ज्ञान यज्ञ की श्रेष्ठता

(श्री स्वामी भगवतानन्द जी महाराज)

अनेक स्थानों में ज्ञान शब्द ब्रह्म का वाचक मिलता है, अतः ‘ज्ञानमेव यज्ञः ज्ञानयज्ञः’ यह भी सवाल हो सकता है, अर्थात् ज्ञानरूप ईश्वर, ज्ञान रूप ब्रह्म। यज्ञ का अर्थ ईश्वर भी है, कर्म रूप यज्ञ भी। यज्ञ का अर्थ लिया जाये तो कोई असंगति नहीं है, ज्ञान में यज्ञतत्व का आरोप करके तथा सावधान होकर ज्ञान संपादन करना चाहिए। उसके साधनों का संग्रह करना चाहिए। जरा सी असावधानी भी अनर्थ करने वाली हो सकती है।

जो भी ‘यज्ञ का अर्थ लीजिए, सब यज्ञों में ‘ज्ञानयज्ञ’ ही श्रेष्ठ है। इसकी पुष्टि गीता के अनेक वचनों से होती है।

‘द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे।

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः शंसितव्रताः’॥

गी0 4/28

इसमें अंत में ‘ज्ञान-यज्ञ’ बतलाया है। इसमें ही प्रधानता भगवान को विवक्षित है। आगे के 29-30 के श्लोकों में ‘अपरे’ लिखा है अतः वह गौण यज्ञ है, ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि -

श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञःपरन्तर।

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञानं परिसमाप्यते॥

गी0 4/33

इसमें ‘ज्ञान-यज्ञ को श्रेष्ठ बतलाया है, ज्ञान में सब कर्मों की समाप्ति बतलाई है, अतः ज्ञान-यज्ञ’ की उत्कृष्टता स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है।

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।

गी0 4/35

‘सर्व ज्ञानसवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि।’

गी0 4/36

ज्ञानाग्निः सर्व कर्मणि भस्सात्कृरुतेअर्जुन।

गी0 4/37

‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।’

गी0 4/37

‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।’

गी0 4/38

प्रियो हि ज्ञानिनोअर्त्यथमहं स च मम प्रियः।

गी0 7/17

‘ज्ञानवान्माँ प्रपद्यते।’ गी0 7/19

इन सब वचनों में ज्ञान की श्रेष्ठता स्पष्ट झलकती है। उपसंहार में भगवान ने-

‘इति ते ज्ञानमाख्योतं गुह्यादगुह्यतरं मया’।

गी0 18/62

ज्ञान का उपदेश तुमको किया है- ऐसा अर्जुन के प्रति कहा है।

‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितोअस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥

गी0 18/73

इसमें अर्जुन ने भी ‘स्मृति’ पद से ज्ञान-प्राप्ति स्वीकार की है, अतः ‘ज्ञान-योग को ही भगवान् ने प्रधानता दी है।

‘तमेव विद्वान् नविभायभृत्योः’।

अर्थर्ववेद 10/8/44

‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।’

यजुवैद 31/18

धिया विप्रो अजायत।’ ऋ ॰ 8/6/28

यह मंत्र सामवेद में भी है।

‘य इत्तद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः’।

ऋग्वेद 1/164/39 अर्थर्ववेद -9/15/1

इन सब मंत्रों में ज्ञान से ही अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति बतलाई है अतः ‘सर्वशास्त्रमयी गीता’ सर्वोप निषदो गावः इस प्रसिद्धि के अनुरोध से भी गीता में ‘ज्ञान-यज्ञ’ सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह स्वीकार करना पड़ता है।

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 11


देव! तुम्हारी ज्योति अमर हो।


देव! तुम्हारी ज्योति अमर हो

देख सके जिससे भूला मन, वह विवेक की राह पुनीता।

जिसको पावन करती आई, युग युग से रामायण गीता॥

मुखरित जिसके प्रति कण कण से,

दिव्य शाँत समता का स्वर हो।

देव! तुम्हारी ज्योति अमर हो।

जिससे आदि काल से व्यापक, जग का अन्धकार मिट जाये।

सत्यं, शिवं सुन्दर के द्वारा, मानव निज आदर्श बनाये॥

मानवता के पद पखारने को,

बहती कल-काव्य लहर हो।

देव! तुम्हारी ज्योति अमर हो।

इसका प्रिय-प्रकाश यह व्यापक वसुन्धरा परिवार बना दे।

कुविचारों के कारागृह को, भव्य -मुक्ति का द्वार बना दे॥

विमल विश्व मन्दिर में इसकी,

आभा अक्षय हो, अक्षर हो।

देव! तुम्हारी ज्योति अमर हो॥

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


गायत्री के द्वारा आन्तरिक काया कल्प

गायत्री का चौथा पद (धियो यो नः प्रचोदयात्) अपनी आन्तरिक सद्बुद्धि को प्रेरित करने की शिक्षा देती है। हम अपनी कठिनाइयों एवं कष्टों का कारण बाहर ढूँढ़ते हैं और दूसरों पर दोषारोपण करते है। पर अधिकाँश उलझन ऐसी होती है जो हमारी अपनी भूलों, कमियों, भ्रान्तियों एवं अयोग्यताओं के कारण होती है। यदि अपनी मनोभूमि परिमार्जित हो जाये तो संसार में अनेक दोष रहते हुए हम सुख पूर्वक जीवन यापन कर सकते हैं।

सन्त इमर्सन कहा करते थे कि “यदि मुझे नरक में रखा जाये तो मैं वहाँ भी अपने लिए स्वर्ग का निर्माण कर लूंगा” वस्तुतः बात ऐसी ही है। यदि हम अपने भीतर पर्याप्त मात्रा में समझदारी और सद्गुण पैदा कर लें तो सहज ही अनेक कठिनाइयों से बच सकते है। दुनिया दर्पण के समान है जिसमें अपनी ही सूरत दिखाई पड़ती है। जो व्यक्ति क्रोधी है उसे प्रतीत होगा कि सारी दुनिया उससे लड़ती है, झगड़ती है। जो व्यक्ति झूठा है उसे सब लोग अविश्वासी दिखाई देते है। जो स्वयं नीच है वह सारी दुनिया को नीच समझता है। जो निकम्मा और आलसी है उसे सर्वत्र बेकारी फैली मालूम देती है। इसी प्रकार व्यभिचारी, लम्पट, मूर्ख, कंजूस, गँवार, सनकी, पागल, भिखारी, चोर या अन्यान्य मनोविकारों वाले लोग अपने गज से सबको नापते हैं और दूसरों को अपने ही जैसा बुरा मानकर उन पर दोषारोपण करते रहते है। यदि हम समझदारी से अपनी भूल पहचान लें और दूसरों के साथ नम्रता, मधुरता, सहनशीलता उदारता एवं संजीदगी से काम ले तो अधिकाँश झगड़े उत्पन्न ही न हो, यदि हो भी तो बड़ी आसानी से बात की बात में सुलझ जावें।

पात्रता के अनुसार वस्तुएँ मिलती हैं। हम यदि अपनी योग्यताएं बढ़ाते चलें संसार को हमारे लिए वे सभी वस्तुऐ देनी पड़ेगी जिनके कि हम वस्तुतः अधिकारी हैं। संसार में बुरे आदमी हैं पर उनकी बुराई तभी सफल हो सकती है जब हममें भी कुछ दोष हों। यदि अपना रक्त पूर्ण शुद्ध हो तो विषैले रोग कीटाणुओं से भी कुछ हानि नहीं हो सकती। इसी प्रकार यदि हम समझदारी और सद्भावना से काम लें तो न केवल स्वयं सुखी रहें बल्कि बुरे आदमियों की बुराई में भी बहुत हद तक सुधार कर सकते हैं।

जब हम दोषारोपण की दृष्टि से दुनिया को देखते हैं। तो हर एक में ढेरों बुराइयाँ मालूम पड़ती हैं, लगता है कि सभी लोग अपने शत्रु हैं पर जब दूसरे प्रकार सोचना प्रारम्भ करते हैं और देखें कि किस ने कब कब, कितना कितना, उपकार हमारे ऊपर किया है तो मालूम पड़ता है कि अपने ऊपर दूसरों की सेवा सहायता का इतना भार लदा हुआ है कि उससे सिर उठाना मुश्किल है। पत्नी में कोई एक दोष हो तो लोग उसकी सारी सेवाओं को धूलि में मिलाकर केवल उसे पापों की पुतली ही समझने लगते हैं माता पिता कोई कटु बात कह दें तो उनकी सारी सेवाओं को भुलाकर लड़के उन पर आग बबूला हो जाते है। इसी प्रकार अन्य स्वजन सम्बन्धियों मित्रों, या सत्पुरुषों की एक बुराई को लोग बहुत बढ़ा चढ़ा कर अपने मन में दुर्भाव बढ़ाते रहते हैं। और उनकी अनेकों अच्छाइयों को भुला देते हैं। जितने ध्यानपूर्वक हम दूसरों की बुराइयों को देखते रहते हैं उनकी भूल से दुखी होते हैं उसकी अपेक्षा यदि उतने ही ध्यानपूर्वक उनकी अच्छाइयों को देखें तो प्रतीत होगा कि चारों ओर से हमारे ऊपर प्रेम, वात्सल्य, सहयोग, सद्भावना एवं कृपा की वर्षा हो रही है।

किसी एक वस्तु का अभाव रहता है तो लोग ईश्वर को कोसते हैं। पर उसकी उन अनन्त कृपाओं को नहीं गिनते जो पग पग उपलब्ध होती रहती हैं। कोई आपत्ति आती है तो उसके दुःख को तो देखते हैं पर यह नहीं देखते कि इसके कारण हमें कितनी बहुमूल्य नसीहत मिलेगी तथा प्रारब्ध का कितना बोझ हलका हो जायेगा। ईश्वर अत्यन्त दयालु है वह द्वेषवश या निष्ठुर होकर हमें कोई कष्ट नहीं देता वरन् जिस प्रकारी हमारा अत्यन्त हित और दूरवर्ती लाभ देखता है वैसा ही आयोजन करता है भले ही वह कष्टप्रद एवं असुविधाजनक हो। अध्यापक के पीटने में, माता के धमकाने में, डॉक्टर के आपरेशन में, जिस प्रकार बालक का हित ही हित भरा होता है उसी प्रकार अनेक कष्टों के पीछे प्रभु की करुणापूर्ण कृपाऐं ही छिपी रहती हैं।

अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना मनुष्य का स्वाभाविक कर्त्तव्य है इसलिये प्रत्येक अपराध से बचने के लिए और उत्तम स्थिति प्राप्त करने के लिये उसे उत्साह और परिश्रम पूर्वक प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता, भाग्य भरोसे बैठ रहा है तो कर्त्तव्य घात का दोषी बनकर अपनी ड्यूटी न करने के पाप का दण्ड पाता है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि पूरी समझदारी, योग्यता और तत्परता से अपनी कठिनाइयों का हल करने के लिए जी जान से कोशिश करे। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि फल देना परमात्मा के हाथ में है। जो हम चाहते हैं प्रयत्न द्वारा वह अवश्य ही प्राप्त हो जाये यह आवश्यक नहीं।

अनेक अज्ञात कारण ऐसे हैं जो सत्प्रयत्नों को भी निष्फल कर देते हैं और वैसी परिस्थिति में रहना पड़ता है। जो कष्टकारक एवं असुविधाजनक होती हैं। ऐसी दशा में खिन्न होने की कोई बात नहीं। हमारे लिए यह प्रसन्नता की, सन्तोष की, गौरव की, बात है कि शक्ति भर अपना कर्त्तव्य पालन किया गया मनुष्य के हाथ में केवल कर्त्तव्य पालन ही है फल ईश्वर के हाथ है। जो वस्तु अपने हाथ की नहीं उसके लिए चिन्तित या परेशान होने का कोई कारण नहीं है।

इसी प्रकार की उत्तेजित मनोदशा आत्मिक अज्ञान का फल है। गायत्री का साधक अपनी आत्मिक महानता को भली प्रकार से समझ लेता है और जानता है संसार में जो आये दिन रंग-बिरंगी घटनाएं घटित होती रहती हैं वे धूप छाँव की तरह क्षण क्षण में बदलने वाली होती हैं उनका महत्व बहुत कम है। इसलिए इन तुच्छ सी बातों को अनावश्यक महत्व क्यों दिया जाये? जीवन शान्ति, स्थिरता और हल्के दृष्टिकोण से जीने की वस्तु है। इसे एक क्रीड़ा कल्लोल विनोद विलास ही समझना चाहिए। इस तत्व ज्ञान को अपना कर वह अनावश्यक शोक, मोह, चिन्ता भय और क्रोध, आवेश से बचा रहता है। शान्तिपूर्वक कर्त्तव्य मार्ग में प्रवृत्त रहने से उनका मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। और अगणित मानसिक पीड़ाओं से उसे छुटकारा मिल जाता है। जो मानसिक शान्ति उसे विशाल फौज, राज पाट, धन भंडार मिलने पर भी नहीं मिल सकती थी वह जीवन को हल्के दृष्टिकोण से जीने की नीति समझ में आ जाने पर सहज ही मिल जाती है। गायत्री का चौथा पद हमें आत्मज्ञान और आत्मबल देता है। जिसके कारण अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाले कष्टों का विनाश बढ़ी सरलतापूर्वक हो जाता है। असफलता और सफलता में उसे कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं मालूम देता। उसका ध्यान केवल कर्त्तव्य पर रहता है हानि लाभ या असफलता सफलता पर नहीं।

अपने आंतरिक क्षेत्र का, मनोभूमि का संशोधन करना, समस्या की जड़ अपने अन्दर खोजना, यही अध्यात्म है। यही गायत्री के तृतीय चरण का सन्देश है। इसे हृदयंगम करने वाला कभी भी, किसी भी स्थिति में दुखी एवं असंतुष्ट नहीं रह सकता, उसे हर स्थिति में प्रसन्नतादायक अवसर ही दृष्टिगोचर होते है। वह हर घड़ी हँसता मुस्कराता है, आनन्दित और उल्लासित रहता है।

गायत्री की शिक्षा है कि हम हर घड़ी हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें। क्योंकि प्रसन्नता हमारी आध्यात्मिकता का प्रमुख लक्षण है। आत्मा आनन्दमयी है, उसकी वाह्य आवरण की दिनचर्या भी आनन्दमयी होनी चाहिए। हर घड़ी प्रसन्न रहने की आदत डालने के लिए हर गायत्री प्रेमी को जी जान से कोशिश करनी चाहिए। मुँह फुलाये रहना, निराश, उदास और चिन्तित बैठे रहना किसी व्यक्ति की दीनता हीनता का ही परिचायक हो सकता है जिसे अपने स्वरूप का थोड़ा सा भी ज्ञान होगा वह अपनी महानता पर प्रभु की आनन्दमयी रचना को देखकर सदा हँसता मुस्कुराता ही रह सकता है।

गीता के अध्याय 2 श्लोक 65 में बताया गया है कि प्रसन्न रहने से मनुष्य के सब दुखों का नाश होता है और बुद्धि की स्थिरता बढ़ती है। हँसोड़े आदमी बहुधा स्वस्थ और मोटे ताजे पाये जाते हैं। कारण यह है कि हँसने से नस नाड़ियों में खून का दौरा भली प्रकार होता है। माँस पेशियों में फुर्ती और चैतन्यता रहती है। क्योंकि कंठ, श्वांस, नाड़ियों, फेफड़े और पेट का अच्छा व्यायाम होता रहता है। आँख, कान नाक सभी पर ऐसा असर पड़ता है जिससे यह इन्द्रियाँ भली प्रकार अपना काम करती रहती है। इसके विपरित अप्रसन्न, निराश, दुखी, शोक त्रस्त, क्रोधी, ईर्ष्यालु स्वभाव के मनुष्य अपने स्वास्थ्य को भट्टी में पड़ी हुई लकड़ी की तरह जलाते रहते हैं।

मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक शत्रु नहीं। जिसका चित्त किसी न किसी कारण दुखी बना ही रहता है। जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहता है, जिसे द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गर्दन फुलाये रहता है सीधे मुँह किसी से बात करना जिसे सुहाता नहीं ऐसे बद मिज़ाज आदमी अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं। ऐसे लोग अकसर अनिद्रा, मधुमेह, बवासीर, कब्ज, जिगर बढ़ जाना, मुँह से बदबू आना, दाँतों से मवाद आना, रक्त की कमी, दिल की धड़कन, मुँह में छाले, सनक, पागलपन जैसे रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। और कितना ही इलाज करने पर भी रोग जड़ से नहीं जाते। मानसिक अप्रसन्नता और उद्विग्नता के कारण रक्त के श्वेत कीटाणु अशक्त हो जाते हैं फलस्वरूप शरीर की रोग निरोधक शक्ति में शिथिलता आ जाती है। हड्डियों के भीतर की मज्जा सूख जाती है, नसें सख्त पड़ जाने से हडफूटन होती रहती है। चिन्ता से रज वीर्य निस्वत्व हो जाते है। फलतः ऐसे लोगों को सुसन्तति से वंचित रहना पड़ता है।

प्रसन्न रहने से मानसिक शक्तियां बढ़ती है। और बुद्धिमता बढ़ने से मनुष्य अनेक प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता है। हँसता हुआ चहरा एक प्रकार का खिलता हुआ फूल है। जिसे देखकर दर्शक का मन अनायास ही उस ओर खिंच जाता है। कुरूप से कुरूप मनुष्य भी जब प्रसन्न मुद्रा में होता है। तो अधिक सुन्दर, अधिक स्वस्थ एवं अधिक सुखी दिखाई देता है। हँसने वाले के अनेक मित्र बन जाते हैं। प्रसन्नता का मधु पीने के लिए अनेक व्यक्ति उसके इर्द गिर्द जमा हो जाते हैं।

प्रसन्न मुख मुद्रा प्रमाणिकता की साक्षी देती है जो स्थिर चित्त है, सुखी है, सफल है, सन्तुष्ट है, वह प्रसन्न रहेगा अथवा यों कहिए कि जो प्रसन्न रहता है जिसके पास यह चारों संपदाएं है वह निश्चय ही बुद्धिमान, गम्भीर, विश्वसनीय, साहसी, कुशल एवं सुयोग्य समझा जाता है। प्रसन्न रहना देखने में मामूली बात है पर उसके पीछे अनेक आशाजनक रहस्य छिपे हुए हैं। प्रसन्नता का हर जगह स्वागत होता है।

परमात्मा के इस पुनीत उद्यान में, संसार में विनोद क्रीड़ा करने के लिए जिस आत्मा का अवतरण हुआ है उसे हर घड़ी प्रसन्न रहना चाहिए। काले सफेद,भले बुरे, प्रिय अप्रिय तथ्यों से भरा हुआ यह संसार कितना सुन्दर है इसे देखकर उसका हृदय कमल खिल जाता है। अच्छाइयों का मधुर स्पर्श करना और बुराइयों से लड़ना यह उभय पक्षीय कार्य कर सामने रखकर मानो भगवान ने मीठे और तीखे षट् रस व्यंजन हमारे जीवन काल में परोसे हैं। हानि लाभ के विविध स्वादों को विविध प्रकार का अनुभव करते हुए हमें उसी प्रकार आनंदित रहना चाहिए जैसे स्वादिष्ट षट् रस भोजन का आस्वादन करते हुए हम प्रसन्न होते हैं। सुख दुख, अमीरी गरीबी, हानि लाभ अपने अपने ढंग के व्यंजन हैं। यह सभी अपने अपने ढंग से स्वादिष्ट हैं। एक से दूसरे का महत्व है। विरोधी भाव न हो तो हर वस्तु नीरस हो जाय। दिन का महत्व रात के कारण होता है। यदि रात न हो तो दिन के आनन्द का अनुभव ही न हो। इसी प्रकार सुख का आनन्द तभी है जब दुख का अस्तित्व भी हो। दुख न हो तो जिन बातों को आज सुख समझा जाता है। उनमें तनिक भी आनन्द एवं आकर्षण प्रतीत न होगा।

गायत्री के चौथे पद का संदेश यह है कि अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को हम बुद्धिमत्ता पूर्ण उपयोग करें। अच्छे से अच्छे भविष्य की आशा करें और बुरे से बुरे परिणाम का मुकाबला करने की तैयारी में रहें। यदि कठिनाइयों को अपने प्रयत्न को बढ़ाने की चुनौती मात्र समझा जाए, उनसे भयभीत न हुआ जाए तो निश्चय ही कोई अप्रिय परिस्थिति हमें दुखी नहीं कर सकती अपनी प्रसन्नता में बाधक नहीं हो सकती। प्रसन्न रहना अपना स्वभाव बना लेने की सद्बुद्धि को अपना लिया जाय तो जरा से तुच्छ कारणों से दुखी होने की कुबुद्धि से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। जीवन खिलाड़ी की भावना से खेलने के लिए है। खिलाड़ी पूरे उत्साह से खेलते हैं। पर जीत हार की विशेष परवाह नहीं करते। रंग मंच पर पार्ट करने वाले नट अनेक प्रकार के अभिनय करते हैं। पर स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होते। इस खिलाड़ी और नट की भावना के साथ जीवन का खेल, खेलना चाहिए। किसी भी घटना को किसी भी परिस्थिति को, बहुत अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। जो कष्ट या अभाव हमें बहुत परेशान करते हैं। उन्हें यदि हल्की दृष्टि से देखें तो वे बहुत ही तुच्छ प्रतीत होते हैं। इन अभावों के होते हुए भी अनेकों से अपनी स्थिति बहुत अच्छी है, जितनी सुविधाएं प्राप्त है उनकी तुलना में दुख तो नाम मात्र का है ऐसी सुविधाओं पर प्रसन्न होकर छोटे-मोटे अभावों की सहज ही उपेक्षा कर सकते हैं।

आनन्द भीतर है। उसे बाहर की वस्तुओं में नहीं ढूँढ़ना चाहिए। सद्बुद्धि रूपी प्रसन्नता हमारे अन्तर में छिपी पड़ी है। उसे प्रेरित, समुन्नत करते ही कष्टों की निशा समाप्त हो जाती है और आनन्द रूपी सूर्य की किरणें अपने चारों ओर बिखरी हुई दिखाई पड़ती है।


Quotation

-कोई मनुष्य उस समय तक बड़े काम अथवा राष्ट्रोन्नति करने में समर्थ नहीं हो सकता जब तक उसके आचरण सच्चे न हों और उसके वचनों का मूल्य न हो।


जीवन और सिद्धान्त

(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए.)

जीवन में यह जानना सबसे आवश्यक बात है कि सबसे प्रमुख क्या है तथा सर्वप्रथम क्या किया जाना चाहिए। मध्य से किसी कार्य को प्रारम्भ करना असफलता का सूचक है। विद्यार्थी विद्यारंभ वर्ण अक्षरों से करता है भूगोल और राजनीति के विवेचन से नहीं? वह व्यापारी जो अपना व्यापार छोटी मात्रा से प्रारम्भ करता है और क्रमशः उसे बढ़ाता है अन्त में समृद्धि प्राप्त करता है। तत्व-ज्ञानियों का भी अध्ययन प्रायः जीवन की साधारण घटनाओं और गुत्थियों से ही होता है। उन्नति की परम चोटी पर किसी एक बारगी उछाल द्वारा नहीं चढ़ा जा सकता, उस पर पहुँचने के लिए कर्म और साधना की सीढ़ी आवश्यक है।

व्यवस्थित जीवन की सर्वप्रथम आवश्यकता है सिद्धान्त और उसका व्यवहारिक निरूपण। बिना उचित सिद्धान्तों के हमारे जीवन का रास्ता टेढ़ा मेढ़ा होगा और असफलता में उसकी इति होगी। सारे ज्योतिष और अंक विज्ञान का आधार एक से लेकर दस तक की संख्या है और संपूर्ण साहित्य वर्ण माला पर आश्रित है। सब कार्यों का आधार तत्व संक्षेप और सरल होता है, किन्तु उतने का ही ज्ञान अनिवार्य है। जीवन के आधार तत्व भी बहुत कम है, किन्तु जीवन में सफलता पाने लिए उनका ज्ञान और प्रतिपादन आवश्यक है।

आइये मानव-जीवन के मूल सिद्धान्तों पर दृष्टि पात करें। कर्त्तव्य इनमें सर्वप्रथम आता है। कर्त्तव्य की सबसे स्पष्ट व्याख्या है, अपने कार्य में तल्लीनता और दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप न करने की भावना। वह व्यक्ति जो सदैव दूसरों को मार्ग बताने का दावा रखता है, स्वयं अपने ही मार्ग को नहीं जानता। भिन्न भिन्न व्यक्तियों के कर्त्तव्य भिन्न होते हैं और दूसरों के कर्त्तव्य की अपेक्षा प्रत्येक को अपने कर्त्तव्य का ज्ञान अधिक होना चाहिए। आवश्यकता और स्थिति के अनुसार हम कर्त्तव्य की मीमाँसा में थोड़ा बहुत परिवर्तन कर सकते हैं। मूल तत्व फिर भी वही है।

ईमानदारी जीवन का दूसरा सिद्धान्त है। वही करो जो कहो और वही कहो जो करो इसका मूल मन्त्र है। इसका कार्य जीवन को अनेकानेक चालाकियों, चालबाजीयों और छल कपटों से दूर करना है। ईमानदारी से मनुष्य के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है और यह विश्वास ही संपूर्ण सुख और समृद्धि का जनक है।

मितव्ययता जीवन का तीसरा सिद्धान्त है। धन के उचित उपयोग को ही मितव्ययता कहते है। ज्यों ज्यों धन बढ़ता जाता है मितव्ययता की आवश्यकता बढ़ती जाती है। अपनी आय की सीमा में ही अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखो इसकी सर्वप्रथम सीख है। धन के अतिरिक्त यह हमें मानसिक और शारीरिक शक्तियों के दुरुपयोग से भी रोकती है। हमारी आय और शक्तियाँ सीमित हैं। उनका अपव्यय शीघ्र ही हमें उनसे वंचित कर देगा। इसलिए उनका उपयोग क्रमशः एवं आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए।

उदारता अप्रत्यक्ष रूप से मितव्ययता से सम्बन्धित है। जो मितव्ययी न होगा वह उदार भी नहीं हो सकता। जो अपनी सम्पूर्ण शक्तियों का अपव्यय स्वयं ही कर लेगा, उसके पास इतनी शक्तियाँ ही कहाँ रहेंगी कि वह दूसरों पर इसका उपयोग करे। धन की सहायता तो उदारता की सब से साधारण अवस्था है। विचारों भावनाओं सद्कामनाओ। द्वारा प्रदत्त सहायता उदारता की सीमा में आती है। उदारता का प्रभाव व्यापक और बहुत काल तक रहने वाला होता है। उदारता अपने बदले में किसी से किसी प्रकार की कामना नहीं करती। प्रतिफल की इच्छा रखने वाली उदारता सिद्धान्त न होकर व्यापार मात्र रह जाती है।

आत्मा संयम जीवन का पाँचवाँ और अंतिम सिद्धान्त है। वह व्यवसायी अथवा अन्य कोई व्यक्ति जो शीघ्र ही नाराज हो जाता है और असंयत भाषा और भाव प्रदर्शित करने लगता है, जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता। अपने मन की दुर्बलताओं पर अधिकार करते समय और परिस्थिति के अनुकूल विवेक द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते हुए ही आत्म संयमी व्यक्ति सदैव कर्त्तव्यनिष्ठ चरित्रवान और मानव सुलभ संपूर्ण गुणों से सुशोभित होगा। आत्म संयमी व्यक्ति के लिए संसार में न तो कोई कार्य कठिन है और न उसके पथ पर कोई बाधा ही है।

उपयुक्त पाँच सिद्धान्त सफलता के पाँच मार्ग है, जीवन के पथ पर प्रकाश की पाँच किरणें हैं। संभव है कि प्रारम्भ में इनका व्यावहारिक निरूपण कठिन हो, किन्तु अभ्यास हमें इन सिद्धान्तों से अभिन्न रूप से जोड़ देगा। यदि हम इनकी उपयोगिता और महत्व को अच्छी तरह से समझ ले, तो हमें इन्हें अपनाने में तनिक भी कठिनता न होगी।

यदि हम संसार के महापुरुषों के जीवन का भली भाँति विश्लेषण करें तो हमें ज्ञात होगा कि उनमें से प्रत्येक के ही जीवन में यह पांचों सिद्धान्त किसी न किसी रूप में भली भाँति विद्यमान है। इसमें मानो किसी भी महापुरुष के व्यक्तित्व का निचोड़ आ जाता है।

महाप्रभु कौटिल्य ने ठीक ही कहा है- तू सूर्य और चन्द्र को अपने पास नहीं उतार सका, इसका कारण उनकी दूरी नहीं, तेरी दूरी की भावना है। तू संसार को बदल नहीं पाया इसका कारण संसार की अपरिवर्तनशीलता नहीं, तेरे प्रयासों की शिथिलता है। जब तू यह कहता है मैं अपने में परिवर्तन नहीं कर सकता तो इसे स्थिति और विवशता कह कर न टाल, साफ साफ आनी कायरता और अकर्मण्यता कह। क्योंकि इच्छा की प्रबलता ही कार्य की सिद्धि है।


कर्तव्य पालन ही ईश्वर भक्ति है।

(श्री मूलचन्द जी गट्टानी, शोभापुर)

विष्णु पुराण में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि केवल मेरे नाम उच्चारण से कुछ नहीं होता क्योंकि मेरा जन्म कर्म करने के लिये हुआ है। अतएव मेरे अनुयायियों को विवेकपूर्वक, भक्ति सहित अपने व समाज हित के लिए नित्य कर्म करते रहना चाहिए और फल के परिणाम की कोई इच्छा नहीं रखनी चाहिए और फल के परिणाम की कोई इच्छा नहीं रखनी चाहिए। भगवान ने निष्काम भावना पर जोर दिया है। सत्कर्म का परिणाम निकलना स्वाभाविक है। फिर उसके लिए इच्छा की आवश्यकता ही क्या है? उसका फल तो होगा ही। परन्तु आज हम लोगों ने परिणाम को मुख्य मान लिया इसका कारण यह है कि हमारा उद्देश्य छोटा हो गया है हमारा लक्ष्य महान नहीं रहा। हम स्वार्थी हो गये हैं। समाज व मानव कल्याण के बजाय आप ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। इसके लिए हमने सत्य, न्याय, प्रेम तथा धर्म की तिलाँज्जलि दे दी है। यही संसार में सारे असन्तोष की जड़ है।

भगवान ने पांडवों को विशेषकर अर्जुन को अपने कुटुम्बियों से युद्ध करने के लिए इसलिए आदेश किया था कि स्वार्थियों का समाज से विध्वंस होना आवश्यक है क्योंकि स्वार्थ, समाज में अनाचार व अत्याचार फैलाता है। कौरवों ने पाँडवों की न्याय संगत माँग को ठुकराया था और अन्याय पर तुले हुए थे। अन्यायी से बाजी लेना प्रत्येक न्याय प्रिय व साहसी पुरुष का कर्त्तव्य है। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन को बार-बार समझाया परन्तु उसकी बुद्धि तो विपरीत हो गई थी। जो स्वार्थी हो जाते हैं। उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। स्वार्थ उन्हें अन्धा बना देता है। दुर्योधन ने एक भी न्याय संगत बात नहीं मानी तब मोह ग्रसित अर्जुन को भगवान ने आदेश किया कि दुराग्रही, अत्याचारियों से युद्ध करना एक ज्ञान युक्त कर्म है। उसके परिणामों को विचारने की जरूरत नहीं है।

अन्याय का विरोध और न्याय का साथ देना यही भगवान कृष्ण के जीवन का सन्देश रहा है। हम नित्य हर तरह के अन्यायों को देखने वाले, सहने वाले बल्कि उसमें शरीक होने वाले सोचे, कि हमारी सामाजिक व धार्मिक अवस्था इतनी क्यों गिर गयी? आज समाज गायों, विधवाओं, अनाथों के प्रति क्यों इतना उदासीन हो गया? आज तुच्छ चीजों के लिए आपस में क्यों लड़ाई झगड़े वैमनस्य फैल रहा है? हमारे धर्म स्थान अपनी पवित्रता खो, ठग बाजी के स्थान क्यों बन रहे हैं?

जब हम भगवान कृष्ण के कर्मयोग सन्देश को समझेंगे तो निश्चय ही क्षण भंगुर शरीर की परवाह न करते हुए कर्तव्य धर्म पर आरुढ़ होगे। कर्तव्य धर्म का पालन करने में बड़ी से बड़ी कठिनाई को सहना और बड़े से बड़े प्रलोभन को त्यागना यही गीताकार की शिक्षा है। जो प्रभु की शिक्षा को जीवन में उतारता है, असल में वही मनुष्य सच्चा भक्त कहलाने का अधिकारी है।


अखण्ड सुख शान्ति का मार्ग

(श्री धर्मपाल सिंह जी कासिमपुर)

मनुष्य तथा प्राणी मात्र सुख चाहते हैं। और सुख भी कैसा अखंड, अपरिसीम, अनन्त अर्थात् जो कभी भी समाप्त न हो। परन्तु उसे खोजते कहाँ हैं, विषय भोगों में तथा जीवन का कुल भाग इन्हीं की प्राप्ति के साधन धन, स्त्री, पुत्र, पद, प्रतिष्ठा की पूर्ति एवं वृद्धि में समाप्त कर देते हैं। सारा बल, बुद्धि, प्रयास इन्हीं वस्तुओं के अधिकाधिक संग्रह करने में लगाया जाता है। परन्तु जिस प्रकार ज्येष्ठ की दोपहरी में प्यास से व्याकुल हिरण चमचमाते सूर्य के प्रकाश से चमकती हुई श्वेत वीलुका को स्वच्छ जल से भरा हुआ सरोवर जान शीतल जल से प्यास बुझाने के लिए अति वेग से भागे हुए जाते हैं। और वहाँ पहुँच कर अतृप्त, निराश और दुखी होते हैं ठीक यही दशा विषय भोगो में सुख शान्ति के लिए मुँह बांये भागते हुए प्राणियों की है। प्रभु की त्रिगुणात्मक सत, रज, तममयि माया से मोहित प्राणी संसार की असारता, अनित्य क्षण भंगुरता तथा इन्द्रियों के अति भोगों के परिणाम दुःख को भूला हुआ है। अनुभवी यथार्थ दृष्टा इन्द्रियों के भोगो के परिणाम दुख को देख अपने मन को इनमें नहीं फँसाते।

अखंड सुख का आकाँक्षी भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है। प्रभो मैं आपसे क्या माँगू। सब कुछ तो यहाँ अनित्य, असार, अस्थिर है। इस क्षण भंगुर नाशवान साँसारिक वस्तुओं के लिए यदि मैं आप से माँग करता हूँ तो ये वस्तुऐ संसार के अनित्य स्वभाव वश एक दिन अचानक मुझ से जुदा हो जाएगी। उस समय मैं और अधिक मोह दुख से दुखित हूँगा? अतएव हे स्वामी मुझे वही वस्तु दीजिए जिस के प्राप्त करने पर मेरा सुख अक्षुण्य बना रहें। ऐसा अक्षुण्य सुख क्या है। वह किस को, किस प्रकार प्राप्त होता है। इस का उत्तर भगवान देते है। विहाय कामोनयः सर्वान् पुँमाश्चरति निःस्पृह।

निर्ममो निरहंकार स शान्ति मधिगच्छति

॥ गीता - 2-71 ॥

जो सब प्रकार की इच्छाओं को त्याग देता है और बिना लालसा इच्छा के जो आगे कर्तव्य कर्म आते हैं, उन्हें करता है। जो योग्य वस्तुऐ पास नहीं, उनकी इच्छा नहीं करता जो पास है, उन्हें अनित्य अस्थिर जान उनमें अनुचित ममता को नहीं बढ़ाता। अपने शरीर में अहम् बुद्धि न रख आत्मा को अपना स्वरूप जानता है। शरीर के हानि लाभ में अपनी हानि लाभ न जान दुःखी सुखी नहीं होता है। शरीर को प्रारब्ध वश मिल जाना प्रारब्ध से मिले हुए भोगों को संयम पूर्वक भोगता हुआ आनन्दपूर्वक व्यवहार करता है। वही पुरुष अखंड सुख शान्ति को प्राप्त होता है। ऐसी निरहंकार इच्छा रहित स्थिति प्राप्त हो जाना कोई एक दिन का कार्य नहीं है इसके लिए प्राणियों को अनेक जन्म धारण करने पड़ते हैं और साधन पथ पर सतत प्रयत्नपूर्वक चलना पड़ता है।

किसी भी वस्तु के मूल स्थान की खोज के लिए प्रथम कुछ परोक्ष ज्ञान की आवश्यकता है। अतएव यह जानना आवश्यक हैं कि इच्छा का मूल स्थान कहाँ है अर्थात् इच्छा किस का धर्म है। लंगड़े, टोटे, अंधे, बहरे मनुष्य भी इच्छा रखते हैं। इससे यह प्रगट हुआ कि इच्छा इन्द्रियों का धर्म नहीं है यदि इन्द्री का धर्म इच्छा होती तो यह लंगड़े आदि इन्द्रिय हीन व्यक्ति इच्छा रहित होते, पर ऐसा नहीं है। सुषुप्ति अवस्था गहरी निद्रा में अंतःकरण (मन) और इन्द्रियों की कोई चेष्टा नहीं रहती क्योंकि यह अपने कारण चेतन आत्मा में लीन हो जाती है केवल दृष्टा चेतन आत्मा ही जागती है। पर उस समय भी मनुष्य में कोई इच्छा प्रतीत नहीं होती। इससे सिद्ध हुई इच्छा आत्मा का भी धर्म नहीं है। स्वप्नावस्था में इन्द्रियों की कोई चेष्टा नहीं होती है क्योंकि वे अपने कारण मन में लीन हो जाती हैं। परन्तु मनुष्य स्वप्नावस्था में नाना प्रकार की इच्छा और भोग भोगता है कभी राजा का सुख भोगता है, कभी घोर मृत्यु भय से दुखित हो जाता है, सुन्दर वस्तुओं को ग्रहण करता भयावनी को देख काँप जाता है। यह स्वप्नावस्था में अन्तःकरण की जागृत अवस्था के हेतु हैं। जागते में तो मन सब कुछ करता ही है। इससे यहां भली भाँति प्रकट हो गया कि इच्छा न आत्मा का धर्म है न इन्द्रियों का धर्म है। इच्छा अन्तः करण (मन) को धर्म है इस मन को परिमार्जित करके वश में करना ही इच्छा रहित शान्त अवस्था प्राप्त करना है। कहा भी है ‘मन एवं मनुष्याणाम्कारणं बन्ध मोक्षयो’ यह मन अभ्यास और वैराग्य से वश में हो जाता ऐसा भगवान ने कहा है।

असंशयं महा बाहो मनों दुनिग्रह चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येन च गृह्यते॥

अर्थ- हे महाबाहो निःसंदेह यह मन चंचल और दुर्निग्रह है पर अभ्यास वैराग्य से वश हो जाता है।

मनुष्य जैसे समाज संगति, आचार, व्यवहार में निरन्तर लगा रहा है। उस का मन वैसी ही बातों में अधिक चाव और एकाग्र होता है। यही कारण है कि कृषक लोग कृषि सम्बन्धी वार्ता में, व्यापारी व्यापार के मामलों में, शराबी जुआरी पार्टी की गप्पाष्टक में अपने मन को देर तक लगाये रहते है नित प्रति वैसी ही बातों के अभ्यास से उनका मन देर तक उनमें लगता और आनन्द लेता है इस समय उनका मन और सब बातों से वैराग्य को प्राप्त होता है। अपरिसीम अखंड सुख के आकाँक्षी को इसी प्रकार आत्मा, परमात्मा सम्बन्धी वार्ता में अपने मन को एकाग्र करने का अभ्यास बढ़ाना चाहिए और संसार से लेकर ब्रह्मलोक पर्यन्त सुखों को अनित्य जान उनसे वैराग्य कर शरीर इन्द्रियों के भोगों की प्राप्ति के अति साधनों को कम करना चाहिए। शरीर मन इन्द्रियों को स्वस्थ रखने के लिए उन्हें सतोगुणी आहार विहार देकर अति भोग शक्ति से बचकर मन की रुचि सत्संग स्वाध्याय गायत्री जप आदि में लगनी चाहिए।

गीता, रामायण, श्रीमद भागवत् उपनिषद् आदि अध्यात्म सम्बन्धी ग्रन्थों का श्रवण पाठ मनन करते हुए उनकी शिक्षाओं को आचरण में उतारना चाहिए एवं जिस प्रकार कृषि में विशेष उन्नति का इच्छुक कृषक विशेष जानकारी के हेतु बड़े उन्नत कृषि फार्मों से खाद बीज जुताई, सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के लिए उनके अनुभवी कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेता है और उनके रचित साहित्य का अवलोकन करके ज्ञान बढ़ाता है इसी प्रकार अध्यात्म विषय के विशेषज्ञ जो साधु, संत महात्मा, आचार्य, विद्वान हैं, उनसे प्रेमपूर्वक अति विनम्र भाव से इस विषय में परामर्श लेना चाहिए। और छल छोड़ कर मन कर्म वचन से उनके होकर उनके आदेशों और शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। हमारे तीर्थ स्थान अब भी ऐसे अध्यात्म विशेषज्ञों से खाली नहीं है।

इस प्रकार के नित प्रति के अभ्यास से हमारा मन आगे आने वाली अध्यात्म सम्बन्धी ऊँची भूमिकाओं में एकाग्र होने लगेगा और गुरु कृपा से जो साक्षात नर रूप से श्री हरि कृपा है, अन्त में अखण्ड सुख शान्ति को प्राप्त कर सकेगा।


महाप्रभु ईसा मसीह के उपदेश

(पवित्र बाइबिल से पैदा)

- यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बना तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करने पाओगे। जो कोई अपने आपको इस बालक के समान छोटा करेगा वह स्वर्ग के राज में बड़ा होगा। -मत्ती 18

तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात् परमेश्वर ही उत्तम है।

- मरकुल 10

- जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे वह तुम्हारा सेवक बने और जो कोई तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने, और जैसे कि मनुष्य का पुत्र इसीलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करें और बहुतों को छुड़ाने के लिए अपने प्राण दें।

-मत्ती 20

- मैं तुमसे सच कहता हूँ कि तुमने जो इन छोटे से छोटे में से एक के लिए न किया, वह मेरे लिए भी न किया।

-मत्ती 25

--परमेश्वर ने कहा था कि अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।

-मत्ती 15

--तुम सुन चुके हो कि कहा गया था कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना और बैरी से बैर, पर मैं तुम से कहता हूँ कि अपने बैरियों से प्रेम रखना और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करना। इससे तुम अपने स्वर्गीय पिता के सन्तान ठहरोगे।

-मत्ती 5

- पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो और न अपने मोती सुअरों के आगे डालों। ऐसा न हो कि वे उन्हें पाँव तले रौंदे और फिर तुमको फाड़े।

-मत्ती


गलती को कैसे सुधारा जाए?

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

जब मनुष्य एक बार किसी गलत रास्ते पर चला जाता है, तो उसे इतना ज्ञान और विवेक नहीं होता कि सही रास्ते पर आ सके। अन्धकार में खोये हुए पथिक की भाँति वह गलत मार्ग पर निरन्तर चला जाता है। यदि कोई रोक कर उसे सही रास्ता प्रदर्शित न करे,तो वह अज्ञान में ही भटकता रहेगा। कभी लोग जानते बुझते अनीतिकार मार्ग का अवलम्बन कर बैठते हैं। इसका कारण यह है कि एक बार गलत मार्ग चुन लेने के पश्चात सही रास्ते पर आते हुए उनके गर्व और अहं को चोट लगती है। वे गलत मार्ग पर चल कर उसी मिथ्या गर्व की रक्षा में सचेष्ट रहते है।

मान लीजिए, आप किसी से कुछ वायदा कर बैठे हैं, बाद में आपको प्रतीत होता है कि आप भूल कर बैठे हैं। आपको ऐसा अदूरदर्शिता पूर्ण वायदा नहीं करना चाहिए था। किसी को रुपया, पुस्तक, या साइकिल उधार देने का वायदा एक भूल है क्योंकि या तो ये वस्तुएँ समय पर वापस लौटकर नहीं आती, यदि आ भी गई तो टूट फूट कर आती हैं। गलत वायदा कर लेने पर उसे शीघ्र से शीघ्र सुधार लेना ही बुद्धिमानी है। अन्यथा वह गलती अधिकाधिक अभिवृद्धि को प्राप्त होती रहेगी।

मान लीजिए आप एक लड़के की शिक्षा, संस्कार और ब्रह्म वेशभूषा देख कर उसे अपनी कन्या के लिए चुन लेते हैं। कुछ मास पश्चात, विवाह से पूर्व, आपको उसके चरित्र की निर्बलताएँ मालूम होती हैं। आप यदि अपने वचन के पक्के हैं तो अपनी गलती को बढ़ा कर कन्या का जीवन नष्ट कर देंगे। उत्तम तो यह है कि वर पक्ष से क्षमा माँग लें और अपनी गलती को शुद्ध कर दें।

गलती करना नये प्रशस्त मार्ग को अनुसरण करने का मार्ग है। आप एक गलती को सुधार कर अपने चरित्र को सबल बना रहे हैं। आगे आने वाले युग के लिए अपने आपको तैयार कर रहे हैं। एक गलती को सुधारना सैकड़ों भूलों से बचना है।

जो अपनी गलती स्वीकार करता है। वह महान् आध्यात्मिक पुरुष है। वह अहं को अपने वश में रखता है। अहं को वश में करना स्वर्ग, मुक्ति और परमपद प्राप्त करने का मार्ग है। समस्त मूर्खताएँ इसी से दूर होती हैं। प्रत्येक सुधरी हुई गलती आगे के लिए सावधानी का मार्ग तैयार करती है। आत्मोन्नति का अर्थ है असंख्य गलतियों को सुधारते हुए परम पद की ओर अग्रसर होना।

गलती करना बुरा नहीं है। संसार के महान पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान धार्मिक अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया, बाल्मीकि डकैत और खूनी रहे हैं, सूर तुलसी कामोन्धता में गलती करते रहे थे, नानक, कबीर, मीरा, रसखान आदि साँसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़ कर महापुरुष बने।

मनोविज्ञान में ‘ट्रायल एंड एरर’ अर्थात् गलती कर अंक प्राप्त करना और आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य जब जीवन यात्रा पर निकलता है तो उसके मार्ग में अनेक प्रलोभन आते हैं। वह इन प्रलोभनों के वश में इधर उधर भागता, गलतियाँ करता है। गलती की कड़वाहट से उसे भयंकर भूल का भान होता है। वह उस गलती को भविष्य में न दुहराने का संकल्प कर आगे साधन पथ पर बढ़ता है। इस प्रकार नाना प्रकार की गलतियों से बचकर निरन्तर साधना में अग्रसर होना मानव विकास है। गलतियों का अभिप्राय यह है कि यह सही मार्ग से जरा हट गये थे अब उस सही मार्ग का मर्म पहिचान कर पुनः शुद्ध मार्ग पर आ रहे हैं। जो गलती अनजाने में हो जाती है। उस पर आपका वश नहीं है, किन्तु जो आप जान बूझ कर करते है। उसके बारे में आप अवश्य दंडनीय है। उसके लिए आपको हृदय से पश्चाताप करना चाहिए। पश्चाताप ही इससे बचने का आध्यात्मिक उपाय हो सकता है। जब आप सच्चे मन से गलती न करने का संकल्प करते हैं तो मन की असंख्य शक्तियाँ आपके साथ रहती हैं। गलती से बचने का उपाय हमारे मन में ही है। मन जितना ही सतर्क रहेगा, उतना ही गलती करने की कम संभावना रहेगी।

स्मरण रखिए, एक गलती को सुधार कर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं। प्रत्येक गलती अनुभव से जुड़ी हुई है। वह आपके अनुभव में नवीन और ठोस ज्ञान जोड़ती है। मनुष्य यदि प्रत्येक गलती से लाभ उठाने की मनोवृत्ति धारण करे, तो प्रचुर लाभ हो सकता है।


प्रवृत्तियों के सदुपयोग की समस्या

(श्री स्व. आचार्य गिजुभई)

कुछ विद्वान मनुष्यों की वृत्तियों को नीचे लिखे तीनों भागों में विभाजित करते हैं। -

(1) क्रियात्मक वृत्ति, (2) ज्ञानात्मक वृत्ति और (3) आवेशात्मक ( भावना-प्रधान ) वृत्ति।

यह क्रियात्मक वृत्ति हमारे जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं में से जन्म पाती है। जन्म लेकर पृथ्वी पर आने के पश्चात् मनुष्य की सबसे पहली वृत्ति, पेट भरने, सर्दी-गर्मी से अपने शरीर की रक्षा करने और अन्य भयों से बचने के उपाय खोजने की जान पड़ती है। इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य जमीन में हल चलाता है, वस्त्र बुनता और अन्य अनेक प्रकार से शरीर रक्षा के लिये प्राकृतिक शक्तियों पर विजय-अधिकार प्राप्त करता है। यह मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताएँ हैं। इन्हीं शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य शरीर की शक्तियों को शिक्षित बनाता है और उनका उचित उपयोग करना सीखता है। ये आवश्यकताएँ ही अर्थशास्त्र की जननी है। इन आवश्यकताओं के ही फलस्वरूप आज पृथ्वी पर रेल और जल पर विशालकाय पोत दौड़ लगाते दीख पड़ते हैं। इन्हीं आवश्यकताओं ने हमें आकाश के साथ बातें करना सिखाया है और अपने दुर्गन्धमय धूम्र से मनुष्य का दम घोटने वाली मिलों की बड़ी बड़ी चिमनियाँ भेट की हैं। ये आवश्यकताएं अंग्रेजों को हिन्दुस्तान में लाती हैं और हिन्दुस्तानियों को अफ्रीका पहुँचाती हैं। ये आवश्यकताएं क्रिया प्रधान होते हुए भी बुद्धि प्रयोग से खाली नहीं है। इस क्रियात्मक वृत्ति के साथ मनुष्य की ज्ञानात्मक वृत्ति और भावनाप्रधान वृत्ति भी कुछ न कुछ अवश्य रहती है।

क्रियात्मक वृत्ति और ज्ञानात्मक वृत्ति के सहयोग से ईश्वर की बुद्धि को भी चक्कर में डालने वाले और अद्भुत शक्ति सम्पन्न यंत्र बल वाली मनुष्य शक्ति का नूतन रूप प्रकट हुआ है। इन वृत्तियों के इसी सहयोग में से वन ग्राम, देश बसे हैं और कुटुम्ब, जाति तथा समाज का प्रादुर्भाव हुआ है। फिर भी मनुष्य में रहने वाली अतुल शक्ति इस वृत्ति के पोषण में व्यय नहीं हो पायी है।

अब तक मनुष्य इस संसार में जीवित रहने के लिये ज्ञान प्राप्त कर रहा था और वह जीवन के प्रति भी मूक बना हुआ था, परन्तु अब जीवन का प्रश्न हल हो जाने के बाद क्रियात्मक वृत्ति का थोड़ा विश्राम मिलते ही मनुष्य की दृष्टि ऊपर प्रकाश की ओर जाती है। इतना विशाल अग्निपुँज सूर्यमंडल, शीतलता प्रदान करने और प्रतिदिन नये नये रूप धरने वाला चन्द्र तथा असंख्य तारा समूह क्या है और कहाँ से आये हैं? ये विचार उनके हृदय को आन्दोलित करने लगते है वह इन समस्याओं को सुलझाने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। अपने पैरों के नीचे रहने वाली पृथ्वी के विविध परतों की ओर जब वह ध्यान देता है तो उसके अनेक आश्चर्यों का भंडार अमूल्य रत्नों से भरपूर प्रतीत होता है। अपने ही उदर पोषण के लिए उपयोग में आने वाले पशु और वनस्पतियों की तरफ वह एक विचित्र नूतन दृष्टि से देखने लगता है और अपने मन से पूछने लगता है कि यह सब क्या है और कहाँ से आया? मन की दृष्टि पल पल में विशाल होती जाती है। इस दुनिया में होने वाले स्थूल दृश्यों का कार्य कारण सम्बन्ध खोजने की ओर उत्सुक-प्रवृत्त होता है। हमारे पूर्वज कौन थे? कब और कहाँ से आये? यह जानने के लिए वह कटिबद्ध हो जाता है। हमारे शरीर का ढांचा कैसा है और उसमें क्या करामात है? इसका पता लगाने के लिए वह उतावला हो उठता है। उसके मन की ज्ञान पिपासा यहाँ शान्ति नहीं हो जाती। मन अपने ही गुण धर्मों की खोज में निकल पड़ता है मनुष्य स्वयं कहाँ से आया और अब फिर कहाँ जायेगा, इसकी खोज का वह दृढ़ निश्चय कर लेता है। और इस शरीर तथा विश्व मात्र की रचना किसने और कैसे की, इन अनुत्तर प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए बेचैन हो उठता है।

मनुष्य की इस ज्ञानात्मक वृत्ति में से अनेक विज्ञान प्रकट हुए हैं। तत्व ज्ञान भी इसी वृत्ति का पुण्य प्रसाद है। क्रियात्मक वृत्ति वाला मनुष्य प्रकृति को अपने उपयोग के लिए जितना चाहता था, उसके ऊपर अधिकार पाने में आनन्द मानता था, परन्तु इस ज्ञान वृत्ति का मनुष्य प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। यद्यपि इस ज्ञान के कारण प्रकृति के ऊपर इसके अधिकार की वृद्धि ही होती जा रही है, फिर भी अभी तक मनुष्य की अन्तः शक्ति का अंत नहीं आ पाया है। एवं अपने लिए सुख चैन का संचय करता है, अपने आस पास की दुनिया में सर्वत्र कार्य कारण का सम्बन्ध खोज निकालता है, परन्तु फिर भी यह ऊँचा अनन्त नील नभ, वह चिरपुरातन योगी सदृश, वन वृक्षों की जटा धारण किये पर्वत और वह दूर दूर तक रजत-सम-श्वेत चादर ओढ़े शयन करता हुआ अति विस्तीर्ण सागर ये सब उसकी हृदयगत भावनाओं को आन्दोलित किये बिना नहीं रहते। खगोल विज्ञान का जो प्रत्यक्षदर्शी पंडित है ऐसे मनुष्य के लिए भी अभी सूर्योदय, पूर्णिमा की चन्द्रिका और अँधेरी रात्रि के तारों का समूह अपनी मूक ध्वनि में कोई न कोई नूतन कहानी प्रति दिन कहते चले जा रहे हैं। पेट के लिए वनस्पति जगत को हँसिये से काटने वाले कृषक अथवा आरे से लकड़ी चीरने वाले बढ़ई और औषध के लिए वनस्पतियों के अंगों पगों के टुकड़े करने वाले वैद्य को भी यही वनस्पति कभी-कभी सौंदर्य का अपूर्व उपदेश दे सकती है। नील नदी के समीपवर्ती सुन्दर प्रदेश की मन मोहक हवा में उड़ने वाले कीट पतंगों को अपने आहार के लिए चबाने वाले जंगली लोगों से लेकर शोरबे के लिए तीतर बटेर, कोयल अथवा मैना को उबालने वाले राजा महाराजाओं को अथवा जन्तु जगत के जीवन रहस्य और उनकी शरीर रचना के ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपनी प्रयोगशाला की मेज पर जीव जन्तु को बिना कम्पन के काटने वाले या गर्म पानी में उबालने वाले प्राणी शास्त्री को भी कभी-कभी पतंगों की अपूर्व प्राकृतिक रचना किसी न किसी विचार धारा में प्रवाहित कर ही देती है।

क्षुधातृप्त और ज्ञान तृप्त मनुष्य जब ऊपर आकाश में और नीचे पृथ्वी पर दृष्टि डालता है तो विविध भावना पूर्ण उसकी अन्तरात्मा कह उठती है कि अहो! यह सृष्टि सौंदर्य अद्भुत है। वह ब्रह्मांड का दर्शन करता है। जब इस दर्शन के समय उसका स्थूल और बौद्धिक स्वार्थ नष्ट हो जाता है, तो उसके हृदय में से उपनिषद् का स्त्रोत प्रवाहित हो जाता है। उसके गले में से अश्रत पूर्व संगीत ध्वनि निकल पड़ती है और उसके हाथों में से किसी सशक्त कला कृति का जन्म होता है। ये उपनिषद् बुद्धिप्रधान और शुष्क वेदान्त की सीमाओं को तोड़कर एक मात्र हृदय की अप्रतिम स्रोतस्विनी के रूप में वह निकलती है। ये काव्य केवल इतिहास भूगोल न रहकर इतिहास भूगोल की जड़ वस्तु को चेतनता प्रदान करते हैं। ये सब जिस वृत्ति में से जन्म लेते हैं उसी को आवेशात्मक (भावना प्रधान) वृत्ति कहते हैं। पेट भरने के बाद, अनन्त ज्ञान कोष संचित करने के पश्चात मनुष्य कुछ कहना, व्यक्त करना चाहता है। अपनी आत्मा को व्यक्त करने की इस वृत्ति में से कला मात्र की सम्पूर्ण कलाओं की उत्पत्ति है। इसी वृत्ति का अतिरेक होने पर मनुष्य के हृदय में परम गूढ़ नैतिक तथा आत्मिक तत्वों का दर्शन होता है।

जैसे क्रियात्मक वृत्ति के हम अनेक रूप देखते हैं, उसी प्रकार ज्ञानात्मक वृत्ति के और आवेशात्मक (भावनाप्रधान) वृत्ति भी बहु रूप धारी है। पेट के लिए की जाने वाली भिन्न प्रवृत्तियाँ सभी विज्ञान कलाएँ इन्हीं उपर्युक्त तीन वृत्तियों के फल है। मनुष्य ने अपनी ज्ञान वृत्ति से जैसे अनेक प्रकार के विज्ञान और उपयोग कलाएँ प्रकट की हैं। उसी प्रकार उसने भिन्न भिन्न ललित कलाओं को जन्म देकर अपनी कलावृत्ति का परिचय दिया है। आवेशात्मक कलावृत्ति के भेद तीन प्रकार है। (1) रूप विषयक भावना (2) ध्वनि विषयक भावना और (3) शब्द विषयक भावना। इस रूप विषयक भावना को प्रकट करते करते मनुष्य में से चित्र, शिला स्थापत्य तथा ऐसी ही अन्य कलाओं की सृष्टि हुई है। जब मनुष्य ध्वनि विषयक भावना को व्यक्त करने लगा तो उसमें से गायन वादन कला का जन्म हुआ और जब उसने शब्द विषयक भावना को प्रकट करने का प्रयत्न किया तो उसमें से साहित्य के नूतन नवनीति का अभिर्भाव हुआ है।


VigyapanSuchana

जनवरी 52 में ‘अखंड ज्योति’ का विशेषाँक

“सद् व्यवहार अंक” होगा

इस अंक के सम्पादक प्रो0 रामचरण महेन्द्र एम॰ ए॰ होंगे। इसमें प्रत्येक नागरिक के लिए अत्यन्त उपरिक एवं पठनीय सामग्री होगी। 1 जनवरी की प्रतीक्षा कीजिए।


बुद्धि की समता ही समाधि है।

(श्री बहिन श्री जय देवी जी)

बहुत से भाई बहिनों को समाधि के जानने में सन्देह होता हैं। कोई तो जड़ समाधि, जो कि एकान्त स्थान में बैठकर लगाई जाती हैं, उसी को समाधि कहते है। इससे अन्य चेतन समाधि, जो कि प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान में लगाई जाती हैं। उसको समाधि नहीं कहते। अब इन दोनों समाधियों में से कौन सी समाधि करने में सहज तथा फल में विशेष है, इस बात का निर्णय उत्तर, प्रश्न द्वारा किया जाता है।

प्रश्न- समाधि किसको कहते हैं? यानी समाधि का स्वरूप क्या है? (1) किस प्रकार समाधि की जाती है? (2) और प्रत्येक व्यक्ति चाहें स्त्री हो, या पुरुष हो, उसको किस प्रकार समाधि विधेय है?

उत्तर -समाधि, इसमें दो पद है। एक सम दूसरा धी। सम-समान, धी-बुद्धि। अर्थात् बुद्धि का समभाव में स्थिर होना समाधि है। दूसरा अर्थ सम का परब्रह्म है।

गीता में भगवान का वचन है कि -

‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म।’

जिस निर्दोष और सम ब्रह्म में चित्त समाधीय है यानि जिस ब्रह्म में चित्त समाधान यानी निश्चल किया जाए वह समाधि है। अर्थात् उस समरूप परमात्मा में सब ओर से बुद्धि को निरोध करके निश्चल करना समाधि है। यह पहिले प्रश्न का उत्तर है। दूसरे प्रश्न का उत्तर एक समाधि तो एकान्त स्थान में जाकर जगत से मुँह मोड़कर लगाई जाती है। और दूसरी समाधि जगत में रहते हुए सर्व व्यवहार करते हुए लगाई जा सकती है। इसका नाम चेतन समाधि है। इस चेतन समाधि को जगत व्यवहार के साथ लगा सकते हैं, यानि बुद्धि को जगत व्यवहार से विक्षिप्त नहीं होने देना, हानि-लाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान इत्यादि प्रत्येक समय में बुद्धि को सम रखना। क्योंकि यह हानि लाभ इत्यादि बाहर के धर्म है। उन बाहर के धर्मों को अपने अन्दर बुद्धि में नहीं लेना। जब जब बाहर के धर्म अन्दर जाए तब तब उनको बाहर ही रोकने का प्रयत्न करना। यानि हानि-लाभ, सुख-दुःख, काम क्रोध, इत्यादि यह बाहर के धर्म है इनको अन्दर बुद्धि में नहीं लेना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करते करते बुद्धि सम होने लगेगी और सम बुद्धि होना ही समाधि है।

इस चेतन समाधि को स्त्री हो चाहें पुरुष सब कर सकते हैं। यह समाधि करने में भी सुखकर हैं क्योंकि इस समाधि को करने के लिए कहीं एकान्त स्थान में आसन लगाकर बैठने की आवश्यकता नहीं है। यह समाधि तो चलते, फिरते, उठते, बैठते, सोते, जागते इत्यादि हर समय कर सकते हैं। किन्तु जब जब संसार के व्यवहार से बुद्धि चंचल अथवा विषम होने लगे तब तब बुद्धि को सम अथवा निश्छल करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार हमारा रोटी बनाने का चौका किसी अछूत व्यक्ति के आ जाने से छूत हो जाता है। इसी प्रकार यह बुद्धिरूपी चौका भी अछूत सुख-दुख, काम-क्रोध, हानि-लाभ, इत्यादि के आ जाने से छूत हो जाता है। क्योंकि काम, क्रोध आदि बाहर अनात्मा के धर्म बुद्धि से अन्य है। अन्यों के धर्म बुद्धि में आने से बुद्धि भ्रष्ट हो जायेगी और बुद्धि के भ्रष्ट होने से आत्मा का पतन। गीता में साक्षात् भगवान ने अपने मुखारविन्द से स्पष्ट कहा है।

‘बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।’

इस चेतन समाधि का फल अधिक और परिश्रम थोड़ा है। क्योंकि बिना चेतन समाधि के सिद्ध हुए तो आत्मा का उद्गार नहीं हो सकता।

बुद्धि को सम करना यही समाधि है, ऐसा तत्व वेत्ताओं का कथन ठीक ही है। क्योंकि आत्मा में कभी कोई विकार नहीं आता। आत्मा न कभी जन्मता है, न कभी मरता है, न कभी सुखी अथवा दुःखी होता है। बुद्धि ही जन्मती है, बुद्धि ही मरती है। बुद्धि के जन्मने मरने से आत्मा का जन्मना मरना आत्मा में प्रतीत होता है। बुद्धि के समभाव में स्थिर रहने में एक दृष्टान्त इस प्रकार है।

एक गृहस्थी सेठ जो सिद्धता करके प्रसिद्ध था। सब कोई मुक्त कंठ से उसकी सिद्धता की प्रशंसा किया करते थे कि- अरे भाई देखो, वह अमुक सेठ गृहस्थी होते हुए और गृहस्थ के सर्व व्यवहार यथावत करते हुए कैसा सिद्ध ज्ञानी है। भाइयों! हम सब को भी उस सेठ जैसा बर्ताव करना चाहिए, यदि मनुष्य जीवन का लाभ है। ऐसा सब किसी को कहते हुए एक दिन एक महात्मा ने सुना महात्मा ने सोचा कि गृहस्थी सेठ और ऐसा सिद्ध? चलकर उस सेठ की परीक्षा करनी चाहिए। ऐसा सोचकर महात्मा सेठ के घर चल दिये।

महात्मा सेठ के घर पहुँच कर सेठ से बोले बच्चा! हम तेरे यहाँ कुछ दिन ठहरना चाहते हैं। सेठ ने कहा बहुत अच्छा आइये विराजिये ! बढ़ा सौभाग्य है जो आप आये। महात्मा को रहते हुए जब कई दिन हो गये, तब एक दिन सेठ के पास खबर आई कि आपका अमुक जहाज समुद्र में डूब गया। यह सुनते ही सेठ ने अपने मुनीम से कहा कि कोष में से दस हजार रुपये दान कर दो। महात्मा चुपचाप बैठे-बैठे देखते रहें कुछ न बोले। इसके तीन दिन पीछे फिर खबर आई कि सेठ जी साहिब! आपका जहाज जो डूब गया था, सो निकल आया है कोई हानि नहीं हुई। यह सुन कर सेठ ने फिर मुनीम से कहा कि भाई इसी समय दस हजार रुपये फिर दान कर दो। यह वृतान्त देखकर अब की बार महात्मा सेठ से इस प्रकार कहने लगे।

महात्मा-अरे सेठ! तू यह बतला कि यह तेरी कमाई धर्म की थी अथवा अधर्म की थी। जो तेरी कमाई धर्म की थी, तब तो तुझे उसके डूबने पर दान नहीं करना चाहिए था। और यदि यह तेरी कमाई अधर्म की थी, तब उसके निकलने पर तुझे दान नहीं करना चाहिए था। यह तेरा दान करना दोनों प्रकार से असंगत है।

सेठ- महात्मा जी ! मैंने जहाज के डूबने अथवा निकलने की खुशी में यह दान नहीं किया है। चाहे कमाई धर्म की हो चाहे अधर्म की हो इससे कोई प्रयोजन नहीं। मैंने तो अपने मन को देखा कि जब जहाज के डूबने की खबर आई तो इस मन के अन्दर किसी प्रकार का विकार नहीं था, यह समभाव में ही स्थित था। तब मन की समभाव में स्थिति पर मैंने यह न्यौछावर रूप दान किया है। इसी प्रकार जहाज के निकलने की खबर आने पर भी मैंने मन को देखा कि मन के अन्दर क्या कोई हर्ष का चिन्ह है, परन्तु नहीं उसके अन्दर किसी प्रकार का कोई चिन्ह नहीं था, वह मन तो पूर्ववत् ही था, ऐसा देखकर फिर मैंने मन की न्यौछावर रूप यह दान किया है। तब महात्मा कहने लगे- बच्चा तू धन्य है! तेरा मन धन्य है!!

महात्मा सेठ की प्रशंसा करते हुए अपने स्थान को चले गये और कहने लगे कि सेठ क्या है, सेठ तो सच्चा ज्ञानी तथा सिद्ध है। ऐसी सिद्धि तो हमारे में भी नहीं, जो कि हम घर बार छोड़ कर एकान्त में आकर बैठे हैं।

यही सम बुद्धि का फल है। और सम बुद्धि करना या होना यही ब्रह्म का मिलना है। जहाँ बुद्धि में जब कोई विकार नहीं होता, तब बुद्धि समता रूप ब्रह्म में ही स्थित होती है, अर्थात् वहाँ पर सम ब्रह्म ही शेष रहता है क्योंकि यह बात हम सब को प्रत्यक्ष रूप से भी अनुभव में आती है कि जिस समय बुद्धि निर्विकार रूप से स्थित होती है तभी हम सब को आनन्द का अनुभव होता है। जिस समय बुद्धि में कुछ गड़बड़ होती है, तभी हम दुःखी हो जाते हैं अथवा घबरा जाते हैं जिस समय हमको अनुकूल यानि इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है उस समय हम सुख का अनुभव करते हैं किन्तु अज्ञानवश हम समझ लेते हैं कि इस वस्तु की प्राप्ति से हम को यह आनन्द प्राप्त हुआ है। परन्तु ऐसा नहीं कि इच्छित वस्तु के मिलने से हमारी बुद्धि समभाव को प्राप्त हुई और सम भाव परमात्मा हैं। बुद्धि के सम होने से स्पष्ट परमात्मा का प्रकाश बुद्धि में आया। बस परमात्मा के आनन्द से उस समय हमें आनन्द अथवा सुख की प्राप्ति हुई। यदि विषयों में आनन्द होता है तो विषय की प्राप्ति के पश्चात भी वैसा ही आनंद रहना चाहिए था। किन्तु ऐसा नहीं होता विषय प्राप्ति के कुछ समय पीछे वैसा आनन्द नहीं रहता। इसलिए सिद्ध हुआ कि सम बुद्धि ही समाधि है और वही परमात्म प्राप्ति है।


पापनाशक चान्द्रायण व्रत

पापों के प्रायश्चित्त के लिए जिन तपों का शास्त्रों में वर्णन हैं उनमें चांद्रायण व्रत का महत्व सर्वोपरि वर्णन किया गया है।

प्रायश्रित्त शब्द प्रायः+चित्त शब्दों से मिल कर बना है। इसके दो अर्थ होते है।

प्रायः पापं विजानीयात् चित्तं वै तद्विशोभनम्।

प्रायोनाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते॥

(1) प्रायः का अर्थ है पाप और चित्त का अर्थ है शुद्धि। प्रायश्चित अर्थात् पाप की शुद्धि।

(2) प्रायः का अर्थ है पाप और चित्त का अर्थ है निश्चय। प्रायश्चित अर्थात् तप करने का निश्चय।

दोनों अर्थों का समन्वय किया जाये तो यों कह सकते हैं कि तपश्चर्या द्वारा पाप कर्मों का प्रक्षालन करके आत्मा को निर्मल बनाना। तप का यही उद्देश्य भी है। चान्द्रायण तप की महिमा और साथ ही कठोरता सर्व विदित है। चांद्रायण का सामान्य क्रम यह है कि जितना सामान्य आहार हो, उसे धीरे धीरे कम करते जाना और फिर निराहार तक पहुँचना। इस महाव्रत के कई भेद है जो नीचे दिये जाते हैं -

(1) पिपीलिका मध्य चान्द्रायण।

एकैकं ह्रासयेत पिण्डं कृष्ण शुलेच वर्धवेत।

उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम्॥

अर्थात्- पूर्णमासी को 15ग्रास भोजन करे फिर प्रतिदिन क्रमशः एक एक ग्रास कृष्ण पक्ष में घटाता जाए। चतुर्दशी को एक ग्रास भोजन करे फिर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से एक एक ग्रास बढ़ता हुआ पूर्णमासी को 15 ग्रास पर पहुँच जावे। इस व्रत में पूरे एक मास में कुल 240 ग्रास ग्रहण होते हैं।

(2) यव मध्य चान्द्रायण -

प्तमेव विधि कृत्स्न माचरेद्यवमध्यमे।

शक्ल पक्षादि नियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम्॥

अर्थात्- शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास नित्य बढ़ाता हुआ पूर्णमासी को 15 ग्रास खावें। फिर क्रमशः एक एक ग्रास घटाता हुआ चतुर्दशी को 1 ग्रास खावें और अमावस को पूर्ण निराहार रहे। इस प्रकार एक मास में 240 ग्रास खावें।

(3) यति चान्द्रायण

अष्टौ अष्टौ समश्नीयात् पिण्डन् माध्यन्दिने स्थिते।

नियतात्मा हविष्याशी यति चान्द्रायणं स्मृतम्॥

अर्थात्- प्रतिदिन मध्यान्हकाल में आठ ग्रास खाकर रहें। इसे यति चांद्रायण कहते है। इससे भी एक मास में 240 ग्रास ही खाये जाते हैं।

(4) शिशु चान्द्रायण

बतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः।

चतुरोऽख्त मिते सूर्ये शुशुचान्द्रायणं स्मृतम्॥

अर्थात्- चार ग्रास प्रातः काल और चार ग्रास साँय काल खावें। इस प्रकार प्रतिदिन आठ ग्रास खाता हुआ एक मास में 240 ग्रास पूरे करे।

तिथि की वृद्धि तथा क्षय हो जाने पर ग्रास की भी बुद्धि तथा कमी हो जाती है। ग्रास का प्रमाण मोर के अड्डे, मुर्गी के अड्डे, तथा बड़े आँवले के बराबर माना गया है। बड़ा आँवला और मुर्गी के अंडे के बराबर प्रमाण तो साधारण बड़े ग्रास जैसा ही है। परन्तु मोर का अंडा काफी बड़ा होता है। एक अच्छी बाटी एक मोर के अंडे के बराबर ही होती है। इतना आहार लेकर तो आसानी से रहा जा सकता है। पिण्ड शब्द का अर्थ ग्रास भी किया जाता है और गोला भी। गोला से रोटी बनाने की लोई से अर्थ लिया जाता हैं यह बड़ी लोई या मोर के अंडे क प्रमाण निर्बल मन वाले लोगों के लिए भले ही ठीक हो। पर साधारणतः पिण्ड का अर्थ ग्रास ही लिया जाता है।

चान्द्रायण व्रत के दिनों में सन्ध्या, स्वाध्याय, देव पूजा, गायत्री जप, हवन आदि धार्मिक कृत्यों का नित्य नियम रखना चाहिए। भूमि शयन, एवं ब्रह्मचर्य का विधान आवश्यक है, कहीं-कहीं मुँडन करने का भी आदेश है।

प्रत्येक ग्रास का प्रथम गायत्री से अनुमंत्रण करे फिर ॐ। भूः। भूवः। स्वः। महः। जनः। तपः। सत्यं। यशः। श्रीः। अर्क। ईट। ओजः । तेजः। पुरुष। धर्म। शिवः इनके प्रारम्भ में ‘ॐ’ और अन्तः ‘नमः स्वाहा’ संयुक्त करके उस मंत्र का उच्चारण करते हुए ग्रास का भक्षण करें यथा- ‘ॐ सत्यं नमः स्वाहा’। ऊपर पंद्रह मंत्र लिखे हैं। इसमें से उतने ही प्रयोग होंगे जितने कि ग्रास भक्षण किये जायेंगे, जैसे चतुर्थी तिथि को चार ग्रास लेने हैं तो (1) ॐ नमः स्वाहा (2) ॐ भूः नमः स्वाहा (2) ॐ भूः नमः स्वाहा (3) ॐ भुवः नमः स्वाहा (4) ॐ स्वः नमः स्वाहा इन चार मंत्रों के साथ एक एक ग्रास ग्रहण किया जायगा।

व्रत की समाप्ति पर कम से कम तीन ब्रह्मणो का भोजन तथा एक गौ दान होता है।


Quotation

-भारत आत्म बल से सब कुछ जीत सकता है, आत्मा की शक्ति के आगे शरीर की शक्ति तृणवत् है।

-जिसका ईश्वर के सिवा और कोई अवलम्बन नहीं, वह जानता ही नहीं कि संसार में पराभव भी कोई चीज है।

-यदि संसार को आत्मा के अस्तित्व का विश्वास हो तो इस बात का सदा ध्यान रहना चाहिए कि शारीरिक बल की अपेक्षा आत्मिक बल कहीं श्रेष्ठ है। यह प्रेम का वह पवित्र सिद्धान्त है जिससे पर्वत हिल जाते हैं।


बहिनें सेवा पथ पर अग्रसर हो

(श्रीमती लक्ष्मी देवी जी बम्बई )

स्त्री स्वयं ही सेवा की मूर्ति है। सच देखा जाए तो स्त्री समाज की सेवा जाने अनजाने साधती ही रहती है वह पत्नी, गृहणी, और माता रूप में समाज के मुख्य कार्य को अपने सिर उठा लेती है। जो स्त्री पत्नी के रूप में रह कर पति को प्रेरणा देकर उसकी सलाहकार बन कर संसार की नाव को सलामती से चलाती है जो स्त्री गृहणी रूप में अपने निजी स्वार्थ को पुरुष के स्वार्थ के साथ संयुक्त कर सुन्दर व्यवस्था शक्ति के स्वभाव से घर के द्रव्यों-पार्जन (द्रव्य पैदा करने ) को शोभित करती है, जो स्त्री माता रूप में जगत को अमोल पुरुष और स्त्री की भेंट देती है, वह पत्नी वह गृहणी और वह माता बनने वाली स्त्री में किसी शक्ति की कमी है, यह तलाश करना बेकार है उसका जन्म ही सेवा के लिये है और वह सेवा के लिए ही दान में दी जाती है। ऐसा शास्त्रों का कहना हैं चाहे यह घड़ी भर मान ले कि स्त्री में सत्ता फैलाने की या लड़ाइयां लड़ने की शक्ति नहीं है तो भी सेवा करने की शक्ति लगन और स्नेह जो स्त्री में है वह पुरुष में नहीं पाई जाती यह तो स्पष्ट कहना ही होगा। पुरुष में स्वभावतः कठोरता मुख्य होती है। अतएव वह अपने स्वार्थ के लिए दया और माया को एक ओर भी रख सकता है। किन्तु स्त्री के स्वभाव से विपरित ऐसी कठोरता उसके आगे हार मानती है। अपने पुत्रों के मर जाने पर भी द्रौपदी ने अश्वत्थामा को क्षमा कर दिया था। इस प्रकार दया से पूर्ण स्त्री हृदय यदि विचार ले तो कौन सी सेवा नहीं कर सकती ?आज भी दुःख दर्द और गरीब को देख कर कठोर हृदय पुरुष खड़ा रह जाता है जब कि स्त्री हृदय को पिघलता हुआ किसने नहीं देखा होगा? यह सब बाते सिद्ध करती हैं कि जिसमें दया, माया और प्रेम के गुण प्रधान हैं उसकी सेवा की योग्यता के सम्बन्ध में तो कोई प्रश्न ही नहीं उठ सकता।

माता के रूप में उसकी समाज सेवा के बारे में तो कहना ही क्या? जितना इस सेवा में उसका अधूरापन है उतनी ही समाज की निर्बलता है। भारत वर्ष के वीर वीराँगनाओं व निर्माण करने वाली माताओं ने समाज, देश और राष्ट्र की कितनी सेवा की है कितने माताओं ने महान पुत्र और पुत्रियों की भेट प्रदान की है? सारा संसार उसका कितना कृतज्ञ है, इन सब का विचार करते हुए स्त्री को माता रूप में सेवा के लिए क्या कहा जाए और क्या नहीं यह प्रश्न जिसका अब तक निर्णय नहीं हो सका, सृष्टि की अन्तिम घड़ी तक विद्यमान रहेगी।

यह बात हमको स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि जब तक स्त्री का जीवन केवल मजदूरी से भरा हुआ है। जब तक उसको घर की व्यवस्था करने का ही भान है, जब तक स्त्री को उसमें रहने की शक्ति के विकास करने का सुयोग प्राप्त नहीं हुआ है, जब तक घर की और कुटुम्ब की बात में उसका दिमाग फँसा हुआ है, जब तक उसका स्वार्थ केवल घर के ही लिए रहेगा तब तक सारे समाज की सारे भारतवर्ष की उन्नति के प्रश्न स्वप्न ही है।

अब यह देखना है कि इस सेवा-मार्ग और सेवा क्षेत्र में स्त्रियाँ कहाँ-कहाँ और किस प्रकार काम कर सकती हैं? हमारी स्त्रियों की अवनति के अनेक कारणों में अज्ञानता मुख्य कारण है। वे 90 फीसदी अशिक्षित हैं और इस प्रकार शिक्षा और विकास के अभाव में इन्हें संसार की उन्नति का ध्यान तक नहीं होता, उन्हें अपनी स्थिति का भी भान नहीं होता और अपने पर आगे वाली अनेक आफतों एवं दुःखों की उत्पादक वे स्वयं ही होने से उसकी रोक नहीं कर सकती, और अनेक प्रकार से कष्ट उठाती हैं। दुख के कारण आसानी से दूर हो सकते हैं किन्तु अपनी अज्ञानता से वे सब सहे चली जाती हैं और इस प्रकार उत्तरोत्तर हमारे स्त्री-समाज ने आज की स्थिति अपने सिर ले ली है। इस अज्ञान और अशिक्षा को दूर करने के लिए प्रथम प्रयत्न स्त्री उन्नति के साधनों का करना जरूरी है।

इस बुझने वाले दीपक को प्रकाशित रखने और उस प्रकाश को बलवान बनाने के लिए मोहल्ले-मोहल्ले में शिक्षा देने की कक्षायें स्थापित करने की प्रवृत्ति अनेक स्त्री संस्थाएं कर रही हैं। किन्तु मुझे कहना चाहिए कि शिक्षित और विकसित कितनी ही सेवा-भावी बहिनों के ये प्रयत्न जनता की सहायता के बिना अधूरे ही रहते हैं और उनका काम कठिन हो जाता है। इसको स्वयं अनुभव करने वाला ही समझ सकता है। इन शिक्षा के वर्गों को धीरे धीरे अक्षर ज्ञान से बड़ा कर विविध कला उद्योग कक्षाओं में बदलना चाहिये। स्त्रियोपयोगी अनेक प्रवृत्तियों को लेकर काम करने की आवश्यकता है।

हमारे समाज में कितनी ही ऐसी रूढ़ियां गहरी जड़ कर गई हैं कि जिनके अस्तित्व से और जिनका पोषण करने से बुराई को उत्तेजना सी मिलती है। ऐसी गन्दगी को निर्मूल करने का कार्य पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ विचार लें तो मेरी समझ से बहुत आसानी से कर सकती हैं। विवाह काल की कितनी ही कुरीतियाँ, (कुरुढ़ियाँ,) अनिच्छनीय रोने पीटने का अशास्त्रीय रिवाज, मृत्यु के बाद असमर्थता में भी प्रतिष्ठा निभाने के लिए होने वाले शाँति-भोज, साँसारिक कलह, क्लेश, निन्दा, वहम, सन्देह और ऐसी अनेक बुराइयों को दूर करने का कार्य सेवा भावी बहिनें विचार करें तो अवश्य पूरा कर सकती हैं।

स्त्रियों को शिक्षा कला, उद्योग, सिखला कर उन्हीं के द्वारा कुरिवाज, वहम और क्लेश एवं कलुषित मनोवृत्ति को दूर करा कर अपने व्यक्तित्व को समझने के ज्ञान का प्रचार होना चाहिए। ऐसा करने के लिए ऐसी सेवावृत्ति रखने वाली बहिनों को स्त्रियों का विश्वास-पात्र बनने की सरलता और सफलता किस प्रकार साध्य करनी चाहिए, किस प्रकार सेवा करनी चाहिए, भावनाओं को किस प्रकार प्रकट करना चाहिए, इन सब बातों के ज्ञान देने की संस्थाओं में ही शिक्षा देकर तैयार कर, बाद में उन पर कार्य का भार रखना उचित है।

देश की उन्नति की इच्छा करने वाले के लिए प्रथम स्त्री समाज की उन्नति करने की हमारे यहाँ खास आवश्यकता है। स्त्री जीवन आज सामाजिक गन्दगी के कारण सड़ा पड़ा है। उसके उद्धार के लिए जैसा कि ऊपर कहा है, तदनुसार अज्ञानता का बादल हटा कर और उनको स्थिति का मान करावें तो आज जिस प्रकार कितनी ही स्त्रियाँ सेवा के लिए भोग दे रही हैं, वैसे ही देना सीख सकती है। इसलिए स्त्री जीवन को पहिले मजबूत करना आवश्यक है। सुनिश्चित स्त्रियों का कर्तव्य है कि अपनी अशिक्षित बहिनों के जीवन किस प्रकार उन्नत बनायें, इसकी लगन उनको रखनी चाहिए।


सहस्त्राँशु ब्रह्म यज्ञ का निमंत्रण

जिन्हें अन्तः प्रेरणा मिले वे इसमें सम्मिलित हो सकते हैं।

अब ऐसे शुभ लक्षण स्पष्ट प्रकट होते जा रहे हैं जिससे यह प्रतीत होता कि वर्तमान काल की चरम सीमा पर पहुँची हुई अधार्मिकता में सुधार होगा और संसार वर्तमानकालीन विषम पीड़ाओं से छुटकारा पाकर नवयुग में प्रवेश करेगा। जैसे एक ग्रहदशा के अंतर्गत लघुग्रह दशाएं बदलती रहती हैं वैसे ही कलियुग के अन्दर भी सतयुगी अर्न्तदशाएं आती हैं। हमें दिखाई पड़ता है कि सूक्ष्म लोकों में कुछ दिव्य आयोजन इसी प्रकार के हो रहे हैं।

उसी दैवी प्रेरणा का एक चिन्ह यह है कि इस वर्ष सात्विकता की प्रत्यक्ष प्रतीक, परम कल्याणकारिणी, महा महिमामयी, गायत्री उपासना का आयोजन सर्वत्र उल्लास पूर्वक हुआ। लोग इस सनातन श्रेय मार्ग को जिन स्थानों पर पूर्णतया भूल चूकें थे वहाँ अप्रत्याशित रूप से ऐसे आयोजन हुए, जिसने साधना, तपश्चर्या और सात्विकता की एक लहर प्रवाहित कर दी। गत आश्विन मास की नवरात्रियों में हमने एक साधारण अपील की थी कि” इस पुराण पर्व पर 24 हजार के लघु अनुष्ठान तपश्चर्या पूर्वक किये जाये।” वर्तमान काल की स्थिति को देखते हुए हमारा अनुमान था कि-’बहुत थोड़े लोग इस ओर ध्यान देंगे जो लोग साधना करेंगे उनके उत्साह को बढ़ाने और अन्यों को प्रेरणा देने के लिए उन साधकों के नाम अखण्ड-ज्योति में छापेंगे।’ परन्तु जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट है कि इस वर्ष नवरात्रि में जिन सज्जनों ने गायत्री के तप किये हैं उनकी संख्या इतनी अधिक है कि पूरी अखंड ज्योति में चार मास तक केवल नाम ही छापे जावें तो भी वह नाम पूरे नहीं हो सकते। इसलिए उन सब लोगों को हार्दिक अभिनन्दन करके ही सन्तोष कर लिया है। जिन सज्जनों के अन्य अनेकों साथी साधक प्रस्तुत किये उनके लिए हमारा विशेष रूप से अभिवादन है।

इस वर्ष एक बहुत ही उत्साह प्रद बात यह हुई कि अनेक स्थानों पर सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही दुर्गा पूजा की पशु बलि, पूर्णतया सदा के लिए बन्द कर दी गई और अब वहाँ माता के तमोगुणी रूप का त्याग कर सतोगुणी गायत्री रूप प्रतिष्ठित कर दिया गया। आशा है कि यह प्रवाह जोरों से बहेगा और माता को रौद्र वेश की अपेक्षा परम वात्सल्य मय सतोगुणी रूप में पूजा जायगा। बंगाल प्रान्त जो काली पूजा का प्रधान केन्द्र है। आशाजनक रूप से गायत्री की सात्विकता का अंचल पकड़ता दृष्टिगोचर हुआ है। यह प्रगति जारी रही तो भारत की पुण्य भूमि में पुनः जगद्गुरु कहलाने वाले तपस्वी ऋषि, विश्व की शान्ति रक्षा करने वाले चक्रवर्ती महापुरुष एवं रत्नगर्भा शस्य श्यामला भूमि का वैभव बढ़ाने वाले सुसम्पन्न नागरिक सर्वत्र दिखाई देंगे।

प्रायः लोगों को यह शिकायत रहती है कि वे दीर्घकाल से विभिन्न साधना करते आते हैं पर उन्हें कुछ चिन्ह दिखाई नहीं देता। परन्तु यह एक आश्चर्य ही है कि गायत्री की विधिपूर्वक व्यवस्थित साधना करने वाले साधकों में कोई विरले ही ऐसे होंगे जो यह अनुभव करते हों कि कोई दिव्य शक्ति उनके साथ नहीं चल रही है एवं कोई दिव्य ज्योति उनके भीतर नहीं जल रही है। गत जुलाई मास के गायत्री अंक में कुछ ऐसे अनुभव अखण्ड ज्योति में छपे थे। इन नवरात्रियों में तो ऐसे चमत्कारी अनुभव अत्यन्त विशाल परिणाम में हुए हैं। उनमें से जो छापने योग्य समझे जायेंगे सन् 52 की जुलाई के गायत्री अंक में छपेंगे। अधिकाँश साधकों ने माता की समीपता एवं प्रसन्नता के प्रत्यक्ष अनुभव किये हैं।

हम अब तक के जीवन में निरन्तर गायत्री उपासना में प्रवृत्त रहे हैं। गायत्री शोध के लिए शास्त्राध्ययन, इस विद्या के सिद्ध पुरुषों की खोज, निज की तपश्चर्या, अन्य व्यक्तियों को इस मार्ग की प्रेरणा देना, आदि कार्यक्रमों में हमारे जीवन का अधिकाँश भाग व्यतीत हुआ है। अनेक ऐसे आशाजनक परिणाम हमने देखे हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ अनावश्यक है। पर इस वर्ष नवरात्रि में हमें स्वयं ऐसा प्रकाश मिला जो अब तक के अनुभवों से ऊँचा है। सदा से हम नवरात्रियों में साधारण उपवास करते थे इस वर्ष हमारा पूर्ण निराहार, केवल जल के आधार पर उपवास हुआ। जहाँ गतवर्षों में सदा शारीरिक निर्बलता आती थी वहाँ इस वर्ष वैसा अनुभव तनिक भी नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त माता की समीपता का जैसा स्पष्ट अनुभव इस बार हुआ वैसा पहले कभी भी न हुआ था।

हमारा चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों का निर्धारित लक्ष पूरा हो गया। अब इसके पश्चात् आगे क्या करना, यह प्रश्न विचाराधीन था। उसका हल माता ने स्वयं ही कर दिया है। आदेश मिला है कि-”सवालक्ष द्विजों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान करा देने की साधना की जाए।” मूर्तिवत् होकर विजयादशमी को अपनी नवरात्रि उपासना की पूर्णाहुति करते हुए यह संकल्प कर दिया गया। परन्तु अब मन में नाना प्रकार के संकल्प विकल्प उठ रहे हैं। आज के युग में लोगों की मनोवृत्ति जैसी हो रही है। उसमें एक स्थान पर दस पाँच आदमी भी धार्मिक विचारों के मिलने कठिन हैं। फिर सवा लाख तो इतनी बड़ी संख्या है कि मस्तक चकरा जाता है। इस युग के भोग और स्वार्थ परायण मनुष्यों में से हमारे जैसा दुर्बल योग्यता का व्यक्ति किस प्रकार सवालक्ष जैसी विशाल संख्या में माता का सन्देश पहुँचा सकेगा, यह कार्य बड़ा दुस्तर मालूम होता है। परन्तु दूसरे ही क्षण नव आशा का संचार होता है। महाशक्ति अपना काम स्वयं कर रही है। हमें तो केवल मात्र निर्मित बनना है। जिस प्रेरणा से आज अगणित व्यक्ति,परम कल्याणमयी सात्विकता की प्रतीक माता की शरण में आ रहे हैं, उसी प्रेरणा से यह महाकार्य भी पूर्ण होगा। प्राचीन काल में महाप्रभु अंगिरा के आदेशानुसार नारद जी ने अधार्मिकता का परिमार्जन करने के लिए 24 करोड़ भगवद् भक्त बनाने का व्रत लिया था। नारद ने अपनी शक्ति से नहीं, दिव्य शक्ति की सहायता से उसे पूरा किया। हमें यह सवालक्ष गायत्री ज्ञाता बनाने की प्रेरणा देने वाला प्रेरक शक्ति ही प्रधान साधन बनेगी। हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति तो अपनी अयोग्यता और कार्य की महानता इन दोनों की तुलना करने मात्र से काँप जाता है।

हमारे अनेक प्रेमी, साथी, स्वजन, सहयोगी श्रद्धालु और गुरु जन हैं। वे समय समय पर पूछते रहते हैं “-हमें किसी बात की आवश्यकता हो तो लिखें।” हम सदा ही उनकी सद्भावना के लिए धन्यवाद देते रहे हैं क्योंकि हमें व्यक्तिगत रूप से कभी किसी बात की आवश्यकता नहीं होती। इस बार सवालक्ष सत्पुरुषों को गायत्री का समुचित ज्ञान देने का जो संकल्प किया गया है वह ऐसा है कि अनेक मनुष्यों के सहयोग के बिना पूरा नहीं हो सकता, इस अवसर पर हम अपने सभी सहयोगियों को थोड़ा थोड़ा हाथ बटाने का निमंत्रण देते हैं। माता जिनके अन्तः करण में प्रेरणा दें, जो व्यक्तिगत रूप से हमारा भार हलका करना चाहें, जिन्हें इस पुण्य प्रचार से अपना तथा संसार का कल्याण दीखता हो, उनसे हमारा विशेष रूप से अनुरोध है कि आलस्य त्याग कर वे थोड़ा सा प्रयत्न इस दशा में अवश्य करें।

इस संकल्प में हमारे बोझ के नीचे अपना कंधा लगाने वालों को चाहिए कि वे किसी दिन अवकाश के समय अपने परिचित उन सज्जनों के नाम नोट करें जो धार्मिक प्रवृति के हों। फिर अपनी गायत्री पुस्तकों को एक एक करके उन्हें पढ़ाना आरम्भ कर दें। जिसने पूरी पुस्तकें पढ़ ली हों उसे “समुचित गायत्री ज्ञान प्राप्त” कहा जा सकता है। जिन्हें अपना गायत्री साहित्य पढ़ाया जाए उन्हें इसके लिये भी उत्साहित करना चाहिए कि वे भी इसी प्रकार अपनी पुस्तकें मँगाकर अन्यों को आपकी ही भाँति यह ब्रह्मदान दें। यह श्रृंखला टूटने न पावे, थोड़े बहुत भी नये गायत्री प्रचारक पैदा होते रहे, तो बहुत भारी काम पूरा हो सकता है। जिसके पास पूरा गायत्री सैट नहीं वे छोटे सैट से भी काम चला सकते हैं।

ऐसे दस पाँच समुचित ज्ञान प्राप्त स्त्री पुरुष बना देना हर एक प्रयत्नशील व्यक्ति के लिए कुछ अधिक कठिन नहीं है। जिस व्यक्ति को पढ़ाया गया हो उसका पूरा पता और जो जो पुस्तकें पढ़ाई गई हों उनके नाम, हमें अवश्य सूचित कर देने चाहिए ताकि यह जाना जा सके कितनी प्रगति हो रही है और उस सूचना की सच्चाई की परीक्षा भी हो सके।

इस सहयोग योजना में-अनावश्यक संकोच, शर्म और झिझक को छोड़ कर दूसरों से गायत्री विद्या चर्चा करने का साहस बटोरने की सबसे प्रथम आवश्यकता है। पुस्तकें देने जाने और वापिस लाने का झंझट भी है। सुरक्षा के लिए पुस्तकों की जिल्द बनाने में, कुछ पुस्तकें फटने टूटने या गुम होने में तथा जो पुस्तकें नहीं हैं उन्हें मँगाने में थोड़ा खर्च भी है। परन्तु किसी भी मनस्वी व्यक्ति के लिए यह तीनों ही कार्य ऐसे नहीं है जिसे वह न कर सके। धर्म कर्म में कुछ न कुछ त्याग एवं कष्ट सहन करना ही पड़ता है, इस महान आध्यात्मिक ब्रह्म यज्ञ की सवालक्ष आहुतियाँ की दिव्य योजना को पूर्ण करने वाले होताओं को कुछ भी झंझट न उठाना पड़े यह हो भी नहीं सकता। स्मरण रहे यह आयोजन अत्यंत गंभीर सत्परिणाम उपस्थित करने वाली है। इस सहस्रांशु ब्रह्मयज्ञ में युग परिवर्तन के बीज छिपे हुए हैं। जैसे नव प्रभात की पुण्य संध्या में ब्राह्मी साधना आवश्यक होती है, उसी प्रकार नाना विधि पाप तपों से त्रास देने वाली इस घन घोर अन्धकारमयी निशा का परिवर्तन करके, शान्तिदायक सतोगुणी ऊषा के स्वागत में यह यज्ञ किया जा रहा है। इसमें सम्मिलित होना, सहयोग देना, हर एक जागृत आत्मा का पवित्र कर्तव्य है।

प्रण पूरा न हो सकने पर हमें जो आन्तरिक कष्ट होगा और उसके लिए जो प्रायश्चित हमें करना पड़ेगा उसकी कल्पना सचमुच कष्टकारक है। उससे बचने के लिए भी हम सब थोड़ा-थोड़ा प्रयत्न करें तो सुखद परिणाम के निकट बहुत जल्दी पहुँच सकते हैं।

इस महान् यज्ञ में साझीदार बनने के लिए हम उन सब आत्माओं को आमंत्रित करते हैं जिनके अन्दर दैवी प्रकाश काम कर रहा हो। इस साझेदारी का पुण्य फल कितना आनन्ददायक होगा इसका प्रत्यक्ष अनुभव हमारे सहयोगी समय आने पर ही कर सकेंगे। यह निश्चित है कि यह सहयोग किसी का भी निष्फल न जायेगा।


गायत्री तीर्थ निर्माण का शुभारंभ

(श्री रामदास विष्णु पाटिल, सावदा)

पिछली गर्मियों में अपनी धर्म पत्नी और पुत्रियों सहित मैं मथुरा गया था। अखंड ज्योति के आरम्भ काल से ही उसका सदस्य हूँ और आचार्य जी के प्रति मेरी असाधारण श्रद्धा है। बहुत दिनों से उनके दर्शनों की इच्छा थी। सुयोग आया। मथुरा पुरी की तीर्थ यात्रा के साथ साथ आचार्य जी के दर्शनों की भी अभिलाषा पूर्ण हुई।

जितने दिनों मथुरा ठहरना हुआ, आचार्य जी से बराबर मिलता रहा। और उनकी विचार धारा, एवं कार्य पद्धति को ध्यान पूर्वक देखता रहा। उनके व्यक्तिगत उज्ज्वल चरित्र, अथाह अध्ययन, सूक्ष्म तत्व ज्ञान, असाधारण व्यक्तित्व एवं आश्चर्यजनक तप को देख कर मैं जितना प्रभावित हुआ, उतना अपने जीवन में बहुत कम अवसरों पर प्रभावित हुआ हूँ। इस युग में किसी पर सहसा विश्वास करना कठिन है। बहुधा दूर से जो लोग बहुत ऊँचे दिखाई पड़ते हैं वे निकट पहुँचने पर बहुत ही छोटे सिद्ध होते हैं। इसलिए मैं भी संदेह में ही था। पर मथुरा पहुँचने पर जो छाप मेरे ऊपर पड़ी वह अमिट है। इतने सरल, सौम्य, सादा फलेवर में इतनी महान आत्मा रहती है यह एक पहेली तो है पर उसने मेरे मन में आश्चर्य का नहीं, श्रद्धा का आविर्भाव किया। कुछ दिनों बाद मैं वापिस घर लौट आया।

घर आकर भी मैं उस सत्य को भूल न सका जो मथुरा में मेरी बुद्धि ने, आँख, कानों ने, आत्मा ने अनुभव किया था। आचार्य जी जहाँ जन साधारण को प्रभावशाली धर्मोपदेश देकर, सद्विचार देकर सन्मार्ग पर लाने के लिए प्रयत्नशील हैं वहाँ वे गायत्री महाशक्ति के अनादि महत्व को पुनर्जीवित करने के लिए भी संलग्न हैं। गायत्री भारतीय धर्म की नींव है, भारतीय संस्कृति की आधार शिला है। जो कुछ हमारा ज्ञान, विज्ञान, आदर्श, धर्म एवं आचार है उसका उद्गम केन्द्र गायत्री है। साधारणतया लोग यही समझते हैं। इस रहस्य को कोई विरले ही समझते हैं कि इन 24 अक्षरों में पूरा धर्मशास्त्र, सम्पूर्ण योग साधनाएं एवं समस्त ज्ञान विद्वानों के बीज छिपे पड़े हैं। जप के अतिरिक्त इस महाशक्ति का मानव जीवन में क्या महत्व है, इस विस्तृत तत्व ज्ञान की जितनी वैज्ञानिक खोज और प्रयोगात्मक साधना आचार्य जी ने की है, यह कहा जा सकता है कि इस युग में और किसी ने नहीं की है। इन बातों पर विचार करते हुए मेरा हृदय बहुधा उल्लासित और उत्साहित होता रहता कि भारत भूमि में ऐसी आत्माओं का अभी अभाव नहीं है जो हमारे सर्वोपरि एवं प्राचीनतम तत्वज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिये, प्रकाश में लाने के लिए, ऊँचा उठाने के लिए भागीरथ प्रयत्न कर रही है।

जुलाई में अखंड ज्योति का गायत्री अंक निकला, उसमें गायत्री की ओर श्रद्धा बढ़ाने वाली बड़ी अमूल्य सामग्री थी। उसी में एक लेख ऐसा था जिसमें बताया गया था कि-”मथुरा गायत्री की सिद्धि पीठ है। उस भूमि में अनेक ऋषियों ने गायत्री तप करके सिद्धि प्राप्त की है। आचार्य जी ने भी इन्हीं विशेषताओं के कारण उस क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया है।”

इस बात को जानने वाले अनेक व्यक्ति मथुरा जाकर आचार्य जी के संरक्षण में गायत्री साधना करना चाहते हैं पर ठहरने की कोई व्यवस्था न होने से उन्हें मन मार कर वापिस लौटना पड़ता है। अखंड ज्योति प्रेस और आचार्य जी का निवास एक छोटे से घर में है, उसमें अन्य व्यक्यों को ठहरने की गुंजाइश नहीं। धर्मशाला वाले तीन दिन से अधिक ठहरने नहीं देते। मकान किराये पर मिलना सरकार की आज्ञा पर ही निर्भर है। इन कारणों से दसियों साधक हर महीने निराश होकर वापिस लौटते रहते हैं।”

उसी लेख के लेखक ने यह भी सुझाया था कि “मथुरा में एक गायत्री तपोभूमि की स्थापना होनी चाहिए। जहाँ गायत्री विद्यालय, प्रचार केन्द्र, अखंड जप, पुरश्चरण, यज्ञ, औषधालय, पुस्तकालय आदि का आयोजन रहे, ऐसा तीर्थ भारतवर्ष भर के गायत्री उपासकों का एक मात्र केन्द्र होने तथा अपनी उपयोगिता के कारण देश भर में प्रख्यात होगा और उससे अनेक आत्माएं शान्ति, उन्नति एवं सद्गति प्राप्त करेंगी”

उस सुझाव की आवश्यकता और उपयोगिता मुझे अत्यधिक प्रतीत हुई क्योंकि मथुरा जाकर मैं स्वयं यह भली प्रकार अनुभव कर चुका हूँ कि ऐसा आश्रय न होने के कारण कितनी भारी सार्वजनिक, धार्मिक क्षति हो रही है। इसमें दोष आचार्य जी का भी है कि वे इस सम्बन्ध में किसी को कभी कोई प्रेरणा नहीं देते और अपने शरीर से जितना हो सके उतना करके ही संतुष्ट हो जाते हैं। मैं ऐसे स्थान की बड़ी भारी आवश्यकता अनुभव करता हूँ परन्तु विवशता यह है कि ईश्वर ने मुझे धनी नहीं बनाया अन्यथा यदि थोड़ी भी सुविधा मुझे होती तो मैं अकेला ही इस तीर्थ को बनवाने में अपना सौभाग्य मानता। अपनी साधारण आर्थिक स्थिति होते हुए भी “एक हजार एक रुपया 1001/- रु” इस लेख के साथ आचार्य जी के पास भेज रहा हूँ। मेरे परम मित्र भी रंगनाथ नाना जी वारडे ने भी 126/- रु दिये हैं। यह तुच्छ भेंट उपस्थित करते हुए हम लोग विवशता अनुभव करते हैं कि यदि सामर्थ्य रही होती तो इस मंदिर का श्रेय हमें ही मिला होता।

आज की मंहगाई बहुत अधिक है। दस वर्ष पर्व जो छोटा सा मकान ढाई तीन हजार का बन जाता था उसके लिए अब पन्द्रह बीस हजार चाहिए। विशाल मन्दिरों के लिए तो बहुत धन चाहिए। पर छोटा सा काम चलाऊ स्थान जहाँ साधकों की आवश्यकता पूरी हो सके, गायत्री का अखंड ज्योतिर्लिंग जहाँ निशदिन प्रज्वलित होता रहे, जहाँ अखंड गायत्री पुरश्चरण जारी रहे, प्रतिदिन यज्ञ होते रहे, गायत्री विद्या का अध्ययन जारी रहे, उसके लिए काम चलाऊ बहुत छोटा स्थान बनाने पर भी पन्द्रह बीस हजार रुपये सहज लग जायेंगे। धनी लोगों के लिए यह रकम बहुत छोटी है। कोई एक सम्पन्न व्यक्ति इतना कार्य अकेला कर सकता है या अपने कई साथियों को शामिल करके उसे पूरा करा सकता है। यह भी न हो सके तो मेरे जैसे मध्यम वर्ग के लोग अपनी सामर्थ्यानुसार थोड़ा थोड़ा देकर यह छोटी सी राशि जमा कर सकते हैं। जिनमें सामर्थ्य और श्रद्धा है, उनके सामने इस आवश्यकता को अच्छे प्रभावशाली ढंग से रखने का कार्य यदि कोई प्रतिभावान पुरुष करे तो स्वयं कुछ न देते हुए भी दूसरे सामर्थ्यवानों से इस कार्य को पूरा करा सकता है।

आज धार्मिक भावना की कमी नहीं है, धन की भी कमी नहीं है। कमी केवल दूरदर्शिता और सूक्ष्म दृष्टि की है। यदि हम समझ लें कि यह छोटा सा मन्दिर कितना महान कार्य सम्पन्न करेगा, इसके द्वारा कितनी धर्म वृद्धि होगी और उस धर्म वृद्धि में उसे बनवाने वाले को कितना अक्षय पुण्य मिलेगा, तो यह स्थान बनते देर न लगेगी। दिल्ली और मथुरा के “विडला मन्दिर” देश भर में प्रसिद्ध हैं क्योंकि वे अन्य मंदिरों की अपेक्षा अधिक उपयोगी हैं। यह गायत्री मंदिर छोटे स्थान में होते हुए भी, कम पूँजी का बने होते हुए भी, विडला मंदिरों से अधिक उपयोगी होगा। क्योंकि देश भर के गायत्री साधकों, तपस्वियों, श्रद्धालुओं एवं सिद्ध पुरुषों का यहाँ सदा ही सम्मेलन होता रहेगा। और नवरात्रियों में तो स्वभावतः यहाँ एक सतयुगी तपोभूमि के दृश्य दिखाई पड़ा करेंगे। ऐसे स्थान बनाने वाले की कीर्ति, एवं प्रशंसा का देश भर में विस्तार होगा, और उसे जो पुण्य लाभ होगा उसकी तुलना तो साधारण शुभ कर्मों से की ही नहीं जा सकती। ईश्वर की लीला विचित्र है। चंदन में सुगंध तो है पर सोने जैसी चमक नहीं। सोने में आभा तो है पर चन्दन जैसा सुगन्ध नहीं। काश, चन्दन सोने जैसा चमकता या सोने में चन्दन जैसी सुगंध होती तो कितना अच्छा होता। जिनके पास भावना है उसके पास धन नहीं, जिनके पास धन है उनके पास वह भावना और दूरदर्शिता नहीं दिखाई देती कि ऐसी उपयोगी आवश्यकता को पूर्ण करने में अपनी कमाई को धन्य बनावें।

मैंने एक हजार रुपये की छोटी सी रकम इस शुभ कार्य के लिए अर्पण की है यह धन थोड़ा सा ही है इतने में तो भूमि भी नहीं खरीदी जा सकती, फिर भी यह तुच्छ भेंट उन लोगों के लिए एक चुनौती है जिन्हें ईश्वर ने धन, दूरदर्शिता, भावना, सद्बुद्धि, और प्रतिभा प्रदान की है। मैं स्वल्प साधन सम्पन्न इतना करता हूँ तो क्या वे लोग जो अनेकों बातों में मुझसे बढ़े चढ़े हैं, इस पुण्य कार्य को पूरा करने में अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग न करेंगे?

यह निश्चित है कि यह पुण्य स्थल बन कर रहेगा। माता ऐसे आवश्यक कार्य को कदापि अपूर्ण न रहने देगी। अब केवल यही देखना शेष है कि इसका श्रेय किन सौभाग्यशाली सज्जनों को माता प्रदान करती है।

मन्दिर तो तपश्चर्या और साधना का पवित्र स्थान रहेगा। उसमें ठहरने पर मल, मूत्र, थूक, झूठन आदि की अपवित्रता फैलाना उचित नहीं इसलिए उसके समीप ही साधकों के ठहरने के लिए अलग से छोटे छोटे कुटीर होने चाहिए। ऐसे कुटीर लगभग पाँच पाँच सौ की लागत में बन सकते हैं। अपने नाम से, अपने स्मारक स्वरूप एक एक कुटीर तो बहुत साधारण स्थिति के व्यक्ति भी बनवा सकते हैं। उनमें ठहरने वालों के पुण्य का श्रेय उस बनाने वाले को भी मिलेगा।


क्या खाऐं क्या न खाऐं?

(डा. अवनीन्द्र नाथ चौधरी, रंगपुर)

एक विद्वान् का कथन है कि मनुष्य जैसा खाता है वैसा ही होता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हम जो कुछ खाते हैं उसका हमारे मन और शरीर पर भारी असर पड़ता है। भूखों को भोजन देने की समस्या अत्यंत महत्वपूर्ण है, परन्तु क्या खाना चाहिए, यह समस्या किसी भी दृष्टि से उसके कम महत्वपूर्ण नहीं है।

अधिकतर बीमारियाँ इसीलिए होती हैं क्योंकि हम यह नहीं जानते कि हमें क्या खाना चाहिए। आज हम देखते हैं कि अस्वस्थता, बीमारी और पीड़ा का चारों ओर साम्राज्य है। समस्त नाशकारी बीमारियां घटने के बजाय बढ़ रही हैं। जैसे मधुमेह, कैंसर, तपेदिक, हृदय रोग इत्यादि।

विज्ञान-सम्मत नया विचार यह है कि मनुष्य का शरीर सोलह से लेकर बीस खनिज तत्वों का बना हुआ है। उस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए यह अनिवार्यतः आवश्यक है कि ये खनिज तत्व भाँति-भाँति के नमक-शरीर में समुचित मात्रा में मौजूद रहे। ये तत्व शरीर में वही काम करते हैं जो समाज में मेहतर, यानी गन्दगी को सफाई का तथा खून को विकार हीन (साफ) करने का। ये यूरिक एसिड जैसे जहरों को शरीर से निकाल कर फेंकने में मदद देते हैं। वे ही प्रकृति की यथार्थ औषधियाँ हैं जो बीमारियों के मूल कारणों को दूर करती हैं। वे ही शरीर के कण-कण, रोम-रोम और पोर-पोर को वह सजीव शक्ति देते हैं जिससे वे बीमारी के कीटाणुओं के आक्रमण से अपनी रक्षा कर सकें।

इन तत्वों के अलावा दूसरी यह चीज है कि जिन पदार्थों से भोजन में शरीर को इतना पोषण मिले कि जिससे उनमें प्राण शक्ति का संचार हो, उसे ही विटामिन कहते हैं। इस तरह विटामिन असल में भोजन में रहने वाली प्राण शक्ति हुई। यह प्राण शक्ति सजीव, नई, ताजी और प्राणप्रद पदार्थों में ही पाई जाती है। ज्यादा छोल-छील या पकाने की प्रक्रिया में उनके नष्ट हो जाने का डर रहता है। अगर हम ताजे फल काफी मात्रा में खावें, और हरे साग व तरकारियों का पूरा-पूरा उपयोग करें तो हमें यह प्राणदा शक्ति (विटामिन) पर्याप्त मात्रा में मिल सकती है। फलों में मेवाएँ भी शामिल हैं। यानी अनार, सन्तरा, सेब, अंगूर, केला, अमरूद, नासपाती, वगैरः के साथ-साथ छुहारे, किसमिस, बादाम वगैरः का भी प्रयोग किया जा सकता है। इन मेवाओं में भी विटामिन मौजूद है। हरे सागों में, बथुआ, पालक, मेथी वगैरः में तथा टमाटर वगैरः में विटामिन बहुत ज्यादा तादाद में पाये जाते हैं। इसलिए सब लोगों को चाहिए कि वे भोजन में इन हरे सागों का खूब प्रयोग करें। ये बातें स्टेन लीलिफ नाम के एक अंग्रेज विशेषज्ञ ने लिखा है। उसने यह भी बताया है कि कबूतरों पर इस बात का प्रयोग करके देख लिया गया है। एक ही उमर और एक ही स्वास्थ्य के दस कबूतरों को पाँच-पाँच की दो टोलियों में बाँट दिया गया। इनमें से जिस टोली को पोषक भोजन, खनिज तत्व और विटामिनों वाला भोजन दिया गया वह सुखी और स्वस्थ पाई गई तथा दूसरी टोली दुखी और बीमार। इसके बाद पहली टोली को दूसरी का भोजन दिया गया और दूसरी को पहला। नतीजा यह हुआ कि दुखी और बीमार टोली सुखी और स्वस्थ हो गई तथा सुखी और स्वस्थ टोली दुखी और बीमार। इससे यह जाहिर है कि हमारे स्वास्थ्य पर हमारे भोजन का तुरन्त और प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। इस विशेषज्ञ का कहना है कि सभ्यता की धुन में हमने भोजन को नष्ट कर दिया है। आपका कहना है कि पोषक और प्राणप्रद भोजन के लिए, स्वास्थ्य के लिए, यह अनिवार्यतः आवश्यक है कि -

(1) मैदे की जगह हम चक्की के पिसे आटे का चोकरदार आटे का प्रयोग करें क्योंकि मैदे में से गेहूँ का प्राण-तत्व जाता रहता है।

(2) इसी तरह साफ शक्कर और उस की बनी हुई मिठाइयों की बात है। इसकी जगह गुड़ कहीं अधिक प्राणप्रद होता है।

(3) चीजों को जहाँ तक हो सके उनके प्राकृतिक रूप में ही खाया जाये। बहुत ज्यादा पकाने वगैरह में भी उसके प्राण-तत्व जल जाते हैं।

(4) ताजी, हरी तरकारियों का, फलों का और मेवाओं का प्रयोग जितना ज्यादा किया जाये अच्छा है। इन्हीं में वे खनिज तत्व होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाजिमी हैं।

(5) बहुत ज्यादा गोश्त, मछली, अण्डे, मुर्गी वगैरह खाना हानिकारक है। इससे तेजाब पैदा होता है। इनके बजाय दूध, दही, पनीर वगैरः का इस्तेमाल उनसे सब बातों में कहीं ज्यादा अच्छा गुणकारी है।

(6) रोटी, केक, बिस्किट, वगैरः भी ज्यादा नहीं खाने चाहिए। इनके बजाय सूखी मेवाऐं, अंजीर, छुआरे, खजूर, वगैरः खाये जाने चाहिए।

(7) सब्जी-तरकारी वगैरः को ज्यादा पानी में उबाल कर पानी फेंकने की आदत बहुत बुरी है। उसका सब प्राण-पत्व उसी पानी में चला जाता है और तरकारी के बजाए महज मसाले मिली घास रह जाती है।

(8) सार हीन भोजन-जैसे चटनी, चाय, कहवा, शराब वगैरः।

(9) भोजन के सम्बन्घ में हमारी एक बहुत बुरी आदत यह है कि हम भोजन अच्छी तरह चबा कर नहीं खाते उसे जल्दी-जल्दी सटक जाते हैं।

(10) इनके अलावा हम एक और बुरी बात करते हैं कि जितना खाना चाहिए उससे ज्यादा खा जाते हैं। भोजन-सम्बन्धी और किसी बुरी आदत से हमें इतनी हानि नहीं पहुँचती जितनी ज्यादा खा जाने की आदत से।

यह जाहिर है कि पोषक भोजन खर्चीला भोजन नहीं है, हरे साग और सब्जियाँ साधारण लोगों को भी मिल सकती है। दूध-दही भी मध्यम श्रेणी के लोग हासिल कर सकते हैं। हर हालत में ज्यादा मिठाइयाँ और ज्यादा घी की चीजों से, नफासत की चीजों से, स्वस्थ भोजन सस्ता ही रहेगा। मौसम के फल और साग सस्ते भी होते हैं और पोषक तथा गुणकारी भी। उनका खूब प्रयोग कीजिए। गेहूँ के मोटे आटे की रोटी खाइये। दूध पीजिए, दही उड़ाइये। आपका भरपूर पोषक भोजन मिल गया। चाय, मिठाई, ज्यादा घी वाली तरकारियाँ और शराब वगैरः में लोग कितना खर्च करते हैं उतने से चौथाई खर्च में ही वे पोषक भोजन पाकर स्वस्थ रह सकते हैं और डाक्टरों के बिलों से भी बच सकते हैं। मोटे आटे की रोटी मैदे के बजाय खाने में, और हरे साग तथा टमाटर वगैरः खाने में उन लोगों का खर्च बढ़ता नहीं बल्कि घटता है जो मैदे की चीजों को और ज्यादा घी वाली पकी हुई मसालेदार तरकारियों का प्रयोग करते हैं तथा चाय, कहवा शराब वगैरः के आदी होते हैं। पोषक भोजन सस्ता भोजन है, खर्चीला नहीं, यदि सरकार अच्छी हो तो देश के हर शख्स के लिए पोषक भोजन का प्रबन्ध हो सकता है। उसे खूब चबा कर खाने पर देश स्वस्थ सुखी और सबल हो सकता है।

स्वास्थ्य और भोजन के कुछ आवश्यक नियम

(1) भोजन नित्य निश्चित समय पर ही करो। उन समयों के सिवा अन्य समयों में कुछ न खाओ।

(2) पेट भर कभी न खाओ। भूख कुछ रहते ही खाने से हाथ रोक लो।

(3) जितना तुमको खाना है उससे जरा भी ज्यादा मत परोसवाओ।

(4) रोगी होने पर खाना बन्द कर दो। बिल्कुल उपवास नाप कर सको तो फल के रस या जौ के पानी पर गुजर करो। हर रोग का आधा इलाज उपवास है।

(5) भोजन में भरसक क्षार की मात्रा अधिक रखो और बादी चीजें, तेज मसाले, खटाइयाँ, आदि से भरसक बचो।

(6) भोजन अत्यन्त सादा रखो और वही खाओ जो सहज में पच सके।

(7) जो कुछ खाओ खूब चबाकर मुँह की राल से अच्छी तरह सानकर जब ग्रास पतला हो जाए तभी निगलो।

(8) भोजन की सामग्री में हरे शाकों, पत्तियों और फलों की अच्छी मात्रा हो। पकाई चीजों से यह चीजें कच्ची ज्यादा अच्छी होती हैं।

(9) भाड़ में भुने दानों से कभी गुजर न करो। स्वाद में ये भले ही अच्छे हों पर इनका पोषक गुण नष्ट हो जाता है। भिगोये हुए अंकुर निकलते दाने बड़े अच्छे पोषक और तृप्ति देने वाले होते हैं। जिस पानी में ये भीगे हो उसे भी पी जाओ।

(10) भोजन करती बेर पानी न पियो। भोजन से घन्टे भर पहले या बाद को इच्छानुसार पानी पियो।

(11) कब्ज रहता है तो सवेरे सोकर उठते ही बाँसी आधा सेर या तीन पाव पानी बिना प्यास के ही पी जाओ। इससे पेट की स्वाभाविक सफाई में मदद मिलेगी।

इन नियमों के सिवा यह याद रखो कि तुम्हारा भोजन अधिक क्षारमय हो। इसके लिए “हेरल्ड आफ हेल्थ” में डा. मेनूकलका एक लेख पढ़ने लायक है। उसका कुछ अंश नीचे दिया जाता हैः-

आपकी प्रकृति आम्ल है, यह कहने का क्या अर्थ है? सारी प्रकृति आम्ल हो जाय तब तो मनुष्य जीवित ही न रहे। रोग रहित स्वस्थ शरीर ही विशेष कर क्षारमय होता है। शरीर में रासायनिक रीति से 80 प्रतिशत क्षार तत्व और 20 प्रतिशत आम्ल तत्व होने चाहिए। इस चार और एक प्रमाण के सुरक्षित रखने का अर्थ है आरोग्यता रक्षा करना और दीर्घजीवी होना। ये तत्व हमारे आधार के पदार्थों में जिस रीति से विभक्त हैं उसे ध्यान में रखकर आम्ल पोषक और क्षार पोषक आहारों और पीने की वस्तुओं की सूची नीचे दी जाती है-

आम्ल पोषक- मछली, पशु पक्षी का माँस, अंडा, पनीर, अनाज (गेहूँ, चावल, मकई आदि) रोटी, दालें, सूखा मेवा, सफेदखांड, मिठाई मात्र, चाकलेट, चाय, काफी मुरब्बे, तली हुई चीजें, नशे की चीजें, उबाला हुआ दूध, खीर, आदि।

क्षार पोषक-फूल गोभी, करमकल्ला, गाजर, चुकन्दर, सेलरी नामक साग, चिचेड़ा, जैतून(पके हुए) प्याज, हरी मटर, आलू, लौकी, कद्दु, मूली, चौलाई, पालक, मेथी, आदि भाजियाँ, टमाटर, शलजम, लगभग तमाम फल, सेब, जरदालू या खुमानी, पूरी तरह से पके हुए केले, खजूर, अंगूर, अंजीर, मुनक्का, हरे मेवे, नीबू, संतरे, मोसंबी आदि का रस, आड़ू, नासपाती, आलूचा, कच्चा दूध, छाछ, आदि।


माता का प्यार


माता का प्यार

तू कामधेनु का मधु-पय, शुचि सलिज जहु जाता का।

या सुधा क्षीर निधि की है, देवता प्यार माता का॥

तू स्नेह पूर्ण निर्झर है, जो युग से झरता आता।

युग-युग झरता जायेगा, कल छल-छल कल-कल गाता॥

हाँ, उस निशीध में तू ही मरघट पर तो भ्रमता था।

रोहित को गोद लिवाये शैय्या में तू रमता था॥

औ वहाँ विजन झुरमुट में, सरिता-तट में संध्या को।

हित श्रवणकुमार रुलाया किसने अंधी वृद्धा को॥

प्रायः स्मृति तो होगी ही त्रेता के पुत्र-प्रणय की।

की विभिन्न अलौकिक गति जो दशरथ की रानी त्रय की॥

स्वर्णिम दिन वे गोकुल के क्या याद नहीं है तुझको।

परियाँ जब तरस रही थी, लख नन्दावन में तुझको॥

वात्सल्य अचल कर बाँधा ले स्नेह-तन्तु ऊखल में।

मथुरा हरि गये, यशोदा बिजखी निशि दिन छिन पल में॥

तेरी उदारता से सब स्रष्टा की सृष्टि बसी है।

पाकर तुझको ही जननी ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ है॥

चिड़ियां चोंचों में भर-भर शावक का अन्न चुगाती।

तनु चाट-चाट जब गायें बछड़े को दूध पिलाती॥

और चूम-चूम मुख माता शिशु को दूध पिलाती।

यह दृश्य देख कर किसकी रे! छाती है न जुड़ाती॥

तुझ से विमुग्ध हो सकती हाँ! अथक प्रसव की पीड़ा।

पालक पोषण-संकट से वह होती नहीं अधीरा॥

कुछ कूट-पीस जो लाती, भूखी रह लाल खिलाती।

ढ़क अंचल से जोड़े में गोदी में ले सो जाती॥

यों सन्तत महल-मड़ी में जा जा विलास तू करता।

जननी-हित रिक्त-कलश को आमोद अमिय से भरता॥

यदि पुत्र दुःख भी देता, सब सह लेती माता है।

तो भी तू मृदु-मानस में ए प्यार! पगा जाता है॥

(श्री हरिवंश नारायण दास “आर्तहरि”)

*समाप्त*