भगवान बुद्ध के उपदेश

-जो फटे पुराने वस्त्रों को धारण करता है, जो दुबला है, जिसकी नसें दिखाई देती हैं, जो वन में अकेला ध्यान करता है। वह ब्राह्मण है। ब्राह्मणी माता से पैदा होकर कोई ब्राह्मण नहीं बनता। जिसके पास कुछ नहीं है, जो अक्रोधी है, व्रती है, सदाचारी है, तृष्णारहित है, संयमी है। वही ब्राह्मण है।

-कमल के पत्ते पर बूँद की तरह जो काम भोगों से अलिप्त है वही ब्राह्मण है। जो गम्भीर प्रज्ञावाला है, जो मेधावी है, जो मार्ग कुमार्ग को पहचानता है, जो असंप्रही है, जो इच्छारहित है, संयम विरत है, जिसने गाढ़े अमृत को पी लिया है वह ब्राह्मण है। जो पुण्य-पाप से परे है शोक रहित है, निर्मल है, शुद्ध है, वही ब्राह्मण है।

-जो काम भोगों को छोड़ अनिकेतन हो परिव्राजक बन गया है, जिसका पुनर्जन्म क्षीण हो गया है, और जिसने निर्वाण प्राप्त कर लिया है। वही सच्चा ब्राह्मण कहा जा सकता है।

-सभी धर्म पहले मन में उत्पन्न होते हैं। मन ही मुख्य है। वे मनोमय है। जब आदमी मलिन मन से बोलता वह कार्य करता है तब दुःख उसके पीछे वैसे ही हो लेता है जैसे गाड़ी के पहिये बैलों के पीछे-पीछे।

-सभी अवस्थाएँ पहले मन में उत्पन्न होती हैं। मन ही मुख्य है। वे मनोमय हैं। जब आदमी स्वच्छ मन से बोलता व कार्य करता है तब सुख उसके पीछे-पीछे वैसे ही हो लेता है जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया।

-मुझे गाली दी। मुझे मारा। मुझे हराया। मुझे लूट लिया। जो ऐसा सोचा करते हैं उनका बैर कभी शान्त नहीं होता।

-बैर बैर से शान्त नहीं होता। अबैर से ही शान्त होता है। यही सनातन का, संसार का सनातन नियम है।

-यदि घर की छत ठीक नहीं है तो जिस प्रकार उसमें वर्षा का जल प्रवेश कर जाता है उसी प्रकार यदि संयम का अभ्यास न हो तो मन में राग प्रविष्ट हो जाता है।

-पापी मनुष्य दोनों जगह शोक करता है। यहाँ भी और परलोक में भी। अपने दुष्ट कर्मों को देखकर दुखित होता है। पीड़ित होता है।

-शुभ कर्म करने वाला मनुष्य दोनों जगह प्रसन्न रहता है यहाँ भी और परलोक में भी। शुभ कर्मों को देखकर यहाँ भी मुदित होता है वहाँ भी प्रमुदित होता है।

-धर्म ग्रंथों को कितना ही पाठ करो, लेकिन यदि प्रमाद के कारण मनुष्य उन धर्म ग्रंथों के अनुसार आचरण नहीं करता है तो दूसरे की गौवें गिनने वाले की तरह वह श्रमणत्व का अधिकारी नहीं है।

-धर्म ग्रंथों को चाहे थोड़ा ही पाठ करे लेकिन यदि राग द्वेष तथा मोह से रहित कोई व्यक्ति धर्म के अनुसार आचरण करता है तो ऐसा बुद्धिमान, अनासक्त यहाँ वहाँ दोनों लोकों में धर्म का भागी होता है।

-ध्यान करने वाले जागरुक नित्य दृढ़ पराक्रम में लगे रहने वाले, धीरज नहीं अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

-उद्योगी जागरुक, पवित्र कर्म करने वाले सोच समझ कर काम करने वाले संयमी धर्मानुसार जीविका चलाने वाले अप्रमादी मनुष्य के यश की वृद्धि होती है।

-प्रमाद मत करो। काम भोगों में मत फँसो। प्रमाद रहित हो ध्यान करने से विपुल सुख के भागी बनोगे।

-चित्त चंचल है, चपल है, रक्ष्य है, दुरनिवार्य है। मेधावी पुरुष इसे इसी प्रकार सीधा करता है, जैसे बाण बनाने वाला बाण को।

-कठिनाई से निग्रह किये जा सकने वाले शीघ्रगामी। जो चाहे वहाँ चला ले जाने वाले चित्त का दमन करना अच्छा है। दमन किया हुआ चित्त सुख देने वाला होता है।

वर्ष -13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -4


अन्तर्ध्वनि


अन्तर्ध्वनि

(1)

पीछे मुड़कर देखो न कभी-

इसलिए कि आगे चलना है।

बड़वानल की लपटों को तो-

सागर-जल में भी जलना है,॥

हिम क्यों न हिमालय का भी हो

पर उसको भी तो गलना है,।

असफलता और सफलता तो

मानव के मन की छलना है॥

पाषाणों के सीने पर भी-

निर्झर निर्भय हो बहता है।

मेरा मन मुक्त से कहता है॥

(2)

बुद-बुद पल-पल में मिट जाते-

पर मिट कर कब बनना छोड़ा।

कलियाँ खिलकर मुरझा जातीं,

खिलना न हुआ अब तक थोड़ा॥

युग-युग से लूट रहे मौंरें-

सुमनों ने कब नाता तोड़ा।

इसलिए पराजय के क्षण भी-

मुँह मैंने आज नहीं मोड़ा,॥

मिट्टी का निर्मित मानव ही-

आँधी पानी सब सहता है।

मेरा मन मुझ से कहता है॥

(श्री जगदम्बा प्रसाद जी त्यागी बी. ए.)


क्षत्रियत्व को चुनौती

सत्तावन्तस्तथा शूराः क्षत्रिया लोक रक्षकाः।

अन्यायाशक्ति सम्भूतान् ध्वंसये युर्हिव्यापदः॥

—गायत्री स्मृति 2

अर्थ—सत्तावान् तथा शूर संसार के रक्षक क्षत्रिय अन्याय और अशक्ति से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों को नष्ट करें।

गायत्री मन्त्र के प्रथम अक्षर ‘तत्’ में ब्राह्मणत्व को जागृत और शक्ति होने का आह्वान किया गया है, जिसके सम्बन्ध में गत अंक में चर्चा की जा चुकी है। दूसरे अक्षर ‘स’ में क्षत्रियत्व के लिए बहुत ही बहुमूल्य उपदेश दिया गया है एवं आदर्श स्थापित किया गया है।

क्षत्रियत्व एक गुण है। वह किसी वंश विशेष में न्यूनाधिक भले ही मिलता हो पर वह किसी वंश तक ही सीमित नहीं है। तालाब में जल अधिक पाया जाता है परन्तु जल अकेले तालाब की ही सम्पत्ति नहीं है। वह कुंए, झरने, नदी, सागर, बादल, वर्षा, ओस आदि में भी रहता है। इसी प्रकार क्षत्रियत्व भी सम्पूर्ण मानव जाति से सम्बन्ध रखने वाला एक गुण है। इस गुण का प्रधान लक्षण शूरता है। शूरता=अर्थात् धैर्य, साहस, निर्भयता, पुरुषार्थ, दृढ़ता, पराक्रम। यह गुण जिनमें हैं, जिनमें सामर्थ्य तेज और प्रतिभा है वह क्षत्रिय है। यह क्षत्रियत्व का गुण जहाँ होगा वहाँ शक्ति का भण्डार जमा होगा और जहाँ शक्ति होगी वहाँ सत्ता भी अवश्य आ जायगी।

प्रतापी और तेजस्वी व्यक्ति की प्रतिभा से प्रभावित होकर अनेक मनुष्य उसके अनुयायी और सहायक हो जाते हैं। नेतृत्व उसका जन्मजात गुण होता है। मानसिक शौर्य के कारण उसका शरीर भी स्फूर्तिवान् एवं संघर्षशील होता है। ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ स्वभावतः ऐसे नर सिंहों को अनेक अधिकार एवं सत्ताएँ देखकर जनता उसका सम्मान करती है।

आत्मिक बल से बलवान व्यक्ति को ब्राह्मण कहते हैं। ब्राह्मण का ब्रह्मतेज उसके निज के प्रयोग के उपयोग के लिए या स्वार्थ साधन के लिए नहीं वरन् इसलिए है कि उसके द्वारा अज्ञान का नाश एवं ज्ञान का प्रकाश करके अन्धकार में भटकने वाले अनेकों को सन्मार्ग पर लगाया जाय। इसी प्रकार शारीरिक प्रतिभा तेज और सामर्थ्य, शौर्य और पुरुषार्थ का क्षत्रिय बल जिसके पास है उसका पवित्र कर्त्तव्य है कि अपनी इस शक्ति द्वारा वह निर्बलों की रक्षा करें, उनको सहारा देकर ऊपर उठावें, अन्याय अत्याचार करने वाले दुष्ट प्रकृति के लोगों से संघर्ष मोल लेकर उन्हें परास्त करने के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा दें।

क्षात्र धर्म के इस महान् उत्तरदायित्व को एक वर्ग विशेष उत्साहपूर्वक अपने कन्धों पर उठाता था। निर्दोष प्राणियों को वास देने वाले सिंह, व्याघ्र, चोर, डाकू, हिंसक; हत्यारे, अन्यायी, आततायी प्रकृति वालों को नष्ट करके अन्याय और अशक्ति के कारण दुख सहने ऐसे ही क्षात्र धर्म एवं शौर्य से भरा पड़ा है। अभी पिछले स्वाधीनता संग्राम में असंख्य निरस्त्र भारतीयों ने साम्राज्य शाही के प्रचण्ड कालदण्ड से जो टक्करें लीं, उससे प्रकट होता है कि क्षात्र तेज हमारी नस-नाड़ियों में अब भी विद्यमान है।

आज ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं, जिन्हें क्षात्र तेज प्राप्त है, जिनके पास शक्ति सामर्थ्य और सत्ता प्रचुर परिणाम में प्राप्त है किन्तु खेद की बात है कि वे उसका दुरुपयोग करके अनीति का निवारण करने की बजाय उसे बढ़ाने के कारण बनते हैं। राजा, रईस, अमीर, उमराव, जागीरदार, जमींदार आदि के हाथ में जो शक्ति होती है उससे वे निर्बलों को सहायता पहुँचाना तो दूर उलटे उनके शोषण, दमन, त्रास एवं उत्पीड़न के आयोजन करते हैं। इसी प्रकार छोटे-छोटे शूर एवं साहसिक लोग बहुधा डाकू, हत्यारे, चोर बनकर गुंडापन, आतंक, अन्याय अनैतिकता, अशिष्टता, व्यसन, दुराचार आदि बुराइयों को बढ़ाते हैं। जैसे आज का ब्राह्मण ठगी और दीनता का प्रतीक बन गया है वैसे ही आज का क्षत्रिय भी आतंक और अनीति का गढ़ बना हुआ है।

गायत्री का दूसरा अक्षर ‘स’ इस स्थिति का घोर विरोध करता है और कड़ी चेतावनी देता है। सच्चा क्षत्रिय तो तपस्वी ब्राह्मण की तरह आत्मत्यागी ही होना चाहिए। शक्ति और सत्ता जो उसके हाथ में सौंपी गई है वह ईश्वर की एक पुनीत धरोहर है उसका अपने लिए नहीं, जन-कल्याण के लिए उपयोग होना चाहिए, जो लोग चिड़िया, कबूतर, मछली, खरगोश आदि दीन-दुर्बल जीवों पर अपनी तलवार छोड़ते हैं वे क्षत्रिय नहीं हैं। जो अपने अहंकार, ऐंठ, अकड़, सनक और स्वार्थ के लिए अनेकों को कष्ट पहुँचाते हैं वे भी क्षत्रिय नहीं हैं। शक्ति के नशे में चूर होकर जो साँप की तरह फुसकारते और भेड़ियों की तरह गुर्राते हैं वे भी क्षत्रिय नहीं हैं। ऐसे लोगों को तो नर-तन-धारी असुर ही कहा जा सकता है। गायत्री बताती है कि असुर और क्षत्रिय एक नहीं होते, वे तो परस्पर विरोधी तत्व हैं। उन दोनों में उतनी ही समता है जितनी डॉक्टर और कसाई की शल्य क्रिया में। ऊपर से देखने में दोनों ही चीर-फाड़ करते हैं पर एक का उद्देश्य परम दयामय होता है और दूसरों का घोर दुष्टतापूर्ण। इसी प्रकार क्षत्रिय और असुरों के पराक्रम भी लोक सेवा एवं स्वार्थपरता के लिए होते हैं।

जैसे हर व्यक्ति में थोड़ा बहुत ब्राह्मणत्व-ज्ञान तत्व-होता है वैसे ही उसमें क्षत्रियत्व का-शक्ति और सामर्थ्य का अंश होता है। यह अंश दैवी अंश है। इसका उपयोग दैवी प्रयोजन के लिए, सर्व हितकारी पुण्य प्रयोजनों के लिए ही होना चाहिए। गायत्री कहती है कि प्रत्येक विचारवान् व्यक्ति को सदा आत्म निरीक्षण करते हुए यह देखना चाहिए कि हमारी शक्ति, सामर्थ्य, प्रतिभा और सत्ता का उपयोग क्षात्र धर्म के अनुकूल हो रहा है या नहीं। उसका प्रतिकूल उपयोग होना गायत्री महाशक्ति की प्रत्यक्ष अवज्ञा है और इस अवज्ञा का परिणाम वैसा ही भयंकर होता है जैसा कि महाकाली से लड़ने वाले महिषासुर आदि का हुआ था। दुरुपयोग की हुई सत्ता, उलटी चलाई हुई तलवार की तरह आत्म-घातक होती है।

आज क्षात्र सत्ता का केन्द्र सरकार के हाथ में पहुँच गया है। पुलिस, फौज, शासन, प्रबन्ध, न्याय, आदि के सभी क्षत्रिय कर्त्तव्य राज के हाथों में है। इन विभागों का—इन विभागों के कर्मचारियों का-विशिष्ट कर्त्तव्य है कि वे जनसाधारण को अन्याय एवं अनीति से पीड़ित न होने दें। परन्तु देखा यह जाता है कि न्याय अत्यन्त महंगा है, उसे केवल धनी ही खरीद पाते हैं। रिश्वत खोरी, पक्षपात, घात-प्रतिघात, रोष-द्वेष आदि बुराइयों की भरमार होने से सरकारी कर्मचारी उन निर्बलों की उचित सहायता नहीं कर पाते जिनके लिए कि उनका अस्तित्व निर्माण किया गया है। गायत्री कहती है कि ऐसा कुशासन क्षात्र धर्म के विपरीत है। उसमें सुधार न हुआ उसकी गति ऐसी ही चलती रही तो यह एक बड़ी ही अधार्मिक और दुर्भाग्यपूर्ण बात होगी।

किसी पर अन्याय होते देखकर किसी को अन्याय करते देखकर अन्तरात्मा का जो अंश दुखी, क्षुभित, दयार्द्र, सेवा प्रवृत्त होता है वही क्षत्रियत्व है। यह दैवी अंश हर मनुष्य की अन्तरात्मा में न्यूनाधिक मात्रा में मौजूद है, इसी को गायत्री मन्त्र के द्वितीय अक्षर ‘स’ ने जागृत और सुविकसित करने का सन्देश दिया है। आइए, हम इस गायत्री माता के सन्देश को सुनें और अपने क्षत्रियत्व को अनीति के परिमार्जन और नीति के संस्थापन में लगावें।


Quotation

-एक पशु दूसरे को केवल अपने शारीरिक बल से ही वश में कर लेता है। उसकी जाति का यही कायदा है। मनुष्य जाति का स्वाभाविक कायदा प्रेम बल से-आत्मिक बल से-दूसरे को जीतने का है।


संस्कार और विवेक

(श्री किशोरी लाल घनश्याम मशरुवाला,)

विवेक-बुद्धि को मैं इष्ट देव के समान पूज्य मानता हूँ। कर्म, भक्ति , ध्यान, ज्ञान, प्राप्त करने की आवश्यकता प्रतीत होती है तो वह विवेक -बुद्धि का विकास है। किसी देवादिकों के दर्शन की अथवा ऋद्धि-सिद्धियों की मुझे तृष्णा नहीं है, लेकिन अगर भक्ति आदि के द्वारा देव संतुष्ट होते हैं, तो मैं उनसे यही चाहूँगा कि वे मेरी विवेक-बुद्धि को शुद्ध और विकसित करें। यह विवेक क्या चीज है?

कहने की शायद ही जरूरत हो कि यहाँ विवेक का अर्थ रूढ़ अर्थ की भाँति, सदाचार या अच्छा रहन-सहन ही नहीं समझना चाहिए।

विवेक का शब्दार्थ विशेष अथवा सूक्ष्म विचार होता है। ऐसा नहीं है कि हम जो कुछ करते हैं, सीखते हैं, मानते हैं, वह किस लिए करते, सीखते या मानते हैं, उस पर हम हमेशा विचार कर ही लेते हैं। यह संभव है कि अत्यन्त निरर्थक से लेकर अत्यन्त गम्भीर क्रियाओं, शिक्षाओं, और मान्यताओं में से कई एक के सम्बन्ध में हमें थोड़े भी विचार न सूझे हों। हममें बोलने और काम करने की ऐसी कितनी ही आदतें होती हैं जो दूसरों के ध्यान में तो आ जाती हैं, लेकिन हमें स्वयं उनके अस्तित्व का भी ज्ञान नहीं रहता। मेरे मित्र कहते हैं कि बोलते समय मुझे “है तो” जैसे निरर्थक शब्द कहने की आदत है। इसका निर्णय मैं अभी तक नहीं कर सका हूँ कि मुझमें यह आदत है, क्योंकि जब मैं सावधान होकर बोलता हूँ तो ये शब्द बोले नहीं जाते, और जब असावधान होकर बोलता हूँ तो वे मेरे ध्यान में नहीं आते। कहना चाहिए कि जिस हद तक यह होता है, उस हद तक हमारी क्रियायें, शिक्षायें और मान्यतायें विवेक रहित हैं। तात्पर्य, हमारे ये काम बतलाते हैं कि इन्हें करने से पहले हमने इन पर सावधान होकर पूर्व विचार नहीं कर लिया था।

यह मान लेने का कोई कारण नहीं है, कि बिना विचारे किये हुए कर्म शिक्षा अथवा मान्यता बुरे या गलत होते हैं। लेकिन सत्कर्म, सदशिक्षण और सच्छन्द्धा अगर विचारपूर्ण न हों तो उनमें दो त्रुटियाँ रह जाती हैं। एक तो यह है कि विचारपूर्वक किये हुए कर्मादि में गुण को प्रकट करने और दृढ़ करने की जो शक्ति रहती है, वह विचार हीन कर्म में नहीं होती, और कितनी ही पुरानी आदत हो तो भी संगदोष से उसे आघात पहुँच सकता है। उदाहरण के लिए यदि में चींटी और मकोड़ों या चींटों को भी न मारूं , तो यह मेरा एक सत्कर्म जरूरत है। लेकिन अगर इस सत्कर्म की आदत केवल मुझे वंशपरम्परा के संस्कारों, गुरुजनों की धाक, परलोक में मिलने वाले दुखों के भय अथवा सुख की लालसा के कारण पड़ी हो, और इस सम्बन्ध में मैंने खुद होकर अपने स्वतंत्र दृष्टि-बिन्दु से विचार न कर लिया हो, तो इस कर्म से गुण की जितनी वृद्धि होनी चाहिए, नहीं होती। अर्थात् मैं चींटी या चींटों को मारूंगा तो नहीं परन्तु उनसे त्रास पाकर उन्हें मन में शाप दिये बिना न रह सकूँगा या प्राण-हरण के सिवा कोई दूसरी सजा उन्हें दे डालूँगा। कदाचित् यह दूसरी सजा या दण्ड ऐसा भी हो कि उसके फलस्वरूप प्राण हरण से भी ज्यादा केवल चींटी या चींटों तक ही परिमित हो, तो वह मुझे बन्दर, साँप या बिच्छू—और सम्भवतः किसी मनुष्य को भी—मारने से रोकेगी ही, इसका कोई भरोसा नहीं। इससे मेरा क्रोध कम नहीं होता उलटे सम्भव है कि इससे मैं अपने बैल या नौकर से इतना काम लूँ कि वह काम करते-करते बेदम हो जाय-मर जाय। मेरे मातहत मनुष्य का सर्वस्व हरण हो जाय, तो भी मैं उस पर सख्ती करने से बाज न आऊँ; और कुसंगति में पड़कर चींटी मकोड़ों के विषय में भी योग्य अवसर पर काम देने वाली निर्णायक शक्ति का उसमें उदय नहीं होता।

अगर अकेली प्रज्ञा ही उसकी तीव्र होगी तो वह पदार्थों के बाह्य भेदों और बाह्य स्वरूपों में ही रमाता रहेगा और पदार्थों के बन्धनों से स्वतन्त्र न हो सकेगा।

अगर वह अवलोकन करने वाला और प्रज्ञावान है, लेकिन योग्य भावना वाला नहीं है, तो भी उसका तत्व विचार उसमें बल की प्रेरणा नहीं कर सकेगा, उसका तत्व-विचार उसके जीवन में कोई अन्तर नहीं ला सकेगा।

अगर आदमी उपयुक्त भाव वाला हो, लेकिन उसमें अवलोकन की कमी हो अथवा उसकी प्रज्ञा मन्द हो तो वह उन पदार्थों की काल्पनिक कीमत निश्चित करेगा, जल्दबाजी से निर्णय करेगा, उसका विकास एकाँगी रहेगा, उसके आचार पर उसका आधिपत्य न होगा और उसमें योग्य-अयोग्य के विचार की कमी दीख पड़ेगी। साराँश बोलचाल की भाषा में जिसे हम बेसमझ, गैर जिम्मेदार या विक्षिप्त व्यवहार कहते हैं, वैसा उसका व्यवहार दीख पड़ेगी।

सब कुछ होने पर भी अगर सावधानता न हो तो उस बराबर यह कहने का अवसर आवेगा कि “जानाभि धर्म नचम प्रवृत्तिः जानाम्य धर्म नचमे निवृत्ति” (मैं धर्म को जानता हूँ लेकिन मैं उसमें प्रवृत्त नहीं हो सकता, अधर्म भी जानता हूँ पर उससे निवृत्त नहीं हो सकता)।

कला, कौशल, पाण्डित्य, सौंदर्य, बल अथवा केवल भक्ति, केवल कम परायणता, केवल तप, केवल ज्ञान (जानकारी ओर तर्क शक्ति) वो केवल ध्यान की पूर्णता से जीवन की पूर्णता प्राप्त हो नहीं सकती लेकिन अगर कहें कि विवेक की पूर्णता और जीवन की पूर्णता ये दोनों एक ही वस्तु हैं तो झूठ न होगा। जैसे प्राण हीन शरीर शव होता है, वैसे विवेक हीन जीवन मुझे अ-मानवी प्रतीत होता है।

केवल विवेक बुद्धि की सहायता से हम भक्ति मार्ग, तप मार्ग, कर्म मार्ग, अथवा ध्यान मार्ग का फल प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन केवल विवेक-विचार पर निर्भर रहना कठिन होता है, अतः भक्ति आदि मार्गों का सहारा लेना उचित है। किन्तु विचार करने पर पता चलेगा कि मनुष्य की उन्नति का ऐसा एक भी साधन नहीं है, जिसमें विवेक-विचार की अपेक्षा न रहती हो, जितने ज्ञानी अथवा सन्त-पुरुष भूतकाल में हो गये हैं, या वर्तमान काल में हैं, उनके जीवन में विवेक-बुद्धि की सतत् जागृति ही उनका बड़े से बड़ा साधारण धर्म प्रतीत होगा। विवेक की पूर्णता के अनुपात में ही उनके जीवन की सच्ची महत्ता रहती है। शेष दूसरी सामग्रियाँ उनके आभूषण मात्र होती हैं।

विवेक के उत्कर्ष के अभाव में इष्ट देव का दर्शन हुआ हो, अनेक प्रकार की विद्याओं में पारदर्शिता प्राप्त हुई हो अथवा वैराग्य वृत्ति सधी हो तो भी मनुष्य इनको पचा नहीं सकता और सम्भवतः इस कारण उसे अधोगति भी प्राप्त हो सकती है। इसके विपरीत अगर वह केवल विवेक-विचार पर जाग्रत रहने की ‘शक्ति प्राप्त कर सके तो उसे अटल शान्ति मिल सकती है। नितान्त शुद्ध विवेक पूर्ण जीवन में ही मेरे विचार जीवन मुक्ति का वाह्य लक्षण है।


सदाचार का तत्व-ज्ञान

(श्री स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती)

आज मानव जीवन इतना अस्त-व्यस्त हो गया है कि सदाचार की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता, लोक कल्याण तथा विश्व शान्ति के लिये अनेकानेक मौखिक-प्रस्ताव पास किये जाते हैं, परन्तु बेपरवाह बन जाऊँ।

इसी तरह दान करना अवश्य ही सत्कर्म है। लेकिन जब तक दान के गुण के सम्बन्ध में दाता ने स्वयं विचार न किया हो और केवल आगत रूढ़ि के कारण, अथवा अमुक स्थान पर फलाँ चीज फलाँ व्यक्ति को देने से एक खास फल की प्राप्ति होती है, इस श्रद्धा के कारण दान दिया हो, तो इसका कोई भरोसा नहीं कि इससे दाता मनुष्य उदार बनेगा ही। रूढ़ मार्गों में उसके दान का प्रवाह बहेगा, लेकिन कई नहीं सकते कि आवश्यक मार्गों में भी वह उसी तरह बहेगा। यह संभव है कि उदारता अथवा रहमदिली के कारण दान में उसकी प्रवृत्ति होने के बदले, उसकी दानशीलता भाल पर के तिलक के समान अथवा आन्तरिक रोग के बाह्य उपचार के समान केवल बाह्य संस्कार मात्र बनी रहे। और अगर किसी कारण से रूढ़ि अथवा श्रद्धा के संस्कारों का उसके हृदय से लोप हो जाय, तो भाल-तिलक की भाँति वह अपने कर्म की आदत को भी मिटा डाले।

सारांश, जब तक मेरे कर्मों के पीछे जिस गुण या इच्छा का बीज रहा हो। उसके सम्बन्ध मेरे अपने मन में विवेकपूर्ण विवाद जागृत न हों तब तक उस गुण को सब कामों में व्यापक बनाने की अथवा कार्य अकार्य के सम्बन्ध में उस गुण में स्थिर रहकर विचार करने की और उसके परिणामस्वरूप आने वाले कष्टों को धैर्यपूर्वक सहने की, संग दोष न लगने देने की तथा दूषित गुण, इच्छा, आदत को टालने की शक्ति मुझमें नहीं आती।

मनःपूर्वक किये हुए समस्त व्यवहारों का मूल सच्चा अथवा झूठा विवेक है। विवेक में चार वस्तुओं का समावेश होता है, अवलोकन, प्रज्ञा, भावना और सावधानता। अवलोकन यानी अनुभव में आने वाले प्रत्येक विषय की शोध। दूसरे शब्दों में किसी एक पदार्थ का स्वरूप क्या है, उसके धर्म क्या हैं और वे क्यों इस तरह के हैं, इसका शोधन ही अवलोकन है।

प्रज्ञा के मानी तुलना-शक्ति के हैं जिस शक्ति के द्वारा हम गुड़ और शक्कर के बीच का, सा और रे के बीच का, दया और प्रेम के बीच का, मान और अपमान के बीच का भेद जान सकते हैं वह अनुभव मूलक शक्ति इन विषयों के बीच का भेद बतलाने वाली शक्ति है।

भावना या भाव उस-2 पदार्थ के प्रति को दृष्टि-बिंदु है। भाव बहुत से प्रतीत होते हैं, लेकिन सब भावों का पृथक्करण करने से उसमें तीन मूल भावों में समावेश हो जाता है। विषम भाव, सम भाव और ऐक्य भाव। इस पदार्थ से मैं जुदा हूँ, इसका हित जुदा है, मेरा जुदा है, यह विषम, या द्वैत भाव है, यह पदार्थ और मैं दोनों समान हैं, जैसा मेरा सुख है वैसा इसका भी-यह सब अथवा विशिष्टाद्वैत भाव है यह और मैं एक हैं, जो इसका हित वही मेरा भी हित है। यह ऐक्य अथवा अद्वैत भाव है।

सावधानता से तात्पर्य सम्यक् जागृति है-कार्य करने के पहले ही आत्म स्मृति का होना सावधानता है।

इन चारों में से कौन किसका कारण है, यह निश्चित करना कठिन है। प्रत्येक मनुष्य के पास जन्म काल से ही इन चारों की थाती कम या बहुत मात्रा में रहती है, प्रज्ञा के सूक्ष्म होने से भाव स्पष्ट होता है सूक्ष्म प्रज्ञा और स्पष्ट भाव मिलकर सत्य निर्णय के लिये आवश्यक हैं, स्पष्ट अवलोकन सत्य निर्णय के लिये आवश्यक है और सावधानता इन तीनों पर अपना असर डालता है। इन सबके फलस्वरूप जो निर्णयात्मक विचार पैदा होता है वहीं विवेक है। विवेक का उद्बोधन उसकी जागृत धड़कन, अवलोकन, प्रज्ञा, भाव की शुद्धि और सावधानता की पोषक होती है। इन चारों में से जो अंग अपूर्ण रहता है उसके कारण विवेक में कमी आती है।

अगर मनुष्य अवलोकन करने वाला हुआ लेकिन उसके भाव उचित न हुए या प्रज्ञा जड़ हुई तो वह केवल स्थूल व अल्प दृष्टि के अथवा काल्पनिक सिद्धान्तों का रचयिता मोक्ष हो सकता है। तात्विक विचार का मूल बिन्दु उसके हाथ नहीं लगता, वे निरर्थक ही सिद्ध हुए हैं। जिसका कारण यही है कि मनुष्य समाज अपने जीवन के सत्य-सम्मत-पक्ष को नहीं देख पाया है। मरु-मरीचिका को ही जलाशय जानकर, वह व्यर्थ ही दौड़-भाग कर रहा है। इसी लिये हम नित्य प्रति सुनते हैं कि विश्व में विनाश और मृत्यु पाप और दुराचार, असभ्यता तथा नारकीयता का प्राबल्य है। यदि हम कुछ देर तक ध्यानपूर्वक मनन करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि मानव-धर्म के सदाचार रूपी व्यावहारिक कर्म का विस्मरण करके ही समस्त मानव समाज, अशान्ति का उदयीभूत कर रहा है। हमारा अधः पतित दृष्टिकोण ही हमारे विश्व में अन्याय का साम्राज्य छत्रमान किये हैं। हमारी नैतिक दुर्बलताएँ हमारे भौतिक दुःख और क्लेश को जन्म देती हैं। शास्त्रनिषिद्ध कर्मानुसरण कर निज-निज धर्मानुसारित-कर्त्तव्यों को त्यागते हुये हमारा लौकिक आचरण अपने सत्य युगी अधिष्ठान से नीचे की और पतित किया गया है। यदि समाज अथवा राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति किसी भी कार्य को करने के पूर्व ही यह विचार करे कि तद्-विचारित-कार्य सदाचार-प्रभूत-धर्म की उपक्रमणिका में आता है कि नहीं- तो वह निश्चय ही अपने जीवन को सफल और कल्याणमय और विमल तथा पवित्र बना सकेगा। यदि परधन-लोलुप व्यक्ति यह सोचे कि वह उचित-कार्य नहीं कर रहा है—यदि मद्य पीने वाला यह सोचे कि मद्यपान तद्विचरित-दृष्ट्या अनुचित है, यदि हिंसातुर-व्यक्ति यह सोचे कि हिंसा सदाचार नहीं और उसके जीवन के आनन्द को विनाश की ओर ले जाने वाली है और महा पाप है, तो वह अपने को इन दुष्कर्मों से विरत रखने की भीष्म चेष्टा करेगा। परिणाम यह होगा कि हमारे संसार में नित्यप्रति जो अमानुषिक-कर्म होते रहते हैं, वे नहीं होवेंगे। किसी की चोरी नहीं होवेंगी, किसी का पुत्र कुचरित्रवान नहीं होवेगा, किसी का सतीत्व-हरण नहीं होगा किसी के प्राणों का अपहनन नहीं होगा। सभी मिलनसार, एक-खिद्धान्ती, दयानुरक्ता, मैत्रीयुक्त , परोपकारी, त्यागी और निस्वार्थ होकर सर्वतोमुखी-शान्ति के लक्षणों का श्री गणेश पायेंगे।

तब सदाचार की मीमाँसा क्या है? क्या यह मनुष्य की विचारधाराओं पर अवलम्बित है—अथवा वाणी विलास ही इसकी सीमा है? या सदाचार केवल लौकिक-मानव-समाज का सुधार मात्र है? सदाचार, यदि इसे अपने भारतीय-तत्वज्ञान की दृष्टि से देखा जाय तो, मनुष्य के जीवन में उन आध्यात्मिक-व्यवहारों का मौलिक-स्वरूप है जिससे विश्व धर्म या लोक धर्म की मर्यादा का प्रतिष्ठापन होता है। यह समझना हमारी भूल होगी कि सदाचार मनुष्य के किसी ऐसे समय की विचार शृंखला है, अथवा वाणी का कौतुक है, जब कि मानव क्षेत्र परिमित-विज्ञान होने के कारण आदर्शवाद की ही ओर जा रहा था, जब कि उसका सामाजिक भूगोल तथा राजनैतिक प्रश्न कुछ ही परिवारों में सीमित था-क्योंकि सदाचार तथागत शास्त्रों के अनुसार, जिसका क्षेत्र आज से भी विशालतर था, मनुष्य के मन,कर्म और वचन की पवित्र-धारा का वह सुन्दर समन्वय है, जहाँ पर मनुष्य मनुष्य के सम्बन्ध को उचित-रीति से जानता है और उस सम्बन्ध का नियमानुकूल अनुपालन भी करता है तथा तत्फलतः वह दूसरे के विनाश का विचार नहीं करेगा—उसके प्रति कटु-शब्दों का प्रयोग भी नहीं करेगा और तद् निषिद्ध-दुष्कर्म करने को उद्यत भी नहीं होगा। अतः यह प्रत्यक्ष सिद्ध होता है कि सदाचार ही सत्य आचरण है, जो आचरण दूसरे के द्वारा अभिवाँछनीय हों, जो आचरण दूसरे के मनोविज्ञान की कसौटी पर ठीक उसी तरह खरे उतरें, जैसे उनका स्वरूप है। सदाचार, मनोविज्ञान, व्यवहार तथा आध्यात्मिक-कर्मों का केन्द्रीकरण है, जिसका प्रभाव मनुष्य के आजीवनोपरान्त-कर्मों के शत-प्रतिशत के अनुपात सक्रियात्मक रहता है।

हम नित्य प्रति धर्म ग्रन्थ (शास्त्र) का अध्ययन करते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि सदाचार के स्वरूप आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों हैं और पुराणों में इसे लोक धर्म का सजीव-रूप दिया है। परन्तु तो कुछ भी हो, हम अपने शास्त्रों से यही जान गये हैं कि सदाचार का सूत्रपात हमारे जीवन के ईश्वरीकरण से है—जिसका परिणाम निश्चयतः ऐसा ही होना चाहिये। यदि वट वृक्षारोपण किया जाय तो छाया भी तो मिलेगी ही। तदनुसार यदि जीवन में ईश्वरीय-जीवन की स्फूर्ति कर दी जाय तो कालान्तर में इसका विकास भी ईश्वरीय ही होगा। अतः हम इस परिणाम पर आते हैं कि सदाचार का श्री गणेश मनुष्य की आध्यात्मिक-प्रकृति के जागरण से होती है। जब अनुभूति का अध्यात्मीकरण हुआ तो सदाचार का सूर्योदय हो ही जाता है।

इस प्रकार सदाचार के साधारणतः तीन गम्भीर स्वरूप होते हैं, जो हमारे जीवन के सभी कर्मों और सभी अनुभूतियों को अनुयूस्त किये हैं—

सदाचार का प्रथम सत्य आध्यात्मिक-जीवन है, जो सर्वप्रधान तथा सर्वव्याप्त माना जाता है जैसे जल की अति व्याप्ति जल के समस्त-विकारों और विकल्पों में भी मानी जाती है। दैवी सम्पत्-सम्पन्न होना इस जीवन का उपादान कारण है। श्रीमद्भगवद्गीता और मनुस्मृति के सिद्धान्तों में यही प्रतिध्वनि है, प्रत्येक मनुष्य को सर्वप्रथम अपने आध्यात्मिक-क्षेत्र में सद्गुणों की अनुभूति का विकास करना चाहिए। अपनी अपनी अनुभूतियों को सर्वथा सद्गुणों का स्वरूप देकर, सब निश्चयतः उसी का अभिव्याख्यान करेंगे तथा व्यवहार भी कर सकेंगे। जैसी अनुभूति होती है, वैसा ही व्यवहार भी—यह विद्वानों का सर्व-सम्मत सिद्धान्त है और यहाँ हमारी भार-तत्व सदाचार प्रणाली ही है, जो पाश्चात्य सदाचार विज्ञान के विकास के दृष्टिकोण से सहमत भी है। आप लोगों ने सुना तो होगा, जैसी गति-वैसी मति, यही है जग की रीति। इससे स्पष्ट यही अभिव्यक्त हो रहा है कि हमारी अनुभूतियाँ ही हमारे विचार का—तदनुसार व्यवहार का निर्णय कर पायेंगी। यदि हमारी अनुभूति में सर्वात्मभाव तथा एकात्मक-सत्य का अनुभव होगा तो हम अपने सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, निरहंकारिता तथा अन्योन्य शास्त्रोक्त-गुणों के लिये सचेष्ट कर सकेंगे, जिसकी प्रतिच्छाया हमारे व्यावहारिक-स्तर पर अवश्य पड़ेगी ही।

अपनी आध्यात्मिक प्रकृति को आरोग-द्वे-यदि सद्गुणों से अलंकृत करने के उपरान्त ही हम अपने जीवन के प्रत्येक व्यवहार में शान्ति और कल्याण और सर्वभूत हित की रूपरेखा का अवतरण कर सकते हैं। अतः सदाचार का सर्वप्रथम दृष्टिकोण आध्यात्मिकता या ईश्वरीय जीवन है, जहाँ मनुष्य पारस्परिक भेदभाव से परे विश्व को केवल एक परिवार ही नहीं-अपितु अपना स्वरूप ही जानता है और यह अनुभव करता है कि समस्त विश्व निःसन्देह उसका ही जल, बिन्दु, तरंग, सागर तथा वाष्पवत् विकास है और वह सर्व-कार्य अध्यक्ष, सभी जीवों में अधिवास करने वाला तथा सबका आत्मा है। वह किसी का अहित नहीं चाहता वह किसी के प्रति अन्य तथा इतर-भाव से अभिव्यक्ति नहीं करता। वह परहित ही क्यों करेगा, जबकि वह “ईशावास्यमिदं सर्वम्” को अपने सदाचार का सर्व प्रधान-दृष्टिकोण स्थिर किये है। हमारे प्राचीन, वैदिककालीन वीतराग,तपस्वी,, ऋषि-महर्षिगण इसके युग स्मरणीय आदर्श थे।

ऐसा मनुष्य या समाज या देश अपने प्रति-वासी के दुःख से दुखित होगा ही, क्योंकि वही तो सबमें हैं अतः वह अपनी प्रतिवासी आत्मा के यत्किंचित् दुःखों के समूल निवारण के लिये प्रयत्न करता रहेगा। स्वभावतः ही दया, मैत्री करुणा, उपकार तथा अन्य मानसिक सदाचार सम्बन्धी सद्गुणों का आविर्भाव उसमें होगा। यदि किसी समाज के ऊपर आर्थिक संकट आया हो तो तत्कथित सदाचरण शील व्यक्ति ही उस संकट निवारण के उपायों के लिए कटिबद्ध जाता है। वह नवीनतर और नवीनतम प्रयोगों द्वारा अपने पराये के हित और कल्याण और शान्ति की विधि के अनुसन्धान में तत्पर हो जाता है। यह सदाचार का मानसिक स्वरूप, जिसे मनोवैज्ञानिक सदाचार भी कहते हैं, द्वितीय श्रेणी का है। महात्मा बुद्ध इसी कोटि के अवतार थे।

सदाचार का तीसरा स्वरूप व्यावहारिक है। इससे यह अर्थ नहीं कि वह स्वतन्त्र अंग हो। व्यावहारिक तथा भौतिक सदाचार सर्वदा आध्यात्मिक अनुभूति तथा मनोवैज्ञानिक आधारों पर ही प्रतिष्ठित रहता है। इसका कारण स्पष्ट है कि जब तक आप अपने जीवन के अनुभवों और विचारों को सत्य के पवित्र मंत्रों में दीक्षित नहीं कर लेंगे, अब तक कैसे सम्भव है कि आज सदाचार परायण हों? आप का आचार आपके विचारों का आतंक है अर्थात् प्रतिबिम्ब है। तात्पर्य यह है कि आपके विचारों के अनुसार ही आपकी क्रिया शक्ति सुकर्म तथा दुष्कर्म का निर्णय करेगी। यदि आप मुझे किसी प्रकार का भीषण कष्ट देना चाहते हैं और यह निश्चय करते हैं कि किसी निकट-भविष्य में उचित अवसर पाकर, आप मेरा तिरस्कार करेंगे या मुझे निश्चित कष्ट देंगे, तो क्या आप व्यवहार करते समय तद्विचारित निश्चय का पालन करने को विवश नहीं होंगे? इसी प्रकार आप यदि किसी अनाथ बालक के दुखों की अनुभूति कर, उसके दुःख निवारण के लिए विचार कर, उसके जीवन की आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करने को सन्नद्ध होते हैं तो संसार में कोई भी ऐसी शक्ति नहीं जो आप के इन आदर्श विचारों को पलट दे। मैंने कुछ लोगों को कहते सुना है कि “क्या करें, मन में उसकी दशा पर तरस आता है। परन्तु कभी कभी उसकी बातें सहन नहीं हो सकतीं”। जो लोग इस प्रकार के विजातीय सिद्धान्तों को जन्म देते हैं, वे सदाचार के आध्यात्मिक तथा मानसिक स्वरूपों में स्थिर नहीं हो पाये हैं और उनके उपरोक्त कथन से हमें यही समझना चाहिए कि वे सत्यतः अपने मन के अन्दर भी उसी प्रकार का निश्चय किये हैं, जो उन्होंने बाहर प्रकट किया है।

ऐसा व्यक्ति, जिसने तद् वर्णित तीसरे अंग का सद् अनुशीलन कर लिया है, उसे आध्यात्मिक तथा मानसिक सदाचार का व्यावहारिक-आदर्श होना चाहिए। महात्मा गाँधी जी को यदि हम इस समन्वय का व्यावहारिक-आदर्श मानें तो सर्वथा उचित ही होगा।

अतः पाठक समझ गये होंगे कि सदाचार मनुष्य जीवन का एक विशिष्ट विज्ञान है, जिसका यहाँ पर अति संक्षेप में दिग्दर्शन कराया गया है और जिस का विशद् व्याख्यान हमारे धर्म ग्रन्थों में किया गया है। सदाचार जितना व्यावहारिक दीखता है, उतना ही-किसी अवस्था में उससे भी अधिक मात्रा में आध्यात्मिक है। सदाचार के अर्थ केवल समाज सुधार विषयक आधार ही नहीं हैं। समाज सुधार तो इस विराट्-सदाचारवाद का एक रोम मात्र है। समाज सुधार से ही सदाचार की पूर्ति नहीं हो सकती। ईश्वर पर ही विश्वास, कर उसको ही एकमात्र उपास्य मानना तथा उसी को सर्वभूत स्थित जानना, सदाचार की भूमिका है। जप, कीर्तन, सत्संग, योगाभ्यास, आत्म-विचार, सच्छास्त्र मनन, यम-नियमादि का संपालन, सदाचार का प्रथम सोपान है और मैत्री, करुणा, परोपकार, अहिंसा, दयाभाव, आत्मत्याग, निस्वार्थ-व्यक्तित्व, सेवा तथा अन्य सद्गुण ही सदाचार के प्रथम सोपान को पार करके, स्वतः ही आपके जीवन में ओत-प्रोत हो जाते हैं, आपको विशेष श्रम नहीं करना पड़ता। यदि आधार दृढ़ हो गया तो आप विशालतर से विशालतम-भाव का निर्माण आसानी से कर सकते हैं। इसी प्रकार ईश्वर चिन्तन के लिये जपादि नित्य धर्मों का अक्षरशः पालन करते हुए, आप अपने जीवन के सभी कार्यों को यथोचित-रीत्या करते रहें और किसी को दुःख और क्लेश न दें तो आप सहसा एक दिन अनुभव करेंगे कि सदाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग हो गया है और आपके आचरण में व्याप्त हो गया है, जिसके अतिरिक्त आप किसी प्रकार के अन्य भौतिक आचरण को श्रेयस्कर नहीं समझते। जिस तरह फिटकिरी धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण से जल में मिल जाती है, उसी प्रकार आपका जीवन भी जप और कीर्तन और ईश्वर-प्रेम में धीरे-धीरे आश्चर्यपूर्ण आचरण द्वारा समाधिस्थ होता जायगा और आप काम करते हुए, भोजन करते हुये तथा संसार के प्रापचिक कार्यों को करते हुए भी अपने सदाचरण से विचलित नहीं हो पायेंगे। परन्तु ईश्वर भावना का परित्याग कर, यदि केवल मात्र लौकिक-सामाजिक व्यवहारों का पालन करोगे तो यह सीमित और अस्थायी ही रह जायगा और आप उसमें शाश्वत-जीवन संचरित कर ही नहीं पायेंगे। कभी-कभी तो आप उकता कर, अपनी सदाचरण की निष्ठा को तिलाँजलि भी दे देंगे। यह कोई असम्भव नहीं इसके कई उदाहरण आपको मिलते रहते हैं। परन्तु आपने भगवत् प्रेम, नाम स्मरण तथा अन्य-शास्त्रोक्त-नित्य-विधियों को अपने जीवन क्षेत्र के अनुसार संपादित किया तो आप सच्चे सदाचार की आधार शिला की प्रतिष्ठा कर पायेंगे, जिस पर जन कल्याण का विशाल-प्रासाद बनाया जा सकेगा, प्रत्येक व्यक्ति जिसकी सुदृढ़ ईंट होगा, एकता तथा संभावना जिसको संकलित कर पायेगी तथा सत्य प्रेम, आनन्द, चिर कल्याण और देवत्व हमारे विशाल-प्रासाद की महामहनीय शोभा होंगे। क्या तब भी विश्व शान्ति एक समस्या ही बनी रहेगी?


बालकों का स्वस्थ विकास होने दो

(श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर)

खुला आकाश, खुली हवा और फूल-पत्ते मानव सन्तान के शरीर और मन की परिणति के लिये बहुत ही आवश्यक हैं। जब उमर बढ़ेगी, आफिस जिस समय अपनी ओर खींचेंगे, लोगों की भीड़ जब हमें ठेलकर चलेगी और मन जब नाना प्रयोजनों से नाना दिशाओं में घूमेगा, तब विश्व-प्रकृतियों के साथ हमारे हृदय का प्रत्यक्ष मिलाप होना बन्द हो जायगा। इसलिए उससे पहले ही हमने जिस जल-स्थल, आकाश-वायु-रूप माता की गोद में जन्म लिया है, उसके साथ हमें अच्छी तरह परिचय कर लेना चाहिये, माता के दूध के समान उसका अमृत रस खींच लेना चाहिए और उसका उद्धार मन्त्र ग्रहण कर लेना चाहिये।

ऐसा करने से ही हम सच्चे और पूरे मनुष्य बन सकेंगे। बालकों का हृदय जब नवीन रहता है, उनका कौतूहल जब सजीवन होता है और उनकी सारी इन्द्रियों की शक्ति जब सतेज रहती है, तब उन्हें खुले आकाश में जहाँ कि हवा और धूप खेलती रहती है—खेलने दो। उन्हें इस पृथ्वी माता के आलिंगन से वंचित मत करो। सुन्दर और निर्मल प्रातःकाल में सूर्य को उनके प्रत्येक दिन का द्वार अपनी ज्योतिर्मय उँगलियों के द्वारा खोलने दो और सौम्य गंभीर सन्ध्या को उनका दिवावसान नक्षत्र खचित अन्धकार में चुपचाप निमीलित होने दो! वृक्ष और लताओं के शाखा-पल्लवों से सुशोभित नाटक शाला में छह अंकों में छह ऋतुओं का नाना रस विचित्र गीत नाटक का अभिनय उनके सामने होने दो! वे झाड़ों के नीचे खड़े होकर देखें कि नववर्षा यौवराज्य पद पर अभिषिक्त राज पुत्र के समान अपने दल के दल सजल बादल लेकर आनन्द गर्जन करती हुई, चिरकाल की प्यासी वन भूमि के ऊपर आसन्न वर्षण की छाया डाल रही है और शरत्काल में अन्नपूर्णा धरती की छाती पर ओस से सींची हुई, वायु से लहराती हुई, तरह-तरह के रंगों से चित्रित और चारों दिशाओं में फैली हुई खेतों की शोभा को अपनी आँखों से देखकर उन्हें धन्य होने दो!

हे बालकों के रक्षक अभिभावकगण! तुम अपनी कल्पना वृत्ति को चाहे जितनी निर्जीव और अपने हृदय को चाहे जितना कठिन बना लो, परन्तु दोहाई तुम्हारी, यह बात कम से कम लज्जा की खातिर ही मत कहना कि “बालकों को इनकी कुछ आवश्यकता नहीं है।” अपने बच्चों को इस विशाल विश्व में रहकर विश्व जननी के लीला स्पर्श का अनुभव करने दो। तुम्हारे इन्स्पेक्टरों के मुलाहिजों और परीक्षकों के प्रश्न पत्रों की अपेक्षा यह कितना उपयोगी है इसका भले ही तुम अपने हृदय में अनुभव न कर सकते हो, तो भी बालकों के कल्याण के लिए तो इसकी बिलकुल उपेक्षा मत करो।

जिस समय मन बढ़ता है उस समय उसके चारों ओर एक बड़ा भारी अवकाश विश्व प्रकृति के बीच विशाल भाव से, विचित्र भाव से और सुन्दर भाव से मौजूद है। किसी तरह साढ़े नौ और दस बजे के भीतर अन्न निगलकर शिक्षा देने की मृगशाला में पहुँचकर हाजिरी देने से बच्चों की प्रकृति किसी भी तरह सुस्थ भाव से विकसित नहीं हो सकती। हाय! हमारी शिक्षा दीवालों से घेर कर, दरवाजे को रुद्धकर, दरवान बिठाकर, दण्ड या सजा से कण्टकितकर, और घण्टानाद द्वारा सचेत करके कैसी विलक्षण बना दी गई है! बच्चे बीजगणित न सीख कर, और इतिहास की तारीखें कण्ठ न करके माता के गर्भ से जन्म लेते हैं, इसके लिये क्या वे अपराधी हैं? मालूम होता है, इसी अपराध के कारण इन अभागों से उनका आकाश, वायु और उनका सारा आनन्द, अवकाश छीनकर उनके लिए शास्ति सा दण्ड रूप बना दी जाती है, परन्तु जरा सोचो तो सही कि बच्चे अशिक्षित अवस्था में क्यों जन्म लेते हैं? हमारी समझ में तो वे न-जानने से धीर धीरे जानने का आनन्द पावेंगे, इसीलिए अशिक्षित होते हैं।

हम अपनी असमर्थता और बर्बरता के वश यदि ज्ञान शिक्षा को आनन्द जनक न बना सके, तो न सही, पर चेष्टा करके, जान बूझकर, अतिशय निष्ठुरता पूर्वक निरपराधी बच्चों के विद्यालयों को कारागार (जेलखाने) तो न बना डालें। बच्चों की शिक्षा को विश्व प्रकृति के उदार रमणीय अवकाश में से उन्मेषित करना ही विद्यता का अभिप्राय है। इस अभिप्राय को हम जितना ही व्यर्थ करते हैं, इतना ही अधिक वह व्यर्थ होता है। मृगशाला की दीवालें तोड़ डालो, मातृ गर्भ के दस महीनों में बच्चे पण्डित नहीं हुए, इस अपराध पर उन बेचारों को सपरिश्रम कारागार का दण्ड मत दो, उन पर दया करो।


अहिंसा में ही कल्याण है।

(सन्त टी. एल. वास्वानी)

विभिन्न धर्मों ने भेदों और झगड़ों का सृजन किया है, अब वे आध्यात्मिक जीवन-सम्बन्धी नये विचार, नूतन देश भक्ति और नवीन राष्ट्रीय जीवन का सृजन करें, क्योंकि सत्य असीम है और धर्म का उद्देश्य भिन्नता और झगड़ों का उत्पादन करना नहीं, किन्तु उदारता और प्रेम का पाठ पढ़ाना है।

अहिंसा-यह वस्तु आलस्य और कायरता के परे है। अहिंसा सत्तात्मक है, निरी कल्पना नहीं। यह साधारण गुणों से उच्च श्रेणी की वस्तु है। यह एक शक्ति है। यह शक्ति शान्ति की है-लड़ाकू दुनिया में शान्ति की अन्तः प्रेरणा है।

बहुत दिनों से यूरोप में नित्य ही बलात्कार और हिंसा के नये-नये कार्य-क्रम स्वीकृत हो रहे हैं। आज भारत में भी बहुत लोगों के लिए वे आकर्षण सिद्ध हुए हैं। एक फ्राँसीसी ने अभी हाल में ही प्रकाशित एक पुस्तक में लिखा है—”हमें जर्मनी के नाश की जरूरत है।” एक भारतीय ने भी रशियोद्धार-फंड में सहायता करने के लिये आग्रह किये जाने पर कहा था—”हमें आवश्यकता है-यूरोपियनों के नाश की।” इस तरह की बातें मेरे हृदय को पीड़ा पहुँचाती हैं। फिर मैं भारत के ज्ञानी महात्माओं का चिन्तन करता हूँ, जिन्होंने आज से 25 शताब्दी पहले हिन्दुस्तान के लोगों को वह महान् संदेश—’द्वेष को सहानुभूति और निःस्वार्थता से जीतो’—दिया था।

मैं इतिहास के पृष्ठों को नाश और क्षय से आच्छादित पाता हूँ। युद्ध! नाश! धार्मिक अत्याचार! अपनी जीवन-यात्रा में हमने अहिंसा को अपना लक्ष्य नहीं रखा। हमारे भोजन में, हमारे व्यापार में और सामाजिक जीवन में क्या अहिंसा से हिंसा अधिक है?

और वर्तमान राजनीति में हम क्या देखते हैं, कषायों की मन्त्रणा या अहिंसा की शक्ति ?

इस बात का मैं और भी अनुभव करता हूँ; और वह यह है कि राष्ट्रीय आन्दोलनों को एक नवीन उदार आध्यात्मिक स्पन्दन (प्रोत्साहन) मिल जाना चाहिए। एक भ्रातृत्वमय सभ्यता का निर्माण होना चाहिए। विद्वेष हमारी सहायता नहीं करेगा। आजकल राष्ट्र अपनी मानसिक शक्तियों की सम्पत्ति लड़ाई-झगड़ों में खर्च कर रहे हैं। हमें चाहिए कि हम ईश्वर को अपने राष्ट्रीय जीवन में खींच लावें। मानव-विश्व के पुनर्निर्माण के लिए हमें आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता है।

यदि कोई मुझ से एक ही शब्द में कहने के के लिये कहे कि भारत की आत्मा क्या है? मैं तो कहूँगा—’अहिंसा’। भारत का अन्तः अन्वेषण अहिंसा को विचार, कला, उपासना को जीवन में समाहृत करता रहा है।

अहिंसा के सिद्धान्त ने भारतवर्ष के साँसारिक सम्बन्धों पर भी प्रभाव डाला। उसने साम्राज्यों और विजयों के स्वप्न नहीं देखे और वह जापान तथा चीन का भी गुरु हो गया। अपनी इस आध्यात्मिक उन्नति के कारण यह अपरिचित देश उन देशों का श्रद्धापात्र हो गया। भारतवर्ष सैनिकवादियों का देश नहीं था। मनुष्यता के प्रति आदर बुद्धि ने ही उसे साम्राज्यवादित्व की आकाँक्षा से बचा लिया। वह महान् राजनीतिक सत्य था, जिसे बुद्ध ने अपने वचनों में व्यक्त किया था कि “विजेता और विजित दोनों ही असुखी हैं। विजित अत्याचार के कारण और विजेता इस डर के मारे कि विजित कहीं फिर न उठ बैठे और उस पर विजय प्राप्त करें।” भारतवर्ष ने कभी किसी देश को गुलाम बनाने का प्रयत्न नहीं किया। गुलाम बनाना ही हिंसाचरण है।

यूरोप इस प्रकार पीड़ित है और संक्षोभ में भटकता फिर रहा है, और प्रायः लोग उसकी शक्ति को भूल से स्वातंत्र्य समझ बैठे हैं। साधनों के बिना और नैतिक नियमों के अभ्यास के बिना स्वातंत्र्य नहीं हो सकता। यूरोप अभी तक राष्ट्रीय और जातीय नियम से अधिक और किसी नियम को नहीं मानता। इसके परिणाम हैं राष्ट्रीय संघर्ष और परिश्रम के राष्ट्रवाद। इनका परिणाम हुआ संसार-व्यापी युद्ध, और युद्ध का अभी तक अन्त नहीं हुआ है।

मुझे मालूम है कि युवकों को हिंसा के मूल्य के विषय में सन्देह है, वे प्रकृति से शक्ति-मदमत्त अनियन्त्रित शासन द्वारा किये गये अपने देश के अपमान के कारण संक्षुब्ध हैं, परन्तु स्वतन्त्रता के युद्ध में शक्ति का रहस्य धर्म युक्त उद्यम और आत्मायज्ञ का अभ्यास है। जिस अहिंसा की चर्चा मैं कर रहा हूँ, वह निर्बलता नहीं है सच्ची अहिंसा मृत्यु का डर नहीं है, किन्तु मनुष्यता के प्रति आदर भाव है—कि ‘अहिंसा यज्ञ है। और यज्ञ अथवा बलदान महान् बल है।’ जब मैं अपने काम के लिये जाता हूँ, तब गीता के एक उद्गार को अपने-आप गुनगुनाया करता हूँ “हे कौन्तेय, मेरा भारत कभी नष्ट न होगा।”


Quotation

—”हमेशा दूसरों की नेकी और भले का ख्याल रखो, किसी की बुराई स्वप्न में भी मत सोचो। किसी को फरेब और जाल में फँसाकर धोखा मत दो। किसी के साथ असभ्यता से पेश मत आओ, हमेशा नेक चलन रहो।”

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—खुद को कमजोर मत समझो, निर्भयता से आगे बढ़ते रहो। तुममें वह शक्ति है कि दुनिया के बड़े से बड़े दुश्मन तुम्हें परास्त नहीं कर सकते।”


सच्चा धन प्राप्त करने की कला

(डेरेक नेबिले)

धनी होना एक कला है, और मेरी समझ में इसका रहस्य अकिंचन बनने में हैं। अकिंचन होने पर ही हम सब कुछ प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं।

हमारे जीवन में सबसे अधिक सुखमय और मूल्यवान् वही क्षण हैं, जब हम भौतिक जगत के मायाजाल से अपने-आपको तटस्थ करके आत्मानुभूति में पूर्ण रूप से स्थित हो जाते हैं। इन क्षणों को प्राप्त करने का सौभाग्य तभी प्राप्त होता है, जब हम दिव्य सौंदर्य के सम्मुख होते हैं, अन्यथा नहीं। भौतिक जगत् की सम्पत्ति इनको नहीं खरीद सकती और न संसार की ऊंची-से-ऊंची अवस्था अथवा शक्ति ही इनको प्राप्त कराने में समर्थ है। क्योंकि ये वही क्षण हैं, जब आत्मा शिशु-सुलभ सरलता से अपने प्रियतम भगवान की अनुपम सुन्दरता का पूजन करती है।

मनुष्य का सुन्दरतम अर्थात् सर्वोत्तम सुखमय क्षण ही उसका सबसे अधिक मूल्यवान समय होता है। मानव-अनुभूति की पराकाष्ठा अपने भाइयों पर शासन करने की अथवा संसार में किसी भी इच्छित, मूल्यवान् निधि को खरीदने की शक्ति में नहीं है। वास्तविक सम्पत्ति तो आत्मा की अनुभूति से ही प्राप्त होती है। सुख की व्यावहारिक मुद्रा अर्थात् चलतू सिक्का ‘प्रेम’ है।

सबसे अधिक धनी वही है, जो सबसे अधिक देता है। ऐसा देना साँसारिक धन के रूप में कदापि नहीं हो सकता। रुपया, आना, पाई केवल प्रतीक मात्र हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। कभी तो ये उन बेड़ियों के प्रतीक बन जाते हैं जो हमें संसार में बाँधती हैं और कभी उस प्रेम के जो हमें जड़वाद से मुक्त करता है, किंतु जीवन के सच्चे सम्पन्न अर्थात् सुखद क्षणों में तो अधिकतर इनका प्रवेश ही नहीं होता।

जिस संसार में हम चलते, फिरते और बसते हैं, उसको यथार्थ रूप में समझने की चेष्टा अवश्य करनी चाहिये। साधारण मनुष्य की दृष्टि केवल गलने-सड़ने और नष्ट होने वाली वस्तुओं पर ही निर्णय दे सकती है। परन्तु इस ऊपरी स्थूलता के पीछे बहुमूल्य आध्यात्मिक वस्तुओं का एक अनादि सागर है-अलौकिक सम्पत्ति की एक बाढ़-जिसके सम्बन्ध में हम प्रायः अनभिज्ञ हैं। तथापि यह आध्यात्मिक सम्पत्ति सबके लिए समान रूप से प्राप्य है। इसके लिये धनी-दरिद्र की अपेक्षा नहीं इस सम्पत्ति पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। और वास्तव में इसी की प्राप्ति के लिये तो हमारा इस संसार में जन्म हुआ है। यदि हम इस आध्यात्मिक सम्पत्ति के जो अलौकिक सुन्दरता की खान है, अनुसंधान में तत्पर नहीं होते तो हमारा जीवन नीरस और निरर्थक बन जाता है।

जो मनुष्य साँसारिक समृद्धि से सन्तुष्ट होने की कल्पना करता है, उसके सम्बन्ध में यदि यह कहा जाय कि गगन के नक्षत्र ही उसके लिये एक-एक करके अदृष्ट और निस्सार होते जाते हैं तो अत्युक्ति नहीं होगी। क्रमशः उसके जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब वह अपने क्षुद्र व्यावहारिक क्षेत्र की सीमा के बाहर कुछ भी नहीं देख सकता। उसकी दृष्टि ऊपरी दृश्यों के अन्तस्तल में प्रवेश ही नहीं करती, इन्द्रियों की अनुभूति के अतिरिक्त वह और कुछ भी जिज्ञासा नहीं करता और वह यह समझ नहीं पाता कि आत्म शक्ति के बिना ये इन्द्रियाँ केवल मुद्रा हैं। ऐसे जीवन-व्यापार में वह केवल अपनी आत्मा का ही हनन करता है।

परन्तु जो उस अनुपम दिव्य सौंदर्य को अपने जीवन की सबसे अधिक मूल्यवान् विधि समझकर अपनी आत्मा की अनिर्वचनीय मौन प्रेरणा का अनुकरण करता है, वह निश्चय ही एक दिन इस पृथ्वी और इसकी समृद्धि का मालिक हो जाता है। क्योंकि ऐसे ही महानुभावों के सम्मुख जीवन का रहस्य स्वतः पूर्णरूपेण व्यक्त हो जाता है।

यह साधारण रहस्य की बात है, इतनी सरल है कि इसको समझने के लिये हमें विद्वत्ता की कोई आवश्यकता नहीं। जीवन की अमूल्य निधि एक स्त्रोत के समान स्वतः हमारे भीतर से फूट पड़ती है। सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों का अस्तित्व तो द्रष्टा के चर्म-चक्षुओं पर निर्भर करता है। हमारे धर्म-चक्षु जो कुछ बाह्य जगत् में सुन्दरता अथवा सम प्रवाहित गति को देखते हैं, ये सब हमारे अभ्यन्तर जीवन के बाहरी प्रमाण हैं। धनी होने में ऐसी अनुभूति ही सच्ची कला है।

ऐसा समझना मूर्खता होगी कि हमारे सामान्य व्यवहारों का कुछ भी महत्व नहीं है। प्रतिदिन हम सैकड़ों काम करते हैं, परन्तु हमारे जीवन में उस काम का सर्वोच्च महत्व है, जिसका देखने में न कोई स्वरूप है और न सार ही। हमें यह समझना चाहिये कि सब वस्तुओं और सब कर्मों में बाहर और भीतर आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह है, जिसके आधार पर विश्व स्थित है।

आत्म निरीक्षण के अभ्यास से ही हमारे चक्षु खुलते हैं। यदि सामान्य दृष्टि प्रत्येक स्थूल अथवा सूक्ष्म वस्तु को देखने का एकमात्र साधन होती तो सब-के-सब आत्मानुभूति के एक ही स्तर पर होते। किंतु देखने में आता है कि बहुत-से लोग ऐसे हैं, जिनके चर्म-चक्षुओं की ज्योति पूर्ण रूप से ठीक है तथापि विश्व में वे उस दिव्य उज्ज्वल सौंदर्य को नहीं देख सकते। इसका कारण यह है कि उनको अपने अभ्यन्तर जीवन में स्थूल दृष्टि के स्त्रोत का अनुभव नहीं हुआ।

आध्यात्मिक व्यापार क्षेत्र की एकमात्र उपयुक्त मुद्रा ‘प्रेम’ है और इसके बदले में कुछ भी पाने की भावना के बिना प्रदान करना होगा। इसको हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारे जमा-खाते की बढ़ती जितनी खर्च करने पर निर्भर करती है, उतनी जमा करने पर नहीं। यह निश्चय ही साँसारिक व्यवहार के बिलकुल विपरीत है। क्योंकि आध्यात्मिक सभ्यता भौतिक सभ्यता के ठीक विपरीत होती है। संसार भौतिक लाभ पर जोर देता है तो आत्मा त्याग पर। संसार समृद्धि को भौतिक शक्ति से नापता है तो आत्मा नम्रता और विनय के अनुपात से।

अन्तर केवल वैसा ही है जैसा कि प्रभेद दिखाने कि लिये हम एक प्रयोग के परिणाम की तुलना ठीक उसके विपरीत प्रयोग के परिणाम से करते हैं। क्योंकि साँसारिक मनुष्य कभी भी सुख शान्ति का अनुभव नहीं कर सकता। उसका सुख और आध्यात्मिक सम्पत्ति तो आत्मा के व्यापार को समझने की सामर्थ्य पर निर्भर है।

वर्तमान जगत् की बड़ी-बड़ी समस्याएँ उतनी जटिल नहीं जितनी कि देखने में आती हैं। मनुष्य उनको अपनी बुद्धि और स्थूल शक्ति यों द्वारा सुलझाने की चेष्टा करता है, परन्तु यह नहीं समझता कि ये सब समस्याएँ उसकी मूर्खता से उत्पन्न हुई हैं, आध्यात्मिक शक्ति के प्रयोग से संसार की बड़ी-से बड़ी समस्या अति अल्पकाल में ही सुलझ जाती है।

यह कहा जाता है इस समय मानव-जाति को अनेक अति आवश्यक वस्तुओं के अभाव का सामना करना पड़ रहा है। परन्तु आध्यात्मिक शक्ति की कमी नहीं, वह प्रचुर मात्रा में उपस्थित है। यदि इसका अनुसंधान करके इसको प्रधानता दी जाय तो छूमन्तर की तरह संसार की अनेक समस्याएँ काफूर हो जायं। फिर सबको सहज ही सदा की भाँति खाद्य पदार्थ प्रचुर मात्रा में प्राप्त हों और सबके हाथ में रोजगार भी आ जाये। यदि प्राणियों के जीवन और कार्य के पीछे सेवा की भावना हो तो मनुष्य मात्र एक नवीन उत्साह से अनुप्राणित हो उठे। आध्यात्मिक सम्पत्ति ही मानव-जाति को सर्वोच्च समृद्धि की प्राप्ति करा करती है।


मोह के बन्धन मत बढ़ाइए।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

संसार की नाना वस्तुओं का मोह आत्मा को बेड़ियों में बाँधता है छोटी-छोटी वस्तुओं में मनुष्य की मनोवृत्ति संलग्न रहती है। जितना अधिक मोह उतना ही बंधन उतनी ही मानसिक अशांति। साँसारिक चमक-दमक में जितना विलीन होंगे, उतना ही आत्म-तत्व को खो देंगे।

एक महर्षि की कथा कही जाती है। एक महात्मा संसार में बैरागी बन, संसार की सम्पूर्ण माया, ममता का बन्धन काट कर संन्यास धारण कर वन में तपश्चर्या के लिये गये। संसार को भूल कर निरन्तर आत्मा में लीन हो गये। साधना करते-करते कई मास व्यतीत हो गये। मन पर संयम तथा अन्तःवृत्तियों पर शासन करने लगे। एक दिन क्या देखते हैं कि उनके आश्रम में दो सौ गज दूर पर बकरियों का एक झुण्ड हरी घास चर रहा है। इतने में एक सिंह ने आक्रमण किया और एक बकरी को ले गया। सब बकरियाँ यत्र-तत्र भाग गई केवल मिमियाता हुआ एक बच्चा छूट गया। उसकी माँ सिंह के द्वारा ले जाई जा चुकी थी। महात्मा को दया आई। वे गये और उस छोटे बच्चे को उठा लाये। पालने लगे उस बच्चे के लिये हरी घास तथा जल का प्रबन्ध करने लगे। मास भर में बच्चे में स्वास्थ्य आ गया। ममता मोह बढ़ा। बच्चे को छाया देने के लिए महात्मा ने एक पर्णकुटी की रचना की, घास चारे का प्रबन्ध किया। वर्ष भर में बकरी बढ़ कर जंचने लगी। फिर ऐसा समय आया जब उसके दो छोटे-छोटे बच्चे उत्पन्न हुए। एक से तीन हो गये। महात्मा की चिन्ता और बढ़ी। अब उन्हें अधिक चारे तथा स्थान का प्रबन्ध करना पड़ा। होते-होते महात्मा के पास बकरियों का एक पूरा झुण्ड हो गया। जिस संसार को छोड़कर चले थे, मोह वश होकर फिर उसी में वापस आ गये उनकी आत्मा बकरी के प्रत्येक बच्चे में बँध गई।

मनुष्य का मोह नाना वस्तुओं जैसे घर, जायदाद, बच्चों, छोटी-छोटी अनेक वस्तुओं के प्रति होता है यही बन्धन है। जब उसकी किसी वस्तु को किसी प्रकार का कष्ट पहुँचता है, या किसी स्वार्थ पर चोट आती है तो आत्मा को कष्ट होता है। मनः शान्ति भंग हो जाती है। मनुष्य अन्दर ही अन्दर मानसिक पीड़ा का अनुभव करता है।

सन्तान का मोह मनुष्य की आत्मा का सबसे बड़ा बन्धन है। आपके तीन बच्चे हैं, पत्नी है, इनमें से कोई भी बीमार होकर मनः शान्ति भंग कर सकता है। पत्नी को कोई रोग हो जाय, तो आपका मन दुखी रहता है। सन्तान से आप कुछ आशा करते हैं, यदि वह पूर्ण नहीं होती तो आप मन की पीड़ा से विक्षुब्ध हो उठते हैं।

मान लीजिए, आप एक छोटा कुत्ता घर में पाल लेते हैं। एक प्राणी का घर में आगमन आत्मा पर एक नया बन्धन होगा। उसके भोजन, स्वास्थ्य, निवास, प्रसन्नता इत्यादि की अनेक चिन्ताएँ आपकी आत्मा पर आ जायेंगी। घर में पला हुआ प्रत्येक पक्षी आपकी आत्मा को मोटे-मोटे रस्सों में बाँधता है। किसी दूसरे व्यक्ति के बाल बच्चों को अपने घर में रख लेना आत्मा के बोझ को बढ़ाना है।

आपके पास एक घर है, पर आप एक और लेने की कामना करते हैं। यह नया बन्धन होगा। आवश्यकता से अधिक कुछ भी रखना, तरह-तरह के शौक, फैशनपरस्ती, धन की तृष्णा, भोग-विलास की अतृप्त कामना आत्मा के बन्धन हैं। इनमें से प्रत्येक में बँध कर मनुष्य तड़प जाया करता है। मोह के ये बन्धन मजबूत जंजीरों से आपको बाँधे हुये हैं। जब-जब आप मनः शाँति का लाभ उठाना चाहते हैं तब तब इनमें से कोई भोग पदार्थ आपको खींच कर पुनः पहली वाली स्थिति में ला पटकता है। मनुष्य की मुक्ति नहीं- स्वतन्त्रता नहीं।

आपके परिवार का प्रत्येक व्यक्ति पर एक प्रकार का बन्धन है। ऋण-बन्धन है, फैशन की वस्तुएँ, जिनके एक दिन ना होने से आप दुख का अनुभव करते हैं, आपका बन्धन है। मादक द्रव्य-शराब तम्बाकू, चाय, बीड़ी इत्यादि वस्तुएँ, जिनसे आप बंधे हुये हैं, आपको आध्यात्म पथ में अग्रसर नहीं होने देते, आपका प्रत्येक सामाजिक, आर्थिक पारिवारिक, उत्तरदायित्व आप पर बन्धन स्वरूप होकर आता है। यदि आपको बढ़िया सूट-बूट कीमती वस्त्र पहनने का व्यसन है, तो इनकी अनुपस्थिति में आप मनःशाँति भंग कर लेंगे। यदि किसी दिन साधारण भोजन प्राप्त हुआ और आप नाक-भौं सकोड़ने लगे, तो यह भी मन की शान्ति को भंग करने वाली है। दो चार दिन के लिये भी आपको साधारण घर, कुटी या धर्मशाला में रहना पड़े तो आप बिगड़ ही उठते हैं। यह सब इसलिये है कि आपने विविध रूपों से, अपनी आत्मा को कृत्रिम उत्तरदायित्वों से बाँध लिया है। आत्म-तत्व को खो दिया है। जरूरत से अधिक संसार में लिप्त हो गये हैं। अपनी आत्मा के प्रति ईमानदार नहीं रहे हैं।

तुम्हारा सम्बन्ध संसार की इन अस्थिर एवं क्षणिक सुख देने वाली वस्तुओं से नहीं हो सकता। तुम उत्तम वस्त्रों में अपने जीवन के निरक्षेप सत्य को नहीं भूल सकते। तुम स्वच्छन्द, संसार के क्षुद्र बंधनों से उन्मुक्त आत्मा हो। तुम वस्त्र नहीं, पारिव्य नहीं, संसार के भोग-विलास नहीं, प्रत्युत सत चित् आनन्द स्वरूप आत्मा हो। तुम्हारा निकट सम्बन्ध आदि स्रोत परमात्मा से है। उसी सत्ता में विलीन होने से आत्म सन्तोष प्राप्त होता है।

तुम्हारे जो सम्बन्ध संसार से जकड़े हुये हैं, वे दुःख स्वरूप हैं, मृत्यु से जो तुम्हें भय प्रतीत होता है, उसका कारण ये ही साँसारिक मोह है न माता, न पिता, भाई, पत्नी, पुत्र सम्बन्धी कोई भी तुम्हारे साथ सर्वथा नहीं रह सकता। ये बाह्य बन्धन हैं। सबसे उत्तम मार्ग तो यह है कि इनमें रहते हुये भी, सदा अपने आपको पृथक समझा जाय। जैसे कमल जल में रहते भी सदा जल से ऊपर रहता है, उसी प्रकार साँसारिक बन्धनों में रहते हुए गृहस्थ के कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी सदा अपने आपको संसार से मुक्त देखिए।

‘मैं संसार से सर्वथा मुक्त हूँ। मेरा लगाव इतना ही है, जितना कमल का जल से होता है, धन, मान, सम्पदा, वासना के चक्र, बनाव-शृंगार, पर-गौरव, माया-मोह कोई मुझे सदा के लिए नहीं बाँध सकते। मैं संसार का मिथ्यात्व, अस्थिरता और व्यर्थता समझ गया हूँ। संसार से मेरा सम्बन्ध अस्थायी है। मैं तो आत्मा हूँ। आत्मतत्वों से विभूषित हूँ। आनन्द कन्द परमेश्वर जिसमें समस्त इच्छाओं का निरोध ही- अक्षय सुख आनन्द, उल्लास प्राप्त होता है, उस, से मेरा निकट सम्बन्ध है। मैं आत्मा के महान तत्व को अपने जीवन में स्पष्ट कर रहा हूँ। मेरा अस्तित्व महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। मैं संसार की उलझनों में अपनी आत्मा को नहीं भूलूँगा। मैं साँसारिक समस्याओं में, खान-पान, शृंगार, धन एकत्रित करना, दूसरे का माल हड़पना, अनुचित हस्तक्षेप, रिश्वतखोरी से बहुत ऊँचा हूँ। मैं इन शुद्ध बातों से स्वतन्त्र हूँ। मेरे मन की छिपी हुई अभद्र कल्पनाएँ, पापमय वासनाएँ नष्ट हो चुकी हैं। धन, जन, मान, प्रतिष्ठा, जायदाद, ईर्ष्या, द्वेष रहित होकर परम निर्मल हो गया हूं। मैं विशुद्ध आत्मा हूँ। मेरी साँसारिक रुकावटें हट गई हैं। सब पार्थिव बन्धन खुल गए हैं।”

उपरोक्त भावना में रमण कीजिए। पुनः पुनः इस पर विचार करने से आत्म चिंतन की भावना गुप्त मन में स्थायी हो जायेगी। अज्ञानता जन मोह दूर हो जायगा, आत्म-भाव का उदय होगा। तुम्हारी अशाँति छोटे मोटे झगड़े, व्यर्थ ही दुरभि-सन्धि, शुद्ध वस्तुओं के प्रति मोह, शरीर, रुपया, मान, ईर्ष्या, वासना-दृष्टि सम्बन्धी चिंताएँ, समस्त उद्वेग, मानसिक परतन्त्रता दूर हो जायगी। अतः संसार की चमक-दमक में आप अपना आत्म तत्व न खो दें।

आवश्यकता से अधिक धन संग्रह करने का मोह त्याग दीजिये। आपके लिए एक मकान ही पर्याप्त है। व्यर्थ के लेन देन, सूद पर रुपया देना, खाद्य पदार्थों का संग्रह त्याग दीजिए। परिवार की वृद्धि न कीजिए। दूसरों की जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर लेना मूर्खता है। अपने ऊपर कम से कम बोझ रखिए। “मैं आत्मा तत्व हूँ। सब प्रकार के विकारों से मुक्त हूँ”

इस भावना का चिन्तन और व्यवहार करने से जगत् आनन्दमय दीखने लगता है। निर्लिप्तावस्था में ही मनः शान्ति स्थिर रह सकती है। उठिए, अपनी आत्मा के बन्धनों को काट डालिये।


वेदों में गो महिमा

(श्री वेणीराम शर्मा गौड़)

मानव-जाति के लिए गौ से बढ़कर उपकार करने वाली और कोई वस्तु नहीं है। गौ मानव जाति की माता के समान उपकार करने वाली, दीर्घायु और निरोगता देने वाली है। यह अनेक प्रकार से प्राणिमात्र की सेवा कर उन्हें सुख पहुँचाती है। इसके उपकार से मनुष्य कभी उऋण नहीं हो सकता। यही कारण है कि हिन्दू जाति ने गाय को देवता और माता के सदृश्य समझ कर उसकी सेवा-शुश्रूषा करना अपना प्रधान धर्म समझा है। गाय का महत्व प्रतिपादन करने वाले कुछ वेद मन्त्र और शास्त्र वचन नीचे उपस्थित करते हैं।

“देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण

आप्यायध्वमध्न्या इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाँ अयक्ष्मा मावस्तेन ईशत माघशँ सो ध्रुवा अस्मिन्गोपतौ स्यात्॥”

(शु. यजु. 1।1)

‘हे गौओं! प्राणियों को सत्कार्यों में प्रवृत्त कराने वाले सवितादेव, आपको हरित शस्य संपन्न विस्तृत क्षेत्र कर्मों का अनुष्ठान होता है। हे गौओं! आप इन्द्र के क्षीर मूलक भाग को बढ़ावें अर्थात् अधिक दूध देने वाली हों। आपकी कोई चोरी न कर सके, व्याघ्रादि हिंसक जीव भी आपको न मार सकें, क्योंकि आप तमोगुणी दुष्टों द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हो। आप बहुत सन्तान उत्पन्न करने वाली हैं जिनसे संसार का बहुत कल्याण होता है। आप जहाँ रहती हैं वहाँ किसी भी प्रकार की व्याधि नहीं आ सकती! यहाँ तक कि यक्ष्मा (तपेदिक) आदि राजरोग भी आपके पास नहीं आ सकते, अतएव आप सर्वदा यजमान के घर में सुख पूर्वक निवास करें।

अन्धस्थान्धो वो भक्षीय महस्थ महो वो भक्षीयोर्जस्थोर्ज। वो भक्षीय रायस्पोषस्थ रायस्पोषं वो भक्षीय ॥ शु. यजु. 3। 20

‘हे गौओं! आप अन्न को देने वाली हैं अतः आपकी कृपा से हम अन्न को प्राप्त करें। आप पूजनीय हैं, आपके सेवन से हममें सात्विक उच्च भाव पैदा होते हैं। आप बल देने वाली हैं, हमें भी आप बल दें। आप धन को बढ़ाने वाली हैं अतः हमारे यहाँ भी धन की वृद्धि और शक्ति संचार करो।’

(शु. यजु. 3।22)

हे गौओं! तुम विश्वरूप वाली दुग्ध-घृत रूप ह्यिदान के निमित्त यज्ञ कर्मों में संगति वाली हो। क्षीरादि रस द्वारा गो स्वामित्व में मुझमें सब प्रकार से प्रवेश करो। अर्थात् हमारा गो स्वामित्व अविचलित रक्खो। रात्रि में भी निरन्तर निवास करने वाले हे, अग्नि देवता! हम प्रतिदिन श्रद्धा-युक्त बुद्धि से तुमको नमस्कार करते हुए तुम्हारे प्रति प्राप्त होते हैं।’

इड एह्म दित एहि काम्या एत।

मयि वःकामधरणं भूयात्॥

(शु. यजु. 3। 27)

‘हे पृथ्वी रूप गौ! इस स्थान पर आओ। घृत द्वारा देवताओं को अदिति के सदृश पालन करने वाली अदिति रूप गौ! इस स्थान पर आगमन करो।

गौओं! तुम सब साधनाओं को देने वाली होने के कारण सब की आदरणीय हो। हे गौओं! तुम इस स्थान पर आओ तुम्हारा जो अपेक्षित फल धारकत्व है सो मुझ अनुष्ठान करने वाले में तुम्हारी कृपा से हो, तुम्हारे प्रसाद से मैं अभीष्ट फल का धारण करने वाला हूँ।’

अपस्त्रमिन्दुमहष्भुंरण्युमाग्निमीडे षूर्वचितिं नमोभिः।

स पर्वभिऋतुशः कल्पमानी गाँ मा हँम् सीरदितिं विराजताम्॥ (शु. य. 13। 43)

‘क्षय रहित ऐश्वर्य से युक्त रोष रहित अथवा आराधना के योग्य पूर्व महर्षियों से चयन के योग्य अन्नों से सबके पोषण करने वाले अग्नि द्वारा स्तुति करता हूँ। वह अग्नि पर्व द्वारा प्रत्येक ऋतु में कर्मों का सम्पादन करता हुआ अखण्डित अदीन दुग्धदानादि से विराजमान दस ऐश्वर्य होने से गौ विराट हैं अतएव गौ को मत मारो।’

गो में माता ऋषभः पिता में दिवम् शर्म्म जगती में प्रतिष्ठा॥ (ऋग्वेद)

‘गाय मेरी माता, बैल मेरा पिता, यह दोनों मुझे स्वर्ग और ऐहिक सुख प्रदान करें। गौओं में मेरी प्रतिष्ठा हो।’

यूयं गावो भेद कृशं चिदक्षीरं चि कृणुथा सुप्रतीकम्।

भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहदो वय उच्यते सभासु॥

(अथर्ववेद)

गौओं दूध से निर्बल मनुष्य बलवान और हृष्ट पुष्ट होता है तथा फीका और निस्तेज मनुष्य तेजस्वी बनता है। गौओं से घर की शोभा बढ़ती है। गौओं का शब्द बहुत प्यारा लगता है।’

शास्त्रों में भी :-

गोम्यो यज्ञाः प्रवर्त्तन्ते गोभ्यो देवाः समुत्थिताः।

गोभ्यो वेदाः समुद्गीर्णाः सषडंगपदक्रमाः॥

‘गौओं के द्वारा यज्ञ चलते हैं, गौओं से ही देवता हुए हैं। छओं अंगों सहित वेदों की उत्पत्ति गौओं से ही हुई है।’

शृंगमूलं गवा नित्यं ब्रह्मबिष्णु समाश्रितौ।

शृंगाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावराणि चराणि च॥

‘गौओं के सींग के मूल में ब्रह्मा और विष्णु निवास करते हैं, सींग के अग्रभाग में सब तीर्थ और स्थावर जंगम रहते हैं।

शिरोमध्ये महादेवः सर्वभूतमयः स्थितिः।

गवामंगेषु निष्ठान्ति भुवनानि चतुर्दश॥

‘गौओं के शिर के बीच में सारे संसार के साथ शिवजी निवास करते है। गौओं के अंगों में चौदहों मुवन रहते हैं।

गावः र्स्वगस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः।

गावः कामदुहो देव्यो नान्यत्किञ्चित्षरं स्मृतम्॥

‘गौएं स्वर्ग की सीढ़ी हैं, स्वर्ग में भी गौओं की पूजा होती है। गौएं अभिलषित फल देने वाली हैं, गौ से बढ़कर उत्तम और कोई वस्तु नहीं है


इच्छा का आकर्षण

(प्रो. शान्तिचरण विश्वास एम. एम. सी.)

संसार की सब वस्तुएं परमाणुमयी हैं, अत्यन्त लघुकाय ऋणाणु और ‘धनाणु’ द्रुत गति से निरन्तर गति शील रहते हैं और उनकी गति के कारण विविध प्रकार की वस्तुओं का निर्माण, विकास, परिवर्तन और रूपांतर होता रहता है।

यह परमाणु आकर्षण और विकर्षण के नियमों से बँधे हुए हैं। इनमें खींचने और फेंकने की शक्ति हैं। यह दो शक्तियाँ ही उनमें क्रियाशीलता उत्पन्न करती हैं। छोटे-छोटे असंख्य अणु मिलकर एक बड़ी वस्तु बनते है। यह आकर्षण शक्ति ही है जो इतने असंख्य अणु इतनी दृढ़ता से एक स्थान पर जमे रहते हैं। यदि यह आकर्षण न हो तो सृष्टि में एक भी वस्तु का रूप न दिखाई दे। अणुओं की गति हीन धूलि मात्र बिखरी रह जाय।

अध्यात्मवाद का सिद्धान्त है कि जड़ परमाणुओं की भाँति सजीव आत्मा के सूक्ष्म तत्व भी आकर्षण शक्तियुक्त हैं, इन्हीं के कारण प्राणियों में साथ साथ रहने की, एक दूसरे की सहायता करने का, प्रेम की, समाज रचना की एवं वंश वृद्धि की प्रवृत्ति होती है। यदि आत्मा में आकर्षण न होता तो जीवित प्राणियों में तनिक भी सहयोग न होता और कीट पतंगों की प्रकृति के जीव जन्तुओं से यह भूलोक भरा होता। सभ्यता, शिक्षा, विज्ञान, धर्म, समाज और शासन जैसी कोई वस्तु दृष्टिगोचर न होती।

कुछ दिन पहले तक भौतिक विज्ञान वेत्ता केवल यह मानते थे कि अणुओं में आकर्षण शक्ति तो है पर उनमें इच्छा, अनुभूति या स्वभाव नहीं है। अब नवीन शोधों ने उस पूर्व मान्यता को गलत सिद्ध कर दिया है। प्रो. हेकल, संसार के गिने चुने विज्ञान वेत्ताओं में हैं। अणु विज्ञान पर उनका अनुभव असाधारण है, उनमें अपनी नवीन शोधों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि— “एक अणु दूसरे अणु से मिलने, उसके साथ देर तक बँधा रहने के लिए तभी तैयार होता है जब वह उसकी अनुभूति और इच्छा के अनुकूल हो। उसमें इच्छा एवं संकल्प की एक हल्की सी शक्ति अवश्य है। इसी के कारण अणुओं की वर्गीकरण और वंश विभाजन होता है। असमान जाति के अणु यदि बल पूर्वक मिला दिये जायं तो देखा जाता है कि वे अच्छा संमिश्रण नहीं बनाते और जल्दी ही विलग हो जाते हैं।

मनुष्य का शरीर ही नहीं वरन् मन भी अणुओं का बना है। शब्द एवं प्रकाश की भाँति विचार और संकल्पों के भी परमाणु होते हैं और वे “सम स्वभाव के आकर्षण” वाले नियमानुसार सजातीय विचारों में मेल-जोल बढ़ाते हैं, उनकी ओर खिंचते तथा खींचते हैं। तदनुसार एक समूह का निर्माण होता है। समान प्रकृति के मनुष्य आन्तरिक विचारों के, स्वभावों के, इच्छाओं के आकर्षण द्वारा एक वर्ग बन जाते हैं। पारस्परिक प्रेम तथा एकता के बन्धन में बँधते हैं।

यह इच्छा जो अणुओं में व्याप्त है वस्तुतः शक्ति का स्त्रोत है। ईश्वर ने इच्छा की है कि ‘मैं एक से अनेक हो जाऊँ” फलतः सारी सृष्टि बन गई। जिसमें जितनी इच्छा है उसमें उतना ही आकर्षण होगा और जितना आकर्षण होगा उतनी ही सुविधाएँ वह प्रकृति के भण्डार में से अपने लिये खींच लेगा। एक सामान्य प्राणी मनुष्य को सृष्टि का मुकुटमणि बना देने का श्रेय उसकी बढ़ी हुई इच्छा शक्ति को ही है। इसी के अभाव में अन्य प्राणी शरीर से बलवान होते हुए भी पिछड़े रह गये और दुर्बल काय मनुष्य ने बाजी मार ली।

जो कुछ हमें प्राप्त होता हो वह पहले इच्छा के क्षेत्र में आता है । इच्छा की प्रेरणा से बुद्धि उसका मार्ग ढूँढ़ती है, थोड़े ही समय में इच्छित वस्तु का धुँधला सा आभास उपलब्ध होने लगता है और धीरे धीरे अभीष्ट वस्तु पूर्व रूप से उपलब्ध हो जाती है।

मनुष्य, मनुष्य के बीच में जो भारी अन्तर दिखाई देता है वह उसकी इच्छा का अन्तर ही है। शारीरिक दृष्टि से मनुष्यों में बहुत कम अन्तर होता है पर मनः क्षेत्र में भारी असमानता पाई जाती है। इस अन्तर के कारण ही धनी निर्धन, मूर्ख विद्वान, चतुर भोंदू, निर्बल सबल, साधु दुर्जन, आदि के भेद दृष्टि गोचर होते हैं। जितनी अधिक इच्छा होती है उतनी ही अधिक शक्ति पैदा होती है और उस शक्ति के द्वारा ही अभीष्ट सफलता मिलती है। जो व्यक्ति विशेष प्रतिभाशाली हैं। धनी, नेता, विद्वान, बलवान आदि विशेषता से युक्त है उसमें निश्चित रूप से दूसरों की अपेक्षा इच्छा शक्ति अधिक तीव्र होती है, उसी के कारण उनके शरीर तथा मन के कल पुर्जे विशेष उत्साह एवं तत्परतापूर्वक काम करते हैं। फलस्वरूप स्वसंचालित विद्युत यंत्र की भाँति उनमें वह आकर्षण उत्पन्न होता रहता है जो सफलताओं को खींच-खींच कर समीप ले आता है।

जिनमें इच्छाशक्ति का जितना अभाव है वे उतने ही पिछड़े रहेंगे भले ही उनका शरीर और मस्तिष्क अधिक अच्छा हो, इच्छा की तीव्रता वाला मनुष्य अनेक शारीरिक, मानसिक एवं व्यावहारिक कठिनाइयों के रहते हुए भी काफी उन्नति कर लेता है। आलस्य, निराशा, अनुत्साह, जल्दी थकना, बड़बड़ाना, संकोच, झिझक यह सब इच्छा की न्यूनता प्रकट करते हैं। तीव्र चाह एक विद्युत धारा की तरह मनुष्य के चेहरे पर नाचती रहती है, उसे ही ओज, तेज एवं प्रतिभा आदि कहते हैं।

यदि हम सफल, विजयी, पुरुषार्थी, प्रभावशाली चतुर एवं यशस्वी बनना चाहते हैं तो आवश्यक है कि अपनी इच्छा शक्ति को तीव्र करें। जो वस्तु अभीष्ट हो, जो लक्ष निर्धारित हो, उसे प्राप्त करने के लिये उत्कट लालसा उत्पन्न करें। शेखचिल्ली की तरह सुख सफलता की कल्पना करते रहने से, सपने देखते रहने से काम नहीं चलेगा, ऐसी हीन वीर्य कल्पना निरर्थक है। इच्छा उसे कहते हैं तो अन्तस्तल को हिला दे, प्रेरणा उत्पन्न करें, लक्ष के लिये बेचैन करें, और कठिनाइयों का डर भी मार्ग को न रोक सके। ऐसी इच्छा जिन मस्तिष्कों में मौजूद है जिनकी बुद्धि में समुचित दृढ़ता एवं दूरदर्शिता है वे आज नहीं तो कल निर्धारित दिशा में सफलता प्राप्त करके रहेंगे।


अपनी अस्वस्थता से लाभ उठाइए।

(श्री सन्तराम, बी. ए.)

कल ही आप तन्दुरुस्त और हृष्ट-पुष्ट थे, खूब उछल-कूद रहे थे, अस्वस्थता का आपको विचार तक न था। रोग ने आकर एकाएक आपके घुटनों की चूलें ढीली कर दी और आपको खाट पर लिटा दिया। अब आप अस्पताल के कमरे में दण्डवत् लेटे हुये हैं, इच्छा न करते हुए भी आपको पीड़ा का साथी बनना पड़ा है।

आप झुँझलाते हुए भाग्य को गाली देते हैं, जीवन के दैनन्दिन कार्यक्रम में इस असामयिक विघ्न के लिये रोष प्रकट करते हैं। पर आपको ज्ञात नहीं कि आप अपनी अस्वस्थता से बहुत लाभ उठा सकते हैं। खाट पर लेट कर मजबूरन छुट्टी करने में निर्दोष रूप से, हमें अतीव कर्म को लाहलमय संसार में छुटकारा मिलता है, हमारी मानसिक एवं आध्यात्मिक अनुभूतियाँ तीक्ष्ण होती हैं और हम अपने जीवनों का अधिक स्पष्ट चित्र देख सकते हैं। किसी गम्भीर अस्वस्थता को ईश्वर का अभिशाप न मानकर लाभ उठाने और शक्ति उत्पन्न करने का ऐसा सुअवसर समझना चाहिये, जिसका मिलना स्वस्थता में सम्भव नहीं।

मैं उन पुराने रोगियों की बात नहीं कर रहा हूँ, जिनका रोग उनको सदा के लिये अशक्त बना देता है और जो फिर भी, जीवन- संग्राम में पराजय स्वीकार न करके, वीरतापूर्वक अपने कार्य में निरत रहते हैं। ऐसे मनुष्य वस्तुतः साधारण कोटी के नहीं होते। पीड़ा पर विजन पाने वाले इन लोगों का सच्चा नमूना अमेरिकन इतिहासकार फ्राँसिस पार्कमैन है। अपने जीवन के अधिकाँश काल में पार्कमैन को इतनी तीक्ष्ण पीड़ा रहती थी कि वह एक बार बैठकर पाँच मिनट से अधिक समय तक काम नहीं कर सकता था। उसकी आँखें इतनी खराब थीं, कि वह कागज पर केवल थोड़े-से बड़े-से अक्षर घसीट सकता था। पेट की भारी तकलीफ, भयंकर गठिया रोग मरणासन्न कर देने वाली शिर पीड़ा के वह शिकंजे में कसा रहता था। शारीरिक दृष्टि से उसका प्रत्येक अंग खराब था, तो भी उसने इतिहास के 20 उत्कृष्ट ग्रन्थ लिखने का उपाय कर लिया।

परन्तु हमारा सम्बन्ध इस समय साधारण मत्य मानस से है, जिसे पहली बार रोग ने लताड़ा है, ये कभी-कभी रुग्ण होने वाले लोग रोग से लाभ उठाना क्वचित् ही सीखते हैं, वे तो उसे दुर्भाग्य का आक्रमण समझते हैं, इस पर सहस्रों मनुष्य ऐसे भी हैं जिन्होंने अस्वस्थता के दिनों में पहली बार अपने आपको वस्तुतः पाया है, डॉ. एडवर्डलिविंग स्टोच टुडो को युवावस्था में ही पहाड़ पर भेज दिया गया था। वहाँ उसे आशा थी कि यक्ष्मा से उसकी मृत्यु हो जायगी परन्तु वह मरा नहीं, खाट पर लेटा-लेटा वह एक बहुत बड़ा अस्पताल बनाने का स्वप्न देखा करता था, जहाँ वह दूसरे रोगियों को स्वस्थ कर सकेगा। अपनी पीठ के बल लेटा हुआ वह अपने से कम बीमार लोगों की परीक्षा किया करता था। उसने इस अस्पताल के लिए धन इकट्ठा किया और परिश्रम किया, फलतः उसका स्वप्न एक बड़ी आरोग्यशाला (सनोटोरियम) के रूप में परिणित हो गया। वहाँ सहस्रों रोगी सहायता पा चुके हैं। टुडो के दुःख ने एक अज्ञात डॉक्टर को जगत विख्यात चिकित्सक बना दिया है।

यूजीन ओनील एक बेमतलब घूमने वाला मनुष्य था। 25 वर्ष की आयु तक उसके सामने जीवन की कोई पद्धति न थी। तब उस पर एक प्रचण्ड रोग का आक्रमण हुआ। इससे आवश्यक अवकाश मिल गया। इसमें उसने उन अनेक बरसों के संस्कारों का मूल्य निर्धारण किया, जिनमें अनुभवों का एक दूसरे के ऊपर ढेर लग गया था, और उसे एक-एक क्षण भी उन पर विचार करने को नहीं मिला था। अस्पताल में ही उसने पहले-पहले वे नाटक लिखने आरम्भ किए, जिन्होंने अमेरिकन नाटकों में क्राँति उत्पन्न कर दी।

किसी बड़ी अनुभूति की तरह रोग भी वस्तुतः हमें बदल डालते हैं। आप पूछेंगे, कैसे? सुनिए, पहली बात तो यह है कि स्वस्थावस्था में जगत को आगे होकर मिलने का जो भीषण दबाव हम पर पड़ता है, वह कुछ काल के लिए हम पर से हट जाता है। बैशाख मास में तुषार बिंदुओं के सदृश्य उत्तरदायित्व दूर हो जाता है, हमें ट्रेन पर समय पर पहुँचने, बच्चों की देखभाल करने, या घड़ी में चाबी देने की चिन्ता नहीं रहती। हम अंतर्दृष्टि और आत्मा-विश्लेषण के प्रदेश चले जाते हैं। हम अपने भूत और भविष्य के सम्बन्ध में, कदाचित् पहली बार, शान्त चित्त से विचार करते हैं। अपने विषय में हमने जो पहले मूल्य लगा रखे थे, वे भ्रमजनक दीखने लगते हैं, जिस कार्य-पद्धति का हमारा स्वभाव हो गया है, वह निर्बल, मूर्खतापूर्ण या दुर्दमनीय जान पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि रोग हमें संसार का वह अतीव दुर्लभ पदार्थ-दूसरा संयोग देता है, जो न केवल स्वास्थ्य में ही वरन् स्वयं जीवन में भी काम देता है।

अस्वस्थता हममें से बहुत से मूर्खतापूर्ण व्यवहार को निकाल देती है, इससे हममें नम्रता आती है, यह हमारा सारा अभियान और बड़प्पन निकाल कर हमें अपनी वास्तविक अवस्था में ले आती है। इससे हम अपनी अन्तरात्मा पर चार बत्ती का प्रकाश डाल कर उनकी वास्तविक अवस्था को देखने योग्य हो जाते हैं और हमें पता लग जाता है, कि कितनी बार हमने अपनी निर्बलताओं और विफलताओं को युक्ति संगत सिद्ध करने का यत्न किया है और कितनी बार हम परमावश्यक बातों पर टालमटोल करके चुपके से भाग चले हैं। अपने कार्यों में विवाह में, और सामाजिक मेल-जोल की हुई भूलें अस्वस्थता में स्पष्ट दीखने लगती हैं। अस्वस्थता का हितकर प्रभाव उस समय में विशेष रूप से दिखाई देता है, जब हम तनिक भयभीत होते हैं। टाइफ़ाइड और न्यूमोनिया ने एकाधिक मद्यषों, चोरों, अनृतवादियों और पत्नी को पीटने वालों का सुधार कर दिया है। यदि रोग का कड़ा दौरा हमें मृत्यु द्वार के निकट ले जाता है—तो कदाचित यह और भी अच्छा है। क्योंकि जब मार्गरुद्ध और द्वार संकीर्ण हो जाता है, कुछ लोगों का केवल तभी अपनी आत्मा, अपने परमेश्वर या जीवन-कार्य का ज्ञान होता है। कबीर ने कहा भी है—

सुख के सिर पर सिल धरु, जो प्रभु का नाम भुलाय।

बलिहारी इस दुःख के, जो पल-पल नाम जपाय॥

मेरे एक मित्र पर एक बार न्युमोनिया रोग का घोर रूप से आक्रमण हुआ, रोग शय्या परा लेटे हुए उन्हें एक दिन ऐसा भास हुआ, मानो कोई देवी उनसे कह रही है कि मैं तुम्हें प्राणदान देती हूँ, परंतु अब तुम अपना जीवन देश-सेवा में लगाओ।” अच्छे होने पर ये सचमुच सेवा में लग गये।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल इतनी बीमार थी कि खाट से उठ नहीं सकती थी। वहाँ पड़े-पड़े ही उसने इंग्लैंड के अस्पतालों को दुबारा संगठित किया। चेचक का टीका निकालने वाले पासचर महाशय पक्षाघात से पीड़ित थे और उनके मूर्च्छा होने का भय निरन्तर लगा रहता था। फिर भी वे अथक भाव से रोग पर आक्रमण करते रहे। इसी प्रकार के और भी असंख्य उदाहरण दिये जा सकते हैं।

पीड़ा भी हमें आध्यात्मिक अन्तः दृष्टि, आशा की सुन्दरता, मानव समाज को समझने एवं क्षमा कर देने का भाव—साराँश यह है कि शान्ति एवं धैर्य का गुण प्रदान करती है। ये बातें घोड़े की तरह दौड़ने वाले मनुष्य को क्वचित् ही प्राप्त होती हैं। अष्ठ-वह साफ करने वाली अग्नि है, जो हमारी बहुत सी नीचता, तुच्छता और कथित “स्वास्थ्य” की अधीरता को जला देती है। महाकवि मिल्टन का कथन है-जो सबसे उत्तम रीति से कष्ट सहन कर सकता है वही धीर है। इसका प्रमाण उसका प्रसिद्ध ग्रन्थ “पेराडाइज लास्ट” है। यह उसने अन्धा होने के बाद लिखा था।

रुग्णावस्था में आपको पता लगता है कि आपकी कल्पना जितना काम अब कर सकती है, उतना पहले स्वस्थता की दशा में कभी नहीं कर सकती थी अस्तित्व की अनेक छोटी-छोटी बातों के सम्बन्ध में छूट जाने का कारण, आप दिन में स्वप्न देखते, हवा में महल बनाते और मनसूबे बाँधने लगते हैं। आपकी शारीरिक शक्ति के पुनः लौट जाने पर भी आपकी भावनाएँ मन्द नहीं पड़ती, वरन् वे और भी क्रियात्मक हो जाती हैं और आप निश्चय रूप से निर्णय कर लेते हैं कि तन्दुरुस्त हो जाने पर अमुक- अमुक बातों को कार्य रूप में परिणित करेंगे।

आपकी मन को एकाग्र करने की शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाती है। आपको देखकर आश्चर्य होता है कि आप कठिन से कठिन समस्या का समाधान भी कितनी सुगमता पूर्वक सोच सकते हैं। इसका कारण क्या है? यही कि आपकी आत्मरक्षा की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ द्रुतगति से काम करने लगती हैं, जो कुछ भी आप देखते और सुनते हैं, उसके तत्व को आप बड़ी शीघ्रता से भाँपने लगते हैं। रोग आपका स्वभाव ग्रहणशील बना देता है, इसीलिए आप चिड़चिड़े हो जाते हैं। हो सकता है कि आप थोड़ी-सी उत्तेजना पर भी रोने लगें। परन्तु इस प्रभाव ग्रहणशीलता का सदुपयोग करना चाहिये।

कलाकारों और प्रेमियों को प्रत्येक युग में इस बात का ज्ञान रहा है कि जिस व्यक्ति को दुःख दिया जाता है, उसमें वह दुःख एक अपूर्व सौंदर्य उत्पन्न कर देता है। इस सौंदर्य का चेहरे की बनावट या वस्त्रादि की सजावट के साथ कोई सम्बन्ध नहीं। यह तो भीतरी मनोहरता है जो उन लोगों की आत्मा और मुखाकृति को प्रकाशित कर देती है, जिन्होंने रुग्णता को एक युद्धाह्वान के रूप में देखना सीखा है और जो आशा एवं उत्साह के साथ इसका सामना करना आवश्यक समझते हैं।

यदि आप कभी बीमार नहीं हुए हैं, यदि आपको कभी एक दिन के लिये भी खाट पर लेटे नहीं रहना पड़ा है-तो आप किसी अमूल्य लाभ से वंचित रहे हैं। जब आपकी बारी आये,तो भयभीत मत हो जाइये। अपने को स्मरण कराइये कि पीड़ा और दुःख आपको कोई ऐसी बहुमूल्य बात सिखाया करते हैं, जो आप अन्यथा कभी नहीं सीख सकते। हो सकता है कि आपके-जीवन की समूची गति को बदल कर अच्छा बना दे। यदि आप और आपके निकटवर्ती सज्जन रोग को भेष बदली हुई भगवत् कृपा समझ कर इससे लाभ उठाने का बुद्धिपूर्वक निश्चय करें, तो आप पहले से अधिक प्रसन्न हो जायेंगे। आप अपनी अस्वस्थता से बड़ा भारी लाभ उठा सकते हैं।


समय का सदुपयोग कीजिए।

(श्री रामचन्द्र वर्मा)

यदि संसार में कोई ऐसा पदार्थ है जो मनुष्य के हिस्से में बहुत ही थोड़ा आया है और जिसका सबसे अधिक अपव्यय और नाश होता है, तो वह समय ही है। जब हम इस बात का ध्यान करते हैं कि जीवन में हमें कितना कम समय मिला है तो हमें उसके अपव्यय पर बड़ा ही आश्चर्य होता है और बातों में तो हम लोग बहुत कुछ सचेत रहते हैं पर समय को बड़ी बुरी तरह से नष्ट करते हैं। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनका कितना समय आवश्यक और उपयोगी कामों में लगता है और कितना हँसी-दिल्लगी, सैर-तमाशे कभी अपने समय के सद् और असद् उपयोग का हिसाब लगावें तो लज्जित और दुःखी होने के सिवा आपसे और कुछ भी न बन पड़ेगा।

मनुष्य ज्यों−ही समय की उपयोगिता समझने लगता है त्यों−ही उसमें महत्ता, योग्यता आदि अनेक गुण आने लगते हैं। मनुष्य में चाहे कितने ही गुण क्यों न हो पर जब तक वह समय की कदर करना न सीखे, उपस्थित अवसरों का उपयोग न करे, तब तक उसे कोई लाभ नहीं हो सकता । यदि सच पूछिये तो समय का दुरुपयोग करने वालों को कभी अच्छे अवसर मिल ही नहीं सकते। जिस समय को मनुष्य व्यर्थ गंवाता है उसी समय में प्रयत्न करके वह बहुत कुछ सफलता प्राप्त कर सकता है। जो मनुष्य अपना कर्त्तव्य पालन करना चाहता हो-जो व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करने का इच्छुक हो, उसे सबसे पहले यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। अपनी योग्यता, शक्ति और साधनों की शिकायत छोड़कर उसे यह समझना चाहिए कि समय ही मेरी ‘सम्पत्ति’ है और उसी से लाभ उठाने के लिए उसे प्रयत्नशील होना चाहिए। कितने दुःख की बात है कि लोगों को व्यर्थ नष्ट करने के लिए तो बहुत सा समय मिल जाता है पर काम में लगाने के लिये उसका एकदम अभाव हो जाता है।

संसार का सबसे अधिक उपकार उन्हीं लोगों के द्वारा हुआ है जिन्होंने कभी अपना एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाया। ऐसे ही लोग बड़े बड़े कवि, महात्मा, दार्शनिक और आविष्कर्ता हुए हैं। सर्व साधारण जिस समय का कुछ भी ध्यान नहीं रखते उसी समय में उन्होंने बड़े बड़े काम किये हैं- उन्होंने एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। एक महात्मा का मत है-”हमें उत्तम अवसरों के आसरे न बैठना चाहिये बल्कि साधारण समय को उत्तम अवसर में परिणत करना चाहिए।” और यही सफलता प्राप्त करने का बहुत बड़ा सिद्धान्त है।

समय की व्यवस्था से बहुत काम निकलता है व्यवस्था एक ऐसी चीज है जिसके अभाव में बहुत से गुण व्यर्थ हो जाते हैं और मनुष्य को उलटे दुःखी होने और अपराधी बनना पड़ता है। जिस मनुष्य के सब कार्य व्यवस्थित हों, उसके कामों में अड़चनों की बहुत ही कम सम्भावना होती है, जिस को शान्त और प्रसन्न रखने में व्यवस्था से बहुत बड़ी सहायता मिलती है। सब प्रकार की व्यवस्थाओं की अपेक्षा समय की व्यवस्था बहुत ही आवश्यक और उपयोगी है।

इस अवसर पर कुछ ऐसे सिद्धान्तों का वर्णन कर देना आवश्यक जान पड़ता है, जो कि सर्व साधारण के लिए बहुत ही उपयोगी हैं। (1) एक समय में सदा एक ही काम करो। सरलतापूर्वक बहुत से काम करने का सीधा उपाय यही है। जो लोग एक ही समय में कई काम करना चाहते हैं उनके सभी काम प्रायः बिगड़ जाते हैं। (2) आवश्यक कामों को तुरन्त कर डालो, उन्हें दूसरे समय के लिए टाल न रखो। जो लोग कामों को टालते जाते हैं उनके बहुत से काम सदा बिना किये ही पड़े रह जाते हैं और जिससे कभी कभी भारी हानि भी जाती है कहा है— ‘काल्ह करे सो आज कर, आज करे सो अब।” यदि हम कल का काम आज ही न कर डालें, तो कम से कम आज का काम तो जरूर निपटा डालें। (3) आज के काम को कल पर कभी मत छोड़ो। जो लोग अपना काम रोज करते चलते हैं उन्हें कभी बहुत अधिक काम की शिकायत नहीं करनी पड़ती। यदि हम आज अपना काम न करें तो कल हमें दो दिनों का काम करना पड़ेगा। यदि हम एक ही दिन में दो दिनों का काम न कर सकें तो और भी कठिनता होगी। सारा क्रम बिगड़ जायगा और एक दिन की जरा सी सुस्ती या असावधानी से हमें कई दिनों तक कठिनता सहनी पड़ेगी। (4) जो काम स्वयं तुम्हारे करने का हो उसे दूसरे पर कभी मत छोड़ो। कुछ लोगों का मत है कि जो काम तुम स्वयं कर सकते हो उसे दूसरे पर मत छोड़ो, और कुछ लोगों का सिद्धान्त है कि जो काम तुम दूसरे से ले सकते हो वह स्वयं मत करो। बहुत बड़ा काम करने वालों के लिए अन्तिम सिद्धान्त ही अधिक उपयुक्त हो सकता है, क्यों कि बहुत से छोटे-छोटे काम वे किसी प्रकार स्वयं नहीं कर सकते। बड़े कार्यालयों और दूसरी संस्थाओं के अधिकारी जब तक साधारण काम दूसरों पर न छोड़े तब तक वे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। ऐसे लोगों का छोटे से छोटे काम पर पूरी देखभाल रखना ही उस काम को स्वयं करने के तुल्य हो जाता है, (5) बहुत अधिक शीघ्रता कार्य को नष्ट कर देती है। आपको ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे जो नित्य के साधारण व्यवहारों, कार्यों और बातचीत आदि में कुछ लोगों का स्वभाव भी जल्दी करने का होता है और जल्दी के कारण बार-बार हानि सहकर भी वे अपनी उस प्रकृति से पीछा नहीं छुड़ाते। यह दोष बहुत ही बुरा है एक पंजाबी मसल का अभिप्राय है कि किसी प्रकार का मन्तव्य स्थिर करने के समय अपने सिर से पगड़ी उतार लेनी चाहिए। क्यों? इसी लिए उन पर शाँतिपूर्वक विचार करने के लिए क्षण भर समय मिल जाय। पर इस सिद्धान्त का इतना बड़ा अनुयायी बन जाना भी ठीक नहीं कि सुस्ती और अकर्मण्यता का दोषारोपण होने लगे (6) किसी कार्य को आरम्भ करने के उपरान्त बीच में बहुत ही थोड़ा विश्राम लो जिसमें वह कार्य शीघ्र समाप्त हो जाय। किसी कार्य के मध्य में थोड़ा विश्राम करने की अपेक्षा उसकी समाप्ति पर अधिक विश्राम करना बहुत अच्छा है। संभव है कि बीच में विश्राम करने के समय उसमें कोई झंझट या विघ्न आ उपस्थित हो और तब हमें अपने विश्राम करने पर पछताना पड़े। यदि किसी प्रकार के झंझट या विघ्न की बिल्कुल सम्भावना न हो तो भी विश्राम नहीं करना चाहिए अथवा बहुत ही अल्प करना चाहिए। क्योंकि उसके बाद हमें और भी काम करने होंगे। यदि कछुए से शर्त लगा कर खरगोश आधे रास्ते में ही विश्राम न करने लग जाता तो कछुए के पास उससे बाजी जीतने का और कोई साधन या उपाय नहीं था।

किसी मनुष्य की मर्यादा और पद्वृद्धि में “समय का सदुपयोग“ ही सबसे बड़ा सहायक होता है। कोई ऐसा मनुष्य ढूँढ़ो जो अपने पुरुषार्थ से बहुत ऊँचे पद की मर्यादा तक पहुँचा हो, जिसने अपनी विद्या या बुद्धि से संसार का उपकार किया हो, जिसकी देश हितैषिता से उसके देश को लाभ पहुँचा हो, जिसने परोपकार- बुद्धि से बहुतों का कल्याण किया हो, ऐसे मनुष्य के जीवन-क्रम पर थोड़ा सा विचार करने से ही तुम्हें स्पष्ट जान पड़ेगा कि उसने समय का बहुत ही अच्छा और पूरा पूरा उपयोग किया है। उसने एक क्षण को भी कभी व्यर्थ नहीं जाने दिया है। व्यापार-क्षेत्र में भी तुम्हें वे ही लोग सबसे अधिक सफलता प्राप्त करते हुए दिखाई देंगे जिन्होंने कभी अपना समय व्यर्थ नहीं खोया है।


Quotation

‘अगर तुमने खुद पर शासन करना सीख लिया, तो तुम सारी दुनिया पर शासन करने का दावा रख सकते हो।”


गायत्री चर्चा

नवरात्रि की तपश्चर्या :- नवीन सम्वत्सर की इस नवरात्रि के अवसर पर अखण्ड-ज्योति की प्रेरणानुसार देश भर में गायत्री उपासना की तपश्चर्या बहुत ही संतोषजनक रीति से पूर्ण हुई। तप से अन्तःकरण के मल जलते हैं और आत्मबल बढ़ता है। असुरता घटती और देवत्व पनपता है। अनेकों ग्रन्थ पढ़ने और अगणित प्रवचन सुनने पर भी जिनकी मनोभूमि में कोई सुधार नहीं हो सका उन्हें थोड़े ही तप से अपने अन्दर एक अपूर्व परिवर्तन परिलक्षित होता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, हवन, दान आदि का अपना महत्व है, पर तप की महत्ता सर्वोपरि है। क्योंकि आत्मबल का, ब्रह्म तेल का, अन्तःप्रकाश का उद्भव तप के बिना अन्य किसी मार्ग से नहीं हो सकता।

हमारा प्राचीन इतिहास साक्षी है कि किन्हीं महान् आपत्तियों की निवृत्ति एवं किन्हीं महान् आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कोई न कोई महान् तप आवश्यक हुए हैं। जब मनुष्य का भौतिक प्रयत्न और पुरुषार्थ शिथिल हो जाता है तब उसके लिये तप का अचूक अस्त्र ही एकमात्र अवलम्बन रह जाता है। आज मनुष्य की व्यक्तिगत एवं सामूहिक समस्याएँ इतनी विपन्न एवं उलझी हुई हैं कि उनके समाधान के लिये तप के दिव्य अस्त्र की ओर ही ध्यान जाता है। अखण्ड-ज्योति परिवार सहस्राँशु ब्रह्मयज्ञ के उस महान् आयोजन में प्रवृत्त है जो इस युग के लिये अभूतपूर्व ही है। इस नवरात्रि की व्यापक उपासना से उसमें और भी चार चाँद लग जाते हैं। इस तप के ऐसे सूक्ष्म परिणाम होंगे जो इस महान् तपश्चर्या में प्रवृत्त तपस्वियों का ही नहीं, समस्त मनुष्य जाति का, समस्त संसार का कल्याण उपस्थित करेंगे।

गायत्री मन्त्र लेखन :- इस वर्ष गायत्री जयन्ती के उपलक्ष में गायत्री उपासकों द्वारा 24 लक्ष हस्तलिखित मन्त्र माता के चरणों पर चढ़ाने का जो संकल्प किया गया है, हर्ष की बात है कि उनमें भाग लेने का अधिकाँश सदस्यों ने उत्साह पूर्वक स्वागत किया है। निर्धारित संख्या तो नियत समय तक पूरी हो ही जायगी ऐसा निश्चय है।

इस सम्बन्ध में ऐसा निश्चय किया गया है कि समस्त गायत्री उपासकों के एक सुन्दर स्मारक एवं सम्मेलन के रूप में यह हस्तलिखित मन्त्र सुरक्षित रखे जावें। जो भी सज्जन अपने हस्तलिखित गायत्री मंत्र भेजेंगे, उनकी यहाँ पर अलग अलग सुन्दर जिल्दें बँधवा ली जावेंगी और गायत्री मन्दिर जब तक कायम रहेगा तब तक सैकड़ों हजारों वर्षों तक यह मन्त्र भी यहाँ सुरक्षित रहेंगे और नित्य प्रति इनका भी षोडशोपचार पूजन, धूप, दीप, आरती आदि के साथ होता रहेगा।

मंत्र लिखने से पूर्व एक पृष्ठ पर लेखकों का अपना पूरा नाम, पता, वर्ण, आयु, संतान, व्यवसाय, शिक्षा, तथा अन्य आवश्यक परिचय जो उचित हो लिखा रहना चाहिए ताकि अन्य साधकों को उनके परिचय प्राप्त करने में सुगमता हो। हो सके तो अपना फोटो भी साथ भेजना चाहिए। जिससे यह स्मारक अधिक पूर्ण बन सके। भविष्य में इन परिचयों के आधार पर भारत वर्ष भर के गायत्री उपासकों का एक इतिहास ग्रन्थ भी बन सकेगा।

साधारणतः यह आशा की जाती है कि प्रत्येक उपासक कम से कम 2400 मंत्र लिखे। पर इससे न्यूनाधिक भी स्वेच्छापूर्वक लिखे जा सकते हैं, गायत्री जयंती (जेष्ठ सुदी 10) तारीख 3 जून को यह मन्त्र माता के चरणों पर समर्पित किये जावेंगे। जो सज्जन अपने मन्त्र पूरे लिख लें वे उस तिथि से पूर्व यहाँ भेज दें। जिनके मन्त्र पूरे न हो सकें वे इस प्रकार का संकल्प पत्र लिखकर भेज दें कि “हम अमुक तिथि तक इतनी संख्या में मन्त्र लिख कर भेज देंगे।” वह संकल्प पत्र माता के चरणों में अर्पित कर दिया जायगा। पीछे उस ऋण को यथा समय ‘चुका देनी चाहिए।

चूँकि यह श्रम बहुत समय तक और बहुत श्रद्धा के साथ किया हुआ होगा, इस लिए इसे रजिस्ट्री, बुक पोस्ट से ही भेजना चाहिए। साधारण पैकिट बहुधा डाक में ही गुम हो जाते हैं और उनके न पहुँचने का वस्तुतः भारी खेद होता है। सभी मन्त्र एक ही साइज की जिल्दों में रहे इसलिए स्कूली कापियों के साइज की ही कापी लेनी चाहिए। कागज यथासम्भव कुछ अच्छा ही लगाना चाहिए जो लम्बी अवधि तक रखे रहने योग्य हो। मन्त्रों पर क्रम संख्या डालते जाना चाहिए जिससे उनकी गिनती होने में भूल न पड़े।

साकार और निराकार उपासना :- उपासना के दो अंग हैं। (1) साकार उपासना, (2) निराकार उपासना। साकार उपासना वह है जिसमें ईश्वर की या उसकी किसी विशेष शक्ति की कोई प्रतिमा बनाकर उसका ध्यान एवं पूजन किया जाता है। यह प्रतिमा किसी धातु, पत्थर आदि की या चित्र की बनी हो सकती है और उसकी मांगलिक वस्तुओं से षोडशोपचार पूजा की जाती है अथवा केवल ध्यान द्वारा किसी प्रतिमा में अपना मानसिक वन्दन और तादात्म्य किया जा सकता है।

निराकार उपासना में मनुष्याकृति प्रतिमा की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल प्रकाश ज्योति, शून्य आकाश आदि की कोई प्रकृति परक स्थिति का ध्यान करके ईश्वर में तादात्म्य स्थापित किया जाता है।

इन दोनों उपासना विधियों में कोई विरोध नहीं, वरन् एक दूसरे की पूरक हैं। आरम्भिक साधक के लिये मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर साकार उपासना उपयोगी पड़ती है। ऊँची स्थिति में पहुँचे हुए साधक के लिये फिर उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती उसके लिये निराकार उपासना ठीक पड़ती है।

पुजारियों के अनाचार, मन्दिरों की अव्यवस्था, दान के धन का दुरुपयोग, ईसाई मुस्लिम धर्मों का प्रभाव आदि कारणों से पिछले दिनों मूर्ति पूजा विरोधी आन्दोलन होता रहा है। समाज सुधार एवं उत्पन्न हुई बुराइयों के निराकरण की दृष्टि से वह आन्दोलन बहुत हद तक उपयोगी भी था पर साधना के मनोवैज्ञानिक एवं सूक्ष्म नियमों के आधार पर बनी हुई साकार उपासना से उसका कोई गम्भीर विरोध नहीं समझना चाहिए। क्योंकि बुतपरस्ती से घोर द्वेष करने वाले मुसलमान भी मजार, ताजिया, दुलदुल, कावे का पत्थर आदि के माध्यम से किसी न किसी प्रकार उसे करते हैं। धर्म से दूर रहने वाले आज के राजनीतिक नेता भी झण्डा वन्दन, महात्मा गाँधी की समाधि पर माथा टेकना आदि क्रियाएँ करते हैं।

पिछले दिनों खण्डन मण्डन के जो कटु आन्दोलन चले हैं उनका प्रभाव साधना क्षेत्र के जिज्ञासुओं तक को भ्रम में डाल देता है। कोई साकार पूजक निराकार साधना के विरोधी हैं, कोई निराकार उपासक, साकार साधना से नाक- भौं चढ़ाते हैं, यह कट्टरता अवाँछनीय है। दोनों ही साधना पद्धतियाँ उपयोगी एवं आवश्यक हैं। अपनी मनोभूमि, स्थिति, अधिकार, रुचि, कक्षा, सुविधा आदि के आधार पर साधकों को अपने लिये साकार या निराकार साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।

गायत्री की साकार उपासना करने वालों के लिए माता की सुन्दर मूर्ति या चित्र या प्रतिमा मांगलिक द्रव्यों से पूजन एवं भक्ति भावना पूर्ण ध्यान एवं अभिवन्दन आवश्यक होता है।

जिन्हें गायत्री की निराकार उपासना करनी हो वे प्रकाश की प्रज्ज्वलित ज्योति के रूप में, भृकुटि, सूर्यचक्र या आकाश में ध्यान करें। बाह्य पूजा में अग्नि को देव प्रतिमा मानकर अग्निहोत्र, धूपबत्ती, घी का दीपक आदि के रूप में सुगंधित हविष्य जलाते हुए पूजन की विधि पूर्ण कर लें।

निराकार साकार पूजा में कोई विरोध नहीं है। केवल कक्षा, श्रेणी, रुचि एवं मान्यता का अन्तर है। साधक अपनी स्थिति के अनुकूल अपनी साधना चुन लें।

गायत्री मन्दिर का स्थान :- हर्ष की बात है कि गायत्री मन्दिर बनने का आरम्भ अब होने ही वाला है, उसका स्थान सम्बन्धी निर्णय शीघ्र ही हो जाना है, ताकि आगे की व्यवस्था चालू करने में विलम्ब न हो। गायत्री मन्दिर का स्थान कहाँ हो, इस सम्बन्ध में परिजनों के दो मत हैं।

एक पक्ष का कहना है कि मन्दिर शहर से दूर एकान्त जंगल में होना चाहिए ताकि साधकों को तपस्या करने में शुद्ध वातावरण की प्राप्ति हो।

दूसरे पक्ष का कहना है कि दूर जंगल का मन्दिर केवल स्थायी तपस्वियों के काम का ही रह जायगा। जो लोग थोड़ा समय लेकर तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से जाते हैं उनके लिए वहाँ पहुँचना और ठहरना बड़ा कष्ट साध्य होगा। सवारी, खाद्य सामग्री, सुरक्षा आदि की कठिनाई रहने के कारण उस स्थान से लोग समुचित लाभ न उठा सकेंगे। चूँकि यह संस्था अधिक लोगों को गायत्री विद्या का अधिक लाभ पहुँचाने के लिए स्थापित की जा रही है, इसलिए वह नगर में या नगर के निकट ही होनी चाहिये।

उपरोक्त दोनों पक्ष अपने अपने मत के समर्थन में अनेक तर्क उपस्थित करते हैं इसलिये ऐसा विचार किया गया है कि इस प्रश्न का निर्णय सभी गायत्री प्रेमियों की सलाह से किया जाय। समस्त गायत्री उपासकों से विशेष कर उन सज्जनों से जिन्होंने गायत्री मन्दिर के लिए सहायता भेजी है, प्रार्थना है कि अपनी सम्पत्ति भेजें कि वे किस पक्ष का समर्थन करते हैं। बहुमत के आधार पर ही इस प्रश्न को हल किया जायगा। अभिमत यथा संभव शीघ्र ही आने चाहिए।


इस मास गायत्री मन्दिर की पुण्य प्रगति

111) श्री दयाशंकर वर्मा, पारादान

101) श्रीमती लक्ष्मी देवी जी हफिजपुर हरकरन

101) श्रीमती महारानी जी साहिबा, मुलथान

101) श्री हजारी लाल वर्मा, कानपुर

51) श्री डॉक्टर मनोहर लाल जी हिरानी, नरायना

51) श्री रंगनाथ नाना जी वारडे, सावदा

31) श्री केदारनाथ गोयल, ऐलनाबाद

25) श्री महादेव गणपति इशाने, नसीराबाद

25) श्री शालिग्राम लक्ष्मीचन्द भाटापारा

25)श्री राम किशन शालिग्राम, भाटापारा

25) श्री माधव जी देवराज जी, भाटापारा

25)श्री ओम प्रकाश देवराज, भाटापारा

25) श्री गुजराम देवराज जी, भाटापारा

25)श्री आनन्द प्रताप मिल, भाटापारा

25)श्री शालिगराम राइसमिल, भाटापारा

25) श्री शलिगराम गोपी किशन, भाटापारा

25) श्री कालूराम मुखराम, भाटापारा

25) श्री शिवनारायन मातादिन, भाटापारा

25) श्री किशनीराम मुरलीधर, भाटापारा

25) श्री मोजीराम मुरारी लाल,भाटापारा

25) श्री दाऊ रतीराम जी अग्रवाल भाटापारा

25) श्री गुरु दास मल ज्ञानचन्द,भाटापारा

21) श्री सीताराम मणिक लाल, भाटापारा

20) श्री चौथमल शाह साहिबगंज

15) श्री लूर सिंह ठाकुर भाटापारा

15) श्री रामजीवन प्रताप चन्द, भाटापारा

15) श्री कृष्णकुमार कृष्णसने ही दाऊ भाटापारा

15) श्री पंजाब राइस मिल, भाटापारा

11) श्री रणछोड दास पुँगालिया भाटापारा

11) श्री बन्शीधर बीजेलाल जोशी भाटापारा

11) श्री राम प्रताप चुन्नीलाल भाटापारा

11) श्री शालिगराम राम किशन भाटापारा

11) श्री बापूराव शिवलकर भाटापारा

11) श्री शिव शंकर शुक्ल जाँजगीर

11) श्री हरिश्चन्द मिश्र शाहजहाँपुर

11) श्री बालकृष्ण अग्रवाल ट्रेसर जबलपुर

11) श्री मोती लाल राँका व्यावर

11) श्री लालू जी गिरधारी जी नैरावी (अफ्रीका)

11) श्री जानकी प्रसाद वक्सी, जबलपुर

11) श्री मथुरा प्रसाद वर्मा, रबाईपुर

11) श्री दयाराम जी पारादान

10) श्री गोविन्द जी रनछोर जी डाह्या पटेल एग्रीको

10) श्री चम्पालाल ओंकार जी राठोर बडवानी

10) श्रीमती प्रेमकली देवी, नकुड

10) श्री राम वचन वर्मा मोरिवावाँ

10) श्री रामदास वर्मा कानपुर

10) श्रीमती माता जी कृष्ण कुमारी देवी रसूलपुर

10) श्री रामदास जी नायक शास्त्री, धगुवाँखुर्द

10) श्रीमती सन्तोष कुमारी भटनागर बी. ए. बिजनौर

7) श्री हीरालाल प्रयाग जी भाटापारा

7) श्री राम रतन राम दयाल डागा, भाटापारा

7) डॉ. नारायण चन्द बेहरा बोनायगढ़

5) पं. दुर्गा प्रसाद पाण्डेय, जबलपुर

5) श्री पंढ़रीनाथ चतुर्वेदी सेगाँव

5) श्री लक्ष्मण करण वि॰ मेहता एडवोकेट, बाँदा

5) श्री अगर चन्द भँवरलाल नाहटा, बीकानेर

5) श्री माँगी लाल पँवार,गुणावद

5) श्रीमती तारादेवी मिश्र, शाहजहाँपुर

5) श्री सरयूजी तिवारी काल्लूर

5) श्री रामनाराण जी दीक्षित, गिरधारीपुरा

5) श्री जमुना प्रसाद बडैरिया डबरामंडी

5)श्री खुशीराम उमाशंकर, श्री गंगानगर

5) श्रीमती कृष्णा कुमारी देवी रसूलपुर

5) श्रीमती ललिता देवी, रसूलपुर

5) श्रीमती पार्वती देवी, रसूलपुर

5) श्री तीर्थानन्द शर्मा सेन्दर हकीमपुर

5) श्री सरस्वती प्रसाद श्रीवास्तव कानपुर

5) श्री शंकर लाल शर्मा जगशेदपुर

5) श्री भगौती लाल जी अहलमद नानपारा

5) श्री केदारनाथ रावल, सूरत

5) श्री जोधामल सिंधी भाटापारा

5) श्री बन्शीलाल पुरोहित दलाल, भाटापारा

5) श्री छाजूलाल बीजेलाल भाटापारा

5) श्री तुलसीराम लक्ष्मीनरायन भाटापारा

5) श्री बीसामल सिंधी भाटापारा

5) श्री कपूरचन्द जी भाटापारा

5) श्री गोविन्ददास मथुरादास डागा भाटापारा

5) श्रीमती भगवती देवी कोंच

31) श्री धर्मपाल सिंह जी कासिमपुर

3) श्री रामबक्स जयनारायण गुप्ता कोटेतरा

3) श्री सीताराम भारद्वाज धगुवाँ खुर्द

3) श्री लोकनाथ रुद्र एम. ए. लखनऊ

211) पं॰ श्री रामावतार शर्मा हसवी फतेहपुर

211)श्रीमती रामेश्वर दयाल जी की माताजी कोंच

21) श्री बनमाली लाल वैद्य, सरसवाही

21) श्री गुज्या लक्ष्मी नारायण भोपाल पत्तन

2) श्री श्याम बिहारी जी नानपारा

2) श्री बच्चीराम जी कासिमपुर

2) श्री विशंभर सहाय वर्मा समौली

2) श्री शिव प्रसाद बढ़ौलिया, महर

2) श्री हरिचरण जी वर्मा, बरनाहल

2) ठा. महाराज सिंह जी पटना मल्हीपुर

2) श्रीमती सुमित्रा देवी रुद्र लखनऊ

2) वैद्यराज श्रीराम बेहरा बोनायगढ़

1।) श्री हरि प्रसाद मुछोरिया, इटारसी

1।) श्री मोहनदास विद्यार्थी इटारसी

1।) श्री शंकेर भीकाजी सावदे मुँगेली

1) श्री नरसिंह चरण वेहरा बोनायगढ़

1) श्री सतीश रुद्र लखनऊ

1) डॉ. हरपाल सिंह जी कासिमपुर


महाप्रभु ईसामसीह के उपदेश

(पवित्र ‘बाईबल’ से)

-तु अपने पड़ौसी से अपने समान प्रेम रख।

-मत्ती 22

-जब कोई तुम्हें उत्सव में बुलावे तो मुख्य जगह न बैठो! ऐसा न हो कि उसने तुमसे भी किसी बड़े को न्यौता दिया हो। उसने तुम्हें और उसे दोनों को न्यौता दिया है आकर तुमसे कहे कि इसको जगह दो, और तब तुम्हें लज्जा खाकर सबसे नीची जगह बैठना पड़े। पर जब तुमको बुलाया जाय तो सबसे नीची जगह जा बैठो कि जब वह जिसने तुम्हें न्यौता दिया है, आये तो तुमसे कहे कि- हे मित्र! आगे बढ़कर बैठो, तब तुम्हारे साथ बैठने वालों के सामने तुम्हारी बड़ाई होगी, क्योंकि जो कोई अपने आपको बड़ा बनायेगा वह छोटा किया जायगा और जो अपने आपको छोटा बनायेगा वह बड़ा किया जायगा।

-लूका 14

-मैं तुम से सच कहता हूँ कि भण्डार में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है क्योंकि सब ने अपनी बढ़ती में से कुछ-कुछ डाला है। पर इसने अपनी घटी में से जो कुछ उसका था अर्थात् अपनी सारी जीविका डाल दी है।

-मरकुस 12।

-तुम दिन का या रात का भोजन करो तो अपने मित्रों या भाइयों या कुटुम्बियों या धनवान पड़ोसियों को न बुला लो, ऐसा न हो कि वे तुम्हें न्यौता दें और तुम्हारा बदला हो जाये। पर जब तुम भोजन करो तब कंगालों, टुण्ठों, लँगड़ों और अन्धों को बुलाओगे तब तुम धन्य होंगे क्योंकि उनके पास तुम्हें बदला देने को कुछ नहीं।

-लूका 14

-धन्य हैं वे जो धर्म के कारण सताये जाते हैं। स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

-मत्ती 5

-धन्य हो तुम जब मनुष्य मेरे लिए तुम्हारी निन्दा करें और सतायें और झूँठ बोलते हुये तुम्हारे विरोध में सब तरह की बुरी बातें कहें तब तुम आनन्द मगन रहो। तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है। उन्होंने उन नबियों को जो तुमसे पहले हुए थे इसी रीति से सताया था।

-मत्ती 5

-मैं तुम्हें भेड़ों की तरह भेड़ियों में भेजता हूँ सो साँपों की तरह बुद्धिमान और कबूतरों की तरह भोले बनो। पर लोगों से चौकस रहो, क्योंकि वे तुम्हें महासभाओं में सौंपेंगे और अपनी पंचायतों में तुम्हें कोड़े मारेंगे। मेरे नाम के कारण सब लोग तुमसे बैर करेंगे, पर जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा।

-मत्ती 10

-जो शरीर को घात करते हैं पर आत्मा को घात नहीं कर सकते उनसे नहीं डरना और उसी से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों का नरक में नाश कर सकता है।

-मत्ती 10

-विश्राम का दिन मनुष्य के लिये ठहराया गया है न कि मनुष्य विश्राम के दिन के लिये। मनुष्य का पुत्र विश्राम के दिन का भी प्रभु है।

-मरकुस 2

-कोरे कपड़े का पैबन्द पुराने पहरावन पर कोई नहीं लगाता क्योंकि वह पैबन्द पहरावन से और कुछ खींच लेता है और फट जाता है।

-मत्ती 9

-यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने को आया हूँ, मैं मिलाप कराने को नहीं तलवार चलाने को आया हूँ। मैं तो आया हूँ कि मनुष्य को उसके पिता से और बेटी को उसकी माँ से और बहू को उसकी सास से अलग कर दूँ। मनुष्य के बैरी उसके घर के ही लोग होंगे। जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है वह मेरे योग्य नहीं, और जो बेटा या बेटी को मुझसे अधिक प्रिय जानता है वह मेरे योग्य नहीं, और अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे नहीं चले वह मेरे योग्य नहीं। जो अपना प्राण बचाता है वह उसे खोयेगा और जो मेरे कारण अपना प्राण खोता है वही उसे बचायेगा।

-मत्ती 10


कैसा यह युग है?


कैसा यह युग है? (Kavita)

[1]

कैसा युग है? जिसमें कोई भले बुरे का भेद नहीं है,

कैसा युग है? नर को अपने महापतन पर खेद नहीं है,

कैसा युग है? दानव पहने हुए आज मानव के कपड़े,

कैसा युग है? वैभव अपने हाथों में ईश्वर को पकड़े,

बोर तिमिर है यहाँ कहाता है प्रकाश, यह कैसा युग है!

बन आजा निर्माण यहाँ पर सर्वनाश, यह कैसा युग है!!

[2]

नीति, धर्म, आदर्श आज हैं बन्दी पुस्तक के पृष्ठों पर,

मानव का कल्याण, पन्थ में खोया-सा बैठा आहें भर,

पुष्प आज है पार्थ नहीं वह, क्रीड़ा-कलित अनग बना है,

नारी है श्री नहीं आज वह एक वासना है, सपना है,

विष से यहाँ बुझाई जाती सरल प्यास, यह कैसा युग है!

यहाँ विसर्जन ही कहलाता है विकास, यह कैसा युग है!!

[3]

कैसा युग है? जबकि व्यंग-सी लगती है विवेक की बातें,

कैसा युग है? जब प्रभात-सी लगती हैं घन-शायी रातें,

कैसा युग है? दूर-दूर तक व्यापक है मानव की क्रीड़ा,

कैसा युग है? जब अपने तक सीमित है प्रति जल की पीड़ा

चारों दिशा निनादित करती मौन श्वास, यह कैसा युग है!

छाया-सा निष्यंद हृदय का अट्टहास, यह कैसा युग है!!

[4]

यह भी नहीं जानता पागल संसृति करवट बदल रही है,

जब कि प्रलय होने को तूने तब सुधार की बात कही है,

ढह जायेगी एक रात में सोने के वैभव की लंका,

हिमगिरि की चोटी से बजता आता परिवर्तन का डंका,

रहा छिपाये इतने दिन तक विजय हास, यह कैसा युग है!

समय खेलता शेषनाग का शिथिल पाश, यह कैसा युग है!!

*समाप्त*

(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए. शास्त्री)