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(1) इस अंक के साथ अधिकाँश पाठकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। आगामी वर्ष का चन्दा 2.50 रु. मनीआर्डर से भेजने की प्रार्थना है। वी. पी. मँगाने में व्यर्थ ही कुछ पैसे अधिक देने पड़ते हैं।
(2) जिन सज्जनों का चन्दा बीच के किसी मास में समाप्त होता है। उनसे प्रार्थना है कि सन् 53 के शेष महीनों का भी चन्दा भेज कर हिसाब पूरा कर लें। अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में हमें बड़ी कठिनाई होती है।
(3) अगला जनवरी का अंक ‘मनुष्यता अंक’ होगा। यह आदि से अन्त तक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. की लेखनी से लिखा हुआ होगा। इसी से पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि इसकी उपयोगिता कितनी अधिक होगी।
(4) अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपती है जितने उसके ग्राहक होते हैं। देर से चन्दा भेजने वालों को पिछले अंकों से वंचित रहना पड़ता है। आप अपना चन्दा यथा सम्भव शीघ्र ही भेजने का प्रयत्न करें ताकि मनुष्यता अंक समाप्त हो जाने पर उससे वंचित न रहना पड़े।
(5) जहाँ हर साल अखण्ड-ज्योति संस्था को अपने प्रति ग्राहक से एक वर्ष में करीब एक आना लाभ होता था वहाँ इस वर्ष एक चित्र बढ़ा देने के कारण करीब तीन आना हर ग्राहक पर घाटा पड़ा है। अगले वर्ष से टाइटिल पृष्ठ आर्ट पेपर पर तिरंगा छपने की व्यवस्था भी की गई है। इससे घटा और भी बढ़ेगा। अखण्ड-ज्योति का प्रचार अधिक हो और उसे अधिक से अधिक सस्ती एवं सर्व सुलभ रखता जाय इस दृष्टि से मूल्य नहीं बढ़ाया गया है। घाटे की पूर्ति का एक ही उपाय है कि प्रेमी सज्जन एक एक दो दो ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करें। यदि ग्राहक संख्या दूनी हो जाय तो यह घटा सहज ही पूरा हो सकता है।
(6) अगले वर्ष सभी ग्राहकों के पते नये सिरे से छापे जायेंगे। इसलिए अपना पूरा पता साफ अक्षरों में मनीआर्डर कूपन पर लिखने की कृपा अवश्य करें। ताकि गलत पता छप जाने की गड़बड़ी न हो।
(7) पुराने ग्राहक अपना ग्राहक नम्बर लिखने की अवश्य कृपा करें। यदि नम्बर न याद हो तो कम से कम “पुराने ग्राहक” शब्द मनीआर्डर में लिख दें। इसी प्रकार “नये ग्राहक” भी अपना उल्लेख कर दें।
(8) यहाँ से हर महीने ठीक समय पर दो बार जाँच कर सभी ग्राहकों के लिये “अखण्ड-ज्योति” भेजी जाती है। यदि कोई अंक न मिले तो अपने पोस्ट आफिस में तलाश करने के बाद उसी महीने हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि अंक बचा हो तो दुबारा भेजा जा सके। कई महीने बाद शिकायत भेजने पर पिछले अंक समाप्त हो जाने के कारण उन्हें दुबारा भेजना सम्भव नहीं होता।
(9) जिन्हें ग्राहक न रहना हो वे अपने निश्चय की सूचना एक कार्ड द्वारा भेज देने की कृपा कर सकें तो विशेष अनुग्रह होगा।
(10) रुपया मनीआर्डर द्वारा ही भेजना चाहिए। सादे लिफाफे में रखकर भेजे हुए नोट अक्सर गुम हो जाते हैं। इस प्रकार भेजना कानूनी जुर्म भी है।
(11) पिछले 13 वर्षों के अंकों में से कुल मिलाकर 24 अंक बचे हैं। किसी भी वर्ष की पूरी फाइल नहीं है। जो सज्जन मँगाना चाहें 3 रु. मनीआर्डर से भेजकर प्राप्त कर सकते हैं। रजिस्ट्री पार्सल से अखण्ड-ज्योति के 24 अंक भेज दिये जावेंगे।
विनीत-
व्यवस्थापक- “अखण्ड-ज्योति” प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -12
तू रो देता तो कह देता है-सावन है।
तू हँस देता तो मधु ऋतु का आमंत्रण है॥
तेरे ही अनुरूप प्रकृति का सारा क्रम है!
यह सारा सुख-दुख तेरे ही मन का भ्रम है!!
श्वेत-पत्र है नियति कर्म ही लिखता अक्षर।
मौन भविष्यत् किंतु भाव ही भरते हैं स्वर॥
शान्ति, एक तेरा ही तो सुखमय संयम है!
यह सारा सुख-दुख तेरे ही मन का भ्रम है!!
तेरे ही तो चरण स्वयं हैं पथ बनाते।
फिर उसको ही इष्ट समझ हैं बढ़ते जाते॥
तू साधन है, तू प्रतिफल है, यही नियम है!
यह सारा सुख-दुख तेरे ही मन का भ्रम है!!
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
गोप्याः स्वायाँ मनोवृत्तीर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।
स्थिति मज्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुप माचरेत्॥
अर्थ—अपने मनोभावों को छिपाना नहीं चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरों की परिस्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।
अपने मनोभाव और मनोवृत्ति को छिपाना ही छल, कपट और पाप है। जैसा भाव भीतर है वैसा ही बाहर प्रकट कर दिया जाय तो वह पाप निवृत्ति का सबसे बड़ा राजमार्ग है। स्पष्ट और खरी कहने वाले, पेट में जैसा है वैसा ही मुँह से कह देने वाले लोग चाहे किसी को कितने ही बुरे लगें पर वे ईश्वर और आत्मा के आगे अपराधी नहीं ठहरते।
जो आत्मा पर असत्य का आवरण चढ़ाते रहते हैं, वे एक प्रकार के आत्म हत्यारे हैं। कोई व्यक्ति यदि अधिक रहस्यवादी हो, अधिक अपराधी कार्य करता हो तो भी उसके अपने कुछ ऐसे विश्वासी मित्र अवश्य होने चाहिए जिसके आगे अपने सब रहस्य प्रकट करके मन को हलका कर लिया करे। और उनकी सलाह से अपनी बुराइयों का निवारण कर सके ।
प्रत्येक मनुष्य का दृष्टिकोण, विचार, अनुभव अभ्यास, ज्ञान, स्वार्थ, रुचि एवं संस्कार अलग-अलग होते हैं। इसलिए सबका सोचना एक प्रकार से नहीं हो सकता। इस तथ्य को समझते हुए हर व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहिष्णु एवं उदार होना चाहिए। अपने से किसी भी अंश में मतभेद रखने वाले को मूर्ख, अज्ञानी, दुराग्रही, दुष्ट या विरोधी मान लेना उचित नहीं। ऐसी असहिष्णुता ही बहुधा झगड़ों की जड़ होती है। एक दूसरे के दृष्टिकोण के अन्तर को समझते हुए यथासंभव समझौते का मार्ग निकालना चाहिए। फिर जो मतभेद रह जायँ, उन्हें पीछे धीरे-धीरे सुलझाते रहने के लिए छोड़ देना चाहिए।
संसार में सभी प्रकार के मनुष्य हैं। मूर्ख-विद्वान, रोगी-स्वस्थ, पापी-पुण्यात्मा, कायर-वीर, कटुवादी नम्र, चोर-ईमानदार, निन्दनीय-आदरास्पद, स्वधर्मी-विधर्मी, दया पात्र-दंडनीय, शुष्क-सरस, भोगी-त्यागी आदि परस्पर विरोधी स्थितियों के मनुष्य भरे पड़े हैं। उनकी स्थिति को देखकर तदनुसार उनसे भाषण, व्यवहार एवं सहयोग करें। उनकी स्थिति के आधार पर ही उन के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करें।
कपट और असहिष्णुता यह दो बहुत बड़े पातक हैं। इन दोनों से बचने के लिए गायत्री के ‘गो’ अक्षर में निर्देश किया गया है। धोखा, विश्वासघात, छल, ढोंग, पाखण्ड यह मनुष्यता को कलंकित करने वाली सबसे निकृष्ट कोटि की कायरता एवं कमजोरी है। जिसको हम बुरा समझते हैं उससे लड़ाई रखें तो इतना हर्ज नहीं, परन्तु मित्र बनकर, मिले रहकर, मीठी-मीठी बातों से धोखे में रखकर उसका अनर्थ कर डालने में जो पाप है वह निष्कृष्ट कोटि का है। अनेक व्यक्ति ऊपर से मिले रहते हैं, हितैषी बनते हैं और भीतर ही भीतर छुरी चलाते हैं। बाहर से मित्र बनते हैं भीतर से शत्रु का काम करते हैं। विश्वास देते हैं कि हम तुम्हारे प्रति इस प्रकार का व्यवहार करेंगे परन्तु पीछे अपने वचन को भंग करके उसके विपरीत कार्य कर डालते हैं।
आजकल मनुष्य बड़ा कायर हो गया है। उसकी दुष्टता अब मैदानी लड़ाई में दृष्टिगोचर नहीं होती। प्राचीन काल में लोग जिनसे द्वेष करते थे, जिसका अहित करना चाहते थे, उसे पूर्व चेतावनी देकर मैदान में लड़ते निपटते थे। पर आज तो वीरता का दर्शन दुर्लभ हो रहा है। विश्वास दिलाकर, मित्र बनकर, बहका-फुसलाकर, किसी को अपने चंगुल में फँसा लेना और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उसके प्राणों तक का ग्राहक बन जाना, आज का एक व्यापक रिवाज हो गया है। जिधर दृष्टि उठाकर देखिए उधर ही छल, कपट, धोखा, विश्वासघात का बोल बाला दीखता है। गायत्री कहती है कि यह आत्मिक कायरता, मनुष्यता के पतन का निकृष्टतम चिन्ह है। इससे ऊपर उठे बिना कोई व्यक्ति ‘सच्चा मनुष्य’ नहीं कहला सकता।
किसी की धरोहर मार लेना, विष खिला देना, पहले से कोई वचन देकर समय पर उसे तोड़ देना, असली बताकर नकली चीज देना, मित्र बनकर शत्रुता के काम करना, यह बातें मनुष्यता के नाम पर कलंक हैं।
विवाह के समय देवता और पंचों को साक्षी देकर लोग यह धर्म प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस नारी के जीवन का सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेते हैं। जैसे बालक का सारा उत्तरदायित्व उसकी माता पर होता है, माता अपने बच्चे से काम लेती है, डाँटती-फटकारती भी हैं परन्तु उससे भी पहले उसके हृदय में अनन्त करुणा, आत्मीयता, ममता और क्षमा का समुद्र लहराता होता है। जिस माता के हृदय में वात्सल्य, क्षमा, ममता और करुणा की भावना न हो केवल बच्चे से अपना फायदा उठाने की, उसे गुलाम की तरह वशवर्ती रखने की वृत्ति हो वह माता शब्द को अलंकित ही करेगी। इसी प्रकार जो लोग देवताओं और मन्त्रों की साक्षी में अपनी धर्मपत्नी को माता, पिता, भाई बहिन सबसे छुड़ाकर उनके स्नेह एवं उत्तरदायित्वों की पूर्ति अपने ऊपर लेते हैं उन्हें उचित है कि जीवन भर उस विवाह की प्रतिज्ञा को निबाहें, परन्तु देखा जाता है कि स्त्री को थोड़ी सी नासमझी का उसे इतना भारी दण्ड दिया जाता है जिसे देखकर न्याय की आत्मा भी काँप जाती है। पतियों द्वारा पत्नी की हत्या या परित्याग में प्रायः ऐसा ही कायर विश्वासघात भरा होता है।
वासना और धन का लोभी मनुष्य न्याय मार्ग से जब अपनी लोलुपता को पूरा नहीं कर पाता तो अनेक अनैतिक, छल पूर्ण मार्ग अपना कर अपना स्वार्थ साधन करता है। गायत्री माता इस कुमार्ग पर चलने से अपने प्रिय पुत्रों को रोकती है। ‘गो’ अक्षर का संदेश है कि हम विश्वासघाती न बनें। अपने धर्म, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को निबाहें। सचाई के मार्ग पर चलने से यदि कुछ असुविधाएं भी सहनी पड़ें तो उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सहना चाहिए। इस प्रकार जो सत्य के मार्ग पर चलने में असुविधाओं का स्वागत करने को भी तैयार रहते हैं वे ही गायत्री माता के सच्चे प्रेम पात्र बन सकते हैं।
‘गो’ शब्द के अंतर्गत गायत्री माता की दूसरी शिक्षा यह है कि—हम सहिष्णु बनें। किसी की जरा सी गलती पर आग बबूला हो जाना या किसी से थोड़ा सा मतभेद होने पर उसे जानी दुश्मन मान लेना बहुत संकुचित विचार है। संसार में कोई भी पूर्णतया निर्दोष, या निष्पाप नहीं है, हर मनुष्य अपूर्ण है उसमें कुछ न कुछ दोष बुराई या कमी अवश्य रहती है। थोड़ी सी कमी के लिए उसे पूर्ण त्याज्य समझ लेना ठीक नहीं। दूसरों ही अच्छाइयों का समुचित उपयोग करना चाहिए, उन्हें बढ़ाना चाहिए, त्रुटियों को सुधारने या घटाने का प्रयत्न करना चाहिए, परन्तु इसके लिए अधीर नहीं होना चाहिए। सहिष्णुता और धैर्यपूर्वक कामचलाऊ सहयोग का मार्ग निकाल लेना चाहिए और आततायी रीति से नहीं वरन् मधुर, सुव्यवस्थित एवं न्यायोचित मार्ग से प्रतिकूलता को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
यह आवश्यक नहीं कि हमारे सभी विचार ठीक ही हों, हमारी मान्यता, धारणा, एवं आकांक्षा हमारे लिए ठीक हो सकती है पर यह आवश्यक नहीं कि दूसरों को भी उन्हें मानने के लिए बाध्य किया जाय। अनेक दार्शनिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मतभेद प्रायः ऐसे होते हैं जिनमें दोनों ही पथ भ्रान्त पाये जाते है। इनके सम्बन्ध में हमें अधिक सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए। कुछ विरोध ऐसे हैं जिन्हें अपराध कहते हैं, जिनके लिए राजदंड की व्यवस्था है। चोरी, हत्या, लूट, छल, दुराचार आदि अनैतिक कर्मों के लिए अवश्य ही प्रबल विरोध किया जाना चाहिए, उसमें जरा भी सहिष्णुता की जरूरत नहीं है परन्तु स्मरण रहे वह ‘प्रबल विरोध’ ऐसा नहीं जो उलटे हमें ही अपराधी बना दे। दण्ड देने योग्य विवेक हर एक में नहीं होता, खास तौर से जिसका अपराध किया है उसमें तो बिलकुल ही नहीं होता, इसलिए दण्ड के लिए उदार, विवेकवान न्यायप्रिय एवं निष्पक्ष व्यक्ति को ही पंच चुनना चाहिए। न्यायालयों और न्यायाधीशों की स्थापना इसी आधार पर हुई है।
संसार में कोई भी दो मनुष्य एक सी आकृति के नहीं मिलते। प्रभु की रचना ऐसी ही है कि हर मनुष्य की आकृति में कुछ न कुछ अन्तर रखा गया है। आकृति की भाँति विचारों, विश्वासों और स्वभावों में भी अन्तर होता है। जैसे विभिन्न आकृतियों के मनुष्य एक साथ प्रेमपूर्वक रह सकते हैं वैसे ही विभिन्न मनोभूमियों के मनुष्यों को भी एक साथ रहने में, प्रेम पूर्वक सुसम्बन्ध बनाये रहने में कोई अड़चन न होनी चाहिए। समाज की सुख-शान्ति, एकता और उन्नति इसी सहिष्णुता पर निर्भर है। असहिष्णुता लोगों का समाज, सदा कलह और संघर्षों से जर्जर होता रहता है वह किसी भी दृष्टि से कोई उन्नति नहीं कर पाता।
गायत्री माता की गोद में चढ़ना, उसका प्रिय पुत्र बनना निश्चय ही हमारे लिए अतीव आनन्ददायक एवं कल्याणकारक सिद्ध होता है। माता उन्हीं लोगों को अपना स्नेह भाजन बनाती है जो उसकी आज्ञा मानते है उसकी व्यवस्था पर आस्था रखते हैं। गायत्री की जो 24 आज्ञाएँ हमारे लिए निर्धारित हैं वे इस महामन्त्र के 24 अक्षरों में सन्निहित है। ‘गो’ शब्द द्वारा माता की आज्ञा यह है कि हम छल की कायरता का परित्याग करें और सहिष्णुता एवं उदारता के साथ जनसमाज में मधुर सम्बन्ध स्थापित करते हुए शान्तिमय जीवन का निर्माण करें।
(श्री दौलतराम जी कटरहा, दमोह)
किसी ने बहुत ही गहराई से सोचकर कहा है कि “अपना कर्म ही देवपूजन है’ गीता में भी कहा है कि ‘जिस परमात्मा से सब प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सब जगत् व्याप्त है उस परमेश्वर को अपने कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है’ (गीता अ. 18-श्लोक 46) इन बातों में गहरा तथ्य भरा हुआ है। यदि हम इनकी सचाई को हृदयंगम कर लें तो हम देवपूजा और ईश्वराराधन का फल चित्त की प्रसन्नता, शान्ति और निर्भयता आदि अपने कर्म के बदले में पा जावें।
संघर्ष के इस युग में सब व्यक्ति अपने मन का काम नहीं पाते। समाज के प्रचलित ढांचे के कारण या अनुकूल अवसर मिलने या न मिलने के कारण अथवा अपनी पहुँच या विशेष परिश्रम के कारण भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न कामों में लग जाते हैं। ऐसे समय में जो व्यक्ति अपने हिस्से में आए हुए काम को उत्साह और सतर्कता पूर्वक नहीं करता वह अपने कार्य में असफल प्रमाणित हो जाता है और कार्य के उस क्षेत्र को छोड़कर उसे अपने इस छोड़े हुए कार्य से भी अधिक अरुचिकर कार्य को करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। अतएव अपने ऊपर आ पड़े काम के प्रति असन्तोष रखने और लापरवाही बरतने का परिणाम होता है निम्न से निम्नतर स्थिति पर खिसकते जाना। अपने काम को अन्यमनस्क भाव से करने का कुप्रभाव मनुष्य के स्वभाव पर भी पड़ता है। मन लगाकर और डटकर काम करने की आदत जाती रहती है और लापरवाही से बार-बार काम करने के कारण, स्थायी-रूप से मनुष्य का स्वभाव लापरवाह हो जाता है और वे कुसंस्कार उस पर सदा के लिए दृढ़तापूर्वक अंकित हो जाते हैं। फिर मनुष्य नीचे ही नीचे खिसकता जाता है और हर काम में असफल होते रहने से उसकी मनोवृत्ति में पराजय की भावना प्रवेश कर जाती है, और फिर वह व्यक्ति कभी पनपने नहीं पाता। लापरवाही से काम करने के इस परिणाम को दृष्टि में रखकर भी मनुष्य को अपने हिस्से में आया हुआ काम उत्साह और तन्मयतापूर्वक करना चाहिए।
प्रत्येक महत्वाकाँक्षी नवयुवक अच्छे पद पर रहकर कोई बड़ा काम करना चाहता है। किन्तु सच तो यह है कि यदि वह भविष्य के ख्याल में ही मस्त रहे, और अपने मौजूदा काम को बिसारता रहे तो अधिक सम्भव यही है कि उसे वह बड़ा काम करने का मौका कभी भी न आवेगा और वह वर्षों काम करने के लिए अवसर पाने का मार्ग तो उसी स्थान से आरम्भ होता है जहाँ पर कि वह वर्तमान अवस्था में मौजूद है। अतएव मनुष्य को जो काम हाथ लगे उसे पूर्ण मनोयोग से करना चाहिए।
सम्भव है कि जिस कार्य में आप लगे हों वह आपकी योग्यताओं के अनुकूल न हो और इसलिए आपके लिए वह कार्य छोड़ना आवश्यक जान पड़े। ऐसी दशा में वह कार्य छोड़ देना अवश्य ही आवश्यक होगा परन्तु उस कार्य को जितनी अच्छी तरह हो सके उतनी अच्छी तरह करने के उपरान्त ही छोड़ना ठीक होगा। किसी कार्य में असफल होकर उसे छोड़ना या पराजित मनोवृत्ति लिए हुए एक कार्य को त्याग कर दूसरा ग्रहण करना ठीक नहीं है। जीवन का प्रारम्भ हार से आरम्भ नहीं होना चाहिए, असफल कार्यों के संस्कार जीवन को कदापि सफल नहीं होने दे सकते।
एक विचारक का कहना है कि आपकी सफलता कभी भी तब तक आरम्भ न होगी जब तक आप अपने कार्य से प्रेम न करोगे और उसे उत्साह और प्रसन्नतापूर्वक न करोगे। अपने कार्य में अच्छी तरह लगा हुआ पुरुष शीघ्र ही सिद्धि पा जाता है (स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः)। अपने कार्य को उत्साहपूर्वक करने से कार्य करने की शक्ति बढ़ जाती है। कठिन कार्य भी सरल प्रतीत होता है, कठिनाइयों को सरलतापूर्वक पार कर दिया जाता है और कार्य करने में उकताहट और थकावट भी शीघ्र नहीं मालूम होती। यह अनुभव की बात है कि जिस कार्य में अरुचि होती है उस कार्य को करने में मन पर अधिक बोझ पड़ता है, उस पर अधिक तनाव पड़ता है और फलस्वरूप उस कार्य में थकावट भी शीघ्र मालूम होने लगती है। किन्तु जो कार्य रुचिकर और सुखद होता है उस कार्य से मन नहीं ऊबता और बहुत समय तक कार्य करने के उपरान्त कार्य करने की शक्ति शेष बनी ही रहती है। अतएव अपने कार्य से प्रेम करने से मनुष्य की कार्य क्षमता बढ़ती है और मनुष्य के लिए उसके आगे बढ़ने का द्वार उन्मुक्त हो जाता है। अपने कार्य से प्रेम करने वाला मनुष्य अपने काम में कभी पीछे नहीं रहता, उसके काम कभी अधूरे नहीं रहते, अतएव उसे कभी उनके अपूर्ण रहने की चिन्ता नहीं सताती। उसी के काम सदा समय पर ही, और कभी-कभी पहले ही हो जाते हैं, अतएव वह निश्चित रहता है, उसका चित्त स्वस्थ रहता है और वह शाँति का सुख भोगता है। यदि मनुष्य सब साधनाएँ करे पर यदि वह अपने काम में हमेशा पीछे रहे तो उसे कभी मानसिक शान्ति प्राप्त न होगी, और उसका चित्त प्रसन्न न रहेगा। चित्त प्रसन्न न रहने से मनुष्य की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती अतएव कार्यों का अधूरा रहना, अकृतकार्यता मनुष्य के लिए शान्ति प्राप्त करने में सदा बाधक बनी रहेगी। अतएव इस विचार से भी शान्ति चाहने वाले व्यक्ति को अपने ऊपर आए हुए कार्य-भार को प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक सम्भालना चाहिए।
शास्त्रों में लिखा है कि जनक आदि महापुरुष कर्म द्वारा ही सिद्धि पा गये। वे लोग कुशल कार्यकर्त्ता थे और उनमें सब आवश्यक कार्यों को कर डालने की शक्ति थी। पर यह शक्ति उनमें अपने कार्य के प्रति उत्साह दिखाने से ही होगी। बिना अपने कार्य से प्रेम किए कोई भी व्यक्ति कार्यकुशल कर्मयोगी नहीं होता।
(श्री पं. लक्ष्मण प्रसाद जी गर्दे)
जहाँ तृष्णा है वहाँ शाँति नहीं, जहाँ शान्ति है, वहाँ तृष्णा नहीं। इस बात को जानना सिद्ध कर्म की दिव्य भाषा का पहला अक्षर सीख लेना है, क्योंकि इस बात को जानना कि तृष्णा और शान्ति एक साथ नहीं रह सकती इस बात के लिए तैयार होना है कि छोटी चीज को त्याग कर बड़ी चीज अपनायी जाय।
मनुष्य शान्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, पर फिर भी तृष्णा का त्याग नहीं करते, बढ़ाते संघर्ष हैं, फिर भी प्रार्थना करते हैं स्वर्गीय विश्रान्ति की। यह अज्ञान है, मूढ़ता है, भागवत जीवन की शिक्षा के श्रीगणेश से भी अनभिज्ञ रहना है।
द्वेष और प्रेम, संघर्ष और शान्ति, एक ही हृदय में एक साथ नहीं रह सकते। जहाँ एक का प्रेम से स्वागत होता है, वहाँ से दूसरा लाँछित होकर निकाला जाता है। जो कोई दूसरों से द्वेष करेगा उससे दूसरे भी द्वेष करेंगे। जगत में जो इतना परस्पर ईर्ष्या-द्वेष फैला है इसमें उसके आश्चर्य और दुःख करने की कोई बात नहीं। उससे यह जानना चाहिए कि वह संसार में संघर्ष ही तो बढ़ा रहा है। उसे यह समझना चाहिए कि उसमें शान्ति नहीं है।
वह वीर है जो दूसरों पर विजय पाता है, पर वह परम उदार है जो अपने आप पर विजय पाता है। दूसरों पर विजय पाने वाला व्यक्ति, बारी आने पर दूसरों से हार सकता है, पर जिसने अपने आप पर विजय पायी है वह कभी हार नहीं सकता।
अपने आपको जीतना ही पूर्ण शान्ति की प्राप्ति का प्रयास-पथ है। जब तक मनुष्य बाहरी चीजों के सम्बन्ध में भयानक संघर्ष करना छोड़ अपने ऊपर की बुराइयों से युद्ध करने में प्रवृत्त होने की परम आवश्यकता को अनुभव नहीं करता तब तक शान्ति के इस रास्ते को न तो वह समझ सकता है न इस रास्ते के समीप आ ही सकता है। जिसने यह अच्छी तरह से समझ लिया है कि संसार का शत्रु भीतर है, बाहर नहीं, वह सन्तों के इस मार्ग पर ही है। वह इस बात को जानता है कि उसके अपने असंयत विचार ही लड़ाई-झगड़ो के कारण हैं, उसकी अपनी पाप वासनाएं ही उसकी और जगत की शान्ति भंग करने वाली है।
यदि किसी ने लोभ, क्रोध, द्वेष, अहंकारिता, स्वार्थपरता और लोलुपता को जीत लिया है तो उसने संसार को जीत लिया है, शान्ति के बैरियों को मार डाला है और उसे शान्ति प्राप्त हो गयी है।
शाँति युद्ध नहीं करती, पक्षपात नहीं करती, कोलाहल नहीं मचाती। शान्ति की विजय अजेय एवं मौन है।
जो बलपूर्वक जीता गया है, उसका हृदय नहीं जीता गया है वह पहले से भी बड़ा शत्रु बन सकता है, पर जो शान्ति से जीता जाता है उसका हृदय भी जीत लिया जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है। बल और संघर्ष तृष्णा और भय बढ़ाते हैं, पर प्रेम और शान्ति हृदय को वश में कर उसे सुधारते हैं।
शुद्ध हृदय और ज्ञान सम्पन्न पुरुष अपने हृदय में शान्ति पाते हैं, वह शान्ति उनके कर्मों में उतर आती है, उस शान्ति को वे अपने जीवन में लगाते हैं। संघर्ष के बल से यह शक्ति अधिक बलवती है, जहाँ बल हार जाता है, वहाँ शान्ति काम कर जाती है। इसके पास सत्पुरुषों के रक्षक हैं। इसके अभय हस्त की छाया में अनुपकारी का भी अपकार नहीं होता। स्वार्थ के संघर्ष की धूप से यह छाया बचती है। हारे हुओं के लिए यह पनाह है, खोये हुओं के लिए यह सीमा है, विशुद्धात्माओं के लिए यह मन्दिर है।
जब शान्ति आचरित, अधिकृत और ज्ञात होती है तब पाप और ताप, दुराशा और निराशा, लोभ और मोह, काम और शोक—चंचल मन की सारी विफलता और क्लेश सब पीछे रह जाते हैं और अपने स्वार्थगत अन्धकारमय जगत में, वहाँ से वे आगे बढ़ नहीं सकते। ये काले भूत जहाँ विचरते हैं उस अन्धकार के सर्वथा परे भागवत परमानन्द के दिव्य धाम सनातन प्रकाश में जगमगाते रहते हैं और इस उच्च और पवित्र पथ के पथिक अन्त में इन्हीं धामों में पहुँचते हैं। तृष्णा में धसाने वाले दलदल, अहंभाव और दम्भ के कंटकाकीर्ण जंगल, संशय और नैराश्य के निर्जल रेगिस्तान इन सबको पार कर इस पथ का पथिक आगे ही बढ़ता जाता है, पीछे नहीं लौटता, न रास्ते में ही कहीं टिकता है, बल्कि अपने अत्युच्च लक्ष्यश्रृंग की ओर ऊपर ही चढ़ता जाता है और अन्त में यह विनम्र और विनयशील वीर, धीर तेजस्वी विजेता शान्ति की परम रमणीय अमरावती में जा पहुँचता है।
(श्री स्वामी शुकदेवानन्द जी)
अपने संचित प्रारब्धानुसार समय-समय पर दुख तो आवेंगे ही किन्तु विचारपूर्वक उन दुखों का प्रसन्नतापूर्वक सामना करने वालों का ही मूल्य संसार में बढ़ जाता है। जिस प्रकार सर्दी से बचने के लिये छाता और बरसाती को प्रयोग किया जाता है। इस बात का प्रयत्न कोई नहीं करता कि सर्दी आवे ही नहीं, या वर्षा ही न हो। इसी प्रकार कष्ट आवें ही नहीं ऐसा प्रयत्न करना बेकार है। अतएव कष्ट-सहन करने के लिये पूर्व-कथित चारों बयडडडडडड प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को इसी प्रकार का ज्ञान बताते हुए श्रीगीता जी में कहा है—
“इदं ज्ञान मुपाश्रित्य मम साधर्ममागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथयन्ति च॥”
अर्थात्—इस ज्ञान का आश्रय करके प्रलयकाल में भी दुःख नहीं होता।
भौतिक उन्नति ही उन्नति नहीं है। वास्तविक उन्नति तो आध्यात्मिक उन्नति है। अतएव भौतिक उन्नति के लिये उतना ही सीमित प्रयत्न करना चाहिये जिससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा न पड़े। शारीरिक मानसिक और सामाजिक तीनों उन्नतियाँ आत्मोन्नति के बिना अधूरी हैं। हाथी शारीरिक बल में मनुष्य से कई सो गुना अधिक बलशाली होता है, किन्तु मानसिक बल के द्वारा मनुष्य उसे वश में कर लेता है। सिंह में मानसिक बल का एक अंग ब्रह्मचर्य होता है और हाथी कामी होता है अतएव शारीरिक बल में अधिक होने पर भी सिंह से भयभीत हो जाता है। सिंह जीवन में केवल एक ब्रह्मचर्य खण्डन करता है इसी कारण उसमें हाथी की अपेक्षा मानसिक बल विशेष होता है और उसी सिंह को मनुष्य अपने बुद्धि बल के द्वारा पिंजड़े में बन्द कर लेता है।
ईंट पक जाने पर यदि पानी में डाल दी जाती है तो और भी दृढ़ हो जाती है। इसी प्रकार जो मनुष्य अपने को दुःख रूपी भट्ठी में डालकर हृदय को बलिष्ठ बना लेते हैं वे अधिक शक्तिशाली बन जाते हैं और आध्यात्मिक बल के द्वारा अपने बल और इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं। आज हम निर्बलों पर तो शासन करते हैं परन्तु अपने से अधिक बलवान से डरते हैं, किन्तु जो मनुष्य अपने मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर उन्हें वश में कर लेता है वह कभी किसी से किसी अवस्था में भयभीत नहीं होता, वह संसार को जीत लेता है! जगत्गुरु भगवान शंकराचार्य ने कहा है—
“जितं जगत्केन मनोहि येन”
अर्थात्-जगत को किसने जीता है? जिसने मन को जीता है। रामराज्य में सभी सुखी और सम्पन्न थे, इसका रहस्य भी था कि :—
दण्ड जतिन कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज।
जीतहिं मुनिहिं सुनिय अस, रामचन्द्र के काज॥
भगवान श्री रामचन्द्र जी के राज्य में लोग अपने मन को असावधान रहते ही स्वयं दण्ड देते थे, अतएव उस काल में कचहरी और अदालत की आवश्यकता ही नहीं थी। आज घर-घर में कलह का मूल कारण यही है कि मन और इन्द्रियों पर अपना वश ही नहीं चलता, अथवा आज कोई इस बात का प्रयत्न ही नहीं करता कि हम अपने मन और इन्द्रियों पर शासन करें। आज भाई-भाई में, पिता-पुत्र में, सास-बहू में कलह होने का यही कारण है। यदि हम मन और इन्द्रियों के दास न बनें, अपनी-अपनी मनचाही न चाहें, अपनी इच्छाओं को दबाएँ तो निश्चय ही कलह बन्द हो जाय और हर घर में राम-राज्य स्थापित हो जाय। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने भरत ने लक्ष्मण, सीता, उर्मिला आदि ने अपने मन के कौन कौन से भोग भोगे? विचार कीजिये आज यह पत्थर की मूर्ति कैसे पूजनीय बन गई? जब यह पत्थर की शिला के रूप में थी तब वहाँ कौन पूजा करने जाता था? जब उस पत्थर की शिला पर शिल्पी ने छेनी और हथौड़ा चलाया तभी तो आज वह मूर्ति के आकार में मन्दिर में प्रतिष्ठित होकर पूजी जा रही है। अतएव मन और इन्द्रियों पर शिल्पी की नई छेनी और हथौड़ा की भाँति साधन द्वारा कटाई करो तब तुम अपनी आत्मोन्नति में निरन्तर अग्रसर होते जाओगे। यदि मन और इन्द्रियों को निरंकुश मस्त हाथी की तरह छोड़ दिया तो तुम्हें संसार में सभी दुःख पहुँचाने वाले ही दिखाई पड़ेंगे। देखो सईस घोड़े की दलाई-मलाई करता है किन्तु रईस घोड़े पर सवारी करता है। तुम मन इन्द्रियों की गुलामी करके सईस मत बनो, वरन् रईस की भाँति आत्मा बनकर अपने मन इन्द्रियों पर सवारी करो। मन के प्रत्येक संकल्प को बुद्धि की तराजू पर तौलकर ही उसे कार्यरूप में परिणित करो।
दूध और पानी का सम्मिलन हो जाता है, घी और आटा में भी मेल हो जाता है परन्तु मनुष्यों में संगठन नहीं हो पाता कारण यही है कि हमारा हमारे मन पर शासन नहीं, हम पूर्णरूप से मन के वशीभूत हो गये। अर्जुन को मन मुखी बनते देखकर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी ने सर्वप्रथम साँख्य योग का उपदेश किया और कर्मयोग का बाद में। आजकल के सस्ते वेदान्ती लोग साँख्य योग का उपदेश का रहस्य तो केवल आत्मा का अनुभव करना था अर्थात् तुम आत्मा हो शरीर नहीं। आत्माभिमानी बने बिना तुम अपने मन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, कारण कि अपने बुद्धि, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और शरीर क्रमशः एक दूसरे के अंतर्गत हैं। क्या हम अपने को शरीर समझकर देहाभिमानी बने रहकर अपने मन को वश में कर सकते हैं? कदापि नहीं। अतएव आत्मा बनकर अपने मन इन्द्रियों से शास्त्रोक्त कर्म कराओ, शरीर बनकर नहीं। कलेक्टर सिपाही को आज्ञा दे सकता है, सिपाही कलेक्टर को अपनी आज्ञा में नहीं चला सकता। केवल दृष्टा बने रहकर भी संसार में काम नहीं चल सकता। अतएव अपने मन और इन्द्रियों को शास्त्राज्ञा के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
अपने मन पर शासन किए बिना दूसरों पर शासन नहीं हो सकता। आत्मोन्नति के बिना मानसिक उन्नति सम्भव नहीं, मानसिक उन्नति के बिना शारीरिक उन्नति नहीं हो सकती और शारीरिक उन्नति के अभाव में सामाजिक उन्नति होना असम्भव है। तुम्हें यदि मानसिक बल प्राप्त नहीं हो तो पौष्टिक पदार्थों को खाकर भी तुम शारीरिक बल प्राप्त नहीं कर सकते। क्रोधादि विकारों के आवेश में किया हुआ भोजन शरीर में विकार पैदा करता है किसी ग्रन्थकार का कथन है :—
सबसे पहिले अपने मन के विकारों को निकाल कर अपने विचारों को शुद्ध बनाकर शारीरिक उन्नति करो फिर सामाजिक उन्नति करो। फिर सामाजिक उन्नति अर्थात् संगठन शक्ति को प्राप्त करो। मोटर वजन में ड्राइवर से कई गुना अधिक होती है परन्तु मोटर के बिगड़ने पर ड्राइवर सुधारता है और चलाता है और यदि ड्राइवर बिगड़ जाय तो मोटर उसे नहीं सुधार सकती।
इसी प्रकार बुद्धिरूपी ड्राइवर के द्वारा मन और इन्द्रियों को सुधार कर शारीरिक उन्नति हो सकती है। हम तो अपने को शरीर ही मान बैठे हैं सुधार हो तो कैसे? शारीरिक उन्नति को ही उन्नति समझ लिया है। हम भूल गये कि हम शरीर नहीं, हमारा यह शरीर तो केवल आवरण मात्र है अर्थात् हम मकान नहीं, इस मकान के निवासी हैं।
आत्मा का बोध होने से बुद्धि बलशाली होती है और बुद्धि का विकास होने पर वह अपने निर्णय से मन और इन्द्रियों पर शासन करने में समर्थ हो सकती है। आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा ने हमें पूर्ण रूप से देहाभिमानी बना दिया। यहाँ तक पतन हो गया कि आज कालेज के विद्यार्थी अपने बनाव शृंगार में स्त्रियों से भी आगे बढ़ गये। प्राचीन काल में राजाओं तक के लड़के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने जाते थे। वहाँ गुरुकुल सेवा, भिक्षा वृत्ति तथा अखण्ड ब्रह्मचर्यादि साधनों के द्वारा उनका देहाभिमान नष्ट हो जाता था। अधिक सुख भोग करने तथा शृंगारादि करने से काम विकार पैदा होता है। अतएव प्राकृतिक नियमानुसार शरीर को कठोर बनाने का अभ्यास करना चाहिये। पशु और पक्षी प्राकृतिक नियमों का पालन करने के कारण सदैव निरोगी बने रहते हैं। आज हम इन नियमों का उल्लंघन करने के कारण ही निर्बल बन गये और आये दिन रोगों से हमारा सामना होता रहता है। बड़े-बड़े शहरों में दस-दस पग पर आपको डॉक्टर और वैद्यों की दुकान मिलेंगी, अनेकों अस्पताल मिलेंगे किन्तु क्या पशु पक्षियों के भी इतने अस्पताल आपने कहीं देखे हैं? अतएव जो बीत गया उसकी ओर न देखकर आत्मोन्नति के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।
देहाभिमान के कारण बुद्धि निर्बल ओर शरीर बलवान हो जाता है और बुद्धि को बलवान बनाने की कहीं शिक्षा ही नहीं दी जाती। अतएव सत्संग के द्वारा सदाचार एवं ब्रह्मचर्य की रक्षा करके बुद्धि को बलवान बनाओ और सतोमुखी बुद्धि के द्वारा परोपकार कार्यों में लग जाओ और समय निकाल कर जनता-जनार्दन की सेवा करो। परोपकार और सेवा के फलस्वरूप तुम्हें महान शक्तियाँ प्राप्त होंगी यह उपदेश नहीं वरन् मेरे निजी अनुभव हैं। भूतकाल का स्मरण न करके वर्तमान को संभालो। वर्तमान के संभल जाने से भविष्य तो मंगलमय होगा ही, यह निश्चित सिद्धान्त है। अध्यात्मिक उन्नति के द्वारा भौतिक उन्नति तो अनायास ही हो जायगी।
एक ड्राइवर सौ मोटरों को ठीक कर सकता है। किन्तु सौ मोटर एक ड्राइवर को ठीक नहीं कर सकतीं। बालू और सीमेन्ट के मिश्रण से सुदृढ़ भवन का निर्माण हो जाता है। केवल बालू से ही गृह-निर्माण असम्भव है। आध्यात्मिक उन्नति सीमेन्ट है और भौतिक उन्नति बालू है। देश और काल के अनुसार, आध्यात्मिक उन्नति का लक्ष्य सामने रखते हुए शास्त्र की आज्ञानुसार जो कार्य सामने आयें उन्हें भगवान का कार्य समझकर प्रसन्नतापूर्वक करो। सीताजी के हरण के पश्चात् मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी ने अपने आध्यात्मिक बल पर रीछ और वानरों का सच्चा संगठन करके भौतिक उन्नति से मदान्ध रावण पर विजय प्राप्त की।
जिस समय महारथी अर्जुन किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर रण से विमुख होकर गाण्डीव को रथ में रखकर बैठ गए और भगवान से बोले ‘मैं संग्राम नहीं करूंगा। मुझे राज्य नहीं चाहिए, मैं तो भिक्षावृत्ति से ही अपना निर्वाह कर लूँगा’ तब भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी ने अर्जुन को फटकारा और नपुँसक, हिजड़ा, कायर आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए, साँख्य योग के द्वारा उन्हें आत्म बोध कराकर कर्त्तव्य-पालन में अग्रसर किया।
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
जुदे-जुदे धर्मों में जो हमें परस्पर विरोध मालूम होता हैं वह अनेकान्त, स्याद्वाद या सम-भाव के न प्राप्त करने का फल है। मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक धर्म का प्रत्येक सिद्धान्त वैज्ञानिक दृष्टि से सत्य है। मनुष्य प्रकृति का विचार करके हर एक धर्म में वैज्ञानिक असत्य को स्थान मिला है। परन्तु वह असत्य भी धर्म के लिए ही लाया गया है, अधर्म के लिए नहीं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण माला उपस्थित करने की आवश्यकता होगी।
पहिले ईश्वर कर्तृत्व के विषय को लीजिए।
एक सम्प्रदाय कहता है कि जगत्कर्त्ता ईश्वर है, दूसरा कहता है कि जगत्कर्त्ता ईश्वर नहीं है। निःसन्देह इन दोनों में से कोई एक असत्य है। परन्तु इन दोनों बातों का लक्ष्य क्या है? ईश्वर-कर्तृत्ववादी कहता है कि अगर तुम पाप करोगे तो ईश्वर तुम्हें दण्ड देगा, नरक में भेजेगा, अगर तुम पुण्य करोगे तो वह खुश होगा, तुम्हें सुख देगा, स्वर्ग में भेजेगा। ईश्वर-कर्तृत्व विरोधी जैन कहेगा कि अगर तुम पाप करोगे तो अशुभ कर्मों का बन्ध होगा, खाये हुए अपथ्य भोजन के समान उसका तुम्हें दुःखमय फल मिलेगा, तुम्हें बुरी गति में जाना पड़ेगा। अगर तुम पुण्य करोगे तो तुम्हें शुभ कर्मों का बन्ध होगा, खाये हुए पथ्य भोजन के समान उससे तुम्हारा हित होगा, आदि। एक धर्म लोगों को ईश्वर-कर्तृत्ववादी बनाकर जो काम करना चाहता है, दूसरा धर्म लोगों को ईश्वर-कर्तृत्व का विरोधी बनाकर वही काम कराना चाहता है। यहाँ धर्म में क्या भिन्नता है? भिन्नता उसके साधनों में है। परन्तु भिन्नता होने से विरोध होना चाहिए, यह नहीं कहा जा सकता। विरोध वहाँ होता है जहाँ दोनों का उद्देश्य एक दूसरे का विघातक हो, परन्तु यहाँ दोनों का उद्देश्य एक ही है। इसलिए हम इन्हें विरोधी धर्म नहीं कह सकते। उनमें से अगर हम ईश्वर-कर्तृत्ववाद को वैज्ञानिक दृष्टि से असत्य मान लें, तो भी वह अधर्म नहीं कहा जा सकता। जो भावुक हैं उनके लिए ईश्वर-कर्तृत्ववाद अधिक उपयोगी है। वे यह सोचते हैं कि ईश्वर के भरोसे सब छोड़ देने से हम निश्चिन्त हो जाते हैं, हममें कर्तृत्व का अहंकार पैदा नहीं होता, पुण्य पाप का विचार रहता है। जो बुद्धि पर अधिक जोर देते हैं, वे तर्क सिद्ध न होने से ईश्वर को नहीं मानते। वे सोचते हैं कि ईश्वर को कर्त्ता न मानने से हम स्वावलम्बी बनते हैं—हम ईश्वर को प्रसन्न करने की कोशिश करने की अपेक्षा कर्त्तव्य को पूर्ण करने का प्रयत्न करते हैं, हमारे पापों को कोई माफ करने वाला नहीं है, इस विचार से हमें पाप से भय पैदा होता है। जिस धर्म ने ईश्वर को माना है, उसने भी इसीलिए माना है कि मनुष्य पाप न करे। जिसने ईश्वर नहीं माना, उसने भी इसीलिए नहीं माना कि मनुष्य पाप न करे। दोनों का लक्ष्य एक है और दोनों ही प्राणियों को सुखी बनाना चाहते हैं, और एक अंश में उन्हें सफलता भी मिली है। इतना ही नहीं परलोक को न मानने वाले नास्तिकों ने भी परलोक को नहीं माना, उसका कारण सिर्फ यही था कि मनुष्य समाज सुखी रहे। जब परलोक के नाम पर एक वर्ग लूट मचाने लगा और भोले-भाले लोग ठगे जाने लगे, विवेक शून्य होकर दुःख सहने को जब लोग पुण्य समझने लगे, तब नास्तिक धर्म पैदा हुआ। इस प्रकार आस्तिकता की सीमा पर पहुँचे हुए ईश्वर कर्तृत्ववादी और नास्तिकता की सीमा पर बैठे हुए परलोक भाववादी, अपने-अपने धर्म का प्रचार सिर्फ इसीलिए करते थे कि मनुष्य निष्पाप बने, एक प्राणी दूसरे प्राणी को न सतावे। यह हो सकता है कि इनमें से कोई धर्म कम सफल हो कोई अधिक, कोई अल्पकालिक हो कोई चिरकालिक, परन्तु यह निश्चित है कि अपने-अपने देश काल में सब धर्मों ने मनुष्य समाज को सुखी बनाने की और समाज के दुःख मूलक विकारों को दूर करने की चेष्टा की है।
अब हिंसा-अहिंसा के प्रश्न को लीजिये। जैन धर्म और बौद्ध धर्म में अहिंसा पर बहुत जोर दिया गया है। परन्तु जिन धर्मों ने हिंसा का विधान किया है, वे अपने समय में भी इतने ही अनुचित थे जितने आज हैं—यह नहीं कहा जा सकता। जिस समय यहाँ जंगलों की बहुलता थी, जंगली जानवरों से कृषि की रक्षा असम्भव थी, उस समय पर मनुष्य समाज की रक्षा के लिए हिंस्र तथा कृषि विघातक जानवरों का यज्ञ तथा शिकार आदि से नाश किया गया, यह अगन्तव्य नहीं है। यह बात दूसरी है, कि पीछे से इस हिंसा की आवश्यकता न होने पर भी लोगों ने नामवरी के लिए या व्यसन के लिए ये कार्य किये। आज हजारों वर्ष से यहाँ कृषि कार्य हो रहा है, इसलिए उस समय के कष्ट की हम कल्पना भी नहीं कर सकते जब लोगों को कृषि-रक्षा के लिए या आत्मरक्षा के लिए इस प्रकार हिंसा का विधान करने पड़े। आज यह हिंसा विधान कई हजार वर्षों से अनावश्यक है, इसलिए वर्तमान काल की दृष्टि से हमें हक है कि हम उसे अनुचित कहें, और अनुचित और पाप में तो सिर्फ शब्द-मात्र का अन्तर है।
इस तरह यह हिंसा विधायक धर्म भी एक समय के लिए आवश्यक था। किन्तु हमारा सबसे बड़ा पाप तो यह है कि एक समय के लिए जो आवश्यक था वह सब समय के लिए आवश्यक मान लेते हैं। जिस समय कृषि कार्य अच्छी तरह से चलने लगा, जंगली पशु भी पालतू पशु हो गये यहाँ तक कि हम उनका दूध तक पीने लगे, इस तरह वे हमारे सहयोगी होकर नागरिक बन गये, उस समय इन मित्रों की हत्या करना क्या उचित था? जब हम उसकी हिंसा किये बिना जीवित रह सकते थे, तब क्या हमें उनकी रक्षा न करनी चाहिए थी? क्या यह तामसिकता हमारे अधःपतन का कारण न थी? यही सोचकर महात्मा महावीर और महात्मा बुद्ध ने हिंसा के विरुद्ध क्रान्ति की। एक समय जो उचित था या क्षम्तव्य था, दूसरे समय में वही अनुचित था, पाप था, इसलिए उसके दूर करने के लिए जो क्रान्ति हुई वह धर्म कहलाई।
हिंसा-अहिंसा के प्रश्न के साथ गो-वध के प्रश्न को ले लीजिए। निःसन्देह किसी भी निरपराध प्राणी की हत्या करना बड़ा भारी पाप है और हिन्दुस्तान में गोवध करना तो बड़े से बड़ा पाप है। परन्तु मुसलमान धर्म जब और जहाँ पैदा हुआ वहाँ की दृष्टि से हमें विचार करना चाहिए। महात्मा मुहम्मद के जमाने में अरब की बड़ी दुर्दशा थी। मूर्तियों के नाम पर वहाँ मनुष्य-वध तक होता था। इसको दूर करने के लिए उनने मूर्ति को हटा दिया। “न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी”—न मूर्तियाँ होंगी, न उनके नाम पर बलि होगी। परन्तु इतनी विशाल क्रान्ति, लोग सह नहीं सकते थे। पात्रता के अनुसार ही सुधार होता है। इसलिए मनुष्य-बलि बन्द हुई और गो-वध आया। हिन्दुस्तान में गो-वंश कृषि का एक मात्र सहायक होने से यहाँ उसका मूल्य अधिक है। इसीलिए गो-माता सरीखे शब्द की उत्पत्ति यहाँ हुई है। परन्तु अरब में कृषि के लिए गो-वंश की आवश्यकता नहीं है—वहाँ ऊँटों से खेती होती है। यदि बलि आदि को, रोकने के लिए मुहम्मद साहब ने मूर्तियाँ हटा दीं, मनुष्य-वध रोकने के लिए गो वध का विधान किया, तो “सर्वनाश उपस्थित होने पर आधे का त्याग कर देना चाहिए” इस नीति के अनुसार उस काल को देखते हुए यह अनुचित नहीं कहा जा सकता। जैन शास्त्रों में एक कथा प्रचलित है कि मुनि के उपदेश देने पर भी जब एक भील किसी तरह माँस छोड़ने को राजी न हुआ, तो उन्होंने उससे काक माँस का ही त्याग कराया। इसका यह अर्थ नहीं है कि अन्य माँसों का विधान कराया गया, सिर्फ शक्यानुष्ठान की दृष्टि से यह बात भी उचित समझी गई। इस दृष्टि से मुहम्मद साहब के समय में अरब की स्थिति पर विचार करके इस्लाम की आलोचना करनी चाहिए। परन्तु भूल है उनकी, जो मुहम्मद साहब के अनुयायी होकर के भी मुहम्मद साहब की दृष्टि पर विचार नहीं करना चाहते। शोधा हुआ संखिया असाधारण बीमारी में दवाई का काम करता है, परन्तु बीमारी की परिस्थिति हट जाने पर उसे कोई अपना भोजन बना ले, तो बीमार हो जायगा। ऐसी हालत में हम उस वैद्य को बुरा न कहेंगे जिसने बीमारी के अवसर पर संखिया खिलाया, बुरा कहेंगे हम उन्हें, जिनने बीमारी के हट जाने पर भी संखिया को सदा के लिए भोजन बना लिया। मुहम्मद साहब के अनुयायी, जो कि भारत वर्ष में रहते हैं, अगर मुहम्मद साहब की दृष्टि से काम लें तो वे कभी गो-वध का विधान न करें। मनुष्य-वध के युग में पशु-वध का विधान क्षम्तव्य कहा जा सकता है, परन्तु जिस देश में वनस्पति के स्पर्श में घोर हिंसा मानने वाले हों उस देश में पशु-वध के विधान की क्या आवश्यकता है? वहाँ तो यह पाप है। अगर हम इस बात को समझें तो इस्लामियों के वर्तमान कार्यों को अनुचित समझते हुए भी इस्लाम को सहन कर सकेंगे।
अब मैं वैदिक धर्म की एक बात लेता हूँ। वैदिक धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था जैन धर्म को मान्य नहीं है। परन्तु यह कहना ठीक नहीं कि वैदिक धर्म का पक्ष असत्य है या जैन धर्म का पक्ष असत्य है। वैदिक धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था को समझाने के लिए हमें अपनी दृष्टि कई हजार वर्ष पहले ले जानी चाहिए। हम देखते हैं कि उस समय आर्यों को कृषि और सेवा के लिए आदमी नहीं मिलते हैं—सभी आदमी अयोग्य रहते हुए भी पंडिताई या सैनिक जीवन बिताना चाहते हैं। आवश्यक क्षेत्र में आदमी नहीं मिलते, अनावश्यक क्षेत्र में इतने आदमी भर गये हैं कि बेकारी फैल गई है। हर एक आदमी महीने में तीस बार अपनी आजीविका बदलता है। वह किसी भी काम में अनुभव प्राप्त नहीं कर पाता। ऐसी हालत में वर्ण-व्यवस्था की योजना होती है। इससे अनुचित प्रतियोगिता बन्द होकर आजीविका के क्षेत्र का यथायोग्य विभाग होता है। परन्तु इसके बाद महात्मा महावीर के जमाने में हम देखते हैं कि वर्णों ने जातियों का रूप पकड़ लिया है। पशुओं में जैसे हाथी-घोड़ा आदि जातियाँ होती हैं, उसी प्रकार आजीविका की सुविधा के लिए किया गया यह सुप्रबन्ध, मनुष्य जाति के टुकड़े-टुकड़े कर रहा है। पारस्परिक सहयोग के लिए की गई वर्ण व्यवस्था परस्पर में असहयोग और घृणा का प्रचार कर रही है। सिर्फ आजीविका के क्षेत्र के लिए किया गया यह विभाग रोटी-बेटी व्यवहार में भी आड़े आ रहा है। इसके कारण दुराचारी ब्राह्मण सदाचारी शूद्र की पूजा नहीं करना चाहता, किन्तु उसे पददलित करना चाहता है। तब वर्ण-व्यवस्था का विरोध करना परम धर्म हो जाता हैं, क्योंकि यह व्यवस्था अब दुःखदायी हो जाती है। यही बात आश्रम-व्यवस्था की है। जब जीवन की जिम्मेदारियों से मुँह छुपाने वाले अपने माता-पिता को रोते छोड़कर भागने लगे, समाज अनुत्तरदायी युवा साधुओं से भर गया, तब आश्रम-व्यवस्था की आवश्यकता हुई। यह नियम बनाया गया कि हर एक आदमी को पितृ-ऋण चुकाना चाहिए, अर्थात् माता-पिता की सेवा करनी चाहिए और जिस प्रकार माता-पिता ने उसका पालन किया है, उसी प्रकार उसे अपनी संतान का पालन करना चाहिए, पीछे वानप्रस्थ रहकर संन्यास का अभ्यास करना चाहिए, फिर संन्यास लेना चाहिए। अब आप देखें कि यह व्यवस्था संसार की भलाई के लिये कितनी अच्छी है।
अब थोड़ा सा विचार द्वैत और अद्वैत पर भी कीजिए। अद्वैतवादी कहता है कि सब जगत् का मूल तत्व एक है, द्वैत भावना करना संसार का कारण है। इस प्रकार का विचार करने वाला मनुष्य, यह मेरा स्वार्थ, वह दूसरे का स्वार्थ, यह विचार ही नहीं ला सकता। वह जो जगत के हित में अपना हित समझेगा जिस वैयक्तिक स्वार्थ के पीछे लोग नाना पाप करते हैं, वह वैयक्तिक स्वार्थ उनकी दृष्टि में न रहेगा। वह निष्पाप बनेगा। द्वैतवादी कहेगा—भूल तत्व वो हैं, मैं आत्मा हूँ और मेरे साथ लगा रहने वाला पर-तत्व पूर्ण जुदा है। मैं इस ‘वर’ के बन्धन में पड़कर पराधीन हूँ, दुखी हूँ, मुझे इस बन्धन को तोड़ना चाहिये। यह समझकर शरीर की अपेक्षा आत्मा को मुख्यता देता है, शरीर के लिये कोई पाप नहीं करता। इस तरह द्वैत-भावना उसे निर्विकार बनने को प्रोत्साहित करती है।
इस तरह के बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं। उन पर से हमें मालूम होगा कि धर्म को प्राप्त करने के लिये जो सम्प्रदाय बने हैं, वे जब बने थे तब उस द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव के अनुसार किसी उपयोगी—कल्याणकारी—तत्व को लेकर बने थे। तभी वे खड़े हो सके इसलिये मैं इस बात को कहने का साहस करता हूँ कि सम्प्रदायों के मौलिक (असली) रूप का धर्म के साथ—कल्याण के साथ कोई विरोध नहीं हैं।
हाँ, हर एक सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का पीछे से दुरुपयोग होता है। परन्तु इससे हम उन सम्प्रदायों को बुरा नहीं कह सकते। दुरुपयोग तो अच्छे से अच्छे तत्व का होता है। अहिंसा सरीखे श्रेष्ठ तत्व का दुरुपयोग होकर कायरता का प्रचार हुआ है। दीक्षा के नाम पर बालक-विक्रय या बालक-चोरी भी होती है, द्वैत के नाम पर स्वार्थ का ही पोषण हो सकता है, अद्वैत के नाम पर सब स्त्रियों में अद्वैत भावना रखकर व्यभिचार का पोषण हो सकता है। इसलिये दुरुपयोग को हटाकर हमें हर एक सम्प्रदाय के मौलिक रूप पर विचार करना चाहिये और उसी दृष्टि से उसकी आलोचना करनी चाहिये। तब हमें सब सम्प्रदाय अपने-अपने द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव के अनुसार अविरुद्ध और अभिन्न मालूम होंगे, और अपनी योग्यतानुसार हम उन सभी से लाभ उठा सकेंगे।
(श्री मोतीलाल जैन, एम. ए.)
टारपीडो नामक नाव से जो गोला छोड़ा जाता है उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह लड़ाई के बड़े-बड़े जहाजों के टुकड़े-2 कर देता है। परन्तु यह महाशक्ति ऐसी गुप्त रहती है कि इसको प्रकट करने के लिए बहुत बड़े धक्के की आवश्यकता होती है।
चाहे बच्चे उस गोले से वर्षों तक खेलते रहें, उसको कूटते पीटते रहें, उसको लुढ़काते फिरें, अथवा उसके साथ कुछ भी करें, परन्तु वह फटता नहीं। किसी साधारण मकान की दीवारों पर वह गोला फेंका जाय तब भी वह नहीं फट सकता। जब वह गोला किसी बड़ी तोप में भर कर बड़े जोर से छोड़ा जाता है और वह लोहे की एक फुट मोटी चद्दर में जो लड़ाकू जहाजों के पेंदे में लगी होती है, जाकर लगता है तब कहीं उसे धक्का पहुँचता है और वह फट जाता है तथा अपनी प्रबल शक्ति से जहाज के पेंदे के टुकड़े कर डालता है।
इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य के भीतर ऐसी महाशक्ति छिपी हुई है कि जब तक उस मनुष्य के ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं आती उसे कोई धक्का नहीं लगता अथवा उसके जीवन में कोई विकट प्रसंग नहीं आता तब तक उस शक्ति का प्रादुर्भाव नहीं होता, और आश्चर्य की बात तो यह है कि तब तक वह मनुष्य स्वयं यह जान भी नहीं पाता कि उसमें ऐसी महाशक्ति छिपी है।
इतिहास में ऐसे अनेकों प्रसिद्ध नाम पाये जाते हैं जिन्होंने उस समय तक अपनी महाशक्ति को नहीं पहिचाना जब तक कि वे साहस और उत्साह के सिवा सब कुछ न खो बैठे अथवा जब तक उनके ऊपर कोई इतनी बड़ी आपत्ति न आई कि उनको संसार में अपना मार्ग स्वयं खोजना पड़ा।
महात्माओं की उत्पत्ति आवश्यकताओं की पाठशाला में होती है। बड़े-बड़े शक्तिशाली और विद्वान् मनुष्य, जिन्होंने सभ्यता की उन्नति की है, स्वावलम्बन के द्वारा ही सब कुछ कर सके हैं। वे दूसरों के सहारे से नहीं बढ़े हैं, किन्तु उन्होंने हर एक बात में अपनी उन्नति आप ही की है।
वे लोग महात्मा इसलिए कहलाते हैं कि उन्होंने कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की है और अनेक आपत्तियों का सामना किया है। उनमें उन कठिनाइयों की शक्ति आ गई है जिन पर उन्होंने विजय प्राप्त की है।
उत्तरदायित्व से शक्ति बहुत बढ़ती है। जहाँ कहीं उत्तरदायित्व होता है वहाँ पर वृद्धि भी होती है। जिन मनुष्यों को जिम्मेदारी के काम नहीं करने पड़ते उनकी वास्तविक शक्ति का कभी विकास नहीं होता। इसी कारण जिन लोगों के जीवन चाकरी में व्यतीत होते हैं वहाँ उनको अपनी बुद्धि से काम नहीं लेना पड़ता उनमें जोरदार मनुष्य बहुत कम होते हैं। वे जन्म भर शक्तिहीन ही बने रहते हैं। क्योंकि किसी बड़ी जिम्मेदारी के न रहने से उनकी शक्तियों का विकास नहीं होने पाता। उनको स्वयं विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि उनको दूसरों के विचारों के अनुसार चलना पड़ता है। उन्होंने अपने पैरों पर आप खड़े होना स्वयं विचार करना और स्वतन्त्र होकर काम करना कभी नहीं सीखा। इसका कारण यह है कि उन्हें अपने आप कभी किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं करनी पड़ी और उन्होंने अपने बल पर कोई मौलिक अथवा स्वतन्त्र कार्य नहीं किया। जिस शक्ति से मनुष्य नई-नई बातें निकालता है, आविष्कार करता है और विकट प्रसंगों का सामना करता है, जो आपत्तियों और कठिनाइयों का बार-बार सामना करने और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये साधन इकट्ठा करने से प्राप्त होती है और जो मनुष्य को राष्ट्रीय आपत्तियों का सामना करने के योग्य बनाती है उस शक्ति का विकास किसी बड़ी जिम्मेदारी के काम को वह वर्षों तक करने से होता है।
कोई मनुष्य अपनी गुप्त शक्ति के परिणाम को उस समय तक नहीं जान सकता जब तक कि किसी कठिन प्रसंग के समय या भारी आपत्ति में उसकी परीक्षा न हो जाय। मनुष्य बहुधा अधेड़ हो जाने पर भी अपनी संपूर्ण शक्ति को नहीं जान पाते। जब तक कि किसी बड़ी आपत्ति, हानि अथवा शोक में उनकी परीक्षा नहीं हो जाती तब तक वे यह नहीं बता सकते कि वे कितनी बड़ी कठिनाई का सामना कर सकते हैं। मनुष्यों की अवस्था चाहे कितनी ही हो जाय, परन्तु जब तक किसी कठिन प्रसंग के समय उनकी गुप्त शक्ति की परीक्षा नहीं हो लेती तब तक वे यह नहीं जान सकते कि किसी बड़ी आपत्ति के आ जाने पर वे कितनी वीरता दिखा सकेंगे।
हम अनेक स्त्रियों को जानते हैं, जिनके दिन बड़े सुख से कटते थे, परन्तु उनके पति और माता-पिता की अकस्मात मृत्यु हो गई और वे निर्धन भी हो गई। उन्होंने कभी अपने हाथों से काम करना न सीखा था, क्योंकि उनके घर में नौकरों की कमी न थी। वे यह जानती थीं कि धन कमाना कैसा होता है। परन्तु उन्हीं स्त्रियों ने आपत्ति का बड़ी वीरता से सामना किया और काम करने में आश्चर्यजनक योग्यता दिखाई। यह यह योग्यता उनमें पहले भी विद्यमान थी, परन्तु गुप्त थी, उनके ऊपर पहले किसी उत्तरदायित्व का भार नहीं पड़ा था।
यदि तुम अपने ऊपर जिम्मेदारी लेना ही नहीं चाहते और यदि तुम आराम की जिन्दगी पसन्द करते हो और स्वतन्त्र व्यापार की कठिनाइयों और झंझटों को किसी दूसरे के ही ऊपर डालना चाहते हो तो तुम भले ही गुलामी करते रहो। परन्तु यदि तुम अपनी शक्ति से यथासम्भव अधिक काम लेना चाहते हो और तुम्हारा उद्देश्य अपनी योग्यता की अधिक से अधिक वृद्धि करना है तो तुम उस समय तक अपने उद्देश्य की अच्छी तरह पूर्ति नहीं कर सकते जब तक कि तुम केवल किसी दूसरे के बताये हुये मार्ग पर चलते रहोगे और सब काम उसी के विचारों के अनुसार करते रहोगे।
प्रत्येक मनुष्य जो अपनी अनेक शक्तियों को अपने भीतर छिपाये रहता है और उनसे कुछ काम नहीं लेता स्वयं पाप का भागी होता है और सभ्यता की उन्नति में बहुत बड़ी रुकावट डालता है।
अपने ऊपर भरोसा करने से डरो मत। प्रत्येक मनुष्य में नये कामों के करने की कुछ न कुछ योग्यता होती है और आत्मविश्वास से इस योग्यता का विकास होता है।
(श्री धर्मपाल सिंह जी, बहादुराबाद)
मनुष्य स्थिर, अखण्ड, शाश्वत सुख चाहता है और यही उसके जीवन का चरम उद्देश्य होना भी चाहिए क्योंकि भोग सुख तो और योनियों में भी जो क्षणिक, अस्थिर सुख देने वाले हैं पर्याप्त मिलते हैं। सुख की खोज ओर आशा में ही मनुष्य नाना प्रकार के विषय और वस्तुओं का संग्रह उचित-अनुचित की अपेक्षा करके किया करता है। जैसे-तैसे भी रुपये का संग्रह, बढ़िया भवन, सुन्दर स्त्रियाँ, हँसते हुए सुन्दर सुकोमल बच्चे, प्यारे सम्बन्धी, नाना प्रकार की स्वाद खाद्य और मोटरकार, रेडियो आदि मनोरंजन की वस्तुएं प्राप्त करता है। परन्तु काल, स्वभाव और कर्म गाति से जब यह भौतिक वस्तुएँ अपने गुण अनित्य और क्षण भंगुर होने से नष्ट होने लगती हैं तो इसकी सारी सुख की आशाएँ दुराशा में बदल कर इसको पूर्व से भी अधिक दुःख का कारण हो जाती हैं।
अध्यात्म गुरु और अध्यात्म ग्रन्थ ही इस शाश्वत अखण्ड सुख का मार्ग बनाते हैं। उनकी चरण शरण ही इस मार्ग के गहन रहस्यों को खोलती है। जिन वस्तुओं को हम बना नहीं सकते उन, स्त्री, पुत्र, धन, सम्बन्धी, सम्पत्ति आदि को अपना मानना उन में मन को अत्यन्त आसक्त रखना यह मन का उन के प्रति ‘राग‘ ही स्थिर, अखण्ड सुख में सबसे बड़ा बाधक है। जिस मालिक ने यह सब रचना की है उस ईश्वर को उसकी वस्तुएं सौंपकर निश्चिन्त हो वर्तमान कर्त्तव्य का पालन करते हुए लाभ, हानि, जय, पराजय, जन्म, मृत्यु, आदि में हर्ष, शोक, न करते हुए समभाव में अपने प्यारे प्रभु की ओर टकटकी लगाकर उनकी लीला को देखने वाला ही “वैरागी” है जो स्थिर सुख प्राप्त करता है। ऐसे वैरागी ही अपमान, हानि, सम्बन्धियों की मृत्यु यहाँ तक अपने शरीर को नष्ट होते देख दुखी तथा भयातुर नहीं होते।
उपरोक्त पंक्तियों में दुख का कारण और अखंड सुख की प्राप्ति में रुकावट डालने वाला राग द्वेष का वर्णन किया गया है, जिसके प्रति राग होता है जब उसमें कोई बाधा उपस्थित होती है तो वही राग, द्वेष का कारण बन जाता है अतः यह राग, द्वेष जिनका स्थान मैला मन है इनको निर्मूल करने के लिए मन का इलाज करके उसे स्वस्थ शुद्ध बनाना ही राग द्वेष की बीमारी से मुक्त होना है। प्राणी के मरने पर पुनर्जन्म भी अन्तः करण का ही होता है न कि आत्मा का। क्योंकि आत्मा सुख-दुख से रहित, अजर, अमर, नित्य, सनातन और आनन्द स्वरूप है। अतः अन्तःकरण को राग द्वेष की बीमारी से मुक्त करने के लिए सदगुरु वैद्य द्वारा आध्यात्मिक साधना की औषधि लेने की अध्यात्म ग्रन्थ सम्मति देते हैं। जिस प्रकार अधिक मैला कपड़ा बार-बार साबुन लगाने से अधिक अधिक स्वच्छ और निर्मल होता जाता है। इसी प्रकार अधिक अधिक जप से मन पवित्र और स्वच्छ होता रहता है। जब वह बिलकुल शुद्ध हो जाता है तो पवित्र और साफ अन्तः करण में प्रभु की लीला का रहस्य प्रगट होने लगता है जिसको अनुभूति कहते हैं यह अनुभव राग द्वेष की बीमारी को दूर करने में बड़ी सहायता करते हैं।
तत्व ज्ञान, शुद्ध चरित्र और प्रभु परायणता इन तीन साधनों का सहारा लेकर मनुष्य आसानी के साथ दुखों से निवृत्त हो सकता है। अपना स्वरूप अपना कर्त्तव्य, संसार की वस्तुस्थिति और जीव तथा संसार के सम्बन्ध की सीमित मर्यादा की वास्तविकता को समझ लेना यही आत्म ज्ञान है। मनुष्य की विचारधारा का, दृष्टिकोण का, इच्छा और आकांक्षा का आधार दार्शनिक एवं आध्यात्मिक बन जाना ही तत्व ज्ञान की उपलब्धि है, इस स्थिति के प्राप्त होने से मनुष्य अपने भ्रम जन्य अधिकाँश दुखों से छुटकारा पा जाता है।
शुद्ध चरित्र के कारण मनुष्य की शक्तियाँ सुरक्षित रहती है और दिन-दिन बढ़ती रहती हैं। लोगों से सच्चा सहयोग और आदर मिलता है। साथ ही अपनी कार्य पद्धति पर स्वयं आत्म सन्तोष रहने से हर प्रकार की परिस्थिति में एक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव होता रहता है। सच्चरित्रता एक ऐसा धन है जिसकी तुलना संसार की और किसी सम्पत्ति से नहीं हो सकती।
प्रभु परायणता जीवन के वास्तविक लक्ष की ओर अग्रसर करने वाली ठीक यात्रा है। इसी मार्ग पर चलने से उस स्थान पर पहुँचा जाना संभव है, जिस पर पहुँचने के लिए आत्मा निरन्तर तृषित रहती है। ईश्वर से बिछड़ा हुआ जीव इधर-उधर भटकता है और नाना प्रकार के त्रास सहता है पर जब वह परमात्मा की गोद में पहुँचने के लिए यात्रा आरम्भ करता है तो दिन-दिन वह आनन्द केन्द्र के निकट पहुँचता जाता है। इस मार्ग पर बढ़ाया हुआ प्रत्येक कदम पहले कदम की अपेक्षा अधिक सुख एवं शान्तिदायक सिद्ध होता है।
स्थिर सुख का सरल साधन यह है कि हम भौतिक राग-रंगों में अनावश्यक रूप से न उलझें। तत्व ज्ञान, शुद्ध चरित्र और प्रभु परायणता को अपना कर जीवन लक्ष की ओर अग्रसर हों। इस गतिविधि को जीवन का प्रधान अंग बना लेने से मनुष्य सच्चे अर्थों में सुखी हो सकता है। सन्मार्ग पर चलना ही स्थिर सुख का सरल साधन है।
(प्रो. रामचन्द्र महेन्द्र, एम.ए.)
साहित्य क्षेत्र में भावुकता एक अनमोल गुण है। कवि हृदय इतना संवेदनशील होता है कि संसार की समस्त वेदना, वह अपने हृदय-पटल पर अनुभव करता है। पीड़ा, कातरता, वेदना से परिपूर्ण हो वह संसार के लिए अपनी अनुभूतियाँ उड़ेलता है, जिसे पढ़ने पर हम हँसते-रोते हैं। उपन्यासकार, नाट्यकार, कहानीकार, कवि सभी भावुकता की जीती जागती प्रतिमाएँ हैं। संसार के अन्य क्षेत्र में भी जो व्यक्ति भावुक नहीं है, वह शुष्क, वस्तुवादी कहा जाता है। भावुक व्यक्ति अतुल मेधा-शक्ति सम्पन्न व्यक्ति हुए हैं।
दैनिक जीवन तथा संसार की कठोरताओं में यही भावुकता गुण के स्थान पर दुर्गुण भी बन जाती है। ऐसा व्यक्ति साधारण कठिनता को देखकर व्यग्र हो उठता है, उसके मन में तूफान आ जाता है, उसके संकल्प एवं पौरुष शिथिल हो उठते हैं। संसार एक कर्म क्षेत्र है। यहाँ पग-पग पर मानव को संघर्ष करना पड़ता है। भावुकता छोटे-मोटे कष्टों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है। मामूली बातों से ही हम अधिक पीड़ित हो जाते हैं, जबकि संकल्प की दृढ़ता से हम उन पर शासन कर सकते हैं।
मान लीजिए, आप किसी ऊँचे पद पर अफसर हैं। आपके नीचे कार्य करने वाले मातहत अपने कर्त्तव्यों के पालन में तत्परता तथा नियमबद्धता का व्यवहार नहीं करते। उनके ऊपर कार्य अधिक है, यह सोचकर आप उन पर दया का व्यवहार कर देते हैं। वे आपकी मृदुता का अनुचित लाभ उठाते हैं, अधिकाधिक लापरवाह बनते जाते है। आपकी प्रतिष्ठा या मान में भी शैथिल्य प्रदर्शित करते हैं। आप अपनी भावुकतावश उन्हें सजा नहीं दे पाते।
आप किसी साधारण सी बीमारी से पीड़ित हैं, लेकिन अपनी अति भावुकता के कारण वही आपको पर्वत सदृश प्रतीत होती है। अनेक रोगी इतने संवेदनशील होते हैं कि मामूली घाव देखकर बेहोश हो जाते हैं, कटे हुए माँस, मरे हुए जानवर, मुर्दे की अर्थी, कसाई की दुकान और गन्दे स्थान देखकर उनका बुरा हाल होता है। मानसिक सन्तुलन जाता रहता है। बहुत देर तक वे अपने दैनिक कार्य नहीं कर पाते। यह बड़ी कमजोरी है।
हमें अपने एक मित्र की बात स्मरण है। एक मृत्यु के सिलसिले में उन्हें मुर्दे के साथ श्मशान जाना पड़ा था। वहाँ उन्होंने प्रथम बार मरे हुए व्यक्ति की लाश देखी। उनके लिए चिता के निर्माण कराने में सहायता प्रदान की। जब श्मशान से लौटे, तो मन में भय ले आये। उन्हें भूत के अस्तित्व का भ्रम हो गया वही मुर्दा दिन-रात उन्हें अपने इर्द-गिर्द चलता-फिरता दिखाई देने लगा, रात्रि में सोते समय भय प्रतीत होने लगा। सोते-सोते चिल्ला उठते। भय उनकी अन्तः चेतना में प्रविष्ट हो गया था।
उनकी मनोवैज्ञानिक चिकित्सा की गई। संसार में जन्म के साथ मृत्यु का सुनिश्चित क्रम, कठिनाइयाँ, जीवन संघर्ष की दुर्गमता स्पष्टता से समझाई गई, तब उनका मिथ्या भय दूर हो सका। इसी प्रकार के अनेक व्यक्ति मृत्यु को भयदायिनी समझ कर इसी गुप्त भय से संत्रस्त हुए रहते हैं। एक महानुभाव ने कवि ‘शैली’ की नौका के जल में डूबने की कहानी सुनी थी। कवि अपने कुटुम्ब के साथ झील में अपनी नौका “ऐरियल” में बैठा हुआ विहार कर रहा था कि नौका यकायक डूब गई। इसे सुनने का आघात इतना गहरा बैठा कि वे नाव में ही न बैठते थे और दूसरों को भी मना करते थे।
एक बार मंसूरी से ऊँचे पर्वत पर चढ़ते हुए चलाने वाले की असावधानी से एक मोटर फिसल कर नीचे खड्ड में गिर पड़ी। गाड़ी चूर-चूर हो गई। सब यात्री मर गये। उनकी लाशें ही मिल सकीं। इस दुर्घटना का प्रभाव एक व्यक्ति पर ऐसा पड़ा था कि वे देहरादून से मंसूरी पैदल ही जाते थे। उन्हें नीचे गिर पड़ने का मृत्यु-भय सदैव लगा रहता था। जब कभी वे किसी जगह मोटर में बैठकर जाते तो अंतर्मन में छिपे हुए मृत्यु-भय से बुरी तरह आक्रान्त हो जाते। यह भी एक ऐसा उदाहरण है, जिसमें भावुकता अभिशाप बनी हुई है।
हमारे घर के समीप कुछ ऐसे नागरिक भी रहते हैं, जो प्रायः प्याज, लहसुन इत्यादि से युक्त भोजन किया करते हैं। प्याज-लहसुन की गन्ध जब हमारे घर में आती है, तो हमारे घर के कुछ सदस्य नाक में कपड़ा ठूँस लेते हैं, कै करने लगते हैं। बहुत देर तक अस्त-व्यस्त रहते हैं। उन्हें अनेक बार समझाया गया है कि जहाँ इत्र फुलेल, चम्पा चमेली और गुलाब की सुगन्ध का आनन्द लेने, मिठाइयों की महक का आनन्द लेने का अभ्यास है, वहाँ इसको सहन करने की आदत भी डालनी चाहिए।
इसी प्रकार कुछ लोग किसी भिखारी पर दया करके अपनी जेब की परवाह न कर कुछ दान दे डालते हैं, कुछ को करुणाजनक कहानियाँ सुनाकर लूट लिया जाता है। स्त्रियों में यह कमजोरी अधिक होती है। वे स्वभावतः भावुक हैं। उनकी दया, करुणा, सहानुभूति, प्रशंसा, भय या जादू टोने की भावनाओं को उत्तेजित कर, खूब मूर्ख बनाया जाता है। पढ़ी-लिखी लड़कियों में सहशिक्षा के कारण यह सस्ते रोमाँस की भावना भयंकर दुष्परिणाम दिखा रही है।
भावुक व्यक्ति का मनोविश्लेषण
अति भावुक व्यक्ति बड़ा दुर्बल चित्त बन जाता है। वह कष्टों को बढ़ा कर देखता है, मिथ्या भय से परेशान रहता है, काम-भाव उसे क्षण भर में उद्विग्न कर देता है, साधारण सी करुणा दिखाने से इतना दयार्द्र हो उठता है, कि अपना सब कुछ दे डालने को उन्मुख हो उठता है, क्रोध में इतना उन्मत्त हो उठता है कि मार-पीट, गाली यहाँ तक कि कत्ल तक कर बैठता है। साधारण मनोविकारों पर अनुशासन वह नहीं कर पाता, वे उस पर हुक्म चलाते हैं। उसके निश्चय बनते अवश्य है, पर उसके संकल्पों में दृढ़ता नहीं होती। हलके वायु के झकोरों से जिस प्रकार पत्ते आन्दोलित होते हैं, उसी प्रकार उसका हृदय डोलता रहता है। वह विकृत मनोविकारों की उग्रता से ग्रसित रहता है।
अति-भावुकता का अर्थ है, संकल्प की क्षीणता, साधारण भाव को बढ़ा चढ़ाकर देखना, विचार-बुद्धि से संचालित न हो सकना, हवाई किले बनाना और एक काल्पनिक संसार में मस्त रहना, जीवन की कठोर वास्तविकता से पलायन करे स्वार्थगत आनन्द-सृष्टि में विहार करना, दिल के फफोले फोड़ना, सहनशीलता, कष्टों से संघर्ष करने की शक्ति का अभाव, अति सुकुमारता में आने वाली शैशव कालीन चिंताओं, भय या आनन्दों में विहार करना आदि। ये सभी कमजोरियाँ चट्टान से भी कठोर मानवीय जीवन के लिए हानिकारक हैं। थोथी भावुकता मनुष्य को चञ्चल, अस्थिर, आत्मगत, स्वार्थी, आलसी और निकम्मा बना देती है। बुद्धि के साथ इसका सामंजस्य हो सके, तो यह लाभकारी अवश्य हो सकती है, पर बहुधा भावुक व्यक्ति बुद्धि और तर्क से दूर रहते हैं।
जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण
जीवन के शूलमय क्षणों, शुष्क संघर्षमय वातावरण, विद्वेषी स्वभाव के व्यक्तियों के दुर्व्यवहार को सहन करने की शक्ति जाग्रत कीजिए। आपकी अनेक समस्याएँ अति-भावुकता के कारण पर्वत सदृश प्रतीत होती हैं, जबकि राई सदृश उनका अस्तित्व है। छोटे-मोटे कष्टों को तो योंही हँस-हँस कर टाल दिया कीजिए। एक-एक कष्ट को सहन करने की आदत डालिए।
जब कभी भावनाओं का तूफान आपके मन में आए, तो विशेष रूप से सावधान हो जाइए। कहीं आप आवेश (तैश) में कुछ ऐसा न कर बैठें कि बाद में पछताना पड़े। आवेश को यथासम्भव रोके रहिये। जब तक शान्त न हो लें, तब तक कोई भी महत्वपूर्ण कार्य हाथ में न लीजिए।
जीवन शुष्क संघर्षों से युक्त है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को साँसारिक चट्टानों से जूझना होता है। आपको कदापि इनसे डर कर भयभीत नहीं होना चाहिये। आपके अन्दर पौरुष नामक एक महाप्रतापी ईश्वरीय गुण है। उसे बाहर निकालिए। दूसरे के दुःख, शोक, हास्य को आप अनुभव कीजिए, पर उसमें बह न जाइये।
अति-भावुकता का एक कारण शारीरिक कमजोरी है। शरीर को जितना स्वस्थ बनाया जाय, उतना अच्छा है। स्वस्थ शरीर आपको जीवन की कठोर वास्तविकता से संघर्ष करने में सहायता प्रदान करेगा। आन्तरिक संस्थान में चंचलता, काम शक्ति का आवेग, क्रोध, आवेश, आत्मग्लानि का असन्तोष, ईर्ष्या की अन्तराग्नि, घृणा की वितृष्णा, दमन का उद्वेग भूल कर भी न पलने दीजिए। अप्राकृतिक उपायों द्वारा मानसिक दमन से यथासम्भव बचे रहिए। हम जीवन की कठोरता से जितना ही अधिक परिचित हों और वास्तविकता के साथ जितना ही अपनी मनोभावनाओं का सामंजस्य स्थापित कर सकें, उतना ही हमारे लिए हितकर होगा।
(श्री पं. केशव देव शर्मा)
मानव प्राणी के मेरु दण्ड (रीढ़ की हड्डी) के भीतर ‘ईड़ा’ और ‘पिंगला’ नामक स्नायुजन्य शक्ति और मेरु दण्ड की मज्जा में ‘सुषुम्ना’ नाम की एक सुप्त नाड़ी रहती है। इस सुन्य नाड़ी के सबसे निचले भाग में “कुण्डलिनी” शक्ति का आधारभूत पद्म अवस्थित है। योगियों का कहना है कि यह पद्म त्रिकोणाकार है। जब वह पद्म जागृत हो जाती है, तब उस सुप्त पोली नाली के भीतर जोर से ऊपर उठाने की चेष्टा करती है। जितनी ही कुण्डलिनी ऊपर को उठती है, उतना ही हमारा मन विकसित होता जाता है। उस समय अलौकिक दृश्य दिखलाई पड़ने लगते हैं और साधक को नाना प्रकार की अद्भुत क्षमताएँ प्राप्त होती हैं। जब यह कुण्डलिनी शक्ति मस्तिष्क में पहुँच जाती है, तब साधक सम्पूर्ण रूप से अपने शरीर एवं मन से पृथक हो जाता है, तब आत्मा मुक्त भाव को अनुभव करने लगता है। सुषुम्ना के बायें भाग में ईड़ा नाम की नाड़ी और दाहिने भाग में पिंगला नाम की नाड़ी रहती है और जो एक पोली नाली इस मेरु मज्जा के ठीक बीचो−बीच निकलती है, वही सुषुम्ना नाम की नाड़ी है। नीचे की तरफ से इस नाड़ी का मुँह बन्द रहता है। कटिदेश में स्थित स्नायु जाल के निकट तक ही यह नाड़ी रहती है। आजकल के शारीरिक शास्त्र के मत में यह स्थान त्रिकोणाकार है। इन नाड़ी समूहों का केन्द्र मज्जा में रहता है। इन्हीं केन्द्रों को सन्ध्या के मत में भिन्न-भिन्न पद्म (कमलों) के स्वरूपों में माना जा सकता है।
सबसे नीचे मूलाधार से आरम्भ होकर ऊपर मस्तिष्क (सहस्रदल पद्म) चक्र के बीच में कुछ केन्द्र हैं। यदि हम इन चक्रों को भिन्न-भिन्न नाड़ी जाल मानें तो वर्तमान शारीरिक विद्या की सहायता से सहज ही में इसका रहस्य प्रगट हो जाता है। इसकी अन्तर्मुखी को ज्ञानात्मक और बहिर्मुखी को क्रियात्मक कह सकते हैं। इनमें से एक बाहर का ज्ञान ले आता है और दूसरा मस्तिष्क से संवाद लाकर बाहर कार्य कराता है। इन समस्त चक्रों से सबसे निचले भाग में (1)’मूलाधार पद्म’, मूलाधार के ठीक ऊपर स्थित (2)’स्वाधिष्ठान पद्म’ इसके ऊपर नाभिदेश में (3)’मणिपुर पद्म’ इसके ऊपर हृदय देश के समीप (4)’अनाहत पद्म’, इससे कुछ ऊपर कण्ठ देश के समीप (5)’विशुदाख्य पद्म’, दोनों भोओं के मध्य में (6)’आज्ञा पद्म’, तथा उसके कुछ ऊपर मस्तक (7)’सहर्षदल पद्म’, सबसे ऊपर हैं। इनके विषय में ज्ञान रखना आवश्यक होता है।
संसार में विविध प्रकार की गतियों का प्रकाश देखने में आता है। तब यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि तड़ित नाम से प्रसिद्ध गति विशेष में और इसमें क्या भेद है? इसको समझने के लिये एक टेबल का उदाहरण सामने रखते हैं। मान लो कि एक मेज कुछ परमाणुओं के सम्मिलन से बनता है, यदि इस मेज के समस्त परमाणुओं को निरन्तर एक तरफ को संचालित किया जाय तो यही विद्युत शक्ति (बिजली) के आकार में परिणत हो जायगा किसी भी पदार्थ के सम्पूर्ण परमाणुओं को एक तरफ प्रवाहित होते रहने को ही “विद्युत” गति कहते हैं। दूसरा उदाहरण—इस घर में जो वायु पुँज वर्तमान है, इसके समग्र परमाणुओं को यदि क्रमशः एक ही संकीर्ण छेद में से प्रवाहित किया जाय तो वह एक महान् विद्युत धारा यन्त्र के आकार में परिणत हो जायगा। इसी तरह यह भाव समझ में आ जायगा कि सुषुम्ना के खुल जाने पा सम्पूर्ण वायु प्रवाह सुषुम्ना द्वारा सहस्रार पद्म में अवस्थित होकर शरीर व मन को निश्चेष्ट कर देता है और आत्मा शरीर से पृथक होकर यत्र-यत्र विचरण करने लगता है।
आधुनिक शारीरिक शास्त्रों की एक बात हमें और समझ लेनी चाहिए, वह यह है कि जो स्नायु केन्द्र श्वास-प्रश्वास की गति को चलाता है, उसका कुछ प्रभाव सारे शरीर में स्नायुओं के ऊपर ही रहता है। इसको ‘अनाहत पद्म’ या यों कहिये कि ‘ॐ कण्ठः’ कहा गया है। यह श्वास-प्रश्वास की गति को चलाता है और जो स्नायु चक्कर शरीर में वर्तमान रहता है, उसके ऊपर भी कुछ थोड़ा बहुत प्रभाव रखता है।
अब हम प्राणायाम साधन का कारण अच्छी तरह समझ सकेंगे। इसको सुगमतया समझने के लिये इस प्रकार की व्याख्या की जा सकती है कि सबसे पहले श्वास-प्रश्वास की गति का एक तरफ होने का उपक्रम हो जायगा।
जब मन विभिन्न दिशाओं में न जाकर एक ओर होकर एक ही दृढ़ इच्छाशक्ति में परिणत हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण शक्ति एक तरफ होकर विद्युत के समान गति प्राप्त करता है। साधक की साधना का उद्देश्य इसी इच्छा शक्ति को ही प्राप्त करना है। प्राणायाम विधि की इस प्रकार शारीरिक विद्या की सहायता से व्याख्या की जा सकती है, प्राणायाम द्वारा शरीर में एक प्रकार की गति उत्पन्न की जा सकती है, श्वास-प्रश्वास यन्त्र के ऊपर अत्यधिक विस्तार करके शरीर में वर्तमान चक्रों को भी वश में लाने के लिये सहायता मिलती है।
हम जो कुछ देखते हैं, कल्पना करते हैं, अथवा कोई स्वप्न देखते हैं, सब आकाश तत्व में अनुभव करना होता है। यह दृश्यमान आकाश जो साधारणतया प्रत्येक को दिखलाई देता है, उसका नाम (महाकाश) है। साधक जब दूसरे के मन के भाव को प्रत्यक्ष करता है, तब वह उसको अपने चिदाकाश में पाता है जिस समय हमारा आत्मा सत स्वरूप में प्रकाशित होता है, उस समय उसका नाम ‘चिदाकाश’ दिया जाता है। जिस समय कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है और जितने विषयों का ज्ञान होता है, वह सब चिदाकाश से होता है। जब हम अचेत पड़े रहते हैं, उस समय हमारा आत्मा सत स्वरूप में प्रकाशित होता है। जब कुण्डलिनी शक्ति की सीमा मस्तिष्क में पहुँच जाती है उस समय साधक अलौकिक विषय शून्य ज्ञान अनुभव करता है।
हम बाहर से जिस वस्तु को देख या सुन सकते हैं वह सबका सब ही पहले शरीर के भीतर और अन्त में मस्तिष्क में पहुँचता है। इसके अतिरिक्त बाहर से जो क्रियाएं होती हैं, वह सब मस्तिष्क के भीतर से बाहर आती हैं। मेरु मज्जा में स्थित ‘ज्ञानात्मक’ व ‘क्रियात्मक’ यह दोनों तरह के स्नायुगुच्छ योगियों की भाषा में क्रमशः ईड़ा और पिंगला नाड़ी के नाम से कहे जाते हैं। इन दानों तरह की नाड़ियों के भीतर से ऊपर बताये हुये शक्ति प्रवाह का मध्यवर्ती पदार्थ न रहने पर भी मस्तिष्क के चारों तरफ विभिन्न प्रकार के संवाद का भेजना और अनेक स्थानों से संवाद का आना इस मस्तिष्क में ही विभिन्न प्रकार से संवाद पहुँचाने का काम फिर कैसे नहीं हो सकता है? प्रकृति में तो इस प्रकार के दृश्य होते दिखाई देते हैं। इसमें सफल हो जाने पर मनुष्य सबके सब भौतिक बन्धनों से छूट जाता है। पर प्रश्न हो सकता है, कि इसमें सफल होने का उपाय क्या है? उत्तर में दृढ़तया कहा जा सकता है, कि मेरुदण्ड के मध्य में स्थित सुषुम्ना के बीच में से यदि स्नायु प्रवाह चलाया जा सके तो यह समस्त प्रश्न हल हो सकता है। मन की शक्ति से ही यह स्नायु जाल निर्माण किया गया है। इस मन को ही यह जाल छिन्न-भिन्न करके इस नाड़ी की सहायता न लेकर अपना काम करने की शक्ति प्राप्त करनी होगी। बस, जिस समय मन में यह सामर्थ्य आ गई कि उसी समय सम्पूर्ण ज्ञान हमारे अधीन हो जायगा। इसलिये सुषुम्ना नाड़ी को वश में करने की आवश्यकता होती है।
साधारण लोगों का निचला भाग बद्ध रहता है, जिससे उसके द्वारा कुछ भी कार्य नहीं होता है। इस सुषुम्ना का द्वार खोलकर उसके द्वारा स्नायु प्रवाह को चलाना एक निर्दिष्ट प्रणाली है उस प्रणाली में सफल होने पर ही स्नायु प्रवाह इसके भीतर से चल सकता है। उस समय इस केन्द्र से एक तरह की क्रिया होती है, जिसको दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। उसमें एक को ज्ञान विरहित गति युक्त केन्द्र और दूसरे को चैतन्यमय केन्द्र कहते हैं। सबका विषय ज्ञान, हमारे ऊपर जो बाहर से आघात करता है, उसका ही प्रतिघात मात्र है। जहाँ पर यह विषयानुभूति संस्कार सृष्टि संचित रहती है, उसको ‘मूलाधार’ कहते हैं। और इस जगह पर जो क्रियाशक्ति संचित रहती है उसको ही ‘कुण्डलिनी’ कहते हैं।
सम्भवतः शरीर के भीतर स्थित सम्पूर्ण गति शक्तियाँ इस कुण्डल के आकार में इसी स्थान पर संचित रहती हैं। क्योंकि बाहरी वस्तुओं के विषय में दीर्घकाल तक विचार करने के अनन्तर यह मूलाधार चक्र उष्ण होते देखा गया है। यदि इस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करके ज्ञानपूर्वक सुषुम्ना नाली के भीतर एक केन्द्र से दूसरे केन्द्र तक ले जाया जावे, तो इससे अति तीव्र प्रतिक्रिया उपस्थित हो जाती है। जब कुण्डलिनी शक्ति का एक सामान्य अंश नसों के बीचो−बीच होकर प्रवाहित होता है, उस समय वह ही स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से कहा जाता है। परन्तु बहुत काल पूर्ण ध्यान से सञ्चित शक्ति सुषुम्ना मार्ग से भ्रमण करती है। उस समय जो भ्रमण होता है, या परिवर्तन होता है, वह स्वप्न अथवा कल्पना के नाम से, अथवा ऐन्द्रिक ज्ञान की क्रिया से अनन्त गुणा श्रेष्ठ होता है, इनको ही अतीन्द्रिय अनुभव कहते हैं। इसी समय ही साधक को ‘ज्ञानातीत’ व ‘पूर्ण चैतन्य’ अवस्था प्राप्त होती है। जब वह सम्पूर्ण ज्ञान व सम्पूर्ण अनुभूति के केन्द्र स्वरूप मस्तिष्क में पहुँचती हैं उस समय मानों माथे से ही एक महान ज्योति का प्रकाश होता है। इसे प्राणायाम का फल, ज्ञानालोक या आत्मानुभूति कहा गया है।
(पं. तुलसीराम शर्मा वृन्दावन)
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया। कौरव हार गये और पाण्डव जीत कर राज सिंहासन के स्वामी हो गये। युधिष्ठिर ने राज्य करना आरम्भ किया। परन्तु उनके मन में न सुख था, न शान्ति। रह-रह कर उनको इस बात का ध्यान आता था कि यह विजय उनको कितनी महंगी पड़ी है। जो राज्य सम्बन्धियों और निर्दोष मनुष्यों का रक्त बहा कर प्राप्त किया जावे, वह किस काम का? कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा :—”तुम्हारे मन में अशान्ति है। तुम भीष्म जी के पास जाओ और अपनी कठिनाई का वर्णन करो। वे तुम्हें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जायेंगे। धर्म का ज्ञान रखने वालों में भीष्म सबसे श्रेष्ठ हैं। जब वे नहीं रहेंगे तो संसार ऐसा तमोमय हो जायगा, जैसे चन्द्रमा के न रहने से रात्रि हो जाती है। भीष्म जीवन और मृत्यु के बीच लटक रहे हैं। जाओ, उनसे जो कुछ पूछना है, पूछ लो।” युधिष्ठिर कृष्ण, कृप और पाण्डवों के साथ कुरुक्षेत्र में पहुँचे। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए भीष्म ने जो उपदेश उस समय दिये, उनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं जीवन का रहस्य जैसा इसे भीष्म ने समझा था, इन उपदेशों में वर्णन किया गया है :—
“सत्य धर्म सब धर्मों से उत्तम धर्म है। ‘सत्य’ ही सनातन धर्म है। तप और योग, सत्य से ही उत्पन्न होते हैं। शेष सब धर्म, सत्य के अंतर्गत ही हैं।”
“सत्य बोलना, सब प्राणियों को एक जैसा समझना, इन्द्रियों को वश में रखना, ईर्ष्या द्वेष से बचे रहना क्षमा, शील, लज्जा, दूसरों को कष्ट न देना, दुष्कर्मों से पृथक रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस, विद्या-यह तेरह सत्य धर्म के लक्षण हैं। वेद सत्य का ही उपदेश करते हैं। सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान सत्य का फल होता है।”
‘सत्य ब्रह्म है, सत्य तप है, सत्य से मनुष्य स्वर्ग को जाता है। झूठ अन्धकार की तरह है। अन्धकार में रहने से मनुष्य नीचे गिरता है। स्वर्ग को प्रकाश और नरक को अन्धकार कहा है।”
“ऐसे वचन बोलो जो, दूसरों को प्यारे लगें। दूसरों को बुरा भला कहना, दूसरों की निन्दा करना, बुरे वचन बोलना, यह सब त्यागने के योग्य हैं। दूसरों का अपमान करना, अहंकार और दम्भ, यह अवगुण है।”
“इस लोक में जो सुख कामनाओं को पूरा करने से मिलता है और जो सुख परलोक में मिलता है, वह उस सुख का सोलहवाँ हिस्सा भी नहीं है जो कामनाओं से मुक्त होने पर मिलता है।”
“जब मनुष्य अपनी वासनाओं को अपने अन्दर खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने सब अंग भीतर को खींच लेता है, तो आत्मा की ज्योति और महत्ता दिखाई देती है।”
“मृत्यु और अमृतत्व—दोनों मनुष्य के अपने अधीन हैं। मोह का फल मृत्यु और सत्य का फल अमृतत्व है।”
“संसार को बुढ़ापे ने हर ओर से घेरा है। मृत्यु का प्रहार उस पर हो रहा है। दिन जाता है, रात बीतती है। तुम जागते क्यों नहीं? अब भी उठो। समय व्यर्थ न जाने दो। अपने कल्याण के लिए कुछ कर लो। तुम्हारे काम अभी समाप्त नहीं होते कि मृत्यु घसीट ले जाती है।”
“स्वयं अपनी इच्छा से निर्धनता का जीवन स्वीकार करना सुख का हेतु है। यह मनुष्य के लिए कल्याणकारी है। इससे मनुष्य क्लेशों से बच जाता है। इस पथ पर चलने से मनुष्य किसी को अपना शत्रु नहीं बनाता। यह मार्ग कठिन है, परन्तु भले पुरुषों के लिए सुगम है। जिस मनुष्य का जीवन पवित्र है और इसके अतिरिक्त उसकी कोई सम्पत्ति नहीं, उसके समान मुझे दूसरा दिखाई नहीं देता। मैंने तुला के एक पल्ले में ऐसी निर्धनता को रक्खा और दूसरे पल्ले में राज्य को। अकिंचनता का पल्ला भारी निकला। धनवान पुरुष तो सदा भयभीत रहता है, जैसे मृत्यु ने उसे अपने जबड़े में पकड़ रखा है।”
“त्याग के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। त्याग के बिना परम आदर्श की सिद्धि नहीं होती। त्याग के बिना मनुष्य भय से मुक्त नहीं हो सकता। त्याग की सहायता से मनुष्य को हर प्रकार का सुख प्राप्त हो जाता है।”
“वह पुरुष सुखी है, जो मन को साम्यावस्था में रखता है, जो व्यर्थ चिन्ता नहीं करता। जो सत्य बोलता है। जो साँसारिक पदार्थों के मोह में फँसता नहीं, जिसे किसी काम के करने की विशेष चेष्टा नहीं होती।”
“जो मनुष्य व्यर्थ अपने आपको सन्तप्त करता है, वह अपने रूप रंग, अपनी सम्पत्ति, अपने जीवन और अपने धर्म को भी नष्ट कर देता है। जो पुरुष शोक से बचा रहता है, उसे सुख और आरोग्यता, दोनों प्राप्त हो जाते हैं।”
“सुख दो प्रकार के मनुष्यों को मिलता है। उनको जो सबसे अधिक मूर्ख हैं, दूसरे उनको जिन्होंने बुद्धि के प्रकाश में तत्व को देख लिया है। जो लोग बीच में लटक रहे हैं, वे दुखी रहते हैं।”
“श्रेष्ठ और सज्जन पुरुष का चिह्न यह है कि वह दूसरों को धनवान देख कर जलता नहीं। वह विद्वानों का सत्कार करता है और धर्म के सम्बन्ध में प्रत्येक स्थान से उपदेश सुनता है।”
“जो पुरुष अपने भविष्य पर अधिकार रखता है (अपना पथ आप निश्चित करता है, दूसरों की कठपुतली नहीं बनता) जो समयानुकूल तुरन्त विचार कर सकता है और उस पर आचरण करता है, वह पुरुष सुख को प्राप्त करता है। आलस्य मनुष्य का नाश कर देता है।”
“भोजन अकेले न खाये। धन कमाने का विचार करे तो किसी को साथ मिला ले। यात्रा भी अकेला न करे। जहाँ सब सोये हुए हों, वहाँ अकेला जागरण न करे।”
“जो पुरुष अपने आपको वश में करना चाहता है उसे लोभ और मोह से मुक्त होना चाहिए।”
“दम के समान कोई धर्म नहीं सुना गया है। दम क्या है? क्षमा, धृति, वैर-त्याग, समता, सत्य, सरलता, इन्द्रिय संयम, कर्म करने में उद्यत रहना, कोमल स्वभाव, लज्जा, बलवान चरित्र, प्रसन्नचित्त रहना, सन्तोष, मीठे वचन बोलना, किसी को दुख न देना, ईर्ष्या न करना, यह सब दम में सम्मिलित हैं।”
“कामनाओं को त्याग देना; उन्हें पूरा करने से श्रेष्ठ है। आज तक किस मनुष्य ने अपनी सब कामनाओं को पूरा किया है? इन कामनाओं से बाहर जाओ। पदार्थ के मोह को छोड़ दो। शान्त चित्त हो जाओ।”
“लोग अनेक प्रकार के मोह में जकड़े हुए हैं। उनकी दशा ऐसी है, जैसी रेत के पुल की जो नदी के वेग के साथ नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार तिल कोल्हू में पेरे जाते हैं, उसी प्रकार वे मनुष्य पेरे जाते हैं जो संसार के मोह में फँस जाता है और निकल नहीं सकता। वैसी ही दशा उस मनुष्य की है जो मोह में फँसा हुआ है।”
“गृहस्थाश्रम से बढ़कर कोई धर्म नहीं। परन्तु जब गृहस्थ मोह में फँस जाता है, तो नाना प्रकार के दुख झेलता है और आवागमन के चक्कर में पड़ जाता है। मन और इन्द्रियों को वश में रखना गृहस्थ का तप है। मृत्यु के पीछे माता, पिता, भाई, बंधु साथ नहीं जाते, न कुछ सहायता कर सकते हैं। केवल धर्म ही साथ जाता है और सहायता देता है। अनुचित मोह को छोड़, धर्मानुसार जीवन व्यतीत करने से ही इस जीवन में सुख मिलता है और इससे पीछे कल्याण होता है। जो पुरुष ऐसा नहीं करता उसे न तो इस लोक में सुख मिलता है और न इसके पीछे मिलेगा।”
(श्री संत तुकडोली महाराज)
मनुष्य को उसकी योग्यता के अनुसार ही ईश्वर शरीर-स्वास्थ्य, धारणा और इंद्रियाँ देता है। वास्तव में यह सारी चीजें परमात्मा द्वारा दान स्वरूप नहीं बल्कि उसकी योग्यता द्वारा प्राप्त इच्छा के अनुसार ही मिलती हैं।
समय को बेकार खोना, मनोवासना के गुलाम होकर अपने जीवन को नष्ट करना है।
जिस वाद-विवाद में कोई अर्थ-निष्पत्ति न हो वह बेकार की बड़-बड़ है, जिससे शक्ति और आयुष्य का व्यर्थ नाश होता है।
लाख मिथ्या शब्द बोलकर अपनी पंडिताई बताने की अपेक्षा एक सत्य बोलना अधिक कीमती और सम्मानास्पद है। केवल बुद्धि की कवायद कर मिथ्या को सत्य का रूप देना यह उन्नति की दृष्टि से अत्यन्त हेय है।
सभा मंच पर खड़े होकर सफाईदार व्यर्थ की लम्बी-चौड़ी बातें कर शेखी बघारने की अपेक्षा अपने घर की साफ-सफाई करके अधिक लोग शिक्षा ग्रहण करेंगे, ऐसा विश्वास है।
देवादिकों के अवतार हम उनके पुरुषार्थ से ही मानते हैं। उसी प्रकार संसार के किसी भी मनुष्य की योग्यता उस के कार्य-कलापों पर ही निर्भर है, केवल बातों पर नहीं।
आलीशान परन्तु मलिन राज भवन की अपेक्षा घास-फूँस की स्वच्छ और सुव्यवस्थित कुटिया को आरोग्य और मानसिक शान्ति के लिए अधिक हितकर होने के कारण में अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ। वैसे ही बिना धोये हुए, अन्न से दूषित रेशमी वस्त्र को नित्य पहनने की अपेक्षा प्रतिदिन धोकर स्वच्छ की हुई खादी की धोती भोजन के समय पहनना अधिक पसन्द है।
अपनी बुद्धि का उपयोग किसी वज्र मूर्ख के सन्मुख करना जैसे बेकार है, वैसे ही अपने साहस का मृत्यु के सामने प्रदर्शन करते हुए पर्वत से नीचे कूदकर अपनी जान गँवाना व्यर्थ है। हमें पात्रता देखकर, बुद्धि और अवसर देखकर ही धैर्य अथवा साहस का उपयोग करना चाहिए।
श्रेष्ठ व्यक्ति अपने जीवन को केवल जीने के लिए ही नहीं, अपितु महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उपयोग करते हैं और समय आने पर प्राण देकर भी अपने उद्दिष्ट कार्य को पूर्ण करते हैं।
मनुष्य को विद्याध्ययन की अपेक्षा सरल व्यवहार से ही अधिक ज्ञान प्राप्त हो सकता है पर वह सत्संगति द्वारा ही प्राप्त होता है।
अज्ञानी लोग वस्तु के स्थिति परिवर्तन को ही मृत्यु मानकर उसके लिए शोक करते हैं, पर ज्ञानी मनुष्य मृत्यु को नये रूप में कार्य संपन्न करने का अवसर देने वाला देवदूत समझकर उसका कभी दुःख नहीं मानते और इसीलिए वे मृत्यु को यत्किंचित् क्षुद्र वस्तु समझते हैं।
(आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री)
आजकल के अधिकाँश स्त्री-पुरुष स्वतन्त्र और बुद्धिमान नहीं होते, वह उड़ती हुई पतंग के समान होते हैं और उस पतंग की डोरी पुरोहितों और राजनीतिज्ञों के हाथ में होती है। वह विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा अन्य विषयों का ज्ञान न होने के कारण मुँड़ते तथा मूर्ख बनाये जाते है।
मनुष्य जाति की आधी त्रुटियाँ अज्ञानवश और शेष आधी अहंकार के कारण होती हैं। आचरण के ही समान ज्ञान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वास्तविक में यह दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। जैसा कि लेसिंग का कहना है। “ज्ञान का उद्देश्य सत्य का अन्वेषण करना है, और सत्य ही आत्मा की आवश्यकता है।” फारसी कवि सादी भी निम्न शब्दों में सभी को अत्यन्त उत्साह के साथ ज्ञान प्राप्त करते रहने की ही प्रेरणा करता है, “तुझको मोमबत्ती के समान ज्ञान के अन्वेषण में पिघल जाना चाहिये। यदि तुझे इसके लिए संसार भर में भी यात्रा करनी पड़े तो तेरा यही कर्त्तव्य है।
ज्ञान के लिये कभी समाप्त न होने वाले युद्ध में आप प्रतिदिन नियमानुसार लगे रहो। अपने समय का कुछ भाग अध्ययन अथवा प्रयोग के लिये दैनिक दिया करो। शरीर को प्रतिदिन कई-कई बार भोजन दिया जाता है, बुद्धि को भी मत भूखी रखो।
बहुत से स्त्री-पुरुषों की मनोवृत्ति इतनी व्यावसायिक होती है कि वह ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते जिससे पैसे की आय न हो। उनका विश्वास है कि जिस अध्ययन और मस्तिष्क के कार्य के बदले में रुपये के लिये ही कठिन परिश्रम करके शेष समय को खेल-कूद आमोद-प्रमोद में व्यतीत किया करते हैं। उनके जीवन का यही नियम जान पड़ता है। बुद्धि का मूल्य उनकी दृष्टि में भौतिक उन्नति करने में ही है। वह व्यक्तिगत मानसिक उन्नति को मूर्खतापूर्ण कार्य समझते हैं। यही कष्टकर भौतिक मनोवृत्ति समाज के सभी वर्गों में गहरी जड़ जमाये हुये हैं। धनी और निर्धन, सबमें यही रोग है। एक वृद्धा मजदूरनी ने मुझसे अपने पुत्र की कभी-कभी सस्ती पुस्तकें खरीदने की प्रकृति के विषय में शिकायत करते हुये कहा था, “वह पुस्तकों में रुपया बरबाद किया करता रहता है। भला उनसे उसका क्या लाभ होना है? वह एक बढ़ई है, अध्यापक नहीं।” हमको नित्य ही ऐसे व्यक्ति मिला करते हैं, जिनका जीवन उनके व्यापार (चाहे वह कुछ भी क्यों न हो) और तुच्छ आमोद-प्रमोद की चक्की में इसी प्रकार पिस कर व्यर्थ में व्यतीत होता रहता है।
इस प्रकार के एकपक्षीय अत्यन्त दुनियादार मनुष्यों से मैं यही कहूँगा, “छाया को पकड़ने और असली तत्व के छूटने से पूर्व ही चेत जाओ। आप अपने मस्तिष्क को रुपये में परिणत कर सकते हो, किंतु इस अवस्था में आप प्रकृति के इस दुर्लभ उपहार का दुर्व्यवहार और दुरुपयोग करते हो। बुद्धि से विशेष रूप से उन्नति और सामाजिक सेवा के साधन के रूप में ही काम लेना चाहिये। वह आपके नगर वासियों के विरुद्ध षडयन्त्र करने का औजार न बने। यदि तुम सभी प्रकार के मस्तिष्क के कार्य को केवल रुपया पैदा करने का साधन ही समझते हो, तो तुम पतित और दयनीय वैश्या के समान हो।
यदि आप सर्वतोमुखी मानसिक उन्नति के कर्त्तव्य से जी चुराते हो तो आप अपने को उस अकथनीय आनन्द से वंचित करते हो, जिसको संसार की बड़ी से बड़ी सम्पत्ति से भी मोल नहीं लिया जा सकता। अतएव रुपयों के बड़े-बड़े थैलों के बोझ के नीचे दबे हुये बौद्धिक बौने बने रहने में सन्तुष्ट मत रहो। अपने मस्तिष्क के अधिक से अधिक विकास के लिये भी प्रयत्न करते चलो।
गायत्री चर्चा-
आगामी गायत्री जयंती (जे. सुदी 10 सं. 2010) गायत्री संस्था के सदस्यों के लिए बहुत ही प्रसन्नता एवं सफलता का शुभ दिन होगा। उस दिन कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी। उस दिन निम्नलिखित आयोजन होंगे।
(1) सहस्रांशु गायत्री ब्रह्म यज्ञ जो गत वर्ष प्रारम्भ हुआ था उसकी पूर्णाहुति होगी। 125 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास यह तीनों ही कार्यों का अधिकाँश भाग पूरा हो चुका है। जो थोड़ा सा शेष रहा है वह भी आगामी गायत्री जयन्ती तक निश्चित रूप से पूरा हो जायगा।
(2) गायत्री मन्त्र लेखन यज्ञ के लिए 24 लक्ष मन्त्रों का संकल्प था वह बहुत पहले ही पूरा हो चुका है। आगामी गायत्री जयन्ती तक 125 लाख (सवा करोड़) मन्त्र लिख जाने की सम्भावना है। इसकी भी तभी पूर्णाहुति होगी।
(3) हमारे अपने 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण पूरे हो गए हैं उनकी पूर्णाहुति भी उसी समय होगी।
(4) तब तक गायत्री मन्दिर बन चुकेगा और गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी उसी पुण्य पर्व पर होगी।
यह चारों ही कार्य परम सात्विकता विशिष्ट तपश्चर्या, ब्रह्म परायणता एवं शिव संकल्प से परिपूर्ण हैं। इसकी पूर्णाहुति भी तदनुरूप ही होगी। इनमें न तो तामसिक अपव्यय एवं जमघट होंगे और न राजसिक उत्सव एवं प्रदर्शनों के लिये विशेष स्थान होगा। इस आयोजन में ऋषि कल्प सात्विकता की ही प्रधानता रहेगी क्योंकि आध्यात्मिकता, तपस्या और ब्रह्मवर्चस् का केन्द्र यही है। इस अवसर पर निम्न आयोजन होंगे।
(1) हमारा 24 दिन का पूर्ण निराहार उपवास होगा। वैशाख सुदी 15 से लेकर जेष्ठ सुदी 10 तक 24 दिन केवल गंगाजल पीकर रहेंगे तथा ऐसी विशिष्ट साधना करेंगे जिससे आत्मशुद्धि एवं लोक सेवा की दिशा में हमारी और अधिक प्रगति हो। इस 24 दिनों का जो विशेष कार्यक्रम है वह सार्वजनिक न होगा।
(2) सार्वजनिक यज्ञ, वेद पाठ, प्राण प्रतिष्ठा, मूर्ति स्थापना, रुद्राभिषेक, प्रवचन, सत्संग, कीर्तन आदि अनेक आयोजन अधिकारी विद्वानों द्वारा अन्तिम तीन दिन होंगे।
(3) भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रमुख तीर्थों का जल एवं प्रायः सभी सिद्धि पीठों की रज एकत्रित करके सभी तीर्थों एवं सिद्ध पीठों का प्रतिनिधित्व इस उत्सव में अवस्थित रहेगा।
(4) विश्वव्यापी महात्माओं एवं महापुरुषों के आन्तरिक आशीर्वाद प्राप्त करके इस पूर्णाहुति को सफल बनाया जायगा।
(5) इस युग के एक महान सिद्धि पुरुष की धूनी की अग्नि की यहाँ स्थापना होगी। यह अग्नि सात सौ वर्ष से अखण्ड रूप से जलती आ रही है। इस पर अनेक महात्मा तप चुके हैं।
(6) इस महा सत्र की सात्विकता एवं महानता सुरक्षित रहे इसलिए इस आयोजन में केवल वे ही व्यक्ति सम्मिलित किये जायेंगे जिनकी पिछली गायत्री उपासना सन्तोषजनक होगी। ऐसे व्यक्ति भी 125 से अधिक सम्मिलित न किये जावेंगे।
बिना पूर्व स्वीकृति प्राप्त किये कोई सज्जन इस आयोजन में सम्मिलित न हो सकेंगे। इच्छुकों की संख्या निश्चय ही, निर्धारित संख्या की अपेक्षा कई गुनी अधिक होगी। पर उपयुक्त व्यक्तियों को ही स्वीकृति मिलेगी। इसलिए जिन्हें उस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए मथुरा आना हो वे अपने साधना सम्बन्धी परिचय के साथ पत्र लिख कर स्वीकृति प्राप्त कर लें। संख्या पूरी हो जाने के पश्चात् किसी को स्वीकृति न मिल सकेगी।
यह उत्सव प्रदर्शनों से रहित होगा, परन्तु तात्विक दृष्टि से यह बहुत ही महत्वपूर्ण होगा, इसकी सूक्ष्म शक्ति अत्याधिक होगी और इसके परिणाम भी असाधारण ही होंगे। आडम्बरों की दुनिया से बचते हुए ही ब्रह्म शक्ति की साधना हो सकती है इस तथ्य को हमें भली प्रकार समझ लेना है।
जिस साधना एवं तपश्चर्या के प्रति फलस्वरूप यह गायत्री तीर्थ बनने जा रहा है यह आध्यात्मिक जगत के लिए एक शुभ सन्देश है। गायत्री संस्था के सदस्यों के लिए तो यह विशेष प्रसन्नता की बात है कि उनने, उनकी सम्मिलित भावना ने, एक ऐसा केन्द्र स्थान विनिर्मित किया है जो असंख्यों आत्माओं को शान्ति देने में समर्थ हो सकेगा। जहाँ इसकी शीतल छाया से हजारों वर्षों तक असंख्य लोगों को सत्परिणाम प्राप्त होंगे वहाँ इस संस्था के सदस्य भी लाभ से वंचित न रहेंगे।
इस पूर्णाहुति पर्व के आयोजन में अभिरुचि रखने वाले सज्जनों से हमारी निम्न प्रार्थनाएं हैं-
(1) अपने समीपवर्ती तीर्थों का जल एवं जिन स्थानों में किन्हीं विशिष्ट आत्माओं ने तपस्या की हो उन स्थानों की मिट्टी थोड़ी मात्रा में हमारे लिए भिजवाने का प्रयत्न करें या जब यहाँ पधारें तब साथ लावें। इसकी पूर्व सूचना हमें पहले से ही दे दें। ताकि उन स्थानों के सम्बन्ध में हम निश्चिन्त हो जावें।
(2) अपने क्षेत्र के ऐसे ज्ञानवृद्ध, आयुवृद्ध, लोक सेवी एवं पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पते हमें लिखें जिनसे इस पूर्णाहुति के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया जाना उचित हो।
(3) यदि आप इस आयोजन में सम्मिलित होना चाहते हों तो अपने लिए समय रहते स्वीकृति प्राप्त कर लें ताकि पीछे पश्चाताप न करना पड़े।
(4) अभी से लेकर आगामी गायत्री जयन्ती तक के समय में लगभग 6 मास है। इस बीच में आप (अ) गायत्री मन्त्र लेखन यज्ञ में अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने, (ब) गायत्री साहित्य के अधिक पाठक बढ़ाने, (स) अधिक गायत्री उपासक बनाने, (द) स्वयं अपनी साधना तथा तपश्चर्या पर अधिक ध्यान दें।
आपके सहयोग से गायत्री संस्था द्वारा अब तक महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। आगामी गायत्री जयन्ती की आयोजन की महानता भी असाधारण है। उसके लिए सभी सदस्यों तथा सहयोगियों की सक्रिय सहायता आवश्यक है। आशा है आप सब लोग अपना भाग एवं उत्तरदायित्व उत्साहपूर्वक पूरा करेंगे।
-श्रीराम शर्मा आचार्य।
परमात्मा की आकृति चराचरमय विश्व ब्रह्माण्ड में देखना ऐसी साधना है जिसके द्वारा सर्वत्र पर आत्मा का अनुभव करने की चेतना जागृत हो जाती है। यही विश्व मानव की पूजा है, इसे ही विराट रूप दर्शन कहते है। रामायण में भगवान राम ने अपने जन्म काल में कौशल्या को विराट रूप दिखाया है। एक बार भोजन करते समय भी राम ने माता को विराट रूप दिखाया था। उत्तर काण्ड में काकभुशुंडि जी के सम्बन्ध में वर्णन है कि वे भगवान् के मुख में चले गये तो उन्होंने वहाँ सारे ब्रह्माण्डों को देखा। भगवान कृष्ण ने भी इसी प्रकार कई बार अपने विराट रूप दिखाये। मिट्टी खाने के अपराध में मुँह खुलवाते समय यशोदा को रूप दिखाया। महाभारत के उद्योग पर्व में दुर्योधन ने भी ऐसा ही रूप देखा। अर्जुन को भगवान ने युद्ध समय में विराट रूप दिखाया जिसका गीता के 11 वें अध्याय में सविस्तार वर्णन है।
इस विराट रूप को देखना हर किसी के लिये सम्भव है। अखिल विश्व ब्रह्माण्ड को परमात्मा की विशालकाय मूर्ति देखना और उसके अंतर्गत— उसके अंग-प्रत्यंगों के रूप में समस्त पदार्थों को देखने की भावना ही विराट रूप दर्शन है। सर्वत्र भगवान को देखने, प्रत्येक वस्तु को, प्रत्येक स्थान को ईश्वर से ओत-प्रोत देखने की भावना करने से भगवद् बुद्धि जागृत होती है और सर्वत्र प्रभु की सत्ता व्याप्त होने का सुदृढ़ विश्वास होने से मनुष्य पाप से छूट जाता है फिर उससे पाप कर्म नहीं बन सकते। निष्पाप होने का इतना लाभ है कि उसके फलस्वरूप सब प्रकार के दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार के अभाव का नाम है—प्रकाश, और दुःख के अभाव का नाम है—आनन्द। विराट दर्शन के फलस्वरूप निष्पाप हुआ व्यक्ति सदा अक्षय आनन्द का उपयोग करता है।
गायत्री परमात्मा की शक्ति है। परमात्मा की शक्ति सर्वत्र, अणु-अणु में, विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, जो कुछ है सब गायत्री है। गायत्री के शरीर में ही यह सब जगत है, यह भावना “गायत्री का विराट दर्शन” कहलाती है। नीचे दिये हुये “गायत्री पंजर स्तोत्र’ में यही विराट दर्शन है। पंजर कहते है। ढांचे को। गायत्री का ढांचा, विस्तार सम्पूर्ण विश्व में है। यह इन स्तोत्र में बताया गया है। इस स्तोत्र का भावना सहित ध्यान करने से अन्तः लोक ओर बाह्य जगत में विराट गायत्री के दर्शन होते है। उस दर्शन के फलस्वरूप पाप करने का किसी को उसी प्रकार साहस नहीं हो सकता जैसे कि पुलिस से घिरा हुआ व्यक्ति चोरी करने का प्रयत्न नहीं करता।
अथ गायत्री पजञ्रम्।
भूर्भूवः सुवरित्येतै निगमत्व प्रकाशिकाम्।
महर्जनरस्तण सत्य लोकोपरि संस्थिताम्॥ 1॥
भूः भुवः स्वः द्वारा निगम का प्रकाश करती है, महः, जनः, तपः, सत्यः इन लोकों से ऊपर स्थित है।
कृतगान विनोदादि कथालापन तत्पराम्।
तदित्य वां तनो गम्य तेजो रुपधराँ परम्। 2।
गान आदि से विनोद और कथा आदि में तत्पर वह वाणी और मन से अगम्य से अगम्य होने पर भी जो तेजो रूप धारण किये हुये है।
जगतः प्रसवित्रीं ताँ सवितुः सृष्टिकारणीम्।
वरेण्यं मित्यन्नमयीं पुरुषार्थफलप्रदाम्॥ 3॥
जगत का प्रसव करने वाली को सविता कहा है, वह सृष्टिकर्ता है। वरेण्यं का अर्थ अन्नमयी है वह पुरुषार्थ का फल है।
अविद्याँ वर्ण वर्ज्या च तेजोवर्द्गभ संज्ञिकाम्।
देवस्य सच्चिदानन्द परब्रह्म रसात्मिकाम्॥ 4॥
वह अविद्या है, वर्ण रहित है, तेजयुक्त है, गर्भ संज्ञा वाली है तथा सच्चिदानन्द परब्रह्म देव की रसमयी है।
घीमह्यहं स वैतद्वद्ब्रह्माद्वैतस्वरूपिणीम्।
घियो योनस्तु सविता प्रचोदयादुपासिताम्॥ 5॥
हम ध्यान करते है कि वह अद्वैत ब्रह्म स्वरूपिणी है, सविता हमारी बुद्धि को उपासना के लिए प्रेरणा देता है।
तादृगस्या विराट रूप किरीटवरराजिताम्।
व्योम केशालकाकाश रहस्यं प्रवदाम्यहम्॥ 6॥
इस प्रकार वह विराट रूप वाली है, वह सुन्दर किरीट धारणा करती है। व्योम केश हैं, आकाश अलकें हैं, इस प्रकार इसका रहस्य कहा जाता है।
मेघ भ्रुकुटिकाक्रान्त विधिविष्णुशिवार्चिताम्।
गुरुभार्गवकर्णाताँ सोमसूर्याग्निलोचनाम्॥ 7॥
भौहों से आक्रान्त मेघ है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव से जो अर्चित है, गुरु, शुक्र कान हैं, सोम, सूर्य, अग्नि जिसके नेत्र हैं।
इडापिंगलसूक्ष्माभ्याँ वायुनासा पुटान्विताम्।
संध्याद्विरोष्ठपुटिताँ लसद्वाग्भूप जिह्विकाम्॥ 8॥
इडा, पिंगला दोनों नासापुष्ट हैं। दोनों सन्ध्या दोनों ओष्ठ हैं, उपजिह्वा ही वाणी है।
सन्ध्यासौ द्य मणो कष्ठ लसद्वाहुसमन्विताम्।
पर्ज्जन्य हृदयासक्त वसुसुस्तनभण्डलाम्॥ 9॥
यह सन्ध्या द्यु है, मणि से कष्ठ शोभित है। बाहु शोभायुक्त हैं तथा पर्जन्य हृदय है और स्तन मण्डल वसु है।
आकाशोदर वित्रस्तः नाभ्यान्तरदेशकाम्
प्राजापत्याख्य जघनाँ कटींद्राणितिसंज्ञिकाम्।॥ 10॥
आकाश उदर है, अन्तर देश नाभि है। जघन प्रजापति है, कटि इन्द्राणि है।
उरु मलय मेरुभ्याँ शोभमानाऽसुरद्विषाम्।
जानुनी जन्हु कुशिक वैश्वदेवसदाभुजाम्॥ 11॥
उरु मलय मेरु है, जहाँ असुर द्वेषी देव निवास करते हैं। जानु में जन्हु कुशिक है, भुजाएँ वैश्व देव हैं।
अयनद्वय जंघाद्यं खुराद्य पितृसंज्ञिकाम्।
पदाँघ्रि नख रोमाद्य भूतलद्रु मलाँछिताम्॥ 12॥
जंघाओं के दोनों आदि स्थान अयन हैं। खुर आदि पितृ हैं। पद, अंघ्रि, नख, रोम आदि पृथ्वी तल के पेड़ आदि कहे हैं।
गृहराश्यदेवर्षि मूर्ति च पर संज्ञिकाम्।
तिथिमासस्तुवर्षाख्य सुकेतुनिमिपात्मिकाम्॥
माया कल्पित वैचित्र्य सन्ध्याच्छादन संवृताम्॥ 13॥
ग्रह, राशि, ऋक्ष, देव, ऋषि, पर संज्ञक शशि की मूर्तियाँ हैं, तिथि, मास, ऋतु, वर्ष तथा सुकेतु आदि निमेष हैं।
ज्वलत्कालानलप्रभाँ तडित्कोटिसमप्रभाम्।
कोटिसूर्यप्रतीकाशाँ चन्द्रकोटिसुशीतलम्॥ 14॥
कालाग्नि की तरह ज्वलन है, करोड़ों बिजलियों के समान प्रभा युक्त है, करोड़ों सूर्यों की तरह प्रकाशवान है और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल है।
सुधामण्डलमध्यस्थाँ सान्द्रानन्दाऽमृतात्मिकाम्।
प्रागतीताँ मनोरम्याँ वरदाँ वेद मातरम्॥ 15॥
सुधा मण्डल के मध्य में आनन्द और अमृत युक्त है, प्राक है, अतीत है, मनोरम है, वरदा है और वेदमाता है।
ततस्तैरंगषंकस्यात्तैरेव व्यापकत्रयम्।
पूर्वोक्त देवताँ ध्यायेत्साकारगुणसंयुताम्॥ 16॥
इसके छः अंग हैं, यह तीनों भुवनों में व्यापक है। इन पूर्वोक्त गुणों से संयुक्त देवता का ध्यान करना चाहिये।
पंचवक्राँ दसभुजाँ त्रिपंचनयनैर्युताम्।
मुक्ताविद्रु मसौवर्णा सितशुभ्रसमाननाम्॥ 17॥
पाँच मुँह हैं, दस भुजा हैं, पन्द्रह नेत्र हैं और मुक्त, विद्रम के तुल्य सुवर्ण, सफेद तथा शूम्र आनन है।
आदित्य पथ गामिन्याँ स्मरेद्ब्रह्मस्वरूपिणीम्।
विचित्रमन्त्र जननीं स्मरेद्विद्याँ सरस्वतीम्॥ 18॥
वह सूर्य मार्ग से गमन करती है, उस ब्रह्म स्वरूपिणी का स्मरण करना चाहिये, उस मन्त्रों की जननी विद्या सरस्वती का स्मरण करना चाहिए।
उपरोक्त श्लोकों में गायत्री का विराट स्वरूप दिखाया गया है। इस भावना को हृदयंगम करने से सर्वत्र उस दिव्य शक्ति के दर्शन होते हैं। अणु—अणु में माता को समाया हुआ देखने वाला व्यक्ति सदा निर्भय रहता है, गुप्त रूप से भी बुरे विचार या कार्य नहीं करता एवं समस्त जड़ चेतन विश्व के त्याग एवं उदारता का सद्व्यवहार करता है। यह विराट दर्शन की मान्यता, भावना, विचार पद्धति एवं कार्य-प्रणाली साधक की अन्तरात्मा को सच्चे आनन्द से ओत-प्रोत कर सकती है।
पाप हृदय में पर, बाहर से उसे छिपाना।
अन्तर में दावानल अधरों पर मुस्काना॥
घृणा हृदय में पर वाणी में प्रेम दिखाना।
द्वेष दंभ छल में ही जीवन व्यर्थ गँवाना॥
ऐसे नर जो दिखलाते रहते आडम्बर!
अविश्वास के पात्र बने रहते जीवन भर!!
जो आत्मा को हैं असत्य का पट पहनाते।
सदा आत्म हत्यारे ऐसे नर कहलाते॥
सदा धर्म ग्रन्थों ने है इनको धिक्कारा।
ऐसे पुरुषों का जीवन पापों की कारा॥
पाप-पात्र जब क्रमशः बढ़ता ही जाता है!
नाश एक दिन अपने ही हाथों आता है!!
है प्रति जन के भाव भिन्न, मत भी न एक हैं।
क्योंकि विश्व में बिखरे जीवन पथ अनेक हैं॥
लक्ष्य भिन्न होते, गति एक नहीं रहती है।
कर्मों की धारा में मानवता बहती है॥
पर सहिष्णु नर है भेदों का सार समझते!
इनमें चलने वालों का आधार समझते!!
मत विभेद के होने पर भी तो उदार नर।
मुखरित करते सदा समन्वय का मंगल स्वर॥
क्योंकि आत्मा एक, एक ही ब्रह्म रूप है।
व्यापक जग में एक रूप के बहु स्वरूप है।
औरों के अनुकूल कर्म जो अपने करते!
ऐसे नर हैं जग जीवन में मधु रस भरते!!
बुद्धिमान नर स्वयं दूसरों में मिल जाता।
फिर विभिन्न तत्वों को लाकर पास मिलाता॥
है सहयोग, संतुलन और समन्वय लाता।
जीवन की कटुता हरता है, मोद बढ़ाता॥
उस साधक के मित्र सभी जग में होते हैं!
उसके चरणों में चारों ही फल सोते हैं!!
*समाप्त*
[पं. शिव शंकर मिश्र, एम. ए.]