गायत्री महाविद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न
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बड़ा सैट-
1- गायत्री महाविज्ञान [प्रथम भाग] गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
2- गायत्री महाविज्ञान [द्वितीय भाग] गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी, गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्रनाम आदि की भाषा टीका समेत संकलन।
3- गायत्री महाविज्ञान [तृतीय भाग] इसमें गायत्री द्वारा योग साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
4- गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री की कृपा से अनेक प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले तथा सुख सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के निजी अनुभव इस पुस्तक में हैं।
5- गायत्री चित्रावली- बढ़िया आर्ट पेपर पर छपे हुए बड़े ही कलापूर्ण गायत्री के 24 तिरंगे चित्र और उनके मार्मिक रहस्य एवं विवेचना की पुस्तक।
6- गायत्री का मन्त्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की शास्त्रीय विस्तृत व्याख्या है। राक्षस राज रावण, सायण, उव्वट, महीधर, व्यास, वशिष्ठ, शंख भारद्वाज, यज्ञावल्क आदि के द्वारा किए हुए गायत्री के अनेकों अर्थ।
छोटा सैट-
7- गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियों तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव।
8- गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत गायत्री का गुप्त मर्म।
9- गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
10- वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री स्तवन एवं गायत्री चालीसा का संग्रह।
11- गायत्री के चौदह रत्न। प्रथम भाग- गायत्री के ॐ, भूः, र्भुवः, स्वः, तत्, सवितुः वरेण्यं, भर्गो शब्दों की व्याख्या।
12- गायत्री के चौदह रत्न। द्वितीय भाग- गायत्री के देवस्य, धीमहि, धियो, यो नः, प्रचोदयात् शब्दों की व्याख्या।
13- अनादि गुरुमन्त्र गायत्री- गायत्री साधक के लिए गुरु की आवश्यकता का प्रतिपादन।
14- विपत्ति निवारिणी गायत्री- सम्पूर्ण विपत्तियों और कष्टों को नष्ट करने वाला तत्वज्ञान।
15- स्त्रियों को गायत्री का अधिकार- स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही गायत्री का अधिकार है। इसकी शास्त्रीय पुष्टि।
16- सचित्र गायत्री- ध्यान करने योग्य गायत्री के 16 रंगीन चित्रों की पुस्तक।
17- सर्व शक्तिमान गायत्री- यह अत्यन्त सस्ती सचित्र पुस्तक ब्रह्मदान में वितरण करने योग्य है। गायत्री का तिरंगा चित्र, गायत्री चालीसा।
6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक- 8
देख रहा तू जो कुछ वह तेरे भावों की छाया!
तुझ में ज्योति—इसी से तेरा सूरज चमका करता,
तुझ में शान्ति—इसी से तो शशि शीतलता है भरता,
यह कोमल आकर्षण—तेरे भव्य हृदय की माया!
देख रहा तू जो कुछ वह तेरे भावों की छाया!!
हिमगिरि तुँग विशाल इसी से-झुका न तेरा मस्तक,
सरिताएँ गतिवान-चरण की गति न सकी तेरी रुक,
नव घन वन तूने जग-मरुथल पर जीवन बरसाया!
देख रहा तू जो कुछ वह तेरे भावों की छाया!!
तेरी एक श्वांस में अंकित वासुदेव की गीता,
तेरा ही विश्वास राम, तेरी ही श्रद्धा सीता,
तू क्या यह सब भेद अभी तक जान नहीं है पाया?
देख रहा तू जो कुछ वह तेरे भावों की छाया!!
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
वद नारीं विनाकोऽन्यो निर्माता मनु सन्ततेः।
महत्वं रचन शक्तेः स्वास्यानार्याहि ज्ञायताम्॥
अर्थ—मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। नारी की रचना शक्ति का महत्व समझा जाना चाहिए।
मनुष्य की उत्पत्ति नारी के उदर से ही होती है। बालक की आदि गुरु भी उसकी माता ही होती है। पिता के वीर्य की एक बूँद तो निमित्त कारण है—बाकी बालक के समस्त अंग-प्रत्यंग माता के रक्त से ही बनते हैं। उस रक्त में जैसे गुण, संस्कार, स्वभाव होंगे, जैसी स्वस्थता, प्रतिभा, विचारधारा एवं अनुभूति होगी उसी के अनुसार बालक का शरीर मस्तिष्क एवं स्वभाव बनेगा। नारियाँ यदि अस्वस्थ, अशिक्षित, अविकसित, असंस्कृत, पराधीन एवं दीन-हीन रहेंगी तो उनके द्वारा उत्पन्न हुए बालक भी इन्हीं दोषों से युक्त होंगे। ऊसर खेत में अच्छी फसल नहीं पैदा हो सकती।
अच्छे फलों का बाग लगाना हो तो अच्छी भूमि की आवश्यकता होगी। यदि मनुष्य जाति अपनी उन्नति चाहती है तो पहले नारी को शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक, क्षेत्रों में प्रतिभावान एवं सबलता, सक्षमता, सद्बुद्धि, सद्गुण और महानता के संस्कारों का विकास हो सकता है। नारी को पिछड़ी हुई स्थिति में रखना अपने पैरों में आप कुल्हाड़ी मारना है।
जन समाज दो भागों में बाँटा हुआ है (1) नर (2) नारी। नर की उन्नति सुविधा एवं सुरक्षा के लिए प्रयत्न किया जाता है परन्तु नारी हर क्षेत्र में पिछड़ी हुई है। फलस्वरूप हमारा आधा राष्ट्र, आधा समाज, आधा संसार, आधा परिवार, आधा जीवन पिछड़ा हुआ रह जाता है। जिस रथ का एक पहिया बहुत बड़ा और एक बहुत छोटा हो, जिसके हल में एक बैल बहुत बड़ा और एक बहुत छोटा जुता हो, उसके द्वारा सन्तोषजनक कार्य नहीं हो सकता। हमारा देश, समाज, समुदाय, तब तक सच्चे अर्थों में विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि नारी को भी नर के समान ही अपनी शक्ति बुद्धि और प्रतिभा को प्रकट करने का अवसर प्राप्त न हो।
आज नारी के प्रति नर का अविश्वास, बन्धन, संकीर्ण भाव अत्यधिक बढ़ा हुआ है। हम अपनी बहिन, बेटी, माता, पत्नी सभी के प्रति अविश्वास करते हैं और यह सोचते हैं कि यदि इन्हें बन्धन रहित, स्वाभाविक जीवन जीने दिया तो ये दुराचारिणी हो जायेंगी। इसी आशंका से प्रेरित होकर उनकी मनुष्योचित सीधी-सादी गतिविधियों पर भी भारी प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं। अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अविश्वास करना जितना निष्कृष्ट कार्य है, उससे भी पतित दृष्टिकोण यह है कि हम अपनी बहिन बेटियों को अविश्वस्त समझें। ऐसी पतित मनोवृत्ति, भारतीय संस्कृति की महानता एवं उदारता के सर्वथा प्रतिकूल है।
गायत्री का पाँचवाँ अक्षर “व” यह बताता है कि नारी के प्रति नर का दृष्टिकोण उदार, तथा पूज्य रहना चाहिए। नारी में नर की अपेक्षा सात्विकता की मात्रा बहुत अधिक है, उसमें करुणा, सेवा, प्रेम, दया, सहृदयता, सहानुभूति, कृतज्ञता, एवं ममता की भावना पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक है इसी प्रकार चरित्र, संयम, सदाचार और पवित्रता की दृष्टि से भी नर की अपेक्षा उसका स्थान बहुत ऊँचा है, इसलिए कोई कारण नहीं कि पुरुष अपनी अपेक्षा नारी को हीन समझे, उस पर अविश्वास करे और उसके समुचित विकास में बाधक बनें।
गायत्री माता को पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियाँ अधिक प्रिय हैं, क्योंकि उनमें वह सतोगुण कहीं अधिक है जो नटखट लड़कों में नहीं होता है। इसलिए गायत्री माता का सन्देश और आदेश है कि नारी को अशक्त, अशिक्षित, अविकसित एवं पराधीन स्थिति में न रखकर उसे सभी दृष्टिकोण से बलवान, विकसित एवं आत्मनिर्भर बनाने का प्रयत्न किया जाय। नर के ऊपर नारी का बहुत ऋण है। अपने शरीर का ही एक भाग देकर बच्चे का शरीर बनाने वाली और अमित कष्ट सहकर उसका पोषण करने वाली माता के रूप में उसका भारी ऋण है। अपना आत्मार्पण करके अर्धांगिनी बनने वाली नारी का उपकार भी कम नहीं है। पुत्री और बहिन के रूप में भी वह अपनी सौम्य भावना से हमें आह्लादित करके ऋण भार से ढ़क देती है। इन उपकारों का बदला पुरुष अपना सब कुछ उसके चरणों पर अर्पित करके भी नहीं चुका सकता। इतने पर भी यदि पुरुष कृतघ्न बने और नारी के प्रति हेय भाव रखे उसके जीवन विकास में बाधक बने तो यह सर्वथा अनुचित ही है।
प्रकृति ब्रह्म, सीताराम, लक्ष्मीनारायण, राधे-श्याम, गौरीशंकर आदि नामों में जैसे नारी का स्थान प्रथम और नर का द्वितीय है उसी प्रकार श्रेष्ठता और स्वाभाविक महानता की दृष्टि से हमारे सामाजिक जीवन में भी नारी का स्थान प्रथम है। उसका यदि समुचित सम्मान किया जाय, उसकी उन्नति और सुविधा का समुचित अवसर दिया जाय तो वह संसार के लिए वरदान बन सकती है। पुरुष की लड़ाकू और स्वार्थी वृत्ति ने प्रभुता पाकर आज संसार में सर्वनाश की विभीषिका उत्पन्न कर दी है। पर यदि नारी शक्ति का विकास हो जाय तो वह इस व्यापक असुरता पर वह सहज ही नियन्त्रण स्थापित कर सकता है। और आज नरक बना हुआ संसार कल सहृदयता, सरलता, ममता, कला और सरसता से ओत-प्रोत बन कर स्वर्ण समान शान्तिदायक हो सकता है।
राष्ट्र ऊँचा उठाने की अनेक योजनाएँ बन रही हैं। मनुष्य को अधिक अच्छा बनाने के लिए अनेकों प्रयत्न हो रहे हैं, उन सबका तब तक कोई विशेष परिणाम नहीं निकल सकता जब तक कि नारी जाति वर्तमान दुर्दशा ग्रस्त दशा में पड़ी हुई है। यदि खेत ही अच्छा न होगा तो उसमें अच्छी फसल उपजने की क्या आशा की जा सकती है। सुसंस्कृत और सुविकसित नारी के द्वारा ही महान पुरुष पैदा हो सकते हैं, कोई देश या समाज रुपये पैसे से नहीं, वहाँ पुरुषों से ही वास्तविक धनी बनता है। जिस देश की नस्ल बिगड़ी हुई है, जिसकी कुसंस्कार ग्रस्त माताएँ निकृष्ट मनोवृत्ति के बालक उत्पन्न करती हैं उस देश या जाति के पास चाहे कितनी ही धन दौलत क्यों न हो वह सदा पतित दशा में ही रहेगी। बीमार और कमजोर पर सदा अधिक ध्यान दिया जाता है। उसकी सेवा, शुश्रूषा, चिकित्सा एवं परिचर्या के लिए अधिक प्रयत्न किया जाता है, इसी प्रकार आज पुरुष की अपेक्षा स्त्री जाति की सुव्यवस्था की ओर अधिक ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
गायत्री माता हमारे दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन उपस्थित करती है। यह स्त्री जाति के प्रति पूज्य भावना रखने और उसके साथ तदनुरूप ही व्यवहार करने का आदेश करती है। पश्चिमी देशों में स्त्री को समानता का आन्दोलन चल रहा है। भारतीय संस्कृति में नारी को पहले से ही समानता की अपेक्षा अनेक गुना उच्च ‘पूज्य’ स्थान दिया गया है। उसी दृष्टिकोण को अपनाकर हम अपने देश और समाज का सच्चा कल्याण कर सकते हैं।
—वाणी की चञ्चलता से बचो, वाणी का संयम रखो वाणी का दुश्चरित्र छोड़ कर वाणी का सदाचरण करो।
—जिसके पास कुछ नहीं है जो अक्रोधी है, व्रती है, सदाचारी है, घृणा रहित है, कमल के पत्ते पर बूँद की तरह जो काम-भोगों से अतृप्त है, वही ब्राह्मण है जो गम्भीर प्रज्ञावाला है जो असंग्रही है, वह ब्राह्मण है।
—जो इच्छा रहित है, अशक्ति रहित है संशय रहित है जिसने गाढे अमृत को पी लिया है वह ब्राह्मण, है। जो पुण्य-पाप से परे है, शोक रहित है, निर्मल है, शुद्ध है, वही ब्राह्मण है।
(श्री डॉ. भगवानदास जी)
‘शास्त्र क्या वस्तु है?’ इसको पहले देखना चाहिए। शायद इसमें किसी को आपत्ति न होगी, यदि कहा जाय कि ‘शास्त्र’ शब्द से जो ग्रन्थ आज कल समझे जाते हैं, वे सब, किसी न किसी मानव की ‘बुद्धि’ से ही उत्पन्न हुए हैं।
न जातु जनयन्तीह शास्त्राणि मनजान् क्वचित्,
मनुजाः एव शास्त्राणि रचयन्ति पुनः पुनः,
बुद्धयैव रचना कार्य तच्च संपाद्यते सदा।
शास्त्र को पुरुष उत्पन्न करते हैं, पुरुष को शास्त्र नहीं।
न बुद्धिर स्तीत्यपि बुद्धिसाष्यं,
न तत्प्रभुत्वं तु कदापि बाध्यं।
‘बुद्धि’ की गति यहाँ नहीं है—यह निर्णय भी हमारी आपकी बुद्धि ही करती है। बुद्धि के प्रभुत्व का बाधक कभी हो नहीं सकता,यदि है, तो वह भी बुद्धि ही है। यदि कहा जाय कि हमारी बुद्धि से अमुक सज्जन ऋषि महर्षि की बुद्धि अच्छी है, मान्य है—तो यह निर्णय भी हमारी ही बुद्धि करती है।
यथैव कश्चित् स्वाँ छायाँ न ह लंघयितुँ क्षमः,
तथैव नहि कश्चित्स्वाँ बुद्धि लंघयितुँ क्षमः।
कोई भी अपनी छाया को नहीं लाँघ सकता, न अपनी बुद्धि को।
विचारस्य खण्डनमपि विचारेणैव क्रियते।
विचार का खण्डन भी विचार ही करता है।
गीता का यह श्लोक अक्सर सुनने में आता है—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते, कार्याकार्यव्यवस्थितौ,
क्या कार्य है, क्या अकार्य—इसके निर्णय के लिए शास्त्र प्रमाण है। इस स्थान पर गीता के पढ़ने वाले के मन में शंका उठ सकती है—
किंतु किं में प्रमाणं स्यात् शास्त्राशास्त्रविनिर्णये?
माना कि शास्त्र से निर्णय करो, पर किस शास्त्र से? कौन शास्त्र है, कौन अशास्त्र है, कौन मानने योग्य है, कौन नहीं? इसका निर्णय कौन करे? यहूदियों के लिए ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’, ‘बाइबल’ का पूर्वार्द्ध परम मान्य अपौरुषेय ब्रह्मवाक्य है, ईसाइयों के लिए ‘न्यू टेस्टामेन्ट’, ‘बाइबल’ का उत्तरार्ध, मुसलमानों के लिये कुरान, बौद्धों के लिए ‘त्रिपिटिक’ जैनों के लिए ‘जैनागम-सुत्त’ इत्यादि। सभी अपने-अपने को परम महामान्य शास्त्र बताते हैं। कौन निर्णय करे, सिवा अपनी ‘बुद्धि’ के, कि किसके पीछे चलना, किसके नहीं? और भी स्वयं वेदानुयायियों में बड़े मतभेद हैं, कोई ऋग्वेदी, कोई यजुर्वेदी, कोई सामवेदी, कोई अथर्ववेदी है, अन्य तीन अथर्व को बहुत अपवित्र मानते हैं, यहाँ तक कि ‘चार वेद’ की पंक्ति में से वह उठा ही दिया गया, और ‘त्रिवेदी’ भारत में मान्य रह गई, ऋक् और यजुः वाले, साम को भी अशुचि मानते हैं, यहाँ तक कि मनुस्मृति के प्रचलित पाठ में भी लिखा है—
सामवेदः स्मृतः पित्र्यः, तस्मात् तस्य अशुचिर् ध्वनिः।
(कहना कठिन है कि यह क्षेपक है या सचमुच मूल ग्रन्थ में था)। प्रत्युत इसके, गीता में कहा है, ‘वेदानाँ सामवेदोऽहं’। इसका निर्णय कौन करे, सिवा बुद्धि के? ‘शास्त्र’ माने हुए भिन्न-भिन्न ग्रंथों में लिखे हुए ऐसे विरुद्ध वाक्यों की समरसता को अवसर-भेद, प्रसंग-भेद आदि कह कर, व्याख्याता लोग, अपनी बुद्धि के ही द्वारा, स्थापित करते हैं। गीता का द्वितीय अध्याय तो एकमात्र ‘बुद्धि’ की महिमा का गीत है। जितनी बार बुद्धि शब्द का प्रयोग गीता में हुआ है, उतनी बार केवल ‘आत्मा’ और ‘अहं’ (मा, मे, मम) का हुआ है, और किसी शब्द का नहीं [अव्ययों को छोड़ कर]। महामान्य गायत्री मन्त्र में ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’, बुद्धि को प्रेरणा करे, परमात्मा सद्बुद्धि दे—ऐसी प्रार्थना की है, शास्त्र दे-नहीं, सद्बुद्धि मिलेगी तो हम स्वयं शास्त्र बना लेंगे। यह भी वैदिक मन्त्र की प्रार्थना है-’स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु’, ‘शास्त्रेण संयुनक्तु’ नहीं इत्यादि।
‘शास्त्रवादी’ कहते है कि ‘शास्त्रीय’ विरोधों का परिहार, ‘शास्त्रीय’ सिद्धान्त का निर्णय करना चाहिए। ठीक है, पर कौन करे? आपकी और हमारी और सज्जन मित्रों की बुद्धि ही न? जो दशा ‘श्रुति’ की [चिरकालीन परम्परा से ‘सुनी’ हुई बात की], ‘वेद’ पदार्थ की है,उससे भी अधिक बिगड़ी दशा ‘स्मृतियों’ की (वृद्धों द्वारा ‘याद’ की हुई बातों की) और अन्य ‘धर्म-शास्त्रों’ की है। वहाँ तक कि वेदव्यास जी ने यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में युधिष्ठिर के मुख से कहलाया है—
तर्कोऽप्रतिष्ठः, श्रुतयो विभिन्नाः,
नैको ऋषिः (स्मृतिकर्त्ता) यस्य वचः प्रमाणं,
धर्मस्य तत्व निहितं गुहायाँ,
‘महाजनो’ येन गतः स पन्थाः।
तर्क की कहीं समाप्ति नहीं, श्रुतियाँ विविध, परस्पर भिन्न, एक भी स्मृतिकार ऋषि नहीं, जिसकी ही बात मानी जाय, धर्म का तत्व तो मनुष्य की हृदय गुहा में (उसकी बुद्धि के प्रेरक आत्मा के, रूप में) छिपा हुआ है। जिस ‘महा-जन’ समूह में, जनता में, समाज में, रहना हो, वह जन साधारण ‘लोकमत’, भूयसीयन्याय से, ‘मेजारिटी ओपिनियन’, कसरत राय से, जिस रास्ते पर चले, वही रास्ता ठीक है धर्म है। महाजन शब्द का अर्थ ‘महापुरुष’, बड़ा आदमी’ नहीं है, जैसा भ्राँति से, बहुधा समझा जाता है, बल्कि ‘जनता’, ‘जन-समूह’, ‘पब्लिक’, जो ही अर्थ आज तक गुजराती भाषा में, इस शब्द का चला आता है। (‘मानव धर्म-सार’ में इसके समर्थक, कई पुराने संस्कृत ग्रन्थों से बहुतेरे उदाहरण दिये गये हैं।) ‘नैको ऋषिर्यस्य मनं न भिन्नं’ ऐसा भी पाठ है, अर्थ वही निकलता है। जितने ऋषि उतने मत, प्रत्येक ऋषि का मत दूसरों से भिन्न होता है’, विवाद-ग्रस्त विषयों में। जब ऋषियों की प्रामाणिकता, इस प्रकार, संशयित हो गई, तब ‘महाजन’ शब्द का अर्थ ‘महा-पुरुष’ करके, उसको प्रमाणिक निर्णायक कहना कैसे उचित हो सकता है? क्या ऋषि-महर्षि भी ‘महा-पुरुष’ नहीं? तो और कौन?
निष्कर्ष यह है कि, कितना भी अधिक पूजित या पूजनीय, ‘शास्त्र’ नामक कोई ग्रन्थ हो, जब उलझन पड़ती है तब, अन्ततोगत्वा, किसी न किसी मनुष्य की बुद्धि ही उसको सुलझाती है। ‘शास्त्र’ से ऊपर ‘बुद्धि’ है, शास्त्र का निर्माण ‘बुद्धि’ करती है, बुद्धि का निर्माण शास्त्र नहीं करता। और भारतवर्ष की ‘महा-जन-बुद्धि’ ने निर्णय कर रखा है कि—
शास्ति यत् साधनोपायं चतुर्वर्गस्य निर्मलं,
तद्वाधनापायं, एषा शास्त्रास्य शास्त्रता।
तस्मात्, कौन्तेय!, विदुषा, धर्माधर्मविनिश्च्ये,
बुद्धिमास्थाय लोकेस्मिन् वर्त्तितव्यं कृतात्मना।
धर्मः प्रतिविधातव्यो बुद्धया राज्ञा ततस्ततः।
बुद्धेः समवहारोयं, कविभिः संभृतं मधु।
(म. भा. शाँ. अ. 141, 142)
उत्सर्गेणापवादेन, ऋषिभिः कपिलादिभिः,
अध्यात्मचिंतामाश्रित्य, शास्त्राण्युक्त नि, भारत!
(अ. 360)
वही शास्त्र है जो मूल्य को चतुर्वर्ग, अर्थात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों के साधन का उपाय, और उनके बाधकों का अपाय (दूर करने का प्रकार) सिखावे, ‘शासै’। धर्म क्या है, अर्थ क्या है, इसका निर्णय निश्चय, बुद्धि से करके, कृतात्मा कृतबुद्धि आत्मवान् स्वावलम्बी स्वयं प्रज्ञ मनुष्य को लोक-व्यवहार निबाहना चाहिए। राजा का कार्य है कि बुद्धियुक्त ‘धर्म’ बनाये, ऐसे धर्म का विधान करे, जिससे प्रजा का ‘धारण’ हो, सब प्रकार का भला हो।
धारणार्द्धमः इत्याहुर्, धर्मो धारयति प्रजाः।
इसलिए कपिल आदि महर्षियों ने ‘अध्यात्मज्ञान’ को, जीवात्मा रूपी मनुष्य के चित्त और देह की प्रकृतियों के ज्ञान को, अपनी बुद्धि में रखकर, शास्त्र रचे, और उनमें उत्सर्ग अर्थात् सामान्य नियम और अपवाद अर्थात् उत्सर्गों के बाधक विशेष नियम भी, कहे। जैसे मधुमक्खी शहद इकट्ठा करती है, वैसे ही, कवियों ने, अपनी बुद्धियों से जो तत्व-तत्व बातों को एकत्र कर दिया है, उसी समूह को अपनी बुद्धियों के व्यवहार को शास्त्र कहते हैं। ऐसे शास्त्र का, ‘बुद्धि-निश्चित’ सिद्धान्त यह है कि—
देश-काल-निमित्तानाँ भेदैर्धर्मो विभिद्यते,
अन्यो धर्मः समस्थस्य, विषमस्थस्य चापरः,
न त्वेवैकान्तिको धर्मः, धर्मोहि आवस्थिकः स्मृतः
(म. भा. शाँ.)
देश-काल निमित्त के भेद से धर्म में भेद होता है, धर्म ऐकान्तिक, आत्यंतिक, एकाकार, एकरूप, अत्यन्त अटल अपरिवर्ती नहीं है, प्रत्युय, आवस्थिक है, अवस्था बदलने से बदलता रहता है। प्रत्यक्ष ही, फौजी सिपाही का धर्म दूसरा, किसान का दूसरा, अध्यापक का दूसरा, दुकानदार का दूसरा, एक ही आदमी का, अच्छे दिनों में दूसरा और मुसीबत के दिनों में दिनों में दूसरा। किस व्यवस्था में क्या धर्म है, इसका निर्णय सात्विकी बुद्धि ही ठीक-ठीक कर सकती है। ऐतरेय आरण्यक में व्याख्यान है कि, जब ऋषि लोग इस लोक से जाने लगे तब मनुष्यों ने उनसे पूछा कि अब हम लोगों को, कठिनाई के समय, उपदेश देने वाला ऋषि कौन होगा, तब ऋषियों ने उनको ‘तर्क’ दिया, और कहा कि—यही तुम लोगों का ‘ऋषि’ होगा। अर्थात्,तर्क करना बुद्धि का काम है, अपनी बुद्धि पर भरोसा रखो, अपने पैरों पर खड़े हो, दूसरों का ही मुँह मत ताकते रहो, यह मत चाहो कि पुराने लोग सदा तुमको गोद में लिये रहें, अपने लिए समयानुसार, नए-नए शास्त्र रचते रहो। आखिर यूरोपीय मानव भी वैसे ही ब्रह्मदेव की सन्तान हैं, जैसे भारतीय। पर अधिक बुद्धिमान् हैं नए-नए आश्चर्यकारी शास्त्र बना ही रहे हैं, जिनके आगे सब होम-हवन-यज्ञ आदि का कर्मकाण्ड थोथा-सा-जान पड़ता है, जिनके बल से उनकी गति वैसी अप्रतिहत हो रही है, जैसी एक ओर रावण आदि की, और दूसरी ओर, कृष्ण, साल्व आदि की, जिनके बल से ऐसे आश्चर्य के कम कर रहे हैं, जिनके समान कार्य पुराणों में भी जल्दी नहीं मिलते हैं।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं?
लोचनाभ्याँ विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति?
जिसको स्वयं प्रज्ञा नहीं, बुद्धि नहीं, जो विवेक विचार से शास्त्र को पढ़ और जाँच नहीं सकता, उसको शास्त्र से क्या लाभ होगा? जिसके आँख नहीं, वह आइना देख कर क्या करेगा? यह वाक्य भी परम शास्त्र ही है।
(पं.श्री लालजीरामजी शुक्ल, एम. ए.)
संसार के सभी लोग सचाई की लड़ाई करते हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिलेगा जो मिथ्या आचरण और दूसरों को धोखा देने को भला कहे। पर यह भी एक साधारण अनुभव की बात है कि विरला ही व्यक्ति पूर्णतः सचाई को अपने व्यवहार में लाता है। इतना ही नहीं, जो व्यक्ति जितना अधिक दूसरों से सच्चे व्यवहार की आशा करता है, वह उतना ही स्वयं धूर्त होता है। धूर्त व्यक्ति को संसार के सभी लोग छल और कपट से भरे दिखाई देते हैं। वह अपने कपट-व्यवहार की ओर दृष्टि नहीं डालता, पर दूसरों के कपट व्यवहार से सदा सतर्क रहता है। ऐसा व्यक्ति जितना भोले-भाले लोगों की प्रशंसा करता है, उतना अपने जीवन में सत्य व्यवहार करने वाला नहीं देखा जाता।
अब प्रश्न आता है कि सच्चे लोग सचाई की महिमा का बखान करें तो युक्तिसंगत है, झूठे लोग क्यों सचाई की महिमा गाते हैं, वे लोग क्यों सच्चे लोगों की खोज में रहते हैं? संसार के प्रायः सभी लोग अपने आप सच्चे न होकर फिर सच्चेपन को क्यों अच्छा कहते हैं, और जब वे एक प्रकार के व्यवहार को अच्छा कहते हैं, तो स्वयं तदनुकूल आचरण क्यों नहीं करते?
प्रश्न के पहले भाग का उत्तर यह है कि सच्चे लोग जितनी सरलता से ठगे जा सकते हैं, उतनी सरलता से झूँठे लोग नहीं ठगे जा सकते। यदि धूर्तों को सदा उन्हीं-जैसों से व्यवहार करना पड़े तो उनकी धूर्तता का महत्व कुछ भी न रह जाय। ठगों को उनकी ठगी-विद्या से तभी लाभ हो सकता है जब दूसरे लोग ठगोरी करने को मिलते हैं। ठगों को भोले-भाले आदमी प्रिय लगते हैं। जो व्यक्ति उनके नग्न स्वरूप को उन्हीं के सामने खड़ा कर दे, उससे बड़ा दुश्मन वे किसी दूसरे को नहीं मानते। हम सचाई की प्रशंसा आत्मरक्षा की भावना से करते हैं। हम दूसरों से ठगे नहीं जाना चाहते, अतएव सच्चे लोगों को भला कहते हैं। पर जब हम सचाई को भला गुण कहते हैं, तब अपने आन्तरिक मन में हम स्वयं सच्चे बनें और सब प्रकार धूर्तता और चतुराई से अलग रहें।
इसका क्या कारण है? इसका कारण है कि हमने वास्तव में सचाई के महत्व को नहीं समझा। सचाई से व्यवहार करने वाला व्यक्ति प्रायः साँसारिक दृष्टि से घाटे में रहता है। अतएव हम मन-ही-मन सचाई को एक प्रकार की बेवकूफी समझते हैं। विरला ही व्यक्ति ही व्यक्ति सचाई की मौलिकता को ठीक से समझता है। इसीलिये हमें अपने मन में अनेक युक्तियों से वह बिठा लेना आवश्यक है कि वास्तव में धूर्तता त्याज्य है और सचाई लाभकारी है। बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि जो व्यक्ति सारे संसार को अनेक प्रकार की युक्तियों द्वारा सचाई, कर्त्तव्यपरायणता और सरलता की मौलिकता समझा सकता है, वही इन गुणों से वंचित रहता है। सचाई का उपदेश देने वाले व्यक्ति ही प्रायः बढ़े धूर्त होते हैं। जो बात तीक्ष्ण बुद्धि वाला व्यक्ति अनेक तरह से लोगों को समझाता है, ठीक उसी बात के प्रतिकूल उसका आचरण होता है। अतएव इस प्रकार के विद्वान से संसार के लोग धूर्तता ही सीखते हैं न कि सचाई। वास्तव में ये विद्वान विद्वान ही नहीं, ये तो परम मूर्ख हैं। तभी तो महात्मा कबीर ने कहा है—
पण्डित और मसालची इनकी येही रीति।
औरन को करें चाँदनो आप अँधेरे बीच॥
सचाई का वास्तविक पुरस्कार क्या है—यह जानना एक दिन की बात नहीं। सच्चे काम का फल अच्छा रहता है और झूठे का बुरा। यह जीवन के अनुभव के पश्चात् किसी-किसी व्यक्ति की समझ में आता है। झुठाई से मनुष्य को तत्कालिक लाभ की सम्भावना रहती है, यदि किसी लड़के ने अच्छी तरह से अपना पाठ याद नहीं किया है और नकल करके परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तो वह नकल करने के सुअवसर से लाभ क्यों न उठावे। यदि वह लड़का नकल करने के मौके को काम में नहीं लाता तो उसे एक पूरे साल पुरानी कक्षा में ही ठहरना पड़ता है। ऐसी सचाई से क्या लाभ जिससे जीवन बरबाद हो। ऐसे गुड़ से क्या लाभ जो मौत को आमन्त्रित करे। इस प्रकार के विचार मनुष्य को झूँठे व्यवहारों में प्रवृत्त करते हैं।
मनुष्य सदा छोटे मार्ग को ढूँढ़ा करता है। इसी प्रवृत्ति के कारण वह सचाई के लम्बे रास्ते को छोड़ कर मिथ्यात्व में पड़ता है। इस प्रकार के आचरण से मनुष्य अन्त में दुःख भोगता है। इसका विचार उसे नहीं रहता। जब चोर चोरी करे तब यदि वह यह सोचने लग जाय कि उसे प्रत्येक चोरी के लिए कभी-न-कभी दण्ड मिलेगा तो वह कुमार्गगामी ही क्यों बने? मनुष्य को अपने कृत्यों के प्रति सन्निकट के निष्कर्ष ही दिखायी देते हैं, उसे अन्तिम परिणाम दिखाई ही नहीं देता। इसीलिये वह अपने को लालच से नहीं रोक पाता।
जिस मनुष्य का हृदय विशुद्ध है वह प्रत्येक काम के शुभ और अशुभ परिणाम को तुरन्त देख लेता है। प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव दो प्रकार की प्रवृत्तियों से मिलकर बना है- एक उसे स्वार्थ परायण बनाती हैं और दूसरी परोपकार में प्रवृत्त करती हैं। ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ समानरूपेण प्रबल हैं। जब मनुष्य की स्वार्थ-सम्बन्धी प्रवृत्तियाँ प्रबल होती हैं, तो वह छल-कपट और धूर्तता से काम लेता है और जब उसकी मानसिक प्रवृत्ति परोपकार की ओर जाती है अर्थात् वह परमार्थ का चिन्तन करता है तो वह सचाई का मार्ग ग्रहण करता है। जो मनुष्य अपने आपके प्रति सतर्क है, वह जब भी सच्चे मार्ग से विचलित होता है तो वह अपनी त्रुटि को तुरन्त समझ जाता है और उसे उस भूल को सुधारे बिना चैन नहीं मिलता। प्रत्येक मनुष्य संसार को धोखा भले ही देता हो वह अपने आपको धोखा नहीं दे सकता, दुराचारी का आत्मा उसे सदा कोसता रहता है। यदि दुराचारी मनुष्य अपने दुराचार को नहीं छोड़ता तो धीरे-धीरे वह एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ से मुक्त होना असम्भव हो जाता है। उसका एक-न-एक दिन विनाश निश्चित है।
देखा गया है कि झूठे और मक्कार व्यक्ति को झूठे और मक्कार ही साथी खोजने पड़ते हैं। जब उसे ऐसे लोग नहीं मिलते तो वह भले लोगों की नीच प्रवृत्तियों को ही उभारा करता है, जिसमें दूसरे लोग उसकी बुराइयों का संसार में प्रदर्शन न करें। वह दूसरों की बुराइयों को सहता है, उनमें भी स्वार्थ-बुद्धि का प्रचार करता है, किन्तु इस प्रकार का व्यवहार अन्त में उसको विनाशोन्मुख बना देता है।
यह समझना बड़ा ही कठिन है कि प्रत्येक छल और कपट का कार्य हमें आध्यात्मिक हानि पहुँचाता है। जिस प्रकार चोर सभी लोगों से डरता रहता है, इसी प्रकार मक्कार मनुष्य का मन सदा उद्विग्न रहता है। उसकी धार्मिकता की ओट उसे आन्तरिक शान्ति नहीं देती। संसार के सभी पदार्थ मन की शान्ति के लिये हैं। मिथ्याचारी को संसार की और वस्तुएँ क्यों न मिल जाय, मन की शान्ति कदापि नहीं मिलती। उसका हृदय आन्तरिक ज्वाला से सदा संतप्त रहता है। जब इस तरह दिन प्रतिदिन के व्यवहार से उसका आध्यात्मिक बल नष्ट हो जाता है, तो फिर उसका बाह्य जगत् में भी पतन हो जाता है। जैसे-जैसे वह ऊँचा चढ़ता है वैसे ही उसकी तृष्णा भी बढ़ती जाती है। साथ ही उसमें ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष आदि की दिनोदिन अधिकता होती जाती है। फिर वे उसके संसार में पतन के कारण बन जाते हैं।
अस्तु! सचाई का पुरस्कार अदृश्य है। यह ज्ञान की दृष्टि से जाना जा सकता है। सच्चा मनुष्य प्रायः दूसरों के द्वारा ठगा जाता है। पर उसे वे मानसिक यन्त्रणाएँ नहीं होती, जो ठगने वाले चतुर व्यक्ति को होती हैं, उसे तस्कर की भाँति सबसे डरते नहीं रहना पड़ता। उसका मन शान्त रहता है। वह शीघ्र ऊँचे पद पर नहीं पहुँचता, पर कालान्तर में उसका उत्थान अवश्य होता है जिसे कोई रोक नहीं सकता। धूर्तों की उन्नति अस्थायी होती है, सच्चों की स्थायी। सच्चा अपनी अवनत अवस्था में भी स्वर्गीय सुख का अनुभव करता है, परन्तु धूर्त ऊपर से उन्नत दीखता हुआ भी अन्दर नारकीय यन्त्रणा भोगता है।
(श्री डॉ. चतुर्भुज सहाय जी)
इच्छा व संकल्प एक ऐसी महान शक्ति है कि संसार का कोई काम बिना उसके सहारे नहीं हो सकता। यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड, यह पृथ्वी-सूर्य, चन्द्र-तारे-मनुष्य-पशु-पक्षी, स्थावर और जंगम सभी एक महान चैतन्य की संकल्प शक्ति का खेल है। इच्छा से ही इसकी उत्पत्ति हुई और इच्छा से ही उसका विनाश होगा। यह एक तमाशा है जो किसी अज्ञात पुरुष के द्वारा हो रहा है और हम सब सारे प्राणी उसी की इच्छा में बँधे हुए यहाँ झूठे खेल खेल रहे हैं।
माँ-बाप अपने बच्चों को निर्जीव खिलौने पकड़ा देते हैं, वह उनसे खेला करता है, बच्चा अपनी अज्ञानता से उन्हें सच्चा जीव समझ के अपने को उनमें ऐसा उलझा लेता है कि कभी-कभी अपने को भी भूल जाता है। माता-पिता दूर से इस तमाशे को देखते और प्रसन्न होते हैं। उन खिलौनों के संसर्ग में आकर वह बालक कभी दुखी हो लेता है, और कभी हँस लेता व सुखी हो लेता है, पर इस हर्ष शोक का प्रभाव माता-पिता पर कुछ भी नहीं होता क्योंकि वह उनकी असलियत को जानते हैं, ऐसे ही इस जगत के सृजनहार का हाल है। अपने संकल्प से अनेकों प्रकार की रचना कर जीवों के चारों ओर बखेर दी है और खुद दृष्टा बन तमाशा देख रहा है। जीव अपनी मूर्खता से भ्रम में पड़ उन सबको सच्चा समझ बैठा है। इस मिथ्या खेल में लिप्त हो अपने को भी भूल बैठा है, सुखी होता है, दुखी होता है, खुश हो लेता है, और कभी शोक सागर में डुबकियाँ खाने लगता है, पर उस तमाशा देखने वाले ‘दृष्टा’ को इससे क्या? क्योंकि वह जानता है कि यह सब भ्रम है, धोखा है, जब समझ आ जायगी, भ्रम का पर्दा हटेगा, तब कुछ नहीं रहेगा, ऐसा शास्त्रों का मत है। लोग उससे दया की भिक्षा माँगते हैं, उससे अपने लौकिक व पारलौकिक कष्टों के दूर करने की विनती करते हैं, और उसका फल प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। जब वह चैतन्य पुरुष केवल दृष्टा है और कुछ किसी के लिए करता नहीं है तो उसकी भजन व प्रार्थना किस प्रकार फल देती है? यह एक प्रश्न कुछ लोगों के मस्तिष्क में गूँजने लगता है। इसका समाधान साधारण है, और वह यह है कि—मनुष्य जब अति दुखी होकर अपनी दीन दशा किसी दूसरे को सुनाता है तो उसका चित्त चारों ओर से सिमट के उस पुरुष पर ही केन्द्रित हो जाता है कि जिसे हम अपनी करुणा कहानी सुनाने चले थे। उसका ही यह नतीजा निकलता है कि एकदम उसकी विचार शक्ति व इच्छा शक्ति को बल मिलता है। जिस अँधेरे में खड़ा वह रो रहा और परेशान हो रहा था, वहाँ एक धुँधला सा प्रकाश उसकी आँखों के सामने आ जाता है, उसे कुछ-कुछ दिखाई देने लगता है उसकी समझ में यह बात आ जाती है कि आगे मुझे क्या करना है, क्या मेरा कर्त्तव्य है? यह ऐसा ज्ञान उसे प्रसन्नता देता है, उसकी अशान्ति थोड़ी देर को दूर कर उसे शान्त बनाता और उत्साह प्रदान करता है। भजन व प्रार्थना की एकाग्रता मन में बल उत्पन्न कर देती है, और मन की बलवती धारा उसे अँधेरे से निकाल प्रकाश में लाती है, उसका मार्ग सुगम करती है, और उसे आशावादी बनाती है। यही प्रार्थना व भजन का फल है, एकाग्रता का प्रभाव है जो मन के ऊपर पड़ता है और उसका ऐसा संस्कार किया हुआ मन ही उसका रास्ता साफ करता है, बुद्धि से भ्रम का पर्दा हटा देता है और ज्ञान देता है। ईश्वर कुछ नहीं करता, वह तो दृष्टा बना देखता रहता है परन्तु उसकी उपासना मन में और आत्मा में बल लाती है और ऐसी बलवती आत्मा और बलवान मन ही उस (जीव) को उठाकर शान्ति और आनन्द के धाम में पहुँचाता है इसीलिए कहा जाता है कि—इच्छा शक्ति और विचार शक्ति को बलवान बनाओ, इन्हीं के द्वारा जीव का कल्याण होता है, वह मोक्ष धाम में पहुँचाता है, आवागमन के चक्कर से छुटकारा पाता है। मन की बिखरी हुई शक्तियों को एकाग्र करना और विचार पर संयम करना ही मनुष्य का कर्त्तव्य है।
उपरोक्त कथन से यह बात साबित होती है कि मन को किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करना ही जीव के उद्धार का कारण है, इसी से आत्मा और मन में बल आता है। ईश्वर का कोई हाथ इसमें नहीं है, तो फिर मन को ईश्वर पर ही क्यों टिकाया जाय, जिसको न देखा है, और न उसका रूप सामने है, केवल कल्पना है कि इस प्रकार की कोई सत्ता है जो सर्वशक्तिमान और चैतन्य है। इससे तो अच्छा यह है कि—किसी देखीभाली वस्तु को जो हमको प्यारी मालूम दे और जो प्रत्यक्ष हमारे सन्मुख है, उसको ही इस काम के लिये क्यों के लिये क्यों न छाँट लिया जाय। इससे एकाग्रता की कठिनाइयाँ बहुत कुछ दूर हो सकती हैं और काम जल्दी हो सकता है, यह ऐसा प्रश्न भी अनेक मस्तिष्कों में उठ सकता है? इस ऐसी शंका का समाधान भी शास्त्रों ने किया है और वह इस प्रकार है :—
इस जगत की रचना में चैतन्य और अचैतन्य दो पदार्थों का मिलाप है, एक सदा एक ही अवस्था में रहने वाली है, न कभी घटती है न बढ़ती है, न उसका नाश होता है, न उत्पन्न होती है। उसमें ज्ञान है, उसमें प्रकाश है, इस एक-रस रहने वाली वस्तु को ‘सत्’ कहा जाता है। दूसरी वस्तु परिवर्तनशील है, वह बनती और बिगड़ती है, उसमें ठहराव नहीं है। उसका प्रत्येक कण हर समय चलता ही रहता है। जो शकल आज हमारी आँखों के सामने है, कल नहीं रहती। वस्तु के जिस रूप को आज हम देख रहे हैं, विनाश उसके संग-संग चलता है। उसमें ज्ञान नहीं है, स्थिरता नहीं है, प्रकाश नहीं है, दूसरे के सहारे अपना काम करती हुई अनेक रूपों से प्रकट होती है। उसमें समुद्र की तरह हर समय तरंग उठती रहती है एक लहर आगे चलती है और सैकिंड में उसके स्थान पर दूसरी लहर आ जाती है, यह सिलसिला उसका कभी समाप्त नहीं होता। बुलबुले उठते हैं, कुछ देर दिखाई देते हैं, वह भी किसी धक्के से आगे को बहते हुए नजर आते हैं, एक स्थान पर नहीं टिकते और अन्त में लोप हो जाते हैं। फिर पता भी नहीं चलता कि वह किधर से आये थे और किधर चले गये। इन सब ऐसे पदार्थों को ‘असत्’ बोला जाता है।
जो स्त्री आज युवा है, कुछ दिन में ही उसका चन्द्र मुख मलिन होने लगेगा, उसके सुन्दर शरीर की कान्ति क्षीण होने लगेगी और आगे चलकर वह एक वृद्धा के रूप में आयेगी पीछे शरीर भी नहीं रहेगा, इनमें से किस रूप को और कैसे तुम पकड़ोगे और किस पर अपने को केन्द्रित करोगे। यही दृष्टान्त सन्तान के लिये भी है। आज वह बालक है, उसकी अठखेलियाँ, उसकी तोतली भाषा हमको अपनी ओर आकर्षित करती है पर वह सदैव ऐसा ही नहीं करेगा, दिन-दिन बदलेगा, उसके शरीर का आकार बदलेगा, उसके भाव बदलेंगे। उसकी भाषा बदलेगी, उस पर बाल्यावस्था के बाद जवानी आयेगी, फिर बुढ़ापे के शिकंजे में कसा जायगा, इस प्रकार बराबर परिवर्तन होता जायेगा। इनमें से तुम किसकी उपासना करोगे, किस रूप को पकड़ के अपने दिल में बिठाओगे। उपनिषद्कार ऋषि यह उपदेश दे रहे हैं कि इन सबकी ओर से अपना चित्त हटा के केवल भगवद् चरणों में लगाओ—वह ही एक ‘सत्’ है और उसकी उपासना जीव का कल्याण करती है। यही उस प्रश्न का उत्तर है कि ‘हम ईश्वर की उपासना क्यों करें। इसके लिए किसी दूसरी देखी-भाली अपनी प्यारी वस्तु को क्यों न छाँट लें’ उपनिषद् आगे और भी कहता है :—
अन्य देवाहुः सम्भवादन्यदाहुर सम्भवात्।
इति शुश्रुम धीराणाँ ये नस्तद्विचि चक्षिरे॥
अर्थ—चैतन्य और एक रस रहने वाली (आत्मा) की उपासना से और फल मिलता है और प्रकृति के बने हुये पदार्थों, शरीर इत्यादि की उपासना का और (दूसरा) फल मिलता है। ऋषि कह रहे हैं कि—ऐसा बुद्धिमान धीर पुरुषों से हमने सुना है और उन्होंने खोल के अर्थात् स्पष्ट हमको बतलाया है।
इस मन्त्र में भी यही संकेत आया है कि संसार से चित्त हटा कर प्रभु को अपने हृदय में बिठाओ, इसी से जन्म सफल होता है, आत्मा का उद्धार होता है। परन्तु शरीर को भूल बैठे और सब कुछ त्याग के केवल आत्मा का ही देखता रहे, यह कैसे सम्भव है? शरीर रखते हुए शरीर की भी खबर रखनी होगी, यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, शरीर निर्बल है तो उपासना भी नहीं बन पड़ेगी कोई साधन मन की एकाग्रता का नहीं हो सकेगा, ध्यान व पूजन भी ऐसा निर्बल मनुष्य नहीं कर सकेगा, तो ऐसी दशा में क्या करना उचित है? इसका उपाय भी उपनिषद्कारों ने बताया है :—
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युँतीर्त्वा सम्भूत्या ऽमृतम्श्नुते॥
अर्थ—जो आत्मा को और प्रकृति के बने हुए इस नश्वर शरीर का जानता है, दोनों को साथी समझ के दोनों की उपासना करता है, आत्मा और शरीर दोनों को बल देता है, शरीर और आत्मा दोनों के रोगों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाता है, वही अमरता को प्राप्त होता है।
यह मन्त्र सारी शंकाओं का समाधान करता है, वह कहता है कि वीर्य रक्षा से, मिथ्या आहार-विहार के त्याग से, प्रत्येक कर्म में संयम रखने से, नियमपूर्वक अपना जीवन-व्यवहार करने से, शरीर में बल आता है और ऐसा निरोग शरीर ही साधन में सफलता प्राप्त कर सकता है। क्षीण वीर्य और निर्बल मनुष्य एकाग्रता नहीं प्राप्त कर पाता, उसकी उपासना ढीली रहती है, उसका चिंतन और ध्यान एक रस नहीं चल पाता है, वह आत्म चेष्टा में हिम्मत हार बैठता है, वह मन के धक्के का सहन नहीं कर सकता, विघ्न आने पर उनका मुकाबला नहीं कर सकता, बलहीन में साहस और उत्साह की कमी रहती है, उसका इरादा अथवा संकल्प मजबूती लिए नहीं होता, करता है फिर छोड़ देता है, ऐसों को अमरधाम में पहुँचना एवं मन पर अधिकार करके आत्मसाक्षात्कार करना बड़ा ही कठिन हो जाता है। वह सफल हो सकेगा या नहीं इसमें सन्देह ही रहता है। इसलिए ठीक रास्ता जिज्ञासु के लिए यह है कि—वीर्य रक्षा करके और रोगों से बचा करके शरीर को बलवान बनाओ फिर आत्म साधनों में लग पड़ो और उस अवस्था में अपने को पहुँचाओ जहाँ आगे पीछे, ऊपर नीचे, दाएँ-बाएँ एक शुद्ध चैतन्य पुरुष की सत्ता भरी हुई दृष्टि-गोचर हो, प्रत्येक वस्तु उसके रंग में रंगी हुई दिखाई दे, प्रत्येक पदार्थ में उसके रूप की झलक झलकती हुई नजर आवे, प्रकृति के प्रत्येक कण तुम्हारे लिए दर्पण बन जाये जिसमें प्यारे का मुखड़ा चमकता हुआ जान पड़े। तुममें तुमसे बाहर, औरों में औरों से बाहर वही एक तत्व भरा हुआ अनुभव हो, वह सबमें और सब उसमें प्रत्यक्ष मालूम देने लगें, इसका नाम ही ‘ब्रह्मचर्यावस्था’ है और यहाँ तक पहुँचा हुआ ही ‘ब्रह्मचारी’ है। वीर्य रक्षा, विचार संयम और इच्छा शक्ति को बलवान बनाने से और निरन्तर अपना उद्योग जारी रखने से आगे चल कर कुछ काल में साधकों पर यह अवस्था आ जाती है। मार्ग दर्शक गुरु यदि अनुभवी है तो उसमें समय की कुछ बचत हो जाती है, जल्दी हो जाती है।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुप्त, एम. एल.टी. फैजाबाद)
विश्व में शक्ति के जितने भी साधन हैं उनमें विचारों की शक्ति सबसे तीव्र और प्रबल है। विचारों की रचना परमाणुमयी है। ये आकाश में व्याप्त ईथर तत्व के सूक्ष्म कण समूह हैं जिनकी रचना मन के अदृश्य स्तर में होती है। ‘ईथर’ तत्व समग्र विश्व में प्रचुरता से व्याप्त है। इसी माध्यम के अनुसार विचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजे जा सकते हैं। हम दृढ़ इच्छा शक्ति एवं मनोबल द्वारा अपने विचार दूसरे मस्तिष्कों में फेंक सकते हैं। ‘ईथर’ का अदृश्य माध्यम विचार संचालन क्रिया में सबसे बड़ा सहायक सिद्ध हुआ है। प्रकाश की सूक्ष्म लहरों की तरह विचारों की लहरें भी संचरित होती हैं। प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणु को गति प्रदान करता है, दूसरा तीसरे को, तीसरा चौथे को, इस प्रकार विचार की तरंगें ईथर माध्यम में अमित वेग से चलती हैं।
प्रकाश की गति एक मिनट में लाखों मील की है किन्तु विचार की गति उससे भी अधिक है। चैतन्य वाही होने के कारण उसकी गति अप्रतिहत है। संसार की कोई रुकावट इसका वेग अवरुद्ध नहीं कर सकती। यह एक मानी हुई बात है कि जो वस्तु जितनी ही सूक्ष्म या चेतन होती है उसका बल भी उतना ही अधिक होता है। जल से वाष्प, वाष्प से वायु, वायु से आकाश, आकाश से प्रकाश और प्रकाश से विद्युत में जड़ता कम और चैतन्य अधिक है। इसीलिए एक ही अपेक्षा दूसरा अधिक शक्तिमान है।
जिस यन्त्र द्वारा मन से विचारों को निकाला जाता है वह मस्तिष्क एक प्रकार का बड़ा शक्तिशाली ‘डाइनमो’ है। अतः इसके केन्द्रस्थान में विचार की गति अत्यन्त तीव्र होती है। यह प्रबल वेग से विचारों की लहरें ईथर के वायुमण्डल में फेंकता है अर्थात् विचार से कम्पन और उससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। प्रत्येक विचार एक विशिष्ट प्रकार की लहर उत्पन्न करता है और मनुष्य का मस्तिष्क अपनी सजातीय तरंगों को ग्रहण करता रहता है। जैसे कोई व्यक्ति भयातुर अथवा भयभीत है या क्रोधावेश में है तो सूक्ष्म जगत में फैली हुई भय और क्रोध की तरंगें खिंचकर उसके मस्तिष्क से टकराती हैं, इसके विपरीत यदि कोई स्नेह और सहानुभूति के विचारों में भर रहा है तथा निःशंक है और इन दिशाओं में उसके विचार दृढ़ हैं तो वैसी ही विचार तरंगें उसे स्पर्श करेंगी।
विश्व के समस्त परिवर्तनों के मूल कारण विचार ही हैं प्रत्येक विचार उस नन्हें बीज के समान है जिसमें एक महान् वृक्ष उत्पन्न करने की शक्ति छिपी है। यदि उस बीज को उचित वातावरण मिले तो निश्चय ही वह हमें सामर्थ्यशाली बना सकता है। आध्यात्म शास्त्र का अटल एवं अनुभव सिद्ध सिद्धान्त है कि मनुष्य के जैसे विचार होते हैं, जैसा ही वह नित्य प्रति के जीवन में सोचता, विचारता, ध्यान करता है वैसा ही वह बनता है और उसका भाग्य तथा फल निर्माण होता है और वैसा ही वह दूसरों के बनाने में सहायता करता है। यदि हम जान लें कि हम चित्त में उदय होने वाले प्रत्येक विचार से अपने साथ ही संसार को भी अच्छा या बुरा बना रहे हैं तो हम उस उत्तरदायित्व की कुछ कल्पना कर सकेंगे जो मानव होने के नाते हम पर है।
हम लोग प्रायः समझते हैं कि जब तक हम कोई बुरा कर्म नहीं करते तब तक मन में यदि कोई दूषित विचार आ ही गया तो कोई विशेष हानि नहीं। यह गलत धारणा है। प्रत्येक विचार जो मन में उत्पन्न होता है, बिजली के समान प्रचण्ड शक्ति से पूर्ण है। इसलिए मनुष्य यदि कोई भी क्षुद्र विचार मन में आने देता है तो न केवल वह अपने मन को, दुर्बल करता और बुरे कार्यों की ओर अपने को प्रवृत्त करने का बीज बोता है बल्कि विश्व के प्रत्येक प्राणी के जीवन को विषाक्त करने का भी अपराध करता है। कोई मनुष्य विचारों से एक क्षण भी रिक्त नहीं रह सकता। वह प्रतिदिन अपने मस्तिष्क के चेतना केन्द्र से अगणित विचार तरंगें बाहर भेजता है और ग्रहण भी करता है। इससे आप उस हानि का कुछ अनुमान कर सकते हैं जो बुरे, दीन, दुर्बल, अस्वस्थ और अकल्याण कारक विचार वाला आदमी अपना और समस्त विश्व का करता है। इसी प्रकार उसके विचार अच्छे हुए तो वह अपना तथा दूसरों का कितना कल्याण साधन कर सकता है, इसका अनुमान करना भी कठिन नहीं।
मस्तिष्क की शक्ति से ही हम गिरते और उठते हैं, खड़े होते और चलते हैं। इसी मन्थन कारी यन्त्र की सहायता से विचार मन से निःसृत होते हैं, वास्तव में मन ही विचारों का स्त्रोत है। विचारों की तीव्र शक्ति से ही सब काम होते हैं। जो अपने विचारों के स्रोत को नियन्त्रित कर सकता है वह अपने मनोवेग पर भी शासन कर सकता है। ऐसा व्यक्ति अपने संकल्प से वृद्धावस्था को यौवन में बदल सकता है, रोगी को निरोगी कर सकता है। मन में सदा सद्विचारों को स्थान देने से मनुष्य अपनी विपुल आत्म शक्ति को प्रत्यक्ष कर सकता है। उसमें सोई हुई असीम शक्तियाँ जाग उठती हैं। प्रत्येक उच्च कार्य करने की शक्ति का अनुभव होता है। किसी श्रेष्ठ संकल्प से शरीर के समस्त जीव—कोष्ठक (सेल्स) दृढ़ एवं शक्तिमान होते हैं, धारणाशक्ति सजीव होती है।
शक्ति का अन्तः स्वरूप चेतन और बाह्य रूप गतिमान है। अर्थात् उसमें चैतन्य और गति दोनों हैं। विचार शक्ति संसार को चेतना प्रदान करती और चलाती है। यद्यपि विचार मानव दृष्टि से अदृश्य हैं परन्तु उनकी अद्भुत शक्ति को सबने स्वीकार किया है। अमेरिका और यूरोप के बहुत से डॉक्टरों ने दृढ़ विचारों की संकल्प शक्ति से मानसिक एवं स्नायविक रोगों की चिकित्सा में पर्याप्त सफलता प्राप्त की है। इस प्रकार की ‘साइको थैरेपी’ या प्राण चिकित्सा का प्रसार वहाँ दिन पर दिन अधिक हो रहा है। जीर्ण रोगों में अपनी मनःशक्ति का प्रभाव रोगों के ऊपर डाल सकते हैं और उसके दुर्बल मन को सबल कर रोग से लड़ने की उसकी शक्ति में वृद्धि करते हैं। यह बहुधा देखा जाता है कि एक आनन्ददायक या शुभ विचार के मन में आते ही चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिल उठता है और भय के कारण वही चेहरा एकदम पीला या निर्जीव पड़ जाता है। शोक समाचार सुनने से भूख बन्द हो जाती है, क्रोध एवं चिड़चिड़ेपन से मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है तथा आँतें निर्बल पड़ जाती हैं। इन बातों से यह शिक्षा मिलती है कि शुभ उन्नत और कल्याणकारी विचारों से मानव शरीर अधिक सूक्ष्म एवं निरोग रहता है तथा जीवन युद्ध में सफलता प्राप्त करने की अधिक आशा की जा सकती है।
अतः स्पष्ट है कि विचारों के रूप में कैसी सूक्ष्म शक्तियाँ मनुष्य में भरी पड़ी हैं। इन विचारों को दृढ़ करके, संघटित करके मनुष्य संकल्प बल से अपनी काया पलट सकता है और विश्व को बदल सकता है। इसलिए कहा गया है कि ‘निराशा पाप है’ और ‘आशा तथा विश्वास संजीवन का काम करते हैं। जो सोचता है कि मैं अभागा हूँ, मुझे प्रभु ने भाग्यहीन बनाया है, मेरे भाग्य में दुःख ही लिखा है वह धन और सुविधाएँ पाकर भी दुःखी ही रहेगा। जो अपने को असमर्थ और अभागा मानता है, उसे सौभाग्यशाली बनाने में कोई समर्थ न होगा। स्वयं मनुष्य के सिवाय किसी में यह शक्ति नहीं है कि उसे शान्ति और सुख दे सके। हम जो अन्दर हैं, उसी अनुरूप बाहर भी बनेंगे। यदि हमारा मानस दरिद्र है तो चाहे हमारे चतुर्दिक् ऐश्वर्य का सागर लहराता हो, हम दरिद्र ही रहेंगे।
किसी महात्मा ने सत्य ही कहा है—”मनुष्य जैसा है, अपने विचारों से बना है। स्वतन्त्रता और सुख प्राप्त करना मनुष्य की अपनी इच्छा, अपने संकल्प बल पर है। यदि हमारी आत्म प्रेरणाएँ उच्च और दिव्य होंगी तो हम जीवन में सफल और सुखी होंगे।” अतः हमें चाहिए कि हम सदैव उसी पर विचार करें जिसमें श्रेष्ठता और उच्चता विद्यमान हो। कभी किसी अवाञ्छनीय विचार को अपने पास न फटकने दीजिए। उदासी और हीनता, रोग और दुःख के विचार मन में न आने दीजिए। विश्वास रखिए, आप में पूरी योग्यता है, आप अपने कार्य को अच्छे ढंग से सम्पादन कर सकते हैं, आपका जीवन विजय के लिए है। आप अपने विचारों को दृढ़ रखिए और अपनी महत्वाकाँक्षाओं को मुरझाने न दीजिए। इसी में जीवन की सच्ची सफलता है।
—मन की चंचलता से बचो, मन का संयम रखो, मन का दुश्चरित्र छोड़कर सात्विक आचरण करो।
—जो काम भोगों को छोड़कर अनिकेतन हो परिव्राजक बन गया है। जिसका पुनर्जन्म क्षीण हो गया है और जिसने निर्वाण प्राप्त कर लिया है वही सच्चा ब्राह्मण कहा जा सकता है।
—जिस प्रकार फूल सवेरे के प्रकाश को लेने के लिए अपनी पंखड़ियों को खोल देता है उसी प्रकार तुम भी अपनी आत्माओं को उदारता के साथ ईश्वर के देदीप्यमान प्रकाश को भीतर आने के लिए खुला रखो।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
प्रायः अधिकाँश व्यक्ति मानसिक रूप से आलसी होते हैं। जब वे परीक्षा के लिए किसी पुस्तक को तैयार करने बैठते हैं, तो वे उसका अध्ययन नहीं करते प्रत्युत घोड़े की तरह सरपट दौड़े जाते हैं। पुस्तक पढ़ने के पश्चात् यदि आप उनसे प्रश्न करें कि क्या पढ़ा है, तो वे कुछ भी उत्तर नहीं दे पाते। कारण उनकी स्मृति पुस्तक से कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाती। ज्ञान ऊपर से ही निकल जाता है,नवीन संस्कारों को दृढ़ता से मन नहीं पकड़ पाता। प्रतिदिन वे नई पुस्तक पढ़ते हैं किन्तु उनके मन में केवल एक हलकी-सी छाया मात्र रह जाती है।
हमें चाहिए कि मन की इस भाग-दौड़ और भँवर वृत्ति से छुटकारा प्राप्त करें। किसी पुस्तक से स्थायी लाभ प्राप्त करने के लिए हमें चाहिए कि पुस्तक को धीरे-धीरे शान्तिपूर्वक पढ़ें। कुछ पढ़ने के पश्चात् रुकें तथा अपने आप से प्रश्न करते रहें, “हमने अभी तक क्या पढ़ा है?” यदि मन पर नये संस्कार नहीं पड़े हैं तथा स्मृति ने कुछ ग्रहण नहीं किया है तो हमें पुनः उस भाग को पढ़ना चाहिए, यहाँ तक कि नये संस्कार जटिलता से अंकित हो जाय। अध्ययन करते समय इन तत्वों पर विशेष ध्यान रखिए :—
1—मनन :- अर्थात् पढ़ी हुई बात पर पुनः पुनः चिंतन, सोचना, विचार करना जिससे कि वह मन में बैठ सके और भूला न जा सके। पढ़ी बात पर जितना ही चिंतन किया जायगा, वह उतनी ही स्मृति में अच्छी तरह बस जायगी।
2—पूर्व पर्यवेक्षण :- जो कुछ आप पहले पढ़ चुके हैं, उसे नये ज्ञान से संयुक्त करना, उसे न भूलना, वरन् नये विचार से उसका मिलान करना। यदि पिछला भूलते जायं और आगे पढ़ते जायं, तो कोई लाभ नहीं है। अध्ययन का सम्बन्ध विचार से है। टामस हाव्स ने कहा कि यदि मैं उतना ही पढ़ता जितना दूसरे लोग पढ़ते हैं तो मेरा ज्ञान उतना ही कम होता। कारण लोग पहले पढ़े पर सोच विचार करना नहीं चाहते। उनकी मानसिक पाचन क्रिया ठीक नहीं है।
यूनानी तत्वज्ञानी डीमाक्रोटस ने जो ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व हुए थे, उन्होंने अपने नेत्र इसीलिए निकलवा डाले थे जिससे व्यर्थ कागज पर नेत्र दौड़ाने के स्थान पर वह मनन और चिंतन कर सके। पुनः पुनः स्मृति में संगृहीत ज्ञान की आवृत्ति करने से ज्ञान दृढ़ होता है और संस्कार परिपुष्ट होते हैं।
3—ध्यानावस्थिति :-मन का तेजी से पुस्तक के मैटर पर दत्तचित्त रूप में लगा रहना। जितना ही अधिक आपका ध्यान विषय में लगा रहेगा, उतना ही आपका मन नये ज्ञान को ग्रहण करेगा। प्रायः लोग रुचि पूर्वक पुस्तक के विषय में दिलचस्पी नहीं लेते, अतः ध्यान उस पर नहीं लगता। कोई भी लाभ पठन-पाठन से नहीं होता। ध्यान को अधिक से अधिक लगाये रहने से ही नया ज्ञान अन्तस्तल में अंकित होता है। बहुधा लोगों की आंखें तो पुस्तक पर रहती है, मन कहीं अन्य चक्कर लगाता रहता है, जब तक मन की आँखें नये ज्ञान पर केन्द्रित नहीं होंगी, विचार मन में न ठहरेंगे। अधूरे विचारों को नोट करने से ध्यान लगा रहता है।
4—स्मृति को दृढ़ बनाना :- स्मृति को मजबूत करना चाहिये। स्मृति के खजाने में ही सब ज्ञान संचित रहता है। स्मृति हमारे बौद्धिक विकास की प्रथम सोपान है। यदि हमारा ज्ञान स्मृति में सुरक्षित होता रहे, तो निरन्तर ज्ञानवृद्धि होती रहे।
स्मृति को मजबूत करने के लिए नोट लेने तथा पुस्तक पर कठिन और उपयोगी स्थलों पर निशान लगाने की आदत डालनी चाहिये। डेल कार्नेगी ने लिखा है, “हाथ में लाल पेंसिल, काली पेंसिल या फाउन्टेन पेन लेकर पढ़िये। जब-जब आप ऐसा संकेत देखें जिसका उपयोग आप अनुभव करते हैं या भविष्य में कर सकते हैं, उसके नीचे लकीर खींचने से पुस्तक अधिक मनोरंजन बन जाती है और उसको जल्दी से पुनः पढ़ जाना सरल हो जाता है। जिस शीघ्रता से हम भूलते हैं, उसे देखकर आश्चर्य होता है। वास्तविक और स्थायी लाभ प्राप्त करना चाहते हैं तो मत समझिए कि पुस्तक को एक बार सरसरी तौर पर पढ़ जाना पर्याप्त होगा। भली-भाँति पढ़ जाने के पश्चात् भी आपको प्रतिमास उसे दुबारा कुछ घन्टे अवश्य व्यय करने चाहिये जिस पुस्तक को आप पचाना चाहते हैं, उसे नित अपने सामने मेज पर रखिए, निरन्तर मन पर संस्कार डालते रहिए।
राबर्ट लुई स्टीवनसेन के पास सदा दो पुस्तकें रहती थीं, एक पढ़ने के लिए तथा दूसरी अपने विचार उस पर लिखने के लिए। वह सदा नोट करने का आदी था। उसका ख्याल था कि जो विचार लिख लिये जाते हैं वे स्थायी बनकर स्मृति में जम जाते हैं।
टामस हाव्स प्रातः भ्रमण को जाते समय हाथ में एक मोटा डण्डा रहता था। उन दिनों (17वीं शताब्दी में) फाउन्टेन पेन नहीं रखते थे। वह उसी सोटे के सिर में दवात और कलम ऐसे ढंग से रखता था कि दूसरों को दृष्टिगोचर नहीं होने देता था। उसकी जेब में एक नोट बुक होती थी, जिसमें वह भ्रमण में आये हुए विचारों को नोट करता चलता था।
पढ़ने की क्रिया अधिक तेज न हो, नहीं तो मन ग्रहण न कर सकेगा। यदि आँखें मन की अपेक्षा अधिक तेजी से दौड़ रही हैं, तो ग्रहणशक्ति और भी मन्द पड़ती जायगी। पुस्तक या अखबार को जल्दी से समाप्त करने की उतावली न कीजिए। जल्दबाजी से मन नया ज्ञान कदापि ग्रहण नहीं करता। बाहर से यही तृप्ति होती है कि हमने पढ़ भर लिया है। इस मानसिक दौड़ से कोई लाभ नहीं है। यदि गति बढ़ाने की इच्छा है तो विवेक-बुद्धि और ग्रहणशक्ति का विस्तार करते चलिये।
अध्ययन की परीक्षा :- जितना ज्ञान हमने एक दिन में प्राप्त किया है, इसकी जानकारी प्रतिदिन रात्रि में चिंतन मनन द्वारा मालूम करनी चाहिए। प्रति सप्ताह सात दिनों के कार्यों पर विचार करना चाहिये। जाँच का कार्य महत्वपूर्ण है। इससे नीर क्षीर हो जाता है। हम जिस ज्ञान को अपना समझते हैं, वह प्रायः अधूरा धुँधला, अपूर्ण निकलता है। मास के पश्चात् पूरे 4 सप्ताहों के ज्ञान-संचय पर विचार कीजिये। यदि जी चाहे तो किसी मित्र बड़े भाई या पिता की सहायता से परीक्षा कार्य हो सकता है। उनसे कहिये कि वे आपसे उन हिस्सों में से प्रश्न पूछें जो आपने तैयार किये हैं। आप लिखकर परीक्षा दें तो और भी उत्तम है। लिखने से हिज्जों की गलतियाँ भी दूर होती हैं तथा ज्ञान पूर्ण बन जाता है। एक डायरी लिखा कीजिए। ज्यों-ज्यों पढ़ने-लिखने में दक्षता बढ़ती जायगी, उसका ग्रहण-विस्तार प्रतिमास बढ़ता जायगा।
—हवा में उड़ना कोई चमत्कार नहीं क्योंकि गन्दी मक्खियाँ भी उड़ सकती हैं। बिना पुल और नाव के नदियों को पार कर लेना कोई चमत्कार नहीं, कुत्ते भी उन्हें पार कर सकते हैं परन्तु दुःखी हृदय को सहानुभूति और सहायता पहुँचाना एक ऐसा चमत्कार है जिसे पवित्र आत्माएँ ही दिखा सकती हैं।
—वही मनुष्य संसार में शान्त और निश्चल रह सकता है जिसने आध्यात्मिक जगत का अनुभव प्राप्त कर लिया है, ऐसे मनुष्य पर बाहर की प्रतिकूल परिस्थिति का कुछ भी असर नहीं होता।
—जो मनुष्य जीवन-संग्राम में परास्त हो जाते हैं वे अज्ञानवश दूसरों की निन्दा करने लगते हैं और असफलता का दोष दूसरों पर मढ़ते हैं जबकि उसके जिम्मेवार वे स्वयं हैं।
(ले.—श्री सुरेन्द्र शर्मा, बी.ए.)
सुख कैसे प्राप्त करें? यह प्रश्न सदियों से हजारों मनुष्य करते चले आये हैं, करते रहते हैं और करते रहेंगे। विचार करना है सुख किसे कहते हैं? कहाँ कैसे प्राप्त किया जा सकता है? कुवासनाओं एवं नीची प्रवृत्तियों की सन्तुष्टि को सुख नहीं कहते। वह केवल मन का भ्रम है और भ्रम का आवरण हटते ही हमें त्रुटि दिखलाई देने लगती है। क्या ही आश्चर्य की बात है कि किसी को मोटर खरीदने में, किसी व्यक्ति को सिनेमा इत्यादि देखने में और किसी-किसी को अति मधुर खाद्य-पदार्थों में सुख मिलता है जबकि दीन को केवल पेट भर भोजन मिल जाने से ही सुख प्राप्त हो जाता है।
प्रश्न यह उठता है—क्या लोहे से बनी हुई मोटर में सुख है, अथवा मधुर खाद्य-पदार्थों में सुख है, या फिर अन्य किसी बाह्य पदार्थ में उसकी स्थिति है? यदि सुख किसी बाहरी पदार्थ में होता तो फिर जो वस्तु एक को सुखकर होती है वह दूसरे को किसी और को भी उतना ही आनन्द देती परन्तु अनुभव से ज्ञात होता है कि ऐसा नहीं है। जो वस्तु एक को सुख या आरामदायक है वह दूसरे को कभी-कभी उससे भी हानिकारक है। जैसे अफीम का व्यसन आदत पड़े हुए व्यक्ति को किसी भी भ्रमात्मक अंश तक लाभदायक हो सकता है परन्तु जो उसे खाने का आदी नहीं है उसे वह हानि पहुँचाता है।
यदि सुख इन पदार्थों में ही निहित होता तो फिर हम त्यागी महात्माओं को सर्व प्रकार से सुखी कैसे पाते? और इन पदार्थों के पाने वालों को फिर भी दुःखी क्यों देखते? सुख दैवी वस्तु है। आत्मिक आनन्द है। नश्वर शरीर से उसका कोई लगाव नहीं, जो ऐसा समझते हैं कि सुख का सम्बन्ध शरीर से है वे भ्रम में हैं जड़ता से सुख की उपलब्धि कभी नहीं हो सकती, वह तो अपने ही अन्दर विद्यमान है, परंतु खेद है कि हम उसे अपने में खोजने का प्रयत्न नहीं करते और कस्तूरी नाभि में बसे हुए मृग के समान बाहर रेतीले मैदानों में उसे खोजते फिरते हैं।
हमारी बुद्धि का कितना हास्यास्पद कृत्य है जबकि हम जड़ता से जड़ता की सन्तुष्टि में सुख निहित समझते हैं। यह ठीक उसी प्रकार की मूर्खता है जिस प्रकार हमें जाना तो मन्दिर को है और हम चल रहे हैं अस्पताल की राह पर, सोचते यह जा रहे हैं कि जब चल रहे हैं तो मन्दिर ही पहुँचेंगे।
पश्चिमी दर्शन में यह सबसे बड़ा दोष है कि वह हर बात को निम्न-कोटि में ले जाते हैं और यह प्राकृतिक है कह कर प्रकृति की दुहाई दे देते हैं। हर प्रकार की नीचता की बात को प्रकृति की ओट में करना और उसकी दुहाई दे देने से वह केवल तर्क भर कर सकते हैं उससे उनकी स्वयं की आत्मिक संतुष्टि भी नहीं होती। कोई नदी यदि वेगवती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह किनारों की पूर्ण उपेक्षा ही कर दे। यदि उनके तर्क के अनुसार विकार सन्तुष्टि को शरीर का एक अंग भी मान लिया जाय तो क्या इसकी फिर कोई सीमा ही नहीं होनी चाहिये। पूर्वी दर्शन में विकार को कोई स्थान नहीं है। परिधियों का सृजन करते हुए आदर्श की उच्च-सत्ता की प्राप्ति ही उसका परम लक्ष है। वासना या कामुकता को वहाँ घृणास्पद कहा गया है। फलतः हम देखते हैं कि पश्चिमी दर्शन जड़ता से प्रारम्भ करके, जड़ता में रमण करते हुए उसमें ही समाप्ति कर देते हैं। भौतिकता जड़ता को-पूर्वी दर्शन प्रारम्भ से भी पूर्व का, नीच योनियों का, पिछड़ा हुआ विषय मानता है इसीलिए कहा जाता है कि जहाँ पश्चिमी दर्शन समाप्त होता है वहाँ पूर्वी दर्शन प्रारम्भ होता है। पूर्वी और पश्चिमी दर्शनों की विस्तृत विवेचना फिर कभी किसी अन्य लेख में लिखेंगे।
मानव शरीर भौतिक पदार्थों के अनुपात से सृजित होने के कारण भौतिक पदार्थों से सम्पन्न और संकलन में ही सुख समझता है जबकि पूर्वी दर्शन उसे व्यामोह, मतिभ्रम या माया जाल कहता है। केवल भौतिकता से कभी सुख नहीं मिल सकता यह पाश्चात्यों की स्थिति से प्रत्यक्ष है। जिस देश में भौतिकता का सम्मान होगा वह देश पतनोन्मुख होगा और जिस देश में आध्यात्मिकता को सम्मानित किया जायगा वह उन्नतिपूर्ण होगा।
कोई-कोई यह भी प्रश्न करते हैं-क्या सुख का स्थान बदलता रहता है। यह एक स्वाभाविक प्रश्न है। पात्र, देश और काल के साथ-साथ सुख का स्थान भी परिवर्तित होता रहता है बचपन में बालक अपनी माँ के स्तन्य के समतुल्य संसार की कोई वस्तु नहीं समझता। वह बालक जब कुछ और बड़ा हो जाता है तो फिर खेलने के खिलौनों को अधिक महत्व देने लगता है। युवावस्था प्राप्त होने पर वह अपनी पत्नी के प्रेम में रंग जाता है, और सन्तान उत्पन्न होते ही उसका प्रेम बच्चों पर केन्द्रित हो जाता है।
प्रेम करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। प्रेम हीन हृदय की साहित्य में पाषाण से समता की गई है। सच्चे प्रेम से परम सुख की प्राप्ति होती है परन्तु सच्चा प्रेम त्याग की नींव पर ही दृढ़ रह सकता है। त्याग अभाव में प्रेम न रह कर विकार का रूप धारण कर लेता है। शारीरिक इन्द्रिय जन्य सुख की कोई स्थिति नहीं। यह भी क्षणिक होता है, और ग्लानि उत्पन्न करता है।
सुख किसी से बदला लेने में नहीं वरन् क्षमा करने में है, बलिदान में है, आत्मोत्थान में है। सत्य कर्मों के करने से, सत्य वचनों के बोलने से आत्मा विभोर हो उठती है। सत्कर्म शील मनुष्य के चेहरे पर ओज होता है। उसकी वाणी एक प्रकार का राग और मुद्राओं में सम्मोहन की शक्ति होती है जिसके प्रति हमारा हृदय अपने आप खिंचने लगता है। वह हर कार्य ईश्वर के लिए करता है। उसकी कीर्ति ज्योति से विश्व चमकने लगता है।
सुख की स्थिति वास्तविक सन्तोष धारण करने में है। व्यग्र रहने या उद्वेलित रहने से मन में सदैव क्लेश उत्पन्न होता है। एक कहावत है कि एक माली की दो लड़कियाँ अपने सिरों पर फलों के टोकरे लिए जा रही थीं। बड़ी लड़की अपने बोझ को अधिक महसूस कर रहीं थी जबकि दोनों टोकरों का वजन बिलकुल बराबर था। छोटी बहिन को प्रसन्न चित्त देख कर उसने पूछा—क्या तुझे बोझ बुरा नहीं मालूम देता है। प्रश्न के उत्तर में छोटी बहिन ने कहा—यह बात तो नहीं है परन्तु मेरे टोकरे में सन्तोष का ऐसा फल रखा है जो और फलों के वजन को भी हलका कर रहा है। यह बात कहावत होते हुए भी तथ्यपूर्ण है। यदि हम सन्तोष और धैर्य से काम लें तो दुःख का बोझ अवश्य हलका हो जाता है।
सन्तोष का अर्थ यहाँ पर अकर्मण्य हो जाने से कदापि नहीं है, बल्कि विकार रहित प्रयत्न करने से है। सुख और समृद्धि मानव के अधिकार या स्वत्व हैं, आवश्यकता उसकी दृढ़ता और लगन की है। यदि वह विश्वास करने लगे कि संसार की विपुल सम्पत्ति का स्वामी ईश्वर है और मानव उसका पुत्र है तो विश्व की सम्पत्ति पर उसका पैतृक अधिकार हो जाता है। पदार्थों की न्यून या अधिक प्राप्ति से कोई बड़ा या सुखी नहीं बन सकता। विचारों को सदैव उदार और उन्नत बनाना चाहिए। मानसिक दरिद्रता का बड़ा स्थाई प्रभाव पड़ता है अतएव उससे सदैव बचना चाहिए। कंजूसी करने से आत्मा मलिन, संकीर्ण एवं तुच्छ बनती है।
सच्चा सुख, समृद्धि तथा वैभव आत्मोत्थान में ही निहित है, सांसारिक जड़ पदार्थों के संकलन में या मन की निम्न कुवासनाओं के पूर्ण करने में नहीं है। सुख को अपनी आत्मा में ही खोजना चाहिये, वह कोई बाह्य वस्तु नहीं है। यदि सुख है तो आत्मा के आनन्द में। और यदि हमारी लगन सच्ची है तो उस सुख की प्राप्ति अवश्य होगी जिस सुख को योगी लोग “आत्मानन्द” कहते हैं।
यों स्वाध्याय,सत्संग, कथा, कीर्तन,दान, पुण्य, होम, यज्ञ, पूजा, अर्चा आदि सभी धार्मिक कृत्यों का अपना-अपना महत्व और लाभ है। इन सभी से आत्मिक उन्नति, पवित्रता, एवं पुण्य परमार्थ की वृद्धि होती है पर “आत्म शक्ति” की वृद्धि का प्रयोजन ‘तप’ के अतिरिक्त और किसी मार्ग से पूरा नहीं हो सकता। घर्षण से उष्णता पैदा होती है, जहाँ अग्नि न होगी वहाँ गर्मी भी न होगी। इसी प्रकार आत्मशक्ति वहीं मिलेगी जहाँ तपस्या का आधार होगा। विलासी मनुष्य, विद्वान और उपदेशक तो हो सकता है पर उनका अन्तस्तल खोखला होता है, इसलिये उनकी निष्प्राण विद्वता एवं वाचालता न उनके अपने लिए कुछ लाभदायक होती है और न दूसरों के लिए। पहलवान बनने के लिए कसरत करने का कष्ट सहना पड़ता है, आत्म बल प्राप्त करने के लिए भी तपस्या की अग्नि में अपने को तपाना पड़ता है।
आत्म बल एक प्रकार की सम्पत्ति है जिसके बदले में भौतिक और आत्मिक दोनों ही प्रकार के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। अपना या दूसरों का हित साधन किया जा सकता है। पूर्व काल में तपस्वियों में अनेक प्रकार की चमत्कारी विशेषताएँ होने के प्रमाण और उदाहरण पुराणों में भरे पड़े हैं। आज तप की ओर लोगों का ध्यान नहीं है। आराम पसन्द स्वभाव हो जाने के कारण लोग कष्ट साध्य मार्ग पर चलना पसन्द नहीं करते। तत्क्षण लाभ लोगों का उद्देश्य हो रहा है। चाहे कुमार्ग से ही हो पर तुरन्त और अधिक होना चाहिए। देर तक जिस कार्य के लिए प्रतीक्षा करनी पड़े और आरम्भ में ही जिसके लिए कठिनाई उठानी पड़े उसे पसन्द करने की अभिरुचि लोगों में नहीं है। यही कारण है कि आज तप की प्रवृत्ति बहुत कम दिखाई पड़ती है। कोई साधु-सन्त एकान्त स्थान में भले ही तपस्या करते हों पर सर्व साधारण के नित्य प्रति के व्यवहारिक जीवन में तपश्चर्या के लिए स्थान नहीं रह गया है। उपार्जन और विलास, काँचन और कामिनी के अतिरिक्त और किसी बात की ओर लोगों का ध्यान नहीं जाता।
जन प्रवृत्ति अनुकूल हो चाहे प्रतिकूल पर सत्य तो सदा सत्य ही रहता है। आजकल बहुत कम लोग सच बोलते हैं, कोई विरले ही ब्रह्मचारी रहते हैं, अधिकाँश लोग असत्यवादी और विलासी हैं फिर भी सत्य और ब्रह्मचर्य की महिमा और महानता वैसी ही है जैसी कि सदा से थी। तप से जिस प्रकार पूर्व काल के लोगों का आत्मकल्याण होता था वैसा ही आज भी होता है और आगे हो सकता है।
हाँ, एक बात अवश्य है कि युग परिवर्तन के प्रभाव से वस्तुओं, प्राणियों तत्वों तथा परिस्थितियों में जो अन्तर आ गया है उसके अनुरूप तप के बाह्य परिणामों में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है। प्राचीन काल में तपस्वियों में जो बाह्य विशेषताएँ सहज ही उत्पन्न हो जाती थीं वे अब नहीं होती। सतयुग में आकाश तत्व प्रधान था अन्य तत्व बहुत ही अविकसित थे। जीवों के शरीर भी आकाश तत्वों से भरे पूरे थे, उस जमाने में थोड़ी सी ही साधना से ‘ईश्वर’ तत्व पर अधिकार हो जाता था और लोग सहज ही आकाश में उड़ना, लोक-लोकाँतरों की यात्रा, दूर दृष्टि, दूर श्रवण दूरस्थ लोगों से बातचीत, आदि सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते थे। आकाश का गुण शब्द है। उस समय शब्द ही एक प्रचण्ड शक्ति था। मन्त्र बल से बड़े-बड़े काम होते थे। विमान, अस्त्र, शस्त्र, वर्षा, अग्निकाण्ड, शाप, वरदान जीवन दान, मृत्यु आदि बातें शब्द की (मन्त्र) की शक्ति से सुगमता पूर्वक होती रहती थी।
पीछे त्रेता युग आया। उसमें अग्नि तत्व प्रधान था। लोगों के शरीर अग्नि प्रधान होते थे। सीता जी का अग्नि में प्रवेश कर जाना, साध्वी स्त्रियों का अग्नि परीक्षा देना, महात्मा योगाग्नि में अपने शरीर को भस्म कर देते थे। पति का स्वर्गवास हो जाने पर स्त्रियाँ संकल्प मात्र से अग्नि उत्पन्न कर लेती थी और बिना किसी पीड़ा के उनके अग्नि तत्व प्रधान शरीर नष्ट हो जाते थे। यज्ञों में भी अग्नि मन्त्र बल से ही प्रकट हो जाती थी।
द्वापर में वायु प्रधान युग था। शरीर और वस्तुएं बड़ी हलकी होती थीं। इसलिए उनकी गति तीव्र थी। एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में देर नहीं लगती थी। भारी-भारी बोझ भी आसानी से उठा लिए जाते थे। महाभारत में ऐसी अनेक घटनाओं का वर्णन है जो आज असंभव दिखाई पड़ती हैं। वायु के आधार पर मनुष्य दीर्घ काल तक बिना अन्न जल सेवन किये जीवित रह जाते थे। पवन पुत्र हनुमान जी जैसे अनेक व्यक्ति वायु प्रधान गुण वाले थे। त्रेता की अपेक्षा द्वापर में उनकी संख्या अधिक रही है। उड़ने वाले घोड़ों की भी एक जाति उस समय मौजूद थी।
वर्तमान युग में जल और पृथ्वी तत्व की प्रधानता है। जल में कोमलता और पृथ्वी में जड़ता अधिक है। जैसे कोमल पौधे बिना जल के जल्दी ही सूख जाते हैं वैसे ही लोग थोड़ी सी आपत्ति आने पर मुर्झा जाते हैं। जड़ता का आलस्य-प्रमाद अदूरदर्शिता, अज्ञान का अंश देह में अधिक भरा रहता है। इसलिए जो बातें पूर्व युगों में बहुत साधारण थीं वे आज के युग में कष्ट साध्य एवं असंभव हैं। इसलिए पूर्व युगों का अनुकरण इस युग में नहीं किया जाता। स्त्री का पति के साथ जलना इस युग में वर्जित है क्योंकि अब न तो संकल्प मात्र से अग्नि प्रकट होती है और न बिना पीड़ा के शरीर जल सकता है। पिछले युग में इष्ट देव के प्रत्यक्ष दर्शन करने लायक जो दिव्य दृष्टि हर किसी में आसानी से उत्पन्न हो जाती थी वह अब सुसाध्याय नहीं रहीं। इसलिए अब किसी को इष्ट देव की प्रत्यक्ष झाँकी नहीं हो सकती। सूरदास को ग्वाल बन कर और तुलसीदास की घुड़सवार बनकर अप्रत्यक्ष दर्शन हुए थे। जब ऐसे महात्मा प्रत्यक्ष दर्शन से वंचित रहे तो साधारण साधकों की तो गणना ही क्या है।
कई तपस्वी, अपनी तपस्या का कोई चमत्कारी परिणाम सामने आते नहीं देखते तो निराश हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि पूर्वकाल के तपस्वियों की भाँति जब उनमें कोई, विलक्षण चमत्कारी विशेषताएं उत्पन्न हों तो वे अपनी साधना को सफल समझें। इस प्रकार अधिकाँश प्रचंड साधक भी अपने को असफल समझने लगते हैं तो साधारण साधकों की निराशा के बारे में तो कोई आश्चर्य की बात है ही नहीं।
तपश्चर्या के मार्ग पर चलने वालों को युग प्रभाव उत्पन्न देश, काल, वस्तु और व्यक्ति की मर्यादाओं को समझना चाहिए। एक समय युग प्रभाव के कारण जो बातें बालकों के हँसी खेल के समान अत्यन्त साधारण थीं और जिन्हें हर कोई थोड़ी सी साधना से प्राप्त कर लेता था वे आज के लिए असम्भव हैं। जो बातें आज बड़ी भारी सिद्धियाँ मालूम होती हैं वे किसी समय साधारण और सरल थीं। अणिमा, लघिमा, महिमा, आदि ऋद्धि-सिद्धियाँ आकाश तत्व प्रधान युग में मामूली सी बातें थीं, आज वे बातें अत्यन्त उच्च कोटि के तपस्वियों के लिए भी कठिन हैं। युग परिवर्तन के साँसारिक प्रभाव का हेर-फेर होना प्रकृति के नियमों के ऊपर निर्भर हैं। युग प्रभाव तो परिवर्तन शील है पर सत्य में कभी परिवर्तन नहीं होता। “तपस्या से अत्यन्त कल्याण की प्राप्ति” यह एक स्थिर तथ्य है इसमें कभी भी परिवर्तन नहीं होता।
गायत्री द्वारा तप करके मनुष्य निश्चित रूप से ऐसा आत्म बल प्राप्त कर सकता है, जिससे उसका जीवन, शुद्ध, पवित्र, सात्विक, महान, सुखी एवं शान्तिमय हो। अपने प्रभाव से वह दूसरों के जीवन में भी इन महानताओं को विकसित कर सकता है। अपने कर्म बन्धनों को काट सकता है। प्रभु की कृपा का अधिकारी बन सकता है और जीवन के परम लक्ष को प्राप्त करता हुआ अक्षय आनन्द का उपभोग कर सकता है। उसके अन्तःकरण में से निकले हुए शाप वरदान भी सफल हो सकते हैं। परन्तु किसी तपस्वी से यह आशा नहीं करनी चाहिए कि जो विशेषताएँ आकाश, अग्नि, वायु तत्व प्रधान युगों में तपस्वी के शरीर में उत्पन्न होती थीं वे अब इस जल और मृतिका प्रधान युग में भी सरलता पूर्वक प्राप्त हो जायेंगी। वे न तो आवश्यक हैं और न महत्वपूर्ण। बाजीगरों जैसे अचरज भरे कौतूहल उत्पन्न करने की ओर नहीं हमें तो आत्म शक्ति बढ़ाने और आत्म कल्याण प्राप्त करने की ओर ध्यान देना है और उसका प्राप्त करना सच्चे तपस्वी के लिए आज भी उतना ही सरल है जितना कि प्राचीन काल में कभी भी रहा है।
(ले.—श्री गिरीश देव वर्मा, बहराइच)
भस्रिका प्राणायाम एक आश्चर्य जनक प्राणायाम है। इसे वासुकी प्राणायाम भी कहते हैं। इस क्रिया को करने में न कोई अड़चन है, न कठिनाई, न किसी आसन को सिद्ध करने की जरूरत है और ने अन्य कोई बाधा ही है। इस क्रिया में अन्य प्राणायामों की तरह आसन, बन्ध, मुद्रा, रेचक, पूरक का अनुपात, आहार-विहार की नियमितता आदि की पाबन्दी नहीं है। इसमें किसी प्रकार की हानि होने की भी आशंका नहीं है।
लाभ :- इस क्रिया से अधिकाँश रोग दूर होते हैं। शरीर में कहीं भी रोग हो प्राणायाम से बिजली जैसा धक्का वहीं लगता है और बार-बार के प्रहार से वहाँ के रोग कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। दिल की धड़कन के लिये यह प्राणायाम रामबाण है। धड़कन का दौरा होने पर भी यह क्रिया विधिपूर्वक करने से तुरन्त आराम होता है। खून खराबी, फोड़े-फुन्सी, दाद, खाज, खुजली, जिगर बढ़ जाना, तिल्ली, पित्ताशय, मूत्राशय, अण्डकोश आदि रोगों में इस क्रिया में बड़ा लाभ होता है। पेट की तमाम बीमारियों के लिये यह प्राणायाम एक चूरन है। खाना न पचता हो, भूख कम लगती हो, कब्ज रहती हो, अग्नि कम हो गई हो तो इस क्रिया से बढ़ जाती है। जुकाम, खाँसी, पेट का भारीपन, सिर दर्द, कमर दर्द आदि में भी इसका अच्छा असर होता है।
गले के रोगों के लिये भी यह क्रिया लाभदायक सिद्ध हुई है। इससे स्वर बड़ा मधुर हो जाता है। बहुत से मनुष्य थोड़ा सा भी शारीरिक या मानसिक परिश्रम करने पर थक जाते हैं। यदि वे इस क्रिया को करने लगें तो थकावट का अनुभव नहीं करेंगे। मेरे कार्यालय के अनेक व्यक्ति दिन भर काम करने के बाद शाम को बड़ी थकावट मालूम करने लगते थे। मैंने उनसे थोड़े दिन यह प्राणायाम कराया। उनको अभूतपूर्व लाभ हुआ। फिर तो चाहे जितनी देर शाम को या रात में काम करना पड़े वे हतोत्साह नहीं होते थे। इस क्रिया से आलस्य, सुस्ती, ढीलापन, दीर्घसूत्रता नहीं रह जाती है।
हमारे आयु की माप वर्षों में नहीं होती है। बल्कि श्वासों की संख्या पर निर्भर है। मान लीजिए कि एक मनुष्य की आयु पचास लाख श्वांस है। वह चाहे तो इसको 50 वर्ष में लेले या 100 वर्ष में लेले या जल्दी-जल्दी श्वास लेकर 20 ही वर्ष में कुल संख्या पूरी कर ले। साधारण स्वस्थ मनुष्य को एक मिनट में 12-14 श्वास लेना चाहिए। यदि इससे अधिक लेते हैं तो आपकी आयु कम है और यदि 12-14 से भी कम लेते हैं तो आप दीर्घजीवी होंगे। जो प्राणी जल्दी-जल्दी श्वास लेते हैं वह थोड़े ही जीते हैं। योगी लोग श्वासों की मात्रा कम करके दीर्घजीवी हो जाते हैं। यों योगी अधिकतर समाधि में रहता है उसकी श्वास उतनी देर तो चलती नहीं और उसकी उतने समय की आयु बढ़ जाती है। इस भस्रिका प्राणायाम द्वारा श्वास-प्रश्वास की गति बहुत थोड़ी हो जाती है। कभी-कभी तो 10-12 श्वास प्रति मिनट से भी कम हो जाती है। इसके साथ योग की कुछ गुप्त क्रियायें की जाती हैं जिससे श्वास-प्रश्वास की गति 3-4 प्रति मिनट हो जाती है। इस भस्रिका प्राणायाम से बढ़ी हुई श्वास की गति सामान्य स्तर पर आ जाती है और यही कारण है कि मनुष्य की आयु बढ़ जाती है।
हमारे मकान पर एक पण्डित जी रहते थे वे गीता व रामायण के बड़े भक्त थे और बड़े अनासक्त भाव से रहते थे। एक बार उनको बुखार आने लगा और फिर खाँसी भी शुरू हो गई। उन्होंने दवा लेना अस्वीकार कर दिया। दो मास बीत गए वे रात भर बैठे खाँसा करते। लोग कहते थे कि पण्डित जी को यक्ष्मा हो गया है। धीरे-धीरे वे कमजोर होने लगे, मगर किसी के आग्रह पर भी औषधि का प्रयोग नहीं किया। उनका कहना था कि वनस्पतियों में भी जान होती है और एक जीवन की रक्षा के लिए दूसरे जीव की हत्या क्यों की जावे।
दैवयोग से उन्हीं दिनों श्री बद्रीनाथ धाम से एक महात्मा पधारे और हमारे यहाँ ठहरे। उन्होंने कहा कि “अच्छा मैं एक क्रिया बताता हूँ। उसका अभ्यास करो, इससे लाभ भी होगा और किसी की हत्या भी न होगी।” उन्हीं महात्मा ने यह विचित्र प्राणायाम बतलाया और इसका लाभ बताया। पण्डित जी ने इसका अभ्यास शुरू कर दिया। दिन में चार बार यह क्रिया करते। धीरे-धीरे वे स्वस्थ होने लगे और एक मास में किसी रोग का नाम नहीं रहा। उनका वजन काफी बढ़ गया। फिर तो यह क्रिया दैनिक क्रिया हो गई।
लेखक ने भी यह क्रिया बहुत दिनों तक करके अपूर्व लाभ उठाया है। शरीर के मल की शुद्धि के साथ-साथ रोगी से मुक्ति को पा लिया है। लेखक के मठ पर जो लोग साधना के लिये आते हैं, उनको यह प्राणायाम अवश्य करना पड़ता है।
एक बार एक महाशय आये। उनका रक्त दूषित हो गया था। बदन भर में दाने निकला करते थे। उन्होंने एलोपैथी, होम्योपैथी, वैद्यक आदि सभी का इलाज किया मगर कोई लाभ नहीं हुआ। उनको मैंने यह प्राणायाम बताया और नमक बन्द करा दिया। दो दिन में ही दानों का रंग बदल गया। एक सप्ताह में रोग भागने लगा और इक्कीसवें दिन वे बिलकुल स्वस्थ हो गये।
हमारा जिला हिमालय की तराई में बसा है और जंगली प्रान्त है। यहाँ का जलवायु अति दूषित है। अधिकतर मनुष्य पेट की बीमारियों से पीड़ित रहते हैं पर इस प्राणायाम से आहार-विहार में कुछ गड़बड़ी होने पर भी कोई नुकसान नहीं होता। शरीर में सदैव फुर्ती बनी रहती है।
यह प्राणायाम कुछ लोगों के लिये वर्जित भी है। जो लोग यक्ष्मा के दूसरे स्टेज में पहुँच गये हैं और जिनका श्लेष्मा रोग कीटाणु युक्त हो गया है, उनको यह क्रिया नहीं करना चाहिए। यह क्रिया उनके रोग को और बढ़ाती है। इसी तरह रक्त पित्त, तीव्र ज्वर, वमन आदि के लक्षणों में यह क्रिया नहीं करनी चाहिये। जो लोग अति रति क्रिया करते हैं और संयम से नहीं रहते उनको भी यह क्रिया नहीं करनी चाहिये। रजस्वला व गर्भिणी स्त्रियों को भी यह क्रिया नहीं करनी चाहिये।
अब इस प्राणायाम की विधि देखिये
विधि :-
एक बड़ी चटाई, दरी या कम्बल बिछाकर मुर्दे की तरह चित्त लेट जावो। जमीन या तख्त पर ही लेट जाना चाहिये। चारपाई पर नहीं, हाथ दोनों बगल में आराम से पड़े रहें।
शरीर को बिलकुल ढीला कर दो। कहीं भी किसी तरह का तनाव न रहे।
अब नाक से धीरे-धीरे साँस खींचो। पहले फेफड़े के निचले भाग को हवा से भरो। यह ऐसे होगा कि पेट व छाती के बीच वाले परदे से काम लो और उसके द्वारा नीचे के पेट के अवयवों पर थोड़ा दबाव डालो जिससे पेट आगे को थोड़ा निकल आवेगा। फिर उसी सिलसिले में जिसमें तार न टूटे, फेफड़े के मध्य भाग को भरा, जिससे निचली पसलियाँ, छाती की हड्डी और छाती बाहर को फैल जाये। फिर उसी साँस में फेफड़े के ऊपरी भाग को भरो जिससे छाती का ऊपरी भाग थोड़ा आगे निकल आये और छाती ऊपरी छः या सातवें जोड़ी पसलियों के साथ ऊपर उठ जाये। अन्तिम गति में पेट का निचला भाग कुछ थोड़ा सा भीतर दब जायगा। साँस खींचने के अन्त में कन्धा को थोड़ा ऊपर उठा देना अच्छा रहेगा, इसमें हँसली की हड्डी उठ जाती है। और दाहिने फेफड़े के ऊपर वाली ललरी में भी हवा घुस जाती है। इसी छोटी ललरी में ही कभी-कभी ट्यूबर क्लोसिस (क्षय) नामक बीमारी हो जाती है।
इस प्राणायाम को करने वाला पुरुष हो या स्त्री, क्षय रोग तथा फेफड़े के अन्य रोगों से निर्भय हो जाता है। क्षय रोग शरीर का जीवट कम होने से होता है और जीवट कम हवा प्राप्त होने से हो जाता है। अस्तु।
उपरोक्त बताये गये साँस में अलग अलग तीन गतियाँ नहीं है इसलिए हिचक-हिचक कर मत साँस लो। लगातार धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए और साँस की वह पूरक क्रिया जितनी लम्बी हो सके उतनी लम्बी करनी चाहिए। अभ्यास परिपक्व हो जाने पर उसमें तीव्रता लाई जा सकती है।
साँस को अन्दर मत रोको। जैसे ही पूरी साँस भर जावे बाहर निकालने की क्रिया शुरू कर दो। साँस मुँह से धीरे धीरे निकालना चाहिए। जिस तरह साँप फुंसकार छोड़ता है उसी तरह ओठों को मिलाकर फूँ-फूँ करते हुए साँस छोड़ो। जिस क्रम से साँस भरी गई है उसी क्रम से साँस निकलेगी अर्थात् पहिले फेफड़ों के ऊपरी हिस्से से, फिर नीचे से, फिर पेट से। साँस के निकलने वाली इस रेचक क्रिया को भी यथाशक्ति लम्बी करो। पूरक में जितना समय लगा था, उससे दुगना रेचक में लगाना चाहिए। यदि इतना न हो सके तो रेचक व पूरक में बराबर समय लगाना चाहिए। पूरी-पूरी साँस निकाल देने पर तुरन्त पूरक शुरू कर दो।
इस प्राणायाम में केवल पूरक व रेचक हैं। कहीं कुम्भक नहीं है। साँस को न भीतर रोकना चाहिए और न बाहर। जिस तरह लोहार की धौंकनी बराबर एक गति से चला करती है उसी तरह पूरक व रेचक होते रहना चाहिए। नाक से साँस लेना व मुख से निकालना यही भस्रिका प्राणायाम है।
इस क्रिया को 10-12 मिनट तक करने के बाद शरीर व मस्तिष्क में स्थित कार्बन जलना शुरू हो जायगा और घबराहट मालूम होने लगेगी। जी चाहेगा कि इस क्रिया को छोड़ दिया जावे। आराम करने को जी चाहेगा। मगर इस घबराहट से मत डरो, थोड़ी आत्म शक्ति लगाकर क्रिया को जारी रखो।
दो तीन मिनट के बाद घबराहट कुछ कम हो जायगी और शरीर में बिजली दौड़ने लगेगी। हाथ-पैरों में झुंझलाहट मालूम पड़ेगी। शरीर का जो अंग रोगी होगा, वहाँ विद्युत के झटके अधिक तीव्रता से मालूम होंगे। किसी-किसी के हाथ पैरों में इतनी विद्युत भर जाती है कि वे अंग काँपने लगते है। यह लक्षण डराने वाले नहीं हैं। इनसे शरीर का मल जलता है और नवीन शक्ति प्राप्त होती है।
शरीर में विद्युत उत्पन्न हो जाने के बाद दो-तीन मिनट तक यह प्राणायाम करते जाओ, अर्थात् कुल 20 मिनट तक यह क्रिया करो। उसके बाद बन्द कर दो। आँखों को मूँद लो और उसी तरह 3-4 मिनट तक पड़े रहो। यह जरूरी है। उसके बाद उठ जाओ।
बीस मिनट तक प्राणायाम करने के बाद जब क्रिया बन्द कर दी जाती है तब शरीर शिथिल हो जाता है। उठने का जी नहीं चाहता। मन आनन्द लोक में चला जाता है। जिस तरह मधुर संगीत सुनने के बाद मनुष्य आनन्द में बेसुध हो जाता है उसी तरह इस क्रिया के बाद एक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव होता है। कभी-कभी अभ्यासी सो जाता है। लेखक तथा उसके मित्रों का अनुभव है कि बहुधा इस क्रिया के बाद नींद आ जाती है। यदि कोई जगावे नहीं तो कभी-कभी दो तीन घण्टे की गाढ़ी निद्रा आ जाती है। उसके बाद उठने पर शरीर में हल्कापन, फुर्ती और उत्साह मालूम होने लगता है।
इस क्रिया को सुबह व शाम खुली हवा में करना चाहिए। विशेष रोगों में अन्य समय भी किया जा सकता है। भोजन के बाद तीन घण्टे तक यह क्रिया नहीं करनी चाहिए। मगर क्रिया के आध घण्टे बाद भोजन किया जा सकता है।
(श्री युगलकिशोर जी चौधरी, एन.डी.)
बाईबल में लिखा है कि जब प्रभु ने आदम और ईव को ईदन के बाग में भेजा तो यह उपदेश दिया कि “भोजन बड़ा ही महत्व रखता है, उन्हें पृथ्वी फली फूली रखना और पूर्ण रखना होगा और सृष्टि उत्पन्न करने के लिए ही मैथुन करना होगा।”
प्रभु ने यह भी आदेश दिया कि “उन्हें पृथ्वी पर उगने वाला हर एक कन्दमूल फल खाना चाहिए, हरे साक, सात्विक अन्न, हर एक फल आदि खाना चाहिए जिसमें कि बीज भी हों।”
प्रभु के इस उपदेश में आग से पकाने का कोई जिक्र न था, शायद आग उस समय थी भी नहीं और सभी मनुष्य ऐसे भोजन पर नीरोग दीर्घजीवी रहते थे। ऐसा कहा जाता है कि अग्नि के आविष्कार के साथ ही दुनिया में रोग, अकाल मृत्यु व पाप उत्पन्न हुए हैं। आज हमारी भोजन प्रणाली को उस समय के सतयुगी आनन्द काल से मिलाइए। हमारा कैसा अधःपतन हो गया है और अग्नि की सहायता से हम कैसी खराब, मुर्दा, सार रहित खुराक खाकर अल्पजीवी, रोगी व पापी हो गए हैं। माँस, मदिरा आदि भी आग के कारण ही खाना-पीना सम्भव हो सका है। हमारे पुराणों में लिखा है कि सतयुग में आयु हजार वर्ष की, त्रेता में 500 वर्ष की, द्वापर में 200 वर्ष और कलियुग में केवल 100 वर्ष की आयु होती है।
परन्तु आज 100 वर्ष तब कितने भाग्यवान जीवित रहते हैं, अधिकाँश तो 50 वर्ष के भी नहीं हो पाते। क्यों? इसलिए कि हमारे शरीर खराब आग से पके खराब भोजन से दिन-दिन खराब हो गये हैं और हमें सच्चे स्वास्थ और दीर्घायु का ज्ञान ही नहीं है। इसलिए आइए और दृढ़ चित्त होकर आरोग्य और दीर्घ जीवन के लिए कोशिश कीजिए। इसके लिए प्रचलित आदतों को छोड़कर स्वाभाविक कच्चे, बिना पकाये फल, कन्द, शाक, कच्चा दूध, मेवे पर रहना शुरू करें, अर्थात् जो चीज जिस हालत में जमीन से पैदा हो वह उसी हालत में खाई जावे, कोई तब्दीली न की जावे, ऐसा करने से शीघ्र शरीर में नया ताजा खून दौड़ने लगेगा। रोग, शोक, विकार भाग जायेंगे और एक अपूर्व आनन्द व सुख का अनुभव होने लगेगा, जो जीवन भार स्वरूप था वही आनन्दमय हो जायगा।
अगर हम संसार में रहते हुये भोजन में कुपथ्य करने से बचे रहें, फलों का सेवन यथाशक्ति करते रहें, भूख-प्यास के अनुसार खाना-पीना रखें, शुद्ध वायु सेवन व उचित व्यायाम करते रहें, कब्ज दूर करके आंतें साफ रखें, जल व मिट्टी से दूर न रहें, तो आरोग्य हमारी मुट्ठी में रहेगा।
वास्तव में आयु है क्या? यह वर्षों पर निर्भर नहीं है बल्कि शारीरिक योग्यता पर निर्भर है। बहुधा देखा जाता है कि एक आदमी जवानी में ही बूढ़ा सरीखा हो जाता है और दूसरा बड़ी आयु वाला होने पर भी जवान सरीखा दिखाई देता है।
हजारों लाखों ऋषि, मुनि, योगी, तपस्वी बहुत बड़ी आयु वाले हो चुके हैं। कई-कई तो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुके थे। सैकड़ों-हजारों वर्ष की आयु के प्रमाण हमारे इतिहास और पुराणों में मिलते हैं। सैकड़ों वर्षों की आयु वाले तो कई आज भी हमारे देश में जिन्दा हैं। इतनी बड़ी आयु वाले यह ऋषि-मुनि लोग केवल कन्द, मूल, फलों व पत्तों या दूध पर रहते थे, जंगलों में रह कर तप करते थे, उपवास करते थे, यही उनके दीर्घ जीवन का रहस्य था।
इसके विपरीत शहरों में रह कर नाना प्रकार के पकवान, मिठाइयाँ, नमकीन पदार्थ, रोटी दाल आदि खाने वाले लोग बहुत कम ऐसे देखे गये हैं जिन्होंने दीर्घ आयु पाई हो। राजा गोपीचन्द की माता ने गोपीचन्द को उपदेश दिया था कि बेटा तुम बहुत ही अल्पायु हो, यदि तुम इसी विलासी जीवन, प्रकृति विरुद्ध आहार, ऐश-आराम में शहर में रहोगे तो तुम्हारे पिता की भाँति शीघ्र मृत्यु तुम्हें घसीट ले जायगी, इसलिये तुम जंगल में रहो, योग साधन करो, कन्द-मूल फल खाओ, पृथ्वी पर सोओ और वस्त्रों का त्याग करो इन उपायों से तुम मृत्यु को निश्चय ही जीत सकोगे। निदान गोपीचन्द ने ऐसा ही किया और मृत्यु पर विजय प्राप्त की।
हमने अनेक रोगियों की, उनके खान-पान आदि की खूब जाँच करके यह पता लगाया कि वे ही रोगी सदा बीमार बूढ़े सरीखे नजर आये जिनके शरीर में क्षार व विजातीय द्रव्य अधिक मात्रा में भरे हुए थे।
जल्दी बूढ़े होने के यही चिन्ह हैं, नसों का मुरझाना, खाल पर झुर्रियाँ पड़ना, बाल सफेद होना, दाँत गिर जाना, जोड़ों का कमजोर होना, कमर झुकना आदि और इन चिन्हों वाले शरीर में क्षार की अधिकता पाई जाती है।
वास्तव में तो क्षार की अत्यधिक मौजूदी मुख के द्वारा जानी जा सकती है, मसूड़े फूलना, जीभ पर काँटे होना, दाँतों में मवाद आना, जीभ सफेद रहना ही बहुत अधिक क्षार या मैल शरीर में भरा होना जाहिर करते हैं।
और इन्हीं चिन्हों से परीक्षा हो सकती है कि अमुक व्यक्ति कहाँ तक मलाच्छादित क्षार युक्त है और कहाँ तक उसके शरीर को बुढ़ापे ने घेर लिया है। वास्तव में बुढ़ापा ही दुःखदायी है और सभी इससे बहुत घबराते हैं। बूढ़ों की इच्छाएँ मर जाती हैं, थकान हर वक्त बनी रहती है, ताकत नष्ट हो जाती है, भोजन का स्वाद-आनन्द जाता रहता है और कफ खाँसी रात दिन तंग करती है। इसे ही हम बुढ़ापा कहते हैं।
जैसे हम पुराने कपड़े फेंक कर नये पहनते हैं वैसे यह आत्मा पुराने जीर्ण शरीर को छोड़ कर नये में प्रवेश करता है इसका अर्थ यह है कि जब तक शरीर जीर्ण नहीं होता जवान बना रहता है प्राणों का अन्त तब तक नहीं होता जब तक कि खास कारण न हो।
वास्तव में आज जो हीन दशा हम बूढ़े लोगों की देख रहे हैं उसका मूल कारण यही है कि खराब खानपान द्वारा उनके शरीर का हर एक भाग मैल गन्दगी से बहुत ज्यादा भर गया है और इसीलिए शरीर रूपी मशीन जर्जर होकर निकम्मी पुरानी हो गई है इन लोगों की दयनीय दशा देखकर हर एक मनुष्य का प्रधान कर्त्तव्य है कि वह अपना आहार जहाँ तक हो सके प्रकृति के अनुकूल, सात्विक, उत्तेजना रहित बनावे ताकि शरीर में गन्दगी न भरे। और हम दीर्घ काल तक निरोग एवं बलवान रह सकें।
—इन्द्रियों के आनन्द से कहीं अधिक आनन्द मन के द्वारा प्राप्त होता है जाँच करके जाना गया है कि मनुष्य जब किन्हीं विचारों में मग्न होता है उस समय पास का भी शब्द सुनाई नहीं देता और नेत्रों के आगे पड़ा हुआ पदार्थ भी दिखाई नहीं देता।
गायत्री चर्चा-
वेदों से ‘ब्राह्मण’ ग्रन्थों का आविर्भाव हुआ है। प्रत्येक वेद के कई-कई ब्राह्मण थे, पर अब उनमें से थोड़े से ही प्राप्त होते हैं। काल की कुटिल गति ने उनमें से कितनों को लुप्त कर दिया।
ऋग्वेद के दो ब्राह्मण मिलते हैं शाँखायन और ऐतेरय। शाँखायन को कोषीतकी भी कहते हैं।
यजुर्वेद के तीन ब्राह्मण प्राप्य हैं- शतपथ ब्राह्मण, कान्व ब्राह्मण, तैत्रिरीय ब्राह्मण।
सामवेद के 11 ब्राह्मण उपलब्ध हैं, आर्षेय ब्राह्मण, जैमिनीयार्षेय ब्राह्मण, संहितोपनिषद् ब्राह्मण, मन्त्र ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, षडविंश ब्राह्मण, दैवत ब्राह्मण, ताण्ड्य ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण, जैमनीय उपनिषद् ब्राह्मण।
अथर्ववेद का केवल मात्र एक ब्राह्मण मिलता है, जिसका नाम है गोपथ ब्राह्मण। गोपथ की 31 से लेकर 38 तक आठ कंडिकाएं गायत्री उपनिषद् कहलाती हैं। इनमें मैत्रैय और मौदगल्य के परस्पर विवाद के उपाख्यान द्वारा गायत्री का महत्वपूर्ण रहस्य समझाया गया है। साधारण शब्दार्थ के अनुसार बुद्धि प्रेरणा की प्रार्थना ही गायत्री का तात्पर्य है परन्तु इस उपनिषद् में ब्रह्म विद्या एवं पदार्थ विद्या से सम्बन्ध रखने वाले कई रहस्यों पर प्रकाश डाला है।
अथ गायत्री उपनिषद् :-
एतद्ध स्म एतद् विद्वाँसमेकादशाक्षं।
मौदगल्यं ग्लाको मैत्रेयोऽभ्याजगाम॥
एकादशाक्ष मौदगल्यके समीप लाव मैत्रेय आए।
स तस्मिन् ब्रह्मचर्य बसतीति विज्ञायोवाच।
किं स्विन्मर्या अयं तन्मौद्गल्योऽध्येति।
यदस्मिन्ब्रह्मचर्य वसतीति॥
मौद्गल्य के ब्रह्मचारी को देखकर और उसे सुना कर ग्लाव ने (उपहास उड़ाते हुए) कहा कि मौद्गल्य अपने इस ब्रह्मचारी को क्या पढ़ाते हैं? अर्थात् कुछ नहीं पढ़ाते हैं।
तद्धि मौद्गल्यस्यान्तेवासी शुश्राव।
स आचार्यायाब्रज्या चचष्टे॥
मौद्गल्य के ब्रह्मचारी ने इस बात को सुन कर अपने आचार्य के पास जाकर कहा—
दुरधीयानं वा अयं भवन्तमवोचद्यऽयमधातिथिर्भवति।
जो आज अतिथि हुए हैं, उन्होंने आपको मूर्ख कहा है।
किं सौम्य विद्वानीति—
क्या वह विद्वान् हैं? मौद्गल्य ने पूछा।
त्रीन्वेदान् व्रतेभो इति।
हाँ, वे तीनों वेदों के प्रवचन कर्त्ता हैं, शिष्य ने कहा—
तस्य सौम्य यो विद्वान् विप्रष्ठो विजिगीषोऽन्ते वासी तं मेऽऽह्मयेति।
हे सौम्य! उसका जो विद्वान, सूक्ष्मदर्शी तथा विजय चाहने वाला शिष्य हो तुम उसे मेरे पास ले आओ।
तमाजुहाव। तमभ्युवाचा साविति भो इति।
तब वह उसे बुला लाया और बोला, वे ये हैं।
किं सौम्य त ब्राचाषर्योऽध्येतीति।
मौद्गल्य ने उससे पूछा—हे सोम्य! तुम्हारे आचार्य क्या पढ़ाते हैं?
त्रीन्वेदान व्रूते भो इति।
उसने उत्तर दिया—वे तीनों वेदों का प्रवचन करते हैं।
यन्नु खलुसौम्यास्माभिः सर्वे वेदा मुखतो गृहीताः,
कथं ते एवमाचार्यों भाषते, कथं नु स चेत्सौम्य।
दुरधीयानो भविष्यति, आचार्यो वावब्रह्मचारी,
ब्रह्मचारिणे सावित्रीं प्राह, इति वक्ष्यति॥
हे सौम्य! यदि वे यह जानते होंगे तो कहेंगे कि आचार्य अपने ब्रह्मचारी को जिसका उपदेश देते हैं वह सावित्री है। अर्थात् जो गायत्री का शब्दार्थ, स्थूल अर्थ है उसे ही बता देंगे।
तत्वं व्रूयाद दुरधीयानं तं वैभवानन्मौद्गल्य
मवोचत्, स त्वाँ यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः।
पुरा संवत्सरादार्तिमारष्यिसीति।
तब तुम कहना, कि आपने तो हमारे आचार्य मौद्गल्य को मूर्ख बताया था, वे आपसे जो प्रश्न पूछते हैं, उसे आप नहीं बतला सके, एक वर्ष के भीतर ही आपको कुछ कष्ट होगा।
शिष्टाः शिष्टेभ्य एवं भाषेरन्। यं ह्येनमहंप्रश्न पृच्छामि न तं विवक्ष्यति, नह्येनमध्येतीति॥
हे सौम्य! हमने भी वेद अध्ययन किये है फिर तुम्हारे आचार्य मुझे मूर्ख क्यों कहते हैं? क्या शिष्टों को शिष्टों के लिये ऐसा कहना ठीक है? हम उनसे जो प्रश्न पूछेंगे, वे उसे न बतला सकेंगे, वे उसे पढ़ाते भी न होंगे।
स ह मौद्गल्यः त्वमन्तेवासीनमुवाच-परे हि सौम्य,
ग्लावं मैत्रेयमुपसीत् अधीहि भोः सावित्रीं गायत्रीं
चतुर्विशति योनिं, द्वादश मिथुनाँ, यस्याभृग्वगिय्शश्च क्षुर्यस्याँ सर्वमिदं श्रितं ताँ भवान् प्राव्रवात्विति।
तब उन मौद्गल्य ने अपने ब्रह्मचारी से कहा—सौम्य! तुम जाओ, ग्लाव मैत्रेय के समीप उपस्थित होकर कहो, कि बारह मिथुन तथा चौबीस योनि वाली भृगु और अंगिरा जिसके नेत्र हैं तथा जिसके आश्रित यह सब हैं उस सावित्री गायत्री को हमें पढ़ाइये।
इस काण्डिका में मौद्गल्य ने मैत्रेय से गायत्री का रहस्य पुछवाया है। साधारण अर्थ तो सभी जानते हैं कि इस मन्त्र में परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हमें सद्बुद्धि की प्रेरणा कीजिये ऐसे मन्त्र तो श्रुति स्मृतियों में अनेकों भरे पड़े हैं जिनमें इसी प्रकार की या इससे भी उत्तम रीति से बुद्धि विवेक आदि के लिये प्रार्थनाएँ की गई हैं। फिर गायत्री में ही ऐसी क्या विशेषता है जिसके कारण उसे वेदमाता कहा गया और समस्त श्रुति क्षेत्र में इतना अधिक महत्व दिया गया। इसका कोई न कोई बड़ा कारण अवश्य होना चाहिये। मौद्गल्य ने उसी रहस्य एवं कारण को मैत्रेय से पुछवाया।
स तत्राजगाम यत्रेतरो बभूव। तंहपप्रच्छ स ह न प्रतिपेदे॥
मौद्गल्य का शिष्य मैत्रेय के पास आया, उसने उनसे पूछा, किन्तु वे उसका उत्तर न दे सके।
तं होवाच दुरधीयानं तं वै भवान्मौदागल्यमवो
चत्सत्वायं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचेः पुरा
संवत्सरादर्तिमारिष्यसीति।
उसने कहा, आपने मौद्गल्य को मूर्ख कहा था उन्होंने जो आपसे पूछा, आप उसे नहीं बतला सके इसलिये एक वर्ष में आपको कष्ट होगा।
स ह मैत्रेयः स्व नन्तेवासीन् उवाच—यथार्थ भवन्तो यथागृहं यथामनी विप्रसृज्यन्ताम् दुरधींयानं व्यवोचं, तनुपैष्यामि, शान्ति करिष्यामीति।
तब मैत्रेय ने अपने शिष्यों से कहा—अब आप लोग अपनी-अपनी इच्छानुसार अपने अपने घरों को लौट जाइये, मैंने मौद्गल्य को मूर्ख कहा था, पर उन्होंने जो पूछा है मैं उसे नहीं बतला सका हूँ, मैं उनके पास जाऊँगा और उन्हें शान्त करूंगा।
स ह मैत्रेयः प्रातः समित्याणिमौद्गल्यमुव- ससादासौ व अहं भो मैत्रेय इति।
दूसरे दिन प्रातः काल हाथ में समिधा लेकर मैत्रेय मौद्गल्य ऋषि के पास आये और कहा—मैं मैत्रेय आपकी सेवा में आया हूँ।
किमर्थमिति—
किसलिए?—उन्होंने पूछा।
दुरधीयानं वा अहं भवन्तमवोचं त्वं मा य प्रश्नसप्राक्षीर्न तं व्यवोचं, त्वामुपैष्यामि, शान्तिं करिष्यामिति।
मैत्रेय ने कहा—मैंने आपको मूर्ख कहा था, आपने पूछा मैं उसे न बतला सका, अब मैं आपकी सेवा में उपस्थित होऊँगा और आपको शान्त करूंगा।
स होवाच—अत्र वा उपेतं च सर्व च कृतं पापकेन त्वा यानेन चरन्तमाहुः अथोऽयं मम कल्याणस्तं ते ददामि तेन याहीति।
मौद्गल्य ने कहा—आप यहाँ आये हैं, लेकिन लोग कहते हैं कि आप शुद्ध भावना से नहीं आये हैं, लेकिन मैं तुम्हें कल्याणकारी भाव देता हूँ, तुम इसे लेकर लौटो।
स होवाच। एतदेवात्रात्विषं चानृशस्य च यथा भवानाह। उपायामि त्वेव भवन्तमिति।
मैत्रेय ने कहा—आपका कहना अभयकारी एवं सदय है। मैं आपकी सेवा में समित्याणि होकर उपस्थित होता हूँ।
तं हो पेयाय—
तब वे विधिपूर्वक उनकी सेवा में उपस्थित हुये।
तं होपेत्य पप्रच्छ—
उपस्थित होकर उन्होंने पूछा :—
किंस्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किमाहु।
धियो विचक्ष यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयन्सवितायाभिरेति॥
1—सविता का वरेण्यं किसे कहते हैं?
2—उस देव का भर्ग क्या है?
3—यदि आप जानते हों तो धी संज्ञक तत्वों को कहिये जिसके द्वारा सबको प्रेरणा देता हुआ सविता विचरण करता है।
तस्मा एतत्प्रोवाच—
उन्होंने उत्तर दिया—
वेदाँश्छंदाँसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयोऽन्नमाहुः।
कर्माणि धियस्तदुते व्रवीमि प्रचोदयन्सवितायामिरेति॥
1—वेद और छन्द सविता का वरेण्य है।
2—विद्वान् पुरुष अन्न को ही देव का भर्ग बतलाते हैं।
3—कर्म ही वह घी तत्व है जिसके द्वारा सबको प्रेरणा देता हुआ सविता विचरण करता है।
तमुपसगृह्य पप्रच्छा धीहि भोः, कः सविता, का सावित्रो।
यह सुन कर उनने फिर पूछा, सविता क्या है? और सावित्री क्या है?
मौद्गल्य के अभिप्राय को मैत्रैय भली प्रकार समझ गये, उन्होंने सच्चाई के साथ विचार किया तो जाना कि मैं गायत्री के उस रहस्य को नहीं जानता हूँ जिसके कारण उसे इतना महत्व प्राप्त है। उन्होंने सोचा यह मूल कारण न मालूम हो तो उसके बाह्य प्रतीकों को जान लेने मात्र से कुछ लाभ नहीं हो सकता। इसीलिये वेदों का प्रवचन करने से तब तक क्या लाभ, जब तक कि उनका मूल कारण मालूम न हो। वह सोचकर उनने निश्चय किया कि पहले मैं गायत्री का रहस्य समझ लूँगा तब अन्य कार्य करूंगा। उन्होंने अपने विद्यार्थियों की छुट्टी कर दी और स्वयं नम्र बनकर समिधा हाथ में लेकर शिष्य भाव से मौद्गल्य के पास पहुँचे। विद्या प्राप्त करने की-विशेष रूप से अध्यात्म विद्या की-यही परिपाटी है कि शिक्षार्थी अपने अध्यापक के पास नम्र होकर-उनके प्रति श्रद्धा भाव मन में धारण करके पढ़ने जावे। इस आर्ष प्रणाली को छोड़कर आज के उच्छृंखल ‘स्टूडेण्ट’ जिन उजड्ड भावनाओं के साथ शिक्षा प्राप्त करते हैं, वह शिक्षा गुरु का आशीर्वाद न होने से निष्फल हो जाती है।
मैत्रेय ने पूछा गायत्री के प्रथम पद में आये हुये शब्दों का रहस्य बताइये (1) सविता का वरेण्यं क्या है? अर्थात् उस तेजस्वी परमात्मा को किससे वरण किया जाता है? ईश्वर किस उपाय से प्राप्त होता है? (2) उस देव का भर्ग क्या है? देव कहते हैं श्रेष्ठ को, भर्ग कहते हैं बल को, देव का भर्ग क्या है? अर्थात् श्रेष्ठ लोगों का बल क्या है? (3) यह धी क्या है? जिसके द्वारा परमात्मा सबको प्रेरणा करता है। अर्थात् वह माध्यम क्या है? जिसके द्वारा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। इन तीन तत्वों को मैत्रेय ने मौद्गल्य से पूछा।
इनका जो संक्षिप्त उत्तर मौद्गल्य ने दिया है वह बड़े ही मार्के का है। इन उत्तरों पर जितनी गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय उतना ही उसका महत्व प्रकट होता है। मौद्गल्य कहते हैं। (1) वेद और छन्द सविता का वरेण्य है। (2)अन्न को ही देव का भर्ग कहते हैं। (3)कर्म ही धी तत्व है, इसी के द्वारा परमात्मा सबको प्रेरणा देता है सबका विकास करता है। आइये, इन तीनों प्रश्नों पर पृथक-पृथक विचार करें—
(1)वेद अर्थात् ज्ञान, छन्द अर्थात् अनुभव। तत्व ज्ञान से, आत्म ज्ञान से परमात्मा की प्राप्ति होती है, पर वह ज्ञान केवल वाचिक न होना चाहिये। भारवाही गधे की तरह अनेक पुस्तकें पढ़े लेने से शुक सारिकाओं की भाँति कुछ रटे हुए शब्दों का प्रवचन कर देने से काम नहीं चलता हमारा तत्व ज्ञान अनुभव सिद्ध होना चाहिए। जिसको कारण, तर्क, प्रमाण और उदाहरण के द्वारा सत्य मान लिया जाय, उस सत्य के प्रति मनुष्य के मन में अगाध श्रद्धा होनी चाहिए और उस श्रद्धा का, उस ज्ञान का, जीवन में व्यावहारिक आचरण होना चाहिए। पहले पूरी तत्परता, सचाई और निष्पक्षता से यह देखना चाहिये कि कौन-कौन सिद्धान्त उचित एवं कल्याणकारी हैं। जब यह विश्वास हो जाय कि सत्य, परोपकार, संयम, ईमानदारी आदि गुण सब दृष्टियों से श्रेयष्कर हैं तो उन्हीं के सिद्धान्त का जीवन में आचरण होना चाहिए। सद्ज्ञान का श्रद्धा भूमि में परिपक्व होना, यही ईश्वर की प्राप्ति का प्रधान उपाय है। बिना सिद्धान्तों को जाने केवल अनुभव निर्बल है और बिना अनुभव का ज्ञान निष्फल है। जब सद्ज्ञान मनुष्य की दृढ़ श्रद्धा में परिणत हो जाता है, दम्भ, छल, मत्सर, कपट, धूर्तता एवं दुराव को छोड़कर जब समस्त मनोभूमि में एक ही जाति की श्रद्धा स्थापित हो जाती है तो उसी आहार पर परमात्मा की प्राप्ति होती है, वेद और छन्द के संमिश्रण में सविता का वरण किया जाता है और ज्ञान और अनुभव से परमात्मा को प्राप्त किया जाता है।
(2)इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए मौद्गल्य कहते हैं देव का अर्थ भर्ग है। श्रेष्ठ का बल, उसके साधन हैं। श्रेष्ठता को तभी बलवान बनाया जा सकता है, जब उसको विकसित करने के लिए अन्न हो, साधन हो। साधन सामग्री-लक्ष्मी-एक शक्ति है, जो असुरों के हाथ में चली जावे तो असुरों को बढ़ाती है, और यदि देवों के हाथ में हो तो उसके द्वारा देवत्व का विस्तार होता है, देवता बलवान होते हैं। शासन सत्ता यदि दुष्ट लोगों के हाथ में हो तो वे दुष्टता फैलाते हैं, पिछली शताब्दियों में भारत की राजसत्ता विदेशियों के हाथ में रही हैं इसके कारण भारत भूमि का कितना अधःपतन किया यह किसी से छिपा नहीं है, वही सत्ता जब अच्छे हाथों में आवेगी तो थोड़े ही दिनों में रूस, अमेरिका की भाँति यहाँ भी उन्नत अवस्था प्राप्त होने की सम्भावना है। योगी अरविन्द ने अपनी ‘माता’ पुस्तक में लिखा है कि लक्ष्मी पर श्रेष्ठ लोगों को आधिपत्य करना चाहिए, इसी प्रकार संसार में सुख-शान्ति बढ़ेगी। यदि लक्ष्मी असुरों के पास चली गई तो उससे विश्व का अनिष्ट ही समझिए। देवताओं को भोग के लिए नहीं, लोभ के लिए नहीं, संग्रह के लिए नहीं, वरन् इसलिए धन और साधन सामग्रियों की आवश्यकता है कि वे उन शक्तियों द्वारा देवत्व की रक्षा एवं वृद्धि कर सकें। अपने आपको बलवान, क्रियाशील और साधन सम्पन्न बना सकें। अन्न को, इस साधन सामग्री को, लक्ष्मी का प्रतीक माना है। मौद्गल्य का दूसरा उत्तर यह है कि—देव का अन्न भर्ग अन्न है श्रेष्ठ का बल साधन है। बिना साधन के तो वह बेचारा निर्बल ही रहेगा।
(3)मौद्गल्य का उत्तर यह है कि—कर्म ही ‘धी’ तत्व है। इसी के द्वारा परमात्मा सबका विकास करता है। यह नितांत सत्य है कि परमात्मा की कृपा से सबका विकास होता है, परमात्मा सबको ऊपर की ओर—उन्नति की ओर, प्रेरित करता है। पर यह भी जान लेना चाहिये कि उस प्रेरणा का रूप है—’धी’। ‘धी’ अर्थात् वह बुद्धि जो कर्म करने के लिये प्रेरणा, प्रोत्साहन देती है और कर्म करने में लगा देती है। परमात्मा की जिस पर कृपा होती है उसे इसी प्रकार की बुद्धि प्राप्त होती है।
(क्रमशः)
नारी आदि प्रकृति की रानी और परम कल्याणी।
उसमें छिपी सत्य शिव सुन्दर की युग-युग की वाणी॥
सारे जग की वह रचयित्री अखिल विश्व की माता।
है समस्त मानव समाज की आदि मूल निर्माता॥
इसीलिए कवि हृदय कर रहा अभिनन्दन उस माँ का!
नयी प्रेरणा देगा सबको पद वन्दन उस माँ का!!
पिता निमित्त मात्र, माता से बालक का तन बनता।
उसके ही भावों को लेकर है उसका मन बनता॥
प्रतिभा, बुद्धि, विचार, शक्ति सब माँ पर ही अवलंबित।
बालक का सम्पूर्ण भविष्यत् है माता पर आश्रित॥
श्रेष्ठा माताएँ ही जग में उच्च पुरुष उपजातीं !
दिव्य पुरुष की माताएँ ही युग-युग पूजी जातीं!!
नारी है वह भूमि जहाँ पर कुसुम मनोरम खिलते।
इसके उपवन से ही हैं अगगात फल-रस मय मिलते॥
उत्तम भूमि बिना न कभी भी उत्तम-कृषि है सम्भव।
साधन भूमि, किन्तु फल से ही पाती है वह गौरव॥
नारी ऐसी ज्योति विश्व को करती जो आलोकित!
इसके ही अन्तर में सारा अग जग है प्रतिबिंबित!!
जहाँ कही भी नारी पाती है अपमान उपेक्षा।
जहाँ कहीं भी पुरुष दिखाता अहं भाव या स्वेच्छा॥
पतन वहीं होता समाज की मर्यादा खोती है।
वहीं बैठ कर दुखी मनुजता पछताती रोती है॥
पूजी जाती जहाँ कहीं भी विश्व-प्रसूता नारी!
बन जाती भू वहीं पुण्य कुँकुम केसर की क्यारी!!
इस युग का पशु-पुरुष शृंखला में नारी को बाँधे।
अपने को स्वामी कहलाने का दुस्साहस लादे॥
चाह रहा नारी उसकी इच्छाओं की हो दासी।
प्रतिमा स्वयं रहे नारी हो एक मात्र छाया-सी॥
अपने ही हाथों विनाश के बीज पुरुष है बोता!
अपनी चिता ज्वाल पर पागल है शैया-सा सोता!!
*समाप्त*
(श्री शिवशंकर मिश्र, एम. ए.)