मैं तुम्हें कैसे रिझाऊं!
देव ! तमसाच्छन्न मन में मैं तुम्हें कैसे बिठाऊँ !
पंक मय जीवन बनाया काम की आराधना में,
बन गया विक्षिप्त सा मैं तुच्छ धन की साधना में,
हाय! मैंने ही बुना यह जाल अपने बंधनों का,
पीप मैं डूबे करो से अंजली कैसे चढ़ाऊँ।
मैं तुम्हें कैसे रिझाऊँ!
हाय ! पापी लोचनों ने कब तुम्हारी ओर देखा।
हा! मिटी मानस-पटल से कब कपट की कुटिल रेखा।
काँप उठता देख अपने आप का लेखा अखिल मैं,
देव! कलुषित कण्ठ, कैसे वन्दना के गीन गाऊँ।
मैं तुम्हें कैसे रिझाऊँ।
छोड़ फूलों को जगत में शूल ही बोता रहा मैं,
मोह के उन्मादकारी अंक में सोता रहा मैं,
भ्रान्तिमय, आकाश-कुसमों का चयन करता रहा नित,
हो कृपा की ओर दो कण तब चरण रज देव ! पाऊँ।
मैं तुम्हें कैसे रिझाऊँ!
(श्री. महावीर प्रसाद विद्यार्थी, बी.ए. साहित्य रत्न)
भारतवर्ष में विवाह-बंधन अत्यन्त पवित्र धार्मिक कृत्य माना गया है। इसमें अनेक उद्देश्यों की प्रतीति और महान् उत्तरदायित्वों की पूर्ति के साधन समाविष्ट हैं। भारत के प्राचीन मुनियों ने इसे मानव प्रकृति की उत्तम प्रवृत्तियों को स्वीकार करने, प्रकृति द्वारा आयोजित प्रजनन तथा सृष्टि विस्तार, सामाजिक सुव्यवस्था, सुदृढ़ नागरिक निर्माण और अन्त में निवृत्ति की चरम सीमा पर पहुँचने की व्यवस्था की है।
धर्मशास्त्र का प्रवचन है :-
“तथा तथैव कार्याणि न कालस्तु विधीयते।
अभिन्नेव प्रयुज्जानों ह्यास्मन्नेव प्रलीपते॥”
इस संसार के साथ हमारा संयोग है, इसी संसार में हमारा लय हो जायगा, तब हमें जिस समय जो कर्त्तव्य हो, वही करना अनिवार्य है। व्यक्तिगत सुविधा तथा असुविधा को लेकर कर्त्तव्य के पुण्य पथ से परिभ्रष्ट होना उचित नहीं। इसीलिए धर्म ने गृहस्थाश्रम को तपोभूमि कहकर उसकी महत्ता स्वीकार की है। यहाँ तक कि धर्म की दृष्टि में गृहस्थाश्रम ही चारों आश्रमों का मुख्य केन्द्र है। इस सम्बन्ध में योग शिविर वशिष्ठ का निर्देश देखिये-
“गृहस्थ एव जयते गृहस्थस्तप्यते तपः।
चतुर्णामाथ माणान्तु गृहस्थस्तु विशेष्यते॥”
अर्थात् - गृहस्थ ही वास्तविक रूप से वश करते हैं। गृहस्थ ही वास्तविक तपस्वी हैं- इसलिए चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम ही सबका शिरमौर है।
भारत धर्म के अनुसार गृहस्थाश्रम प्रकृत तपोभूमि है। इस काल में दो पवित्र आत्माओं का परस्पर सामंजस्य होता है तथा वे जीवन के युद्ध में प्रविष्ट होते हैं। उन्हें पग-पग पर उत्तरदायित्व, कठिनाइयाँ, साँसारिक संघर्ष, प्रतियोगिताओं में भाग लेना होता है। दोनों आत्माएं परस्पर सम्मिलित होकर एक दूसरे की सहायता करते हुए, तपस्या और साधना के मार्ग पर अग्रसर होती हैं।
प्रकृति के प्रजनन-क्रिया की सिद्धि के निमित्त जिस उद्दाय वासना को मानव-हृदय में प्रतिष्ठित किया है, उसकी उच्छृंखलता यौवन में आकर इतनी तीव्र हो उठती है, कि सामाजिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उसका संयम आवश्यक है। भारतीय धर्म ने उस उद्दाय प्रवृत्ति को स्वीकार किया है तथा विश्व की संस्थिति और संपूर्णता के लिए, मनुष्य के विकास के लिए जरूरी माना है। अतएव प्रत्येक नागरिक को इस महायज्ञ में प्रवृत्त होने का आदेश प्रदान किया है।
गृहस्थाश्रम विषय-भोग की सामग्री नहीं है, स्वार्थमयी लालसा और पापमयी वासना का विकास मंदिर नहीं, वरन् दो आत्माओं के पारस्परिक सहवास द्वारा शुद्ध आत्म सुख, प्रेम और पुरुष का पवित्र प्रासाद है, वात्सल्य और त्याग की लीलाभूमि है, निर्माण प्राप्ति के लिए शान्ति कुटी है। विवाह से मनुष्य समाज का एक अंग बनता है, अपूर्णता से पूर्णता प्राप्त करता है, निर्बलता से सबलता की ओर अप्रसर होता है। उसे नये सम्बन्ध प्राप्त होते हैं, नये उत्तरदायित्व और नये आनंद प्राप्त होते हैं। भारतीय ऋषियों ने गृहस्थाश्रम को अनेक व्रत, नियम, अनुष्ठान, आतिथ्य-सत्कार इत्यादि पुण्य कर्त्तव्यों की लीला भूमि बनाकर उसकी महिमा को द्विगुणित किया है। उन्होंने पारिवारिक व्यवस्था में प्रेम और वात्सल्य तथा दूसरी और अपने से छोटे के लिए उन्हीं के हित में त्याग तथा तपस्या के द्वारा इसे तपोभूमि के समान पवित्र बना दिया है।
एक लेखक का विचार है- “इस तपो भूमि के पुण्य स्वरूप और पुण्य साधना का मधुर रहस्य जानने के लिए हम हिमालय की उस तुषार मंडित शिला पर चलें, जहाँ हिमालय की किशोरी पार्वती तपश्चर्या में निमग्न है। यही भारतीय गृहस्थाश्रम के मंगलमय स्वरूप का प्रथम दर्शन है। गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने से पूर्व रमणी को तपोमयी साधना में प्रवृत्त होना पड़ता है, क्योंकि जिस मंगलमय उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अपने पवित्र सुँदर जीवन को
उत्सर्ग करती है, उसके लिए तपस्या और त्याग की परम आवश्यकता है। कुमार की उत्पत्ति तपस्या की सिद्धि का मधुर फल है, क्योंकि विश्व के परित्राण के लिए, देश के मंगल के लिए, समाज के अभ्युदय के लिए और मनुष्यता की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिए ही कुमार के अवतार की आवश्यकता है। पुत्र या कन्या का जन्म भी धार्मिक महत्व रखता है। उसके साथ रमणीकी उत्कृष्ट सिद्धि भी सम्मिलित है।”
भारतीय वैवाहिक जीवन मंगलमय है। उसका प्रत्येक व्रत, नियम, अनुष्ठान, पूजन, चिन्तन इत्यादि विशेष महत्व रखता है। सतीत्व तथा एक पत्नीव्रत की पवित्रता से समुज्ज्वल, मातृत्व के मृदुल वात्सल्य से विभूषित, उत्तरदायित्वों के मनोरम भार से परिपूर्ण, प्रेम के प्रवाह से पूज्य भारतीय विवाहित जीवन त्याग को तेजोमय तीर्थ और पुण्य एवं कर्म की भूमि है। इसी के द्वारा स्त्रियों में स्त्रीत्व तथा पुरुषों में पुरुषत्व का विकास होता है। नर-नारी के मंगलमय चिर सम्मिलित के समय भारतीय समाज उन दोनों के प्रणय-सूत्र में आबद्ध करने के साथ ही साथ इस जन्म तथा मृत्यु के पश्चात् परलोक में भी परस्पर सहायता, सहानुभूति एवं स्नेहमय व्यापार के प्रतिज्ञा सूत्र में आबद्ध करता है।
हमारा हिन्दू धर्म जिस मंगलमयी साधना को लेकर सदा व्यस्त रहता है, वह है “प्रवृत्ति को निवृत्ति के पथ पर परिचालित करना।” हमारे यहाँ वासना की प्रवृत्ति को माना है, किंतु साथ ही साथ उसने इस प्रवृत्ति के परिष्कार, उन्नति करण और अन्ततः निवृत्ति में परिणत करना यह फल माना है। वैवाहिक जीवन हमारे जीवन की एक स्टेज है, जो भावी जीवन के निर्माण में सहायक है। हम सदा से यह मानते आये हैं कि असंस्कृत और उच्छृंखल प्रवृत्ति साधना और तपस्या के द्वारा परम शान्ति और त्यागमयी बनाई जा सकती है। विनाश की अपेक्षा वृत्तियों का सही मार्गों में बहाव, स्वार्थ और लालसा से निकल कर प्रेम और त्याग के मार्गों में उनका प्रवाह हमारे लिए विशेष महत्व रखता है।
आदि कवि से लेकर पण्डित राज जगन्नाथ ने अपने साहित्य में गृहस्थाश्रम का मनो मोदक रूप प्रतिष्ठित किया है। कौन ऐसा प्रान्त है जिसमें मातृत्व की मंगलमय मूर्ति, सतीत्व का त्याग और सौंदर्य और वात्सल्य की मन्दाकिनी प्रवाहित न हुई हो।
गृहस्थ में प्रविष्ट न होने वाला व्यक्ति अनेक प्रकार के मानसिक रोगों का शिकार बनता है। आयु कम रहती है, मानसिक भावनाएं विकसित नहीं हो पातीं, संसार के महत्वपूर्ण कार्यों में जी नहीं लगता, मनः पुनः पुनः सुँदर स्त्रियों के मानसचित्र बनाता और स्वप्नदोष उत्पन्न करता है। अविवाहित पुरुष की उत्पादन शक्ति क्षीण होती है। विवाह से उसे नया चाव, उत्साह, स्फूर्ति और प्रेरणा प्राप्त होती है। इसी प्रकार अविवाहित स्त्री कुढ़न, अनिद्रा, प्रमाद, चिंता, हिस्टीरिया, प्रजनन की गुप्त भावना, अतृप्ति, स्वार्थी और क्रोधी हो जाती है। विवाहित स्त्री का सौंदर्य बढ़ता है। शरीर के सब अंगों का नवीन ढंग से विकास होता है। मृदुल भावनाओं- दया, प्रेम, सहानुभूति, वात्सल्य, करुणा की अभिवृद्धि होती है।
डॉक्टर जेम्स स्टाक, रजिस्ट्रार जनरल आफ स्काटलैंड ने अपनी परिगणना द्वारा सिद्ध किया है कि कुँआरेपन से मनुष्य की आयु क्षीण होती है। विवाहित व्यक्तियों में से 80 और 20 वर्ष के मध्य 2407 व्यक्ति प्रतिवर्ष मरते हैं, किन्तु इसी अवस्था में कुँवारे एक लाख में से 1835 प्रतिवर्ष मरते हैं। 25 से 40 के मध्य में मरने वाले कुँआरों की मृत्यु अनुपात विवाहितों से दुगुना है बीमा कंपनियाँ अविवाहितों की अपेक्षा विवाहितों को पसंद करती हैं।
विवाह से पूर्णता की प्राप्ति।
पृथक-पृथक स्त्री और पुरुष अपूर्ण हैं। उनके गुण तथा स्वभाव भी अपने अंदर एक प्रकार की कमी, हीनता और किसी अदृश्य वस्तु की कामना करते हैं। जो गुण एक में नहीं है, दूसरों में उनकी मौजूदगी आकर्षण का विषय बनती है। स्त्री-पुरुष दोनों के स्वभावों का विश्लेषण देखिये-
स्त्री में चारुता, सहज ज्ञान पातिव्रत्य, कोमलता, सूक्ष्मता, भावुकता और लज्जा शीलता होती है। वे मानसिक संवेगों को तीव्रता से अनुभव करती हैं। वे स्नेह सरोवर की मीन हैं। उन्हें रूप लावण्य की अनुपम राशि प्रदान की गई है। शान्त प्रियता, सहनशीलता और धैर्य भी बहुत होता है। ये बातें बहुत कम करती हैं, पर सुनती बहुत अधिक हैं।
पुरुष पाशविक वृत्तियों, शक्ति, क्रोध, कार्य, दक्षता तथा “अहं” वादी है। क्रियाशीलता और प्रभुता प्रदर्शन उसके प्रमुख गुण हैं। पुरुष का मस्तिष्क पाशविक वृत्तियों के क्षेत्र में अत्यधिक बलवान है। प्रेम, क्रोध और प्रतिशोध के समय वह कुछ काल के निमित्त उदभ्रान्त-सा हो जाता है। प्रेम में शीघ्रता करता है। वह स्वभावतः, मजबूत, निर्णायक, प्रमाणिक, स्वाभिमानी, प्रचंड, दाता, उदार, कठिन परिश्रमी, बेलगाम, निग्रह हीन और युद्ध करने वाला है। उसका मन अस्थिर, चंचल, बेकाबू और एक विस्फोटक के समान है।
दोनों में स्वतंत्र यौन प्रभेद मिलते हैं। नर प्रेम करने में उन्मत्त, शीघ्र आवेगपूर्ण कामास्थिति में प्रचण्ड है। वह प्रेम से पूर्व स्त्री को हर प्रकार से अनुटक करने में सचेष्ट रहते हैं, तत्पश्चात प्रेमाराधना में लापरवाह से हो जाते हैं। पुरुष के प्रेम में प्रचण्डता है, किंतु वह शीघ्र ही ठण्डा हो जाने वाला ज्वालामुखी है। पुरुष के लिए प्रेम एक प्रकार का खेल है। इसके विपरीत स्त्री का संपूर्ण जीवन ही प्रेम से निर्मित हुआ है। वह प्रेम से ही जीती है और उसी से अपना भविष्य बनाती है। उसके आन्तरिक दृश्यों का विकास प्रेम के जल से ही होता है। सुप्रसिद्ध कवि शय वासना ने सत्य ही कहा है- “प्रेम स्त्री का संपूर्ण अस्तित्व है।”
स्त्री का प्रेम शान्त पर सहज प्रवाहित होने वाली सरिता की तरह गंभीर है। वह इन्द्रियों से प्रारंभ होकर आत्मिक ज्ञान की ओर अभिवृद्धि को प्राप्त होने वाला है। स्त्री एक बार प्रेम-दान देकर पुरुष को अपना सर्वस्व दान देती है। उसमें भक्तिभाव, पातिव्रत्य और आत्मिक ज्ञान अपेक्षाकृत अधिक है। हेवलाक ऐलिक ने सत्य ही निर्देश किया है- “पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में मौन क्षेत्र अधिक स्थूल और प्रसारित है, परन्तु उनमें वह उतने प्रधान भाव से व्यक्त नहीं होता। पुरुषों में काम-वासना की स्वाभाविक प्रवृत्ति शक्ति का एक अशान्त स्त्रोत है। वह उछल-उछल कर सब प्रकार की नालियों में बह जाता है।”
स्त्री प्रेम से शासन करना चाहती है। उसका प्रेम विकेन्द्रित होता है जिसमें उसके बच्चे, पति, भाई-बहिन इत्यादि सम्मिलित हैं। मातृत्व का भार उठाने पर उसका वात्सल्य विकसित होता है, करुणा, सहानुभूति, दया, प्रेम, नाना धाराओं में बहने लगता है। वह अपने बच्चे पर तो प्रेम न्यौछावर करती ही है, सभी बच्चों, पशु-पक्षियों तक को भावुक दृष्टि से निहारती है। स्त्री की भावनाएं तीव्र होती हैं। संवेग तथा भावना का उसके हृदय में राज है। सोच में डूबे रहना, प्रतीक्षा करना और सहजज्ञान-ये स्त्री के सनातन गुण हैं। वे अपने सहजज्ञान से पुरुष की साधारण और मौन आवश्यकताओं को पहले से ही भाँप लेती हैं और उसका प्रबंध करती हैं। दूसरों के मनोभावों को भाँपने तथा भविष्य में आने वाली विपत्तियों का अनुमान लगाने के लिए उन्हें विशेष गुप्त मनोवैज्ञानिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
डाँ. बरनार्ड डालेडर के अनुसार अधिकाँश स्त्री एक तीखी और गहरी दृष्टि से जान लेगी कि यह व्यक्ति कैसा है? धोखेबाज, बदमाश या सज्जन, नैतिक, बुद्धिमान। मूर्ख स्त्रियाँ दुराचारियों के वश में आ सकती हैं किंतु बुद्धिमती स्त्री बड़ी चतुर होती है। वह उसके चेहरे से अंदर के मनोभाव पढ़ सकती है। यदि आप अपना दुःख दर्द स्त्रियों के सामने वर्णन करें तो वे सहानुभूति प्रदर्शित करेंगी। वे पुरुषों की अपेक्षा अधिक भावुक हैं, अधिक प्रकार के मानसिक भावों का प्रकाश और अनुभव करती हैं। धार्मिक विचारों में वे पुराने संस्कारों से चिपकी रह जाने वाली हैं। स्त्री पुरुष की अपेक्षा अधिक व्यवहार कुशल है, अपने व्यवहार में अधिक उदार होती है, पुरुष के प्रेम पर सदा विचार किया करती है और उसके प्रशंसायुक्त प्रेम भरे वाक्य सुनने के लिए सदैव लालायित रहा करती है। संक्षेप में, पुरुष की अपेक्षा वह अधिक सहनशील, शान्ति, प्रतिमा, सम्पन्न, उदार एवं सहजज्ञान युक्त होती हैं।
विवाह में स्त्री पुरुष के उल्टे गुण एक दूसरे से मिल कर पूर्णता की सृष्टि करते हैं। दोनों का संयोग समाज का एक यूनिट बनाता है। यही यूनिट सम्मिलित रूप में समाज को आगे बढ़ाता है। न तो पुरुष स्त्री के बराबर है, न स्त्री पुरुषों के गुणों का अनुकरण कर अपने अंदर उन्हें उत्पन्न कर सकती है। सृष्टिकर्त्ता की रचना ऐसी है कि दो विभिन्न गुण वाले प्राणी भाईचारे और पारस्परिक साझेदारी से, एक दूसरे के स्वभाव और प्रकृति को समझकर सम्मिलित रूप से आगे बढ़ते हैं। स्त्री तथा पुरुष के गुण-दोष एवं प्रकृति एक स्थान पर मिलने से “मनुष्य” बनता है। यदि ये दोनों लिंगों के प्राणी एक दूसरे से पृथक रहेंगे, या लैंगिक प्रतियोगिताओं में उलझे रहेंगे, तो गृहस्थियों में पारस्परिक कहल की वृद्धि रहेंगी। समाज की समस्वरता नष्ट हो जायगी।
श्री सन्तराम जी ने लिखा है - “गृहस्थी एक साझे की दुकान है। इस दुकान के प्रधान साझेदार दो हैं - स्त्री और पुरुष। यह दुकान तभी बढ़ती फूलती है और लाभप्रद होती हैं जब ये दोनों साझेदार एक दूसरे के स्वभाव, प्रकृति, गुण, दोष, आवश्यकता और विशेषता को समझते हों। एक दूसरे का संपर्क बात न होने से उनका साझा भली भाँति नहीं चल सकता..... विज्ञान ने स्त्री और पुरुष की तुल्यता की घोषणा की है, न कि उनकी समानता की। बात केवल इतनी ही है कि स्त्री और पुरुष दोनों के संयोग से मनुष्य बनता है, ठीक उसी प्रकार जैसे धनात्मक और ऋणात्मक अणुवों के मिलने से विश्व बना है।”
विवाह के पश्चात पुरुष स्त्री को सुख के लिए तथा स्त्री को पति के आनन्द के निमित्त कुछ बलिदान करना पड़ता है। दोनों ही एक दूसरे को सुखी देखना चाहते हैं। अपने जीवन-मित्र के लिए अधिक से अधिक त्याग करने को प्रस्तुत रहते हैं। अतः स्वार्थ और संकुचिता नष्ट होकर उदारता और त्याग की भावनाएं जागृत होती हैं। जीवन का क्रम है “सुख की ओर अग्रसर होना।” इस त्याग का यह फल होता है कि दोनों ही सुखी रहते हैं। एक दूसरे के लिए सुख खोजने की प्रवृत्ति तथा उपकरण प्रस्तुत करने से अपने लिए सुख पाने का राज-पथ तैयार किया जाता है। इस प्रवृत्ति का जनक है कर्त्तव्यनिष्ठ गृहस्थ जीवन। गृहस्थ जीवन एक ऐसी पाठशाला है जिसमें स्त्री-पुरुष के स्वभाव एक होकर एक दूसरे की कमी पूर्ति करते हुए अधिक से अधिक सुख, समृद्धि और समाज हित के लिए अग्रसर होते हैं।
विवाहित स्त्री-पुरुष त्याग और आत्म-समर्पण की प्रतिमूर्ति हैं। पुरुष सिंह के समान बलशाली क्रोधी और तीव्र मनोविकारों का लड़ाकू जीव है। लेकिन अपनी पत्नी के समक्ष वह दयालु हो उठता है। जिस नारी को वह एक पराये घर से लाता है, अपने गृह की सम्पूर्ण व्यवस्था, गुप्त बातें उसे सौंप कर ठण्डी साँस लेता है। सब रुपया कमा कर उसी लक्ष्मी को अर्पण करता है। वह स्वयं अपने आप कुछ नहीं खाना चाहता। भूखा रह कर पत्नी के लिए अच्छी से अच्छी सामग्री प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार पत्नी स्वयं दुख उठाकर घर के कार्यों में लगकर पति को सुखी देखना चाहती है। वह अपना सुख, खान-पान, पहनावा इत्यादि पति के सुख पर उत्सर्ग कर देती है। यह पारस्परिक आत्म-समर्पण ही गृहस्थ जीवन का निर्माण करता है।
थोड़े से ऐसे जीवों के जो एक साथ खाते-पीते, सोते और उठते-बैठते हैं, एक ही घर में रहने से परिवार नहीं बन जाता। इस प्रकार तो हम घर की ईंटों को ही परिवार कह सकते हैं। किसी परिवार के आधे लोग चाहे पृथ्वी के भिन्न-भिन्न भागों में रहते हों पर हम उसे सुख सम्पदा पूर्ण परिवार कह सकते हैं। पारिवारिक जीवन के सच्चे अंग तो प्रेमपूर्वक, स्मरण, परस्पर का सद्भाव, सबकी मंगलकामना, सबके प्रति सच्ची सहानुभूति, माता-पिता का निश्छल आशीर्वाद, पुत्र की आज्ञाकारिता कर्त्तव्य पालन, सत्यनिष्ठा, भगनी का अभिमान, प्रेम तथा सौजन्य, पत्नी का त्याग, बलिदान, और सर्वतोमुखी प्रेम, वृद्धों की सेवा, प्रतिष्ठा, अतिथियों का सम्मान और आदर इत्यादि हैं।
परिवार परमात्मा की ओर से स्थापित एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हम अपना आत्म विकास सहज ही में कर सकते हैं और आत्मा में सतोगुण को परिपुष्ट कर सुखी, समृद्ध जीवन प्राप्त कर सकते हैं। मानव जीवन की सर्वांगीण सुव्यवस्था के लिए पारिवारिक जीवन प्रथम सोपान है। मनुष्य केवल सेवा, कर्म और साधना में ही पूर्ण शान्ति प्राप्त कर सकता है।
प्रत्येक परिवार में पूर्वजों की जैसी धारणाएं, विचार, धर्म या रूढ़ियों चली आती हैं, उन्हीं के अनुसार गुप्त रूप से प्रत्येक बच्चे के मानसिक संस्थान पर प्रभाव पड़ा करता है। जो बच्चा चार घण्टे स्कूल में जाकर बीस घंटे घर में अपने पारिवारिक सदस्यों में व्यतीत करता है, उस पर घर का गुप्त प्रभाव निरंतर पड़ता रहता है। आधुनिक बालकों की मान बोधित भावनाओं एवं पुरुषोचित शक्तियों की प्राप्ति में विफलताओं की सर्वाधिक जिम्मेदारी उनके अभिभाविकों की है।
हमारी रूढ़ियां और अन्धविश्वास :-
बुरे परम्परागत संस्कार या सामाजिक रूढ़ियां बच्चों के लिए बड़े शत्रु हैं। मैं ब्राह्मण हूँ, वह चमार है। मैं क्षत्रिय हूँ, वह शुद्र है। मैं अमीर हूँ, वह अस्पृश्य है। उसे मेरी समानता का अधिकार नहीं-इस प्रकार की अनेक रूढ़ियां छात्रों के दिमागों में पाई जाती हैं। सब बच्चों का मानस स्फटिक की तरह स्वच्छ न होकर, रूढ़ियों पुराने धार्मिक संस्कारों, घर के रीति रिवाजों, भोजन सम्बन्धी विचारों तथा साँस्कृतिक विकास से आच्छादित होता है। जब आप बच्चे को उठाना चाहते हैं, तो पहले आपको परिवार का वातावरण परिवर्तित करना पड़ता है। ज्यों-ज्यों परिवार का वातावरण बदलता हैं, त्यों-त्यों बच्चे में भी अंतर होना प्रारम्भ होता है। बालक परिवार के संस्कारों का प्रतीक है।
बच्चे में वीर-पूजा (हीरो वरशिप) की जन्म जात भावना बड़ी तीव्र होती है। वह आदर्श के समीप आना चाहता है। उसका सबसे पहला आदर्श माता है। माता के गुण, दोष, आदतें, स्वभाव, दूध के साथ संपर्क, और आदेशों के साथ मानसिक जगत में प्रवेश करते हैं। माँ के पश्चात पिता वीर-पूजा का पात्र बन जाता है। परिवार में पिता का महत्व सर्वाधिक है। वह समस्त परिवार के लिए आदर्श है। उसी के पथ-निर्देश पर सब चलते हैं, उसी की आदतों और योग्यता, शिक्षा, सभ्यता का अनुकरण प्रति पल किया जाता है। समस्त परिवार पिता की प्रतिछाया ही है। उसके मानस की अप्रत्यक्ष किरणें जिस वातावरण का निर्माण कर देती हैं, उसी में प्रत्येक बच्चे का मानसिक और नैतिक संस्थान विनिर्मित होता है। आपका परिवार वैसा ही होगा, जैसे आप स्वयं है, जैसे आपके विचार, आदर्श, रूढ़िगत संस्कार, भावनाएं और अन्धविश्वास हैं।
जैसा पिता, वैसा परिवार :-
पिता का महत्व मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत अधिक है। प्रत्येक परिवार अनुकरण का दास है। वह बड़ों का अनुकरण करता है। अतः पिता के रहन-सहन, विचारों और आदतों द्वारा घर के बच्चों की आदतों का निर्माण होता है। अतः पिता हर प्रकार से आदर्श रहे। अपने जीवन का कोई भी दोषपूर्ण पहलू परिवार के सामने न लायें। आदर्श पिता का परिवार ही सुखी, समृद्ध और उन्नतिशील हो सकता है।
घर का वातावरण बनाने वाले अन्य भी तत्व हैं। पहले घर में दीवारों पर लगी हुई तस्वीरों को ही लीजिए। यदि यह चित्र अश्लील, कामोत्तेजक, सस्ते श्रृंगार पूर्ण जीवन या सिनेमा की अभिनेत्रियों से सम्बन्धित होंगे, तो अप्रत्यक्ष रूप से घर का वातावरण अशुद्ध होता रहेगा। इसका प्रभाव बड़ा होने पर बच्चों के चरित्र में प्रकट हो जाएगा। इसी प्रकार जिन परिवारों में गन्दी गालियाँ देने, बच्चों या नौकरों को मारने-पीटने, दुखी करने का क्रम है, उनके बच्चे दुष्ट और निर्मम प्रकृति के होते जायेंगे। पोशाक का दिखावा, अधिक बनवा, पाउडर, सैन्ट, इत्र, खुशबूदार तेल लगाकर सज-धज कर निकलने वाले परिवारों के बच्चे ऊंचे और कामुक प्रकृति के निकलेंगे। जैसा घर का वातावरण, वैसे ही बच्चे के संस्कार !
पिता को अपना महान् दायित्व समझना चाहिए और स्वाध्याय, चिंतन, मनन एवं सेवाभाव के बीज पारिवारिक सदस्यों में बोने चाहिए। पिता ही प्रथम शिक्षक और पथ प्रदर्शक है। ऊँचा उत्साही, मिलनसार, भावुक, परोपकारी, अधिक परिश्रमी, अटल विश्वासी, व्यवहार कुशल, सच समालोचक, विनोदपूर्ण होना चाहिए। जिस संलग्नता से वह पवित्र जीवन व्यतीत करेगा। उसी परोपकारिकता, पितृभक्ति और मृदुता से उसका परिवार उसके पद चिन्हों पर चलेगा।
सम्मिलित रहें या पृथक हो जायें ?
सहयोग की भावना मनुष्य जाति की ऊर्जा का मूल कारण है। हमारी एकता शक्ति, सामाजिकता, मैत्री भावना, सहयोग, परायणता, हमारी आधुनिक सभ्यता का मूल मंत्र है। सभ्यता के प्रारंभ में मनुष्यों ने आपस में एक दूसरे को सहयोग दिया, अपनी स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों को परस्पर मिलाया। इस संगठन में उन्हें ऐसी चेतनाएँ एवं सुविधाएं प्राप्त हुई। जिनके कारण अनेक हिंसक पशुओं के ऊपर मनुष्य का आधिपत्य स्थापित हो गया। दूसरे प्राणी जो साधारणतः शारीरिक दृष्टि से मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक सक्षम थे, इस मैत्री भावना, सम्मिलित योग्यता के अभाव में जहाँ के तहाँ अविकसित पड़े रहे। उनकी शक्तियाँ विशखलित, विघटित, असंगठित रहीं। संघशक्ति का प्रादुर्भाव उनमें न हो सका।
यही बात परिवारों के सम्बन्ध में है। वे ही परिवार उन्नति कर सके हैं जिसमें पारस्परिक सहयोग, संगठन, एकता, पारस्परिक सद्भाव रहे हैं। बड़े सेठ, साहूकारों, संस्थाओं, फर्मों का निरीक्षण करके मालूम करें तो उनका संगठन ही उन्नति का मूल मिलेगा। विद्युत, अग्नि, गैस, वाष्प की तरह जनशक्ति भी एक होकर अनेक गुनी अभिवृद्धि को प्राप्त होती है।
व्यक्तिवाद के स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना संसार अब पहचानता जा रहा है। मजदूर, किसान, कारीगर अपने संघ विनिर्मित कर रहे हैं। जहाँ तक कि बुरे व्यक्ति भी बुरे कर्मों के लिए घनिष्ठ संघ बनाकर अवाँछनीय साहसिक कार्य प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
सम्मिलित कुटुम्ब के असंख्य लाभ
पृथक-पृथक रूप से छोटे-छोटे प्रयत्न करने में शक्ति का अपव्यय अधिक और कार्य न्यून होता है। अकेला मनुष्य थोड़ी देर बाद रुक जाता है। परंतु सामूहिक और संगठित सहयोग से ऐसी अनेक चेतनाओं और सुविधाओं की उत्पत्ति होती है, जिसके द्वारा बड़े-बड़े कठिन कार्य सहज हो जाते हैं। सम्मिलित खेत, सम्मिलित रसोई, सम्मिलित व्यापार, सम्मिलित संस्था, सम्मिलित परिवार का क्षेत्र विस्तृत होता है। सम्मिलित परिवार की प्रवृत्ति से मानव प्राणी की सुख, शाँति एवं सफलताओं में आश्चर्यजनक रीति से अभिवृद्धि होती है।
आर्थिक दृष्टि से विचार कीजिए तो धन का मितव्यय होता है तथा सम्पन्नता में अभिवृद्धि होती है। पृथक-पृथक रहने पर पृथक ही चूल्हे जलते हैं, दीपक जलते हैं, भोजन, निवास तथा शिक्षा इत्यादि के निमित्त प्रत्येक छोटे परिवार को प्रथक ही व्यय करना पड़ता है। आजकल मकान की समस्या बड़ी विषम है। चार भाई यदि पारस्परिक स्नेह का विकास कर सम्मिलित रहें, तो चार मकानों के स्थान पर एक से ही कार्य चल जायेगा। चार मकान, चार फर्नीचर, फर्श, सजावट का सामान की आवश्यकता प्रतीत न होगी। अतिथियों के लिए अतिरिक्त पलंग, बिस्तर फिर सबको प्रथक रखने की क्या जरूरत। घर के साधारण नौकर, जैसे-कहार, रसोइया, मेहतर, चौकी-दार, दूध दुहने वाले का व्यय भी एक ही स्थान से किया जा सकेगा और चारों भाइयों को आराम भी प्राप्त होगा। चार भाइयों के एक साथ सम्मिलित रहने में यदि दो सौ रुपये का व्यय है तो, पृथक रहने में चार सौ का व्यय अवश्य हो जाएगा। एक भाई दूसरे अच्छे भाई के व्यवहार, प्रोग्राम, दिनचर्या देखकर उसका अनुकरण करेगा, गंदगी से बचेगा, व्यर्थ की आदतों-जैसे सिनेमा, मद्य, सिगरेट, सैर-सपाटा इत्यादि अनेक प्रकार के अपव्यय से बचा रहेगा।” जो मैं चाहता हूँ, वह सबको भी होना चाहिए। सबके लिए वही व्यवस्था करने में बहुत व्यय पड़ेगा। केवल मेरे ही लिए यह वस्तु होने से सबको बुरा प्रतीत होगा- “ऐसा सोचकर गृह के अन्य सदस्य भी अपनी आवश्यकताओं पर संयम और मन पर नियंत्रण रखेंगे। जब यह नियंत्रण हट जाता है, तो हर एक व्यक्ति खुले हाथ से व्यय करता है। घर की जुड़ी हुई सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। झूठे दिखावे में आदमी बरबाद हो जाता है।”
आर्थिक लाभ-
इस प्रकार जहाँ व्यय में किफायत होती है, वहाँ सम्पन्नता में वृद्धि होती है। मितव्यय वाला धन क्रमशः एकत्रित होता है। सम्मिलित श्रम से लाभ भी अधिक होता है। घर के विश्वस्त आदमी मिलकर कारोबार में जितना लाभ कमा सकते हैं, उतना नौकरों द्वारा नहीं हो सकता। सबकी आय एक ही स्थान पर एकत्रित होने से, संचित पूँजी में वृद्धि होती है। अर्थशास्त्र का अकाट्य नियम है। “अधिक पूँजी, अधिक लाभ”। जैसे किसी व्यापार में एक हजार की पूँजी लगाई जाती है, तो दस प्रतिशत लाभ होता है। पर उसी में दस हजार की पूँजी लगाई जावे, तो पन्द्रह प्रतिशत लाभ होने लगेगा। सबकी कमाई एक स्थान पर होने से, पारिवारिक उद्योग धंधे, छोटे-छोटे व्यापार और छोटी कंपनियाँ चालू की जा सकती हैं। ये ही छोटी कंपनियाँ मिलकर बड़ी कंपनियाँ बन जाती हैं।
प्रत्येक परिवार की एक साख होती है। अच्छी साख वाले परिवार के प्रत्येक सदस्य को जीवन में अग्रसर होने में यह पूर्व संचित प्रतिष्ठा-सम्पदा बहुत लाभ पहुँचाती है।
मानसिक दृष्टि से लाभ :-
मानसिक दृष्टि से विचार कीजिए तो अनेक लाभ है। साथ-साथ रहने से सामाजिकता की वृद्धि होती है। मनोरंजन रहता है और तबियत लगी रहती है। चित्त ऊबता नहीं। बच्चों की मीठी तोतली बोली, माता का सुखद वात्सल्य, भाई-बहिनों का सौंदर्य, पत्नी का प्रेम, सबका सहयोग, कष्ट के समय उत्साह-जैसे विविध भावों का रुचिकर थाल सामने रहता है जिसे खाकर मानसिक क्षुधा तृप्त हो जाती है। पत्नी को लेकर पृथक हो जाने वाले लोग इन षटरस मानसिक व्यंजनों से वंचित रह जाते हैं। छोटे बच्चों का खेलना, बड़े बच्चों का पढ़ना, लड़कियों का काढ़ना-बुनना, अध्ययन, संगीत, स्त्रियों की अनुभव पूर्ण बातें, गृहकार्य करना, गृहपति का आगन्तुकों से वार्तालाप, वृद्धाओं की धर्मचर्चा एवं नानी की कहानियाँ-किसी में प्रेम किसी में चख चख, खटमिट्ठा स्वाद मिलकर कुटुम्ब एक अच्छा मनोरंजन स्थल बन जाता है। यह अपने आप में एक सोसायटी है।
आपत्ति की सुरक्षा के लिए सम्मिलित कुटुम्ब की प्रथा एक बहुत बड़ी गारंटी है। स्त्रियों के शाँत सदाचार की रक्षा के लिए यह एक ढाल के समान है। बीमार पड़ जाने पर इतने व्यक्ति सेवा शुश्रूषा के लिए प्रस्तुत रहते हैं और रोग मुक्ति का उपाय करते हैं। सबके साथ वृद्धावस्था आराम से कट जाने का संतोष रहता है। अपाहिज या अशक्त हो जाने पर भी आश्रय का विश्वास रहता है। मृत्यु हो जाने पर स्त्री बच्चों का पालन-पोषण हो जाने की निश्चिन्तता रहती है। पाश्चात्य देशों में जहाँ पृथक परिवार हैं। विधवाओं का जीवन बड़ा अश्लील रहता है। उन्हें स्वयं गृह के बाहर का काम-काज करना पड़ता है, या अन्यों का मोहताज रहना पड़ता है। हमारे बड़े परिवार में इनके पालन-पोषण तथा सम्पूर्ण जीवन सुख से व्यतीत करने की अच्छी सुव्यवस्था है। बच्चे, बूढ़े, अपंग, पागल, विधवा, सभी को आश्रय प्राप्त हो जाता है।
बाल्य मनोविज्ञान के अनुसार बच्चे अनुकरण प्रिय होते हैं। एक अच्छा परिवार एक स्कूल की भाँति है, इसमें हर एक बच्चा प्रारंभ से ही घरेलू शिक्षा प्राप्त करता है। वे साथ-साथ खेलते-कूदते खाते-पीते हैं, उनका शारीरिक और बौद्धिक स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन और वृद्धि को प्राप्त होता है। परिवार का प्रत्येक बालक बड़ों का अनुकरण कर कुछ न कुछ उत्तम शिक्षा, आदत, स्वभाव की विशेषता ग्रहण करता है। यही कारण है कि बड़े प्रतिष्ठित खानदानों की लड़कियाँ प्रायः चतुर, सुसंस्कृत, अच्छी आदतों वाली, सभ्य और व्यवहार कुशल होती हैं। माँ-बाप की अकेली संतान विशेषकर कन्या बड़े परिवार से पृथक प्रायः अकेली माँ-बाप के साथ रहती है, तो वह गृह संचालन के कार्य में बहुत कम सफल हो पाती है। उसके पारिवारिक संस्कार विकसित नहीं हो पाते। बुजुर्गों और अनुभवी व्यक्तियों के गुप्त संस्कार प्रतिपल बच्चों का आत्मिक विकास किया करते हैं। अतः पृथक रहकर बालक उतना विकसित नहीं हो पाता, जितना एक सुसंस्कृत, सुशिक्षित और सात्विक प्रकृति के सुसंचालित परिवार में पनपता है।
सामाजिक दृष्टिकोण से लाभ-
सामाजिक दृष्टि से सम्मिलित परिवार अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। चार अनुभवी व्यक्तियों के परिवार को सम्मिलित जनशक्ति देखकर प्रतिद्वन्द्वी अनायास मुकाबला नहीं करते, मित्र आकर्षित होते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। सम्मिलित शक्ति के स्वामित्व का बल घर के प्रत्येक सदस्य को रहता है। हर सदस्य समझता है कि किसी ने मेरा अपमान किया तो समस्त परिवार की जनशक्ति उससे प्रतिशोध लेगी। बीस व्यक्तियों के कुटुम्ब की सबकी शक्ति का अनुमान मान लीजिए एक मण है, तो वैसे पृथक-पृथक हर एक का बल दो सेर हुआ। पर, समाज में हर एक का बल एक-एक मण समझा जाता है। इस प्रकार हर एक को बीस गुनी शक्ति का लाभ तो अनायास ही प्राप्त हो जाता है।
पृथक रहने पर तो मनुष्य की जो वास्तविक शक्ति होती है, उससे भी न्यून प्रतीत होती है। दूसरे व्यक्ति समझते हैं कि “अपनी निजी आवश्यकताओं से इसके पास समय, बल और धन कम ही बचता होगा। इसके द्वारा यह किसी को हानि-लाभ न पहुँचा सकेगा।” इस मान्यता के आधार पर यह व्यक्ति वास्तविक स्थिति से भी छोटा प्रतीत होने लगता है। ऐसी स्थिति में देश या समाज की सेवा के निमित्त कोई महान त्याग करने के लिए वह व्यक्ति तत्पर नहीं हो पाता। यदि हो भी जाता है, तो उसे अतीव चिन्ता रहती है तथा उसके आश्रितों की कठिनाई का ठिकाना नहीं रहता।
धार्मिक दृष्टि से लाभ -
धार्मिक दृष्टि से सम्मिलित परिवार कर्त्तव्य, संयम, त्याग, निस्वार्थता, सेवा भावना की शिक्षा का पुण्य स्थान है। माता-पिता, बड़े भाई, साँस, ननद, जिठानी आदि के प्रति जो कर्त्तव्य है, वह सम्मिलित कुटुम्ब में रहकर ही निभाया जा सकता है। बड़े का सत्कार, सेवा, आदर तभी संभव है जब तक उनके साथ रहें। बड़े भी अपने अनुभव का लाभ छोटों को उसी दशा में दे सकते हैं। जिन बड़ों ने एक बालक को गोदी में खिलाया है और एक युग तक बड़ी-बड़ी आशाएं रखी हैं, वह समर्थ होते ही, पृथक हो जाता है, तो उन्हें भयंकर मानसिक आघात लगता है। यह धार्मिक दृष्टि से एक कृतघ्नता है। ऐसी कृतघ्नता को अपनाने से मनुष्य अपने सहज धर्मलाभ से, कर्त्तव्य पालन से वंचित रह जाता है।
जो परिवार को अपना धर्म क्षेत्र मानकर, नाना प्रकार के पुण्य कर्त्तव्यों का पालन करते हुए उसके द्वारा प्रभु पूजा करते हैं, वे सच्चा आत्म लाभ करते हैं। आपका परिवार परमेश्वर के द्वारा आपको सौंपा हुआ एक उद्यान है। उसमें नाना प्रकार के छोटे बड़े पौधे लगे हुए हैं। एक कर्त्तव्यशील माली की तरह आपको प्रत्येक छोटे बड़े पौधे को सींचना है। जो इस प्रकार अपने कर्त्तव्य का पालन करते हैं, वे एक प्रकार की योग साधना करते हैं और योग के फल को प्राप्त करते हैं। अपने निजी सीमित स्वार्थ की दृष्टि को विस्तृत करके जब मनुष्य उसे स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिजन आदि को फैलाता है, तब वह अहंभाव का विस्तार द्रुतगति से होने लगता है। फिर ग्राम, देश, विश्व से बढ़कर वसुधैव कुटुम्बकम की उसकी दृष्टि हो जाती है और सब कुछ अपना आत्मा का परमात्मा का दीखने लगता है, यही जीवन मुक्ति है।
इस प्रकार सम्मिलित परिवार एक सुदृढ़ गढ़ है, जिसमें कोई भी बाहर का व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता, कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, सर्वतोमुखी उन्नति हो सकती है। पर खेद के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि आज हमारे अधिकाँश सम्मिलित परिवार कलह और मनोमालिन्य के शिकार हैं। इसका कारण मुखिया (अधिष्ठाता घर का प्रधान) की कमजोरियाँ हैं। यदि प्रधान मनुष्य के मनोविज्ञान का अच्छा जानकार है, बच्चों, बूढ़ों, युवकों और स्त्री-स्वभाव को अच्छी तरह समझता है, तो वह कुटुम्ब के कलह का अवसर ही न आने देगा। उसे बड़ा अनुभवी, दूरदर्शी, न्यायसंगत, निःस्वार्थ, निष्पक्ष, शाँत स्वभाव का होना चाहिए। उसका विवेक जागृत रहे। वह शान्ति से सबके पक्ष सुने, विचारे और तत्पश्चात् निर्णय प्रदान करे। वह परिवार का कन्ट्रोलर या पथप्रदर्शक है, उसे आने वाली कठिनाइयाँ, घर की आर्थिक सुव्यवस्था, विवाह सम्बन्धों की चिन्ता, युवकों की नौकरियाँ, स्त्रियों के स्वास्थ्य और शिशुपालन का ज्ञान होना अपेक्षित है। अनेक बार उसे युक्ति से काम लेना पड़ेगा, प्रशंसा और प्रेरणा देनी होगी, क्रोध और डाट-फटकार का प्रयोग कर पथ भ्रष्टों की सन्मार्ग पर लाना होगा, और आर्थिक कार्यों के आगे चलना होगा। अपनी धार्मिक, उज्ज्वलता से उसे सब पारिवारिक सदस्यों का आदर भी और प्रतिष्ठा का पात्र भी बनना होगा।
सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा कितनी लाभदायक एवं उपयोगी है, इसका विवेचन किया जा चुका है। इसकी इतनी उपयोगिता देखकर ही समाज में इसका प्रचलन हुआ था। अब भी कोई व्यक्ति अपने परिवार से पृथक होने की माँग करता है तो वह स्वार्थी समझा जाता है। जो लोग शामिल रहते हैं वे उदार दृष्टिकोण के सतोगुण प्रधान समझे जाते हैं।
उपरोक्त तथ्य के होते हुए भी आज हम देखते हैं कि सम्मिलित परिवारों में क्लेश, कलह, मनोमालिन्य, ईर्ष्या, द्वेष, आपाधापी, दुराव एवं कपट का बोलबाला है। घर में जो अधिक कमाता है, जो अधिक चतुर है, जिसकी चलती है वह अपने तथा स्त्री पुत्रों के स्वार्थ साधन को, प्रधानता देता है और परिवार के अन्य सदस्यों की उपेक्षा करता है। बड़े छोटों पर रौब गाँठते उन्हें उचित अनुचित तरीके से दबाते हैं। छोटे-बड़ों का समुचित आदर नहीं करते। उनकी कर्कशता के प्रतिरोध में अपमान जनक शब्द कहते तथा अवज्ञा करते हैं। कोई काम से जी चुराता है, किसी को अत्यधिक श्रम करना पड़ता है। खान-पान, आदर-सम्मान, कपड़े-जेवर, श्रम-विश्राम, आना-जाना, मनोरंजन, जेबखर्च, बीमारी, चिकित्सा आदि में जब असमानता का व्यवहार होता है तो ईर्ष्या के अंकुर मन में उठते हैं। यह जब बराबर पनपते रहते हैं, बराबर उनमें पानी लगता रहता है, एक के बाद दूसरी घटनाएँ इन अंकुरों को पुष्ट करने के लिए उपस्थित होती रहती हैं तो मनोमालिन्य की जड़े मजबूत हो जाती हैं और नारंगी की तरह बाहर से एक दीखते हुए भी भीतर ही भीतर उस परिवार में पृथकता मजबूत हो जाती है। ऐसे परिवार उन सब लाभों से वंचित रह जाते हैं जो कि सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा में मिलने चाहिए। असंतुष्ट सम्मिलित परिवारों की स्थिति कई बार तो पृथक-पृथक रहने की अपेक्षा भी अधिक बुरी हो जाती है।
पारिवारिक कलह, असंतोष और मनोमालिन्य का कारण व्यवस्था क्रम में गड़बड़ी है। परिवार एक राज्य है। इसकी व्यवस्था, प्रणाली शासन पद्धति भी राज्य व्यवस्था के ढंग पर ही होनी चाहिए। प्राचीन काल में राजतंत्र का सिद्धाँत उपयोग भी था और सर्वप्रिय भी। पर आज समय बहुत बदल गया है। साँसारिक, सामाजिक, मानसिक परिस्थितियों में भारी हेर फेर हो गया है। इसलिए राजतंत्र के स्थान पर प्रजातंत्र को पसंद किया गया है। इंग्लैण्ड आदि देशों में जहाँ राजतन्त्र कायम है वहाँ भी प्रजा का हित ही प्रधान है। प्रजातन्त्र के तीन प्रमुख सिद्धान्त हैं। (1) जनता द्वारा शासन, (2) जनता के हित के लिए शासन (3) हर नागरिक के अधिकार की रक्षा। इसी आधार पर हमें पारिवारिक प्रजातन्त्र की स्थापना करनी चाहिए। वैधानिक प्रधान घर का मुखिया रहेगा पर गृह नीति के संचालक में परिवार के सदस्य का समुचित हाथ रखना चाहिए। घर के लोगों की नित्य नहीं तो प्रति सप्ताह एक बैठक अवश्य होनी चाहिए, जिसमें विचार विनिमय के लिए सबको अवसर मिले। इस बैठक में निम्न विषयों पर चर्चा की जावें। (1) हर सदस्य अपनी कठिनाई इच्छा तथा आवश्यकता बतावें। (2) गृह नीति में जो दोष हों या दूसरे सदस्य जो भूल कर रहे हों उसे बतावें। (3) पारिवारिक उन्नति के लिए जो सुझाव हों उन्हें रखें, (4) घर से बाहर की व्यापारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक समस्याओं पर विचार प्रकट करें। बैठक में घर का प्रधान एक-एक करके घर के हर सदस्य से यह चारों प्रश्न पूछें और बिना किसी संकोच के, निर्भयतापूर्वक किन्तु नम्रता और प्रेम मिश्रित वाणी में अपनी-अपनी बात विस्तार पूर्वक कहने के लिए हर सदस्य को अवसर दिया जाये। पर्दा प्रथा के कारण जो नव-वधुएं अपने विचार खुद नहीं प्रकट करना चाहती हैं वे किसी दूसरे के द्वारा अपनी बात कहलवा सकती हैं।
फूट और लड़ाई का अधिक आधार गलत फहमी पर निर्भर रहता है। जब आपस में विचार परिवर्तन होता रहता है तो बहुत सी गलतफहमी दूर होती रहती हैं और किसी ने जो भूल की थी वह सुधार लेता है। इस प्रकार इन बैठकों से लड़ाई झगड़े का आधार भाग तो अपने आप नष्ट हो जाता है। शेष बातों के सम्बन्ध में अपनी विचार विनिमय से ऐसे मार्ग ढूंढ़े जा सकते हैं जिनसे कठिनाइयाँ कम रहें और सुविधाएं बढ़ें।
अब घर का हर सदस्य यह समझता है कि गृह व्यवस्था में मेरा भी हाथ तथा अधिकार है। मेरे स्वार्थ भी समान रूप से सुरक्षित हैं, तो फिर कोई कारण नहीं कि वह सम्मिलित रहने के इतने लाभों को छोड़कर पृथकता की कठिनाई और जिम्मेदारी को अपने ऊपर लादना चाहे। यदि समानता, सम्मान, सुहृदयता और स्वार्थ रक्षा की चतुर्विधि व्यवस्था हर सदस्य के लिए बरती जाये तो परिवार सुदृढ़ आधार पर खड़े रहेंगे और अलग होने की आवश्यकता न पड़ेगी।
घर में सब लोग एक दूसरे का उचित सम्मान करें। कोई किसी के स्वाभिमान पर चोट न पहुँचावे। रोगी, बालक, वृद्ध या किसी विशेष स्थिति की बात छोड़कर भोजन के सम्बन्ध में समानता बरती जाये। स्वास्थ्य, आयु और योग्यता के अनुसार सबके काम बंटे हुए हों। न कोई निठल्ला रहें और न किसी को अत्यधिक श्रम करना पड़े। अपनी स्थिति के अनुसार थोड़ा-थोड़ा जेबखर्च भी हर एक को मिलता रहे जिसे स्वेच्छापूर्वक खर्च कर सकें। एक दूसरे की गतिविधि पर ध्यान रखें। समानता का अर्थ बालक और वृद्ध को समान मात्रा में भोजन देना या लड़की और नववधू को बराबर कपड़े जेवर बनवाना नहीं है। अपनी-अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप सबको चीजें दी जाये। आवश्यकता के अनुकूल वस्तुएं देना ही समानता का वास्तविक तात्पर्य है यदि रोगी को फल मिलते हैं तो निरोगी का भी वही माँगना यह समानता नहीं है। घर की आर्थिक स्थिति का, आय व्यय का ब्यौरा घर के समस्त बालिगों को मालूम रहना चाहिए।
इस प्रकार पारिवारिक प्रजातंत्र की स्थापना से गृह शासन भली प्रकार चल सकता है। सब की विचारधारा का सम्बन्ध होने से उत्तम गृह नीति बन सकती है। जब परिवार अधिक बढ़ने लगे या स्वभावों में असाधारण अंतर होने से किसी की पटरी न बैठती हो तो “प्रान्तीय स्वाधीनता” दी जानी चाहिए। केन्द्रीय सरकार के अधीन, गृह स्वामी की देख रेख में, अलग छोटे उप-परिवार भी बनाये जा सकते हैं। लड़-झगड़कर अलग होने की अपेक्षा, सहमति, स्वीकृति और संरक्षता में पृथक होना कहीं अच्छा है। स्त्रियों का संघर्ष चौका-चूल्हा अलग कर देने या काम बाँट देने से दूर हो जाता है। पुरुषों का संघर्ष कार्य क्षेत्र की पृथकता से मिट जाता है।
संकीर्ण, अनुदार, तुच्छ, दृष्टिकोण के कारण घर में संघर्ष होते हैं। अपने निजी स्वार्थों की परवाह न करके घर के अन्य सदस्यों के हित का समुचित ध्यान रखा जाये, आपस में प्रेम, सहानुभूति, सेवा, सहायता एवं समानता का उदार धार्मिक दृष्टिकोण रखा जाये तो परिवार का प्रजातन्त्र बड़ी अच्छी तरह चल सकता है। यह प्रजातंत्र घर में शान्ति रख सकता है, सुव्यवस्था रख सकता है। शत्रुओं को परास्त कर सकता है, अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकता है और घर के हर एक व्यक्ति को सुरक्षा, सुविधा, निश्चिन्तता, प्रसन्नता तथा सम्पन्नता प्रदान कर सकता है। ऐसे प्रजातंत्र की प्रजा अपनी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति की ओर निरन्तर अग्रसर हो सकती है।
आइए! हम लोग अपने घरों में पारिवारिक प्रजातंत्र की स्थापना करके गृह-स्वराज्य का उपभोग करें।
परिवार एक प्रकार का प्रजातन्त्र है, जिसमें मुखिया, प्रेसीडेन्ट तथा परिवार के अन्य सज्जन प्रजा है। पिता-माता, पुत्र, बहिन, चचा-चाची, भाभी, नौकर इत्यादि सभी का इसमें सहयोग है। यदि सभी अपने सम्बन्ध आदर्श बनाने का प्रयत्न करें, तो हमारे समस्त झगड़े क्षण मात्र में दूर हो सकते हैं।
पिता और पुत्रः एक वृहत् आत्मा तथा उसके आत्माँश का सम्बन्ध वही हो सकता है, जो आदि प्रभु तथा पृथ्वीतल की अन्य आत्माओं में परस्पर हो सकता है। आज हम देखते हैं कि पिता पुत्र में कटुता है। इसका कारण पिता के पुत्र पर डाले गए दूषित संस्कार है। यदि पुत्र में दुर्गुण हैं, तो उसका उत्तरदायित्व पिता पर ही माना जायेगा। यदि वह कुछ भी दूरदर्शिता से कार्य लेता, तो पुत्र को किसी भी ढांचे में परिवर्तित कर सकता था। बिगड़े हुए पुत्रों के पिताओं में दोष है। उसका परिष्कार भी वहीं से होना उचित है। पहले पिता अपना सुधार करें। तत्पश्चात् पुत्रों से उन्नति की आशा करें।
पिता का उत्तरदायित्व सबसे अधिक है। वह परिवार का अधिष्ठाता है, आदेश कर्ता और संरक्षक है। उसके कर्त्तव्य सबसे अधिक हैं। वह परिवार की आर्थिक व्यवस्था करता है, बीमारी में दवा-दारु, कठिनाई में सहायता, कुटुम्ब की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। संपूर्ण कुटुम्ब उसी की बुद्धि, योजनाओं, योग्यताओं और पथप्रदर्शन पर निर्भर है।
क्या आप पिता हैं? यदि हैं तो आप पर उत्तरदायित्व का सबसे अधिक भार है। घर का प्रत्येक व्यक्ति आपसे पथप्रदर्शन की आशा करता है। संकट के समय सहायता, मानसिक क्लेश के समय सान्त्वना और शैमितय में प्रेरणात्मक उत्साह चाहता है। पिता बनना सबसे कठिन है क्योंकि इसमें छोटे-बड़े सभी को इस प्रकार संतुष्ट रखना पड़ता है कि किसी से कटुता भी न हो, और कार्य भी होता रहे। घर के सब झगड़े भी दूर होते चलें और किसी के मन में गाँठ भी न पड़े। परिवार के सब सदस्यों की आर्थिक आवश्यकताएं भी पूर्ण होती रहें, और कर्ज भी न हो, विवाह, उत्सव, यात्राएं, दान भी यथाशक्ति दिये जाते रहें।
पुत्रों को पिता से कितनी प्रेरणा और पथ प्रदर्शन हो सकता है, इस सम्बन्ध में कुछ विद्वानों के अनुभव देखिए। युवक कैक्सटन कहता है -
“मैं प्रायः औरों के साथ की लम्बी सैर, छोड़ क्रिकेट का खेल छोड़, मछली का शिकार छोड़ अपने पिता के साथ बाहर बगीचे की चाहर दीवारी के किनारे धीरे-धीरे टहलने जाता। ये कभी तो चुप रहते, कभी बीती बातों को सोचते हुए आगे की बातों की चिन्ता करते पर जिस समय वे अपनी विद्या के भंडार को खोलने लगते और मध्य में चुटकुले छोड़ते जाते, उस समय एक अपूर्व आनंद आ जाता था।” कैक्सटाइन थोड़ी-सी कठिनाई आ जाने पर पिता के पास जाता था और अपने हौंसलों और आशाओं को उसी के सामने कहता। वह उसे नई प्रेरणा से भर देता था।
डॉक्टर ब्राउन कहते हैं - “मेरी माता की मृत्यु के उपरान्त मैं उन्हीं के पास सोता था। उनका पलंग उनके पढ़ने के कमरे में रहता था, जिसमें एक बहुत छोटा-सा आतिशदान भी था। मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि किस प्रकार वे उन मोटी बेढंगी जर्मन भाषा की पुस्तकों को उठाते थे और उनसे चारों ओर से घिर कर उनमें गड़ जाते थे। पर कभी-कभी ऐसा होता कि बहुत रात गये या सवेरा होते-होते मेरी नींद टूटती और मैं देखता कि आग बुझ गई है, उजाला खिड़की के रास्ते से कुछ-कुछ आ रहा है, उनका सुन्दर गम्भीर मुख झुका हुआ है और उनकी दृष्टि उन्हीं पुस्तकों की ओर गड़ी हुई है। मेरी आहट सुनकर वे मुझे मेरी माँ का रखा हुआ नाम लेकर पुकारते और बिस्तर पर आकर मेरे गरम शरीर को छाती से लगाकर सो रहते।” इस वृतान्त से हमें उस स्नेह और विश्वास का आदर्श मिलता है, जो पिता पुत्र में होना चाहिए।
आज के युग में पिता-पुत्र में जो कड़ुवाहट आ गया है वह नितान्त संकुचिता है। पुत्र अपने अधिकार माँगता है। किन्तु कर्त्तव्यों के प्रति मुख मोड़ता है। जमीन, जायदाद में हिस्सा माँगता है, किन्तु वृद्ध पिता के आत्म सम्मान, स्वास्थ्य, उत्तरदायित्व, इच्छाओं पर तुषारापात करता है। पुत्र ने परिवार के बंधन थिथिल कर दिए हैं। घर-घर में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुशासन विरोध का कुचक्र फैल रहा है। यह प्रत्येक दृष्टि से निन्दनीय एवं त्याज्य है।
पुत्र पिता से क्या क्या सीखता है?
पिता-पुत्र का सम्बन्ध बड़ा विचित्र है। पिता को पुत्र के मनोविकारों की अच्छी जानकारी होती है। उसका पुत्र के साथ तीन प्रकार का सम्बन्ध होता है। (1) पथप्रदर्शक का, (2) तत्वचिन्तक का, (3) मित्र का।
पिता के संरक्षण पर पुत्र निरंतर कुछ न कुछ सीखता है। पिता को चाहिए कि बड़ी सावधानी से जीवन में आने वाले प्रलोभन, कठिनाइयाँ, तथा अन्य आवश्यक जानकारी का परिचय वह पुत्र को करा दे। बड़ा होने पर पुत्र के साथ वही व्यवहार किया जाय, जो मित्र के साथ होता है। पिता-पुत्र के अच्छे सम्बन्धों का गुर यही है कि ज्यों-ज्यों पुत्र बड़ा होता जाय, त्यों-त्यों पिता उस पर अनुशासन कम करता जाय, मित्र बनाने का उपक्रम करें, महत्वपूर्ण बातों में उससे सलाह ले, उसकी राय लेकर रुपया व्यय करे, और उस पर यह धाक जमा दे कि वह उसका पूर्ण विश्वास करता है। पिता पुत्र के स्नेह में यद्यपि मृदुलता कम रहती है, पर विश्वास की मात्रा अधिक रहती है, यद्यपि आलम्बन का मृदुल भाव कम रहता है, पर समता की बुद्धि विशेष रहती है।
बुद्धिमान तथा सुशील पिता से जितना हम सीख सकते हैं उतना सैकड़ों शिक्षकों से नहीं। पिता सबसे बढ़कर हितैषी, शिक्षक है, जिसके पाठ हम न केवल मुख से, वरन्, उसके कार्यकलाप-आचार व्यवहार, चरित्र नैतिकता सबसे ग्रहण करते हैं। उसके धैर्य, आत्मनिग्रह, कोमल स्वभाव, सम्भावनाओं की तीव्रता, शिष्टता, पवित्रता और धर्म परायणता आदि गुण का स्थायी प्रभाव पुत्र पर प्रतिपल पड़ता है।
मुझे स्वयं अपने पिता के पथप्रदर्शन का अनुभव है। मैं जब प्रारम्भिक दिनों का स्मरण करता हूँ, तो मुझे उन्हीं के गुण अपने व्यक्तित्व में विकसित मिलते हैं। तीस वर्ष पूर्व जब मैं एक अबोध बालक था, जमींदार पिता के साथ अपने गाँव के भीषण जंगलों में रहा। उन्हीं के साथ सोना, प्रातः जागरण, भजन, पूजा फिर दौड़ और अध्ययन, दूर-दूर की सैर, प्रकृति के अंचल में तैरता हुआ अनुभव मेरे दिल दिमाग में है। कभी मैं देखता देर रात्रि में पिताजी बैठे पुस्तक पढ़ रहे हैं, पेंसिल से निशान लगाते जाते हैं, झट-झट पुस्तकों का रसास्वादन करते जाते हैं। उनकी कापियाँ, लिखने का ढंग, प्रोफेसरी-सभी कुछ मेरे मस्तिष्क में एक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया से घुस गया है। मैं आज बौद्धिक और नैतिक चिंतन के क्षेत्र में जहाँ तक पहुँचा हूँ, उन्हीं के पद चिन्हों पर चल कर हो सका है। उनकी आदतें और विश्वास हमारे प्रत्येक परिवार के सदस्य में प्रविष्ट हो गये हैं।
पिता का जीवन एक खुली पुस्तक है, जिसका प्रत्येक पृष्ठ खुला रहना चाहिए, जिसकी एक-एक पंक्ति और अक्षर घर के छोटे व्यक्ति पढ़ सकें और जीवन में उतार सकें। पिता के धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कारों का सबसे अधिक प्रभाव पुत्र पुत्री के आध्यात्मिक जीवन पर पड़ता है। हम उन संस्कारों, मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं द्वारा विनिर्मित हुए हैं, जिनका अलक्षित प्रभाव हमारे माता-पिता हमारे ऊपर छोड़ गये हैं।
माता का प्रभाव :-
माता स्नेह की साक्षात प्रतिमूर्ति है। उसकी भावनाओं तथा दूध पिलाते समय की आकांक्षाओं से हमारे मनोजगत का निर्माण हुआ करता है। माता बचपन में बालक को जैसी कहानियाँ, आपबीती, चुटकुले या और बातें सुनाया करती हैं, वे बालक के अंतःप्रदेश में प्रवेश करके ग्रन्थियों का निर्माण करते हैं। माता की लोरियों विशेष प्रभावशाली होती हैं। बालक अर्द्धनिद्रा में निमग्न है। माता लोरी गा-गा कर उसे सुला रही है। यह एक प्रकार की आत्मप्रेरणा है, जो धीरे-धीरे उसके बनते हुए गुप्त मन पर प्रभाव डाल रही है। इसी से उसका मानसिक संस्थान बनता है। माता की पूजा एक आध्यात्मिक साधन है जिससे मन को शान्ति प्राप्त होती है। माता भी पुत्र को उन्हीं अंशों तक दबाती है, जहाँ तक उसके “अहं” पर ठेस न पड़े। वह पुत्र के लिए महान त्याग को प्रस्तुत रहती है। फिर पुत्र के लिए जो कर दे, थोड़ा ही गिना जायेगा।
पं. रामचन्द्र शुक्ल का मत श्रेष्ठ है। आप लिखते हैं। - “पुत्र को माता-पिता के व्यय का, उससे अधिक अनुभव का, उसके उन दुखों का जिन्हें उसने उनके लिए उठाया है, सर्वदा ध्यान रखना चाहिए। पुत्र को पिता के स्वाभाविक बड़प्पन को स्नेह पूर्वक खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए। बहुत से पत्र ऐसे होते हैं, जो बिलकुल बुरे, बे कहे और स्नेह शून्य तो नहीं होते, पर वे अपने पिता के साथ मान मर्यादा का भाव छोड़ इस प्रकार के हेल मेल का व्यवहार रखते हैं मानो उनका गहरा सगी हो। वे उससे चलती बाजार बोली में बात चीत करते हैं और वे उसके प्रति इतना सम्मान भी नहीं दिखाते जितना एक बिना जाने सुने आदमी के प्रति दिखलाते हैं। यह बेअदबी तिरस्कार से भी बुरी है।’
भाई-भाई का व्यवहार सरस करने के अमूल्य उपाय
भाई-भाई के झगड़ों के कारण एक ही घर में दीवार खिंच जाती है और थोड़ी सी बात में झगड़ा बढ़ सकता है। भाइयों में पारस्परिक कटुता के कारण प्रायः ये होते हैं - (1) जायदाद का बटवारा, (2) पिता का एक पर अधिक स्नेह दूसरे का तिरस्कार, (3) एक भाई का अधिक पढ़ लिख सम्पन्न होना, दूसरे की हीनता, (4) मिथ्या गर्व और अपने बड़प्पन की मिथ्या भावना, (5) अशिष्ट व्यवहार, (6) एक भाई की कुसंगति, सिगरेट या व्यभिचार इत्यादि दुर्गुण (7) उनकी पत्नियों का मन परस्पर न मिलना।
उपरोक्त कारणों में कोई भी उपस्थिति होने पर बड़े भाई को पूर्ण शान्ति और विवेक से छोटे की मनोवृत्ति पर देखभाल, सूक्ष्म अध्ययन करना चाहिए। कभी-कभी तनिक से विवेक बुद्धि और शाँति से बड़े काम बनते हैं। गर्मा-गर्मी में आने से अपशब्द उठते हैं, बड़े भाई को आत्म सम्मान एवं प्रतिष्ठा की हानि होती है। यदि एक दूसरे लिए थोड़ा सा त्याग कर दिया जाय, तो अनेक झगड़े तय हो सकते हैं।
जायदाद के बटवारे के मामले में किसी बाहरी सज्जन को डालकर उचित बटवारा कराना और जितना मिले उसी में प्रत्येक को संतोष रखना चाहिए। यदि हम थोड़ा सा त्याग करने को प्रस्तुत रहें, तो कोई कठिनाई आ ही नहीं सकती। यदि पिता एक पुत्र पर अधिक तथा दूसरे पर कम प्रेम प्रकट करते हैं, तो भी व्यग्र होने का कोई कारण नहीं है। पिता के हृदय में सबके प्रति समान प्रेम है। चाहे वे प्रकट एक पर ही करें, वह प्रत्येक पुत्र-पुत्री को समभाव से प्रेम करते हैं। इस प्रकार का दृष्टिकोण रखने से हम अनेक कलुषित और अनर्थकारी विचारों से बच सकते हैं।
झगड़ा कराने में पत्नियों का विशेष हाथ रहता है। उनमें ईर्ष्या का दुर्गुण बहुत मात्रा में होता है। यदि पत्नियों को शिक्षा दी जावे और कुशलता से स्त्री स्वभाव की इस कमजोरी का ज्ञान करा दिया जावे, तो अनेक झगड़े प्रारंभ ही न हों। एक अच्छा नियम यह है कि पत्नी की बातों में न आया जाय और गलतफहमी से बचा जाय। यदि कोई गलतफहमी आ जाय तो शान्ति से उसे दूर करना उचित है। उसे हृदय में रखना पाप की मूल है। बाहर वालों के कहने में कदापि न आना चाहिए।
भाई से आपकी आत्मा और रक्त का सम्बन्ध है। दोनों में उसी आत्मा का अंश है, उसी रक्त से उनके शरीर, मन तथा भावनाओं का निर्माण हुआ है। उसमें कटुता का तत्व किसी तीसरे के षडयंत्र से होता है। समाज में ऐसे व्यक्तियों की न्यूनता नहीं है, जो परस्पर युद्ध करा दे। अतः उनसे बड़े सावधान रहें।
भाई आपका सबसे बड़ा मित्र और हितैषी है। बड़ा भाई पिता तुल्य गिना जाता है। छोटा भाई आड़े समय अवश्य काम आता है। सेवा करता है। एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। यदि दो भाई मिल जुलकर अग्रसर हों तो संसार में निर्विघ्न चल सकते हैं। एक दूसरे के आड़े समय पर काम आ सकते हैं, आर्थिक सहायता कर सकते हैं, और एक के मरने पर दूसरे के कुटुम्ब का पालन पोषण कर सकते हैं। वे भाई धन्य हैं जो मिलजुल कर चलते हैं।
छोटा भाई आप में पथप्रदर्शक, हितैषी एवं संरक्षक की प्रतिच्छाया देखता है। उसके लिए आपको वही त्याग और बलिदान करने चाहिए जो एक पिता अपने पुत्र के लिए करता है। पिता की मृत्यु के पश्चात ज्येष्ठ पुत्र के ऊपर संपूर्ण उत्तरदायित्व आ जाता है।
सन्तान के साथ हमारा व्यवहार :-
ईश्वर ने जो संतान तुम्हें दी है, वह अनेक जन्मों के वरदान और उपहार स्वरूप प्राप्त हुई है। उसे परमेश्वर का अनुग्रह समझ कर ग्रहण करना चाहिए। संतान के प्रति सच्चा और निष्कपट प्रेम करना चाहिए। यह अनुचित लाड़ या झूठा स्नेह न हो जो तुम्हारी स्वार्थपरता और मूर्खता से उत्पन्न होता है और उनके जीवन को नष्ट करता है।
तुम यह कभी न भूलो कि तुम्हारे गृह में पदार्पण करने वाले तुम्हारे आत्म स्वरूप ये बालक भावी नागरिक हैं, जो समाज और देश का निर्माण करने वाले है। ईश्वर की और से तुम्हारा यह कर्त्तव्य है कि उनकी सुशिक्षा, शिष्टता तथा परिष्कार की समस्या में हम पर्याप्त दिलचस्पी लें।
तुम अपनी संतान को केवल जीवन के सुख और इच्छा पूर्ति मात्र की ही शिक्षा न दो, वरन् उनको धार्मिक जीवन, सदाचार और कर्त्तव्य पालन, आध्यात्मिक जीवन की भी शिक्षा-प्रदान करो। इस स्वार्थमय समय में ऐसे माता-पिता विशेषतः धनवानों में बिरले ही मिलेंगे, जो संतान की शिक्षा के भार को, जो उनके ऊपर है, ठीक-ठीक परिमाण में तोल सकें।
जैसा वातावरण तुम्हारे घर का है, उसी साँचे में ढलकर तुम्हारी संतानों का मानसिक संस्थान, आदतें, साँस्कृतिक स्तर का निर्माण होगा। जबकि तुम अपने भाइयों के प्रति दयालु, उदार और संयमी नहीं हो, तो अपनी सन्तान से क्या आशा करते हो कि वे तुम्हारे प्रति प्रेम दिखलाएंगे। जब तुम अपना मन विषय-वासना, आमोद-प्रमोद तथा कुत्सित इच्छाओं से नहीं रोक सकते, तो भला वे क्यों न कामुक और इन्द्रिय लोलुप होंगे। यदि तुम माँस, मद्य या अन्य अभक्ष्य पदार्थों का उपयोग करते हो, तो वे भला किस प्रकार अपनी प्राकृतिक पवित्रता और दूध जैसी निष्कलंकता को दूर रख सकेंगे। यदि तुम अपनी अश्लील और निर्लज्ज आदतों, गन्दी गालियों, अशिष्ट व्यवहारों को नहीं छोड़ते, तो भला तुम्हारे बालक किस प्रकार गन्दी आदतें छोड़ सकेंगे।
तुम्हारे शब्द, व्यवहार, दैनिक कार्य, सोना, उठना-बैठना ऐसे साँचे हैं, जिनमें उनकी मुलायम प्रकृति और आदतें ढाली जाती हैं। वे तुम्हारी प्रत्येक सूक्ष्म बात देखते और उनको अनुकरण करते हैं। तुम उनके सामने एक मॉडल, एक नमूने या आदर्श हो, जिसके समीप वे पहुँच रहे हैं। इसलिए यह तुम्हीं पर निर्भर है कि तुम्हारी सन्तान मनुष्य हो या मनुष्याकृति वाले पशु।
हमारे परिवारों में आमोद-प्रमोद का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा जा रहा है, फलतः वह दुख से भरे हैं। हम अपने परिवार से अनेक प्रकार के काम तो चाहते हैं, उसके लिए पुनःपुनः उनसे कहते हैं, किन्तु हम यह नहीं सोचते कि परिवार में मनोरंजन के कितने साधन हमने एकत्र किये हैं। सौ में अस्सी प्रतिशत परिवार अशिक्षा के अन्धकार से घनीभूत हैं। उनमें आमोद प्रमोद की आवश्यकता ही अनुभव नहीं की जाती। जिन परिवारों में आमोद-प्रमोद का ध्यान नहीं दिया जाता। वहाँ के व्यक्तियों का जीवन बड़ा शुष्क और व्यस्त रहता है। वहाँ के व्यक्ति अल्पायु होते हैं।
प्रफुल्लता, हंसी-मजाक, मनोविनोद, मनोरंजन जीवन के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने भोजन, वायु, वस्त्र तथा जल। प्रत्येक बुजुर्ग का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि अपनी रुचि, परिस्थिति, आय, समय तथा आवश्यकता के अनुसार स्वयं पूरे परिवार के लिए यहाँ तक कि प्रत्येक सदस्य के लिए आमोद-प्रमोद की व्यवस्था करे। हम यह नहीं कहते कि सबको उच्च कोटि से अधिक खर्च वाले मनोरंजन ही प्राप्त हों, हाँ किसी न किसी प्रकार का विनोद अवश्य मिले। साधारण परिवार के लिए हम यहाँ कुछ उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करते हैं।
जिन परिवारों में लोगों का पेशा या व्यवसाय शारीरिक श्रम पूर्ण है, जो दिन भर अपने शरीर से परिश्रम कर पसीना बहाकर द्रव्योपार्जन करते हैं, उसके आमोद-प्रमोद मूलतः मानसिक होने चाहिए। वे मनोरंजन के ऐसे साधन निकालें, जिनसे उनके थके हुए शरीर को अधिक परिश्रम न करना पड़े, प्रत्युत मानसिक दृष्टि से भी उन्हें प्रसन्नता के साधन मिल जाये। ऐसे व्यक्तियों के लिए उनका पठन-पाठन उत्तम मनोरंजन का साधन हो सकता है। वे नई-नई पुस्तकें पढ़ें। अपना अधिकाँश समय पुस्तकालय में बिताएं और नये-नये समाचार पत्र, साप्ताहिक, मासिक, पत्र पढ़ें और मनोरंजन के साथ ज्ञान-बुद्धि भी करें।
मजदूर, श्रमिक, मिल के सेवक, दुकानदार, मिस्तरी, बाहरी फेरी लगाने वाले, काश्तकार जितना मनोरंजन पुस्तकों तथा समाचार-पत्रों से प्राप्त कर सकते हैं, उतना सिनेमा से नहीं। सिनेमा का मनोरंजन महंगा और अश्लील है। सरस कविता के उच्च स्वर से पाठ करने में थकान और शुष्कता दोनों दूर हो जाते हैं। इनके द्वारा गंभीर और चिन्तनशील पाठक उत्तम संस्कृति और सात्विक मनोरंजन प्राप्त कर सकता है। कविताएं, गीत, दोहे, चौपाई सस्ते से सस्ते सात्विक मनोरंजन हैं।
नित्य के भोजन से निवृत्त होकर पूरा परिवार बैठ जाये। एक व्यक्ति कोई मनोरंजन पुस्तक समाचार-पत्र, पौराणिक, धार्मिक ग्रंथ या रामायण इत्यादि काव्य उच्च स्वर से पढ़े, अन्य उसे सुनें। यदि परिवार में पुस्तक, समाचार पत्र या मासिक पत्र मंगाने की सामर्थ्य हो, तो घर में एक घरेलू पुस्तकालय खोला जाय और साहित्य का आनंद लूटा जाये। प्रत्येक परिवार में ऐसे पत्र-पत्रिकाएं मंगवाये जाये, जिनमें ज्ञानवर्द्धन के साथ-साथ समाचार और मनोरंजन दोनों प्राप्त होते रहें। उपयोगी पत्रों में ‘हिन्दुस्तान’ (दैनिक), ‘समाज’ (साप्ताहिक), ‘मनोरमा’ तथा ‘सरस्वती’ (मासिक) आने चाहिए। घर का प्रत्येक सदस्य इन पत्रों से यथेष्ट मनोरंजन और ज्ञान संचय कर सकता है।
सिनेमा के मनोरंजन के पक्ष में हम नहीं हैं। हाँ, यदि कोई उच्च कोटि का सामाजिक या धार्मिक चित्र आ जाये तो दूसरी बात है। यह स्मरण रहे कि हमारे अधिकाँश फिल्म अत्यंत विषैली, कामोत्तेजिक सामग्रियों से भरे हुए हैं और यदि संभलकर चुनाव न किया जाये, तो यह मनोरंजन हमारे समाज को पतन और मृत्यु के मार्ग में ढकेल सकता है। हमें चाहिए कि परिवार के लिए घरेलू खेलों को अपनावें। जब सिनेमा न था, अखाड़ों की मिट्टी बोलती थी और भजन, कीर्तन, हुआ में दिल हँसते-रोते थे। रामायण तथा महाभारत की कड़ियाँ, आल्हा के छन्द हमारी रगों में रक्त बनकर दौड़ते थे। हम देशी खेल-कूद, तैरना, इत्यादि से स्वास्थ्य रहते थे। पुराने काल में मनोरंजनों से स्वास्थ्य, आचरण दोनों ही ठीक रहते थे। हमें चाहिए कि पुनः उन सात्विक मनोरंजनों को अपनावें और उच्छृंखलता तथा गृहकलह उत्पन्न करने वाले सिनेमा के विषैले मनोरंजन से बचें।
भारतीय परिवारों के लिए संगीत मनोरंजन का उत्कृष्ट साधन है। भारतीय नारी का यह विशेष आभूषण है। वे अपने कटु अनुभवों को संगीत की स्वर-लहरी में तिरोहित कर सकती हैं। जो भी वाद्ययन्त्र रचे-हारमोनियम, सितार, तम्बूरा, ढोलक, उसी पर गाना चाहिए। जो कविता उत्तम जंचे, जो काव्य ग्रंथ रुचे जिस कवि की वाणी मीठी लगे, उसे ही उन्मुक्त कराए पाठ करना चाहिए। संगीत और वादन मनोरंजन के सात्विक साधन हैं।
परिवार के व्यक्ति अपनी छुट्टी का दिन घर के जेलखाने से बाहर बितायें। भोजन साथ ले लें और बाहर निकल पड़े। शहर में या बाहर किसी उद्यान, झील, सरिता-तट, जंगल या अन्य किसी रमणीय प्राकृतिक स्थान में व्यतीत करना चाहिए। कैम्प-जीवन का स्त्रियों और बच्चों के स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। बाहर सैर-सपाटे से पाचन क्रिया तो ठीक होती ही है, हृदय भी नवशक्ति से परिपूर्ण हो जाता है। पाश्चात्य देशों में स्नान करने के लिए बड़ी संख्या में लोग सरिता तट या झील पर जाते हैं, धूप-स्नान करते हैं, नदी तैरते हैं, खेल-कूद करते हैं। पूर्ण स्वास्थ्य के लिए कैम्प-जीवन अत्यंत आवश्यक है। घर की पुरानी परिस्थितियों से निकलकर प्रकृति की नवीन परिस्थितियों में आने से मन प्रफुल्लित हो जाता है। पर्वतों का पर्यटन आयु को और भी बढ़ा देता है। जंगल, उद्यान, घास पर टहलना मनोविनोद के अच्छे साधन हैं।
जो परिवार खरीद सकते हैं, उन्हें धीरे-धीरे रुपया बचाकर एक रेडियो ले लेना चाहिए। यह घर में शिक्षा-संस्था है, जो मनोरंजन भी देती है। आजकल रेडियो-प्रोग्राम इस तरकीब से रखे जाते हैं कि जानकारी के साथ-साथ उत्तम मनोरंजन भी प्राप्त हो सके। औरतों तथा बच्चों के लिए पृथक-पृथक विशेष प्रोग्राम रखे जाते हैं।
जो व्यक्ति दिन-रात पढ़ने-लिखने या क्लर्की का काम करते हैं, उन्हें सायंकाल कुछ न कुछ खेलने की योजना बनानी चाहिए। हाकी, फुटबाल, बालीवाल, क्रिकेट जो भी चाहें, वे खेलें, पर हाथ पाँव अवश्य बचावे। कम से कम टहलने अवश्य जाएं, भागें, दौड़ें, कूदें। कुछ व्यायाम होने दें सैर को जाने से शरीर पुनः उत्फुल्ल हो जाता है। पुरुषों की अपेक्षा बेचारी स्त्रियों का जीवन अधिक बंधा हुआ है। उन्हें घर के झंझटों में बंधा रहना पड़ता है। अतः उनके लिए छुट्टियों तथा कैम्पों की, सैर की परम आवश्यकता है। बाल-बच्चों को घुमाने ले जाते हैं, तो रंग बिरंगे पुष्पों नाना वस्तुओं को देखकर उनका मन प्रफुल्लित हो उठता है। छुट्टियों में स्थान परिवर्तन अवश्य होना चाहिए। बाहर जाने की योजना बनानी चाहिए। कुछ खेलों का सामान ले जाना उत्तम है। वहाँ खाने का प्रोग्राम रहे। यदि वहीं भोजन बने तो उत्तम है। फल भी ले जाये जाते हैं। वहीं किसी सरिता के तट पर भोजन किया जाये। संगीत हो, खेल हो, स्नान हो। सायंकाल पर्यटन किया जाये।
हमारे परिवारों में त्यौहार एक प्रकार के समारोह से होने चाहिए। उस दिन जल्दी भोजन बनाकर सब साथ भोजन करें। फिर ग्रामोफोन या कथा-वार्ता चले। बाहर से पड़ोसियों को आमंत्रित किया जाय। साल-गिरह तथा अन्य उत्सवों में बाहर वालों का सहयोग लेना चाहिए। स्वयं दूसरों के यहाँ भी जाना चाहिए। त्यौहार में खेल-कूद, आमोद-प्रमोद खूब होना चाहिए। मंदिरों में पूजा के लिए जायें, तो हृदय में उत्साह रहे और मन में आह्लाद।
प्रत्येक परिवार के मुखिया को स्वयं सोचकर अपनी परिस्थिति के अनुसार खेलों तथा मनोरंजन की योजना बनानी चाहिए।
मित्रता की आवश्यकता एवं उसका निर्वाह-
परिवार में अनेक ऐसी अड़चने आती हैं जिनमें बिना पड़ौसी तथा मित्रों की सहायता के बिना काम नहीं चलता। विवाह, जन्मोत्सव बिना काम नहीं चलता। विवाह, जन्मोत्सव, प्रवास में जाने पर, बीमारी में, मृत्यु के दुखद प्रसंगों में आर्थिक कठिनाइयों के मौकों पर तथा जटिल अवसरों पर राय लेने के लिए मित्रों की अतीत आवश्यकता है।
पर मित्र तथा उत्तम पड़ौसी का चुनाव बड़ा कठिन है। अनेक व्यक्ति आपसे अपना काम निकालने के लिए स्वार्थमय उद्देश्य से मित्रता करने को उतावले रहते हैं किंतु अपना कार्य निकल जाने पर कोई सहायता नहीं करते। अतः बड़ी सावधानी से व्यक्ति का चरित्र, आदतें, संग, शिक्षा इत्यादि का निश्चय करके मित्र का चुनाव होना चाहिए। आपका मित्र उदार, बुद्धिमान, पुरुषार्थ और सत्य परायण होना चाहिए। विश्वास पात्र मित्र जीवन की एक औषधि है। हमें अपने मित्रों से यह आशा करनी चाहिए कि वे हमारे उत्तम संकल्पों को दृढ़ करेंगे, तथा दोषों एवं त्रुटियों से बचावेंगे, हमारी सत्य, पवित्रता और मर्यादा को पुष्ट करेंगे। यदि हम कुमार्ग पर पाँव रखेंगे, तब हमें सचेत करेंगे, सच्चा मित्र एक पथ प्रदर्शक, विश्वासपात्र और सच्ची सहानुभूति से पूर्ण होना चाहिए।
पं. रामचन्द्र शुक्ल ने मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बताया है- “उच्च और महा कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिखाना कि तुम अपनी निजकी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ। यह कर्त्तव्य उसी से पूर्ण होगा, जो दृढ़ चित्त और सत्य संकल्प का हो। हमें ऐसे ही मित्रों का पल्ला पकड़ा चाहिए जिनमें आत्मबल हो, जैसे सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था।”
मित्र हो तो प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के हों, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सकें और यह विश्वास कर सकें कि किसी प्रकार का धोखा न होगा मित्रता एक नई शक्ति की योजना है। बर्क ने ने कहा है - “आचरण दृष्टान्त ही मनुष्य जाति की पाठशाला है, जो कुछ वह उससे सीख सकता है वह और किसी से नहीं।”
यदि आप किसी के मित्र बनते हैं तो स्मरण रखिए आपके ऊपर वह जिम्मेदारी आ रही है। आपको चाहिए कि अपने मित्र की विवेक बुद्धि, अन्तरात्मा जागृत करें, कर्तव्य बुद्धि की उत्तेजना प्रदान करें, और उसके लड़खड़ाते पाँवों में दृढ़ता उत्पन्न कर दें।
जीवन के आवश्यक कार्य -
हमारे कार्य चार प्रकार के होते हैं। (1) पशु तुल्य (2) राक्षस तुल्य, (3) सत्पुरुष (4) देव तुल्य। प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार में कार्य करते समय इन पर दृष्टि डालनी चाहिए।
वे सब कार्य जिनमें बुद्धि का उपयोग न किया जाय, क्षणिक आवेग या प्रकृति के संकेत पर बिना जाने बूझे कर डालें जायें पशु तुल्य कार्य हैं। जैसे-भोजन, कामेच्छा की पूर्ति, गुस्से में मार बैठना, प्रसन्नता में वृथा फूल उठना, जीभ तथा वासना अन्य सुख इसी श्रेणी में आते हैं।
स्वार्थ की पूर्ति के लिए जो कार्य किये जायें वे राक्षस जैसे कार्य होते हैं। राक्षस वृत्ति वाले पुरुष साम, दाम, दण्ड, भेद से, अपना ही अपना भला चाहते हैं। दूसरों को मार कर स्वयं आनन्द में रहते हैं। उन्हें किसी के दुख, तकलीफ, मरने-जीने से कोई सरोकार नहीं है। ऐसे अविवेकी माँस भक्षण, रति प्रेम, व्याभिचार, चोरी, रिश्वतखोरी, पीओ मौज उड़ाओ’ यही उनका आदर्श है। दुर्भोग, व्याभिचार, माँस भक्षण, मद्यपान भोग उसके आनन्द के ढंग हैं।
सत्पुरुष आज की आवश्यकताओं की पूर्ति करता, कल की योजना बनाता, धन, अनाज, वस्त्र इत्यादि का संग्रह करता, अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखता, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भावी उन्नति का विचार रखता है। वह पृथ्वी पर ही अपनी सद्भावनाओं तथा सद् इच्छाओं द्वारा स्वर्ग का निर्माण करता है। वह जानता है कि जीवन में सफलता की कसौटी नहीं है। धन वह साधन है जिसके द्वारा पुरुष जीविका एकत्र की जाती है।
वह पाप जीविका, छल जीविका, जुआ, सट्टा भिक्षा, ब्याज से दूर रहता है। वह दूसरे को ठगने का प्रयत्न नहीं करता। उसकी जीविका उपार्जन का कार्य सद्उद्देश्य से होता है। सच्चाई और पुण्य की कमाई से खूब फूलता फलता है। बुराई से खरीदी हुई प्रतिष्ठा क्षणिक होती है। यथाशक्ति वह दूसरों को दान पुण्य से सहायता करता है। जीवन निर्वाह के बदले वह उचित सेवा भी करता है।
देव तुल्य जीवन का उद्देश्य त्याग तथा साधना द्वारा जनसेवा के कार्य हैं। यह सेवा शरीर, मन या शुभ विचारों के द्वारा हो सकती है। विश्व कल्याण के लिए जीने वाले व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी देवता है। वह अपनी बुद्धि एवं ज्ञान का विश्वहित के लिए बलिदान करता है। ज्ञान चर्चा द्वारा वह दूसरों का मन भी उच्च विषयों की ओर फेरता है। उसकी दिनचर्या में उत्तम प्रवचनों का श्रवण, शंका निवारण, पठन, चिन्तन, आत्मनिरीक्षण, निर्माण और उपदेश होते हैं। वह संसार की वासनाओं के ऊपर शासन करता है।
ईर्ष्या, लोभ, क्रोध और अप्रिय किंवा कटुवचन इनसे सदा अलग रहो। धर्म प्राप्ति का यही मार्ग है।
-तिरुवल्लुवर।
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काम के समान व्याधि नहीं। मोह के समान बैरी नहीं। क्रोध के समान आग नहीं। और ज्ञान से परे सुख नहीं।
-श्री चाणक्य।
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सत्संग से दुर्जनों में साधुता आती ही है। साधुओं ही में दुष्टों की संगति से दुष्टता नहीं आती। फूल के गंध को मिट्टी ही ले लेती है। मिट्टी के गंध को फूल नहीं धारण करते।
-श्री चाणक्य।
वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का उदय
सुखद पारिवारिक जीवन के लिए उत्सव तथा त्यौहार बड़े उपयोगी हैं। इनके द्वारा अनेक लाभ हैं। (1) अच्छा मनोरंजन होता है। इसमें सम्मिलित रूप से समस्त परिवार के व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। अभिनय, गान, कीर्तन, पठन, पाठन, स्वाध्याय इत्यादि साथ-साथ करने में सबमें भ्रातृभाव का संचार होता है। (2) समता का प्रचार त्यौहारों में हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सामूहिक रूप से उन्हें सफल बनाने का उद्योग करता है। (3) पुराने साँसारिक एवं आध्यात्मिक गौरव की स्मृति पुनः हरी हो जाती है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो हमें प्रतीत होगा कि प्रत्येक त्यौहार का कुछ गुप्त आध्यात्यि अर्थ है। हिन्दू उत्सव एवं त्यौहारों में समता, सहानुभूति तथा पारस्परिक संगठन की पवित्र भावना निहित है। इन गुणों का विकास होता है। (4) आध्यात्मिक उन्नति का अवसर हमें इन्हीं त्यौहारों द्वारा प्राप्त होता है। हमारे प्रत्येक उपवास मौन व्रत, समारोह का अभिप्राय सच, परिवार में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, उदारता दया, श्रद्धा भक्ति और उत्साह के भाव उत्पन्न होते हैं। ये सब आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं। यही मनुष्य की स्थायी शक्तियाँ हैं।
ये उत्सव तथा त्यौहार केवल रस्म अदायगी बाह्य दर्शन या झूठा दिखावा मात्र न बने’ प्रत्युत पारिवारिक भावना, संगठन, एकता, समता और प्रेम की भावना के विकास में सहायक हो। पारिवारिक जीवन का विकास करने लिए हमें कटुता और विषमता की भावना त्यागना होगी, स्नेह सरिता प्रवाहित करनी होगी और सहानुभूति का सूर्य उदय करना होगा।
उत्सव तथा त्यौहारों में हम सबको एक ही स्थान पर एकत्रित होने का अवसर प्राप्त हो जाता है। हम मिलजुल कर परस्पर विचार विनिमय कर सकते हैं, एक ही विषय पर सोच विचार कर अपनी समस्याओं का हल सोच सकते हैं। परस्पर साथ रहने से हम एक दूसरे के गुण-दोषों की ओर भी संकेत कर सकते हैं। ये वे अवसर हैं जो पारिवारिक भेद भाव भुलाकर पुनः स्नेह सहानुभूति में आबद्ध करते हैं। बड़े उत्साह से हमें इन्हें मानना चाहिए।
मूर्खतापूर्ण आदतें
वे आदत कौन हैं जिनसे परिवार का सर्वनाश होता है? प्रथम तो स्वार्थमय दृष्टिकोण है जिसकी संकुलित परिधि में केवल मुखिया ही रहता है। जो मुखिया अपने आप अच्छी से अच्छी चीजें खाता, सुँदर वस्त्र पहनता। अपने आराम का ध्यान रखता है और परिवार के अन्य सदस्यों को दुखी रखता है, अस्थिर चित्त, मारने-पीटने वाला, वेश्यागामी व्यक्ति परिवार के लिए अभिशाप है।
अनेक परिवार अभक्ष्य पदार्थ के उपयोग के कारण नष्ट हुए है। शराब ने अनेक परिवारों को नष्ट किया है। इसी प्रकार सिगरेट, पान, तम्बाकू, बीड़ी, गाँजा, भाँग, चरस, चाय इत्यादि वस्तुओं में सबसे अधिक धन स्वाहा होता आया है। इन चीजों से सब खर्चा बढ़ता आया है तो उसकी पूर्ति जुआ, सट्टा, चोरी, रिश्वत, भ्रष्टाचार से की जाती है। जो व्यक्ति संयमी नहीं है, उससे उच्च आध्यात्मिक जीवन की कैसे आशा की जा सकती है। नशे में मनुष्य उपव्यय करता है और परिवार तथा समाज के उत्तरदायित्व को पूर्ण नहीं कर पाता। विवेकहीन होने के कारण वह दूसरों का अपमान कर डालता है, व्यर्थ सताता है? मुकदमेबाजी चलाता है। समय और धन नष्ट हो जाता है। शराबी लोगों के गृह नष्ट हो जाते हैं, प्रतिष्ठा की हानि होती है, बच्चों और पत्नी की दुर्दशा हो जाती है। जो लोग भाँग अफीम इत्यादि का नशा करते हैं वे भी एक प्रकार के मद्यपी ही परिगणित किये जायेंगे।
माँस भक्षण भी एक ऐसा ही दुष्कर्म है, जिससे प्राणी मात्र को हानि होती है। इससे हिंसा, प्राणीवध, भाँति-भाँति के जटिल रोग उत्पन्न होते हैं। पशु प्रकृति जागृत होती है। अधिक मिठाइयाँ या चाट-पकौड़ी खाना भी उचित नहीं है।
कर्जा लेने की आदत अनेक परिवारों को नष्ट करती है। विवाह, जन्मोत्सव, यात्रा, आमोद-प्रमोद से अधिक व्यय करने के आदि अविवेकी व्यक्ति अनाप-शनाप व्यय करते हैं। कर्जा लेते हैं और बाद में रोते हैं। एक बार का लिया हुआ कर्ज कभी नहीं उतरता। सामान और घर तक बिक जाते हैं। आभूषण बेचने तक की नौबत आती है। इसी श्रेणी में मुकदमेबाजी आती है। यथाशक्ति आपस में सुलह मेल-मिलाप कर लेना ही उचित है। मुकदमे के चक्र में समय और धन दोनों की बरबादी होती है।
व्यभिचार सम्बन्धी आदतें समाज में पाप और छल की वृद्धि करती है। विवाहित जीवन में जब पुरुष अन्य स्त्रियों के संपर्क में आते हैं, तो समाज में पाप फैलता है। कुटुम्ब का प्रेम, समस्वरता, संगठन नष्ट हो जाता है। गृह पत्नी से विश्वासघात होने से संपूर्ण घर का वातावरण दूषित और विषैला हो उठता है। शोक है कि इस पाप से हम सैकड़ों परिवारों को नष्ट होते देखते है, और फिर भी ऐसी मूर्खता पूर्ण आदतें डाल लेते हैं। आज के समाज में प्रेमी, सखी, आदि के रूप में खुला आदान-प्रदान चलता है। इसके बड़े भयंकर दुष्परिणाम होते हैं।
सास बहू के झगड़े -
बहुसंख्यक परिवारों में सास बहू के झगड़े चल रहे हैं। इसके अनेक कारण है। सास बहू को अपने नियंत्रण में रखकर अनुशासन करना चाहती है। अपनी आशानुसार उससे कार्य कराना चाहती है। कभी-कभी वह अपने पुत्र को बहका कर बहू की मरम्मत कराती है। प्रायः देखा गया है कि जहाँ कोई पुरुष स्त्री को कष्ट देता है, तो उसके मध्य में अवश्य किसी स्त्री-सास, ननद या जिठानी रहती है। स्त्रियों में ईर्ष्या भाव अत्यधिक होता है। बहू का व्यक्तित्व प्रायः लुप्त हो जाता है तथा उसे रौरव नर्क की यन्त्रणाएं सहन करनी पड़ती हैं।कहीं पर पति बहू के इंगित पर नृत्य करता है और उसके भड़कायें से वृद्धा सास पर अत्याचार करता है। वृद्धा से कठिन कार्य कराया जाता है वह धुएं में परिवार के निमित्त भोजन व्यवस्था करती है जबकि बहू सिनेमा देखने या टहलने के लिए जाती है।
ये दोनों ही सीमाएं नियं हैं। सास बहू के सम्बन्ध पवित्र हैं। सास स्वयं बहू को देखने के लिए लालायित रहती है। उसके लिए वह दिन बड़े गौरव का होता है जब घर बहू रानी के पदार्पण से पवित्र होता है। उसे उदार, स्नेही, बड़प्पन से परिपूर्ण होना चाहिए। बहू की सहायता तथा पथ प्रदर्शन के लिए कार्य करना चाहिए। छोटी-मोटी भूलों को सहृदयता से माफ कर देना चाहिए इसी प्रकार बहू को सास में अपनी माता के दर्शन करने चाहिए और उसकी वही प्रतिष्ठा करनी चाहिए जो वह अपनी माता की करती रही है। यदि पुरुष माता को माता के स्थान पर पूज्य माने, और पत्नी को पत्नी के स्थान पर जीवन सहचरी, मिष्ठभाषणी प्रियतमा माने तो ऐसे संकुचित झगड़े बहुत कम उत्पन्न होंगे।
ऐसे झगड़ों में पुत्र का कर्त्तव्य बड़ा कठिन है। उसे माता की मान-प्रतिष्ठा का ध्यान रखना और पत्नी के गर्व तथा प्रेम की रक्षा करनी है। अतः उसे पूर्ण शान्ति और सुहृदयता से कर्त्तव्य भावना को ऊपर रखकर ऐसे झगड़ों को शाँत करना उचित है। किसी को भी अनुचित रीति से दबा कर मानहानि न करनी चाहिए। यदि पति कठोर, उग्र, लड़ने वाले स्वभाव का है, तो पारिवारिक शाँति और समृद्धि भंग हो जायेगी। प्रेम और सहानुभूति से दूसरों के दृष्टिकोण को समझकर बुद्धिमत्ता से अग्रसर होना चाहिए।
ननद भौजाई के झगड़े-
प्रायः देखा जाता है कि जहाँ ननदें अधिक होती हैं, या विधवा होने के कारण मायके यहाँ रहती हैं, वहाँ बहू पर बहुत अत्याचार होते हैं। ननद भाभी के विरुद्ध अपनी माता के कान भरती है और भाई को भड़काती हैं। इसका कारण यह है कि बहिन भाई पर अपना पूर्ण अधिकार समझती है और अपने गर्व, अहं, और व्यक्तव्य को अन्यों से ऊपर रखना चाहती है। भाई, यदि अदूरदर्शी होता है, तो बहिन की बातों में आ जाता है, और बहू अत्याचार का शिकार बनती है।
इन झगड़ों में पति को चाहिए कि पृथक-पृथक अपनी बहिन और पत्नी को समझा दे और दोनों के स्वत्व तथा अहं की पूर्ण रक्षा करे। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से दोनों का अध्ययन कर परस्पर मेल करा देना ही उचित है। मेल कराने के अवसरों की ताक में रहना चाहिए। दोनों को परस्पर मिलने, बैठने साथ-साथ टहलने जाने, एक सी दिलचस्पी विकसित करने का अवसर प्रदान करना उचित है। यह नहीं होना चाहिए कि पत्नी ही दोनों समय भोजन बनाती, झूठे बर्तन साफ करती, जिठानी के बच्चों को बहलाती-धुलाती, आटा पीसती, कपड़े धोती, दूध पिलाती या झाड़ू-बुहारी का काम करती रहे। चतुर पति को चाहिए कि काम का बटवारा करदे। पत्नी को कम काम मिलना चाहिए क्योंकि उसके पास बच्चे भी पालने के लिए हैं। यदि कोई बीमार पड़ेगा तो उसे उसका कार्य भी करना होगा।
वृद्धों का चिड़चिड़ापन और परिवार के अन्य व्यक्ति
प्रायः देखा गया है कि आयुवृद्धि के साथ-साथ वृद्ध चिड़चिड़े, नाराज होने वाले, सनकी क्रोधी और सठिया जाते हैं। वे तनिक सी असावधानी से नाराज हो जाते हैं और कभी-कभी अपशब्दों का भी उच्चारण कर बैठते हैं। ऐसे वृद्ध क्रोध के नहीं, हमारी दया और सहानुभूति के पात्र हैं। वे अज्ञान में हैं और हमें उनके साथ वही आचरण करना उचित है, जैसा बच्चों के साथ। उनकी विवेकशील योजनाओं तथा अनुभव से लाभ उठाना चाहिए और उनकी मूर्खताओं को उदारतापूर्वक क्षमा करना चाहिए।
वृद्धों को परिवार के अन्य व्यक्तियों के प्रेम और सहयोग की आवश्यकता है। हमें उनसे प्रीति करना, जितना हो सके आज्ञा पालन, प्रतिष्ठा उनके स्वास्थ्य का संरक्षण ही उचित है, खाने के लिए, कपड़ों के लिए तथा थोड़े से आराम के लिए वह परिवार के अन्य व्यक्तियों की सहानुभूति की आकाँक्षा करता है। उसने अपने यौवन काल में परिवार के लिए जो श्रम और बलिदान किए हैं, अब उसी त्याग का बदला हमें अधिक से अधिक देना उचित है।
परिवार के संचालन की कुँजी उत्तम संगठन है। प्रत्येक व्यक्ति यदि सामूहिक उन्नति में सहयोग प्रदान करे, अपने श्रम से अर्थ संग्राम करे, दूसरों की उन्नति में सहयोग प्रदान करे। सब के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों का बलिदान करता रहे, तो बहुत कार्य हो सकता है।
स्वस्थ दृष्टिकोण-
दूसरों के लिए कार्य करना, अपने स्वार्थों को तिलाँजलि देकर दूसरों को आराम पहुँचाना सृष्टि का यही नियम है। कृषक हमारे निमित्त अनाज उत्पन्न करता है, जुलाहा वस्त्र बुनता है। दर्जी कपड़े सींता है, राजा हमारी रक्षा करता है। हम सब अकेले काम नहीं कर सकते। मानव जाति में पुरातन काल से पारस्परिक लेन देन चला आ रहा है। परिवार में प्रत्येक सदस्य को इस त्याग, प्रेम सहानुभूति की नितान्त आवश्यकता है। जितने सदस्य हैं सबको आप प्रेम-सूत्र में आबद्ध कर लीजिए। प्रत्येक का सहयोग प्राप्त कीजिए प्यार से उनका संगठन कीजिए।
इस दृष्टिकोण को अपनाने से छोटे बड़े सभी झगड़े नष्ट होते हैं। अक्सर छोटे बच्चों की लड़ाई बढ़ते-बढ़ते बड़ों को दो हिस्सों में परिवर्तन कर देती है। पड़ौसियों में बच्चों की लड़ाइयों के कारण युद्ध ठन उठता है। स्कूल में बच्चों की लड़ाई घरों में घुसती है। कलह बढ़कर मार-पीट और मुकदमेबाजी की नौबत आती है। उन सबके मूल में संकुचित वृत्ति, स्वार्थ की कालिमा, व्यर्थ वितंड़ावाद, दुरभिसन्धि इत्यादि दुर्गुण सम्मिलित हैं।
हम मन में मैल लिए फिरते हैं और इस मानसिक विष को प्रकट करने के लिए अवसरों की प्रतीक्षा में रहते हैं। झगड़ालू व्यक्ति ज़रा-जरासी बातों में झगड़ों के लिए अवसर ढूंढ़ा करते हैं। परिवार में कोई न कोई ऐसा झगड़ालू व्यक्ति, जिद्दी बच्चा होना साधारण सी बात है। इन सबको भी विस्तृत और सहानुभूति दृष्टिकोण से ही निरखना चाहिए।
तुम्हें एक दूसरे के भावों, दिलचस्पी, रुचि, दृष्टिकोण, स्वभाव, आयु का ध्यान रखना अपेक्षित है। किसी को वृथा सताना या अधिक कार्य लेना बुरा है। उद्धत स्वभाव का परित्याग कर प्रेम और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए। कुटिल व्यवहार के दोषों से जैसा अपना आदमी पराया हो जाता है, अविश्वासी और कठोर बन जाता है, वैसे ही मृदुल व्यवहार में कट्टर शत्रु भी मित्र हो जाता है।
विश्व में साम्यवाद की अवधारणा के लिए परिवार ही से श्रीगणेश करना उचित है। न्याय से मुखिया को समान व्यवहार करना चाहिए।
परिवार के युवक तथा उनकी समस्याएँ-
प्रायः युवक स्वच्छन्द प्रकृति के होते हैं और परिवार के नियंत्रण में नहीं रहना चाहते। वे उच्छृंखल प्रकृति, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित, हलके रोमाँस से वशीभूत पारिवारिक संगठन से दूर भागना चाहते हैं। यह बड़े परिताप का विषय है।
युवकों के झगड़ों के कारण ये हैं- 1-अशिक्षा 2-कमाई का अभाव, 3-प्रेम सम्बन्धी अड़चनें घर के सदस्यों का पुरानापन और युवकों की उन्मुक्त प्रकृति, 4-कुसंग, 5-पत्नी का स्वच्छन्द प्रिय होना तथा पृथक घर में रहने की आकाँक्षा, 6- विचार सम्बन्धी पृथकता-पिता का पुरानी धारा के अनुकूल चलाना पुत्र का अपने अधिकारों पर जमे रहना, 7-जायदाद सम्बन्धी बटवारे के झगड़े । इन पर पृथक-पृथक विचार करना चाहिए।
यदि युवक समझदार और कर्त्तव्यशील हैं, तो झगड़ों का प्रसंग ही उपस्थित न होगा। अशिक्षित अपरिपक्व युवक ही आवेश में आकर बहक जाते हैं और झगड़े कर बैठते हैं। एक पूर्ण शिक्षित युवक कभी पारिवारिक विद्वेष या कलह में भाग न लेगा। उसका विकसित मस्तिष्क इन सबसे ऊँचा उठ जाता है। वह जहाँ अपना अपमान देखता है, वहाँ स्वयं ही हाथ नहीं डालता।
कमाई का अभाव झगड़ों का एक बड़ा कारण है। निखट्टू पुत्र परिवार में सबकी आलोचना का शिकार होता है। परिवार के सभी सदस्य उससे यह आशा करते हैं कि वह परिवार की आर्थिक व्यवस्था में हाथ बंटाएगा। जो युवक किसी पेशे या व्यवसाय के लिए प्रारम्भिक तैयारी नहीं करते, वे समाज में फिर नहीं हो पाते। हमें चाहिए कि प्रारंभ से ही घर के युवकों के लिए काम तलाश कर लें जिससे बाद में जीवन-प्रवेश करते समय कोई कठिनाई उपस्थित न हो। संसार कर्मक्षेत्र है। यहाँ हम में से प्रत्येक को अपना कार्य समझना तथा उसे पूर्ण करना है। हममें जो प्रतिया बुद्धि, अज्ञात शक्तियाँ हैं, उन्हें विकसित कर समाज के लिए उपयोगी बनाना चाहिए।
जरमी टेलर कहते हैं -”जीवन एक बाजी के समान है। हार-जीत तो हमारे हाथ में नहीं है, पर बाजी का ठीक तरह से खेलना हमारे हाथ में है। यह बाजी हमें बड़ी समझदारी से, छोटी-छोटी भूलों से बचाते हुए निरन्तर आत्म विकास और मनोवेगों का परिष्कार करते हुए करनी चाहिए।”
डॉक्टर आर्नल्ड ने लिखा है - “इस जगत में सबसे बड़ी तारीफ की बात यह है कि जिन लोगों में स्वभाविक शक्ति की न्यूनता रहती है, यदि वे उसके लिए सच्चा साधन और अभ्यास करें, तो परमेश्वर उन पर अनुग्रह करता है।” बक्सटन ने भी निर्देश किया है - “युवा पुरुष बहुत से अंशों में जो होना चाहें, हो सकते हैं।” एटी शेकर ने कहा है- “जीवन में शारीरिक और मानसिक परिश्रम के बिना कोई फल नहीं मिलता। दृढ़ चित्त और महान् उद्देश्य वाला मनुष्य जो चाहे कर सकता है।”
प्रतिभा की वृद्धि कीजिए। आपको नौकरी, रुपया, पैसा, प्रतिष्ठा और आत्म सम्मान प्राप्त होगा। उसके अभाव में आप निखट्टू बने रहेंगे। प्रतिभा आपके दीर्घकालीन अभ्यास, सतत परिश्रम, अव्यवसाय, उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर है। प्रतिभा हम अभ्यास और साधन से प्राप्त करते हैं। मनुष्य की प्रतिभा स्वयं उसी के संचित कर्मों का फल है। अवसर को हाथ से न जाने दें, प्रत्येक अवसर का सुँदर उपयोग करें और दृढ़ता, आशा और धीरता के साथ उन्नति के पथ पर अग्रसर होते जायें। स्व संस्कार का कार्य इसी तरह सम्पन्न होगा।
पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, वही आत्मिक शान्ति का अनुभव कर सकता है।
स्मरण रखिये, आप जो कुछ गुप्त रखते हैं, दूसरों के समक्ष कहते हुए शर्माते है, वह निंदय है। जब कोई युवक पिता के कानों में बात डालते हुए हिचके, तो उसे तुरन्त सम्भल जाना चाहिए क्योंकि बुरे मार्ग पर चलने का उपक्रम कर रहा है। उचित अनुचित जानने का उपाय यह है कि आप उसे परिवार के सामने प्रकट कर सकें।
जब किसी पदार्थ का रासायनिक विश्लेषण हो जाता है, तब सभी उसके शुभ अशुभ अंशों को जान जाते हैं। परिवार में यह विश्लेषण तब होता है, तब युवक का कार्य परिवार के सदस्यों के सम्मुख आता है।
परिवार से युवक का मन तोड़ने में विशेष हाथ पत्नी का होता है। उसे अपने स्व का बलिदान कर संपूर्ण परिवार की उन्नति का ध्यान रखना चाहिए। समझदार गृहणी समस्त परिवार को सम्भाल लेती है।
आज के युवक प्रेम-विवाह से प्रभावित हैं। जिसे प्रेम-विवाह कहा जाता है, वह क्षणिक वासना का ताँडव, थोथी समझ की मूर्खता, अदूरदर्शिता है। जिसे ये लोग प्रेम समझते हैं, वह वासना के अलावा और कुछ नहीं होता। उसका उफान शान्त होते ही प्रेम-विवाह टूक टूक हो जाता है। चुनावों में भारी भूलें मालूम होती है। समाज में प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है। ऐसा व्यक्ति सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।
अनेक पुत्र विचारों में विभिन्नता होने के कारण झगड़ों का कारण बनते हैं। संभव है युवक पिता से अधिक शिक्षक हो। किन्तु पिता का अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है। पुत्र को उदारतापूर्वक अपने विचार अपने पास रखने चाहिए और व्यर्थ के संपर्क से बचना चाहिए।
कुसंग का भयानक अभाव-
कुसंग में रह कर युवक परिवार से छूट जाता है। ये कुसंग बढ़े आकर्षण रूप में उसके सम्मुख आते हैं-मित्रों, सिनेमा, थियेटर, वैश्या, गन्दा साहित्य, गर्हित चित्र, मद्यपान, सिगरेट तथा अन्य उत्तेजित पदार्थ। वे सभी प्रत्यक्ष विष के समान है, जिनके स्पर्श मात्र से मनुष्य पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उनकी कल्पना सर्वथा विनाशकारी है। बड़े सावधान रहें।
इस सम्बन्ध में हम पं. रामचन्द्र शुक्ल की बहुमूल्य वाणी उद्धृत करना चाहते हैं। इसमें गहरी सत्यता है :-
कोई भी युवा पुरुष ऐसे अनेक युवा पुरुषों को पा सकता है जो उसके साथ थियेटर देखने जायेंगे, नाच रंग में जायेंगे, सैर-सपाटे में जायेंगे, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करेंगे। ऐसे लोगों से हानि होगी तो बड़ी होगी।
सोचो तो, तुम्हारा जीवन कितना नष्ट होगा, यदि ये जान पहिचान के लोग उन मनचले युवकों में से निकले जिनकी संख्या दुर्भाग्यवश आजकल बहुत बढ़ रही है, यदि उन शोहदों में से निकले जो अमीरों की बुराइयों और मूर्खताओं का अनुकरण किया करते हैं, दिन रात बनाव श्रृंगार में रहा करते हैं, कुलटा स्त्रियों के फोटो मोल लिया करते हैं, महफिलों में अहाँ -हा, वाह किया करते हैं, गलियों में ठट्ठा मारते और सिगरेट का धुआँ उड़ाते चलते हैं। ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है ?
वे अच्छी बातों से कोसों दूर हैं। उनके लिए न तो संसार में सुन्दर और पवित्र उक्ति वाले कवि हुए, और न उत्तम चरित्र वाले महात्मा हुए हैं।
जिनकी आत्मा अपनी इन्द्रियों के विषयों-खान-पान, चटकीले वस्त्र, दिखावा, विलासप्रियता, श्रृंगार, झूठी शान, बचपन की रंग रेलियाँ, सिनेमा की अभिनेत्रियों के जीवन या सामाजिक विकारों में ही लगा रहता है और स्वार्थ, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, दगाबाजी-बेईमानी के कलुषित विचारों में रमा हुआ है, ऐसी नशोन्मुख आत्माओं का अवलोकन कर कौन पश्चाताप न करेगा ?
ऐसी विनाशकारी वृत्ति का एक उदाहरण पं. रामचंद्र शुक्ल ने दिया है। आपने मकदूनिया के बादशाह डेमेट्रियस के विषय में लिखते हुए निर्देश किया है कि वह कभी-कभी राज्य का सब कार्य त्याग कर अपने ही मेल के दस-पाँच साथियों को लेकर विषय वासना में लिप्त रहा करता था। एक बार बीमारी का बहाना करके, वह इसी प्रकार अपने दिन काट रहा था। इसी बीच उसका पिता उससे मिलने के लिए गया। उसने एक हंसमुख जवान को कोठरी से बाहर निकलते हुए देखा। जब पिता कोठरी के बाहर निकला, तब डेमेट्रियस ने कहा - “ज्वर ने मुझे अभी छोड़ा है।” पिता ने उत्तर दिया, “हाँ! ठीक है, वह दरवाजे पर मुझे मिला था।”
कुसंग का ज्वर ऐसा ही भयानक होता है। एक बार युवक इसके पंजे में फंस कर मुक्त नहीं हो पाता। अतः प्रत्येक युवक को अपने मित्रों, स्थानों, दिलचस्पियों, पुस्तकों इत्यादि का चुनाव बड़ी सतर्कता से करना चाहिए।
इसके विपरीत सत्संग एक ऐसा आध्यात्मिक साधन है जिससे मनुष्य की सर्वतोमुखी उन्नति हो सकती है। संसार में एक से एक पवित्र आत्माएं पुस्तकों के रूप में आपके साथ रह सकती हैं। उनके विचारों की विद्युत आपके चारों ओर रह कर सब प्रकार की गंदगी को, अशुभ विचारों को दूर भगाती है। उत्तम पुस्तकों को घर में रखने, उनका अध्ययन, मनन तथा सहवास करने से मनुष्य सबसे बुद्धिमान आत्माओं के सहवास में हो सकता है।
इसके अतिरिक्त विद्वान, साहित्य सेवियों, दर्शन शास्त्रियों, सम्पादकों, सन्तों के संपर्क में रह कर भी आध्यात्मिक जीवन व्यतीत किया जा सकता है।
बाल-मानस की पृष्ठ भूमि :-
यों तो एक वर्ष के बच्चों में बुद्धि का विकास मनोवेगों के प्रदर्शन द्वारा स्पष्ट होने लगता है पर दो-ढाई वर्ष का होने पर बालक में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। परिवार के मुखिया को चाहिए कि बच्चे की परिपक्व होती हुई मानसिक शक्तियों के विकास में सहायता प्रदान करे। तीन वर्ष तक गुप्त मन अपनी विशेष सेवाएं अर्पित करता है। अतः प्रारम्भिक काल में बच्चों को डांटने-डपटने, मारने-पीटने, अत्याचार करने या कठोर नियंत्रण में रखने से गुप्त मन में जटिल मानसिक ग्रन्थियाँ उत्पन्न होती जाती हैं। इस काल में प्यार, सहानुभूति तथा दुलार से ही उसमें उत्साह भरना चाहिएं तनिक सी वृद्धि या अच्छाई उत्पन्न होते ही प्रशंसा दिल खोलकर करना, बच्चों को छोटे-छोटे उपहार, चटकीले खिलौने, कुत्ते बिल्ली के बच्चे का अन्य सामान देना उत्तम है।
3 से 6 वर्ष में बालक का विकास -
बालक की 3 से 6 वर्ष की अवस्था में मन अपना कार्य प्रारंभ कर देता है। प्रारंभ में उसे जो मानसिक संवेदनाएं, विचार या अनुभव प्राप्त हुए हैं, वे अब स्पष्ट होने लगते हैं। बालक पर परिस्थिति की छाप तो नहीं लगती, वह परिस्थिति को समझने लगता है। उसका व्यक्तित्व स्थापित होने लगता है और वह स्वयं स्फुटित होने लगता है। उस काल में बालक हाथ पाँव से भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति करना चाहता है और इसी के द्वारा ज्ञान ग्रहण करता है। पालने वालों की गरीबी, विषय शिक्षक का अभाव, अनुकूल व्यवस्था की कमी होने पर बच्चे का मानसिक विकास रुक जाता है।
मेडम पौटेसरी नामक विशेषज्ञा का कथन कि 3 से 6 वर्ष की आयु में बालक शिक्षा ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है किन्तु शिक्षण व संस्कार बालक की स्वयं प्रवृत्ति पर ही सध सकते हैं अर्थात् उसके स्व-प्रयत्न पर निर्भर होता है कि उत्साह द्वारा उसे स्वयं प्रयत्न करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। साधन द्वारा वह संस्कार ग्रहण करने में समर्थ होता है। इसके अतिरिक्त बच्चा चरित्र के विकास के लिए भी योग्य बन जाता है, पर इस आयु में बालक अपने द्वारा ही विकास की बातों को ग्रहण कर सकता है। तत्व उस पर लादे नहीं जा सकते। चरित्र विकास के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को बालक के सामने आदर्श रखना चाहिए। वह आदर्शों का अनुकरण करके सब सीखेगा। आज्ञा द्वारा भी नीति की कई बातें सीख सकता है। इस आयु में बालक अधिक से अधिक शब्द माँगता है। इन शब्दों के उच्चारण में उसे एक अजीब रस प्रतीत होता है। उसे नये-नये फलों, तरकारियों, व्यक्तियों के नाम भी देने चाहिए। घर की वस्तुओं, पोशाक, मोहल्ले, गाय, भैंस, बकरी इत्यादि में उसे विवेक प्रारंभ हो जाता है। 3 से 6 वर्ष आयु में प्रत्यक्ष वस्तुओं द्वारा नाम सिखायें जायें तो बालक उन्हें कठिन और लम्बे होने पर भी ग्रहण कर लेता है।
इस समय बालक की कल्पना शक्ति भी विकसित हो उठती है। अतः वे परियों, साँपों, जादू की कहानियों, अद्भुत वस्तुओं की बातचीत में विशेष रस लेते हैं। ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती है, इसी कल्पना द्वारा बालक अपने ज्ञान की वृद्धि करता है। परिस्थिति से अनुभव लेकर उन पर कल्पना करता है। नवीन बातों की जानकारी के लिए उसकी जिज्ञासा जागृत होती है। वह माता-पिता तथा परिवार वालों से नाना प्रकार के प्रश्न करेगा। सावधान! ये प्रश्न दबा न दिये जायें वरन् कुछ न कुछ उत्तर अवश्य दिए जायें। उत्तर देने वालों को बालक की ग्रहण शक्ति का समुचित ध्यान रखना चाहिए। उत्तर देते समय तीन तत्वों की ओर विशेष ध्यान रखिये-
1. बाल समाज का ज्ञान ।
2. परिस्थिति की जानकारी।
3. विषय को सरल बनाकर समझाने की कला।
बालक में किसी प्रकार की शंकाएं न रह जायें, विरोध खड़ा न हो। बातें उलझी अध समझी हुई न रहें, प्रत्युत वह सन्तुष्ट हो जाये।
6 से 10 वर्ष तक का विकास-
बच्चे का विकास और होता है जब वह 6 से 10 वर्ष तक का हो जाता है। उस काल में वह पढ़ने लिखने में खूब दिलचस्पी लेता है। हमें चाहिए कि निम्न रीतियों से उसके विकास में सहायता प्रदान करें-
1. उत्तम पुस्तकें, जिनमें साहसिक कहानियाँ हों। ये पूर्ण पवित्र चरित्र का निर्माण करने वाली हों, 2-बच्चों द्वारा छोटे-छोटे एकाँकी नाटकों के अभिनय कराये जायें। पौराणिक या ऐतिहासिक घटनाओं को लेकर बच्चों के लिए अच्छे नाटक तैयार कराये जा सकते हैं। 3-वैराइटी शोः यह मंद बुद्धि के बच्चों के लिए बड़ी उत्तम शिक्षा का साधन है। इसके अस्त-कस्त गाने, अभिनव और हाव भावों का प्रदर्शन होता है, 4-संयम से खिलाए गए खेल इनके द्वारा बच्चे खेल खेल में आशा पालन, नियंत्रण इत्यादि सीखते हैं, 5-वाद्य यन्त्रों पर संगीत, भजन और कीर्तन इत्यादि। 6- बच्चों को बाहर सैर के लिए ले जाया जाये और उन्हें भाँति-भाँति के जीव, पक्षी, चिड़िए, कीड़े मकोड़े दिखाये जायें, 7-भिन्न-भिन्न देश के बालकों के वर्णन, 8-चित्रकारी के लिए अभिरुचि उत्पन्न की जाय। अच्छे अच्छे चित्र, खुदाई के काम, खिलौनों का बनाना, बालक की छिपी हुई वृत्तियों का विकास करेगा। बच्चों के शौकों का विकास करना चाहिए।
बच्चों के कुछ शौक इस प्रकार हैं - 1-टिकट एकत्रित करना, 2- बड़े आदमियों के हस्ताक्षर, चित्र, दियासलाई के लेविल, फोटोग्राफ, पत्तियाँ-पुष्प एकत्रित करना, 3-सुँदर मासिक पत्रों तथा पुस्तकों का संग्रह, 4-भाँति-भाँति के खेलों के साधन जुटाना, 5-तितलियाँ, कीड़े मकोड़े, बिल्ली कुत्ते के बच्चे, पंछी पालना, 6-देश-विदेश के बालकों से पत्र व्यवहार। यह सब ज्ञानवर्द्धन का बड़ा अच्छा साधन है। 7-स्थानीय पास-पड़ौस, अपने प्रदेश की सैर। सैर का महत्व है क्योंकि इससे भूगोल का ज्ञान बढ़ता है। स्वदेश की सैर करने से प्रान्तीयता की संकुचित भावना नष्ट होती है, राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित होता है। ऐसे पर्यटन बालक के मन में विभिन्न प्राँतों के मध्य एकदेशीय साँस्कृतिक एकता के भाव दृढ़ करते हैं।
प्रौढ़ अवस्था में विकास-
बड़े होने पर बच्चों को एक मित्र की हैसियत से रखना चाहिए। चौदह वर्ष की आयु में बच्चे में एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। कौमार्य समाप्त होकर यौवन का प्रवेश होता है और विपरीत लिंग के व्यक्तियों में भारी आकर्षण प्रतीत होने लगता है। माता-पिता को बड़ी सावधानी से इस आयु में बच्चे के मानसिक और शारीरिक परिवर्तन आने में सहायता करनी चाहिए। ब्रह्मचर्य की पुस्तकें, कामोत्तेजक स्थानों, दृश्यों, गंदी पुस्तकों से बचाना चाहिए। प्रेममय पथप्रदर्शन से बहुत काम निकल सकता है। तीव्र आलोचना या सीधा हस्तक्षेप शोचनीय होगा। यदि समलिंगी अथवा भिन्न लिंगी मित्रता अत्यधिक स्वत्व जताने वाली है तो ऐसा सम्बन्ध दुर्भाग्यपूर्ण है और परिवार के मुखिया को इसकी निगरानी करनी चाहिए। यदि ऐसे गर्हित सम्बन्ध की अविवेकशीलता समझा दी जाये, तो काम निकल सकता है। कामशिक्षा की आवश्यकता से कौन इंकार कर सकता है। पवित्र ढंग से किसी विश्वासपात्र व्यक्ति के द्वारा जवान बालक को शिक्षा मिलनी चाहिए।
परिवार वास्तविक रूप से घर होना चाहिए न कि होटल। जहाँ माता-पिता और युवा पुत्र-पुत्रियों में परस्पर मित्रता और सहानुभूति का सम्बन्ध हो वही प्रेममय स्थान घर कहा जाता है। ऐसे प्रेम और सरस वातावरण में बालक का संतुलित विकास होता है। माता-पिता अपने बच्चे के दोस्तों को भोजन, खेल और बातचीत के लिए घर बुलाये, तो श्रेष्ठ है। इससे बच्चे का घर में विश्वास बढ़ता है।
जहाँ तक हो सके बालकों को अपने इष्ट-मित्रों के चुनाव का अवसर प्रदान करना चाहिए उसमें थोड़े से पथ निर्देश से काम चल सकता है। स्मरण रखिये, यदि आप बालक के मित्रों की अवहेलना करेंगे, तो उसे अपना विरोधी ही बना लेंगे। उनके मित्र के साथ शिष्टता एवं कोमलता का व्यवहार हो। इसे आपका पुत्र-पुत्री पसंद करेंगे।
माता-पिता को सदा समय के अनुसार चलना चाहिए। आपका मुख्य ध्येय अनुशासन नहीं, डाट-फटकार जुर्माना नहीं, प्रत्युत प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण मित्रता का सम्बन्ध होना चाहिए। आपका पुत्र भी मित्र सदृश्य ही है। एक सहानुभूति पूर्ण माता-पिता के समान कौन अच्छा मित्र हो सकता है।
सीधे हस्तक्षेप न कर, टेढ़े तरीकों से, अर्थात् ऐसे उपायों से उनकी गलतियाँ बतलानी चाहिए कि वे बुरा न मान बैठें। उनके ‘अहं’ की रक्षा, गर्व की रक्षा का ध्यान रखें। यदि वे बालक की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अपहरण न करें, तो माता-पिता तथा बालक के मध्य किसी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न नहीं होगा।
मनोवैज्ञानिकों ने स्पष्टतः निर्देश किया है कि घर तथा परिवार के सदस्य ही बालक के जीवन के विकास के साधन हैं। अनुकरण परिस्थितियाँ आपके भले बुरे निर्देश, सामाजिक स्थिति, सभी इसके चरित्र पर अपना-अपना प्रभाव डालने वाले हैं। बात यह है कि व्यक्ति की शक्तियों, योग्यताओं, भावनाओं और प्रकृतियों का विकास एक प्रकार का संपूर्ण वातावरण स्थायित्व सुरक्षा तथा शक्ति माँगता है। यह सब आपके परिवार में जितनी सच्चाई और पूर्णता से मिल जाता है उतना अन्यत्र दुर्लभ है। बालक के विकास के लिए हमें सुखद, प्रेममय, प्रमोद कारी वातावरण प्रस्तुत करना चाहिए।
वैवाहिक जीवन में आर्थिक और सामाजिक कारण अवश्य होते हैं। किन्तु प्रधान कारण मनोवैज्ञानिक होते हैं। पति-पत्नी में अनेक अज्ञात भावनाएं प्रसुप्त इच्छाएं पुराने संस्कार, कल्पनाएं होती हैं। जो अप्रकट रूप से प्रकाशित हो जाती है। प्रायः दो प्रेमी प्रसन्नता से वैवाहिक सूत्र में आबद्ध होते हुए देखे गए हैं। किन्तु विवाह के कुछ काल पश्चात उनका पारस्परिक आकर्षण न्यून होता देखा जाता है। बाद में तो वे परस्पर घृणा तक करने लगते हैं। इस घृणा के कारण प्रायः आन्तरिक होते हैं। इसका प्रधान कारण मनुष्य की उभयलिंगता है। जिसका अभिप्राय यह है कि हर एक पुरुष में स्त्रीत्व का अंश विद्यमान है तथा हर स्त्री में पुरुषत्व का। बड़े होने पर किन तत्वों की प्रधानता हो जायेगी। इस मनोवैज्ञानिक आधार पर स्त्री-पुरुष का मेल निर्भर है।
यदि संयोगवश ऐसे दो प्राणी वैवाहिक सूत्र में आबद्ध हो गये हैं, जिनमें एक ही लिंग की प्रधानता है-जैसे स्त्री में पुरुषत्व और पुरुष में भी पुरुषत्व के गुण बढ़े हुए हैं अथवा स्त्री में तो स्त्रीत्व है ही, उसके पति में भी स्त्री-तत्व की प्रधानता है, तो वैवाहिक जोड़े में साम्य, सुख, समृद्धि और आन्तरिक संतुलन उचित न रहेगा।
वास्तव में दाम्पत्य जीवन का वास्तविक सुख तभी प्राप्त हो सकता है जब स्त्री में स्त्रीत्व के गुणों का, तथा पुरुषों में पुरुषोचित गुणों का स्वाभाविक और अबोध विकास हो। इसका अभिप्राय यह नहीं कि उनमें विपरीत गुण बिलकुल ही न हों। इसका आशय केवल इतना ही है कि पुरुष में पुरुषत्व की प्रधानता हो, और स्त्री में स्त्रीत्व की प्रधानता हो। पुरुष में स्त्रीत्व के गुण केवल गौण रूप से, और स्त्री में पुरुषत्व के गुण गौण रूप से रह सकते हैं।
पुरुषत्व के गुण-
पुरुष का प्रधान गुण है पौरुष (अर्थात् शक्ति, साहस, निर्भयता, सक्रियता) है। उनमें 1. शरीर बल 2. मानसिक बल 3. चरित्र बल 4-संकल्प बल की प्रधानता है। पुरुष का निर्माण सतत युद्ध करने वाला, कठोरता, दृढ़ता और पाशविक शक्ति से पूर्ण जीव की भाँति हुआ है। पुरुष अहंकारी, क्रोधी, तामसी, मदोन्मत्त, प्रेमोन्मत है। उसे शक्ति का अवतार कहना युक्ति संगत होगा। आदि प्रकृति का बर्बर जंगली पुरुष आज भी उसमें जाग रहा है। पुरुष स्वभाव से ही उपार्जनच्छ और रमणशील है। पुरुष कर्त्ता, अहंवादी, व्यक्तिवादी, स्वनिष्ट, आत्मप्राधान्य-स्थापक और स्वार्थ पर है। वह अपने अंदर एक शक्ति का अनुभव करता है और उसी से प्रेरित होकर शीघ्रता और आतुरता में काम करता है।
स्त्रीत्व के गुण -
स्त्री कोमलता, मृदुता, सौम्यता एवं सहानुभूति की खान है। उसमें भावनाओं की प्रचुरता है, दयालुता, स्नेह, सौकुमार्य, विवेक है। उसका भाव्यक्ष पुरुष की अपेक्षा विशेष उन्नत एवं परिपक्व है। वह गंभीरता से सोचती है, उसके दृष्टिकोण में विशालता है, उसकी अंतर्दृष्टि अत्यन्त व्यापक है। स्त्री स्वभाव और शरीर से कोमल है।
स्त्री और पुरुष को अपने अंदर ही सीमित रहने में सुख का अनुभव नहीं होता, वरन् वे विपरीत सेक्स वाले प्राणी के सहवास में रहकर पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए इच्छुक होते हैं। एक दूसरे के प्रत्येक कार्य में सहायता करते हैं और अतृप्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। पुरुष जब पवित्र त्यागमयी भावनाओं से अपनी पत्नी को अपने समान सीमित कर उच्च आध्यात्मिक भूमि पर लाता है, तो उसे उसके पौरुष में विश्वास होता है। इसी प्रकार स्त्री सहायक, मित्र विपत्तियों में धैर्य प्रदान करने वाली, सहनशीलता बन कर पुरुष को समुन्नत करती है।
सुखी, सन्तुष्ट, पवित्र भावनाओं वाले, संयमशील और शिक्षित पति-पत्नी के बच्चे प्रारंभ से ही उच्च संस्कार लेकर जन्मते हैं और पूर्ण गृहस्थ फलता-फूलता है। पति-पत्नी की हिंसात्मक क्रियाओं का स्थान रचनात्मक प्रवृत्तियाँ ले लेती है। मनोविश्लेषण की दृष्टि से बाँझ स्त्री तथा वह पुरुष जिसके बच्चे न हों, भयानक विषैली भावना ग्रन्थियों से ग्रसित रहते हैं, हिंसात्मक घृणास्पद और बेरहमी के कार्य करते हैं। इस दृष्टि से स्त्री के जितनी बार बच्चे होंगे, वह उतनी बार अधिक विनम्र, सहिष्णु, संयमित, विनयशील बनती जायेगी। उसे बहुत मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होगा। उसकी विवृत्तियों और वासनाओं का परिष्कार हो सकेगा। जब स्त्री पुरुष को अपनी उच्चता, पवित्र आध्यात्मिक गुप्त शक्तियों में विश्वास होने लगता है, तब उनकी दबी हुई प्रवृत्तियों का सम्मान रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक हो जाता है। घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, स्वार्थ नष्ट हो जाते हैं। विवाहित स्त्रियाँ कुँवारियों से अधिक जीती हैं।
गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के स्वर्ण सूत्र -
डेलकार्नेगी ने दाम्पत्य मनोविज्ञान का गूढ़ अध्ययन कर जो निष्कर्ष निकाले हैं, उन्होंने आज पाश्चात्य देशों में क्राँति उत्पन्न कर दी है। इसमें स्त्री-पुरुष के मन के अपेक्षा गुप्त भेदों का ज्ञान भरा पड़ा है। परिवारों के लाभार्थ हम उन्हें यहाँ उन्हीं की पुस्तक से उद्धृत करते हैं।
1. पतियों को तंग मत करो-
यह नियम स्त्रियों के लिए है, जो समय कुसमय अपने पति से उसकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में न रख भाँति-भाँति की फरमाइश करती हैं। जीभ पर अधिकार न होना, प्रलोभन, सिनेमा देखना, आभूषण अच्छे वस्त्रों की जिद से पति परेशान हो उठता है। विचार तथा स्वभाव के मतभेद होते हैं, फिर बढ़कर पारिवारिक जीवन को नष्ट करते हैं।
2. समालोचन मत करो।
पति या पत्नी जब एक दूसरे की कमजोरियाँ, खराबियाँ, मूर्खताएं छाँटने लगती हैं, तो फिर प्रेम-डोर टूट जाती है। प्रेम की उच्च भूमिका में आपको एक दूसरे के दुर्गुणों, कमजोरियों को भी सहन करना है। यदि शीघ्र ही एक दूसरों की त्रुटियों पर एकाग्र रहे, तो एकाग्रता के नियमों के अनुसार उन्हीं की अभिवृद्धि होगी।
3. निष्कपट भाव से प्रशंसा करो।
अपने जीवन-साथी को उत्साहित करना, ऊंचा उठाना, शिक्षित सुसंस्कृत, सभ्य नागरिक बनाना आपका कर्त्तव्य होना चाहिए। प्रत्येक अच्छाई की प्रशंसा कीजिए और दिल खोलकर कीजिए। प्रशंसा से उनके और भी गुण अच्छा स्वभाव विकसित हो सकेगा। मित्रभाव, सहनशीलता, संगठन, सहयोग बढ़ेगा। अधिकाँश पत्नियाँ अच्छी ही होती हैं, पर पति के उत्साहित न करने से, उनका विकास रुक जाता है। झिड़कने, मारने-कूटने, अशिष्ट व्यवहार करने व निर्दयता का व्यवहार करने से पत्नी का हृदय टूक-टूक हो जाता है। गुप्त विश्वास टूटते है। तलाक की नौबत आती है। अतः पति को सदा सर्वदा पत्नी के उच्च गुणों के सजेशन ही देने चाहिए। निष्कपट भाव से उसके प्रत्येक कार्य घर की सजावट, रसोई, पहनाव, श्रृंगार, शिशुपालन आर्थिक सहयोग की प्रशंसा करो।
4. छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखो
गृहस्थी छोटी-छोटी बातों से टूटती भी बनती भी है। स्त्रियाँ पति को साफ-सुथरा देखना पसंद करती हैं, अपनी बाबत अच्छे विचार पर पुनः सुनना चाहती हैं, अपने कपड़ों, घरेलू व्यवस्था, भोजन की प्रशंसा सुनना चाहती हैं यदि आप उनके लिए हुए कार्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते, तो वह क्यों अच्छी बनेंगी।
कुछ व्यक्ति रुपया पैसा अपने हाथ में रखते हैं और पत्नी को दो-दो चार-चार आने मांगने पड़ते हैं। उसके ‘अहं’ और गर्व को धक्का सा लगता है। अपने अंदर वह हीनत्व की भावना का अनुभव करती है और पति को प्रेम ना करती। अतः पत्नी के पास यथेष्ट पैसा, छोड़ना चाहिए। उसकी उचित और नैतिक माँगों व पूर्ति में आलस्य करना घर में झगड़े का वृक्ष धोना है।
जो युवक-युवती एक दूसरे पर अंधाधुँध आसक्त होकर विवाह करते हैं वे एक दूसरे के सुख और आनन्द पाने की बड़ी आशाएं लेकर आते हैं। यदि दोनों एक दूसरे की छोटी-छोटी बातों का ध्यान न रखें तो शीघ्र ही दाम्पत्य जीवन कंटकाकीर्ण हो जाता है। एक दूसरे का मन रखने के लिए पर्याप्त समझ, अध्यत सम साहस और कड़े परिश्रम की आवश्यकता है।
पत्नी से कुछ भी मत छिपाइये अन्यथा वह शक-शुबा करेगी और गुप्त मानसिक व्यथा से दग्ध होती रहेगी। उसे यह बतला दीजिए कि आप क्या कमाते हैं? कैसे व्यय करते हैं? कितना बीमा करा रखा है? किसके नाम वसीयत है? आय-व्यय कैसे चलता है? भविष्य में आपकी क्या-क्या योजनाएं हैं ? कितना रुपया आपने एकत्रित किया है ? इत्यादि-इत्यादि।
पति को निरन्तर कोमलता और निरन्तर पत्नी की देख-रेख द्वारा उसके प्रति अपने प्रेम का प्रकाश करते रहना चाहिए। अन्यथा प्यार की भूखी स्त्री जहाँ भी उसे प्रेम मिलेगा, वहीं से ले लेगी। विवाह के पश्चात जब तक जीवित रहें, प्रेम-दान करते रहना चाहिए। शिष्टाचार की छोटी मोटी बातों को, इज्जत और नये-नये उपहार लाने की बात भूल नहीं जाना चाहिए। क्योंकि स्त्रियाँ इस बात को बहुत महत्व देती हैं। स्त्री प्रेम, प्रणय और प्यार के अभाव में साधारण सुख का जीवन भी व्यतीत नहीं कर सकती। प्रेम उसकी आत्मा का भोजन है।
5-सुशील बनो।
आप ऐसे चुम्बक बनने चाहिए जिससे आकर्षित होकर स्त्री अथवा पुरुष आपसे कुछ आध्यात्मिक प्रेरणा, उत्साह, शिक्षा पथप्रदर्शन प्राप्त कर सके। प्रसन्नता, सौम्यता और सुशीलता से आप घर भर में रस संचार कर सकते हैं। ऐसा पति किस अर्थ का जिसके घर में प्रवेश करते ही सब डर जायें, बच्चे दुबक जायें, खामोशी और मुर्दनी छा जाये ? सुशीलता से आप अपनी पत्नी की इच्छाएं समझ सकेंगे। उसकी अनुचित फरमाइशें को तर्क और बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे दूर कर सकेंगे। क्रोध, मार-पीट, द्वेष या तलाक द्वारा आप कदापि कुछ न कर सकेंगे। समानता, निष्कपटता, शिष्टता का व्यवहार ही आगे बदलता है।
6-कामशास्त्र की वैज्ञानिक पुस्तक पढ़ो
मनुष्य के काम-जीवन का क्या तात्पर्य है? उसकी निगूढ़तम गुत्थियों का अध्ययन प्रत्येक स्त्री पुरुष के लिए अतीव उपयोगी है। सस्ती बाजार की अश्लील पुस्तकों से सावधान! यह मार्ग बड़े उत्तरदायित्व और आर्थिक परीक्षा का है। अतः इसकी पुस्तकों का चुनाव विवेकपूर्ण ढंग से होना चाहिए।
दाम्पत्य कलह का एक कारण दम्पत्ति का, विशेषकर पुरुष का काम विज्ञान से अनभिज्ञ होना है। पुरुष स्वभाव से ही ढीठ और स्त्री शीलवती है। इसके अतिरिक्त वह केवल पतित्व की वेदी पर ही अपने को निछावर करने में आनन्द मानती है, वह पतित्व के साथ ही दाम्पत्य प्रेम भी चाहती है। जो पुरुष प्रथम संभोग में ही स्त्री को अपनी कामना का शिकार बनाने की बर्बरता करता है, वह भयंकर भूल करके दाम्पत्य कलह का बीज बोता है। विषय मानसिक विकार एवं शरीर का मल पदार्थ है। किन्तु पवित्र दाम्पत्य प्रेम तो हृदय की उच्चतम अभिव्यक्ति है। हृदय के आदान प्रदान में पर्याप्त समय लगता है। हृदय ही स्त्री की सम्पत्ति है। वह सहज ही पुरुष को नहीं देती और एक बार देकर फिर वापिस नहीं लेना चाहती। अतः कामविज्ञान के शिक्षण से मनुष्य नारी हृदय की निगूढ़तम गहराइयों की शिक्षा पाकर बर्बरता, निष्ठुरता, बलात्कार से बच सकता है।
उपरोक्त नियमों के पालन से बहुत लाभ हो सकता है। स्मरण रखिए गृहस्थाश्रम पति और पत्नी की साधना का आश्रय है। वहाँ जीवन की धर्म, अर्थ और काम की साधना की जाती है। पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, सहायक हैं, मित्र हैं। दोनों का कार्य एक दूसरे के गुणों की अभिवृद्धि करना है, क्षुद्रताओं का उन्मूलन करना है और परस्पर एक अभिन्नता बनाये रखना है। इसके लिए प्रत्येक को संयम, सहनशीलता एवं स्वार्थ त्याग अपने अंदर विकसित करना चाहिए।
पति का नाम “भर्त्ता” अर्थात् भरण और पोषण करने वाला है। पत्नी में उसकी शारीरिक, मानसिक, साँस्कृतिक, सामाजिक जो विभूतियाँ या न्यूनताएं हैं, उनकी पूर्ति का उत्तरदायित्व भी उसी के ऊपर है। उसकी शक्तियों का विकास करें, पोषण करे, कुत्सित मार्ग से बचावे तथा सदा सर्वदा सन्तुष्ट रखें।
पत्नी साधिका है। जिस प्रकार एक साधक अपने प्रभु की साधना में अपना सर्वस्व समर्पण कर देता है, उसी प्रकार अपने मन में द्वेष की भावना न रखकर पति को अपना आराध्य मानकर अपना भला और बुरा सब कुछ सौंप दे। यदि पति कुमार्गगामी हो, तो प्रेम प्रशंसा और युक्ति द्वारा उसका परिष्कार करे। कुमर्गढायन एक मानसिक रोग है। अशिक्षा, अंधकार और मूढ़ता की निशानी है। इस रोग के उपचार के लिए समझाने, तर्क, बुद्धि तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कुमार्ग की हीनता प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। निराश होने के स्थान पर समझाने से अधिक लाभ हो सकता है।
पितृ ऋण के उद्धार का एक मात्र साधन दाम्पत्य जीवन की शाँति है। संतान का उत्पादन और सुशिक्षण योग्य दम्पत्ति के बिना कदापि संभव नहीं है। योग्य माता-पिता, उचित वातावरण, घरेलू संस्कार पुस्तकों तथा सत्संग द्वारा योग्य संतान उत्पन्न होती है। योग्य संतान के इच्छुकों को सर्वप्रथम स्वयं अपना परिष्कार एवं सुधार करना चाहिए।
दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य “भोग“ नहीं, उन्नति है। सब प्रकार की उन्नति के लिए दाम्पत्य जीवन आपको अवसर प्रदान करता है। यहाँ पहिले शरीर, फिर सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत जीवन और आध्यात्मिक जीवन की उन्नति के साधनों को एकत्रित करना चाहिए। उन साधनों को अपनाना चाहिए जिससे परस्पर का द्वेष नष्ट हो और आत्मरति एवं आत्म प्राप्ति की ओर दोनों जीवन-साथी विकासमान हों। जब दोनों एक दूसरे की उन्नति में सहयोग प्रदान करेंगे तो निश्चय ही अभूतपूर्व गति उत्पन्न होगी।
भोग का शमन योग से नहीं होता, भोगने से वासनाएं द्विगुणित होती हैं और अपने चंगुल से मनुष्य की मुक्ति नहीं होने देतीं। एक के पश्चात दूसरा प्रलोभन मनुष्य को आकर्षित करता है। अतः जितने से शरीर, मन, आत्मा की उन्नति हो, उतने से ही संपर्क करना चाहिए। जीवन में फैशनपरस्ती, अभक्ष पदार्थों का उपयोग, नशीली वस्तुओं, रुपया उधार देना या लेना, व्यर्थ के दिखावे बढ़ाने से मनुष्य उनका गुलाम बन जाता है। इनमें व्यवधान उपस्थित होने से कलह बढ़ता है।
स्त्री-पुरुष का दाम्पत्य सम्बन्ध आत्म-पक्ष के लिए है। यज्ञ में ईश्वरीय शक्तियों का विकास, आत्म भाव का विस्तार, उच्च ग्रन्थों द्वारा मानव जीवन को परिपुष्ट करने के लिए दाम्पत्य जीवन का निर्माण किया है। इसलिए स्त्री-पुरुष को विषय वासना का गुलाम नहीं बनना चाहिए। भोग से जितनी दूर रहा जाये, उतना ही उत्तम है।
गृह की आन्तरिक व्यवस्था भी एक कला है। प्रायः देखा जाता है कि घर में दो प्रकार के सदस्य होते हैं - 1. कार्य में लगे रहते हैं, 2-आराम तलब और कामचोर - ये व्यक्ति आनन्द अधिक लेते है और उसी अनुपात में कार्य नहीं करते। काम करने वाले वर्ग में मुख्यतः घर का स्वामी, मालकिन बड़ी भौजाई तथा अन्य उत्तरदायित्व का अनुभव करने वाले व्यक्ति आते है। द्वितीय वर्ग में नवयुवक तथा स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियाँ, नवीन वधुएं, मेहमान या पढ़ने के लिए आये हुए दूसरे घर के विद्यार्थी गिने जाते हैं।
अपने परिवार का अध्ययन कर मालूम कीजिए कि इन दोनों वर्गों में किस व्यक्ति का स्थान कहाँ है? आपकी नीति सबसे उसकी आयु के अनुकूल कार्य लेने की होनी चाहिए। परिवार एक ऐसी संस्था है, जिसमें सबका समान अधिकार है। काम भी सभी को करना उचित है। अन्यथा परिवार की नींव ढह जायेगी।
घर के विभिन्न कार्य कर्त्ता :-
घर के सब कार्यों की सूची तैयार कीजिए। मान लीजिए आपके घर में निम्न कार्य हैं - घर की झाडू, कमरों की सफाई, बैठक की झाड़फूँक, सजावट, प्रातः दूध दुहना या बाजार से लाना, पशुओं की देखभाल, बाजार से सब्जी तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का खरीदना, रुपए की आय व्यय का हिसाब, घर का भोजन बनाना, बर्तन साफ करना, बच्चों को पढ़ाना, मासिक बजट तैयार करना। दवादारु और चिकित्सा का प्रबंध, सफर कराने का बन्दोबस्त, डाक की सुव्यवस्था इत्यादि। इन सब कार्यों को करने के लिए आप परिवार से निम्नलिखित कार्यकर्ता चुन लीजिए।
1. गृह मंत्री, 2. यातायात, 3. विदेशी विभाग, 4. स्वास्थ्य विभाग, 5. अर्थ मंत्री।
गृहमंत्री का कार्य प्रमुख व्यक्ति करे, जो घर की सब छोटी-मोटी जानकारी रखे, भावी कठिनाइयों के लिए परिवार को चौकस रखे, लड़ाई झगड़ों से बचाकर परिवार की प्रतिष्ठा का ध्यान रखे, घर की सामान्य पॉलिसी का निर्णय करे। दूसरा प्रमुख कार्य अर्थ मंत्री का है। यह व्यक्ति हिसाब करने, बजट बनाने, अध्ययन का ठीक ब्यौरा रखने, मौसम के समय खाद्य वस्तुओं को खरीदने और बचत की व्यवस्था में चतुर होना चाहिए। घर में पाई-पाई का हिसाब रखा जाय। मास से पूर्व ही बजट तैयार करले और एक-एक कर सब जिम्मेदार सदस्यों के पास घुमा दे। उनकी आवश्यकताओं के विषय में पूछ लें और उसका उल्लेख बजट में यथास्थान करदें। कर्ज में आने से परिवार की रक्षा करे। यातायात मंत्री सफर, मेहमानदारी, यात्रियों की देखभाल करे। विदेश मंत्री, चिट्ठी-पत्री, अखबार मंगाना बाहर वाले मेहमानों से अच्छे सम्बन्ध स्थिर रखने का कार्य करे। यदि घर के सब व्यक्ति इन कार्यों में पृथक-पृथक काम विभाजित कर अग्रसर होगा तो घर का काम क्षण भर में हो सकेगा। किसी के ऊपर अनुचित भार भी न पड़ेगा।
प्रातःकाल उठकर यदि प्रत्येक सदस्य स्वयं अपने कमरे में झाड़ू लगालें, अपना बिस्तर स्वयं उठा दे, स्नान के उपराँत साबुन तथा स्थान रखदे, और तोलिया स्वयं धो डाले, अपने कपड़े नियत स्थानों पर रखे, तो बहुत सहूलियत हो सकती है। जब एक-एक-व्यक्ति काम छोड़ कर लापरवाही करता है, तो काम पहाड़-सा प्रतीत होता है। यदि प्रत्येक आदमी अपना-अपना काम निपटाता चले तो सब कुछ क्षण भर में निपट जाता है।
नौकर के ऊपर निर्भर रहना उत्तम नहीं है। नौकर आ जाने से प्रत्येक व्यक्ति के मन में आलस्य कामचोर-पन, दूसरे पर शासन करने की भावना आती है। थोड़े दिन पश्चात कार्य-भार से त्रस्त होकर नौकर भाग जाता है। यही हाल रसोइया का होता है। कल्पना कीजिए कि यदि रसोइया एक-एक व्यक्ति के लिए बैठा रहे, तो कैसे भोजन का अंत हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को नियत समय पर जो बने, उसे प्रसन्नतापूर्वक खा लेने की आदत डालनी चाहिए।
घर की सुव्यवस्था कैसे करें-
आइए, मैं आपको अपने घर की सैर कराऊँ। यह देखिए हमारा स्टोर है। इसमें जो सामने अलमारी है, इसमें छोटे-छोटे सात पीपे चुने रखें हैं। प्रत्येक पीपे पर कुछ लिखा हुआ है। ये सात प्रकार की दालें हैं, जिन पर दाल के साथ जिनका नाम दर्ज है। कौन सी दाल किस दिन तैयार होगी, इसका प्रबन्ध पहले से ही है। मास के पहले दिन इन पीपों को देख लिया जाता है और मुँह तक भर दिया जाता है। दूसरी ओर मसालों के पीपे हैं जिनमें वर्ष भर के लिए नमक, धनिया, मिर्च, हल्दी, जीरा, गरम मसाला पिसा हुआ रखा है। जब रसोई के मसालदान में कोई वस्तु कम हो जाती है, तो इसमें से लेली जाती है। एक ओर दो बड़े बोरे गेहूँ के रखे हैं, एक पीपे में चावल है, गाय भैंस के लिए 1 बोरी खल चुनी इत्यादि रखी है। एक पीपे में ढक्कन से बंद आटा रखा हुआ है। खूँटी पर तराजू मौजूद है। नियत मिकदार में आटा और दाल तोल कर गृह मंत्री देता है। इसी में करीने से सजी हुई एक ओर लकड़ी एकवत्र रखी हैं। शेष लकड़ियाँ छत पर एकत्रित हैं। कुछ उपले भी मौजूद हैं। एक कोने में मिट्टी के तेल का पीपा और दो बोतलें रखी हुई हैं। मास के प्रारंभ में देख लिया जाता है कि स्टॉक में क्या-क्या हैं। स्टॉक रखने वाला व्यक्ति बजट के लिए वस्तुओं के परिमाण के सम्बंध में सूचना देता है।
ऊपर एक अलमारी में (जो बंद है) पाँच तरह के अचार-मुरब्बे और घी एकत्रित है। इसे मास के प्रारंभ में भर लिया गया है। कुछ तिल का तेल भी रखा है। इसी में पापड़, भंगौरी और सूखे मेवे-किशमिश, बादाम, छुहारे, खोपरा, स्पेशल भोजन के लिए तैयार रखे हैं। अलमारी के निचले खाने में दो दर्जन कटोरियाँ, दो दर्जन चम्मच, कुछ थालियाँ गिलास इत्यादि एकत्रित हैं। कुछ बढ़िया गुड भी बन्द पीपे में सुरुचिपूर्ण ढंग से रखा है। इस स्टोर में एक मास के लिए तरकारी के अतिरिक्त सब कुछ एकत्रित कर लिया है।
रसोई भी देख लीजिए। एक अलमारी में साफ किए हुए बर्तन सजे रखे हैं। महरी ने उसे धो दिया है, चूल्हा लीपा पुता साफ है, पटरा धुला हुआ है। एक और आले में शक्कर का पीपा, छलनी, कुछ चम्मच, चाय का इंतजाम है, दूसरी और मसालदान विराज रहे हैं। एक ओर दूध बिलोने का यंत्र रखा है। दही जमा रखा है। मक्खन ढका रखा है। प्रत्येक बालक को प्रातः मक्खन से रोटी और एक पाव दूध का नाश्ता मिलेगा। उसके लिए सब तैयारी है। कुछ सूखी तरकारियाँ भी यहीं रखी हुई हैं। बाजार में बिकने वाले कुछ रायते, सुखे आलू, टमाटर की चटनी, अचार, सिरका मौजूद है। यह आपको इतना साफ सुथरा इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि प्रति 3 मास में घर के व्यक्ति मिलकर स्वयं इसकी पुताई कर डालते हैं। यह स्थान सबसे स्वच्छ है।
आगे आइए, यह हमारा गुशल खाना है-छोटा पर साफ। एक ओर साबुन तथा मंजन देखिए। दूसरी ओर साफ तौलिया लटक रहा है। हाथ धोने के पश्चात इसे काम में लाया जाता है प्रतिदिन प्रातःकाल फिनाइल से इसकी दीवारें और राख से नल की टोंटी माँज दी जाती है।
पाखाना इतना साफ है कि कहीं मक्खी का नाम तक नहीं। इसी में आले में फिनाइल का डिब्बा है, नल है, बाहर से धोने के लिए पिचकारी है। बाहर के नल में लगाकर इसे प्रति दिन खूब स्वच्छ कर दिया जाता है। पाखाना धुलाने की बारी प्रति सप्ताह बदलती है।
घर के सहन में एक डायरी कील पर लटक रही है। उसी में एक पेंसिल बंधी है। जिस किसी वस्तु को बाजार से मंगाने की आवश्यकता होती है, वह कोई भी इस डायरी में दर्ज कर देता है। प्रत्येक बच्चा बूढ़ा इसका प्रयोग करता है। अपनी जरूरत की वस्तु के साथ नीचे अपना हस्ताक्षर कर देता है। जब बाजार से चीजें लाने वाला व्यक्ति बाजार जाता है, तो इस स्लिप को फाड़ कर ले जाता है और सबकी वस्तुएं एक साथ आ जाती हैं।
यह हमारा संदूकों का कमरा है। इसमें दस-पन्द्रह छोटे-बड़े संदूक आप देख रहे हैं। यह सबसे बड़ा संदूक रजाई, बिछौना, और कम्बल के लिए है। जिसमें फिनायल की तेज महक आ रही है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति का संदूक पृथक है। उस कोने के संदूक में मैले कपड़े रखे हैं, जो धोबी ले जायेगा। धोबी के घर धुला हुआ प्रत्येक कपड़ा आठ दिन तक चलना होता है। रात्रि की पोशाक पृथक है। प्रातःकाल नहा धो कर स्वच्छ पोशाक धारण करने की योजना है। परिवार की आन्तरिक व्यवस्था सही कर हम अन्य कार्यों में निश्चिन्ता पूर्वक लग सकते हैं।
तीन कमरे विशेष महत्व रखते हैं। पहला पूजा गृह है। यह अपेक्षाकृत छोटा पर, स्वच्छ अगरबत्तियों से सुगन्धित और धार्मिक चित्रों से सुसज्जित है। प्रातः सायं घर के सब सदस्यों को भजन, प्रार्थना और पूजा के अनिवार्य रूप से यहाँ उपस्थित होना पड़ता है। बालकपन में डाले गये संस्कारों से प्रत्येक बालक आशावादी, संघर्षशील, आस्तिक और कर्त्तव्य परायण होता है। इसी में एक छोटा घरेलू पुस्तकालय भी है, जिसमें अनेक छोटे बड़े धार्मिक आध्यात्मिक और चरित्र निर्माण करने वाले ग्रन्थों, मासिक-पत्रिकाओं का संकलन है। भोजन के पश्चात् सब सदस्य इस कमरे में एकत्रित होते हैं। रेडियो द्वारा मनोरंजन, समाचार तथा अन्य आवश्यक तत्वों का यहाँ ज्ञान कराया जाता है। बच्चे प्रायः इसमें अपना अधिकाँश समय व्यतीत करते हैं।
हमारा शयनागार दो बातों में विशेष महत्व रखता है। वह खूब खुला हुआ, हवादार, प्रकाशमय है। बिस्तर सफाई से एक ओर तय करके रखे हुए हैं। शाम होते-होते इन्हें बिछा दिया जायेगा। ‘बिस्तर लगाना और उठाना’ यह कार्य छोटे बच्चों का है। उन्हें सहायता करने के लिए एक बड़े व्यक्ति की ड्यूटी भी लगी हुई है। बच्चों के लिए और भी छोटे-छोटे कार्य चुन दिये गए हैं जैसे-भोजन खिलाना, कुर्सियों की सफाई, पुस्तकों को उठाकर यथास्थान पर जमाना, अपने वस्त्र, जूते, बस्ता नियत स्थान रखना, छोटे शिशुओं को खिलाना, घर के पशु-पक्षियों-तोता, बिल्ली, कुत्ता, गाय को मामूली भोजन प्रदान करना इत्यादि। उनकी आयु के साथ धीरे-धीरे उन्हें अधिक जिम्मेदारी का स्थान प्रदान किया जाता है।
सबसे अधिक परिश्रम बैठक में किया जाता है। प्रातःकाल इसकी सफाई की जाती है। बिखरी वस्तुओं को यथास्थान रखा जाता है। कुर्सियों की झाड़-पोंछ, पुस्तकों, अलमारी, आलों ब्रंचों की सफाई, तस्वीरों की रक्षा, तथा कोनों, किवाड़ों या छत में लगे हुए जालों को तोड़ने का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें किसी भी सदस्य को उसकी व्यक्तिगत वस्तु को छोड़ने नहीं दिया जाता, केवल बैठने, अपने मित्रों के साथ ठहरने, आमोद-प्रमोद तथा बातचीत करने का अधिकार है। बैठक से घर की प्रतिष्ठा रहती है। उसकी स्वच्छता के लिए प्रत्येक सदस्य प्रयत्नशील रहता है।
घर के छोटे-छोटे कार्य-
इसके अतिरिक्त छतों की सफाई का ध्यान रहता है। खाटों की अजवायन खींचने, टूटी वस्तुओं की मरम्मत कराने, घर के पशुओं के चारे दाने की व्यवस्था करने, प्रत्येक बच्चे की शिक्षा में दिलचस्पी लेने, प्रतिमास उसकी परीक्षा लेने का नियम है। एक मास में बच्चा कितना आगे बढ़ा है। उसके शारीरिक, मानसिक, साँस्कृतिक स्तर में कितना परिवर्तन हुआ है। इसका निरीक्षण किया जाता है। बालक के मानसिक विकास में यथाशक्ति सहायता पहुँचाने का प्रयत्न किया जाता है। हमारा यह विचार है कि हमारी विचारधारा, हमारी प्राकृतिक वृत्तियों के अनुभव में निर्धारित होनी चाहिए। बच्चे का अनुभव बढ़ता है। उसके साथ उसका ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता है। ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अभीष्ट ज्ञान प्राप्त करना, शारीरिक और मानसिक व्यापारों का विकास ही बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा है। जिस घर में बच्चों की चंचलता, उनकी हलचल जिज्ञासा, स्व प्रवृत्ति के अनुसार संगी साथी बनाने की चेष्टा अनुकरण, हर्ष, शोक भयादि व्यापार, सम्मति प्रदर्शन की इच्छा, एप्रीसीयेशन कुछ न कुछ करते रहना इत्यादि प्रवृत्तियाँ शुभ कार्यों में लग सकेंगी। उसी परिवार के बच्चे आगे निकल जायेंगे। प्रत्येक बच्चे को कुछ जिम्मेदारियाँ सौंपिये। जितना ही बच्चा जिम्मेदारियों के प्रति जागरुक बनेगा। उतना ही उसका आत्म विश्वास बढ़ता जायेगा।
पारिवारिक खर्च की समस्या सम्मिलित कुटुम्बों में कदाचित सबसे महत्वपूर्ण और उत्तर दायित्वपूर्ण है। हमने अनेक बड़े परिवारों का विशेष अध्ययन किया है तथा हमें ज्ञात हुआ है कि परिवारों के मुखिया आय-व्यय की कला से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। अस्सी प्रतिशत कर्ज से ग्रसित हैं। अथवा अनीति की राह पर जा रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक व्यय करना चाहता है। चुपचाप कुछ एकत्रित रखकर परिवार की सम्मिलित पूँजी का क्षय करता है। कुछ स्थानों पर स्त्रियाँ बड़ी मूर्खतापूर्ण काम करती हैं। गहनों, विवाहों दिखावा में अनाप-शनाप व्यय होता है। कुछ रूढ़ि वादी अशिक्षित मूर्ख स्त्रियाँ जो धर्म के विषय में कुछ नहीं समझती। पात्र कुपात्र का विवेक न कर खूब दान करती हैं। एक परिवार में एक मुखिया ने अपनी पत्नी की जिद से तंग आकर अपनी सामर्थ्य से बाहर निकल कर एक कन्या पाठशाला प्रारम्भिक और दो वर्ष में दिवाला निकाल बैठे। दूसरे सज्जन ने कई छोटे-मोटे कारखाने प्रारम्भ किए। एक महानुभाव ने एक डेयरी फिर चक्की, तिल पेलने की मशीन लगाई पर सभी में हानि उठाकर 30-35 हजार रुपया का ऋण परिवार पर डाल गये। एक बड़े रईस अफीम के व्यसन से सब कुछ गँवा बैठे। कई स्थानों पर पुत्र-पुत्रियों की शिक्षा उचित नहीं हुई और पिता के मरते ही पूरा परिवार नष्ट भ्रष्ट हो गया। एक जमींदार साहब ने घर की खेती की। नौकर रख कर जमीन की जुताई कराई किन्तु व्यय आय के अनुपात में इतना हो गया कि गाँठ की पूँजी भी नष्ट हो गई । एक सज्जन के इतने पुत्र-पुत्री हो गये कि बेचारे उनकी शिक्षा, देख−रेख तथा विवाह करते-करते नष्ट हो गये । हम एक ऐसे प्रतिष्ठित पूँजीपति को जानते हैं जो व्यसन-व्यभिचार में बहुत कुछ गँवा कर दर-दर के भिखारी बन गये और कर्ज के लिए सबके आगे हाथ फैलाये फिरते हैं।
सम्मिलित कुटुम्ब में ऋण क्यों होता है ?
1- आय-व्यय की कला से अनभिज्ञता प्रथम कारण है। जिससे परिवार नष्ट होते हैं। यह कला हमें अपने खर्च को सही रूप से व्यय करना, भविष्य के लिए कुछ संग्रह करना, बीमारी, विवाह, मृत्यु, मकान, मवेशी, जायदाद इत्यादि खरीदने की सुविधाएं प्रदान करती है।
2- स्वार्थपरता वह दुर्गुण है जिससे परिवार नष्ट होते हैं। हर व्यक्ति अपना सुख देखता है। बढ़ा चढ़ा कर व्यय करता है। झूँठी शान में रहता है या रुपया चुराकर रखता है। खुदगर्जी साक्षात राक्षस हैं। इससे कर्ज बढ़ता है।
3- व्यसन, व्यभिचार, विलासिता घर में प्रविष्ट होते ही खर्च बढ़ते जाते हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी जरूरत कम नहीं करना चाहता। प्रत्युत उसी शान से व्यय करता है। जहाँ आय से व्यय अधिक हुआ कर्ज बढ़ता है। शराब पीने वाले व्यक्ति हमेशा ऋण में रहते हैं। नशे में उन्हें अपने बजट पर नियंत्रण नहीं होता। व्यभिचार करने वाला देखते-देखते दर-दर ठोकरें खाने वाला भिखारी बन जाता है।
4- दान, यात्राएँ, विवाह, मृत्यु, भोजन, मुकदमें इन सभी में आय से अधिक खर्च हो जाता है और वह कर्ज मामूली व्यक्तियों से कभी नहीं उतर पाता। हिन्दुओं में विवाह समस्या और कन्याओं के विवाह में दहेज तथा गहनों का बनाना बेहद खर्चीले हैं। जिस व्यक्ति के चार कन्याएं हैं, उसे समृद्ध बनने में अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है।
5- अधिक बच्चे उत्पन्न करना नैतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोण से बुरा है। सारी आयु बच्चों में ही नष्ट हो जाती है। मरने के बाद बच्चे रोते फिरते हैं।
6- पुराना ऋण- जिन परिवारों पर पुराना ऋण चला आता है, वह कभी भी नहीं दिया जा पाता। सूद बढ़ता है। ऋणग्रस्त समझता है कि चूँकि तकाजा नहीं होता, उससे कर्ज न माँगा जायेगा। जब वह मूल से आगे बढ़ जाता है, तो घर नीलाम हो जाता है।
7- लंबी बीमारियां- यक्ष्मा, पुरानी बवासीर, दुर्बलता, पेट के रोग, दाँतों के रोग, हृदय के रोग, पागलपन इत्यादि लंबी बीमारियाँ है। इनमें चाहे-जितना खर्च करो, परिवार पनप ही नहीं पाता। वृद्धों की बीमारियाँ निरन्तर चलती रहती हैं। यदि कहीं कोई आपरेशन कराने का अवसर आ गया, तो वह बड़ा कष्ट-साध्य हो जाता है। पुनःपुनः बच्चों का होना बड़ा खतरनाक है। इसमें व्यय भी होता है और बड़ी बीमारियाँ, जैसे-प्रसूत, ज्वर, यक्ष्मा इत्यादि हो जाने का भय रहता है।
8-बच्चों की शिक्षा-आधुनिक षिक्षा पद्धति बड़ी खर्चीली है। यदि कोई अपने बच्चे को उच्चतम शिक्षा दिलाना चाहता है, तो उसे पुस्तकों, फीस, बौर्डिंग तथा आने जाने के बहुत से व्यय करने पड़ते हैं। विद्यार्थीगण लापरवाह, व्यसनी, फिजूल खर्च, दिखावा पसन्द, सिनेमा और फैशन परस्त होते हैं। माँ-बाप से खूब रुपया मँगाते हैं और कमाऊ बनकर पृथक गृहस्थी ले बैठते हैं, पिता को कर्जदार छोड़ जाते हैं।
व्यय पर आप की समृद्धि निर्भर है।
जितना आप-व्यय करते हैं, उस पर आप की समृद्धि निर्भर है। आप कितना कमाते हैं, यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खर्च है। आप सौ रुपया कमाते और डेढ़ सौ खर्च करते हैं, तो आपके सौ रुपए किस काम के? बढ़े हुए पचास रुपयों के लिए आप या तो चोरी करेंगे, गाँठ काटेंगे, धोखा देंगे या अनीति की राह पर चलेंगे। आपका खर्च करना आपकी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा। चाहे आपकी आमदनी कुछ भी क्यों न हो।
आपके खर्च अधिक होने का अभिप्राय है कि आपकी आवश्यकताएँ बढ़ी हुई हैं। उनमें कुछ जरूरी और कुछ व्यर्थ की विलासितापूर्ण गंदी आदतें हैं। आय के अनुसार खर्च की योजना बनानी चाहिए।
यदि यह कहें कि कर्ज सबसे बुरी गुलामी है, तो अतिश्योक्ति न होगी। जो कर्ज लेता है, अपने गले में दस मन का पत्थर बाँध लेता है। उसी भार से वह निरन्तर क्षय को प्राप्त होता है।
होरेस ग्रीनले बड़े अनुभवी व्यक्ति हो गये हैं। आप कहा करते थे-”भूख, ठंड, चिथड़े, कठिन- कार्य, घृणा, मजबूरी और झिड़कियाँ बड़ी अप्रिय चीजें हैं, लेकिन कर्ज इन सभी से बुरा और दुःख देने वाला राक्षस है। कभी ऋण-ग्रस्त न होइये। यदि आपके पास चार आने हैं, और आप एक समय का भोजन भी नहीं खरीद सकते, तो भी ऋण न लीजिए। चने भून कर पेट की क्षुधा शाँत कीजिए। एक पैसे का भी कर्ज दूसरे दिन के लिए न रखिए अन्यथा आपको मीठी नींद का सुख प्राप्त न होगा।”
कौबडन ने कहा है कि संसार के मनुष्य दो भागों में विभाजित हो सकते हैं। 1-वे जिन्होंने मितव्ययता का अभ्यास डालकर अपनी आय में बचाया है। 2-वे जो अपनी आदतों में अनियन्त्रित रहे हैं और जिन्होंने खूब खुले हाथ खर्च किया है-मितव्ययी और फिजूल खर्च। बड़े-बड़े आलीशान भवन, पुल, कारखाने, जहाज और दुनिया में बड़े-बड़े कार्य जिनसे हमारी संस्कृति का विकास हुआ है और सुख की वृद्धि हुई है, प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों द्वारा हुई है। जिन लोगों ने अपने हाथ में आये हुए रुपए का अपव्यय किया है, हमेशा मितव्ययी श्रेणी के गुलाम रहे हैं। प्रकृति का ऐसा ही नियम रहा है।
यदि आप व्यापार कर रहे हैं, तो दूसरी बात है अन्यथा ऋण न लीजिए। न कर्ज लीजिए, न दीजिए। यदि कर्ज लेंगे, तो कर्ज देने वाला आपको घृणा और हीनत्व की दृष्टि से देखेगा। यदि आप कर्ज देंगे, कर्ज का रुपया वापिस आना कठिन है। जब आप रुपया लेने जायेंगे, तो कर्जदार आपको राक्षस समझेगा। यदि आप किसी को रुपया देते ही हैं, तो वापस लेने की इच्छा त्याग दीजिए।
यदि रुपया धीरे-धीरे आता है, तो उसी अनुपात से खर्च करते रहिए। यदि कमाई अच्छी हो रही है, तो उसे अविवेक से खर्च न कर बैठिये प्रत्युत बीमारी, बुढ़ापे, विवाहों और संकट काल के लिए संग्रह करके रखिये। जैसे-जैसे आप बड़े होंगे, आपका कुटुम्ब रिश्तेदारी बढ़ेगी, स्वास्थ्य गिरेगा, वैसे-वैसे आपको अधिकाधिक रुपयों की आवश्यकता प्रतीत होगी। बहुत से व्यक्ति प्रारम्भ में बड़े सतर्क रहे, पर बड़े होकर सठिया गये और नष्ट हो गये।
अमीर बनने के लिए उतावले न बनिये। यद्यपि यह सत्य है कि हम में से प्रत्येक अमीर नहीं बन सकता किंतु नियंत्रण, ईमानदारी और मितव्ययता से हम गरीबी से बच सकते हैं और प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत कर सकते हैं। गरीब वे लोग नहीं हैं जिनके पास कम है, प्रत्युत वे हैं, जो अपनी आवश्यकताएँ बढ़ाकर बहुत अधिक वस्तुएँ चाहते हैं।
आपकी आवश्यकताएँ आसानी से पूरी हो सकती हैं। उनके लिए आपको डरने की जरूरत नहीं है। मनुष्य की आवश्यकताएँ-भोजन साधारण वस्तु और मकान आपको प्राप्त हो जाएंगे। आपको सावधान वहाँ रहना है, जहाँ आवश्यकताएँ छोड़ कर आराम और विलासिता के क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं। विलासिता सबसे महंगी कुत्सित वस्तु है। जितने रुपए आप विलासिता-चटकीले वस्त्र, चटपटे खाने, आलीशान मकान, दिखावा, फैशन, सिगरेट, सिनेमा पाउडर और खुशबूदार तेल में व्यय करते है उतने से दो बच्चों की शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध हो सकता है।
भविष्य के लिए बहुत बड़ी-बड़ी आशाएं न रखिए। जिन आशाओं से आप विहार करते हैं वे टूट फूट सकती हैं। रुपया नष्ट हो सकता है। संचित पूँजी, व्यापार खराब हो सकते है। बड़े-बड़े अनुभवी व्यापारी गलती कर बैठते हैं जीवन में बड़ी समझदारी और सम्हाल कर चलना हैं। जो कुछ आपके हाथ में है उस पर ही आपको निर्भर रहना चाहिए।
बनियों को देखिए। वे अपनी पूँजी को कैसे ध्यान, सतर्कता, मितव्ययता से सम्हालता है। एक-एक पैसा जोड़ता है। खर्च को कम से कम रखता है। मामूली खाना खाता है। व्यसनों से बचता है। पर रुपया बचाकर रखता है और समय पर दूसरों की सहायता करता है। कंजूस मत बनिये पर मितव्ययी अवश्य बनिये। बनिये की तरह हम और आप सभी व्यापार कर रहे हैं। हमें अनेक कर्त्तव्य पूर्ण करने होते हैं। हमारे पास एक घर की व्यवस्था का भार है। बाल-बच्चे सम्बन्धी और परिवार है। हमारी आमदनी आती है। उसे व्यय करना है। घर के नौकर हैं। जिन्हें वेतन देना है। बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना है। हजारों छोटे-छोटे व्यय, बीमारियाँ, उत्तरदायित्व, छोटे बड़े उत्सव आते हैं। इन सब में आप अपने व्यय की कुशलता प्रदर्शित कर सकते हैं।
व्यापार की सफलता हमारी बुद्धि, ध्यान और एकाग्रता पर निर्भर हैं। हमारी योजनाएँ जितनी सफल और अनुभवपूर्ण होंगी, उतनी ही सफलता हमें प्राप्त होगी। हम अपने बजट को यदि ठीक तरह बना लिया करें और पूर्ण मनोयोग से उस पर दृढ़ रहें, तो संतुलित व्यय कर सकते हैं।
आप कहेंगे कि हमारी आमदनी ही इतनी कम है कि यों ही व्यय हो जाता है। बजट बना कर क्या करें? यह थोथी दलील है। यदि आपको दस रुपए प्रतिमास मिलते हैं, तब भी बजट बनाना चाहिए और उसे अपने कमरे में टाँग लेना चाहिए। बजट का मतलब यह है कि आप आवेश में आकर व्यय नहीं करते हैं, बल्कि सोच समझ कर बुद्धिमत्ता और पूर्ण विवेक से व्यय करते हैं। कम आमदनी भी आपको सुख और आनन्द देगी यदि नियंत्रण पूर्वक व्यय की जायेगी। अँग्रेजी कवि वडर्सवर्थ को केवल 30 बिलिंग प्रति सप्ताह मात्र प्राप्त होता था किन्तु इसी से वह प्रसन्न जीवन व्यतीत कर सके। यदि तुम्हारे भाग्य में अमीर होना नहीं लिखा, तो कम से कम गरीबी भी नहीं लिखी है, यह विश्वास रखिए। उत्तम स्वास्थ्य, गुलाब के फूल सा खिला हुआ चेहरा, प्रसन्नता और भलमनसाहत का व्यवहार-क्या किसी संपदा से कम हैं ?
रुपया क्या-क्या कर सकता है? इसको लोग बहुत बढ़ा चढ़ाकर देखते हैं। क्या हम उससे बहुत उत्तम भोजन खा सकते हैं? स्मरण रखिए, अमीर से अमीर भी भोजन साधारण ही करता है, सोना नहीं निगल सकता।
पारिवारिक व्यय के लिए कुछ सुझाव
सब कमाने वाले महानुभावों को संपूर्ण आय मुख्य व्यक्ति के पास जमा करनी चाहिए। वह पूरी आय का योग कर परिवार की आवश्यकताएँ नोट करता जाये और बजट तैयार करे। उसमें प्रत्येक छोटे कुटुम्ब को कुछ हाथ खर्च दें। यदि सम्भव हो तो यह जेब खर्च सबके लिए रखा जाये।
सर्व प्रथम स्थायी व्ययों-अनाज, पानी, रोशनी, लकड़ी, मिर्च-मसालों, दूध का विध्या रक्खा जाय। तत्पश्चात् वस्त्रों की योजना रहे, दृष्टिकोण यह रहे कि कम से कम सबको तन ढ़कने के लिए पर्याप्त वस्त्र मिल जायें। दफ्तर में काम करने वाले बाबू तथा विद्यार्थियों को कुछ विशेष वस्त्र बाहर के लिए अतिरिक्त प्रदान किए जा सकते हैं। वर्ष के प्रारम्भ में ही बिछौनों, दरियों, रजाइयों का प्रबन्ध कर लेना चाहिए। मकान का प्रश्न आजकल बहुत जटिल हो गया है किन्तु अपनी आय, मर्यादा, स्वास्थ्य की दृष्टि से मकान का चुनाव हो। यदि मकान घर का हो तो उसकी टूट फूट का प्रति वर्ष अच्छा इन्तजाम रहे।
फुटकर खर्च, जैसे बच्चों का अध्ययन, डॉक्टर की फीस, दवाइयाँ, देनदारी, टायलेट, मनोरंजन, नौकर, सफर इत्यादि का खर्च बहुत सम्हाल कर रक्खा जाये। विलासिता के व्यय से बड़ा सतर्क रहा जाये।
बीमा, विवाह-शादियों, मृत्यु, बीमारी, मकान, मुकदमेबाजी तथा परिवार पर आने वाले आकस्मिक खर्चों के लिए सावधानी से एक अलग खाता रखा जाये। जो लोग करा सकें, उन्हें बीमा अवश्य कराना चाहिए।
यदि परिवार का प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को संयमित करे और पूरे परिवार के लाभ को देखे। जिन परिवारों में एक विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए सब अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को तिलाँजलि देते हैं, सामूहिक उन्नति में विश्वास करते हैं। वह उत्तरोत्तर विकसित होता है।
हम लोग अवश्य ही अपने पूर्वजों से अधिक पढ़े हुए और वैज्ञानिक हैं। पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे हम पाशविक और अधिक मानव हृदय वाले हैं।
-सर एस. राधाकृष्णन।
परिवार के स्त्री-पुरुष दोनों को कुछ न कुछ फालतू समय मिलता है। जिसका उपयोग आलस्य हँसी-ठट्ठा या चुगली गपशप में किया जाता है। हमारे परिवारों में समय का मूल्य नहीं समझा जाता है। पुरुष प्रायः आर्थिक समस्याओं में उलझे हुए गृह से बाहर रहते हैं। स्त्रियाँ भोजनोपरान्त या तो सो जाती हैं, या घर में बैठकर व्यर्थ की टीका टिप्पणी, परछिद्रान्वेपण, बुराई निकालना, चबोड़, लड़ाई-झगड़ों, बच्चों की देख−रेख, चौपड़ खेलने में समय नष्ट करती हैं।
आज का युग हमें पुकार-पुकार कर चेतावनी दे रहा है, “उठो, तन्द्रा छोड़ो, जागों और अपनी उन्नति के लिए प्रत्येक क्षण का समुचित प्रयोग करो। देखो प्रत्येक परमाणु आगे बढ़ रहा है, उन्नति करने के लिए उद्योग कर रहा है। व्यर्थ की सुस्ती, आलस्य या व्यर्थ की टीका टिप्पणी में समय नष्ट करने का किसे अवकाश है? यहाँ तो प्रत्येक पल उन्नति के लिए लगाना है। जब विश्व को कण-कण प्रगतिशील है, तो क्या आप व्यर्थ ही सोते रहेंगे? क्या अपना समय हम व्यर्थ नष्ट कर देंगे?
दैनिक कार्यक्रम-
परिवार के स्त्री वर्ग का उत्तरदायित्व अधिक है। अब युग उन्नति करने का है। प्रत्येक पल को उचित उपयोग कर निरन्तर अग्रसर होने का है। प्रत्येक प्रगतिशील परिवार के स्त्री-पुरुष को चाहिए कि दिनभर का कार्यक्रम दिन प्रारम्भ होने से पूर्व तैयार कर ले। यदि दिन प्रारम्भ हो जायेगा, तो इतना अवकाश प्राप्त न होगा कि यह सोचा जा सके कि आज कौन-कौन सा महत्वपूर्ण कार्य करना है। चतुर विद्यार्थी, व्यापारी, अध्यापक, इंजीनियर, ठेकेदार रात्रि में दूसरे दिन के लिए कार्यक्रम तैयार करते हैं। स्त्रियों को भोजन बनाना, नित्यकर्म, घर की सफाई और शिशु पालन का समय निकाल कर कुछ फुरसत का अवकाश निकालना चाहिए।
पुरुषों को रात्रि में दो घण्टे और स्त्रियों को 9 घंटे फालतू समय बचता है। इसमें से भी दो घण्टे बरबाद कर दिए जाये, तो आसानी से छः सात घण्टे का समय स्त्री के पास बचा रहता है। अवकाश निकालना या न निकालना हमारी इच्छा और सद् संकल्प की बात है। प्रायः पुरुष अपने मित्रों का, और स्त्रियाँ अपने सैकड़ों कार्यों का जिक्र करती हैं। कहती हैं-”क्या बताएँ! हमें तो दम मारने की फुरसत नहीं मिलती। सारा दिन धाँय-धाँय करते योंही निकल जाता है। जिन्दगी में कुछ मिठास ही नहीं रह गया है। सारे दिन चौका-चूल्हा ही लगा रहता है। इस प्रकार के असत्य और मिथ्या भाषण अशिक्षित आलसी और उन्नति न करने वाली औरतों के बहाने हैं।
अवकाश का सदुपयोग -
सर्वप्रथम प्रत्येक परिवार का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि घर की जितनी नारियाँ निरक्षर हो, उनको साक्षर बनाया जाये। बेपढ़ा लिखा होना सबसे बड़ा अभिशाप है। यदि पति, भाई या घर का और कोई सदस्य शिक्षित है, तो उसे घर से विद्या-दान का कार्य करना चाहिए। आज के युग में विद्या प्राप्ति के साधन इतने सुलभ और सस्ते हैं, जैसे किसी भी युग में न थे। पुस्तकें, मासिक-पत्र, स्टेशनरी, कागज इत्यादि अत्यन्त सस्ते में ही प्राप्त हो जाते हैं। समाचार-पत्रों की सुविधा थोड़े ही पैसों में हो जाती है। मासिक पत्रिकाएँ प्रत्येक स्थान पर सुलभता पूर्वक ली जा सकती हैं। पास-पड़ौस से माँग कर भी इनका उपयोग किया जा सकता है।
परिवार में आने वाले समाचार-पत्रों या पत्रिकाओं का चुनाव बड़ी सतर्कता से होना चाहिए। आजकल सिनेमा से सम्बन्धित अश्लील, सुरुचिपूर्ण, कामोत्तेजित पुस्तकें और पत्रिकाएं ढेर की ढेर मिलती हैं। इनके मायाजाल में कदापि न फँसिये। स्त्रियों के लिए मासिक-पत्रिकाओं में शाँति, ‘दादी’ ‘मनोरमा’, ‘कला’, ‘भारती’, ‘सरस्वती’ कोई भी चुनी जा सकती है। उच्च मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित पत्रिकाओं में ‘अखण्ड ज्योति’ कल्याण, कल्प वृक्ष, ‘शाँति संदेश, ‘आरोग्य’ इत्यादि पत्र मँगाने चाहिए। एक दैनिक पत्र ‘हिन्दुस्तान’ या ‘वीर अर्जुन’ इत्यादि मँगवाया जा सकता है। परिवार में एक छोटा सा घरेलू पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए जिसमें मानव-जीवन को ऊँचा उठाने वाले सद्ग्रन्थों का चुनाव रहे।
जो परिवार अच्छी स्थिति में हैं, उन्हें घर के लिए एक मास्टर की योजना रह सकती है, जो प्रशिक्षितों को अक्षर ज्ञान करा कर उच्च स्थिति में पदार्पण कर सके। परिवार स्वयं एक पाठशाला है, जिसमें प्रत्येक सदस्य को प्रेम और उत्तरदायित्व की शिक्षा प्राप्त होती है। फिर क्यों न शिक्षा का विधिवत पालन किया जाये।
शिक्षा के जिस महान कार्य को आप पूर्ण करना चाहते हैं, उसे छोटे से प्रारम्भ कीजिए। एक छोटे से भाग को हाथ में लीजिए और उस भाग को पूरी सावधानी से, दिलचस्पी और लगन से दृढ़ता पूर्वक करने का प्रयत्न कीजिए। जब आप परिवार से शिक्षा की बात कहेंगे, तो वे सम्भव है इसे पहले न पसंद करें पर बाधाओं से मत घबराइये। इस पुण्य कार्य को मत त्यागिये वरन् जैसे भी बन पड़े थोड़ा बहुत समय उस कार्य के निमित्त नित्य लगाते रहिए। नियमित रूप से कुछ पढ़ाने-लिखाने, कविता पाठ कराने, खेल-कहानी, समाचार-पत्र पढ़ाने से साधारण योग्यता अवश्य प्राप्त की जा सकती है। पहले एक सदस्य की, फिर उसकी सहायता से दूसरे तीसरे और चौथे को शिक्षित कीजिए। जिस आदमी को एक बार अपनी योग्यता पर विश्वास हो गया, वह बड़े कठिन कामों में हाथ डालने लगता है और बड़े से बड़े कार्यों को सुगमता से सम्पन्न कर डालता है।
विद्या ही आत्मा का भोजन है। फालतू समय का उपयोग सात्विक ज्ञान संचय, पुस्तक पढ़ने, अखबारों से संसार की घटनाओं के विषय में जानने, मासिक पत्रों के अध्ययन में व्यतीत होना चाहिए। पहले पुस्तकें, कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास इत्यादि पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न कीजिए। तत्पश्चात क्रमशः कठिन और गंभीर विषयों की ओर अग्रसर हूजिए। आध्यात्म, मनोविज्ञान इत्यादि गम्भीर विषयों का अध्ययन करने से मानव जीवन के ज्ञान का सम्पूर्ण भाग प्राप्त किया जा सकता है।
ज्ञान प्राप्ति के अन्य साधन -
स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है। जो व्यक्ति पुस्तकें पढ़ता है, वह उच्चतम ज्ञान के साथ अटूट सम्बन्ध स्थापित करता है। सुशिक्षा, विद्या, विचारशीलता, समझदारी, सुविस्तृत जानकारी अध्ययन, चिन्तन, ममन, सत्संग तथा दूसरों के अनुभव द्वारा हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सुसंस्कृत बना सकता है। मनुष्य स्वयं अनेक शक्तियों को लेकर भूतल पर अवतरित हुआ है। जन्म से प्रायः हम सब समान ही हैं। अंतर केवल विकास का ही है। स्वाध्याय द्वारा ही हमारा विकास सम्भव है। स्कूल कालेज में भी केवल स्वाध्याय करने के उचित साधन उपस्थित फिर जाते हैं। स्वाध्याय अर्थात् स्वयं अपने परिवार और उद्योग से शिक्षित होकर संसार में महात्मा, भक्त, ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी, गुणी, विद्वान्, महापुरुष, नेता, देवदूत, पैगम्बर तथा अवतार हुए हैं। ज्ञान ने ही मनुष्य को तुच्छ पशु से ऊँचा उठाकर एक सुदृढ़ असीम शक्तिपुँज नानादैवी सम्पदाओं तथा कृत्रिम साधना से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्याबल पर ही बहुत हदतक निर्भर है। ज्ञान प्राप्ति के कुछ उपाय ये है -
1- विद्वानों के भाषण में, प्रवचनों को ध्यान से सुनना और उनके अनुसार आचरण करना। सुनकर ज्ञान की अभिवृद्धि।
2- विद्वानों से अपनी शंकाओं का समाधान करना अर्थात् प्रश्न पूछना।
3- उत्तम ग्रन्थों का पठन-पाठन। उन्हें स्मरण रखना, मस्तिष्क का एक भाग बनाना।
4- ज्ञान का विस्तारण। दूसरे को देने से विद्याबल बढ़ता है।
5- स्वयं विचार करना, जगत, संसार, मानव स्वभाव तथा आदतों पर विचार करना।
6-आत्म निरीक्षण।
7- उपदेश ग्रहण किसी के उपदेश की सत्यता की जाँच लोग उनके आचरण से ही करेंगे। इसलिए यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगों को आलसी बनाने का एक बहुत बड़ा कारण बन जायेगा।
शिक्षित स्त्रियाँ पति को आर्थिक सहायता देने के लिए छोटी मोटी नौकरी भी कर सकती है। उसके लिए 1-अध्यापिका 2-नर्स 3- डाक्टरनी 4-सम्पादिका, लेखिका तथा कहानीकार 5-शिशु संस्थाओं की देखभाल 6-उद्योग मंदिरों में कार्य सिखलाने का काम कर सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में स्त्रियों की नितान्त आवश्यकता है। कुमारी अध्यापिकाओं से विवाहित अध्यापिकाएँ तथा लेडी प्रोफेसर अधिक चतुर और अनुभवी समझी जाती है। बाल मंदिरों में शिशुओं की देखभाल के लिए शिक्षित मनोविज्ञान वेत्ता स्त्रियों की बेहद जरूरत है। स्त्रियों के शफाखानों में प्रसूत-ग्रहों में लेडी डाक्टरनियों की तथा चतुर नर्सों की आवश्यकता है। सरकार के दफ्तरों, पोस्ट ऑफिसों तथा रेलवे में टिकट चेक करने के लिए स्त्रियों की आवश्यकता है। जो बहिनें अपने चरित्र की दृढ़ता में विश्वास करती हैं और साधारण से ऊँची है, उन्हें विवेक पूर्ण ढंग से घर की आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए।
घर में ऐसे अनेक उद्योग धन्धे हैं, जिन्हें आप अपने पति की सहायता से घर में कर सकती हैं। देशी-विदेशी हर प्रकार के सुगन्धित तथा सादे तेल, इत्र, एसेन्स, वेसलीन, स्नो. क्रीम, हैजलीन, ओटो दिलबहार, फलों के शर्बत इत्यादि की कुछ शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं। देशी जड़ी-बूटियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के रंग बनाना, कपड़े रँगना, कपड़े सीने का काम, फूल-पत्ती काढ़नाभी चलाये जा सकते हैं। थोड़ी पूँजी से घर में प्रिंटिंग प्रेस चलाया जा सकता है, जिसमें स्त्रियाँ कम्पोजिंग, कटाई, छपाई, जिल्दसाजी, लिफाफे बनाना, लेटरपैड तैयार करने का कार्य किया जा सकता है।
यदि आपके पास थोड़ी सी भूमि है तो दो पेशे और भी शुरू किये जा सकते हैं। (1) बागवानी-घर के लिए सब्जी उगाना, पुष्प उत्पन्न करना, गमलों में कमल इत्यादि लगाना, छोटे फल उत्पन्न करना बड़ा लाभप्रद मनोरंजन है। (2) दूध का व्यवसाय-तीन-चार गाय भैंस पाल कर, दूध, घी और मक्खन का काम चलाया जा सकता है। दूध-घी का कार्य तो स्त्रियों के हाथ में सफलता से दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अगरबत्ती बनाना, दियासलाई, बीड़ी इत्यादि के काम भी चलाये जा सकते हैं। दरवाजों तथा खिड़कियों पर लगाने का पैन्ट घर में बनाया जा सकता है। पंजाब में अनेक दुकानें पापड़ का ही व्यवसाय कर हजारों का लाभ उठाती हैं। पापड़ों के साथ वे कुरेरी, बड़ियों तथा अन्य इसी प्रकार की वस्तुएँ घर पर तैयार कर सकती हैं। रँग का काम भी उनके हाथ की बात है। मोमबत्ती का व्यापार थोड़े पैसे से घरों में प्रचलित किया जा सकता है। आतिशबाजी का सामान तैयार करने के लिए थोड़ी सी सामग्री-शोरा, गन्धक, पोटाश बारूद इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त थोड़े से परिश्रम से डबल रोटी बनाना सीख सकती हैं। चारपाई बुनना, निवाड़ तैयार करना, चर्खा कात कर सूत तैयार करना, गले बुनना, टोकरियाँ तैयार करना, चिकें, दरिया इत्यादि तैयार करना-घरों में किए जाने वाले कुछ उद्योग धन्धे हैं।
आजकल पाश्चात्य देशों की महिलाओं के कार्यकलाप देखकर दंग हो जाना पड़ता है। हम वहाँ की उच्छृंखलता को खतरनाक समझते हैं, किन्तु सदाचार और नैतिकता हमारे चरित्र के अंग हैं। हमें सतर्कता से उनके परिश्रम तथा प्रशस्त गुणों को अपनाना चाहिए। परिश्रम की दृष्टि से पाश्चात्य देशों की स्त्रियों को कई भागों में विभाजित किया जा सकता है-1. शिक्षालयों की अध्यापिकाएँ 2-गृहपरिचारिकाएँ 3-अभिनेत्रियाँ 4-कार्यालयों की लेखिकाएँ 5-उच्च गृह की गृहस्वामिनियाँ 6-दाइयाँ और डाक्टरनियाँ इत्यादि अभिनेत्री का जीवन निंद्य और वासना-जन्य है। प्रत्येक दृष्टि से वह निकृष्ट एवं त्याज्य है। उसे छोड़कर अन्य पेशों के लिए चुनाव किया जा सकता है।
फालतू समय का एक उपयोग मनोरंजन है। सम्पूर्ण दिन कार्य करते-करते महिलाओं का दिल और दिमाग शिथिल हो जाता है। वे घर के कारावास में बंद रहती है। छुट्टी के दिन उन्हें उद्यानों की सैर करनी चाहिए, सहेलियों के यहाँ मिलने जाना चाहिए, सरिताओं के तट पर तथा पर्वत प्रदेशों की यात्राएँ करनी चाहिए, तैरना खेलना भी है और व्यायाम भी। फोटोग्राफी, लकड़ी का काम, लेख लिखना, कविता करना या अन्य कोई शौक का कार्य किया जा सकता है। अपने बच्चों को पढ़ाने का कार्य बहुत श्रेयस्कर है। राष्ट्रीय कार्यों में अनेक विजयलक्ष्मीयों की आवश्यकता है। यदि प्रयत्न करें तो भारत में रचनात्मक योजनाओं के लिए अनेक राष्ट्रीय विचारों वाली विदुषी नारियाँ तैयार की जा सकती हैं। भारत में अभी देवमाता आदिति लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी जैसी महामान्या नारियों को भूला नहीं, जा सकता। फालतू समय में शास्त्रों का अध्ययन कर भारतीय ललनाएँ वक्ता, लेखिकाएँ, कवियित्री, विदुषी, ब्रह्मवादिनी बना सकती हैं।
आपका परिवार एक छोटा सा स्वर्ग है, जिसका निर्माण आपके हाथ में है। परिवार एक ऐसी लीला भूमि है जिसमें पारिवारिक प्रेम सहानुभूति, सम्वेदना, मधुरता अपना गुप्त विकास करते हैं। यह एक ऐसी साधना भूमि है जिसमें मनुष्य को निज कर्त्तव्यों तथा अधिकारों, उत्तरदायित्व एवं आनन्द का ज्ञान होता है। मनुष्य को इस भूतल पर जो सच्चा और अकृत्रिम सौम्य और दुःख से मुक्त सुख प्राप्त हो सकता है वह कुटुम्ब का सुख ही है।
कुटुम्ब की देवी स्त्री है। चाहे वह माता, भगिनी या पुत्री किसी भी रूप में क्यों न हो। उन्हीं के स्नेह से, हृदय की हरियाली, रस स्निग्ध वाणी और सौंदर्यशाली प्रेम से परिवार सुखी बनता है। वह स्त्री जिसका हृदय दया और प्रेम से उछलता है। परिवार का सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसकी वाणी में सुधा की सी शीतलता और सेवा में जीवन प्रदायिनी शक्ति है। उसके प्रेम की परिधि का निरंतर विकास होता है। वह ऐसी शक्ति है, जिसका कभी क्षय नहीं होता और जिसका उत्साह एवं प्रेरणा परिवार में नित्य नवीन छटाएँ पूर्णता में नवीनता उत्पन्न कर मन को मोद, बुद्धि को प्रबोध और हृदय को संतोष प्रदान करता है।
हिन्दू भावना स्त्री के रूप में केवल अर्धांगिनी और सहधर्मिणी हो सकती है। अन्य कुछ नहीं। हिन्दू की दृष्टि में नारी केवल साथिन के रूप में या थोथी और उथली रोमाँटिक प्रेमिका नहीं दिखाई देती। इस वैचित्र्यमय जगत में नानात्व की अभिव्यंजना के साथ नारी को भी हम अनंत शक्ति-रूपिणी, अनंत रूप से शक्ति दायिनी स्नेहमयी जननी आशा कारिणी भगिनी कन्या और सखी के रूप में निहारते आये हैं।
हिन्दू परिवार में पुत्र क्षणिक आवेश में आकर स्वच्छन्द विहार के लिए परिवार का तिरस्कार नहीं करता। वरन् परिवार के उत्तरदायित्व को और भी दृढ़ता से वहन करता है। हिन्दू जीवन में पति उत्तरदायित्वों से भरा हुआ प्राणी है। अनेक विघ्नों के होते हुए भी उसका विवाहित जीवन मधुर होता है। यहाँ संयम, निष्ठा, आदर प्रतिष्ठा तथा जीवन-शक्ति को रोक रखने का सर्वत्र विधान रखा गया है। यदि यह संयम न हो तो विवाहित जीवन गरल-मय हो सकता है। हिंदू नारी को भोग-विलास की सामग्री नहीं, नियंत्रण प्रेरणा साधना विघ्न-बाधाओं में साथ देने वाली जीवन-संगनी के रूप में देखता है।
इन दैवी गुणों की वृद्धि कीजिए
पारिवारिक जीवन को मधुर बनाने वाला प्रमुख गुण निःस्वार्थ प्रेम है। यदि प्रेम की पवित्र रज्जु से परिवार के समस्त अवयक सुसंगठित रहें, एक दूसरे को मंगल कामना करते रहें, एक दूसरे को परस्पर सहयोग प्रदान करते रहें तो संपूर्ण सम्मिलित कुटुम्ब सुघड़ता से चलता रहेगा। परिवार एक पाठशाला है। एक शिक्षा संस्था है। जहाँ हम प्रेम का पाठ पढ़ते हैं।
अपने पारिवारिक सुख की वृद्धि के लिए यह स्वर्ण सूत्र स्मरण रखिए कि आप अपने स्वार्थों को पूरे परिवार के हित के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत रहें। हम अपने सुख की इतनी परवाह न करें, जितनी, दूसरों की। हमारे व्यवहार में सर्वत्र शिष्टता रहे। यहाँ तक कि परिवार के साधारण सदस्यों के प्रति भी हमारे व्यवहार शिष्ट रहें। छोटों की प्रतिष्ठा करने वाले, उनका आत्म सम्मान बढ़ाने वाले उन्हें परिवार में अच्छा स्थान देकर समाज में प्रविष्ट कराने वाले भी हमीं हैं।
छोटे-बड़े भाई-बहिन घर के नौकर पशु पक्षी सभी से आप उदार रहें। प्रेम से अपना हृदय परिपूर्ण रखें। सबके प्रति स्नेहसिक्त, प्रसन्न रहें। आपको प्रसन्न देखकर घर भर प्रसन्नता से फूल उठेगा। प्रफुल्लता वह गुण है जो थके-हारे सदस्यों तक में नवोत्साह भर देता है।
मैं प्रायः कालेज से थका-हारा लौटता हूँ। घर आता हूँ तो हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। बैठक में पत्नी, भाई, बच्चे जमा है। टेबल के ऊपर दूध, मिष्ठान्न, मेवा जमा हैं। बाबूजी के आने की प्रतीक्षा की जा रही है। मैं घर में आविष्ट होता हूँ। सबसे छोटी बालिका आकर मुझ से लिपट जाती है- “बाबूजी आ गए। बाबूजी आ गए” की मधुर ध्वनि मुझे अहलादित कर देती है। मैं जेब में से एक चाक का टुकड़ा निकाल कर नन्ही मृदुता को देता हूँ। वह उसी में तन्मय हो जाती है। मेरी पुस्तकें ले लेती है और हैट सिर पर पहन लेती है। सब उसका अभिनय देखकर हंस देते हैं। मैं खिलखिला कर हँस देता हूँ। एक नई प्रेरणा दिल और दिमाग को तरोताजा कर देती है। वह सम्मिलित लघु भोजन हम में नवजीवन संचार कर देता है।
आप अपने परिवार में खूब हँसिये, खेलिये, क्रीड़ा कीजिए। परिवार में ऐसे रम जाइए कि आपको बाहरीपन मालूम न हो। आत्मा तृप्त हो उठे। मैंने चुन-चुन कर अपने परिवार में मनोरंजन के भी नवीन ढंग अपनाये हैं। इनका उल्लेख अन्यत्र किया जा रहा है। लेकिन इन सबके मूल में जो वृत्ति है वह हँसी विनोद और विश्राम की है।
धर्म प्रवर्त्तक लूथर ने कहा है - “विचारपूर्ण विनोद मर्यादापूर्ण साहस वृद्ध और युवक के लिए उदासी की अच्छी दवा है।”
सरसता का अद्भुत प्रभाव
जिनका स्वभाव रूखा, दार्शनिक, चिन्तित है। उन्हें तुरन्त प्रसन्न करने का उद्योग एवं अभ्यास करना चाहिए। रूखापन जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। कई आदमियों का स्वभाव बड़ा शुष्क, कठोर और अनुदार होता है। उनकी आत्मीयता का दायरा बड़ा संकुचित होता है। उस दायरे के बाहर के व्यक्तियों तथा पदार्थों में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं होती। पास-पड़ौस के व्यक्तियों तक में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं। किसी के हानि-लाभ उन्नति-अवनति, खुशी-रंज, अच्छाई-बुराई, तरक्की-तनज्जुली से उन्हें कोई मतलब नहीं होता। ऐसे व्यक्ति प्रसन्नता में भी कंजूस ही रहते हैं। अपने रूखेपन के प्रत्युत्तर में दुनिया उन्हें बड़ी रूखी, नीरस, कर्कश, खुदगर्ज, कठोर और कुरूप प्रतीत होती है।
रूखापन परिवार के लिए रेत की तरह बेमजे है। तनिक विचार कीजिए, रूखी रोटी में क्या मजा है, रूखे बाल कैसे अस्निग्ध प्रतीत होते हैं, रूखी मशीन कैसी खड़खड़ चलती है, रूखे रेगिस्तान में कौन रहना पसंद करेगा?
प्राणी मात्र सरसता के लिए तरस रहा है। वह आपका प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा-प्रशंसा, उत्साह, आहाद चाहता है। पारिवारिक सौभाग्य के लिए सरसता और स्निग्धता की आवश्यकता है। मनुष्य का अन्तःकरण रसिक है। स्त्रियाँ स्वभाव से ही कवि हैं, भावुक हैं, सौंदर्य उपासक हैं, कलाप्रिय हैं, प्रेममय हैं। मानव-हृदय का यही गुण है, जो उसे पशु जगत् से ऊँचा उठाता है।
सहृदय बनिये। सहृदयता का अभिप्राय कोमलता, मधुरता, आर्द्रता है। सहृदयता व्यक्ति सबके दुःख में हिस्सा बँटाता है। प्रेम तथा उत्साह देकर नीरस हृदय खींचता है। जिसमें यह गुण नहीं है उन्हें हृदय होते हुए “हृदयहीन” कहा जाता है। हृदयहीन का अर्थ है “जड़ पशुओं से भी नीचा”। नीरस गृहस्वामी पूरे परिवार को दुखी बना देता है।
जिसने अपनी विचारधारा और भावनाओं को शुष्क, नीरस और कठोर बना रखा है, उसने अपनी आनन्द, प्रफुल्लता और प्रसन्नता के भण्डार को बन्द कर रखा है। वह जीवन का सच्चा रस प्राप्त करने से वंचित रहेगा। आनन्द स्त्रोत सरसता की अनुभूतियों में है।
परमात्मा को आनन्दमय निर्देश किया गया है। क्यों? क्योंकि वह कठोर और नियंत्रणप्रिय होते हुए भी सरस और प्रेम-मय है। श्रुत्रि कहती है- “रसोवैसः” अर्थात् परमात्मा रसमय है। परिवार में उसे प्रतिष्ठित करने के लिए वैसी ही लचीली, कोमल, स्निग्ध और सरस भावनाएँ विकसित करनी पड़ती हैं।
नियंत्रण आवश्यक है
जब हम आप से सरसता को विकसित करने का आग्रह करते हैं, तो हमारा अभिप्रायः यह नहीं है कि आप नियंत्रण को भी टूट जाने दें। हम नियन्त्रण के पक्षपाती हैं। नियंत्रण से आप नियमबद्ध, संयमी, अनुशासनबद्ध, आज्ञाकारी परिवार की उत्पत्ति करते हैं। परिवार के नियंत्रण में आप दृढ़ रहे, गलतियों पर डाटें-फटकारे, सजाए दें और पथभ्रष्ट को सन्मार्ग पर प्रतिष्ठित करें। परिवार की उन्नति के लिए आप कड़ा कदम उठा सकते हैं।
पर एक बात कदापि विस्मृत न कीजिए। आप अंततः हृदय को कोमल, द्रवित होने वाला, दयालु प्रेमी और सरस ही रखिए। संसार में जो सरलता का, सौंदर्य का अपार भण्डार भरा हुआ है उसे प्राप्त करना सीखिए। अपनी भावनाओं को जब आप कोमल बना लेते हैं, तो आपके चारों ओर आने वाले हृदयों में अमृत-सा झरता हुआ प्रतीत होता है। भोले भाले मीठी-मीठी बातें करते हुए बालक, प्रेम की प्रतिमाएँ-माता, भगिनी, पत्नी, अनुभव ज्ञान और शुभ कामनाओं के प्रतीक वृद्धजन-ये सब ईश्वर की ऐसी आनंदमय विभूतियाँ हैं, जिन्हें देखकर परिवार में मनुष्य का हृदय कमल के पुष्प के समान खिल जाना चाहिए।
परिवार एक पाठशाला है जो हमें आत्म-संयम, स्वसंस्कार, आत्मबल और निःस्वार्थ सेवा की अनमोल शिक्षाएँ देता है। प्रतिदिन हम परिवार की भलाई के लिए कुछ न कुछ करते रहें, अपना निरीक्षण खुद करें।
परिवार के प्रत्येक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि प्रति रात को सावधानी के साथ अपने चरित्र का निरीक्षण करे। यह देखें कि आज मैंने कौनसा कार्य पशु के समान, कौन सा असुर के समान, कौन सा सत्पुरुष के समान और कौन सा देवता के समान किया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति सहयोग और निःस्वार्थ सेवा की भावना से परिवार की सम्पन्नता में हाथ बंटायें, तो गृहस्थ सुख धाम बन सकता है।
‘हमें अधिकार दीजिए’- एक दूषित भावना
आए दिन इस बात का झगड़ा रहता है कि ‘हमें अधिकार दीजिए’। नवयुवक, नवयुवतियाँ तथा अन्य सदस्य अधिकारों की रट लगाये हैं। अधिकार माँगने की प्रवृत्ति दूषित स्वार्थ की भावना पर अवलम्बित है। वे दूसरों को कम देकर उनसे अधिक लेना चाहते हैं। यह स्वार्थमयी भावना जिस दिन अंकुरित होती है, परिवार से सुख और शान्ति की भावना का तो उसी दिन तिरोभाव हो जाता है। प्रत्येक मनुष्य छोटे से अनुचित व्यवहार करता है और कहता है कि हमारा अधिकार है। सास बहू पर अनुचित अधिकार जमाती है। बड़ा भाई छोटे भाई पर दुर्व्यवहार करता है।
“अधिकार” माँगने वाला दूसरे से कुछ चाहता है, परंतु दूसरे को देने की बात विस्मृत कर बैठता है। उसे यह ज्ञान नहीं कि अधिकार और कर्त्तव्य साथ-साथ चलते हैं। इस हाथ दीजिए, उस हाथ ले लीजिए। इस माँग और भूख की लड़ाई में ही गृहस्थ जीवन का सुख विदा होना आरम्भ हो जाता है।
प्रेम, समता, त्याग, समर्पण-ये ऐसी दैवी विभूतियाँ हैं जिनसे गृहस्थ स्वर्ग बनता है। वहाँ अधिकार नामक शब्द का प्रवेश निषेध है। वहाँ तो दूसरा शब्द “कर्त्तव्य” ही प्रवेश पा सकता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का उत्तरदायित्व है, कुछ न कुछ कर्त्तव्य है। वह अपना कर्त्तव्य करता चले। जो तुम्हारा अधिकार है वह तुम्हें अनायास ही प्राप्त हो जायेगा। लेकिन कर्त्तव्य की बात भूलकर केवल अधिकार की माँग लगाना नैतिक दृष्टिकोण से गर्हित है। समस्त बखेड़ों की इस जड़ को काट देना चाहिए।
संसार के सम्बन्धों को देखिए। दुनिया का सब कार्य स्वयं ही आदान-प्रदान से चल रहा है। जब कुछ दिया जाता है, तब तुरन्त ही कुछ मिल जाता है। देना बंद होते ही, मिलना बंद हो जाता है। अतः लेने की आकाँक्षा होने पर देने की भावना पहले बना लेना जरूरी होता है। अधिकार में केवल लेने की ही भावना भरी रहती है, त्याग, बलिदान, सेवा, सहानुभूति की नहीं। इसलिए पारस्परिक प्रेम का क्षय प्रारंभ होता है। जिस दिन वह अधिकार की लालसा गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट हो जाती है, गृहस्थ कलह का अखाड़ा बन जाता है। आज पढ़े लिखे मद्यान्ध नवयुवक इसी भावना को मन में भरे पृथक कुटुम्बों की आवाज बुलन्द करते हैं। अपने ही हाथों उन्होंने अपने सुख सुविधा को लात मार दी है।
अधिकार का अभिप्राय है-दूसरों को अपने आधीन रखना, अपने सुख का, भोग का यन्त्र, जब किसी भावना का प्रवाह एक ओर से चलना प्रारम्भ हो जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया दूसरी ओर से भी प्रारम्भ हो जाती है। तब एक दूसरे को भोग का यन्त्र बनाना चाहता है, तो दूसरा भी पहले को यन्त्र बनाने की धुन में लग जाता है।
इस कुचक्र से बचने का उपाय यही है कि परिवार का हर सदस्य अधिकार की अपेक्षा कर्त्तव्य पर अधिक ध्यान दे लेने की अपेक्षा देने का अधिक ध्यान रखे।
(लेखक-श्री सत्यभक्तजी, सम्पादक - ‘सतयुग‘ इलाहाबाद)
इस समय दुनिया के राजनीतिज्ञों में तीसरे महायुद्ध की चर्चा जोर पकड़ती जा रही है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब कि समाचार-पत्रों में युद्ध की तैयारी का एक न एक समाचार दिखलाई न पड़े। यद्यपि कुछ राजनीतिज्ञ शाँति की चर्चा भी करते हैं-जिनमें प्रमुख हमारे पण्डित जवाहरलाल नेहरू ही हैं, पर कोरिया, चीन, तिब्बत के युद्ध के वातावरण ने उनकी आवाज को बहुत दबा दिया है और एक साधारण पाठक को तीसरे महायुद्ध का होना ऐसा ही निश्चय जान पड़ता है जैसे दो और दो का मिलकर चार होना।
इसमें संदेह नहीं कि दुनिया के लोग भावी महायुद्ध की भयंकरता का ख्याल करके उससे बहुत डर रहे हैं। छोटे-मोटे देशों की तो क्या बात अमरीका, रूस और इंग्लैंड भी इस विचार से आतंकित हैं। पर परिस्थिति ऐसी बनती जा रही है कि इस युद्ध का होना अनिवार्य हो गया है। चाहे कोरिया का फैसला हो जाये, चीन के साथ समझौता कर लिया जाये, तिब्बत का मामला ठण्डा पड़ जाये, पर तीसरा महायुद्ध आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों अवश्य होगा। इसका मुख्य कारण अमेरिका और रूस की विचारधाराओं का एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होना है।
अमरीका में पूँजीवाद की प्रधानता है और वहाँ के पूँजीपतियों को दुनिया में पैर फैलाने का मौका मिलना चाहिए। रूस इस कार्य में बाधक सिद्ध होता है क्योंकि वह पूँजीवादियों के शोषण के विरुद्ध प्रचार करता है और जिस देश के लोग पूँजीवाद के खिलाफ सर उठाते हैं उनकी मदद करता है। आजकल अमरीका की तरफ से रूस पर भी साम्राज्यवादी होने का दोष लगाया जाता है, पर रूस में पूँजीवादियों और उनके व्यक्तिगत स्वार्थ का अभाव होने से उसे दूसरे देशों का आर्थिक शोषण करने की आवश्यकता नहीं। हद से हद वह अपना राजनीतिक प्रभुत्व ही कायम कर सकता है, जो उसी समय तक अधिक जोरदार रहेगा जब तक उसका पूँजीपति देशों में संघर्ष चल रहा है।
रूस और अमरीका का विरोध ऐसा है जिसमें किसी प्रकार के समझौते की गुंजाइश नहीं। अगर यह देश दोनों पूँजीवादी होते तब तो यह भी संभव था कि वे संसार को दो हिस्सों में बाँट कर अपने-अपने क्षेत्र में शोषण करते रहे और इस प्रकार एक लम्बे अरसे तक युद्ध का होना स्थगित रह सकता। पर जबकि उनका लक्ष्य उनके आगे बढ़ने की दिशा एक दूसरे के विरुद्ध है तो उनमें संघर्ष होना स्वाभाविक है, जिसे कोई रोक नहीं सकता है।
यह संग्राम कैसा भीषण होगा इसका चित्र अनेक लेखक खींच चुके हैं। कहा तो यहाँ तक जाता है कि इसमें प्रयोग करने के लिए एटम-बम से भी बढ़कर ऐसे-ऐसे विष अथवा मारात्मक कीटाणु तैयार किए गए हैं जिसका एक छटाँक द्रव्य दुनिया के तमाम व्यक्तियों को मारने के लिए काफी है। पर हमारा अनुमान है कि इनमें से बहुत सी बातें मनगढ़न्त या वैज्ञानिक कल्पनाएं हैं। पर इसमें जरा भी शक नहीं कि तीसरा महायुद्ध अभूतपूर्व होगा और दुनिया की कायापलट कर देगा। हमारा ही नहीं अधिकाँश लोगों का यही कहना है। अमरीका के एक बहुत बड़े प्रेस रिपोर्टर ‘अलसप’ न यूरोप की अवस्था की जाँच करके एक बड़ी रिपोर्ट लिखी थी जिसके अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया था-
“रूस की लाल सेना रक्षात्मक उपायों से शून्य यूरोप पर बहुत ही शीघ्र कब्जा कर लेगी और शायद अमरीका तक अधिकार जमा लेगा। तब महाद्वीपों के बीच एक ऐसा भयंकर युद्ध होता रहेगा जो बहुत लंबा, नाशकारी और बड़ा वीभत्स भी होगा। इसके दरम्यान संसार को बारम्बार रासायनिक, कीटाणुओं और एटॉमिक अस्त्रों के आक्रमण से नष्ट-भ्रष्ट होना पड़ेगा। पश्चिमी सभ्यता की नींव, जो पहले से ही कमजोर हो गई है, पूरी तरह खोखली हो जायेगी। वह भी असम्भव नहीं है कि इन प्रलयकारी अस्त्रों के प्रभाव से पृथ्वी की प्राकृतिक अवस्था भी अस्त−व्यस्त हो जाये।”
ऐसे युद्ध को यदि संसार के लिए खण्ड प्रलय समझा जाये तो यह उचित ही है। इसके बाद संसार का वर्तमान रूप हरगिज कायम नहीं रह सकेगा। जिन आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक नियमों और रिवाजों को आज हम अटल, अपरिवर्तनीय समझते हैं उनका नाम-निशान भी नहीं रहेगा। इनमें से अधिकाँश युद्ध-काल में हवा में उड़ जायेंगे और युद्ध समाप्त होने पर दुनिया के लोग अपनी स्थिति और जरूरत के मुताबिक नवीन समाज की रचना करेंगे जिसके नियमों और आदर्शों में आजकल के नियमों और आदर्शों से जमीन आसमान का अंतर होगा।
‘सतयुग‘ के जुलाई-अगस्त 1950 के अंक में 11 वे पृष्ठ पर ‘पिरामिड रहस्य’ शीर्षक लेख छपा है जिसके अंत में कहा गया है-
पिरामिड की नाप-खोज करके जिन लोगों ने उसमें निहित भविष्यवाणियों पर प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि सन् 1953 के अंतर्गत समस्त अन्तर्राष्ट्रीय ढाँचा बदल जायेगा। इसके बाद 40 वर्ष तक संसार का नवीन आर्थिक संगठन हो जायेगा।”
इस समय विश्व परिवर्तन की प्रसव पीड़ा चल रही है। भविष्य में ऐसे परिवर्तन होने वाले हैं जो आज की स्थिति को आदर्शजनक रीति से बदल देंगे। संसार का जो बौद्धिक, सामाजिक, ढाँचा इस समय है वह भविष्य में न रहेगा। तीसरा महायुद्ध ऐसी संस्थाएँ उत्पन्न करेगा जिनका निराकरण हमारी वर्तमान रीति-नीति से हो सकेगा। जिन्हें सुलझाने के लिए नई विचार पद्धति अपनानी पड़ेगी और नये प्रकार से समाज की रचना करनी पड़ेगी। तभी मानव प्राणी शाँतिपूर्वक जीवन यापन कर सकेगा।
सूक्ष्मदर्शी, तत्ववेत्ता बहुत समय से यह अनुभव करते आ रहे हैं कि वर्तमान काल निकट है। प्राचीन भविष्यवाणियों के आधार पर और वर्तमान कालीन परिस्थितियों की सूक्ष्म विवेचना से निकलने वाले निष्कर्ष के अनुसार यह साफ दिखाई देता है कि युग परिवर्तन की यह साध्यवेत्ता है और नवयुग का श्री गणेश होने में अधिक देर नहीं है।
विषयों में आसक्त मन बंधन को हेतु है और विषयों से रहित मुक्ति का। मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। -श्री चाणक्य।
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मनुष्य अपने अच्छे या बुरे विचारों के कारण अच्छी या बुरी आदतों में रहते हैं। यदि वे चाहें तो इस संसार को नरक बनावें और यदि चाहें तो इसी को स्वर्ग बनावें। विचार के जिस रंग के चश्मे में वे संसार को देखेंगे, संसार उनको उसी रंग का दिखाई पड़ेगा। -जेस्म एलेन।
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मनुष्य बीस वर्ष के अनुभव से जो सीखता है, पुस्तकें उससे भी अधिक एक वर्ष में सिखा देती हैं।-महात्मा गाँधी।
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अचेत आदमी के लिए संसार भोग-विलास का स्थल है, परंतु विचारवान के लिए युद्ध क्षेत्र है। जहाँ जीवन पर्यन्त मन और इन्द्रियों से संग्राम करना पड़ता है। -सहजोबाई
पशु-पक्षी भी तो जीते हैं -- मानव ! जीवन-सम्मान करो।
काँटों में पलता फूल, किन्तु,
मधु-सौरभ देता रहता है।
अपना जीवन दे-देकर धन,
वसुधा का अव्वल भरता है।
जीना सीखो, इस जीवन की --परहित हँस-हँस बलिदान करो॥
तिनके विपदा की झंझा में,
धीरज खोते हैं, रोते हैं।
रहते अविचल उन्नत-मस्तक,
वे सारयुक्त जो होते हैं।
विघ्नों में हृदय-शिरीष-कुसुम -- हे वीर! वज्र उपमान करो॥
कल-कल करती जीवन-सरिता,
संगीत मधुर, निश्छल गावे।
अरि के प्राणों की वीणा भी,
जिसको सुन झंकृत हो जावे।
अभिशाप दैव का नहीं, इसे -- विधि का अनुपम वरदान करो॥
सम्मान भोगते तुम सस्मित,
अपमान सहो तो हंस-हंसकर।
जयमाल पहनते प्रमुदित तो,
स्वीकार पराजय हो सादर।
पीयूष चाहता कौन नहीं -- तुम बढ़ो, गरल का पान करो॥
देखो मुड़कर न मरु स्थल को,
चढ़ जाओ, यदि है अचल खड़ा।
लहलहा उठेगा, सींचो तो,
आगे है, क्षेत्र विशाल पड़ा।
गिरि बनता कण-कण से, जीवन - क्षण-क्षण को जोड़ महान करो॥
पशु-पक्षी भी तो जीते हैं -- मानव-जीवन-सम्मान करो॥
(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, बी. ए., साहित्य-रत्न)
*समाप्त*