(1) अखंड ज्योति का जुलाई अंक ‘गायत्री अंक होगा। उसके मुखपृष्ठ पर तिरंगा अत्यन्त चित्ताकर्षक गायत्री का सुन्दर चित्र आर्ट पेपर पर छपा हुआ होगा पृष्ठ संख्या भी साधारण अंक से ड्योढ़ी होगी, पाठ्य सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। गायत्री विद्या के रहस्यपूर्ण तथ्यों को इसमें सरल, सारगर्भित एवं अनुभव के आधार पर उपस्थित किया जायेगा।
(2) यह अंक उतना ही छपेगा जितना कि अखंड ज्योति के स्थायी ग्राहक है। इसलिये नये ग्राहकों को अंक प्रकाशित होने से पूर्व ही अपना चन्दा भेज देना चाहिए। जो लोग चन्दा भेजने में पिछड़ जायेंगे वे यह अंक प्राप्त न कर सकेंगे।
(3) गायत्री अंक के लिये अपने अनुभव और लेख जिन्हें भेजने हों वे शीघ्र ही भेज दें। किन्हीं सफल गायत्री साधकों को वृत्तान्त एवं चरित्र भी यदि विदित हों तो उनको भी छपने के लिये भेजने की पाठकों से प्रार्थना है।
(4) अखंड ज्योति साइज में गायत्री के तिरंगे चित्र, आर्ट पेपर पर छपाये गये है। इनका मूल्य प्रति चित्र है।
(5) गायत्री विद्या का अधिकाधिक प्रचार करने तथा गायत्री उपासकों का एक व्यापक परिवार बनाने के लिए अखंड ज्योति के तत्वाधान में अखिल भारतीय गायत्री संस्था की स्थापना की गई है। इसकी सदस्यता की कोई फीस नहीं है। (अ) जिनने गायत्री संबंधी आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने लिये गायत्री महाविज्ञान के तीनों खंड माँग लिये है, तथा गायत्री के प्रति जिनको श्रद्धा है वे इस संगठन के सदस्य बन सकते हैं। सदस्यता के फार्म बिना मूल्य मँगाये जा सकते हैं।
(6) अखंड ज्योति से जितना गायत्री साहित्य प्रकाशित हुआ है, वह सब गायत्री संस्था के लिए हैं इस साहित्य की बिक्री से लाभ होगा वह गायत्री प्रचार, गायत्री तप, यज्ञ, सत्र पुरश्चरण, उपासना, पाठ, संस्कार, जप, शिक्षा आदि पुण्य आयोजनों में ही व्यय होगा ।
(7) जेष्ठ सुदी 10 (गंगा दशहरा) गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इस शुभ अवसर पर गायत्री प्रेमियों को यथा शक्त्िव्रत, उपवास, जप, यज्ञ, तथा गायत्री साहित्य का वितरण आदि के पुण्य आयोजन करने चाहिये।
(8) सर्व शक्तिमान गायत्री नामक एक अत्यंत सस्ती प्रचार पुस्तिका छापी गई हैं जिसमें 24 पृष्ठ है और मूल्य दो आना मात्र है । यह धर्मार्थ वितरण करने योग्य है। जो सज्जन इसे छः रुपये से अधिक की मँगवायेगा उनका नाम पता तथा वितरण का उद्देश्य मुख पुष्ट पर छाप कर भेजा जायगा।
(9) गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग के कुछ आवश्यक अंश अलग छाप लिये गये हैं। जिनका नाम (1)गायत्री ही कामधेनु है। (2) वेद शास्त्रों का निचाढ़ गायत्री (3) गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएँ (3) गायत्री का वैज्ञानिक आधार (4) अनादि गुरु मन्त्र गायत्री है इनके अतिरिक्त (1) गायत्री के चौदह रत्न प्रथम भाग (2) गायत्री के चौदह रत्न द्वितीय भाग (3) विपत्ति निवारिणी गायत्री , यह तीन पुस्तकें अलग है इनकी पाठ्य सामग्री तीन बड़े ग्रन्थों से अलग है । जिन्होंने गायत्री महाविज्ञान के तीनों भाग मँगा लिये हैं। उन्हें भी इन पिछली तीन पुस्तकों को मँगाना चाहिए। छोटी 5+3 इन आठों पुस्तकों का मूल्य आना है ।
(10) अपने निज के तथा अनेक सहचरों के अनुभवों तथा शास्त्र वचनों के आधार पर हमारा विश्वास दिन-दिन अधिक सुदृढ़ होता जाता है कि गायत्री उपासना मानव जीवन को सात्विकता एवं सुख शान्ति की ओर ले जाती है। पाठको से प्रार्थना है कि वे प्रयोग कर परीक्षण के रूप में ही सही कुछ दिन इस महामंत्र की उपासना करके देखें। आशा की जाती है कि उन्हें भी शान्तिदायक अनुभव होंगे।
(11) गायत्री संबंधी परामर्शों के लिए जवाबी पत्र भेजना आवश्यक हैं।
-श्रीराम शर्मा आचार्य
“अखंड ज्योति” कार्यालय मथुरा
(देश देशान्तरों से प्रचारित, उच्च कोटि की आध्यात्मिक मासिक पत्रिका)
वार्षिक मूल्य 2॥) सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य एक अंक का।)
साधना मेरी नहीं,
मैं ही तुम्हारी साधना हूँ।
क्यों पहुंच पाऊँ न तुम तक ,
आप ही की आराधना हूँ॥
इस जगत के किस सरल ने था विरल का गान गाया,
क्यों न अपना प्राणधन उन्मत्त हो उर में बसायों,
कामना मैं क्या करूं,
मैं ही निरन्तर कामना हूँ।
जग प्रफुल्लित हो उठा, जागी कमी यदि भावनायें,
मन मयूर प्रमत्त होकर देखता नव कल्पनायें,
जागती विर भवानी,
मैं ही अकल्पित कल्पना हूँ ।
अजर हो तुम अमर हो प्रिय, किन्तु मै प्रतिफल बदलती
रीझती, खिझती, उलझती, रूठती, हँसती , मचलती,
एक तुम मेरे रहो, मैं ही अनेकों जन्मना हूँ।
साधना मेरी नहीं, मैं ही तुम्हारी साधना हूँ॥
(श्री तोरन देवी शुक्ल ‘लली’)
स्वरेषो वै शब्दो निगदति मनः स्थैर्य करणम् ।
तथा सौख्यं स्वास्थ्यं ह्य पदिशति चित्तस्वतलतः।
निमग्नत्वं सत्यब्रत सरसि चा चक्षत् उत।
त्रिधाँ शान्तिह्येभिर्भु विच लभते संयम रतः॥4॥
अर्थ- “स्वः” यह शब्द मन की स्थिरता का निर्देश करता है चंचल मन को सुस्थिर और स्वस्थ रखो यह उपदेश देता है। सत्य में निमग्न रहो यह कहता है। इस उपाय से संयमी पुरुष तीनों प्रकार की शांति प्राप्त करते हैं।
जीवन में आए दिन दुरंगी घटनाएं घटित होती रहती हैं। आज लाभ है तो कल नुकसान , आज बलिष्ठता है तो कल बीमारी, आज सफलता है तो कल असफलता। दिन रात चक्र जैसा ही सुख दुख का, सम्पत्ति विपत्ति का उन्नति अवनति का पहिया भी घूमता रहता है। यह हो नहीं सकता कि सदा एक सी स्थिति रही हो। जो बना है वह बिगड़ेगा जो बिगड़ा है वह बनेगा, श्वासों के आवागमन का नाम ही जीवन है। साँस चलना बन्द हो जाय तो जीवन भी समाप्त हो जायेगा। सदा एक सी ही स्थिति बनी रहे परिवर्तन बन्द हो जाय तो संसार का खेल ही खतम हो जायेगा। एक के लाभ में दूसरे की हानि है और एक की हानि में दूसरे का लाभ। एक शरीर की मृत्यु ही दूसरे शरीर का जन्म है। यह मीठे और नमकीन, हानि और लाभ के दोनों ही स्वाद भगवान ने मनुष्य के लिए इसलिए बनाये हैं कि वह दोनों के अन्तर और महत्व को समझ सके।
खिलाड़ी लोग जैसे गेंद, ताश, शतरंज, नाटक आदि खेलों को मनोरंजन के उद्देश्य से खेलते हैं और उसकी अनुकूल प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के कारण अपने आपको उत्तेजित, उद्विग्न, या अशान्त नहीं करते। वैसा ही दृष्टिकोण जीवन की विविध समस्याओं के संबंध में रखा जाना चाहिए। किन्तु हम देखते है कि लोग इन स्वाभाविक, आवश्यक एवं साधारण से उतार चढ़ाव को देखकर असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाते हैं। और अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं।
जरा सा लाभ होने, सम्पत्ति मिलने , रूप सौंदर्य यौवन की तरंगें आने , कोई अधिकार या पद प्राप्त हो जाने , पुत्र बनने विवाह होने आदि अत्यन्त ही तुच्छ सुखद अवसर आने पर फूले नहीं समाते, खुशी से पागल हो जाते हैं, ऐसे उछलते कूदते है। मानों इन्द्र का सिंहासन इन्हें ही प्राप्त हो गया हो। सफलता, बड़प्पन या अमीरी के अहंकार के मारे उनकी गरदन टेड़ी हो जाती है, दूसरे लोग अपनी तुलना में उन्हें कीट पतंग जैसे मालूम पड़ते है और सीधे मुंह किसी से बात करने में उन्हें अपनी इज्जत घटती दिखाई देती है।
जरा सी हानि हो जाय, घाटा पड़ जाय, कोई कुटुम्बी मर जाय, नौकरी छूट जाय, बीमारी पकड़ लें, अधिकार छीने, अपमानित होना पड़े अपनी मर्जी न चले, दूसरों की तुलना में अपनी बात हेठी हो जाय तो उनके दुख का ठिकाना नहीं रहता बुरी तरह रोते चिल्लाते हैं। चिन्ता के मारे सुख-सुख कर काँटा हो जाते हैं। दिन रात सिर धुनते रहते है । भाग्य को कोसते हैं। और भी, आत्म हत्या आदि बन पड़ता है करने से नहीं चूकते।
जीवन एक झूले है जिस में आगे भी और पीछे भी झोटे आती है। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न होता है। और आगे आते हुए भी, यह अज्ञानग्रस्त, माया मोहित, जीवन विद्या से अपरिचित लोग बात बात में अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है। कभी हर्ष में मदहोश होते है तो कभी शोक में पागल बन जाते है। अनियंत्रित कल्पनाओं की मृग मरीचिका में उनका मन अत्यन्त दीन अभाव ग्रस्त दरिद्र की तरह व्याकुल रहता है। कोई उनकी रुचि के विरुद्ध बात करदे तो क्रोध का कोई पार नहीं रहता। इन्द्रियाँ उन्हें हर वक्त तरसाती रहती है, भस्मक रोग वाले की जठर ज्वाल के समान, भोगों की लिप्सा, बुझ नहीं पाती। नशे में चूर शराबी की तरह “और लाओ और लाओ”। “और चाहिए, और चाहिए की रट लगायें रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए कभी भी सुख शान्ति के एक क्षण का दर्शन होना भी दुर्लभ है। भले ही उनके पास लाख करोड़ की सम्पदा तथा वैभव के साधन भरे पूरे हों पर वे किसी न किसी अभाव के कारण दीन दरिद्र ही बने रहेंगे। उन्हें अपना दुर्भाग्य ही हर घड़ी परिलक्षित होता रहेगा। अपनी मनोवांछाऐं पूरी होने पर जो सुखी होने की आशा करता है। वह मूर्ख न तो सुख को, न सुख के स्वरूप को न सुख के उद्गम को, जानता है और नहीं वह उसे प्राप्त ही कर सकता है।
गायत्री के “स्व” शब्द में मानव प्राणी को शिक्षा दी गई है कि मन को अपने में, अपने अन्दर स्थिर रखो। अपने भीतर दृढ़ हो। घटनाओं और परिस्थितियों को जल तरंगें समझो उनमें क्रीड़ा कल्लोल का आनन्द लो। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही स्थितियों का रसास्वादन करो, किन्तु उनके कारण अपने को उद्विग्न, अस्थिर, असंतुलित मत होने दो, जैसे सर्दी गर्मी की परस्पर विरोधी ऋतुओं को हम प्रयत्नपूर्वक सहन करते हैं। उन ऋतुओं के दुष्प्रभावों से बचने के लिए वस्त्र, पंखा ,अँगीठी , शर्बत चाय आदि की प्रतिरोधात्मक व्यवस्था कर लेते हैं वैसे ही सुख-दुख के अवसरों पर भी उनकी उत्तेजना का शमन करने योग्य विवेक तथा कार्यक्रम की हमें व्यवस्था कर लेनी चाहिये। कमल सदा पानी में रहता हैं पर उसके पत्ते जल से ऊपर ही रहते हैं। उसमें डूबते नहीं। इसी प्रकार साक्षी द्रष्टा निर्लिप्त, अनासक्त एवं कर्मयोगी की विचारधारा अपना कर हर परिस्थिति को, हर चढ़ाव उतार को देखें और उसमें मिर्च तथा मिठाई के कडुए मीठे रसों का हँसते हँसते रसास्वादन करें।
गायत्री का “स्व” शब्द बताता है कि इन हर्ष-शोक की बाल क्रीड़ाओं में न उलझें रहकर हमें आत्मपरायण होना चाहिए। ‘स्व’ को पहचानना चाहिए। आत्म चिन्तन, आत्म विश्वास, आत्म गौरव , आत्मनिष्ठ, आत्म साधन, आत्म उन्नति, आत्म निर्माण यह वह कार्य है। जिनमें हमारी इच्छा शक्ति, कल्पना शक्ति एवं क्रिया शक्ति का उपयोग होना चाहिये। क्योंकि अन्दर का मूल केन्द्र, उद्गम स्त्रोत आत्मा ही है। जिसने आत्मा के साथ रमण करना सीख लिया उसे स्वर्ग की अप्सराएं भी चुड़ैलों जैसी तुच्छ एवं कुरूप दिखाई देने लगती है। क्योंकि आत्मा ही अन्तर यौवन और अनन्त सौंदर्य है। अपनेपन की, आत्म भाव की छाया, पड़ते ही अपनी तुच्छ सी वस्तु, संतान, संपदा, देह, कितनी सुन्दर कितनी प्रिय मालूम पड़ने लगती है। कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता। जिसकी छाया पड़ने से जड़ वस्तुएं इतनी मनोरम बन जाती है तो उस आत्म की समग्र प्राप्ति में कितना सुख होगा, यह कल्पना से नहीं अनुभव से ही जाना जा सकता है। अनन्त वैभव का, ऐश्वर्य का, सुख शान्ति का रत्न भंडार अपने अन्दर है, जिसने उस खजाने पर अपना अधिकार कर लिया उसके लिए चाँदी ताँबे के टुकड़े में कोई आकर्षण नहीं रह जाता। आत्म प्राप्ति का लाभ इतना बड़ा है कि उसकी तुलना संसार के किसी आनन्द से नहीं हो सकती। आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द, परमानन्द का सुख गूँगा के गुड़ की तरह है संसार की कोई भी उपमा देकर मिठास को बताया नहीं जा सकता ।
आत्मस्थित मनुष्य का अन्तःस्तल स्वस्थ होने से वह सदा प्रसन्न रहता है। उसके चेहरे पर प्रसन्नता नाचती रहती है चहरा सदा मुसकराता हुआ हँसता हुआ, खिलता हुआ दिखाई देता है। उसकी वाणी से मधु टपकता है और बोलने में फूल झड़ते हैं। स्नेह, आत्मीयता, नम्रता, सौजन्य एवं हित कामना का संमिश्रण होते रहने से उसकी वाणी बड़ी ही सरल एवं हृदय ग्राही हो जाती है।
स्वस्थ-आत्मा में स्थिर-व्यक्ति बालकों की तरह, सरल छल-कपट से रहित, निर्मल अन्तः करण का होता है। उसे सबके प्रति ममता, आत्मीयता, दया, एवं सहानुभूति होती है। वह किसी से नहीं कुढ़ता , न किसी का बुरा चाहता है। ईश्वर पर विश्वास होने से वह भविष्य के बारे में आशावादी और निर्भर रहता है फलस्वरूप अप्रसन्नता उसके पास नहीं फटकती और आनन्द एवं उल्लास से उसका अन्तः करण भरा रहता है। यह आनन्दमयी स्थिति उसकी मुखाकृति एवं वाणी से हर घड़ी छलकती रहती है। गायत्री का ‘स्व’ शब्द हमें ऐसी ही स्वस्थता की ओर ले जाता है।
(श्री स्वामी शिवानंद जी सरस्वती )
विनोद-हास्य की आदत प्रकृति की अमूल्य देन है। साधकों को आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने में यह सहायता करती है, यह मन की खिन्नता को दूर करती है और मनुष्य को प्रसन्न रखती है। यह दूसरों को भी प्रफुलित और आनन्दित करती है। परन्तु आपको ऐसा हास्य कभी नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों को दुःख हो। आपका हास्य ऐसा होना चाहिए। जिससे दूसरों को शिक्षा और सुधार का अवसर मिले। आपका हास्य आध्यात्मिक उपदेश का भी काम करे। मनुष्य को हल्की मधुर हँसी हँसना चाहिए। उजड्डेपन की ठेकेदार असभ्य हँसी से बचना चाहिये । इस से साधक की आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती हैं। मन की गम्भीरता नष्ट हो जाती है। महात्मा अपने नेत्रों में ही मुस्कराते और हंसते है जो वास्तव में महत्वपूर्ण आकर्षक होता है। बुद्धिमान साधक ही इसको समझ सकते है। बालकों जैसे छिछोरे और मूर्ख मत बनो।
थोड़ी सी भी उद्विग्नता और चिड़चिड़ेपन का मन पर और सूक्ष्म शरीर पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। साधकों को अपने चित्त में इस प्रकार की कुवृत्तियाँ प्रकट नहीं होने देना चाहिए। यदि आप इनकी ओर से कुछ भी असावधान हुए तो फिर यही वृत्तियाँ भयंकर क्रोध का रूप किसी समय भी धारण कर ले सकती है। उन्हें अंकुरित होते ही क्षमा, प्रेम और सहानुभूति के द्वारा मसल डालना चाहिए। मन में तनिक भी अशान्ति नहीं होनी चाहिए। मन को बिल्कुल शान्त और स्थिर रहना चाहिये। तब ही ध्यान सम्भव है।
जिस प्रकार शैतान घोड़ा सवार को अपने ही साथ कुपथ की ओर ले जाता है उसी प्रकार क्रोध का वेग भी इस संयम रहित शुद्ध जीव को क्रोध वेश में पथ भ्रष्ट कर देता है। वह क्रोध का शिकार ही बन जाता है। जिस प्रकार कुशल घुड़सवार घोड़े काबू रखता हुआ निरापद अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जाता है। उसी प्रकार आत्मसंयमी मनुष्य क्रोधावेश को दबाकर शान्ति प्राप्त करता है। और जीवन के लक्ष्य को पहुँच जाता है।
भयंकर क्रोध-वेश से स्थूल शरीर की नाड़ी मण्डलियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। और सूक्ष्म शरीर पर इसका बड़ा गहरा स्थायी प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म शरीर से काले-काले तीर के समान ये लहरे निकला करती हैं। जिन परमाणुओं ने स्पेन का फ्लू पैदा किया था वे भले नष्ट हो जायें परन्तु अनेक देशों में दीर्घ काल तक उनका कार्यरूप इन्फ्लुएंजा जारी रहेगा। इसी प्रकार मन में क्रोध का प्रभाव भले ही थोड़ी देर में शान्त हो जाये परन्तु लिंग शरीर में इसका असर कई दिनों बल्कि सप्ताहों तक बना रहता है। थोड़ा सा भी उद्वेग जो मन में पाँच मिनट रहे तो लिंग शरीर में दो तीन दिन के लिए उसका प्रभाव बना रहता है। भयंकर क्रोध का आक्रमण शरीर में अत्यधिक सूजन पैदा कर देगा। जिससे लिंग शरीर में एक जख्म पैदा हो जायगा जो कई महीनों में अच्छा होगा। क्या अब आपने क्रोध का विनाशकारी परिणाम समझ लिया। क्रोध के शिकार मत बनें। इसे क्षमा, प्रेम दया सहानुभूति, विचार और दूसरों के विचारों का आदर करके दमन करो।
चिन्ता, खेद, अपवित्र विचार, क्रोध या घृणा, मन या लिंग शरीर पर एक प्रकार की काली तह जमा देते हैं। यह काली तह का आवरण सद्गुणों का लाभकारी प्रभाव अन्दर प्रवेश नहीं होने देती और असद्गगुणों को अपना काम कराने में सहायक बनी रहती है। चिन्ता मन और सूक्ष्म शरीर को बड़ी हानि पहुँचाती है। चिन्ता करने से शक्ति क्षीण हो जाती है। और कुछ लाभ होता नहीं बड़ी कुशलतापूर्वक आत्म निरीक्षण द्वारा तथा मन को निरंतर ध्येय में संलग्न रखकर चिन्ता को निर्मूल करना चाहियें
अपने प्रयत्न में कमी मत करो। दिव्य ज्योति के दीप को जलने दो। अब आप ध्येय के समीप पहुँच गये हो। अब प्रकाश मिल गया है। अथवा धैर्य पूर्ण साधन की शक्ति से अध्यात्मिक मार्ग में आपने बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत पार कर लिए हैं। यह बड़ी ही सराहनीय बात है। आपने बेशक बड़ी उन्नति की है। पर अभी आपको अभी एक और चोटी पर चढ़ना है। और एक तंग घाटी में से पार होना है इसके लिये और भी धैर्यपूर्ण प्रयत्न और शक्ति की आवश्यकता है। आपके सात्विक अहंकार को भी घुला डालना होगा। सविकल्प समाधि की आनन्द पूर्ण अवस्था को भी उल्लंघन कर जाना होगा। ब्रह्माकार वृत्ति को भी समाप्त करना होगा। तभी आप निश्चय पूर्वक भूमावस्था को प्राप्त करोगे जो कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
(श्री प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी)
यदि हमें खाने पीने की सभी सामग्रियाँ मिल जाती हैं, चढ़ने को सवारी, रहने को मकान और देखने को सिनेमा नाटक मिल जाते है, तब हम भगवत् चर्चा के चक्कर में क्यों पड़ें? इसका उत्तर हमें स्वयं ही सोचना चाहिये। यदि खाना-पीना, इन्द्रियों का सुख भोगना ही जीवन का उद्देश्य होता इतने से ही शांति मिल जाती तो लोग इतना प्रयास क्यों करते? जिनके पास खाने-पीने की सभी सामग्रियाँ है, रहने को कोठी चढ़ने को मोटर और खर्च करने के लिये रुपये हैं, वे भी एकदम सुखी नहीं वे भी शान्ति के साथ बैठ नहीं सकते। संसार में बहुत से लखपती हैं, करोड़पति भी है क्या वे सभी सुखी है? क्या उन्हें आन्तरिक शान्ति है? क्या वे कुछ भी काम नहीं करते है? उन्हें हमारी तरह दुख नहीं होता है? वे भी हमारी तरह चिन्तित रहते हैं, उन्हें भी बीमारी होती है, संबंधियों के मरने पर वो भी हमारी तरह रोते हैं। वे भी किसी तरह पेट भरते हैं। हम भी किसी तरह पेट भरते हैं। हमें अपने चार आने रोज की चिन्ता है उन्हें चार लाख की चिंता हैं बीमार होने पर उन्हें भी कष्ट होता है, हमें भी कष्ट होता है। हमारे चार आने गिर पड़ते है। हमें जितना दुःख होता है। उतना ही उन्हें हजारों का घाटा होने पर दुःख होता है। यही नहीं वे हम से भी अधिक चिन्तित है वे हम से भी अधिक अशान्त हैं। वे हम से भी अधिक दुखी हैं।
इससे यही सिद्ध हुआ कि बहुत धन से बहुत से इन्द्रियों के भोगों से सुख नहीं मिलता। अधिक सामग्रियों की बहुलता से शान्ति नहीं मिलती। राजा ययाति बूढ़े हो गये थे शुक्राचार्य जी के वरदान से उन्होंने अपने पुत्र से जवानी लेकर एक हजार वर्ष फिर संसार भोगों को भोगा। पूरे एक हजार वर्ष सुख भोगने पर उन्होंने अत्यन्त ही दुख के साथ कहा था-
न जातु कोमः कामानामुपभोगेन शाम्यति
हविष कृष्ण वर्त्मव भूय एवाभिवर्धते॥
“इन्द्रियों के सुखों के उपभोग से उनकी शान्ति नहीं होती। यही नहीं, बल्कि भोगो से तो वासना और बढ़ती ही जाती है। जैसे जलती हुई अग्नि में उसे शान्त करने के लिये घी डाले तो वह और भी बढ़ती है।”
बात यह है कि जितना ही सामग्री बढ़ती जाती है उतनी ही वासना भी बढ़ती जाती है। जो हजार पति है वह लखपति होना चाहता है। जो लखपति है वह करोड़पति होना चाहता है और करोड़पति, अरबपति बनने की इच्छा करता है। संसारी वैभवों से आज तक कोई भी तृप्त नहीं हुआ। तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र भी जब किसी को तपस्या करते देखते है,तो वे भी चिन्तित हो जाते हैं। कि ये हमारे पद को छीन न ले एक भी कोई आदमी आज तक ऐसा नहीं हुआ जिसने इन विषय भोगों से शान्ति लाभ किया हो इसीलिये महाराज ययाति ने कहा है-
यतपृथिव्याँ ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
न दुह्यान्ति मनः प्रीति इति मत्वा शमे व्रजेत्॥
पृथ्वी भर में जितने अन्न हैं, सुवर्ण आदि धातुएँ है, जितने पशु हैं, जितनी स्त्रियाँ हैं ये सब किसी एक ही आदमी को दे दिये जायं तो ये संसार भर की सभी सामग्रियाँ एक ही आदमी को तृप्त नहीं कर सकती। एक भी आदमी के मन को शान्ति प्रदान नहीं कर सकती । जब ऐसी बात है तो हमें इन से हट कर भगवान शरण में जाना चाहिये ।
धन वैभव की तृष्णा उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है। गरीब समझता है, लखपति सुखी है, लखपति समझता है कि करोड़पति आनन्द में है, किन्तु वास्तव में सुखी कोई नहीं हैं। मैंने एक कहानी पढ़ी थी।
एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया, किसान की स्त्री घर में थी उसने चने की रोटी बना रखी थी किसान आया उसने अपने बच्चों का मुख चूमा, स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये । वह रोटी खाने बैठ गया। स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया। भिखारी चना लेकर चल दिया। रास्ते में वह सोचने लगा “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं? फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री हैं, बच्चे हैं। अपने आप पैदा करता है, बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है वास्तव में सुखी तो यह किसान है।
वह किसान रोटी खाते खाते अपनी स्त्री से कहने लगा- “नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है, अब वह किसी तरह काम नहीं देता यदि 50) का इन्तजाम हो जाय तो इस साल काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा। वह ब्याज पर 50) दे देगा।” भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया। बहुत देर चिरौरी बिनती करने पर 1) सैकड़ा सूद पर साधों ने 50) देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली और गिन कर 50) किसान को दिये। रुपये लेकर किसान अपने घर को चला। वह रास्ते में सोचने लगा-”हम भी कोई आदमी हैं। घर में 5)भी नकद नहीं। कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये। साधो कितना धनी है। उस पर सैकड़ों रुपये है। “वास्तव में सुखी तो यह साधोराम ही है।
साधोराम छोटी सी दुकान करता था। यह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया। वह वहाँ बैठा ही था, कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था कोई कलकत्ते का। किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ। किसी में एक लाख का। साधो महाजन यह सब देखता रहा। कपड़ा लेकर वह चला। रास्ते में सोचने लगा “हम भी कोई आदमी हैं, सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं। एक दिन में लाखों का फायदा। “वास्तव में सुखी तो यह है।”
पृथ्वीचन्द बैठे थे कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वे बड़ी चिन्ता में थे कि नौकर ने कहा- “आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है आपको जाना है मोटर तैयार है।” पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर गया। वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी रायबहादुर जी से कलक्टर कमिश्नर हाथ मिला रहे थे, बड़े-बड़े सेठ खड़े थे, वहाँ पृथ्वीचन्द सेठ को कौन पूछता वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गये। लाट साहब आये। रायबहादुर से हाथ मिलाया, उनके साथ चाय पी और चले गये। पृथ्वी अपनी मोटर में लौट रहें थे रास्ते में सोचते आते थे। हम भी कोई सेठ है-5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये। रायबहादुर का कैसा ठाठ है लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं “वास्तव में सुखी तो ये ही है।” लाट साहब के चले जाने पर रायबहदुर के सिर में दर्द हो गया, बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे। कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे, उनकी भी चिन्ता थी, कारोबार की भी बात याद आ गई, वे चिन्ता में पड़े थे, खिड़की से उन्होंने झाँक कर देखा एक मोटा ताजा भिखारी नंगे बदन एक डंडा लिये जा रहा था रायबहदुर ने उसे देखा और बोले-”वास्तव में तो सुखी यही है, इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र। इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती सुखी तो यही है।”
इसका कहने का मतलब इतना ही है, कि हम एक दूसरे को सुखी समझते हैं। वास्तव में सुखी कौन है इसे तो वही जानता है। जिसे आन्तरिक शान्ति है। एक विरक्त साधु ने एक राजा से कहा था- “महाराजा आप इतने बड़े राज के स्वामी है और मैं अपने फटे कपड़ों का स्वामी हूँ। अतः हम दोनों ही के पास स्वामित्व तो है ही अब हम में दरिद्र वही है, जिनकी तृष्णा बढ़ी हुई हो मैं तो इन फटे कपड़ों ही से सन्तुष्ट हूँ तुम इतने बड़े राज्य से भी संतुष्ट नहीं। इस लिए संतुष्टि राज्य वैभव में नहीं वह तो मन का धर्म है। मन सन्तुष्ट हुआ तो फिर चाहे लाख रुपये या एक पैसा भी न हो दोनों ही हालत में आनन्द है। इसलिये हम जो रुपये पैसे में आनन्द खोजते है। यह हमारी भूल है।
जीवन का उद्देश्य रुपये पैसे पैदा करना नहीं है। तेली के बैल की तरह दिन रात्रि रुपये पैसे पैदा करने में ही लगे रहना यही जीवन का चरम लक्ष्य नहीं है। जिनके लिये तुम इतना परिश्रम कर रहे हो ये चीजें तो सूकर कुकर योनि में भी प्राप्त हैं। अमीरों के कुत्ते भी मोटरों में चलते हैं। दूध जलेबी खाते हैं, अपनी कूकरी के साथ वे सुखोपभोग भी करते है, किन्तु उन्हें सच्चा सुख नहीं प्राप्त हो सकता। सच्चा सुख तो भगवान की प्राप्ति में ही है। ये संसारी सुख तो इच्छा न करने पर भी मिल जायेंगे। क्योंकि यह तो प्रारब्ध के ऊपर हैं। आप अपने परिश्रम से पेट पाल सकते हैं लखपति करोड़पति होना यह तो प्रारब्ध का खेल है। जैसे कोई भी दुख की इच्छा नहीं करता। कौन चाहता है कि हम बीमार हों, हमारे घर वालों की मृत्यु हो, व्यापारी कब चाहता है हमें घाटा हो, किन्तु न चाहने पर भी रोग, शोक, घाटा आदि होते ही हैं। न चाहने पर ये चीजें जिस प्रकार प्रारब्ध के अनुसार मिलती हैं, उसी प्रकार संसारी भोग भी आपको मिलेंगे उन्हीं की प्राप्ति के लिये दिन रात्रि लगे रहना इसे पुरुषार्थ नहीं कहते अरे, पुरुषार्थ तो यह है कि इस नश्वर शरीर से शाश्वत भगवान् को प्राप्त कर ले। इस विनाशी शरीर से अविनाशी भगवान की प्राप्ति हो।
(श्री स्वामी सर्वदानंद जी)
हठयोगी बड़े-बड़े चमत्कार करते हैं। किन्तु इस विद्या के द्वारा उनका हृदय पवित्र हो जाता हो, वे मायाजाल को छोड़ देते हों सो बात नहीं वरन् कभी-कभी तो यह देखा जाता है कि ऐसे हठयोगी बड़े पक्के दुनियादार होते हैं। हाँ, हठ योगी ने आत्म-ज्ञान भी प्राप्त कर लिया हो, उसे आत्म-साक्षात्कार हो गया हो तब तो बात ही दूसरी है किन्तु यह हठयोग का सुफल किसी प्रकार नहीं कहा जा सकता।
हठयोगियों के चमत्कार विलक्षण होते हैं और उनमें भूलकर उनके पीछे पड़ जाना मनुष्य के लिए सरल है। एक हठयोगी अपनी आंखों पर पट्टी बाँध कर पढ़ सकता है। कोई कोई खेचरी मुद्रा का अभ्यास करके महीनों वर्षों पृथ्वी के अन्दर पड़े रह सकते हैं। कोई-कोई इसके अभ्यास से पानी पर चलने लगते हैं एक हठयोगी किसी भी मनुष्य को भी श्री सम्पन्न बना सकता है। किन्तु उसे स्वयं धन की चिन्ता बनी रहती है। बदन में सुई चुभाना, चाकू या तलवार खा लेना तो हठयोगियों के लिए मामूली बात है। किन्तु इन बातों से अज्ञान का परदा सदा के लिये हमारी आंखों से कदापि नहीं हट सकता।
हठयोग में मन को वश में करने की क्रिया है। मन बड़ा चंचल है। मन को हम साँप से उपमा दे सकते हैं। जब साँप को ठंड लगती है तब वह सिकुड़ कर एक गोला बन जाता है। उस समय चाहे जो उसे उठा कर ले जा सकता है। बच्चे भी उसके साथ खेलने लगते हैं। किन्तु जरा उसे आँच दिखा दीजिए और वह फिर ज्यों का त्यों फुफकारने लगता है। हठयोगी जो समाधि लगाते हैं वह साँप को ठंड लगने के समान है। जब तक वह समाधि में रहता हैं तब तक संसार का मायाजाल उसे नहीं सता सकता। किन्तु ज्यों ही वे उससे नीचे उतरते हैं त्यों हि दुनियादारी उन्हें घेर लेती है। बात यह है कि जब तक हम साँप के विष के दाँत निकाल कर नहीं फेंक देते तब तक हम निर्भय नहीं रह सकते। जब तक मन में वासना का राज्य है तब तक क्षणिक समाधि से हमें उस सच्चिदानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसीलिए हमें पहले साँप के दाँत उखारने होंगे। पहले मोहनी मन्त्र के द्वारा साँप को वशीभूत कर लीजिये मन को वश में करने के लिए वेदान्त ही मोहनी मंत्र है। सौ बात की एक बात यह है कि जब तक वासना दूर नहीं होगी, जब तक चरित्र निमार्ण न होगा तब तक केवल हठयोग की समाधि से कुछ नहीं हो सकता।
बहुत से आदमी हठयोग का अभ्यास करके रुपये कमाना चाहतें है। हठयोग के द्वारा मन की एकाग्रता होती है। किन्तु यदि साँप के विषैले दाँत नहीं निकाले गये- यदि वासनाएँ नहीं दूर की गई तो समाधि और एकाग्रता दूर होते ही प्रलोभन बेतरह सताने लगते हैं। भक्त भगवान के मन्दिर में जाता है और भक्ति के आवेश में अपना सर्वत्र भगवान को सौंप देता है उस समय उसके मन की अवस्था बहुत ऊंची हो जाती है। घड़ी भर के लिए वह आनन्द से सराबोर हो जाता है किन्तु घर पहुँचते ही वह शराबी की भाँति फिर भगवान से अपना एक-एक सामान वापस लेने लगता है। वह घर को फिर अपनी निजी सम्पत्ति समझने लगता है। अपने परिवार को अपना परिवार मानता है और उनके सुख-दुःख में मग्न हो जाता है।
वेदान्त कहता है कि यदि घड़ी भर के त्याग से तुम्हें इतना आनन्द मिलता है तो यदि सचमुच तुम अपना सर्वस्व भगवान को सौंप दो तब तुम्हें कितना आनन्द मिलेगा? क्या तुम्हें उसके सच्चिदानन्द स्वरूप होने में कोई संदेह है?
हठयोग उन्नति का एक छोटा सा मार्ग है। किन्तु यदि हमें उस सच्चिदानन्द स्वरूप के पास पहुँचना है तो हमें प्रवृत्ति मार्ग छोड़कर निवृत्ति मार्ग ही ग्रहण करना होगा। यदि हमें राजा से मिलना है तो राजा के नौकर-चाकरों की खुशामद से क्या लाभ? हमें सीधे राजा को अपना मित्र बनाना चाहिए। वेदान्त निवृत्ति मार्ग के द्वारा हमें सीधे उसी राजा को अपना मित्र बनाना चाहिए।
इसलिए हठयोग का अभ्यास करना चाहिए या नहीं? इसके उत्तर में वेदान्त भी यही कहता है कि तुम्हें हठयोग द्वारा प्राप्त ऋद्धि-सिद्धियों के मजा लुटने की लालसा है तब तो वह शुद्ध दुनियादारी है उससे आत्मिक उन्नति की आशा करना व्यर्थ है। हमें मृत पुरुषों से बातचीत करने की चेष्टा करना चाहिए या नहीं? इसके उत्तर में वेदान्त कहता है कि तुम मृत पुष्पों से बातचीत तो अवश्य कर सकते हो किन्तु मृत पुरुषों की अपेक्षा जीवित पुरुषों से बातचीत करना क्या बुरा है? वेदान्त की दृष्टि में तो मृत पुरुषों की अपेक्षा जीवित पुरुषों का संसर्ग और भी अच्छा है।
(श्री रामकृष्ण परमहंस)
लोग इन विश्वउद्यान को देखकर उस पर ही विमोहित हो जाते हैं। इस उद्यान की एक कली (अर्थात् स्त्री) जब ऋषियों मुनियों और योगियों तक के मन को अपने काबू में किये हुये है तो फिर साधारण लोगों का क्या जिक्र? उद्यान स्वामी (परमात्मा) के दर्शन की लालसा कितने जनों को होती है?
चाँद की छाया दर्पण में दिख पड़ती है। बालक उस छाया पर मोहित हो जाता है। उसको देखते-2 वह अपने आप को भूल जाता है। उस चाँद छाया के अतिरिक्त कोई प्रकृत चाँद भी है, बालक को इसका ज्ञान नहीं। बालक नहीं जानता कि प्रकृत चाँद इस छाया चाँद से अनन्त गुणा सुन्दर है। दर्पण अपने स्थान से हिल जाता है छाया चाँद उसमें दिखाई नहीं देती। बालक उस छाया चाँद के लिये रोता है। माता फिर शीशे को यथा स्थान रख देती है। बालक छाया को वापस देखकर प्रसन्न हो जाता है।
इस विश्व रूपी दर्पण में भगवान की छाया है। यह छाया-भगवान् की माया-इतनी प्रबल है कि बड़े-2 ऋषियों मुनियों को भ्रमित कर देती है। संसार के विषय भोगों में जो आनन्द है वह ब्रह्मानंद का आभास मात्र है, किन्तु इस आभास में इतना आकर्षण है कि माया विमोहित प्राणी विषय सुख को ही परम सुख और जीवन का लक्ष्य मान कर उसके पीछे-2 भागते फिरते हैं और परमानन्द के झरने से कोटि-कोटि कोस दूर रहते हैं। जिस समय मानव के सिर पर दुःख का पहाड़ गिरता है, उस समय थोड़ी देर के लिए इस संसार की असारता का ज्ञान होता है और उसका मन भगवान की ओर आकर्षित होता है, किन्तु बाद में माया की “मैं तू” मनुष्य को अपने जाल से, निकलने नहीं देती। दूसरे ही पल “मैं तू” उसको अपनी ओर खेंच लेती है।
कान, आँख, नाक, सीना, और त्वक इत्यादि पाँच इन्द्रियों द्वारा हमें संसार के समस्त पदार्थों का ज्ञान होता है, और इनके द्वारा ही हम सर्व विषयों को भोगते हैं। यह इन्द्रियाँ मन को विषयों के पीछे-2 भटकाती फिरती हैं। शब्द, रूप, रत्न, गंध और स्पर्श यह पाँचों विषय अति प्रबल हैं, विषय अपनी मोहिनी आकर्षण शक्ति द्वारा प्राणी मात्र को ही अपने वशीभूत किये हुए हैं। कोई शब्द पर आसक्त है, और कोई रूप का दिवाना है, कोई रस के पीछे-2 भागता है, कोई गन्ध में लीन हैं और कोई स्पर्श सुख की लालसा से अधीर हो रहा है। सकल विषय ही प्रबल हैं, किन्तु इनमें स्पर्श-सुख, स्त्री-सुख सबसे प्रबल है। पशु-पक्षी, कीट-पतंग, प्राणी मात्र ही स्त्री जाति के वशीभूत हो रहे हैं। विशेषतः मनुष्य कामिनी में इतना आसक्त है कि कामिनी ही उसके ज्ञान, ध्यान, और पूजा का विषय हो रही है। ब्रह्मादिक देवता भी इस कामिनी की मोहिनी शक्ति द्वारा अधीर हो गये तो फिर साधारण पुरुषों का क्या कहना?
लाखों में कोई ही ऐसा वीर है, जो इन स्थूल विषयों की मोहिनी माया से बच निकले। जब मनुष्य संसार के दुःख और आपदों से हताश हो जाता है, और विषय-भोगों में तुष्टि नहीं पाता तो उसका मन संसार के विषयों से विरक्त हो ईश्वर की ओर झुकता है, किन्तु स्थूल विषयों से विरक्त होने से ही काम नहीं चलता। सूक्ष्म विषय मन को आ घेरते हैं। लोक मान, स्तुति, अभिमान मन को घेरे रहते हैं। इनसे मुक्ति पाने पर अनेक प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियों में मन भूल जाता है। प्रथम तो सहस्रों मनुष्यों में कोई ही भगवान प्राप्ति के लिये यत्न करता है, और उन यत्न करने वालों में हजारों में कोई एक सिद्धि को प्राप्त होता है, और उन सिद्धों में हजारों में कोई एक भगवान के स्वरूप को तत्वतः जानता है।
यह भगवान की माया अति दुस्तर है, किन्तु जो लोग भगवान की शरण में आते हैं वे इसको तर सकते हैं। किन्तु भगवान् की शरण लेना ही अति कठिन काम है। भगवान् की कृपा बिना भक्ति प्राप्त नहीं होती। महापुरुषों की कृपा अथवा भगवान् की दया से ही भक्ति का संचार होता है। जिस पर भगवान की कृपा होती है उसे भगवान की माया मोहित नहीं कर सकती। जिस प्रकार मदारी के शिष्य को मदारी की माया मोहित नहीं कर सकती, उसी प्रकार भगवान की माया भगवान के दास को नहीं व्यापती।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
मानव बुद्धि के विचार-गुप्त, कुँठित, विकार मय रूप से उत्पन्न मैल का नाम “चिंता” है। यह मस्तिष्क की वह अवस्था है, जब मनुष्य अपने लाभ तथा उन्नति के स्थान पर भय, कुढ़न, शक्तिहीनता, परिस्थिति की विषमता, दैन्य का अनुभव करता है। चिन्ता किसी भी दिशा में मनुष्य की कमजोरी तथा परिस्थिति से संघर्ष न कर सकने का प्रमाण है।
चिन्ताऐं नाना रूपों तथा विषयों की होती हैं। मुख्य रूप से हम इन्हें निम्न विभागों में बाँटते हैं (1) शारीरिक चिंताएं (2) साँसारिक चिंताएं (3) और धार्मिक चिंताएं। स्थूल रूप में यह कहा जा सकता है कि साँसारिक चिंताएं सबसे अधिक लोगों को सताती है। उन्हीं से शारीरिक तथा धार्मिक चिंताओं की उत्पत्ति होती है अतः सर्वप्रथम उन्हीं पर विचार करें।
साँसारिक चिंताएं-
इस वर्ग में अनेक छोटी-2 बातें सम्मिलित हैं। सर्वप्रथम आर्थिक चिंताएं हैं। आज के जीवन में दो तत्व मुख्य रूप से महत्वपूर्ण बन गये हैं रुपया तथा वासना। अधिकाँश व्यक्तियों की समस्या वासना से संबंधी है। सेक्स का तात्पर्य विस्तृत वासना-जन्य सुखों से है। इसमें काम वासना, स्पर्श, गंध, सुन्दर दृश्यों को देखने की लालसा, तथा भाँति-2 के सुस्वादु पदार्थों का उपयोग सम्मिलित है।
मानव अन्ततः एक जानवर ही है। अतः साधारण स्तर पर रहने वाले निम्न कोटि के व्यक्तियों का इन्द्रिय-सुख चाहिए। हम अमुक स्त्री से विवाह करते, तो कैसा अच्छा रहता? अमुक की पुत्री कितनी सुन्दर है? अमुक अभिनेत्री कैसा मुग्धकारी श्रृंगार करती है? अमुक की पत्नि सामाजिक आचार व्यवहार में कैसी निपुण है? इस प्रकार की अनेक छोटी-मोटी चिंताएं साधारण मानवीय स्तर पर रहने वाले मनुष्यों के हृदय-सरोवर में उठा करती हैं। वे प्रत्येक स्त्री को ललचाई दृष्टि से देखते हैं और हृदय में एक प्रकार की दलित वासना के उभरने का अनुभव करते हैं। इस प्रकार की चिन्ताओं से ग्रस्त व्यक्तियों से हमें दो बातें कहना है। वासना का सुख क्षणिक है। दूर से आकर्षक और समीप आने पर यह काला-कलूटा, परम निंद्य, अनेक अनर्थ तथा गुप्त रोगों की सृष्टि करने वाला राक्षस है।
वासना-जन्य चिंताओं से सावधान! क्या तुम तरह-तरह के गुप्त रोगों से बचना चाहते हो? क्या तुम समाज में उच्च गौरवशाली प्रतिष्ठित पद, स्थिति, प्राप्ति करना चाहते हो? क्या तुम अपने लिये भावी पीढ़ी के मन पर एक उज्ज्वल भाव छोड़ना चाहते हो? यदि हाँ, तो वासना की चिन्ताओं को त्याग दो। प्रत्येक अभिनेत्री तुम्हारे सात्विक पवित्र आदर्श से नीची है, प्रत्येक पड़ौसी की पत्नि तुम्हारे लिये पूज्य है। तुमसे छोटी की आयु की बालिकाएं तुम्हारे पथ प्रदर्शन के लिए उत्सुक हैं। क्या आप उनका पथ प्रदर्शन न करेंगे?
वासना-जन्य चिंताएं आपकी निर्बलता की द्योतक हैं। आपको अपनी वासना के ऊपर विजय प्राप्त करनी चाहिए। सिनेमा के गन्दे फिल्मों को न देखिये, दूसरों की स्त्रियों की ओर वासना लोलुप दृष्टि न डालिये, गन्दे चित्र, बुरे गाने, कुसंगति त्याग दीजिए, आप इन महा अनर्थकारी चिंताओं से मुक्त रहेंगे।
यदि आप वासना की तुच्छता को मन में गहरा उतार सकें, तो अपनी बहुत सी शक्ति का क्षय रोक सकेंगे। रात्रि में शय्या ग्रहण करने से पूर्व मन को पवित्र संकल्पों में निरत रखना, कुसंगति से बचना, सद् ग्रन्थों की प्रेरणा ग्रहण करना वासना-मुक्ति का उपाय है।
आर्थिक चिंताऐं-
आर्थिक चिंताऐं आज के मानव की बड़ी कमजोरी है। हर एक व्यक्ति “अधिक रुपया चाहिए” चिल्ला रहा है। जिस किसी से पूछिये वही अपनी गरीबी का प्रदर्शन करता है। यथेष्ट रुपया रखने वाले धनीमानी व्यक्ति भी आर्थिक चिंताओं में डूबे हैं।
आर्थिक चिंताओं की उत्पत्ति के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-
(1) कृत्रिम आवश्यकताओं की अभिवृद्धि।
(2) अपने को दूसरों के समक्ष बढ़ा-चढ़ा कर प्रदर्शन करना।
(3) शौक की वस्तुओं-उत्तम वस्त्र, बढ़िया मकान, कीमती भोजन, मेवा, मिष्ठान, सैर सपाटा का उपयोग।
(4) नशेबाजी या वेश्या गमन, गुप्त रोग, मुकदमे बाजी।
(5) समाज में दूसरों को अधिक देना लेना, विवाह शादियों में अनाप शनाप व्यय।
(6) अधिक संतान की उत्पत्ति तथा उनकी आवश्यकताएँ जुटाने में कठिनाइयाँ।
(7) दूसरों को प्रसन्न करने की चेष्टा में व्यय।
ऊपर के प्रत्येक कारण पर विचार कर देखिये कि आप आखिर क्यों चिंतित हो रहे हैं? व्यर्थ के शौक या दिखावा छोड़ दीजिये। अपना वास्तविक रूप ही जनता के समक्ष आने दीजिये। क्या रक्खा है थोड़ी देर के उस आनन्द में जो सदा के लिये आपको ऋण के बोझ में बाँध दे। उस रात्रि सुख में क्या आनन्द है, जो इतने बच्चे उत्पन्न कर दे कि आप उनकी शिक्षा, विवाह, नौकरी लगाने में ही मर मिटे? व्यर्थ की आवश्यकताएँ वे जंजीरें हैं, जो आपको दूसरों के सामने हाथ फैलाने को विवश करती हैं। एक बीड़ी या दियासलाई की सींक के लिए आप दूसरों के सन्मुख हाथ पसारते नहीं लज्जाते! कैसा दुर्भाग्य है कि चाट-पकौड़ी, सिनेमा, मिठाई या जुए के लिए आप दूसरे की खुशामद करते हैं।
गरीबी बुरी नहीं है। यदि आप गरीब हैं, तो वैसे ही समाज के सम्मुख रहिए। आपके गुण, आपकी शिक्षा, उच्च संस्कार, व्यवहार, मुख की प्रसन्नता, सज्जनता का व्यवहार आपको समाज में उच्च पद प्रदान करेगा सज्जन व्यक्ति गरीब हो कर भी प्रतिष्ठा का अधिकारी होता है। मितव्ययिता एक कला है। उसमें पारंगत बन कर आप आर्थिक चिंताओं से मुक्त रह सकते हैं। आय को देखिये। उसी के अनुसार व्यय को कम या अधिक करते चलिए। जिस दिन आप कुछ नहीं कमाते, उस दिन भूखा रह लेना, कर्ज लेकर चिंतित रहने से श्रेयस्कर है।
सामाजिक चिंताऐं-
सामाजिक आचार व्यवहार में नाना प्रकार की चिंताएँ आपको व्यग्र करती हैं। आप अपने अफसर को प्रसन्न करना चाहते हैं। डरते है कि कहीं वह नाखुश न हो जाय। यदि आप दुकानदार हैं, तो ग्राहकों के रुष्ट हो जाने से डरते हैं। यदि आप अध्यापक हैं, तो विद्यार्थियों से, वकील हैं तो अपने मुवक्किलों से, उपदेशक हैं, तो श्रोताओं से डरते हैं। ये चिंताएं तब दूर हो सकती हैं, जब आप मनोविज्ञान का अध्ययन कर मनुष्यों के गुप्त रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करें। स्त्री, पुरुष, ग्राहक, श्रोता, बच्चों, बूढ़ों, अफसरों के मन में रहने वाले “अहं” को समझ लें। लोग तभी अपने से रुष्ट होते हैं, जब आप उनके “अहं” पर आघात करते हैं। “अहं” को उकसाने या उभारने से प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न हो सकता है। आपके सामाजिक व्यवहार सरस-स्निग्ध हो सकते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति एक बन्द पुस्तक के समान है। उसमें नाना अनुभूतियाँ, स्वाभाविक कमजोरियाँ, दलित वासनाएँ भरी पड़ी हैं। वह कुछ चीजों में दिलचस्पी लेता है, कुछ को ना पसन्द करता है। इन्हीं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन हमें इस प्रकार की चिन्ताओं से मुक्ति प्रदान कर सकता है।
मानसिक चिन्ताऐं-
इनका जन्म अति-विचार शीलता से होता है। कुछ व्यक्ति इतने सुकुमार होते हैं कि तनिक सी मानसिक चोट को भी सहन नहीं कर पाते, टीका टिप्पणी, मजाक, आलोचना, या अपने विषय में अप्रिय बाते सुनकर आवेश में भर जाते हैं। कुछ निराशा का ताना बाना दिन रात बुना करते हैं। कहीं असफलता हो गई, उसी के लिए चिन्तित रहा करते हैं। भविष्य में क्या होगा? हमारी नौकरी रहेगी या छूट जायगी? बच्चों की शिक्षा कैसे चलेगी? लड़कियों का विवाह कैसे होगा? बाजार में मँहगाई है, उदरपूर्ति कैसे चलेगी?-इन चिंताओं में फंसे रहने वाले व्यक्ति को जानना चाहिए कि परमेश्वर के हाथ इतने बड़े हैं कि उन सभी कार्यों की पूर्ति के लिये उपयुक्त साधन निकाल लेंगे। हमें असफलता, निराशा, कमजोरी का अनुभव नहीं करना है, भविष्य उज्ज्वल है। हमारी शक्तियाँ भी तब तक इतनी बढ़ जायगी कि हम सभी बढ़ने वाले उत्तर दायित्वों को पूर्ण कर सकेंगे। यदि हमारे ऊपर उत्तरदायित्व बढ़ते हैं, तो हमारी शक्तियाँ, योग्यताएँ, संचित धन राशि, समाज में सम्मान हमारे संबन्ध भी तो उत्तरोत्तर विकसित हो रहे हैं। हमारी मानसिक और बौद्धिक सम्पदाएँ भी तो निरन्तर वृद्धि पर हैं। हमारे मित्र, सगे सम्बन्धी भी हमारी सहायता के लिए मौजूद है। अतः चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। फिक्र क्यों करें आने वाला समय हमारे लिये उज्ज्वल होगा। हमारे बाल बच्चे पढ़ कर उस स्थिति में पहुँच जाँयगे कि हमारा भार वहन कर सकें।
मन में चिता रखना फूँस में अग्नि को छिपाये रखने जैसा मूर्खतापूर्ण प्रयत्न है। चिंता आपके स्वास्थ्य को दग्ध कर देगी। आयु का बहुत सा हिस्सा जीने से नहीं, प्रत्युत चिंता की महा अनर्थकारी, प्रलयंकारी दुर्वह कराल अग्नि से भस्मीभूत हो जायगा।
अपने विषय में अधिक चिंतन कर हम अपनी समस्याओं को हल नहीं कर पाते। उलटे कठिनाइयों से संघर्ष करने वाली गुप्त इच्छा शक्ति का ह्रास करते हैं। आने वाली कठिनाइयों के विषय में चिंता कर रही सभी शक्तियों को भी क्षय करने की अपेक्षा यह युक्ति संगत है कि उन पर स्थिर बुद्धि से शान्तचित्त हो उन को दूर करने की तदबीरों पर विचार किया जाय।
चिन्ता न कीजिये, ठंडे दिल से प्रत्येक समस्या पर सोचिये विचारिये। समस्या को हल करने की कोई युक्ति निकालिये। श्रम कीजिये। चिंता से क्या पायेंगे? यदि आप स्वयं नहीं सोच सकते, तो मित्रों से, पत्नि से, अध्यापक से, या किसी विशेषज्ञ से सलाह लीजिये। दूसरों को अपनी समस्याएँ सुलझाने का अवसर प्रदान कीजिये।
कोई ऐसी विषम स्थिति नहीं कि उसकी सुलझाहट न की जा सके। थोड़ी सी विचारशीलता से कुछ न कुछ उपाय अवश्य निकल आयेगा जिससे परिस्थिति की रक्षा हो सके।
शारीरिक चिंताऐं-
शारीरिक चिन्ताओं में क्रमशः होती हुई कमजोरी तथा आने वाली वृद्धावस्था प्रमुख हैं। कुछ व्यक्ति अपनी शारीरिक निर्बलता को बढ़ा-चढ़ा कर देखने के आदी होते हैं। यह एक प्रकार का संदिग्ध स्वभाव है।
साधारण व्यायाम, संयमित जीवन, जिह्वा पर कन्ट्रोल तथा आहार-विहार में सावधान रहने से अनेक शारीरिक चिंताएँ दूर हो सकती हैं। शक शुवे की आदत अनर्थकारी है। आपका जीवन सौ वर्ष तक मजबूती से चलने के लिये बनाया गया है। उस पर अत्याचार न करें, तो व मजे में अपने आप चलता जायेगा। मिथ्या भय त्याग दीजिये। साधारण बीमारियों से युद्ध करने की प्रचुर सामर्थ्य आप में विद्यमान है। व्यर्थ के भय से शरीर दुर्बल होता है।
चिंता की सृष्टि करने वाले आप स्वयं ही हैं। यह आपके विचार की आदत मात्र है। वाह्य वातावरण से चिन्ता का कोई सम्बन्ध नहीं है। चिन्ता करके वातावरण को बदला नहीं जा सकता।
यदि शरीर की चिंता है, तो कुछ क्रियात्मक कार्य कीजिये। टहलिये, कसरत कीजिये, शुद्ध वायु में रहा कीजिये या विश्राम लीजिए पर व्यर्थ फिक्र से तो कुछ होना नहीं है। योजना बनाकर चिन्ता के कारण को दूर करना ही इससे मुक्ति का उपाय है।
धार्मिक चिन्ताऐं-
ईश्वर क्या है? आत्मा तथा ईश्वर का क्या संबन्ध है? मृत्यू के पश्चात् क्या होता है? ये प्रश्न बड़े महत्वपूर्ण हैं। इनसे मन में सद् प्रकाश का उदय होता है। लेकिन यदि आप इनके ठीक उत्तर नहीं जानते, या कोई आपको संतुष्ट नहीं कर पाता, तो कोई चिन्ता न करें। ज्यों-ज्यों आपका ज्ञान बढ़ेगा, आप स्वयं इसकी उपयोगिता तथा अर्थ समझते चलेंगे। धर्म अनुभव की वस्तु है। प्रतिदिन हम धार्मिक समस्याओं के विषय में भी कुछ न कुछ ग्रहण करते हैं। अतः समय से पूर्व इन चिन्ताओं से भी परेशान नहीं होना चाहिए। यदि हम अपने अनुभव से लाभ उठावें तो प्रायः सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त हो सकते हैं।
(श्री अगरचन्द नाहटा बीकानेर)
विश्व अशान्ति के दो प्रधान कारण हैं-एक तो अभाव, दूसरा तृष्णा। हमें अपने जीवनोपयोगी वस्तुओं के प्राप्त न होने या कम प्राप्त होने के कारण चित्त में अशाँति का अनुभव होता रहता है। विशेषकर जबकि दूसरों के पास उनकी आवश्यकता से अधिक विद्यमानता देखते हैं तो मन में एक संघर्ष सा छिड़ता है कि हमें भी वैसी ही सुविधाएँ और वस्तुएँ मिलनी चाहिए और जहाँ तक उनका अभाव रहेगा, अशाँति मिट नहीं सकती। उसका सच्चा उपाय तो यही है कि हम अपनी आवश्यकताओं को यथा संभव कम करें उनकी पूर्ति स्वयं कर सकें वैसा श्रम करते रहें एवं जो साधन सामग्री प्राप्त है, उसमें संतोष की भावना पन पायें। भारतीय प्राचीन संस्कृति इस पर जोर देती आ रही है। पर मानव-स्वभाव की कमजोरी समझें या संस्कार दोष हमें प्राप्त वस्तुओं में सन्तोष नहीं होता। हमारी तृष्णा बढ़ती ही रहती है। एक दूसरे अनुकरण में हमारी आवश्यकताएं बढ़ती ही चली जाती है। ऐसी परिस्थिति में शाँति कैसे प्राप्त हो?
हमारे प्राचीन मनीषियों ने बहुत प्रकार से इस अशाँति का विश्लेषण करके मानव को अंतर्मुखी बनने को आकर्षित किया है। उन्होंने देखा कि यह जीवन क्षण भँगुर है, थोड़े-से समय में ही इस देह से नाता छूट जानेवाला है। हम जियेंगे तो पचास-साठ वर्ष और सोचते रहते हैं सैंकड़ों वर्षों की बातें! हमारा मन अन्त समय तक संग्रह-वृत्ति में ही लगा रहता है। जो भी यहाँ से भौतिक शरीर को छोड़ जाते हैं कोई शरीर, धनादि पदार्थ साथ नहीं ले जा सकता। तब इनकी इतनी तृष्णा भ्रम का चक्कर ही प्रतीत होता है। इसीलिए मनीषियों ने भोग को छोड़ त्याग को स्वीकार किया व उसे ही शाँति का मार्ग समझा।
विश्व के सारे पदार्थ परिवर्तनशील हैं। कोई भी पदार्थ सदा एक-सा नहीं रहता। इससे हमें बोध ग्रहण करना चाहिये। हमारे मनीषियों ने ऐसा ही किया था, जिसके सैकड़ों दृष्टान्त भारतीय साहित्य में भरे पड़े हैं। हम इस परम सत्य की उपेक्षा न कर इधर-उधर, बाहर ही बाहर भूले भटक रहें हैं। इससे शान्ति मिलने की नहीं। यह सही है कि सभी व्यक्ति ऐसी भावना व यह सही है किन्हीं बन सकते, पर जितने अधिक परिमाण में हमारी आध्यात्मिक संस्कृति का प्रचार होगा, शान्ति उतनी ही अधिक सुलभ होगा।
बहुत से व्यक्तियों का कहना है कि वस्तुओं की कमी है तब संघर्ष रुक कैसे सकता है? वास्तव में हमने अभी वस्तुओं के उपयोग की कला सीखी नहीं और न हमारा इस ओर तनिक भी ध्यान ही है। हम प्रतिदिन देखते है कि घरों में या सड़कों पर कूड़े करकट का ढेर पड़ा रहता है। उनमें जीवनोपयोगी कितनी ही वस्तु निकम्मी समझकर डाल दी जाती है। दफ्तरों में नित्य न मालूम कितने कागज फाड़-फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल दिये जाते हैं जबकि उन्हीं को संग्रह कर उपयोग किया जाय तो बहुत काम आ सकते हैं। उन्हें पंसारियों, हलवाइयों, मोंचे वालों आदि को बेचा जाय तो पैसे मिल सकते हैं। महात्मा गाँधी का इन छोटी-छोटी बातों पर बड़ा ध्यान था। जहाँ तक जिस वस्तु का उपयोग हो सकता, वे उसे व्यर्थ नहीं गंवाते थे। वे जो भी लिफाफे आते या जो भी कागज काम के लायक होते, उन्हें उलटकर, लिफाफे बना कर, काम में ले लेते थे। पर हमें तो वस्तुओं को व्यर्थ बरबाद करने की आदत पड़ गई है। अतः इस ओर हम तनिक भी ध्यान नहीं देते। कोई चीज हमारे काम की न हो, पर हमारे अन्य भाई के काम की हो सकती हो तो हमें उनको दे देनी चाहिए, ताकि उसकी आवश्यकता की पूर्ति हो जाय। अपनी उपभोग्य वस्तुओं में से थोड़ी-थोड़ी बचत की जाय तो बहुत वस्तुएँ बच जायगी।
घरों में देखते हैं, कोई कपड़ा थोड़ा-सा फट गया या मैला हो गया तो उसे व्यवहार के अनुपयुक्त समझ फाड़कर, झाड़न आदि में उनको काम में लेकर, फेंक देते हैं। यदि हम विवेक रखें तो जो काम किसी दूसरी साधारण वस्तु से हो जाय उसके लिए वस्त्र को न गन्दाकर उस वस्त्र को किसी गरीब भाई को उपयोग के लिए दिया जा सकता है। वह व्यक्ति उससे अपनी सर्दी-गर्मी और लज्जा का बचाव कर सुखी हो सकता है।
विद्यार्थी ज्यों-ज्यों आगे की कक्षा में जाता है, पहले की पाठ्य पुस्तक बेकार हो जाती है और उन्हें यों ही बरबाद किया जाता है। यदि उन्हें उस कक्षा के किसी गरीब विद्यार्थी को दे दिया जाय तो कितना सुन्दर हो।
विदेशों में जहाँ अशुचि और कूड़े करकट को भी खाद बनाने आदि के काम में ले लेते हैं, वहाँ हमारे यहाँ काम में आने योग्य वस्तु को भी व्यर्थ ही खोते हैं। यह बहुत ही खेद की बात है। वस्तुओं के उपयोग की कला सीखना भारतवासियों के लिए परमावश्यक है।
हमारे यहाँ गाय, भैंस आदि ढोर रहते हैं। उन्हें घास पत्तर आदि डालने में असावधानी रखने से इधर-उधर कितना ही घास और दाना जमीन में पड़ कर व्यर्थ जाता है। ढोर चरते समय कुछ घास और दाना इधर-उधर फैला देते हैं। वह पैरों के नीचे या भीगे स्थान में पड़ने से यों ही नष्ट हो जाता है तथा गन्दगी और बीमारी बढ़ाता है, जब कि जरा ध्यान रख के उसे तत्काल उठा लिया जाय तो बेचारे कितने ही भूखे ढोरों का इससे पेट भर सकता है।
हम खाने बैठते है तो कोई वस्तु अधिक ले लेते हैं या भाती नहीं है तो यों ही जूठन में छोड़ उसकी बरबादी करते हैं। यदि खाद्य पदार्थ लेते समय ध्यान रखा जाय जिससे जूठन न निकले तो रोज कितना ही खाद्य पदार्थ बचा सकते हैं। इसी प्रकार जल आदि का प्रयोग भी हम ठीक तरह नहीं करते और कितना ही जल व्यर्थ इधर-उधर बरबाद होता है, जिसे पौधों में डाला जाय तो सूखते हुए पौधे ताजे हरे हो सकते हैं। ऐसे अनेक दृष्टान्त दिये जा सकते हैं। वास्तव में रात दिन हम ऐसी अनेक बाते देखते हैं, पर उन पर विचार नहीं करते। यदि कोई विचार करते भी हैं तो उसे कार्य रूप में परिणत नहीं करते।
प्राचीन समय की बात जाने दें तो भी कुछ समय पूर्व तक और किसी अंश में अब भी हमारे ग्रामों में निरुपयोगी मानी जाने वाली वस्तुओं का प्रयोग होता नजर आता है। गाँव वाले फटे वस्त्रों के बिछौने बना लेते हैं। मट्टी आदि साधारण वस्तुओं के ठाठे बनते हैं। पुराने जमाने में रद्दी कागजों को कूट-काट कर अनेक उपयोगी वस्तुएँ बना लेते थे। ऐसी पेटडी, डब्बे, सिंहासन, कलमदान आदि हमारे कला भवन में हैं जिनकी मजबूती व सुन्दरता देखते ही बनती है। खाता बही के रद्दी कागजों के एक ओर के खाली पृष्ठ पर अनेक कलापूर्ण चित्र बनाये हुए हमारे संग्रह में हैं। इसी प्रकार ठाठे के सिंहासन आदि दर्शनीय हैं।
वस्तुओं की व्यर्थ बरबादी से जितना नुकसान होता है, उससे कहीं अधिक समय की बरबादी से होता है। मन, वचन और काया की शक्ति का अपव्यय भी हमारे सारे जीवन को व्यर्थ बना रहा है। अतः हमें अपने चारों ओर, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होने वाली इस बरबादी से बचकर उसका विवेक पूर्वक सदुपयोग करने की कला का प्रतिदिन अभ्यास बढ़ाते रहना चाहिए। यही जीवन का सबसे अच्छा सद्व्यय है।
(श्री पूर्णाचन्द जैन, बूँदी)
किसी भी कार्य में यथेष्ट सफलता प्राप्त करने के लिए उसका भली भाँति विचार करके उसके हर अंगों से यथार्थ रूप में अवगत होना अत्यंत आवश्यक है। उसके सब अंगों का अत्यंत सूक्ष्म अन्वेषण करके अपने हानि-लाभ, मार्ग की कठिनाइयाँ, दूसरों द्वारा उत्पन्न व्यर्थ का विरोध, अपनी शक्ति, साधन और योग्यता तथा कार्य की रूप रेखा और क्रम आदि पर भली भाँति गंभीर विचार करके कार्य आरंभ करना चाहिए। नियमित और व्यवस्थित रीति से कार्य आरंभ करने पर 80 अंश सफलता की आशा की जा सकती है। इससे दिन-2 क्रमशः हमारी योग्यता और कुशलता में अभिवृद्धि होती जाती है और हम अपने कार्यों और कर्तव्यों में अनुभवी और निष्णात बनते जाते हैं।
यह निश्चित है कि यदि अपने कर्तव्यों को गंभीर विचार पूर्वक एवं निश्चित क्रिया पद्धति द्वारा किया जाय तो असफलता की संभावना कम हो जायगी। सामान्यतया असफलता तब ही होती है, जब अपने कर्तव्यों को सजगता, विचार और व्यवस्था पूर्वक नहीं किया जाता है। किन्तु, योजनाबद्ध कार्य करने में इन तीनों गुणों और इनके अंतर्गत अन्य सब गुणों का समावेश होता है। अतः इससे प्राप्त महान सफलताओं के आगे किंचित असफलतायें कार्य की उत्तेजक ही होती है, विशेष हानिप्रद नहीं। जीवन विकास के मार्ग की सामान्य असफलतायें हमें अधिक अनुभवी ओर योग्य बनाती हैं। उन्नतिशील जीवन के लिए यह आवश्यक और लाभप्रद भी है क्योंकि यह व्यक्ति को अधिक अनुभवी, कर्तव्यशील और सतर्क बनाती है।
सफल, गम्भीर व मनीषी पुरुषों के जीवनवृत्त पर दृष्टि डालने पर हमें यह तथ्य स्पष्ट लक्षित होता है। वह अपने सब कर्तव्यों की ओर सतर्क रहते हैं और अपने सब कार्य गम्भीर विचार और व्यवस्था पूर्वक करते हैं। उनके जीवन के महान लक्ष्य पहले ही से निर्मित हो जाते हैं। वह अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रहते हुए जीवन को नियमित रीति से परिचालित करते हैं। उनके महीनों अथवा वर्षों के कार्यक्रम पहले से ही निर्मित हो जाते हैं और बिना आवश्यक कारण के वह उसका सदैव अनुगमन करते रहते हैं तथा उन्हें सफल बनाने का भरपूर प्रयत्न करते हैं। यह समझना ठीक नहीं कि नियमों के शुष्क और कठोर पाश में आबद्ध रहकर हम जीवन के यथार्थ तथ्य और आनन्द वृति का विकास करने में असमर्थ रहते हैं। हाँ, विलासपूर्ण और अक्रियाशील अनुपादेय जीवन अवश्य दूर रहता है। जीवन में यथार्थ उन्नति प्राप्त करने के हेतु जीवन उद्देश्य और उसकी प्राप्ति के उपायों पर पहले ही से विचार करना आवश्यक है। हमारे जीवन का एक महान् उद्देश्य निर्दिष्ट होना चाहिए। उस महान उद्देश्य की सिद्धि के हेतु समय-समय पर छोटी-बड़ी योजनायें निर्मित करके उन्हें सफल बनाते जाना चाहिए। जिस भाँति मकान बनाने के पूर्व उसका नक्शा बनाना उचित होता है और नक्शे की पूर्णता पर ही मकान की पूर्णता निर्भर होती है, उसी भाँति उससे भी अधिक इसकी आवश्यकता किसी कार्य को ठीक रूप से पूर्ण करने के लिए होती है। किसी भी कर्तव्य को आरंभ करने के पहले यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि वह किस प्रकार आरंभ किया जाय? उसके लिये किन-किन उपकरणों और व्यक्तियों की सहायता अपेक्षित होगी? कौन हमारे विरोधी और सहायक होगे और मार्ग बाधाओं को किस भाँति ठीक किया जायगा?
भगवान् महावीर के सुन्दर जीवन से हम योजना के महत्व को ठीक रूप में हृदयंगम कर सकते हैं। आज से करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत में अत्यंत भयंकर स्थिति वर्तमान थी। चारों ओर भयंकर हिंसा, अनाचार, विलासिता और छल-कपट का अंधकार व्याप्त था। मानव में से मानवता का बीज नष्ट हो गया था और वह दानव बन गया था। मानवता का दम घोट देने वाली ऐसी भयंकर स्थिति का अवलोकन कर महामना महावीर की जाग्रत आत्मा विचलित हो गई, उसमें अगाध चिन्तन धारा उत्पन्न हुई और जीवन का एक महान लक्ष्य निर्दिष्ट हुआ। अपने जीवन के महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए उन्होंने एक योजना निर्मित की और उसे सफल बनाने के प्रयास में लग गये। उन्होंने राज पाट और कुटुम्बियों का त्याग किया, बाहर वर्ष तक अत्यंत कठोर तपस्या की, अनेकों उपसर्ग और बाधाओं को सहन किया एवं बड़े-बड़े विशाल जंगल, पहाड़ और शहरों की खाक छानी। इस भाँति एक सुन्दर योजना द्वारा उन्होंने अपने विचारों को पुष्ट और सबल बना कर भारतीय स्थिति का सुन्दर निर्माण किया। महामना महावीर के प्रभावशाली संगठन और उनके दर्शन में स्थान-स्थान पर सुन्दर योजनाओं अर्थात् व्यवस्थित कार्य पद्धतियों के दर्शन होते हैं।
महात्मा बुद्ध के जीवन में भी योजनाओं का सुन्दर सामंजस्य मिलता है। वह अपने लक्ष्य पूर्ति की किसी भी निर्मित योजना से कभी पीछे नहीं हटते थे। महामना सुकरात ने तो विष का प्याला तक पी लिया था, पर वे अपने कार्यक्रम को स्थगित करने के लिए किसी भाँति तैयार नहीं हुए थे। वे जीवन भर अपने उज्ज्वल लक्ष्य और अपनी निर्मित योजनाओं पर दृढ़ रहे। यद्यपि इसके कारण उन्हें मृत्यु का वरण करना पड़ा, तथापि आज भी संसार उन्हें महान तत्ववेत्ता, ज्ञानी, दृढ़ और सदाचारी महा मानव के रूप में स्मरण करता है। महात्मा ईसा और महामना सबोनारोला भी सदैव अपनी योजनाओं को सफल बनाने में ही संलग्न रहते थे, चाहे भले ही इसके कारण उन्हें अपने अमूल्य जीवनों से ही हाथ धोना पड़ा। कहने का साराँश यह है कि हम किसी भी महापुरुष को लें, सबके जीवन में योजनाओं का सुन्दर सामंजस्य मिलता है। बिना ठीक योजनाओं के वे कभी भी अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकते थे। अतः यदि हम भी सुफलता प्राप्त करना चाहते हैं-चाहे वह व्यापार, कारीगरी या कोई भी कार्य हो तो हमें अपने महान उद्देश्य के अंतर्गत ठोस योजनाएँ निर्मित करके कार्य आरम्भ करना और उन्हें सफल बनाना चाहिए। जीवन में यथार्थ सफलता, सुख और शाँति प्राप्त करने का यही ठोस मार्ग और उपाय है।
अब योजना निर्माण कार्य पर विचार करना आवश्यक है। व्यक्तिगत जीवन सम्बन्धी योजनाएँ दो प्रकार की होती हैं- (1) आत्म निर्माण सम्बन्धी और (2) जीवन के ‘विशिष्ट’ उद्देश्य की पूर्ति सम्बन्धी। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जब तक आत्मा का पवित्र और ठोस निर्माण नहीं होता है, तब तक प्रायः जीवन उद्देश्य की ठोस पूर्ति असंभव हैं, यद्यपि कभी-कभी इसके अभाव में भी सफलता हो जाती है, पर वह स्वतः अपने और लोक के लिए अभिशाप मय होती है। सामान्य सफलता की दृष्टि से राम और रावण दोनों सफल और विजेता थे। पर राम की सफलता जहाँ सब के लिए कल्याणकारी और उर्त्कषमयी थी, वहाँ रावण की सबके लिए, विनाशपूर्ण और अधोगतिमय थी। जीवन सिर्फ व्यक्तिगत एवं व्यर्थ की इच्छाओं की पूर्ति के लिए ही नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य उत्यन्त महान है और यह स्व-पर कल्याण और उत्कर्ष के लिए है। हमारा उद्देश्य भौतिक और आध्यात्मिक समन्वय के रूप में होना चाहिए। अतः योजना निर्माण के प्रथम हमें अपनी आत्मा का सूक्ष्म अन्वेषण करके अपने व्यक्तित्व की उच्चता, पवित्रता, सदाचारिता और प्रभावशीलता का ज्ञान प्राप्त करना उचित है। यदि आत्म अन्वेषण द्वारा हमें अपने व्यक्तित्व का हीन, निर्बल और विलास पूर्ण आधार विदित हो तो प्रथम आत्म निर्माण कार्य में सफलता प्राप्त करना आवश्यक है। हाँ, जिन लोगों का व्यक्तित्व उच्च, पवित्र, कार्य कुशल और प्रभावशाली है और जो अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों को ठीक और सफल रूप में पूर्ण करने में समर्थ है, वह जीवन-उद्देश्य की पूर्ति सम्बन्धी योजना निर्माण कर सकते हैं।
योजना निर्माण कार्य को भली भाँति समझ लेना अत्यंत आवश्यक है। योजना में प्रथम तत्व है- (1) अवधि का निश्चय और (2) उद्देश्य। जब आप इन दोनों को निश्चित कर लेते हैं, तब आपको उद्देश्य और कार्य की गुरुता के अनुकूल उसके सम्बन्ध में कार्य पद्धति का व्यवस्थित निर्माण करना पड़ता हैं। योजना का एक प्रभावशाली अंग है-प्रतिज्ञा। योजना को ठीक रूप में सफल बनाने के हेतु दृढ़ संकल्प किया जाता है। आत्म निर्माण योजना के छः विभिन्न अंग है (1) शारीरिक, (2) मानसिक, (3) आत्मिक, (4) आर्थिक, (5) पारिवारिक और (6) सामाजिक। दैनिक कार्यक्रम, पारिवारिक व्यय पत्रक और पाठ्य कार्यक्रम आदि अन्य सब कार्यक्रमों का इनके अंतर्गत समावेश हो जाता है। इसी भाँति जीवन के विशिष्ट उद्देश्य सम्बन्धी योजना का भी निर्माण किया जा सकता है। हमारे जीवन का विशिष्ट उद्देश्य चाहे राजनीति, व्यापार या कला कौशल आदि कुछ भी हो, पर योजना के ठोस, सबल और महत्वपूर्ण साधन द्वारा हम अपने क्षेत्र में सर्वाधिक सम्पन्न सफल, अग्रणी और प्रभावशाली रहेंगे।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जीवन की नियमितता, संयम, क्रिया कुशलता और प्रभाव को विकसित करती है। ज्यों-ज्यों हमारे अंतर में इनका विकास होने लगता है, त्यों-त्यों अंतर्दृष्टि सूक्ष्म, गम्भीर और विवेकशील बनती जाती है और सुख, शाँति, समृद्धि और स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त होने लगता है।
हे भगवान! मरे जीवन के शेष दिन किसी पवित्र वन में शिव-शिव-शिव जपते हुए बीते। साँप और फूलों का हार, बलवान बैरी और मित्र कोमल पुष्प शय्या और पत्थर की शिला, रत्न और पत्थर तिनका और सुन्दर कामिनी-इन सब में मेरी सम दृष्टि हो जाय। -भर्तृहरि,
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जो व्यक्ति निर्मल, चित्त, मात्सर्यहित, प्रशान्त, शुद्ध चरित्र, समस्त जीवों का सुहृद और हित वादी तथा अभिमान एवं माया से रहित होता है उसके हृदय में भगवान वासुदेव सर्वदा विराजमान रहते हैं। -विष्णुपुराण,
ब्रह्म मुहूर्त में ही जागना चाहिए!
(श्री श्रीकण्ड जी शास्त्री)
प्रातःकाल,- जिसको कि हम आगे चल कर ब्रह्मा मुहूर्त कहेंगे- जब कि प्रकृति माँ अपने दोनों हाथों से स्वास्थ्य, बुद्धि, मेधा, प्रसन्नता और सौंदर्य के अमित वरदानों को लुटा रही होती है, जब कि जीवन और प्राण शक्ति का अपूर्व भण्डार प्राणि मात्र के लिए खुला हुआ होता है, तब हम बिस्तरों में पड़े निद्रा पूरी हो जाने पर भी आलस्य वश करवटें बदल-2 कर अपने शरीर में विद्यमान इन सम्पूर्ण वस्तुओं का नाश कर रहे होते हैं। हमें यह ज्ञान भी नहीं होता कि प्रभात के उस पुण्य काल में पड़े पड़े हम प्रकृति के कितने वरदानों से वंचित हो रहे हैं।
प्रातःकाल का वह समय जिस समय मनुष्य को निद्रा को छोड़ देना चाहिए ब्रह्म मुहूर्त कहलाता है। ब्रह्म मुहूर्त का लक्षण धर्म शास्त्रों में इस प्रकार वर्णन किया है। यथाः-
रात्रेः पश्चिमयामस्य मुहूर्तो यस्तृतीयकः।
स ब्रह्म इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधन॥
अर्थात्- रात्रि के अन्तिम पहर का जो तीसरा भाग है उसको ब्रह्म मुहूर्त कहते है। निद्रा त्याग के लिए यही समय शास्त्र विहित है।
आधुनिक सभ्यता का मूर्तिमान प्रतीक रेडियो यद्यपि सूर्योदय के बाद 9 बजे सुरम्य शब्दों में-
“जागा सब संसार, उठो अब भोर भई!”
गा गा कर प्रातःकाल हो जाने की सूचना देकर आधुनिक काल को जगाता है, किन्तु वह वास्तव में प्रातःकाल तो उससे बहुत पहले हो चुका होता है।
भगवान् मनु के आदेशानुसार तो,
ब्रह्म मुहूर्ते बुध्येत
अर्थात्- उपरिलिखित ब्रह्म मुहूर्त में ही उठना चाहिए।
यदि मनुस्मृति को हम उस काल के कानून और आर्डिनैन्सों की पुस्तक स्वीकार करें जैसा कि आधुनिक गवेषक मानते हैं तो हमें मानना पड़ेगा कि मनु के समय से प्रज्ञा के लिए उपर्युक्त आदेश कानून-मानना अनिवार्य होता था और इसके विपरीत आचरण वाले के लिए दण्ड का विधान था। यथा-
ब्रह्म मुहूर्ते या निन्द्रा सा पुण्यक्षयकारिणी।
ताँ करोति द्विजो मोहात् पाद कृच्छे्रणा शुद्धयति॥
अर्थात्- चूँकि प्रातःकाल की निद्रा पुण्यों-सत्कर्मों का नाश करने वाली है इसलिए आलस्य वश जो द्विज प्रातः न उठे उसे “पाद कृच्छ” नामक व्रत करके उसका प्रायश्चित करता चाहिए।
मनु के इस नियम का उस समय सर्वत्र ही आदर के साथ पालन होता था। सभ्य मानव से राक्षस सभी इस नियम को मानते थे। भारतीय साहित्य के सबसे पुराने ऐतिहासिक ग्रन्थ श्री बाल्मीकि रामायण में हमें इस संबन्ध का बड़ा सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है।
हनुमान जी जग जननी श्री जनक नन्दिनी की खोज में अशोकवाटिका में पहुँचे हैं, रात्रि का अन्तिम प्रहर हैं। श्री बाल्मीकि जी ने लिखा हैः-
विचिन्वतश्च वैदेहीं किंचिच्छेषा निशाभवत्।
षडंग वेदविदुषाँ क्रतुप्रवरयाजिनाम्॥
शुश्राव ब्रह्म घोषान् स विरात्रे ब्रह्मरक्षसाम्॥
(बा.रा. सुन्दर सर्ग 18,-1,2 श्लोक)
अर्थात्- इस प्रकार सीता की खोज करते करते रात्रि थोड़ी शेष रह गई और तब हनुमान जी ने ब्रह्म मुहूर्त में वेदज्ञ और याज्ञिक पुरुषों द्वारा किये जाने वाले वेद पाठ को सुना।
प्रातः जागरण में जिन लाभों का ऊपर वर्णन किया गया है वह कोरा वर्णन नहीं है बल्कि स्वास्थ्य शास्त्र सम्मत है, यथा-
वर्णों कीर्ति यशः लक्ष्मी, स्वास्थ्यमायुश्च विन्दति।
ब्रह्म मुहूर्ते संजाग्रच्छ्रियं वा पकजं यथा । ।
(भैषज्य सार -93)
अर्थ-ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला पुरुष सौंदर्य, लक्ष्मी, स्वास्थ्य, आयु आदि वस्तुओं को प्राप्त करता है। उसका शरीर कमल के सदृश सुन्दर हो जाता है।
प्रातः काल उठने से इतने लाभ क्यों हैं? इस प्रश्न का उत्तर प्रातःकाल की उस प्राणप्रद वायु में निहित है जो प्राकृतिक रूप से उस समय बहा करती है। जिसके एक-एक कण में संजीवनी शक्ति का अपूर्ण संमिश्रण रहता है। यह वायु रात्रि में चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी पर बरसाये हुए अमृत बिन्दुओं को अपने साथ लेकर बहती है। इसीलिये शास्त्रों में इसे वीर वायु के नाम से स्मरण किया गया है।
जो व्यक्ति इस समय निद्रा त्याग कर चैतन्य होकर इस वायु का सेवन करते हैं उनका स्वास्थ्य सौंदर्य, मेघा और स्मरण शक्ति बढ़ती है, मन प्रफुल्लित हो जाता है और आत्मा में नव चेतनता का अनुभव होने लगता है।
इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण रात्रि के पश्चात् प्रातः जब भगवान् सूर्य उदय होने वाले होते हैं तो उनका चैतन्यमय तेज आकाश मार्ग द्वारा विस्तृत होने लगता है यदि मनुष्य इससे पहले सजग होकर स्नानादि से निवृत हो, उपस्थान द्वारा उन प्राणाधि देव भगवान सूर्य की किरणों से अपने प्राणों में उनके अतुल तेज का आह्वान करने योग्य बन जाय तो वह पुरुष दीर्घजीवी बन जाता है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त वायु का विभाग साधारणतया निमन क्रम से किया जाता है।
ऑक्सीजन वायु 21 प्रतिशत
कार्बनडाई आक्साइड वायु6 “
नाइट्रोजन वायु73 “
100 “
विज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण दिन वायु का यही प्रवाहण क्रम रहता है किन्तु प्रातः और सायं जब सन्धिकाल होता है इस क्रम में कुछ परिवर्तन हो जाता है। सूर्यास्त होने के बाद मनुष्य की प्राणशक्ति इसीलिए क्षीण पड़ जाती है कि उस समय जगत्प्राण प्रेरक भगवान सूर्य के अस्त हो जाने के कारण ऑक्सीजन अर्थात् प्राणप्रद वायु भी अपने स्वाभाविक स्तर से निम्न हो जाती है और इसी प्रकार प्रातःकाल के समय उस वायु के अत्यधिक बढ़ जाने के कारण स्वास्थ्य सम्पादन में उसका समुचित उपयोग किया जाना चाहिए। यही इसका वैज्ञानिक रहस्य है।
संसार के सभी महापुरुषों ने प्रकृति के इस अलभ्य वरदान से बड़ा लाभ उठाया है।
विश्ववैद्य महात्मा गाँधी प्रतिदिन रात्रि में 3 बजे उठ कर ही अपने दैनिक कार्यों में लग जाया करते थे। पिछले पत्रों के उत्तर, समाचार पत्रों के लिए लेख तथा सन्देशादि वे इसी समय तैयार किया करते थे। लिखने-पढ़ने के लिए तो इससे उपयुक्त समय हो ही नहीं सकता। एकान्त और सर्वथा शान्त वायु मंडल में जब कि मस्तिष्क बिल्कुल उर्वर होता है ज्ञान तन्तु रात्रि के विश्राम के बाद नवशक्ति युक्त होते हैं, मनुष्य यदि कोई बौद्धिक कार्य करे तो वह उसे उसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पड़ेगा। इसलिए हमें प्रकृति के इस अमूल्य वरदान से लाभ उठाना चाहिये और अभ्यास करना चाहिए कि हम प्रति दिन प्रातः उठ बैठे। इस अभ्यास के लिए एक साधारण सा उपाय कार्य में लाया जा सकता है। रात्रि को सोते समय ईश्वर स्मरण के अनन्तर हमें अपनी चैतन्य आत्मा से अपना प्रातः चार बजे उठने का संकल्प जलता देना चाहिए और कहना चाहिये “मुझे प्रातः चार बजे जगा देना”। यह शत-प्रतिशत अनुभव की बात है कि प्रातः चार बजे आपकी अवश्य ही नींद खुल जायगी और यदि फिर आलस्य में आप न पड़े रहे तो फिर बिना किसी घड़ी की सहायता के उठने लगेंगे।
पिछली जनगणना के अनुसार भारत में भिखमंगों की संख्या करीब साठ लाख है। यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसकी सम्मिलित शक्ति का अन्दाज लगाने में सिर चकराने लगता है। गत महायुद्ध में रूस ने इतना बड़ा पराक्रम दिखाया था जिसे देखकर दुनिया दंग रह गई यह पराक्रम दिखाने वाले, भारत के भिखमंगों से संख्या में कम ही थे, अधिक नहीं। इतनी बंडी जनशक्ति का निरर्थक होना, उसके भरण पोषण का भार गरीब जनता पर पड़ना, एक दुर्भाग्य की बात है। इसमें राष्ट्र-शक्ति का बड़ा अपव्यय होता है।
हम देखते हैं कि नाना प्रकार की वेषभूषा, नाना प्रकार के आडम्बर बनाये, नाना प्रकार के बहाने बनाकर एक बड़ा भारी जन समूह भिक्षा को अपना व्यवसाय बनाये हुए है। जैसे दुकानदारों में से किसी को कम किसी को अधिक मुनाफा होता है वैसे ही इन भिक्षा व्यवसाइयों में किसी को कम किसी को अधिक पैसा तथा सम्मान प्राप्त होता है, फिर भी जिस प्रकार हर एक दुकानदार अपना खर्च अपने व्यापार से चला लेता है उसी प्रकार यह भिक्षुक भी अपनी जीविका भीख माँग कर कमा लेते है। कहने का तात्पर्य यह है कि भिक्षा व्यवसाय के मार्ग में ऐसी कोई बाधा नहीं है जिससे भिक्षुकों को किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव हो और वे उसके कारण कोई दूसरा मार्ग चुनने की बात सोचें। ऐसे निरापद व्यवसाय में अधिक व्यवसाइयों का प्रवेश करना बिल्कुल स्वभाविक है। यही कारण है कि सरकारी जनगणना के अनुसार भिक्षुकों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जाती है। एक हिसाब लगाने वाले ने बताया है कि जिस तेजी से आजकल भिक्षुक बढ़ रहे हैं यदि यही क्रम जारी रहा तो तीन सौ वर्ष में पूरा भारत भिक्षुक हो जायेगा, हर एक नर-नारी, तूँवी, लोटा, कमंडल, मृगछाला लिए एक दूसरे से भिक्षा की याचना करता दृष्टिगोचर होगा।
भिक्षुकों की समस्या हमारे देश की एक बड़ी ही गंभीर और महत्वपूर्ण समस्या है। यह दिन दिन और अधिक उलझती एवं पेचीदा होती जाती है तथा ऐसा रूप धारण करती जाती है जिसे देखकर हर एक विचारशील व्यक्ति को चिन्तित होना पड़ता है। भिक्षा व्यवसाय के फलने फूलने से देश की असाधारण क्षति हो रही है। एक प्रकार से नहीं अनेकों प्रकार से यह घृणित व्यवसाय बड़े-बड़े भयानक परिणामों की सृष्टि करता है। आर्थिक दृष्टि से लीजिए-साठ लाख भिक्षुकों में से हर एक का खाने पहनने व्यसन तथा आडम्बर रचने का खर्च आठ आना प्रतिदिन प्रति भिक्षुक मान लिया जाय तो प्रतिदिन यह खर्च तीस लाख रुपया होता है अर्थात् एक अरब साढ़े नौ करोड़ रुपया प्रतिवर्ष यह लोग फूँक देते हैं। इतना बड़ा बोझ भारत जैसे गरीब देश के लिए उठाना बहुत ही कठिन है। इतनी रकम निरर्थक रीति से खर्च हो जाने में उसकी नाड़ियों का मूल्यवान रक्त बेकार चला जाता है। देश के जर्जर शरीर में इतना फालतू रक्त नहीं है कि वह एक अरब साढ़े नौ करोड़ रुपया प्रतिवर्ष लगातार बेकार खर्च करता रहे। यह रकम इतनी बड़ी है कि यदि शिक्षा में इसे खर्च किया जाय तो हिन्दुस्तान भर के सोलह वर्ष से कम आयु के बालकों में से आधे बालकों की पढ़ाई का खर्च चल सकता है। अगर इतना रुपया उद्योग धंधों के विकास में लगाया जाय तो एक करोड़ आदमियों को धन्धा मिल सकता है। इतने पैसे से देश की चौथाई जमीन की सिंचाई कर सकने वाली नहरें चल सकती हैं, जबकि संसार का हर एक देश अपनी राष्ट्रीय सम्पत्ति की एक-एक पाई का सदुपयोग करने की बात सोच रहा है तब हम भारतीय अपनी इतनी बड़ी सम्पत्ति के अपव्यय की ओर से आँख बन्द करके उपेक्षा भाव से नहीं बैठ सकते।
साठ लाख व्यक्तियों को मुफ्त भोजन देने का भार बहुत अधिक है। इतने लोगों की शक्तियाँ यदि अन्न, वस्त्र आदि के उत्पादन में लगें तो यह लोग तीन चार करोड़ आदमियों की आवश्यकता पूर्ण करने योग्य सामग्री और तैयार कर सकते हैं। यदि इतनी शक्तियों का सदुपयोग हुआ होता तो अन्न वस्त्र का जो अभाव आज दिख रहा है न हुआ होता। लाखों मनुष्य को भूख से तड़प-तड़प कर मरने और करोड़ों को अधनंगा रहने की नौबत न आती। यदि हमारे एक हाथ को लकवा मार जाय, वह निकम्मा हो जाय तो सारे शरीर की कठिनाई बढ़ जाती है, उस एक हाथ की निष्क्रियता के फलस्वरूप सारे शरीर को कष्ट भोगना पड़ता है, इसी प्रकार साठ लाख व्यक्तियों की उत्पादन शक्ति से वंचित रहना और उलटे उन्हें मुफ्त में भोजन तथा आडम्बरों का खर्च देना यह देश के लिये दुहरी हानि है।
उपरोक्त दो हानियाँ ही इन भिक्षा व्यवसाइयों द्वारा हुई होती तो भी उनका भार उठाना कठिन था। पर बात यहीं तक सीमित नहीं रहती उनके द्वारा जो अन्य हानियाँ होती है वे इनसे भी अधिक भयानक और असह्य हैं। इन भिक्षुकों में से अधिकाँश ऐसे हैं जो न तो अपाहिज हैं और न लोक सेवा में दिन रात जुटे हुए ब्रह्मनिष्ठ महात्मा हैं। यह तो निट्ठले, कामचोर, अयोग्य और हरामखोर मात्र हैं। भिक्षा माँगने के दो ही कारण हैं- (1) आपत्तिग्रस्त होना (2) लोक सेवा का ठोस कार्य करना। इन दोनों में से एक भी बात जिनके पास नहीं उसे माँगने के लिए कुछ न कुछ बहाना चाहिए। बेकार दिमाग शैतान की दुकान कहा जाता है उसमें बहानेबाजी की बातें आसानी से सूझ जाती हैं। धर्म की आड लेकर ऐसे-ऐसे अन्धविश्वास, आडम्बर, मायाचार, रचते हैं जो उन्हें अधिक धन भले ही प्राप्त करा दें, पर जनसाधारण के लिए वे सब प्रकार अहितकर ही होते हैं।
मुफ्तखोरी एक भारी अभिशाप है। यह जहाँ निवास करती है वहाँ अनैतिकता का पूरा साम्राज्य छा जाता है। मुफ्त का पैसा नशेबाजी, व्यभिचार, आलस्य, प्रमाद, कलह, ईर्ष्या, द्वेष, संकीर्णता, छल, दंभ, निष्ठुरता, क्रूरता, मिथ्या, भाषण, धोखा, चोरी, जुआ आदि नाना प्रकार के दुर्गुणों की सृष्टि करता है, जो लोग मुफ्त का पैसा पाते हैं उनमें यह या ऐसे ही अन्य दुर्गुण अपने आप पैदा होने लगते हैं। दुर्गुण एक प्रकार से छूत के रोग हें जो एक से दूसरे को लगते है। एक सत्पुरुष के लिए दूसरों को सत्पुरुष बनाना कठिन है पर एक दुर्जन के लिए यह आसान है कि वह अपने दुर्गुणों को पड़ौस के अनेक आदमियों में फैला दे। यह भिखमंगे जहाँ भी रहते और आते जाते हैं वहीं छछूंदर की तरह दुर्गुणों की दुर्गन्ध बखेरते है वहीं अशान्ति, अनाचार और घृणा का वातावरण उत्पन्न करते हैं।
अधिक विचार करने से यह प्रकट हो जाता है कि समस्या असाधारण है। इधर अधिक समय तक उपेक्षा वृत्ति जारी रखने से भयंकर परिणाम उत्पन्न होने की संभावना है। (1) साठ लाख व्यक्तियों की शक्ति का निष्क्रिय पड़ा रहना, (2) मुफ्त भोजन पाने के कारण उन भिक्षुकों में नाना विधि उत्पन्न होने वाले दोष (3) उन दोषों की जनता में विस्तार (4) इतनी बड़ी पलटन के पालन पोषण का भारी खर्च (5) भिक्षुक अपनी उपयोगिता प्रकट करने के लिए जो नाना विधि पाखंड रचते हैं, उनसे बर्बादी (6) इन सब खुराफातों से उत्पन्न होने वाला, जातीय अनर्थ। इस प्रकार के और भी अन्य अनेक अनर्थ हैं जो भिक्षा व्यवसाय के सामूहिक विकास के कारण उत्पन्न होते हैं।
प्राचीन समय में ऋषि, मुनि, ब्राह्मण,त्यागी, तपस्वी, संन्यासी, भिक्षा माँगने थे। वे इसलिये माँगते थे, कि उन्हें माँगने का अधिकार था। उनका जीवन अपनी निज की सम्पत्ति नहीं रहता था, वे लोकसेवा में अपना सारा समय लगाते थे। ऋषियों के एक-एक आश्रम में हजारों छात्र शिक्षा पाते थे। चिकित्सा संबंधी अनेकानेक अनुसंधान होते थे, दुर्लभ औषधियों की खोज और निर्माण व्यवस्था जारी रहती थी। धर्म, राजनीति स्वास्थ्य, शिक्षा, साहित्य, न्याय, अर्थ, आदि विविध विषयों पर गंभीर मनन होते थे और महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे जाते थे। शास्त्र विद्या से लेकर शिल्प विद्या तक की वैज्ञानिक शिक्षा उन आश्रमों से प्रादुर्भूत होती थी। खगोल विद्या, भूगर्भ विद्या, आदि अनेकानेक विद्याओं की महत्वपूर्ण प्रयोगशालाएँ वहाँ रहती थीं। इतने महानतम राष्ट्रोपयोगी कार्य करते हुये भी वे ऋषि सर्वथा निस्पृह, त्यागी थे। ऐसे महाभाग तपस्वी अपनी शरीर रक्षा के लिए और अपने वैज्ञानिक कार्यों के लिए भिक्षा माँगने के अधिकारी थे। उनको श्रद्धा से नत मस्तक होकर लोग दान देते थे। जिनकी कमाई अपवित्र होती थी उनकी भिक्षा लेने से वे लोग इनकार कर देते थे। आज ऐसे भिक्षुक कहाँ है?
अपाहिज, अनाथ, असमर्थ एवं आपत्तिग्रस्त व्यक्ति भिक्षा के अधिकारी हैं। और जो लोक सेवा में अपने जीवन को सर्वतोभावेन लगाये हुए हैं, उन्हें भी भिक्षा पर निर्भर रहने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त ऐसे भिक्षुक जो भिक्षा को एक पेशा बनाये हुए हैं, हाथ पाँव से स्वस्थ रहते हुए भी अकारण भीख माँगते हैं, वे अवाँछनीय हैं। ऐसे लोगों को दिया हुआ दान, एक प्रकार से अनीति की वृद्धि को महत्व देना है, इसलिए किसी भिक्षुक को दान देने से पूर्व यह विचार कर लेना आवश्यक है कि दान का दुरुपयोग तो न होगा?
एक समय था जब भिक्षु संस्था परम पुनीत श्रद्धा, सम्मान और अत्यन्त गौरव की चीज थी। भिक्षुकों को द्वार पर देख कर गृहस्थ अपने सौभाग्य पर नाचने लगता था। बलि, हरिश्चन्द्र, दशरथ, कर्ण, मोरध्वज जैसे अनेकों ने भिक्षुकों के हाथ पसारते ही उनके मन चाही चीजें दे डाली थीं पर आज तो यह भिक्षा-वृत्ति एक अभिशाप के रूप में हमारे सामने खड़ी है। और यह सोचने के लिए विवश कर रही है कि इस सामाजिक क्लेश से अपनी जाति का पिण्ड कैसे छुड़ाया जा सकता है।
(श्री वैद्यराज गुरु शरण दत्त त्रिपाठी)
अभी तक तो ऐसा था कि किसी स्थूल और भारी भरकम शरीर को देखकर लोग हंसी उड़ाया करते थे और ऐसा मनुष्य एक मनोरंजन की चीज बन जाता था। लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों से डाक्टरों की गम्भीर खोज से यह नतीजा निकला कि मोटापा भी एक किस्म की बीमारी है जिसका इलाज होना चाहिये वरना वह दूसरे और रोगों को भी उभार सकता है। पश्चिम के आधुनिक विज्ञान वेताओं ने इस पर सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित की और अनेक प्रकार की कसरतें निकाली जिससे मोटापे के रोगों में लाभ हो सके। शरीर में बढ़ती हुई इस फिजूल चर्बी को रोकने के लिए वहाँ नये से नये आविष्कार हो रहे हैं। कुछ तो ऐसे नियमित भोजन पर भी जोर दिया जा रहा है जिससे यह रोग बढ़ नहीं सके। जैसे जैसे मर्ज फैलता गया वैसे वैसे डाक्टरों की गम चिन्ता और खोज भी बढ़ती गई। मोटापे को अब हंसी मखौल का विषय नहीं समझा जा रहा है।
वह लोग जो मोटे हो जाते हैं पहले तो कुछ ध्यान नहीं देते किन्तु बाद में स्वयं उनको ही मोटापा अखरने लगता है और उसको कम करने के उपाय वे ढूंढ़ने लगते हैं। कुछ तरकीबें ऐसी जरूर हैं जो मोटापे में फायदा करती हैं किन्तु उनका समुचित प्रयोग न होने के कारण स्थायी लाभ नहीं होने पाता, देर काफी हो जाती है। किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि यदि नियमित रूप से शास्त्रीय पद्धति पर अमल किया जाय तो लाभ होना निर्विवाद है।
जिन आदमियों में मोटापे के लक्षण दिखाई देने लगे उन्हें प्रारम्भ में ही उसकी ओर तवज्जह देना चाहिये। मर्ज बढ़ने पर आदमी बेकार सा हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि 40 वर्ष से ऊपर के स्त्री पुरुष ही अधिक मोटे दिखाई देते हैं। इसके अलावा डाक्टरों की राय में 45 वर्ष की अवस्था के बाद यदि कुछ खफीफ सा मोटापा हो जाय तो वह लाभदायक बतलाया जाता है। कहते हैं कि थोड़ी स्थूलता बढ़ जाने से स्पर्श जन्य रोगों से बचाव होता रहता है। इसके साथ-साथ यह भी कहा जाता है कि प्रौढ़ावस्था में शरीर का कुछ हल्कापन होना स्वास्थ्य के लिये लाभकारी होता है जिससे हृदय रक्त और गुर्दे की बीमारियाँ जल्द ही अपना असर न कर पायें।
अब विचारणीय यह है कि मोटापे को आखिर हम इतना गम्भीर विषय क्यों समझें। पहली बात तो यह है कि मोटे हो जाने से मनुष्य की आकृति बहुत कुछ गन्दी हो जाती है। इसके अलावा मोटापा ऐसा रोग है जिससे बहुत सी बीमारियां होने की सम्भावना रहती है। मोटापे से नसों और पुट्ठों पर ज्यादा जोर पड़ता है और शरीर के प्रधान पुट्ठे अपना कार्य करने में कमजोर पड़ जाते हैं। मोटापे की वजह से इन्द्रियों की हरकत शिथिल हो जाती है और पेट की नसों पर इसका बुरा असर पड़ता है जिसके फलस्वरूप कब्ज और बदहजमी हो जाती है तथा बवासीर होने की भी सम्भावना रहती है। प्रकृत बल भी घट जाता है। इन सब बातों में कब्ज एक ऐसा मर्ज है जो अमूमन मोटे आदमियों को हो जाता है।
जो भयंकर बीमारी मोटापे की वजह से हो जाती है वह है प्रमेह और मधुमेह। यह बीमारी मोटे आदमियों में प्रायः होती है। दिल और रक्त पर भी काफी असर पहुँचता है जिसके परिणाम स्वरूप खून का दबाव बढ़ जाता है। गुर्दे में भी तकलीफ हो जाती है ‘मृगी’ होने का भी अन्देशा रहता हैं इसमें सन्देह नहीं कि मोटे आदमियों का दिल ज्यादा मजबूत नहीं रहने पाता। डाक्टरों की राय से मोटे आदमियों के दिल में काफी कमजोरी आ जाती है और इसके अलावा मोटापे का रोगी चीर फाड़ के काम के लिये तो एक खतरा होता है। आपरेशन के काम के लिये जितना दुबला पतला आदमी मौजूद होता है, मोटा आदमी उतना ही अनुपयुक्त।
अधिक स्थूलता से मस्तिष्क के कई तारों तथा जोड़ों ओर हड्डियों में वाज मर्तवा उल्टा असर पड़ता है। शरीर पर अधिक चर्बी होने से मानसिक परिवर्तन भी हो जाता है और मनुष्य की प्रतिभा कुछ क्षीण पड़ जाती है। मोटे आदमी सहनशील और सीधे होते हैं किंतु यह बात उनकी बढ़ती हुई मानसिक सुस्ती और बेकारी को छुपाने के लिये आड़ मात्र है। जैसे-जैसे मोटापा बढ़ने लगती है। प्रकृत स्वास्थ्य के लिये तो मोटापा घातक है।
स्वास्थ्य के लिये मनुष्य को तीन बातों की आवश्यकता होती है-भोजन, व्यायाम तथा आराम। मनुष्य चाहे जितना बलवान अथवा मोटा क्यों न हो पर उसे उपयुक्त आवश्यकताओं का अनुभव अवश्य होगा। नीचे शरीर की चर्बी बढ़ने के कुछ कारण बताये जाते हैं-
(1) अपने शरीर की रक्षा के लिये हम नित्य भोजन करते हैं जिसका कुछ भाग हमारी खोई हुई शक्ति को पूरा करता है, कुछ हमारा शरीर बढ़ाता है और शेष मल के रूप में बाहर निकल जाता है। बहुधा हमारा न पचा हुआ भोजन चर्बी के रूप में हमारे शरीर में एकत्र हो जाता है इस प्रकार धीरे-धीरे चर्बी बढ़ने लगती है और शरीर मोटा होने लगता है क्योंकि चर्बी को बाहर निकालने का कोई मार्ग नहीं।
(2) मदिरा पान से भी चर्बी बढ़ती है।
(3) जो मनुष्य अधिक भोजन करता है, शराब पीता है और व्यायाम नहीं करता वह अवश्य मोटा हो जाता है।
(4) बहुधा देखा जाता है कि शरीर की मुटाई पैतृक भी होती है। मोटे बाप का बेटा मोटा होता है। परन्तु यदि ऐसे लोग तनिक ध्यान दें तथा नियमपूर्वक प्रतिदिन व्यायाम करें तो उनके शरीर की चर्बी पिघल कर बाहर निकल सकती है।
शरीर की चर्बी को कम करने के लिये निम्नलिखित साधनों का प्रयोग किया जा सकता है-
दूध, घी और मक्खन का प्रयोग कम करें। चावल तथा चीनी कम खाओ। प्रातःकाल चावल और संध्या समय चंदोसी गेहूँ की रोटी खानी चाहिये। कुछ लोगों की धारणा है कि अधिक भोजन के कारण उत्पन्न हुई चर्बी को व्रत द्वारा कम करना चाहिये। परन्तु यह नितान्त भ्रम मूलक है। चर्बी को कम करने के लिए हमें अपने भोजन से चर्बी बढ़ाने वाले पदार्थों को ही कम करना चाहिये और आवश्यकता से कम भोजन करने की आदत छोड़नी चाहिए। कभी कभी बहुत व्रत रखने अथवा चर्बी कम करने के लिए अधिक व्यायाम करने से हृदय को बहुत हानि होने की सम्भावना होती है।
चर्बी को कम करने के लिए व्यायाम बहुत आवश्यक है। अतएव ऐसे व्यायाम अधिक करने चाहिये। जिनसे शरीर के उन अंगों के अवयवों को काम करना पड़े जहाँ चर्बी एकत्र होती है। विशेष कर चर्बी कमर में एकत्र होती है। अतः सत्संबंधी कुछ व्यायाम यहाँ दिये जाते हैं।
(1) पृथ्वी पर चित्त लेट जाओ। अपने दाहिने पैर को शरीर से 90 का कोण बनाता हुआ ऊपर उठाओ, फिर उसे पृथ्वी पर रख दो। इसी प्रकार बायें पैर से करो। पैर उठाते समय साँस लो और पैर गिराते समय साँस बाहर निकालो। यह व्यायाम हर पैर से कम से कम 20 बार करो।
(2) पहले की भाँति चित्त लेट जाओ। एक पैर के स्थान पर दोनों एक साथ पहले की ही भाँति ऊपर उठाओ फिर धीरे-धीरे नीचे गिराओ। साँस पहले व्यायाम की भाँति लो। यह व्यायाम भी 20 बार करो।
(3) नं 2 की भाँति लेट कर पैर सीधा ऊपर उठाओ। फिर शीघ्रता से एक-एक पैर सिकोड़ो और सीधा करो। जब दाहिना पैर सीधा करो तब बायाँ सिकोड़ लो।
(4) एक फुट की दूरी देकर दोनों पैरों के बल सीधे खड़े हो जाओ। साँस भीतर खींचो और बिना पैर झुकाये शरीर को कमर से झुकाओ। हाथों को दोनों पैरों के बीच में जाने दो। साँस बाहर निकालो और फिर पहली स्थिति में खड़े हो जाओ। यह क्रिया 10-15 बार करनी चाहिये।
(5) दोनों पैरों के बीच में एक फुट की जगह देकर सीधे खड़े हो जाओ। दोनों हाथ ऊपर उठाओ जिससे हथेलियाँ आपस में मिल जायं। साँस भीतर खींच कर झुको और पृथ्वी को अपने हाथों से छुओ। फिर पहली स्थिति में खड़े हो जाओ। साँस बाहर निकाल दो।
(6) अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर खड़े हो शरीर को आगे की ओर झुकाओ। अब अपने शरीर को दाहिनी ओर से बाँई ओर की ओर घुमाओ। इन व्यायामों के अतिरिक्त दौड़ना भी चर्बी कम करने में सहायक होता है।
(डा. लक्ष्मी नारायण टंडन, प्रेमी)
दूध, कुछ विशेष अवस्थाओं को छोड़ कर, सर्वोत्तम अहार है। प्रायः सभी आवश्यक तत्व, संतुलित अनुपात से इसमें मौजूद रहते हैं। दूध से उतर कर दही होता है। जिन्हें दूध न पचे वह दही का प्रयोग करे। पेट के रोगियों के लिए मट्ठा तथा मखनियाँ दूध अत्यन्त लाभप्रद होता है। मलाई भी अच्छी चीज है। पर खोया भारी चीज है। पनीर का प्रयोग प्रायः सर्वसाधारण भारतीय नहीं करते। इसमें प्रोटीन बहुत होता है। मक्खन तथा घी भी इसमें निकाला जाता है। वह भी बड़ी लाभ की वस्तु है। गाय, भैंस, बकरी के दूध का ही प्रायः भारतीय प्रयोग करते हैं। इनसे चर्बी तथा गरमी खूब मिलती है।
अनाजों में गेहूँ सर्वोत्तम है। चोकरदार घर की चक्की में पिसा आटा या दलिया सर्वोत्तम है। जौ भी अच्छी चीज है। चावल का प्रयोग भी बंगाल-बिहार-आसाम में बहुत होता है। घर में तैयार किये (मशीन से तैयार नहीं) चावल अच्छे होते है। यद्यपि वह गेहूँ जैसे पोषक तत्व नहीं रखते। चावल खाने वालों को फल तरकारी का प्रयोग अधिक करना चाहिये। दालों में मसूर की दाल सर्वोत्तम है, फिर मूँग की दाल। उर्दू की दाल सब से भारी होती है। दाल भी छिलके लगी खायें। इनसे, स्टार्च प्रोटीन आदि मिलता है।
सोयाबीन, शाक, हरी तथा अन्य तरकारियाँ भी बहुत लाभ दायक होती हैं। कद्दू, बैंगन, घीया आदि का अधिक प्रयोग बादी तथा भारी होने के कारण न करना चाहिये। कच्ची, तरकारी, शाक खाना बहुत अच्छा है जैसे खीरा, ककड़ी हरे चने, टमाटर, गाजर, मूली, गोभी, पता गोभी, फलियाँ, पालक, बथुई, सलाद आदि। तरकारी उबली खाई जाय, छिलकों सहित लें तो अच्छा है। इनमें लवण आदि खूब मिलते हैं।
ताजे फल खाना बहुत लाभप्रद है। अधिक खट्टे और चटपटे फल जैसे कमरख कैथा आदि का प्रयोग अत्यधिक न करे। इनसे लवण पर्याप्त मिलता है।
सूखे मेवे भी बहुत लाभ की चीज हैं। इनमें प्रोटीन खूब मिलता है। इनके सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है।
कुछ हानिप्रद वस्तुएं-
माँस बुरी चीज है। जिसे मारो उसके हृदय की आह कितनी बुरी होती है। इसे जाने भी दीजिये। धर्म अधर्म का विचार मत कीजिये। पर बुड्ढे, रोगी पशुओं का माँस कैसा होगा? मरने के बाद शीघ्रता से कैसे दूषित होता जाता है, माँस देर में हजम होता है यह देर तक आँतों में पड़ा रह कर सड़ेगा तो क्या होगा? गोश्त में जो मृत कोषाणु होंगे उसका हमारे पेट पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन बातों पर विचार करने से भी माँस त्याज्य ही है। वैसे ही मछली और अंडे के बारे में कहा जा सकता हैं। इनमें प्रोटीन बहुत होता है। यह याद रखिए कि हमारे शरीर को एक सीमित मात्रा में ही इसकी आवश्यकता हैं। शेष मात्र तो यूरिक एसिड के रूप में पेशाब द्वारा निकल जाती है। यदि आवश्यकता से अधिक प्रोटीन खाई जायगी तो जिगर और गुर्दों पर अत्यधिक बोझ में यूरिक एसिड बढ़ेगा, वे रोगी और कमजोर हो जायेंगे। कठिन परिश्रम करने वाले ही यदा कदा इसे हजम कर सकते हैं। सर्वसाधारण नहीं।
शक्कर और गुड़ भी अनुपयोगी हैं विशेष कर सफेद शकर। यह गर्मी देने के अतिरिक्त कुछ नहीं करती। कठिन परिश्रम करने वाले ही इसे खा सकते हैं।
चाय-कहवा, काफी आदि भी कब्ज करते, खुश्की पैदा करते और वीर्य पतला करते हैं। इन्हें आवश्यकता होने पर ही पियें।
बाजार की मिठाइयाँ, डिब्बों के भोजन, बर्फ, मलाई की बर्फ, तथा खटाई-मिर्च तथा मसाले का अधिक प्रयोग भी हानिप्रद है।
सिगरेट बीड़ी तम्बाकू का निकोटीन भी स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है। यह सब रुधिर को दूषित करते, दिल फेफड़े और दिमाग को कमजोर बनाते, वीर्य को पतला करते, सन्तानोत्पादक अंगों में खराबी पैदा करते तथा अनेक रोगों के कारण बनते हैं। जीभ के लिए अपनी आयु को खोना कहाँ की बुद्धिमानी है?
(मूल ले.- महात्मा शैख सादी। अनु. डा. गोपाल प्रसाद ‘वंशी’ )
“तुम्हारे पाँव के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो यदि तुम हाथी के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुख को अपने दुख से तुलना किये बिना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।”
किसी बादशाह को ऐसा भयंकर रोग था, जिसका यहाँ वर्णन करना उचित नहीं है। कई यूनानी हकीमों ने मिल कर यह राय ठहराई कि एक खास तरह के आदमी के पीत के सिवाय इस बीमारी का और इलाज नहीं है। बादशाह ने इस तरह के आदमी की तलाश करने का हुक्म दिया। लोगों ने एक किसान के लड़के में वह सब गुण मौजूद पाये। बादशाह ने उस लड़के के माँ-बाप को बुलवाया और उन्हें बहुत सा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने यह फैसला किया कि बादशाह को बीमारी से आराम करने के लिए एक रिआया का खून बहाना न्याय संगत है। जब जल्लाद ने उसे मारने की तैयारी की, तब वह बालक आकाश की ओर देख कर हँसा। बादशाह ने उस बालक से पूछा, “इस अवस्था में ऐसी क्या बात हुई, जिससे तुझे खुशी हुई? “उसने जवाब दिया “बालक माँ-बाप के प्रेम पर निर्भर रहते हैं, मुकदमों का समावंश काजी करता है। मेरे माता-पिता की मति थोथे साँसारिक लोभ से भ्रष्ट हो गई है कि मेरा खून बहाने पर राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राण दण्ड की सजा दे दी है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिये, मेरी मृत्यु पर राजी हो गये हैं। ऐसी दशा में, अब ईश्वर के सिवाय किसकी शरण जाऊं? “बादशाह इस बात को सुनकर बहुत ही दुखी हुये और आंखों में आंसू भर कर बोला, “निर्दोष मनुष्य का खून बहाने की अपेक्षा मेरा ही मर जाना अच्छा है।” बादशाह ने उस बालक के सिर और आंखें चूम कर गले से लगाया और उसको बहुत सा इनाम देकर छोड़ दिया।
लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोग मुक्त हो गया। इस किस्से से ठीक मेल खाता हुआ एक पद मुझे याद पड़ता है। फलीवान महावत ने नील नदी के किनारे सुनाया था, “अगर तुम्हें अपने पैर के नीचे दबी हुई चींटी की अवस्था का ज्ञान हो, तो तुमको समझना चाहिए कि चींटी की वैसी हालत है जैसी हाथी के पैर के नीचे दबने पर तुम्हारी हो।”
तात्पर्य यह है कि हमें सब जीवों को अपने समान समझना चाहिये। दूसरों को कष्ट न पहुँचाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कैसा दुख होगा।
(श्री भीकम शाह “भारतीय” शिवगंज)
मनुष्य को सात्विक व न्याय प्रिय होने के अलावा प्रेम और मिलन सारी की आवश्यकता है। जिस मनुष्य का हृदय प्रेम पूर्ण न हो उसे बहुत अंशों में मनुष्य न मानना चाहिये। प्रेम मनुष्य के दुःख को घटाने और सुखों को बढ़ाने में बड़ा भारी सहायक होते हैं। जिस मनुष्य में प्रेम की जितनी अधिक मात्रा होगी वह संसार की विपत्तियों से उतना ही अधिक बचा रहेगा। इसके अतिरिक्त मन को सात्विक बनाने के लिये भी प्रेम की बड़ी आवश्यकता होती है। प्रेमपूर्ण व्यवहार का प्रभाव मनुष्य पर कठोर दंड की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। प्रेम की सहायता से मनुष्य अपना मन भी पवित्र एवं प्रसन्न कर सकता है।
प्रेम से कोमलता, सुख-शान्ति ममता और सद्भाव आदि अनेक गुणों की उत्पत्ति होती है और इसी की सहायता से मनुष्य बुरी बातों का त्याग करके अच्छी बातें स्वीकार करता है। प्रेम हमारे सच्चे मित्रों और सहायकों की संख्या बढ़ाकर हमारे मार्ग के समस्त कंटकों को दूर करता है। केवल सुविचार से ही मनुष्य में सद्गुणों की उत्पत्ति नहीं हो सकती। हमारा हृदय क्षेत्र है, सुविचार बीज है। प्रेम वह अमृत है, जिससे यह क्षेत्र सींचा जाता है। और सद्गुण उस क्षेत्र में होने वाले फल है। जब तक हमारा हृदय प्रेमामृत से सींचा न जायेगा, तब तक उसमें सद्गुण उत्पन्न न होगे। एक महापुरुष का उपदेश है “यदि हमें ईश्वर से कुछ माँगना हो तो सदा प्रेम की भिक्षा ही माँगनी चाहिये।”
प्रेम एक ऐसी अलौकिक शक्ति है जिससे मनुष्य को अनन्त लाभ होते हैं। प्रेम से मानसिक विकार दूर होते हैं। विचारो में कोमलता आती है, सद्गुणों की सृष्टि होती है। दुःखों का नाश और सुखों की वृद्धि होती है। यहाँ तक कि मनुष्य की आयु और सम्पदा भी बढ़ती है। जो मनुष्य अपने हृदय से प्रेम भाव निकाल देता है। वह मानो अपने जीवन का सर्वोत्तम अंश नष्ट कर देता है। प्रेम ही मनुष्य को साहसी वीर और सहनशील बनाता है। प्रेम ही के कारण माता अपने पुत्र के लिए अत्यंत कष्ट सहती और स्वयं सब प्रकार के दुःख भोग कर उसे सुख देती है। माताओं को बहुधा ऐसी अवस्थाओं में रहना पड़ता है, जिससे यदि उन्हें प्रेम का सहारा न हो तो, वे बहुत शीघ्र बीमार हो जाये । पर वह प्रेम उन्हें रोगी होने से बचाता है। उल्टे शुद्ध प्रेम बलिष्ठ और सुन्दर बनाता है। बिना प्रेम के अच्छी से अच्छी सुख सामग्री हमें तनिक भी प्रसन्न नहीं कर सकती पर प्रेम सहायता से हम बिना किसी सुख सामग्री के परम सुखी हो सकते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रेम से संसार की समस्त उत्तम बातों की सृष्टि होती है और समस्त बुरी बातों का नाश होता है।
संसार में सुख और प्रतिष्ठापूर्वक रहने के लिये उदार, नम्र एवं शिष्ट होना चाहिए। इन गुणों वाला मनुष्य वही हो सकता है’- जिसका हृदय प्रेमपूर्ण है संसार में हमारे बहुत से काम केवल मिलन सारी से निकल सकते हैं। जिस मनुष्य का स्वभाव प्रेमपूर्ण और मिलनसार होता है उसे सब स्थानों पर सब अवस्थाओं में मित्र और सहायक मिल जाते हैं। हम नित्यप्रति यह देखते हैं कि मिलन सार मनुष्य के कठिन काम बहुत ही सहज में हो जाते है। और जिस मनुष्य का स्वभाव मिलनसार नहीं होता उसके साधारण काम भी रुक जाते हैं।
बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें
(1) सूर्य चिकित्सा विज्ञान। (2) प्राण चिकित्सा विज्ञान। (3) स्वस्थ और सुन्दर बनने की अद्भुत विद्या। (4) भोग में योग। (5) बुद्धि बढ़ाने के उपाय। (6) आसन और प्राणायाम। (7) तुलसी के अमृतोपम गुण। (8) महान जागरण। (9) तुम महान हो। (10) घरेलू चिकित्सा। (11) बिना औषधि के कायाकल्प। (12) पंच तत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण। (13) दीर्घ जीवन के रहस्य। (14) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा। (15) स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा। (16) दूध की आश्चर्यजनक शक्ति। (17) उन्नति का मूल मंत्र- ब्रह्मचर्य। (18) उपवास के चमत्कार। (19) स्त्री रोग चिकित्सा। (20) बाल रोग चिकित्सा।
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें
(1) मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार।
(2) धनवान बनने के गुप्त रहस्य। (3) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि। (4) मरने के बाद हमारा क्या होता है। (5) मित्र भाव बढ़ाने की कला। (6) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान। (7) संजीवनी विद्या। (8) अमृत पारस और कल्पना की प्राप्ति। (9) हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं। (10) विचार करने की कला। (11) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं। (12) लेखन कला। (13) सफलता के तीन साधन। (14) शिखा और सूत्र की रहस्यमय विवेचना। (15) दैवी आपदायें। (16) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। (17) सौभाग्य बढ़ाने की कला। (18) प्रभावशाली व्यक्तित्व। (19) अमृत करण। (20) प्रसिद्धि और समृद्धि।
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें
(1) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है।
(2) क्या धर्म? क्या अधर्म? (3) गहना कर्मण गति (4) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश। (5) पंचाध्यायी धर्म नीति शिक्षा। (6) शक्ति संचय के पथ पर। (7)आत्म गौरव की साधना। (8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। (9) आन्तरिक उल्लास का विकास। (10) आगे बढ़ने की तैयारी। (11) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन। (12) ब्रह्म विद्या का रहस्योद्घाटन। (13) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग। (14) विवेक सतसई। (15) आध्यात्म शास्त्र। (16) आध्यात्म विद्या का प्रवेश द्वार। (17) वैज्ञानिक आध्यात्मवाद। (18) प्रेम का रहस्य। (19) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत। (20) यज्ञोपवीत द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें
(1) मैं क्या हूँ। (2) परकाया प्रवेश। (3) स्वर योग से दिव्य ज्ञान। (4) वशीकरण की सच्ची सिद्धि। (5)जीव जन्तुओं की मूक भाषा। (6) ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग। (7) यम नियम। (8) प्रत्याहार धारण ध्यान और समाधि। (9) मैस्मेरिज्म की अनुभव पूर्ण शिक्षा। (10) हस्तरेखा विज्ञान (11) गायत्री की चमत्कारी साधना। (12) गृहस्थ योग। (13) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार। (14) विचार संचालन विद्या। (15) सुखी वृद्धावस्था। (16) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग। (17)प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं। (18) योग के नाम पर मायाचार। (19) जादूगरी या छल। (20) सम्मोहन विज्ञान।
मूल्य में कमी के लिए लिखा पढ़ी व्यर्थ है छै रु ॰ से अधिक की पुस्तकें लाने पर डाक खर्च माफ।
पता-”अखण्ड ज्योति” प्रेस-मथुरा।
(श्री हरिनंदन प्रसाद लहेरियासराय)
भरो सुमन वास हृदय में, सुमनों-सा ही मुसकाओ।
चिंता की पतवार न थामो, मोद-सिंधु में बह जाओ॥
निज विचार-धारा में बहकर, पर्वत-सा तुम अटल रहो।
संकट आवे, धैर्य धरो तुम, नहीं किसी से कभी कहो॥
शरण तुम्हारे जो जन आवें, प्रकट करो उन पर माया।
पास आरसी के जाने से, ज्यों झट हर लेती छाया॥
जिसमें तेरी लगन लगी हो, कदम-कदम बढ़ाते जानो।
निर्जन वन में, बीहड़ पथ पर, सरिता की गति अपनाना॥
कर्म-हीन बन सुख मिलता है, ऐसी प्यारे भूल न हो।
सेवा हित कुर्बान करूं नित, इसकी तुमको शूल न हो॥
पराधीन बन रहूँ जगत में, जपना कभी न ऐसा मंत्र।
सुख के दिन कट गये उसी के, जो जीवन में रहा स्वतंत्र॥
उच्च बनूँ, हो अमर लालसा, निष्ठुर मद से सदा डरो।
उच्च शिखर चढ़ बाँस सरीखे, गर्दन नीची सदा करो॥
माया की मोहक नगरी में, स्वार्थ देख मत ललचाना।
वह भी वीर बना क्या जग में, बैर न लालच से ठाना॥
दुख के पथ पर बढ़े चलो तो, स्वयं करेगा, सुख सम्मान।
घोर कँटीले वन में हरि सा, पाया जाता जन्तु महान॥
झुलस ईर्ष्या की आंखों से, हुई प्रेम की कब पहचान।
उलट महाभारत को देखो, पंक्ति-पंक्ति में यही प्रमाण॥
आज कंठ में जगा मृदुलता, कोयल की बोली बोलो।
स्वर-लहरी के प्रति कंचन में, मोद-मधुरिमा-रस धोलो॥
*समाप्त*