के नियमों का अच्छी तरह पालन न करें, इसी प्रकार उपनिषद्, गीता, योगवशिष्ठ के सैकड़ों पारायण भी हमको आध्यात्मिकता के निकट नहीं पहुँचा सकते अगर हम उनके उपदेशों के वास्तविक मर्म को ग्रहण न करके तद्नुसार आचरण न करें।

इस कसौटी पर जब हम अपने भाइयों को कोसते हैं तो हमको ज्यादातर हिस्से में “कैमिकल गोल्ड” ही मिलता है। ज्यादा न लिख कर हम इतना ही कहना चाहते हैं कि जहाँ हमको यूरोप आदि में कार्ल मार्क्स, क्रोपीटकिन, लेनिन, सनयात सेन और इनके साथी हजारों अन्य क्रान्तिकारी ऐसे मिलते हैं जो यद्यपि हमारी परिभाषा के अनुसार अधार्मिक हैं, नास्तिक भी हैं, फिर भी उन्होंने अपना सारा जीवन केवल लोकोपकार में लगाया और इसी के लिये अपने प्राण दे दिये। इसके विपरीत हमारे यहाँ अनगिनत ऐसे ही सज्जन मिलते हैं जो सुबह गंगाजी पर 2 घण्टे आँख बंद करके पूजन करते हैं या शाम को घण्टे भर तक भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़े रहते हैं और दिन भर लोगों को ठगने या निर्बलों को सताकर अपना मतलब गाँठने का धन्धा किया करते हैं। इनमें से अनेक भाई गीता और उपनिषदों का भी नित्य पाठ करते हैं उनका अर्थ भी समझते हैं, पर व्यवहार करते समय उनकी बातों को ताक पर उठा कर रख देते हैं।

अनेक प्रकार की दार्शनिक मान्यताएँ तथा अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से हैं। जिस उपायों से जिन विचारों से, मनुष्य का चरित्र ऊँचा उठे, वह पारस्परिक प्रेम, सहयोग, न्याय, उदारता, सचाई एवं संयम शील बने, उन्हें ही आध्यात्म कहते हैं। आज आध्यात्मवाद की चर्चा तो बहुत होती है पर उसकी वास्तविकता का लोप हो रहा है।

हमें सच्चे आध्यात्मवाद की तलाश करनी चाहिए। तलाश करके उसे ही अपनाना चाहिए। क्योंकि हमारा व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण उस सच्चे आध्यात्मवाद पर ही निर्भर है। उच्च चरित्र, सदाचार एवं सर्वतोमुखी नैतिकता ही आध्यात्मवाद का प्राण है। उसकी सजावट और सुविधा के लिये पूजा पाठ के उपचार हैं। यदि प्राण निकल जाय तो देह बेकार है। इसी प्रकार उच्च नैतिकता के बिना धार्मिक कर्मकाण्डों की तरह विशेष उपयोगिता नहीं है।


महात्मा शेखवादी की सूक्तियाँ

(डा. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’, बेतिया)

1- शराब पीने पर बुद्धि का ठिकाना रहना आसान है, पर यदि दौलत पाकर तू मस्त न हुआ तो मर्द आदमी है।

2- अच्छे स्वभाव की स्त्री हृदय को सुख देने वाली होती है, लेकिन बुरे स्वभाव की स्त्री से तो भगवान ही बचाये, तंग जूती की अपेक्षा तो नंगे पाँव रहना बेहतर है और घर की लड़ाई से तो यात्रा की मुसीबत ही अच्छी है।

3- कमर में सुनहरी चपरास बाँधने और चाकरी में खड़े रहने की अपेक्षा जौ की रोटी खाना और जमीन पर बैठना अच्छा है।

4- युवावस्था में पापों का त्याग करना पैगम्बरों का काम है। वृद्धावस्था में तो जालिम भेड़िया भी साधु बन जाता है।

5- ऐ पेट! एक रोटी में संतुष्ट रह, ताकि दूसरों की सेवा में पीठ न टेढ़ी करनी पड़े।

6- अगर, तुझको ईश्वर की आँखों सी दृष्टि मिल जाय तो तुझे अपने से बढ़ कर कोई पतित न दिखाई पड़ेगा।

7- हे भाई! तू पवित्र रह। किसी से डर मत मलिन वस्त्र ही को धोबी पत्थर पर पिछाड़ते हैं।

8- आज्ञाकारिणी और शुद्ध चरित्र स्त्री भिखमंगे पति को भी सम्राट बना देती है। सुन्दर और लज्जावती स्त्री का दर्शन ही पुरुष के लिये स्वर्ग है।

9- अगर तू इन्साफ की पूछता है तो भाग्यहीन मनुष्य वह है, जिसके सुख से दूसरों को दुःख हो।

10- सत्पुरुष सम्पन्न होकर सेवा-धर्म ग्रहण करते हैं। जैसे फलों से लदी हुई शाखा अपना सिर पृथ्वी पर लगा देती।

11- जो पढ़े-लिखे मनुष्य मूर्खों जैसे कर्म करते हैं, वे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं। किसी पशु पर यदि कुछ पुस्तकें लाद दी जाय तो क्या वह उनसे विद्वान या बुद्धिमान बन सकता है?


नारी स्वर्गीय पवित्रता की प्रतीक है

(श्री मनोहरदास जी अग्रावत)

-स्त्री, तू घर की स्वामिनी बन कर जा और हाँ जितने पुरुष हों उन सबसे रानी की तरह बात कर!

-ऋग्वेद।

-स्त्री जंगल को भी राज महल बना देती है।

-रामायण।

-पिता, भाई, पति और देवर यदि अपनी भलाई चाहें तो उन्हें चाहिये कि वे अपनी पुत्री, नानी, भईया और भाभी का अनादर न करें।

-मनुस्मृति।

-स्त्री का अनादर संसार के सर्वनाश का लक्षण है।

-मनु।

-भली स्त्री संसार का ‘प्रकाश’ और बुरी संसार का अंधकार है।

-उपनिषद्।

-तेरा स्वर्ग तेरी माता के पैरों तले है।

-हजरत मुहम्मद।

-भारतवर्ष का धर्म उसके बेटों के प्रताप से नहीं, प्रत्युत उसकी बेटियों के प्रताप में स्थिर रहा है। यदि भारत की देवियों ने अपना धर्म छोड़ा होता तो यह देश कभी का अपना अस्तित्व खो चुका होता।

-स्वामी दयानन्द।

-जो दूसरों की स्त्री की ओर पाप की दृष्टि से देखता है वह परमात्मा के कोप-कटाक्ष को जाग्रत करता है और अपने लिये नरक का रास्ता पैदा करता है।

-स्मृति।

-किसी भी स्त्री के सतीत्व का अपहरण करने से पूर्व मर जाना अच्छा है। किसी स्त्री को बुरे काम से बचा लेना सबसे बड़ा पुण्य है।

-स्वामी दयानन्द।

सौंदर्य से स्त्री अभिमानित बनती और सद्गुणों से उसकी प्रशंसा होती है, किन्तु लज्जा से वह देवी बन जाती है।

-शेक्सपियर।

-स्त्रियों की उन्नति या अवनति पर राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्भर है।

-अरस्तू।

-रोमन राष्ट्र अपनी स्त्रियों के साथ, ग्रीक जाति की अपेक्षा अधिक अच्छा बर्ताव करता था। इसी कारण रोमन राष्ट्र ग्रीक से अधिक बलवान! हो गया और ग्रीक को रोम के सम्मुख सिर झुकाना पड़ा।

-गिवन।

-भू मण्डल के प्रत्येक भाग में स्त्रियों पर अत्याचार और उनका अनादर करना असभ्यता का मुख्य चिन्ह समझा जाता है। वहशी और जंगली आदमी ही स्त्री जाति को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं।

-राबर्टसन।

-बालक को सुशिक्षण देने के काम में केवल माता जितनी उपयोग में आती है, उतने और अच्छे शिक्षक उपयोग में नहीं आ सकते।

-जार्ज हर्बर्ट।

-अतिशय शुद्ध मन वाली और सुशिक्षिता स्त्री का साथ मिलना इतना बड़ा स्वर्गीय आनन्द है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।

-डिटाफ्वेल।

-बालक का भविष्य में भला या बुरा होना उसकी माता पर अवलम्बित है।

-नेपोलियन।

-परिवार के प्रेम के कारण ही बड़े-बड़े कामों में हाथ डाला जाता है। यदि स्त्री और मित्र का सुख न हो तो बहुत अधिक प्रतिष्ठा पाने पर भी मनुष्य वास्तव में सुखी नहीं हो सकता है।

-गिजो।

-जहाँ स्त्रियों का सत्कार होता है वहाँ ही देवताओं का वास होता है। जहाँ इनका मान नहीं वहाँ की सभी क्रियाएँ निष्फल सिद्ध होती हैं।

-महर्षि व्यास।


हृदय! यह संताप कैसा?


हृदय! यह संताप कैसा? (kavita)

हृदय! यह संताप कैसा?

स्नेह-धोग-धवल-शाश्वत यहाँ, फिर अभिताप कैसा?

स्वयं सत-चित् रूप है, आनन्द का वरदान है तू,

प्रकृति-पति का दान तू सर्वोच्च-अतः महान् है तू,

उस कलामय की कला, उत्कृष्ट कृति, अभिमान है तू,

सृष्टि की रामस्थली में शोक क्या, पर ताप कैसा?

यहाँ असित प्रताड़ना, तो सुधा सम विश्वास भी है,

जगत है निश्वास-पूरित, किन्तु निर्मल ह्स भी है,

ठीक, व्यापक-रुदन है यदि, मृदुल-तम परिहास भी है,

आसित् को तू देख ही मत-व्यर्थ, कुसित प्रलाप कैसा?

यहाँ है घनश्याम अम्बर के नयन को धन्य करते,

जलद नभ के शस्य-श्यामल भूमि को सम्पन्न करते,

गिरि, गुहा, निर्भर सुसीत्विक भाव को उत्पन्न करते,

शान्ति, सुख का क्षेत्र है यह, यहाँ हिम का तार कैसा?

क्षरी-सिन्धु समान शशि की पूर्णिमा है, ज्योत्सना है,

श्वेत मुक्ता युक्त झिलमिल वसन अम्बर में तना है,

प्रकृति सुषमा बाँटती है-मनुज फिर भी उन्मना है,

दुःख-सुख के नापने की यहाँ भ्रामक माप कैसा?

शील, मन्द, सुगन्ध युक्त सर्वत्र मलियानिल पवन है,

विविध-वर्ण-विचित्र-शोभित, भ्रमर का धन, प्रति सुमन है,

तर-लताओं से भरा उद्यान, उपवन, गहन वन है,

जगत-जननी मातृ-भू है, पुराण भू में पाप कैसा?

बाल-रवि की स्वास्थ्य-वर्षा, देन-जागृति, नवल जीवन,

सुधा-सदृश-पराग-तितली के करो से सौम्य वितरन,

विहंग-गण का मधुर कलकल, पिक-मयूर, संगीत-नृत्यन,

विश्व आत्म स्वरूप तब, तब क्षोम कैसा, दाप कैसा,

यहाँ शिशु-किलकारियों से द्रवित हैं वात्सल्य जग में,

तुम्हें, नँद-नन्दन मिलेंगे प्रति प्रहर, प्रत्येक पग में,

मौत यशोमती का हृदय तुम पा सकोगे डगर, मग में,

चिर-अमर तू, यहाँ दुखद वियोग का कटु श्राप कैसा?

हृदय! यह संताप कैसा?

*समाप्त*

(श्री डा. लक्ष्मी नारायण टण्डन, एम. ए. ‘प्रेमी’)