गायत्री महाविद्या के नौ ग्रन्थ रत्न

गायत्री महाशक्ति की साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। जैसे बिजली का विज्ञान जाने बिना कोई आदमी बिजली उत्पन्न करने की मशीन चलाने लग जाय तो यह एक खतरनाक बात होगी। डाक्टरी पढ़े बिना जो आदमी आपरेशन करने लग जाय वह कोई अच्छा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता। इसी प्रकार गायत्री महाविद्या को भली प्रकार जानने के बाद ही साधना करनी चाहिए।

गायत्री महाशक्ति की अत्यन्त आवश्यक जानकारियाँ और साधना विधियाँ इतनी विस्तृत एवं विशद हैं कि उन्हें चिट्ठी पत्री की दस बीस लाइनों में किसी का समझना या समझाना असम्भव है। इसलिए गायत्री विद्या का अत्यन्त आवश्यक विज्ञान, विधान, साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई इन सुन्दर, सस्ती, अनुभवपूर्ण एवं सच्चा पथ-प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक-एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।

1 गायत्रीमहाविद्या (प्रथम भाग) गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, गायत्री और यज्ञोपवीत का संयंत्र, साधना के आवश्यक नियम गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएँ, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुण्डलिनी जागरण आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू0 3॥) रु॰

2 गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी, गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्र नाम आदि का भाषा टीका समेत संकलन है। मू0 3)

3 गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियाँ तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव। मू॰ 1)

4 गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क, प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत आधार उपस्थिति करके गायत्री का गुप्त विज्ञान तथा मर्म समझाया गया है। मू॰ 1)

5 गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं- सर्वसाधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ। मू॰1)

6 वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक एवं गायत्री चालीसा का संग्रह। मू0 1)

7 गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)- गायत्री के ॐ, भूर्भुवः, स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं , भर्गो, शब्दों की जीवन को सुविकसित सात्विक, आदर्श, महान एवं सुख शान्तिमय बनाने वाली शिक्षात्मक व्याख्या। मूल्य छः आना।

9 सर्वशक्तिमान गायत्री-गायत्री विद्या के महत्व को प्रतिपादित करने वाली यह अत्यन्त सस्ती पुस्तक ब्रह्मदान के रूप में अधिकाधिक संख्या में वितरण करने योग्य है। मूल्य 1)

मूल्य में कमी के लिए लिखा पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। छः रु॰ से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। छः से कम की बी. पी. पी. पर डा. ख. 11)

पता - “अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)

वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)


शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात!


शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात (kavita)

देख, पद रख, नाप लेगा सिंधु की तू थाह,

हाथ ऊपर कर निकट ही बादलों की छाँह,

सुन जरा तू सुन सकेगा तारकों की बात!

शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात!

छू लिया जिसको पिघल ही वह गया पाषाण,

कामना तेरी गई कर शाप को वरदान,

तू तृषित मरु भूमि में रस का सुरम्य प्रभात,

शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात!

तिमिर मय जग में भरा तूने पुनीत प्रकाश,

शिथिल पद में ध्येय पाने का अटल विश्वास,

बन गई ऊषा, तुझे पाकर विरह की रात,

शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात,

शक्ति अपनी तू भली विधि आज ले पहिचान,

आज तेरे हाथ में है विश्व का कल्याण,

कह रही है बिजलियों की शपथ खा बरसात!

शक्ति अपनी ही तुझे कब ज्ञात।

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


सर्वत्र अपना ही प्राण बिखरा पड़ा है।

भूर्वै प्राण इति ब्रुवन्ति मुनयो वेदान्ति पारंगता।

प्राणः सर्व विचेतनेषु प्रसृतः सामान्य रुपेण च॥

एतेनैब धिसिद्धयते हि सकलं नूनं समानं जगत्।

दृष्टव्यं सकलेषु जन्तुषु जनै नित्यंह्यतश्चात्मवत्॥

अर्थ-मनन करने वाले मुनि लोग प्राण को भूः कहते हैं। यह प्राण सर्वत्र समष्टि रूप से फैला हुआ है। इस से सिद्ध है कि यहाँ सब समान हैं। अतएव सब मनुष्यों और प्राणियों को अपने समान ही समझना चाहिए।

हम शरीर हैं इस भावना से भावित होकर लोग वही कार्य करते हैं जो शरीर को सुख देने वाले हैं, आत्मा के आनन्द की प्रायः सर्वदा उपेक्षा की जाती रहती है। यही माया, अविद्या, भ्रान्ति, बन्धन में बाँधने वाली है। मैं वस्तुतः कौन हूँ? मेरा स्वार्थ सुख और आनन्द कि बातों में निर्भर है ? मेरे जीवन का उद्देश्य एवं लक्ष्य क्या है? इन प्रधान प्रश्नों की लोग उपेक्षा करते हैं, और निरर्थक बाल-क्रीड़ाओं में उलझे रह कर मानव जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को यों ही गवाँ देते हैं।

गायत्री के ‘भूः’ शब्द में बताया है कि हम शरीर नहीं प्राण हैं-आत्मा हैं। जब प्राण निकल जाता है तो शरीर इतना अस्पर्श्य एवं विषाक्त हो जाता है कि उसे जल्द से जल्द जलाने, गाढ़ने या किसी अन्य प्रकार से नष्ट करने की आवश्यकता अनुभव होती है। आत्मा के संसर्ग से ही यह हाड़, माँस, मल-मूत्र आदि घृणित वस्तुओं से बना हुआ शरीर सुख, यश, वैभव, प्रतिष्ठा का माध्यम रहता है जब वह संयोग बिछुड़ जाता है तो लाश, पशुओं के मृत शरीर के समान भी उपयोगी नहीं रहती।

हम प्राण हैं-आत्मा हैं। ज्ञान संचय करने से पूर्व हमें अपने आपको जानना चाहिए। सुख सामग्री इकट्ठी करने का प्रयत्न करने से पूर्व यह देखना चाहिए कि आत्मा को सुख शान्ति किन वस्तुओं से मिल सकती है। समृद्धि, यश, प्रतिष्ठा पद आदि संचित करने से पूर्व यह सोचना चाहिए कि आत्मगौरव, आत्म-सम्मान, आत्मोन्नति का केन्द्र कहाँ है? शरीर को प्रधानता देना और आत्मा की उपेक्षा करना यह भौतिकवाद है। आत्मा को प्रधानता देना और शरीर की उचित रक्षा करना, यह आत्म-वाद है। गायत्री कहती है कि हम आत्मा हैं इसलिए हमारा सर्वोपरि स्वार्थ आत्म-परायणता में है, हमें आत्मवादी बनना चाहिए और आत्म-कल्याण, आत्म-चिंतन, आत्मोन्नति, एवं आत्म-गौरव की सबसे अधिक चिन्ता करनी चाहिए।

जब हम आत्मवादी बनते हैं तो स्वभावतः भौतिकवाद को केवल उतना ही महत्व देना होता है जितना कि वह अनिवार्यतः आवश्यक है। शरीर की क्षुधाएं बुझाने के लिए भोजन कमाने, कुटुम्ब पोषण की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए सीमित धन कमाने की इच्छा हो तो उसे ईमानदारी से कमाया जा सकता है। शेखी-खोरी और बड़प्पन की कामना से हम बहुत सी बेकार की जरूरतें, फैशन, अपव्यय, उत्सव, आदि के खर्चीले भार अपने सिर पर ओढ़ लेते हैं। वजन को बढ़ाते चलना और उसको उठाने के लिए धर्म और जीवन को बलिदान करते चलना, आज की यही जीवनचर्या है। यदि सादा जीवन बिताया जाय, अपने अपरिग्रही पूर्वजों की भाँति आवश्यकताओं को सीमित रखा जाय तो भौतिक आकर्षण के लोभ से सहज ही बचा जा सकता है। तब आत्म कल्याण के लिए कुछ सोचने और करने का अवकाश मिल सकता है। इसलिए आवश्यकताओं को कम करना और उच्च विचारों को हृदयंगम करना ही एकमात्र वह उपाय रह जाता है जिसके सहारे हम आत्मकल्याण की ओर चल सकते हैं। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ यह आत्मवादी की’ प्रथम साधना है। इस साधना को अपनाये बिना कोई भी व्यक्ति आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। वस्तुओं की अपेक्षा गुण का मूल्य एवं सम्मान जब समझ में आने लगे तब समझना चाहिए कि यह आत्मवाद का प्रकटीकरण हो रहा है।

आत्म-कल्याण का अगला कदम सबमें अपनेपन का दर्शन करना है। विश्वव्यापी प्राण एक है, प्राणिमात्र में एक ही आत्मा निवास कर रही है, एक ही नाव में सब सवार हैं, एक ही नदी की सब तरंगें हैं, एक ही सूर्य के सब प्रतिबिम्ब हैं, एक ही जलाशय के सब बुलबुले हैं, एक ही माला के सब दाने हैं, सब में एक ही प्रकाश जगमगा रहा है। सम्पूर्ण समाज शरीर है हम उसके अंग मात्र हैं। आत्मा एक मनुष्य की होती है, सम्पूर्ण प्राणियों की विश्वव्यापी परम विस्तृत जो आत्मा है उसे परमात्मा या विश्वात्मा कहते हैं। नरनारायण, जनता जनार्दन, विराट पुरुष, विश्वनाथ, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, आदि शब्दों में यही भाव भरा हुआ है कि एक ही चैतन्य तत्व प्राणिमात्र में समाया हुआ है। इसीलिए सब आपस में संबंधित हैं, सब आपस में पूर्ण आत्मीय हैं, पूर्णतया एक है।

संसार की सब पंच भौतिक वस्तुएं निर्जीव हैं उन में सुख देने वाला कोई तत्व नहीं, जिस वस्तु को हम अपनी मान लेते हैं बड़ी प्रिय लगने लगती है। वस्तुओं में प्रिय-अप्रिय लगने लायक कोई विशेषता नहीं है। हमारी ‘अपने पन’ की भावना ही उस साधारण वस्तु को परम प्रिय, परम आकर्षक, परम आनन्द दायक बना देती है। अपने मकान व्यापार, परिवार, शरीर, वाहन आदि से हम बहुत प्रसन्न रहते हैं, वही प्रिय लगते हैं। पर उनसे भी अधिक अच्छी यह सब वस्तुएँ दूसरे की हों तो उनसे उतना आनन्द नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि आनन्द का उद्गम हमारी आत्मा है। यह आत्मीयता की भावना यदि प्राणी मात्र में, समस्त सृष्टि में, आरोपित कर दी जाए तो विश्व का कण-कण स्वर्गीय आनन्द से, ओत-प्रोत हो जायगा। प्रत्येक प्राणी अपना भाई, भतीजा जैसा लगने लगेगा। अपने को विश्व, परिवार का सदस्य, समस्त सृष्टि का स्वामी, अनुभव करने पर जो अपार आनंद आता है, उसका गायत्री के शब्द का अर्थ समझने वाला ही रसास्वादन कर सकता है।

एक ही प्राण समस्त शरीर में व्याप्त है। हाथ, पाव, आँख, नाक, कंठ, छाती आदि अवयवों व चेतना एक ही केन्द्र पर आधारित है इसलिए पृथक-पृथक रंग रूप गुण स्वभाव योग्यता शक्ति के होते हुए भी एक ही शरीर के अंग हैं। सब अवयव जब परस्पर मिलजुल कर काम करते अपने संकुचित स्वार्थ का विचार न करके सामूहिक स्वार्थ को प्रधानता देते हैं तभी शरीर ठीक काम करता है यदि इनमें से हर एक अंग अपने लाभ, स्वार्थ, संचय, सुख, आराम, प्रतिष्ठा, बड़प्पन की बात सोचे तो समझना चाहिए की जीवन के लिये संकट उत्पन्न हुआ। फेफड़े अपने तक ही वायु को सीमित रखें, आमाशय भोजन को ? कर अपने में ही धरे रहे, हृदय सारा रक्त अपने पास जमा कर ले, पैर सब अंगों का भार ढोने से इनकार कर दें, हाथ दिन भर श्रम करके अन्य अंग के पोषण के लिए परिश्रम करने में आनाकानी करें तो शरीर की, सारी व्यवस्था बिगड़ जायगा और वह स्वार्थी अंग भी सुखपूर्वक न रह सकेगा।

समाज एक शरीर है व्यक्ति उसका अंग है यदि व्यक्ति अपने स्वार्थ को प्राथमिकता देता है और समाज के हित की अवहेलना करता है तो निश्चय ही न वह व्यक्ति सुखी रह सकेगा और समाज। सब के हित में अपना हित और सब की हानि में अपनी हानि है। मौहल्ले में प्लेग, चेचक, हैजा आदि कोई रोग फैले या पड़ौसी के घर आग लग जाय तो निश्चय ही हमारा घर भी सुरक्षित नहीं रह सकता अपने नगर में गुँडों का आतंक बढ़ जाय तो हम भी शान्तिपूर्वक नहीं रह सकते, शत्रु का हमला किसी नगर पर हो तो उसके प्रत्येक निवासी को समान रूप से खतरा है। इसी प्रकार जहाँ जलवायु उत्तम हो, सत्पुरुष रहते हों, सुशासन हो, सुख शान्ति का वातावरण हो, वहाँ सभी लोग सुखी रहते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि पत्नी के पाप का भागी उसका पति और शिष्य के पाप का भागी उसका गुरु भी होता है। इसी प्रकार पत्नी को पति के पुण्य में से और शिष्य को गुरु के तप में से हिस्सा मिलता है। कारण स्पष्ट है कि परस्पर संबंधित होने के कारण एक दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व से बंधे हुए हैं। फल स्वरूप एक दूसरे की बुराई भलाई एवं हानि लाभ के लिए भी जिम्मेदार हैं। निर्दोषों के साथ में अनीति हो रही हो तो उसे न रोकने वाले वहाँ के निवासी भी पापी होते हैं। सरकार ऐसे प्रदेशों पर सामूहिक जुर्माना करती है। क्योंकि बुराई को न रोकना भी एक जुर्म है। भूकम्प, महामारी, युद्ध अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष आदि सामूहिक आपत्तियों का कारण उस देश की जनता की सामूहिक अनैतिकता, गरीबी, अकर्मण्यता आदि बुराइयां हैं। इन्हें दूर करने के लिये वहाँ के लोगों में पुरुषार्थ जागृत करने के लिये ईश्वर इस प्रकार की आपत्तियाँ भेजता है। इन आपत्ति ग्रस्त क्षेत्रों में अनेकों सत्पुरुष भी दुख पाते हैं कारण स्पष्ट है अपने पड़ोसियों की हीनावस्था के लिए वे स्वयं भी उत्तरदायी हैं। समस्त मानव समाज एक सूत्र शृंखला में बँधा हुआ है।

जिसका हृदय संकुचित है, जिसकी बुद्धि संकीर्ण है, जिसकी भावना अनुदार हैं वे अविवेकी मनुष्य खुदगर्जी को प्रधानता देते हैं। परिणाम यह होता है कि लोकहित तो वे करते नहीं, अपना हित उनसे हो नहीं पाता। भारतीय धर्मशास्त्र में बताया है कि “उदार चरितानाँ तु वसुधैव कुटम्बकम” उदार मनुष्यों के लिए सारा संसार अपना कुटुम्ब है। भगवान बुद्ध ने यह कह कर मोक्ष को ठुकरा दिया कि “जब तक एक भी प्राणी बन्धन में है तब तक मुझे मोक्ष की आवश्यकता नहीं।” बादल अपने लिए नहीं बरसते, फूल अपने लिए नहीं खिलते, वृक्ष अपने फलों को आप नहीं खाते, सरोवर अपने लिये जल नहीं भरे रहते, मधु-मक्खी अपने लिये मधु संचय नहीं करती, सूर्य-चन्द्र अपने लिये भ्रमण नहीं करते। सृष्टि के समस्त जड़ चेतन पदार्थों पर दृष्टिपात कीजिये वे केवल आत्मसुख के लिये ही जीवन धारण नहीं किये हुए हैं वे प्रभु की इस पुण्य वाटिका, सृष्टि की शोभा बढ़ा रहे हैं, दूसरों की सुख सुविधा बढ़ाना उनका प्रधान प्रयोजन है। मनुष्य को मिली हुई विशेष शक्तियाँ तो ईश्वर की अमानत है जो इसलिये है कि उनके द्वारा कम बुद्धि वालों की सहायता करके उन्हें ऊँचा उठाया जाय, सुखी बनाया जाय। जो यह समझते हैं कि हमारे पास जो धनबल, बुद्धिबल, शरीरबल है वह केवल मात्र हमारे ही लाभ के लिए है वे भूल करते हैं। जन साधारण के लाभ के लिए दी हुई ईश्वर की अमानत का वे दुरुपयोग करते हैं। अमानत में खयानत का अपराधी उन्हें ठहराया जायगा।

गायत्री की शिक्षा है कि अपनी आत्मा को सब में और सबकी आत्मा को अपने में समाई हुई देखो। अपना वह लाभ स्वीकार करो जो समाज के लोभ का एक भाग है। अपने जिस कार्य से औरों की हानि होती है, बहुसंख्यक नागरिकों पर जिसका बुरा प्रभाव पड़ता है ऐसा लाभ सर्वथा त्याज्य है। इसलिए दूसरों के दुख को अपना दुख समझना चाहिए। जिस व्यवहार को हम अपने लिए उचित नहीं समझते उसे दूसरों के लिये नहीं करना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मेरे साथ दूसरे लोग दुर्व्यवहार न करें, चोरी, ठगी, विश्वासघात, छल, उद्दंडता, निष्ठुरता, बेईमानी, अनुदारता का व्यवहार उसके साथ न हो, वरन् मधुरता, नम्रता, उदारता, सचाई एवं सहायता की नीति बरती जाय।

स्मरण रखना चाहिए कि जब हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे तो हमें भी ऐसा प्रतिफल मिलेगा। जो बोयेंगे वहीं काटेंगे। यदि वैसा ही व्यवहार हमारे साथ दूसरे न भी करें तो भी विश्व-व्यापी आत्मा को हमारे सद्व्यवहार से जो सुख मिलेगा वह आँशिक और अप्रत्यक्ष रूप से अपने को ही तो मिला क्योंकि अनन्तः सभी आत्माएं एक दूसरे से संबंधित हैं।

किसी को छोटा या नीच समझना अनात्मवाद है। गीता ने पंडित की परिभाषा करते हुए कहा है कि ‘विद्या विनय सम्पन्न ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ता, चाण्डाल आदि सब छोटे बड़े, नीच ऊँच, को जो समता की दृष्टि से देखता है वह पंडित है।” किसी को जाति वंश कुल देश वर्ण लिंग की दृष्टि से ऊँचा या नीचा गिनना अपंडित पन है। परमात्मा के सभी पुत्र एक मानव जाति के हैं चाहे वे स्त्री हों या पुरुष चाहे शूद्र हों या ब्राह्मण। सबका अधिकार, पद, कर्त्तव्य और गौरव समान है। अपनी योग्यता, विद्या, पुरुषार्थ, पुण्य, सेवा आदि गुणों के बल पर लोग ऊँचे उठते हैं, महात्मा, महापुरुष, ब्राह्मण पूजनीय बनते हैं और अपने ही दोष दुर्गुणों के कारण नीच बनते हैं। यह गुण, कर्म, स्वभाव ही नीचता और महानता के आधार हैं अन्यथा प्राणिमात्र में प्रकाशवान ईश्वरीय ज्योति, आत्मा एक ही जाति की है। किसी को स्त्री या पुरुष होने के कारण, शूद्र या ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण छोटा या बड़ा मानना, अधिकार को न्यूनाधिक मानना अज्ञान मूलक है।

गायत्री का भूः शब्द बराबर हमारे लिए आदेश करता है कि हम शरीर नहीं आत्मा है। इसलिए आत्म-कल्याण के लिए, आत्मोन्नति के लिए, आत्म गौरव के लिए, प्रयत्नशील रहें और समाज सेवा द्वारा विराट पुरुष, विश्व-मानव, परमात्मा की पूजा करें।


महा महिमामयी माता

(स्वर्गीय योगिराज अरविन्दघोष)

माता एक ही है, पर वह हमारे सामने विविध रूपों में आती है, उनकी अनेक शक्तियाँ और अभिव्यक्तियाँ हैं, अनेक स्फुल्लिंग और अनेक विभूतियाँ हैं जो इस विश्व में उनका कर्म करती हैं। जिनको हम पूजते हैं वह एक ही हैं और वही भगवान् की वह दिव्य चैतन्यमयी शक्ति हैं जो ‘सर्वमिंद’ के ऊपर खड़ी हैं, हैं एक, पर इतनी अनेक रूपा हैं कि उनकी गति को देखना या समझना तेज-से-तेज गति वाले मन और मुक्त-से-मुक्त तथा व्यापक-से-व्यापक बुद्धि के लिए भी असम्भव है। माता पुरुषोत्तम का चैतन्य हैं, पुरुषोत्तम की शक्ति हैं।

वह सारी दृष्टि करने वाली आदि शक्ति हैं और अपनी इस सारी सृष्टि से बहुत ऊँचे पर रहती हैं। पर उनकी यह विविध विलक्षण झाँकी देखी जा सकती है, समझी जा सकती है उन्हीं की प्रतिमाओं-उन्हीं के ऐसे रूपों को देखकर जो अपने स्वभाव ओर कर्म में मूल रूप से अधिक व्यक्त और मर्यादित होने के कारण अधिक हृदयंगम करने योग्य हैं और जिनके द्वारा माता अपनी संतानों के सामने प्रकट होने में अनुमत होती है।

माता की सत्ता के तीन रूप हैं जो तुम जान सकते हो जब तुम हम को और इस विश्व को धारण करने वाली चिन्मयी शक्ति के साथ अपनी एकता (अभिन्नता) का अनुभव करने लगोगे। लोकातीत परा आधी शक्ति के रूप में वह अनन्त कोटि ब्रह्मांडों के ऊपर खड़ी हैं और पुरुषोत्तम के नित्य अव्यक्त रहस्य तथा उनके इस विश्व ब्रह्माण्ड के बीच की लड़ी हैं। फिर हैं विश्व शक्ति विश्वव्यापिनी महाशक्ति जो इन सब का सृजन करती और इन अनन्त कोटि गतियों के क्रमों के तथा इन अनन्त कोटि शक्तियों को धारण करती है उन्हें धारे रहती और बुलाती है। इसके बाद है व्यक्ति-शक्ति जो माता की सत्ता की इन दो विराट् गतियों की शक्ति का व्यक्त रूप हैं जिनके द्वारा माता के वे दो विराट् स्वरूप हमारे लिये ज्वलन्त और निकटतर हो जाते हैं। और जो मनुष्य तथा दिव्य प्रकृति के बीच में मध्यवर्ती शक्ति के तौर पर हैं।

महाशक्ति, जगत् की जगन्माता वही सृजन करती हैं जिसका संकल्प परमेश्वर से उन्हीं के परम चैतन्य के द्वारा प्रेरित किया जाता है। महाशक्ति इस प्रकार सृष्टियों को रचकर उनके अन्दर प्रवेश करती हैं, इनकी सत्ता ही इन लोकों को भागवत भाव, सर्व प्रतिपालक भागवत-शक्ति और आनन्द से भर देती हैं जिनके होने से ही ये लोक ठहरे हुए हैं। जिसे हम प्रकृति कहते हैं वह इस महाशक्ति का केवल अत्यन्त बाह्य सर्ग (कर्म) रूप हैं, महाशक्ति ही अपनी शक्तियों और गतियों का संचालन और व्यवस्थापन करती हैं, वही प्रकृति से कर्म कराती हैं और उन सब कर्मों के अन्दर गुप्त अथवा प्रकट रूप से रहती हैं। जो कुछ हम देख सकते या अनुभव कर सकते या जिसे जीवन गति दे सकते हैं उन सबमें महाशक्ति की ही सत्ता है। प्रत्येक लोक और कुछ नहीं, एक विशेष लोक-समूह या जगत की महाशक्ति का एक विशेष खेल है और इन सब लोकों में वह महाशक्ति उन्हीं आद्या शक्ति भगवती माता की विश्वव्यापिनी चिच्छक्ति और विश्वव्यापिनी व्यक्ति हैं। प्रत्येक लोक का उन्हीं की दृष्टि में साक्षात्कार होता है, फिर उन्हीं के सौंदर्य और शक्तिमय हृदय में एकत्र धनी भूत होकर वह उनकी आनन्द-स्फुरण से सृष्टा होता है।

माता ऊपर से सब का शासन करती है यह नहीं, बल्कि इस छोटे-से विविध संसार में वह उतर आती है। केवल दिव्य अक्षररूप की ओर दृष्टि निबद्ध करने से मालूम होगा कि यहाँ की सारी वस्तुएं, यहाँ तक कि अज्ञान की सारी गतियाँ भी अपनी शक्ति को प्रच्छन्न करती हुई स्वयं माता ही हैं। अपने सततत्व में अल्पीकृत (घटी हुई) उन्हीं की सृष्टियाँ हैं, उन्हीं की प्रकृति-शरीर और प्रकृति शक्ति हैं। और ये सब हैं इसी कारण से कि अनन्त की प्रभाव सम्भावनाओं में कुछ ऐसा था जिसे चुन कर प्रकृतरूप प्रदान करने का रहस्यमय आदेश परमेश्वर से पाकर वह इस महान् आत्मबलि के लिए समस्त हुई और उन्हीं ने छद्मवेश की तरह अज्ञान की आत्मा और रूपों को धारण कर लिया। पर व्यक्ति रूप में भी उन्होंने अपने को यहाँ तक नीचा कर दिया कि वह इस अन्धकार में उतर आयीं इसलिये कि इसे ज्योति की ओर ले जाऊँ, झूठ में और भ्रम में आ गयीं इसलिये कि इन्हें सत्य का रूप दे दूँ, इस मृत्यु में भी आ धमकी इसलिए कि इसे दिव्य जीवन दे दूँ, संसार के इस क्लेश में, इस हठी शोक और दुःख में पहुँच गयीं इसलिये कि इसके इस रूप का अन्त करके अपने महत् अत्युत आनन्द की दिव्य रूप प्रदान करने वाली प्रगाढ़ता में इसे परिणत कर दूँ।

अपनी सन्तानों के प्रति उनका मातृ प्रेम प्रगाढ़ और महान है। इसी से उन्होंने अन्धकार का यह आवरण ओढ़ना स्वीकार कर लिया है, तमस् और मिथ्या की शक्तियों के दारुण दुर्भाव और दुराक्रमण सह लेना मंजूर कर लिया है, जो जन्म-मृत्यु ही हैं, उसके तोरण द्वार के पार होने की वेदना को धार लिया है, सृष्टि की सारी व्यथा, सारा शोक और सारा कष्ट उठा लिया है, क्योंकि ऐसा मालूम हुआ कि यही एक उपाय है जिससे यह सृष्टि उठ कर आलोक, आनन्द, सत्य और सनातन जीवन को प्राप्त हो सकती है। यह महायज्ञ है जिसे कभी-कभी पुरुष का यज्ञ कहते हैं, पर जो इससे अधिक गंभीर अर्थ में, प्रकृति की ही पूर्ण आत्मबलि है, भगवती माता का ही महायज्ञ है।

जो ज्ञानी हैं। उन्हें वह अधिकाधिक एवं और भी विशद ज्ञान देती हैं, जिनमें दर्शन-शक्ति है उन्हें अपनी कल्पना और अभिप्राय में शरीक होने का अधिकार देती हैं, जो विरोधी हैं उन पर उस विरोध का परिणाम लादती हैं, जो अनजान और मूर्ख हैं उन्हें उन्हीं की अन्धता के अनुसार रास्ता दिखाती हैं। प्रत्येक मनुष्य के स्वभाव के भिन्न-भिन्न अंशों की आवश्यकता और प्रेरणा के अनुसार और जिस प्रतिदान के लिए वे आहुति देते हैं उसके अनुसार माता (महेश्वरी) प्रत्युत्तर देती हैं और उनका प्रयोग करती हैं, उन पर आवश्यक प्रभाव डालती हैं या उन्हें अपने प्रति स्वाधीनता के भरोसे छोड़ देती हैं जिसमें या तो अविधा के पथ पर समृद्धि लाभ करें या ध्वंस को प्राप्त हों। कारण वह सब के ऊपर हैं, जगत् के कोई किसी वचन से बँधी नहीं, किसी में आसक्त नहीं। तथापि उनका जो हृदय है वह विश्व जननी का हृदय है, ऐसा मातृ स्नेह इतना और किसी में नहीं है।

कारण, इनकी दया अनन्त और अक्षय है, उनकी दृष्टि में सभी उनकी सन्तान हैं, उसी एक के अनेक अंश है, असुर, राक्षस, पिशाच और जो उन से विद्रोह करते या शत्रुता करते हैं वे विद्रोही और शत्रु भी उनकी दृष्टि में अपनी सन्तान ही हैं। उनका प्रत्याख्यान केवल विलम्बन मात्र है, और उनका दण्ड विधान तो करुणा ही है।

ज्ञान और शक्ति, केवल ये ही दो रूप परमेश्वरी माता के नहीं हैं, उनकी प्रकृति में और भी सूक्ष्मतर एक रहस्य है और वह एक ऐसी चीज है कि जिसके बिना ज्ञान और शक्ति अपूर्ण ही रह जायेंगे और पूर्णत्व भी पूर्ण न होगा। इन ज्ञान और शक्ति के ऊपर सनातन सौंदर्य की अलौकिक चमत्कृति है, दैवी समन्वय का अगम्य रहस्य है, अप्रतिहत जगद्वयापिनी मनोहरता और आकर्षण का ऐसा वशीकरण है कि वह अपनी और सब वस्तुओं और शक्तियों और सत्ताओं को खींचता है, एकत्र बाँधे रहता है और उन्हें एक दूसरे के साथ मिलने और एक होने को विवश करता है जिनमें वह आनन्द जो परदे के के अन्दर छिपा हुआ है, वहाँ से अपना खेल खेले और उन्हें अपने स्वर और रूप बनावे। यह शक्ति है महालक्ष्मी की और कोई रूप इससे अधिक मोहक या आकर्षक नहीं है। महेश्वरी इस पार्थिव-प्रकृति की क्षुद्रता लिये इतनी अविचल और महान् और दूर मालूम हो सकती हैं कि यह वहाँ तक पहुँच न सके या उनका भाव धारण भी न कर सके, महाकाली भी इतनी द्रुतगति और प्रचण्ड हैं कि इस पार्थिव प्रकृति की दुर्बलता उनका भाव वहन न कर सके, पर महालक्ष्मी की ओर सभी बड़े आनन्द और लालसा के साथ दौड़ पड़ते हैं। कारण, वह भगवान के उन्मादक माधुर्य को मोहनास्त्र फेंक हैं, उनके समीप रहने में अगाध सुख होता है और अपने हृदय के अन्दर उन्हें मालूम करना जीव को आनंदोन्माद और कौतुकमय बना देना हैं, शोभा और मोहकता और मृदुता उनसे वैसे ही प्रवाहमान होती हैं जैसे सूर्य से ज्योति। जहाँ कही वह अपनी आश्चर्यमयी दृष्टि डालती हैं या अपनी स्मित कान्ति बरसाती हैं। वहाँ आत्मा अभिभूत हो जाता है, विमुग्ध होकर कैदी-सा बन जाता है और अथाह आनन्द की गंभीरता में निमग्न हो जाता है। उनके हाथों का स्पर्श चुम्बक के समान है और उनका रहस्यमय मृदु प्रभाव मन, प्राण और शरीर में लालित्यमय सूक्ष्मता ले आता है और जहाँ उनके चरण अवस्थित होते हैं वहाँ उन्मत्त कर देने वाले आनन्द के अपूर्व स्रोत बहने लगते हैं।


भारतीय संस्कृति का आदर्श-विश्व प्रेम

(श्री सर अकबर हैदरी)

आज संसार की आत्मा संकट में पड़ गयी है। मानव जाति साँस्कृतिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से जिन बातों को महत्व देती आयी है, उन सब का अस्तित्व आज अधर में लटका हुआ है। प्रश्न यह है कि आज जैसी अराजकता हमारे बीच छाई हुई है, उससे संस्कृति के बचे रहने की क्या कुछ भी आशा है?

कोई राष्ट्र अपनी जनता में ज्ञान, विज्ञान तथा ललित-कलाओं का विकास भले ही कर ले, किन्तु यदि वह अपने साधारण दृष्टिकोण, अपनी विचारधारा और अपने दैनिक जीवन में ज्ञान, सत्य और सौंदर्य तथा जीवन के उच्च आदर्शों से प्रभावित होने के स्थान पर निम्न कोटि के व्यापारिक, धार्मिक तथा अन्य उद्देश्यों से प्रभावित होता है, तो साधारणतः उसे सभ्य भले ही कह लिया जाय, किन्तु वास्तविक अर्थ में उसे सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता।

श्री अरविन्द घोष ने संस्कृत तथा सुसंस्कृत मानव समाज की व्याख्या बड़े सारगर्भित शब्दों में की है। आपके शब्दों में उस व्यक्ति को संस्कृति के वास्तविक अर्थ में सुसंस्कृत कहा जा सकता है, “जो मन की इन्द्रिता (अस्थिर अवस्था) से ऊपर उठकर ज्ञान और विवेक को अपनाता है और जिसकी भावना जिज्ञासु के समान सदा ज्ञान की खोज में रहती है। सुसंस्कृत व्यक्ति के कर्म उसकी परिष्कृत अभिलाषा के परिणाम होते हैं और उन्हीं से चरित्र तथा अन्य नैतिक गुणों का निर्माण होता है। ऐसा व्यक्ति साधारण अथवा निम्नकोटि की मनोवृत्ति के वशीभूत होकर कार्य नहीं करता, बल्कि उसके कार्य सत्य और सौंदर्य के अभिमान तथा आत्मसंयम के आधार पर किये हुए संकल्प के परिणाम होते हैं।”

इस प्रकार सच्ची संस्कृति सत्यं, शिवं, सुन्दग्म् की खोज में एकनिष्ठ होकर लगा रहना है। इस कसौटी पर कसने पर हम आधुनिक सभ्यता को यूनान की प्राचीन संस्कृति या जागृत काल के इटली अथवा अशोक या विक्रमादित्य कालीन प्राचीन भारत अथवा अकबर और शाहजहाँ के मध्यकालीन भारत से भिन्न तर पाते हैं, क्योंकि आज संसार के सभ्य कहाने वाले राष्ट्रों ने अपनी बौद्धिक तथा वैज्ञानिक सफलताओं को अपने व्यापारिक उद्देश्यों, हृदय हीन अधार्मिकता तथा पशुबल बढ़ाने में उपयोग करने के सिवा और कुछ नहीं किया।

आज यूरोप का अधिकाँश मानव समाज जीवन का ध्येय अपनी शक्ति बढ़ाना ही समझता है। आधुनिकता का मतलब विज्ञान से ओत-प्रोत, कुत्सित और प्राणहीन जीवन है।

कला के सम्बन्ध में पूर्वीय और पश्चिमी दृष्टिकोण की विभिन्नता से भी इस विषय पर कम प्रकाश नहीं पड़ता। पूर्वीय कलाकार वस्तु के बाह्यरूप की अपेक्षा उसके अन्दर को सजाने में ही कला की सार्थकता समझता है। उसकी कला का उच्चतम ध्येय आत्मा अर्थात् मनुष्य के अन्तर की दैवीसत्ता का ज्ञान प्राप्त करना अथवा इस दैवीसत्ता और प्रकृति के परस्पर भेदों पर प्रकाश डालना है। पूर्वीय कलाकार आत्मा को इसकी अभिव्यक्ति द्वारा, असीम दैवी सत्ता को इसके सीमा प्रतिरूपों तथा सांसारिक उपकरणों द्वारा और ब्रह्म को इसकी अपरिमित तथा अपरिमेय शक्ति द्वारा समझता है।

अक्सर कहा जाता है, कि भारतीयों की आध्यात्मिकता ही उनके साँसारिक जीवन की असफलताओं तथा विदेशियों की अधीनता में पड़ने का कारण है। परन्तु दर्शन और साहित्य में भारत की महानता, चित्रकला तथा मूर्ति और गृह-निर्माण कलाओं में उसकी सफलता और उसके इतिहास में, महान साम्राज्यों का उत्थान तथा पतन-इन सबसे यही प्रकट होता है, कि भारतीय जनता संकल्प करने तथा शक्ति का प्रदर्शन करने में किसी से पीछे नहीं रही है।

भारत में राजनीतिक एकता न रहने का कारण देश की विशालता तथा यातायात के साधनों की कमी थी। यही कारण था, कि विदेशियों ने उस पर विजय पायी, यद्यपि विजयी होने के पूर्व उन्हें लम्बी और कठिन लड़ाइयां लड़नी पड़ती थीं। अब यातायात के आधुनिक साधनों का विकास होने के कारण देश के राजनीतिक जीवन में एकता आने लगी है। यदि बौद्धिक दृष्टि से भी भारत स्वाधीन हो जाय और अपनी आध्यात्मिक संस्कृति को पुनः प्राप्त कर ले, जैसा कि उसके करने का मुझे पूर्ण विश्वास है, तो वह मानव जाति के उत्थान के लिये एक भारी दृष्टि की सृष्टि कर देगा।

राष्ट्रों, जातियों, संस्कृतियों तथा धर्मों के बीच आज जो विरोध, शत्रुता तथा अविश्वास की भावना दिखायी दे रही है, यह हमारी प्राचीन अहंभावना के कारण है। यह दूसरे पर अपनी इच्छा लादने की हमारी प्रवृत्ति के कारण है। यह दूसरे घर को छीनकर उसे अपना घर बना लेना, उस पर अपनी प्रभुता स्थापित करने तथा एक के द्वारा दूसरे के व्यक्तित्व को मिटा देने के कारण है।

अब हमें एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता है, जिसमें पारस्परिक सहन शीलता ही कानून हो, जिसमें एक साथ विभिन्न जातियाँ, राष्ट्र, संस्कृतियाँ और आध्यात्मिकता रहें और फले फूले। ऐसी व्यवस्था में-ऐसी सामूहिक एकता में ही आज दिखायी देने वाला विरोध, शत्रुता और अविश्वास की भावना मिटा सकती है।

मानव जाति की पूर्ण विकसित सभ्यता में हमारी यही स्थिति होगी और इसी को अपनी उन्नति का ध्येय मानकर हमें आगे बढ़ना चाहिए। भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का उद्देश्य मानवता के सर्वोच्च आदर्शों की प्राप्ति करना रहा है। इसीलिये संसार में नयी व्यवस्था होने पर भारत उसमें अपना उचित स्थान ही प्राप्त नहीं करेगा, वरन् मानव जाति के विकास में संसार को मार्ग दिखाने में समर्थ हो सकेगा। मनुष्य जाति को आध्यात्मिकता के रस में ओत-प्रोत करने के लिये भारत के पास आदर्शों की महत्ता है और उसकी जनता में उन्हें कार्यान्वित करने की सामर्थ्य भी है।


सफलता का मनोवैज्ञानिक मार्ग

(प्रो॰ रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

समाज के मनोविज्ञान की जानकारी पर आपकी सामाजिक सफलता बहुत अंशों में निर्भर है। क्या आप दूसरों की कमजोरियाँ खुले आम बतलाते हैं? क्या उनकी आलोचना खराबियाँ, दोष, दिखलाते हैं? यदि ऐसा है, तो आप अपने पाँव में कुल्हाड़ा मार रहे हैं।

मनुष्य का “अहं” गर्व, अभिमान एक बड़ी महत्वपूर्ण भावना है। चाहे किसी ने भारी भूल ही क्यों न की हो, चाहे वह जेल खाने का अपराधी ही क्यों न हो, वह अपने आपको दोषी मानने को कदापि तैयार नहीं होता। आलोचना भयावह मानसिक व्यंग्य हैं, गर्व और अभिमान पर चोट है। वह जनता के क्रोध और अंतर्जगत में बद्धमूल गर्व पर आक्रमण करती है। यही कारण है कि अपराधी अपने सिवा और सबको दोष देता है। हम सबमें से कोई भी आलोचना पसन्द नहीं करते।

समाज में वह जीतता है, जो हँसमुख चेहरे द्वारा सर्वत्र प्रसन्नता बखेरता है। सच्चे हृदय से लोगों को उत्साहित करता है। उन्हें सत्पथ पर जाते देख प्रशंसा, प्रेरणा, उपहार, निष्कपट मैत्री द्वारा आगे बढ़ाता है।

संसार में मनुष्य आश्चर्य का पिटारा है। बिल्कुल नई चीज है, जिसमें निजी इच्छाएं, अनुभव, मानसिक आवेग भरे पड़े हैं। ये सब पृथक-2 हैं। आप सहानुभूति तथा उत्साह के यंत्रों से उन्हें खोलिये और समझिये। उनकी विगत समस्याओं और आपबीतियों को कान देकर दिलचस्पी के साथ सुनिये। और उन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कीजिए। हमें यह जानने का उद्योग करना चाहिए कि जो कुछ वे कहते हैं, या करते हैं, वह किस आकाँक्षा या गुप्त भाव से संतुलित होता है। आलोचना के स्थान पर मनुष्य को स्टडी करना, समझना, कहीं अधिक लाभदायक और गुप्त प्रभाव रखता है। इससे सहानुभूति, सहिष्णुता, और दयालुता उत्पन्न होती है, आत्मा का विस्तार होता है। दूसरों को समझाना ही हमारे जीवन का दृष्टिकोण होना चाहिए।

समाज में प्रसिद्धि के लिए आपको अपने मत, विचारधारा, एवं योजनाओं का आरोप दूसरों के मन, बुद्धि पर करना होता है। अर्थात् आपको दूसरों को अपनी विचारधारा के अनुकूल बनाना होता है। उनकी पुरानी रूढ़ियां, अंधविश्वास परिवर्तित कर नई अपनी विचार धार को उनके मन मंदिर में प्रतिष्ठित करना होता है।

साधारण व्यक्ति इस कार्य के निमित्त बुद्धि व, अर्थात् तर्क-वितर्क का आश्रय ग्रहण करते हैं लम्बी-लम्बी दलीलों पर उतर आते हैं। बहस लम्बी चलती है। और उसका निष्कर्ष यह होता है कि दूसरा व्यक्ति अपनी धारणाएं नहीं बदल सकता। एक खोज तथा ईर्ष्या का भाव लेकर वह पृथक हो जाता है।

मानव-मन में अनुभूतियों, भावना के तत्व, हृदय एवं आकाँक्षाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। मान-वमन अनुभूतियों के सरस धरातल पर ऐसी ऐसी कठिन और अप्रासंगिक बातों पर विश्वास कर जाता है, जिन्हें कदाचित वह शुष्क तर्क के द्वारा कदापि विश्वास नहीं कर सकता। वे व्यक्ति कुछ सामाजिक लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सकते, तर्क-वितर्क के शुष्क धरातल से उठ कर अनुभूति और भावना के सरस धरातल पर नहीं आ सकते। मनुष्य भावना से परिचालित होता है, जो उसके हृदय को स्पर्श करता है, उसी पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है।

अनावश्यक वाद-विवाद त्याग कर दूसरों की मनोभावनाओं और अनुभूतियों को सहृदयता पूर्वक सुनिये, दूसरों के दृष्टिकोण की कटुआलोचना न कीजिए। जब वे अपनी बातें कह चुकें, तब अनुभूतियों और भावुकता से सरस बनाकर अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत कीजिये। अपने विचारों और योजनाओं की व्याख्या इस भावनात्मक दृष्टि कोण से प्रस्तुत कीजिये कि उनके हृदयतन्त्री के तार झंकृत हो उठें। उनका दिल यह गवाही दे दे कि बात वास्तव में ठीक है।

सार्वजनिक व्याख्यानदाता की सफलता का गुर यह है कि वह जनता की, आसपास के मनुष्यों की, भावना को झड़काना जानता है। वह चतुरता से इस बात को ध्यान रखता है कि दूसरों के आत्मसम्मान, और आत्मगौरव को ठेस न लग जाय। आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचने से द्वेष पूर्ण घृणा उत्पन्न हो जाती है।

श्री शिव कंठ लाल शुक्ल ने सत्य ही लिखा है, “मनुष्य अनुभूतियों और भावनाओं, विचारों, इच्छाओं और सम्मान का दास है वह तर्क शास्त्र से वशीभूत कभी नहीं हो सकता। हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए कि वे लोग “मनुष्य” हैं देवता नहीं है। उनके विचार और भावनाएं शिलाखंड पर लिखे अक्षर नहीं हैं। इसमें से प्रत्येक अपने को बुद्धिमान, विचारवान, और तर्क शास्त्री होने का दावा करता है और उसी के अनुसार प्रयत्न भी करता है, परन्तु जब वही बात प्रत्यक्ष अनुभव में आती है, तो हमें ज्ञात होता है कि हमारी प्रदर्शन बुद्धि तत्व की अपेक्षा पूर्व निर्मित धाराएँ अधिक काम करती हैं। तर्क हमारे साथ कार्य करने में असमर्थ सिद्ध होता है तर्क की विजय बहुत कम होती है। तर्क अधिकतर व्यर्थ सिद्ध होकर विजय को भी पराजय में बदल देती है। मान लीजिये, कि हमने किसी को अपने तर्क बल से कोई बात मनवाली और उसने स्वीकार भी कर लिया, पर विश्वास रखना चाहिए कि यह मान्यता बाह्यय और अस्थायी है। उससे विचारों में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं हो सकता। हृदय नहीं बदल सकता।”

मानव स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह उन्हीं बातों पर विश्वास करता है, जो उस के घर में पहले से ही चले आ रहे हैं। मानव स्वभाव स्मृतियों से, पूर्व धाराओं से स्नेह करता है। अतः आप इस प्रकार बातचीत करें कि उनके प्रिय सुनिश्चित विचारों पर कम से कम प्रहार हो। प्रेम पूर्वक हृदय की भाषा में समझाइये। पूर्व उदाहरण भी ऐसे प्रस्तुत कीजिए जिससे उसके स्नेह को जीता जा सके, वह उत्साहित रहे, “हाँ, हाँ” उच्चारण करता चले। सच्ची मान्यता प्रेम पूर्ण सुहृदय व्यवहार से हो सकती है, तर्क-वितर्क खण्डन-मण्डन द्वारा नहीं। वास्तव में प्रेम, सुहृदयता, दूसरों के दृष्टिकोण को आदर, प्रशंसा ही वशीकरण के मूल मन्त्र हैं।

समाज से डरने वाला, सभा-सोसाइटी से भागने और जन समूह से पृथक रहने वाला असामाजिक हो जाता है। यदि आप बहुत जल्दी चिढ़ जाते हैं, झल्ला उठते हैं, अपनी बात दूसरों को बताने में शर्म आती है, तो आप आत्मलघुता की भावना से पीड़ित हैं। यह मानसिक बीमारी है। यदि आपको निम्नलक्षण अपने व्यक्तित्व में दिखाई दें, तो सावधान हो जाइए-झेंपना लड़कियों की तरह यकायक नेत्र नीचे कर लेना, दूसरे से आँखें न मिला सकना, यदि आप काम कर रहे हों और दूसरा आदमी मेज के पास आ जाय, तो मन में बेचैनी का भाव अनुभव करना, लड़कियों से डरना, अपनी आलोचना न सुन सकना, भविष्य के प्रति निराश रहना, नये लोगों से मित्रता स्थापित करने में कठिनाई का अनुभव करना, अपनी भावनाओं को आघात लग जाना समझने लगना, सभा-सोसाइटियों में लोगों में घुल मिल न सकना, प्रसिद्ध लोगों से परिचय होने के समय आपके मुँह से शब्दों का न निकलना, ये सभी बातें बतलाती हैं कि आप सामाजिक तत्वों में कमजोर हैं।

सामाजिक बनिये। आपका काम प्रत्येक सामाजिक प्राणी से पड़ने वाला है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आपको लोगों से मिलने जुलने की आदत बढ़ानी चाहिए। सभा-सोसाइटियों में जाने से और वहाँ कुछ बोलने से मत चूकिए । यह सोचने की आदत डालिये कि कमजोरी और हीनताएँ तो सभा में होती हैं। उनसे इतना घबराने की आवश्यकता नहीं है।

आप किस प्रकार के समाज में रहना चाहते हैं, वह उच्चकोटि के चरित्रवान, सात्विक प्रकृति के निष्ठा त्याग और बलिदान के व्यक्तियों का होना चाहिए। यदि मनुष्य को अच्छा समाज प्राप्त हो जाय, तो उससे बड़ा उत्तम प्रभाव चरित्र पर पड़ता है। आत्म संस्कार का कार्य सहज हो जाता है।

पं॰ रामचन्द्र शुक्ल की राय है कि आत्म संस्कार वाले मुमुक्षों को चाहिए कि सात्विक समाज में प्रवेश करें। साहित्यिकों, विद्वानों, उच्च कर्म मार्गियों से पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने से जानकारी में अभिवृद्धि होती है। इस उच्च समाज में प्रवेश करने से हमें अपना यथार्थ मूल्य विदित हो जाता है। हम देखते हैं कि हम उतने चतुर नहीं हैं जितने एक कौने में बैठकर अपने आपको समझा करते थे। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न गुण स्वभाव चारित्रयक विशेषताएँ होती है। यदि कोई एक बात में निपुण है तो दूसरा दूसरी बात से। समाज में प्रवेश करने पर हम देखते हैं कि इस बात की कितनी आवश्यकता है कि लोग हमारी भूलों को क्षमा करें। अतः हम दूसरों की भूलों को क्षमा करना सीखते हैं, नम्रता और आधीनता का पाठ सीखते हैं, हमारी समझ में बुद्धि में वृद्धि होती है, विवेक तीव्र होता है, वस्तुओं, घटनाओं तथा व्यक्तियों के विषय में हमारी धारणा विस्तृत होती है, हमारी सहानुभूति गहन होती है, हमें अपनी शक्तियों के उपयोग का अभ्यास होता है।

“समाज एक परेड है, जहाँ हम चढ़ाई करना सीखते हैं, इसमें भी साथियों के साथ-साथ मिल कर आगे बढ़ना और आज्ञा पालन सीखते हैं, इससे भी बढ़ कर और बातें हम सीखते हैं। हम दूसरों का ध्यान रखना, उनके लिए कुछ स्वार्थ त्याग करना, सद्गुणों का आदर करना और सुन्दर चाल ढाल की प्रशंसा करना सीखते हैं। बड़ों के प्रति सम्मान और सरलता का व्यवहार बराबर वालों से प्रसन्नता का व्यवहार और छोटों के प्रति कोमलता का व्यवहार-भले मनुष्यों के लक्षण हैं।”

अधिक से अधिक समाज के शिष्ट व्यक्तियों से मित्रता स्थापित कीजिए, अपना संपर्क उत्तरोत्तर बढ़ाते रहिए। जितना अधिक मेल होगा, उतनी ही प्रतिष्ठा, सहायता, पारस्परिक सद्भाव, सहयोग, प्रेम और मान बढ़ता जायेगा।


जीवन की महानता की कसौटी।

(ले॰ श्री अगरचन्दजी नाहटा)

प्रत्येक धर्म में जीवन को बहुत दुर्लभ व अनमोल बताया है। विचार करने पर उसका रहस्य समझ में भली भाँति आ जाता है। इतर प्राणियों से मानव की एक विशेषता है-विचारकता। और इसका फल है भोग से त्याग की ओर अधिकाधिक अग्रसर होना। इस सिद्धान्त से हमें मानव जीवन की महानता का मापक मन्त्र मिल जाता है। विवेक पूर्वक जिसके जीवन में जितना अधिक त्याग है, उसका जीवन उतना ही आदर्श व महान है।

शास्त्रों में देवों से भी अधिक मानव जीवन को उच्च बताया है। क्योंकि देवों का जीवन भोग प्रधान है। वे शुभ प्रवृत्तियाँ तो कर सकते हैं, पर इच्छा व विवेक पूर्वक त्याग नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें अविरसि (त्याग रहित) की संज्ञा दी गई है। जगत के समस्त प्राणियों में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो जीवन का चरमोत्कर्ष मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मानव के सिवाय कोई भी प्राणी मोक्ष-मुक्ति का अधिकारी नहीं। मुक्त शब्द स्वयं ही हमें त्याग की महत्ता इंगित करता नजर आता है।

मुक्ति किससे? बन्धन से! बन्धन का त्याग ही तो मोक्ष है और बन्धन भोग के द्वारा होता है। अतः जितने-जितने अंश में हम त्याग को अपनाते हैं उतने-उतने अंश में हम मोक्ष के समीप पहुँचते हैं। और भोग के द्वारा बन्धन को बढ़ा कर संसार में परिभ्रमण करते हैं। मानवेत्तर समस्त प्राणियों के जीवन पर दृष्टिपात करने पर वे निरन्तर भोग के पंक में ही फँसे हुए नजर आते हैं। अतः उनकी भव परम्परा समाप्त नहीं होती। विचारक मानव मस्तिष्क ने बन्धन एवं मोक्ष के कारण की मीमाँसा की, तो उसे जीवन धारा बहिर्मुखी प्रवाहित होती हुई नजर आई। अतः उसके धारा-प्रवाह के बदलने की आवश्यकता प्रतीत हुई। और वह भोग के दल-दल से हट कर अंतर्मुखी बना, पर पुदगलों के भोग से वृत्ति हटाकर त्यागी बना।

जैन धर्म के मान्य तीर्थंकरों व ऋषियों के जीवन एवं उपदेशों पर नजर डालते ही हमें इस दर्शन की निवृत्ति प्रधानता का पता चल जाता है। समस्त तीर्थंकरों ने त्याग धर्म को अपनाया। कुटुम्ब, परिवार, धन-माल, राज्य वैभव, सत्ता, ऐश आराम को छोड़ कर वे अंगार संन्यासी बने, गृह हीन बने। जीवन में अनेक भावों के परिपोषित आशक्ति के तन्तुओं पर उन्होंने विजय पाई। यावत् शरीर पर की ममता को भी त्याग भोगों पर पूर्ण विजय प्राप्त हो गई तो उन्हें आत्मदर्शन रूप केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। और उन्होंने अपने अनुभूति के बल पर प्राणियों को आत्म दर्शन का रास्ता बतलाया।

हजारों व्यक्तियों ने पूर्णतः एवं अंशतः योग्यतानुसार त्याग को स्वीकार किया। सर्व विरति धारक सर्वस्व त्यागी को साधु, एवं देश विरति धारक अंशतः त्यागी को श्रावक या महात्मा कहा जाता है। इनमें जिनका त्याग जितना अधिक उसका दर्जा उतना ही उच्च माना जाता है, मूलतः त्याग में पौद्गलिक आसक्ति का त्याग ही प्रधान है। पर हमारी आसक्ति विविध प्रकार की है। अतः उनके अनेक भेद किये जा सकते हैं। धनादि परिग्रह आशक्ति का प्रधान करण है। अतः गृहस्थों के लिए उससे स्वामित्व हटाने रूप दान धर्म को भी त्याग का एक प्रकार माना गया है। “ज्ञान का सार विरति” बतलाया गया है। जो चरित्र (व्रत ग्रहण) एवं तप (देहादि आसक्ति का त्याग) रूप है। जैन दर्शन में इन सब गुणों को आत्म धर्म माना है। अतः त्याग हमारा सहज धर्म हो जाना चाहिए। प्रति समय हम त्याग की ओर अग्रसर होते रहें, यही प्रत्येक मानव को परम धर्म है। मनुष्य जन्मतः शरीर के सिवाय कुछ लाया न था। पीछे से अनेक वस्तुओं पर अपना पूरा-ममत्व आरोपित किया उसी से बन्धन बढ़ते गये जो त्याज्य, हैं।

त्याग के महत्व को जान लेने के बाद, वह किसका व कैसे किया जाय, यह प्रश्न रह जाता है। अतः संक्षेप में उसका भी यहाँ विचार कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है।

हमारे प्राचीन महर्षियों ने हमारे दुःख के मूल कारणों पर गम्भीरता से विचार किया और वे इसी नतीजे पर पहुँचे कि बाहरी वस्तुओं को हमने सुख का साधन माना है वास्तव में वही हमारी सबसे बड़ी भूल है। सुख का स्रोत भीतर है, बाहर नहीं। अतः बाह्य पदार्थों पर सुख की कल्पना अज्ञानतावश हुई है। अनन्तकाल से हमने बाहरी साधनों को इकट्ठा किया व भोगों पर उससे तृप्ति नहीं मिली, शान्ति प्राप्त नहीं हुई। अतः वह रास्ता सही न था वह दीपक की भाँति अनुभव से स्पष्ट हो जाता है। जितने ही पाप, चाहें वे विचार कथन व वर्तन किसी भी प्रकार के हो, सारे भोग के कारण ही होते हैं।

हम हिंसा, मिथ्या भाषण, चोरी, अत्याचार करते हैं, सब भोग के लिए, ऐहिक स्वार्थ के लिए क्रोध, मान, माया, लोभ, कलह इत्यादि करते हैं इन सबके पीछे हमारी अहंकार शक्ति ही कार्य कर रही है। अतः त्याग योग्य इन दुर्गुणों व दुर्वासनाओं का हमें सहज पता चल जाता है। संक्षेप में हिंसा, असत्य, चोरी, आलस्य, वाचालता, कुसंस्कार व व्यसन, यश−कामना, अहंभाव, विषय, कषाय दुर्भावना आदि जिन-जिन भावों एवं कार्य को दुर्गुण व पाप माना जाता है, वे भी त्याग हैं और उनका त्याग ही धर्म हैं।

अन्तः निरीक्षण द्वारा हमें देखना है कि हमारा मन, वचन, काया की प्रवृत्ति में कहाँ-कहाँ क्या खराबी है? हममें कौन-कौन से बुरे विचार पैदा हुए? वचन का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ किया गया। शारीरिक क्रिया से हिंसादि कौन से असद् कार्य हो गये? सूक्ष्म प्रज्ञा से हमें अपने दुर्गुणों को व दोषों को खोलना है, और यथाशक्य उनके त्याग करने में जुट जाना है। बाधक कारणों का त्याग व साधक कारणों को ग्रहण करके जीवन का सदुपयोग कर लेना है। स्वार्थ को छोड़ परमार्थ व सेवा में लग जाना है।

अब त्याग कैसे करें, उसका भी मार्ग बतलाया जाता है। सबसे पहले हमें निरर्थक पाप प्रवृत्तियों से हटना है, फिर आवश्यकताओं को कम करते जाना है। क्रमशः बाह्य पदार्थों के त्याग के साथ साथ आन्तरिक दोषों पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। आसक्ति के बाद क्रमशः इच्छा व अहंभाव का त्याग कर देना है। इस प्रकार त्याग को बढ़ाते ही चले जाना है।

साधारण व्यक्तियों का कहना है कि त्याग बहुत कठिन व कष्टप्रद है। पर वास्तव में जिसने त्याग के आनन्द का अनुभव नहीं किया, वे ही ऐसा कहा करते हैं। अन्यथा त्याग तो शान्ति, सुख व आनन्द का ही मार्ग है। जितनी बाह्य उपाधि बढ़ती है, आकुलता बढ़ती जाती है, अतः हम भारी बनते जाते हैं। जितना त्याग बढ़ता है, बोझ कम हो जाने से हलकेपन का व शान्ति का अनुभव होता है। इसीलिए चक्रवर्ती से भी मुनि एवं योगी को अधिक सुखी बताया गया है।

बाह्य दृष्टि से देखते हैं तो भी त्यागी के चरणों में भोगी झुकते हैं। भोगी त्यागी की महानता व अपनी दीनता का अनुभव करते हैं। त्यागी निस्पृह होते हैं, उन्हें भोगी से कुछ लेना नहीं होता। अतः स्वरूप में मस्त रहते हैं। जिन्होंने त्याग का वास्तविक अनुभव किया है उनके सामने भोग के साधन अनायास उपस्थित होते रहते हैं, पर उनकी ओर उनकी रुचि ही नहीं होती। त्याग हमें कठिन लगता है क्योंकि अनादिकाल के भोग के संस्कार हमें चक्कर में डाले हुए हैं।

कष्ट तो भोगों में भी अनेक उठाने पड़ते हैं, पर उनकी ओर हम दुर्लभ कर लेते हैं। सच्चे त्यागी को तो बाह्य कष्ट में आनन्द का ही अनुभव होता है, क्योंकि वे उसे कष्ट रूप अनुभव नहीं करते। मानसिक दुर्वासनाओं पर वे विजय प्राप्त कर लेते हैं। देह से भिन्न आत्मा के शुद्धावस्था की प्रतीति हो जाय तब कष्ट प्रतीत ही नहीं। कष्ट तो शारीरिक होते हैं, आत्मा को इससे अलग मानने पर त्यागी को दुःख कैसा? संक्षेप में पर भाव का त्याग कर स्व-स्वरूप में स्थित हो जाना ही मानव जीवन का पूर्ण साफल्य है।

हम अपने जीवन में त्याग को समुचित स्थान देकर बढ़ते चले जाना है, आखिर बाह्य वस्तुओं को त्याग करके जाना ही होगा पर बिना इच्छा के जबरन त्याग करना पड़ा उसमें कष्ट ही होगा। स्वयं इच्छापूर्वक जागृत विवेक से त्याग करेंगे तो शक्ति प्राप्त होगी। भोग में रहते हुए भी हमारा लक्ष्य त्याग की ओर होनी चाहिए। वर्णाश्रम धर्म में गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थ में स्वार्थ का त्याग होता है सेवामय जीवन की साधना होती है और अन्त में संन्यास आश्रम में पूर्णतः त्याग को स्थान दिया गया है। अतः आसक्ति रहित सेवा करना एवं त्यागमय जीवन का आदर्श कभी नहीं भूलना चाहिए। शान्ति का एकमात्र उपाय-विवेक पूर्वक त्याग ही है।


अपनी आन्तरिक दशा सुधारिए।

(ले॰ पं॰ चुन्नीलाल शर्मा ओकास, जबलपुर)

प्रत्येक मनुष्य के जीवन की घटनाएँ उसके आन्तरिक विचारों का ही परिणाम हुआ करती हैं। परिस्थितियाँ व घटनाएँ जो भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के समक्ष समस्या बन कर उपस्थित होती हैं वे सब मुझे आन्तरिक विचारों गुणों और शक्तियों द्वारा खिंच कर ही उसके सामने साकार रूप में आ खड़ी होती हैं। मनुष्य के विचारों में बड़ी विलक्षण आकर्षण शक्ति है। मनुष्य इस शक्ति को पहचानने में भूल रहा है तथा उसी के परिणाम स्वरूप उसे अनेकों घटनाओं तथा भीषण परिस्थितियों का दास बनना पड़ रहा है। मनुष्य के जीवन को बिगाड़ने और बनाने में इन घटनाओं और परिस्थितियों का बड़ा महत्व रहता है। घटनाओं का कारण बहुधा आँतरिक विचारों पर ही निर्भर रहता है। कहा भी है-”जैसे आप हैं वैसा ही आपका संसार है”।

जैसे आप हैं ठीक वैसा ही आपका संसार बन जाता है। विश्व की प्रत्येक वस्तु का समावेश आपके आँतरिक अनुभव में हो जाया करता है आपके विचारों वासनाओं एवं अभिलाषाओं द्वारा आपकी सुन्दर सृष्टि निर्मित होती है। अपने विचारों द्वारा आप अपने जीवन-जगत् और विश्व को बनाते अथवा बिगाड़ते हैं। क्योंकि यदि आप सोचें कि परिस्थितियाँ आपको बनाती है तो यह उचित न होगा। क्योंकि अगर परिस्थितियों में सुख-दुःख पहुँचाने की शक्ति होती तो वे (परिस्थितियाँ) सब मनुष्यों को एक ही प्रकार सुखी एवं दुखी बना सकतीं। परन्तु एक ही दशा का भिन्न-भिन्न मनुष्यों पर अच्छा अथवा बुरा प्रमाणित होना यह सिद्ध करता है कि भलाई-बुराई करने की, सुख-दुःख पहुँचाने की, शक्ति उस घटनाचक्र में नहीं है बल्कि उस व्यक्ति के मस्तिष्क में है जिसे उसका सामना करना है। इसलिए ठीक समझ लीजिए कि जैसे आपके विचार हैं वैसा ही आपका संसार भी होगा।

इन विचारों के अनुसार आपका अड़ोस-पड़ोस तथा जीवन जगत तथा जिस वातावरण में आप रहेंगे वहाँ आप के विचारों का प्रभाव बिना पड़े न रह सकेगा। जो कुछ भी आप हैं वह सब आपके आँतरिक विचारों का ही फल है। यह न भूलें कि “आप डूबे तो जग डूबा”।

जैसे हम हैं वैसा ही हमारा संसार होगा। यदि हम सुखी हैं तो हमारा सारा संसार सुखी है और यदि हम दुखी हैं तो हमें सारा संसार (चाहे वह कितना ही सुखमय क्यों न हो) दुखमय प्रतीत होता है। यह सब हमारी मनोदशा पर ही अवलम्बित रहता है। यदि हम दुःख में भी सुख अनुभव करने लगें तथा सोचने लगें कि यह सब हमें केवल अपने जीवनस्तर की सीढ़ियों पर चढ़ने के हेतु परीक्षार्थ ही मिला करता है, तो हमें दुःख की छाया भी नहीं छू सकती। जब हम इस प्रकार अनुभव करने लगेंगे तो वास्तव में हम दुःख को सुख में बदल सकेंगे और अध्यात्म तत्व की ओर अग्रसर होकर दूसरों के दुःख को भी सुखों में बदल सकेंगे-

ऐसा करने के लिए हमें त्याग व तपस्या की आवश्यकता पड़ती है जिसकी प्रतिक्रिया हमारी आत्मा पर होती है। यदि हमारी आत्मा इन सबको सहन कर लेती है तो वास्तव में हम में एक आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है जिसका निर्माण हम अपने विचारों द्वारा ही करते हैं। आज हम चाहे जिस परिस्थिति में भी क्यों न हों, अपने दृष्टिकोण को बदल देना चाहिए अपने विचारों को सदा, प्रसन्नता, आशा, शान्ति, शक्ति और प्रयत्न की ओर दौड़ाना चाहिए। जिस समय आप ऐसा करने लगेंगे तो देखेंगे कि आपका जीवन सहसा प्रसन्नता, शान्ति, शक्ति आदि गुणों से विभूषित होता हुआ नजर आवेगा।

यदि आज भी आप बुरी परिस्थितियों तथा वातावरण में जकड़े हुए हैं तो निराश मत हूजिए, अपने भाग्य को मत कोसिए, इस परिस्थिति के लिए किसी दूसरे को दोषी मत ठहराइये, सिर्फ अपना दृष्टिकोण बदल दीजिये। बुराई का कारण तो आप में ही विद्यमान है उसे समझकर अपने आपको खुशी-खुशी घटनास्थल पर घटना को सामने आने दीजिये। यह घटना आपकी स्वतः की निर्मित की हुई है। उसे आप शीघ्र दूर कर सकते हैं। यदि आप अपना दृष्टिकोण बदल दें, सदा उत्तम विचारों में लीन रहें, अपनी आन्तरिक स्थिति को सुधारने का दृढ़ संकल्प करले तो बाह्य जीवन में भी वह दशा सफलतापूर्वक कर सकते हैं जिसके लिए आप चिन्तित रहते हैं।

यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्व स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्न देखना मात्र है। यदि हम वस्तुतः अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।

अन्तःकरण में उच्चविचारों का प्रवेश कराते रहिए तथा सदा सुखमय जीवन की आशा लेकर आगे बढ़िये, आप देखेंगे कि स्थिति में आशाजनक सुधार हो रहा है। जिन बुरी दशाओं के कारण जीवन भार स्वरूप बन रहा था वे घट रहीं हैं दयामय प्रभु ने मनुष्य की अनिष्टकारी दशाओं का सामना करने के लिये बड़ा भारी अस्त्र-मस्तिष्क दिया है उसका सच्चा उपयोग करना ही जीवन का ध्येय बनाइये। यदि आप दिन रात उसी चिन्ता में लगे रहते हैं तो कठिनाइयों का भार कदापि दूर नहीं कर सकते क्योंकि उस चिंता से अपनी मानसिक प्रवृत्ति बिगड़ती है और वे जंजीरें जिनसे आप जकड़े हुए हैं। सबल बनती जाती हैं। आप अब भी उसे बदल सकते हैं।

आप जीवन के प्रति अपनी धारणा बदल डालिए। विश्वास तथा ज्ञान में ही अपना जीवन भवन निर्माण कीजिए। यदि वर्तमान आपत्तिग्रस्त है तो उसका यह अर्थ नहीं है कि भविष्य भी अंधकारमय है। आपका भविष्य उज्ज्वल है विचारपूर्वक देखिए कि जो कुछ आपके पास है उसका सबसे अच्छा उपयोग कर रहे हैं, अथवा नहीं? क्योंकि यदि प्रस्तुत साधनों का दुरुपयोग करते हैं, तो चाहे वह कितनी ही तुच्छ और सारहीन क्यों न हो, आप उसके भी अधिकारी न रहेंगे-वह भी आपसे दूर भाग जावेंगे या छीन लिए जावेंगे।

यह सत्य है कि जब तक आप स्वतः अपनी दशा नहीं सुधारेंगे तब तक दुख, शोक तथा चिन्ताएँ पीछा नहीं छोड़ सकतीं और परिणाम स्वरूप आप सदा दुखी रह सकते हैं। इसलिए अपनी आन्तरिक दशा सुधारिये। आँतरिक जीवन के साथ साथ बाह्य जीवन में परिवर्तन होना निश्चित है। जिसकी मनोदशा उत्तम है वह स्वल्प साधने होने पर भी सदा सुखमय वातावरण में विचरण करेगा।


साधनामय जीवन

(श्री पं. द्वारका प्रसाद शर्मा, करेरा)

मनुष्य और पशु-पक्षी सभी जीवनयापन करते हैं। इच्छा और परिस्थिति से प्रेरित होकर विविध प्रकार के शुभ-अशुभ कर्म करते हैं और उनके भले बुरे परिणाम भोगते हैं। किसी प्रोत्साहन एवं आशा से एक काम करते हैं, उस काम में विघ्न, अड़चन, बाधा उत्पन्न होने या सफलता में देर होते देख कर उसे छोड़ देते हैं और फिर कोई और नया कार्य आरम्भ करते हैं।

इस प्रकार बीसियों कार्य आरम्भ किये जाते हैं और अधूरे छोड़ दिये जाते हैं। बीसियों कार्यक्रम बनाये और रद्द किये जाते हैं। अनेकों सिद्धाँत आदर्श एवं विचार आवेश और उत्साह पूर्वक ग्रहण किये जाते हैं और थोड़े ही समय में उनकी ओर अश्रद्धा एवं अशक्ति होने लगती है तो हाथ खींच लिया जाता है। इस प्रकार लोग अनेकों असफल योजनाओं को अधूरी पड़ी छोड़कर कूच कर देते हैं। उनका जीवन असफल ही रह जाता है।

निरुद्देश्य जीवन सदा असफल रहता है। जिस चिट्ठी पर कोई पता नहीं लिखा गया है वह कहाँ पहुँचेगी? अनेक डाक खानों की मुहर खाती हुई रद्दी के टोकरे में पड़कर नष्ट हो जायगी। जिस तीर को किसी लक्ष्य पर नहीं योंही शून्य आकाश में फेंका गया है वह कोई प्रयोजन ‘सिद्ध करना तो दूर’ स्वयं भी कहीं अज्ञात् प्रदेश में गिर कर नष्ट हो जायगा। जो मोटर निरुद्देश्य के सड़क पर दौड़ रही है वह अपनी शक्ति गँवाने के अतिरिक्त और क्या फल उत्पन्न करेगी?

आज अधिकाँश व्यक्ति निरुद्देश्य जीवन जीते हैं। खाना-पीना और मौज करना उनका कार्यक्रम होता है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन तो प्राणी की जन्मजात शारीरिक आवश्यकताएँ हैं, इनमें बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता एवं मनुष्यता का कोई लक्षण नहीं है। इन आवश्यकताओं को तो कीट पतंग भी पूरा कर लेते हैं। परमात्मा ने मानव प्राणी को सृष्टि का मुकुटमणि इसलिए बनाया है, उसे बुद्धितत्त्व इसलिए दिया है कि वह अपनी विशेषता प्रकट करे, विशेष कार्य सम्पादन करे।

मानव जीवन जैसे अलभ्य अवसर का कोई लक्ष्य होना चाहिए। इसे किसी ऐसी सफलता के लिए उत्सर्ग किया जाना चाहिए जिसका महत्व जीवन जैसे अमूल्य पदार्थ की तुलना में कम न हों। इसलिए हमारा प्रथम कर्तव्य यह है कि निरुद्देश्य दिन पूरे न करते रह कर जीवन का कोई निश्चित लक्ष्य निर्धारित करें। और जो लक्ष्य निर्धारित हो जाय उसे पूरा करने के लिए दृढ़ता एवं तत्परतापूर्वक जुट जावें। निश्चित लक्ष्य की ओर दृढ़तापूर्वक जो प्रवृत्ति होती है, उसे ही ‘साधना’ कहते हैं।

साधारणतया लोग छोटी-छोटी कामनाएँ करते हैं। उनकी इच्छा, अभिलाषा और महत्वाकाँक्षा छोटे दर्जे की, इन्द्रिय सुख या धन वैभव के संकुचित क्षेत्र की होती है। मकान बनाना, मोटर खरीदना, अमुक परीक्षा पास करना आदि कामनाएँ जीवन लक्ष्य नहीं कही जा सकती क्योंकि वे जब पूरी हो जाती हैं तो फिर नयी योजना बनानी पड़ती है। मकान खरीदना लक्ष्य है तो जब मकान खरीद लिया जायगा तब या तो निष्क्रिय बैठना पड़ेगा या कोई दूसरा लक्ष्य चुनना पड़ेगा। ऐसे छोटे छोटे आयोजन लक्ष्य नहीं होते, लक्ष्य वही है जिसके लिए कम से कम वर्तमान जीवन लगाना तो आवश्यक ही हो।

ऋषियों ने तीन लक्ष्यों को वेधन करना, तीन शत्रुओं से संग्राम करना जीवन का आदर्श बताया है। (1) अज्ञान, (2) अशक्ति और (3) अभाव, यह तीन ही कारण ऐसे हैं जो नाना प्रकार के दुखों को उत्पन्न करते हैं। इन असुरों से लड़ते रहना ही जीवन का लक्ष्य है। गीता में भगवान ने जिस धर्म युद्ध के लिये प्रेरणा दी है, जिस युद्ध को निरन्तर जारी रखने का आदेश दिया है वह इन तीन असुरों के विरुद्ध ही है।

द्विजों के तीन वर्ण, इन तीन दुरितों से लड़ने के उद्देश्य से ही बने हैं। जो अज्ञान के विरुद्ध संग्राम करके ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं वे ब्राह्मण हैं। जो अशक्ति, अरक्षा, अनीति को परास्त करके बल, निर्भयता, सुरक्षा और नीति की स्थापना करते है वे क्षत्रिय हैं और जिनका कार्यक्रम जनता के अभावों को दूर करके उसे आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराना है वे वैश्य हैं। जीवन के इन तीन लक्ष्यों में से अपनी रुचि, शक्ति, इच्छा और योग्यतानुसार, जिसको चुना वे उसी वर्ण के बने। जिनमें लक्ष्य स्थिर करने में उदासीनता है जिनका कार्यक्रम स्वार्थपूर्ण, संकुचित एवं व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से है वे शूद्र कहलाये।

‘शूद्र’ शब्द तिरष्कृत इसलिए है कि मानव जीवन के महान लक्ष्यों के प्रति, महान उद्देश्यों के प्रति उनकी श्रद्धा नहीं है। आज व्यापक रूप से शूद्रता फैली हुई है। जीवन लक्ष्य की ओर किसी का ध्यान नहीं है। भौतिक कामनाओं से प्रेरित होकर नित नये कार्यक्रम बनाते बिगाड़ते रहते हैं अनेकों प्रकार की इच्छाएँ, अभिलाषाएँ, कामनायें मन में आती रहती हैं परन्तु प्राप्त करने योग्य दृढ़ता एवं मनोबल न होने से वे अधूरे पड़े रहते हैं। भोगवादी स्वार्थपरायण मनुष्यों में भी ऐसे व्यक्ति थोड़े से ही होंगे जो कामनाएँ तृप्त होने का सुख प्राप्त कर सके हों।

किसी कार्य को पूरा करने के लिए उस दशा में अविचल श्रद्धा अटूट साहस और दृढ़ प्रयत्न की आवश्यकता होती है। संसार में जिन लोगों ने कोई कहने लायक काम किये हैं, महापुरुष कहलाये हैं, आशाजनक सफलता पाई है उन्हें धैर्य, साहस, प्रयत्न की परीक्षा अग्नियों में होकर गुजरना पड़ा है, तब कहीं आशाजनक परिणाम निकला है। हथेली पर सरसों जमाने के लिए उतावली करने वाले, जरा-सी कठिनाई देखकर विचलित जो जाने वाले, थोड़े दिन उत्साह दिखाकर शिथिल हो जाने वाले लोग छोटे-छोटे कार्यों में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। सफलता की आवश्यक शर्त है-दृढ़ता, एकनिष्ठा, साधना।

जिनने इतिहास के पृष्ठों में आपका उज्ज्वल स्थान बनाया है उन्हें अपने कार्य के लिए ‘साधना’ करनी पड़ी है सब ओर से चित्त हटाकर लक्ष्य में तन्मय हो जाना, लक्ष्य का ही ध्यान रखना और अटूट धैर्य एवं दृढ़ता के साथ उसी कार्य में लगे रहना और कठिनाइयाँ आने पर भी चित्त में उदास न होना साधक का प्रधान चिन्ह है। साधना ही सफलता की जननी है। जो भी सफल हुआ है साधना द्वारा हुआ है।

जीवन को असफलता में नष्ट न करके यदि उसे सफल बनाना है तो उसका एकमात्र उपाय साधक बनना ही है। जीवन की साधना यही है कि अपने को तथा दूसरों को नाना प्रकार के दुख देने वाले जो तीन महाअसुर हैं, उन अज्ञान, अशक्ति और अभाव को दूर करने के लिए द्विजत्व का व्रत लें। द्विजत्व का तात्पर्य है-ज्ञान, बल और सम्पत्ति का अभिवर्धन। यह अपने लिए ही नहीं वरन् सभी के लिए बढ़ाने योग्य है। कोई व्यक्ति, राष्ट्र या समाज इन तीनों के द्वारा ही सुखी हो सकता है, जहाँ इन तीनों की जितनी मात्रा होगी वहाँ उसी अनुपात से कष्ट और दुख कम उपस्थित रहेंगे।

जीवन अस्त-व्यस्त जीने के लिए, तुच्छ और क्षुद्र कार्यों में व्यतीत करने के लिए नहीं है। यह महान सम्पदा उन्हीं महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खर्च की जानी चाहिए जो व्यापक रूप से सुख शान्ति की वर्षा करने वाले हैं। हमारा लक्ष्य द्विजत्व की प्राप्ति, एवं कर्त्तव्य धर्म की पूर्ति होना चाहिए। यह कार्य छिछोरापन, उथलेपन तथा संकीर्ण दृष्टिकोण रख कर नहीं हो सकता, इसे पूरा करने के लिए साधनात्मक दृष्टि और कार्य पद्धति होनी चाहिए। हमारा जीवन साधनामय होना चाहिए क्योंकि मानव जन्म की सफलता, साधनात्मक गति विधि पर ही निर्भर है।

मातृ भावना का पुण्य विकास।

(श्री सरयू शरण जी गुप्त, नवाबगंज)

प्रत्येक व्यक्ति के मानस क्षेत्र में सभी प्रकार के सद्गुण एवं दुर्गुण, सदाचार एवं कुविचार, अव्यक्त बीज रूप से विद्यमान रहते हैं। वातावरण, परिस्थिति एवं संगति रूप से यह गुण एवं विचार घटते बढ़ते रहते हैं। अच्छे वातावरण में सद्चारों एवं सद्गुणों का विकास होता है और कुसंग एवं बुरी परिस्थितियों में रहने से कुविचार तथा दुर्गुण बढ़ जाते हैं।

संगति का काफी प्रभाव पड़ता है। जैसे लोगों के बीच मनुष्य का रहना होता है वह उसी ढाँचे में ढलने लगता है, साथियों के गुण दोषों की छाप अपने ऊपर सहज ही पड़ती रहती है परन्तु सबसे अधिक प्रभाव मानसिक संगति का पड़ता है। मन में जैसी स्थापना होती है उसका प्रभाव संगति से भी अनेक गुना अधिक पड़ता है।

कोई व्यक्ति विद्वानों के साथ रहे पर उसके मन में वेश्याओं की छवि भाव भंगी, कुचेष्टाएँ नाचती रहें, और विकार पूर्ण अंगों तथा चेष्टाओं का चिंतन करता रहे तो निश्चय ही विद्वानों की संगति का उतना प्रभाव न होगा जितना उन मानसिक काम विकारों का होगा। मन में जो भाव दृश्य, एवं आदर्श हर घड़ी भरे रहते हैं, जिधर आन्तरिक इच्छा अभिलाषा और अभिरुचि झुकी रहती है, उधर ही मस्तिष्क की समस्त शक्तियाँ झुक जाती हैं फलस्वरूप उसका जीवन तेजी से उसी रास्ते पर चलने लगता है। मानसिक चिन्तन के आधार पर मनुष्य के गुण, धर्म, स्वभाव बनते हैं, तद्नुसार वह अपने अनुकूल वातावरण में पहुँच जाता है, वैसी ही परिस्थितियाँ उसके सामने आ खड़ी होती हैं। जो प्रभाव बाह्य संगति से बहुत समय में पड़ता है वह मानसिक संगति से स्वल्प काल में ही परिस्थिति होने लगता है।

मनोविकारों में ‘काम विकार’ को बहुत बुरा बताया है। धर्म शास्त्रों ने पण्डित के तीन लक्षण बताये हैं उनमें सबसे पहला लक्षण ‘मातृवत्परदारेषु’ दूसरा ‘परद्रव्येषु लोष्टवत’ और तीसरा ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ है। मनुष्य की यह सर्वश्रेष्ठ तीन महानताएँ हैं। (1) नारी जाति के प्रति मातृ भावना, (2) पराये पैसे को ठीकरी समझना, (3) अपने समान सबको समझना। इन तीनों में सबसे प्रथम, सबसे महत्वपूर्ण-सबसे आवश्यक “मातृ भावना” को माना गया है। जिसके मन में नारी जाति के प्रति पवित्र भावनाएँ हैं, जो स्त्रियों के प्रति माता, बहिन और बेटी की दृष्टि रखता है वस्तुतः वही पंडित, धार्मिक या सच्चे अर्थों में मनुष्य कहा जाता है।

आज शुद्ध दृष्टि का बड़ा अभाव है। देखा गया है कि बाहर से नैतिकता पर जोर देने वाले, धार्मिक बनने वाले व्यक्ति भी कामुकता के कुविचारों से ग्रस्त रहते हैं और वयस्क नारियों के प्रति उनकी दृष्टि दूषित एवं भावना कुत्सित बनी रहती हैं। शारीरिक व्यभिचार के अवसर भले ही उनको न मिलें, पर मनोभावों को तो वे बहुधा पतित बनाये रहते हैं। यह मनसा पाप निरन्तर उनके ऊपर चढ़ता रहता है और अकारण पाप की गठरी भारी होती रहती है। भावना दूषित रहने से बाह्य जीवन में भी वैसी कुचेष्टाएं उनसे अनेक बार बन पड़ती हैं।

मनुष्यता के, पाण्डित्य के, सर्वश्रेष्ठ और सर्व प्रथम लक्षण ‘मातृ भावना’ का विकास करना, प्रत्येक आत्मकल्याण के इच्छुक मनुष्य के लिए आवश्यक है। क्योंकि इस पहली कक्षा को पास किये बिना, ‘पर द्रव्येषु लोष्टवत’ और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती। जिसने मातृ दृष्टि प्राप्त कर ली है वही अन्य आध्यात्मिक पवित्रताओं का अधिकारी भी बन सकता है।

वर्तमान काल के दूषित वातावरण में, जबकि चारों और वासना, विलासिता, भोगवाद का आतंक फैला हुआ है, संयम, सदाचार और पवित्र दृष्टि रखने की बात कठिन मालूम होती है। कभी व्यक्ति इस ओर थोड़ा प्रयत्न करते भी हैं तो चारों ओर फैले हुए विकार उन्हें असफल कर देते हैं, ऐसी दशा में वे निराश होकर प्रयत्न छोड़ बैठते हैं और ऐसा सोचते हैं कि हमारा मन बड़ा निर्बल है, उसे फिसलने से रोकना बहुत कठिन है, यह सब हमसे न हो सकेगा।

ऐसे लोगों को अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मेरी सलाह है कि ये ‘गायत्री उपासना’ ग्रहण करें। माता की सुन्दर छवि का परम पवित्र मातृ भावना के साथ ध्यान किया करें। धीरे-धीरे उनकी भावना समस्त नारी जाति में श्रद्धामयी एवं परम पवित्र रहने लगेगी। माता का ध्यान बहुत देर तक मन में करने से नारी रूप में भगवान की झाँकी होती है। भगवान के प्रति ईश्वरीय शक्ति के प्रति, स्वभावतः मातृ भावना होती है। यह मातृ भावना जब देर तक मन में ठहरती है तो चित्त का उसी का अभ्यास पड़ जाता है। जैसे विचार देर तक मन में रहते हैं वह आन्तरिक सत्संग के रूप में हमारे अन्तःकरण पर गहरा प्रभाव डालते हैं। बाह्य सत्संगों की अपेक्षा माता के सान्निध्य का यह आन्तरिक सत्संग अनेक गुना महत्वपूर्ण एवं आशु फल दायक होता है।

यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। कुदृष्टि की दूषित भावना से छुटकारा पाने के लिये मैं व्याकुल था। श्री आचार्य जी से मैंने इसका उपाय पूछा उनने बताया कि “गायत्री उपासना द्वारा निश्चित रूप से मातृ भावना का विकास होता है और इस मार्ग का अवलम्बन करके कोई भी व्यक्ति अपने दृष्टिकोण को पवित्र कर सकता है।” मैंने वैसे ही किया अब मैं देखता हूँ कि माता की कृपा से कुदृष्टि का संतोषजनक शमन हो गया है और नारी मात्र को देखते ही माता, बहिन तथा बेटी के भाव उत्पन्न होते हैं। मातृ भावना को वृद्धि के साथ-साथ जिस आत्मिक विकास का प्रारम्भ हुआ है उसकी चर्चा करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

योगी अरविन्द, रामकृष्ण परमहंस, आदि सिद्ध पुरुषों ने माता की उपासना से सिद्धि पाई थी। अर्जुन का उर्वशी को माता कहना, छत्रपति शिवाजी का पवन राज कन्या को पुत्री मान कर उसके पास पहुँचा देना, लक्ष्मण को शूर्पणखा को तिरष्कृत करना आदि भारतीय इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनमें मातृ भावना की दृढ़ता को प्रतिष्ठित किया गया है। यह भावना गायत्री की उपासना द्वारा आसानी से प्राप्त हो सकती है। मेरी दृष्टि में इस महान आत्मिक सफलता का इससे सरल उपाय और दूसरा नहीं हो सकता।


उपवास कब और कैसे?

(डा॰ लक्ष्मी नारायण टण्डन ‘प्रेमी’ एम॰ ए॰)

साधारणतया उपवास सभी कर सकते हैं और सबको ही उपवास लाभप्रद हो सकता है किन्तु कुछ रोगों में तो उपवास ही राम-बाण है।

यदि किसी अंग-विशेष से हम बहुत दिनों तक काम न लें तो वह निर्बल या बेकाम हो जाता है। बहुत से साधु जो सदा अपना हाथ उठाते रहते हैं बहुत दिनों के बाद उनका वह हाथ बेकाम हो जाता है। वैसे ही जब कोई अंग ठीक-ठीक काम नहीं करता तो स्वयं उस अंग में कोई दोष न होते हुए भी वह रोगाक्रांत हो जाता है। ऐसे रोग प्रतिक्रियात्मक कहलाते हैं। वे निश्चय रूप से उपवास से ठीक हो जाते हैं।

अर्वुद (केन्सर) में उपवास राम-बाण है। रोग की आरंभ अवस्था में तो कैंसर बिल्कुल ही ठीक हो सकता है। किन्तु बढ़ी हुई अवस्था में भी उपवास के अतिरिक्त और किसी चीज से आरोग्य की आशा की ही नहीं जा सकती। ऐसी दशा में उपवास शीघ्रता से रोगी के कष्ट को रोकता और कम करता है और अपेक्षाकृत अधिक कष्ट रहित तथा लम्बा जीवन दे सकता है।

यदि चोट आ जाने के कारण मस्तिष्क में चोट आ गई हो तो उपवास से अवश्य लाभ होगा। जिस समय तक मस्तिष्क के गूदे में वह पड़ने के कारण उत्पन्न हुआ पागलपन होश-हवास का दुरुस्त न रहना तथा अन्य भयंकर लक्षण समाप्त न हो जाएं उपवास जारी रखना चाहिए। वैसे ही विषों के प्रभाव से जो एक नशा-सा रह कर मन की बीमारी हो जाती है उसमें भी उपवास लाभ प्रद है।

लाल बुखार साधारण ज्वर तथा सब प्रकार के ज्वरों में, गले की सूजन, कुकर खाँसी, जुकाम, सर्दी, खाँसी, जुकाम, सर्दी, खाँसी, पायेरिया, छोटी माता या खसरा, बच्चों के अर्धांग वात रोग की प्रारम्भिक दशा में हिस्टीरिया (अपतन्त्र वायु), मानसिक, वायु रोग, आधा-शीशी, सर-दर्द, दस्त, कै, जी मिचलाना आदि में भी उपवास तथा हल्के उपवास बहुत लाभ प्रद होते हैं।

गर्मी या उपदेश की प्रारंभिक अवस्था में उपवास विशेष लाभप्रद होता है।

महात्मा गाँधी ने भी लिखा है-”डॉक्टर मित्रों से माफी माँगते हुए किन्तु अपने सम्पूर्ण अनुभवों के और अपने जैसे दूसरों के अनुभवों के आधार पर मैं बिना किसी हिचकिचाहट के यह कहूँगा कि यदि निम्नलिखित शिकायत हो तो अवश्य ही उपवास किया जाय-

1-कब्ज में 2- रक्त की कमी में 3-बुखार आने पर 4-बदहजमी में 5-सिर दर्द में 6-वायु के दर्द में 7-जोड़ों के दर्द में 8-भारीपन मालूम होने पर 9-उदासी और चिन्ता में 10-बेहद खुशी में। यदि इन अवसरों पर उपवास किया जाय तो डा. के नुस्खों और पेटेन्ट दवाओं से बचत हो जायगी।”

बादी, मोटापा कम करने की इच्छा वालों के लिए उपवासों से बढ़ कर कोई सरल और उत्तम उपाय है ही नहीं। बादी को दूर करने में भी उपवास रामबाण है।

लकुवा, कण्ठ माली, ताप तिल्ली, बवासीर आदि में भी उपवास बहुत लाभ करता है। मन्दाग्नि, पेट के दर्द, अतिसार, पेचिश, आँतों, पेट तथा प्रदर के अन्य सभी रोगों में उपवास करना चाहिये। जीर्ण रोगों में भी उपवास लाभप्रद है। आँव-अन्तर प्रदाह, भीतरी सूजन, पित्त सम्बन्धी रोगों में, दमा, गठिया, मधुमेह, जिगर के रोग, जुकाम, गले में खराश, खाँसी, चिड़चिड़ापन क्रोध तथा मानसिक विकारों को दूर करने के लिये बाई, वायुगोला, शूल-दर्द आदि में उपवास करें।

आत्मिक शान्ति तथा मानसिक आवेगों को दबाने में भी उपवास बड़ा सहायक सिद्ध होता है। क्रोध, शोक, घृणा आदि भी उपवास द्वारा दबाये जा सकते हैं। इससे कुत्सित विचार तथा बुरी भावनाओं आदि का शमन हो जाता है।

गठिया बाई, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों (जैसे गर्मी, सुजाक, सूजन, मधुमेह) दमा, लकुवा, यकृत में रक्त का जमा होना, बादी, मोटापा, मस्तिष्क में खून का जमा होना, पेट तथा सीने की जलन, नसों के कड़े होने या अन्य विकारों में, कैन्सर, मोतीझरा, अपेंडी साइरिस आदि में लम्बे उपवास करने चाहिये।

कब्ज, पेचिश, मन्दाग्नि, अतिसार, शूल-दर्द, खाँसी, जुकाम-सर्दी, फोड़े-फुँसी, खुजली तथा अन्य चर्म रोगों में, दाँत, आँख, नाक, आदि में दर्द, छूत के रोगों जैसे शीतला, खसरा आदि में पेट में कृमि पड़ जाने या चुनने होने पर, सर-दर्द, पेट-दर्द, साधारण बुखार, डिफथीरिया आँतों या पेट के अन्य यन्त्रों के स्थानापन्न होने आदि रोगों में छोटे उपवास करना चाहिये।

लम्बे उपवासों की पहले से कोई निश्चित दिनों की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। यह तो मनुष्य की शारीरिक दशा स्थिति आदि के ऊपर निर्भर है। साधारणतया जब तक स्वाभाविक भूख न लगे तब तक उपवास जारी रखना चाहिए। साधारण रोगों में भी जब तक रोग की तीव्रता न समाप्त हो जाय तब तक उपवास करें। छोटे-छोटे उपवास करके अच्छा होने में समय अधिक लगता है और लम्बे उपवास में रोग से मुक्ति शीघ्र ही होती है। अप्टन सिंक्लेयर का मत है-’मेरी समझ में पाचन शक्ति के मन्द पड़ने, आँतों में मल जमा होने, सिर में दर्द रहने, कब्जियत होने अथवा इसी प्रकार की और दूसरी साधारण छोटी-मोटी शिकायतों के लिए दस-बारह दिनों का उपवास बहुत ठीक होता है। पर जिन लोगों को नासूर, गर्मी, बवासीर, गठिया आदि भारी और भयंकर रोग हैं, उन्हें अधिक दिनों तक उपवास करना चाहिये।” दुबले पतले आदमियों को लम्बे उपवास नहीं करना चाहिए पर मोटे आदमी लम्बा उपवास कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर में फालतू द्रव्य बहुत होता है।

छोटे बच्चों को लम्बे उपवास न कराइए। पाँच छः दिन से अधिक लम्बे उपवास उन्हें बिना किसी विशेषज्ञ की देख रेख और सलाह से कभी न करावे। 14 वर्ष तक के बच्चों को छोटे उपवासों से जितना लाभ होता है उतना बड़ों को कभी नहीं होता। जुकाम, खाँसी, हर प्रकार के ज्वर उपवास करते ही भाग जायेंगे। बच्चों के शरीर का संगठन ही प्रकृति की ओर से ऐसा होता है कि वे शीघ्र ही उपवास द्वारा आरोग्य हो जाते हैं।

एक सप्ताह से अधिक दिनों तक का महीना-दो या तीन महीने का उपवास लम्बा और एक सप्ताह तक का छोटा उपवास कहलाता है। 10 दिन के उपवास से पूरा विष शरीर से बाहर नहीं निकल सकता। जीभ पर पड़ी हुई पपड़ी और मैल, दुर्गन्धितवास, वेजयिका जीभ तथा खुलकर स्वाभाविक भूख लगना आदि लक्षण जब तक फिर प्रकट न हो जायं तब तक अपूर्ण तथा अधूरा रहता है। 8-10 दिन के उपवास अधूरे ही होते हैं। ऐसा उपवास तो प्रत्येक दशा और प्रत्येक अवसर पर बिना किसी हानि अथवा कष्ट के कोई मनुष्य कर सकता है। लम्बे उपवासों में भी जब भूख लौट आवे तभी उपवास तोड़ा जाय यह आवश्यक नहीं है। कई ऐसी दुर्घटनाएँ हुई हैं कि भूख नहीं लौटी पर अन्य चिन्ह उपवास तोड़ने लायक प्रकट हो गए, पर उपवास कर्त्ता जिद पकड़े रहा और अन्त में उसने भारी हानि उठाई।


सात्विक भोजन का सूक्ष्म प्रभाव।

(श्री पं॰ शिवकुमार जी शर्मा, मौरा)

शास्त्र कहते हैं-”मानएव मनुष्याणाँ कारणाँ मोक्ष बन्धयोः। बन्धाय विषयासक्त’ मुक्तौ निर्विषयं मनः॥” अर्थात्-’मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है, क्योंकि विषयों में फँसा हुआ मन बन्धन में है और विषयों से छूटा हुआ मुक्त है।’ जब बन्धन और मोक्ष कारण मन ही है, तो मन पर ही क्यों न नियन्त्रण किया जाय? मन को नियन्त्रण करने की एक अमोध औषधि है, जिसकी महिमा का वर्णन, शास्त्रों में विशद रूप से किया गया है, वह है ‘सात्विक भोजन’।

भोजन तीन प्रकार के हैं-सात्विक, राजस तथा तामस। सात्विक भोजन सबसे उत्कृष्ट माना गया है, क्योंकि इससे मन पवित्र होता है, तथा आत्मिक शक्ति बढ़ती है। आत्मिक बल ही मनुष्य का सच्चा बल है। श्रुति कहती है- “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य” अर्थात्-’इस आत्मा को बलहीन पुरुष प्राप्त नहीं कर सकता।’

सात्विक भोजन से निकृष्ट वृत्तियाँ तत्काल दब जाती है, विलासप्रियता का विनाश हो जाता है, सद्भाव जागृत होकर शान्ति का प्रादुर्भाव होता है, पापी से धर्मात्मा तथा व्यभिचारी से ब्रह्मचारी बन जाता है, आध्यात्मिक तथा नैतिक शक्तियों का विकास होता है। सात्विक भोजन रसायन है, सम्पूर्ण व्याधियों को नष्ट कर बुढ़ापा रोकने की शक्ति प्रदान करता है, असमय में बालों को पकने नहीं देता तथा वीर्य को उर्द्धगामी बनाता है, साँसारिक प्रपंच से उद्धार पाने की उत्कण्ठा जागृत होता है, विवेक और वैराग्य होता है। अतएव मनुष्य को ऐसा भोजन करना चाहिए जिससे मन प्रसन्न रहे, ब्रह्मचर्य की रक्षा हो, धार्मिक विचार तथा तीव्र बुद्धि हो, एवं अपनी पुरानी बुरी आदतों, कुविचारों, कुसंस्कारों तथा कुवासनाओं का उन्मूलन हो जाय।

जिन वस्तुओं में सरसता, सुवास, पुष्टि तथा तुष्टि होती है, जो पचने में तो हलकी और शक्ति देने में भारी होती हैं, उन्हीं को सात्विक आहार में ग्रहण करना चाहिए।

मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों पर भोजन का बड़ा प्रभाव पड़ता है। अप्राकृतिक भोजन करने वाले राष्ट्र के लिए घातक हैं, क्योंकि उनकी तमोगुणी वृत्तियाँ समाज तथा देश में अशान्ति फैलाती रहती हैं। आज का मानव-जगत् इसी आसुरी-भाव को प्राप्त है।

“देहो देवालयः प्रोक्तः” अर्थात्-देह को परमात्मा का मन्दिर कहा गया है। यह तो परम पवित्र स्थान है, इसमें किसी अपवित्र वस्तु को स्थान देना ठीक नहीं, इसे सर्वदा शुद्ध, पवित्र और शुचि रखना चाहिए। किसी बुरे विचार या किसी बुरी वासना को रखना ठीक नहीं। अशुद्ध भोजन से देह को किसी कुकर्म में प्रवृत्त कराना अनुचित है, क्योंकि यह शिवालय है। पवित्र भोजन से इस देवालय को शुद्ध रखना चाहिये, जिससे देहस्थ भगवान प्रसन्न होकर हमारी आर्तनाद भरी प्रार्थनायें सुन सकें।

हम जो कुछ भी भोजन करते हैं, वह तीन हिस्से में बँट जाता है, उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग है, वह मल हो जाता है, जो मध्य भाग है, वह माँस हो जाता है और उससे भी जो अत्यन्त सूक्ष्म भाग है, वह मन हो जाता है। इसलिए मन को पवित्र तथा पारदर्शी बनाने के लिए नैसर्गिक भोजन पर ही बसर करना चाहिए। नैसर्गिक भोजन ऋषियों का भोजन है, हमारे मन को निर्मल धारा में बहा कर मोक्ष या स्वर्ग के दिव्य-द्वार पर पहुँचा सकता है। इसके द्वारा हम भारत को फिर से ऋषि भूमि बनाकर सत्य युग की रचना कर सकते हैं। दाम्पत्य जीवन व्यतीत करने वाले यदि सात्विक भोजन करते हुए गर्भाधान करें तो उनकी सन्तान मेधावी, धर्मात्मा तथा दीर्घायु हो सकती है।

प्राचीन तथा अर्वाचीन काल में जितने महापुरुष हुए हैं, सभों ने भोजन के शुभाशुभ तत्व को अनुभव करके विश्व को प्राकृतिक भोजन करने की शिक्षा दी है। कहा भी है-”याद्दशी भक्षयेच्चान्न’ बुद्धिर्भवति ताद्दशी। दीपास्तिमिर भक्षयतिकज्जलं च प्रसूयते॥” अर्थात्-मनुष्य जैसा अन्न भक्षण करता है, वैसी ही उसकी बुद्धि हो जाती है, जैसे-दीप अन्धकार भक्षण कर कालिख उत्पन्न किया करता है इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है-”आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः सत्व शुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। स्मृति लब्धे सर्व ग्रन्थीना मोक्षः॥” अर्थात्-’आहार शुद्ध होने पर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होने पर बुद्धि निश्चयात्मक हो जाती है, निश्चयात्मक बुद्धि होने पर ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, ग्रंथियों का भेदन होने से अमरत्व की प्राप्ति होती है।’

यदि प्रत्येक भारतीय सात्विक भोजन पर निर्वाह करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ले तो विषमता की प्रज्वलिताग्नि से भारत फिर छुटकारा पाकर ऋषियों की भूमि बन जाय।


गायत्री शब्द का अर्थ

ऐतरेय ब्राह्मण में गायत्री शब्द का अर्थ करते हुए कहा गया है-

गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री।

अर्थात्-जो -’गय’ (प्राणों की) रक्षा करती है वह गायत्री है।

प्राण कहते हैं चैतन्यता एवं सजीवता को। हमारे भीतर जो गति, क्रिया, विचारशक्ति, विवेक एवं जीवन धारण करने वाला तत्व है प्राण कहलाता है। इस प्राण के कारण ही हम जीवित हैं, जब प्राण निकल गया तो जीवन का अन्त ही समझिए। प्राण होने के कारण ही जीव को प्राणी कहते है। बिना प्राण का पदार्थ तो जड़ होता है।

जब प्राण शक्ति निर्बल पड़ जाती है तो प्राण का बाहरी ढाँचा साधारण दिखाई पड़ते हुए भी वह भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है। साहस श्रमशक्ति, आशा, उत्साह, दृढ़ता, कष्ट, सहिष्णुता निर्भयता, तेजस्विता, यह सब प्राणशक्ति की परिपूर्णता के चिन्ह हैं। जिसमें यह शक्ति न्यून या निर्बल पड़ जाती है वह निराश, निस्तेज, भयभीत आलसी, थका हुआ सा, स्वार्थी, मन्द बुद्धि, एवं चिन्तित रहता है। ऐसे मन्द प्राण या न्यून प्राण व्यक्ति एक प्रकार से अर्ध मृतक होते हैं। उनका जीवन कीट पतंगों के जीवन से किसी प्रकार उत्तम नहीं कहा जा सकता।

जीवन का सार प्राण है। क्योंकि सभी प्रकार की शक्तियाँ प्राण तत्व की अनुगामिनी होती हैं, जो निष्प्राण है, न्यून प्राण है, उसका वैभव धन, विद्या, पद आदि उसे कुछ विशेष आनन्द नहीं दे सकता। जिसका प्राण जितना ही सबल है, अधिक है, सुरक्षित है वह उतना ही पुरुषार्थी एवं शक्तिशाली होगा और उद्योग से वह सब चीजें प्राप्त कर लेगा जिनके द्वारा आन्तरिक और बाह्य सुख शाँति को प्राप्त किया जा सकता है।

यह प्राण परमात्मा ने हमें प्रचुर मात्रा में दिया है। पर लोग उसे दुर्बुद्धि के कारण कुमार्ग में खर्च कर देते हैं और फिर छूँछ बन कर दीन-हीन की तरह से जीवन पर रोते गिड़गिड़ाते रहते हैं। जिसमें सद्बुद्धि है वह अपने प्राण की रक्षा कर लेता है, शक्तियों का संचय करता है और उन्हें सन्मार्ग में संयमपूर्वक व्यय करता है फलस्वरूप वह तेजस्वी, दीर्घजीवी, बलिष्ठ, सुसम्पन्न एवं प्रति भावना जीवन का अधिकारी बन जाती है। सद्बुद्धि से ही प्राण की रक्षा हो सकती है। इसलिए सद्बुद्धि, ऋतम्भरा प्रज्ञा, धी, सरस्वती आदि नामों से पुकारी जाने वाली गायत्री को प्राणरक्षक कहा गया है।

भारद्वाज ऋषि कहते हैं-

प्राण गया इतिप्रोक्ता स्रायते तानथापिवा।

अर्थात्-गय, प्राणों को कहते हैं। जो प्राणों की रक्षा करती है वह गायत्री है।

वृहदारायक 5।144 में लिखा है-

तद्या त्प्राणंत्रायते तस्माद गायत्री।

अर्थात्-जिससे प्राणी की रक्षा होती है वह गायत्री है।

शंकराचार्य ने गायत्री भाष्य में लिखा है-

“गयान् त्रायते-गायत्री” अर्थात्-गायत्री प्राणों की रक्षा करती है। उन्होंने यह भी लिखा है कि “गीयते तत्व मनया गायत्रीति” अर्थात-जिससे तत्व (ब्रह्म) को जाना जाय वह (सद्बुद्धि ही) गायत्री है।

वशिष्ठ जी ने गायत्री की स्तुति की है-

गायतस्त्रायते देवि, तद् गायत्रीति गद्यसे।

गयःप्राण इति प्रोक्ततस्य त्राणादपीति वा॥

अर्थात् हे देवि! तुम उपासक की रक्षा करती हो इसलिए तुम्हारा नाम गायत्री है। गय नाम प्राणों की रक्षा करने से आपका नाम गायत्री हुआ है।

अग्नि पुराण 216-1, 2 में लिखा है-

गयाच्छिष्यान यतस्रयेत्कायं प्राणास्त्थैवच।

ततः स्मृतेयं गायत्री सावित्रीयं ततो यतः॥

प्रकाशनात्या सवितुर्वाग् रुपत्वात्सरस्वती।

अर्थात्-शरीर और प्राणों की रक्षा करने के कारण गायत्री नाम हुआ और प्रकाश स्वरूप होने से सावित्री तथा वाणी रूप होने से सरस्वती कहलाई। (गायत्री को सावित्री तथा सरस्वती भी कहते हैं)।

याज्ञवल्क्य जी का कहना है-

गायत्री प्रोच्यते तस्याद गायन्ती त्रायते यतः

अर्थात्-उसे गायत्री इसलिए कहा जाता है कि वह प्राणों की रक्षा करती है।

गायत्री के शब्दों में छिपी हुई शिक्षाओं को हृदयंगम करने, उन पर चलने तथा वेदमाता की उपासना करने वाला प्रत्येक व्यक्ति निश्चित रूप से प्राणवान बनता है और संसार के सब सुख सौभाग्यों को प्राप्त करता है क्योंकि वे प्राण वालों के लिए ही बनाये गये हैं। प्राणशक्ति प्रेरणा स्फूर्ति, साहस, शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ की जननी है। जो गायत्री द्वारा अपनी प्राणशक्ति बढ़ाता है, अपने प्राण की रक्षा करता है, वह सफल एवं आनन्दमय जीवन का उपभोग करता है।


भूगर्भ दृष्टा योगी

आकाश और पृथ्वी के बीच में अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएँ हैं, जिनका मनुष्य को कुछ भी ज्ञान नहीं है। किन्तु कभी-कभी जब ऐसी घटनायें हो जाती हैं तो वैज्ञानिक इन घटनाओं का कारण जानने के लिए उतावले बन जाते हैं।

ऐसी ही एक आश्चर्यजनक घटना जो देखने में आई है वह पचास वर्षीय योगी श्री0 जीवराम व्यास के विषय में है। जोकि एक मील गहराई तक धरती के भीतर निहित वस्तुओं को देख लेते हैं। इन योगीराज को जनता ‘पानी वाला महाराज’ के नाम से पुकारते हैं। वैज्ञानिक अभी तक ‘ऐक्सरे’ को केवल कैमरा तथा माँस मज्जा इत्यादि तक की वस्तु समझते रहे हैं। किन्तु इन योगी महाराज की दिव्य दृष्टि (ऐक्सरे निगाह) ने वैज्ञानिकों को भी चमत्कृत कर दिया। इन योगी महाराज की इस दिव्य दृष्टि के कुछ चमत्कार नीचे दिये जाते हैं।

दिल्ली छावनी के निकट तिहाड़ नामक गाँव में पानी वाले महाराज ने एक स्थान बताया था, जहाँ अब एक बड़ा पम्प लगा हुआ है, जो सैकड़ों गैलन पीने का पानी देता है।

पानी वाले महाराज ने राजपुरा उन्नति बोर्ड को जो स्थान बताये थे, वहाँ अब दो नलदार कुँए बने हुये हैं।

प्रधान मन्त्री के कहने से फरीदाबाद उन्नति बोर्ड ने पानीवाले महाराज को ऐसे स्थान बताने के लिए बुलाया था, जहाँ नलदार कुँए बनाये जा सकें। विज्ञानवेत्ता यह कह चुके थे कि वहाँ पानी नहीं निकल सकता। परन्तु अब वहाँ आठ नलदार कुँए प्रति घण्टे लगभग 34000 गैलन पानी दे रहे हैं।

समुद्री से 18 मील की दूरी पर दुन्दारा नामक गाँव में भी एक नलदार कुँआ बराबर पानी दे रहा है। यह कुँआ अभी पानी वाले महाराज द्वारा बताये गये स्थान पर बनाया गया था।

जयपुर में नलदार कुँए बनवाने के लिए पानी वाले महाराज ने जितने स्थान बताये, उन सभी से पानी निकला।

हाल ही में उन्होंने बढ़बान के समीप एक शुष्क क्षेत्र में पानी का पता लगाया है, जहाँ पर एक बड़ा भारी कुँआ बनाया जा रहा है। सौराष्ट्र में झील के सूखे मैदान में भी उन्होंने पानी ढूंढ़ निकाला है। यहाँ भी शीघ्र एक कुँआ बनाया जायगा।

उनका पानी देखने का ढँग बड़ा विचित्र है। कभी तो वे किसी क्षेत्र विशेष के मानचित्र पर हाथ फेरते हैं और पिन छेद कर बता देते हैं कि इस स्थान पर पानी निकलेगा और कभी कमरे में बैठे हुए या मोटर कार में जाते हुए पृथ्वी के भीतर कुछ धुँधलापन देखकर, वे केवल पानी की मात्रा ही नहीं यह भी बता देते हैं कि यहाँ पानी मीठा निकलेगा या खारा, और उनकी भविष्य वाणी बिल्कुल ठीक उतरती है।-नवभारत से।

इन महाराज की दिव्य दृष्टि ने सरकार को प्रभावित किया है। माननीय पं॰ नेहरु और श्री के.एस. मुंशी ने अपने वक्तव्यों में इनकी अद्भुत शक्ति को सराहा है और आशा प्रकट की है कि उनके सहयोग से राजस्थान की मरु भूमि को जल सिंचित करके हरा-भरा बनाया जा सकेगा।

योग शक्ति का यह एक चमत्कार अनायास ही सामने आ गया है। ऐसे अनेकों चमत्कारों की शक्ति आध्यात्मिक साधना के सिद्ध पुरुषों में होती है। इस भारत भूमि में प्राचीन काल में अनेक योग शक्ति सम्पन्न महापुरुष थे अब भी ऐसे कितने आत्मशक्ति सम्पन्न महापुरुषों का साक्षात्कार किसी-किसी को हो जाता है।


हमारी अभिलाषाएँ पूरी क्यों नहीं होती?

(पं. गोकुल प्रसाद भट्ट, सम्भलपुर)

बहुत से मनुष्य कहा करते हैं, कल्पना जगत में ही विचरण करते रहने से-इस प्रकार के स्वप्नों में रहने से-हम वास्तव में कुछ नहीं कर सकते। केवल मन के लड्डू ही हम खाते रहेंगे। किन्तु यह भ्रम है। कहने का आशय यह है कि हम सदैव कल्पना-जगत में ही विचरण करते रहें और विचार ही विचार में रह जायें और मन के लड्डू में ही सन्तुष्ट रहें। कहने का आशय यह है कि किसी काम को करने के पहले उस काम को करने की दृढ़ इच्छा मन में उत्पन्न होने दें और तब सारी शक्तियों को उस ओर झुका देंगे जिससे आपको अधिकाधिक सफलता प्राप्त हो। मन के विचार को मन में ही गाढ़ कर न रखें वरन् उसे व्यवहार रूप में लाना आवश्यक है। हम यह भी अवश्य कहेंगे कि ये शक्तियाँ बड़ी ही कार्य कुशल है-पवित्र है। ईश्वर ने दैवी उद्देश्य सिद्ध के लिए हमें ये शक्तियाँ दी हैं, जिससे हम सत्य की झलक देख सकें। इन्हीं की बदौलत हम उस समय भी अपने आदर्श पर कायम रह सकते हैं जब कि असुविधा पूर्ण एवं विपरीत परिस्थिति में कार्य करने को बाध्य किए गये हों।

हवाई किले बनाना सर्वथा निःसार नहीं है। हम पहले मन में ही अपने कार्यों का सृजन करते हैं-अभिलाषा सूत्र में उनका नक्शा तैयार करते हैं और फिर कार्य रूप में उसकी बुनियाद डालते हैं। कारीगर मकान का नक्शा पहले मन से ही तैयार कर लेता है और मकान बनाता है। सुन्दर और भव्य मकान बनाने के पूर्व ही वह मनश्चक्षु से निर्मित इमारत देख लेता है।

इसी प्रकार हम जो कार्य करते हैं पहले उसकी सृष्टि हमारे मन में होती है और फिर वह स्थूल रूप धारण करता है। हमारी कल्पनाएँ हमारी इमारतों के नक्शे हैं। किन्तु यदि हम कल्पनाओं को सत्य करने के लिए जी-जान से प्रयत्न न करेंगे तो उनका नक्शा मात्र ही रह जावेगा। कारीगर यदि बैठा नक्शा बनाता रहे और मकान बनाने के साधनों को न जुटाए तो फिर उसका नक्शा बेकार ही रहेगा और उसके प्रयास नक्शे तक ही समाप्त हो जायेंगे।

सभी महान पुरुष, जिन्होंने संसार में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है पहले अपनी इच्छित वस्तुओं को स्वप्न में ही देख सकते थे। जितनी स्पष्टता से, जितने आग्रह से, जिस उत्साह से उन्होंने अपने सुख स्वप्न की-आदर्श की सिद्धि में प्रयत्न किया उतनी सिद्धि या सफलता उन्हें प्राप्त हुई।

अपने आदर्श को कभी इसलिए न त्याग दें कि उसे व्यवहृत करने का प्रत्यक्ष साधन आपको नहीं दिखलायी पड़ता। आप अपनी समस्त शक्तियों का प्रवाह अपने आदर्श पर लगा कर उस पर दृढ़ता से जमे रहें। आप सदैव उसे प्रज्वलित रखें। कभी भी अन्धकारमय या मन्द उसे न होने दें। सदैव आप नूतन एवं आनन्दप्रद अभिलाषा में उत्पन्न वायुमण्डल में भ्रमण करते रहें। आप वही ग्रन्थ पढ़ें जो आपके आदर्श की ओर आपको प्रोत्साहन दें-उन्हीं व्यक्तियों के संपर्क में रहे जिन्होंने ऐसे कार्य किए हैं जो आप करना चाहते हैं और जिसे सफल बनाने के लिए आप जी-जान से प्रयत्नशील हैं।

रात में सोने के पूर्व शान्त से आप एकाग्रचित्त हो अपने आदर्श पर चिन्तन करें-विचारों में आदर्श का व्यवहारिक रूप देखें और सफलता के आनन्द में विभोर हो उठें। आप भयभीत न हों-क्योंकि जो अपने आदर्श की असफलता के स्वप्न देखा करता है उसका निश्चय ही पतन होता हैं। स्वप्न-शक्ति या विचार-शक्ति आपको इसलिए नहीं दी गयी है कि वह आशंकाएँ उत्पन्न करें। उसके पीछे सत्य छिपा हुआ है। यह एक ईश्वर प्रदत्त गुण है जो दैवी कोष से दैवी धन देता है और आप साधारण व्यक्तियों की श्रेणी से उठकर असाधारण पुरुषों की श्रेणी में रहने लगते हैं-दुर्व्यवस्था से वह आपको दिव्य आदर्शों में निमग्न कर देता है।

हम अपने हृदय के आनन्दमय भवन में आदर्श के जिस आभास को देखा करते हैं वह हमें असफलता और दुराशा के कारण हतोत्साह होने से रोकता है।

यहाँ स्वप्नों का तात्पर्य उन स्वप्नों से नहीं है जो तरंगों के समान क्षणिक हैं-वरन् तात्पर्य उस सच्ची एवं प्रकृत अभिलाषा-उस पवित्र आत्मिक आकाँक्षा से है जो हमें सदैव हृदय में इस विचार को बल देती रहती है कि हम अपने जीवन को दिव्य और महान बनाएँ, तथा जो हमें सदैव सावधान करती रहती है कि हम अवाँछनीय एवं दुर्व्यवस्था से उठकर उन आदर्शों को ग्रहण करें जिनकी कल्पना हम किया करते हैं।

हमारी प्रकृत अभिलाषा के पीछे ईश्वरत्व छिपा हुआ है।

दैवी और फलप्रद अभिलाषाओं के लिए हम यह नहीं कहते कि आप अपनी अभिलाषाओं को उन पदार्थों के लिये उपयोग करें जिनको आप चाहते तो हैं लेकिन जिनकी आवश्यकता आपको नहीं है। उन अभिलाषाओं की चर्चा यहाँ पर नहीं है जो मरुदेश के उस फल के समान है जो देखने में सुन्दर है किन्तु मुँह लगाते ही जिसकी जघन्यता प्रकट हो जाती है। हमारा आशय यहाँ पर उन प्रकृत अभिलाषाओं से है जो हमारे आदर्श की सिद्धि में सहायक होती है। मेरा आश्रय उन वास्तविक आकाँक्षाओं से है जो हमें पूर्ण बनाने में आत्म विकास करने में मदद करती हैं।

हमारी मानसिक प्रवृत्तियाँ-हमारी हार्दिक अभिलाषाएँ हमारी रोज की प्रार्थनाएँ हैं। इन प्रार्थनाओं को प्रकृत दैवी सुनती है और उनका यथोचित उत्तर देती है। वह इस बात को स्वीकार कर लेती है कि हम वही वस्तु चाहते हैं जिसकी सूचना हमारी अन्तरात्मा देती है और वह हमें उसकी प्राप्ति के लिए बल देती है। लोग यह बहुत कम समझते हैं कि हमारी नित्य की अभिलाषाएँ हमारी प्रार्थनाएँ हैं ये प्रार्थनाएँ नकली नहीं, बनावटी नहीं, किन्तु विमल हृदय से निकली हुई हैं-आत्मिक है और परमात्मा उनका सुफल हमें अवश्य देता है।

हम सभी इस बात को मानते और जानते हैं कि एक दिव्य पथ-प्रदर्शक हमारी आत्मा में आसीन है और वह सदैव हमारी रक्षा करता है, हमें उचित मार्ग दिखलाता है और हमारी आकाँक्षाओं का समाधान करता रहता है। जो व्यक्ति अपने मानसिक भाव को ठीक करके उत्साह एवं दृढ़ता से अपने लक्ष्य तक पहुँचना चाहती है वह अवश्य सफल होगा-पूर्णतया नहीं तो अंशतः अवश्य।

हमारी हार्दिक अभिलाषाएँ हमारे उत्पादक अर्न्तवल को जागृत करती हैं। वे हमारी शक्तियों को जोर देती रहती हैं हमारी योग्यता को बढ़ाती रहती हैं। प्रकृति देवी की ऐसी दुकान है कि वहाँ एक मूल्य निश्चित रहता है और मनुष्य वह मूल्य देकर प्रत्येक वस्तु खरीद सकता है। हमारे विचार उन जड़ों के समान हैं जो शक्ति रूपी अनन्त सागर में फैली हुई है और जिन्हें गति तथा स्पन्दन देने से वे हमारी आकाँक्षा एवं अभिलाषा का स्नेहाकर्षण कर देती है।

वनस्पति-संसार की प्रत्येक वस्तु क्या फल क्या फूल अपने निश्चित समय पर ही फूलते-फलते और पकते हैं। जब तक उन्हें पूर्ण रूप से फूलने-फलने का अवसर न मिले पतझड़ उन पर असर नहीं करता। बर्फ गिरने के पहले ही फल पक जाते हैं यही कारण है कि उनकी वृद्धि रुकती नहीं।


VigyapanSuchana

‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

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इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति, गहरे अनुभव और अनुसंधान के साथ लिखी गई है।

(1) मैं क्या हूँ।

(2) सूर्य चिकित्सा विज्ञान।

(3) प्राण चिकित्सा विज्ञान।

(4) परकाया प्रवेश।

(5) स्वस्थ और सुन्दर बनाने की विद्या।

(6) मानवीय विद्युत के चमत्कार।

(7) स्वर योग से दिव्य ज्ञान।

(8) भोग में योग।

(9) बुद्धि बढ़ाने के उपाय।

(10) धनवान बनने के गुप्त रहस्य।

(11) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि।

(12) वशीकरण की सच्ची सिद्धि।

(13) मरने के बाद हमारा क्या होता है?

(14) जीव जन्तुओं की बोली समझना।

(15) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

(16) क्या धर्म? क्या अधर्म?

(17) गहना कर्मणो गतिः

(18) जीवन की गूढ़ गुत्थ्यों पर प्रकाश।

(19) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा।

(20) शक्ति संचय के पथ पर।

(21) आत्मगौरव की साधना।

(22) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान।

(23) मित्रभाव बढ़ाने की कला।

(24) आन्तरिक उल्लास का विकास।

(25) आगे बढ़ने की तैयारी।

(26) अध्यात्म धर्म का अवलोकन।

(27) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन।

(28) ज्ञान योग, कर्मयोग, भक्ति योग।

(29) यम नियम।

(30) आसन प्राणायाम।

(31) प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि।

(32) तुलसी के अमृतोम गुण।

(33) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान।

(34) मैस्मरेजन की अनुभव पूर्ण शिक्षा।

(35) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग।

(36) हस्त विज्ञान।

(37) विवेक सतसई।

(38) संजीवनी विद्या।

(39) गायत्री की चमत्कारी साधना।

(40) महान जागरण।

(41) तुम महान हो।

(42) गृहस्थ योग।

(43) अमृत, पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति।

(44) घरेलू चिकित्सा।

(45) बिना औषधि कायाकल्प।

(46) पंच तत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण।

(47) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

(48) विचार करने की कला।

(49) दीर्घ जीवन के रहस्य।

(50) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?

(51) लेखन कला।

(52) प्रार्थना के चमत्कार।

(53) विचार संचालन विद्या।

(54) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।

(55) अध्यात्म शास्त्र।

(56) स्वप्न दोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।

(57) सफलता के तीन साधन।

(58) शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य।

(59) दूध की चमत्कारिक शक्ति।

(60) दैवी सम्पदाएं।

(61) अध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार।

(62)कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान।

(63) सुखी वृद्धावस्था।

(64) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग।

(65) वैज्ञानिक आध्यात्मवाद।

(66) प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनायें।

(67) योग के नाम पर मायाचार।

(68) जादूगरी या छल।

(69) सौभाग्य बढ़ाना।

(70) सम्मोहन विज्ञान।

(71) ब्रह्मचर्य विज्ञान।

(72) प्रभावशाली व्यक्तित्व।

(73) प्रेम का रहस्य।

(74) अमृत कण।

(75) उपवास के चमत्कार।

(76) प्रसिद्धि और समृद्धि।

(77) स्त्री-रोग-चिकित्सा।

(78) बाल-रोग-चिकित्सा।

(79) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञो पवीत।

(80) यज्ञोपवीत से धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।

(81) निरोग जीवन का राज मार्ग

मूल्य में कमी के लिये लिखा पढ़ी व्यर्थ है। छः रुपये से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

व्यवस्थापक “अखण्ड ज्योति” कार्यालय मथुरा।


जीवन का अस्तित्व!


जीवन का अस्तित्व

जीवन क्या है, कैसे जाने!

जीवन क्या है, कैसे जाने! युग-युग बीते जिन अमरों को, उनको जीवित सभी बखाने!

(1)

जीवित रहना ही जीवन है,

या मरना जीवन कहलाता है?

जीवित को जीवित कहकर क्यों-

मानव जग को बहलाता है?

मरकर भी जो जीवित ही है-

क्यों न उसी को जीवित माने?

जीवन क्या है, कैसे जाने!

(2)

इन रूखे धन पतियों को है,

मानवता क्या जीवित कहती?

मर-मर कर जो जीते हैं,

उनकी कहीं निशानी रहती?

जब भी, आखिरी हिचकी आई-

काल आ गया नाम मिटाने।

जीवन क्या है, कैसे जाने!

(3)

मानव ने सुन्दरता पायी,

वह उस पर फूला फिरता है।

क्षण-क्षण वह मिटती जाती है,

नहीं जरा उसमें स्थिरता है।

फिर भी उसको देख-देख क्यों-

उसके रोम लगे थहराने?

जीवन क्या है, कैसे जाने!

(4)

गैरों के सुख के खातिर ही-

जिसने अपना जीवन त्यागा।

बचा वही, पर मरा वही-

जिसने सोचा है पीछा-आगा।

अपना मरना ही जीवन है,

आया हमको शलभ दिखाने।

जीवन क्या है, कैसे जाने!

(श्री बजरंगलालजी सुलतानिया)

*समाप्त*