“अखण्ड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

इन पुस्तकों की एक एक पंक्ति गहरे अनुभव एवं अनुसन्धान के साथ लिखी गई हैं।

बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें

1-सूर्य चिकित्सा विज्ञान। 2-प्राण, चिकित्सा विज्ञान। 3-स्वस्थ बनने की विद्या। 4-भोग में योग। 5-बुद्धि बढ़ाने के उपाय। 6-आसन और प्राणायाम। 7-तुलसी अमृतोपम गुण। 8-महान जागरण। 9-तुम महान हो। 10-घरेलू चिकित्सा। 11-बिना औषधि के कार्याकल्ग। 12-पंच तत्वों द्वारा रोग निर्मारण। 13-दीर्घजीवन के रहस्य। 14-नेत्ररोगों की चिकित्सा। 15-स्वप दोष की चिकित्सा। 16-दूध की आश्चर्य जनक शक्ति। 17-उन्नतिका मूलमंत्र-ब्रह्मचर्य। 18 उपवास के चमत्कार। 19-स्त्री रोग चिकित्सा। 20-बाल रोग चिकित्सा। 21-निरोग जीवन का राजमार्ग। 22-कब्ज की सरल चिकित्सा। 23-चिरस्थायी यौवन। 24-सौंदर्य बढ़ाने का उपाय।

जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें। 1-मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार। 2-धन बान बनने के गुप्त रहस्य। 3-पुत्र या पुत्री सरपत्र करने की विधि। 4-मरने के बाद हमारा क्या होता है। 5-मित्र भाग बढ़ाने की कला। 6-आकृति देखकर मनुष्य की पहचान। 7-संजीवनी विद्या। 8-अमृत पारस और कल्पवृक्ष। 9-स्वप्न क्यों दीखने हैं। 10-विचार करने की करना। 11-हम बक्ता कैसे बन सकते हैं। 12-लेखन कला। 13-सफलता के तीन साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संप जायें। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला। 18-प्रभाव शाली व्यक्तित्व। 19-अमृत करण। 20-प्रसिद्धि और समृद्धि।

21-हमारी पारिवारिक समस्याएं। 22-हमारे आंतरिक शत्रु।

उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें। 1-ईश्वर कौन हैं ? कैसा है ? 2-क्या धर्म ? अधर्म ? 3-गहना कर्मणोगति। 4-जीवन की गुत्थियों पर प्रकाश। 5-शास्त्र मंयन का नव नीत। 6-शक्ति संजय का पथ। 7-आत्मगौरव की साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन। 12-ब्रह्म विद्या का रहस्य। 13-ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग। 14-विवेक सतसई। 15-आध्यात्म शास्त्र। 16-अध्यात्म विद्या का प्रवेश। 17-वैज्ञानिक अध्यात्मवाद। 18-प्रेम का रहस्य। 19-भारतीय संस्कृति का बीज गन्त्र यज्ञोपवीत। 20-यज्ञोपवीत द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति।

गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें।

1-मैं क्या हूँ। 2- एककार्यों प्रवेश। 3-स्वर योग से दिव्य ज्ञान। 4-वशीकरण की विद्धि। 5-जीव जन्तुओं की मूक भाषा। 6-ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियों,। 7-यम नियम। 8-प्रत्याहार, धारणा ज्ञान और समृद्धि। 9-मसेम रेजम की शिक्षा। 10-हस्तरेखा विज्ञान। 11-गायत्री की चमत्कारी साधना। 12-ग्रहस्य योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था। 16-आत्मोन्नति का मार्ग। 17-प्रत्यक्ष फल दायनी साधनाएं। 18-योग के नाम पर प्रायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।

मूल्य में कमी के लिए न लिखिए। छः रुपये से अधिक की पुस्तक लेने पर डाक खर्च माफ।

पता - “अखण्ड ज्योति” प्रेस, मथुरा।

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 10


उषा-गान


उषा-गान

(श्री ‘अरविन्द’ बी. ए.)

नभ, अलस-उदय-गिरि के उपर

हट रहा श्याम-तम का अंचल!

खुल रही जनों की नींद-गहन

हो गया भोर उठ, चल रे, चल!

डोली उपवन में मन्द-पवन

ले नूतन-मधु, नूतन परिमल!

कुसुमों के अधरों पर बिखरा

प्राची का कंचन-हास सजल!

वह बन्द-क्षितिज का द्वार खोल

फूटे भव में आलोक-नवल!

तुम के अवगुँठन में हँसती

उषा गाती आयी मंगल!

अय परदेशी! खो गयी रात

उठ, बाँध न ले पथ का संबल!

तू अब तक सोता है अचेत

घर दूर-देश, उठ, चल रे, चल !


गायत्री द्वारा सद्गुणों की वृद्धि

गायत्री के तीसरे चरण (भर्गो देवस्य धीमहि) में दिव्य गुणों को धारण करने के लिए कहा गया है। जैसे बहुमूल्य आभूषण, वाहन, साधन, आदि के द्वारा साधारण लोग अपने को गौरवान्वित समझते हैं, वैसे ही गायत्री उपासकों को अपनी शोभा महिमा, बड़ाई, एवं विशेषता सद्गुणों से सुसज्जित होने में समझनी चाहिए।

धन से जीवनोपयोगी वस्तुएँ खरीदी जाती हैं। धन की उपयोगिता इतनी ही है कि उससे हमारी अन्न, वस्त्र आदि की आवश्यकताएं एक सीमा तक पूरी होती हैं और वे एक नियत मात्रा में धन उपार्जन करने पर आसानी से पूरी हो सकती हैं। इन दिनों सरकार की अयोग्यता से मँहगाई का कुचक्र चल पड़ा है जिससे साधारण जनता को दुर्भिक्ष जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। यह कुचक्र सामयिक है, कुछ दिन पूर्व ऐसे दुर्दिन नहीं थे और आशा है कि आगे भी यह नहीं रहेंगे। साधारण परिस्थितियों के समय में एक स्वस्थ मनुष्य अपने परिवार की उचित आवश्यकताओं को पूरा करने लायक आसानी से कमा सकता है। फिर भी देखा जाता है कि लोग अधिक कमाने और जोड़ने की धुन में बेतरह लगे हुए हैं। जिनके पास अपनी आवश्यकताओं लायक पहले से ही काफी मौजूद है वे भी सब काम छोड़ कर दिन रात अधिकाधिक धन कमाने में प्रवृत्त हैं, उनके समय का सारा भाग इसी उधेड़ बुन में लगा रहता है।

धन की शक्ति बड़ी सीमित है उससे शरीर का निर्वाह करने वाले पदार्थ खरीदे जा सकते हैं जिसकी वास्तविकता बहुत ही सीमित है। जमा किया हुआ अत्यधिक धन किसी के कुछ काम नहीं आता, सब जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाता है। जिन उत्तराधिकारियों के लिए उसे जोड़ा जाता है वे उस मुफ्त के माल से बेरहम व्यवहार करते हैं और उसे बारूद की तरह फूँक कर तमाशा देखते हैं। मुफ्त की मिली हुई पैतृक सम्पत्ति उत्तराधिकारियों को निकम्मा, आलसी, व्यसनी, फिजूल खर्च एवं दुर्गुणी बना देती है इसलिए संतान के लाभ के लिए जोड़ा हुआ धन वस्तुतः उनकी हानि ही करता है। कितने ही लड़के उस मुफ्त के माल पर बेतरह लड़ मरते हैं, मुकदमे बाजी में वह सारी बारूद बात की बात में फूंक जाती है। धनी व्यक्ति दूसरों की आंखों से सुखी दीखते हैं पर अपने आप में वे काफी चिन्तित और परेशान रहते हैं। धन कमाने की कष्ट साध्य प्रक्रिया, हानि से बचने की चिन्ता, सुरक्षा, आदि व्यवस्थाओं में इतनी जान मारी करनी पड़ती है कि वे लोग वस्तुतः गरीब एवं मजदूरों की अपेक्षा आन्तरिक दृष्टि से अधिक उद्विग्न रहते हैं। यह उद्विग्नता उनके शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को खो जाती है।

इन कठिनाइयों को जानते हुए भी लोग ‘जैसे बने वैसे’ धन कमाने के लिए इतनी तत्परता के साथ जुते हुए है इसका कारण यह है कि “धन की प्रतिष्ठा” होने लगी है। जिसके पास धन है उसे बड़ा आदमी, महापुरुष, आदरणीय, समझा जाने लगा है। पूर्व काल में जिसके पास ज्ञान, विद्या, चरित्र, त्याग आदि की दैवी संपदाएं होती थी, उनका सबसे अधिक आदर होता था। मध्य युग में पराक्रम पुरुषार्थ, साहस, वीरता, शक्ति की प्रतिष्ठा रही। जो जितना शक्ति सम्पन्न होता था उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। आज धन की प्रतिष्ठा है। चाहे कोई मनुष्य मूर्ख, दुश्चरित्र, दुर्बल, कायर आदि कितनी अयोग्यताओं से घिरा हुआ हो पर यदि उसके पास पैसे हैं तो लोग उसके प्रति आदर प्रकट करेंगे, उसे मान देंगे, उसे अगुआ, नेता या पंच मानेंगे, उसकी हाँ में हाँ मिलाने वाले, प्रशंसा के पुल बाँधने वाले, अनेक लोग तैयार हो जांयगे।

आत्मा वस्तुतः महान है। अतएव वह अपने को महान ही प्रकट करना चाहता है। हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा रहती है कि वह प्रतिष्ठित आदरणीय एवं महान समझा जाये। वह देखता है कि आज वे ही लोग प्रतिष्ठित हैं जिनके पास धन है, तो उसका लक्ष धनी बनना हो जाता है, आज अधिकाँश मनुष्यों का जीवन लक्ष्य यही बना हुआ हैं। चूँकि न्यायपूर्वक, परिश्रम के साथ, सन्मार्ग से इतना ही कमाया जा सकता है जो काम चलने लायक हो। अधिक कमाने के लिए वे मार्ग अपनाने पड़ते हैं जो पाप पूर्ण हैं। बड़े आदमी कानूनी लूटमार और शोषण करते हैं, छोटे आदमी गैर कानूनी छाप मारते है। जिसको जितना मौका मिलता है अपनी घात चलाता है। आज समाज में व्यापक रूप से जो अनैतिकता फैली हुई हैं उसका कारण यह ‘धनी बनकर बड़े आदमी होने’ की हविश ही काम कर रही है।

हम देखते हैं एक आदमी दूसरे को खाये जा रहा है। एक दूसरे की आँतें निकाल लेने कि लिए घात लगाये बैठा है। जिसका जैसे मतलब सिद्ध होता है वह वैसा प्रपंच बना लेता हैं। आपसी प्रेम और सद्भाव विदा हो रहे हैं और उसके स्थान पर स्वार्थ का पिशाच नंगा होकर नाच रहा है। बाप अपने बेटी बेटों को बेच रहा है। भाई का भाई जानी दुश्मन बना हुआ है। बुड्ढ़े माँ बाप को रोटी खिलाना बेटों के लिए असह्य बोझ बना हुआ है। निर्धन पति, पत्नी को आँखों देखा नहीं सुहाता। बेटे की बहू यदि दहेज साथ नहीं लाई है तो उसका परित्याग कर दिया जाता है या उसे मारकर दूसरे विवाह की योजना सोची जाती हैं। नौकर चोर डाकुओं से मिलकर मालिक के जान माल पर दाँत लगाये बैठा है। मित्र बनकर कलेजा निकाल ले जाने वाले नर पिशाचों की कमी नहीं। निकट सम्बन्धियों की पारस्परिक मनोदशा जब यह है तब दूरवर्ती लोग धन के लिए दूसरों के साथ जो भी नीति बरतें वह कम है। रिश्वतखोरी, चोरबाजारी, बेईमानी, मिलावट, धोखाधड़ी, ठगी आज व्यापक रूप से फैली हुई हैं। चोरी, डकैती करने का साहस तो किन्हीं किन्हीं को ही होता है पर सभ्य तरीके से सभी लोग धन उपार्जन के लिए ‘सब कुछ’ कर रहे हैं। सतीत्व, धर्म, ईमान, मजहब, बुद्धि, विद्या, न्याय, कर्त्तव्य, वफादारी यहाँ तक कि जान तक पैसे के लिए बिक रही है।

पूर्व काल में जब विद्या, तप और चरित्र की प्रतिष्ठा थी गुणों के आधार में मनुष्य का बड़प्पन आँका जाता था तो लोग उसके लिए बड़ी बड़ी कुर्बानियाँ करते थे। प्रह्लाद, विश्वामित्र, हरिश्चन्द्र, गौतमबुद्ध, अम्बपाली, मीरा, गोपीचन्द जैसे साधन सम्पन्न लोग अपने वैभव को लात मारकर तपश्चर्या का मार्ग अपनाते थे। जब विद्या की अपेक्षा शक्ति में बड़प्पन माना गया तो अपनी शूरता का परिचय देने के लिए राजपूतनियों तक ने वे कार्य कर दिखाये जिसे सुनकर सुनने वालों के कलेजे काँप उठते हैं। जान गवाँ देना उनके लिए एक खेल हो गया था प्रतिष्ठा के लिए मनुष्य बड़े से बड़ा खतरा उठाने का तत्पर हो सकता है। आज भी जब कि धन की प्रतिष्ठा बढ़ी है तो लोग धन के लिए बड़े से बड़ा खतरा मोल लेने को तैयार है पर कठिनाई तो यह है कि लोग जैसे विद्या, तप, चरित्र, पुरुषार्थ आदि अपने आप में स्वयं उत्पन्न कर सकता है, वैसे सोना चाँदी अपने आप में से अधिक मात्रा में पैदा नहीं कर सकता, उसके लिए तो सुलभ मार्ग ‘अपहरण’ ही दिखाई पड़ता है जिसके लिए लोग राज दंड का, प्रत्याक्रमण का, निन्दा का, खतरा खुशी खुशी उठा लेते हैं और जैसे बने वैसे धनी बनने में जुट पड़ते हैं। इस मनोवृत्ति ने आज घर घर में कलह, विरोध, क्लेश, एवं दुर्भाग्य पैदा कर दिये हैं जिनसे अनेक प्रकार के दुखदायी अपराध हो रहे हैं। इस गतिविधि से सर्वत्र असन्तोष की अग्नि जल रही है और व्यापक रूप से लोगों के मन, निराश, शुष्क, खिन्न, नीरस एवं दुखित हो रहे हैं।

धन की उपयोगिता है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। पर उसको मनुष्य की महानता का चिन्ह समझना भारी भूल है। इस कुबुद्धि से ग्रसित होकर आज सारी मनुष्य जाति दुख पा रही है। भारतीय धर्म शास्त्रों में परिग्रह को सदा से हेय माना जाता रहा है। विद्या और बल के पश्चात धन को तीसरे दर्जे की घटिया शक्ति माना है। उस तीसरे दर्जे की चीज को जब पहले दर्जे का सम्मान दिया गया तो उसका दुष्परिणाम होना ही चाहिए।

गायत्री रूपी सद्बुद्धि द्वारा हम इस कुबुद्धि का परिमार्जन कर सकते हैं। तीसरे पद (भर्गो देवस्य धीमहि) की शिक्षा हमारे लिए यह है कि हम दिव्य शक्तियों को धारण करें, दिव्य गुणों को बढ़ावें, दैवी सम्पत्तियों का संचय करें। हम धन के आधार पर नहीं वरन् सद्विचारों और सत्कार्यों के आधार पर किसी का सम्मान करें। हम अपना बड़प्पन अपने सद्गुणों से तोलें ओर दूसरे का बड़ा तभी माने जब उसमें उच्च आदर्श श्रेष्ठ चरित्र और लोक सेवा के तत्व समुचित मात्रा में देखें। हमें धन पतियों का मनुहार करने की कोई आवश्यकता नहीं। हम तो उन्हें अपना नेता, पथ प्रदर्शक एवं आदर्श मानें जो गुणों की दृष्टि से, दैवी सम्पदाओं की दृष्टि से सुसम्पन्न हो। जब ये मान्यता बढ़ेगी और यह समझा जाने लगेगा कि धन की उपयोगिता शरीर निर्वाह मात्र के लिए एक सीमित मर्यादा में ही है और उसका मनुष्य की प्रतिष्ठा से कोई सम्बन्ध नहीं है तो निश्चय है कि आज जो धन के पीछे पागल दौड़ लग रही है वह बन्द हो जायगी और लोगों का ध्यान उन विचार एवं कार्यों की और मुड़ेगा जो वास्तव में प्रतिष्ठा के योग्य हैं।

धन पदार्थ है, इसलिए साधन है। जितने भी पदार्थ संसार में हैं वे सब साधन हैं। पदार्थ कभी साध्य नहीं हो सकते। धन के द्वारा शारीरिक आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं शरीर को सजाया जा सकता है पर जीव की आन्तरिक उन्नति या तृप्ति नहीं हो सकती। इसलिए धन कमाने की भाँति ही सद्ज्ञान, सद्गुण, एवं सद्विनोद को प्राप्त करने के लिए भी समय लगाया जाना चाहिए। जब धन ही लक्ष बन जाता है तो अन्य दिशाओं में मन नहीं लगता, समय का अधिकाँश भाग उसी उधेड़ बुन में लगाने के पश्चात् अन्य प्रकार की उन्नतियों के लिए न इच्छा रहती है न शक्ति न सुविधा। इसलिए वह आवश्यक है कि धन को उतना ही महत्त्व दिया जाये जितना कि वस्तुतः उसे मिलना चाहिए। कोई व्यक्ति अध्ययन का श्रम न करना चाहे तो करोड़ों रुपया खर्च कर देने पर भी वह विद्वान नहीं बन सकता। कोई व्यक्ति बिना अभ्यास किये प्रचुर धन व्यय करने पर भी संगीतज्ञ नहीं बन सकता। किसी का सच्चा प्रेम सहस्रों रुपयों में भी नहीं खरीदा जा सकता है। रुपयों का पहाड़ खर्च करने के बदले में भी स्वास्थ्य नहीं मिल सकता। इन सब बातों के लिये अपना समय और मनोयोग लगाना पड़ता है। मनोयोग और श्रम लगाने के लिए कोई मनुष्य तभी तैयार होगा जब धन की तुलना में उसका महत्व भी बहुत कम न आँका जाये। आज लोग धन को इतना महत्त्व देते हैं कि और कुछ कमाने की उन्हें आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती।

स्वाध्याय के लिए लोगों को फुरसत नहीं, व्यायाम के लिए अवकाश नहीं, भजन के लिए समय नहीं मिलता, लोक सेवा के लिए छुटकारा नहीं, चित्त को प्रफुल्लित करने वाले संगीत, देशाटन, तैरना, सत्संग आदि के लिए टाइम नहीं। कारण एक ही है कि जिस कार्य को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मान लिया गया है उसकी तुलना में ये सब बातें इतनी तुच्छ इतनी गौण समझी गई हैं कि उनकी ओर ध्यान करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। फुरसत उसी काम के लिए नहीं मिलती जो अनावश्यक और महत्वहीन समझा जाता है। जिस काम को हम आवश्यक समझते हैं उसे अन्य कामों की उपेक्षा करके भी सबसे पहले करने हैं। धन का आकर्षण जब अति प्रबल होता है तो जीवन को सुखी और समुन्नत बनाने वाले विचार गुण और कार्य करने के लिए जरा भी अवकाश नहीं मिल सकता। यदि जीवन की सर्वांगीण उन्नति करनी है तो यह तभी सम्भव हो सकेगी जब कि धन का आकर्षण कम किया जाय, उसे साध्य नहीं, साधन मात्र माना जाय। विद्या प्राप्त करना, स्वास्थ्य को सँभालना, अपनी विविध योग्यताएं और शक्तियाँ विकसित करना, शान्तिदायक विनोदों द्वारा आन्तरिक उल्लास को बढ़ाना, अपने स्वभाव का निर्माण करना, सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करना, परमार्थ कार्यों में समय देना, आत्म चिन्तन करना भी हमारे लिए धन कमाने से कम महत्वपूर्ण न होना चाहिए। इन कार्यों के लिए भी उतना ही समय और मनोयोग लगाना चाहिए जितना कि धन के लिए लगता है। पर यह सम्भव तभी है जब कि धन की अत्यधिक बढ़ी प्रतिष्ठा को घटा कर उतना ही रखा जाये जितना की वास्तव में है।

गायत्री के तृतीय चरण का मानव जाति के लिये यह संदेश है कि वस्तुओं को उतना ही महत्व दिया जाये जितनी कि उनकी उपयोगिता है। प्रधान लक्ष गुणों और विशेषताओं की ओर होना चाहिए। विविध वस्तुओं के स्वामी बनने की कुबुद्धि छोड़ कर, विविध सद्गुणों के अधिकारी बनने की योजना होनी चाहिए। धन की नहीं, गुणों की पूजा चाहिये। जब इस प्रकार की मनोवृत्ति बनेगी तो वस्तुओं के संचय के लिए लोग पागल दौड़ लगाना और एक दूसरे को नोंच खाना छोड़ देंगे एवं सद्गुणों के द्वारा एक दूसरे की सेवा सहायता करते हुए, एक दूसरे के प्रति प्रेम, सौजन्यता, उदारता एवं आत्मीयता का व्यवहार करते हुए शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे।

गायत्री का तृतीय चरण हमारी आर्थिक कठिनाइयों को सुलझा देता है क्योंकि साधक की समझ में यह बात भली प्रकार आ जाती है कि धन केवल साँसारिक सुविधाएं दे सकता है, मनुष्य की आन्तरिक एवं वास्तविक सुख शान्ति से उसका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। ऐसा निश्चय हो जाने के पश्चात वह धन को अनावश्यक महत्व देना छोड़ कर गुणों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। तब उसे दिन रात धन की हाय नहीं रहती। साधारण प्रयत्न से काम चलाऊ उपार्जन करके मितव्ययता के साथ अपना गुजारा करता है और प्रसन्न रहता है। धन को जोड़ने की या अनावश्यक मात्रा में बढ़ाते चलने की हविस में पड़कर मनुष्य अपने जीवन की अन्य दिशाओं का विकास करना भूल जाता है। सर्वतोमुखी उन्नति और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि किसी एक ही बात पर मस्तिष्क का सारा ध्यान एवं समय का सारा भाग न लगा दिया जाये। स्वास्थ्य, ज्ञान, वृद्धि, मनोरंजन, परमार्थ आदि के लिए भी धन की भाँति ही इच्छा, बुद्धि, श्रम और समय को लगाया जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब सद्बुद्धि की कृपा से हम सर्वांगीण उन्नति का महत्व और धन शक्ति की सीमित मर्यादा को भली प्रकार समझ कर सद्गुण एकत्रित करने की ओर विशेष ध्यान दें।


Quotation

-अगर गुलामी पाप नहीं है, तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है।

-अब्राह्म लिंकन,


सतोगुण को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए।

(श्री अशर्फी लाल जी मुख्तार, बिजनौर)

यह सृष्टि त्रिगुणमयी है। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, इन तीन गुणों से संसार के समस्त जड़ चेतन ओत प्रोत हो रहे हैं। तमोगुण में आलस्य (अशान्ति युक्त मूढता), रजोगुण में क्रियाशीलता (चंचलता), सतोगुण में शान्ति युक्त क्रिया (अनासक्त और निःस्वार्थ व्यवहार) होता है।

प्रायः तमोगुण और रजोगुण की ही लोगों में प्रधानता होती है। सतोगुण आज कल बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। क्योंकि उच्च आध्यात्मिक साधना के फल स्वरूप ही सतोगुण का विकास होता है। सतोगुण की वृद्धि ही परम अर्थ कल्याण का हेतु है। सात्त्विकता जितनी बढ़ती जाएगी उतना ही प्राणी अपने लक्ष्य (मुक्ति) के निकट होता जाएगा। इसके विपरीत रजोगुण की अधिकता से मनुष्य भोग और लोभ के कुचक्र में फँस जाता है और तमोगुणी तो तीव्र गति से पतन के गर्त में गिरने लगता है।

तमोगुण प्रधान मनुष्य आलसी, अकर्मण्य निराश और परमुखापेक्षी होता है। वह हर बात में दूसरों का सहारा टटोलता है, अपने ऊपर अपनी शक्तियों के ऊपर उसे विश्वास नहीं होता। दूसरे लोग किसी कुपात्र को सहायता क्यों दें? जब उसे किसी ओर से समुचित सहयोग नहीं मिलता तो खिन्न और क्रुद्ध होकर दूसरों पर दोषारोपण करता है और लड़ता झगड़ता है। लकवा मार जाने वाले रोगी की तरह उसकी शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं और जड़ता एवं मूढ़ता में मनोभूमि जकड़ जाती है। शरीर में स्थूल बल थोड़ा बहुत भले ही रहे पर प्राण शक्ति, आत्मबल, शौर्य एवं तेज का नितान्त अभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति बहुधा, कायर, कुकर्मी, क्रूर, आलसी और अहंकारी होते हैं। उसके आचरण, विचार, आहार कार्य और उद्देश्य सभी मलीन होते हैं।

तमोगुण पशुता का चिन्ह है। चौरासी लाख योनियों में तमोगुण ही प्रधान रहता है। वही संस्कार जिस मनुष्य के जीवन में प्रबल हैं उसे नर पशु कहा जाता है। इस पशुता से जब जीव की कुछ प्रगति होती है तब उसका रजोगुण बढ़ता है। तब की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों में राज सिकता अधिक रहती है।

रजोगुणी में उत्साह अधिक रहता है, फुर्ती, चतुराई, चालाकी, होशियारी, खुदगर्जी, दूसरों को उल्लू बनाकर अपना मतलब गांठ लेने की योग्यता खूब होती है। ऐसे लोग बातूनी, प्रभावशाली, क्रियाशील, परिश्रमी, उद्योगी, साहसी, आशावादी, और विलासी होते हैं। उनकी इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया ठाठ-बाट, विषय-वासना की इच्छा सदैव मन में लगी रहती है। कई बार तो वे भोग और परिश्रम में इतने निमग्न हो जाते हैं कि अपना स्वास्थ्य तक गँवा देते है।

यारबाजी, गप-शप, खेल-तमाशे, नृत्य-गान, भोग-विलास, शान-शौकत, रौब-दौब, ऐश-आराम, शाबाशी, वाहवाही, बड़प्पन, और धन दौलत में रजोगुणी लोगों का मन खूब लगता है। सत्य और शिव की ओर उनका ध्यान नहीं जाता पर ‘सुन्दरम्’ को देखते ही लट्टू हो जाते हैं। ऐसे लोग बहिर्मुखी होते हैं, बाहर की बातें तो बहुत सोचते हैं पर अपनी आंतरिक दुर्बलता पर विचार नहीं करते, अपनी बहुमूल्य योग्यताओं परिस्थितियों और शक्तियों को अनावश्यक रूप से हल्की छिछोरी और बेकार की बातों में बर्बाद करते रहते हैं।

सतोगुण की वृद्धि जब किसी मनुष्य में होती है तो उसकी अन्तरात्मा में धर्म, कर्त्तव्य, और आत्म कल्याण की इच्छा उत्पन्न होती है। न्याय और अन्याय का, सत् और असत् का, कर्त्तव्य, अकर्त्तव्य का, ग्राह्य और त्याज्य का भेद स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। तत्व ज्ञान, धर्म विवेक, दूरदर्शिता, सरलता, नम्रता और सज्जनता से उसकी दृष्टि भरी रहती है। दूसरों के साथ करुणा, दया, मैत्री, उदारता, स्नेह, आत्मीयता और सद्भावना का व्यवहार करता है। कुच काँवन की तुच्छता को समझ कर वह तप, साधना, स्वाध्याय, सत्संग, सेवा, दान, और प्रभु शरणागति की ओर अग्रसर होता है।

सात्विकता की अभिवृद्धि होने से आत्मा में असाधारण शान्ति, सन्तोष, प्रसन्नता, प्रफुल्लता एवं आनन्द रहता है। उसका प्रत्येक विचार और कार्य पुण्यमय होता हैं। जिससे निकटवर्ती लोगों को भी ज्ञात और अज्ञात रूप से बड़ी शान्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती है।

तमोगुण सबसे निष्कृष्ट अवस्था है। रजोगुण उससे कुछ ऊँची तो है पर मनुष्यता से नीची है। मनुष्य का वास्तविकता परिधान सतोगुण है। मनुष्यता का निवास सात्विकता में है। आत्मा को तब तक शान्ति नहीं मिलती जब तक कि उसे सात्विकता की परिस्थिति प्राप्त न हो। जो मनुष्य जितना सतोगुणी है वह परमात्मा के उतना ही समीप है। इस दैवी तत्व को प्राप्त करके जीव धन्य होता है क्योंकि जीवन लक्ष की प्राप्ति का एक मात्र साधन सतोगुण ही है। प्रत्येक आत्म कल्याण के प्रेमी को अपने में सात्विकता की अभिवृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्न शील रहना चाहिए।


हमारे जीवन की वास्तविकता

(श्री नैनूराम जी याज्ञिक, रौहेरा)

सृष्टि के नियमानुकूल हम हर पदार्थ-जड़ अथवा चेतन को विकसित होता हुआ पाते हैं। और जब तक कोई भी पदार्थ अपने विकास को प्राप्त नहीं होता है तब तक उसके अस्तित्व की उपयोगिता व वास्तविकता का ठीक लाभ नहीं उठाया जा सकता। इसी भगवद् सृजनात्मक नियमों के आधार पर जीवात्मा अनेक योनियों में परिभ्रमण करता हुआ सर्वोत्कृष्ट मानव योनि को प्राप्त कर सकता है जिसका वास्तविक हेतु भगवान की लीला को समझने के लिए ऊर्ध्वगामी बनने का है, न कि अपने विकास क्रम से पुनः नीचे गिरने का, अथवा एक सी ही स्थिति में परिभ्रमण करते रहने का। ऐसी दशा में हमारे लिए यह वाँछनीय हो जाता है कि हम अपने आपको समझें और सर्वदा अपने जीवन के विकास क्रम को बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहें। हमें यह मानकर ही संतुष्ट नहीं रह जाना चाहिए कि हम अपने अज्ञानवश अनुचित कार्य भी करते रहें, फिर भी परम दयालु परमात्मा हमें माफ कर हमारा उद्धार कर ही लेंगे। ऐसा मानकर हमारे लिए कार्य करते रहना अमानुषिक होगा। अगर ऐसा ही हो तो फिर हममें और पशुओं में किसी प्रकार का भेद न रहेगा। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि परमात्मा ने पशुओं की अपेक्षा हमें बुद्धि प्रदान कर अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक कृति का परिचय दिया है जिसके द्वारा उसका उचित दिशा में प्रयोग करने पर उसकी लीलाओं के रहस्य को समझते हुए हम अपने विकास क्रम की गति को अग्रगामी बनाये रखने में समर्थ हो सकते हैं।

हमारी प्रकृति तम, रज, और सत् गुणों के मिश्रण से बनी हुई होती है। और इसी त्रिगुणात्मक प्रकृति में किसी भी गुण की प्रधानता रहने से हमारी विचार धाराएं उसी गुण जनित कार्यों की ओर प्रवाहित होती रहती हैं और हमारी इन्द्रियाँ वैसे ही कार्य करने में हमें विवश करती हैं। हमारी प्रकृति में तमोगुण की प्रधानता मूढ़ता व अज्ञानता, रजोगुण की प्रधानता इन्द्रिय लोलुपता व सतोगुण की प्रधानता-विवेक बुद्धि की परिचायक होती है। अतएव तम और रजोगुण जनित हमारे कार्य हमें नाना प्रकार के मानसिक एवं कायिक क्लेशों का फलोपभोग करने के लिए बाधित करते हैं जो हमें अपने विकास क्रम से पदच्युत करते रहते हैं। परन्तु इसके विपरीत सतोगुण की प्रधानता रहने पर हमारे सारे कार्य विवेक युक्त होने से चिर शान्ति और आनन्द के सूचक बनते रहते हैं। जिससे यह भली भाँति ज्ञात किया जा सकता है कि हम अपने विकास की ओर पदार्पण किये जा रहे हैं।

प्रायः देखा जाता है कि हमारी चेतना शक्ति विशेषतः तम और रज की प्रधानता से परिवेष्टित रहने से हमें पशु धर्म की ओर प्रवृत्त करती रहती है जिसकी ओड में रह कर हम अपने वास्तविक मानव धर्म को भूले रहते हैं। और इस चेतना के बाह्याँतर अथवा स्थूल रूप को ही महत्ता प्रदान कर उसी को अपने जीवन की सार्थकता समझ बैठते हैं जो कि हमारी ऐसी अधूरी समझ हमें अपने मानवोचित विकास क्रम में बाधाएं पहुँचाने वाली होती है। हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि हमारी चेतना का केवल वही रूप नहीं है परन्तु उसका आँतरिक स्थूल रूप भी है। जिसका अनुभव करने के लिए अज्ञानता अथवा अविवेक हमारे पथ में बाधाएँ उपस्थित करते हैं। उस चेतना द्वार को खोलने के लिए हमारे लिये यह अत्यावश्यक हो जाता है कि हम अपनी प्रकृति में सतोगुण की प्रधानता को उत्पन्न करने का प्रयत्न करते रहें जिससे विवेक बुद्धि का प्रादुर्भाव हो। और यह उसी दशा में संभावनीय है जब कि हम अपने जीवनोपयोगी कार्यों का सम्पादन करते हुए यम नियमों के साथ अपनी निष्ठा के अनुकूल भगवद् आराधना को जीवन का मुख्य अंग बना लें। ऐसा करते रहने से हमारी तम और रजोगुण जनित पाशविक वृत्तियों का शमन होकर दिव्य वृत्तियाँ जागरित होती जायेंगी। जिसके फलस्वरूप हमारी कार्यप्रणाली ज्ञान व विवेकयुक्त बनी रहेगी और शनैः शनैः हम अपने विकास क्रम को अर्थात् आत्मिक विकास को प्राप्त कर सकेंगे। हमारा आत्मिक विकास ही हमारे जीवन की वास्तविकता है।

क्या खोया ? क्या पाया?

आज की इस नई प्रगति के युग में हमने क्या क्या खोया क्या क्या पाया ?

ज्ञान खोया -विज्ञान पाया। श्रद्धा खोई-अनभिज्ञता पाई। आचार खोया-विचार पाया। विश्वास खोया-तर्क पाया। स्वास्थ्य खोया-इलाज पाया। नीति खोई- बुद्धि पाई। ईमान खोया-अभिमान पाया। प्रेम खोया-इल्म पाया। दिल खोया-दिमाग पाया। भूख खोई-भोजन पाया। सच्चाई खोई-चतुराई पाई।


प्राणायाम के लाभ

(श्री विश्वम्भर नाथ द्विवेदी)

यह तो सर्वविदित ही है कि खून को पहले हृदय संचालित करता है फिर यह खून धमनियों और बारीक धमनियों में होता हुआ शरीर के प्रत्येक भाग में पहुँच जाता है। इसके बाद वह दूसरे मार्ग से बारीक से बारीक शिराओं में होता हुआ मोटी शिराओं में लौटता है और वहाँ से फिर हृदय में वापस आता है। फिर हृदय से निकल कर वह फेफड़ों में खिच जाता हैं। जब पहले हृदय से रुधिर संचालित होकर धमनियों की राह शरीर में फैला था तो उसका रंग लाल, चमकदार, और जीवनदायक था। परन्तु जब शिराओं की राह से वापस आया था तब उसका रंग नीला और दोषयुक्त था। क्योंकि शरीर की तमाम गन्दगियों को बटोरता हुआ आया था। यह गन्दा खून वापस आकर हृदय की बाई कोठरी में पहुँचता है और तब यही गन्दा खून निकल कर दाहिना ओर दूसरी वेंट््रीकल नामक कोठरी में जाता है। फिर वहाँ से फेफड़ों में आता है जिसका वर्णन ऊपर हो चुका है। यह गन्दा रुधिर फेफड़ों की लाखों हवा वाली कोठरियों में बँट जाता है। जब श्वास ली जाती है तो हवा भी इन्हीं कोठरियों में पहुंचती हैं और जब हवा के ऑक्सीजन का स्पर्श इस गन्दे रुधिर से होता है तब उस में एक तरह की जलन पैदा होती है और रुधिर हवा की ऑक्सीजन को खुद ही खींच लेता है। और अपनी कार्बोनिक एसिड गैस को हवा के सुपुर्द कर देता है। इस तरह रुधिर साफ और ऑक्सीजन मिश्रित होकर चमकीला, लाल एवं जीवन शक्ति दायक तथा और सामान से युक्त होकर हृदय की बाईं कोठरी में जाता है वहाँ से वह फिर वेंट्रीकल में जाता है। वहाँ से फिर नलियों और बारीक नलियों द्वारा शरीर के अंग प्रत्यंग को जीवन दान देने जाता है। यह अनुमान किया गया है कि 24 घंटे में 3500 पाइंट रुधिर फेफड़े की बाल सी बारीक नलियों में होकर गुजरता है, जिसके दोनों तरफ ऑक्सीजन होता है।

अब यह देखना है कि यदि साफ हवा पूरे परिमाण में फेफड़ों में न पहुँचेगी तो शरीर के अंगों से लौटा हुआ गन्दा खून साफ न हो सकेगा और परिणाम होगा कि यह शरीर केवल जीवनदायक सामग्रियों से वंचित ही नहीं, किंतु रुधिर की गन्दगी जिसको फेफड़ों में साफ हो जाना चाहिए था यह फिर शरीर के अंग-प्रत्यंगों में वापस जाएगी और विष उत्पन्न करके मृत्यु को न्योता देगी। गन्दी हवा भी ऐसा ही असर करती है, लेकिन धीरे धीरे यह भी देखने में आयेगा कि यदि कोई उचित परिमाण में श्वास न लेगा तो रुधिर का काम भी उचित रीति से न चल सकेगा। और तब शरीर का उचित पालन पोषण भी न होगा, तो फिर बीमार होना निश्चित है अथवा स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा। इसके प्रतिकूल अच्छी तरह श्वास लेने से खून का संचालन अच्छी तरह होता है, जिससे शरीर सुर्ख एवं रोग रहित हो जाता है।

ऑक्सीजन द्वारा केवल प्रत्येक भाग बलवान ही नहीं बनाया जाता, किन्तु पाचन शक्ति भी अधिकाँश में भोजन के ऑक्सीजन पर ही अवलम्बित है और यह तभी होगा जब रुधिर में ऑक्सीजन अधिक रहे और वह खाये हुए अन्न के संपर्क में आकर एक प्रकार की जलन उत्पन्न करे, जिसे जठराग्नि कह सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि फेफड़ों द्वारा ऑक्सीजन काफी मात्रा में ग्रहण किया जाय। यही कारण है कि निर्बल फेफड़े वालो की पाचन शक्ति भी निर्बल होती है। इस कथन से भली भाँति सिद्ध है कि, पचे हुए अन्न से शरीर पुष्ट होता है और अपच से शरीर अपुष्ट होता है। साराँश यह कि ऑक्सीजन की कमी का अर्थ पुष्टि और सफाई की कमी होना है जिसका परिणाम स्वास्थ्य हानि है, अतएव वस्तुतः श्वास ही जीवन (प्राण) है।

अब यह तो सर्व प्रकार से सिद्ध ही है कि शरीर को स्वास्थ्य और बलवान बनाने के लिए जितना ही ऑक्सीजन यानी प्राण वायु मिल सके, उतना ही अच्छा है। इससे सम्बन्ध रखने वाले विषय ये हैं।

श्वास कसरतों को करना, जिससे प्राण-वायु मिल सके और श्वास-यन्त्र को बड़ा करना अर्थात् सीने को चौड़ा बनाना। मनुष्य को चौबीस घंटे प्राण-वायु की आवश्यकता होती है। जिस समय हम कसरत करते हैं उस समय तो हवा मिलती है, पर दस या पन्द्रह मिनट के लिए। ज्यादा श्वास लेने से 24 घंटे की जरूरत पूरी नहीं होगी। इसलिए सीने की चौड़ाई बढ़ानी ही पड़ेगी। जब हम मामूली तौर पर श्वास लेते हैं तो करीब 500 घन सेन्टी मीटर हवा एक बार में खिंच आती है पर यह सीने के अन्दर सिर्फ ऊपर के हिस्से में ही आती जाती है। सीने के अन्दर के सारे हिस्सों में नहीं जाने पाती। पाठक ऊपर यह भली प्रकार समझ ही चुके हैं कि पूर्णतया श्वास की क्रिया ठीक न होने पर शरीर के अन्दर सीने पर विकार इकठ्ठा होने लगता है और वह धीरे-धीरे खराब होने लगता है। ऊपर-ऊपर तो श्वास आती जाती है पर बीच और नीचे के हिस्सों में श्वास के नहीं आने जाने से विषैले कीड़े पैदा होते हैं। और यह कीड़े समय पाकर सारे शरीर में खराबी उत्पन्न कर देते हैं। कभी कभी यह देख कर मन विचलित सा हो उठता है कि हमारे देश के लोग न तो अपने पूर्वजों के बताये हुए नियमों पर चलते हैं और न अपना ही कोई नियमित ढंग निकाल कर उस पर चलते हैं। हमारे देश में विद्या के बड़े बड़े केन्द्र हैं। उन केन्द्रों में बड़े बड़े विद्वानों का समागम होता है। पर अन्य विषयों के साथ-साथ मामूली रहन सहन, खान पान और व्यायाम की तरफ किन्हीं महाशय का ध्यान नहीं जाता। और रोगों की बढ़ती के साथ साथ क्षय दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है पर इसके रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किया जाता। जितने भी श्वास रोग हैं उनसे बचने के लिए यदि मनुष्य भोजन सुधार के साथ-साथ हर रोज दो प्राणायाम की क्रिया कर ले तो उसे किसी प्रकार की श्वास की बीमारी का होना असम्भव है। साथ ही साधारण श्वास में भी आश्चर्य जनक उन्नति होती है।

ऊपर मैंने दो ऐसे व्यायामों का जिक्र किया है जिनसे प्राण वायु ज्यादा मिले और सीना चौड़ा हो। अब एक तीसरा व्यायाम और होना चाहिए, जिससे शरीर के स्नायु तन्तु स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनें। क्योंकि हमारे शरीर में जितने भी अंग हैं उन सबकी चाल ज्ञान-तन्तुओं पर ही निर्भर है।

योग-शास्त्र में ज्यादा से ज्यादा प्राण वायु प्राप्त होने का जिक्र नहीं है अर्थात् प्राणायाम संबंध प्राण वायु से नहीं बताया गया है। यदि ऐसा समझा जाये कि एक मिनट में एक साधारण आदमी सत्रह बार साँस लेता है और हर साँस में करीब 500 घन सेन्टीमीटर हवा खींचता है तो एक मिनट में 500&60=30000 घन सेंटीमीटर हुआ। अब एक आदमी 500 घन से॰ हवा लेने के बाद 1600 घन से॰ श्वास और ले सकता है और 500 घन से॰ साँस निकालने के बाद 1600 घन से॰ श्वास और निकल सकता है। इस हिसाब से सीने की श्वास की ताकत 1600+500+1600=3700 घन से॰ हुई। मैं प्राणायाम करते समय यदि पाँच सेकेण्ड में श्वास लेता हूँ, 15 सेकेण्ड रोकता हूँ और 10 सेकेण्ड में निकालता हूँ तो एक मिनट में दो ही बार हुआ अर्थात् एक मिनट 3700&20=7400 घन से॰ हुआ। इससे सिद्ध हुआ कि मामूली तौर से जो साँस ली जाती है उससे कम प्राणायाम की हालत में ली जाती है। इस हिसाब से मालूम हो जाएगा कि प्राणायाम प्राण-वायु के लिए नहीं किया जाता है। प्राणायाम कुछ और उद्देश्य से किया कराया जाता है जिसका उल्लेख फिर कभी करेंगे। यदि कोई प्राणायाम को मामूली श्वास की कसरत समझे, जिससे मेरा मतलब सिर्फ प्राण-वायु लेना है तो वह भारी भूल करता है। शायद पच्छिमी विद्वान इसी भ्रम में पड़ कर यह कह दिया करते हैं कि प्राणायाम अवैज्ञानिक है और इसमें प्राण वायु नहीं मिलती। मैं तो यह समझता हूँ कि उन महाशयों को किसी ने यह नहीं बताया कि योग शास्त्र में प्राण-वायु प्राप्त करने के लिए एक बड़ी सुन्दर क्रिया है जिसे ‘कपाल भाथी’ कहते हैं। इस क्रिया का मुकाबला संसार में शायद वायु की कोई भी कसरत नहीं कर सकती। इस क्रिया में एक बार में मामूली तौर पर 800 घन से॰ अधिक श्वास निकाली जाती है। यह क्रिया एक मिनट में 120 बार की जाती है अर्थात् 1 मिनट में 120&840=9600 घन से॰ हुआ जो मामूली हालत की श्वास से सोलह गुणा ज्यादा होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि श्वास विज्ञान हमारे योग शास्त्र में इतना पूर्ण है कि पच्छिमी विद्वानों को इतना जानने के लिए दो तीन शताब्दियाँ लगेंगी। पच्छिमी विद्वानों ने प्राण-वायु के लिए एक ही तरह की कसरत का अवलम्बन लिया है। इसलिए इनके यहाँ श्वास का रोकना जायज नहीं है। पर अपने यहाँ प्राण-वायु और सीने को बढ़ाने के लिए अलग अलग क्रियाएं हैं जिनका आधार दूध और घी हैं।

अब हम एक ऐसा प्राणायाम बता कर अपने लेख को समाप्त करेंगे। जिससे प्राण-वायु ज्यादा मिलती और सीना भी चौड़ा होता है, साथ ही खून का दौरा भी बढ़ता है इस प्राणायाम में रेचक कुम्भक, पूरक करने की आवश्यकता नहीं होती। इसे बैठ कर, खड़े होकर या धीरे-धीरे चलते हुए भी कर सकते हैं। पर खड़े हो कर हाथ कमर पर और बैठने की दशा में हाथ जंघों पर, और पीठ को स्वाभाविक अवस्था में सीधा रखते हैं। अब खुले हुए नथुनों से धीरे-धीरे साँस खीचते हैं। साँस लेते समय और निकालते समय पेट खींचा हुआ होता है श्वास लेते और निकालते समय गले में मीठी मीठी खर्र खर्र की आवाज निकलती है। चेहरा सामने और सीधा रहता है, पाँच सेकेण्ड में श्वाल लेना और 10 सेकेण्ड में धीरे धीरे श्वास छोड़ना चाहिए। पहले हफ्ते में यह प्राणायाम सात बार सुबह और सात बार शाम को करना चाहिए। हफ्ते में 3 बार बढ़ा कर 28 बार सुबह और 28 बार शाम को कर सकते हैं। जो नियम दूसरी व्यायामों के साथ लागू हैं वे इसमें भी लगते हैं। यह जरूरी है कि श्वास की यह या कोई क्रिया साफ हवा के स्थान में की जाये, इस प्राणायाम से जन साधारण को बहुत लाभ होगा।


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किसी मनुष्य के यश का मूल्य इस बात से नहीं आँका जा सकता कि उसने अपने जीवन में कौन सा पद प्राप्त किया है किन्तु यश प्राप्त करने के मार्ग में उसने कितनी विघ्न-बाधाओं से लड़ झगड़कर उन्हें पद दलित कर डाला है इसी से उसके यश का मूल्य ठहराया जा सकता है।

-जार्ज वाशिंगटन।

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-सत्य में बड़ा बल है। सच्ची बात छिपाने से शायद ही किसी को कभी लाभ हुआ हो।

-शेक्सपियर।


होतव्यता की प्रबलता

(श्री रामदयाल गुप्त, नौगढ़)

एक समय महामुनि वेदव्यास जी स्वेच्छा से परीक्षित पुत्र राजा जन्मेजय की सभा में पधारे, राजा ने महर्षि का बड़ा सत्कार्य किया और उनसे धर्मोपदेश प्राप्त करने की उत्कंठा प्रकट की। व्यास जी ने राजा को शास्त्र सुनाये। उसी प्रवचन में प्रसंग वशात् ऐसा आया कि “प्रारब्ध की अमिट भाग्य रेखाओं को कोई सामर्थ्यवान् भी मिटा नहीं सकता।”

इस प्रवचन को सुनकर राजा ने आश्चर्यान्वित होकर पूछा-”भगवन् ! क्या भाग्य को कोई भी टाल नहीं सकता ? यदि पहले से ही भविष्य का ज्ञान हो जाये तो वह अवश्य टल सकता है “ महर्षि ने कहा राजन् ! यदि पहले से पता चल जाए तो भी होतव्यता नहीं टलती। मनुष्य विवश होकर भावी के चंगुल में फँस जाता है।” राजा को सन्तोष न हुआ। उसे महर्षि की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। व्यास जी उसके अन्दर की बात जान गये। उनने कहा-राजन् ! तुम अनुभव करके भवी की प्रबलता को जानना चाहे तो तुम्हारे भयंकर भविष्य को बता सकता हूँ। इतना ही नहीं, उस होनहार से बचने का उपाय भी बता सकता हूँ। पर उससे कुछ न बनेगा, तुम्हारा एक भी प्रयत्न सफल न होगा और भवतव्यता होकर रहेगी।

जन्मेजय ने अत्यन्त नम्रता और उत्सुकता से कहा - “भगवन् मेरा भयंकर भविष्य और उससे बचने के उपाय बता दीजिए। मैं अपने पुरुषार्थ और चातुर्य से उसे टाल दूँगा।”

महर्षि हँसने लगे, और कहने लगे, तू बुद्धिमान होते हुए भी बालकों की सी बात करता है। प्रारब्ध को टालना तेरे बस की बात नहीं है। पर मैं तेरा भविष्य तुझे बताता हूँ जिससे तू होतव्यता की प्रबलता जान सके। अब तू ध्यानपूर्वक सुन।

“तेरे अठारह प्रकार की कोढ़ निकलने वाले हैं। अगर तू उसे टालना चाहता है तो सुन मैं तुझे उपाय भी बतला देता हूँ। पहले तो यह बात है कि तू अश्वमेध यज्ञ के घोड़े कदापि मत खरीदना। यह तुझसे न हो सकेगा और भावीवश यज्ञाश्व मोल ले लेवेगा। ऐसा हो जाने पर तू दक्षिण दिशा में अश्व पर सवार होकर मत जाना। परन्तु यह भी सम्भव नहीं है और तुझे जाना ही पड़ेगा। वहाँ तुझे एक सुन्दर स्त्री मिलेगी और तुझको हर तरह ललचावेगी परन्तु तू उसको भी टाल न सकेगा और साथ में उस स्त्री को लाकर पटरानी बनी लेगा। इतने पर भी सन्तोष हो जाए तो ठीक है परन्तु भावी तुझे और भी आगे खीचेंगी। जिससे तू यज्ञ करने को तैयार हो जायेगा और सो भी अश्वमेध यज्ञ। तू अश्वमेध यज्ञ करके अपने भावी का आवाहन स्वयं करेगा।

यज्ञ में वृत ऋत्विक् जो अठारह ब्राह्मण होंगे ये बजाय वृद्ध के जवान होंगे। इन ब्राह्मणों से अगर कोई अपराध हो जाये तो क्रोध मत करना, परन्तु तू अवश्य ही क्रोध करेगा। क्रोध होने पर उनको देहान्त दण्ड मत देना। परन्तु भविष्य टलने वाला नहीं। तू इस कारण से उन अठारहों ब्राह्मण का शिरच्छेदन करेगा और इस ब्रह्म हत्या के कारण तत्काल तुझको अठारह प्रकार का कोढ़ फूट निकलेगा। अब तुझे इसके निवारण का उपाय बिताता हूँ। जो कि तेरा भविष्य तुझसे करायेगा। इस कोढ़ के निवारणार्थ जिसकी वाणी और हस्त दग्ध न हुए हों (दान आदि प्रतिग्रह लेने से हाथ और असत्य अयोग्यादि भाषण करने से वाणी दग्ध अर्थात् भ्रष्ट होती है। ऐसे व्यक्ति से पराक्रम तथा सत्व नहीं रहता) ऐसे ब्राह्मण से तू महाभारत के अष्टादश पर्व का श्रवण करना परन्तु उसमें किसी बात की शंका मत करना तो तेरा सब कोढ़ मिट जायेगा, परन्तु तुझे उसमें शंका अवश्य होगी और इसके फलस्वरूप अठारह प्रकार के कोढ़ों में से एक कोढ़ तेरे शरीर में जैसे का तैसा रह जायेगा। यह मैंने तेरा सब भावी कह सुनाया है। तुझसे हो सके उतने सब उपाय करके इस भविष्य को टालना। इतना कहकर वेदव्यास जी वहीं अन्तर्ध्यान हो गये।

मुनि के चले जाने पर राजा जनमेजय ने नगर में डौंडी पिटवा दी कि ‘कोई गृहस्थ यज्ञ के घोड़े को न खरीदे तथा कोई भी यज्ञाश्व इस नगर में न लावे। थोड़े दिन पीछे इस बात की चर्चा नगर भर में होने लगी कि भैया हो न हो, अब तो सचमुच कलियुग आ गया। राजा अधर्मी हो गये, कर्म पर से मनुष्य की आस्था उठने लगी। राजा के यहाँ क्या टोटा आ पड़ा जो यज्ञाश्व न ले सके। स्वयं यज्ञ न करे तो न सही परन्तु दूसरा कोई छोटा मोटा यज्ञ करे तो उसको भी बन्द कर दिया।’ इस भाँति जगह-2 लोग निन्दा करने लगे। राजा के प्रधानों तथा कार्यभारियों को भी बुरा भला कह कर प्रजा उनको भी त्रास देने लगी। राजा को प्रधानों ने सूचना दी कि आपकी इस आज्ञा से बड़ी निन्दा हो रही है। राजा ने निन्दा का ख्याल कर अपनी पहली आज्ञा को बदल दिया और यज्ञाश्व लाने तथा बेचने का हुक्म दे दिया। अब यज्ञाश्व और नाना प्रकार के अश्व आने लगे। परन्तु यज्ञाश्व खरीदना आसान काम न था जो यज्ञ कर सके और समस्त दिशाओं को जीत लेने वाला राजा ही खरीद सकता था। यज्ञाश्व घोड़े आते और चले जाते। नगर में आया हुआ अश्व पीछे लौट जाए तो राजा की अपकीर्ति होती और राजा निसत्व समझा जाता इस कारण विवश होकर कीर्ति रक्षा के लिये राजा जनमेजय को एक यज्ञाश्व खरीदना पड़ा। परन्तु उस पर सवारी न करने का निश्चय किया।

कुद दिनों पश्चात् राजा ने विचार किया कि सवारी करने में क्या दोष है? किधर जाना किधर न जाना सो तो अपने हाथ में है। ऐसा सोच कर राजा ने यज्ञाश्व पर सवार होकर उत्तर दिशा को गमन किया, परन्तु भावी प्रबल है, घोड़ा दौड़ते-2 दक्षिण दिशा को जाने लगा। जाते-2 रास्ते में एक स्थल पर एक अत्यन्त रुपवती नवयौवना सुन्दर स्त्री दृष्टिगोचर हुई। उस पर मोहित हो जाने के कारण राजा ने ही आगे बढ़कर पूछा कि ‘र्स्वग की हे मनमोहनी तू अकस्मात इस स्थान पर कहाँ से आई ?” उसने उत्तर दिया कि “र्स्वग लोक में से” पुनः राजा ने पूछा “तेरी क्या इच्छा है ? क्या तू मेरे साथ चलेगी ? मैं पृथ्वी पति राजा हूँ।” सुन्दरी ने कहा कि “मेरे साथ प्रतिज्ञा करने से मैं आ सकती हूँ।” राजा के पुनः पूछने पर उसने कहा कि “मुझे पटरानी बनाने की प्रतिज्ञा पर मैं चल सकती हूँ।” राजा ने स्वीकार किया और मन में विचार किया कि पटरानी बनावेगें किन्तु यज्ञ नहीं करेगें। तदन्तर राजा ने उसे भवन में लाकर विवाह करके पटरानी के पद पर स्थापित किया।

राजा के यज्ञ न करने का निश्चय कर बैठने पर उसकी अपकीर्ति होने लगी। और “अब तो राजा भी समय के अनुकूल होने लगे। जब यज्ञ-यागदिक कर्म बन्द हो गये तब वर्षा कहाँ से होवे? प्रजा पीड़ित होने लगी और अश्व खरीदा हुआ है, दिग्विजय भी किया हुआ है इतने पर भी राजा यज्ञ नहीं करता इसका क्या कारण है? इस प्रकार अपकीर्ति सुनकर राजा ने अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया। मुनि के कथनानुसार वृद्ध ऋत्विजों की बहुत सी खोज कराई गई परन्तु एक भी वृद्ध ब्राह्मण नहीं मिला, प्रत्युत सब ब्राह्मण जवान और मस्करें मिले यज्ञ होने लगा। ब्राह्मण स्वाहा स्वाहा करते हुये हवनीय पदार्थ की आहुति देने लगे। कई दिनों तक गाजे बाजे के साथ यज्ञ होता रहा।

अश्वमेध में घोड़े के सभी अंगों का न्यास होता है। इस कृत्य को यजमान की धर्मपत्नी करती है। राजा जन्मेजय की रानी अत्यन्त सुन्दरी थी, जब रानी ने क्रमशः सब अंगों का न्यास करते हुए घोड़े के गुप्ताँग को न्यास किया तो ये यज्ञ कराने वाले तरुण ब्राह्मण हँस पड़े। उन्हें हँसते देखकर उपस्थित जन समुदाय भी हँस पड़ा। राजा के क्रोध की सीमा न रही। उसने दाँत पीसते हुए सामने रखे हुए यज्ञ पात्र उन ब्राह्मणों में मारे। होनी की प्रबलता देखिए, उन हलके से पात्रों के आघातों से अठारहों ब्राह्मणों के सिर धड़ से कटकर भूमि पर गिर पड़े। चारों ओर हाहाकार छा गया। राजा को ब्रह्म हत्या का पाप लगा और वह अठारह प्रकार के कोढ़ों से कोढ़ी हो गया।

राजा कोढ़ से दुखी था। सब ने उसे छूना तक बन्द कर दिया। उसकी बड़ी दुर्गति होने लगी। जन्मेजय को महर्षि वेदव्यास के वचन याद आये कि उन्होंने कोढ़ के निवारण के लिए महाभारत सुनने का उपाय बताया था। राजा की आज्ञानुसार मंत्रियों ने ऐसा ब्राह्मण खोजा जिसकी वाणी असत्य और प्रतिग्रह से दग्ध न हुई हो। ऐसे महातेजस्वी मुनि वैशम्पायन से महाभारत सुनाने की प्रार्थना की गई। मुनि ने कहा-राजन् इस महाग्रथ्ं में कुछ विचित्र बातें हैं उनके रहस्य सब को विदित नहीं, तो भी उसमें असत्य कोई बात नहीं हैं। तू मुझसे रहस्य तो पूछ लेना पर अविश्वास मत करना अन्यथा उसके सुनने का पुण्य नष्ट हो जाये। राजा ने उनकी बात मान ली और कथा सुनने लगा।

ज्यों ज्यों राजा पर्वों को सुनता गया त्यों त्यों उसका एक एक प्रकार का कोढ़ नष्ट होता चला गया। इस भाँति सत्रह कोढ़ मिट गये पर 18 वें पर्व में उसे शंका उत्पन्न हो गई। वैशम्पायन जी भीम का पराक्रम और उनके हाथी उठा उठा कर फेंक देने की कथा सुना रहे थे। राजा को यह बात असम्भव लगी। उसने चिल्ला कर कहा - “मुनिराज यह सर्वथा असत्य है, बिलकुल असम्भव है। मनुष्य हाथी को उठाकर फेंक दे यह हो नहीं सकता।” राजा का यह कहना था कि उसका अठारवाँ कोढ़ स्थायी हो गया। कथा पूरी हो गई।

वैशम्पायन जी ने अपने योग बल से जन्मेजय को प्राचीन काल के दृश्य दिखाये, तब राजा ने अपनी आँखों भीम का पराक्रम देखा। उसे बड़ा पश्चाताप हुआ कि मैंने ऐसी भूल क्यों की ? शंका क्यों उठाई, यदि न उठाता तो एक कोढ़ से कोढ़ी रहने के दुख से बच जाता। राजा पश्चाताप ओर दुख से दुखी होकर रोने लगा। तब मुनि ने उसे समझाया कि इसमें तेरा क्या दोष है? होतव्यता किसी न किसी प्रकार अपना प्रभाव प्रकट कर देती है। वह किसी से भी, किसी उपाय से भी, कदापि, नहीं टलती, इस प्रकार उसको सान्त्वना देकर मुनि अपने स्थान को चले गये और राजा होतव्यता की प्रबलता को देखता ही रह गया।


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-नेकनाम रहना अच्छी बात है, परन्तु नेकनामी के लिये सच्ची बातों में दबना अपनी आत्मा की हत्या करना है।

-रानाडे

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-रहने का तरीका साधारण और विचारों में उच्चता होनी चाहिए। -मिल्टन


विचार और कार्य में समन्वय कैसे हो?

(प्रो. राम चरण महेन्द्र, एम. ए.)

स्ंसार में अनेक व्यक्ति हैं जिन के पास जीवन को परिपुष्ट, उन्नत और उत्कृष्ट बनने वाले सद्विचारों की न्यूनता नहीं है, हृदय सरोवर में नित्य नवीन आशापूर्ण तरंगें उद्वेलित हुआ करती हैं, मन में अनेक दिव्य भावनाओं का उदय होता रहता है, आत्मा में महत्वाकाक्षाओं का उद्भव चलता रहता है, किन्तु इन समृद्ध विचारों के होते हुए भी वे अनेक वर्षों से जहाँ थे वहीं हैं, तिलभर भी आगे नहीं बढ़े, सफलता प्राप्त नहीं हुई, ज्यों के त्यों किं कर्त्तव्यविमूढ़ दीन-हीन अवस्था में पड़े दिनों को धक्के दे रहे हैं। वे जीवन में उन्नति करना चाहते हैं, अपनी गुप्त मानसिक शक्तियों से पूर्ण लाभ उठाने के इच्छुक हैं, सुख और शान्ति प्राप्त करना चाहते हैं, और संसार में सफलता लाभ के आकाँक्षी हैं। किन्तु उन्नति की सच्ची अभिलाषा होने पर भी वे अग्रसर नहीं हो रहे हैं, जंग लगी हुई मशीन के पुर्जों की भाँति एक ही स्थान पर पूर्ववत् स्थिर हैं। इसका क्या कारण है ?

विचार ही संसार में सब से महान् शक्ति है, पर असंगठित अव्यवस्थित और काल्पनिक विचार केवल दिल-बहलाव, मनोरंजन, एवं निष्प्रयोजन सामग्री हैं। जिस प्रकार आप कुछ काल के लिए उपन्यास अथवा दिल बहलाने वाली कोई पुस्तक लेकर अपना मनोरंजन कर लेते हैं, उसी प्रकार इन शुभ विचारों में रमण कर कुछ काल तक उनकी अद्भुत शक्तियों पर चमत्कृत होते हैं -उनके नशे में अन्य विस्मृति कर देते हैं। किन्तु तदुपरान्त वह सब कुछ नीरस प्रतीत होने लगता है और कभी कभी तो पुस्तक छोड़ते ही हम सब कुछ भूल भी बैठते हैं। हम उन सद्-ग्रन्थों में दिये हुए र्स्वण-सूत्रों को क्रियात्मक रुप प्रदान नहीं करते। उनमें वर्णित सद्-शिक्षाओं को कार्यरुप में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील नहीं होते, उनके अनुसार जीवन को नहीं मोड़ते, शिक्षाओं पर दत्तचित्त, एकाग्र दृढ़तापूर्वक अमल नहीं करते, शास्त्रीय विधियों का पूर्ण तन्मय हो अभ्यास नहीं करते, अपने आचरण को उनके अनुसार नहीं बनाते। केवल पढ़ कर ही संतुष्ट से हो जाते हैं। यही हमारी सबसे गुरुतर-त्रुटि है। यही पर-वशता हमें अग्रसर नहीं होने देती। आजकल अधिकाँश जिज्ञासु और साधक इसी क्रियात्मक विचार की न्यूनता के कारण ही वाँछनीय परिस्थिति उत्पन्न नहीं कर पाते।

मानस-शास्त्र के वेत्ताओं का कथन है कि मनुष्य उत्तम लेखक, योग्य वक्ता, उच्च कलाविद् एवं वह जो कुछ भी चाहे सरलता पूर्वक बन सकता है, पूर्ण पारंगत हो सकता है, यदि वह निज शुभ विचारों को क्रिया का रुप प्रदान कर दे। वह जो कुछ सोचता विचारता, कल्पना करता है, यदि उसे परिश्रम द्वारा नित्य-प्रति के जीवन में भी प्राप्त करने की कोशिश करे, स्वयं कार्य-संलग्न होकर मानसिक वृत्ति को सत्य का रुप प्रदान करे। शुद्ध विचारों की उपयोगिता तभी प्रकट होगी जब अंतःकरण के समस्त संस्कारों, विचार-मुद्राओं तथा कल्पनाओं को शरीर के कार्य द्वारा प्रत्यक्ष करने का प्रयत्न किया जायेगा।

विचार के दो रुप हैं - एक काल्पनिक दूसरा क्रियात्मक। तुम किसी वस्तु-विशेष की हार्दिक कामना करते हो, उसकी सिद्धि के हेतु अंतःकरण पूर्वक अभिलाषा भी करते हो, तुमने अपना आदर्श भी उच्चे अन्तःकरण से निर्मित किया है, पर तुम्हारी ये आशापूर्ण तरंग पानी के बुलबुलों की तरह मन ही मन में शान्त हो जाती हैं। तुम जीवन के काल्पनिक बाजू पर तो अपना विशेष ध्यान रखते हो, किन्तु विचारों के क्रियात्मक स्थल पर यथोचित ध्यान नहीं देते ! इसी कारण तुम्हें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होती, तुम विजय से अपने अन्तःकरण को गद्गद् नहीं कर सकते-फतह के डंके बजा कर संसार को महत् आर्श्चय में नहीं डाल सकते। तुम्हारे मुख-मन्डल पर आध्यात्मिक-सौर्न्दय का दिव्य प्रकाश नहीं झलकता और तुम सन्तोष के मधुर सरोवर में अपनी आत्मा को सुख स्नान करा कर शान्त नहीं कर पाते। जब तुम किसी वस्तु विशेष के ध्यान में निमम्न होते हो, तो किंचित् काल के लिए उस वस्तु से तुम्हारा सम्बन्ध स्थिर हो जाता है। पर केवल अभिलाषा मात्र करते रहने से आकर्षण के दिव्य सूत्र अत्यन्त निर्बल रहते हैं, और तब तक सक्रिय नहीं होते जब तक उस की सिद्धि के लिए पर्य्याप्त परिश्रम प्रयत्न-क्रिया न की जाये। काल्पनिक और क्रियात्मक दोनों ही तत्वों से विचार समूचा, पूर्ण उत्पादक बनता है। अभिलाषा तब तक उत्पादक नहीं होती जब तक वह किया में पूर्ण रुप से परिणत न कर दी जाये। अभिलाषा की क्रिया के साथ सम्मेलन होने पर उत्पादक शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और शीघ्र ही फल की प्राप्ति हो जाती है।

हमने ऐसे अनेक अस्थिर व्यक्तियों को देखा है जो बड़े उत्कृष्ट आदर्शों को लेकर निकले, जिन्हे मनोवाँछित पदार्थ में अत्यन्त श्रद्धा थी, और जो बहुत कुछ करने के इच्छुक थे, किन्तु वे अपने सम्पूर्ण मन, बचन, और कार्यों के प्रवाह को कार्य में परिणत न कर सके, सिद्धि के लिए कर्म में प्रविष्ट नहीं हुए। जिस मूल्य-द्वारा किसी विशेष कार्य में सफलता प्राप्त होती है, उस मूल्य (ठोस कर्म, परिश्रम, उद्योग, क्रियाशीलता) को दिये बिना ही उस वस्तु-विशेष की आकाँक्षा करने लगे अपनी उत्सुकता केवल विचारों मात्र तक परिमित रखकर वे यह भूल ही गए कि आत्मिक भावनाओं का जितना दृढ़ संबंध कर्म से होगा, कार्य उतनी ही शीघ्रता से सम्पन्न होगा। यह संसार तो साधना भूमि है। इसे कर्मक्षेत्र कहना अधिक उपयुक्त होगा। जिस जिस व्यक्ति ने जैसे जैसे कर्म किये, वैसे ही फल उसे प्राप्त हुए। बिना कार्य क्षेत्र में उतरे केवल सोचने-विचारने मात्र से न किसी को कुछ प्राप्त हुआ है, न होने की संभावना ही है।

सफलता प्राप्त करना चाहते हो तो कार्य के महत्व का हृदयंगम करो। कार्य में संलग्न हुए बिना मनुष्य कदापि अग्रसर नहीं हो सकता। वह इधर उधर की बातें सोचता रहे, मन में मंसूबे और हवाई किले तैयार करता रहे, परन्तु अभ्यास या परिश्रम से भयभीत होता रहे तो क्या लाभ। आजकल मनुष्य कार्य से दूर भागते हैं। चाहे समस्त दिन इधर-उधर की उलटी-सीधी बातें करते रहें, एक से एक उत्तम पुस्तक पढ़ते रहें, पर उस उत्कृष्ट विचार धारा को कार्य रुप में सत्य करने का आन्दोलन नहीं करते। संसार तो कार्य की कसौटी है। यहाँ मनुष्य की पहिचान, तभी होती है जब उसके कार्यों पर टीका-टिप्पणी होती है।

जो कर्म क्षेत्र में प्रविष्ट होता है, वही आगे बढ़ता है। जो अपनी शुभ कामनाओं का क्रियात्मक रुप प्रदान करता है वही अन्त में पूर्ण विजयी होता है। प्रत्येक मनुष्य का कार्य में संलग्न होना ही राष्ट्र की उन्नति का मूल-मंत्र हैं।

आत्म संयम और चरित्र गठन तो जीवन-व्यापी कार्य है। हममें से यह कोई नहीं कह सकता कि मैं अपना यह कार्य समाप्त कर चुका हूँ और पूर्ण निश्चित हूँ। शरीर के भीतर रहने वाले दुश्मनों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना इतना सरल नहीं है जितना अन्य कार्यों में विजय प्राप्त करना और सबसे बलशाली दुश्मन तो यह अकर्मण्यता है जो हमें आगे नहीं चलने देता। कहीं हम आलसी, बातूनी, बक्की-झक्की कोरे अकर्मण्य ही न बन जाए इस बात पर तीव्र दृष्टि रखने की परम आवश्यकता है। चंचलता, व्यग्रता हमारे मार्ग को अवरुद्ध कर सकती हैं, और कर्मभूमि में पग पग पर ठुकरा सकती हैं। वासनाऐं, चिंताएं और काल्पनिक भय हमारे अध्यवसायों को शिथिल कर सकती हैं, पर हमें चित्त संयम रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो तुम सम्पादित न कर सकते हो। जो कार्य, जो सफलताएँ, जो आर्श्चय-चकित फल एक व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, उस सब की सामर्थ्य तुम में भी विद्यमान है। जो प्रतिभा, जो बुद्धि सामर्थ्य एक मनुष्य के पास है वह तुम में भी बीज-रुप से मौजूद है। तुम जो चाहोगे वही कर सकोगे, तुम जिसकी याचना करोगे वही प्राप्त होगा। यदि तुम सुख समृद्धि की याचना करोगे तो तुम्हें सुख मिल सकेगा। यदि मुक्ति की आकाँक्षा करोगे तो मुक्ति मिलेगी। संसार तो कल्पवृक्ष है, उससे तुम जो चाहोगे वही प्रदान करेगा। तुम विभूति के लिए हाथ पसारोगे, तो तुम्हारे लिए रत्नाकर, वसुन्धरा, और हिमालय के मुक्तामणि खोल देगा। तुम आनन्द प्राप्ति के लिए अनुरोध करोगे तो वही तुम्हारे लिए र्स्वग बन जायगा। जो उसे हरा भरा क्रीडास्थल देखने के आदी है, उसके लिए नित्य, शाश्वत और आनन्द-धाम बन जायगा। केवल एकाग्रचित्त हो, उत्तम और उच्च विचारों को कार्य रुप में प्रकट करना सीख लो। तुम्हारी यह सर्वोत्कृष्ट शक्ति है। इसे इष्ट कार्य में लगाने से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त होती है।

तुम आज से अभी से दृढ़ संकल्प करो कि थोथी विचार धारा में निमग्न नहीं रहूँगा। मेरी कार्यशक्ति अत्यन्त है। मुझे पूर्ण अनुभव हो गया है कि मनुष्य जो क्रिया करता है उसी का फल उसे प्राप्त होता है मेरी उन्नति या अवनति, मान या हानि मेरे कार्यों पर निर्भर है। उत्तम कार्य, उचित कर्म और निरन्तर साधना-युक्त हो सक्रियात्मक विचार ही उत्तम जीवन निर्माण करते हैं।


विजयोत्सव क्यों और कैसे

(पं नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ)

वर्षा के पश्चात् शरद् ऋतु आती है उसमें नदियों में जल कम हो जाते हैं, मार्गों में कीचड़ादि नहीं रहता, आकाश स्वच्छ हो जाता है, क्षत्रियों के लिए विजय-यात्रा के निमित्त यही सुन्दर अवसर रहता है, इस शरद्-ऋतु के शुक्ल पक्ष में भारत में सर्वत्र विजयोत्सव होते थे। इसी में विजय यात्रा प्रारम्भ होती थी, इसी में युद्ध का निर्णय होकर विजयोत्सव मनाये जाते थे। इसी ऋ तु में राम-रावण का महा-युद्ध आश्विन शुक्ल दशमी को प्रारम्भ हुआ इसीलिए विजया दशमी को इतना महत्व प्राप्त हुआ। कार्तिक में हमारा प्रसिद्ध महाभारत हुआ था इसलिए दीपावली को इतना महत्व प्राप्त हुआ।

वैसे हमारे पूर्वजों ने जो भी त्यौहार चलाये वे ऋतुओं पर दृष्टि रखकर चलाये। प्रत्येक ऋतु की सन्धि में कोई न कोई यज्ञ महायज्ञ होता था। प्रत्येक मास में अमावस को दर्श तथा पूर्णिमा को पौर्णिमासेष्टि होती थी। चैत्र में वसन्तोत्सव चलता था। रामजन्मोत्सव भी इसी में आता है। आषाढ़ में व्यास पूर्णिमा अर्थात् गुरु-शिष्यों का उत्सव, श्रावण में श्रावणी अर्थात् शिक्षा देने वाली संस्थाओं का महोत्सव, भाद्र पद में जन्माष्टमी, आश्विन में विजयादशमी, कार्तिक में दीपावली मार्ग शीर्ष में-प्राचीन समय में कहीं कहीं मार्ग शीर्ष से वर्षारम्भ होता था - इसलिए बड़े बड़े यज्ञ समारोह इसमें होते थे। पोष में संक्रान्ति, माघ में फिर वसन्तागमन, फाल्गुन में होलिका इस प्रकार बड़े बड़े समारोह होते है। सब जाति के उत्सवों तथा समारोह में सब जाति के लाग अभिन्न भाव से सम्मिलित होते थे। कोई छोटे बड़े का भाव नहीं रहता था। क्योंकि आर्य- जाति सदैव स्वभावानुरुप बाँटकर काम करती रही है। शिक्षा का काम ब्राह्मणों ने लिया, रक्षा का काम क्षत्रियों ने, वाणिज्य का, कृषि का काम वैश्यो ने संभाला, सेवा का भार शूद्रों पर आ पड़ा।

मनुष्य एक समाज का प्राणी है, उसको समाज के बिना सरता नहीं। मनुष्यों में भी सत्व, रज, तुम ये तीन गुण प्रधान रहते हैं। सब में ये तीनों गुण रहते हैं पर जिनमें जो गुण प्रधान हो वह मनुष्य उसी गुण वाला कहलाता है, इसीलिए इन तीनों गुणों के कारण मनुष्य तीन स्वभावों वाला, तीन प्रवृत्तियों वाला, तीन श्रद्धाओं वाला, तीन प्रकार के कर्मों वाला होता है। इसलिए जिस-जिस गुणों के प्रभाव में आकर मनुष्य किसी कार्य में प्रवृत्त होगा, जैसी श्रद्धा रखेगा, जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल पायेगा। इसीलिए ब्राह्मणों का मुख्य त्यौहार श्रावणी, क्षत्रियों का विजयदशमी, वैश्यों का दीपावली और शूद्रों का होली हो गया, वैसे प्रत्येक आर्य (हिन्दू) के घर में इतने त्यौहार होते रहते हैं कि संसार की किसी जाति के जीवन में इतने त्योहार नहीं होते हैं। हमारे यहाँ मनुष्यों के ही नहीं अपितु पशुओं के भी त्यौहार मनाये जाते हैं, वृक्षों तक के त्यौहार मनाये जाते हैं। बालकों के त्यौहार पृथक, कन्याओं के पृथक, पति के, स्त्री के, भाई के, बहन के त्यौंहार हार बँटे हुए हैं। आज हम दिशा भूल हो गये हैं त्यौहारों को आनन्द पूर्वक मनाने की शक्ति नहीं रख रहे हैं, क्योंकि दरिद्र हैं, भ्रान्त हैं, दीन हैं, अनन्य गतिक हैं पर जिस प्रकार भी जिस रुप में भी मनाते रहते हैं उस से क्या अपने पूर्वजों के अनन्त वैभव, ऐर्श्वय, सम्पत्ति, उत्साह, उमंग, वीरता और श्री का पता नहीं चलता-

1.महापुरुषों के जन्मदिन -

2.वीर पुरुषों के वीरोत्सव

3.ऋ तु-ऋ तु के योगादृष्टि-

4.घर-घर में आवासवृद्ध पुरुष-स्त्रियों की जन्म गाँठे-

5.ऋतु-उत्सव-वसन्तात्सव आदि-

6.स्त्रियों के विशेष उत्सव वट-सावित्री आदि-

7.पर्वोंत्सव, महापर्वोत्सव-

8.कुम्भ अर्द्धकुम्भ, महावारुणी, आदि

9.वृक्षाोत्सव, विशेष-विशेष वृक्षों की आरोपण विधि -

10.पशुओं के विशेष उत्सव जैसे श्रावणी के दिन गाय बैल आदि के समारोह। इन उत्सवों तथा त्यौहारों अथवा समारोहों में व्यक्ति तथा समुदाय दोनों की प्रवृत्तियों का ध्यान रखा गया है। मनुष्य है और संसार के सुख दुःखों के चक्र चलते ही रहते हैं, बीच में इस प्रकार त्यौहार दुःख को भुला देते हैं। यह ध्यान रहे कि सब त्यौहारों में धर्मतत्व का बीज विद्यमान है। इसके अतिरिक्त गर्भाधान संस्कार से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाले अन्य संस्कार समारोह भी मनुष्य के मन पर अपने संस्कार डालते रहते हैं, साराँश इन संस्कारों, त्यौहारों, समारोहों में प्रवृत्ति और निवृत्ति का ऐसा सुन्दर संमिश्रण हो गया है कि मनुष्य व्यक्तिगत तथा समष्टि रुप से अपना कर्त्तव्य आनन्दपूर्वक करता रहता है। उसको संसार एक बोझ नहीं प्रतीत होता, वह संसार को दुःखमय नहीं समझता, इसीलिए घबराता नहीं और ईश्वर-विश्वास के साथ शुभ कर्म करता हुआ जीवन यापन करता रहता है।


सरदी और जुकाम की चिकित्सा

(लेखक श्री जे. उडहाउस)

सरदी जब मनुष्य को लगती है तो वह एक प्रकार की पूर्व सूचना होती है। यदि किसी को सरदी का कुछ असर हो जाए तो उसको तुरन्त यह सोचना चाहिये कि उसके शरीर में कुछ न कुछ गड़बड़ी है, उसके शरीर में कुछ न कुछ विजातीय द्रव्य एकत्र हो गये हैं। इस सिलसिले में यदि हमको इस बात का ज्ञान हो जाये कि शरीर में यह विजातीय द्रव्य कैसे एकत्र होते हैं तो हम सरदी, जुकाम या किसी प्रकार की शिकायत का कारण तुरन्त समझ जायेगें। शरीर में विषैले विजातीय पदार्थों के बहुत से कारण हैं जिनमें कुछ प्रमुख यहाँ दिये जाते है।

1. अनावश्यक रुप से अधिक भोजन करना।

2. अनियमित विटामिन आदि हीन पदार्थ खाना।

3. व्यायाम का अभाव।

4. शरीर से गन्दगी दूर करने वाले अवयवों से ठीक रुप से काम न लेना।

5. शुद्ध वायु का न मिलना एवं दीर्घश्वास न लेना।

इन सब पर विचार करने से बात होगा कि एक दूसरे से कितना अधिक सम्बन्धित है। यदि एक पर भी ध्यान नहीं जायेगा तो परिणाम शरीर के लिये कितना भयावह और घातक होगा।

ऊपर संक्षेप में यह बतलाया जा चुका है किस प्रकार शीत का प्रारम्भ होता है। जब सरदी का आरम्भ हो जाता है तो शरीर से अनावश्यक मल निकलने लगता है। यदि यह मल रुक जाये तो शरीर की दशा अत्यन्त खराब हो जाने की सम्भावना रहती है। किन्तु हम लोगों में एक दोष यह है कि जब शीत के कारण हमारे शरीर से अनावश्यक मल निकलने लगता हैं तब भी हम सतर्क नहीं होते और उसको निकालने के बजाय शरीर में संचित होने देते हैं। इसके बाद ही जुकाम होता है और मल के निकलने का एक मार्ग मिल जाता है। अतः हमें यह ज्ञात हो गया कि सरदी और जुकाम दोनों का एक ही कारण है। और यदि हम अनावश्यक मल को बहिष्कृत कर दें तो सरदी और जुकाम दोनों को अच्छा कर सकते हैं। देखने-सुनने में तो यह तरीका बड़ा सुगम-सा जान पड़ता है किन्तु यह जान लेना चाहिये कि जब तक जुकाम को दूर करने के लिये दृढ़ निश्चय न कर लिया जायेगा तब तक सरदी बनी रहेगी। इसके लिये अपनी रहन-सहन, खान-पान, तौर-तरीके में परिवर्तन करना पडे़गा। जो इसके लिये तैयार नहीं होगा यह सदा सरदी जुकाम से आक्रान्त रहेगा। जब तक ये परिवर्तन न होगा तब तक लाभ होने की कोई आशा नहीं। और यदि इस दिशा में समुचित प्रयत्न न किया जायेगा तो आगे चलकर बहरेपन के भी लक्षण शुरु होने लगते हैं। अतः इस मामले में विशेष सतर्क रहने को आवश्यकता है।

अब हम यहाँ इन सब बातों पर विचार करेंगे। ऊपर जो कारण इन दोषों के बतलाये गये हैं उनमें पहले दो को ही लीजिए? कितने लोग इस बात को नहीं जानते कि हमें भोजन जीवित रहने के लिये करना चाहिये। वे तो केवल स्वादेन्द्रिय को तृप्त करने के लिये भोजन करते हैं। उनको इस बात का तनिक भी पता नहीं कि हमारा आचार हमारे आहार के ही अनुसार बनते हैं। जैसा हमारा आहार रहेगा वैसे ही हम बनेगें। इसलिये यह बहुत बुरा है कि अनावश्यक रुप में पेट को स्वादेन्द्रिय तृप्त करने के लिये भरा जाये। यह बात जान लेनी चाहिये कि शरीर के लियें अल्प चीजों की ही आवश्यकता हुआ करती है। शरीर को पुष्ट करने के लिये प्रोटीन, स्टार्च, मेद, चीनी, लवण एवं विटामिन की प्रायः न्यूनता देखी जाती है। इनकी प्राप्ति अधिकतर ताजे फलों, तरकारियों और सलाद से होती है। एक साधारण औसत दरजे के अच्छे भोजन में प्रोटीन, स्टार्च, मेद और चीनी कम से कम मात्रा में रहते हैं और शाक, तरकारियाँ और फल अधिक रहते हैं।

जिस व्यक्ति को हमारे लिखे नियम के अनुसार सरदी-जुकाम का उपचार करना हो उसको यह बात ध्यान कर लेनी चाहिये कि यदि उसने निश्चय किया तो दृढ़ प्रतिज्ञा होकर इन्हीं नियमों के अनुसार चलना होगा, तनिक भी अपनी इच्छा से इधर उधर न करना होना। पहली बात यह है कि रोगी को कम से कम एक सप्ताह तक केवल ताजे पके फलों पर निर्वाह करना होगा। अधिक से अधिक तीन बार एक दिन में भोजन करना चाहिये। और प्रति बार उतना ही खाना चाहिये जितने से पेट भर जाये।

इसके अनन्तर व्यायाम का नम्बर आता है। यदि हम थोड़ा अधिक भी खालें किन्तु नियमित रुप से प्रति दिन व्यायाम करते जायें तो फिर भी ठीक है। लेकिन एक तो खाने पीने में ही हम असंयम दिखाते हैं और दूसरे व्यायाम भी नहीं करते। और यही बुराई का घर है। शरीर में से विजातीय द्रव्य निकालने में व्यायाम बहुत सहायता करते हैं। जिनको किसी व्यायाम की आदत न हो वे टहलने से आरम्भ करें। कम से कम तीन मील प्रति दिन टहलने से ठीक रहता है। टहलने के समय यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि हम व्यायाम कर रहें हैं। खूब लम्बी-लम्बी साँस लें।

अन्त में हम वायु की शुद्धता और अंशतः प्राणायाम पर आते हैं। शुद्ध वायु तो प्राण रक्षा के लिये आवश्यक है ही इसको कौन नहीं स्वीकार करेगा। किन्तु साथ ही साथ प्राणायाम की आवश्यकता भी कम नहीं है। प्राणायाम से स्वयं ही स्वास्थ्य अत्युत्तम हो जाता है। प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे प्रातःकाल करना चाहिये। इससे फेफड़े, हृदय आदि को अपूर्व शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार भी लम्बी ख् साँस लिया करें। कुछ ही दिनों में आदत पड़ जायेगी। अभ्यास से क्या नहीं सम्भव है?

हो सकता है कि एक सप्ताह के अभ्यास से जुकाम सरदी का प्रकोप दूर न हो। ऐसी दशा में पुनः इसको करना चाहिये। यदि एक मास में गुण न करे तो दो मास तक चलाये। क्योंकि यदि पुराना रोग होगा तो समय लेगा ही आतुरता से कुछ नहीं होता।


Quotation

-विद्या से सभा में विजय होती है, वाहन पर चढ़कर चलने से मार्ग जीता जाता है। बल से शत्रु जीते जाते हैं, परन्तु अच्छे स्वभाव वाला मनुष्य समस्त संसार को जीत सकता है। -विदुर

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-आदर के साथ विष खाने पर भी शिवजी जगदीश ही बने रहे, और बिना आदर के अमृत खाने पर भी राहु को सर कटाना पड़ा। -रहीम

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-अत्यन्त परिचय से अनादर होता है, जिस तरह भीलनी चन्दन को जला देती है। -वृदकवि


गाजर खाने से नेत्र-ज्योति बढ़ती है।

शरीर के अन्य अंगों की भाँति हमारे नेत्रों पर भी आहार का विशेष रुप से प्रभाव पड़ता है। प्रायः देखा गया है कि भोजन में विटामिन ‘ए’ का अभाव होने पर ही दृष्टिक्षीणता, अन्धता अथवा रतौंधी की शिकायतें हुआ करती हैं। अमेरिका के प्राकृतिक चिकित्सकों ने यह पता लगाया है कि गाजर में पुनः दृष्टि शक्ति प्राप्त कराने के विशेष गुण हैं। अभी हाल ही में अमेरिका प्राकृतिक चिकित्सक मि॰ इमनुइल जोसेफ्रसन का लेख प्रकाशित हुआ था। उसमें उन्होंने एक बालक पर, जो करीब करीब अन्धा हो चला था, प्रयोग किया। उन्होंने उसे प्रतिदिन तीन कच्ची या ठीक तौर से पकायी हुई गाजर खाने को बताया। गाजर के साथ ही उस बालक को काड-लिवर आयल (मछली का तेल) भी पिलाया। इससे उसकी आँखे शीघ्र ही निरोग होने लगी। तीन महीने के बाद उसकी आँखों में कोई भी खराबी न रह गई। काड-लिवर आयल में विटामन ‘ए’ रहता है। हरे शाक और भाजियों में एक प्रकार का पीला पदार्थ होता है जो स्वतः विटामिन ‘ए’ उत्पन्न करता है।

घास में विटामिन ‘ए’ और वह पीला द्रव पदार्थ अधिक मात्रा में मौजूद रहता है। पिछले महायुद्ध के समय हँगेरियन सैनिकों को अच्छा भोजन न मिल सकने के कारण रतौंधी आने लगी, जिससे उन्हें रात के समय कुछ सूझता ही न था। इस प्रकार वे रात के समय पहरा देने में असमर्थ हो गए। लेकिन वहाँ के मेडीकल अफसरों को पता लगा कि उनके सैनिक क्षुधा से आतुर होकर घास खाने लगे तो उनकी रतौंधी गायब हो गई।

उक्त प्राकृतिक चिकित्सक ने यह भी पता लगाया है कि यदि बालकों के भोजन में विटामिन ‘ए’ का अभाव हो तो चश्मे से भी उनकी दृष्टि क्षीणता दूर नहीं की जा सकती।

प्रयोग के बाद यह ज्ञात किया गया है कि यदि गर्भणी स्त्री को विटामिन ‘ए’ न मिले, तो उनके बच्चे अपेक्षाकृत मन्द बुद्धि होगें और वे बचपन में ही अपनी आँखें खो बैठेगें। शरीर के स्नायु जाल को लाभ पहुँचाने में भी विटामिन ‘ए’ अत्यधिक उपयोगी साबित हुआ है। यदि माताऐं यह चाहती हैं कि उनके बच्चे सुन्दर और स्वस्थ हो तो उन्हें अपने भोजन में विटामिन ‘ए’ को विशेष रुप से प्रधानता देनी चाहिये।

विटामिन ‘ए’ के अतिरिक्त दृष्टि शक्ति कायम रखने के लिए अन्य प्रकार के भी आहार तथा पौष्टिक पदार्थों का सेवन करना समान रुप से आवश्यक है। सुन्दर स्वस्थ और उपयुक्त भोजन के ही द्वारा काफी समय तक अपनी आँखों की दृष्टि शक्ति अक्षुण्य रखी जा सकती है।

आँखों के जिन स्नायुओं के कारण हम देखते हैं उन्हें स्वस्थ बनाए रखने के लिए विटामिन ‘बी’ आवश्यक है। विटामिन ‘सी’ आँखों की पुतलियों को अच्छी स्थिति में रखने तथा आँखों की अन्य तरह की बीमारियों से मुक्त करने के लिए बड़ा उपयोगी है। अवसर विटामिन ‘सी’ की कमी होने पर मोतियाबिन्द की बीमारी हो जाया करती है। यह देखा गया है कि भोजन में नारंगी, अंगूर या मुनक्का तथा इसी प्रकार के अन्य फलों की अधिक मात्रा रखने से अनेक संक्रामक रोग दूर किए जा सकते हैं। आँखों के लिए विटामिन ‘सी’ भी गुणकारी हैं। आँखों से कम दिखाई पड़ना यह आजकल बहुत साधारण बीमारी हो गई है। इस दृष्टि क्षीणता के लिए गाजर एक बड़ी लाभदायक और सस्ती औषधि हैं। सिर के बाल सफेद हो जाने या झड़ने लगने अथवा रुखे होने सरीखे रोग भी गाजर सेवन से दूर होते हैं।


मेवे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।

(श्री डा. सुरेन्द्रप्रसाद जी)

किशमिश, मुनक्का, अंजीर, काजू, पिस्ता खुमानी, चिरोंजी आदि की गिनती सूखे मेवों में होती है वास्तव में सूखे मेवे स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं। कौन सी चीज किस व्यक्ति के लिये लाभदायक और किसके लिए हानिकारक है यह तो व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा स्वभाव पर निर्भर करता है, लेकिन सूखे मेवे साधारण तौर पर फायदेमन्द ही होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। यों तो हरेक ऋतु में इनका प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन जाड़ो के दिनों में मेवे विशेष रुप से गुणकारी हैं। शरीर में शक्ति लाने उसे स्फूर्तिमय बनाने के लिये गर्मी की आवश्यकता होती है और गर्मी मीठे पदार्थ खाने से मिलती है, लेकिन मीठे पदार्थ वे ही गुणकारी होते हैं जो स्वाभाविक हों, अर्थात् जिन्हें बाहरी उपायों से गुड़ अथवा चीनी द्वारा मीठा न बनाया गया हो। स्वाभाविकता की दृष्टि से सूखे मेवे अपनी सानी नहीं रखते। चीनी गुड़ आदि के अधिकाँश उपयोगी तत्व उन्हें साफ करने की क्रिया में नष्ट हो जाते हैं, लेकिन सूखे मेवों के पौष्टिक तत्व ज्यों के त्यों बने रहते हैं उनसे शरीर को पुष्टि मिलती है और पर्याप्त प्रात्रा में गर्मी भी।

हमारा देश निर्धन है अधिकाँश लोगों की स्थिति ऐसी है कि मेवे खाना तो दूर उन्हें पेट भरने के भी लाले पड़े रहते हैं। लेकिन जो सम्पन्न हैं, उन्हें जाड़े के दिनों में मेवों का खूब प्रयोग करना चाहिए।

हम देखते हैं कि प्रायः बच्चों को उनके माँ-बाप मिठाई अथवा गरिष्ठ पदार्थ खिलाया करते हैं। स्वयं भी यही चीजें खातें हैं हमारी राय में बच्चों को मिठाई के स्थान पर मेवे खिलाना कहीं अधिक उपयोगी और स्वास्थ्यप्रद हैं।

मेवों में अनेक गुण होते हैं। सबसे पहला तो यह है कि वे दस्त साफ लाते हैं। कारण यह है कि मेवों में विटामिन अधिक मात्रा में पाया जाता है, जो आँतों को स्वस्थ रखता है। मेवों में पौष्टिक तत्व तो होते ही हैं, साथ ही आटे के न पचने वाली चोकर के समान कुछ ऐसे पदार्थ जैसे बीज, रेशा, गूदा आदि भी होते हैं, जिनकी मदद से भोजन का बचा अंश आसानी से बाहर निकल आता है। रोटी में पाये गये स्टार्च या श्वेतसार की भाँति इनका पाचन भी छोटी आँत में होता है और इन्हें पचाने में शरीर को अधिक श्रम नहीं करना पड़ता। कारण इनमें शर्करा उसी रुप में रहती है, जिस रुप में वह हमारे रक्त में हैं। अतः शरीर में इनका रुपान्तर हुए बिना ही इनका एकीकरण हो जाता है और इनके पचकर बाहर आने में बहुत कम समय लगता है।

सूखे मेवों के खाने से पूर्व उन्हें पानी से धो लेना चाहिये। सर्वोत्तम उपाय तो यह है कि उन्हें थोड़ी देर पानी में पड़ा रहने दिया जाये। लेकिन एक बात ध्यान रहे-भिगोने के लिए मिट्टी या चीनी का बर्तन होना चाहिए धातु का नहीं। कुछ देर भीगने पर मेवे और अधिक गुणकारी एवं उपयोगी हो जाते हैं। भीगने पर उनका वजन बढ़ जाता है और स्वादवश हम उन्हें अधिक नहीं खा सकते।

बहुत लोग मुनक्का और छुहारों को दूध में उबाल कर खाते हैं। पर यह तरीका बहुत अच्छा नहीं है आग पर उबलने से उनके पौष्टिक तत्व थोड़े बहुत अवश्य नष्ट हो जाते हैं। हाँ बिना चीनी के दूध के साथ उन्हें खाना उपयोगी होता है।


महात्मा गान्धी की अमर वाणी

(गाँधी-वाणी)

भोजन-

हमारे सामने एक गहरा प्रश्न है। खुराक की तंगी है और इसलिए परेशानी होती है ......मुझे लगता है कि अगर हम सच्ची आजादी को हजम कर लेते हैं, तो ऐसी परेशानी नहीं होनी चाहिये।...... मैं क्या पाता हूँ कि जो मैने बात कही है वह तो बड़ी सीधी है और बिल्कुल व्यवहार की बात है यानी बाहर से ख्राक नहीं मंगाना। ऐसी व्यवहार की बात सुनते ही लोग क्यों काँप उठते हैं। हमारे पास पानी पड़ा है, जमीन पड़ी है, करोड़ों की तादाद में लोग पड़े हैं, हम क्यों परेशान बनें?

मेरा तो कहना इतना ही है कि लोग इसके लिए तैयार हो जाये कि हम अपने परिश्रम से अपनी रोटी पैदा कर लेगें। इससे लोगों में एक किस्म का तेज पैदा हो जाता है और उस तेज से ही आधा काम हो जाता है।

अधिकार और कर्त्तव्य-

जिसके पास फर्ज नहीं है उसका तो हक नहीं है, अर्थात् सब हक अपने फर्ज में से निकलता -फर्ज नहीं तो हक नहीं। मैं फर्ज अदा करता हूँ, तो उसका नतीजा मिलता है, वही हक है।

सत्य-

जिसका जीवन सत्यमय है वह तो शुद्ध स्फटिक मणि की तरह हो जाता है। उसके पास असत्य जरा देर के लिए भी नहीं ठहर सकता। सत्याचरणी को कोई धोखा दे ही नहीं सकता, क्योंकि उसके सामने झूठ बोलना अशक्य हो जाना चाहिए। संसार में कठिन से कठिन व्रत सत्य का है।

सत्य में ही सब बातों का समावेश हो जाता है, अहिंसा में चाहे सत्य का समावेश न हो, पर सत्य में अहिंसा का समावेश हो जाता है।

अहिंसा-

अहिंसा मानो पूर्ण निर्दोषता ही है। पूर्ण अहिंसा का अर्थ है प्राणिमात्र के प्रति दुर्भाव का पूर्ण अभाव।

सत्य विधायक है, अहिंसा निषेधात्म है। सत्य वस्तु का साक्षी है, अहिंसा वस्तु होने पर भी उसका निषेध करती है। सत्य है, असत्य नहीं है। हिंसा है, अहिंसा नहीं है। फिर भी अहिंसा ही होना चाहिए, यही परम धर्म है।

मेरे लिए सत्य से परे कोई धर्म नहीं है और अहिंसा से बढ़कर कोई परम कर्त्तव्य नहीं है इस कर्त्तव्य को करते-करते आदमी सत्य की पूजा कर सकता है।

प्रेम-

संसार आज इसी लिए खड़ा है कि यहाँ घृणा से प्रेम की मात्रा अधिक है, असत्य से सत्य अधिक है।

अहिंसा, तितिक्षा और प्रेम की मात्रा को बढ़ा कर सत्य को सिखाती है। प्रेम सौदे की वस्तु नहीं है।

प्रेम की सच्ची परीक्षा तो यह है कि हम मर कर भी दूसरों के अप्रेम का उत्तर न दें।

विश्वास के बदले विश्वास या प्रेम के जवाब में प्रेम, विश्वास या प्रेम कहलाने लायक नहीं। सच्चा प्रेम वह हैं, जो दुश्मन के सामने भी टिके।

प्रेम की कोरी कल्पना यह है कि वह कुसुम से कोमल और वज्र से भी कठोर हो सकता है।

ईश्वर-

ईश्वर निश्चय ही एक है। वह अगम अगोचर और मानव जाति के बहुजन समाज के लिए अज्ञात है। वह सर्वव्यापी है। वह बिना आँखों के देखता है, बिना कानों के सुनता है। वह निराकर ओर अभेद है। यह अजन्मा है, उसके न माता न पिता न, संतान फिर भी वह पिता, माता, पत्नी या संतान के रुप में प्रजा को ग्रहण करता है।

यदि हमारे अन्दर सच्ची श्रद्धा है, यदि हमारा हृदय वास्तव में प्रार्थनाशील है, तो हम ईश्वर को प्रलोभन नहीं देगें, उसके साथ शर्तें नहीं करेगें। हमें उसके आगे अपने को आत्म समर्पण कर देना होगा।

राम नाम-

प्राकृत और संस्कृत दोनों प्रकार के मनुष्य राम-नाम लेकर पवित्र होते हैं। परन्तु पावन होने के लिय राम-नाम हृदय से लेना चाहिए, जीभ और हृदय को एक रस करके राम-नाम लेना चाहिए।

करोड़ों के हृदय का अनुसन्धान करने और उनमें ऐक्य भाव पैदा करने के लिए एक साथ राम-नाम की धुन जैसा कोई दूसरा सुन्दर और सबल साधन नहीं हैं।

प्रार्थना-

प्रार्थना का आमन्त्रण निश्चय ही आत्मा की व्याकुलता का द्योतक है, प्रार्थना का एक चिन्ह है। प्रार्थना हमारे अधिक अच्छे, अधिक शुद्ध होने की आतुरता को सूचित करती है।

प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं, हृदय से होता है। इसी से गूँगे, तुतले, मूढ़ भी प्रार्थना कर सकते हैं।

मद्य-निषेध-

अगर हम अहिंसात्मक प्रयत्न द्वारा अपना ध्येय प्राप्त करना चाहते हैं, तो जो लाखों स्त्री-पुरुष शराब, अफीम वगैरह नशीली चीजों के व्यसन के शिकार हो रहे हैं उनके भाग्य का निर्णय हम सरकार पर नहीं छोड़ सकते। स्थायी और स्वास्थ्यपूर्ण मुक्ति भीतर से ही आती है यानी आत्म-शुद्धि से ही उद्भूत होती है।

स्त्री का अधिकार-

अहिंसा की नींव पर रचे गये जीवन की योजना में जितना और जैसे अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है, उतना और वैसा ही अधिकर स्त्री को भी अपना भविष्य तय करने के बारे में है। लेकिन अहिंसक समाज की व्यवस्था में जो अधिकार या हक मिलते हैं वे किसी न किसी कर्त्तव्य या धर्म-पालन से प्राप्त होते हैं इसलिए यह भी मानना चाहिए कि सामाजिक आचार-व्यवहार के नियम स्त्री और पुरुष आपस में मिलकर और राजी-खुशी से तय करें।

विवाह-

विवाह एक ऐसी बाड़ है, जो धर्म की रक्षा करती है। यदि यह तोड़ दी जायगी तो धर्म का नाश हो जायगा।

पर्दा-

पवित्रता कुछ बन्द घर के भीतर नहीं पनपती। वह उपर से भी लादी नहीं जा सकती। पर्दें की चारदीवारी खड़ी करके उसकी रक्षा नहीं की जा सकती।


आध्यात्मिक साधना का शुभ मुहूर्त

प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तन, ऋतुओं का हेर फेर, चन्द्रमा की कलाओं की घटा बढ़ी, समुद्र के ज्वार भाटे, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों का पृथ्वी पर आने वाला प्रभाव, सूक्ष्म जगत में होने वाली उथल पुथल, पृथ्वी की परिक्रमा से परिवर्तित राशिस्थल, आदि अनेक कारणों से संसार के अवश्य वातावरण में बड़े महत्वपूर्ण हेर होते रहते हैं। उन परिवर्तनों का कब, किस वस्तु पर किस प्राणी पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस रहस्य को दिव्य दृष्टि से देख सकने वाले योगियों ने “मुहूर्त” विद्या की रचना की है। किस कार्य के लिऐ कौन समय उपयुक्त होगा? इस सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर ही मुहूर्त शोधे जाते है।

किसान जानता है कि किस अवसर पर कौन सी फसल बोनी चाहिए। ‘वावनी’ को ‘ओठ’ के दिनों में बीज न वोकर आगे पीछे बोया जाय तो उस भूल से फसल में भारी कमी हो जाती है।

इसी प्रकार संतानोत्पत्ति के लिए भी स्त्री के ऋतु स्नान के उपरान्त कुछ नियम समय तक हो वह मुहुर्त होता है जिसमें गर्भावान सफल हो सकता है। वह अवसर निकल जाने पर प्रयत्न निष्फल ही जाता है। इसी प्रकार अन्य कार्यों के भी भले बुरे मुहूर्त होते हैं जिनमें उनकी सफलता असफलता बहुत हद तक निर्भर रहती हैं।

दो विशेष कालो की मिलन बेला को ‘सन्ध्या’ कहते हैं। सन्ध्या काल असाधारण महत्व पूर्ण होता है। ऋषियों ने रात्रि और दिवस के मिलन की प्रायः सायं सन्ध्याओं के महत्व को देखते हुए उस समय अनेक कार्य करने और न करने का विधान किया है। संध्याकाल में भोजन, शयन, मैंथुन अध्ययन, यात्रारंभ, आदि अनेक कार्य वर्जित और स्नान भजन, ध्यान, आदि अनेक कार्य उचित ठहराये गये हैं। सर्दी और गर्मी की दो प्रधान ऋतुओं की मिलन संध्या भी ऐसी ही महत्व पूर्ण हैं। आश्विन और चैत्र की नवरात्रि ऐसी ही पुण्य ऋतु संध्या की बेला है।

वैद्य लोग जानते हैं कि आश्विन और चैत्र में ज्वर जूड़ी आदि अनेक रोग बढ़ते हैं, शरीर में सूक्ष्म कोषों में एक प्रकार का उफान आता है, उन्हीं दिनों जुलाव आदि द्वारा कोष्ट शुद्धि कराना अच्छा समझा जाता है। आत्मिक दृष्टि से भी यह समय बड़ा महत्व पूर्ण है। इन दिनों जो साधनाऐं की जाती हैं वे अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। मन्त्र सिद्धि के लिए यह अतीब शुभ अवसर है।

गायत्री साधना के लिए यह नवरात्रि का पुण्य पर्व बड़ा ही शुभ मुहूर्त हैं। उस समय के थोड़ा सा साधन भी अन्य समय के विशेष साधन से अधिक सफल होता है। अखण्ड जोति के पाठक इसे अवसर पर गायत्री का न्युनाधिक साधन करें, इस प्ररेणा के साथ इस अंक को अवश्यक आदेशों के साथ नियत समय से कुछ पूर्व ही भेजा जा रहा है।


नवरात्रि में गायत्री तपश्चर्या कीजिए

‘तपश्चर्या’ एक महत्वपूर्व आध्यात्मिक कमाई है। तप ही वह पूँजी है जिसके द्वारा संसार की अनेक सम्पदाऐं प्राप्त होती है। तप की अग्नि में जन्म जन्मान्तरों के संचित पाप, कुसंस्कार और दुर्भाग्य नष्ट होते है। प्राचीन काल के ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास पुराणों में मौजूद हैं जिन में तप के द्वारा बड़े बड़े वरदान प्राप्त होने एंव दुस्तर कार्यो का सम्पादन होने की सफलताऐं मिली हैं।

आप तप के महत्व को भली प्रकार जानते हैं। हमारी आन्तरिक इच्छा है कि तपश्चर्या की दिशा में आपकी प्रगति और भी तीव्र हो। आश्विन मास की नवरात्रि निकट आ रही है। तपश्चर्या के लिए यह सन्धि वेला अत्यन्त शुभ मुहूर्त है। बीज बोने के लिए कुछ विशेष दिन ऐसे आते हैं कि उस अनुकूल अवसर पर बोया हुआ बीज बहुत अच्छा उपजता है। आध्यात्मिक कृषि कर्म में नव-रात्रि ऐसा ही र्स्वग अवसर हैं। यदि आपकी सुविधा हो तो इस अवसर पर एक छोटी सी 24 हजार की गायत्री तपश्चर्या कर लें।

ता0 2 अक्टूबर मंगलवार को आश्विन सुदी एड़वा है। उसी दिन से नवरात्रि प्रारंभ होती है। इस बार मंगल-वार को पड़वा और दौज एक हो गई है इस प्रकार एक दिन घट गया है। परन्तु 24 हजार के लघु पुरश्चण के लिए 9 दिन होने आवश्यक हैं। इसलिए दशमी बुधवार ता. 10 अक्टूबर को विजयदशमी के दिन यह साधना समाप्त होगी।

प्रातः काल ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर शौच स्नान से निवृत्त होकर पूर्व की ओर मुँह करके आसन पर बैठना चाहिए। पास में जल पात्र तथा साक्षी के लिए अग्नि रहना आवश्यक है। अग्नि को दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, आदि के रुप में स्थापित रखना चाहिए। गायत्री एवं गुरु का चित्र सामने रखना चाहिए। आवाह्रन मन्त्र से माता का आवाह्न करके धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य जल, पुष्प आदि से उनका पूजन करना चाहिए। केवल माता की प्रतिमा हो, गुरु की न हो तो उसके स्थान पर नारियल को प्रतिनिधि स्थापित कर लेना चाहिए। यदि दोनों में से एक भी प्रतिमा न हो तो केवल मानसिक ध्यान द्वारा काम चलाया जा सकता है। जिन्हें ब्रह्म संध्या याद हो वे उसे करके तब जप आरम्भ करे। जिन्हें याद न हो वे आवाहन पूजन के उपरान्त जप आरम्भ कर दें।

नौ दिन में 24 हजार जप करना है। प्रतिदिन 2667 मंत्र जपने है। एक माला में 108 दाने होते है। प्रतिदिन 25 मालाऐं जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। प्रायः चार घंटे में इतनी मालाएँ आसानी से जपी जा सकती हैं। यदि एक साथ इतने समय लगातार जप करना कठिन हो तो अधिकाँश भाग प्रातः काल पूरा करके शेष भाग साँयकाल पूरा कर लेना चाहिए। जप समाप्त करके माता को प्रणाम करना चाहिए और विसर्जन मंत्र से विसर्जन कर देना चाहिए। जल को ‘सूर्य के संमुख अर्घ चढ़ा दें। भोजन के समय भोग लगाने तथा संध्या समय आरती करने का भी क्रम रखना चाहिए।

प्रातः काल पूर्व की ओर एवं शाम को पच्छिम की ओर मुँह करके जप किया जाता है। तर्जनी उँगली से माला का र्स्पश नहीं करना चाहिए। सुमेरु (बीच का दाना) उल्लंधन नहीं करना चाहिए। जप इस प्रकार करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होती रहे, होंठ हिलते रहें पर पास में बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रुप से मंत्र को सुन न सके। जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में गायत्री के तेज पुँज प्रकाश का ध्यान करते रहना चाहिए। नियत जप के अतिरिक्त समय में मन ही मन मानसिक जप और ध्यान, अन्य कार्य करते हुए भी करते रहना चाहिए।

इन दिनों जिससे जितनी तपश्चर्या सध सके उसे उतनी सोधनी चाहिए। तपश्चर्या में मुख्य बातें यह हैं (1) भूमि शयन (2) जूते या छाते का त्याग (3) शरीर पर कम वस्त्र (4) हजामत बनाने एंव श्रृंगार सामग्रियों का त्याग (5) अपना भोजन जल, वस्त्र धोना आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना (6) धातु के बर्तनों का प्रयोग छोड़ना (7) पशुओं की सवारी का त्याग (8) ब्रह्मचर्य (9) मौन (10) उपवास। इनमें से जो तप जितनी मात्रा में जिससे हो सके उसे उतना करने का प्रयत्न करना चाहिए। जो लोग केवल एक समय फलाहार पर नहीं रह सकते वे दो बार ले सकते हैं। जिसके लिए यह भी कठिन हो वे दोपहर को बिना नमक का एक अन्न से बना हुआ भोजन और शाम को दूध लेकर अपना उपवास चला सकते हैं।

इस प्रकार चौबीस हजार का यह लघु अनुष्ठान विजयदशमी के दिन ता. 1 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण हो जायेगा। अन्तिम दिन 108 आहुतियों का हवन करना चाहिए। उस आहुति में कम से कम 3 मासे सामग्री और 1 मासे घी होना चाहिए 108 आहुतियों में करीब छः छटाँक सामग्री और दो छटाँक घी होना आवश्यक है। 24 अंगुल लम्बी 24 अंगुल चौड़ी 4 अंगुल ऊँची मिट्टी की वेदी बना लेनी चािहए या हवन कुन्ड हो तो उससे काम चला लेना चाहिए। सुमिधाओं में कपूर से अग्नि प्रज्वलित करके गायत्री मंत्र के अन्त में स्वाहा लगा कर आहुतियाँ देनी चाहिए। हवन में यदि तीन व्यक्ति हों तो एक माला गिनता चले, दुसरा सामग्री, तीसरा घी चढ़ावे। अधिक व्यक्ति सम्मिलित हों तो और भी अच्छा है। घी की आहुति के पश्चात चमची लौटाते हुए उसमें बचे हुए घी की एक ही बूँद, वहाँ रखे हुए जल पात्र में टपका देनी चाहिए और टपकाते समय ‘ॐ गायत्री इद्म न मम’ इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। पूर्णाहुति के पश्चात यज्ञ की 4 परिक्रमा करनी चाहिए और उस जल पात्र में टपकाये हुए घी को हथेलियों पर मलकर अग्नि पर तपाना चाहिए और उसे मुँह, नेत्र, आँख, कान, मस्तक, हृदय एवं कन्ठ पर लगा लेना चाहिए।

ऊपर अत्यन्त साधारण विधि लिखी गई है जिसे प्रारंभिक साधक भी कर सकता हैं। सरल होते हुए भी यह बड़ी प्रभावशाली, लाभदायक एवं सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस तप की उष्णता से कच्चे सद्विचार पकते है। पाप एवं कुसंस्कार नष्ट होते हैं, तथा माता की कृपा से अनेक लाभदायक प्रवृत्तियाँ, योग्यताएं, परिस्थितियाँ एवं दैवी सहायताऐं प्राप्त होती हैं आत्मबल सात्विकता एवं दैवी सम्पदाओं को बढ़ाने में यह तप विशेष रुप से फलदायक है। इसलिए जिन की इस ओर श्रद्धा एवं प्रवृति हो उन्हें इस छोटे से तप का आयोजन अवश्य करना चाहिए।

जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देगें उनके साधन का संरक्षण, परिमार्जन पथ प्रदर्शन एवं परिपोषण हमारे द्वारा होता रहेगा। उन दिनों कोई सज्जन मथुरा न आवें। क्योंकि उन दिनों हमारा केवल जल के आधार पर नौ दिनों का पूर्ण निराहार व्रत होता है। उन दिनों हमारा अधिकाँश समय एकान्त में व्यतीत होगा।

इस अनुष्ठान की तपश्चर्या के यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मण भोजन, दान पुण्य, प्रसाद वितरण आदि का नियम है। इसके बिना यह यज्ञ, अधूरा अपूर्ण एवं अतृप्त रह जाता है। इसलिए यथा शक्ति इन तीनों की भी व्यवस्था करनी चाहिए। छोटी छोटी कम मूल्य की गायत्री पुस्तकें मँगा कर अपने निकटवर्ती धर्म रुचि के व्यक्तियों में वितरण करनी चाहिए। और पूरा गायत्री साहित्य मँगाकर अपना गायत्री पुस्तकालय पूरा कर लेना चािहए। यह उच्च कोटि का आध्यात्मिक प्रसाद वितरण है। दान या भोजन कराते समय सत्पात्र को ढूँढ़ना चाहिए क्योंकि कुपात्र को दिया हुआ दान निष्फल जाता है।


गायत्री ज्ञान यज्ञ के होताओं की शुभ नामावलि।

इस मास गायत्री संस्था के सदस्य बनने वाले, अपना गायत्री पुस्तकालय आरम्भ करने वाले एवं गायत्री प्रचार में सहयोग देने वाले सज्जनों के नाम नीचे प्रकाशित किये जाते हैं।

श्री रामनन्दन प्रसाद, यादवपुर बखरी

प्ं रामचन्द्र शर्मा वैद्य, मोरेना

श्री के ए खाजेन्द्र, अमरावती

श्री भगवती शरण जी सैदनगर, जालौन

श्री दीनदयाल गुप्ता, असदपुर, बदाँयू

प्ं गिर्राज सिंह तिवारी घाना, सागर

श्री चतुर्भुज राजाराम मेहता, डूँगरगढ़

श्री उधोराम सूर्यवंशी, धीरकोट

श्री भवानी शंकर वैद्य, नीमकुँज, उदयपुर

श्री महादेव गुप्ता, नसीराबाद, खानदेश

श्री नित्यानन्द प्रकाश ब्रह्मचारी, कटक

श्री केदारनाथ शर्मा फूड आफिस विलासपुर

श्री सोहनलाल लोया, बम्बई नं. 2

श्री रामनन्द ब्रह्मचारी लेसारीघाट मेरठ

प्ं नानकचन्द शर्मा, राजा का ताजपुर

श्री कृपाशंकर तिवारी, कछपुरा जबलपुर

श्री केशवप्रसाद बन्दुर खुर्द, हमीरपुर

श्री शंकरनारायण सिंह वैस, लामटा

श्री प्यारेलाल राधेलाल आढ़ती कायमगंज

श्री दौलतराम र्स्वणकार, धमना

पं विश्वम्भरदास वेदान्ती, अयोध्या

श्री चौथमल शाह, साहबगंज

प्ं नरेशचन्द्र त्रिपाठी, भीलवाड़ा

पं राधेश्याम शर्मा, महासमुन्द्र, रायपुर

श्री वेदभूषण भटनागर, टे्रसर, झाँसी

पं लक्ष्मीनारायण मिश्र, सिलारी, सागर

प्ं भूरेलाल शर्मा वैद्य, हर्रई

श्री सरयूशरण गुप्ता, नवाबगंज, गोंडा

श्री के आर नासिककर, नानपुरा, सूरत

श्री हनुमतसिंह पवार, छापीहेड़ा राजगढ़

श्री ए एस भटनागर, मिर्जापुर

पं सत्यव्रत उपाध्याय, कछवा, मिर्जापुर

पं रामकरन मिश्र, फुलवरिया, चम्पारन

पं जे पी शर्मा वी ए नरसिंहगढ़

श्री विश्वननाथ दीक्षित, बेतिया, चम्पारन

श्री उचितनरायनसिंह, भोजुआ, मुँगेर

श्री महावीर प्रसाद, अग्यारी लेन बम्बई

पं कल्यानमल शर्मा, दीगोद, कोटा

श्री रामेश्वर परसाई, सेर्गाव, खरगोन

पं पूजा मिश्र, ठोरी बाजार, चम्पार

पं सालिगराम दुबे, बीना, सागर

श्री बुद्धीलाल जी, नानपारा, बहरायच

पं राधेमोहन मिश्र वैद्य, बहरायच

श्री गिरीशदेव वर्मा, इन्स्पेक्टर, बहरायच

श्री वंशीधर शर्मा पटवारी, मनोवर, धार

श्री रामनारायन रईस, अगदपुर शाहाबाद

श्रीमती कलावती देवी लाहोटी, नगीना

पं न्यादर दत्त शर्मा कौशिक, सरघना, मरेठ

श्री रामदास वर्मा इम्पीरियल बैंक कानपुर

श्री डा इन्द्रलालजी, यंग रोड, देहारादून

श्री उदयभान जी ‘भानु’ राजा का ताजपुर

श्री कृश्णगोपाल अग्रवाल, ओरग, रायपुर

श्री रामवचन वर्मा मोरियावा, पटना

पं रामसहाय शर्मा, मुरादपुर, शाहजहाँपुर

पं रामप्रताप द्विवेदी, शोभापुर, जबलपुर

श्री विश्वनाथप्रसाद, राजाबाजार देवरिया

श्री दिलेराम पटेल वैद्य, लोहाली विलासपुर

श्री वंशीलाल दलाल, भाटापीरा रायपुर

वैद्य त्रिपुराशंकर वी ओझा, सीलदर सिरोही

पं श्यामसुन्दरलाल पानी गाँव देवास

श्री लालाराम जी जमींदार बडैरा सुपान

डा एस एल लाठुर खिलचीपुर

पं द्वारिका प्रसाद शर्मा,छुरी, विलासपुर

श्री धुन्धी सिंह शर्मा, वडेसरा, अलीगढ़

श्री कुन्जीलाल अध्यापक, सहजपुर, सागर

श्री हेमन्त प्रकाश गौतम, भुआ विछीया

श्री हेमराज जी, सपरोन शिमला हिल्स

कविराज कन्हैयालाल शर्मा, चन्द्रभागा, इन्दोर

श्री लक्ष्मण तरुड़कार नरखेड़, नागपुर

स्वामी देव दर्शनानन्द सरस्वती, अमरोहा

पं तुकाराम शर्मा, नरधा, दु्रम

श्री शाहजी राव काशीवा पटेल, हाल, वीड

श्री जी आर मिश्रा, थाना, बम्बई

श्री गंगाराम ठाकुर, देवदंव, सन्थाल परगना

श्री विश्वनाथ सिन्दे मास्टर, पेरडूर, कनाडा

श्री त्र्यम्यक दिनकर पोण्डरीक ढरई

श्री दुर्गानन्द चौधरी, सहरसा, भागलपुर

डाक्टर गुरु प्रसाद कौशिक, काँठा, मुरादाबाद

श्री सुखलाल जी काँकोली, बरेली

श्री दिनकर बोमन जी गार्ड दमोह

शा. हुकमचन्द गंगराडे, कलमखार

श्री इन्द्रवली सिंह, हिसमपुर, इलाहाबाद

श्री राजकिशोर मेहरोत्रा, चन्दोली

योगी हरि कृष्ण जी अनासक्त गनेशपुर

श्री दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव खजुहा

श्री रामचरन जी, कटनी, जबलनुर

श्री शीतल सिंह जी, नरकटिया, मुजफ्फपुर

इन्द्रदेव पाण्डेय, गंगोली हाट

चौ रघुवीर सिंह जी मन्दतौर

-अपूर्ण


गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

नवरात्रि के पुण्य पर्व पर इन्हें मँगाकर अपना गायत्री पुस्तकालय पूर्ण कीजिए और गायत्री संस्था की सदस्यता प्राप्त कीजिए। इन पुस्तकों के बिना आपका गायत्री ज्ञान अधूरा रहेगा।

1.गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)-सर्व साधारण के लिए आवश्यक जानकारी एवं उपयोगी साधनाऐं - मूल्य 3/-

2.गायत्री महाविज्ञान (द्वितिय भाग)-गायत्री गीता, स्मृति, संहिता, उपनिषद, रामायण, तंत्र, अभिचार, पुरश्चरण पंजर, कवच आदि अनेको महत्वपूर्ण संग्रह। मूल्य 3/-

3.गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग)-गायत्री द्वारा अनेकों गुप्त, रहस्यपूर्ण चमत्कारी योगिक साधनाओं की शिक्षा। मूल्य 3/-

4गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री द्वारा अनेकों अध्यात्मिक सिद्धियों और साँसारिक सफलताऐं पाने वाले साधकों के व्यक्तिगत अनुभवों का सचित्र संग्रह। मूल्य 3/-

5.गायत्री चित्रावली - विभिन्न उद्देश्यों के लिए विभिन्न प्रकार के ध्यान करने के लिए आर्ट पेपर अत्यन्त सुन्दर, तिरंगे, छपे हुए 24 चित्रों की पुस्तक, विस्तृत चित्र परिचय समेत। मूल्य 1/-

6.गायत्री का मन्त्रार्थ-गायत्री के एक 2 अक्षर की शास्त्रीय व्याख्या। अनेक ऋषियों द्वारा किये हुए अनेक अर्थों की मंजूषा। मूल्य 1/-

7.गायत्री का छोटा सैट- 1. गायत्री ही कामधेनु है। 2. गायत्री का वैज्ञानिक आधार। 3. गायत्री की सर्व सुलभ साधनाऐं। 4. वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री। 5. गायत्री के 14 रत्न प्रथम भाग। 6. गायत्री के 14 रत्न द्वितिय भाग। 7. अनादि गुरु मन्त्र गायत्री। 8.विपत्ति निवारणी गायत्री। 9. स्त्रियों को गायत्री अधिकार। 10. सर्व शक्तिमान गायत्री। 11. गायत्री चालीसा। 12. गायत्री की गुप्त शक्ति। 13. गायत्री का तिरंगा चित्र।

मूल्य में कमी के लिए न लिखिए। छै रुपये अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

पता-अखण्ड “ज्योति”प्रेस, मथुरा।


ब्रह्मचर्य-वन्दना


ब्रह्मचर्य-वन्दना

ओ तेजपुँज।  ओ दिव्य रुप। , ओ शक्ति-सुधा के अनुपम स्रोत।

ओ सौर्न्दय निराले सुखमय।  ओ जागृत जीवन की ज्योति। ॥

ओ अनन्त के परिचायक।  ओ, अमर-भावनाओं के मूल। ।

ओ अदभुत।  ओ भव्य, सुगन्धित, ओ मानुष उसवन के फ ल॥

देह-भवन के उज्जवल दीपक, फ णिकी मणि वैदूर्य ललाम। ।

जग में केवल सार रुप ओ, ब्रह्माचर्य है तुझे प्रणाम॥1

जिस तनु में आवास करे तू, होवे वह सुख से भरपुर।

रोग, शोक , चिन्ता, भय, जड ता, ये सब उससे रहते दूर॥

उद्यम, साहस, क्रिया-शक्ति औ, पटुता का उसमें भण्डार।

भरा रहे नित, कभी न होवे, उसकी जीबन रण में हार॥

प्रबल निराशा और उद्वेगों, का है यह भीषण संग्राम।

इसमें तू आचार रुप ओ, ब्रह्मचर्य है तुझे प्रणाम॥2

जिसने तुझे न जाना अथवा, किया नहीं तेरा सम्मान।

किं वा जान बूझ कर भी जो, तुझसे वंचित रहा अंजान॥

उसने जग में आकर-के भी, पाकर सब वैभव मर्याप्त।

पाया कुछ भी नहीं वृथा ही, जीवन लीला करी समाप्त॥

तेरे बिना विभव सब फ ीके, सकल साबनायें हैं बाम।

साधक मुख्य जगत में तू ओ, ब्रह्मचर्य है तुझे प्रणाम॥3

इन्द्रिय संयम द्वारा जिसने, तेरा सेवन किया यथार्थ।

पुगम रीति से साध सका वह, अपना स्वार्थ और परमार्थ॥

तुझ अमूल्य निधि को संचित कर, जिसने निज भण्डार भरा।

उसका जीवन पुष्प निरंतर, नित नूतन है हरा भरा॥

तू है अक्षय कोष सुखों का, ऋद्धि सिद्धियों का तू धाम।

तेरी समता नहीं कहीं ओ, ब्रह्मचर्य है तुझे प्रणाम॥4

*समाप्त*