गायत्री महाविद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न

1. गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, गायत्री और यज्ञोपवीत का संबंध, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन

2. गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्रनाम आदि का भाषा टीका समेत संकलन है।

3. गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) इसमें गायत्री द्वारा योग साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

4. गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री की कृपा से अनेक प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले तथा सुख सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के निजी अनुभव इस पुस्तक में हैं। इस मार्ग का अनुकरण करके आशाजनक लाभ उठाया जा सकता है।

5. गायत्री का मंत्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की शास्त्रीय विस्तृत व्याख्या है, राक्षस राज रावण, सायन, उब्वट, महीधर, व्यास, वशिष्ठ, शंख, भारद्वाज, याज्ञवल्क, आदि के द्वारा किये हुए गायत्री के अनेकों अर्थ दिये हैं। पहले यह पुस्तक ‘गायत्री रहस्य’ नाम से छपी थी।

6. गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियों तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव।

7. गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत आधार उपस्थित करके गायत्री का गुप्त विज्ञान तथा मर्म समझाया गया है।

8. गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं- सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।

9. वेद शास्त्रों का निचोड़-गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री अष्टक एवं गायत्री चालीसा का संग्रह।

10. गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)- गायत्री के ॐ, भूर्भुवः, स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो शब्दों की शिक्षात्मक व्याख्या।

12. अनादि गुरुमंत्र गायत्री - गायत्री साधक के लिये गुरु की आवश्यकता का प्रतिपादन।

13. विपत्ति निवारिणी गायत्री- सम्पूर्ण विपत्तियों और कष्टों को नष्ट करने वाला तत्वज्ञान।

14. स्त्रियों को गायत्री का अधिकार- इस पुस्तक में वेद शास्त्रों के सैकड़ों प्रमाणों से यह सिद्ध किया है कि स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही गायत्री का अधिकार है।

15. सर्वशक्तिमान गायत्री- यह अत्यन्त सस्ती पुस्तक ब्रह्मदान के रूप में अधिकाधिक संख्या में वितरण करने योग्य है।

पता - “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

भाग 2 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 8


जगत का तमाशा


जगत का तमाशा

यह जगत है एक तमाशा।

हम तमाशाई यहाँ के, है सभी को मधु पिपासा॥

ऐ मुसाफिर सो रहा क्यों,

स्वप्न में दिन खो रहा क्यों,

वेदनाएं ढ़ो रहा क्यों,

जाग, उठ, चल, है बुलाती, पूर्व दिशि से दिव्य आशा॥

यह जगत है एक तमाशा।

किस लिए आँसू बहाता,

किस लिए दामन छुड़ाता,

व्यर्थ करुणा गीत गाता,

छोड़ हठ अपनी हठीले, बोल निर्भय मुक्त भाषा॥

यह जगत है एक तमाशा।

(श्री अज्ञात)


गायत्री द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्ति

कुबुद्धि का दूसरा लक्षण “अदूरदर्शिता” है। आज का, इसी समय का, तुरन्त का, लाभ देखना और भविष्य के परिणामों पर विचार न करना इसे अदूरदर्शिता कहते हैं। इसके चँगुल में फँसकर अनेक व्यक्ति विविध विधि कष्ट भोगते हैं।

स्वास्थ्य को नष्ट करने में अदूरदर्शिता सबसे बड़ा कारण है। इन्द्रियों के भोग भोगने में लोग इतने निमग्न हो जाते हैं कि यह नहीं देखते कि आगे इसका परिणाम क्या होगा। जीभ के स्वाद में पेट की मर्यादा से अधिक भोजन किया जा सकता है। मसाले और चीनी मिलाकर अनुपयुक्त पदार्थों को पेट में ठूँसा जाता है। जब तक पहला भोजन पचने नहीं पाया कि नया बोझ पेट पर लाद दिया। इन अत्याचारों से पेट की पाचन शक्ति खराब हो जाती है, कब्ज रहने लगता है, भूख लगती नहीं, दस्त साफ नहीं होती, आँतों में मल इकट्ठा होकर सड़ने लगता है। उस सड़न से उत्पन्न हुआ विष विविध प्रकार के रोग उत्पन्न करता है।

काम सेवन की मर्यादा यह है कि जब संतानोत्पादन करने की आवश्यकता अनुभव हो तब पति-पत्नि का संयोग हो। इस प्राकृतिक मर्यादा का अदूरदर्शी लोग बेतरह उल्लंघन करते हैं। क्षणिक खुजली को शान्त करने के लिये अपने जीवन रस को निचोड़ते रहते हैं और अन्त में स्वास्थ्य को खोखला बनाकर सिर धुनते, पछताते हैं।

रात्रि को तेज रोशनी में सिनेमा नाच रंग देखने या अन्य काम करने से आँखें खराब हो जाती हैं। तात्कालिक लोभ या स्वार्थ के वशीभूत होकर लोग आँखों से अधिक काम लेते हैं और उनकी रोशनी से हाथ धो बैठते हैं। यदि नेत्रों से उनकी सामर्थ्यानुसार काम लिया जाए, तो वे वृद्धावस्था तक ठीक काम करते रह सकते हैं। इसी प्रकार शरीर के अन्य अवयव हैं, यदि उनका ठीक उपयोग हो, तात्कालिक स्वाद, लोभ या मनोरंजन के लिए उनकी शक्ति को अनुचित रूप से नष्ट न किया जाए तो बीमार पड़ने का, असमय शक्तिहीन होने का, अकाल मृत्यु का अवसर न आवे। पशु, पक्षी भी प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। स्वाद के लिए नहीं, वरन् शरीर की स्वाभाविक आवश्यकता के अनुरूप कार्य करते हैं, फलतः न वे बीमार पड़ते हैं और न उन्हें वैद्य डाक्टरों की आवश्यकता पड़ती है।

गायत्री के दूसरे चरण (तत्सवितुर्वरेण्यं) में उस तेजस्वी एवं वरण करने योग्य, श्रेष्ठ भविष्य की ओर संकेत किया गया है, जो वर्तमान काल का दूरदर्शिता पूर्ण उपयोग करने से ही प्राप्त है। जो शक्तियाँ, सहयोग, सामर्थ्य, योग्यताएं, एवं सुविधाएं उपलब्ध हैं, यदि उनका संयम एवं समझदारी से उपयोग किया जाए तो निश्चय ही आशाजनक भविष्य की आधार शिला रखी जा सकती है।

किसान धैर्यपूर्वक अपनी खेतों में श्रम करता रहता है। घर से अन्न ले जाकर उसमें बीज बो देता है। अदूरदर्शिता की दृष्टि से देखा जाए तो उसका यह सब कार्य बेवकूफी से भरा हुआ प्रतीत होगा। रोज-रोज कठिन परिश्रम करना और शाम को खाली हाथ वापिस लौट आना, साथ ही घर में रखा हुआ अन्न भी मिट्टी में बिखेर आना, यह भी कोई समझदारी की बात नहीं मालूम होती। पर दूरदर्शी किसान यह जानता है कि मेरा यह परिश्रम कभी नष्ट नहीं जा सकता। इसका समुचित परिणाम मुझे मिलकर ही रहेगा। वह मिलता भी है। समयानुसार खेती पकती है और किसान का घर धन-धान्य से पूरा कर देती है, उसका परिश्रम सफल हो जाता है।

किसान जैसी दूरदृष्टि को अपना कर हम भी अपने जीवन को सुख शान्ति की राशि से भर सकते हैं। विद्यार्थी जानता है कि मुझे आगामी जीवन में सफलता और प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है, तो आरम्भ में कठिन परिश्रम पूर्वक विद्याध्ययन करना पड़ेगा। विद्याध्ययन के समय उसका समय, श्रम और पैसा सभी लगता है, तत्काल उसे कुछ लाभ नहीं होता, वरन् हानि ही रहती है परन्तु यह निश्चित है कि इस हानि की आगे चलकर ब्याज समेत भरपाई हो जाती है। विद्यार्थी और किसान का दृष्टिकोण अपनाकर जो लोग आशाजनक भविष्य के लिए आज कठिनाई उठाने को तैयार है, उन्हें गायत्री का सदा आज्ञाकारी पुत्र कहा जा सकता है। माता अपने आज्ञाकारी बालकों को दुलारने में कमी नहीं रखती, पर अवज्ञाकारी को दुत्कारने में भी उसे संकोच नहीं होता।

ब्रह्मचारी संयम पूर्वक वीर्य रक्षा करता है। उस समय उसे अपना मन मारना पड़ता है। दूसरे उच्छृंखल युवक कामुकता की इन्द्रिय लिप्सा में अपना शरीर निचोड़ते हैं। आरम्भ में वह उच्छृंखल लड़के अपने आपको बड़ा चतुर समझते हैं और ब्रह्मचारी को मूर्ख मानते हैं। पर कुछ दिन बाद जबकि उनका शरीर खोखला होकर अनेक रोगों का घर बन जाता है और उधर वह ब्रह्मचारी दिन-दिन स्वस्थ, सुदृढ़ बलवान और सुन्दर बनता जाता है, तब उन्हें पता चलता है कि वस्तुतः कौन मूर्ख और कौन बुद्धिमान था। लोभ के चटोरेपन में वशीभूत होकर जो लोग चटपटे, मसालेदार, और मीठे जायकेदार पदार्थ दिन भर चाटते रहते हैं वे आरम्भ में उस संयमी पुरुष को मूर्ख कह सकते हैं, जो स्वाद के लिए नहीं वरन् शरीर पोषण के लिए औषधि रूप आहार लेता है। औषधि में स्वाद कौन देखता है, उसके गुण ही देखे जाते हैं। शरीर की आवश्यकता पूर्ण करने वाला आहार उतनी मात्रा में, उस समय लिया जाना चाहिए जबकि पेट को जितनी मात्रा में आवश्यकता हो। जीभ के स्वाद के मारे असमय, अनावश्यक, अनुचित मात्रा में जो लोग भोजन करते हैं, वे अपनी पाचन शक्ति से हाथ धो बैठते हैं। पेट खराब होने से, आवश्यक मात्रा में शुद्ध रक्त नहीं बन पाता फलतः अनेक आकार प्रकार के रोग सामने आ खड़े होते हैं। परन्तु जिसने जीभ पर काबू रखा है, तात्कालिक स्वाद लोलुपता को ठुकराकर भविष्य के स्थिर स्वास्थ्य का ध्यान रखा है, वह निरोग दीर्घ जीवन का आनन्द लेता है।

आज ‘निकट दृष्टि’ की बीमारी बुरी तरह फैली हुई है। लोग आज का, अभी का, इसी समय का लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि जल्दी की हविश में जो अनुचित कार्य प्रणाली अपनाई जा रही है उसका परिणाम कल क्या होगा। जैसे बन सके, वैसे, जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी, जितना अधिक हो सके, उतना अधिक धन, प्राप्त करने के लालच में अन्धा होकर मनुष्य बुरे-बुरे काम करता है। चोरी, डकैती, लूट, ठगी, धोखाधड़ी की सारी योजनाएं इसी मनोभावना से बनती हैं। जिसके नेत्रों में ‘निकट दृष्टि’ का रोग होता है, उसे पास की चीजें तो साफ दिखाई पड़ती हैं, पर दूर की वस्तुएं दिखाई नहीं पड़तीं। इसी प्रकार का बौद्धिक रोग ‘अदूर दर्शिता’ है उसे यह नहीं सूझ पड़ता कि इसका परिणाम आगे चलकर क्या होगा। इसके कारण मनुष्य चिरस्थायी, सुस्थिर, प्रतिष्ठा युक्त, बड़े लाभ से वंचित हो जाता है।

चोर मनोवृत्ति के धोखेबाज व्यापारी सस्ती, खराब, नकली वस्तुएं लोगों को उलटा सीधा समझा कर मड़ देते हैं और तात्कालिक लाभ उठा लेने पर बड़े प्रसन्न होते हैं। परन्तु उनसे एक बार जो व्यवहार कर लेता है, वह सदा के लिए उनका विरोधी हो जाता है। ऐसी दशा में उसका व्यापार चमक नहीं पाता। इसके विपरीत जो लोग अच्छी, असली वस्तुओं का व्यापार प्रामाणिकता के आधार पर करते हैं, आरम्भ में उनकी दुकान कम चलती है, पर अन्त में अपनी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता के आधार पर वे मालामाल हो जाते हैं। वेस्टएण्ड वाँच कम्पनी की घड़ियाँ और फोर्ड मोटरें यद्यपि महंगी होती हैं, तो भी अपनी प्रामाणिकता के कारण वे खूब बिकती हैं और उनके मालिक मालोमाल हो गये हैं। इसके विपरीत ऐसे अनेक चोर व्यापारी हैं, जो सस्ती और खराब चीजें अनुचित रीति से ग्राहक को मेड़ने में बड़े चतुर हैं, परन्तु वे सदा कंगाल ही रहते हैं। इनको कभी स्थिर प्रतिष्ठा या सम्पत्ति प्राप्त नहीं हो सकती। अदूरदर्शी लोग अपने को चतुर समझते हैं, पर समय बतला देता है कि उनकी वह चतुरता और सफलता कितनी पोली, कितनी अवास्तविक और कितनी अस्थिर है।

‘लोभ’ की शास्त्रों में निन्दा की गई है। वह निन्दा न्यायोचित रीति से परिश्रम पूर्वक कमाने और मितव्ययता पूर्वक सत्कार्यों के लिए बचाने की नहीं है। उसके लिए तो कहा गया है कि “सौ हाथों से कमा और हजार हाथों से दान कर”। लोभ वह है जिसमें ललचाकर अनुचित रीति से धन, भोग या यश का अपहरण किया जाता है। लोभ को पाप का मूल बताया गया है।

तात्कालिक प्रलोभन के आकर्षण में अन्धे होकर घुस पड़ना और भविष्य के दुष्परिणाम को भूल जाना इसी का नाम लोभ है। इस लोभ की मनोवृत्ति से प्रेरित होकर ही लोग नाना प्रकार के दुष्कर्म करते हैं और अन्त में जब उन दुष्कर्मों का दुखदायी परिणाम सामने उपस्थित हो जाता है तो उसका दारुण वेदनाओं से चीत्कार करते हैं।

जैसे माता उंगली के इशारे से बालक को चन्द्रमा दिखाती है, वैसे ही गायत्री अपने द्वितीय चरण की शिक्षा द्वारा हमें बताती है कि-”पुत्र! दूर तक देखो, अपनी दृष्टि लम्बी फेंको, मृत्यु की घड़ी को निकट समझ कर उसके लिए समुचित तैयारी करो, इसी क्षण की लिप्साओं में इतने बे खबर न हो जाओ कि आगे का कुछ ध्यान न रहे। किसान और विद्यार्थी से शिक्षा लो कि वे भविष्य के निर्माण के लिए आज तप करते हैं। तुम भी अपने दूरवर्ती भविष्य को आनन्दमय बनाने के लिए आज के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करो।”

माता की इस शिक्षा को मानकर यदि हम दूरदर्शी बनने का प्रयत्न करें, तो निश्चय ही हम उन बालक्रीड़ाओं को छोड़ देंगे जो आरम्भ में बड़ी लुभावनी मालूम पड़ती हैं, पर अन्त में दुखों के पर्वत पटक देती है। अदूरदर्शिता की मूर्खता से बचाकर गायत्री का दूसरा चरण हमें उस स्थिति तक ले पहुँचता है, जिससे जीव अपने जन्मजात अधिकार आनन्द का शान्त चित्त से आस्वादन करता रहता है।


Quotation

-जिस समय मनुष्य को उसके उज्ज्वल स्वरूप का भव्य ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह आनन्द विभोर हो जाता है। ज्ञान और इच्छा के क्षेत्रों में जो कुछ दिव्य, भव्य और प्रशंसनीय है, वह अनायास ही उसके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है।

-डा. पाल ब्रन्टन


उपासना की व्यवहारिक रूप रेखा

(श्री स्वामी रामतीर्थ)

ऐ मेरे प्यारे कृष्ण! मुझे तो अब उस देवता की उपासना करने दे, जिसकी समस्त पूँजी एक बूढ़ा बैल, एक टूटी हुई पलँगड़ी, एक पुराना चिमटा, थोड़ी-सी राख, नाग और एक खाली खोपड़ी है। क्या यह महिम्न-स्तोत्र के महादेव हैं? नहीं, नहीं। ये तो साक्षात् नारायण-स्वरूप भूखे भारतवासी है। यही मेरा धर्म है, और भारत के प्रत्येक मनुष्य का यही धर्म, साधारण मार्ग, यही व्यवहारिक वेदान्त और यही भगवान की भक्ति होना चाहिए।

संसार में कोई भी बच्चा शिशुपन के बिना युवावस्था को प्राप्त नहीं हो सकता। इसी तरह कोई भी मनुष्य उस समय तक विराट भगवान् से अभेद होने के आनन्द का अनुभव नहीं कर सकता, जब तक कि समस्त राष्ट्र के साथ अभेद भाव उसकी नस नस में पूरा जोश न मार ले।

भारत-माता के प्रत्येक पुत्र को समस्त देश की सेवा के लिए इस दृष्टि से तैयार रहना चाहिए कि “समस्त भारत मेरा ही शरीर है।” भारत का प्रत्येक नगर, नदी, वृक्ष, पहाड़ और प्राणी देवता माना और पूजा जाता है। क्या अभी वह समय नहीं आया, जब हम अपनी मातृभूमि को देवी मानें और इसका प्रत्येक परमाणु हमारे मन में सम्पूर्ण देश के प्रति देश भक्ति उत्पन्न कर दे।

जब प्राण-प्रतिष्ठा करके हिन्दू लोग दुर्गा की प्रतिमा को साक्षात् शक्ति मान लेते हैं, तो क्या यह ठीक नहीं कि हम अपनी मातृभूमि की महिमा को प्रकाशित करें और भारत-रूपी सच्ची दुर्गा में जीवन और प्राण की प्रतिष्ठा करें?

अपने चित्त को शान्त रक्खो, अपने मन को शुद्ध विचारों से भर दो, तो कोई भी मनुष्य आप के विरुद्ध नहीं हो सकता। यही दैवी विधान है।

दैवी विधान यह है कि मनुष्य आराम-चैन से तथा विद्वेष-रहित रहे और उसका जीवन सदैव हरकत करता रहे। उसका मन स्थित-विद्या के आधीन रहे और तन गति-विद्या के। शरीर तो काम में लगा रहे और अन्तरात्मा सदैव आराम में रहे।

वेदान्त आप से यह मनवाना चाहता है कि दान देने में आनन्द है, लेने में नहीं।

अलमारियों में बंद वेदान्त की पुस्तकों से काम न चलेगा, तुम्हें उसको आचरण में लाना होगा।

यदि वेदान्त आप की निर्बलता को दूर नहीं करता, यदि वह आप को प्रसन्न नहीं रखता, यदि वह आप के बोझों को परे नहीं हटाता, तो उसे ठुकराकर अलग फेंक दो।

वेदान्त-दर्शन के प्रचार का सर्वोत्तम मार्ग उसे अपने आचरण में लाना है, अन्य कोई भी सुगम मार्ग नहीं है।

वेदान्त चाहता है कि आप काम को काम की खातिर करें, फल के लिए नहीं।

तन को काम में और मन को प्रेम और राम में रखने का अर्थ इसी जन्म में दुःख, पाप से मुक्ति पाना है।

शरीर और मन निरन्तर काम में इस हद तक प्रवृत्त रहें कि परिश्रम बिलकुल ही जान न पड़े।

जहाँ कहीं भी तुम से हो, दानी की हैसियत से काम करो, भिक्षुक की हैसियत कदापि न करो, ताकि आप का काम विश्वव्यापी हो और किंचित मात्र भी व्यक्तिगत न हो।

संसारी मनुष्य के लिए निरन्तर कर्म और निरन्तर परिश्रम ही सबसे महान् योग है। संसार के लिए तभी आप सब से महान् कार्यकर्ता हैं, जब आप अपने लिए काम नहीं करते।

वह हमारी स्वार्थ-पूर्ण चंचलता है, जो सारा काम बिगाड़ देती है।

शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक पुकार-पुकार कर उपदेश देते हैं।

परिणाम और नतीजा मेरे लिए कुछ नहीं है, सफलता अथवा असफलता मेरे लिए कुछ नहीं है। मुझे काम जरूर करना चाहिए, क्योंकि मुझे काम प्यारा लगता है। मुझे काम काम के लिए ही करना चाहिए। काम करना मेरा उद्देश्य व लक्ष्य है, कर्म में प्रवृत्त रहना ही मेरा जीवन है। मेरा स्वरूप, मेरी असली आत्मा स्वयं शक्ति है। मैं अवश्य काम करूंगा।

सदा स्वतंत्र कार्यकर्ता और दाता बनो। अपने चित्त को कभी भी याचक तथा आकाँक्षी की दशा में न डालो। सर्वेसर्वा बनने के स्वभाव से पीछा छुड़ाओ।


यज्ञ का महत्व

(पं0 लक्ष्मीधर जी वाजपेयी)

संसार के हित के लिए जो आत्मत्याग किया जाता है, उसी को यज्ञ कहते हैं। हिन्दू जाति का जीवन यज्ञमय है। यज्ञ से ही इसकी उत्पत्ति होती है और यज्ञ ही में इसकी अन्त्येष्टि होती है। यज्ञ का अर्थ जितनी पूर्णता के साथ आर्य या हिन्दू जाति ने जाना है, उतना अन्य जाति ने नहीं। हिन्दू धर्म के सभी ग्रन्थों में यज्ञ का विस्तृत वर्णन है। आदि धर्म ग्रन्थ वेद तो बिल्कुल यज्ञमय हैं। एक हिन्दू जो कुछ कर्म जीवन भर करता है, सब यज्ञ के लिए। श्रीमद्भगवतद्गीता के तीसरे और चौथे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी ने यज्ञ का रहस्य अत्यन्त सुन्दरता के साथ बतलाया है। आप कहते हैं-

यज्ञार्थार्त्कमणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

अर्थात् यदि यज्ञ के लिए कर्म नहीं किया जायगा, तो वही कर्म बन्धन कारक होगा। इसलिए हे अर्जुन, तुम जो कुछ कर्म करो, सब यज्ञ के लिए अर्थात् संसार के हित के लिए-करो और संसार से आसक्ति छोड़कर, आनन्द पूर्वक आचरण करो। यज्ञ की उत्पत्ति बतलाते हुए भगवान् कहते हैं -

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्पध्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥

अर्थात् प्रजापति परमात्मा ने जब आदि काल में यज्ञ के साथ ही साथ अपनी इस प्रजा को उत्पन्न किया, तब वेद द्वारा यह कहा कि, देखो, ‘यज्ञ’ से तुम चाहे जो उत्पन्न कर लो, यह तुम्हारी कामधेनु है, यह तुम्हारी सब मनोकामनाओं को पूर्ण करेगा। क्योंकि-

देवान् भावयताऽनेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

इस यज्ञ ही से तुम देवताओं-सृष्टि की सम्पूर्ण कल्याणकारी शक्तियों को प्रसन्न करो। तब वे देवता स्वाभाविक ही तुमको भी प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर को प्रसन्न करने से तुम सबका परम कल्याण होगा ।क्योंकि-

इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।

तैर्दत्तानऽप्रदायैभ्यो यो भुँक्ते स्तेन एव सः॥

वे यज्ञ से प्रसन्न किये हुए देवता लोग तुमको सब प्रकार के सुख देंगे। परन्तु उनके दिये हुए उन सुखों को यदि तुम फिर उनको अर्पित किये बिना भोगेंगे, तो चोर बनोगे। क्योंकि यज्ञ के द्वारा देवता लोग तुमको जो सुखद पदार्थ देंगे, उनको फिर यज्ञ के द्वारा उनको अर्पित करके, तब तुम सुख भोग करो। इस प्रकार सिलसिला सुख भोग का लगा रहेगा। यह करके जो सुख भोग किया जाता है, वही कल्याणकारी है।-

यज्ञशिष्टाशिनः संतो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।

भुँजन्ते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

अर्थात् यज्ञ करने के बाद जो शेष रहा जाता है, उसी का भोग करने से सारे पाप दूर होते है, किन्तु जो पापी, यज्ञ का ध्यान न रखकर केवल अपने ही लिए पाक सिद्धि करते हैं, वे पाप खाते है। बिना यज्ञ किये भोजन करना मानो पाप ही का भोजन है।

जो अन्न हम खाते हैं, वह किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस विषय में भगवान् कृष्ण कहते हैं-

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः॥

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।

तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥

अर्थात् अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वृष्टि से उत्पन्न होता है, और वृष्टि यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म वेद से उत्पन्न हुआ जाने और वेद ईश्वर से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार सर्वव्यापी ईश्वर सदैव यज्ञ में स्थित है। इसलिए-

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।

अधायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

हे अर्जुन, परमात्मा के जारी किये हुए उपर्युक्त सिलसिले के अनुसार जो मनुष्य आचरण नहीं करता अर्थात् यज्ञ के महत्व को समझ कर जो नहीं चलता वह पापी जीवन अपनी इन्द्रियों के सुख में भूला हुआ इस संसार में व्यर्थ ही जीता है।

इससे अधिक जोरदार शब्दों में यज्ञ का महत्व और क्या बतलाया जा सकता है। परन्तु अत्यन्त दुःख की बात है कि हम लोगों ने यज्ञ करना छोड़ दिया है। यही नहीं, बल्कि हममें से अनेक सुशिक्षित कहलाने वाले लोग तो यज्ञ की हंसी उड़ाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की यह बात कि यज्ञ से वृष्टि होती है, उनकी समझ में नहीं आती। वे लोग कहते हैं कि सूर्य की गर्मी से जो भाप समुद्रादि जलाशयों से उठती है, उसी से बादल बनकर वृष्टि होती है। यह तो ठीक है, परन्तु फिर क्या कारण है कि किसी साल बहुत अधिक वृष्टि होती है और किसी साल बिल्कुल नहीं होती। आप कहेंगे कि भाप तो बराबर उठती है, परंतु हवा बादल को कहीं उड़ा ले जाती है और इसी कारण कहीं वृष्टि अधिक हो जाती है और कहीं बिलकुल नहीं होती। ठीक। परन्तु हवा ऐसा क्यों करती है? इसका कोई बुद्धियुक्त उत्तर नहीं दिया जा सकता। यही तो भेद है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस भेद का खुलासा किया है। उनका कथन है कि यथाविधि यज्ञ-हवन करने से मुख्य तो वायु की ही शुद्धि होती है, फिर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इत्यादि सभी भूतों पर यज्ञ का असर पड़ता है। अग्नि में घृत इत्यादि जो सुगन्धित और पुष्ट पदार्थ डाले जाते हैं, वे वायु में मिलकर उसकी भी शुद्धि करते हैं। महर्षि मनु ने कहा है-

अग्नौ प्रास्ताहूतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।

आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥

अर्थात् अग्नि में जो आहुति डाली जाती है, वह सूर्य तक पहुँचती है, सूर्य से वृष्टि से अन्न होता है, और अन्न से प्रजा।

ग्रामे ग्रामे स्थितो देवः देशे देशे स्थितो यज्ञः।

गेहे गेहे स्थित द्रव्यम् धर्मश्चैव जने जने॥

-भविष्य पुराण

अर्थात् गाँव-गाँव में देवता स्थित हैं, देश देश में, भारत के प्रत्येक प्रान्त में यज्ञ होते हैं, घर-घर में द्रव्य मौजूद है, अर्थात् कोई दरिद्री नहीं है, और प्रत्येक मनुष्य में धर्म मौजूद है।

इसी प्रकार यज्ञ की प्रथा यदि फिर हमारे देश में चल जायगी, तो अतिवृष्टि, अनावृष्टि और बहुत से रोग-दोष दूर हो जायेंगे।


हमारी प्रवृत्ति अन्तर्मुखी होनी चाहिए।

(श्री लालन राम जी शुक्ल एम. ए.)

चेतना का प्रकाश जिस ओर जाता है, उसी ओर आलोक हो जाता है और जिस ओर उसका प्रकाश नहीं जाता, उस ओर अंधकार हो जाता है। चेतना के प्रकाश में दो विशेषताएं हैं-एक, वह पदार्थ का ज्ञान कराता है और दूसरे, वह उसे प्रिय बनाता है। उससे जिस ओर हमारी चेतना जाती है, अर्थात् जिन वस्तुओं की ओर हम ध्यान देते हैं, वे न केवल हमें ज्ञात हो जाती हैं वरन् वे हमें प्रिय हो जाती हैं। जिन बातों के बारे में हम कुछ जानते नहीं वे हमें प्रिय भी नहीं होतीं। मनुष्य को जो वस्तु प्यारी लगती है, वह उसकी वृद्धि करने की भी चेष्टा करता है। इस प्रकार चेतना से प्रकाशित वस्तुओं की वृद्धि होने लगती है। मनुष्य के साँसारिक धन वैभव की वृद्धि इसी प्रकार होती है। शरीर की उन्नति भी शरीर के विषय में सोचने से होती है।

जब मनुष्य बहिर्मुखी रहता है, तो वह साँसारिक उन्नति करता है। उसके धन, यश और मान-प्रतिष्ठा बढ़ते हैं। पर उसका स्वत्व अंधकार में रह जाता है। अन्धकार में रहने के कारण न तो मनुष्य को अपने-आपका कुछ ज्ञान होता है और न उसे अपने आप प्रिय ही लगता है। इतना ही नहीं, बहिर्मुखी व्यक्ति को यदि अकेला छोड़ दिया जाय तो वह अपने आपसे इतना विफल हो जायगा कि आत्म-हत्या करने की इच्छा होने लगेगी। यदि किसी कारण से बहिर्मुखी व्यक्ति को कभी अकेले रह जाना पड़ता है तो वे जीवन से निराश हो जाते हैं, उनके विचार उनके नियंत्रण में नहीं रहते, उनकी मानसिक ग्रन्थियाँ उन्हें भारी त्रास देने लगती हैं। यहाँ तक उनका जीवन भार रूप हो जाता है।

चेतना का प्रकाश बाहर जाने से मनुष्य के मन में अनेकों प्रकार के संस्कार पड़ते हैं। ये सभी संस्कार मानसिक क्लेश के कारण बन जाते हैं। इनसे आत्मा की प्रियता कम हो जाती है और बाहरी पदार्थों की ओर आकर्षण बढ़ता जाता है। इस प्रकार मनुष्य की चेतना के पीछे साँसारिक पदार्थों की इच्छाओं के रूप में एक अचेतन मन की सृष्टि होती है। जो व्यक्ति जितना ही बहिर्मुखी है, उसकी साँसारिक पदार्थों की इच्छाएँ उतनी ही प्रबल होती हैं। इन ग्रन्थियों के कारण मनुष्य का आन्तरिक स्वत्व दुखी हो जाता है। वह फिर चेतना के प्रकाश को अपने आपके पास बुलाने का उपाय रचता है। रोग की उत्पत्ति अपने आपकी ओर चेतना के प्रकाश के बुलाने का उपाय है।

मनुष्य का वैयक्तिक अचेतन मन उसकी मानसिक ग्रन्थियों और दलित इच्छाओं का बना हुआ है। दबी हुई इच्छाओं का चेतना पर प्रकाशित होने से रेचन हो जाता है और बहुत सी मानसिक ग्रन्थियाँ इस प्रकार खुल जाती हैं, पर इससे मानसिक ग्रन्थियों का बनना रुकता तक नहीं। नयी मानसिक ग्रन्थियाँ बनती ही जाती हैं। इस प्रकार अचेतन मन का नया भार तैयार होता जाता है। मनोविश्लेषण चिकित्सा से मनुष्य की व्याधि विशेष का उपचार हो जाता है, पर उससे मूल रोग नष्ट नहीं होता। वह नये-नये रूपों में प्रकाशित होता रहता है। जब तक अचेतन मन पर चेतना का प्रकाश नहीं जाता, तब तक मानसिक प्रकाश को बाहर की ओर जाने से रोककर, उसे भीतर की ओर ले जाता है।

जब मनुष्य अन्तर्मुखी हो जाता है तो बाह्य-पदार्थों की प्रियता चली जाती है। उसके कारण वे मनुष्य के मन पर अपने दृढ़ संस्कार नहीं छोड़ते। इस प्रकार नया कर्म विपाक बनना बन्द हो जाता है। सदा आध्यात्मिक चिन्तन करने से मनुष्य की पुरानी मानसिक ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं। अब उसे अपने सुख के लिए इधर उधर दौड़ना नहीं पड़ता। उसे अपने विचारों में असीम आनन्द मिलने लगता है। अब अनेक प्रकार की साँसारिक चिन्ताएं किसी प्रकार की मानसिक अशान्ति उत्पन्न नहीं करतीं। मनुष्य निजानन्द में निमग्न रहता है। ऐसा व्यक्ति सदा साम्यावस्था में रहता है।

चेतना का प्रकाश धीरे-धीरे भीतर की ओर मोड़ा जाता है। इसके लिए नित्य अभ्यास और विचार की आवश्यकता है। जब मनुष्य को बाह्य विषयों से विरक्ति हो जाती है, अर्थात् जब वे उसे दुख रूप प्रतीत होने लगते हैं, तभी वह सुख को अपने भीतर खोजने की चेष्टा करता है। मन के हताश होने की अवस्था में मनुष्य के विचार स्थिर नहीं रहते, वह सभी प्रकार के प्रयत्नों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगता है, अतएव एकाएक मन को अन्तर्मुखी नहीं बनाया जा सकता पर धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा उसे अन्तर्मुखी बनाया जा सकता है।

जब मनुष्य अन्तर्मुखी होता है, तो उसे ज्ञात होता है कि मनुष्य का मानसिक संसार उसके बाह्य संसार फैलाव से कम नहीं है। जितना बाह्य संसार का विस्तार है, बल्कि उससे कहीं अधिक आन्तरिक संसार का है। अर्थात् मनुष्य को आत्म स्थिति प्राप्त करने के लिये उतना ही अधिक अध्ययन, विचार और अन्वेषण करना पड़ता है, जितना कोई भौतिक विज्ञान में रुचि रखने वाला अन्वेषक करता है, जैसे पदार्थ विज्ञान का भारी विस्तार है, उसी प्रकार आध्यात्मिक विद्या का भारी विस्तार है।

संसार की सभी वस्तुएं आत्म सन्तोष के लिये हैं। यदि मनुष्य को आत्म संतोष का सरल मार्ग ज्ञात हो जाय तो वह सांसारिक पदार्थों के पीछे क्यों दौड़े? पर यह आत्मसन्तोष प्राप्त करना सरल काम नहीं। जितनी कठिनाई किसी इच्छित बाह्य पदार्थ के प्राप्त करने में होती है, उससे कहीं अधिक कठिनाई आत्मज्ञान प्राप्त करने में होती है। आत्मज्ञान मन की साधना से उत्पन्न होता है। जब तक मन निरवलम्ब नहीं हो जाता, पुरुषार्थी को स्वरूप का ज्ञान नहीं होता पर मन का सहज स्वभाव आत्मा से इतर वस्तु पर अवलम्बित होकर रहता है। उसे अपनी इस आदत से मुक्त करने में जितना प्रयास करना पड़ता है, वह कल्पनातीत है।

जब मनुष्य चेतना के प्रयास को अपनी ओर मोड़ने में समर्थ हो जाता है, तो उससे सबसे अधिक प्रिय वस्तु “अपना-आप” ही हो जाता है। फिर वह किसी भी साँसारिक वस्तु में अपना मन नहीं फँसाता। उसका मन स्वभावतः आत्मा की ओर ही जाने लगता हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी सभी मानसिक ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं और नई मानसिक ग्रन्थियाँ बनती नहीं। फिर मनुष्य का जीवन प्रकाशमय हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के विचार आत्म नियंत्रण में रहते हैं उसके मन में किसी प्रकार की आत्म ग्लानि की भावना नहीं आती। वह सदा स्वस्थ चित्त रहता है। इस प्रकार के स्वास्थ्य को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को जब कभी अवसर मिले, आध्यात्मिक चिन्तन में समय लगाना चाहिए और उसको अपनी आदत बना लेनी चाहिये।


समय रहते सँभल जाने में ही भलाई है।

(श्री सत्यानारायण जी मूँदड़ा, शोलापुर)

जिसके पास पैसा है, वे साम्यवाद से बहुत डरते हैं। संसार में ऐसी विचार धारा बड़ी तेजी से बढ़ती चली आ रही है कि पूँजी पर व्यक्ति का अधिकार न रह कर सरकार का स्वामित्व रहे, अमीर लोग ऐसा सोचते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो हमारी सभी सम्पत्ति जब्त हो जायगी। जायदाद, बँगले, कारखाने, मोटर, जेवर, नकदी आदि सभी हाथ से चली जायगी और हमें भी साधारण मजदूर की तरह काम करना पड़ेगा। रूस, चीन जैसे विशाल देशों में तथा उनके प्रभाव क्षेत्र के अनेक छोटे-मोटे देशों में साम्यवादी व्यवस्था का मय हो गई है तथा अन्य देशों में उसका जोर बढ़ता जाता है। आश्चर्य नहीं कि वह हमारे देश में भी शक्तिशाली हो जाय और आज के अमीरों को कल गरीब बनने के लिए मजबूर होना पड़े।

साम्यवाद के आविष्कारक कार्लमार्क्स बताये जाते हैं और कहा जाता है कि रूस के ऐजेन्ट तथा बिगड़े दिमाग के नौजवान उसे फैलाते हैं, पर सच बात दूसरी है। अमीर लोग स्वयं ही साम्यवाद के आविष्कारक हैं और वे स्वयं ही उसको बढ़ाते हैं। कोई कम्युनिस्ट नेता जितने लोगों को साम्यवादी जीवन भर के प्रचार में नहीं बना सकता, उतने एक अमीर एक दिन में उत्पन्न कर देता है।

कारण यह है कि धन एक महान् शक्ति है। इसका सदुपयोग वही कर सकते हैं, जिनमें इतनी बड़ी शक्ति को धारण करने की योग्यता है। तुच्छ विचारों और क्षुद्र आदर्शों के मनुष्य के पास जब धन हो जाता है, तो उसका मद और अभिमान उस पर चढ़ जाता है। जैसे शराब के नशे में चूर होकर शराबी अनुचित वाणी बोलता है, अनुचित कार्य करता है, वैसा ही धन के नशे में चूर हुआ मनुष्य भी करता है। साधारण शिष्टाचार, मधुर व्यवहार, विनम्र भाषण, मनुष्यता का सम्मान आदि सामान्य व्यवहार को भी वह भूल जाता है और अपने से निर्धन व्यक्तियों को तुच्छ समझ कर उनके साथ ऐसा अपमान जनक व्यवहार करता है जिससे उनके हृदय को मार्मिक चोट लगती है। निर्धन होने से किसी का स्वाभिमान नष्ट नहीं हो जाता। वह तिरस्कार का कडुआ घूँट पीकर उस अमीर पर रोष करता है। इस रोष को एक दार्शनिक विचारधारा की सहायता मिलती है। साम्यवाद बताता है कि यह अमीर ही संसार भर की बुराइयों की जड़ है। उस क्रुद्ध आदमी की समझ में यह बात तत्काल आ जाती है और वह अमीरों का घोर दुश्मन साम्यवादी बन जाता है। जहाँ कोई नेता नहीं होता, वहाँ भी अनेक कच्चे-पक्के साम्यवादी बन जाते हैं और वे तरह तरह से अमीरों के लाभ में बाधक होते है।

विलासिता की अति, सर्व साधारण की अपेक्षा असंख्य गुने ठाठ-बाट, दूसरे दुखी और अभाव ग्रस्तों की ओर उपेक्षा, निष्ठुर नीति, अशिष्ट व्यवहार, यह सब बातें ऐसी हैं जो गरीबों की ईर्ष्या को कोंच कोंच कर भड़काती है। साधारणतया मनुष्य सन्तोषी होते हैं, अपने प्रयत्न, पुरुषार्थ और भाग्य पर सन्तोष कर लेते हैं। अमीर-गरीब सदा से रहते चले आये हैं कभी गरीब सदा से रहते चले आये हैं, कभी गरीबी अमीरी के कारण कोई विद्वेष पैदा नहीं हुआ। परन्तु आज ईर्ष्या की आग सर्वत्र जल रही है और उसकी लपटें इतनी ऊँची उठ रही हैं कि अमीरों के लिए उससे एक भारी खतरा उत्पन्न हो गया है। उनका आज का यह भाव कि-”कहीं साम्यवाद के द्वारा हमें भी गरीब न बनना पड़े” कल सार्थक हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

प्राचीन काल में हमारा देश अब की अपेक्षा कहीं अधिक धनी था। उस समय असंख्य धन कुबेर भरे पड़े थे, परन्तु उनकी नीति शोषण की, अशिष्टता की, अहंकार की, फिजूलखर्ची की, स्वार्थपरता की न थी। अपने को धन का ट्रस्टी समझ कर उसे देश जाति और धर्म की उन्नति में खर्च करते रहते थे। अधिक धन होने से अपनी जिम्मेदारी भी अधिक समझते थे और जनसेवा के कार्यों में सबसे आगे रहते थे। मधुमक्खी परिश्रम से शहद संचय करती है और उसे दूसरों के लाभ के लिए देती है, यही नीति उस समय के धनी वर्ग की थी, फलस्वरूप अमीरों के प्रति कहीं कोई असन्तोष न था। उपयोगिता, बुद्धिमत्ता एवं कार्यकुशलता के लिए उनकी सराहना होती थी और सबका प्रेम तथा सहयोग उन्हें प्राप्त होता था।

आज अमीरों ने अपनी नीति बदल दी है। वे गरीबों की हड्डियों पर अपने महल खड़े करना चाहते हैं, अपने स्वार्थों के लिए दूसरों का बुरे से बुरा अहित कर सकते हैं, ऐसी दशा में यदि उनके विरुद्ध घृणा, द्वेष, शत्रुता और ईर्ष्या बढ़ती जाय, तो यह कुछ अस्वाभाविक नहीं है। पूँजीपति समाज के लिए उपयोगी बनकर रहें, तो भूतकाल की भाँति उनका स्वागत होगा। बुद्धिमता, कुशलता के साथ-साथ त्याग और सद्व्यवहार को संमिश्रण करके वे अपने वैभव को सुरक्षित रख सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में सहायक बनकर जनता का प्रेम, यश और सहयोग भी प्राप्त कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि आज की स्वार्थपूर्ण और मदोन्मत्त गतिविधि को ही अपनाये रहे तो निश्चय ही वे अपने नाश का कारण स्वयं ही बनेंगे। भारत जैसे धार्मिक देश में साम्यवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। उसे तो स्वार्थी पूँजीपति ही अपनी दुर्नीति से उत्पन्न करने और बढ़ाने में लगे हुए हैं। काल का चक्र बड़ा प्रबल है। जो समय रहते स्वयं नहीं सँभलता, उसे काल दण्ड के थपेड़े अपने निर्दय प्रहारों से रास्ते पर ले आते हैं। अमीरों की भलाई समय रहते सँभल जाने में ही है।


मधु संचय

(संकलन कर्त्ता-श्री दाऊ गंगा प्रसाद जी अग्रवाल, आरंग)

1-जिस धर्म से मनुष्यों को हानि पहुँचती हो वह धर्म मनुष्य का बनाया हुआ है ईश्वरकृत नहीं है।

2-ईश्वरीय धर्म वही है, जिससे सारे प्राणियों पर दया हो।

3-बने जितना कम बोलो, पूछे बिना सलाह देने को न दौड़ो। जो बिना पूछे बोलता है, उसे लज्जित होना पड़ता है। किसी का जी दुखे ऐसी बातें मत कहो। सत्य ही प्रधान गुण है इस अपनाओ।

4-बने जितना कम देखो, किसी के दोष देखने में दक्षता प्रकट मत करो, यदि हो सके तो एकान्त में दोष निवारण का उपदेश दो।

5-बने जितना कम सुनो-विषय चर्चा, बैर बढ़ाने वाली पर निन्दा की बातों से तो जरूर ही अलग रहो, जहाँ शान्ति भंग हो वहाँ जाने से पहले भली-भाँति विचार कर लो।

6-आहार-विहार, निद्रा पर नियन्त्रण रखो। ऐसा करने से स्वस्थ रहोगे और ज्ञान द्वारा सुख रूपी परमात्मा की प्राप्ति कर सकोगे।

7-सन्तोष, शान्ति और सादगी का पालन करो।

8-राग-द्वेष और बैर-भाव को त्यागकर अपने बन्धुओं का, देश का हित करो।

9-धन, लक्ष्मी, विद्या, जाति, युवावस्था का मद त्याग करो।

10-संयम विहीन जीवन शुष्क एवं पशु के समान निःसार है।

11-माता-पिता, पुत्र, स्त्री, बान्धव आदि सम्बन्धियों का मिलन धर्मशाला में एकत्र हुए पथिकों के समान है। कोई किसी का नहीं है। कुछ काल के लिए एकत्र हुए हैं, पीछे अपने-अपने भिन्न मार्ग पर सभी लोग चल बसेंगे। रहेंगे कोई नहीं। अतः अहंता, ममता को छोड़कर एक मात्र उस परमात्मा की निरन्तर चिन्ता करनी चाहिये।

12-कुसंग से परचर्चा पर निन्दा में प्राप्ति होती है, 2-विषय शक्ति और भोग कामना बढ़ती है। 3-काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, इन शत्रुओं की वृद्धि होती है। 4-दंभ, दर्प, अभिमान, असहिष्णुता, अविवेक, असत्य, कायरता, निर्दयता आदि की वृद्धि होती है। 5-राग, द्वेष, इच्छा, वासना, अहंकार को वृद्धि होकर अज्ञान का परदा मजबूत होता है। 6-भाँति-भाँति के दुराचार बढ़ते है। इसलिए कुसंग का त्याग करना ही उचित है।

13-भगवान की पूजा के लिए पुष्प उपयोगी हैं-अहिंसा, इन्द्रिय संयम, प्राणियों पर दया, मन का वश में करना, क्षमा, ध्यान और सत्य इन फूलों से भगवान प्रसन्न होते हैं।

14-जो सदा सन्तुष्ट है, वही यथार्थ धनी है। इन्द्रियाँ ही मनुष्यत्व की शत्रु है। विषयों का अनुराग ही बन्धन है।

15-धन का मोह मनुष्य की बुद्धि को अनिश्चयात्मक बना देता है, इसलिए सदैव सावधानी से मन को ठीक रास्ते पर रक्खें। ध्यान रखो जो कुछ भी धन कमाओ, वह न्याय और धर्म के आधार पर ही होना चाहिए।

16-जिसमें अधिक गुण हों, वही वास्तव में बड़ा है।

17-पिता के कर्ज को चुकाने वाले तो पुत्र आदि भी होते, परन्तु भव बन्धन से छुड़ाने वाला तो अपने सिवा कोई नहीं है।

18-उखड़ो मत, झल्ला न उठो, झुंझलाना छोड़ दो, धीरता से सुनो, अपनी झूठी निन्दा भी चुपचाप सुनो, फिर शान्त चित्त से विचार करो क्यों वह तुम्हारी निन्दा करता है? जरूर कोई कारण मिलेगा। अधिकाँश में तो अपनी कोई कमजोरी ही मिलेगी, उसे दूर करो और निन्दक का उपकार मानो।

धन की आवश्यकता क्यों है।

19-जिसके पास धन होता है, उसी को मित्र मिलते हैं।

20-जिसके पास धन है, उसके सभी भाई-बन्धु हैं।

21-कुल, शील, पांडित्य, रूप, भोग, यश, सुख ये सब धनवान को ही प्राप्त होता है।

22-धन हीन मनुष्य को तो उसके स्त्री पुत्र भी त्याग देते हैं।

23-दरिद्र हैं वे-जो धर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकते।

24-स्वर्ग प्राप्ति के लिए सात्विक यज्ञ कार्य पोखरें खुदवाना आदि कर्म हैं, वह भी धन के अभाव में नहीं हो सकता।

25-दान संसार के लिए स्वर्ग की सीढ़ी है, किन्तु निर्धन व्यक्ति के द्वारा उसकी भी सिद्धि होनी असंभव है।

26-व्रत आदि का पालन, धर्मोपदेश आदि का श्रवण, पितृ यज्ञ आदि का अनुष्ठान तथा तीर्थ सेवन, ये शुभ कर्म धन हीन मनुष्य के लिए नहीं हो सकते।

27-रोगों का निवारण, पथ्य का सेवन, औषधि का संग्रह, अपने शरीर की रक्षा तथा शत्रुओं पर विजय आदि कार्य भी धन से ही सिद्ध होते हैं।

28-जिनके पास धन होता है, उनको इच्छानुसार भोग प्राप्त होते हैं, इसलिए न्याय पूर्वक धन कमाओ।


जीवन की रक्षा करें या शरीर त्याग दें?

(लोक मान्य तिलक)

यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि न्याय पूर्वक प्राप्त की हुई किसी की सम्पत्ति को चुरा ले जाने या लूट लेने की स्वतंत्रता दूसरों को मिल जाय, तो द्रव्य का संचय करना बन्द हो जायगा, समाज की रचना बिगड़ जायगी और सभी की हानि होगी। परन्तु इस नियम के भी अपवाद हैं। जब दुर्भिक्ष के समय, मोल लेने, मजदूरी करने या भिक्षा माँगने से भी अनाज नहीं मिलता, तब ऐसी आपत्ति में यदि कोई मनुष्य चोरी करके आत्मरक्षा करे, तो क्या वह पापी समझा जायगा? महाभारत में (शाँ0 141) यह कथा है कि किसी समय बारह वर्ष तक अकाल पड़ा और विश्वामित्र पर बहुत बड़ी आपत्ति आई, तब उन्होंने किसी स्वपच (चान्डाल)के घर से कुत्ते का माँस चुराया और वे इस अभक्ष्य भोजन से अपनी रक्षा करने के लिए प्रवृत्त हुए। उस समय उस स्वपच ने विश्वामित्र को अभक्ष्य भक्षण और वह भी चोरी से न करने के विषय में बहुत उपदेश दिया, परन्तु विश्वामित्र ने उसको डाँटते हुए कहाँ—

पिबन्त्येवोदकं गावो मंडूकेषुरुबास्वपि।

न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति माभूरात्म प्रशंसकः॥

अरे यद्यपि मेढ़क टर्र-टर्र करते हैं तो भी गौएं पानी पीना बन्द नहीं करती, चुप रह! मुझको धर्म-ज्ञान बताने का तेरा अधिकार नहीं है। व्यर्थ अपनी प्रशंसा मत कर। उसी समय विश्वामित्र ने यह भी कहा कि ‘जीवितं मरणात्श्रेयो जीवनधर्मभावाप्नुयात्। अर्थात् यदि जिन्दा रहेंगे, तो धर्म का अचारण कर सकेंगे। इसलिए धर्म की दृष्टि से मरने की अपेक्षा जीवित रहना अधिक श्रेयष्कर है। मनु ने अजीर्गत, वामदेव आदि अन्वान्य ऋषियों के उदाहरण दिए हैं, जिन्होंने ऐसे संकट के समय, इसी प्रकार आचरण किया है। (मनु0 10-105-108) हाब्स नामक अंग्रेज ग्रन्थकार ने लिखा है कि किसी कठिन अकाल के समय जब अनाज मोल न मिले या दान भी न मिले तब यदि पेट भरने के लिए कोई चोरी या साहसिक कर्म करे, तो उसका यह अपराध माफ समझा जाता है और मिल ने तो यहाँ तक लिखा है कि ऐसे समय चोरी करके अपना जीवन बचाना मनुष्य का कर्त्तव्य है।

मरने से जिन्दा रहना श्रेयस्कर है। विश्वामित्र का यह तत्व क्या सर्वदा अपवाद रहित कहा जा सकता है? नहीं। इस जगत में जिन्दा रहना ही कुछ पुरुषार्थ नहीं हैं। कौए भी का कि बलि खाकर कई वर्ष तक जीते रहते हैं। यही सोचकर विदुला ने अपने पुत्र से कहा था कि बिछौने पर पड़े-पड़े सड़ जाने या घर में सौ वर्ष की आयु को व्यर्थ व्यतीत कर देने की अपेक्षा यदि तू एक क्षण भी अपने पराक्रम की ज्योति प्रकट करके मर जायगा, तो अच्छा होगा। “मुहूर्त ज्वलित श्रयो न च घूमायितं चिरम्” (म॰ 3-132-15) यदि यह बात सच है कि आज नहीं तो कल, अन्त में सौ वर्ष के बाद मरना जरूर है, (भागवत 10-1-38 गी0 2-27) तो फिर उसके लिए रोने या डरने से क्या लाभ? अध्यात्म शास्त्र की दृष्टि से आत्मा तो नित्य और अमर है। इसलिए मृत्यु का विचार करते समय सिर्फ इस शरीर का ही विचार करना बाकी रह जाता है।

यह तो सभी जानते हैं कि यह शरीर नाशवान है, परन्तु आत्मा के कल्याण के लिए इस जगत में जो कुछ करना है, उसका एक मात्र साधन यही नाशवान- मनुष्य शरीर है। इसलिए मनु ने कहा है-’आत्मानं सततं रक्षेत् दारै रपि धनैरपि” (मनु0 7-213) अर्थात् स्त्री और सम्पत्ति की अपेक्षा हमको पहले स्वयं अपनी ही रक्षा करनी चाहिए। यद्यपि मनुष्य देह दुर्लभ और नाशवान भी है, तथापि जब उसका नाश करके, उससे भी अधिक किसी शाश्वत वस्तु की प्राप्ति कर लेनी होती है जैसे देश, धर्म और सत्य के लिए, अपनी प्रतिज्ञा, व्रत और विरद की रक्षा के लिए एवं इज्जत, कीर्ति और सर्वभूतहिते के लिए तब ऐसे समय पर अनेक महापुरुषों में तीव्र कर्त्तव्याग्नि में आनन्द से अपने प्राणों की भी आहुति दे दी है। जब राजा दिलीप, अपने गुरु वसिष्ठ की गाय की रक्षा करने के लिए, सिंह को अपने शरीर का बलिदान देने को तैयार हो गया, तब वह सिंह से बोला कि हमारे समान पुरुषों की इस पच्च भौतिक शरीर के विषय में अनास्था रहती है, अतएव तू मेरे इस जड़ शरीर के बदले मेरे यश रूपी शरीर की ओर ध्यान दे। (रघु 2-50) कथा सरित्सागर और नागानन्द नाटक में यह वर्णन है कि सर्पों की रक्षा करने के लिए जी भूत वाहन ने गरुड़ को स्वयं अपना शरीर अर्पण कर दिया। मृच्छकटिकम नाटक (10-20) में चारु दत्त कहता है—

न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः।

विशुद्धस्य हिमे मृत्युः पुत्र जन्म समः किल॥

मैं मृत्यु से नहीं डरता, मुझे यही दुःख है कि मेरी कीर्ति कलंकित हो गई। यदि कीर्ति शुद्ध रहे और मृत्यु भी आ जाय, तो मैं उसको पुत्र जन्म के समान मानूँगा। और भी इस तरह की अनेक आख्यायिकाएं शास्त्र एवं इतिहास में भरी पड़ी है। इन सब का अर्थ इतना ही है कि यदि जीवन की आवश्यकता है, तो उसके धारण करने के लिए, संकट के समय चौर कर्म हो जाय, तो कोई डर नहीं, परन्तु चौर कर्म न सिर्फ निंदित है बल्कि समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करके अशान्ति फैलाने वाला है। इसलिए साधारण स्थिति में कष्ट सहकर भी चोरी न करना ही उचित है। जीवन रक्षा और शरीर त्याग इन दोनों का महत्व कुछ नहीं, किस उद्देश्य के लिए जीवन का रक्षण या त्याग किया गया है, वह उद्देश्य ही प्रधान कसौटी है।


कहीं आप भी तो मूर्ख नहीं हैं?

(स्वामी मनोहर दास ज्ञानतीर्थ, दीनवी)

मूर्ख दो प्रकार के होते हैं एक मूर्ख, दूसरा पठित मूर्ख। आज मैं आपके सामने मूर्खों ही के लक्षणों का धर्म शास्त्र के आधार पर वर्णन करुँगा—क्या आप में भी निम्नाँकित सूक्तियों के लक्षण मिलते हैं? यदि मिलते हों, तो आप अपना भी परिमार्जन करिए और मूर्खता के कलंक से बचकर निर्मल होने का प्रयत्न करिए।

—जिसके उदर से जन्म लिया, ऐसी माता और पिता के साथ विरोध करे, सर्व परिवार को छोड़ स्त्री में रमा रहे, अपने गुप्त मत का प्रकाश स्त्री से करे-जो कि उसके दायरे से बाहर की बात है, वह मूर्ख है।

—बलवान से बैर करे, अपने शरीर पर गर्व करे, बिना बल के सत्ता दिखावे, आत्म स्तुति करे, दरिद्र स्थिति में रहकर भी बड़ी बड़ी डींगें हाँके, चिकित्सक एवं सत्ता धारी से अकारण विरोध करे, वह मूर्ख है।

—जेबों में हाथ डाले अकड़ कर बात करे वह मूर्ख है।

—बिना कारण हंसे, अत्यन्त अविवेकी विचार शून्य और बहुतों का शत्रु हो, उसे मूर्ख जानो।

—नीच से मित्रता करे, रात-दिन पर छिन्द्रान्वेषण को तत्पर रहे, वह मूर्ख है।

—जहाँ बहुत लोग बैठे हैं, उनके मध्य में जाकर सोना और विदेश में हर व्यक्ति पर बिना जाने विश्वास कर लेना मूर्खता है।

—व्यसनों के वश होकर अपनी महत्ता को खो बैठे वह मूर्ख है।

—पर आशा से परिश्रम करना छोड़कर जो अकेले पन में आनन्द माने वह मूर्ख है।

—मूर्ख घर में बड़े विवेकी बनते हैं, बहुत बोल कर अपने परिवार के भोले जीवों पर अपनी धाक जमाये रखते हैं, एवं स्त्रियों के सन्मुख बहादुरी दिखाते और मौका पड़ने पर पीठ दिखाकर भागते है। स्त्रियों में वक्ता बनते हैं, किन्तु सभा में शर्माते हैं वे मूर्ख हैं।

—वृद्धों के सन्मुख ज्ञानीपना प्रकट करे, सात्विक और सरल हृदय के जीवों से छल करे, अपने से श्रेष्ठ के साथ स्नेह करने जाये और उन का उपदेश नहीं माने, वह मूर्ख है।

— विषयी और निर्लज्ज होकर मर्यादा से बाहर कार्य करता फिरे, रोगी होकर पथ्य का पालन न करे, उसे मूर्ख जानो।

—विदेश में बिना परिचय किसी का साथ करे और जाने बूझे बिना किसी बड़े नगर (शहर) में जावे, यह लक्षण मूर्खों में ही होते हैं।

—जहाँ अपमान होता हो वहाँ बारम्बार जाए, बिना पूछे उपदेश देने लगे, वह मूर्ख है।

—बिना विचारे तनिक अपराध पर भी दंड दे, मामूली-2 बातें में भी कृपा दिखावे, वह मूर्ख है।

—वास्तविकता को न मानना, शक्ति बिना बड़ी-बड़ी बातें करना, मुख से अपशब्द बोलना मूर्खों ही का काम है।

—घर में अपनी बड़ी बहादुरी प्रकट करे और बाहर दीन बनकर फिरे उसे मूर्ख जानो।

—नीच की मित्रता, पर स्त्री के साथ एकान्त और मार्ग चलते खाना मूर्ख के लक्षण है।

—किसी के किये उपकार को अपकार माने, अपना थोड़ा किया बहुत बतावें, ऐसे कृतघ्न को मूर्ख जानना चाहिए।

—तामसी, आलसी, मन से कुटिल और अधीर मनुष्य मूर्ख होता है।

—विद्या, वैभव, धन, पुरुषार्थ, बल और मान बिना मिथ्या अभिमान करने वाला मूर्ख होता है।

—मलीन रहना दाँत, आँख, हाथ, वस्त्र और शरीर सर्व काल मैले रक्खे, यह कार्य मूर्खों ही के हैं।

—क्रोध से, अभिमान से और कुबुद्धि से अपना आप ही घात करे, ऐसा अव्यवस्थित चित्त वाला मूर्ख है।

—अपने सुहृद के साथ बुरा व्यवहार करे, सुख और शान्ति का एक शब्द भी न बोले और नीच जनों की स्तुति करे, वह मूर्ख है।

—अपने आप को सर्व प्रकार से पूर्ण माने, शरणागत को धिक्कारे, लक्ष्मी और आयु का भरोसा करे, वह मूर्ख है।

—सांसारिक विषय वासना को ही मुख्य मान कर ईश्वर को भूल जावे, कर्त्तव्य का ज्ञान न हो, वह मूर्ख है।

—बुरे का संग करे, आँख मींचकर मार्ग चले, पितृ, गुरु देव, माता-पिता, गुरु भाई, स्वामी आदि बड़ों का विरोध करे, वह मूर्ख है।

—दूसरे को दुख में देख हंसे और सुखी देख कर कुढ़े, गई वस्तु का शोक करे, अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा न कर सके, सदा हँसी ठट्ठा करे, हँसते 2 लड़ने लग जाय, उसे मूर्ख जानो।


अत्यधिक परिश्रम न कीजिए।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत हैं कि “श्रम, संयम और विश्राम संसार के चिकित्सकों में सर्वश्रेष्ठ हैं” मनुष्य खूब मौज से मन लगाकर परिश्रम करे, जीवन में अपनी इन्द्रियों पर संयम रक्खे, अति न करे और फिर विश्राम करे, तो वह दीर्घ जीवन लाभ कर सकता है।

परिश्रम का महत्व महान् है। भतृहरि का कथन है ‘आलस्यो हि मनुष्याणाँ शरीरस्थो महानृपुः।’ गीता में भगवान् कृष्ण ने सौ वर्ष तक कर्म करने का आदेश दिया है। संयम का स्थान भी महत्वपूर्ण है। संयम से इन्द्रिय निग्रह होता है। असंयम से नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।

स्वस्थ जीवन का तृतीय अंग है-विश्राम। इसी तत्व पर विस्तार से हमें विचार करना है। आजकल के विविध विघ्न-बाधा संकुल जगत् में मनुष्य का जीवन काम से भर गया है। वह दिन-रात काम में जुटा रहता है। मजदूर लोग रुपयों के लोभ में शरीर की कुछ परवाह न कर खूब श्रम करते हैं। मध्वर्ती जनता भी नाना प्रकार के कार्यों में दिन रात जुटी रहती है। पहर रात तक कार्य और व्यापार तेजी से चलते रहते हैं। सिनेमा, दुकानें, रात्रि में चलने वाले प्रेस, बिजलीघर, रेलवे कर्मचारी, ट्यूशन करने वाले बाबू आदि कार्य भार से थके जा रहे हैं, आज कल के जीवन में विश्राम की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। स्वास्थ्य विशारदों का मत है कि आज की 20 प्रतिशत बीमारियाँ अत्यधिक परिश्रम, निरन्तर काम में जुटे रहने के कारण होती हैं। लोग थक कर चूर होते हैं, फिर हफ्तों बीमार रहते हैं।

यह थकावट प्रायः दो प्रकार की होती है —

(1) शारीरिक थकावट—शरीर के अत्यधिक उपयोग से माँसपेशियाँ और पुट्ठे थक जाते हैं, शरीर के कल पुर्जा की शक्ति क्षीण हो जाती है। जोड़ों और विशेषतः पिण्डलियों में दर्द होता है। सिर में हल्का सा दर्द होता है। हाथ-पाँव टूटने लगते हैं। यदि शारीरिक थकावट मर्यादा और शक्ति से अधिक हो जाय तो इसका ज्वर हो आता है। हाथ, पाँव, कन्धों और कमर की थकान बहुत विश्राम के पश्चात् ठीक होती है।

(2) मानसिक थकावट—शरीर की भाँति मस्तिष्क की शक्ति भी सीमित है। उससे भी एक विशेष दर्जे तक कार्य ले सकते हैं। अधिक बौद्धिक श्रम करने से हिसाब किताब, जोड़-बाकी, अध्ययन, पठन-पाठन, सोचने-विचारने, कुर्की करने, स्कूली मास्टरी, लेखन कार्य से मस्तिष्क पर जोर पड़ता है। जो व्यक्ति निरन्तर बोलते हैं। वे भी अधिक शक्ति व्यय करते हैं। मानसिक थकावट अन्तर्द्वन्द्व और चिंता का कारण बनती है। जब मनुष्य का मन थक जाता है, तो काम में मन नहीं लगता। सिर भारी रहता है, मन उचाट हो जाता है। कोई काम करने को जी नहीं चाहता। प्रायः देखा गया है जब कोई कार्य भार समझ कर किया जाता है, तो थकावट जल्दी आती है।

अमेरिका में आजकल “अपने जीवन की मोमबत्ती दोनों ओर से न जलाओ” वाला आन्दोलन जोरों से चल रहा है। आन्दोलनकारियों का कहना है कि हमें विश्राम भी चाहिये। हम दत्तचित्त हो काम करने को प्रस्तुत हैं, किन्तु हमें पर्याप्त विश्राम अवश्य मिलना चाहिए। हमारा थका हुआ शरीर विश्राम चाहता है और उसे विश्राम न देना उसके ऊपर महान् अत्याचार करना है।” यह निर्विवाद सिद्ध है कि मनुष्य का जीवन अत्यन्त मूल्यवान और सर्वतोभावेन उपयोगी है। सतत- तप, नियम, एवं सद्वृत्ता चरण के पश्चात मनुष्य यह शरीर प्राप्त कर उसकी सत्ता रखता है। ऐसे दुर्लभ जीवन की बत्ती को दोनों तरफ से फूँक कर नष्ट भ्रष्ट कर देना बुद्धिमानी का कार्य नहीं है। इस सम्बन्ध में डॉक्टर फेरे ने एक बार पार्लियामेंट में भाषण देते समय कहा था।

“मैं विश्राम के लिये रविवार का दिन अत्यन्त आवश्यक समझता हूँ, क्योंकि विश्राम से शारीरिक एवं मानसिक क्षतिपूर्ति होती है। शरीर तो महान् है। यह दुर्लभ मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता। उसकी शक्ति यदि एक बार नष्ट कर दी जाय तो फिर कोई भी दवादारु उसका पुनः निर्माण नहीं कर सकती। मैं मानता हूँ कि रात्रि में विश्राम से शक्ति की कुछ क्षतिपूर्ति हो जाती है, किन्तु वह यथेष्ट नहीं होती। मानव शरीर रचना इतनी सूक्ष्म है कि उसे हर सातवें दिन समग्र आवश्यक से आवश्यक कार्यों से हाथ खींचकर पूर्ण विश्राम करना चाहिये। “

पाश्चात्य देशों में लोग छुट्टी-छुट्टी चिल्ला रहे हैं। हमें भी छुट्टियाँ चाहिये। छुट्टियाँ हमारे स्वास्थ्य की वृद्धि और आनन्द को बढ़ाती हैं। छुट्टियों के बाद मनुष्य पुनः ताजा होकर अपने कार्य में नए उत्साह और नए जोश से आकृष्ट होता है। छुट्टियाँ एक प्रकार का जीवन बीमा है, जो मृत्यु, वृद्धावस्था, दुःख, क्लेश और क्षय होती हुई शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों के विरुद्ध रक्षा के रूप है। जीवन की एक रसता और इर्द गिर्द की परिस्थितियों का परिवर्तन हो जाता है। वह परिवर्तन स्वास्थ्य, सुख, और दीर्घायु के लिए संजीवनी बूटी के तुल्य है।

प्रिय पाठक! लगातार मानसिक या शारीरिक परिश्रम में न लगे रहो। थके हुए शरीर से काम लेना परम घातक है। खिंचे रहने से धनुष की डोरी जल्दी टूटती है इसी प्रकार मानसिक या शारीरिक कलपुर्जों से शक्ति से अधिक काम लेने से उत्पादक शक्ति का ह्रास होता है। अपनी शक्तियों से सामर्थ्य के अनुसार काम लेने की आदत डालो। लोभवश शरीर की शक्ति का दिवाला न निकालो। अधिक काल तक एक ही विषय पर सोचने, एक ही प्रकार का शारीरिक या मानसिक परिश्रम करते रहने से प्राण शक्ति का ह्रास होगा। काम को बदलने के कारण और लगातार एक ही कार्य में व्यस्त रहने से जीवन शक्ति पंगु हो जाती है। बोरहेव नामक विद्वान अपनी दशा का वर्णन करते हुए स्वयं लिखते हैं—

“क्या करता, मुझे कई दिन तक अविराम गति से घोर मानसिक परिश्रम करना पड़ा। प्रेस वालों का तकाजा था। मैं लिखता रहा, परिणाम यह हुआ कि मेरे शरीर में और मन के सूक्ष्म पुर्जों की एक अजीब तरह की थकान आ गई और आलस्य के कारण एक महीने तक मैं बिस्तर पर मुर्दे की तरह पड़ा रहा।”

यदि आप शक्तियों की रक्षा करना चाहते हैं, तो परिवर्तन का सुनहरा नियम सीख लीजिए। काम करते समय थोड़ी-2 देर के लिए विश्राम अवश्य रखिए। एक कार्य करने के पश्चात् कोई नवीन कार्य प्रारम्भ कीजिए, फिर कोई तीसरा, इसके उपरान्त आप पुनः पहले ही कार्य करने के लिए ताजे हो जायेंगे। उत्तम तो यह है कि शारीरिक के बाद मानसिक और मानसिक के बाद शारीरिक परिश्रम करें।

अनेक व्यक्ति कार्यों की शक्ति बढ़ाने के लिए मादक वस्तुओं का उपयोग करते हैं। ये पदार्थ शक्तिवर्द्धन नहीं करते, बल्कि उत्तेजना उत्पन्न करते है। ये रही सही शक्ति का भी दिवाला निकाल देते हैं। ऐसे उपायों द्वारा शरीर से अधिक काम लेकर उस पर अत्याचार करना प्राणघातक है।

रात्रि में शरीर को पूर्ण विश्राम दो। सोने से थकावट दूर होती है, नवशक्ति प्राप्त होती है, स्फूर्ति का संचार होता है और दूसरे दिन नए जोश से कार्य करने के लिए ताजगी आती है। सोये बिना दिमाग में गर्मी चढ़ जाती है, सर भारी हो जाता है और आँखें भारी हो जाती हैं। दिन भर कार्य करने से जो शक्ति क्षीण हो जाती है, माँस तंतु या कीटाणु टूट फूट जाते हैं नींद से उनका पुनः निर्माण होता है। अतः नियत समय पर लाख काम छोड़ कर सोने जाओ और आठ घन्टे के लिए पूरी छुट्टी कर दो। बिस्तर पर लेट कर चिंता के विचारों में न फंसे रहो।

दिन में भी जब कभी तुम थकान का अनुभव करो, काम छोड़ दो और किसी शान्त जगह पर निकल जावो। आराम से बैठ कर अंग शिथिल कर लो, आँखें मूँद लो और मन में विचार न आने दो। जिस प्रकार थका हुआ नाविक नाव खेते खेते डाँड मारना छोड़ कर कुछ क्षणों के लिए विश्राम करता है, तुम भी सब प्रकार के विचारों को क्षण भर के लिए भूल जाओ। दुनिया को विस्मृत कर दो और इसी प्रकार निश्चेष्ट बैठे रहो।


मलेरिया से बचने के सरल उपाय

(श्री मूल नारायण जी वैद्य)

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दूध, घी के न मिलने के कारण गरीब भारतीय जनता निर्बल और निस्तेज हो रही है। यही कारण है कि यहाँ के निवासी अनेक प्रकार के रोगों के शिकार होकर काल के गाल में समा रहे हैं। निर्बलता के कारण छोटे से छोटे रोग आज भयंकर रूप धारण कर रहे हैं।

जिस प्रकार से इस समय तपैदिक अर्थात् क्षय रोग यहाँ के प्राणियों का क्षय कर रहा है, उसी प्रकार से मलेरिया भी लोगों को मार रहा है। लोगों का अनुमान है कि दस लाख से अधिक मनुष्य साल में इसके शिकार हो जाते हैं।

हम इस रोग से दूर होने के अनुभूत और सरल प्रयोगों को सर्वसाधारण के सामने उपस्थित करते हैं और आशा है कि इससे लाभ उठाया जायगा।

मलेरिया को आयुर्वेद मत के अनुसार विषम रोग माना गया है। इससे कब्जियत, कमर में दर्द, व्यास, नेत्रों में जलन, जाड़े का लगना इत्यादि होता है। इसकी तीन अवस्थाएं होती हैं—एक शीतावस्था, दूसरी उष्णावस्था और तीसरी स्वेदावस्था। यह ज्वर विशेष करके वर्षा, शरद और बसंत ऋतु में फैलती है। शीतावस्था में अधिकतर सरदी पीठ से लगनी आरम्भ होती है और बाद में वह सर्वांग में फैल जाती है। जाड़े के अधिक लगने से शरीर काँपने लगता है। उष्णावस्था में पहिले आँखें गर्म मालूम पड़ती हैं, मुँह से गर्म भाप निकलती है और छाती, हाथ-पैरों में गर्मी लगती है। स्वेदावस्था में पसीना आरम्भ में माथे और मुँह पर आता है, बाद में सर्वांग में होने लगता है। कभी कभी तो इतना पसीना होता है कि ओढ़ना और बिछौना पसीने से तर हो जाता है। अनेक लोगों का मत है कि गन्दे पानी के गढ़ों में जो मच्छर पैदा होते हैं वही इस रोग के मुख्य कारण हैं। ऐसा भी लोगों का कहना है कि यह रोग बालक, स्त्री, पुरुष सभी को होता है, किन्तु काले स्त्री पुरुष की अपेक्षा गौर वर्ण के लोगों में अधिक पाया जाता है। इसके और भी भेद हैं जिसको अतरा, तिजारी, चौथिया भी कहते हैं। जो भी हो यह रोग भयंकर घातक रोग है और इससे सभी परिचित हैं। इससे बचने के लिए कुनैन का अधिक प्रयोग होता है, किन्तु इस स्थान पर हम सरल और अनुभूत औषधियाँ बतलाते हैं।

1—जाड़ा देकर आने वाले बुखार में भुनी हुई फिटकरी 6 आना भर और चीनी 6 आना भर लीजिये। दोनों को मिलाकर चार भाग करके एक एक घण्टे में देने से ज्वर नहीं आता। प्यास लगने पर मिश्री मिला गो दुग्ध लेना चाहिये।

2—नाई बूटी-यह बूटी सभी जगह मिलती है और अधिकतर लोग इसे जानते हैं। इसको तीन से छः माशे तक लेकर सात मिर्च और 21 पत्ती तुलसी की मिला कर घोंट ले। फिर गोली बना गर्म या ठण्डे पानी से मुख में नीचे कर उतार लेना चाहिये।

3—तुलसी की 25-30 पत्ती सात दाना मिर्च के साथ पीस कर पीने से भी ज्वर दूर होता है।

4—इन्द्र जौ, पर बल के पत्ते और कुटकी का काढ़ा बनाकर पिलाने से ज्वर दूर हो जाता है।

5—इकतारा, तिजारी चौथेया इत्यादि में ज्वर आने से पहले भाँग और गुड़ मिलाकर खिलाने से ज्वर दूर हो जाता है।

6—करंज की हरी पत्ती दो तोला, कालीमिर्च 6 माशा, गेरू एक माशा घोट कर चने के बराबर गोली बना लें। ज्वर आने से 3 घण्टे पहले आध-2 घण्टे में एक गोली पानी से उतारे तो लाभ होगा।

7—करंज का बीज 5 तोला, फिटकरी भुनी 2.5 तोला, छोटी पीपर 2.5 तोला, गोभी की पत्ती 2.5 तोला, इन सबको पीसकर तुलसी के रस की 7 भावना देकर मटर के बराबर गोली बनावें और दिन में 4 बार दें अवश्य लाभ होगा।


प्रकृति माता की देन

(श्री लक्ष्मीनारायण टण्डन प्रेमी)

प्रकृति-माता अत्यन्त कोमल हृदय हैं, किन्तु साथ ही वह कठोर शासक भी है। बच्चे भूले करते ही हैं और माता का सदा एक प्रयत्न रहता है कि साधारण भूलों का सुधार तथा परिशोध होता जाय। किन्तु यदि बच्चा कोई भयंकर अपराध कर बैठता है, तो माता कठोर होकर उसे कठोर दण्ड भी देती है। यदि वास्तव में देखा जाय तो माता का उद्देश्य बच्चे को तीव्र चेतावनी देने का होता है, जो उसकी कोमल-हृदयता तथा न्याय प्रियता का ही द्योतक होता है।

हम मानव भी नित्य प्रति प्रकृति के नियम का विरोध खान-पान, रहन-सहन आदि में असंयम करके करते हैं, फलस्वरूप अस्वास्थ्य या रोग के चंगुल में फँसते हैं। प्रकृति ने कृपा करके इन रोगों तथा अस्वास्थ्य से छुटकारा दिलाने को हमारे लिए पग-पग पर प्रयत्न किया है। यदि आप पहाड़ पर भी गए होंगे तो वहाँ एक प्रकार का पौधा जिसमें बिछू पत्ती या पलाकी निकलती हैं, देखा होगा। इनके शरीर में लग जाने से एक प्रकार का जहर सा चढ़ जाता है तथा दाने दाने से पड़ जाते हैं। किन्तु इसी बिछू पत्ती के पास ही एक अन्य प्रकार की पत्तियाँ उगी होती हैं और इन पत्तियों का रस लगाते ही बिछू पत्तियों का रस उतर जाता है। इसी प्रकार हमें अपने रोगों के इलाज में असुविधा न हो, इससे प्रकृति ने हमारे चारों ओर नीम, मदार अड़ूसा, पीपल, गिलोय, तुलसी, बरगद आदि पैदा कर दिए हैं। इन अनेक गुण युक्त वनस्पतियों से अनेक प्रकार के रोग दूर हो सकते हैं। निर्धन तथा धनी बिना अधिक टीपटाप तथा असुविधा के इनके द्वारा लाभ उठा सकते हैं। जड़ी-बूटियों द्वारा इलाज भी प्राकृतिक चिकित्सा के ही अंतर्गत है। आस पास के वृक्षों तथा पत्तियों आदि से भगवान ने पहले ही से हमारे लिए प्रबन्ध कर दिया है।

उदाहरण स्वरूप हम दो चार नाम लेंगे। अडूसे का लाभ तो सर्वविदित ही है। बुजुर्ग कहा करते थे-जहाँ बकरी हो और अडूसे के पौधे हों, वहाँ क्षय रोग की दाल नहीं गलती। मलेरिया में तुलसी लाभ करती है, वह भी जानी हुई बात है। यदि दो माशे तुलसी के बीज प्रातः और सायं फाँके और ऊपर से दूध पीले तो नपुँसकता दूर होती है। वैसे ही बेलपत्र बहुमूत्र (मधुमेह या डाइबटीज) में अत्यन्त लाभप्रद है। सात पत्तियों से प्रारम्भ करके 21 तक बढ़ावें। लोड़े सिल द्वारा पीसकर इन्हें जल में पिएं। संग्रहणी में, आँव में भी डायरिया तथा डिसेंट्री) तथा दस्तों के आने पर भी इससे लाभ होता है। यदि तीन-तीन माशे, छः-छः घण्टे के बाद सूखे बेल की गिरी 3 दिन तक खाये तथा ऊपर से ठण्डा पानी पिए तो अवश्य लाभ होगा। हाँ, उस समय भोजन अति सूक्ष्म खाए। दर्द भी हो तो दही का अवश्य प्रयोग करें। बाद में खिचड़ी ही खाये।

दूब प्रत्येक स्थान पर उगती है। यदि रक्त कहीं से गिर रहा हो (चौट में लगने पर नहीं) तो 1 तोला सफेद दूब पीसकर उसका रस पिलाए, यदि अनार का रस भी डाल लें तो अति उत्तम। घण्टा-2 भर बाद पिलाते रहें, जब तक कि खून बन्द न हो जाय। जहाँ से खून आता हो उस स्थान पर कटोरा रखकर जोर से पानी की धार डालें। कटोरा भर जाने पर फिर खाली कर कै वैसा ही करते जायें जब तक खून बन्द न हो। दूब अत्यन्त लाभप्रद चीज है। इन दो चार उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि बिना पैसा खर्चे हम अपना और दूसरों का इलाज कर सकते हैं।

अब हम उदाहरण स्वरूप केवल एक पौधा लेंगे और देखेंगे कि उसके एक नहीं अनेक प्रयोग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अति साधारण चीज मदार लीजिए।

ऋतु परिवर्तन होने पर प्राकृतिक रूप से प्रायः ज्वर आ जाता है, तब मदार की जड़ का एक माशा छिलका आध पाव पानी में उबाले। जब छटाँक भर पानी रह जाय, तो उसे आधा प्रातः और आधा सायं पिला दें, चाहे यों ही चाटें शहद में मिलाकर। लाभ होगा।

जाड़े में खाँसी आने पर गीली खासी, मदाग्नि, अफरा, दमा, पेट दर्द, वायु गोला, बदहजमी तथा भूख न लगने पर मदार का फूल 1 तोला और कालीमिर्च 1 तोला पीसकर गोली बना लें, मटर के बराबर। एक प्रातः एक सायं गोली दें। अवस्था के अनुसार 3 से 4 तक गोली दे सकते हैं। लाभ होगा।

जूड़ी के रोग में मदार की जड़ का छिलका आधा या एक रत्ती, फांके सी कतर कर पानी में खिलावें तो जूड़ी ठीक होगी। जूड़ी आने के 6 घण्टे पहले से खिलाए एक-एक घण्टे बाद एक-एक मात्रा, चार बार खिलाए, उस दिन भोजन न दें। जूड़ी का समय निकलने के बाद दूध, साबूदाना आदि दें।

मदार के पत्ते 1 छटाँक, पाँचों नमक (काला, सेंधा, साँभर, सज्जी खार तथा जवा खार) एक तोला लें। एक हाँड़ी में एक पत्ता बिछाकर उस पर थोड़ा सा नमक डालें। इसी प्रकार करते जाएं। हाँड़ी बन्द करके मिट्टी में लपेट कर 15-20 ऊपर नीचे कंडों में रख कर गर्म करें। खंजर सा रह जायगा वह। इसे पीस लें। इसमें असुविधा पड़े तो पत्ते तो पत्ते वैसे ही जला दें और सब नमक मिलाए और पीस डालें। 3 माशा प्रातः और 3 माशा सायं गर्म जल से पिएं तो तिल्ली अवश्य ठीक हो जायगी। यह दवा की मात्रा जवानों की है। बच्चों को थोड़ी कम मात्रा दें। लीवर बढ़ने में देने पर भी इससे लाभ होगा। मदार के पत्ते तथा लट जीरा बराबर बराबर जला कर मिला कर उसमें सेंधा या काला नमक मिला कर दे तो भी लीवर में लाभ होगा। लीवर के स्थान पर कडुआ तेल नमक मिलाकर मालिश करें। बड़ों की मात्रा तीन तीन माशा प्रातः और सायं। गठिया हो जाने पर 5 तोला मदार के फूल, 2 तोला काली मिर्च तथा दो तोला रेंडी की सफेद गूदी सबको पीस कर जंगली बेर के बराबर गोली बनावें तथा प्रातः सायं गोली गर्म पानी से खिलायें। तेल में पत्ते डालकर जलाएं और गर्म तेल से गठिया के स्थान पर मालिश करें और उसी के पत्ते उस स्थान पर चुपड़ कर बाँध दें। देह में दर्द आदि होने पर भी इस तेल से लाभ होगा। मदार की पत्ती पीस कर लेप करने से भी दर्द शान्त होता है।

श्वाँस रोग में 2 तोला मदार की जड़ का छिलका, 1 तोला मदार का दूध तथा 1 तोला कालीमिर्च सबको पीसकर उर्द के बराबर गोलियाँ बनायें। दिन में तीन बार खिलाए, ऊपर से ठण्डा पानी पिएं इससे लाभ होगा।

मदार के पत्ते का रस निचोड़ कर गर्म करके कान में डालें तो कान के दर्द को लाभ हो। यदि कान बहता हो तो नीम की पत्ती से धोकर यही रस डालें तो लाभ होगा।

यदि सर्दी से सिर दर्द हो तो मदार के फूल के जीरे का गरम पानी में पीस कर गरम करके मस्तक पर लेप किया जाय तो तुरन्त सर दर्द ठीक हो।

कालरे में 1 तोला मदार के फूल 1 तोला पत्थर चट्टा ऊँचा वाला (पुनरनवा) की हरी जड़ 1 तोला लाल मिर्च, तीनों को महीन पीसकर गोली बना ले, उर्द के बराबर। नीबू के रस में पीसना चाहिए। सम्भव न हो तो पानी में ही सही। यदि रोग की प्रथम अवस्था है तो एक-एक घण्टे बाद एक या दो गोली देते रहें, जब तक उसका जोर कम न हो जाय। यदि रोग के पहले इसे खालें, तो हैजा हो ही नहीं सकेगा। रोग की बढ़ी हुई हालत में दो-दो घण्टे बाद दो-दो गोली दें। शरीफे की पत्ती उबाले, वही पानी पिलाया जाय और उसी के साथ गोली खिलायी जाय। पानी ऐसे तैयार करें, आध पाव सौंफ लें, आध सेर खूब साफ करके शरीफे की हरी पत्तियाँ लें। 5 सेर जल में उबाले, जब 4 सेर रह जाय तो साफ कपड़े में छान कोरी हाँड़ी में रख, दो तोला साधारण नमक मिला ले। यह जल खूब पिलाये।

दाद में भी यदि मदार की पत्ती का रस मला जाय तो लाभ होगा। सखी खुजली में भी मदार की पत्ती का रस 1 छटाँक, आध पाव कडुआ तेल, सादा नमक दो तोला मिलाकर आग में चढ़ाओ। जब तेल मात्र रह जाय, तो ठण्डा करके दो दिन बाद शरीर में मलें।

आँखें उठने पर दोनों पैरों के अँगूठे की नसों पर मदार का दूध लगा दें। इस बात का ध्यान रहे कि यह दूध आँख में न लगने पाए।

इस प्रकार हमने मदार के कुछ साधारण उपयोग देखे। मदार सी साधारण तथा हर जगह पाई जाने वाली चीज से भी हम कितना लाभ उठा सकते हैं।

दूर के गाँवों में, जहाँ दवाखाने, अस्पताल या वैद्य डॉक्टर या हकीम नहीं हैं, वहाँ यदि प्रकृति की शरण ली जाय तो बहुत कुछ लाभ हो सकता है। जिनके पास डाक्टरों का बिल चुकाने का पैसा नहीं है, वे प्रकृति माता की शरण ले सकते हैं। जिस प्रकार रोगी या घायल की प्राथमिक चिकित्सा हम डाक्टरों के न आने तक करते हैं, उसी प्रकार यह छुटपुट घरेलू नुस्खे भी साधारण रोगों या साधारण अवसरों पर हम प्रयोग करें तो समय, पैसा, परेशानी और परिश्रम, सबसे हमारी बचत होगी।


माता से बड़ा और कोई देवता नहीं

माता ही संसार में अधिक पूज्या है। ‘न मातुः परदैवतम्’। इस भौतिक शरीर को जन्म देने वाली प्राकृत शरीर धारिणी माता, उन्हीं परम माता का एक स्वरूप है। माता और पिता लौकिक दृष्टि में एक दूसरे से भिन्न होते हैं, परन्तु अलौकिक दृष्टि सम्पन्न आप्त यह बतलाते हैं कि परम माता और परम पिता एक ही हैं। एक ही में ये एक साथ दो रूप हैं, इसलिए एक से दूसरे का ध्यान भी हो जाता है, शिशु को गोद में उठा लेने की जो उत्सुकता है, संक्षेप में जो वात्सल्यता वह पितृ रूप में एक विलक्षण गम्भीरता के भीतर छिपा हुआ है, उसे व्यक्त करने वाली माता ही है। पिता और पुत्र के बीच में माता हैं। ‘मातृदेवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव।’

इत्यादि मन्त्रों में माता को ही सबसे पहला स्थान दिया गया है। इसका भी यही कारण है कि माता ही आदि गुरु है और उसी की दया अनुग्रह के ऊपर बच्चों का ऐहिक, परलौकिक और परमार्थिक कल्याण निर्भर रहता है।

मात्रा भवतु संमनाः (अर्थव वेद 3।30।2)

इस लेख का शीर्षक समस्त पद है, जिसका अर्थ है ‘उदर में गर्भ व शरीर को धारण करने वाली पूजनीय माता की महत्ता’ जैसा कि इसके निर्वचन से सिद्ध है। माता शब्द अत्यन्त प्रिय और बहु व्यापक है एवं जननी, जनित्री, जनयित्री, प्रसू-ये माता के पर्याय हैं। माता की महिमा के विषय में श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास में एवं नीति ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा मिलता है। भगवती श्रुति उपदेश देती है—मातृ देवो भव। (तैत्तिरीय 1।11) अर्थात्—हे मनुष्य! इष्टदेव समझ कर माता की सेवा कर। स्मृति का वचन है —

उपाध्यायनदशाचार्य आचार्याणाँ शतं पिता।

सहस्त्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥

अर्थात्- एक आचार्य गौरव में दस उपाध्यायों से बढ़ कर है। एक पिता सौ आचार्यों से उत्तम है एवं एक माता सहस्र पिताओं से श्रेष्ठ है, पालन पोषण करने के कारण माता की पदवी सब से ऊँची है।

गर्भ धारणपोषाद्धि ततो माता गरीयसी।

माता के विरुद्ध आचरण सन्तान को किसी भी दशा में नहीं करना चाहिए। पुत्रों के लिए माता परम पूजनीय है। माता के होते हुए उनको किसी दूसरे देवता की पूजा की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि शास्त्र का अनुशासन है—

मातृतोऽन्यो न देवोऽस्ति तस्मात्पूज्या सदा सतैः।

इस वचन से इन्द्रादि देवताओं की सत्ता का खण्डन अभिप्रेत नहीं है। माता में देववत् पूज्य बुद्धि रखना ही पुत्र का कर्त्तव्य है और इसी को शास्त्र सिखाता है। धर्मशास्त्रियों का कथन है—

मातुश्च यद्धितं किंचित्कुरुते भक्तितः पुमान्।

तर्द्धमंहि विजनीयाँदेवं धर्म विदो बिदुः॥

अर्थात्- माता की प्रसन्नता के लिये मनुष्य भक्ति पूर्वक जो कार्य करता है, वही उसके लिए धर्म है। गृहस्थ व्यक्ति की बड़ी तपस्या इसी में है कि वह माता की सेवा उसको जगन्माता आद्यशक्ति समझ कर और पिता की सुश्रूषा परात्पर ब्रह्म मान कर करें, क्योंकि माता पिता की प्रसन्नता ही सब धर्मों का मूल है—

त्वमाद्ये जगता माता पिता ब्रह्म परात्परम्।

युवायोः प्रीणनं यस्मात्तस्मात्किं गृहिणाँ तपः॥

नीतिकारों का मत है—

मातृष्वसा मातुज्ञ्लानी पितृव्यस्त्री पितृष्वसा।

श्वश्रूः पूर्वज पत्नी च मातृतुल्याः प्रकीर्तिताः॥

अर्थात्- मौसी, मामी, चाची, ताई, बुआ, सास और मामी ये सब माता के समान हैं। महर्षि मनु का उपदेश है—

पितुर्भगिन्याँ मातुश्च ज्यायस्याँ च स्वदपि।

मातृवद्वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी।॥

अर्थात्- पुरुष को चाहिए कि वह बुआ, मौसी और बड़ी बहिन के साथ माता का सा व्यवहार करें और अपनी सगी माता तो इनसे भी बड़ी है ही। ब्रह्म वैवर्त पुराण में अन्य पन्द्रह महिलाओं को माता की पंक्ति में बैठाया है। वेदशास्त्र विहित उन सोलह प्रकार की माताओं का उल्लेख इस प्रकार है—

स्तन्यदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरु प्रिया।

अभीष्ट देव पत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥

सगर्भजा च या भगिनी स्वामिपत्नी प्रियाप्रसुः।

मातुर्माता पितुर्माता सोदसस्य प्रिया तथा ॥

मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानि तथैव च।

जनानाँ वेदबिहिताँ मातरः षोडश स्मृताः॥

अर्थात्- दूध पिलाने वाली (धाय) गर्भ धारण करने वाली, भोजन देने वाली, गुरु पत्नी, इष्टदेव की पत्नी, सौतेली माँ, सौतेली माँ की पुत्री, सगी बड़ी बहिन, स्वामी की पत्नी, सास, नानी, दादी, सगे बड़े भाई की पत्नी, मौसी, बुआ और मामी ये सब मिला कर सोलह माताएं हैं।

लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि जब मनुष्य पर कोई संकट पड़ता है तब वह “अरी मेरी मैया” कह कर माता का ही स्मरण करता है। ‘आपदि मातैव शरणाम्।’ माता के समान शरीर का और कोई पोषक नहीं है—

माता समं नास्ति शरीर पोषणाम्।

इसका कारण यही है कि अहैतुक स्नेह करने वाली माता ही एक ऐसी है, जिसका प्रेम सन्तान पर जन्म से लेकर शैशव, बाल्य, यौवन एवं प्रौढ़ावस्था तक एक सा बना रहता है। माता का यह प्रेम केवल मनुष्य योनि तक ही सीमित नहीं है। वह तो पशु, पक्षी, जलचर, स्थल चर आदि अन्य योनियों में भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। चिड़िया और कुक्कुटी अड्डे रख कर कुछ दिन उनको सेती हैं और बच्चे निकल आने पर दाना चुगा चुगा कर तब तक उनका पालन-पोषण करती हैं, जब तक पर निकल आने से उनमें स्वयं उड़ने और दाना चुगने की शक्ति नहीं आ जाती। कच्छपी दूर रह कर भी अपने अड्डों को भगवत्प्रदत्त अपनी अनुस्मरण शक्ति से ही बच्चे निकलने तक सेती है। एवं गाय, भैंस, बकरी, कुतिया, बिल्ली आदि भी बच्चे जन कर बाहरी आपत्तियों से तब तक उनकी रक्षा करती हैं, जब तक वे माता का दूध छोड़ कर घास-फूस आदि खाद्य पदार्थ खाकर आत्म निर्भर नहीं हो जाते। वानरी तो स्नेह-पाश में इतनी बद्ध रहती है कि मृत शावक को भी कई दिनों तक छाती से लगाये फिरती है। स्नेह की प्रबलता में असमर्थ होने पर भी अपनी सन्तान को विपत्ति से बचाने के लिए जान जोखिम में डाल कर आक्रमणकारी पर प्रत्याक्रमण करने का शक्ति भर प्रयास करती है चाहे इसमें वह सफल हो या विफल। सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक मातृ मण्डल की महत्ता लोक और वेद में जागरुक है। स्नेहमय माता की सब से बड़ी अभिलाषा यही रहती है, मेरा पुत्र चिरायु हो और इसके साथ ही निरोग, विद्वान, बलवान, धनी, धार्मिक एवं सर्व गुण सम्पन्न बने।

माता कुन्ती ने पांडवों को धर्म पर दृढ़ रखते हुए क्षात्र धर्म और प्रजा पालन करने का उपदेश और आशीर्वाद दिया था। धर्म प्राणा गान्धारी ने अपने दुराग्रही पुत्र सुर्योधन को असन्मार्ग से हटा कर सन्मार्ग पर लाने के लिये समादान द्वारा राजनीति और धर्म नीति के उत्तमोत्तम उपदेश दिये थे। माता कौशल्या को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम की जननी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। माता कैकेयी और सुमित्रा ने क्रमशः भरत और लक्ष्मण, शत्रुघ्न जैसे पुत्रों को जन्म दिया, जिन्होंने धीरता, वीरता, भ्रातृ-प्रेम और भगवद्भक्ति का जीता जागता आदर्श स्थापित कर संसार का महान् उपकार किया है। प्रातः स्मरणीय माता देवकी ने पोडश कलावतार उन भगवान् श्रीकृष्ण को जन्म दिया था, जिन्होंने भगवद्गीता के सदुपदेश एवं पावन चरित्रों से भक्त को भवसागर से पार उतारने का मार्ग दिखाया। इस प्रकार अन्यान्य अनेक स्नेहमयी योग्य माताओं के नाम दिये जा सकते हैं। धन्य हैं वे सज्जन, जो अहैतुक स्नेह करने वाली परम सुहृद् माता की सेवा कर महर्षि सुमन्तु के वचनानुसार इस लोक और परलोक में सुख के भागी होते हैं।

आयुः पुमान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुण्यं बलं श्रियम्।

पशुँ सुखं धनं धान्यं प्राप्नुयान्मातृ वन्दनात्॥

अर्थात्- ‘माता की सेवा करने वाला सत्पुरुष दीर्घायु, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुण्य, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख, धन, धान्य, सब कुछ प्राप्त कर सकता है। इसके विपरीत हत भाग्य हैं वे लोग, जो सर्व सुखसम्पादयित्रि हितैषिणी माता के विरुद्ध रहते हैं। ऐसों के लिए शास्त्र की यह भर्त्सना है—

धिगस्तुजन्म तेषाँ वै कृतघ्नानाँ च पापिनाम्।

ये सर्वसौख्यदा देबीं स्वोपास्याँ न भजन्ति वै॥

अर्थात्- धिक्कार है उन कृलष्ण, गुनमेटे, पापी दुर्जनों को, जो सर्वसौख्यादा माता की सेवा—शुधषा नहीं करते। जगती तल में उनका जन्म लेना वृथा है।

जियतु मातु सों दंगम दंगा।

मरीं मातु पहुँचावें गंगा॥

भारतवर्ष सदा से मातृ वर्ग का सेवक रहा है। जाति, व्यक्ति, समाज और देश का सौभाग्य, सच्ची हितैषिणी माता के ही ऊपर निर्भर है। उपर्युक्त पंक्तियों से यही निष्कर्ष निकलता है कि माता पद सब से ऊँचा है इसलिए सभी स्त्री पुरुषों का कर्तव्य है कि वे परम धर्म समझ कर माता की सेवा-सुश्रूषा अवश्य करें, करावें जिससे इस लोक में यश और परलोक में सुख प्राप्त हो। माता का स्थान वस्तुतः स्वर्ग से भी ऊँचा है।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

माँ के उपदेशों पर ध्यान दो। उनके सारे उपदेश तुम्हारी भलाई के लिए ही हैं। माँ की सेवा करो, श्रद्धा शक्ति बढ़ाओ। झूठे तर्क न करो, तर्कों से कभी भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती। माता पिता के लिए तर्क करना उनका अपमान करना है, अतएव तर्क छोड़ कर माँ के भक्तों की वाणी पर विश्वास करो और श्रद्धा पूर्वक माँ की सेवा में लगे रहो, क्योंकि जीव मात्र को माता सबसे अधिक प्रिय और श्रद्धेय होती है। माता जैसा कोमल, दयालु हृदय किसी का भी लोक में दृष्टिगोचर नहीं होता। सन्तान कैसी भी दुष्ट से दुष्ट, स्वेच्छाचारी, मातृ सेवा से विमुख क्यों न हो, फिर भी माँ अपनी ऐसी सन्तान की भी सैदव हितैषिणी रहती है और स्वयं सन्तान की सेवा करके प्रसन्न होती है। अपनी संतान का वह कभी त्याग नहीं करती है। माँ शब्द में कितना प्रेमामृत भरा हुआ है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। पुत्र जब अपनी माँ को माँ, माँ, कहकर पुकारता है तब माता का हृदय प्रेम से भर आता है।

माता ही एक ऐसी वस्तु है जिसे कोई बदल नहीं सकता। माता चाहे जैसी हो वह माता ही रहेगी। चाहे सन्तान उससे घृणा करे या उस पर गर्व, माता को बदल देना उसकी शक्ति के परे है। विलासी आदमी पत्नियों को बदल सकते हैं, भाई-भाई से चिड़ कर उसे त्याग सकता है, पर माता तो माता ही रहेगी। चाहे वह गौरव शालिनी हो अथवा अपमानित हो, विश्व माता को माँ के भीतर देखा जा सकता है। प्रार्थना करने पर माँ कृपा करती है, रोने से माँ सुनती है। याद रखिये, बिना रोये माँ दूध नहीं देती है।

—कल्याण से


‘गायत्री स्मृति’ की अमूल्य शिक्षाएं

गायत्री स्मृति में में कुल 15 श्लोक हैं। पर इनमें सन्निहित शिक्षाएं अमूल्य हैं। यह 20 शिक्षाएं इतनी सार गर्भित और महत्वपूर्ण हैं कि इन्हें जीवन नीति बना लिया जाय तो मनुष्य की सभी लौकिक और परलौकिक समस्याएँ सुलझ सकती हैं। साथ ही राष्ट्रों, जातियों, वर्गों और व्यक्तियों के बीच में जो भारी मनोमालिन्य चल रहा है, उसका निवारण होकर संसार में सतयुगी शान्ति की स्थापना हो सकती है।

गायत्री के एक-एक अक्षर पर, गायत्री स्मृति के एक-एक श्लोक का निर्माण हुआ है। पाठक मनोयोग पूर्वक इन शिक्षाओं पर विचार करेंगे, तो इन सिद्धान्तों की उपयोगिता को भली प्रकार जान लेंगे।

गायत्री स्मृति

भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषुहि।

स एवं तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥1॥

भूर्भुवः और स्वः ये तीन लोक हैं। उन तीनों लोकों में ओम् ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस ब्रह्म को जानता है वह ही वास्तव में ज्ञानी है।

तत्वज्ञास्तु विद्वान्सा ब्राह्मणः स्वतपश्च थै।

अन्धकारमपाकृर्यु लोंकादज्ञानसम्भवम् ॥2॥

तत्वदर्शी विद्वान् ब्राह्मण अपने एकत्रित तप के द्वारा संसार में अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को दूर करें।

सत्तावन्तस्तया शूषः क्षत्रियो लोकरक्षकाः।

अव्यायाशक्ति सम्भूतान् ध्वंसयेयुर्हि व्यापदः ॥3॥

सत्तावान् वीर संसार के रक्षक, क्षत्रिय अन्याय और अशक्ति से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों को नष्ट करें।

वित्तशक्त्या तु कर्त्तव्या उचिताभाव पूर्तयः।

न तु शक्त्या नया कार्य दपौंद्वत्यर्प्रशनम् ॥4॥

धन की शक्ति द्वारा तो उचित अभावों की पूर्ति करनी चाहिए। उस शक्ति द्वारा घमंड और

तुषाराँणाँ प्रतापेऽपि प्रयत्नो धर्म आत्मनः।

महिमा च प्रतिष्ठा च प्रोक्तोऽपारः श्रमस्यहि॥5॥

तुषारापात में भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म है। श्रम की महिमा और प्रतिष्ठा अपार है ऐसा कहा गया है।

वद नारी बिना कोऽन्यो निर्माता मनुसन्ततेः।

महत्वं रचनाशक्तेःस्वस्याः नार्या हि ज्ञायताम्॥6॥

नारी के बिना मनुष्य को बनाने वाला दूसरा और कौन है अर्थात् मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। नारी को अपनी रचना शक्ति का महत्व समझना चाहिए।

रेवेव निर्मला नारी पूजनीया सता सदा।

यतो हि सैव लोकऽस्मिन साक्षालक्ष्मी माता वुधैः ॥7॥

सज्जन पुरुष को हमेशा नर्मदा नदी के समान निर्मल नारी की पूजा करनी चाहिए क्योंकि विद्वानों ने उसी को इस संसार में साक्षात लक्ष्मी माना है।

न्यस्यन्ते ये नराः पादान पृकृत्ज्ञानानुसारतः।

स्वस्थाः सन्तस्तु से नूनं रोगमुक्ता भवन्ति हि ॥8॥

जो मनुष्य प्रकृति की आज्ञानुसार पैरों को रखते हैं, अर्थात् प्रकृति की आज्ञानुसार चलते हैं वे मनुष्य स्वस्थ होते हुए निश्चय ही रोक को मुक्त हो जाते हैं।

भवोद्विग्नमना नैव हृदुद्वेगं परित्यज।

कृरु सर्वास्ववस्यासु शान्तं सन्तुलितं मनः॥9॥

मानसिक उत्तेजना को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शान्त और संतुलित रखो।

गोप्याः स्वीया मनोवृत्तीर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।

स्थितिमन्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुपमाचरेत्॥10॥

अपने मनोभावों को नहीं छिपाना चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरे की स्थिति को देखकर उसके अनुसार आचरण करे।

देयानि स्ववशे पुँसा स्वेन्द्रियाण्यखिलानि वै।

असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्येतानि स्वामिनम्॥

मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने वश में रखनी चाहिये। ये असंयत इन्द्रियाँ स्वामी को खा जाती हैं।

वसताँ ना पवित्रः सन् वाह्यतोऽभ्यन्तरस्तथा।

यतः पवित्रतायाँ हि राजतेऽतिप्रसन्नता॥12॥

मनुष्य को बाहर और भीतर सब तरफ से पवित्र होकर रहना चाहिए, क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।

स्यन्दनं परमार्थस्य परार्थो हि बुधैर्मतः।

योऽन्यान् सुखयते विद्वान् तस्य दुःखं विनश्यति॥

दूसरे का प्रयोजन सिद्ध करना परमार्थ का रथ है, ऐसा बुद्धिमानों ने कहा है। जो विचारवान् दूसरे लोगों को सुख देता है, उसका दुःख नष्ट हो जाता है।

धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्येकस्याँ हि समुन्नतौ।

कृयतामुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशासु जीवने॥14॥

धीर पुरुष को एक ही प्रकार की उन्नति में सन्तुष्ट न रहना चाहिए। मनुष्य को जीवन में सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।

महेश्वरस्य विज्ञाय नियमान्न्याय संयुतान्।

तस्या सत्ताँ च स्वीकुर्वन् कर्मणा तमुपासयेत॥

परमात्माँ के न्यायपूर्ण नियमों को समझकर और उसकी सत्ता को स्वीकार करते हुए कर्म से उस परमात्मा की उपासना करे।

हितं मत्या ज्ञानकेन्द्रं स्वातन्त्र्येण विचारयेत्।

नान्धानुसरणं कुर्यात कदाचित् कोऽपिकस्यचित्॥

हितकारी ज्ञान केन्द्र को समझ कर स्वतंत्रता पूर्वक विचार करे। कभी भी कोई किसी का अंधानुसरण न करे।

धिया मृत्युँ स्मरेर्न्मम जानीयाज्जीवनस्य च।

तदा लक्ष्यं समालक्ष्य पादौ सन्ततमाक्षिपेत् ॥17॥

बुद्धि से मृत्यु को ध्यान रखे और जीवन के मर्म को समझे, तब अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अपने पैरों को चलावें। अर्थात् निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।

यो धर्मो जगदाधारः स्वाचरणो तमानय।

मा विडम्बय तं स ह्येका मार्गे सहायकः ॥18॥

जो धर्म संसार का आधार है, उस धर्म को अपने आचरण में लाओ। उसकी विडम्बना मत करो। वह तुम्हारे मार्ग में एक ही अद्वितीय सहायक है।

योजनं व्यसनेभ्यः सस्यात्तानि पुँसस्तु शत्रवः।

मिलित्वैतानि सर्वाणि समये ध्नन्ति मानवम्॥

व्यसनों से योजन भर दूर रहे, अर्थात् व्यसनों से बचा रहे, क्योंकि वे मनुष्य के शत्रु हैं। ये सब मिलकर समय पर मनुष्य को मार देते हैं।

ना श्रृण्वेकीमिताँ वार्तां “जागृतस्त्वं सदा भव”।

स्वपमाणं नरं नूनं ह्याक्रामन्ति विपक्षिणः ॥20॥

हमारी इस एक बात को सुनो कि ‘तुम हमेशा जागृत रहो’ क्योंकि निश्चय ही सोते हुए मनुष्य पर विपक्षी आक्रमण कर देते हैं।

प्रकृते स्तु भवोदारो नानुदारः कदावचन।

चिन्तयोदार दृष्ट यैव तेन चितं विशुद्ध यति ।21।

स्वभाव से ही उदार होओ कभी भी अनुदार मत बनो उदार दृष्टि से ही विचार करो ऐसा करने से चित शुद्ध हो जाता है।

चोदपत्येव सत्संगे धियमस्य फ लं महत्।

स्वमतो सज्जनै विद्वान् कुर्यात् पया्रवृतं सदा।22॥

सत्संग बुद्धि को प्रेरणा देता है। इस सत्संग का बल महान है इसलिये विद्वान अपने आपको हमेशा सत्पुरुषों से घिरा हुआ रखें अर्थात् सज्जनों का संग करें।

दर्शन ह्मात्मनः कृत्वा जानीयादात्म गौरवम्।

ज्ञात्वाँ तु तत्तदात्मानं पूर्णोंन्नतिपथं नयेत्।23।

आत्मा का दर्शन करके आत्मा के गौरव को पहचानो उसको ज्ञान कर तब आत्मा को पूर्ण उन्नति के मार्ग पर ले चलो।

यायात्स्वोत्तरदायित्वं निवहन् जीवने पिता।

कुपितापि तथा पापः कुपुत्रोऽस्ति यथा यतः।24।

पिता अपने उत्तरदायित्व को निभाता हुआ जीवन में चले क्योंकि कुपिता भी उसी तरह पापी होता है जैसे कुपुत्र होता है।

तथाचरेत्सदान्येभ्यो वाञ्च्छत्यंन्यैर्यथा नरः।

नम्र, शिष्टा, कृतशश्च सत्यसाहाय्यवान् भवन्।

मनुष्य दूसरे के साथ उस प्रकार का आचरण करे जैसा वह स्वयं के साथ चाहता है। और उसे नम्र शिष्अ कृतज्ञ और सच्चाई के साथ सहयोग की भावना वाला होना चाहिए।


माता की प्रेरणा का अनेक आत्माओं में प्रकाश

गत मास गायत्री प्रचार के महत्व के सम्बन्ध में प्रकाश डालते हुए गायत्री प्रेमियों से एक संगठन सूत्र में आबद्ध होने एवं गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने के सम्बन्ध में अनुरोध यिका गया था। हर्ष की बात है कि अध्यात्म मार्ग में प्रेम रखने वाले महानुभावों ने इस ओर समुचित ध्यान दिया। इसे ईश्वरीय प्रेरणा ही समझना चाहिए कि ऐसी साधारण प्रार्थना का विज्ञ महानुभावों पर समुचित प्रभाव हुआ।

यह भोग और स्वार्थ का युग हे। मनुष्यों को लोभ, तृष्णा, स्वार्थ, वासना एवं बहुमुखी आवश्यकताएं जुटाने से फुरसत नहीं मिलती। धनी हो या निर्धन, विद्वान हो या मूर्ख, आत्म कल्याण की ओर किसी की रुचि नहीं होती। लोग भौतिक समस्याओं में इस कदर उलझे होते हैं कि आत्म कल्याण की ओर बढ़ना तो दूर उस सम्बन्ध की बात सुनना तक भारी मालूम पड़ता है। ऐसे भोगवादी विकट वातावरण में, संयम, तप, साधना, परमार्थ आत्म निमार्ण की ओर किन्हीं विरलों का ही ध्यान जाता है। इसलिए आमतौर से धर्म प्रचारक अपने प्रयत्न के परिणामों के सम्बन्ध में प्रायः निराश ही रहते हैं।

भगवती जिनकी आत्मा में प्रकाश देती हैं उन्हें कल्याण की ओर चलने के लिए भीतर से उत्साह पैदा होता है और उस उत्साह से प्रभावित होकर जब कोई व्यक्ति आत्म लाभ की ओर अग्रसर होता है तो उसे तत्व ज्ञान और अमृता स्वादन होने लगता है फिर उसका पैर पीछे नहीं हटता और लक्ष को प्राप्त कर ही लेता है। कठिनाई केवल प्रारम्भिक श्रद्धा, विश्वास और उत्साह की है। यह बाधा बिना प्रभु की कृपा के नहीं हटती। हम प्रत्यक्ष दे रहे हैं कि इस बुरे वातावरण में भी अनेकों को सतयुगी प्रकाश प्राप्त हो रहा है और वे कल्याण पथ पर बड़े उत्साह के साथ बढ़ रहे हैं। यदि यह प्रगति इसी प्रकार जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब भारत सन्तान अपने खोये हुए आत्म बल को प्राप्त करके आत्मिक दृष्टि से जगद्गुरु और लौकिक दृष्टि से “भू सुर” कहलाने की अधिकारिणी बनेगी।

प्रभु जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे तप करने की प्रेरणा देते हैं। हम देखते हैं कि वैसी कृपा अनेक आत्माओं को प्राप्त हो रही है। तप एक प्रत्यक्ष बल है जिसके बदले में सब प्रकार के सुख मिलते हैं। गायत्री सबसे बड़ी विधि, सबसे श्रेष्ठ तपश्चर्या, सबसे प्रचंड शक्ति है, इस ऋषियों की महान शोध से लाभान्वित होने के लिए लोगों का इतना उत्साह देखकर हमारा अन्तःकरण आशा और विश्वास से भ्र जाता है और भविष्य बहुत ही आशा जनक दिखाई पड़ता है।

सब दृष्टियों से दुखी और दीन हीन बने मनुष्य को माता अपनी कृपा का वरदान देकर उसके समस्त पाप पापों का शमन करेंगी, इसका एक अत्यन्त स्पष्ट प्रमाण वह उत्साह है जिससे तरगंति होकर अनेक व्यक्ति साधना पथ पर अग्रसर हो रहे हैं और माता के चरणों में अपना मस्तक झुका रहे हैं। गायत्री प्रचार और गायत्री उपासकों का एक सूत्र में आबद्ध होना भी इसी आध्यात्मिक सूर्योदय की करुण किरणें हैं। आइए इन किरणों का समुचित आदर करें।

इस मास (गायत्री) संस्था के सदस्य बनने वाले (2) अपना गायत्री पुस्तकालय आरम्भ करने वाले (3) गायत्री प्रचार में सहयोग देने वाले महानुभावों की शुभ नामावली -

1. बा. केदारनाथ सिंह सी ही, पटना

2. डा. जे. आर. परदेशी, मोमिनाबाद

3. कविराज गोविनदचन्द्र मिश्र, निमचौरी, कटक

4. श्री कार्तिकचरनधेष, झालदी, मानभूम

5. श्री वी.पी. देव, मस्कतीमारकेट अहमदाबाद

6. श्री हरसुखदास रामप्रताप बीकानेर

7. श्री दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव कजहा बहरायच

8. श्री रामप्रताप शर्मा, टूँटड़ा, आगरा

9. श्री हरदयालजी श्रीवास्तव गोहाड़ हमीरपुर

10. पं. बंकिलाल शर्मा मालगोदाम, फ र्रुखाबाद

11. श्री बालकृष्ण अग्रवाल, ट्रेसर, जबलपुर

12. श्री सुखलाल जी बाँकोली, बरेली

13. पं. भगवानदास शर्मा अशोकपुर, रामपुर

14. श्री सुमेरचन्दगुप्ता, ओबरसीयर फ रीदाबाद

15. श्री मौजीराम भारद्वाज, ककराझर

16. श्री लछमनदास सन्तलाल आहूजा, बम्बई

17. जोशी तुलसीराम शंकरलाल, शाहपुरा

18. श्री पी.एस. शिवलकर, भाटापारा

19. श्री रामेश्वरजी पुष्करनदत्त वैद्य, बेटाषद

20. श्री रुपरामचौये, कुउारी उमरिया, जबलपुर

21. श्री कन्हैयालाल राठी, गाँधीगंज जबलपुर

22. श्री भगौतीलाल जी अहलसद, नाँनपरा

23. पं. लक्ष्मीनारायण शर्मा र्क्लक, अक्लेहरा

24. श्री जीवराम किशनदास ठक्कर, अहमदाबाद

25. श्री चतुरभुज राजाराम मेहता डोंगरगढ़

26. श्री रामबली रामजीवन, सौताबार्ढी नागपुर

27. पं. श्रीकृष्ण भवरलाल पंसारी, बाराँ, कोटा

28. श्री बंशीधर प्रहलादराय, नानपरा बहरायचन्द

29. श्री आर. एल. जयसवाल, कलकत्ता,

30. श्री बैजनाथ त्रिवेदी मुन्शी, जबलपुर

31. श्री कुन्दनलाल प्रेमप्रकाश, धुरीमण्डी, पेण्सु

33. पं. परसादीलाल शमा्र दिनेश, कराहल

34. श्री अशफ ीलाल जी मुतावर, बिजनौर

35. श्री रंगनाथ नाना वारडे, सावदा, खानदेश

36. एस. वेंकोवाराव टह्वीचर, बेल्लारी

37. श्री इन्द्रदेव पाण्डेय, अस्कोठ, अलमोड़ा

38. श्री हरमानभाई सीमाभाई पटेल, सादानपुरा

39. श्री रामदास विष्णु पटेल, साबदा खानदेश

40. श्री महादेवप्रसाद वकील, गोलोगंज गोंड़ा

41. श्री वैद्य लक्ष्मीनारायण शर्मा घाटौली कोटा

42. श्री जे.एच. हैजिस्टे, भद्र, अहमदाबाद

43. श्रीहरनारायण शर्मा, मदनगंज (राजस्थान)

44. श्री मदनलाल प्राणजीवन गान्धी, नवसारी

45. श्री जटाशंकरजी नान्दी, पाटन (गुजरात)

46. श्री वैद्य रामशरन जी, सरधना (मेरठ)

47. श्री धर्मपाल सिंह कालमपुर (अलीगढ़)

48. श्री वृजमोहनप्रसाद गुप्ता, हजारीबाग

49. पं. पेमचन्द्र गुप्ता, दरीवाकला, देहली

50. पं. अयोध्याप्रसाद दीक्षित, सूर्यनगर कानपुर

52. पं. छदामीलाल पटेल भालगुजार, जबलपुर

53. पं. पी.एस. राम शर्मा, श्रीनिवासपुरम्

54. श्री गनपतराज जी, नन्दनिवास शिमला

55. बाँकेबिहारीलाल जी पोस्टमा. मदवर

56. श्री सीताराम पुरोहित एकाउूण्ट, सागर

57. श्री राजाजीराम वर्मा टीचर, हलद्वानी

58. श्री दयाशंकर वर्मा पायदान फ तेहपुर

59. जानकीप्रसाद हजारीलाल सराफ दमोह

60. श्री भोलानाथ ठाकुरप्रसाद बक्सर आरा

61. श्रीमास्टर रामचन्द्रसिंह, स्याऊ बिजनौर

62. श्री गोपालसिंह, नरपतनगर (बिहार),

63. श्री परमालसिंह जी, हरनबाड़ा

64. स्वामी योगानन्द, खानपुर

65. श्री ब्रहासेवक अवस्थी, हटिया कानपुर

66. श्री विश्वनाथ पाण्डेय, मिर्जापुर

67. श्री भगवानसिंह यादव, ब्रकस मैन, दमोह

68. श्री विष्णुभक्तराज गोरखा, जयगाँव

69. श्री रामस्वरुप गुप्त, बिड़लानगर ग्वालियर

70. श्री एन. वी. महोरे आमला, बेतूल

71. श्री कमलाप्रसाद श्रीवास्तव, डेड़तलार्इ्र

72. पं. महेश्वरनाथ जी रनवीरगंज काश्मीर

73. श्री सरयूराम जी कलक्ट्रेट, शाहाबाद

74. पाण्डे केशवलाल गिरधारीलाल,परान्तिज

75. श्री लोकथजी मालगुजार, धठुली रह्वायपुर

76. श्री के. पी. त्रिवेदी, देवेन्द्र नगर

77. श्री राध कृष्ण अग्रबाल इंजीनियर, दिल्ली

78. श्री रामचन्द्रलाल वैद्य, दीघाघाट, पटना

79. श्री रामप्रकाश बाजपेयी, एकाउन्टेन्ट दिल्ली

80. श्री सालिगराम दवे र्क्लक, बीनी सागर

81. श्री जयन्तीलाल त्रिवेदी, पावी गुजरात

82. श्री जगदीशनारायण वर्मा, ईाहाबाद

83. पं. जयलाल शर्मा, बालमुन्द, हिसार

84. पं. पूरनलाल त्रिवेदी, दीक्षितपुरा जबलपुर

85. पं. मोतीलाल शर्मा आरंग रह्वायपुर

86. श्री जगन्नाथप्रसाद रनमस्तपुर बाँदा

87. श्री रामसेवक मिश्र, पोटरखोली खरगपुर

88. पं. जगन्नाथप्रसार शास्त्री, साक्ची सराय

89. पं. वैजनाथ प्रसाद शुल्क, न्यूमारकेट कलकत्ता

90. व्यास वालकिशन मुखिया पुराना हवड़ा

91. श्री रामचन्द्रशर्मा मुख्तार, बुलन्दशहर

92. श्री विशनस्वरुप भटनागर, मिर्जापुर

93. पं. गुनेराम भूताजी शर्मा, बर्िरा (सिरोही)

94. ठा. बद्रीसिंह, शाहपुर, बाँदा

95. श्री द्वारिकाप्रसाद जी मेहुनवाड़ा, खानदेश

96. श्री राधाकिशन मालवीय, खाते गाँव

97. श्री चन्दवर शास्त्री, डोरनहल्ली, दक्षिण

98. पं. भगवानदीन त्रिवेदी, हरदोई

99. श्री ब्रहादेव रऽरायणसिंह, सिरधाचक पटना

100. श्री सीतारामसिंह, कोरियावा, पटना

101. श्री विनायक प्रसाद परया, बस्तर

102. श्री सोनेलाल पटेल, धर्मपुरा, जबलपुर

103. पं. बासुदेव जोशी, काव्यतीर्थ, चूरु

104. श्री कैलाशनारायण जी चौधरी, कानपुर

105. पं. बाबूलाल र्श्मा र्क्लक, दोराहा भोपाल

106. श्री छह्वोटेलाल गुप्ता कैथी बऽरस

107. पं. द्वारकाप्रसाद शर्मा, करेरा

108. श्री वृन्दावनलाल एकाउन्टेण्ट करेरा

109. श्री सीताराम पाइक हैडमास्टर उदगवाँ

110. श्री रामगरीब गुप्ता कलहीवहरा, रायपुर

111. राना नवनीतलाल मनसुखलाल, झोलोद

112. श्री हासू भाई द्विवेदी, ध्राँगध्रा

113. श्री राम विहार प्रसाद, चौक, आरा

114. श्री सीताराम साह, कोरिआवाँ, पटना

115. श्री आर.डी. पटेल, एग्रिको, लिंहभूम

116. श्री परसराम शाह अध्यापक, नरवदा द्रुग

117. पं. गुद्दीलाल शर्मा, शंडोल, रीबा

118. श्री इनद्रजीत जी, निकलसन रोड, दिल्ली

119 . श्री ब्रहादेव बुप्ता, गोधनाबाजार इलाहाबाद

-क्रमशः


भाव के भूखे हैं भगवान


भाव के भूखे हैं भगवान

जाग कर नकली बातें हम, छोड़ देते हैं असली बात।

स्वार्थ से सने हुये हैं हम, ठग रहे दुनिया को दिन रात ॥1॥

प्रेम कोरा है शब्दों में, हृदय में द्वेष-दाह है साथ ।

पेट में तेज कतरनी है, और हे बड़ी सुमरनी हाथ ॥2॥

तिलक का असर त्वचा तक है, रंगेगा उससे कभी न चित्त ।

शान्ति सुख पैदा करता है, कभी भी नहीं लूट का वित्त ॥3॥

देह ही ईश्वर का घर है, सभी में वे हैं, यह है ज्ञान ।

मौन युत नामोच्चारण है, उन्हीं के चरणामृत का पान ॥4॥

स्वमन के मल को धो देना, यही तो है बस सच्चा स्नान ।

उन्हें भजना, सबको तजना, यही तो है बस सच्चा ध्यान ॥5॥

खोजते हैं भोगों में सुख, सर्वदा जो हैं सुख के कन्द।

ढूंढ़ते हैं उसको बाहर, भरा है हम में जो आनन्द ॥6॥

वस्त्र में और मनुज-मन में, नहीं है अन्तर का कुछ संग ।

इन्हें जिस रंग में डालोगे, चढ़ेगा इन पर वह ही रंग ॥7॥

आँख हम नहीं खोलते हैं, करें क्या इसका प्राणाधार ।

सदा वे दर्शन देने को, हमारे सम्मुख हैं तैयार ॥8॥

नहीं कुछ भी हो सकता है, ईश से बिना हुए सम्बंध ।

कीमती अच्छे चश्मे को, लगाकर क्या कर लेगा अंध ॥9॥

बगल में छुरी छुपाते हैं और कहते हैं मुख से राम।

नाम वैसा ही रहता है, स्वयं हम होते हैं बदनाम ॥10॥

कुकर्मी ॐ चा पद पाकर, गर्व का भी रखते हैं रोग ।

चाहते हैं ईश्वर को भी, आजकल धोका देना लोग ॥11॥

पहनकर पीताम्बरी बड़ी, करें क्यों लोग दिखाऊ ध्यान ?

बाहरी बातों से क्या है, भाव के भूखे हैं भगवान ॥12॥

*समाप्त*

(श्री प्रतापनारायण जी)