डाल पर मुरझाता फूल, गीत की शोभा हुई मलौम!
सुरभि का संचित सारा कोष, हो गया किस दुनिया में लीन!!
जगत की आँखों का था बिन्दु, लदा था सिर पर शोभा भार!
निछावर थे कितने अलिवृन्द, छलकता था मोहकता सार!!
कभी था वह स्वर्गीय विकास, सुनाता था आकर्षण तान!
झुलाता था प्रिय मलय समीर, सुरभि का था करके प्रिय दान!!
धरती पर गिरकर हुआ अधीर, बिखर जाता है मंजुल गीत!
हृदय में पी करके विष घूँट, बिलखता अपना देख निपात!!
टूटकर पंखुड़ियों का बृन्द, देखती है डाली की ओर!
मर रहा था लम्बी उछवास, उदासी का फैला व्यापार!!
खिलाती थी करुणा ले गीत, पिन्हा करके मूर्छा का हार!!
धूल में मिल करके अब ज्योति, जगत की नश्वरता का गान!!
बहाकर हग से अश्रु प्रवाह, सुनाती सुन लो देकर कान!!
भभक निकला आहों का शोर, काल पूरा कर ले अरमान!
नहीं मुझको कुछ भी परवाह, एक दिन होना था अवसान!
(श्री “अरविन्द”)
मनुष्य ईश्वर का उत्तराधिकारी एवं राजकुमार है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। अपने पिता के सम्पूर्ण गुण और वैभव बीज रूप उसमें मौजूद है। जलते हुए अंगार में जो शक्ति है वही छोटी चिनगारी में भी मौजूद है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य बड़ी निम्न कोटि का जीवन बिता रहा है। दिव्य होते हुए भी दैवी सम्पदाओं से वंचित हो रहा है।
परमात्मा सत् है, परन्तु उसके पुत्र हम असत् में निमग्न हो रहे हैं। परमात्मा आनन्द स्वरूप है हम दुःखों से संतप्त हो रहे हैं। ऐसी उल्टी परिस्थिति उत्पन्न हो जाने का कारण क्या है। यह विचारणीय प्रश्न है। जबकि ईश्वर का अविनाशी राजकुमार अपने पिता के इस सुरम्य उपवन संसार में विनोद क्रीड़ा करने के लिये प्राया हुआ है तो उसकी जीवन यात्रा आनन्दमयी न रहकर दुख दरिद्र से भरी हुई क्यों बन गई है? यह एक विचारणीय पहेली है।
अग्नि स्वभावतः उष्ण और प्रकाशवान् होती है, परन्तु जब जलता हुआ अंगार बुझने लगता है तो उसका ऊपरी भाग राख से ढ़क जाता है। तब उस राख से ढके हुए अंगार में वे दोनों ही गुण दृष्टिगोचर नहीं होते जो अग्नि में स्वभावतः होते हैं। बुझा हुआ, राख से ढ़का हुआ अंगार न तो गरम होता है और न प्रकाशवान्। वह काली-कलूटी कुरूप भस्म का ढेर मात्र बना हुआ पड़ा रहता है। जलते हुए अंगार को इस दुर्दशा में पहुँचाने का कारण वह भस्म है जिसने उसे चारों ओर से घेर लिया है, यदि यह राख का परत ऊपर से हटा दिया जाय तो भीतरी भाग में फिर वैसी ही अग्नि मिल सकती है जो अपने उष्णता और प्रकाश के गुण से सुसम्पन्न हो।
परमात्मा सच्चिदानन्द है। वह आनन्द से ओत-प्रोत है। उसका पुत्र आत्मा भी आनन्दमय ही होना चाहिए। जीवन की विनोद क्रीड़ा करते हुए इस नन्दनवन में उसे आनन्द ही आनन्द अनुभव होना चाहिए। इस वास्तविकता को छिपाकर जो उसके बिल्कुल उलटी दुःख-दरिद्र और क्लेश-कलह की स्थिति उत्पन्न कर देती है वह कुबुद्धि रूपी राख है। जैसे अंगार को राख ढ़क कर उसको अपनी स्वाभाविक स्थिति से वंचित कर देती है वैसे ही आत्मा की परम सात्विक, परम आनन्दमयी स्थिति को यह कुबुद्धि ढ़क लेती है। और मनुष्य निकृष्ट कोटि का दीन-हीन जीवन व्यतीत करने लगता है।
‘कुबुद्धि’ को ही माया, असुरता, अविद्या, आदि नामों से पुकारते हैं। यह आवरण मनुष्य की मनोभूमि पर जितना मोटा चढ़ा होता है वह उतना ही दुखी पाया जाता है। शरीर पर मैल की जितनी मोटी तह जम रही होगी उतनी ही खुजली मचेगी और दुर्गन्ध उड़ेगी, यह तह जितनी ही कम होगी उतनी ही खुजली और दुर्गन्ध कम होगी। शरीर में दूषित, विजातीय विष एकत्रित न हो तो किसी प्रकार को कोई रोग न होगा। पर यह विकृतियाँ जितनी अधिक जमा होती जायेगी शरीर उतना ही रोग-ग्रस्त होता जायेगा। ‘कुबुद्धि’ एक प्रकार से शरीर पर जमी हुई मैल की तह या रक्त में भरी हुई विषैली विकृति है जिसके कारण खुजली, दुगन्ध, बीमारी तथा अनेक प्रकार की अन्य असुविधाओं के समान जीवन में नाना प्रकार की पीड़ा, चिन्ता, बेचैनी और परेशानी उत्पन्न होती रहती है।
लोग नाना प्रकार के कष्टों से दुखी हैं। कोई बीमारी से कराह रहा है, कोई गरीबी से दुखी है, किसी का दाम्पत्य जीवन कष्टमय है, किसी को सन्तान की चिंता है, व्यापार में घाटा, उन्नति में अड़चन, असफलता की आशंका, मुकदमा, शत्रु के आक्रमण का भय, अन्याय का उत्पीड़न, मित्रों का विश्वासघात, दहेज की चिन्ता, प्रियजनों का विछोह, आदि का दुख आये दिन दुखी बनाये रहता है। व्यक्तिगत जीवन की भाँति धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में भी अशान्ति कम नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अपने आपको बहुत सम्भाल कर रखे, तो भी व्यापक बुराइयों एवं कुव्यवस्थाओं के कारण उसकी शान्ति नष्ट हो जाती है और जीवन का आनन्दमय उद्देश्य प्राप्त करने में बाधा पड़ती है।
दुःख चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक उनका कारण एक ही है और वह है कुबुद्धि। संसार में इतने प्रचुर परिमाण में सुख-साधन भरे पड़े हैं कि इन खिलौनों से खेलते-खेलते सारा जीवन हँसी-खुशी बीत सकता है। मनुष्य को ऐसा अमूल्य शरीर, मस्तिष्क एवं इन्द्रिय समूह मिला हुआ है कि इनके द्वारा साधारण वस्तुओं एवं परिस्थितियों में भी इतना आनन्द किया जा सकता है कि स्वर्ग भी उसकी तुलना में तुच्छ सिद्ध हो। इतना सब होते हुए भी लोग बेहाल दुःखी हैं, जिन्दगी में कोई रस नहीं, मौत के दिन पूरे करने के लिये समय को एक बोझ की तरह काटा जा रहा है। मन में चिन्ता, बेबसी, भय, दीनता और बेचैनी की अग्नि दिन भर जलती रहती है। जिसके कारण पुराणों में वर्जित नारकीय यात्राओं जैसी व्यथाएं सहनी पड़ती हैं।
यह संसार चित्र सा सुन्दर है इसमें कुरूपता का एक कण भी नहीं, यह विश्व विनोदमयि क्रीड़ा का प्राँगण है इसमें चिन्ता और भय के लिए कोई स्थान नहीं, यह जीवन आनन्द का निर्वाध निर्भर है इसमें दुःखी रहने का कोई कारण नहीं। स्वर्गादपि गरीयसी इस जननी जन्म भूमि में वे सभी तत्व मौजूद हैं जो मानस की कली को खिलाते हैं। इस सुरदुर्लभ नर तन की रचना ऐसे सुन्दर ढंग से हुई है कि साधारण वस्तुओं को वह अपने स्पर्श मात्र से ही सरस बना लेता है। परमात्मा का राजकुमार आत्मा इस संसार में क्रीड़ा कल्लोल करने आता है। उसे शरीर रूपी रथ, इन्द्रियों रूपी सेवक, मस्तिष्क रूपी मंत्री देकर परमात्मा ने यहाँ इसलिये भेजा है कि इस नन्दन वन जैसे संसार की शोभा को देखे, उसमें सर्वत्र बिखरी हुई सरसता का स्पर्श और आस्वादन करे। प्रभु के इस महान उद्देश्य में बाधा उपस्थित करने वाली, जीवन के महान प्रयोजन को नष्ट करने वाली, स्वर्ग को नरक बना देने वाली कोई वस्तु है तो वह केवल ‘कुबुद्धि ही है’।
स्वस्थता हमारी स्वाभाविक स्थिति है, बीमारी अस्वाभाविक एवं अपनी भूल से पैदा हुई वस्तु है। पशु-पक्षी जो प्रकृति का स्वाभाविक अनुसरण करते हैं, बीमार नहीं पड़ते, वे सदा स्वास्थ्य का सुख भोगते हैं पर मनुष्य नाना प्रकार की मिथ्या आहार-विहार द्वारा बीमारी को न्यौता बुलाता है। यदि वह भी अपना आहार-विहार प्रकृति के अनुकूल रखे तो कभी बीमार न पड़े। इसी प्रकार सद्बुद्धि स्वाभाविक है। वह ईश्वर प्रदत्त है, दैवी है, जन्मजात है, जीवन संगिनी हैं। संसार में भेजते समय प्रभु हमें सद्बुद्धि रूपी कामधेनु भी देते हैं ताकि वह हमारे सम्पूर्ण सुख साधन जुटाती रहे परन्तु हमें भूल वश, भय वश, अज्ञान वश, आय ग्रस्त होकर सद्बुद्धि को त्यागकर कुबुद्धि को अपना लेते हैं और जैसे मिथ्याचरण से बीमारी न्योता बुलाई जाती है वैसे ही मानसिक अव्यवस्था के कारण कुबुद्धि को आमंत्रित किया जाता है। यह पिशाचिनी जहाँ आई नहीं कि जीवन का सारा क्रम उलटा हुआ नहीं, दोनों एक साथ रह नहीं सकतीं, जहाँ कुबुद्धि होगी वहाँ तो अशान्ति, चिंता, तृष्णा, दीनता, नीचता, क्रूरता आदि की कष्टकारक स्थितियों का ही निवास होगा।
गायत्री, सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है। इसके चौबीस अक्षरों में 24 अमूल्य शिक्षा संदेश भरे हुए हैं वे सद्बुद्धि के मूर्तिमान प्रतीक हैं। उन शिक्षाओं में से वे सभी आधार मौजूद हैं जिन्हें हृदयंगम करने वाले का सम्पूर्ण दृष्टिकोण शुद्ध हो जाता है और उस भ्रम अन्य अविद्या का नाश हो जाता है जो आये दिन कोई न कोई कष्ट उत्पन्न करती रहती है। गायत्री महामंत्र की रचना ऐसे वैज्ञानिक आधार पर हुई है कि उसकी साधना से अपने भीतर छिपे हुए अनेकों गुप्त शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं और अन्तस्तल में सात्विकता की निर्झरिणी बहने लगती है। विश्व व्यापी अपनी प्रबल चुम्बक शक्ति से खींचकर अन्तः प्रदेश में जमा कर देने की अद्भुत शक्ति गायत्री में मौजूद है। इन सब कारणों से कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्री की तरह प्रभावशाली सिद्ध होता है। इस शमन के साथ-साथ अनेकों दुःखों की समाप्ति हो जाना भी पूर्णतया निश्चित है। गायत्री देवी प्रकाश की वह अखंड ज्योति है जिसके कारण कुबुद्धि का अशानान्धकार दूर होता है और अपनी वही स्वाभाविक स्थिति प्राप्त हो जाती है जिसको लेकर आत्मा इस पुरायमयी धरती माता की परम शान्तिदायक गोदी में किलोल करने आया है।
रंगीन काँच का चश्मा पहन लेने पर आँखों पर सब चीजें उसी रंग की दीखती है जिस रंग का कि वह काँच होता है। कुबुद्धि का चश्मा लगा लेने से सीधी साधारण सी परिस्थितियाँ और घटनायें भी दुःखदायी दिखाई देने लगती हैं। जिस मनुष्य को भौंरी रोग हो जाता है सिर घूमता है, मस्तिष्क के चक्कर आते हैं उसे दिखाई पड़ता है कि सारी पृथ्वी, मकान, वृक्ष आदि घूम रहे हैं। डरपोक आदमी को झाड़ी में भूत दिखाई देने लगता है। जिसके भीतर दोष है उसे बाहर के सुधार के कुछ लाभ नहीं हो सकता, उसका रोग मिटेगा तभी बाहर बुरी अनुभूतियों का निवारण होगा। पीला चश्मा पहनने वाले के सामने चाहे कितनी ही चीजें बदल कर रखी जाएं पर पीले पन के अतिरिक्त और कुछ दिखाई न देगा। बुखार से मुँह कडुआ हो रहा है उसे स्वादिष्ट पदार्थ भी कडुए लगेंगे। कुबुद्धि ने जिसके दृष्टिकोण को, चिर प्रवाह को दूषित बना दिया है वह चाहे स्वर्ग में रखा जाय चाहे कुबेर सा घने पति या इन्द्र सा सत्ता सम्पन्न बना दिया जाय तो भी दुःखों से छूट न सकेगा।
गायत्री महामंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है जो व्यक्ति कुबुद्धि से बचने और सद्बुद्धि की ओर अग्रसर होने का व्रत लेता है वही गायत्री का उपासक है। इस उपासना का फल तत्काल मिलता है जो अपने अन्तःकरण में सद्बुद्धि को जितना स्थान देता है उसे उतनी ही मात्रा में तत्काल आनन्दमयी स्थिति का लाभ प्राप्त होता है।
सोये हुए गाँव को जैसे बाढ़ बहा ले जाती है वैसे ही पुत्र और पशुओं में लिप्त मनुष्य को मौत ले जाती है। जब मृत्यु पकड़ती है उस समय पिता, पुत्र, बन्धु या जाति वाले कोई भी रक्षा नहीं कर सकते। इस बात को जानकर बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह शीतवान बने और निर्वाण की ओर ले जाने वाले मार्ग को जल्द साफ करे।
जो अलज्जा के काम में लज्जा करते हैं और लज्जा के काम में लज्जा नहीं करते, जो भय रहित काम में भय देखते हैं और भय के काम में निर्भय रहते हैं, और जो अदोष में दोष बुद्धि रखते हैं और दोष में अदोष रखते हैं वे झूठी धारणा वाले जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
-धम्मपद
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राग के समान आग नहीं, द्वेष के समान भूत पिशाच नहीं, मोह के समान जल नहीं और तृष्णा के समान नदी नहीं-
महात्मा बुद्ध
(श्री स्वामी भोले बाबाजी महाराज)
विपरीत ज्ञान का नाम अविद्या है। अथवा जैसे वस्तु हो उसको वैसी न जानना किन्तु उससे अन्य प्रकार की जानना, उसका नाम अद्य है। लोक में इसको मूर्खता कहते हैं, शास्त्रकार इसी को अविवेक, अविचार, अज्ञान, मोह आदि नामों से पुकारते हैं। यह अविद्या यानी मूर्खता ही समस्त अनर्थों का कारण है। इसी के कारण से मनुष्य, चतुर मनुष्य, अपने को पंडित मानने वाले भी आपको यानी अपने स्वरूप को भी नहीं जानते! बालक से भी पूछा जाय कि तू देह है या तेरा देह है, तो उत्तर देता है कि मेरा देह है, मैं देह नहीं हूँ, इससे स्पष्ट है। कि देह से, देह का मालिक, देह वाला मित्र है। फिर भी सब आपको देह ही समझते हैं, देह ही मानते हैं देह ही जानते हैं, और देह ही कहते हैं।
विद्वानों का वचन है कि “जो मूढ़ आप कुछ है, मानता अपने को कुछ है, आत्मा को-आपको चुराने वाले उस चोर ने कौन सा पाप नहीं किया यानी सब पाप कर लिये। यह अविद्या ही सब पापों की कराने वाली है। इसी के कारण से मनुष्य आपको भूल कर देह आदि को आत्मा यानी अपना स्वरूप मानने लगता है और जन्म-मरण के चक्र में पड़कर अनेक योनियों में जन्म लेकर अनेक दुःख भोगता है किन्तु जीव के साथ जीती है।
विद्वानों का वचन है कि संसार में मूर्खता ही दुःख है, इसके सिवाय अन्य कोई दुःख नहीं है, सर्प का काटा एक बार मरता है, विष खाने वाला भी एक ही बार मरता है, अविद्या तो बार-बार मरती है, करोड़ों जन्म तक भी जीव इससे छूट नहीं सकता अथवा यों कहिए कि इससे छूटने की कभी भी आशा ही नहीं है। कई विद्वान कहते हैं कि-यह अविद्या घोर अन्धेरी रात है इसमें विचरने वाला करोड़ों वर्षों युगों तक ठोकरें खाता रहता है। यह अविद्या भीषण पिशाचिनी है, जो निरन्तर प्राणियों का माँस खाती रहती है। क्या यह अविद्या भयंकर नहीं है? जो अपने में पड़ने वाले जीवों को डुबाती उछालती हुई दुःखी करती रहती है। यह अविद्या क्षय रोग की बीमारी है, घुला-घुला कर सुखा कर जीवों को मारती रहती है, चैन से सोने नहीं देती! यह सब कथन ठीक ही हैं, अविद्या ऐसी ही है। समस्त अवगुणों की हानि और समस्त शुभ गुणों को चुराने वाली यह अविद्या ही है कोई धीर, वीर ही, जिसके ऊपर ईश्वर की कृपा हो, इस डाकिनी के पंजे में से छूट सकता है नहीं तो सब उसके पंजे में फँसे ही रहते हैं निकल नहीं सकते।
निकल कैसे सकते हैं? कोई एक दो चुड़ैल के वश हों, तो निकल सकते हैं, यहाँ तो यह भूतनी सबके सिर के ऊपर चढ़ी हुई यह पिशाचिनी सबको नचा रही है, और आप उनका तमाशा देख रही हैं। कोई स्त्री की कामना से दुःखी होकर रो रहा है, कोई पुत्र की इच्छा से आँसू बहा रहा है, इतना ही नहीं, दूसरे से लड़ रहा है, कट रहा है, मर रहा है, दुःखी हो रहा है। अविद्या ने सबकी आँखें बन्द कर दी हैं, सब अन्धे कर दिये हैं, इसलिये कहीं कोई किसी से रोग कर रहा है, कोई किसी से द्वेष कर रहा है, कोई किसी की चोरी कर रहा है, कोई किसी की जमीन दबाना चाहता है। सारांश यह है कि आंखें बन्द होने के कारण सब ठोकरें खा रहे हैं, हाय-हाय कर रहे हैं, जिसके करने से दुःख उठाते हैं, उसी को बारम्बार करते हैं सुखी नहीं होते, उलटे दुःखी ही होते हैं, फिर भी दुःख के कार्य को नहीं छोड़ते, यह आश्चर्य है। इस प्रकार आप सभी इस अविद्या के वश दुःखी हैं, करोड़ों में कोई विरला एक विवेकी ही इससे मुक्त हो तो भले हो।
इस अविद्या की निवृत्ति विद्या से होती है। सत् शास्त्रों का पठन-पाठन करने से और सन्त महात्माओं का संग करने से विद्या की प्राप्ति होती है, विद्या की प्राप्ति होते ही, जैसे उजाले के होते ही अन्धेरा दूर हो जाता है, इसी प्रकार अविद्या दूर हो जाती है, जैसे आँख बन जाने से मनुष्य सब वस्तुऐ देखने लगता है, इसी प्रकार भाग्यवान अधिकारी सत्य असत्य का विवेकी हो जाता है विवेकी पुरुष न तो कभी शोक करता है, न मोह करता है न किसी से भय करता है, न किसी से वैर करता है, किन्तु निःशंक, निर्मोह, निर्भय और निडर होकर सुख पूर्वक विचरता है। अब तक जो दुःखी और दीन नहीं होता, किन्तु सुखी, धीर, वीर और उदार हो जाता है। जैसे कल्प करने से मनुष्य फिर नये सिरे से वृद्ध से युवा हो जाता है। उसी प्रकार यह धीर पुरुष काया पलट हो जाता है। कल्प करने से तो स्थूल शरीर ही पुष्ट होता है विद्या से तो सूक्ष्म और को रण शरीर स्वस्थ हो जाते हैं, इतना ही नहीं किन्तु आत्मा अनात्मा का विवेक होने से अनात्मा से वैराग्य हो जाता है और धीर पुरुष आत्मा का अनुसंधान करता हुआ अजर अमर हो जाता है।
सत्शास्त्रों के पढ़ने से और सत्संग करने से विद्या उदय होती है, अविद्या अस्त हो जाती है, इसलिये श्रेयकांक्षी को सत् शास्त्र का अवलोकन और संत महात्माओं का सत् कर्तव्य है। ऐसा करने से विचार रूपी सूर्य उदय होता है, अविद्या रूपी रात्रि भाग जाती है, अविद्या रूपी रात्रि के भाग जाने पर उसमें विचरने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, असूया, ममता, अहंता, कृपणता आदि अशुभ गुण भाग जाते हैं और उनके भागते ही शर्म, दम, शान्ति, सन्तोष, दया, क्षमा, समता, एकाग्रता, वीरता, धीरता, उदारता, विवेक, वैराग्य आदि शुभ गुण अधिकारी के हृदय में वास करने लगते हैं। इनके वास करने से अन्तःकरण इतना पवित्र और प्रसन्न हो जाता है यानी शुद्ध हो जाता है कि मल-विक्षेप और आवरण तीनों अन्तःकरण के दोष दूर हो जाते हैं, जैसी वस्तु वैसी ही वस्तु दिखाई देने लगती है। इसी का नाम सम्यक् है सम्यक् ज्ञान मात्र ही सुखी और स्वतंत्र होने का एक उपाय है। सत्शास्त्र और सत्संग से सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है, ऐसा जानकर चतुर पुरुष कुशास्त्र और कुसंग को त्याग करके सत्शास्त्र और सत्संग का ही सेवन करता है।
जैसे सिद्धाँजन का सेवन करने से गड़ा हुआ धन दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार सत् शास्त्र और सत्संग से छुपा हुआ आत्म तत्व प्रत्यक्ष हो जाता है। जैसे सूर्य के निकलने से कमल खिल जाता है, इसी प्रकार इन दोनों के प्राप्त होने से भाग्यवान अधिकारी का हृदय कमल विकसित हो जाता है। जैसे चन्द्रमा के उदय होने से दिन का ताप दूर हो जाता। जैसे अग्नि सेवन करने से जाड़ा दूर हो जाता है, इसी प्रकार इन दोनों के सेवन से अविद्या रूप जड़ता दूर हो जाती है।
जो वस्तु अनादि और अनन्त है उसी में सुख है, अन्तवान वस्तु में सुख नहीं है, अंतवान वस्तु का एक दिन अवश्य नाश होगा, इसलिये जो उस पर आ सका होगा उसको दुःखी ही होना पड़ेगा।
-विजयकृष्ण गोस्वामी
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अगर तेरे हृदय में प्रेम है तो उसका ढिंढोरा न पीट। तेरे हृदय के भाव को अन्तर्यामी जानते ही हैं।
-महात्मा मलूकदास
(श्री स्वामी रामतीर्थ जी)
उपासना- जिन लोगों के हृदय में शिव रूप त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन , सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगों के अन्तःकरण लक्ष्मी, धन दौलत की लाग में मोहित हैं वे दरिद्र के पात्र रहते हैं जैसे जो कोई सूर्य की तरफ पीठ मोड़ कर अपनी छाया को पकड़ने दौड़ता है, तो छाया उससे आगे बढ़ती जाती है। कभी काबू में नहीं आती है। और जो कोई छाया से मुँह फेर कर सूर्य की और दौड़े तो छाया अपने आप ही पीछे भागती आती है, साथ छोड़ती ही नहीं।
कौन प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है? जिससे हमारा स्वार्थों इतना कम हो कि मानो वह सत्य स्वभाव ईश्वर का अपना ही काम है यह तो रही अति उत्कृष्ट उपासना। उपासना की जरा न्यून स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या प्यारी और प्रबल है। बच्चा अपने माता-पिता को अनन्त शक्तिमान मानता है। और उनके बल को अपना बल समझ कर माता की गोद में बैठा हुआ शाहनशाही करता है, रेल को भी धमका लेता है। पवन और पक्षियों पर भी हुकुम चलाता है, दरिया को भी कोसने लगता है और कोई चीज असम्भव जानता ही नहीं। धन्य हैं वे पुरुष उच्च भाग्य वाले जिनका इस जोर का विश्वास सचमुच सर्व शक्तिमान पिता में जम जाए।
दुःखी दुष्ट में और रंगीले मतवाले मस्त में फर्क सिर्फ इतना ही है। एक के चित्त में कामना अंश ऊपर है भक्ति अंश नीचे। दूसरे के चित्त में राम ऊपर है और काम नीचे। एक यदि साक्षर है। तो उलट पलट से दूसरा राक्षस है।
माँगना दो प्रकार का है, एक तो तुच्छ “मैं” (अहंता, ममता) को मुख्य रखकर अपनी वृद्धि और दूसरा ज्ञान-प्राप्ति, तत्व-दर्शन, हरि सेवा को परम प्रयोजन ठान कर आत्योन्नति माँगनी। प्रथम प्रकार की प्रार्थना तो मानो ईश्वर का तुच्छ नाम रूप (जीव) का अनुचर बनाना है। अपनी सेवा की खातिर इर्नाश्वर को बुलाना है, उलटी गंगा बहाना है। द्वितीय प्रकार की प्रार्थना सीधी बाट पर जाना है।
आत्मा में चित्त के लीन होते समय जो भी संकल्प होगा सत्य तो अवश्य ही हो जायगा, परन्तु यदि वह संकल्प अज्ञान, अधर्म और स्वार्थमय है तो काँटेदार विष भरे अंकुर की नाई उगकर दारुण परिणाम का हेतु होगा। अहंता, ममता और भोग कामना सम्बन्धी ईश्वर से प्रार्थना करना मैले ताँबे (ताम्र) के बर्तन में पवित्र दूध को भरना है। दुःख पाकर जो सीखोगे तो पहिले ही अपवित्र वासना को क्यों नहीं त्याग देते। अशुभ भावना में औरों का भी बुरा होता है और अपनी भी खराबी। शुभ भावना, पवित्र भाव, ज्ञान, विज्ञान की प्राप्ति में न केवल अपना ही कल्याण होता है वरन् परोपकार भी। मन में सत्वगुण, शान्ति, आनन्द और शुद्धि हो तो हमारे काम स्वयं ईश्वर के काम होते हैं। पूरे होते देर लग ही नहीं सकती।
आज पहले ही नहीं समझ जाओ, अभी समझ लो, तो मारोगे ही नहीं मरने के वक्त गीता तुम्हारे किस काम आयेगी? अपनी जिन्दगी को ही भगवान की गीत बना दो। मरते वक्त दीपक तुम्हें क्या उजाला करेगा। हृदय में हरि ज्ञान प्रदीप अभी जला दो।
(श्री भैरवप्रसाद जी ‘विशारद’)
प्रकृति का सर्वप्रथम सर्वोत्कृष्ट नाटककार वह परम परमेश्वर ही है। जिसने इस संसार रंग-मंच पर भाँति-भाँति के सुंदरतम अनुपम और मनोहर पर्वतीय, सामुद्रिक, नदिया, जंगल और आकाश सम्बन्धी विभिन्न रंगों और रूपों से विभूषित दृश्यों की अवतरण की, भिन्न-भिन्न पशु−पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों और नर-नारियों के सुन्दर-असुन्दर, हिंसक तथा अहिंसक मैले और बुरे रूपों में पात्र तथा पुत्रियों की सजीव और यथार्थ कल्पना की, पशु-पक्षियों की भयंकर गर्जना तथा सुमधुर कलरव एवं मानवों की विभिन्न भाव प्रवाहहीन ध्वनियों, द्वारा कर्ण-प्रिय मृदु संगीत तथा भावना भरे संवादों को जन्म दिया और जिसने इन विभिन्न जीवधारियों के आपस के जीवन संघर्ष एवं उसका प्रकृति के साथ सामंजस्यकारी चरित्रों का गढ़न किया।
नाटक के एक नाटककार के लिए जिस प्रकार उसका उच्च, अप्रतिम चरित्रवाहक नायक प्रिय तथा अत्यावश्यक होता है। ठीक उसी प्रकार क्षुद्र तथा नीच तथा नीच प्रकृति और वृत्ति का पात्र भी उसे प्रिय तथा आवश्यक होता है। वह इन दोनों को साथ लेकर चलता है, एक के बिना उसका नाटक सम्पूर्ण हो, ही नहीं सकता और इसलिए वह इन दोनों को ही समान दृष्टि से देखता है, यदि नाटककार ऐसा न होकर कुछ और ही निराली वस्तु हो जाता है। और वह नाटककार के पद से च्युत हो जाता है। वह महाप्रभु कोई साधारण नाटककार है कलाकार है और इसीलिए वह अपने उच्च एवं क्षद्राति क्षुद्र पात्रों को समदृष्टि से देखता है, यदि वह एक को प्यार करता है, तो दूसरे को भी, यदि वह एक को दंडित करता है, तो दूसरे को भी उसका न्याय तो सबके लिये बराबर है, एक है। और इसीलिए ऋषियों ने उसे समदृष्टि के नाम से स्मरण किया है।
संसार के रंग-मंच पर वह महाप्रभु अपने पात्रों विभिन्न गुणों, तथा भाँति-भाँति के कलेवरों में भेजता है। भेजते समय वह अपने पात्रों से आशा रखता है कि वे उसके दत्त गुणों एवं शक्तियों का उपयोग कर अपना-अपना अभिनय सफलतापूर्वक दर्शन का प्रयत्न करें इस प्रयत्न में जो पात्र सफल होते हैं, पुरस्कृत होता है और जो असफल होता है वह दंडित। कर्म शुभाशुभ फलों का संकेत इसी पुरस्कार और दंड से तो है।
किन्तु इस संसार में आ कर, माया के जाल में फँस उस परमात्मा के दत्त गुणों एवं शक्तियों का दुरुपयोग जितना यह मानव करता है। उतना अन्य प्राणी नहीं। मानव की इसी दशा को तो देख मैथिलीशरण गुप्त की कंत आत्मा चीख उठी--
करते हैं हम पतित जनों में,
बहुधा पशुता का आरोप।
करता है पशुवर्ग किन्तु क्या,
निज निसर्ग नियमों का लोप?
ये पंक्तियाँ किस मानव का सिर न झुका देंगी? आज मानव संसार का जो वीभत्स दृश्य हमारी आँखों के सामने विद्यमान है, उसकी कल्पना मात्र से ही हमारा हृदय विदीर्ण हो जाता है, नेत्र घृणा एवं आत्मिक वेदना से बन्द हो जाते हैं। आज मानव के रक्त का प्यासा हो अपनी पाशविक वृत्ति का जो परिचय दे रहा है, उसे देख क्या हम यह कहने का साहस कर सकते हैं कि द्वेष, ईर्ष्या तथा स्वार्थ के वशीभूत हो जो नरपिशाच आज रण चण्डी का आह्वान कर करोड़ों निरीह प्राणियों को यम-लोक भेज रहे हैं। हजारों कलामय ऐतिहासिक प्रसादों एवं धर्म स्थानों को ध्वंस कर रहे हैं तथा करोड़ों के गाढ़े परिश्रम की कमाई शस्त्रीकरण में व्यय कर बम्ब के धुओं में उड़ा लाखों को भूखों मार रहे हैं। उनको देख क्या कोई भी मानव यह कह सकता है कि कविवर पंत ने ये पंक्तियाँ उन्हीं मानवों को लक्षित कर लिखी थी-
“सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर,
मानव तुम सब से सुंदरतम।
कदापि नहीं। सचमुच आज का मानव-मानव न रहकर राक्षस बन गया है- भयंकर रक्त-पिचासु रीछ या व्याघ्र बन गया है।
अब आइये तनिक विचार करें कि आखिर उस देव दुर्लभ मानव शरीर की ऐसी स्थिति क्योंकर प्राप्त हुई? इसका एक मात्र उत्तर यही होगा कि मानव भूल गया अपने सृजनहार को, भूल गया उस नाटककार को जिसने उसे इस संसार में अपना पार्ट अदा करने भेजा था, भूल गया उस शक्ति स्त्रोत को जिसने उसे कार्य करने की शक्ति प्रदान की, भूल गया उस महाप्रभु की सत्ता को जिसने उसे अस्तित्व का रूप दिया, भूल गया उस जगदाधारा कृपालु भगवान की करुणाधार को जिससे संसार में उसके सौंदर्य और सुख की अनुपम कल्पना को जिसने सारे ब्रह्माण्ड को जन्म दिया तथा जो सारे प्राणियों का पुत्रवत् पालन पोषण करता है। यदि ऐसा न होता, मानव का विश्वास उस परमपिता परमात्मा में यथावत् बना रहता, यदि वह उसकी सारी सृष्टि को अपनी अहंकारता तथा स्वार्थ की वस्तु न जान, उसे उस प्रभु की ही जानता तो भला कैसे उस परमात्मा की प्यारी वस्तु को आघात पहुँचाता, वह उसे भी उतनी ही प्यारी क्यों न होती जितनी स्वयं वह उसके सृजनहार कल्याणकर भगवान् को है।
वह दूसरे मानव को भाई क्यों न समझता, वह दूसरे प्राणी को अपने ही जीव की भाँति क्यों न मानव, दूसरे के सुख-दुख से सुखी और दुःखी क्यों न होता? दूसरों के क्षत-विक्षत शरीरों को छटपटाते देख वह काल की तरह क्यों ठहाका मारता हँसता है? दूसरों को सुख में देख वह जलकर राख क्यों होता? उसे तो प्राणिमात्र के दुःखों से हार्दिक सम्वेदना और सहानुभूति होती, उनकी पीड़ाओं से उसका मर्म फट पड़ता। अधिक मानव। तुझसे भी कृतघ्न कोई होगा?
साँसारिक सुख-दुःख प्रकाश-अन्धकार उत्थान-पतन की अबूझ पहेलियों के झिलमिल परदे की आड़ से एक चैतन्य आत्मा उस सतत प्रवाहहीन शक्तिधारा का दर्शन करती है, क्योंकि वह सोचती है कि जब तक एकीकरण नहीं हो जाता तब तक साँसारिक दुःखों से उसकी मुक्ति नहीं इसी एकीकरण की साधना का नाम भक्ति है। इसी भक्ति से नशे में झूमकर ऋषि को आत्मा पुकार उठती है- ‘अहं ब्रह्म’
जब वही प्रभु कण-कण में पुष्प-पुष्प में, प्राण-प्राण में विद्यमान है। तो वह ईश्वर का वाहक कैसे किसी पुष्प को तोड़ सकता है, कैसे किसी प्राणी को किंचित् मात्र भी कष्ट पहुँचा सकता है? वह समझता है ऐसा करने से उसके प्रभु के अन्तर को चोट लगेगी। प्रभु को भला वह दुःखित कर सकता है? वह प्रभु को प्रसन्न रखने के लिए संसार की समस्त वस्तुओं और प्राणियों को अपने प्रभु का ही प्रतीक समझ उनसे प्रेम करने लगता है- उन्हीं के प्रेम की सीढ़ी पर चढ़ वह ‘घट-घट रमैया’ तक पहुँचना चाहता है और यही होती है उसकी साधना।
प्रभु-भक्त किसी प्रकार भी दूसरों के हृदय को कष्ट नहीं पहुँचा सकता। फिर उसे शस्त्र की आवश्यकता ही क्यों हो? उसके पास तो ‘प्रभु-भक्ति’ का अमोघ शस्त्र है, जो न केवल उसकी ही रक्षा करता है, बल्कि दूसरों की रक्षा करता है। कष्ट उससे किसी को मिल ही नहीं सकता। तुलसीदास जी के शब्दों में सुनिये- रावण ऐसा महापराक्रमी वीर योद्धा से श्री रामचन्द्र जी युद्ध करने जा रहे हैं। रावण रथ पर आरुढ़ है और रामचन्द्र जी रथ हीन हैं यह देख कर विभीषण अधीर हो गए। श्री राम के प्रति अधिक प्रीति होने से मनोगत भय को रोक न सके। प्रभु के चरणों में वन्दना कर प्रेम के साथ वे श्री राम से बोले-
‘नाथ न रथ नाहीं पदत्राना।
केहि विधि जी रिपु बलवाना॥’
इनमें कितनी मार्मिकता है। अपने प्रिय की कल्याण भावना की कितनी सुन्दर व्यंजना है। श्री रामचन्द्र जी उनकी बात समझ गए। अपने मित्र के भय को दूर करने के लिये उन्होंने अपने अमोघ रथ और शस्त्र का वर्णन यों किया-
सुनहु सखा कह कृपा निधाना।
जेहि जय होइ सो स्यन्दन आना॥
सौरज, धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य-शील दृढ़ ध्वज पताका॥
बल विवेक दम परहित घोरे।
छमा-कृपा समता रजु जोरे॥
ईश-भजन सारथी सुजाना।
विरति चर्म सन्तोष कृपाना॥
दान परसु बुद्धि शक्ति प्रचण्डा।
बर विज्ञान कठिन को दण्डा॥
अमल अचल मन त्रोन समाना।
समजम नियम सिली मुख नाना॥
कवच अभेद विप्र पद पूजा।
एहि सम विजय उपाय न दूजा॥
सखा धर्म-भय अस रथ जाके।
जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताके॥
महा अजय संसार रिपु जीत सकइ सो वीर।
जाके अस रथ होय दृढ़, सुनहु सखा मति धीर॥
यही अमोघ शस्त्र है न? प्रभु भक्त इसी शस्त्र के बल पर अपने इने-गिने शत्रुओं पर ही नहीं, एक समाज, देश या भूखंड पर नहीं, बल्कि सारे संसार पर सर्वकालिक विजय प्राप्त करता है। और वह भी विजित के शरीर को बन्दी बनाकर नहीं बल्कि उनके हृदय पर स्थायी और चिर अधिकार जमा कर। उसे हवाई जहाज, टैंक, बम के गोलों और विषैली गैसों की आवश्यकता ही क्यों पड़े? न तो वह किसी के अधिकार को आत्मघात करना चाहता है, न ही किसी से उसकी शत्रुता है, न किसी से वैर। वह सबको उसी प्रभु का पुत्र समझता है जिसका वह स्वयं प्यारा लाडला पुत्र है।
यहीं प्रभु भक्ति अपनी चरमोत्कृष्टता को प्राप्त हो जाती है। ईश्वर-भक्ति की अमृत धारा में स्नान करने से भक्त आत्मा का द्वेष, ईर्ष्या और क्रोधित दुर्गुणों का पंक धुल जाता है, वह अलौकिक ज्योति से प्रदीप्त हो संसार को, विश्व प्रेम को प्रेम का प्रकाश देता है। वह अनन्त पंथ का जानकार बन चिर सुन्दर सन्देश संसार को सुनाता है। वह मसीहा बन संसार के दुःखों को दूर करने का अमोघ मंत्र बताता है, और सच तो यह है कि वह अपनी वाणी, चरित्र कार्य तथा प्रत्येक अंग परिचालन तक से संसार का कल्याण करता है, क्योंकि वह समझता है-लोक सेवा ही प्रभु सेवा है- सच्ची प्रभु भक्ति है।
लाभ क्या है? गुणियों की संगति, दुःख क्या है? मूर्खों का संग, हानि क्या है? समय को नष्ट करना, निपुणता क्या है? धर्म में प्रीति, शूर कौन है? जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, प्रियतम कौन है? जो पतिव्रता है, धन क्या विद्या, सुख क्या है? परदेश न जाना, राज्य क्या है? अपनी आज्ञा का चलाना।
-भतृहरि
अध्यात्मशास्त्र में स्थान पर तीन ऐषणाओं की बहुत निंदा की गई है। वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा यह तीनों इच्छाएं भौतिक, त्याज्य एवं बन्धन में बाँधने वाली बताई गई हैं। वित्तेषणा का अर्थ है- धनलोलुपता। पुत्रेषणा का तात्पर्य है-सन्तानोत्पादन में काम सेवन में असंयम। लोकेषणा का भावार्थ है- सस्ती वाह-वाही लूटने की मूर्खता।
यों धन, सन्तान और यश तीनों ही आवश्यक हैं इनका उचित उपार्जन आवश्यक एवं प्रशंसनीय है परन्तु जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो यह इच्छाएं, ऐषणाएं कहलाने लगती है। और उनकी निन्दा की जाती है। इन्हें त्यागने का अर्थ है इनकी अति का, अमर्यादा का, अनौचित्य का परित्याग करना। आइए, इन तीनों इच्छाओं के सम्बन्ध में विशेष ध्यान देकर विचार करें।
शरीर यात्रा, बौद्धिक विकास एवं सुस्थिर जीवन के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता है वे सम्पत्ति कहलाती हैं। उन्हें उचित मात्रा में, उचित रीति से, उपयोग के लिए कमाना एक अत्यावश्यक कर्तव्य है। परन्तु अधिकाधिक संचय की तृष्णा अनुचित मार्ग से अनीतिपूर्वक कामना अनुपयुक्त कार्यों में धन का उपयोग, धन को ही सुख का केन्द्र मानकर उसी की अभिलाषा में निरन्तर डूबे रहना, यह वित्तेषणा में निमग्न हो सकती है और कोई धन कुबेर भी राजा जनक या बादशाह नसीरुद्दीन की तरह अपने को उसका ट्रस्टी मानता हुआ उस पर अधिकार रख सकता है। मामाशाह धनपति थे पर उसने राष्ट्र की आवश्यकता पर राणा प्रताप को अपना सारा खजाना सौंपते हुए तनिक भी संकोच न किया। धन की मात्रा की न्यूनाधिकता का कुछ महत्व नहीं। उसकी तृष्णा, बेचैनी एवं लालसा ही वित्तेषणा कहलाती है, कारण यह है कि अधिक लालच के कारण जीवन की अन्य आवश्यकताओं पर ध्यान देना कठिन हो जाता है। अत्यन्त आवश्यक आत्मिक विकास की उपेक्षा की जाती है। और अनीति से उपासना करते हुए पाप का भय भी नहीं लगता इन कारणों से सम्पत्ति के उपार्जन का ‘कर्तव्य’ ‘वित्तेषणा’ को ‘अकर्तव्य’ बताया है। इस बारीकी को न समझने वाले परिश्रमपूर्वक रोटी कमाने को छोड़कर भीख टूक माँग खाने के लिए उतर पड़ते है। और भ्रमवश अपने मिथ्याचार को वैराग्य मान बैठते हैं। वैराग्य का अर्थ मन का राग रहित निर्लोभ, होना है। कर्तव्य का परित्याग तो किसी प्रकार भी वैराग्य नहीं कहा जा सकता।
ऐश्वर्य और में विलासिता भारी अन्तर है इन्द्रियों की सरलता का निर्माण, जीवन की नीरसता एवं जड़ता को हटाकर उसमें आनन्द एवं जागरुकता भर देने के लिए हुआ है पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने सात्विक भोगों को उपलब्ध करके आत्मा के आनन्द को बढ़ाती है और जीवन को सुविकसित एवं प्रफुलित बनाने में सहायक होती है। ऐसी एक भी इन्द्रिय शरीर नहीं है। जो स्वभावतः पतन का कारण हो। पर जब उनका अविवेकपूर्वक अनावश्यक कार्यों में दुरुपयोग किया जाता है। तो वे आतिशबाजी की तरह अपनी शक्ति का नाश होते समय कुछ मनोरंजन तो अवश्य करती है। पर वह विनाश अन्ततः बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण और दुखदायी सिद्ध होता है सात्विक, सरस स्वादिष्ट भोजन की इच्छा उचित है, समान चित्त का दाम्पत्य जीवन एक बड़ी अपूर्णता को पूर्ण करता है। नेत्रों से, कानों से नाक से, वाणी से हमारी ज्ञान वृद्धि होती है। उनकी सहायता से उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। रूपवान् नर नारियों, बालक बालिकाओं को देखकर, प्रकृति के सौंदर्य का निरीक्षण करके आत्मा के आन्तरिक उल्लास में असाधारण अभिवृद्धि होती है। यदि इन्द्रियाँ नष्ट हो जाय तो वृक्ष, वनस्पति आदि की तरह जड़ संज्ञा में पहुँच जायेगा। यह दस इन्द्रियाँ ही हैं। जो अविकसित होने के कारण मानव प्राणी को सृष्टि का मुकुटमणि और सुख सौभाग्य का निर्झर बनाती हैं। इन्द्रिय-निग्रह इन्द्रिय-दमन आदि का अर्थ-उनका ‘सदुपयोग करना’ ही है। पुत्रेषणा के शिष्ट शब्द में काम सेवन की ओर ऋषियों का संकेत है। इन्द्रिय विकारों में चटोरापन और कामुकता प्रधानतः दो ही दोष हैं। इनको सुव्यवस्थित संतुलित रखा जाये और अन्य इन्द्रियों से समुचित आनन्द लाभ किया जाये तो यह ऐश्वर्य उचित भी है। और आवश्यक भी। अनुचित अमर्यादित विषय लोलुपता को ही निन्दित ठहराया गया है। ऐश्वर्य में इन्द्रियों के सदुपयोग द्वारा आनन्द लाभ में, कुछ भी दोष नहीं उलटा अपूर्णता एवं नीरसता हटा कर पूर्णता एवं सरसता की ओर अग्रसर होने का लाभ ही है।
लोकेषणा और आत्मा तुष्टि में भी ऐसा ही आकाश-पतला का अन्तर है। धन, जायदाद, रूप, सौंदर्य, फैशन अमीरी, बल पद आदि साँसारिक वस्तुओं की चतुरताओं की, वाहवाही लूटने के लिए जो प्रदर्शन, आडम्बर, विज्ञापन किया जाता है वह लोकेषणा है। विवाह शादियों में, का रज त्योहार, में, उत्सवों में, प्रीति भोजों में, अनाप-शनाप खर्च करके अपनी शान जमाने और अमीरी प्रकट करने का आडम्बर अनेक लोग किया करते हैं। कितने ही व्यक्ति अपना खर्च आवश्यकता से बहुत अधिक बढ़ाये रहते हैं। बड़े जमींदार, सेठ साहूकार, रईस अमीर कहलाने वाले लोगों के यहाँ, मोटर, गाड़ी नौकर-चाकर, सामान, वस्त्र-आभूषण आदि का इतना बड़ा खर्च होता है जितनी कि वस्तुतः आवश्यकता नहीं होती। एक-दूसरे की होड़ करके अधिक खर्च करने में अपनी प्रतिष्ठा अनुभव करते हैं। गरीब लोग अमीर बनने की इच्छा इसलिए भी करते हैं कि वे भी बड़े आदमी होने की प्रशंसा प्राप्त करें। कई आदमी अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होने के लिए बड़े आतुर रहते हैं। और झूठी वाहवाही करने वाले, खुशामदी चापलूसों द्वारा उल्लू बनते रहते हैं। इसी लोकेषणा की निन्दा की गई है क्योंकि यह भी धन लिप्सा एवं इन्द्रिय लोलुपता भाँति बन्धनों में बाँधने वाली है। कई आदमी तो किसी अनुचित भयंकर एवं दुस्साहसपूर्ण काम कर डालते हैं। कई आदमी साधु सन्त बनने का कष्ट साध्य आडम्बर भी इसी लालच से ओढ़ते हैं।
आत्म निर्माण, लोकेषणा से भिन्न वस्तु है। अपने सद्गुणों के कारण प्रतिष्ठा प्राप्त करना, अपने उच्च, आदर्श जीवन, परमार्थ साधना एवं लोक सेवा द्वारा यश प्राप्त करने की आकाँक्षा आत्मा, की भूख है। इसे प्राप्त करने से आन्तरिक सन्तोष प्राप्त होता है। और अन्तरात्मा में उत्साह, आनन्द एवं उल्लास की अभिवृद्धि होती है। इस प्रोत्साहन से, सफलता से मनोबल बढ़ता है। और आगे अधिक उत्साह से, ऐसे पुण्य कार्य, सतोगुणी आचरण करने की इच्छा होती है जो अपना लोक परलोक सुधारने, पुण्य संचय करने के लिए आवश्यक है। आत्म गौरव, आत्म सम्मान, आत्म कल्याण, आत्म आनन्द, आत्म प्रतिष्ठा, आत्म सन्तोष प्राप्त करके मनुष्य की अन्तरात्मा संतुष्ट होती है। इसलिए उसके लिए प्रयत्न करना सब प्रकार उचित एवं आवश्यक है। स्वर्ग के, मुक्ति के, आत्म सम्मान के, यश के निमित्त भी यदि सद्विचार और सत्कार्यों का आयोजन हो तो यह सात्विक अभिलाषा प्रशंसनीय ही कही जायेगी। यह लोकेषणा नहीं आत्मतुष्टि है। यह निन्दनीय नहीं स्वागत योग्य है। ऐषणाओं की अति की निन्दा की गई है अपने सात्विक रूप में यह तीनों ही इच्छाएँ मानव जीवन में उपयोगी एवं श्रेयष्कर सिद्ध होती हैं।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम.ए.)
मानव स्वभाव के दुर्गुणों में चिड़चिड़ापन आन्तरिक मन की दुर्बलता का सूचक है। सहिष्णुता के अभाव में मनुष्य बात-बात में चिढ़ने लगता है, नाक भौं सिकोड़ता है, प्रायः गाली-गलौज देता है। मानसिक दुर्बलता के कारण वह समझता है कि दूसरे उसे जान बूझ कर परेशान करना चाहते है उसके दुर्गुणों को देखते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं। किसी पुरानी कटु अनुभूति के फलस्वरूप वह अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है। और उसकी भावना ग्रन्थियाँ उसकी गाली-गलौज या बेढंगे व्यापारों में प्रकट होती हैं।
चिड़चिड़ेपन के रोगी में चिंता तथा शक सूबे की आदत प्रधान है। कभी-कभी शारीरिक कमजोरी के कारण, कब्ज, परिश्रम से थकान, सिर दर्द, नपुँसकता के कारण आदमी तनिक उठता है। अपनी कठिनाइयों तथा समस्याओं को उद्दीप्त होकर देखते-देखते उसे गहरी निराशा हो जाती है। चिड़चिड़ापन एक पेचीदा मानसिक रोग है। अतः प्रारम्भ से ही इसके विषय में हमें सावधान रहना चाहिए।
जिस व्यक्ति में चिड़चिड़ेपन की आदत है, वह सदा दूसरों के दोष ढूंढ़ता रहता है। वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में तो बुरा होता ही है। स्वयं भी एक अव्यक्त मानसिक उद्वेग का शिकार रहता है। उसके मन में एक प्रकार का संघर्ष चलता है। वह भ्रमित कल्पनाओं का शिकार रहता है। उसके संशय ज्ञान-तन्तुओं पर तनाव डालते हैं। भ्रम बढ़ता रहता है। और वह मन ही मन ईर्ष्या की अग्नि में दग्ध होता रहता है। वह क्रोधित, भ्रान्त, दुःखी सा नजर आता है। तनिक सी बात में उसकी उद्विग्नता का पारावार नहीं रहता। गुप्त मन पर प्रारम्भ में जैसे संस्कार जम जाते हैं, उनके फलस्वरूप ऐसा होता है। यह आदत से पड़ने वाला एक संस्कार है।
रोग से मुक्ति के साधन -
मन में दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि चिड़चिड़ापन बुरा है। हम उसे अपने स्वभाव में से निकालना चाहते हैं। हम दूसरों के बोलने, हँसने मजाक, या कार्यों से नहीं चिड़ेंगे हम उनकी परवाह न करेंगे। अपने स्वभाव में मृदुत सरस बनेंगे, सहिष्णु बनेंगे।
मनुष्य के मन में सत् तथा असत् दोनों प्रकार के विचारों का क्रम चला करता है। अपने दुर्बल विचारों के प्रति बड़ा सतर्क रहना चाहिए। जब कोई चिन्ता या निराशाजनक बात मन में आवे, आप उसके प्रतिकूल भावना कर उद्रेक कीजिये। चिड़चिड़ेपन के दमन के लिए मृदुता, प्रसन्नता, सहानुभूति की भावना अत्यन्त लाभदायक है। प्रबलता से मन में शुभ संकल्प जाग्रत कीजिए।
जब कभी आपको क्रोध आवे तो आप मन ही मन कहिए “दूसरों से गलती हो ही जाती है। मुझे दूसरों की गलती पर क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ। मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे हम धैर्य धारण करें।
जितना ही आप विचारों को ऊपर लिखित भावनाओं पर एकाग्र करेंगे, उतना ही बल आपको मिलेगा। पुनः पुनः दृढ़ता से उन में स्मरण करने से स्वभाव बदल जायेगा, प्रकृति मधुर बन जाएगी। आवेश को रोकने से मन को बल मिलेगा।
अपने दैनिक व्यवहार में प्रेमी, सहानुभूतिपूर्ण, सौम्य और प्रसन्नमुद्रा से काम लीजिये। इस मधुर स्वभाव का प्रभाव आपके कुटुम्ब पर तथा समाज पर बहुत अच्छा पड़ेगा। सुख शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मिष्ट भाषी और मधुर स्वभाव सर्वोत्तम तत्व है। मधुरता का प्रवाह तुम्हारे इर्द−गिर्द वातावरण में फैल जायेगा। चिड़चिड़ा होना आपकी एक बड़ी कमजोरी है, मधुरता से, सरसता से और प्रसन्नता से उसे ठीक कर लीजिये। ऐसे मधुर वचन बोलिये कि छोटे बच्चे आपके चारों ओर आकर्षित होकर चले आये, पत्नि प्रसन्न हो उठे, नौकर भी प्रसन्नता से आपकी आज्ञा वजा लायें। संकल्प की दृढ़ता, आवेश को रोकने तथा मधुर आदर्श सामने रखने से निश्चय ही आप चिड़चिड़ेपन से छुटकारा पा सकेंगे।
(श्री स्वामी कृष्णानन्जी, केकड़ी)
नायं जनो में सुखदुःख हेतुः,
न देवता··त्मा ग्रह कर्म कालः।
मनः परं कारणमामनन्ति,
संसार चक्रं परिवर्तयैषत्॥
(श्री. भा. 11। 23। 43)
मनुष्य, देव, आत्मा, ग्रह, कर्म काल ये कोई भी मेरे सुख दुःख के हेतु नहीं हैं। मन ही इन सुख दुःख का सच्चा कारण है, जो इस संसार चक्र को चलाया करता है। ऐसा वेदों ने कहा है।
मनुष्य मात्र सुख प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते रहते हैं। इस सुख के नित्य और अनित्य, ये दोनों भेद है। इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध से जो सुख मिलता है। वह क्षणिक होने से अनित्य है। विषय भोग जन्य सुख क्षणभर रहता है, फिर सुख अदृश्य हो जाता है, सुतराँ वह दुःख की प्रथमावस्था है। जिस सुख का अन्त दुःखमय हो, उसको यथार्थ सुख नहीं कह सकेंगे। ऐसे सुख की पाशव वृत्ति वाले पामर या निमीलित नेत्र वाले विषयी लोग ही करते हैं। बुद्धिमान जिज्ञासु ऐसे सुख की चाह नहीं रखते।
जिस सुख की प्राप्ति में दुःख का लेश न हो, उसको नित्य सुख कहते हैं। यह अनित्य सुख की कामनाओं का त्यागा करने के पश्चात ही मिल सकता है। परोपकार, दया, भक्ति, विश्व प्रेम, स्वदेश सेवादि कार्य निष्काम भाव से दीर्घ काल पर्यन्त किया जाय, तभी चित्त शुद्ध होकर सुख का मार्ग प्रतीत होने लगता है। फिर आत्मज्ञान दृढ़ होने पर अविचल नित्य सुख की प्राप्ति होती है।
मोहादि दुर्दमनीय पाशव-वृत्तियों का दमन और चित्त-संशोधन कर दैवी सम्पत्ति का जितने अंश में विकास किया जाय एवं धर्म का जितने अंश में पालन किया जाय उतने ही अंश में व्यक्ति और समाज को सुख मिल सकता है। किन्तु जब तक मन में विश्व धर्म की कल्पना नहीं आ सकती। उस विश्व धर्म का पालन या मानसिक उन्नति अवनति का आधार चित्त की शुद्धि अशुद्धि है।
मनुष्य सर्व व्यापक विश्व धर्म के अनुकूल प्रतिकूल जो-जो कर्म करते हैं, उनके अनुरूप अन्तःकरण में शुभाशुभ संस्कारों को धर्म और पुण्य कहते हैं, अशुभ संस्कारों को अधर्म और पाप कहते हैं। इन संस्कारों में से अधर्म के संस्कार चित्त शुद्धि में से अंतराय रूप है। अतः इनको नष्ट करने की पूर्ण आवश्यकता है।
जैसे वस्त्र पर रंग, मैल और तैलादि के दाग पड़ते हैं, या ग्रामोफोन की प्लेट पर शब्द संस्कारों का प्रवेश हो जाता है, वैसे मन पर शुभाशुभ कर्तव्यों के संस्कार पड़ते हैं। यद्यपि इन संस्कारों को बाहर से कोई नहीं देख सकते। तथापि उन्नति-अवनति इन संस्कारों से ही होती रहती है। जैसे मलिन वस्त्र पहनने के अभ्यासी को मैले वस्त्र की दुर्गन्ध से घृणा नहीं होती, दुर्गंध युक्त स्थान में निवास करने में वह दुःख नहीं मानता, किन्तु वह कुछ काल में अपनी सुगन्ध और दुर्गन्ध सम्बन्धी परीक्षण शक्ति को गुमा देता है, वैसे ही मलिन मन वाले मनुष्य को पाप कार्य से, पाप विचार से या पापी के सहवास से घृणा नहीं होती, तथापि वह अपने मन का अधः पतन करा देता है।
जैसे एक ब्राह्मण ने कुसंग दोष से अपने समाज और कुटुम्ब से छिपकर शराब पीना प्रारम्भ किया, पहले उसको भ्रम से उत्साह की वृद्धि का अनुभव होता था। जिससे शास्त्र वचन और वृद्धों की शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकता था। फिर व्यसन दृढ़ होने पर पक्का शराबी बन गया, तब धन हानि, बुद्धि की मलिनता, विचारों की अशुद्धि, मन की निर्बलता, पुनः पुनः शराब पीने की चाह, फुफ्फुस, हृदय, मस्तिष्क, और अंत्रादि अवयवों की शक्ति का क्षय, तथा, समाज में निंदादि हानि का अनुभव करने लगा। फिर भी सदुपयोग को धारण नहीं कर सका। उल्टा दुष्टों के संपर्क से झूठ, माँसाहार, व्यभिचार, चोरी चालबाजी आदि दुराचार में ही प्रवृत्ति की। किं बहुना उसने अशुभ संस्कारों के हेतु से अपनी अत्यन्त अवनति कर, महादुःख भोग इस संसार से विदा ली। इस रीति से अशुभ कार्य करने वाले सभी का अधः पतन हो जाता है।
इससे विपरीत वस्त्र पर इत्र लगाने से या कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थों का संपर्क होने से वस्त्र में सुगन्ध आने लगती है। ऐसे वस्त्रों के धारण से मन प्रसन्न होता है। वैसे ही पुण्य कर्म करने से मन में शुभ संस्कारों की उत्पत्ति होती है, और पुनः पुनः परोपकारादि शुभ कर्तव्य करने की अंतर प्रेरणा मिलती रहती है तथा जैसे स्वच्छ वस्त्र धारण करने के अभ्यासी को मलिन पहिनना, मलिन वस्त्र धारियों का सहवास करना या मलिन स्थानों में जाना असह्य हो जाता है, वैसे ही पुण्यात्मा को पापी विचार, पापात्मा का सहवास या दूषित स्थानों में जाना दुःखदायी ही हो जाता है।
इन शुभाशुभ मानसिक भावनाओं का परिणाम मनुष्य के स्वास्थ्य और आयु पर भी होता है। यद्यपि अनेक पापी मनुष्य बलवान, धनवान् और बड़ी आयु वाले दृष्टिगोचर होते हैं, तथा अनेक पुण्यात्मा निर्बल, निर्धन और छोटी आयु में ही मरण, मरणोन्मुख प्रतीत होते हैं। तदपि वे बलवान् पापी यद्यपि पाप में प्रवृत्ति नहीं करते, पुण्यकर्मों में प्रीति रखते तो वे और अधिक बलवान रहते। एवं पुण्यात्माओं में जो निर्बल या दुःखी हैं, उसका हेतु पुण्यकर्म नहीं है, किन्तु पूर्व जन्मों का पाप ही हेतु है।
मनुष्य से अनेक वृक्षों की दृढ़ता और आयु ज्यादा प्रतीत होती है। वृक्षों पर दुःख का असर बहुत कम होता है। तथा ज्ञान की दृष्टि से वृक्ष की अपेक्षा मनुष्य जीवन ही श्रेष्ठ है। एवं मनुष्य से वनचर व्याघ्रादि पशुओं में शरीर बल बहुत अधिक रहता है। चिन्ता और जवाबदारी मनुष्यों की अपेक्षा बहुत कम होती है। अपनी इच्छानुसार जंगलों में विचरते रहते हैं। पापात्मा का जीवन भी पशुतुल्य ही माना जाता है। अतः इस पशु जीवन की प्राप्ति की चाह कोई बुद्धिमान् नहीं करता। संसार के समस्त स्तर प्राणियों की अपेक्षा मानव जीवन उत्तम माना गया है। इस दृष्टि से क्षुद्र पापी के जीवन से विशाल अन्तःकरण वालों की जीवन निर्धनता आदि कष्ट होने पर भी श्रेष्ठ है। पापी मनुष्य ऊपर से कदाचित सुखी प्रतीत हो, फिर भी उसके मन की ओर दृष्टि डालने से वह महा दुःखी है, ऐसा अवगत हो जाता है।
थोड़े वर्षों पहले बम्बई के एक व्यापारी ने एक दुकान खोली थी। उस दुकान के माल का दश हजार रुपये का बीमा कराया था। दुकान प्रारम्भ करने के 2-3 मास पश्चात भागीदारों में मत भेद हो जाने से दो भागीदार अलग हो गये। जिससे दुकान का नाम बदल लिया। परन्तु बीमा कम्पनी से नया बीमा कहीं उतराया । 6-8 मास बाद, अकस्मात् चारों ओर की दुकान में आग लग गई, उस समय अग्नि बुझाने वालों से थोड़ा पानी इसमें डाला गया, जिससे माल भीग कर पाँच सौ रुपये की हानि हुई। किन्तु उस दुकान के मालिक ने दुकान के चालू नाम से बीमा न होने पर भी प्रपंच कर पहले के नाम से बीमा कम्पनी से पाँच हजार की रकम प्राप्त की। परिणाम में मरण पर्यन्त लगभग 15 वर्ष तक हृदय से दुःखी और भयभीत रहता था। सर्वदा उसकी दृष्टि समक्ष यह चित्र दिखाई देता था, कि यदि कोई दुश्मन खड़ा हो जायेगा, और बीमे के पाखंड की बात प्रकाशित कर देगा। तो अपकीर्ति और धन की हानि होगी। तथा सजा भी भोगनी पड़ेगी। ऊपर से तो यह धनिक सुखी देखने में आता था, परन्तु यथार्थ में वह दुःखी था। यदि इसने इस पाप में प्रवृत्ति नहीं की होती, तो जीवन चिंतातुर नहीं रहता, अपने व्यापार में अधिक लाभ उठा सकता था, एवं 10-20 वर्ष अधिक या ईश्वर निर्मित और पूर्ण आयु तक जीवित रह सकता था, अकाल मृत्यु के मुख में नहीं गिरता।
एक समय एक पल्टन के कैप्टन से मेरा वार्तालाप हुआ था। वह ईस्वी सन्-1911-12 में विलायत गया था। उसने कहा था, कि शाहनशाह 7 वें एडवर्ड को चिन्ता ने खा लिया है। हिन्दुस्तान और इतर देशों के लिये राज्य सचिवों के अनेक जुल्मी कार्यों से वे सर्वदा असन्तुष्ट और चिन्तातुर रहने से रोगाक्रान्त हो गये हैं। वाह्य दृष्टि से चक्रवर्ती सम्राट होने से किसी भी बात की कमी नहीं है, तथापि विचार दृष्टि से देखने पर वे तन-मन से सुखी नहीं हैं। अन्त में केवल 6 वर्ष ही राज्यकर इस चिन्ता में ही आपने इस संसार से विदा ली थी।
मनुष्य जो शुभाशुभ कर्तव्य करते हैं, उनमें से कर्तव्यानु रूप शुभाशुभ वासना और सुख-दुख देने वाले मानस संस्कारों की उत्पत्ति होती है। इनमें से वासनाओं से पुनः 2 उसके समान विषय सेवन की चाह होती रहती है और संस्कारों के परिपाक काल में सुख अथवा दुःख रूप फल मिलते रहते हैं। राजा से रंक तक या ब्रह्म से चिंटी तक को जो सुख मिलता, वह शुभ कर्म का फल और जो दुःख मिलता है। वह अशुभ कर्म का फल है। जब तक चित्त अशुद्ध होता है, तब तक दुष्ट वासनाओं का उद्भव होकर दुष्ट कार्य में प्रवृत्ति होती रहती है। और जब चित्त शुद्ध हो जाता है। तब निष्काम प्रवृत्ति होने लगती है। और पापी विचार या पाप कार्य में से प्रीति हट जाती है। जिससे भावी जीवन सुखमय बन जाता है।
भोजन की पवित्रता से मन की पवित्रता आती है। जो शक्तिमान और शरीर को जोड़े हुए है। वह उस भोजन में मौजूद रहती है जिसे हम खाते हैं। विभिन्न प्रकार के भोजन का विभिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। कुछ ऐसे भोजन होते हैं। जो हमारे मन और शरीर दोनों को स्वस्थ बनाते हैं। अतः यह परमावश्यक है कि हम शुद्ध और सात्विक भोजन करें। भोजन का ब्रह्मचर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अगर भोजन की पवित्रता पर उचित ध्यान दिया जाय तो ब्रह्मचर्य पालन करना बड़ा ही आसान हो जाय।
-स्वामी शिवानन्द
(श्री स्वामी ज्योतिर्मयानन्द पुरी, बम्बई)
वेदों में का मुख्य विषय यह है। यज्ञ के सम्बन्ध में बहुत से वाक्य मिलते हैं जिस प्रकार “उदिते सूर्ये प्रातर्जुहोति” “वसंते ब्राह्मणोकग्निना दधीत’ का. औ. सूत्रं ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ‘ऋतं च स्वाध्याय प्रवचनेन च’ भगवद्गीता में भी यज्ञों का वर्णन बहुत मिलता है। परम कृपालु भगवान् कृष्णचन्द्र आनन्दकन्द ने तृतीय अध्याय में अर्जुन को कर्म योग का मार्ग बतलाते हुए यज्ञों की सृष्टि और आवश्यकता भली भाँति बतला दी है, भगवान् ने अर्जुन से कहाः-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरावाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसिविष्यध्वमषवीस्त्विष्टकामधुक्॥ 3-10
प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारम्भ में प्रजाओं के साथ ही साथ उन प्रजाओं की कल्याणार्थ यज्ञों की भी सृष्टि की। और पिता जिस प्रकार अपनी सन्तानों के हित के लिये सन्मार्ग का उपदेश देते हैं उसी प्रकार पितामह ब्रह्माजी ने भी सन्तानों के प्रति उनके अभ्युदय के लिये उपदेश देते हुए कहा है- तुम्हारे सामने मैं यज्ञों को भी रख देता हूँ। इन श्रोत तथा स्मार्त यज्ञों को यथारीति संपादन करके देवताओं की प्रीति उत्पादन करो। श्रद्धा के साथ किए हुए इन यज्ञों से भी तुम लोगों को अभीष्ट फल मिलेगा।
आगे जड़ात्मक यज्ञ किस प्रकार प्रजाओं का हित सम्पादन करेंगे इस प्रकार के सन्देश को दूर करने के लिये ब्रह्म ने फिर अपनी प्रजाओं से कहा -
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु धः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ 3-11
तुम लोग इन यज्ञों द्वारा देवताओं को सन्तुष्ट करो। सन्तुष्ट हुए देवता भी तुम लोगों को अभीष्ट वस्तु प्रदान कर सन्तुष्ट करेंगे। इसी प्रकार परस्पर के सद्भाव से तुम लोगों का भला होगा।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुं ् तेस्तेन एव सः। 3।12
जो देवताओं को यज्ञों द्वारा चरु पुरोडाशादि न देकर केवल अपना शरीर पुष्ट करने के लिये ही भोजन करता है। वह देवताओं की दृष्टि में चोर होता है।
इस प्रकार भगवान् कृष्णचन्द्रजी ने प्रजापति ब्रह्मा के मुख से यज्ञों की सृष्टि तथा आवश्यकता बतलाकर आगे चतुर्थ अध्याय के पच्चीस श्लोक से तीस श्लोक तक द्रव्य आदि चौदह यज्ञों का वर्णन किया है। और इन चौदह यज्ञों में ज्ञानयज्ञ को सर्वश्रेष्ठ बतलाया है-
श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परंतप।
सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञानेपरिसमाप्ते॥4।32
हे परंतप द्रव्यमय यज्ञों से ज्ञान-यश श्रेष्ठ होता है, क्योंकि ज्ञान में श्रोत स्मार्त तथा लौकिक सभी कर्म परि समाप्त हो जाते है। समुद्र पार जाने वाले पुरुष को पार पहुँचने पर जैसे और कोई कर्तव्य नहीं रहता है उसी प्रकार ज्ञान की प्राप्ति होने पर सच्चित्, आगामी, प्रवृत्त, अप्रवृत्त सभी कर्म नष्ट हो जाते है। इसीलिए ज्ञान-यज्ञ सर्व श्रेष्ठ यज्ञ है।
इस ज्ञान-यज्ञ का दूसरा नाम ब्रह्मयज्ञ है, यह यज्ञ परमात्मा-सम्बन्धी यज्ञ है। इसका स्वरूप भगवान् ने गीता के चतुर्थ अध्याय में 24 वे तथा 25 वें श्लोक में बतलाया है-
“ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम।
ब्रह्मैष तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥”4-24
“ब्रह्माग्न वपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुहव्ति।” 4-25।
चमसादि सर्वक्षोपकरण वस्तुओं में ब्रह्म मात्र बुद्धि करके अथवा’-सत्य ज्ञान स्वरूप ब्रह्म में सोपाधिक आत्मा को निर्विशेष स्वरूप ब्रह्म के अभिन्न बोध करके दर्शन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है। इस यज्ञ का फल महान् है। इससे सब पाप-ताप नष्ट हो जाता है। सब कर्म बन्धन छूट जाता है। हृदय की ग्रन्थि छूट जाती है।
“भिद्यते हृदयग्रन्थिः च्छिद्यन्ते सर्व संशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टि परावरे॥”
गीता में भी भगवान् ने कहा-
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पोपकृत्तमः।
सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥ 4।36
“यद्यपि तू सब पापियों में महा पापी भी क्यों न हो तथापि ज्ञान-रूपी नौका से समय पाप की नदी को भली-भाँति तर जायगा।” इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान ही मनुष्य को समस्त पाप-ताप कीक सीमा के पार ले जाता है।
(श्री मनोहरदास जी अग्रवाल, उम्मेदपुरा)
अनुभूति का क्षेत्र बुद्धि नहीं है मन और बुद्धि तो दृश्य जगत के सम्बन्ध में सिर्फ तर्क कर सकते हैं। तर्क अनुभूति में सहायक भले ही हो जावे पर अनुभूति करा ही देगा यह निश्चित नहीं है। इसीलिए हमारे शास्त्रकारों का कहना है-
अचिंत्या खलु ये भावाः,
न ताँस्तु तर्केण चिन्तयेत्।
जिन भावों को मन और बुद्धि ग्रहण नहीं कर सके तो उनका निर्णय तर्क द्वारा नहीं करना चाहिए। इसीलिए तर्क के स्थान पर आचरण को महत्व दिया गया है। क्योंकि हो सकता है जिसे तर्क सिद्ध कर दे वह आचरण की कसौटी पर ठीक न उतरे और तर्क के द्वारा जिसे सिद्ध न किया जा सके उसकी आचरण द्वारा अनुभूति मिल जाय।
अनुभूति रूपी फल तो आचरण रूपी कार्य का है। इसे जानते हैं और ऐसी अनेकों अनुभूति है। जिनका वर्णन शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता रसानुभूति की बात ले ली जावे। खट्टा, मीठा, तीखा, कड़वा कसैला एवं नमकीन इस प्रकार छः रस है। क्या कोई भी व्यक्ति इनके स्वाद को सिद्ध कर सकता है और सो भी तर्क द्वारा? कदापि नहीं। बल्कि इन रसों को बतलाने के लिए इनका उपयोग कराया जाता है। वस्तु दी जाती है खाने को, स्वाद लेने पर कहा जाता है यह खट्टा है, मीठा है आदि। उस अनुभूति को प्राप्त करने के अनन्तर क्या कोई व्यक्ति इसके बारे में कि यह अमुक रस ही है, सिद्ध कर सकता है, सिर्फ तर्क के आधार पर? नहीं। इसके लिए भी अनुभूति का ही रसास्वादन किया जाता है। मान लो कि गुड़ क्षारीय होता है। मान लो कि एक कहता है कि गुड़ मीठा होता है और दूसरा कहे कि क्षारीय होता है। मीठे और क्षारीय पदार्थों के साथ कर्तृत्व के साथ सिद्ध करना चाहे, तो एक स्थल ऐसा आ जाता है जहाँ यह कहने को मजबूर होना पड़ता है कि यदि विश्वास न हो तो चख कर देख लो। अतः आचरण बिना तर्क यहाँ निस्वत्व हो जाता है।
तब ईश्वर के अस्तित्व को तर्क के आधार पर सिद्ध करने से उसकी अनुभूति हो ही कैसे सकती है। उसकी सिद्धि के लिए या तो-उसकी अनुभूति के लिए या तो स्वयं साधना करने की आवश्यकता होती है।
इस बात की तो सबको अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने किसी कार्यक्रम के आधार पर रहा है। यहाँ तक उस निश्चित कार्यक्रम के विपरीत जब कोई भी व्यक्ति अपना कदम उठाना चाहता है तो उसे सफलता नहीं मिलती, विफलता ही हाथ आती है जब कि निश्चित कार्यक्रम के आधार पर ही व्यक्ति संचालित हो रहा है।
तब स्वभावतः यह प्रश्न हो सकता है कि कौन है इसका संचालक। और उसका अवश्य यह उत्तर मिलता है कि अवश्य कोई न कोई इसका संचालक है। और वह संचालक हमारा कहीं बाहर से संचालन नहीं करता बल्कि अन्दर प्रविष्ट होकर वह हमारी क्रिया शक्ति को प्रेरणा देता है, संचालित करता है। संचालक शक्ति हमारे अन्दर है और अज्ञात प्रेरणाओं द्वारा हमें चला रहीं है, यहाँ तक उन प्रेरणाओं से हम बन्धे से हैं।
सभी कोई कुछ न कुछ करते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन प्रेरणाओं की अनुभूति सबको नहीं होती इसीलिये क्षोभ दुःख और वेदनाओं की भरमार है। जिस समय व्यक्ति अपनी वृत्तियों को अंतर्मुखी कर लेता है उसे कार्य की संचालक प्रेरणाओं की अनुभूति होना आरम्भ हो जाती है और इस अनुभूति के बाद वे तमाम कार्य करते रहने के बाद भी, उसे शोक, दुःख, क्षोभ आदि से भी छुटकारा मिल जाता है। तब उसके अन्दर की वृत्ति जागृत होती है और सुखानुभूति बढ़ जाती है फिर तो जो प्रेरणा उसे अज्ञात अवस्था में मिलती थीं वे उसे प्रत्यक्ष होने लगती है। वह समझने लगता है कि भगवान या ईश्वर उसके साथ बात करते हैं उसे रास्ता बतलाते हैं और उस पर साथ-साथ ले चलते है। एक अटूट श्रद्धा से भरा हुआ वह व्यक्ति अपने चारों ओर प्रकाश देखता है वह अपने एकाकीपन को भूल जाता है, अपनी सामर्थ्य और अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। मानव जीवन की चरम सिद्धि अनुभूति है। अनुभूति के साथ श्रद्धा का संमिश्रण रहता है। श्रद्धा विश्वास के साथ चलती है। या अनुभूति के। क्योंकि बिना अनुभूति विश्वास नहीं होता और बिना विश्वास के अनुभूति नहीं होती पर असल में देखा तो ईश्वर की अनुभूति प्रत्येक मानव में होती है। जब तक व्यक्ति की वृत्तियाँ बहिर्मुखी रहती हैं तब तक अनुभूति प्रत्यक्ष नहीं होती, मन और बुद्धि अपना कार्य वाह्य जगत में ही करते रहते हैं लेकिन जैसे-जैसे इनकी दिशा बाहर से भीतर की ओर बदलती जाती है वैसे- वैसे ही अप्रत्यक्ष से अनुभूति प्रत्यक्ष होती जाती है। और यही ईश्वर दर्शन या भगवत्प्राप्ति है।
जैसा कि पहले कहा गया कि अनुभूति के लिए आचरण की आवश्यकता होती है। यह आचरण बहिर्मुखी वृत्तियों को अन्तर्मुखी करने के लिए है जिससे प्रेरणा स्त्रोत जोकि अन्दर है।
मन, बुद्धि और चित्त का उसके साथ सम्बन्ध स्थापित हो जावे। और ये तीनों अर्थात् मन-बुद्धि-चित्त उस सम्बन्ध को न केवल स्थापित कर लें बल्कि प्रेरणाओं का जो स्त्रोत है उससे प्रेरणाएं भी ग्रहण करना आरम्भ कर दें।
प्रेरणाएं अन्दर से आती हैं लेकिन ग्रहण करने की क्षमता न होने के कारण उनकी प्रथम अनुभूति नहीं हो पाती। अन्तर्मुखी वृत्ति हो जाने से मनुष्य में प्रेरणाओं को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती हैं क्षमता के साथ-साथ अनुभूति बढ़ती है और प्रशंसा का क्षेत्र विस्तृत होता जाता है।
अनुभूति जितनी गहरी होती है जीवन में उतनी ही मात्रा में रस की वृद्धि होती है। जहाँ अनुभूति हीनता में मानव जीवन से उकता कर उसे नष्ट करने की ओर बढ़ता या कदम उठाता है वहाँ अनुभूति पाते ही वह जीवन को अपने अन्दर अधिक से अधिक भर लेने के लिए उत्सुक रहता है। उत्सुकता या प्रफुल्लता का यह चिन्ह भगवान प्राप्ति का ही निदर्शक है।
आचरण के लिए श्रद्धा और विश्वास की आवश्यकता है लेकिन ये दोनों तर्क पर प्रतिष्ठित नहीं होने चाहियें। यह बतलाया जा चुका है कि यह ज्ञान अप्रत्यक्ष अनुभूति का ही एक हिस्सा है। उसे बढ़ाने के लिए तर्क के साथ सम्बन्ध स्थापित न करके श्रद्धा के साथ नाता जोड़ना चाहिए। वृत्तियों को अन्तर्मुखी करने की साधना का यहीं से श्रीगणेश होता है। और यहीं से प्रकाश की किरणें मानस पर उतरना या दिखाई देना प्रारम्भ हो जाती हैं।
(श्री नीलरतन मुखोपाध्याय बी.ए.)
ईसा और बुद्ध के लिये कहा जाता है कि उनके कर स्पर्श से ही रोगी भला चंगा हो जाता था। सुकरात पर अभियोग लगाया गया था कि वह युवकों पर जादू चलाकर वशीभूत करके उन्हें अपने मत में परिवर्तित कर लेता था। ऐसे महापुरुषों का उल्लेख रास्पुटिन और मेस्मर जैसे व्यक्तियों के साथ करना नितान्त अनुचित है। पर इतिहास साक्षी है। कि किस प्रकार का सम्मोहन प्रसिद्ध पापी संन्यासी रास्पुटिन के नेत्रों में था। दृष्टि डालते ही व्यक्ति किसी भी नर-नारी को वशीभूत कर लेता था।
ऐसे व्यक्तियों को किसी भी देश में कोई अभाव नहीं है जो किसी की मृत्यु तिथि तक बता देते हैं और जब ये भविष्य वाणियाँ सच निकल जाती है। तब हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रह जाता। मेस्मर और रास्पुटिन जैसे लोग आज भी पहेली-से बने हुए है। राज्यक्रान्ति के पहले जब मेस्मर ने अपने अलौकिक चमत्कार दिखाने शुरू किये तब सभी ने उनकी कटु आलोचना ही नहीं, नितान्त भर्त्सना भी की। लेकिन कितने ही लोगों ने यह स्वीकार किया कि उसके स्पर्श से ही वे ठीक हुए। ऐसी रहस्यमयी शक्तियों के प्रति अच्छे लोगों की सदा ही इसलिये शंका पर्ण दृष्टि रही, कि कहीं इस प्रकार की दैवी शक्ति का उपयोग शैतानी शक्ति के ही रूप में न होने लगे ऐसी आशंका के कारण भी यथेष्ट थे। कितने ही पतित वृत्ति वालों ने ऐसी शक्ति का अपने स्वार्थ साधन के लिये उपयोग किया और कितनों ने सम्पत्ति और प्रभुता के लिये ही नहीं। बात ऐसे लोगों की है जो मेस्मर की प्रणाली का दुरुपयोग अपने स्वार्थों के लिये करे। रास्पुटिन की शक्ति को कोई इन्कार नहीं कर सकता। उसका प्रभाव आधुनिक युग में सबसे अधिक व अद्भुत कहा जायगा। रूस के जार और उसके समस्त परिवार पर राजकुमारी की बीमारी के पश्चात् ही रास्पुटिन का सिक्का जमा तब से उसने ऐसे-ऐसे करिश्मे दिखाये कि लोगों को चकित रह जाना पड़ता है। किन्तु उसकी इस शक्ति की सराहना करते हुए इसके दुरुपयोग इसके उपयोग के साधन और साध्य की सरहना कौन कर सकता है? रास्पुटिन आज निंदा का विषय ही बना हुआ है। इसी प्रकार शैतानी की लीलाओं के अभियोग में कितने ही सम्मोहक दंडनीय ठहराये जा चुके है। और कितने ही फाँसी पर लटकाये और कितने ही जीते जी जलाये जा चुके हैं।
इसलिये वैज्ञानिकों ने सम्मोहन विद्या के जानकारों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह रखा है कि वस्तुतः इसकी कोई उपयोगिता है या नहीं। इसके अस्तित्व के सम्बन्ध में प्रश्न गौण हो चला है, प्रधान प्रश्न अब इसकी उपयोगिता का है सम्मोहकों ने अब अपनी विद्या पर वैज्ञानिक दृष्टि डाली है। एक समय था जब लम्बे-लम्बे लबादों में घूरती हुई अपलक आँखों द्वारा सम्मोहक किसी को अचेत करके अथवा स्वेच्छापूर्वक अपनी इच्छा शक्ति द्वारा सम्मोहित को संचालित करके ही अपने चमत्कारों की इतिश्री समझ लेते थे। लेकिन आज जब नैतिकता का मूल्य भी सामाजिक और मानवीय कल्याण साधन की कसौटी पर कसा जाने लगा है तब सम्मोहन विद्या की उपयोगिता भी सम्मोहक को प्रमाणित करनी पड़ेगी और सम्मोहन इस स्थिति से अवगत हो चला है।
लन्दन के अलेज्ड्रा पैलेस में उस दिन एक नये सम्मोहक कैसन ने अपने चमत्कार से सबको चकित कर दिया और अखबारों में उसकी कहानियों को पढ़ कर लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे। 24 वर्ष के इस युवक की वेश-भूषा बिल्कुल साधारण-हमारी आपकी-सी किन्तु अपनी तीक्ष्ण अन्तर्भेदनी दृष्टि से, अपने स्पर्श से कैसन अलौकिक चमत्कार कर दिखाता है। जिस समय यह युवक आपसे जो कुछ भी करने के लिये कहेगा। आप इन्कार नहीं कर सकते। स्वेच्छापूर्वक यह आपको चेतनाहीन करके विभिन्न लोकों का सफर करायेगा। लेकिन इसे सर्वथा चेतना हीन स्थिति में ही नहीं कह सकते। एक 33 वर्षीय महिला को इतने विभिन्न वर्षों में ले जाकर उससे एक बार पाँच वर्ष की अवस्था के अवसरों में, फिर 6 फिर 14 और अन्त में वर्तमान अवस्था के अक्षरों में हस्ताक्षर कराये और बाद को तुलना करके देखा गया कि हस्ताक्षर वास्तविक वय के असली हस्ताक्षरों के समान ही हैं।
आधुनिक दृष्टि से कैसन ने सम्मोहन विद्या का अध्ययन किया है। उसका दावा है कि कितने ही रोगों में सम्मोहन का उपयोग किया जा सकता है चीर-फाड़ की अवस्था में सम्मोहन द्वारा रोगी को अचेत किया जा सकता है और इस स्थिति में चीर-फाड़ रोगी महसूस नहीं कर सकता। अनिद्रा के रोग का इलाज भी इससे सहज साध्य हो सकता है। आगस्ट फोरेल नामक एक दूसरे सम्मोहक ने तो म्यूरिच के पागल खाने में काम करने वालों पर इसके प्रयोग कर भी दिखाये हैं। पागल खाने के शोरगुल से परेशान कर्मचारियों पर वह सोने के समय ऐसा सम्मोहन डाल दिया करता है कि उसके प्रभाव में वह गाढ़ निद्रा में निमग्न हो जाते हैं और फिर चाहे जितना शोर गुल हो निर्धारित समय से पहले उनकी नींद में बाधा नहीं पड़ती।
आपरेशन के लिये सम्मोहन का उपयोग 1840 से ही किया जाने लगा था, किन्तु क्लोरो फार्म के आविष्कार के पश्चात इसका त्याग किया जाने लगा। इसके बाद पुनः प्रथम महायुद्ध पश्चात इसका प्रयोग होने लगा। सम्मोहन द्वारा चिकित्सा प्रणाली का एक बड़ा दोष यह है कि इससे रोग का निवारण तो कभी कभी अद्भुत ढंग से हो जाता है किन्तु रोग की न तो वास्तविक जानकारी हो पाती है न तो इस बात का ही विश्वास हो पाता है कि रोग का आमूल निराकरण हो सका या नहीं। फिर भी स्नायु सम्बन्धी रोगों के इलाज के लिये सम्मोहन प्रभावशाली प्रमाणित हुआ है।
सम्मोहन विद्या की वास्तविकता के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ कहना कठिन है, किन्तु इसका आधार मनोवैज्ञानिक है और मानव की इच्छा को प्रभावित करके स्वेच्छानुसार उसका संचालन करने की क्रिया मनोविज्ञान और मनस्त्व के सिद्धान्त के प्रतिकूल नहीं बतायी जा सकती। इसकी उपयोगिता अथवा अवाँछनीयता का प्रश्न भिन्न है विषमारात्मक है किन्तु ‘विषस्य विषमौषधम्’ के सिद्धान्तानुसार अनेक घातक रोगों की चिकित्सा विषौधियों द्वारा ही होती है। इसलिये सम्मोहन विद्या का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही सम्भव है। इतना निश्चित है कि सम्मोहन विद्या कोरी विद्या कोरी विडम्बना नहीं है। इसका आधार मनोवैज्ञानिक है। इसका केन्द्र शक्ति और इसका साधन स्नायविक प्रणाली है।
-यदि तुमने इसी जन्म में ईश्वर को जान लिया तब तो ठीक है अन्यथा महाविनाश और हानि है। प्राणी मात्र में जो उसी ब्रह्म को पहचानते हैं नहीं बुद्धिमान पुरुष इस शरीर को छोड़ कर अमृतत्व प्राप्त करते हैं।
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-जिसने दुराचरण को सदा के लिये नहीं छोड़ा, जिसकी इन्द्रियाँ और मन शान्त नहीं। वह मनुष्य केवल पुस्तक ज्ञान से प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता। -कठोपनिषद्
(श्रीमती चन्द्रकान्ता जेरथ, बी.ए., दिल्ली)
भारतवर्ष में सदा से ही स्त्रियों का समुचित मान है। उन्हें पुरुष की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्मजात उपाधि ‘देवी’ प्रायः जुड़ी रहती है। शांति देवी, गंगा देवी, दया देवी, श्रद्धा देवी आदि देवी परक नाम कन्याओं के रखे जाते हैं। जैसे पुरुष बी.ए., शास्त्री, साहित्य रत्न, आदि उपाधियाँ उत्तीर्ण करने पर अपने नाम के पीछे उस पद्वी को लिखते हैं। वैसी ही कन्याएं अपने जन्म जात ईश्वर प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों, दिव्य विशेषताओं के कारण ‘देवी’ उपाधि से अलंकृत होती हैं।
देवताओं और महापुरुषों के नाम के साथ-साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हुए हैं। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मी नारायण, उम महेश, माया-ब्रह्म, सावित्री सत्यवान आदि नामों में नारी को पहला और नर को दूसरा स्थान है। पवित्रता, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति भावना, आदि-2 आत्मिक गुणों ने बढ़ा चढ़ा माना है।
इसलिए धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर प्राप्ति सम्बन्धी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उसकी महानता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गई है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता हैं कि वेदों के मंत्र दृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं वैसे ही अनेक ऋषिकाएं भी हैं। ईश्वरीय ज्ञान वेद महान आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन वेद मंत्रों को प्रकट किया इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए उन मंत्र दृष्टाओं को ‘ऋषि’ कहते है। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं वरन् अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अन्तः करण में भी उसी प्रकार वेद ज्ञान प्रकाशित किया जैसे कि पुरुषों के अन्तःकरण में, क्योंकि प्रभु के लिए दोनों ही सन्तान समान हैं। महान दयालु, न्यायकारी और निष्पक्ष प्रभु भला अपनी ही सन्तानों में नर-नारी का पक्षपात करके अनुचित भेद भाव कैसे कर सकते है?
ऋग्वेद 10। 85 के सम्पूर्ण मंत्रों की ऋषिका “सूर्या सावित्री” हैं। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है। “ऋषिदर्शनात् स्तोमान ददाशति। ऋषियों मंत्र द्रष्टारः” अर्थात् मंत्रों का द्रष्टा उनके रहस्य को समझ कर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।
ऋग्वेद की ऋषिकाओं सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार हैः-
घोषा गोधा विश्व वारा, अपालोपनिषन्निषत्
ब्रह्म जाय जुहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति। 84
इन्दाणी चेन्द्र माता च सरमा रोमशोर्वशी।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाशवती 85
श्रीर्लक्ष्मीः सार्प राज्ञी वाक् श्रद्धा मेघा च दक्षिणा
रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्म वादिन्य ईरिताः। 86
अर्थात्- घोषा, गोधा, विश्व वारा, अपाला, उपनिषत्, निषत्, जुहू, अदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा यमी, शाश्वती, सूर्या सावित्री आदि ब्रह्म वादिनी है।
ऋग्वेद के 10 134, 10-39, 10-40, 8-91, 10-95, 10-107, 10-109, 10-154, 10-159, 10-189, 5-28, 8-91 आदि सूक्तों की मंत्र दृष्टा यही ऋषिकाएं हैं।
ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं। जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थी। वे यज्ञ विद्या और ब्रह्म विद्या में पारंगत थी। कई नारियाँ तो इस सम्बन्ध में अपने पिता तथा पति तक का मार्ग दर्शन करती थी।
तैत्तिरीय ब्राह्मण में सोम द्वारा ‘सीता सावित्री’ नामक ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तार पूर्वक आता है। अब
................... तं त्रयो वेदा अन्व सृज्यन्त अथह सीताँ सावित्री सोमं राजान चक में............ तस्या उहत्रीन वेदान प्रददौ। तैत्तिरीय 2। 6।10
इस मंत्र में बताया गया है। कि किस प्रकार सोम ने सीता सावित्री को तीनों वेद दिये।
मनु की पुत्री ‘इड़ा’ का वर्णन करते हुए तैत्तीय 1।1। 4 में उन्हें ‘यज्ञान्काशिनी’ बताया है। यज्ञान्काशिनी का अर्थ सायणाचार्य ने ‘यज्ञ तत्व प्रकाश समर्था’ किया है। इड़ा ने अपने पिता को यज्ञ सम्बन्धी सलाह देते हुए कहा -
सा·व्रवीदिड़ा मनुम्। तथावाऽहं तवाग्नि माधास्यामि यथा प्रजया पशुभिर्मिथुनैर्जनिष्य। प्रत्यस्मिलोकेस्थास्यासि। अभि सुवर्गं लोकं जेष्यसीति। तैत्तिरीय व्रा. 1। 4
इड़ा ने मनु से कहा मैं तुम्हारी अग्नि का ऐसा अवधान करूंगी जिससे तुम्हें पशु, भोग, प्रतिष्ठा और स्वर्ग प्राप्त हो।
प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली भी थी और ब्रह्म परायणा भी। वे दोनों ही अपने अपने कार्य क्षेत्र में कार्य कराती थी। जो गृहस्थ संचालन करती थी उन्हें ‘सद्यो वधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म उपासना आदि के परमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थी उन्हें ‘ब्रह्म वादिनी’ कहते थे। ब्रह्म वादिनी और सद्यो वधू के कार्यक्रम तो अलग-2 थे पर उनके मौलिक धर्माधिकारों में कोई अन्तर न था देखिए-
द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्म वादिन्यः सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनी नामुपनयनम् अग्नीन्धनं वेदाध्यंयनं स्वगृहे भिक्षाचर्या च। सद्योव धूनाँ तूपस्थिते विवाहे काले कथं चिदुपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः।
इरीत धर्मसूत्र 21। 20। 24
ब्रह्म वादिनी और सद्योवधू ये दो प्रकार की स्त्रियाँ होती है। इनमें से ब्रह्म वादिनी यज्ञोपवीत अग्नि होत्र, वेदाध्यवन तथा स्वगृह में भिक्षा करती है। सद्योवधुओं का भी यज्ञीपवीत आवश्यक है वह विवाह काल उपस्थित होने पर करा देते हैं।
शतपथ ब्राह्मण में याहवल्क ऋषि की धर्म पत्नी मैत्रेयी को ब्रह्म वादिनी कहा है। तयोई मैत्रेयी ब्रह्म वादिनी वभूवः।
अर्थात्- मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। ब्रह्मवादिनी का अर्थ वृहदारणयक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य जी ने ब्रह्म वादन शीला किया है। ब्रह्म का अर्थ है- वेद। ब्रह्म वादन शीला अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली।
यदि ब्रह्म का अर्थ ईश्वर लिया जाय तो भी ब्रह्म प्राप्ति बिना वेद ज्ञान के नहीं हो सकती।इसलिये ब्रह्म वहीं जान सकता है जो वेद पढ़ता है। देखिए।
ना वेद विन्मनुते तं वृहन्तम्।
तैत्तिरीय.
एतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाअनाशकेन।
वृहदारणयक 4। 4। 22
जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रहकर तप, स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को करते थे वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्मा निर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती थी।
पूर्वकाल में अनेक सुप्रसिद्ध ब्रह्मचारिणी हुई है। जिनकी प्रतिभा और विद्वता की चारों ओर कीर्ति फैली हुई थीं। महाभारत में ऐसी अनेक ब्रह्मचारिणी का वर्णन आता हैं
भारद्वाजस्य दुहिता रूपेण प्रतिमा भुवि।
श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी॥
महाभारत शल्य पर्व 48। 2
भरद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी जो ब्रह्मचारिणी थी। कुमारी से साथ 2 ब्रह्मचारिणी शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।
अत्रेव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार ब्रह्मचारिणी।
योगयुक्तादिवं माता, तपः सिद्धा तपस्विनी॥
महा.भा. शल्य पर्व 54। 6
योग सिद्धि को प्राप्त कुमार अवस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली, तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्राह्मणी तप करके मुक्ति को प्राप्त हुई।
वभुव श्रीमती राजन् शणिडल्यस्य महात्मनः।
सुता धृत व्रता साध्वी नियता ब्रह्म चारिणी।
सातु तप्तवा तपो घोरे दुश्ररं स्त्री जनेन ह।
गता स्वर्ग महाभागा देव ब्राह्मण पूजिता॥
महा. भा. शुल्य 54। 9
महात्मा शाँडिल्य की पुत्री ‘श्रीमती’ थी। जिसने व्रतों को धारण किया। वेदाव्ययन में निरन्तर प्रवृत्त थी। अत्यंत कठिन तप करके वह देब ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारी। अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणो वे पारगा। अधीत्य सकलार्न् वदान् लेभेकसन्देह सक्षयम्॥
महा. भा. उद्योग पर्व 109। 18
शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारगत थी उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष पद प्राप्त किया।
महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 320 में सुलमा नामक ब्रह्मवादिनी संन्यासिनी का वर्णन है। जिसने राजा जनक के साथ शास्त्रार्थ किया था। इसी अध्याय के श्लोक 82 में सुलभ ने अपना परिचय देते हुए कहा है-
प्रधानो नाम राजर्षि व्यक्तं ते श्रोत मागतः।
कुले तस्य सनुत्पन्ना सुलभाँ नाम विद्धिमाम्॥
साहं तस्तिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे।
विनीता मोक्ष धर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम्॥
महा. शान्ति पर्व 320। 82
मैं सुप्रसिद्ध क्षत्रिय कुल में उत्पन्न सुलभा हूँ। अपने अनुरूप पति ने मिलने से मैंने गुरुओं से शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास ग्रहण किया है।
पांडव पत्नी द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए श्री आचार्य आनन्द तीर्थ (मध्वाचार्य) जी ने महाभारत निर्णय में लिखा है -
वेदाश्चायुत्तम स्त्रीभिः को कृष्णाद्याभिरिहा खिलाः।
अर्थात्- उत्तम स्त्रियों को कृष्णा (द्रापदी) की तरह सब वेद पढ़ने चाहिये।
तेभ्योदघार कन्ये द्वे, वपुनाँ धारिणी स्वधा। उभे ते ब्रह्म वादिन्यौ, ज्ञान विज्ञान पारंगे।
भागवत 4। 1। 64
‘स्वधा’ को दो पुत्रियाँ हुई, जिनके नाम वयुनी और धारिणी थे। वे दोनों ही ज्ञान और विज्ञान में पूर्ण पारंगत तथा ब्रह्मवादिनी थीं
विष्णु पुराण 1। 10 और 18-19 में तथा मार्कणडेय पुराण अ. 52 में भी इस प्रकार ब्रह्म वादिनी (वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है।़
सततं मूर्ति मन्तश्च वेदाश्चत्वार एव च। सन्ति यस्याश्च जिव्हाग्र साच बेदवतीस्मृता॥
ब्रह्म वैवर्तपुराण प्रकृति खण्ड 14। 65 उसे चारों वेद कंठाग्र थे। इसलिये उसे वेदवती कहा जाता था।
इस प्रकार की नैष्ठिक ब्रह्मचारिणी और ब्रह्मवादिनी नारियाँ अगणित थी। इनके अतिरिक्त गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाली कन्याएं भी दीर्घकाल तक ब्रह्मचारिणी रहकर वेद शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त तब विवाह करती थी। तभी उनकी सन्तान संसार में उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह यशस्वी, पुरुषार्थी और कीर्ति मान होती थी धर्म ग्रन्थों का कि कन्या ब्रह्मचारिणी रहने के उपरान्त विवाह करे।
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विनते पतिम्।
अथर्व 11। 6। 1
अर्थात्- कन्या ब्रह्मचर्य अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त करती है।
(क्रमशः)
(क्रमशः)
(लेखक-डा. पी. आर. जैन)
ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिये मन और वाणी शुद्धि के बाद यह भी अनिवार्य है कि शारीरिक अशुद्धि न रहने पाये। शारीरिक अशुद्धि बीमारी का घर है और जो रोगी है उसका ब्रह्मचारी होना भी सम्भव नहीं। डाक्टरों एवं मनोविज्ञान वेत्ताओं का तो कहना है कि रोगी और निर्बल ही अधिक विषयी होते हैं और फलतः क्षीण होते चले जाते हैं।
शरीर में इतने छिद्र और रोमकूप इसलिये बने हैं कि शरीर की भीतरी गन्दगी दूर होती रहे और साथ ही शुद्ध वायु का प्रवेश भी जारी रहे। नाक और मुँह के अतिरिक्त रोम कोपादि भी साँस लिया करते हैं और स्वस्थ रहने के लिये यह आवश्यक है कि उन्हें साफ रखा जाये और यह ध्यान और कोशिश बनी रहे कि वे बन्द न होने पायें
स्नान मात्र ही पर्याप्त शुद्धि नहीं दे सकता। केवल 10-20 लोटा पानी। डाल लेने या नदी या तालाब में 1-2 डुबकी लगा लेना ही पर्याप्त स्नान नहीं। साथ ही गरम पानी और साबुन से शरीर को मलमल कर धोना भी पर्याप्त या आवश्यक स्नान कदापि नहीं है। स्वस्थ रहने, वीर्य की रक्षा करने तथा रोग विमुक्त रहने के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति शरीर को स्वच्छ करने में कदापि आलस्य न करें और विधिवत् स्नान को सुख, सौंदर्य और स्वास्थ्य का सर्वोच्च साधन मानें।
इसके लिये यह आवश्यक है कि घर्षण स्नान किया जाये। इस विधि से स्नान करने से मनुष्य तेजस्वी, निर्विकारी, नीरोग, ब्रह्मचारी तथा दीर्घजीवी बन सकता है। जो अपने शरीर को गन्दा बनाये रहते हैं। और वे अल्पायु को प्राप्त होते हैं और अल्पायु में भी सदैव रोग एवं मनोविकार के शिकार बने रहते हैं। शरीर को किसी खुरदरे गमछे या तौलिये से रगड़ना ही रोग कूपों को साफ रखने का मुख्य साधन है। रोमकूप साफ रहेंगे तो शरीर की गन्दगी और विष आसानी से बाहर निकल आयेगा। डाक्टरों का कथन है कि बहुधा मंदाग्नि, कब्जियत, चर्म रोग आदि रोमकूपों की गन्दगी से हो जाते हैं। और क्रमशः रक्त अत्यन्त अशुद्ध हो जाता है। रगड़कर स्नान करने से रोमकूप साफ रहते हैं, छिद्रों के मुँह खुल जाते हैं और साथ ही त्वचा बड़ी मुलायम और सुन्दर हो जाती है।
घर्षण स्नान का सर्वोत्तम समय प्रातः काल है। प्रातः काल स्नान कर लेने से दिन भर चित्त प्रसन्न रहता हैं और जठराग्नि दीप्त होने से भोजन भी ठीक से पचता है। फिर जब पेट ठीक रहता है और तो मन की विमलता भी बनी रहती है और आलस्य पास फटकने नहीं पाता। सूर्योदय के पूर्व स्नान करना अत्यन्त लाभकर है। फिर भी यदि किसी कारणवश देर हो जाय तो सूर्योदय के पश्चात स्नान कर लेना चाहिये।
स्नान सदैव शीतल जल से ही करना चाहिए। हाँ किसी रोग या अन्य कारणवश यदि डॉक्टर कहें तो गर्म जल से स्नान कर लेना हानिकारक नहीं है तथापि यह ध्यान तो रखना ही पड़ेगा कि सर पर गर्म जल न पड़े। यह स्मरण रहे कि स्नान से जो लाभ है वे तभी प्राप्त हो सकते हैं जब शीतल जल से स्नान करने से नस-नस में स्फूर्ति की बिजली सी दौड़ पड़ती है और जठराग्नि प्राप्त होती है। अतएव प्रातःकाल शीतल स्नान स्वास्थ्य का परम साधन है। यह साधन इतना सुलभ है कि गरीब से गरीब प्राप्त कर सकता है- भले ही बहुत बड़ा अमीर अपनी जान के भय से गर्म जल से स्नान कर अपना समय और धन का दुरुपयोग करे। आजकल के नवयुवक गर्म जल से स्नान करना अपना भाग्य और स्वास्थ्य का चिन्ह समझते हैं लेकिन यह बात ध्यान में नहीं आती कि फिर भी क्यों उनका स्वास्थ्य क्षीण होता जा रहा है।
जाड़े में जिन्हें सर्दी लगने का विशेष भय रहता है वे तो अवश्य घर्षण स्नान करें। स्नान करने से पूर्व एक खुरदरे तौलिये या गमछे से शरीर को खूब रगड़ें। डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। खास-खास अंगों को छोड़कर बाकी शरीर पर बल लगाकर घर्षण करें। इससे शरीर एकदम गर्म हो उठेगा, पसीना निकलेगा और छिद्र खुल जायेंगे। इसके बाद फिर हाथों से तमाम शरीर रगड़ना चाहिये। एक-दो दिन के अभ्यास से ही उसका गुण प्रकट हो जायेगा। पेट को रगड़ने से पेट की शिकायत भी दूर होगी और स्वास्थ्य उत्तम हो जायेगा।
इसके अतिरिक्त स्नान करते समय भी घर्षण किया जा सकता है- यानी शरीर पर जल डाल कर या तौलिये को जल में भिगोकर शरीर को रगड़ा जाता है। लेकिन प्रथम विधि सर्वोत्तम है। शरीर पर जल डालने के सम्बन्ध में यह नियम याद रखना चाहिये कि पहले सर भिगो लिया जाये फिर शरीर के अन्य भागो पर जल पड़े। शरीर के अन्य भागो से पहले सिर पर जल डालने से एक प्रकार की गर्मी उत्पन्न होती है जो सर पर पहुँच बहुत हानि करती है, लेकिन यदि सर को पहले ही भिगो लिया जाये तो फिर वह डर नहीं रहता।
कुछ विद्वान विशेषज्ञों का यह मत है कि स्नान सोने में सुगन्ध उत्पन्न कर देता है। हिन्दू धर्म में सूर्योपस्थान आदि की विधि भी शायद इसी लाभ को मद्देनजर रख कर रखी गयी है। यह सूर्य स्नान कर लेने पर घर्षण स्नान का पूरा लाभ मिलता है।
सुबह और शाम दो बार स्नान करना चाहिए। यदि शीत अधिक पड़ती हो तो 10-15 मिनट अन्यथा आधे घंटे का समय स्नान में व्यतीत करना चाहिये। भली-भाँति विधिवत स्नान ही अपने गुण दिखा सकता है। स्नान का स्थान एकान्त होना चाहिये। पाश्चात्य विद्वानों ने नंगे स्नान करने की राय दी है लेकिन यह भारतीय सभ्यता के विरुद्ध है तथापि शरीर पर जितने कम कपड़े हों उतना ही अच्छा। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि भोजन करने के बाद स्नान का अवसर न आये। इस प्रकार स्वास्थ्य को सुधारने से तथा घर्षण स्नान से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन हो सकता है।
(डाँ. लक्ष्मी नारयण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए.)
मनुष्यों का स्वभाव एक सा नहीं होता। कोई गर्म स्वभाव का होता है, कोई ठंडे स्वभाव का। अतः किसी को गर्म भोजन लाभदायक होते हैं किसी को ठंडे भोजन आदि। नीचे लिखी तालिका पाठकों को विशेष लाभप्रद होगी -
(1) गर्म-खुश्क चीजें- अचार, अखरोट, बड़ी इलायची, करमकल्ला, गाँठ गोभी, चाय, चना, मकोय का शाक, शहद, कालीमिर्च, लाल मिर्च, मसूर, मोठ, मटर, मेथी, चना, छुहारा, सरसों, तम्बाकू, सुहाजना, दालचीनी, सोंठ, नमक, सोये का शाक, पान, सौंफ , पोदीना, प्याज, बैंगन आदि।
(2) गर्म तर चीजें- अंजीर, भेड़ का दूध, उड़द की दाल, अंगूर, मिसरी, आम, काशीफल, मूँगफली, खरबूजा, राई, गेहूँ, लोबिया, घी, शकरकन्द, चुकन्दर, साबूदाना, चिलगोजा, सेव, जिमीकन्द, काला जीरा, तिल, किशमिश, सूखा नारियल, परवल, पिस्ता, बादाम आदि।
(3) सर्द खुश्क चीजें- आलू, इमली, खट्टा, आँवला, कत्था, कचनार, गुलाब, गोभी का फूल, जामुन, जौ, धनिया, नाख, फालसा, बरफ, बेर, भिस्से, भाँग, मकई, महुआ, मूली, सिंघाड़ा, सूखा, सिरका, सुपारी, सेम की फली आदि।
(4) सर्द तर चीजें- आड़ू, नीबू, इसबगोल, तरबूज, अलूवा, तोरई, मीठा बनार, ताजा पानी, आँवले का मुरब्बा, पालक, अनानास, पनीर, कुल्फे का शाक, पेठा, कुलफी मलाई, फलूदा, कमल गट्टा, दूध, केला, बादाम की सरदाई, खीरा, बथुआ, खुम्ब, भिंडी, लौकी, मक्खन, कद्दू, मीठा, चकोतरा, लीची, छाछ, लखौट, टिण्डे, संतरा, ढींगरी, सिंघाड़ा कच्चा नारियल, सरदा नारंगी आदि।
(5) मौत दिल (सौम्य) चीजें- घुइयाँ, अमरूद, गाजर, शलजम, सदल, छिलका उतारा भिगोया हुआ बादाम आदि।
गंगादशहरा गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इस दिन स्वर्ग लोक से शिवजी के मस्तक पर भगवती गंगा जी का अवतरण हुआ था। और इसी दिन ब्रह्म की वाणी का प्रस्फुरण होकर ज्ञान गंगा गायत्री का उद्भव हुआ है। एक ज्ञान गंगा आत्मा को पवित्र बनाती है दूसरी वाह्य जीवन के मलों को स्वच्छ करती है। दोनों ही तरण तारिणी है। एक सूक्ष्म है दूसरी स्थूल। दोनों ही की महिमा अपार है।
इस पुण्य पर्व को भारतीय जनता अनादि काल से मनाती चली आ रही है। गंगा या अन्य नदी सरोवरों पर लोग स्नान करते हैं, तथा अपनी भावना और परिस्थिति के अनुसार दान पुण्य एवं शुभ सत्कर्म करते हैं। आध्यात्मिक ज्ञान गंगा गायत्री का महत्व समझने वाले भी इस अवसर को अछूता नहीं जाने देते वे भी अपनी शक्ति और भावना के अनुरूप माता के चरणों पर श्रद्धाँजलि समर्पित करते हैं। गायत्री उपासकों का सबसे बड़ा त्यौहार गंगादशहरा ही है।
इस वर्ष जेष्ठ सुदी नवमी दशमी ता. 24 जून को है। उसी दिन पर्व माना जायगा। उस दिन अपनी सुविधा के अनुसार हमें व्रत, उपवास, मौन, भूमि शयन, 24 सौ मंत्रों का जप, ध्यान, एकान्त सेवन, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, कीर्तन, हवन, प्रवचन आदि का आयोजन करना चाहिए।
माता के चरणों पर श्रद्धाँजलि के रूप में अर्पण करने योग्य सबसे उत्तम आध्यात्मिक उपहार गायत्री प्रचार है। इस अमृत को जितने अधिक लोगों में बाँटा जा सके, इस पारस मणि से जितने अधिक व्यक्तियों को संपर्क कराया जा सके उतना ही उत्तम है। इस कार्य में अपना समय और प्रभाव खर्च करते हुए किसी को संकोच न करना चाहिए। वाणी द्वारा आग्रह पूर्वक अनुरोध करके किसी को गायत्री उपासना में लगा देना वाणी की श्रद्धांजलि है। धन द्वारा गायत्री साहित्य का वितरण करना माता का प्रिय भेंट चढ़ाना है।
साधना रथ के दो पहिए होते हैं। 1-आत्मा कल्याण के लिए तप कराना और 2-दूसरों के कल्याण के लिए प्रचार करना। गायत्री जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार का श्रद्धांजलियां माता के चरणों पर समर्पित की जानी चाहिए।
हैजा से बचने के उपाय
(आयुर्वेदाचार्य श्री नीलकंठ शास्त्री)
हैजा उड़कर लगने वाला रोग है, और इसकी छूत नदियों अथवा स्थल के रास्ते के रास्ते भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है। इसके सम्बन्ध में विभिन्न सम्मतियाँ हैं। किन्हीं की सम्मति है कि-इस रोग की छूत हवा में है, किसी का मत है कि- पानी में है, कोई कहते हैं कि गन्दगी से यह छूत उत्पन्न होती है। किसी का मत है कि इस रोग का असर पहले आमाशय पर होता है।
यह बात सत्य है कि एक मनुष्य से दूसरे को हैजे की बीमारी उड़ कर लगनी है, परन्तु इसका कारण स्पर्श नहीं। इसके और कारण हैं। रोगी के समीप रहने वाले मनुष्यों में जो रोगी के काम में आई हुई चीजों का इस्तेमाल करते हैं और अपने शरीर और कोष्ठ की सफाई का ठीक ध्यान नहीं रखते उन्हीं पर इस रोग की छूत उड़ कर लगने का भय रहता है। इसलिए रोगी को परिचर्या करने वाले मनुष्यों को रोग से बचने के लिए सचेष्ट रहना चाहिये। हैजे के फैलने का मुख्य साधन पानी है, दूषित पानी के पीने से ही हैजा अधिकतर फैलता है, जल में अनेकों प्रकार के छोटे-छोटे जन्तु होते हैं, जो हमें नहीं दीखते। इनमें हैजे के जन्तु इस प्रकार मिल जाते हैं उनको पहचानना बहुत ही कठिन हो जाता है। जल में बहुत से जन्तु ऐसे होते हैं कि जिनका शरीर पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, वे शरीर में जाते ही नष्ट हो जाते हैं। जिन स्थानों में यह रोग सदा बना रहता है वहाँ यह जन्तु कभी नष्ट नहीं होते। थोड़े बहुत बने ही रहते हैं। जैसे ही उसे अनुकूल हवा और खुराक मिलती है, तत्काल बढ़कर रोग फैला देते हैं। यदि किसी कुएं में भरपूर बलवान जन्तु उत्पन्न हो गये हों, तो उनपर जन्तु नाशक दवा भी पूरा असर नहीं करती। हाँ कुछ कमी जरूर हो जाती है। इसीलिए ऐसे कुओं में कई बार दवा डालनी पड़ती है। हवा डालने के पश्चात् कुएं के पानी को निकलवा देना चाहिए। इससे पानी शीघ्र साफ हो जाता है।
यही बात नहीं कि कुएं का पानी दोष युक्त हो, उसके पीने से ही रोग का आक्रमण हो, बल्कि उस पानी से स्नान करने और बर्तन, कपड़ा धोने से भी यह रोग फैलता है। बहुत से मनुष्य कहते हैं कि अगर कुएं के पानी से ही यह रोग फैलता है तो जितने आदमी उस पानी को पीते हैं सब बीमार क्यों नहीं पड़ते। इसका क्या कारण है? वास्तव में यह रोग उन्हीं पर आक्रमण करता है, जिनकी पाचन शक्ति कमजोर होती है। जो तन्दुरुस्त हैं, बलवान हैं, उन पर रोगों का आक्रमण नहीं होता। जिनकी पाचन क्रिया ठीक है, उनके विशेष रूप से एक प्रकार का रस पैदा होता है। यह रस स्वाद में खट्टा होता है, उसके प्रभाव से यह जन्तु तत्काल नष्ट हो जाता है। परन्तु जिनकी पाचन शक्ति कमजोर है, जिन्हें सदैव कब्ज बना रहता है, जो खाये हुए पदार्थ को हजम नहीं कर सकते। जिनकी आँतें भी ठीक प्रकार काम नहीं कर सकतीं, उन्हीं पर इस रोग का आक्रमण होता है। जो लोग पानी गर्म करके और छानकर पीते हैं, उन पर इस रोग का असर नहीं होता। इस रोग का खाली पेट पर जितना असर होता है, उतना भरे पेट पर कदापि नहीं होता। क्योंकि खाली पेट में उक्त खट्टा रस नहीं रहता यह रस भोजन करने के पश्चात् ही बनता है। इसलिए खाली पेट में वह दूषित जल पहुँचता है तो उसमें के जन्तु अंतड़ों और रक्त में प्रवेश कर जाते हैं। परन्तु भोजन के पश्चात् यह पानी पिया जाय तो यह पाचन रस उस जल के जन्तुओं को नष्ट कर देगा। जो लोग एक ही साथ बहुत सा पानी पीते हैं, उन पर इस रोग का असर जल्दी होता है, परन्तु जो थोड़ा-थोड़ा पानी पीते हैं उन पर इस रोग का इन-जन्तुओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि थोड़े पानी में थोड़े जन्तु होते हैं, जिन्हें पाचक रस तुरन्त नष्ट कर देता है। इस रोग का आक्रमण अधिकतर गरीब लोगों पर होता है, क्योंकि उन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता। नंगे बदन रात को खुली हवा में सोते हैं, और कच्चा पक्का जो भोजन मिल जाय उसे ही खाते हैं इससे वे बिल्कुल कमजोर हो जाते हैं। और कमजोरी में रोग का आक्रमण शीघ्र होता है। पानी के सिवाय कपड़ा, दूध, खुराक आदि के द्वारा भी इस रोग के जन्तु शरीर में प्रवेश करते हैं।
जब किसी मनुष्य पर हैजे का आक्रमण होता है, तब किसी को तो यह रोग दवा-दारु का भी मौका नहीं देता और कुछ घण्टों में ही यमलोक पहुँचा जाते हैं। परन्तु वह इतने अशक्त हो जाते हैं कि वर्षों में भी पूर्व खोई हुई शक्ति का संचय नहीं कर पाते। रोग के आक्रमण के पश्चात् कोई रोगी तो बिल्कुल ठंडा पड़ जाता है, किसी को तेज ज्वर हो जाता है। किसी को पतले दस्त अधिक संचय में आने लगते हैं और किसी को वमन होने लगती है, कभी-कभी मूत्र का अवरोध भी हो जाता है। सबसे पहला लक्षण दस्त का होना है। दस्त बार-बार होते हैं। दस्तों के साथ ही बेचैनी बढ़ जाती है। पेट में दर्द भी अक्सर हो जाता है। और कुछ घण्टों तक रहता है। प्रारम्भ के दो तीन दस्त भारी होते हैं इन दस्तों का रंग पीला होता है, और ज्यों 2 ही दस्तों की संख्या बढ़ती जाती है दस्तों का रंग सफेद हो जाता है, जैसा कि चावल का माण्ड होता है। कभी-कभी दस्त के साथ खून भी आने लगता है। कभी आँव भी आती है। यह लक्षण हो तो समझना चाहिए कि रोगी का बचना कठिन है मूत्र के अवरोध में रोगी को खतरे से बाहर न समझना चाहिए। जब मूत्र हो जाय तो समझना चाहिए कि रोग का वेग कम है।
हैजे के दिनों में दस्त, दर्द, आँव, मरोड़ होना अच्छा नहीं। इनके होते ही उनकी चिकित्सा करो, कराओ। ऐसा प्रयत्न करे जिससे कमजोरी न बढ़े। बीमारी के दिनों में अगर दस्त हो जाय तो उन्हें रोकने से पूर्व आमाशय और अंतड़ियों में एकत्रित मल को निकाल दो। जब तक यह दूषित मल शरीर में रहेगा, रोग का आक्रमण होते ही किसी अच्छे वैद्य या डॉक्टर को दिखाओ। चिकित्सा में असावधानी न करो नीचे के उपायों से रोग का भय नहीं रहता-
(1) कोठा साफ रक्खो, कब्ज न होने दो। गरिष्ठ वस्तुओं का खाना बिलकुल बन्द कर दो।
(2) बाजार की मिठाइयाँ, खोमचे वाली की चाटे खाना एकदम बन्द कर दो। (3) हरे शाक, बासी फल, ककड़ी-फूट आदि खाना छोड़ दो। (4) पानी औटाकर और छान कर पियो। (5) खाली पेट घर से न निकलना चाहिए। (6) जेबों में कपूर पड़ा रहने दो। (7) घरों के आलों में प्याज रक्खो। (8) प्याज की चटनी, करौंदा, मिर्च और नीबू का सेवन प्रति दिन करो। (9) नीबू की शिकंजी का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। (10) अपने ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों को रोज धूप में सुखाओ। (11) रोगी का मल-मूत्र को तुरन्त घर से बाहर गड्ढे में जाकर दबा दो। (12) कुएं के पानी में लाल दवा डालकर उसको पीओ। (13) हैजा के रोगी से मिलों-जुलो नहीं। घर साफ रखो, कीच जमा मत होने दो। (14) मल-मूत्र को तुरन्त घर से बाहर गड्ढे में जाकर दबा दो। (15) रोगियों को साफ रखो, उनमें रोज फिनायल डालकर साफ करो। (16) दूध बासी ठण्डा मत पिओ। कच्चा दूध देर तक मत रहने दो। (17) धोबी के घर से कपड़े आवें तो उन्हें तुरन्त धूप में डाल दो, और खूब सुखा दो। (18) मेला-तमाशा-सिनेमा आदि भीड़ के स्थानों में मत जाओ।
उर की धड़कन-धड़कन में मैं सुनता, प्रिय, संगीत तुम्हारा!
आगे, दाएं, बाएं, पीछे, मेरे तन मन के स्पन्दन में!
गाते हो तुम, प्राण, तरंगें, उठती हैं मेरे कण-कण में!
तुम कितना भी धीमे गाओ, सुनता हूँ स्पष्ट उसे में!
क्यों न सुनूँ? जब तुम मुझमें हो, प्रियतम और रमा तुममें में!
एक हमारी तन्त्री, प्यारे, एक राग अनुराग हमारा! उर की.
हे मेरे अभिराम राम! तुम मेरे पास नहीं आते हो!
मति तुम, मैं आता, चिपके से, हे छलिया, छिप जाते हो!
हे रसिया, हे मोहन, इतना क्यों तुम मुझसे शरमाते हो?
प्रिय! तुम अपने भोलेपन से ही मुझको यों तड़पाते हो!
ओ आकाश, छाया है मेरे चारों और घना अंधियारा! उर की.
तुम्हें पकड़ने का कोई, प्रिय, साधन मेरे पास नहीं है!
इसीलिए यह मनमानी, सच कहना, क्या यह बात नहीं है?
यही सही में क्यों घबराऊँ? दो दिन की ही बात रही है!
आज पवन ने चुपके से आ श्रोत्र निकट यह बात कही है-
बाँध तुम्हें सकती है मेरी गरम-गरम आँसू की धारा! उर की.
लेकिन मेरे उर मैं जलती रहती हैं भीषण ज्वालाएं!
बन जाती हैं वाष्प दृगों तक आती आँसू की धाराएं!
गरम-गरम वे वाष्प कपोलों को आ कर देते हैं रक्तिम!
और समझते हो तुम, मैं मुसकाता हूँ, हे मेरे प्रियतम!
कहूँ तुम्हें क्या, भोले? मैं ही हूँ दुखिया किस्मत का मारा! उर की.
पर कुछ भी हो, निश्चय मुझे कभी न कभी तुम प्राण मिलोगे!
मेरे सपनों की दुनिया के एक मात्र अरमान, मिलोगे!
मेरे मन्दिर, मेरी प्रतिमा, हे मेरे भगवान्, मिलोगे!
नहीं व्यर्थ जा सकता प्रेमी का यह जप, तम, साधन सारा! उर की.
*समाप्त*
(श्री सत्यभूषण जी ‘योगी’)