(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
वाणी में कैसे बँध पाये माँ तेरा यश गान!
प्रातः की प्रिय पुष्प मलय-सी तेरी गति स्वच्छंद,
फिर भी तू सीमित कण-कण में ज्यों कवि में मकरंद,
उसी भाँति जैसे कि तिमिर में रहता सदा विहान!
वाणी में कैसे बँध पाये माँ तेरा यश गान!
तू सदैव डरती रहती है जड़ चेतन का शोक,
तू भरती है शून्य ध्येय में नव-जागृति आलोक,
तेरी भरती साधना का फल अब जग का कल्याण!
वाणी में कैसे बँध पाये माँ तेरा यश गान!
तेरे दिव्य चरण पर जिनका है अखण्ड विश्वास,
विश्व-वादिनी तू रहती है सदा उन्हीं के पास,
उनके द्वारा ही होता है पावन नव निर्माण!
वाणी में कैसे बँध पाये माँ तेरा यश गान!
तेरी कृपा कोर पर आश्रित है वरदान अशेष,
सत्यं, शिवं, सुन्दरं में अंकित है तेरा सन्देश,
शान्ति, साधना, सुख का देती है तू जन को दान!
वाणी में कैसे बँध पाये माँ तेरा यश गान!
गायत्री महाविद्या के अन्वेषण में लगभग दो हजार धर्म ग्रन्थों का अनुशीलन करके तथा चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस पुरश्चरण करके व्यक्तिगत रूप से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि गायत्री की उपासना निश्चित रूप से आशाजनक परिणाम उत्पन्न करती है। अनेक अन्य गायत्री उपासकों से भी हमारा परिचय एवं सम्बन्ध है, उनको माता का आश्रय लेने से जो लाभ हुए हैं। उनकी विस्तृत जानकारी होने के कारण हमारी श्रद्धा वेदमाता के प्रति और भी अधिक बढ़ी है। मनुष्य की उलझी हुई व्यक्तिगत तथा समाज की समस्याओं को सुलझाने में गायत्री का माध्यम हमें सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है।
अपनी इस श्रद्धा, मान्यता और भावना के कारण हमारी प्रकट इच्छा है कि गायत्री का अधिकाधिक प्रचार हो। लोग इस महाशक्ति का परिचय प्राप्त करे, उपयोग करे और लाभ उठायें, अतएव यह गायत्री अंक प्रस्तुत किया गया है। हर साल गायत्री जयन्ती के उपलक्ष में जुलाई का अंक गायत्री अंक निकालते रहने का मिश्रण किया गया है।
इस अंक के लिए जितने अनुभव आये थे उनमें से आधे से अधिक बचे हुए रखे हैं। इतने सीमित पृष्ठों में वे छापे जा सकें। इसलिए ऐसा मिश्रण किया गया है कि अंक में छपे हुए तथा बचे हुए सभी अनुभवों को पुस्तकाकार छाप दिया जाय, जिससे पढ़ने वालों को गायत्री साधना के लिए उत्साह बढ़े।
जिन सज्जनों को गायत्री साधना से सत्परिणाम मिले हों तथा किन्हीं अन्य गायत्री साधकों के उत्साह वर्धक वृत्तान्त मालूम हों तो उन्हें लिख भेजने की कृपा करें ताकि बढ़िया कागज पर छपी रंगीन जिल्द की उन सुन्दर नई पुस्तकों उन अनुभवों को भी छापा जा सके। अभी निम्न पुस्तकें छपेगी-
(1) गायत्री साधना से आध्यात्मिक लाभ।
(2) गायत्री द्वारा सुख, समृद्धि, उन्नति और सफलता।
(3) गायत्री द्वारा अनेक कष्ट और कठिनाइयों का निवारण।
(4) महिलाओं द्वारा गायत्री साधना के सत्परिणाम।
अनुभवों के साथ फोटो भी छापे जायेंगे इसलिए आधे शरीर के साफ वाले (धुँधले नहीं) फोटो भेजने का भी प्रयत्न करना चाहिए। पुस्तकें छपना शीघ्र ही आरम्भ होगी। इसलिए अनुभव और फोटो जुलाई मास के भीतर भी आ जाने चाहिएं देर से आने वाले लेखों का पुस्तकों में समावेश न हो सकेगा।
इस अंक के पाठकों से प्रार्थना है कि वे गायत्री की उपयोगिता का परीक्षण करके देखें, थोड़ी सी साधना से भी अन्तः भूमि में आशाजनक शक्ति संचार होता हुआ अनुभव होगा। जो सज्जन स्वयं उपासना में प्रवृत्त हैं वे दूसरों को इस मार्ग में प्रवृत्त करें। गायत्री का अधिकाधिक लोगों में प्रसार करना एक ऐसा आध्यात्मिक पुण्य है जिसकी तुलना में अन्य सभी पुण्य हल्के बैठते हैं।
-श्रीराम शर्मा आचार्य
भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 6
(श्री डाह्याभाई रामचन्द्र मेहता, अहमदाबाद)
संसार में दो शक्तियाँ हैं एक दैवी दूसरी आसुरी। इन दोनों का अलग प्रभाव अलग कार्य क्षेत्र है। दैवी को अपनाने वालों के विचार भाव, स्वभाव, गुण, कर्म में सात्विकता बढ़ती है जिसके कारण उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहता है और दूसरी के साथ सद् व्यवहार करने के कारण प्रत्युत्तर में दूसरों की ओर से भी उन्हें प्रेम, सहयोग, आदर एवं यश प्राप्त होता है। (1) भावना की पवित्रता (2) सद्गुणों का बाहुल्य (3) कर्त्तव्य परायणता (4) दूसरों से मधुर सम्बन्ध यह चार बातें भूलोक की दैवी सम्पदाएं हैं इन्हें प्राप्त करने वालों का जीवन निश्चय ही सुख शाँति से ओत प्रोत हो जाता है, भले ही आर्थिक दृष्टि उन्हें साधारण श्रेणी का ही रहना पड़े।
इसके विपरीत आसुरी शक्यों को अपनाने वालों में इन्द्रिय भागों की लिप्सा, धन संचय का लोभ, स्वार्थपरता, असंयम आदि अनेक दुर्गुण पैदा हो जाता हैं जिनके कारण उनके गुण, कर्म, स्वभाव अत्यंत विकृत निन्दनीय एवं कष्टकारक होते हैं। स्वयं दिन रात अशान्ति की भट्टी में जलते रहते हैं, और दूसरों को अपना विरोधी, निन्दक असहयोगी, बनाते जाते हैं। ऐसे लोग अपने अनुचित कार्यों से बहुधा धन सम्पत्ति जमा कर लेते हैं और उसमें अपने बड़प्पन का अनुभव करते हैं पर इस आत्म वंचना से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उनका खुद का आत्मा अपराधी जैसा सशंकित रहता है और किसी भी हार्दिक प्रेम न पा सकने के कारण उनके हृदय की कली कभी भी विकसित नहीं हो पाती। आसुरी शक्ति से आसुरी सम्वृत्तियाँ शीघ्र ही बढ़ जाती हैं पर शोथ रोग से मोटे हुए आदमी की तरह उनका वह वैभव और बड़प्पन केवल अशांति और नारकीय दुखों को ही उत्पन्न करता है।
आज मनुष्य जाति की सभी गुत्थियाँ बुरी तरह उलझी हुई हैं। हर आदमी अपने को दीन दुःखी, अभाव ग्रस्त, संत्रस्त, असहाय, अनुभव करता है और अपने को चारों ओर से आपत्तियों से घिरा हुआ अनुभव करता है। यही बात प्रत्येक जाति एवं देश की है। हर जाति अपने को खतरे में समझती है, हर राष्ट्र अपने को शत्रुओं से घिरा अनुभव करता है। हर व्यक्ति को अपने बारे में अनेक डर सता रहे हैं। कितनी ही संस्थाएं और सरकारें इस व्यापक उलझन को दूर करने के लिए एड़ी से चोटी तक का पसीना एक कर रही हैं परन्तु परिणाम कुछ नहीं निकल रहा है व्यक्तिगत और सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कठोर कानून, नियंत्रण, पुलिस, फौज आदि के सभी शस्त्र काम में लाये जा रहे हैं पर बुराइयों में रत्ती भर भी कमी नहीं हो रही है वरन् दिन-दिन और बढ़ती जाती है, और नये-नये रूपों में प्रकट हो रही है।
संसार के समस्त संकटों का एक मात्र कारण आसुरी शक्तियों की वृद्धि है। लोगों के मस्तिष्क पर आसुरी माया ने कब्जा कर रखा है। फलस्वरूप लोलुपता, स्वार्थ परता, संकीर्णता से प्रेरित उनके विचार, आयोजन, व्यवहार एवं कार्य सभी ऐसे होते हैं जो अपने लिए तथा दूसरों के लिए केवल कष्टकारक ही बनते हैं इस रोग का एक मात्र उपाय वह है कि लोगों की मनोभूमि को भोग स्वार्थ और अहंकार की असुरता के चंगुल से छुड़ाया जाय और उसके स्थान पर संयम, सेवा एवं सद्भावना की दैवी सत्ता को स्थापित किया जाय। समस्त कठिनाइयों की एक ही कुँजी है। इस एक ही उपाय को अपनाकर विश्व व्यापी अनेक संकटों में त्राण प्राप्त किया जा सकता है।
गायत्री आन्दोलन, असुरता के विरुद्ध दैवी युद्ध का शंखनाद है। इस रणभेरी को इसलिये बजाया जा रहा है कि दैवी शक्ति में श्रद्धा रखने वाली आत्माएं एक मोर्चे के नीचे संगठित हो जाए। आत्मबल के अस्त्र-शस्त्र को सुसज्जित करें, तप और साधना द्वारा अपनी योग्यता और क्षमता को इतना परिपुष्ट कर लें कि विकराल दांतों वाली असुरता से सफलतापूर्वक संघर्ष किया जा सके। हर युद्ध का एक झंडा, एक उद्देश्य, एक लक्ष्य होता है। इस दैवी महाभारत की, परम पुनीत सात्विकता की, प्रतीक ध्वजा गायत्री है। विश्व मानव के अन्तः प्रदेश पर दैवी शक्ति का चक्रवर्ती शासन स्थापित करना इसका लक्ष्य है। तीर, तलवार, के हथियार नहीं इस युद्ध के सैनिकों को आत्मबल, उज्ज्वल चरित्र, तपश्चर्या त्याग, संयम और ईश्वर विश्वास के अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होना पड़ेगा।
‘अखण्ड ज्योति’ द्वारा प्रज्वलित की गई गायत्री आन्दोलन की मशाल, वर्तमान विश्वव्यापी अशान्ति के विरुद्ध एक दैवी चुनौती है। यह प्रचण्ड शक्तिशाली मानसिक क्रान्ति की एक महान् योजना है। मुझे भारत के भाग्याकाश में उज्ज्वल ऊषा की तरह यह प्रकाश रेखा चमकती दिखाई दे रही है। एक ओर जहाँ संहार के लिए परमाणु बम बन रहें हैं, वहाँ नव निर्माण के लिए गायत्री गंगा की कल-कल ध्वनि भी हो रही है। दुष्कृतों के विनाश और सुकृतों के परित्राणाय भगवान यह लीला रच रहे हैं समस्त मानवता के उद्धार में प्रभु प्रेरणा का जो यह सजीव चित्र सामने उपस्थित हो रहा है उसे मैं भक्ति भावना के साथ प्रणाम करता हूँ। और विश्वास करता हूँ कि रोते, सिसकते, भूले, भटके, दीन दुखी, गन्दे मैले, अपने बालक-मनुष्य को माता की गोदी में शान्ति मिलेगी।
बोलो माता गायत्री की जय।
(श्री श्यामबिहारी सिंह जी, बम्बई)
मेरा मन सदा से पराये दुख में दुखित होने वाला रहा है। हृदय में यही भावना निरन्तर उठती रहती है किसी प्रकार दुखियों के दुख दूर हों और सब लोग सुखपूर्वक जीवनयापन करें। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर मेरे कार्यक्रमों का निर्धारण होता है।
जब मैंने देखा कि सामाजिक कुरीतियों के कारण हमारे निर्धन वर्ग को बहुत सा पैसा व्यर्थ बर्बाद करने को विवश होना पड़ता है और आवश्यक कार्यों के लिए धन न रहने से जीवन की उन्नति एवं सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है तो मैं उन रूढ़ियों के प्रति विद्रोही हो गया। अछूतों और स्त्रियों के प्रति हमारा समाज कितना अनुदार, अन्यायी और हृदयहीन है यह देखकर भी मेरे हृदय में चोट लगी और मैं आर्यसमाज भी हो गया। आर्य समाज के लिए मैंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग लगाया है। राजनीतिक कुचक्रों ने भारत को किस प्रकार दीन हीन बनाया बात जब समझ में आई तो महात्मा गाँधी के आदर्शानुसार काँग्रेस में भाग लेने लगा। जनता के लाखों निवारण करने के लिए जो भी उपाय समझ में आये उनका पूरी ईमानदारी से उपयोग किया। शिक्षा प्रचार खादी, सफाई समाज सुधार, नशा निवारण आदि रचनात्मक कार्यों में ही मेरा अधिकाँश समय व्यतीत होता है। अपनी शक्ति मतलब है, पर सेवा की अभिलाषा ऐसी रहती है कि अपना सब कुछ होम कर भी यदि पीड़ित बन्धुओं की भलाई बन सके तो वह अवश्य ही होनी चाहिए।
अब मेरी आयु चालीस वर्ष से अधिक हो चली है। अनेक संस्थाओं का सदस्य और कार्यकर्ता रहा हूँ। राष्ट्र निर्माण, लोक सेवा, समाज सुधार की अनेक प्रवृत्तियों की वास्तविक स्थिति की भी भली प्रकार जानकारी हैं। संस्थाओं द्वारा जितना प्रचार होता है उतना कार्य नहीं द्वारा जितना प्रचार होता है उतना कार्य नहीं होता इसका दुःख होना एक ईमानदार आदमी के लिए स्वाभाविक है। संस्थाएं सदुद्देश्यों के लिए स्थापित होती हैं पर उनमें कार्यकर्ता अच्छे एवं ईमानदार न होने से कोई सन्तोषजनक कार्य नहीं हो पाता।
जनता के कष्टों के अनेक कारण हैं। बीमारी अशिक्षा, वस्तुओं का अभाव, फूट आदि कारणों के निवारण के लिए अस्पताल, स्कूल, उद्योग, संगठन आदि के आयोजन हो रहे हैं परन्तु यह सब प्रयत्न निष्फल जाते दिखाई पड़ते हैं। कारण यह है कि चरित्र बल की बड़ी कमी है आन्तरिक पवित्रता, उच्च भावना, प्रेम, त्याग, संयम, ईमानदारी आदि आत्मिक गुणों की कमी होने से अन्य साधनों द्वारा सुख उत्पन्न करने के प्रयास से सफल नहीं हो पाते। अच्छी-अच्छी योजनाएं भ्रष्ट चरित्र के कारण निरुपयोगी हो जाती है सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक भ्रष्टाचार फैल रहा है। और उसके कारण इतने प्रकार की नई कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं जिनका समाधान करना न सरकार के बस की बात है और न संस्थाओं के बस की। मैं इन सब समस्याओं पर एकान्त में बैठकर बहुत सोचता हूँ, और उस उपाय को प्राप्त करने का प्रयत्न करता हूँ जिससे लोगों में गुप्त मन में घुस बैठी हुई अनैतिकता दूर हो। चरित्र किसी राष्ट्र या समाज का वास्तविक धन होता है। जहाँ यह धन होगा वहाँ आत्ममय सम्पत्तियाँ रहेंगी और सब कठिनाइयाँ दूर हो जायगी। आज अनेक प्रकार की राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, पारिवारिक, शारीरिक गुत्थियाँ उलझी हुई हैं। इन सबका एकमात्र हल यह है कि लोग अधिक ईमानदार बनें। जब तक लोगों की मनोवृत्ति स्वार्थपूर्ण, दूसरों के स्वत्वों को हड़पने की बनी रहेगी तब तक एक भी गुत्थी का सुलझाना सम्भव नहीं है। भूसी कूटने से जैसे हाथ में छाले पड़ने के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता वैसे ही आन्तरिक अनैतिकता का सुधार किये बिना अन्य उपायों से किसी भी क्षेत्र में सुख शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती।
अन्तःकरणों की पवित्रता कानून व्याख्यान, लेख, रेडियो आदि से स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए आध्यात्मिक श्रद्धा और धार्मिक संस्कारों की आवश्यकता है। यह कार्य गायत्री महामंत्र के आधार पर सबसे सुगम तरीके से हो सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों में जो 24 शिक्षाएँ भरी हुई हैं वे मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाने वाली हैं। इन शिक्षाओं को ईश्वरीय वाणी मानना और उस वाणी को अन्तःभूमि में गहराई तक जाने के लिए उपासना करना, यह एक ऐसा कार्यक्रम जो है मानव हृदय में एक दिव्य परिवर्तन करता है। यही वह महान तत्व है जिसके अभाव में आज सरकार के संस्थाओं के तथा लोक सेवकों के हाथ पाँव फूल रहे हैं। यदि लोगों में थोड़ा चरित्र बल बढ़े तो अनेकों पर्वत जैसी दीखने वाली समस्याएं चुटकी बजाते हल हो सकती हैं।
अब मैंने गायत्री महातत्व का प्रचार करना आरम्भ किया है क्यों कि यह विश्वास करने योग्य बात है कि गायत्री मंत्र सात्विकता बढ़ाने का वैज्ञानिक एवं धार्मिक आधार है। गायत्री की ईश्वरीय वाली को जब लोग सुनने लगेंगे तभी दुखियों के विविध कष्टों का निवारण होगा और तभी मेरी अन्तरात्मा को शान्ति मिलेगी।
(श्रीमती गोमती देवी शर्मा, अध्यापिका)
भारतीय धर्म में नारी की असाधारण महत्ता है। क्योंकि मानव जाति की उद्गम गंगोत्री नारी ही है। ऋषियों ने नारी को प्रत्यक्ष देवताओं में गिना है और उसके प्रति पूज्य भावना रखने का मनुष्य मात्र को उपदेश दिया है। बेटी, बहिन और माता के तीनों ही रूप में नारी को भारतीय पुरुष सदा से दैवी भावनाओं के साथ सिर झुकाता रहा है।
यह पूज्य भावना ही हिन्दू जाति की वह श्रेष्ठता थी जिसके कारण वह संसार का सिरमौर रहा। भगवान मनु ने स्पष्ट शब्दों में कहा था “जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। और जहाँ वे तिरष्कृत होती हैं वहाँ (उन्नति के) सब प्रयत्न निष्फल होते हैं।”
विकार पूर्ण वासना की, दूषित दृष्टि की, यहाँ सदा से निन्दा की जाती रही है। ‘रमणी’ नारी का घृणित और विकृत रूप है। स्त्री की जहाँ शंकराचार्य प्रभृति महात्माओं ने निन्दा की है, उससे दूर रहने का आदेश किया है, वह रमणी रूप ही है। माता के रूप में भगवती आद्य शक्ति की स्वयं शंकराचार्य जी ने भी अत्यन्त भावना पूर्ण स्तुति की है।
आज लोगों की आँखों में कीचड़ भर गई है वे वस्तु स्थिति को नहीं देख पर रहे। रमणी और कामना की विषैली प्रतिमूर्ति बनाकर नारी को देखा जा रहा है, आज सिनेमा, नाटक, उपन्यास, चित्र, संगीत, कला आदि में स्त्री को विलास सामग्री के रूप उपस्थित किया जा रहा है। तरुणी, नवयौवना, अर्ध नग्न, विलासिनी, विकार ग्रस्त, भाव भंगिमा वाली नारी का आज पुरुष समाज चिन्तन करता है उससे इन्द्रिय सुख की ही कामना करता है बेटी को वात्सल्य, बहिन का सौहार्द, माता की आराधना, लोग भूलते से जा रहे हैं।
इस दूषित दृष्टि का कितना दुष्परिणाम होता है इसे आज का मन्द बुद्धि जन समाज नहीं समझता। प्राचीन काल के ऋषि मुनि समझते थे। शारीरिक निरोगता, बलिष्ठता, दीर्घ जीवन, मानसिक संतुलन, पारिवारिक सुव्यवस्था, सुसंतति, पारस्परिक विश्वास, रक्त शुद्धि, पितृ भक्ति, पवित्रता, आदि लाभों से मनुष्य जाति तभी लाभान्वित हो सकती है। जब दृष्टि में पवित्रता हो आत्मिक लाभ तो इस तत्व के बिना हो ही नहीं सकता। नारी जैसे पूजनीय परम पवित्र तत्व के प्रति कुविचारों की दोष दृष्टि रहेगी तो उसका यह आध्यात्मिक तिरस्कार समाज का नाश कर देगा उसे पतन के गर्त में गिरने से कोई बचा न सकेगा। भगवान मनु का वचन असत्य नहीं हो सकता कि ‘यदि नारी का तिरस्कार होगा तो (उन्नति के) सब प्रयत्न निष्फल होंगे।’
अखण्ड ज्योति द्वारा गायत्री प्रचार का जो आन्दोलन चलाया जा रहा है, उसमें मुझे सर्वोत्कृष्ट लाभ यह पड़ दिखाई पड़ता है कि ईश्वर की, नारी (गायत्री) के रूप में आराधना करने के स्त्री जाति के प्रति पवित्रता, आदर और श्रद्धा की भावना का जन समाज में विकास होगा। गायत्री उपासनाओं में कुमारी कन्याओं की पूजा होती है। ध्यान और पूजन में अमित सौंदर्य की प्रति मूर्ति गायत्री के प्रति मातृभावना स्थापित करनी पड़ती है। इस प्रकार मनुष्य नारी के जिन पुत्री, बहिन और माता के निर्मल स्वरूपों को भूलता जाता है उनको पुनः हृदयंगम कर सकेगा।
मेरी गायत्री आन्दोलन के प्रति बड़ी श्रद्धा है। शक्ति भर इस पुण्य कार्य में भाग लेती हूँ। मेरा विश्वास है कि आचार्य जी का यह प्रयत्न भारतीय नारी जाति के लिए वैसा ही उन्नायक सिद्ध होगा जैसा कि पूज्य बापू का हरिजन आन्दोलन करोड़ों भूल मानवों में प्राण संसार करने वाला सिद्ध हुआ। मैं उस सुन्दर भविष्य का आशाजनक स्वप्न देखती हूँ जब कि पुरुषों के हृदय में नारी के प्रति पुण्य भावनाएँ रहेगी और फलस्वरूप यह भारत भूमि सम्पूर्ण सुख साधनों से परिपूर्ण होकर देव भूमि बनेगी। भगवान करे यह गायत्री आन्दोलन सफल हो।
(श्री रामदास विष्णु पाटिल, सावदा)
सृष्टि के आदि काल से जिन महात्माओं ने तपश्चर्या एवं योग साधना की है उनने ‘गायत्री’ को आधार रखा है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक तत्वों की चाबी गायत्री है। इसके बिना आत्म सिद्धि का ताला खुल नहीं सकता। कितने ही ऋषि-मुनि राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, सूर्य आदि को इष्ट मानकर उन्हें प्रसन्न करके शक्ति प्राप्त करने के लिए योग साधना करते रहे हैं कितनों ने निराकार ब्रह्म की उपासना की है। परन्तु हर एक को ‘गायत्री’ का प्रथम आश्रय अवश्य लेना पड़ा है। बिना गायत्री के कोई भी तप या साधन सफल नहीं हो सकता।
शास्त्र का वचन है -
अस्य कस्यापि मंत्रस्य पुरश्चरण्माभेत।
व्याहति त्रय संयुक्ता गायत्री चायुतं जपेत॥
नृसिहार्क बराहाणाँ कौला ताँत्रिका तथा॥
बिना जप्त्वातु गायत्री तर्त्सब निष्फलं भवेत॥
अर्थात्-चाहे किसी भी मंत्र का साधन किया जाय पर उस मन्त्र को व्याहृति समेत गायत्री के साथ जपना चाहिए। चाहे नृसिंह, सूर्य बाराह आदि की उपासना हो या धाम मार्ग के कौल तंत्रिका प्रयोग किये जाय बिना गायत्री को आगे लिए वे सभी निष्फल होते हैं।
गायत्री चारों वेदों की माता है। उसके बिना वेदोक्त दक्षिण मार्गी साधनाएं सफल नहीं होती साथ ही ताँत्रिक, कौल अवधूत, कापालिक, अधीर आदि के वाम मार्ग में जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसका मूल उद्गम भी गायत्री ही है बिना गायत्री के जिन सावर मन्त्रों को लोग सिद्ध करते हैं वे क्षणिक चमत्कार दिखा कर शक्ति हीन हो जाते हैं जिनके मूल में ठोस शक्ति होगी वही सफलता देर तक ठहरेगी और कठिन कार्यों को भी पूरा करेगी। गायत्री से रहित मंत्र चिरस्थायी और तीव्र शक्ति सम्पन्न नहीं होते, उनके लिए किया गया श्रम बहुत कम लाभ दे पाता है।
प्राचीन इतिहास पुराणों से पता चलता है कि सभी प्रमुख ऋषि महर्षि गायत्री के आधार ही पर योग साधना और तपश्चर्या करते थे। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है- “गायत्री छंद सामहम्” अर्थात्- गायत्री मैं ही हूँ। भगवान की उपासना के लिए गायत्री से बड़ा और कोई मंत्र नहीं हो सकता।
वशिष्ठ, याज्ञवल्क, अत्रि, विश्वामित्र, भरद्वाज, नारद, कपिल, कणादि, गौतम, व्यास, शुकदेव, दधीचि, बाल्मीक, च्यवन, शंख, लोमस, तैत्तरेय, जावालि, उद्दालक, वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, पुलिस्त, दृत्तात्रेय, अगस्त, सनत्कुमार, कन्ध, शौनक आदि ऋषियों ने विस्तृत जीवन चरित्र लिखकर इस लेख में यह बताने को स्थान नहीं कि उन्होंने वेदमाता की उपासना करके किस प्रकार परम सिद्धि प्राप्त की थी और गायत्री की शक्ति द्वारा वे कितनी महान् सफलताएँ सम्पादित कर सके थे। इतिहास पुराणों के ज्ञाताओं से इन महर्षियों के चरित्र छिपे नहीं हैं।
ऋषियों के अतिरिक्त साधारण गृहस्थ, वानप्रस्थी, ब्रह्मचारी, पंडित, राजा, व्यवसायी आदि सभी प्राणियों के लोगों को गायत्री द्वारा श्रेय मार्ग की प्राप्ति हुई है। राजा जनक ब्रह्मविद्या के पारंगत थे, उनसे शिक्षा लेने के लिए शुकदेव जैसे महात्मा भी जाते थे। माता सबकी है उस महाशक्ति के समीप जो कोई जाता है वही ब्रह्म रूप हो जाता है। अग्नि में पड़ने से साधारण लकड़ी पत्ते, घास पात भी अग्नि रूप हो जाते हैं।
थोड़े ही समय पूर्व अनेक ऐसे महात्मा हुए हैं जिनने गायत्री का आश्रय लेकर अपनी प्रतिभा को प्रकाशित किया। उनके इष्ट देव, आदर्श सिद्धान्त मित्र रहे हों पर वेदमाता के प्रति सभी की अनन्य श्रद्धा थी, उन्होंने प्रारम्भिक कुच पान इसी महाशक्ति का किया था जिससे वे इतने प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष बन सके। शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, नरसी महंत, दाढू दयाल, संत ज्ञानेश्वर, स्वामी रामानन्द, गोरखनाथ, मछीन्द्रनाथ, हरिदास, तुलसीदास, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, योगी अरविन्द, महर्षि रमण, गौराँग महाप्रभु, स्वामी दयानन्द, महात्मा एकरसानन्द जी आदि प्रातः स्मरणीय महात्मा का आत्मिक विकास इस महाशक्ति के आँचल में ही हुआ था।
वर्तमान काल में तीर्थ स्वरूप शरीर धारण किये हुए अनेक महात्मा, जिनमें से कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात स्थानों में तप कर रहे हैं, गायत्री की अनन्य श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं महात्मा गान्धी, महामना मालवीय, कवीन्द्र रवीन्द्र टी.सुवाराव, सर राधाकृष्णन, जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी शिवानन्द आदि महापुरुषों ने गायत्री की महानता के संबंध में अपने जो उद्गार प्रकट किये हैं वह बहुत ही विचार पूर्ण और मनन योग्य हैं। अखण्ड ज्योति संचालक आचार्य द्वारा गायत्री का जो असाधारण प्रकाश हुआ वह तो आश्चर्यजनक है।
अनेक महात्मा भूत काल में गायत्री द्वारा असाधारण सिद्धियाँ प्राप्त कर चुके हैं और आज भी प्राप्त कर रहे हैं जो शास्त्र मर्म के ज्ञाता हैं भारतीय योग विद्या से परिचित हैं, उन सभी साधकों की आराधना में गायत्री का प्रारम्भिक स्थान है फिर चाहे उसके इष्ट देव एवं विशेष साधन विधान कुछ भी क्यों न हो। आरम्भ से योग विद्या की प्रमुख सड़क गायत्री रही है अन्तः तक और कोई मार्ग ऐसा नहीं मिल सकेगा जो गायत्री से अधिक सीधा, सरल स्वल्प साध्य और निश्चित सफलता प्रदान करने वाला है। गायत्री की नौका पर सवार होकर ही। भव सागर को तैरा जा सकता है। गृही और विरागी दोनों को ही यह गायत्री रूपी कामधेनु समान स्नेह से अपना पथ पान कराती है। दोनों ही उसकी कृपा से अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं।
(पं॰ वासुदेव कृष्ण जोशी काव्यतीर्थ, चूरु)
शेखावाटी नामक प्रान्त में लक्ष्मणगढ़ नामक एक अच्छा कस्बा है। इस स्थान में यहीं के निवासी स्वर्गीय पं॰ विश्वनाथ जी गोस्वामी प्रसिद्ध गायत्री उपासक हो चुके हैं इनका जन्म करीब सं॰ 1927 में हुआ था। और स्वर्गवास सं॰ 1987 में 60 साल की अवस्था के आस-पास ये संसार से प्रयाण कर चुके थे। इनका जन्म मारवाड़ी सारस्वत ब्राह्मण समाज में हुआ था। दो विवाह किये थे। दोनों ही स्त्री गुजर गई तब इन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया और इन्होंने ऊनी वस्त्र धारण किये। आमरण ऊनी वस्त्र ही धारण करते रहे और एकाहारी तथा भूमि शायी रहे। इन्होंने अपनी उम्र में गायत्री माता के 3 पुरश्चरण किये थे।
दो तो पूर्ण रूप किये और तीसरे चालू पुरश्चरण में ही स्वर्गवास हो गया। जब दो पुरश्चरण पूरे हो चुके और तीसरा चालू किया था तभी से जब ये संध्यावंदन करके एकासन पर बैठ गायत्री भगवती की माला फेरने लग जाते तभी एक काला नाग सर्प बड़ा लम्बा चौड़ा फन ऊपर उठाकर के करीब इनके आसन से 2-3 फुट पर आकर बैठ जाता था। जब अपनी नियम माला पूर्ण करके उठते और विसर्जन का मंत्र पढ़ देते तो सर्प चला जाता। यह दृश्य उनके कई भक्तों और साथियों ने देखा है। गोस्वामी जी महाराज सर्प के इतनी नजदीक या जाने पर भी तनिक भी विचलित नहीं होते थे और अपनी शक्ति गम्भीर मुद्रा में ध्यान किये रहते थे। बहुत सम्भव है कि वह सर्प गायत्री माता के ही रूप में हो और उनको दर्शन देने आता रहा हो।
गोस्वामी जी महाराज के आशीर्वाद से सीकर के एक भक्त बीदावत का परिवार तो बड़ा समृद्धिशाली तथा वैभव सम्पन्न हो गया जो पहले एक साधारण परिवार था। अब यह परिवार गोस्वामी जी की समाधि पर छोटे बालकों का मुण्डन संस्कार व प्रसाद वगैरह बराबर करता है और उनको अपने देव की तरह मानता है संकट के समय गोस्वामी जी मनौती व प्रसाद बोला जाता है और श्रद्धा एवं विश्वास के साथ फल मिलता है। इसके अलावा अन्य सैकड़ों व्यक्तियों ने गोस्वामी जी से लाभ उठाया। अब उनका जप स्थान गुँसाई जी की बगीची के नाम से मशहूर है और उनकी स्वर्गवास तिथि पर लक्ष्मणगढ़ के बहुत से व्यक्ति दर्शनार्थ जाते हैं आप 12 वर्ष तक तो दूध और फलों पर ही आश्रित रहे। आप वास्तव में बड़े त्यागी और तपस्यानिष्ठ ब्राह्मण थे। गायत्री की साधना से उनको वचन सिद्धि प्राप्त हो गई थी तभी तो वीदावत का परिवार इनके आशीर्वाद से करीब बीस लाख के सम्पत्ति का मालिक है।
इस प्रदेश के आपत्ति ग्रस्त अन्य कई सज्जनों ने भी काफी लाभ उठाया है। इनके दत्तक पुत्र पं ज्वालादत्त जी उसी बगीची में रहते हैं ये कुछ पढ़े लिखे भी नहीं हैं तथा कोई विशेष पूजा पाठ वगैरह भी नहीं करते हैं फिर भी इनके पिता जी के आशीर्वाद स्वरूप खूब आनन्द करते हैं।
गोस्वामी जी ने जिस प्रकार गायत्री माता की उपासना करके स्वयं आत्म कल्याण करते हुए अनेकों दूसरों का भी भला किया उसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी श्रद्धापूर्वक साधना करके लाभ उठा सकते हैं। गायत्री सर्व शक्तिमान है उसकी शरण में जाने वाला साधक सब प्रकार की सफलता प्राप्त करता है। उसे किसी बात की कमी नहीं रहती।
(श्री सरयू शरण गुप्त, नवाबगंज)
जिनकी दृष्टि संकुचित और प्रज्ञा मलीन होती है वे धन, भोग, यश आदि की कामना करते हैं और उसकी की उधेड़ बुन में नर तन जैसे अमूल्य अवसर को गंवा देते हैं। परन्तु भगवान जिन्हें दूर दृष्टि, स्वच्छ प्रज्ञा और तात्विक ज्ञान देते हैं वे मनुष्य जीवन की महानता को समझते हैं और उसका सदुपयोग करके जन्म मरण की फाँसी काटने का प्रयत्न करते हैं।
जैसे कोई मनुष्य चाहे अपने लाभ के लिए ही दीपक जलाता हो तो भी उस दीपक का प्रकाश दूर तक होता है और उस स्थान के अनेक व्यक्तियों को प्रकाश मिलता है। अपने लिए यज्ञ किया जाय तो भी उससे आकाश की शुद्धि वायु होकर जल वर्षा आदि के लाभ असंख्य प्राणियों को मिलते हैं। इसी प्रकार आत्म कल्याण के लिए जो परमार्थिक कार्य किये जाते हैं उससे अपना कल्याण तो होता ही जाता है साथ ही अन्य अनेकों का भी हित साधन होता है
नवाबगंज के निकट सरयू तट पर लगभग 25 वर्ष से एक महात्मा तप कर रहे हैं। इनका नाम तो पं॰ बलभद्र जी है पर नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन करने का आरम्भ से ही व्रत धारण करने के कारण उन्हें ब्रह्मचारी कहा जाता है अब वे ब्रह्मचारी के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। इन महात्मा का संक्षिप्त सा परिचय नीचे की पंक्तियों में उपस्थित किया जाता है।
ब्रह्मचारी जी संस्कृत भाषा के उत्कृष्ट विद्वान हैं उन्होंने प्रारम्भिक जीवन में ही पूर्व संचित शुभ संस्कारों के कारण यह जान लिया था कि मनुष्य जीवन का सच्चा लाभ क्या है? और उस लाभ को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग क्या हो सकता? उन्होंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गायत्री माता आश्रय लिया है क्योंकि सृष्टि के आदि से लेकर अब तक प्रायः सभी वेदानुयायी साधक गायत्री के आधार पर ही तप करके परम पद के अधिकारी बने हैं।
अपनी राज तुल्य सम्पत्ति में लात मार कर ब्रह्मचारी जी ने सरयू तट पर एक छोटी सी कुटी में गायत्री तप का महान अनुष्ठान कर रहे हैं। अब तक वे 24 करोड़ से अधिक जप कर चुके हैं। पहले वे सर्वथा मौन रहते थे, कुछ समय तक उन्होंने दिन में मौन रखने का नियम रखा। वे नित्य प्रति यज्ञ करते हैं। गत वर्ष एक सज्जन ने अपने संतति सुख के उपलक्ष में प्रति पूर्णमासी को एक बड़ा यज्ञ करते रहने की व्यवस्था कर दी थी और त्रिशक्तियों के लिए उपयुक्त वस्त्र परिधान भी दान किया था। ब्रह्मचारी जी मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को हर साल तीन कन्याओं का वस्त्र भोजन आदि से पूजन करते हैं।
इन पच्चीस वर्षों से उन्हें जो महान आत्मिक लाभ हुआ है। उस संबन्ध में कुछ प्रकाश डालना ब्रह्मचारी जी को अभीष्ट नहीं है इसलिए उस संबन्ध में कुछ भी नहीं लिखा जा रहा है। फिर भी स्थानीय लोगों को उनके प्रति अगाध श्रद्धा है क्योंकि ऐसे तपोनिष्ठ महात्मा आसानी से दृष्टिगोचर नहीं होते।
कुछ वर्ष पूर्व इधर दूर-दूर स्थानों तक चेचक तथा हैजा रोमाँचकारी प्रकोप हुआ था पर जो लोग ब्रह्मचारी की छाया में रहते थे वे सपरिवार उस आपत्ति से अछूते रहे। इसी प्रकार गत वर्ष जल प्रवाह की प्रलय तुल्य दशा होने पर भी ब्रह्मचारी जी का आश्रय लेने वाले लोग समस्त आपदाओं से रक्षित रहे हैं। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर अनेकों लोगों ने गायत्री उपासना का व्रत लिया हुआ है। मैंने भी उन्हीं से गायत्री उपदेश लिया और यथाशक्ति उस कल्याण मार्ग पर चल रहा हूँ।
स्वर्गीय लाला राम सहाय जी की धर्मपत्नी के हृदय में अपने पति देव का स्मारक बनाने के लिए इस गायत्री तीर्थ को सुन्दर बनाने की प्रेरणा हुई। उनने अपने धन का परम सात्विक उपयोग यह किया है कि पूज्य ब्रह्मचारी के निवास स्थान पर गायत्री यज्ञ, शाला, कूप, तथा वृक्षारोपण किया है जिसका समारोह इसी साल माघ सुदी 5 को अखण्ड कीर्तन के साथ समारोहपूर्वक सम्पन्न हुआ था।
गायत्री उपासना में जो लोग लगे हैं उनमें से अनेकों को आत्मिक लाभ के अतिरिक्त साँसारिक लाभ भी मिले हैं। एक सज्जन जेलखाने के दण्ड से सर्वथा छूट गये। एक सज्जन ने बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियाँ होते हुए भी पर्याप्त लाभ कमाया है। एक सज्जन की कन्या विवाह की चिन्ता बड़ी सरलता से हल हो गई। ब्रह्मचारी जी चिन्ता बड़ी सरलता से हल हो गई। ब्रह्मचारी जी अक्सर कहा करते हैं कि जितनी निष्ठा एवं श्रद्धापूर्ण हृदय से जगज्जननी की उपासना की जायगी उसका उतने ही परिणाम में सुमधुर तथा चिरस्थाई परिणाम प्राप्त होगा। यह कहने सुनने नहीं करके देखने की बात है।
(पं॰ अयोध्याप्रसाद जी दीक्षित, कानपुर)
हमारे गाँव जुगराजपुर में जो कि कानपुर जिले के अंतर्गत है जंगल में एक कुटी बनी हुई है। एक ब्राह्मण जिनका कि नाम छेदीलाल जी है। उनको कि हम अच्छी तरह से जानते हैं। क्योंकि विद्यार्थी जीवन में जब कभी हमें छुट्टी मिलती थी हम अपने गाँव पहुँच कर उस कुटी पर अवश्य जाया करते थे वे गायत्री माता की उपासना में लगे हुये हैं अब उनकी अवस्था 50 के करीब होगी। भगवान सूर्य देव के सन्मुख खड़े होकर साधना किया करते हैं और दोपहर में नित्य प्रति हवन करते हैं तथा एक बार ही भोजन करते हैं। उनके चेहरे पर एक अनोखा तेज है। वाणी में मधुरता है, संस्कृत का उदाहरण तो उनका इतना शुद्ध है कि प्रशंसा से बाहर है उनका घर धन-+धान्य से परिपूर्ण है और सभी प्रकार से सुख शान्ति है। उस कुटी पर उनके गुरु बाल ब्रह्मचारी हैं। उन्होंने हमारे पिता के कहने पर कि इसको विद्या नहीं आती है मुझे मंत्र दिया था और कहा था कि उसके जप मात्र से बुद्धि तीव्र हो जायेगी। सचमुच उसका मुझे बड़ा अच्छा लाभ मिला। उनके दर्शनार्थ बहुत-बहुत दूर से लोग आया करते हैं लेकिन दोपहर के समय उनका कोई पता नहीं चलता कि वे कहाँ चले जाते हैं। जो महानुभाव कानपुर के रहने वाले यदि हैं उनको दर्शन की अभिलाषा हो तो जुगराजपुर जा कर देख लें।
(पं॰ बिहारीलाल जी त्रिवेदी, राजगढ़)
सृष्टि के आदि काल में भागीरथ जी उग्र तप करके तरण तारिणी गंगा को भूलोक में लाये थे। वर्तमान समय में भी एक एकान्त सेवी महात्मा वैसा ही प्रवास कर रहे हैं। नाम इनका भी भागीरथ जी है मानसिक विषय विकारों की अग्नि में जलने वाली मनु संतति, को शान्तिदायक ज्ञान गंगा में स्नान कराने का व्रत इन महात्मा ने किया हुआ है॥
जन्म नाम इनका पं॰ भागीरथ जी है। पर इनका वाह्य कलेवर भी अन्तरात्मा की भाँति ही ब्रह्ममय हो गया है। वाणी से ब्राह्मी शिक्षा और दैवी प्रवचन उद्भूत होते हैं इसलिए इन्हें महात्मा हरि ॐ तत् सत् कहते हैं। इसी नाम से अब ये मध्य भारत में विख्यात हैं।
राजगढ़ के राज्य पूजित वंश में इन महापुरुष का जन्म हुआ है काशी जी में संस्कृत की, साथ ही वह शिक्षा भी प्राप्त की जिसे पाने पर और कुछ उपलब्ध करना शेष नहीं रह जाता। आध्यात्मिक पुरुषार्थों में तप सब से बड़ा, विवेक, त्याग और आत्म दमन का आवश्यकता होती है। कोई विरले ही शूरवीर इस पथ पर पर्दा पण करते हैं। प्राणों को हथेली पर रखकर समुद्र तल घुसने का साहस जिसमें होता है वही मोती पाने का सौभाग्य प्राप्त करता है।
महात्मा हरि ॐ तत् सत् गत 22 वर्ष से उपवास पूर्वक तप करते हैं। इतने समय से उन्होंने अन्न ग्रास नहीं उठाया। थोड़ा सा दूध और फल लेकर वे शरीर को धारण किये रहने योग्य शक्ति प्राप्त करते हैं। और निरन्तर गायत्री द्वारा आत्म साक्षात्कार करने की साधना में तल्लीन रहते हैं। नेत्रों से उन्हें नहीं दीखता, पर दिव्य नेत्र इतने प्रदीप्त हैं कि उन्हें मनुष्य के छिपे हुए अन्तस्तल को देखने में देर नहीं लगती। रात्रि के 10 बजे से लेकर दिन के 12 बजे तक 24 घंटों उनका मौन रहता है 10 घंटे के लिए उनकी वाणी खुलती है, तब उससे अमृतमय परमार्थिक प्रवचन की निसृत होते हैं।
साँसारिक कामना वाले स्वार्थी लोग उनके तप से अनुचित लाभ न उठाने लग जाएं इसलिए अपनी आत्मिक सफलताओं को उन्होंने सर्वथा गुप्त ही रखा है परन्तु वे लोगों को आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए अपने सम्पूर्ण ज्ञान सम्पत्ति सदा ही बखेरते रहते हैं उनसे प्रकाश पाकर अनेकों भूले-भटके लोगों ने सच्चा रास्ता पाया है। अनेकों ने नरक से निकल कर स्वर्ग की है। रामायण गीता घर घर प्रचार इस क्षेत्र में उन्हीं से प्रयत्न हुआ है। राजगढ़ की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चे अपनी तोतली बोली में रामायण की चौपाई गाते हुए सुने जा सकते हैं और माताएं चलो चलाते हुए गीता के श्लोक बोलती है। चैत्र में रामायण के अवसर पर हर साल एक प्रभाव शाली पक्ष होता है जिससे अनेक आत्माओं को भागीरथ जी द्वारा आमंत्रित ज्ञान गड्ढा का रसा स्वादन करने का सौभाग्य मिलता है।
यदि आत्मा परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त कर लो तो परमात्मा ही बन जाती है। हरि ॐ तत् सत् परमात्मा का सुन्दर नाम है। इस नाम से हम सब इन महात्मा जी को पुकारते क्योंकि उनकी निर्मल आत्मा अपने शुद्ध स्वच्छ परमात्मा के समीप ही पहुँच चुकी है।
(श्री विश्वनाथ दीक्षित, विष्णुपुर)
हमारे बाबा श्री भगवान दीक्षित, बिठूर वाले महाराज खोडेराव के शिष्य थे। बहुत रोज तक उनके कोई सन्तान न हुई तो उनने महाराज जी की कृपा से गायत्री का अनुग्रह प्राप्त किया और उनके दो पुत्र हुए उन्हीं में से एक हमारे पिता गुरुदीन जी थे।
पिता जी अध्यापक थे। काकूपुर के सुप्रसिद्ध वेदपाठी विद्वान पं॰ अयोध्याप्रसाद जी से उनने सस्वर यजुर्वेद पढ़ा था। पिता जी का नित्य नियम था कि प्रातःकाल 3 बजे उठकर गंगा स्नान करते और गायत्री उपासना में तल्लीन हो जाते। अपने हाथ छै छटाँक जौ के आटे की रोटी बनाकर एक समय भोजन करना, तख्त पर सोना, खड़ाऊं पहनना, गंगाजल पीना जैसे अनेक संयम नियमों को वे पालन करते रहे।
उनका ब्रह्म तेज ऐसा था कि अफसर भी उठकर अपने हाथ से उन्हें कुर्सी देते थे। जीवन भर किसी ने उनका गंगातट से हटाकर तबादला नहीं किया। मुसलमान और अंग्रेज अफसर तक उनकी प्रतिष्ठा करते थे। एक अंग्रेज अफसर जो अपने बुरे स्वभाव के लिए बदनाम था एक दिन स्कूल का मुआइना करने आया पिता जी जप पर बैठे थे। अंग्रेज लौट गया। दूसरे समय आकर उसने अच्छा मुआइना लिखा और स्कूल के समय में भजन करने के लिए कोई शिकायत न की।
सर्विस में तीन साल बाकी थे तभी उनने इस्तीफा देकर भजन करना आरम्भ कर दिया था। अपने जीवन के अन्तिम अध्याय में माघ सुदी 12 को उन्होंने संन्यास लिया और फागुन सुदी 2 को गौ माता के सामने कुर्सी पर बैठ कर खुले मैदान में ब्रह्म जप करते हुए प्राण त्याग दिया उनके आशीर्वाद से अनेकों का कल्याण हुआ, उनके प्रेरणा से अनेक दुख लोग सज्जन बने, अनेक विपत्ति ग्रस्तों के संकट छूटे और अनेकों की मनोकामनाएं पूर्ण हुई। गृहस्थ आश्रम में वे रहते थे, परन्तु आवरण में वे संन्यासी के समान थे। माया ममता उन्हें छू भी न गई थी। पिता जी गायत्री के अनन्य उपासक थे। ब्राह्मण के लिए गायत्री को अनिवार्य मानते थे और कहते थे कि वेद माता का आश्रय लेकर साधारण गृहस्थ भी परम गति को प्राप्त हो सकता है। उन्होंने अपनी सन्तान (हम लोगों) को छोटेपन से ही गायत्री की शिक्षा दी जिस पर कि हम श्रद्धापूर्वक चल रहे हैं।
पिता जी के पुण्य प्रताप से हम सभी लोग सुखी हैं। मैंने तीन बार सवा लाख के अनुष्ठान किये हैं जिनसे समय-समय पर कई प्रयोजन सफल हुए दो कन्याओं के विवाह बड़ी आसानी से जमाने को देखते हुए सस्ते रेट पर समृद्ध घरों में हो गये। समयानुसार बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हल हो जाती हैं और संदेहास्पद कार्य पूरे हो जाते हैं। करीब आठ दस साल से प्रणाम की स्पष्ट ध्वनि सुनाई पड़ने लगी है। आशा चक्र में स्फुरण तथा प्रकाश की मात्रा बढ़ रही है। चित्त में बड़ी शान्ति रहती है। यह सब गायत्री की ही कृपा है।
(श्री लक्ष्मण जी तरुड़कार)
लायलपुर से दो मील उत्तर में एक सघन उपवन था जिसमें कुछ समय पूर्व एक हरीहर नामक एक महात्मा रहते थे। संध्या को एक समय नगर में भिक्षा को आते थे बाकी सारे दिन ईश्वर भजन में तल्लीन रहते। गायत्री का उन्हें ईष्ट था। भगवती माता के परम भक्त थे। भिक्षा के लिए वे इने-गिने घरों में जाते थे। उन्हीं घरों में एक भक्त विशुनदयाल का था। भगत जी का एक सात वर्ष का बालक महात्माजी से बड़ा हिल गया था, भिक्षा का समय होता था तो बालक उनकी बहुत पहले से प्रतीक्षा किया करता था। जिस दिन न आते उस दिन बहुत बेचैन होता। महात्मा जी को भी बालक से प्रेम हो गया वे उसके साथ बैठ कर कुछ देर नित्य खेलते।
एक दिन बच्चा बीमार पड़ा एक हफ्ते की बीमारी में बालक का देहान्त हो गया। जिस समय उसकी लाश को श्मशान ले जाया जा रहा था, उसी समय महात्मा जी भिक्षा को आ गये। यह सब देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ। श्मशान तक वे भी साथ गये। जब अंत्येष्ठि की तैयारी हुई तो उनने लोगों से कहा इस लाश को मुझे दे दो और तुम सब लोग चले जाओ। महात्मा जी पर सब लोगों की बड़ी श्रद्धा थी। वे लाश उन्हें देकर लौट आये।
एक दो व्यक्ति लाश लेने का कारण जानने के लिए वहीं छिपकर बैठे रहे। महात्मा जी ने मृतक के जीवित हो जाने के लिए ईश्वर बहुत प्रार्थना की, पर वह न जिया। रात इसी प्रकार बीत गई। सवेरा निकलने को आया। उन्हें अपनी असफलता पर बड़ी झंलाहट हो रही थी। उनने बड़े जोर से चिल्लाकर कहा- ईश्वर की इच्छा से नहीं, तो उठ, मेरी इच्छा से जी पड़ बालक ने करवट बदली और वह सचमुच जी पड़ा एक दिन अपनी कुटी पर रखकर दूसरे दिन उस बालक को उसके पिता को सौंप आये। मरे को जिन्दा कर देने के चमत्कार का यश दूर-दूर तक फैल गया। अब उनकी कुटी पर भीड़ लगी रहती थी लोग तरह की भेंट लेकर वहीं पहुँचते थे, भिक्षा की उन्हें आवश्यकता न रही।
एक दिन हरीहर जी के गुरु जी कुटी पर पधारे। इतना वैभव इतनी भीड़भाड़ देखकर उन्हें बड़ा कौतूहल हुआ। भीतर पहुँच कर देखा तो शिष्य फूलों की माला से सजा बैठा था। उनके क्रोध का बारा पार न रहा। ऐसे जोर की लात लगाई कि हरीहर जी आधे मुँह गिर पड़े। गुरु जी इस विकरालता को देखकर वे थर-थर कांपने लगे। गुरु ने एक दर्पण झोले में से निकाल कर दिया और कहा इसमें अपना मुँह तो देख। उनने मुँह देखा तो वह काला हो रहा था। मुर्दनी छाई हुई थी, सारा तेज उड़ गया था। प्रशंसा तो फैल रही थी पर आत्मबल की कमाई सब चुक गई थी।
गुरु जी ने कहा -ईश्वर के नियमों में और मनुष्य के निर्धारित प्रारब्ध में हस्तक्षेप करना उचित नहीं। भक्त अपने तप के प्रभाव से भगवान को अपनी बात को मनवाने के लिए विवश कर सकता है पर ऐसा करने से उसका अपना सारा तप तेज समाप्त हो जाता है। यह कहकर वे हरीहर जी को कान पकड़कर घसीटते हुए अपने साथ अज्ञात स्थान को ले गये। ताकि वे पुनः तप करके अपनी खोई हुई आत्म शक्ति का संचय कर सकें। जाते समय उनने उपस्थित लोगों से कहा-आप लोग किसी सन्त को प्रशंसा पूजा का प्रलोभन देकर उसे पथ भ्रष्ट न किया करें। अपने कल्याण के लिए आप लोग स्वयं भगवान का भजन किया करें।
यह घटना लगभग 85 वर्ष पुरानी और बिलकुल सच्ची है। एक परम विश्वस्त प्रत्यक्षदर्शी ने कही थी। यह गायत्री साधकों के लिए बड़ी शिक्षा प्रद है। तप के अनुपात से निश्चित रूप से सिद्धि मिलती है उस सिद्धि को किसी का प्रारब्ध पलटने का चमत्कार दिखाने में खर्च नहीं कर देना चाहिए। वरन् उसे गुप्त रखना चाहिए। कष्ट ग्रस्त लोगों को स्वयं साधना पथ पर चलकर कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
(श्री मान सिंह जी टाक, जोधपुर)
विशाल वृक्ष की छाया, पुष्प, फल, पल्लव, लकड़ी आदि से अनेक प्राणी लाभ उठाते हैं आम का वृक्ष अपने जीवन में अनेक प्राणियों की अनेक प्रकार से सेवा करता है। उस वृक्ष के अस्तित्व का श्रेय एक छोटे से बीज को होता है। बीज का कलेवर बहुत छोटा है उसका अस्तित्व तुच्छ सा है। वृक्ष के विशाल वैभव में उस छोटे से बीज का कितना बड़ा भाग है इस वस्तु स्थिति को तभी समझा जा सकता है जब उस पर मनोयोग पूर्वक विचार किया जाय।
मनुष्य, जन्म से पशु तुल्य होता है। उस पर जैसे संस्कार डाले जाते हैं वैसा ही वह बनता है शिक्षा और संगति में बुरे भले होने पर मनुष्य का भला बुरा होना बहुत कुछ निर्भर रहता है। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं उनको वैसा बनाने में सदशिक्षा का बहुत बड़ा हाथ है। जंगली देशों और जातियों में जहाँ सदशिक्षा की व्यवस्था नहीं है वहाँ कोई महापुरुष पैदा नहीं होता।
गायत्री ऐसा बीज मंत्र है कि यदि किसी उपयुक्त क्षेत्र में वह जो दिया जाय तो उसका पौधा उगकर सुरम्य आम्र वृक्ष की तरह पल्लवित होता है। प्राचीन भारतीय इतिहास में जिन शूरवीरों, महापुरुषों, भूमि मुनियों, विद्वानों, चक्रवर्ती शासकों के नामों का उल्लेख है वे गायत्री बीज के ही पुष्य पल्लव हैं। इस महामंत्र ने उनकी योग्यता और शक्ति को इतना विकसित किया था कि वे न केवल अपना वरन् दूसरे असंख्य मनुष्यों का भला करने में भी समर्थ हुए।
आज भारतीय संस्कृति के बीज मंत्र गायत्री को भुला सा दिया गया है। उसकी शक्ति, सम्भावना और महिमा स्मरण भी हिन्दू जाति को नहीं रहा है। फलस्वरूप हमारी आत्मिक और भौतिक महानता प्राचीन काल की अपेक्षा बहुत नीचे गिर गई है। यदि पूर्वकाल की भाँति उन्नति के शिखर पर पहुँचना है तो उसकी शक्ति गायत्री माता का दुग्ध पान करने से ही मिलेगी।
अनेक मस्तिष्कों में हमें गायत्री बीज को बोना चाहिए। इनमें से कुछ की जमीन ऊसर होने से प्रयत्न व्यर्थ जा सकता है पर थोड़े बहुत मनुष्यों की अन्तः भूमियाँ अवश्य ऐसी निकलेंगी जिन पर यह बीज उग आवे। यदि ऐसे थोड़े से भी पौधे उगाये जा सके तो आम्र वृक्षों की तरह वे संसार के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। कभी-कभी एक दो महान आत्माएं ही इतनी प्रचंड आत्म शक्ति सम्पन्न होती हैं कि उनका पराक्रम, वातावरण में भारी उलट कर देता है। ऐसे महापुरुषों को उत्पन्न कर देने की खेती का नाम है गायत्री प्रचार मेरी दृष्टि में इस युग की सब से बढ़ी चढ़ी आवश्यकता यही है। आज मनुष्य जाति अनेक कष्टों और अनेक समस्याओं के जाल में उलझी हुई है उसका उद्धार गायत्री की शिक्षा एवं शक्ति द्वारा ही होना सम्भव है।
गायत्री प्रचार मेरी दृष्टि में सबसे आवश्यक एवं उपयोगी कार्य है। उस ओर मेरा बड़ा उत्साह है। पिछले छः महीनों में लगभग 500 पुस्तकें बिना मूल्य अपनी ओर से वितरण कर चुका हूँ। कितनों को ही अपना पैसा खर्च करके इस साहित्य को मँगाने के लिए प्रस्तुत कर चुका हूँ। इस दिशा में बहुत काम करने की मेरी इच्छा है।
यह प्रचार कार्य मोटी दृष्टि से देखने में बहुत तुच्छ प्रतीत होता है पर वस्तुतः यह इतना ही महान है जितना कि बरगद का बीज। सहस्र पुरुषों को यह शिक्षण और प्रोत्साहन देने पर उनमें से यदि एक भी व्यक्ति ऐसा निकल आवे जो माता की शक्ति प्राप्त करने को उठ खड़ा हो तो उस एक का पुण्य पुरुषार्थ भी बहुत बड़े काम का सिद्ध हो सकता है। आम का वृक्ष चिरकाल तक अनेकों को लाभ पहुँचाता, गायत्री का एक पूर्ण ज्ञानी अनेक पाप तापों से भरे विषाक्त वातावरणों को शुद्ध कर सकता है। इस प्रकार जो महान् उपयोगी कार्य होगा उसमें हमारे इस प्रचार कार्य का उतना ही महत्व होगा जितना कि वृक्ष की उपयोगिता में बीज श्रेय होता है। मैं जप, तप, व्रत, उपवास उतने नहीं कर पाता। गायत्री माता के चरणों में मेरी श्रद्धाँजलि यही होती है कि उनकी महिमा का अधिकाधिक प्रचार करूं। क्या यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा माता को कम प्रिय होगी? मेरा अन्तःकरण कहता है कि - नहीं
(श्री नयन सिंह वर्मा, वसन्तपुर)
चार पाँच महीने की बात है उत्तराखण्ड की तीर्थ यात्रा से घूमते हुये जागेश्वर से श्री 108 श्री दूधाधारी बाबाजी महाराज हमारे गाँव वसन्तपुर अल्मोड़ा) पधारे। आप नित्य त्रिकाल स्नान, ध्यान, हवन, यज्ञ, गायत्री जप करते हैं। एक बार फलादार या दुग्धाहार तथा बोरे ही पहनते व ओढ़ते हैं जिस दिन आप यहाँ आये उस समय आपके पास केवल 2 सेर हविष्य सामग्री थी, शहर अल्मोड़ा दूर होने के कारण उस सामग्री का यहाँ मिलना भी दुर्लभ था, तिल की खेती होने को तैयार थी परन्तु उन दिनों बिल्कुल ही समाप्त थी। परन्तु गायत्री का चमत्कार देखिये आप सात दिनों तक यहाँ रहे, प्रतिदिन 3 बार 2 सेर सामग्री का हवन किया और जाने के आठवें दिन भी आपके पास उतनी ही सामग्री थी जितनी आने के दिन थी। एक दिन बातों को प्रसंग में ही एक भक्त ने कहा कि महाराज आज ककड़ी नहीं आई बाबा जी बोले अभी आ जायगी। ठीक दो मिनट के बाद एक भक्त ककड़ी लेकर एक भक्त उपस्थित हो गया। जिसके आने की सम्भावना ही नहीं थी। इसी प्रकार की अन्य घटनाएं भी घटित हुईं। उस दिन हम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि गायत्री वास्तव में कामधेनु ही है।
(डाक्टर रामनरायन भटनागर, इटौआ धुरा)
विगत श्रावण की नाग पंचमी को मैं हरिद्वार गया वहाँ 12 दिन तक ऋषिकेश गंगा तट पर निवास किया तत्पश्चात् जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा पहुँचा। कई दिन तक श्री गुरुदेव आचार्य जी के संपर्क में रहा। तदुपरान्त अपने सम्बन्धियों से मिलता हुआ आगरा होता हुआ धौलपुर गया।
मथुरा से जब मैं विदा ले रहा था तब आचार्य जी चिन्तित, गम्भीर, उद्विग्न और विषादपूर्ण मुद्रा में थे। उनका कंठ रुँधा हुआ था, विदा करते समय वे बड़े दुखी हो रहे थे। मैंने सोचा मेरे प्रति उनको जो प्रेम तथा वात्सल्य है उसी के कारण वियोग के समय उनकी यह स्थिति हो रही है परन्तु मन न माना उनकी समुद्र जैसी गम्भीर मनोभूमि मैं मेरे जैसे व्यक्ति के जाने की साधारण सी घटना का इतना प्रभाव नहीं हो सकता कि वे ऐसी अधीरता का परिचय दें। चित्त में नाना प्रकार के संकल्प-विकल्प उठने लगे बहुत विचारने पर भी कुछ समाधान न हो सका। बुद्धि ने हार मान ली और मै धौलपुर पहुँचा। रास्ते भर इस गुत्थी को सुलझाता रहा, पर वह सुलझ न सकी।
धौलपुर पहुँचते-पहुँचते मैं बीमार पड़ गया। चिकित्सा चलती रही पर बीमारी न घटी। एक दिन रोग तीव्र प्रकोप हुआ। सन्निपात, वमन अतिसार के कारण मैं मृत्यु-शैया पर पहुँच गया। मैं स्वयं डॉक्टर हूँ। लक्षणों से विश्वास हो गया कि मेरी अन्तिम घड़ी है। अपने भांजे भगवान स्वरूप से मैंने लड़खड़ाती जबान में अपनी अंत्येष्टि सम्बन्धी सब आदेश दे दिये और शीतल पसीने आने की विपन्न दशा में बेहोश हो गया।
उधर स्वजन सम्बन्धियों को मेरा कोई समाचार न मिलने से बड़ी चिन्ता हो रही थी। बरेली वाली मेरी बहिन ने चारों ओर को पत्र भेजे और ज्योतिषी अशर्फीलाल जी को बुलाकर गृह दशा दिखवाई। ज्योतिषी जी ने बताया कि वह बड़े संकट में है यदि 10-25 दिन में न आये तो उनके आने की आशा भी नहीं। कारण यह यह था कि छः ग्रह एक साथ मेरे जन्म स्थान में प्रवेश कर रहे थे और मार्केश बन रहा था।
जिस समय मैं मृत्युशय्या पर पड़ा अन्तिम साँस ले रहा था। उसी समय गढ़वाल में मेरे मित्र पं॰ रामदत्त शर्मा को स्वप्न हुआ मैं माला हाथ में लेकर गंगा जी को पार कर रहा हूँ। उनकी तुरन्त आँख खुल गई और अपनी पत्नी से कहा अब डॉक्टर साहब नहीं मिलेंगे।
जैसा कि पं॰ रामदत्त जी ने स्वप्न देखा था सचमुच ही मेरा प्राण इस शरीर से सम्बन्ध तोड़ रहा था। मुझे लगा कि मैं बहुत हल्का होकर ऊपर आकाश में उड़ रहा हूँ। आर्श्रय, कौतूहल के साथ इस विचित्र दशा में पड़ा हुआ कुछ निर्णय न कर पा रहा था कि मैं किस अवस्था में हूँ, कहाँ हूँ, उड़ता हुआ कहाँ जा रहा हूँ। अकस्मात इसी अवस्था में मुझे अनन्त तेजोमयी, परम स्वरूपी, दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हंसारूढ़ वेदमाता गायत्री के दर्शन हुए हैं। मैं उनके चरणों की ओर बढ़ी, उनने मस्तक पर हाथ धर दिया। यह स्पर्श ऐसा सुखद था कि मैं सारी सुधि-बुधि भूलकर एक विचित्र आनन्द सागर में निमग्न हो गया।
कई घण्टे बाद संज्ञा शून्य शरीर में चेतना फिर लौट गई। मृत्युशय्या पर करवटें बदली और धीरे-धीरे अच्छा होने लगा। कुछ दिन दवा-दारु करते ठीक हो गया और घर चला आया।
मन में बार-बार प्रश्न उठता है कि उस माता की शरणागति से अलग होकर मुझे फिर क्यों यह जीवन जीने के लिए लौटना पड़ा? गुरुदेव ने बताया है कि जो अपूर्णताएं रह गई हैं उनको पूरा करने के लिए, कच्चेपन को पकाने के लिए अभी कुछ समय की साधना और आवश्यक है। नया जन्म लेकर उस कमी को पूरा करना संदिग्ध था। कौन जाने अगले जन्म में वे प्राप्त होती या न होती। इसलिए वर्तमान सुयोग से लाभ उठाकर जीवन लक्ष्य तक पहुँच जाना ही श्रेयकर था।
मथुरा से चलते समय आचार्य जी का उद्विग्न हो उठना मेरी समझ में आता है। वे अपनी सूक्ष्म दृष्टि से मेरा भविष्य देख रहे थे। उसी से उनका माता जैसा कोमल हृदय पिघल कर छलका पड़ रहा था। मृत्यु से वापिस लौटने में उनका कितना प्रचण्ड प्रयत्न मेरे प्रति रहा इनका उल्लेख करना उसका महत्व कम करना है।
अज्ञानी बालक जैसे अपने अभिभावकों के आदेशों का अनुसरण करता है, उसी प्रकार माता की प्रेरणा और गुरुदेव की आशा का संबल पकड़ कर चल रहा हूँ। प्राण माता के चरणों में रम रहे हैं, हर साँस में माता की पुकार उठती है। वे जहाँ मुझे पहुँचा देंगी वहीं मेरा कल्याण होगा ऐसी भावना के साथ गायत्री उपासना में संलग्न हूँ। अब यही एक मात्र मेरी जीवन साधना है।
(पं॰ जगन्नाथ प्रसाद शर्मा, जयपुर)
शास्त्रों में लिखा है कि मृत्यु के समय प्राणी को एक हजार बिच्छुओं के काटने जैसी पीड़ा होती हैं। देखा भी ऐसा गया है कि कितने ही मनुष्य ऐसे कष्ट साध्य रोगों में ग्रसित होकर प्राण छोड़ते हैं कि देखने वालों का कलेजा काँप जाता है। कई-कई दिन आवाज बन्द रहना, गले में कफ घड़घड़ाना, साँस भी पूरी तरह न ले सकना, मूर्छा, झकड़ना, हड़फूठन, दर्द, अश्रुपात दीनता एवं वेदना के साथ प्राण त्यागते हुए मनुष्य को देखकर यही अनुभव होता है कि स्वर्ग नरक सब यहीं है नरक के यमदूतों द्वारा दी जाने वाली पीड़ाओं सज्जनों का कुछ आभास देखने वालों को भी मिलता रहता है। मरने वाले पर जो बीतती है उसे वही जानता है। हमने अपनी आँखों से ऐसी मृत्युएं देखी हैं जिनमें हजार बिच्छू काटने की दुख होने वाली बात सत्य प्रतीत होती है।
यह निश्चित है कि दुःखों कारण अकर्म ही है। सत्कर्म करने वाला मनुष्य इस लोक या परलोक में कोई कष्ट नहीं पाता, मृत्यु के समय भी उसे कोई पीड़ा नहीं होती। कितने ही सत्पुरुष इस प्रकार प्राण त्यागते हैं जैसे हाथी के गले में पड़ी हुई फूलों की माला टूट पड़े तो हाथी को पता तक नहीं चलता है कि वह माला कब टूट पड़ी। माया मोह ग्रस्त, दुरात्मा मनुष्य बहुधा सत्य के समय असहनीय पीड़ा सहते हैं।
हमारे परिवार-नेता श्री पं॰ हरिसहाय जी की मृत्यु पिछले मई मास में ही हुई है। रात को भोजन करके सोये, प्रातःकाल उठने पर उन्हें कुछ कमजोरी सी अनुभव हुई। साधारण अवस्था में उन्हें भान हुआ कि अब शीघ्र ही उनकी अन्तिम यात्रा होने वाली है। घर के लोगों को बुला कर उनने कहा कि बस अब डेढ़ घण्टे मैं और रहूँगा। घर के लोगों को इस बात पर विश्वास न हुआ कि यह कह क्या रहे हैं। उन्होंने फिर समझाया कि मैं असत्य नहीं कहता। जो बात अवश्यंभावी है वही कह रहा हूँ। वे डेढ़ घंटे सदुपदेश देते रहे और भगवान का नाम उच्चारण करते रहे। बोलते, बात करते, ठीक समय पर उनके प्राण पखेरू उड़ गये।
मृत्यु से कुछ ही क्षण पूर्व उन्होंने बताया कि देखो वह विमान लेने आ गया। वह विमान घर के किसी दूसरे को न दीखा तो वे चुप हो गये और कहा यह तुम लोगों को नहीं दीखेगा। हमारे गाँव में एक बड़ी हरिभक्त महिला है उसे अपने घर से ही ठीक समय पर वह दिव्य विमान जाता हुआ दिखाई दिया साधारणतः मृत्यु के समय बड़ी भयंकर और अशान्त वातावरण हो जाता है पर न उनकी मृत्यु के समय ऐसा वातावरण न था। ऐसी शान्तिमयी, दिव्य धारा बह रही थी मानों इस स्थल पर कोई देव पुरुष विराजमान हों।
श्री हरिसहाय जी पृथ्वी के देवता थे। उन्हें सच्चे अर्थों में भूसुर कह सकते हैं। अपने पूरे परिवार की उन्होंने ऐसी रक्षा उन्नति और सेवा की मानो घर पर ही उसकी आत्म साधना की तपोभूमि हो। उन्हें सफल गृहस्थ-योगी कहा जा सकता है। प्रातःकाल तीन बजे उठकर गायत्री का जप करने लग जाना उनका नित्य नियम था। वे अक्सर कहा करते थे कि गायत्री पर श्रद्धा करने वाले मनुष्य की पवित्र आत्मा हो जाती है, और उसके सब कार्य यज्ञमय होते हैं। मैं इस छोटे से परिवार को ईश्वर की अमानत समझ कर वैसी ही उच्च भावना से सेवारत रहता हूँ जैसे कि योगी अपनी साधना में लगे रहते हैं। यह शिक्षा और भावना गायत्री माता ने मेरे हृदय में प्रेरित की है।
एक दिन सब को मरना है इसलिए मृत्यु की पीड़ा से बचने के लिए हमें स्वर्गीय आत्मा का प्रत्यक्ष उदाहरण अधिक उपयुक्त लगता है। महा कल्याण करणी गायत्री उपासना में आत्मा को श्रद्धा पूर्वक लगाये रहना और शरीर को कर्तव्य धर्म में निरत रखना यह दो कार्यक्रम ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर हम सब अपनी अन्तिम यात्रा को कष्ट रहित बना सकते हैं। मैंने इसी मार्ग को पकड़े रहने का निश्चय किया है। पाठक बन्धुओं से भी ऐसा ही करने की मेरी प्रार्थना है।
- अन्य उपासना चाहे न करे, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाना है। साँसारिक और परि लौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
-शौनक ऋषि
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-नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री ही है। उससे उत्तम वस्तु स्वर्ग और पृथ्वी पर कोई नहीं है। गायत्री का ज्ञाता निस्संदेह स्वर्ग को प्राप्त करता है
-शंख स्मृति
(श्री धर्मपाल सिंह जी, कासिमपुर)
मेरी बुआ जी अशिक्षित थीं, पर वे नियमित रूप संध्या करती थीं। फूफा जी ने एक 2 शब्द करके उन्हें सब मंत्र याद कराये थे। बुआ जी को इस प्रकार संध्या करते देखकर मेरे मन में बड़ा उत्साह हुआ। उन दिनों 10-11 वर्ष का ही था। संध्या सिखाने की बुआ जी से प्रार्थना की तो उनने गायत्री मंत्र सिखा दिया और कहा-यही मंत्र सबसे बड़ा है, तुम अभी इसी को जपा करो। बड़े होने पर सारी संध्या याद करना।
जैसी धार्मिक बुआ जी थी वैसे ही फूफा जी थे। विद्याध्ययन के लिए मुझे उनके यहाँ रहने का अवसर मिला। उनके विचार और कार्य इतने उच्च कोटि के थे कि उनसे लाभ उठाने के लिए अनेकों व्यक्ति हर समय उनके पास घिरे रहते थे। मुझे भी उनके द्वारा जो विचार और संस्कार प्राप्त हुए उन्हीं के कारण आध्यात्मिकता की ओर मेरी प्रवृत्ति बढ़ी।
पढ़ाई समाप्त करके सरकारी नौकरी में आया। गायत्री मेरे साधन का केन्द्र-बिन्दु रहा। उसी की कृपा से स्वाध्याय और सत्संग के अलभ्य अवसर प्राप्त होते रहे। सत्पुरुषों की ऐसी अहैतु की कृपा उपलब्ध हुई कि मेरी आत्मिक यात्रा आगे ही बढ़ती चली।
आचार्य जी के आदेशानुसार 24 लक्ष जप का आरम्भ किया, एक समय भोजन को व्रत लेकर संयम नियम के साथ वह उपासना चलने लगी। गंगा की बड़ी नहर के किनारे माता का जप करने में बड़ा आनन्द अनुभव होता।
इस अभियान साधना के बीच अचानक दिसम्बर के अन्त और जनवरी के आरम्भिक सप्ताहों में एक अद्भुत घटना घटी। शरीर यकायक दुर्बल हो गया। हाथ पाँचों की उंगलियों से ठंडी फुहार निकलना आरम्भ हो गई। देह में शिथिलता आ गई और कुछ दिव्य अलौकिकता का अनुभव होने लगा। शरीर, इन्द्रिय मन, बुद्धि में एक विशेष प्रकार की चेतनता का प्रकाश मिलता था। बुद्धि में सतोगुण के प्राबल्य से चैतन्य आत्मा का प्रकाश अधिक बढ़ रहा था। बुद्धि के स्वच्छता से अनेक आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों का अनुभव आन्तरिक स्फुरण से ही होने लगा। सर्वत्र सब कुछ प्रभु ही प्रभु ऐसी विराट पुरुष की झाँकी तीव्र भावना से दिन में, रात्रि में, कई घंटों को हो जाती थी। इन सब अनुभवों ने मुझे भविष्य में निश्चित और निर्मल रहने का पाठ भली प्रकार पढ़ा दिया।
आत्मा में दैवी प्रकाश बढ़ने का अनुभव बिल्कुल प्रत्यक्ष रूप से हो चुका है अब मैं सब कामनाएं त्यागकर आनन्दकन्द की प्राप्ति के लिए गायत्री द्वारा चित्त शुद्ध करके अपनी मूक वाणी में हर समय प्रार्थना करता हूँ और शरीर को कर्त्तव्य धर्म में लगाये रहता हूँ। माता मुझे पार करेंगी इस बात में अब किसी प्रकार का संदेह नहीं रह गया है। गायत्री के भक्त सदा से पार होते आये हैं, विश्वास है कि माता मुझे भी डूबने न देगी।
(पं॰ सूर्यदेव शर्मा वानप्रस्थी, मानिकपुर)
जब मैं 46 की अवस्था में पहुँचा तब मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मेरे पूर्वज लोग 45 से 50 वर्ष की आयु में ही स्वर्ग वासी हो गये हैं, अब मुझे भी लगभग उसी आयु में इस संसार को त्यागना पड़ेगा। मेरे पिता जी पूर्व में मुझ से कहते थे कि जो ब्राह्मण संध्या गायत्री से वंचित रहता है वह शूद्र के तुल्य होता है। इससे मैं प्रथम की साध्यों पालन तथा गायत्री 108 बार जपा करता था परन्तु इस विचार धारा में पड़ने से मेरा चित्त इस तरफ विशेष रूप से झुका। ग्रन्थावलोकन करने से भी गायत्री देवी की महिमा बहुत बड़ी प्रतीत हुई। एक सुदिन निश्चित कर मैंने प्रथमतः पूर्वार्जित पाप का प्रायश्चित विधानोक्त किया। शास्त्रों में यह विधान आया है कि सवा लाख गायत्री जपने तथा हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन कराने से इस जन्म के पातक उपपातक तथा महापातक नष्ट हो जाते हैं।
इन सब बातों को समझबूझ कर मैं नियमित से रूप किसी माह में तीन हजार प्रति दिवस तथा किसी माह में चार हजार प्रति दिवस जप करना आरम्भ कर दिया। उस समय मैं प्रचुर कष्टों से वेष्टित था कतिपय ग्रामीण सज्जन तथा और लोग मेरा अनिष्ट करने पर दिलोजान से उतारू थे। परन्तु इसकी उपासना करने से दिनों दिन उपासना करके वे लोग स्वयं ही शान्त हो गये तथा उन लोगों की यह विचार धारा मेरे प्रति प्रेम में परिणित हो गई, मुझे प्रतीत हुआ कि मेरी सब बुराइयाँ गायत्री देवी की कृपा से दूर हो गयी। जो कुछ भी जप मैंने किया सो सब निष्काम भाव से ही किया सकाम भाव से नहीं। सकाम भाव में साधना करने से साधकों को निश्चित पदार्थ ही मिलता है न कि दुष्प्राप्य वस्तु।
अधुना में वानप्रस्थ आश्रम में हूँ गायत्री उपासना के कुछ ही दिनों के पश्चात् मेरी बुद्धि और स्वभाव में परिवर्तन हो गया जिससे मेरे हर्ष की सीमा न रही। धन्य गायत्री माता की कृपा उन्हीं की कृपा से मेरे उद्धार होने की सम्भावना है। सात्विक आचार विचार तथा आहार व्यवहार से साधकों को विशेष लाभ होने की आशा है मुझे भी ऐसा ही हुआ।
पहले मैं गृहस्थ आश्रम में था। तो खटाई, मिठाई, तेल नमक छोड़ा। आमवाद, गठिया होने पर वैद्यों ने राय दी तो थोड़ा सा सैन्धानमक लो। 11 वर्ष के बाद खाना शुरू किया, मगर जब मैं गृहस्थ आश्रम छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम में आया तो तरकारी में मसाला और पकवान खाना छोड़ दिया उबली हुई तरकारी और भात रोटी खाने लगा। मसाला छोड़ने से मुझे गर्मी की कमी मालूम हुई दूसरे मन भी स्थिर हो गया। 5 वर्ष पकवान भी नहीं खाया। बगैर मसाला पड़ी तरकारी उसी जी ही खाता हूँ। गायत्री उपासना और सात्विक भोजन के फल स्वरूप में आमवात गठिया रोग से भी मुक्त हो गया और आजकल पूर्ण स्वास्थ्य और सुखी जीवन व्यतीत करता हूँ। इस समय वानप्रस्थ में समय व्यतीत कर रहा हूँ।
(डॉक्टर भगवानदास जी, हटा)
गायत्री उपासना में मेरी बहुत दिनों से रुचि है। निर्धारित विधान के साथ मैं उस महामंत्र की आराधना करता हूँ। मित्र नित्य नियमित आराधना के अतिरिक्त नव रात्रियों में 24 हजार के लघु अनुष्ठान किया करता हूँ।
इस साधना के फलस्वरूप मेरे स्वभाव में आकाश-पाताल का अन्तर हुआ है। जो बुराइयाँ पहले मुझ में थीं, वे अब धीरे-धीरे करके सब समाप्त हो गई हैं और ऐसे नये गुणों का आविर्भाव हुआ है जिनसे मुझे स्वयं हार्दिक प्रसन्नता है और मेरे शुभ चिन्तक उन्हें देखकर फूले नहीं समाते।
पिछली बार जब मेरा अनुष्ठान चल रहा था तब आर्थिक गड़बड़ी के कारण कुछ अड़चन आ रही थी। मैं चाहता था कि अनुष्ठान के अन्त में एक अच्छा समारोह ब्रह्म-भोज दान, एवं गायत्री साहित्य का प्रसाद वितरण करूं। पर आर्थिक स्थिति अनुकूल न थी, जितना खर्च करना चाहता था उतने की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी।
इसी चिन्ता में बैठा हुआ था कि मेरे एक बुजुर्ग मित्र गोविंदराम जी आये और चिन्ता का कारण पूछने लगे। मैंने सब बात कह दी। उनने गम्भीर होकर कहा तुम चिन्ता मत करो। माता के लिए जो कोई सच्चे हृदय से कुछ खर्च करना चाहता है, उसकी वे पूर्ति कर देती हैं। तुम अपना कर्तव्य उत्साहपूर्वक करते आओ कोई काम रुका न रहेगा।
अनुष्ठान पूर्ति में केवल तीन दिन शेष रह गये थे। कुछ उपाय सूझ न पड़ रहा था, अकस्मात ऐसा हुआ कि कई चिन्ताजनक रोगों के रोगियों की चिकित्सा के लिए बुलावे आये। दिन भर दौड़-धूप करनी पड़ी रात को 2 ॥ बजे उनसे छुटकारा मिला। पर चिकित्सा में आशाजनक सफलता मिली। फलस्वरूप मुझे एक दिन में ही 90) प्राप्त हुए, शेष जो कमी थी वह भी पूरी हो गई और इच्छानुकूल उत्साह के साथ अनुष्ठान यह पूर्ति का दान पुण्य किया।
तब से माता के चरणों श्रद्धाँजलि चढ़ाने में मुझे बड़ा उत्साह रहता है। जितना मैं इस मार्ग में खर्च कर देता हूँ यह आगे माता के द्वारा निश्चित रूप से पूरा हो जाता है। अपने साधना काल में एक बार मुझे एक बार अर्ध निद्रित अवस्था में माता का साक्षात्कार भी हुआ वे मौलवी साड़ी पहने अत्यंत दिव्य स्वरूप थीं, हाथ में कुछ लिए हुए मुझे दर्शन दिया। मैं उनसे नत मस्तक दर्शन होकर कुछ प्रश्न कर रहा था। जिसे सुनकर काकाजी ने मुझे जगा दिया। जगाने पर मुझे बहुत अफसोस हुआ न जाने माता क्या कह रही थी मैं उसे सुन न पाया।
एक बार मेरे प्रेमी पं॰ घनश्याम जी पाण्डे ने सवा लाख का अनुष्ठान किया उनने स्वप्न में देखा कि माता गायत्री हंस पर सवार होकर मेरे साधना गृह में पदार्पण कर रही हैं। समय 2 पर जो माता की कृपा का परिचय प्राप्त होता रहता है उससे मेरी श्रद्धा निरन्तर बढ़ रही है।
(श्री रामचन्द्र जी महेन्द्रिकर, हैदराबाद)
आत्मकल्याण के साधक को उसकी प्राप्ति के मार्ग में सब से अधिक रोड़ा है तो यह काम है। काम विजय के बिना आत्म साक्षात्कार सम्भव नहीं हो सकता। काम को वश कर सर्वोत्तम दृष्टि प्राप्त करने के लिये अनेक साधन हैं। पर उन सब साधकों में गायत्री सर्वश्रेष्ठ है।
गायत्री की उपासना के प्रथम रूप में मातृरूप है, जिसमें सभी दिव्यताएं मौजूद हैं, करने पर अल्प समय में ही सब स्त्रियों में मातृभाव उत्पन्न होने लग जाता है जिससे कर्मरूपी शत्रु का दमन और सर्वात्म भाव का मार्ग खुल जाता है ।
अब इस मार्ग में प्रगति शीघ्र होने में बाधा नहीं रहती। धीरे-धीरे साधक की दृष्टि विशाल होने लगती है। गायत्री माता का साक्षात्कार केवल स्त्रियों में ही नहीं अपितु प्राणी मात्र में होने लगता है। सब में उसको उसकी अनुभूति होने लगती है। मानवता का ध्येय साध्य होने में गायत्री उपासना ही मेरे विचार में सर्वश्रेष्ठ है।
नित्य प्रातः और सायं संध्या-समय एकान्त में मन एकाग्र कर गायत्री माता के रूप में स्थूल रूप से ध्यान करें। उसमें सत्चित् और आनन्द का आरोप करें। उसकी सर्व व्यापकता, सर्व शक्ति मानत्व का अनुभव कर ध्यान करें। सभी स्त्रियों को गायत्री माता के रूप में देखें। उनके शरीर, मन और बुद्धि का प्रकाश गायत्री माँ ही है। सो विचार दृढ़ करता जाए। इस प्रकार धीरे धीरे पर तीव्र अभ्यास से दृष्टि विशाल होती है। बुद्धि में प्रकाश की प्राप्ति है। ईर्ष्या, द्वेष, वैरत्व हिंसा का समूल उच्छेद होता है। सब चराचर में उसी ‘माँ’ को दिव्य झाँकी होने लगती है।
अन्य साधनों से भी यह लाभ हो सकता है, परन्तु जितना शीघ्र कामवासना का त्याग गायत्री साधना से होता है, अन्य साधनों से नहीं होता यह मेरा विश्वास है।
अतः जो अधिक काम वासना का स्थान शीघ्र करना चाहता हो वह गायत्री की साधना करे तो वह अपना ध्येय शीघ्र प्राप्त कर लेगा। यह पंक्तियाँ में किसी पढ़े सुने आधार पर नहीं कहता वरन् अपनी गायत्री उपासना में अनुभव के आधार पर उपलब्ध हुए सुदृढ़ विश्वास को प्रकट कर रहा हूँ।
- ब्रह्म आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैं, वह ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं। गायत्री से रहित व्यक्ति शूद्र से भी अपवित्र है।
-भारद्वाज
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- मन्दगति, कुमार्गगामी और अस्थिर मति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं। फिर सद्गति होना निश्चित है जो पवित्रता स्थिरतापूर्वक सावित्री की उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।
-वशिष्ठ
(श्री गिरीशदेव वर्मा, बहरायच)
जब मैं पाँच वर्ष का था तभी पिता जी ने मुझे गायत्री शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। वे जहाँ संध्या करते थे तो मुझे पास बिठा लेते थे। अयोध्या ले जाकर उन्होंने मुझे एक महात्मा से विधिवत् मंत्र भी दिलवाया था। वे सब बातें मुझे अब भली प्रकार याद हैं।
समय बीता। गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया, कुछ दिन यों ही बीत गये। फिर दैवयोग से अपने ही एक ऐसे साथी सत्संग प्राप्त हो गया गृहस्थ होते हुए भी महात्मा तथा योगी थे। चार साल उनके साथ रहा। उनके सत्संग से आध्यात्मिक प्रेम जागृत हुआ। स्वाध्याय और साधना में रुचि बढ़ी। समय के कुचक्र से हम दोनों बिछुड़ गये उनकी बदली दूसरी जगह हो गई मेरी बदली दूसरी जगह।
परिस्थितियों के झंझावान जीवन नैया को बहुत थपेड़े दिये। और अन्त में सबसे बड़ा धक्का पुत्र शोक लगा। मेरा एक 18 वर्ष का पुत्र था जो बड़ा होनहार कुशल बुद्धि तथा योगी था। वह यक्ष्मा का शिकार हो गया। ऐसे सुशील युवक पुत्र के चल बसने से मेरा मन शोकाकुल रहने लगा, चित्त में निशदिन अशान्ति रहने लगी।
उन्हीं दिनों हमारे नगर में एक ताँत्रिक स्वामी जी आये उनकी काफी ख्याती थी। उन्होंने मुझे गायत्री जप का उपदेश दिया। उन्हीं दिनों गायत्री महाविज्ञान पुस्तक प्राप्त हुई। उसे पढ़कर अन्धकार में विद्युत प्रकाश चमक उठा। तब से मैं श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना कर रहा हूँ। अभियान का प्राण यज्ञ विधिपूर्वक रहा है।
आन्तरिक शान्ति और सात्विकता की वृद्धि के रूप में माता की कृपा का प्रत्यक्ष परिचय मुझे मिल रहा है। कई बार मुझे अनुभव हुए जिनसे यह प्रकट होता है कि माता का मंगलमय हाथ मेरे मस्तक पर रखा हुआ है।
मेरे दफ्तर का एक कर्मचारी कुछ वर्षों कागजों में गोलमाल करके गबन करता रहा। उसने दो एक महीने मेरे आधीन भी काम किया था। अन्त में वह पकड़ा गया और जिन-जिन लोगों के आधीन उसने काम किया था वे लोग भी अपराधी समझे जाने लगे, गोकि उस गबन से किसी अन्य का सम्बन्ध नहीं था। अनुष्ठान आरम्भ करने के बाद ऐसा सुनाई पड़ा कि मेरे ऊपर भी अभियोग चलेगा। चिन्ता बढ़ी किन्तु मैंने माता से अपना दुःख निवेदन किया।
एक दिन मैंने स्वप्न देखा कि एक विशालकाय मनुष्य मेरी हत्या करने आ रहा है। उसके हाथ में एक छुरा भी है। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं कि कर्त्तव्य विमूढ़ हो गया। इतने में एक दिव्य रूप वाली देवी आई और उस मनुष्य को पटककर पैर के दवा लिया, फिर मुझसे कहा- निर्भय चले जाओ। अब यह कुछ नहीं कर सकता। इतने में आँख खुल गई। इस स्वप्न का मैंने यह अर्थ लगाया कि माता ने उस अभियोग से मेरी रक्षा कर दी है। चूँकि अभी मामला विचाराधीन था अतएव यह बात मैंने किसी से प्रकट नहीं की। कई महीने बाद जब यह निश्चय हो गया कि मेरे ऊपर अभियोग नहीं चलेगा तब आज इस बात को लिख रहा हूँ। इस घटना के बाद माता के प्रति मेरी श्रद्धा अति बढ़ गई। मेरा दृढ़ विश्वास हो गया कि स्वल्प श्रम में फलदायिनी साधना गायत्री से बढ़कर और कोई नहीं है।
निर्भयता दिन दिन बढ़ रही है। ऐसा लगता है कि ऐसी शक्ति मेरे चारों ओर रक्षात्मक घेरा डाले हुए है। प्रातःकाल तीन बजे उठकर नदी तट के ऊँचे टीले पर साधना करने के लिए चल देता हूँ। रास्ते में कब्रिस्तान, ऊंचे-ऊंचे टीले, झाड़ी, साँप, बिच्छू, जंगली जानवर आदि अनेक भय के कारण हैं पर मैं उस भयानक निर्जन मार्ग पर पूर्ण निर्भयता के साथ चला जाता हूँ।
अभी मेरी साधना का शैशव है। मगर मुझे इतने में ही अनेकों लाभ हुए हैं। मन की चंचलता कम होकर विषयों में अरुचि उत्पन्न हो रही है। दैनिक जीवन आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं कि अनेक बातें प्रतिकूल होते हुए भी अनुकूल हो जाती हैं। मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे मेरी श्रद्धा बढ़ेगी वैसे-वैसे कल्याण का मार्ग अधिक प्रशस्त होता जायगा।
(पं॰ राधेमोहन मिश्र, बहरायव)
मेरी प्रवृत्ति अपनी बाल्यावस्था से ही आध्यात्मवाद की ओर रही। मुझे ऐसे मित्र तथा मार्ग प्रदर्शन मिलते गये जिससे और सहायता मिलती गयी। घर में अपने वयोवृद्धों को गुरुमंत्र जपते देखा करता, जब मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हुआ मुझे गायत्री मंत्र दिया गया, मैं उसे अपना गुरुमंत्र जानकर यदा-कदा जपा करता, जब कभी रात्रि में कहीं जाना पड़ता अथवा संकट में पड़ जाता तो भयभीत अवस्था में गायत्री मंत्र की शरण में जाने से मुझे वह शक्ति अनुभव होता और भय दूर हो जाता था। धीरे-धीरे मंत्र पर दृढ़ विश्वास होने लगा।
मैं एक साधारण मनुष्य हूँ, इस मंत्र के जप के प्रभाव से और गुरुदेव के आशीर्वाद से इस संकट काल एवं चरम सीमा पर पहुँची हुई महँगाई के समय में न जाने कहाँ से व्यय पूरा हो रहा है मुझे स्वयं आश्चर्य होता है। दो बार जप करने के लिये माला उठाते ही उसे बिखरा हुआ पाया। यह मेरे लिये खतरे की घण्टी थी। मैं दो बार कठिन रोग से पीड़ित हुआ। मुझे अपनी बीमारी में जरा भी भय मालूम नहीं हुआ। और आन्तरिक स्फूर्ति का अनुभव होता था। मैं मन में ही गायत्री मंत्र का जप किया करता, धीरे-धीरे रोग से छुटकारा मिल गया। अब तो श्री आचार्य जी द्वारा खोज पूर्ण लिखित गायत्री महाविज्ञान नामक पुस्तक के आधार पर गायत्री साधना कर रहा हूँ इसके द्वारा मुझे पूर्ण सहायता मिल रही है। मेरे एक मित्र को गायत्री मंत्र के सवा लक्ष के अनुष्ठान से पुत्र रत्न का लाभ हुआ और एक दूसरे मित्र ने गायत्री माता की शरण में जाने से मृत्यु के मुख से अपने पुत्र को बचा लिया।
(श्री हरिदयाल जी पटवारी, गोहाड़)
धार्मिक प्रवृत्ति मुझे अपने माता-पिता से विरासत में मिली। वे दोनों ही बड़े धार्मिक, साधु सेवी, चरित्रवान और प्रभु परायण थे। उनकी छाप मेरे ऊपर पड़ी। सत्साहित्य के स्वाध्याय और सत्पुरुषों के सत्संग से यह प्रवृत्ति और भी बढ़ी। मैं आत्मकल्याण का मार्ग प्यासे चातक की तरह ढूँढ़ने लगा। अनेक सूत्रों से मुझे एक ही उपाय दृष्टिगोचर हुआ -गायत्री उपासना। अखण्ड ज्योति के प्रकाश में मुझे वह मार्ग भी दिखाई दिया जिस पर चलकर पिता से उस दस गुनी ममता रखने वाली माता की आनन्दमयी गोद प्राप्त हो सकती है।
एक लम्बे अर्से से मैं गायत्री उपासना में प्रवृत्त हूँ। मुझे हर घड़ी यह अनुभव होता रहता है कि कोई दिव्य शक्ति शरीर को पार करती हुई अन्तः करण में प्रवेश कर रही है। कई बार स्वप्न में और कई बार अर्ध जागृत अवस्था में माता का साक्षात्कार हुआ है। उन क्षणों के आनन्द को याद करके आज भी देह रोमाँचित हो जाती है।
सभी कामनाएं और लालसाएं शान्त हो चूक हैं। इस वृद्धावस्था में केवल एक मात्र ही इच्छा है जन्म मरण की फाँसी पर बार-बार गला न फँसाना पड़े। भव सागर में बार-बार न डूबना उतरना पड़े इसी उद्देश्य के लिए माता का अंचल पकड़े हुए हूँ। गुरुदेव का आश्वासन है कि जब तक यह लक्ष पूरा न हो आएगा तब तक शरीर समाप्त न होगा।
इस साधना काल में दो बार मेरे प्राण अपनी यात्रा पूरी करने को तैयार हुए हैं, पर किसी गुप्त शक्ति द्वारा वापिस लौटा लिए गये हैं। मैं अपना प्राण ब्रह्म रंध्र में होकर ले जाना चाहता हूँ ताकि जीव ऊर्ध्व गति को प्राप्त हो, पर वह स्थिति प्राप्त नहीं हो पाई है, इसलिए शेष कमी को पूरी करने के लिए प्राण धारण किये रहना उचित प्रतीत होता है और इस पूर्ति तक के लिए मेरे गुप्त सहायक बार-बार मेरी यात्रा को रोक भी देते हैं।
गत वर्ष सितम्बर मास में मैंने मथुरा जाने का मिश्रण किया। ता॰ 17 को जाना था पर ता॰ 15 को अचानक ऐसा आकस्मिक शारीरिक आघात लगा कि लेने के देने पड़ गये। पहले दिल की धड़कन बढ़ी, फिर तीव्र ज्वर, फिर बेहोशी इठन, वेदना, का कोई ठिकाना न रहा। पसीने से सारा शरीर लथपथ हो गया। वैद्य और डॉक्टर बुलाये गये। स्थिति देख कर सभी गम्भीर हो रहे थे। मुझे स्पष्ट दीखने लगा कि अब बचना मुश्किल है। चारपाई से उठाकर जमीन पर ले लिया गया मैंने टूटे-फूटे अपने शब्दों तथा संकेतों की सहायता से गायत्री का अपना पूजा चित्र मँगाया। उसे श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और अन्तिम विदा माँगी। प्राण वायु सारे शरीर में से एकत्रित होकर मस्तिष्क के मध्य में एकत्रित हो गई। परन्तु कई बड़े-बड़े झटके लगने पर भी वह त्रिकुटी से आगे नहीं बढ़ सकी कुछ देर अचेतन अवस्था में इसी प्रकार पड़ा रहा। फिर देखा कि जीव वापिस लौट रहा है और जिस शरीर में से खिच गया है उसमें पुनः वापिस लौट रहा है। आँखें खुली तो आकाश में गुरुदेव की प्रतिमा उड़ रही थी।
धीरे-धीरे अच्छा हो गया। अच्छा होकर मथुरा गया। मालूम हुआ कि अपूर्णता को पूर्ण करने में दूसरा जन्म लेना पड़ता और बहुत समय लग इस झंझट भरी अनिश्चितता से बचाने के लिए मुझे रोक लिया गया है। प्रभु की लीला अपार है उनकी कृपा की महिमा किस प्रकार कही जाय।
इसी बार फिर भी उपरोक्त आघात से मिलता शारीरिक आघात लगा। 15 लंघन हुए पर इस बार पहले की अपेक्षा अधिक शान्ति रही। दो बार जीवन बच गया। जो कमी थी वह सन्तोषजनक रीति से पूरी होती जा रही है बताये हम साधनों पर चलते हुए मैं ब्रह्म द्वार को खोल सकूँगा और जीवन को सार्थक कर सकूँगा ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति को माता तार सकती है तो जो अधिक श्रद्धा और अधिक तपस्या करने वाले हैं वे भी अवश्य कर सकते हैं ऐसा निश्चित है।
(श्री अशफीलाल जी मुख्तार, बिजनौर)
गायत्री ईश्वर की शक्ति है॥ ब्रह्म निर्विकार, निरपेक्ष, निर्गुण निराकार है। उसका जो कुछ वैभव विस्तार परिलक्षित होता है वह ईश्वरीय प्रकृति, माया एवं शक्ति के कारण ही है शास्त्रों में कहा गया है कि शक्ति के बिना शिव भी शव अर्थात् मृतक हो जाता है। जितना भी पदार्थ, जितना भी चैतन्य दृष्टि गोचर होता है उस सबके मूल में महामाया -ब्राह्मी शक्ति ही काम कर रही है। उस शक्ति को ही आध्यात्मिक भाषा में गायत्री कहते हैं।
इस महा शक्ति से संपर्क स्थापित करने के दो मार्ग है (1) स्थूल बल द्वारा (2) सूक्ष्म बल द्वारा। स्थूल बल के अंतर्गत बुद्धि, परिश्रम, धन, पदार्थ, विज्ञान, यंत्र आदि हैं इनके द्वारा, नित्य प्रति के जीवन में अनेकों कार्यों का आयोजन किया जाता है, और उस प्रयत्न के फलस्वरूप अनेक प्रयोजनों को पूरा किया जाता है। यह स्थूल प्रयोग नित्य प्रति मानव जीवन में व्यवहत होता है। दूसरा मार्ग सूक्ष्म बल का है। चैतन्य जीवात्मा, अन्तःकरण चतुष्टय, सूक्ष्म शरीर, पंच कोप, षट्चक्र, ग्रन्थि गुच्छक आदि अवश्य आंतरिक शक्तियों को एक विशेष प्रयुक्त किया जाता है कि उस महामाया सूक्ष्म प्रकृति सत्ता से सम्बन्ध स्थापित हो सके। इस प्रकार जब सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तो अनेक उपयोगी प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं।
महामाया अनन्त वैभवों और ऐश्वर्यों की भण्डार है। इतनी दयालु है कि अपने ऐश्वर्य का द्वार हर एक के लिए सदैव खुला रखती है। प्रश्न केवल पात्रता का है। जो अपने में जितनी पात्रता उत्पन्न कर लेता है वह उतना ही लाभ उठा सकता है। समुद्र में अतुलित जल राशि भरी पड़ी है पर उसमें से उतना ही जल लिया जा सकता है जितना भरने को अपने पास पात्र हो। जिसके हाथ में गिलास है वह गिलास भर लेगा, घड़े वाले का घड़ा भर जायगा, मेघ मालाएं लाखों मन पानी उसमें से भर लेंगी। समुद्र का द्वार सबके लिए खुला है, पर मिलता उतना ही है जितना कि पात्र है।
संसार में स्थूल बल की पात्रता जितनी होती है उतना ही कमाई कर सकेगा जितना उसके शरीर में बल होगा। व्यापारी उतना ही बड़ा व्यापार कर सकेगा। जितनी उसके पास पूँजी होगी। मशीन जितनी बड़ी होगी उसी अनुपात से काम करेगी। बैल और भैंसे के मूल्य में उसकी योग्यता के आधार पर फर्क रहता है। पात्रता की कीमत पर संसार में हर सजीव या निर्जीव वस्तु का मूल्याँकन किया जाता है और उसी पर प्रतिफल मिलता है। अयोग्य या अपात्र वस्तु एवं प्राणी को सदैव उपेक्षित ही रहना पड़ता है।
पात्रता का यही नियम आध्यात्मिक जीवन में लागू होता है। अन्तः भूमि जितनी स्वस्थ होगी उतना ही महामाया के शक्ति स्रोतों से दिव्य तत्व प्राप्त करेगी। बीमार बालक, माता के कूचों में भरपूर दूध होते हुए भी उसका पान नहीं कर पाता। परन्तु स्वस्थ बालक उसे पीकर दिन-दिन हृष्ट-पुष्ट होता जाता है। माता दोनों बालकों को समान प्यार करती है पर उसके प्यार से लाभ उठाना तो पात्रता पर ही निर्भर है।
जैसे श्रम, धन, यंत्र, विज्ञान, बुद्धि आदि भौतिक साधनों से स्थूल सम्पत्ति कमाई जाती है। उसी प्रकार सूक्ष्म अन्तःकरण से भी महामाया प्रकृति के गुण अन्तःस्थल तक पहुँच कर वे लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं जो स्थूल प्रक्रिया द्वारा भी मिलना सम्भव नहीं। सदा की स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्ति अधिक होती है जो वस्तुएँ स्थूल पात्रता के प्रतिफल में मिलती है, सूक्ष्म पात्रता से उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं। इस तथ्य को हमारे पूर्वज भली प्रकार समझते थे, इसलिए उन्होंने दस मन लोहा इकट्ठा करने की अपेक्षा एक छटाँक सोना कमाना अधिक उपयुक्त समझा, स्थूल बल की अपेक्षा सूक्ष्म बल के सम्पादन की ओर अधिक ध्यान दिया। फलस्वरूप वे उन गुप्त योग्यताओं को प्राप्त कर सके जिनके कारण जगद्गुरु और चक्रवर्ती बनने का सुअवसर उन्हें मिल सका।
उपासना, आराधना, साधना ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ है जिनके द्वारा अन्तः चेतना में पात्रता उत्पन्न की जाती है, साधक जैसे-जैसे आन्तरिक बल एकत्रित करता जाता है वैसे ही वैसे उसके उस सूक्ष्म चुम्बक शक्ति का विकास होता है जो महामाया को अपनी ओर खींचती है, कृपा प्राप्त करती है और उसके अक्षय भण्डार से उपयुक्त वस्तुओं को उपलब्ध करती है दयालु माता है वह अपने पुत्रों को बहुत देने को तत्पर रहती है पर देती उन्हें ही है जो पात्र होते हैं अनधिकारी लोग बड़ी बड़ी लालसायें और कामनाएं करते हैं पर अपनी पात्रता बढ़ाने के लिए समुचित प्रयत्न नहीं करते। ऐसी दशा में वे बड़े-बड़े मनोरथ पूरे नहीं हो पाते जो साधना के तप में खरे उतरने वाले साधकों को ही उपलब्ध हो सकते हैं।
सभी सुख, शान्ति और समृद्धि चाहते हैं। स्थूल जगत में वह तीनों ही अस्थिर रहती हैं चिरस्थायी सम्पदाएं आत्मिक होती हैं दैवी सम्पदाएं कहते हैं। उन्हें प्राप्त करने लिए महामाया के भण्डार की चाबी अपनी ‘आन्तरिक पात्रता’ ही है। पात्रता के लिए ‘तप’ करना पड़ता यह तप ही उपासना के नाम से ही प्रसिद्ध है। मैं इस गायत्री उपासना को अपनी साँसारिक कमाई से अधिक महत्व देता हूँ ताकि मूल्यवान् लाभ प्राप्त किया जा सके। मैं वकील हूँ अपनी समस्त तर्क शक्ति के द्वारा जब सोचता हूँ कि मेरा वास्तविक लाभ किस में है तब यही समझ में आता है कि आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न करना ही सर्वोत्तम है। गायत्री का आश्रय लेकर वही मैं कर भी रहा हूँ।
(डॉक्टर -राजाराम शर्मा मार्थू)
गायत्री साक्षात् सरस्वती है। बुद्धि बढ़ाने का, स्मरण शक्ति को तीव्र करने का तथा विद्या के लिए अनेक साधन जुटा देने की उसमें विलक्षण शक्ति है। जो विद्यार्थी अपनी शिक्षा के साथ-साथ गायत्री की थोड़ी बहुत उपासना किया करते हैं उनकी उन्नति बड़े सन्तोष प्रद ढंग से होती चलती है। परीक्षा के दिनों में इस महामंत्र का थोड़ा साधना करना भी बड़ा अच्छा रहता है। इससे परीक्षार्थी को पिछला पढ़ा हुआ आसानी से याद हो जाता है और परीक्षा काल में चित्त शान्त रहने से प्रश्न पत्रों का तात्पर्य भली प्रकार समझने की सुविधा होती है। अक्सर विद्यार्थी लोग परीक्षा काल में उतावली, घबराहट और भय के कारण अपने मानसिक संतुलन को डाँवाडोल कर लेते है। फलस्वरूप अच्छी तैयारी होते हुए भी वैसे उत्तर नहीं लिख पाते जैसे कि लिखे जाने चाहिए। फेल होने का बहुधा यही कारण होता है।
जिन विद्यार्थियों को किसी भी प्रकार की कठिनाई हो उन्हें गायत्री की उपासना करनी चाहिए। क्योंकि यह विद्या का महान मंत्र है। इससे पढ़ाई सम्बन्धी अनेक कठिनाइयों का निवारण होता है। मस्तिष्क की कमजोरी, शरीर की अस्वस्थता, घरेलू विघ्न बाधाएं, आर्थिक अड़चन के कारण जिनकी शिक्षा सम्बन्धी उन्नति रुक रही हो वो विद्यार्थी सच्चे हृदय से वेदमाता की आराधना करें तो उनकी असुविधाएं दूर हो सकती हैं।
अपने परिवार के कुछ अनुभव पाठकों के सम्मुख उपस्थित करता हूँ। मेरी पुत्री सावित्री देवी ने गत वर्ष आयुर्वेद की परीक्षा की तैयारी की, फार्म भर दिया, फीस भेज दी। पर परीक्षा से कुछ ही दिन पूर्व वह टाइफ़ाइड से ऐसी बीमार हो गई कि घर के सब लोगों को बड़ी चिन्ता होने लगी। लड़की को अपनी बीमारी की उतनी चिन्ता न थी जितनी कि परीक्षा की। तीव्र ज्वर में पड़े 2 उसे परीक्षा की ही धुन लगी रहती। रोग और चिन्ता का दुहरा दबाव शरीर पर बुरे रूप से दिखाई देने लगा।
मैंने पुत्री को सलाह दी कि बेटी! मन ही मन गायत्री का जप ध्यान करो। माता की कृपा से बड़े 2 कठिन काम सरल हो जाते हैं। सावित्री जितनी कुशल बुद्धि, अध्ययन प्रिय, परिश्रमी और सद्गुण सम्पन्न है उतनी ही वह धार्मिक एवं श्रद्धालु भी है। मेरी सलाह को उसने उत्साह पूर्वक माना और रोग शय्या पर पड़े 2 ही मानसिक जप आरम्भ कर दिया। परिणाम बड़ा आशाजनक हुआ। बीमारी अपनी मियाद से पहले ही सुलझ गई। फिर भी कमजोरी बहुत अधिक थी। इसलिए हम लोग उसके परीक्षा देने के पक्ष में न थे। पर वह न मानी। उसे भीतर से ऐसा उत्साह उमड़ रहा था कि वह सब से विश्वास पूर्वक कहती कि न तो मेरे स्वास्थ पर कोई बुरा असर पड़ेगा और न मैं अनुत्तीर्ण हूँगी। उसने उसी दशा में परीक्षा दी और अच्छे नम्बरों से पास हुई।
ऐसी ही घटना मेरे पुत्र की है। चि॰ व्यास देव मैट्रिक की पढ़ाई के लिए आग्रह करता था। गाँव में प्राइमरी स्कूल है। दूर शहर में रहकर पढ़ाई में आर्थिक तथा अन्य कठिनाइयाँ थी। फिर भी उसकी आग्रह प्रबल थी। मैंने कहा-बेटा गायत्री माता से सुविधा माँगो वह तुम्हें मार्ग दिखायेगी, उसने एक अनुष्ठान किया और इलाहाबाद चल पड़ा उसकी पढ़ाई का सब प्रबन्ध आसानी से हो गया और वह अपना मनोरथ शीघ्र ही पूरा करने वाला है।
अपने बच्चों पर ही नहीं हमने अनेक बार ऐसे अवसर देखे हैं जब कि मन्द बुद्धि और निर्धन स्थिति के विद्यार्थी गायत्री की कृपा से विद्वान बन कर उन्नति की बनकर उन्नति की ओर अग्रसर हुए हैं।
(श्री जीवनलाल वर्मा, सरसई)
छोटे बालक, भावुक हृदय माता-पिता की आँखों के तारे होते हैं। जब पशु-पक्षी तक अपने बालकों को इतना प्यार करते हैं तो बुद्धिजीवी मनुष्यों में बढ़ी-चढ़ी ममता का होना स्वाभाविक ही है। विशेषतया जब कि कोई बालक अधिक सुन्दर, चंचल, बुद्धिमान और प्रेमी स्वभाव का होता है तब तो वह माता-पिता को ही नहीं पड़ोसियों तक के मन को हर लेता है।
अपने छोटे बालक मोहन में कुछ ऐसी विशेषताएं थीं कि वह देखने वालों के भी मन में बस जाता था। घर के सब लोग उसे खिलौने की तरह लिये फिरते थे। उसके जीवन के तीन वर्ष घर भर के लिए बड़ी ही प्रफुल्लता प्रदान करने वाले रहे।
ईश्वर की माया अपार है। तीन दिन वे निमोनिया ने उसके प्राण ले लिये। बोलता हुआ तोता हाथों से उड़ गया। जिसने सुना कलेजा पकड़ कर रह गया। बच्चे की माता की दशा तो पागलों जैसी हो गई। पुत्र शोक में वह ऐसी बीमार पड़ी कि कठिनाई से ही वह अच्छी हो सकी। इस बच्चे का सदमा इतना हुआ जितना किसी बड़ी आयु के कमाऊ आदमी के उठ जाने का भी नहीं होता।
सब जानते हैं कि जो मर गया वह लौटता नहीं। फिर भी मन बड़ा कच्चा होता है, उसकी आत्मा से ही किसी प्रकार भेंट हो, उसका स्वप्न में ही साक्षात्कार हो, उसके सूक्ष्म शरीर की ही किसी प्रकार झाँकी हो सके इस प्रकार के विचार मन में घूमने लगे। पर इसका उपाय मालूम न था। तलाश आरम्भ की। इसी खोज के सिलसिले में अखण्ड ज्योति से प्रकाशित एक छोटी पुस्तक मृत्यु से पीछे क्या होता है, इस सम्बन्ध की मिली। उससे नई बातें ज्ञात हुई। कई शंकाएं हुईं। उनके लिए अखंड ज्योति से पत्र व्यवहार हुआ, फिर मथुरा जाकर आचार्य जी के दर्शनों का लाभ लिया।
स्वर्गीय बालक को किसी भी रूप में पाने के लिए हम तरसते थे। यह पता चल जाता कि वह किसी पशु-पक्षी में जन्म है तो उसे लाने का जी जान से प्रयत्न करते। इतनी प्रबल हमारी ममता थी। आचार्य जी ने शोक मुक्त होने के उपदेश दिये और कुछ साधन बताये कि यदि वह बालक अभी जन्म ले चुका होगा तो पुनः आपके घर में लौट आयेगा। मैंने और पत्नी बड़े नियम संयम के साधन किये। दूसरे मेरी पत्नि ने स्वप्न में देखा कि मेरा मोहन बाहर से खेलता हुआ आया है और गोदी में चढ़ गया है। पत्नी ने जैसे ही उसे छाती से चिपटाना चाहा कि वह पेट में समा गया। उस स्वप्न के साढ़े नौ मास बाद दूसरा बालक जन्मा। यह बिल्कुल मोहन की आकृति का हुआ जैसे 2 उसकी आयु बढ़ी उसके गुण, स्वभाव, हाव भाव सब मृत बालक के से ही विकसित होने लगे, अब वह 5 वर्ष का है, इसका नाम भी मोहन ही रखा है क्योंकि हम सब का यह पूरा-पूरा विश्वास है कि मोहन की आत्मा ने ही दुबारा हमारे घर में फिर जन्म लिया है। जन्म भर तक दुख देने वाले विरह विछोह के कष्ट को हटाकर, खोई वस्तु को पुनः प्राप्त करा देने का श्रेय गायत्री माता को है, अथवा उनको है जिसने यह मार्ग हमें दिखाया। अन्धा जैसे अपनी नेत्र ज्योति पाकर प्रसन्न होता है वैसे ही हम अपने स्वर्गीय बालक को नये शरीर में पाकर प्रसन्न हो रहे हैं।
(श्री नैनूराम जी जानी, रोहेड़ा)
लगभग 15 वर्षों से गायत्री-माता पर मेरी साधारण श्रद्धा चली आ रही है। परन्तु अपान वायु की उर्ध्वता और विकृति के कारण कमर से ऊपर का भाग गरदन तक जकड़ा हुआ सा रहता था जिसके फलस्वरूप मैं अपनी गायत्री सम्बन्धी उपासना में प्रवृत्त नहीं हो सकता था। रोग की भयंकरता दिनों दिन बढ़ती गई यद्यपि मैं इसके निवारणार्थ कुछ व्यायाम, आसन इत्यादि किया करता था। यह रोग गत 20 सालों से चला आ रहा था और मुझे तो वह असाध्य ही मालूम पड़ता था। कई दिनों तक मुझे सूझे ज्वर में रहना पड़ता था। इस रोगोत्पत्ति के होते हुए भी मैं अपने जीवनोपयोगी सारे कार्य किया करता था। परन्तु वे सारे कार्य भार रूप मुझे प्रतीत होते थे। न तो मुझमें स्फूर्ति थी और न किसी प्रकार का उत्साह। इन सारी बातों ने मेरे मन में एक समस्या पैदा करदी थी।
लगभग तीन चार साल पहले की बात है कि जब मेरे मन में गायत्री के प्रति श्रद्धा के भाव बढ़ते गये तो इस शक्ति के सम्बन्ध में उचित ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा उत्तरोत्तर बढ़ती हुई दिखाई दी। यह निर्विकार सत्य है कि जहाँ चाह है वहाँ राह भी है। कुछ ही समय के बाद देवी की कृपा से ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका हाथ लग गई और उसमें गायत्री महा विज्ञान सम्बन्धी पुस्तकें प्रकाशित हो जाने की सूचना मिलने पर मैंने उन पुस्तकों को मँगवा कर मनन और चिन्तन द्वारा अध्ययन किया। इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होने पर मेरे भावों में काफी जाग्रति का प्रसार होने लगा। दृढ़ता के साथ नियमित उपासना करना तभी से प्रारम्भ कर दिया। परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण मनोवृत्ति को केन्द्रीभूत करने में बहुत कुछ कठिनाई होती थी। फिर भी मैंने अपनी उपासना का कार्य जारी ही रखा। इस प्रकार उपासना करते हुए कुछ ही महीनों के अन्दर गायत्री माता के प्रति मेरा प्रेम अधिकाधिक बढ़ता गया। साँसारिक वस्तुओं से मोह उठता गया। वैराग्य की भावनाएं काफी जाग्रत होने लगी। हर समय भगवती माता की ही धारणा बनी रहती थी-सोते-उठते बैठते। सच पूछा जावे तो मेरी दशा उन्मत्त की सी हो रही थी।
इस अवस्था में कुछ ही दिनों तक गोते लगाने के पश्चात् मेरे मन में एक दिन भगवती माता के दर्शन की प्रगाढ़ इच्छा उत्पन्न हुई। जिसके फलस्वरूप मेरी आँखों में से प्रेमश्रुधारा बहने लगी। मैं बैठा हुआ बहुत कुछ रो गया। इसी समय मैंने माता को हिम्मत बँधाते हुए अपने सम्मुख उपस्थित देखा।
दूसरा दिन हुआ। भोजन करने के पश्चात् जब मैं बैठा हुआ था। ध्यान तो मेरा भगवती माता की ओर ही रहता था। सो उस अवस्था में एकाग्रता बढ़ती गई। कटि के नीचे के भाग से कुछ शक्ति ऊपर उठती हुई अनुभव होने लगी। ज्यों-ज्यों एकाग्रता के कारण माता के दर्शन की भावनाएं प्रबल होती गई त्यों-त्यों वह शक्ति ब्रह्म-रंध्र में पहुँच कर एक बिजली की सी झलक में विलीन हो गई। उस क्षण मात्र के अलौकिक आनन्द का वर्णन करना मेरी पहुँच के बाहर है। उस अनुभूति के कारण मेरे अन्तःकरण में शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो गया। मन और बुद्धि में अनोखा ही परिवर्तन हो गया। ऐसा प्रतीत होता था मानों जीवन का काया-कल्प हो गया हो। देवी की कृपा से उस समय से रोग-मुक्ति होती गई और जीवन में आ गये उत्साह की तरंगें हिलोरें खा रही हैं।
मैं अपने उपरोक्त स्वानुभव से यह कहने में जरा भी संकोच नहीं रखता हूँ कि गायत्री के विद्युत प्रभाव से मन और बुद्धि को निर्मलता के कारण साधक में एक नया नैतिक बल प्राप्त होता है जो जीवनोर्त्सग के लिये वाँछनीय है।
(पं॰ राधेश्याम शर्मा पोस्टमास्टर, जबलपुर)
जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली तब से मेरा जीवन उत्तरोत्तर उन्नतिशील दृष्टिगोचर होता है। पहले की अपेक्षा मुझे अपने स्वभाव में पर्याप्त परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। क्रोध व मिथ्या भाषण से घृणा हो गई है। मेरा स्वतः मन बुरे विचारों की ओर तनिक नहीं जाता। आशाजनक परिवर्तन हो गया है।
मेरा अटल विश्वास है कि वेदमाता की शरण लेने वाला दुखी नहीं सकता। मनः शान्ति व ईश्वर प्राप्ति को सुगम मार्ग वेदमाता की शरण है। जो वेदमाता का आसरा रखे उसको ईश्वर प्राप्ति होती है यह निश्चित है। जीवन का महान उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति माता की शरण से भली-भाँति पूर्ण हो सकता है। प्रधान उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य संकट भी माता की कृपा से दूर होते हैं। मेरी अवस्था 27 वर्ष की है इतनी छोटी अवस्था में इतना प्रत्यक्ष मेरा अनुभव है कि जब से मैंने गायत्री साधना की, लाभ के अतिरिक्त हानि नहीं हुई।
जब से मैंने गायत्री माता की शरण ली, सबसे डॉक्टर वैद्य के लिये मुझे एक पाई औषधोपचार के लिये नहीं खर्चना पड़ा मामूली स्वास्थ्य जब बिगड़ा तो अपने आप ठीक हुआ। इसके पूर्व डाक्टरों के बिल इतने देने पड़ते थे कि कभी तो वेतन का चतुर्थांश उनको अर्पण करना पड़ता था व कभी कभी तो अर्ध वेतन तक की बाजी लग जाती थी। यही हाल मेरी पत्नी का था। एक अनुष्ठान सवा लक्ष का उन्होंने भी ज्यों ही किया त्यों ही प्रारम्भ करते ही बीमारियाँ रफ होने लगी और अनुष्ठान पूर्ण होते ही सब रोगों से मुक्ति मिल गई। और तब से वे भी पूर्ण रीति से आरोग्य हैं। कभी कभी अस्वस्थता हो भी तो अपने आप ठीक होती है। डाक्टरों की आवश्यकता नहीं पड़ी। मेरा काल तक एक समय टल गया मैं फाल्गुन शुक पूर्णिमा के रोज रात्रि को 2 बजे के करीब जब होलिका दहन हुआ तब अकेला नंगे पैर आ रहा था। उस समय मानसिक जप महामन्त्र का कर रहा था। एक काला सर्प ढाई हाथ लम्बा मेरे दोनों पैरों के बीच से निकल गया मैं खड़ा रहा व जप मानसिक चालू रखा व सर्प जब पूरा निकल गया तब वहाँ से भगवती को प्रणाम करके आगे घर की ओर बढ़ा। मुझे मृत्यु के मुख से भगवती ने बचाया। माता मेरी क्षणक्षण में रक्षा करती हैं। उपरोक्त उदाहरण तो उदाहरण मात्र है। कितनी बार सहायता मिली इसका वर्णन करने में असमर्थ हूँ। अनेकों कठिनाइयों के समय दयामयी माता ने मेरी सहायता की है।
(श्री दिलेराम पटेल, लोइर्सी)
दुर्भाग्य का कुछ ऐसा कुचक्र है कि मेरे पाँच बालक अब तब मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। बालक जन्मते हैं, हँस खेल कर मोह बढ़ाते हैं और कुछ ही दिन में वियोग की पीड़ा देकर चले जाते हैं। अपने कलेजे के टुकड़ों को कराल काल की क्रूर डाढ़ों में पिसते देखकर माता के हृदय पर कितना बड़ा आघात बैठता है, इसे भुक्त भोगी ही जानते हैं।
बालक के बिना माता की गोद और पिता का आँगन सूना रहता है। हम लोग भी इस सूने मन से दुःखी थे। इस दुखदायी दुर्भाग्य के कारण की तलाश की गई। मालूम हुआ कि कोई दुष्ट आत्मा पीछे लगी हुई है और वह अपनी पैशाचिक शक्ति से इन बालकों का भरण कर जाती है।
काफी समय तक अनेक प्रकार के उपचार किये जाते रहे पर कोई सफल न हो सका। सभी प्रयत्न निष्फल चले गये। एक दिन एक सत्पुरुष ने गायत्री की महिमा समझाते हुए बताया कि गायत्री से बड़ा रक्षक और दूसरा नहीं। वेदमाता जिसकी रक्षा करती है उसका कोई बाल बाँका नहीं कर सकता।
पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भावना के साथ मैं माता की उपासना करने लगा। भगवान ने एक बालक और दिया जिसे पाकर प्रसन्नता की सीमा न रही। साथ ही यह भय भी था कि इस बालक का भी कोई अनिष्ट न हो जाय भय और आशंका से दिल धड़कता रहता, पर गायत्री माता का ध्यान करके कुछ साहस बंधता।
एक दिन रात्रि के समय मेरी पत्नि कुछ अर्ध तंद्रित अवस्था में बच्चे के साथ सो रही थी। उसे अनुभव हुआ किसी भयंकर राक्षस ने आकर बच्चे के अंग-अंग तलवार से काट डाले हैं। ठीक उसी समय मैं भी पास की चारपाई पर पड़ा यह स्वप्न देख रहा था कि एक एक बड़ी फौज घर में घुस आई है और मेरे गले को तलवार से काट रहा है। मैं भय से थर-थर काँपने लगा, मुँह से जोर-जोर से ॐ भूर्भुवः स्वः निकलने लगा। उधर पत्नी की भी घिग्घी बँध गई, वह बच्चे से बेतहाशा लिपट गई और भर्राई आवाज में चिल्लाने लगी-’मेरा बच्चा टुकड़े -टुकड़े हो गया।’
हड़बड़ा कर हम दोनों उठ बैठे। अधखुली आंखों से दिखाई दिया कि एक परम सुन्दरी कन्या हाथ में फर्सा लिए आकाश में हमारी रक्षा के लिए आई हुई है उसके दर्शन करते ही हमारी हिचकी बँध गई, आँखों से आंसुओं की धारा बहने लगी और कातर होकर जोर-जोर से माता को पुकारा।
कुछ देर ऐसी ही भयंकर स्थिति बनी रही। जब धीरज बँधा तो बच्चे को टटोल कर देखा। वह चैन से था। पत्नी तो मुझसे भी बहुत पीछे तक अधीर रही, उसका कंठ सूख गया था। मुख से स्पष्ट शब्द भी न कहे जाते थे। हम दोनों बार-बार बच्चे को उलट पलट कर देखते थे, यद्यपि वह ठीक था पर फिर भी मन न मानता था और यही भय लगता था कि कोई अनिष्ट न हो गया हो। उस रात नींद आई। हम दोनों पति-पत्नी बच्चे के लिए जागते रहे।
पीछे मालूम हुआ कि उस रात्रि एक दुष्ट आत्मा का प्राण घातक आक्रमण किया था और यदि माता ने रक्षा न की होती तो इस वर्तमान बालक को खिलाने के सौभाग्य से भी हमें वंचित होना पड़ता। जगज्जननी सबसे बड़ी रक्षक हैं, दुष्टों के सारे प्रयत्नों को वे निष्फल कर सकती हैं। उनकी शरण में अपना सब परिवार सुरक्षित रहेगा। ऐसा विश्वास दृढ़ होता जाता है और गायत्री उपासना में दिन-दिन चित्त अधिक बढ़ता जाता है।
(श्री हेमचन्द्र गुप्त, दिल्ली)
अब से कोई 10 वर्ष पहले तक मैं गायत्री-साधना के विषय में नितान्त अनभिज्ञ था। परन्तु अखण्ड ज्योति में प्रकाशित गायत्री सम्बन्धी लेखों को पढ़कर हृदय में आकाँक्षा जोर पकड़ती गई कि हमें भी गायत्री-साधना अवश्य करनी चाहिए। एक ओर बात जिसने हमारी गायत्री-साधना को नियमित तथा सफलीभूत बनाया-इस साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
इस साधना के करने के फलस्वरूप मेरे स्वभाव एवं आचरण में आश्चर्यजनक परिवर्तन स्वयमेव हो गया है। कलह आदि की बात दूर रही प्रत्येक संपर्क में आने वाले व्यक्ति के लिए हृदय में खुद ब खुद प्रेम, सहानुभूति, उदारता और सेवा के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। एक प्रकार का ऐसा प्रभाव संपर्क में आने वाले व्यक्ति पर पड़ता है उसके आचरण से भी प्रेम, सहानुभूति, उदारता और सेवा के भाव टपकने लगते हैं हमारे घर में नीचे ऊपर लगभग आठ परिवार और रहते हैं। और उन सब में जरा-जरा सी बात पर प्रतिदिन समय कुसमय लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज होती रहती थी। परन्तु अब यह बहुत हद तक बन्द हो गई है। क्योंकि प्रत्येक परिवार हमारे अपने परिवार के शान्ति और प्रेम पूर्ण वातावरण को आदर्श बनाने लगा है। दूसरे, प्रत्येक परिवार इसी ओर देखता रहता है कि हमारी तो लड़ाई प्रत्येक से होती रहती है परन्तु इनकी (हमारी) किसी से नहीं होती। अतएव क्यों व्यर्थ में लड़ाई झगड़ा करें, इस प्रकार परोक्ष रूप से हमारी गायत्री साधना ने हमारे समस्त घर में शान्ति स्थापित कर दी है।
सन् 1949-50 में स्वयं हमारे परिवार पर कुछ अत्यन्त भीषण प्रहार नियति के पड़े। और उन प्रहारों के कारण एक बार भी भविष्य अत्यन्त अन्धकारमय दिखाई देने लगा था। परन्तु ऐसे समय में हमने आचार्य जी की सलाह से गायत्री अनुष्ठान किया और वेद-माता गायत्री की अनुकम्पा से हम उन विपत्तियों से मुक्त होना असम्भव और आश्चर्यजनक लगता था कि हमें अब भी सहसा यह विश्वास नहीं होता कि वास्तव में उन विपत्तियों से मुक्त हो चुके हैं।
इसी प्रकार का एक आश्चर्यजनक अनुभव गायत्री साधना का हमें हो चुका है। हमारे एक मित्र के दस वर्षीय पुत्र का दिमाग कुछ खराब था और इस दिमागी खराबी के कारण एक दिन वह बगैर किसी को कुछ बताए घर से कहीं निकल गया। हमारे मित्र ने काफी ढूँढ़ा परन्तु कहीं पता नहीं चला। इस प्रकार एकमात्र पुत्र के खो जाने से मित्र महोदय बहुत चिन्तित और दुःखी रहने लगे। एक दिन उनका इस बाबत जिकर मुझसे आया, मैंने उन्हें वेद माता गायत्री की शरण में जाने को कहा और उन्हें गायत्री मन्त्र याद कर दिन में तीन समय उसका जाप करने को कहा। मित्र महोदय को जाप करते तीन दिन ही हुए थे कि चौथे दिन उनके एक रिश्तेदार उनके लड़के को लिए हुए उनके घर पर पहुँचे और लड़के को मित्र महोदय को सौंप कर बोले कि इत्तफाक से बेइरादे मैं गुड़गाँव पहुँच गया था, वहाँ एक हलवाई की दुकान पर इसे बैठे देखा। हलवाई से कहकर मैं इसे आपके पास ले आया हूँ। खोए हुए पुत्र को पाकर मित्र महोदय आनन्द से गदगद हो गए और हमारे प्रति कृतज्ञ होने लगे कि हमने उन्हें ऐसे अमूल्य मंत्र की शिक्षा दी।
इस प्रकार मेरा तो अपना अनुभव यह पक्का हो चुका है कि गायत्री-साधना सर्वशक्ति मान साधना है और यह मनुष्य को अलौकिक गुणों से युक्त बना देती है।
-ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाला गायत्री मंत्र निकाला। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष तक गायत्री का जप करता है वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों संध्याओं में गायत्री जपता है वह वेद पढ़ने के फल को प्राप्त होती। अन्य कोई साधना करे या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
-मनु
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-गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने आत्माओं की उत्रति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।
-महात्मा गाँधी
(श्री वैजनाथ भाई रामजी भाई गुलारे)
गायत्री की पूजा में धर्म और अर्थ दोनों का लाभ है, इसलिए दूसरी पूजाओं के बजाय मुझे यही अधिक प्रिय है। गायत्री की मैंने बड़ी प्रशंसा सुनी थी। कई व्यापारियों ने मुझसे कहा था कि इस पंडितों से गायत्री का जप कराते हैं। इससे लक्ष्मी जी की कृपा रहती है। तब से मेरा ध्यान भी उधर गया।
पहले मैंने संवत् 2001 में 24 पंडितों द्वारा गायत्री पुरश्चरण कराया। हमारे ऊपर इनकम टैक्स का मुकदमा चल रहा था, बड़ी रकम का मामला था, माता से यह प्रार्थना थी कि इसमें जिता दें। अनुष्ठान में तीन हजार रुपया लगा। मुकदमा हम हार गये। पर एक लाभ ऐसा हुआ जो मुकदमे को जीतने से भी बड़ा था। मेरे छः सन्तान हुई थी छः ओं कन्याएं हैं। एक मर गई चार पाँच जीवित है अनुष्ठान के बाद पत्नी गर्भवती हुई और पैदा हुआ, वंश डूबने की जो चिन्ता हो रही थी वह दूर हो गई। घर भर खुशी से फूला न समाया। एक तरह से अनुष्ठान असफल रहा पर दूसरी तरह से उसका पूरा लाभ मिल गया।
दूसरा अनुष्ठान संवत् 2003 में कराया। मझली लड़की को तपैदिक हो गई थी उसकी प्राण रक्षा के लिए यह कराया थाञ्। लड़की तो न बची मगर मेरा सत्रह साल का बवासीर अच्छा हो गया। इस दुष्ट रोग का तीन बार आपरेशन हो चुका था, हजारों खर्च हो चुके थे और सदा ही बड़ा कष्ट रहता था उससे छूट जाना भी मेरे लिए लड़की के अच्छी हो जाने जैसा ही सन्तोष की बात है।
तीसरा अनुष्ठान संवत् चार में कराया। बड़े दामाद बीमार थे। जलोदर की चिकित्सा कराना हमारे यहाँ हो आ गये थे। डॉक्टर इंजेक्शन तो लगा रहे थे पर बचने की किसी को आशा न थी। अनुष्ठान कराया, परन्तु दामाद न बच सके। फिर भी उस वर्ष व्यापार में इतना लाभ हुआ जितना कई वर्षों को मिलाकर भी नहीं हुआ था।
तब से हर साल अनुष्ठान होता है और स्वयं भी पूजा तथा जप करता हूँ। मुझे उससे लाभ ही होता है। मेरी प्रार्थना तो माता ने एकाधबार ही सुनी है पर वे अपनी इच्छा से मुझे बहुत कुछ देती हैं। ज्ञानी लोग बताते हैं कि अटल प्रारब्ध भोग नहीं टलते पर गायत्री की कृपा भी व्यर्थ नहीं जाती। अवश्य ही गायत्री में चमत्कार है उसका भक्त लाभ में रहता है जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ती जाती है भजन पूजा में मन बहुत रमता है। माता की कृपा से सब कुछ सम्भव है, परलोक में मेरी सद्गति होना भी सम्भव है।
-’गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं हैं।’
-विश्वामित्र
(चौधरी अमर सिंह जी, इन्दोर)
अन्य साधनों की अपेक्षा मैं गायत्री मंत्र को इस वास्ते महत्व देता हूँ कि जब मैं इस साधना से पूर्व अन्य प्रणालियों से साधना करता रहा तो किसी भी सिद्धि की प्राप्ति मुझे इतनी मात्रा में नहीं हुई जितनी कि इसके साधना से थोड़े काल में हुई जिनका वर्णन संक्षेप से नीचे दिया जावेगा।
मुझे कई बार इसके साधना से बिना इच्छा किये अद्भुत लाभ प्राप्त हुये हैं। उनमें से थोड़े से का वर्णन इस प्रकार का है (क) कई बार या अन्य किसी प्रिय व्यक्ति के रोग ग्रसित होने पर मन में ज्ञान प्राप्त हुआ कि इस रोग का अमुक उपचार किया जावे तो लाभ होगा अन्य था अमुक प्रकार की व्याधि उत्पत्र होगी। इन संकेतों से तदनुसार ही फल मिला (ख) तीन वर्ष पूर्व मैं एक ऐसे कार्य में प्रवृत्त हुआ था जो मेरी बुद्धि, शक्ति , पराक्रम से बाहर था। उस कार्य में जहाँ त्रुटि होती तो स्वयं एक अव्यक्त शक्ति साथ ही साथ बताती जाती कि यहाँ यह त्रुटि हुई है सुधार लो, तो उसी त्रुटि को अन्य प्रकार से जाँच करने पर वह त्रुटि विदित हो जाती व सुधार ली जाती। इस प्रकार वह कार्य भी अलौकिक रीति से पूर्ण हो गया। (ग) सन् 1950 ई॰ में इन गर्मी के दिनों में मैं एक ग्राम में था कि पास ही छोटे 2 बच्चे व मेरी एक कन्या एक फूस के मकान में खेल रहे थे कि एक छोटे से बच्चे ने वहाँ आग लगा दी। आग लगने से 10 मिनट पूर्व किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे स्पष्ट शब्दों में बताया कि मकान से बाहर निकलो-बाहर निकल कर मैं एक पानी के नल के नीचे नहाने लगा कि इतने में आग लग गई। परन्तु मैंने तुरन्त लोग इकट्ठे किए व अधिक हानि नहीं हुई। इन बातों का प्रमाण है कि यह सर्व गायत्री के प्रभाव से हुआ है। माता गायत्री मेरे साथ माता का सा बर्ताव करती रही हैं।
मेरे ग्राम से 14 मील दूरी पर कुछ समय एक साधु रहते थे जो कि गायत्री की साधना में सिद्ध थे। वह कई बार आश्चर्यजनक कार्य लोक समूह के सामने भी करके दिखा देते थे। जैसे खाली बोतल को झट किसी द्रव्य से भरकर दिखा देना व लोगों को वह द्रव्य पिला भी देना।
श्री विद्यारण्य ऋषि के प्रार्थना करने पर गायत्री देवी ने सोने की वर्षा दक्षिण देश में की है (देखिये जपयोग पृष्ठ 65 श्री स्वामी शिवानन्द ऋषिकेश द्वारा प्रकाशित) श्री सूदन स्वामि ने 17 बार पुरश्चरण किया परन्तु क्योंकि उसने पूर्व जन्म में 15 ब्राह्मणों की हत्या की हुई थी उसे कोई सिद्धि प्राप्त न हुई। अठारहवाँ पुरश्चरण करते ही उसे भगवान के दर्शन हुये (देखिये उपरोक्त जपयोग पृष्ट 66) प्रायः आजकल के साधक जहाँ भजन करके हटते है तो तुरन्त झूठ बोलना इत्यादि कुकर्मों को करने लग पड़ते हैं। उन्हें सिद्धि कहाँ ?
-’जिस प्रकार पुष्पों का सार शहद’ दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री को छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। वाम्य सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
-महर्षि व्यास
(श्री पं. रामस्वरुप जी सीसौदिया, राठ)
सामान्य तथा मनुष्य तत्काल के लाभ को देखता है। तात्कालिक लोभ के लिए वह भविष्य की भारी हानि का खतरा भी उठाता है। इसके विपरीत यदि किसी काम में तुरन्त लाभ न हो किन्तु भविष्य में किसी बड़े सुख की सम्भावना हो तो भी उसे करने का उत्साह नहीं होता। तुरन्त का लाभ लोगों का दृष्टिकोण बना हुआ है। ऐसे कोई विरले ही हैं जो भविष्य को स्थायी लाभ के लिए आज के लाभों को छोड़ने को साहस कर पाते हैं।
आध्यात्मिक साधना में तत्काल कोई लाभ नहीं होता, बल्कि समय खर्च करना पड़ता है। नीरस कर्म काण्ड की नियमित साधना का बन्धन ऊपर लेना पड़ता है, हवन, दान पुण्य आदि में कुछ खर्च भी बढ़ता है, यह सब तात्कालिक हानियाँ ही है। व्रत, उपवास, तीर्थ यात्रा, संयम नियम आदि का झंझट और मित्र मंडली में उपहास यह सब बातें भी हानि में गिनी जा सकती हैं। भविष्य में इससे कोई लाभ होगा या नहीं इसका भी निश्चय नहीं, इस सब कारणों से कोई विरले ही आध्यात्मिकता के मार्ग को अपनाते हैं। जो अपनाते हैं वे सरल सा कार्यक्रम पूरा करते हैं रोज 2 का झंझट नहीं रहता। कथा प्रवचन सुनने या कीर्तन की सम्मिलित स्वर लहरी में सहयोग देने का कार्य भी सुगम है। पर नित्य-नियत समय पर मन भार का जप, ध्यान, भजन, पूजन के लिए बैठना और उसे देर तक निभाये रहना सामान्यता बड़ा अरुचिकर होता है। लोग अरुचिकर कार्यों के लिए प्रायः तैयार नहीं होते।
उपरोक्त दृष्टिकोण वाले असंख्यों मनुष्यों में से ही एक मैं भी था। मेरी रुचि जप तप में जरा भी न होती थी। परन्तु भगवान की कृपा बड़ी विलक्षण है, जिस पर वे कृपा करते हैं उसकी बुद्धि फेरते भी उन्हें देर नहीं लगती।
एक दिन मुझे एक मित्र से गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। उनमें गायत्री द्वारा अनेक साँसारिक लाभ होने का भी वर्णन था, साथ ही ऐसे कुछ उदाहरण भी दिये हुए थे जिनसे विदित होता था कि अमुक व्यक्ति ने इस साधना द्वारा अमुक लाभ उठाये हैं। मेरा मन भी ललचाया। तात्कालिक लाभ सभी को इष्ट है, मुझे भी इसी की आवश्यकता थी। अपना लाभ या स्वार्थ जिस तरह से भी पूरा होता है यही मार्ग ठीक है चाहे वह गायत्री उपासना हो, चाहे व्यापार, चाहे नौकरी, चाहे और कुछ साधना से मुझे वस्तुतः कोई प्रेम न था। अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए गायत्री की परीक्षा कर देखने की इच्छा हुई।
लाभ के लोभ से मैंने गायत्री को अपनाया। जानकारों से पूछकर जप, ध्यान, हवन आदि की विधियाँ मालूम ही और नियमित रूप से उन्हें करने लगा। जीवन में पहली बार यह पथ चुना था इसलिए इस सम्बन्ध में उत्साह और कौतूहल विशेष था। उनने मुझे अधिक जानने के लिए प्रेरित किया मैंने गायत्री सम्बन्धी अनेकों पुस्तकें पढ़ डालीं।
जिस छोटे प्रयोजन को लेकर मैंने अनुष्ठान प्रारम्भ किया था वह सफल हो गया। जो आशंकाएं और बाधाएं दिखाई पड़ती थी वे एक भी बाधक नहीं हुईं परिणाम सुखद रहा। साधारण तथा स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर साधन वस्तुओं को छोड़ दिया जाता है पर मैं वैसा न कर सका। क्योंकि अब उपासना में एक आन्तरिक रस आने लगा। इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी प्राप्त करने की रुचि ने आध्यात्मिक ज्ञान को इतना बढ़ा दिया कि साँसारिक लाभों की तुलना में आत्म लाभ का महत्व अनेक गुना अधिक मालूम होने लगा। माता के प्रति अगाध भक्ति बढ़ती गई और साधना ही एक महान लाभ प्रतीत होने लगी। अब मैं पूर्ण निष्काम भाव से उपासना करता हूँ और उसका वह प्रतिफल पाता हूँ जो बड़ी से बड़ी कमाना पूर्ण होने की अपेक्षा अधिक सरस है। सकाम उपासना अन्ततः निष्काम मातृ श्रद्धा में बदल जाती है। ऐसा मैंने व्यक्तियों के उदाहरणों से देखा है। परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि प्रारम्भ में छोटी से छोटी ही कामना करनी चाहिए। प्रारम्भिक साधक की श्रद्धा और साधना अत्यंत निर्बल होती है। जो लोग रत्ती भर श्रम का लाख मन फल पाने का अमर्यादित लोभ करते हैं और प्रबल कर्म भोगों को एक माला फेर कर ही हटाना चाहते है उनको निराशा ही होती है। फिर भी जितना शुभ प्रयत्न वे कर लेते हैं वे किसी न किसी रूप में उनके लिए सहायक ही होता है। अपने को असफल समझने वाले गायत्री साधकों का प्रयत्न भी कभी व्यर्थ नहीं जाता, मनोकामना पूर्ण न होने पर भी किसी न किसी प्रकार सत्परिणाम अवश्य मिल जाता है।
(पं॰ श्रीकृष्ण शुक्ल, देहली)
गायत्री का आश्रय लेने से मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। कोई वस्तु ऐसी नहीं जिसे गायत्री साधक प्राप्त न कर सके। अनुभवी लोगों ने ऐसा ही कहा है उसकी पुष्टि में अनेकों प्रमाण उपलब्ध हैं। जिनने श्रद्धा और विश्वासपूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें कभी निराश नहीं होना पड़ा। वेद माता की कृपा से जब मनुष्य के अन्तःकरण में सतोगुण का प्रकाश होता है तो शारीरिक बीमारियाँ तथा स्वभाव और विचारों की बुराइयाँ आप ही दूर हो जाती है। उन्नति और सुख शान्ति के मार्ग में यह बुराइयाँ ही रोड़ा अटकाती हैं, जब माता की कृपा से उनका निवारण हो जाता है तो कोई भी अभाव कष्ट या दुःख शेष नहीं रह जाता।
अपना मेरा निज का अनुभव बड़ा उत्साह वर्धक है। कुछ वर्ष पूर्व मेरा स्वभाव बड़ा क्रोधी था। जरा सी बात पर लड़ बैठता था। मस्तिष्क में बुरे-बुरे विचार उठते रहते थे। चित्त में हर घड़ी अशान्ति और भ्रान्ति रहती थी। जब से गायत्री माता का पाठ मैंने पकड़ा है तब से उन दोष दुर्गुणों का सफाया हो गया। अब मुझमें पुराना एक भी अवगुण नहीं है। हर तरह से शान्ति अनुभव करता हूँ। कई वर्ष से मैंने नौकरी छोड़ दी है, फिर भी नौकरी की अपेक्षा कहीं अधिक घर बैठे अपने स्वतंत्र व्यवसाय से कमा लेता हूँ।
मेरे एक मित्र को गायत्री महिमा का बड़ा ही आनन्ददायक चमत्कार मिला है। दिल्ली में ही नई सड़क पर पं॰ बुद्धराम भट्ट, की दुकान है। आपको 45 वर्ष तक कोई सन्तान नहीं हुई थी इसमें पति-पत्नी दोनों ही दुखी रहते थे। पर ईश्वर की इच्छा और भाग्य की प्रबलता समझ कर सन्तोष कर लेते थे। कुछ समय पूर्व उन्होंने गायत्री महिमा का परिचय प्राप्त किया और भक्ति पूर्वक माता की आराधना करने लगे। इस आराधना का लाभ यह हुआ कि अब उनके एक पुत्र हुआ है। निराशा के अन्धकार में आशा की यह एक नवीन किरण प्रकाशित हुई है। बच्चा बड़ा स्वस्थ, सुन्दर और होनहार है, उसमें कई दैवी गुण दिखाई पड़ते हैं। बच्चे का चित्र साथ में दिया जा रहा है।
ऐसी ही एक माता की कृपा इसी वर्ष वृन्दावन में हुई। संयुक्त प्रान्तीय आर्य प्रतिनिधि सभा के गुरु कुल में रसायन विभाग के कार्यकर्ता पं॰ सुदामा जी सुयोग्य सज्जन हैं। चौदह वर्ष से आपके यहाँ कोई बालक नहीं जन्मा था। पंडित इसी साल 14 वर्ष पश्चात् एक पुत्र का जन्म हुआ है। वंश चलने और घर के किवाड़ खुले रहने की जो चिन्ता थी वह सहज ही दूर हो गई। पं॰ सुदामा जी का तब से गायत्री पर और भी अधिक विश्वास बढ़ गया है।
ऐसी घटनाएं एक दो नहीं अनेकों हैं जिनको कन्याएं ही कन्याएं होती हैं या कोई सन्तान नहीं हैं उन्हें मनोवांछित सन्तान मिलने की अनेक घटनाएं अखण्ड ज्योति सम्पादक को मालूम हैं। पूर्व काल में पुत्रेष्टि यज्ञ गायत्री मंत्र से ही होते थे। राजा दशरथ ने जो पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। वही गायत्री के मंत्र से ही हुआ था। राजा दलीप ने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में रहकर नंदनी गाय की सेवा और गायत्री की उपासना करके ही सन्तान पाई थी, कुन्ती ने कुमारी अवस्था में गायत्री द्वारा सूर्य के तेज धारण करके कर्ण को जन्म दिया था।
गायत्री अपने भक्तों की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। सन्तान सम्बन्धी बाधाओं को भी वह दूर करती हैं। कुपात्र अवज्ञाकारी, दुर्गुणी, सन्तान के विचार और स्वभाव में परिवर्तन होकर उनके सौम्य बनने के चमत्कार भी माता की कृपा से अनेक बार होते हैं। कितने ही कुसंग में पड़े हुए, जिद्दी, चोर, दुराचारी, अवज्ञाकारी, आलसी एवं मंद बुद्धि बालकों में आशाजनक परिवर्तन गायत्री की कृपा से होता देखा गया है।
जिन्हें सन्तान सम्बन्धी असन्तोष है, संतान नहीं होती, होकर मर जाती है, कन्याएं ही कन्याएं होती हैं, बालक रोगी कमजोर और कुरूप होते हैं, वे गायत्री उपासना करके देखें उन्हें मनोवाँछित लाभ होगा माता-पिता गायत्री का आश्रय लेकर इच्छानुकूल सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं ऐसे अनेक उदाहरण अनेक बार देखे गये हैं।
(श्री शंभूचरण विश्नोई, वीरपुर)
पिता जी बड़े चतुर और बुद्धिमान थे। उनने अपने हाथों लगभग दस लाख की सम्पति कमाई थी। जमींदारी, देन लेन घी और गल्ले का व्यापार तथा और भी अनेक भागों से उनकी आमदनी थी। रईसी ठाठ-बाठ से रहते थे, सदा उनके साथ दरबार लगा रहता था। मैं उनका इकलौता पुत्र था। लाड़-प्यार की कमी न थी, जिस दुलार, आनन्द और विलासिता से मेरा बचपन बीता वैसा किन्हीं विरलों को ही नसीब होता है।
भाग्य ने पलटा खाया जब मैं तेरह वर्ष का था तो अचानक तीन दिन की बीमारी में पिता जी की मृत्यु हो गई। पिता जी के जितने मित्र थे उन सब ने मेरी माता पर तथा मुझपर बड़ी कृपा दिखाई। हर एक ने यह विश्वास दिलाया कि हम लोगों की पूरी सहायता की जायगी। विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। सब ने कृपा की जो जितना कोई अधिक हित चिन्तक बना उसने उतनी ही बड़ी दगा की। मिलकर दगा करने वालों की करतूतों का कोई मनोरंजक अनुभव सुनना चाहे तो उसे आप बीती कहानी कई दिनों तक सुनाये जा सकते हूँ। पाठकों का कीमती वक्त अधिक खराब करने से क्या फायदा, किस्सा यह है कि सात वर्ष के भीतर पिता जी की सारी जायदाद, सारे नकली मित्रों न अपना घर भरने के लिए खानदान भर से हमारी दुश्मनी करा दी, तरह-तरह की बुराइयाँ, फिजूल खर्ची, लापरवाही आदि के कारण तबाही बढ़ती गई। माता जी भी पिता जी के सात वर्ष बाद स्वर्ग सिधार गईं। उनके मरते ही कर्ज-दारों ने अपने झूठे सच्चे दावे किये और छः महीने के भीतर ही बचा-खुचा भी चला गया।
बेबसी और शर्मिंदगी से परेशान होकर मैंने घर छोड़ दिया। स्त्री को उसके मायके पहुँचा कर मैं रोजगार की तलाश में परदेश को निकल पड़ा जगह की खाक छानता हुआ मारा-मारा फिर रहा था। बचपन के आराम और इस वक्त की मुफलिसी इन दोनों का मुकाबला करता तो आँखों में आँसू भर जाते। ऐसी ही चिन्ता और परेशानी में एक बगीचे में बैठा हुआ था। और भी कई महानुभाव वहाँ बैठे हुए थे। उनमें गायत्री सम्बन्धी वार्तालाप हो रहा था। बातें कुछ प्रिय लगीं, ध्यान से सुनने लगा, वे लोग ऐसी चर्चा कर रहे थे कि किस-किस व्यक्ति को किस प्रकार गायत्री साधना से लाभ हुआ। झिझकते हुए उन भद्र पुरुषों से पूछा कि क्या मैं भी गायत्री द्वारा लाभ उठा सकता हूँ? उनने मेरा परिचय पूछने के बाद उपासना के लिए प्रोत्साहन दिया और सारी विधि बता दी। दूसरे दिन से ही मैं साधना करने लगा। मेरा मन घर जाने को कर रहा था घर लौट आया। अब मेरे स्वभाव में और विचारों में भारी हेर फेर हो रहा था। खेती करने की इच्छा हुई। अपने खानदान वालों से पश्चाताप और क्षमा याचना के साथ। उनमें से कई बड़े उदार थे, भूतकाल में मेरे पिता जी द्वारा किये गये उपकारों की याद करके वे पिघल गये और मेरा प्रदर्शन और सहयोग करने को प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गये।
कुटुम्बियों के साथ में खेती आरम्भ कर दी। लगातार कई वर्ष तक अच्छी फसलें हुईं। भाव अच्छा लगा। तीन चार वर्ष में ही मेरे दिन फिर गये। जो लाभ खेती से होता था उससे पिता जी की भाँति घी, गल्ला, किश्त बाँटना, जेवर गिरवी रखना, देन लेन आदि का कारबार करने लगा। ससुराल वालों ने सुना कि लड़का सुधर गया तो उनने भी आर्थिक सहायता दी। सब दिशाओं में सफलता मिलती गई। लक्ष्मी को जाते देर नहीं लगती पर जब आती हैं तब भी दौड़ती हुई आती हैं बूँद-बूँद से घड़ा भर जाता है चारों ओर से जब ईश्वर की कृपा हुई तो हमारा खाली घर धन, धान्य, प्रतिष्ठा, सन्तान, नौकर-चाकर आदि से भरा पूरा हो गया। जिन लोगों ने हमारी जायदाद खरीदी थी, उनमें से कई एक से वापिस खरीद ली है।
यह सब गायत्री की कृपा है। उस बगीचे में बैठे हुए सज्जनों की बातों को याद करता हूँ तो मेरा हृदय कृतज्ञता से भर जाता है। उनमें मुझे वह ज्ञान दिया जो हजारों रुपये नकद देने की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान है। गायत्री माता ने मेरे सब दुख दरिद्र को दूर कर दिया उसका स्मरण और पूजन किये बिना मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करता। प्रति वर्ष गायत्री यह करता हूँ। मेरी देखा देखी और भी कई मनुष्यों ने गायत्री का व्रत लिया है और वे भी फल फूल रहे हैं। मैंने शास्त्र नहीं पढ़े सीधी सादी विधि से पूजन, जप और ध्यान करता हूँ। मेरा विश्वास है कि जो माता के चरणों में शीश नवाता है वह जगज्जननी की कृपा अवश्य प्राप्त करता है।
(श्री कविराज कन्हैयालाल जी शास्त्री, इन्दोर)
बादल एक दिन बरस कर चले जाते हैं। जितनी जमीन को उन्होंने गीला किया था दूसरे दिन वह सूख जाती है। परन्तु झरने के बारे यह बात नहीं वह निरन्तर नियमित रूप से झरता है। उसकी पतली सी जल धारा निरन्तर बहती रहती है। फलस्वरूप उसके नीचे की भूमि सदा गीली रहती है और विश्वासपूर्वक कितने ही पशु-पक्षी तथा वृक्ष उसका आश्रय लेकर अपनी तृष्णा बुझाते हैं। आँधी तूफान की तरह आने और चले जाने बादलों की अपेक्षा झरने का महत्व अधिक है।
किसी के प्रभावशाली प्रवचन से उत्तेजित होकर किसी काम में जो प्रवृति होती है उसका स्थायी होना कठिन है। जो बात स्वयं काफी समय तक सोच समझ कर की जाती है उसमें अधिक स्थिरता एवं दृढ़ता रहती है। गायत्री साधना को जो लोग किसी के मुँह से कुछ बातें सुनकर अपना लेते हैं वे अधूरी जानकारी के कारण एक तो ठीक प्रकार साधन नहीं कर पाने, दूसरे पूरी बातें मालूम न होने से उनके मन में संकल्प-विकल्प की धूप छाँह रहती है। जिसके कारण कई बार बीच में ही उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। ले भागे का ज्ञान बादल बरसने के समान अस्थायी है और गायत्री साहित्य के स्वाध्याय द्वारा मन में स्थिर ज्ञान और सुदृढ़ संस्कार जमाना ऐसा है जैसा निरन्तर बहने वाला निर्झर प्रवाह।
गायत्री साधना केवल अपने तक ही सीमित रखने की वस्तु नहीं है। उसे दूसरों को भी देना चाहिए। जो लोग केवल अपने ही मतलब में चौकस है और दूसरे बन्धुओं को सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए प्रयत्न नहीं करते, वे स्वार्थी माता को उतने प्रिय नहीं हो सकते जितने कि अपनी परवाह कम करके दूसरों की सेवा में ध्यान देन वाले साधक प्रिय हैं।
जप की ही भाँति स्वाध्याय भी साधना का अंग है। जैसे जप और ध्यान करना आवश्यक है वैसे ही गायत्री साहित्य का नित्य स्वाध्याय करना भी प्रत्येक गायत्री साधक का नित्य कर्म होना चाहिए। इस आवश्यक कर्तव्य की उपेक्षा करके जो लोग केवल जप ही किया करते हैं उनकी अधूरी साधना एकाँगी होने से निर्बल रहती है।
अपनी साधना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए स्वयं स्वाध्याय करना और दूसरों को परमार्थ पथ पर लगाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना यह दोनों ही कार्य पूरे हो सके इसके लिए अपने साधक बन्धुओं के सामने मैं एक कार्यक्रम उपस्थित करता हूँ, वह यह कि हममें से हर एक के घर में छोटा ‘गायत्री पुस्तकालय’ हो। अखण्ड ज्योति ने अब तक 12 पुस्तकें छापी हैं। इन सभी को लेकर एक छोटा पुस्तकालय बना लिया जाय। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पुस्तकालय में आती रहे और भी पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी कहीं से मिले या भविष्य में अखण्ड ज्योति से छपे तो उन्हें भी समय-समय पर इस पुस्तकालय में बढ़ाते रहा जाय।
स्वयं नित्य स्वाध्याय में इनका थोड़ा बहुत पाठ किया जाय। मैंने देखा कि मनोयोगपूर्वक जितनी बार इस साहित्य को पढ़ा जाय उतने ही महत्वपूर्ण गुप्त रहस्य प्रकट होते चलते हैं। गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण आदि के प्रकरण ऐसे हैं कि जिनमें से एक का मंथन करने के लिए एक-एक जीवन का समय भी कम है, एक बार पुस्तक के पन्ने पलट लेने से नहीं वरन् निरन्तर उनको मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय करने से ही ब्रह्म विद्या के रहस्यों को समझा जा सकता है।
जो लोग अपने मित्र या परिचित हों उनका इस विद्या की प्रारम्भिक जानकारी कराने के लिए छः आने वाले छोटी पुस्तकें एक-एक करके पढ़ने के लिए देते रहना चाहिए। लोग अक्सर लापरवाह होते हैं पुस्तकों को संभाल कर रखने और लौटाने में बड़ी लापरवाही करते हैं। इससे हमें खीजना नहीं चाहिए। वरन् पुस्तक खराब होने की हानि तथा पुस्तकें देने और लेने का समय भी प्रसन्नतापूर्वक एक पुण्य परमार्थ समझ कर शिरोधार्य करना चाहिए। एक नये व्यक्ति से नित्य गायत्री सम्बन्धी प्रोत्साहन देने वाली चर्चा करना भी अपना एक नियमित सेवा कार्य बना लेना चाहिए। इस प्रकार यह एक बड़ा ही कल्याणकारी एवं उपयोगी गायत्री का ज्ञान यज्ञ प्रत्येक साधक के घर में आरम्भ होना चाहिए।
प्रति वर्ष गायत्री जयन्ती के पुण्य पर्व तक हम लोग मिलकर गायत्री ज्ञान निर्भर की एक सहस्र धारा से माता के चरण पखारा करें। ऐसे छोटे 2 एक हजार पुस्तकालय प्रति वर्ष खुलते चले जाएं और उनके संचालक इस पुण्य प्रचार कार्य को उत्साहपूर्वक चलावें तो कुछ ही वर्षों में गायत्री का संदेश घर-घर में पहुँच सकता है और सहज ही एक बहुत भारी कार्य हो सकता है आशा है कि गायत्री माता के सच्चे पुत्रों-मेरे सहोदर बन्धुओं -का ध्यान इस ओर अवश्य आकर्षित होगा।
-गायत्री आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन, और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली है।
-अर्थवेद 19-71-1
(श्री गरीबदास जी नरखेड़)
यह एक बड़ा खटकने वाला अभाव है कि हिन्दु मात्र की परम आराध्य महाशक्ति गायत्री का कोई प्रधान तीर्थ नहीं है। छुटपुट मन्दिरों के अतिरिक्त कोई ऐसा गायत्री केन्द्र नहीं है जिस पर समस्त गायत्री उपासकों की श्रद्धा केन्द्रित हो।
सुनते हैं कि मथुरा गायत्री की सिद्ध पीठ है। उस पुण्य भूमि में सब ऋषियों ने तप करके सिद्धि पाई थी। वहीं राजा बलि ने वह प्रसिद्ध गायत्री यज्ञ किया था जिसके पुण्य फल को विष्णु को वामन रूप बना कर उसे छलना पड़ा था। महर्षि दुर्वासा ने तप करने के लिए भूमि का अनु संचालन करते हुए इसी क्षेत्र को चुना था। भगवान निश्चय हो गायत्री उपासना के लिए स्थल इतना शक्ति सम्पन्न है कि सफलता बहुत शीघ्र मिलती है।
मथुरा, गायत्री केन्द्र तीर्थ अति प्राचीन काल से रही है। उसे अखण्ड ज्योति द्वारा भी आलोकित किया जा रहा है। ऐसी पुण्य भूमि में केन्द्रीय गायत्री तीर्थ स्वभावतः ही उपयुक्त हो सकता है। परन्तु खेद है कि किसी समर्थ व्यक्ति का ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया है। आचार्य जी की यह कमजोरी ही कही जायगी कि उन्होंने अपने संकोची स्वभाव के कारण किन्हीं सामर्थ्यवान् व्यक्तियों को अब तक प्रेरणा या प्रोत्साहन नहीं दिया। अन्यथा अब तक वह तीर्थ कब का बन गया होता। सिद्ध पीठ का भूमिगत महत्व और आचार्य जी का अनुभवपूर्ण पथप्रदर्शन इन दो कारणों से अनेक साधक मथुरा रहकर अपनी साधना करना चाहते हैं पर ऐसी सुविधा प्राप्त करने से बहुधा साधकों को वंचित ही रहना पड़ता। कारण यह है कि अखण्ड ज्योति का प्रेस, दफ्तर एवं आचार्य जी का परिवार जिस छोटे से भाड़े के मकान में रहता है उसमें इतनी गुँजाइश नहीं है कि साधकों का भी रहना उसमें हो सके धर्मशालाओं की भीड़ और तीन दिन से अधिक न ठहरने का प्रतिबंध साधकों के लिए सुविधाजनक नहीं होता। बाहर से पहुँचने वाला व्यक्ति भोजन व्यय तो स्वयं कर सकता है पर साधना काल में ठहरने की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकता। निराश होकर उसे लौटना पड़ता है। इस कठिनाई के कारण पचासों व्यक्ति गायत्री तप करके आत्म कल्याण के महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित रह जाते हैं।
इस स्थिति पर मुझे बड़ा दुःख होता है। देश में अनेक धनी मानी व्यक्ति अनुपयुक्त स्थानों पर कूप, तालाब, बगीचे मन्दिर, शिवालय बनवाते हैं। नाम का पत्थर उन पर लगा कर वे संतोष कर लेते हैं पर उनसे लाभ उठाने वाले इने-गिने लोग होते हैं थोड़े दिन बाद उनकी मरम्मत और सफाई तक नहीं होती वे यों ही टूट-फूट जाते हैं। दूसरी ओर एक अत्यन्त आवश्यक कार्य के लिए छोटी सी ऐसी तपोभूमि का अभाव है जिसमें आत्म कल्याण के अभिलाषी व्यक्ति चालीस दिन बैठ कर तपस्या कर सकें।
उचित अवसर का उपयोग करने वाले कोई विरले ही होते हैं। दिल्ली और मथुरा के बिड़ला मन्दिरों ने बिड़ला सेठ के यश को देश भर में फैला दिया है। यद्यपि मथुरा और दिल्ली में उनकी अपेक्षा बहुत अधिक लागत के अन्य मन्दिर मौजूद हैं। पर उनके नाम तक किसी को विदित नहीं और यह बिड़ला मन्दिर है जो देश के कोने-कोने में विख्यात हैं। यह निश्चित है मथुरा में एक गायत्री तीर्थ की स्थापना होगी एक तपोभूमि तथा उपासना का गृह थोड़े ही दिनों में निर्माण होगा पर उसका श्रेय किसी बड़भागी को ही मिलेगा। ऐसा तीर्थ निर्माण करना जहाँ गायत्री का ब्रह्म विद्यालय, प्रचार केन्द्र, जप, तप, साधारण पुण्य नहीं। उस स्थान में होने वाले धर्म फलस्वरूप जन्म जन्मांतरों तक सद्गति का यह अधिकारी हो सकता है। यश और कीर्ति का जो देश व्यापी विस्तार होगा उसके सम्बन्ध में तो कुछ कहना ही नहीं है।
धन चलती फिरती छाया की तरह है। आज के धन कुबेर को कल दरिद्र बनते देर नहीं लगती। धनी बनना उसी का सार्थक है जो उसका सदुपयोग कर लेता है। ऐसे कार्यों में लगाया हुआ धन ईश्वरीय बैंक में जमा कर देना है जिसका न्याय जन्म जन्मांतरों तक मिलता रहता है। अपना या अपने किसी स्वर्गीय प्रियजन का स्मारक कीर्ति स्तंभ बनाने का इससे अच्छा सुयोग मिल सकना कठिन है।
यह तीर्थ छोटा सा भी बन सकता है। पन्द्रह बीस हजार की लागत से एक छोटा गायत्री मन्दिर और दस पन्द्रह तपस्वियों के ठहरने लायक कुटिया उसमें बन सकती हैं। विद्यालय, पुस्तकालय औषधालय के लिए छोटे 2 स्थान उसी में निकल सकते हैं। कोई सज्जन मिलकर भी इसे बना सकते हैं। कोई सज्जन अपने प्रभाव का उपयोग करके दूसरों द्वारा इस कार्य को सम्पन्न करा सकते हैं। जो इस दिशा में जितना ही सहयोग देगा वह उतना ही पुण्यार्जन करेगा।
गायत्री माता से, आचार्य जी से तथा गायत्री तथा गायत्री प्रेमियों से मेरी हार्दिक प्रार्थना है कि इस महान् आवश्यकता की शीघ्र ही पूर्ति होनी चाहिए।
इस अंक को हम जितना सुन्दर बनाना चाहते थे उतना न बना सके। पृष्ठ संख्या सीमित होने के कारण आधे से अधिक अनुभव अपने से बच गये। लेखों के साथ लगे हुए लेखकों के कई चित्र साफ छपने में न आये। मुख पृष्ठ जितना सुन्दर छपना चाहिए था उतना न छपा। इतनी त्रुटियाँ रहते हुए भी इस अंक में सामान्य अंक की अपेक्षा दूने से अधिक खर्च लग गया। सरकार के फिर अदूरदर्शिता पूर्ण पेपर कन्ट्रोल लगा देने से कागज के दाम ड्योढे़ हो गये और महँगे दाम पर भी अच्छा कागज उपलब्ध न हो सका। जैसा कुछ बन पड़ा यह अंक पाठकों के सामने है। गायत्री जयन्ती पर यह विनम्र श्रद्धाँजलि अखण्ड ज्योति परिवार की ओर से भेंट करते हुए इतना ही संतोष है कि प्रयत्न से गायत्री महा तत्व की अधिक जानकारी बढ़ेगी और माता का आश्रय लेकर अनेकों व्यक्तियों को जीवन सफल करने का अवसर मिलेगा। हमारी आन्तरिक इच्छा है कि गायत्री का अधिकाधिक प्रचार हो, इस प्रयत्न में सहयोग देकर ज्ञान यज्ञ के भागीदार बनने की पाठकों से हमारी आग्रह पूर्वक प्रार्थना है।
(श्री बृजमोहन प्रसाद गुप्ता, हजारीबाग)
मैं सुसम्पन्न परिवार में पैदा हुआ हूँ। अच्छा जमा हुआ व्यापार और सुसंगठित परिवार है इतना होने पर भी मेरे 27 वर्ष अशान्ति और क्लेश में ही व्यतीत हुए।
माता जी बचपन में ही स्वर्ग सिधार गई थी। अधिक स्नेह करने वाले चाचाजी भी अधिक समय तक जीवित न रहे। सुव्यवस्थित मानसिक विकास न होने के कारण शुद्ध विचारधारा भी प्राप्त न हो सकी। आठवीं कक्षा से पढ़ाई छोड़ बैठा। विमाता के प्रति मेरे मन में बड़े दुर्भाव थे। उनकी साधारण सी बातों में मुझे शत्रुता की गन्ध आती थी। उनके हाथ का भोजन तक न करता था। गृह कलह बढ़ने लगा। मुझे अपना सारा परिवार शत्रुवत् प्रतीत होता था। एक बार तो आत्म हत्या तक करने का निश्चय कर लिया था।
दुर्बुद्धि, अनेक बुराइयाँ साथ लेकर आती है। मुझे भाँग, अफीम, सिगरेट आदि की नशेबाजी और वेश्यागमन की बुरी बातें भी बन गई। सिर में चक्कर आने की बीमारी पैदा हो गई। दुकान पर मन न लगता था। खेती-बाड़ी की देखभाल करने की जो जिम्मेदारी ऊपर डाली गई थी वह भी पूरी न हुई। पिता जी पत्नी तथा स्वजन सम्बन्धी सभी मुझसे असंतुष्ट थे। इन परिस्थितियों में रहकर मैं स्वयं भी भारी आन्तरिक जलन में जलता रहता था।
यही स्थिति यदि इसी प्रकार आगे बढ़ती रहती तो न जाने दुर्दशा का अन्त कहाँ जाकर होता पर ईश्वर को कुछ दूसरी ही बात मंजूर थी। पटना के एक होटल में आचार्य श्रीराम शर्मा लिखित ‘गायत्री के अनुभव’ पुस्तक रखी हुई मिली, उसे पढ़ने लगा। पढ़कर बड़ा प्रभावित हुआ और अन्य गायत्री-ग्रन्थ मँगाये तथा आचार्य जी पत्र व्यवहार करके उपासना आरम्भ कर दी।
गायत्री साधना को अपनाये हुए लगभग एक वर्ष हुआ है कि मेरे जीवन का कायाकल्प ही हो गया। सद्बुद्धि का आश्चर्यजनक विकास हुआ। नशेबाजी वेश्यागमन आदि की सभी बुराइयाँ छूट गई। पिताजी तथा विमाता से मेरी पूर्ण सद्भावना है, फल स्वरूप उनका वात्सल्य भी पर्याप्त मात्रा में मिल रहा है। राजसिक, तामसिक आहार छोड़कर सात्विक आहार अपना लेने से स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। घर में तम्बाकू का व्यवसाय होता है वह मुझे नहीं रुचा। इसलिए शुद्ध घी का व्यापार करने की ठानी। पूँजी की कठिनाई भी माता की कृपा से दूर हो गई अब मैं उस सात्विक व्यापार को स्वतन्त्र रूप से चलाता हूँ और सन्तोषजनक आमदनी कर लेता हूँ तथा अपने व्यवस्थित जीवन की सब पर छाया डालता हूँ। सभी स्वजन सम्बन्धी इतनी जल्दी इतना अधिक मुझमें परिवर्तन देख कर आश्चर्य करते हैं। मैं उन्हें बताता हूँ कि गायत्री की महिमा अपार है उस महाशक्ति की कृपा से हर एक को साँसारिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार के लाभ मिल सकते हैं। सुना है कि किन्हीं औषधियों से शारीरिक काया कल्प होता है। मानसिक काया कल्प की अचूक औषधि तो मुझे मिल गई है, वह है -गायत्री।
साचिका है सुर कार्य की तू सदा, तेरा करें वे न क्यों अभिनन्दरन।
तेरे प्रसाद की प्राप्ति से ‘निश्चल’ होती कभी मति की गति मन्द न॥
साधक के कटे बाधक विघ्न, रहें अवरोधक के भव फन्द न।
पद्य-प्रबन्ध की दे क्षमता, हम शारद तेरा करें पद-वन्दन॥1॥
करते करते पद पद्य का ध्यान, तू मानस मध्य पधारती है।
जन मंगल कारिणी तारिणी देवि, अमंगल-ओध विदारती है॥
कर देगी निहाल कृपा की निगाह से, ‘निश्चल’ ज्यों ही निहारती है॥
तेरे भरोसे अचिन्त रहें, तू अनन्त दया-मयी भारती है॥2॥
सब देवियों की शधीश्वरी है तू, शुभ साज सभी से निराला रहे।
घर विहान वाणी विच्ित्र ही तेरा, मयूर खुले पर वाला रहे॥
स्वय संयुक्त वीणा के वादन से, गृह ब्रहा का गायन शाला रहे।
दुख दास के दूर हों ‘निश्चल’ यों ही निरन्तर फरती माला रहे॥3॥
तेरे गुणों का अथाह है अबुधि, थाह जो चाहे बडी थकता है।
तेरी छपा बिना कौन तेरे यश गान का ही यश पा सकता है।
लेखक हो अथवा कवि ‘निश्चल’ तेरे ही आश्रय को तकता है।
याचकर्ता के बिना तब तुष्टि की, व्यर्थ वृहस्पति-वाचकर्ता है॥4॥
सुख देती सद्बुद्धि दे सज्जनों को-द्रत द्वेषिया के दल दाहती है।
करती है मला नित भक्त का ‘निश्चल’ भक्ति की भेंट ही चाहती है॥
छाचि सेवक भोले स्वभाव के भाक, पा निज भाग्य सराहती है।
सुत मान के दोष भी लाती न ध्यान में , माता का नाता निभाती है॥5॥
विभु की है विभाली विभालित तू, प्रतिमा की प्रभा चमकाती न क्यों।
अति निर्मल-निश्चल भाव भरी सरिता उर में उमगाती न क्यों॥
मृदुहासिनी आपहृदयासन पै पदमासन आशु लगाती न क्यों।
कृति शक्ति की जागृति करणी माँ, मनोहारिणी वीणा बजाती न क्यों॥6॥
कान्ति अनूप तेरे तन की, हरती हिय का रहे भ्रान्ति अन्धेरा।
वेष की भव्यता शान्ति प्रदा बने-क्लेश अशेष का काट के घेरा॥
नूपुर की माधुरी ध्वनि ‘निश्चल’ पूर्ण प्रफुल्ल करें मन मेरा।
चारुती भी चरणाम्बुजों की, चरणाम्बुजों का करदे मुझे चेरा॥7॥
*समाप्त*
(श्री बृजभूषणलाल त्रिपाठी ‘निचल’)