गायत्री महाविद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न
*******
बड़ा सैट-
1- गायत्री महाविज्ञान [प्रथम भाग] गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
2- गायत्री महाविज्ञान [द्वितीय भाग] गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी, गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्रनाम आदि की भाषा टीका समेत संकलन।
3- गायत्री महाविज्ञान [तृतीय भाग] इसमें गायत्री द्वारा योग साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
4- गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री की कृपा से अनेक प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले तथा सुख सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के निजी अनुभव इस पुस्तक में हैं।
5- गायत्री चित्रावली- बढ़िया आर्ट पेपर पर छपे हुए बड़े ही कलापूर्ण गायत्री के 24 तिरंगे चित्र और उनके मार्मिक रहस्य एवं विवेचना की पुस्तक।
6- गायत्री का मन्त्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की शास्त्रीय विस्तृत व्याख्या है। राक्षस राज रावण, सायण, उव्वट, महीधर, व्यास, वशिष्ठ, शंख भारद्वाज, याज्ञवलक्य आदि के द्वारा किए हुए गायत्री के अनेकों अर्थ।
छोटा सैट-
7- गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियों तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव।
8- गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत गायत्री का गुप्त मर्म।
9- गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
10- वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री स्तवन एवं गायत्री चालीसा का संग्रह।
11- गायत्री के चौदह रत्न। प्रथम भाग- गायत्री के ॐ, भूः, भुर्वः, स्वः, तत्, सवितुः वरेण्यं, भर्गो शब्दों की व्याख्या।
12- गायत्री के चौदह रत्न। द्वितीय भाग- गायत्री के देवस्य, धीमहि, धियो, यो नः, प्रचोदयात् शब्दों की व्याख्या।
13- अनादि गुरुमन्त्र गायत्री- गायत्री साधक के लिए गुरु की आवश्यकता का प्रतिपादन।
14- विपत्ति निवारिणी गायत्री- सम्पूर्ण विपत्तियों और कष्टों को नष्ट करने वाला तत्वज्ञान।
15- स्त्रियों को गायत्री का अधिकार- स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही गायत्री का अधिकार है। इसकी शास्त्रीय पुष्टि।
16- सचित्र गायत्री- ध्यान करने योग्य गायत्री के 16 रंगीन चित्रों की पुस्तक।
17- सर्व शक्तिमान गायत्री- यह अत्यन्त सस्ती सचित्र पुस्तक ब्रह्मदान में वितरण करने योग्य है। गायत्री का तिरंगा चित्र, गायत्री चालीसा।
6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -2
युग युगों से प्यार के हम, गीत गाते आ रहे हैं।
प्यार में ही हम सभी, जीवन बिताते आ रहे हैं॥
शुष्क जीवन वह कि जिसमें, प्यार का पानी नहीं है।
प्यार नादानी नहीं है।
प्यार में भगवान रहते, प्यार तो भगवान ही है।
प्यार से पूजा, यही भगवान का सम्मान भी है॥
प्यार से रहता विलग, तो भक्त वह प्राणी नहीं है।
प्यार नादानी नहीं है।
प्यार की दुनिया अनोखी, जानते हैं जन अनेकों।
है कठिन इसमें विचरना, मानते तन मन अनेकों॥
प्यार पा लेना किसी का, बात मनमानी नहीं है।
प्यार नादानी नहीं है।
प्यार यदि होता न जग में; हम न होते जग न होता।
व्यर्थ था अस्तित्व जग का, फिर यहाँ कुछ भी न होता।
प्यार में है शक्ति जो वह विश्व ने जानी नहीं है।
प्यार नादानी नहीं है।
(श्री भगवती प्रसाद सोनी “गुँजन”)
(श्री स्वामी विद्यानन्द जी महाराज)
गीता के अनुसार हम पिछले अंक में देख चुके हैं कि धर्म का विरोध न करने वाली इच्छा भगवान् का ही रूप है ‘धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि’। दूसरे वेदादि शास्त्रों में लिखा है ‘यज्ञो वै पुरुषः’, ‘यज्ञो वै विष्णुः’। यज्ञ ही भगवान हैं। इसी से महात्मा लोग धर्मविरुद्ध काम को भी यज्ञ माना करते हैं। अर्थात् यज्ञ क्या है धर्म और काम का मेल। यज्ञ क्या है अपनी इच्छा को धर्मानुसार चलाना। धर्म का विरोध किये बिना सब कुछ करना ही तो यज्ञ है।
कुछ लोग समझते हैं कि गीता में यज्ञ की निन्दा है, गीता-धर्म से यज्ञ का विरोध है। पर सच्ची बात यह है कि गीता ने यज्ञ की महिमा को और भी अधिक चमका दिया है। गीता में यज्ञ का बड़ा व्यापक अर्थ लिया गया है। गीता में यज्ञ का ऐसा सुन्दर वर्णन हुआ है कि यज्ञ के भीतर सभी कुछ आ जाता है। यज्ञ से शरीर-यात्रा, कर्म, धर्म, सभ्यता, संस्कृति सभी का बोध हो जाता है। अधिक क्यों कहें, यह विश्व ही एक यज्ञ है। भगवान् ने कहा है कि यह बड़ा यज्ञ नित्य हुआ करता है अतः हम सब का कर्त्तव्य है कि उस यज्ञ में अपनी अपनी आहुति डाला करें।
गीता ने यज्ञ का छोटा और संकुचित अर्थ करने वालों को फटकारा है। गीता ने तो ब्रह्म तक को अग्नि बनाकर उसमें ब्रह्म की ही आहुति देने की राय दी है। इससे बड़ा यज्ञ और हो ही क्या सकता है?
गीता में जो यज्ञ की निन्दा सी दिख पड़ती है उसका क्या कारण है? लोगों को ऐसा भ्रम होता है कि गीता में मीमाँसकों और याज्ञिकों के यज्ञ-कर्म की निंदा है, इस भ्रम का क्या कारण है? इसका कारण समझने के लिए एक बात जान लेनी होगी। यज्ञ में दो अंग होते हैं—द्रव्य और देवता। प्रायः लोग कर्म के फेर में पड़कर, आशा के बंधन में बँधकर, द्रव्य पर ही जाते हैं और देवता को भूल जाते हैं। उन्हें प्रत्यक्ष यज्ञ देख पड़ता है, उन्हें उसका वही भौतिक रूप अच्छा लगता है, वे उसी यज्ञ-शरीर की पूजा करते हैं; पर वे भूल जाते हैं कि इस यज्ञ का देवता भी है। इस यज्ञ-शरीर के भीतर एक आत्मा भी है, उसकी भी पूजा करनी चाहिए। भगवान ने यही बात बार बार कही है कि शरीर देखो पर उसे सब कुछ मत समझो। शरीर के भीतर की आत्मा को भी पहचानने की कोशिश करो। इसी प्रकार यज्ञ करो पर इस यज्ञ को ही सब कुछ मत समझो। यज्ञ-पुरुष की पूजा इससे भी बड़ी है। पुरुषोत्तम की पूजा सबसे बड़ी होती है।
गीता यज्ञ और वेद सबका आदर करती है; पर इन सबके ऊपर वह परमेश्वर, परमब्रह्म, पुरुषोत्तम है। उस पुरुषोत्तम को गीता सबसे पहले देखती है और कहती है कि जो पुरुषोत्तम को—साक्षात् भगवान् को—भूलकर यज्ञ करता है वह आत्मा-रहित शरीर को पूजने वाला मूर्ख है। अतः यज्ञ करो पर यज्ञ के भीतर रहने वाले ‘अधियज्ञ’ को—यज्ञ के भी ईश्वर को—अर्थात् यज्ञपुरुष को सदा स्मरण रखो।
आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे देश को तभी वस्तुतः प्राधान्य मिलेगा जब उसमें सुवर्ण की अपेक्षा सत्य की, ऐश्वर्य की अपेक्षा निर्भयता की, देहासक्ति की अपेक्षा परोपकार की समृद्धि दिख पड़ेगी।
प्रेम आत्मा का रूप है। उसका गुण आत्मिक है। यदि हमारा प्रेम में विश्वास होगा तो प्रेम-शक्ति के द्वारा हम सारे संसार को हिला दे सकते हैं।
(श्री स्वामी श्री भोलेबाबा जी महाराज)
एक सत्संग में बैठे हुए कई विचारवान व्यक्ति आपस में विचार विनिमय कर रहे हैं।
एक—क्यों जी! स्वदेश-स्वदेश ऐसा शब्द आजकल बहुत सुनने में आता है, स्वदेश शब्द का क्या अर्थ है? इसका आज हम मिलकर विचार करें, ऐसा मेरे जी में आता है, आप सबकी यदि मर्जी हो, तो अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार इसका अर्थ प्रकट कीजिए!
दूसरा-हाँ भाई! मैं भी यह ही चाहता हूँ, यह विषय बहुत ही रोचक और उपयोगी सिद्ध होगा और इसका विचार हमारे चित्त को आनन्द देने वाला और बुद्धि का विकास करने वाला भी ठहरेगा, ऐसी मेरी मति है। शब्दों के अर्थ का समझना समझाना बुद्धि को तीव्र, सूक्ष्म और शुद्ध बनाता है।
तीसरा—भाई! स्वदेश शब्द का अर्थ मेरी समझ में तो यह आया है कि—यह देह ही स्वदेश है, बाहर के समस्त देश इस देह के ही आधीन हैं, इस देह के लिए ही अन्य देशों की आवश्यकता है, इस देह से ही अन्य देश सिद्ध होते हैं, यह देह जहाँ होता है, वहाँ ही हमारा देश हो जाता है, देह नष्ट हुआ, कि—देश अदृश्य हुआ, न कहीं फिर स्वदेश दिखाई देता है, न कहीं परदेश देखने में आता है, जब तक देह है, तब तक देश विदेश का झगड़ा है, देह न हो तो किसको देश कहा जाय किसको विदेश पुकारा जाय! जब तक देह है, तब तक इस स्वदेश रूप देह को खूब खिलाओ खूब पिलाओ, पुष्ट करो, पीछे कुछ नहीं है। जैसे बने वैसे इस स्वदेश का उपकार करो, सेवा करो, उसकी सेवा किये बिना यह मेवा नहीं देता, जितनी उसकी सेवा करोगे, उतना यह भी हमारी सेवा करेगा।
चौथा—भाई! देह को तू देश बताता है, यह तेरा कहना ठीक है, मेरा मत भी ऐसा ही है परन्तु तेरे समान मैं स्वार्थी नहीं हूँ, अपने देह को ही मैं पुष्ट, करना और पालना नहीं चाहता! जैसे मेरा देह है, इसी प्रकार मेरे माता, पिता, भाई बहिनों का और मेरे पुत्रों का भी देह मेरा देह है; एक घर में जितने हम रहते हैं, वे सब एक देश के होने से एक ही हैं, सबका ही अपने देह के समान पालन-पोषण करना चाहिए, यह मेरा मत है, ऐसा मैं करता भी हूँ, सबको ऐसा ही करना चाहिए! किसी ने सच कहा है कि—सबको खिलाकर सबसे पीछे खाने वाला कुटुम्बी धन्य है, यहाँ कीर्ति पाता है, और मरने के पीछे देवताओं के दिव्य भोगों को भोगता है।
पाँचवाँ—मित्रो! आप दोनों का कथन ठीक है, देह को ही मैं भी स्वदेश मानता हूँ परन्तु आप दोनों के समान संकुचित हृदय वाला मैं नहीं हूँ, मैं तो अपनी जाति भर को अपना देश समझता हूँ, और अन्य जातियों को भी अपना देश मानता हूँ, भेद उतना है कि—अपने घर वालों को तो अपने धन का यथायोग्य विभाग करके अपने उपभोग में लाता हूँ, ब्राह्मणों को और अपनी जाति वालों को भी कभी कभी किसी उत्सव पर भोजन करा देता हूँ, ब्राह्मणों को कभी प्रत्यक्ष वस्त्र आदि का दान देता हूँ और जाति वालों की गुप्त या प्रकट यथासंभव सहायता करने को तैयार रहता हूँ, यह बात मैं अभिमान से नहीं कहता किन्तु अपना कर्त्तव्य ही समझता हूँ, आप मित्रों से प्रसंग आने पर मैंने अपने विचार प्रकट कर दिये हैं, नहीं तो मैं कभी किसी से इस बात को कहता नहीं हूँ।
छठा—विद्वानों! मैं भी देह को ही देश मानता हूँ, अपने घर के, अपने ग्राम के, अपने शहर के, और अपने देश के सभी प्राणियों को मैं अपना देश मानता हूँ, व्यवहार तो मैं अधिक नहीं बढ़ाता हूँ, क्योंकि व्यवहार के लिये तो घर के ही बहुत हैं, उनके लिए ही महान् चिन्ता करनी पड़ती है, चिन्ता करने पर भी उनसे यथायोग्य व्यवहार नहीं कर सकता और करने की आवश्यकता भी नहीं समझता, क्योंकि मैंने वृद्ध पुरुषों से सुना है कि—शरीर बनने से पहिले शरीर का प्रारब्ध बनता है, सब अपने-अपने प्रारब्ध की झोली लेकर आते हैं और जैसा अच्छा, बुरा, थोड़ा बहुत उनकी झोली में होता है, वैसा खाते, पीते, पहनते हैं, ऐसा समझ कर मैं किसी घर की अथवा बाहर की चिन्ता नहीं करता! प्यार सबसे करता हूँ, सबका भला चाहता हूँ, यथासंभव अपने देश की वस्तु ही अपने उपयोग में लाता हूँ और दूसरों को भी ऐसा ही उपदेश देता हूँ। अपने देश का मैं सेवक हूँ, विदेशियों से यथासंभव दूर रहता हूँ बात यह है कि—मैंने ऐसा सुना है कि-सब देश वाले अपने देश की बनी हुई वस्तुओं को अपने उपयोग में लाते हैं। अन्य देश की वस्तुयें अपने उपयोग में नहीं लाते उनका ऐसा विचार है कि—अपने देश का धन अपने देश में रखना चाहिये, बाहर नहीं जाने देना चाहिये, यह बात मेरी समझ में बैठ गयी है, और मैं ऐसा ही करता हूँ यह ठीक है।
सातवाँ—भाइयो! देह ही देश है, सब देश देह से जानने में आते हैं, देह न हो तो कोई कहीं भी देश न हो भाई! मैं तो पृथ्वी भर को अपना देश मानता हूँ, जैसे एक देह, जैसे एक घर के देह, जैसे ग्राम के देह, शहर, देश आदि के देह हैं, वैसे ही समस्त पृथ्वी के देह हैं, तब एक घर, एक ग्राम, एक शहर, एक देश ही को ही देश क्यों मानना चाहिए! मैं किसी एक देश को देश नहीं मानता, पृथ्वी के सब देश मेरे ही देश हैं। जहाँ से उत्तम उत्तम उपयोगी वस्तु मिलती हैं, वहाँ से मँगा लेता हूँ, किसी देश की वस्तु से मुझे द्वेष नहीं है। ईश्वर ने मुझे धनी बनाया है, सब देशों से माल मंगाता हूँ, सब देशों में माल भेजता हूँ। सुनता हूँ कि—बहुत से अपने देश का ही माल लेते हैं, परन्तु अपना माल तो अन्य देशों में भेजते ही हैं, ऐसा उनका करना मुझे नहीं रुचता! जब सब पृथ्वी जगदीश्वर की है, तो मुझे संकुचित क्यों बनना चाहिए! पृथ्वी भर से मैं व्यवहार करता हूँ! अपने कूप का खारी पानी पिये, पड़ोसी के कूप का मीठा पानी न पीवे, उसे क्या विद्वान्-चतुर कह सकते हैं। नहीं कह सकते!
आठवाँ—(गम्भीर स्वर से) हे विद्वानों! हे मेरे आत्माओं! वेद वेत्ताओं से मैंने तो ऐसा सुना है कि-यह समस्त ब्रह्माण्ड ही मेरा स्वदेश है, और मेरा भी ऐसा ही अनुभव है कि-यह सब ब्रह्माण्ड मेरे बिना सिद्ध नहीं होता, मुझ चेतन से ही इस सम्पूर्ण दृष्टि की सिद्धि होती है; इसलिए यह समस्त ब्रह्माण्ड मेरा स्वदेश है, अथवा यों कहना चाहिए कि—यह समस्त ब्रह्माण्ड मैं ही हूँ, और तुम भी ऐसे ही हो; क्योंकि तुम सब मेरे आत्मा ही हो; यानी मेरे स्वरूप ही हो, और मैं तुम्हारा आत्मा हूँ; यानी स्वरूप हूँ; तब हम सबका समस्त ब्रह्माण्ड ही देश हुआ। यह ब्रह्माण्ड क्या है? और हम तुम क्या हैं? वह बात बताता हूँ; सुनो! सत्व आदि तीन गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। यह प्रकृति भोक्ता पुरुष के अदृष्ट द्वारा यानी कर्मों के कारण से ईश्वर की प्रेरणा से गुणों की विषमता को प्राप्त होकर स्वयं ही देह; इन्द्रिय; प्राण; मन, बुद्धि आदि रूप से, राग द्वेष आदि रूप से, शम-दम आदि रूप से, शब्द आदि विषय रूप से और जगत् के आकार रूप से, बहुत प्रकार से परिणाम को प्राप्त हो जाती है। यह ही कार्य कारण संघात रूप से अनुभव में आने वाले शरीर यानी ब्रह्माण्ड है।
इस अनुभव में आने वाले शरीर रूप ब्रह्माण्ड को जो जानता है, यानी गुरु के उपदेश किये हुए ज्ञान से इस सब दृश्य-समूह को जानता है, यानी यह सब मैं ही हूँ; इस प्रकार जानता है; वह चेतन आत्मा है। भाव यह है कि-बाहर और भीतर सर्वत्र समस्त दृश्य को प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से साक्षात् यानी बिना किसी आड़ के जो जानता है; वह शरीरज्ञ आत्मा है; ऐसा शरीर और शरीरज्ञ के जानने वाले कहते हैं।
यह चेतन आत्मा ही इस सब ब्रह्माण्ड को जानता है; यह ही सबका स्वदेश है, और मेरा स्वदेश है, इसके संबंध से सब ब्रह्माँड भी मेरा देश है, न कोई शत्रु है, न मेरा कोई मित्र है, सब मेरे आत्मा ही हैं, गुरु शास्त्र, ईश्वर की कृपा से इस देह में से मेरा अभिमान चला गया है, इसलिए सब देह मेरे ही हो गये हैं। इस देह में अभिमान करने से पूर्ण आत्मा छोटा सा भासता है, अभिमान छोड़ देने से पूर्ण ही भासने लगता है। पूर्ण ही है, किसी का स्वरूप परमार्थ से बदल नहीं सकता, यह पूर्ण आत्मा सर्वत्र, सर्वदा सर्वथा पूर्ण ही है, फिर भी देहाभिमानियों को छोटा सा भासता है, इसी कारण उनमें राग-द्वेष होता है, रागद्वेष होने से किसी को अपना और किसी को पराया समझते हैं, यदि वे उस स्वदेश को जाने लें, तो उनको अपने से भिन्न कोई दिखाई ही न दे! इस आनन्द स्वरूप स्वदेश आत्मा का अज्ञान होने से ही सब अशान्त हैं, अशान्त होने से अपने को देह मान कर देह के संबंधियों को अपने मानते हैं और अन्य देशों को विदेश मानते हैं, इसी कारण परस्पर विरोध करते हैं, लड़ते हैं, झगड़ते हैं, मरते हैं, एक जान के लिए सैकड़ों की जान खो देते हैं, आप भी दूसरों के हाथ से मारे जाते हैं, यदि दैवयोग से बच गये, तो काल भगवान् के ग्रास तो एक दिन हो ही जाते हैं।
यह देव बुद्धि बहुत ही स्थूल बुद्धि है, घर बुद्धि यानी कुटुम्ब बुद्धि कुछ सूक्ष्म है, ग्राम बुद्धि, जाति बुद्धि, देश बुद्धि और पृथ्वी बुद्धि क्रम क्रम से कुछ उत्तम हैं परन्तु हैं सब स्थूल बुद्धि ही! श्रुति कहती है और विद्वानों का भी अनुभव है कि-देह से सूक्ष्म इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है, मन से सूक्ष्म बुद्धि है, बुद्धि से सूक्ष्म समष्टि बुद्धि है, समष्टि बुद्धि से सूक्ष्म अव्यक्त यानी कारण शरीर है, कारण शरीर से सूक्ष्म पुरुष है यानी सब का आत्मा है, पुरुष से सूक्ष्म कुछ नहीं है, यह ही काष्ठा है, यानी सीमा है, और यह ही परमगति है! हे मित्रो! यह पुरुष ही स्वदेश है, इस स्वदेश के न जानने से ही हम तीन तेरह हो रहे हैं, शोक मोह से ग्रस्त व्याकुल हो रहे हैं, विक्षिप्त हो रहे हैं, तुच्छ और दीन हो रहे हैं, अधिक क्या कहूँ, जितना भी दुःख है; उतना इसी के न जानने का दुःख है, नहीं तो संसार में कोई दुःख हो भी कहाँ से? सुख रूप परमेश्वर के सब अंश हैं अथवा स्वरूप ही हैं। कारण से कार्य भिन्न नहीं होता, इस न्याय से सब स्वतंत्र और सुखी ही है; अपने स्वदेश को न जानने से सुखी और स्वतंत्र होकर भी दुःख, परतंत्र होने का अनुभव करते हैं, यह बड़े शोक की बात है।
----***----
(श्री डॉक्टर चतुर्भुज सहाय जी)
जिन चीजों को हम देखते हैं या जिन बातों को हम सुनते हैं वह हमारे अन्दर एक नक्शा बनाती हैं और यही नक्शा या चित्र गहरा हो जाने पर ‘संस्कार’ कहलाता है। ऐसे अनेकों संस्कार हम दिन रात में अपने बना डालते हैं और फिर इन्हीं संस्कारों में जकड़े हुये जन्म-मरण की चरखी में झूलते रहते हैं। मुक्ति प्राप्त करने के लिए प्रथम उपाय यह है कि हम संस्कार बनना रोक दें और पिछले किये हुए संस्कारों को तप से या भोग से समाप्त कर डालें। जब तक यह जाल नहीं कटेगा, मुक्ति नहीं मिल पायेगी।
संसार में रहते हुए यह मुमकिन नहीं हो सकता कि हम किसी वस्तु को न देखें या किसी बात को न सुनें, इससे तो वन और गुफाओं में रहने वाले भी नहीं बच पाते, वन पशुओं की भयानक गर्जना, पक्षियों के सुरीले राग, जल स्रोतों का प्रपात, इत्यादि तो उनके कानों में पहुँचेंगे ही? वृक्षों की हरियाली, पर्वतों की चट्टानें, नदियों का प्रवाह सुन्दर-सुन्दर फुदकती हुई चिड़ियाँ, हिरनों के बच्चे इत्यादि को उनकी आँखें भी देखती ही हैं और सुनी हुई या देखी हुई वस्तुयें संस्कार बना डालती हैं। इसलिए महापुरुषों ने यह बताया है कि आँख को देखने से मत रोको, उसे देखने दो, क्योंकि देखना उसका स्वभाविक गुण है। परन्तु यदि कोई वस्तु तुम्हें प्यारी लगती है और मन फिर से देखने को लुभायमान हो रहा है, तो आँख को उस ओर जाने से रोक लो। ऐसा करने से मन पर अधिकार ही नहीं होगा बल्कि संस्कार बनना रुक जायगा। क्योंकि संस्कार एक बेर के देखने से या एक बेर किसी बात को सुनने से नहीं बनता बल्कि बार-बार एक ही तरफ इन इन्द्रियों के प्रयोग करने पर बना करता है।
चंचलता और अशान्ति का कारण विचार है। विचार अपना हो या दूसरे का वह अन्तर के चिदाकाश में कम्पन उत्पन्न कर देता है और उसी से मन व इन्द्रियाँ चंचल हो उठती हैं। चंचलता आते ही शान्ति भंग हो जाती है और मन में विकार आने लगते हैं।
—मन के विकारों का प्रभाव शरीर पर आता है। इन्द्रियाँ विकारी बन विषयों की ओर दौड़ने लगती हैं, और प्राणी को बुरी तरह पटक के मारती हैं। शरीर अनेक रोगों से ग्रसित हो जाता है, और वह दुःखी हो चिल्लाने लगता है। इन सब का एक ही उपाय है कि अभ्यास या सत्संग के द्वारा या तो विचार बिल्कुल ही न उठने दिया जाय और यदि उठे भी तो वह शुद्ध सात्विकी हो, अशुभ और राजसी, तामसी न हो।
—पुस्तकों का, चित्रों का प्रभाव, भी मन पर बहुत पड़ता है, इसलिए अध्ययन में अच्छी पुस्तकें रक्खो। चित्रों को अपने गृह में रखना या तो बिल्कुल छोड़ दो या संत-महात्मा और देवताओं के चित्र रक्खो ताकि बुरे विचार मन न उत्पन्न करने पावे, उसमें सात्विक विचार ही आवें।
—अभ्यासी को भोजन में भी संयमी रहना पड़ता है। अन्न से ही मन बनता है। कुधान्य और कुविचारों में खाया हुआ भोजन मन को विकारी बनाता है, इसलिए अच्छी व शुद्ध कमाई का, शुद्धता से परोसा हुआ, और शुद्धता से खाया हुआ भोजन ही अभ्यासी को लाभदायक होता है। जहाँ तक बन पड़े, चुपचाप खामोशी से भोजन करो। भोजन के समय इष्ट या गुरु का ध्यान निरन्तर बनाये रखने का उद्योग करते रहो। शान्ति और खुशी के साथ भोजन करो। क्रोध-भय शोक या चंचल वृत्ति को लिए हुए भोजन अभ्यासी को त्याज्य है, इससे मन में और शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं।
—भोजन के प्रभाव का अनुभव कोई भी अभ्यासी उसी दिन कर सकता है, जिस दिन शाँति व एकत्रित होकर भोजन किया जायगा उस दिन चौबीसों घंटे चित्त प्रसन्न रहेगा और भजन के समय एकाग्रता लाने के लिए कुछ भी उद्योग नहीं करना पड़ेगा। मन स्वयं ही शान्त हो के बैठ जायगा। और जिस दिन गड़बड़ी में भोजन पाया जायगा उस दिन वृत्ति चंचल रहेगी और अभ्यास में कठिनाई पड़ेगी।
—नियमित आहार विहार करना, सदाचारी रहना, एक अभ्यासी के लिए बहुत जरूरी है। आहार विहार के बिगड़ने पर शरीर में निर्बलता और रोग बढ़ते हैं, रोगी और कमजोर से साधन नहीं बन सकता और सदाचारी न रहने से मन पर कालिमा छा जाती है, हृदय मलीन हो जाता है, वह खुद ही अपनी नजरों में अपने को पतित पाता है और शुभ काम के करने को उसकी हिम्मत नहीं रहती।
—दुराचारी का हृदय कम्पित होता रहता है वह श्रेष्ठ पुरुषों की संगत से दूर भागते हैं। भजन पूजन से चित्त उचाट खा जाता है और संत महात्माओं का तो उन्हें भय मालूम देने लगता है इसलिए उनके सन्मुख नहीं पड़ते। इसलिए अभ्यासी को सदाचार का पूरा पालन करना उचित है।
—सभ्यता (अखलाक) भी एक चीज है जो साधक के पास अवश्य होना चाहिए। असभ्य मनुष्य कभी संत या पूर्ण-पुरुष नहीं बन सकता। साधु को सरल स्वभाव-सदाचारी और सभ्य होना जरूरी है। साधन करते हैं पर दूसरों को तुच्छ समझते हैं, गालियाँ बकते हैं, पास आने वाले के साथ दुर्व्यवहार से पेश आते हैं इत्यादि, ऐसा मनुष्य कभी ईश्वर का दर्शन नहीं पा सकता। वह कुछ सिद्धियाँ लेकर संसार में कौतुक दिखा सकता है, प्रतिष्ठा करा सकता है, धन बटोर सकता है, पर ऊँचे पद को नहीं प्राप्त हो सकता।
—असभ्यता (बद अखलाकी) अहंकार का चिन्ह है! अपने को श्रेष्ठ और बड़ा समझेगा और दूसरों को तुच्छ और नीच समझेगा वही ऐसा दुर्व्यवहार कर सकता है। अहंकारी भगवान के दरबार में प्रवेश नहीं हो सकता, वह इस विद्या के पाने का अधिकारी नहीं हो सकता, इसलिए जिज्ञासु को सभ्यता सीखना लाजिमी है।
—दूसरों से ऐसा बर्ताव करो कि जैसा तुम दूसरों से चाहते हो। क्या वह तुम्हारे भाई और प्रभु के पुत्र नहीं हैं? क्या वह हृदय और आत्मा नहीं रखते? और क्या तुम्हारे बुरे व्यवहार से उनके दिल को चोट नहीं लगेगी? फिर यह हिंसा हुई या नहीं? दिल दुखाने को तो हिंसा कहते ही हैं, जिसे सबसे प्रथम, साधक को त्यागने की शिक्षा शास्त्र देते हैं।
—नम्रता और प्रेम हृदय में उत्पन्न करने के लिए ही तो साधन किया जाता है। सबसे छोटा और सबका सेवक अपने को समझना, और प्रेम के दायरे को विस्तृत करते हुए संसार व्यापी कर लेना, यह दो ही साधक के उद्देश्य हैं। प्राणीमात्र हमारा हो और हम सबके सेवक हों, जिस समय पूर्ण रूप से यह भाव हृदय में उदय हो गये उस समय फिर साक्षात्कार में देर नहीं लगती।
—प्रेम से बोलो; प्रेम से बिठा लो, प्रेम से उसकी सेवा शुश्रूषा करो, इस व्यवहार से तुम्हें भी खुशी मिलेगी और दूसरे भी प्रसन्न रहेंगे और तुमको देख कर भगवान भी प्रसन्न होंगे।
योग का अर्थ है मिलना, जुड़ना। दो वस्तुएं जब आपस में मिलती हैं तो कहा जाता है कि इनका योग हो गया। दो और चार का योग छः है। दवाओं के नुस्खों को योग कहते हैं क्योंकि उनमें कई चीजों का संमिश्रण होता है। आध्यात्मिक भाषा में योग उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके आधार पर दो प्रमुख आध्यात्मिक तत्वों का मिलन होता है। मस्तिष्क और हृदय को, माया और मुक्ति को, पाप और पुण्य को, मन और आत्मा को एक सूत्र में बाँध देने, एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत कर देने, द्वैत मिट कर अद्वैत बन जाता है और विछोह दूर होकर एकीकरण का ब्रह्मानन्द प्राप्त होने लगता है।
योग का कार्य है जोड़ना, मिलाना। आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाले जितने भी साधन, उपाय, मार्ग हैं, वे सब आध्यात्मिक भाषा में योग कहे जावेंगे। योगों की संख्या असीमित है। भारतीय योग शास्त्रों में सब मिला कर लगभग 6000 योग साधन अब तक देखे जा चुके हैं, शोध करने पर उनकी संख्या अभी इससे कई गुनी अधिक निकलेगी। संसार के विविध देशों धर्मों और विज्ञानों के अनुसार योगों की संख्या इतनी बड़ी है कि उनकी गणना करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। इतना होते हुए भी इन समस्त योगों का उद्देश्य एवं कार्य एक ही है। वे सभी पृथकता को मिटा कर एकता की स्थापना करते हैं। अभाव को भाव से, अपूर्णता से मिलने की विद्या योग कही जाती है। जीव अपूर्ण है, अभाव ग्रस्त है, दुख द्वन्द्वों से आच्छादित हो रहा है इसको पूर्णता से, साधनों से, ज्ञान से, आनन्द से, परिपूर्ण बनने के लिए जो उपाय काम में लाये जाते हैं वे योग कहलाते हैं।
योग साधना सबसे बड़ी, सबसे महत्वपूर्ण विद्या है। क्योंकि उसके द्वारा उन वस्तुओं की प्राप्ति होती है जो मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक, सबसे अधिक उपयोगी है। जिस उपाय से जितने बड़े लाभ की प्राप्ति होती है वह उतना ही बड़ा लाभ समझा जाता है। अन्य अनेक साँसारिक चतुरताओं, शक्ति सत्ताओं द्वारा जो लाभ प्राप्त किये जाते हैं वे भौतिक और क्षणिक होते हैं। उनके द्वारा केवल साँसारिक वस्तुएं किसी हद तक प्राप्त की जाती हैं किन्तु योग के द्वारा जो वस्तुएं प्राप्त की जाती हैं वे अधिक ऊँची श्रेणी की होती हैं, उनमें अधिक स्थायित्व होता है उनके द्वारा मनुष्य को सुख भी अधिक ऊँची श्रेणी का, अधिक ऊँची मात्रा में प्राप्त होता है, इसलिए योग को सर्वश्रेष्ठ विद्या माना गया है।
साँसारिक योग्यताओं तथा शक्तियों द्वारा धन, स्त्री, पुत्र, पद, वैभव, स्वास्थ्य, विद्या आदि को प्राप्त किया जा सकता है। पर इन चीजों की प्राप्ति होने पर भी न तो मनुष्य को तृप्ति मिल सकती है और न अभाव जन्य दुखों की निवृत्ति होती है। क्योंकि वस्तुओं में सुख तभी तक दिखाई पड़ता है जब तक वे प्राप्त होवें। पर थोड़ा बहुत रस उनमें तब तक रहता है जब तक कि उस वस्तु के प्रति आकर्षण की मात्रा विशेष रहती है, जैसे ही वह आकर्षण पड़ा कि वह वस्तु भार, निरर्थक, उपेक्षणीय एवं तुच्छ प्रतीत होने लगती है। फिर उसकी ओर से मन हट जाता है और नई वस्तु में सुख तलाश करने लगता है। यह क्रम चलता ही रहता है, प्राप्ति के साथ साथ तृष्णा बढ़ती है। फलस्वरूप कितनी ही बड़ी मात्रा में, कितनी ही उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति हो जाय मनुष्य को संतोष नहीं हो सकता और संतोष के बिना शान्ति असम्भव है।
सच्ची शान्ति तब मिलती है जब वह वस्तु मिल जाय जिसके बिछुड़ने से आत्मा को बेचैनी रहती हो। वह वधू जिसका हृदयेश्वर प्राण पति बिछुड़ गया है तब तक चैन नहीं पा सकती जब तक उसको अपने बिछुड़े हुए साथी की प्राप्ति न हो जाय। वह माता जिसका बालक खो गया है तब तक चैन से न बैठेगी जब तक अपने बालक को पाकर उसे छाती से न लगा ले। वियोगिनी माता, या विरहिनी वधू को उनके प्रियजन प्राप्त न हो जायं। यदि अन्य वस्तुएँ देकर उनके बिछोह के दूर करने का प्रयत्न किया जावे तो सफलता न मिलेगी। वे किसी अन्य वस्तु को लेकर संतुष्ट न हो सकेंगी। यही बात आत्मा की है। वह परमात्मा के वियोग में अतृप्त, बेचैन, विरहिनी बनी हुई है। हमारा मन उसके सामने तरह तरह के प्रलोभनकारी खेल खिलौने उपस्थित करके बहलाना चाहता है; उसके वियोग को भुलाना चाहता है पर आत्मा की बेचैनी वैसी नहीं है जो इन खेल खिलौनों से दूर हो सके। फलस्वरूप सुख शान्ति के लिए कितनी श्री, समृद्धि, कीर्ति, शक्ति एकत्रित कर ली जाय, पर आत्मा का असंतोष दूर नहीं होता। बेचैनी मिटती नहीं। अशान्त आत्मा को लोक और परलोक में कहीं भी सुख नहीं मिलता।
(पं. शिवनाथ जी शास्त्री)
वैज्ञानिक आयुर्वेदिक दृष्टि से गंगाजल की समालोचना करते हैं, तो यही पाया जाता है कि गंगाजल तथा गंगा-मृत्तिका में स्वस्थीकरण एवं शरीर-पोषण की अपूर्व शक्ति है। इस समालोचना के समर्थन में बड़े बड़े विज्ञानवेत्ता पाश्चात्य सभ्यता, दीक्षा में बर्द्धककण विद्वान् भी गंगाजल में शरीर पुष्टि की अद्भुत क्षमता है, ऐसा मुक्त कण्ठ से कहते हैं, तथा रोगियों, दुर्बल पुरुषों को किसी भी बलदायक (टानिक) वस्तु की आवश्यकता नहीं, यदि इसी जल का पान तथा स्नान करते रहें। विशेष करके आयुर्वेद के अन्वेषण (रिसर्च) से इस विषय के विज्ञान वेत्ताओं ने यह निश्चय किया है, कि गंगाजल में अजीर्ण रोग, अजीर्ण ज्वर, संग्रहणी, राजयक्ष्मा, और चिरकालीन श्वास रोग को समूल नष्ट करने की अपूर्व शक्ति है, यदि रोग के समय का प्रमाण देखकर पान करने तथा स्नान में उसी मात्रा का प्रयोग किया जाय। इसके अतिरिक्त यही गंगाजल केवल 40 दिन स्नान से प्रत्येक अभ्यान्तर मस्तक रोग तथा चर्म रोग के नाश करने में साक्षात् रामबाण है। इस कथन की सत्यता वर्तमान के महाविद्वान, सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यों तथा प्रसिद्ध डाक्टरों ने रासायनिक परीक्षा से सिद्ध की है। विस्तृत रूप से नवमुद्रित ‘शिवसंहिता’ आयुर्वेद ग्रन्थ के उपोद्घात में मीमाँसा विद्यमान है।
जो पुरुष गंगाजल के अविश्वास की बुद्धि से इसके प्रभाव से वंचित थे वह भी अब इसकी चमत्कारिक शक्ति तथा विलक्षण प्रभाव को देखकर सिर झुका गये, और इस गंगाजल तथा इसकी मिट्टी को सिर में लगाने का प्रयत्न करने लग गये। पुरुष को जब सात्विक बुद्धि आती है, तो वह शास्त्र और गुरु -वचनों का सौभाग्य प्राप्त करने में समर्थ होता है।
जो कुत्सित-स्थान और वैसे ही जल के सेवन से ग्रन्थिक (प्लेग), विसूचिका (हैजा), दुर्वात (मलेरिया) आदि बहुत कठिन साँक्रामिक रोग उत्पन्न होते हैं, वही रोग गंगाजल में केवल स्वल्पकाल के स्नान से अदृश्य हो जाते हैं। कारण यह कि गंगाजल किसी भी प्रकार साँक्रामिक रोगादिकों के विषाणु से दूषित नहीं होता है। यदि किसी प्रकार के रोग के विषाणु जो रोग कीट के नाम से प्रसिद्ध हैं, इस गंगा में छोड़ दिये जायें, तो वह कृमि प्रातःकाल ही मर जाते हैं। यह भी आयुर्वेद-वैज्ञानिकों ने परीक्षा से सत्य पाया है। ऐसी अद्भुत शक्ति ही इसमें नहीं, प्रत्युत माधुर्य तथा मनोहरता भी पायी जाती है। यदि किसी प्रमाण से माप करके गंगाजल तथा अन्य जल दो शीशियों में भर दिया जाये, फिर एक दो मास के बाद माप लिया जाये, तो गंगाजल में वृद्धि हो गयी होगी, अन्य जल में ह्रास पाया जायगा।
डॉ. हेकिस ने गंगाजल की इस प्रकार परीक्षा की है। विसूचिका रोग के कृमि इसमें अपने अनुभव के वास्ते डाल दिये थे, जो दो घण्टे बीस मिनट में मर गये। अन्य जल में यही कीट वृद्धि पा गये। ऐसा चमत्कार देख कर वह मुग्ध रह गया। पाताल देश (अमेरिका) के सुप्रसिद्ध डाक्टरों ने बहुत कुछ इस विषय में लिख दिया है। बल्कि सारे संसार का सुप्रसिद्ध यात्री मार्क दुहन नामी अपनी संसार यात्रा में लिखता है। मैंने स्वयं गंगाजल की परीक्षा की, इसमें रोग कीटों के नाश करने की अपूर्व शक्ति है और यह जल अत्यन्त स्वच्छ तथा पवित्र है। इसका यही लाभ है, कि इसके जलपान से बड़े बड़े रोगी मनुष्यों के रोग नष्ट हो जाते हैं।
पाश्चात्य वैज्ञानिकों के मत के अतिरिक्त आयुर्वेद विशारदों का भी मत है कि—गंगाजल में कठिन से कठिन रोगों की निवारण-शक्ति विलक्षण पायी गयी है। एक रोगी क्षय-श्वास रोग का लक्ष हुआ था। वह निराश होकर आयु शेष के दिवस पूरे करने के लिए हरिद्वार में निवास करने गया, वहाँ पर सारे औषधों को ‘इति श्री’ करके सिर्फ गंगाजल का पान तथा समय समय पर स्नान किया करता रहा, जिससे वह केवल दो मास में स्वास्थ्य पा गया। ऐसे उदाहरण सुनकर जनगण में आश्चर्य तो अवश्य होता होगा। पर ऐसे अनेक और भी विचित्र उदाहरण हैं, जिससे पूरे तौर कौतुक पूर्ण शक्ति गंगाजल में विदित होती है। पवित्रता तो अनुमेय ही है।
इसी विषय में एक फ्राँस देश का वैज्ञानिक डॉ. डेरेल अपनी योग्यतानुसार परीक्षा करके यह पा गया, कि इस जल में विसूचिका-अतिसार-संग्रहणी -क्षय के कीटों को नाश करने तथा भयंकर घाव के पूर्ण करने की विलक्षण शक्ति है। बल्कि उसने अपने नवीन आविष्कार में प्रतिपादन भी किया है, तथा गंगाजल के कीटाणु के साहाय्य से एक अद्भुत औषधि का “वैक्टरियो फैज” नाम से निर्माण किया, जो उपरोक्त रोगों की चिकित्सा के कार्य में सफल हुआ।
गंगाजल की पवित्रता एवं उपयोगिता धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, प्रत्युत आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से भी माननीय है। जिसके प्रमाण में ‘गुड हेल्थ’ नामक इंग्लिश मासिक पत्र में मिस्टर सी. ई. नेलसन का लेख, ‘जो स्टेटमैन’ ‘लीडर’ इन पत्रों में भी प्रकाशित हुआ है, कि गंगाजल की पवित्रता सर्वमान्य है, इसमें विसूचिका तथा दुष्टब्रण नाश करने की अपूर्व शक्ति है। इत्यादि
रोशन लाल वाँरअटला लिखते हैं, कि मेरे सामने एक अमेरिका के डॉक्टर ने काशी के गन्दी नाली में से तीन बिन्दुमात्र गन्दा पानी निकाल कर यन्त्र द्वारा देखा, तो हजारों विसूचिका-कीट प्राप्त हुये। वही गन्दा पानी गंगाजल में छोड़कर देखा तो वह समस्त-कीट पड़ते ही मर गये। अर्थात् गंगाजल के एक एक परमाणु ने हजारों विष कीटों को खाकर जल को शुद्ध किया। इलाहाबाद का डॉ. करोली लिखता है कि मेरी कास श्वास की पुरानी व्याधि गंगाजल के प्रताप से हट गयी।
यह गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर मन्दाकिनी पद्मा-अलकनन्दा-प्रभृति नदियों को अपने साथ ला अनेक प्रकार की औषधियों पर से बहती हुई बद्रीनाथ- केदारनाथ- देवप्रयाग- लक्ष्मण झूला-ऋषिकेश आदि स्थानों से होती हुई हरिद्वार की समतल भूमि में जा निकलती है। आश्चर्य है, इसी स्थान तक इसके यह गुण सम्पूर्ण रूप से मौजूद होते हैं। इस स्थान से आगे यह गुण न्यूनता को प्राप्त होते हैं। कारण कि जितना यह उत्तरोत्तर बहती जाती है, उतना इसमें गन्दी नालियाँ समुद्र पर्यन्त मिलती जाती हैं।
(प्रो. लालजीराम शुक्ल एम. ए.)
मनोविज्ञान की परिभाषा में पाप वह कृत्य है जिससे मनुष्य का मानसिक साम्य अथवा एकत्व नष्ट हो। पाप से मनुष्य के मन में दो भाग हो जाते हैं और एक भाग दूसरे भाग से लड़ने लगता है। पाप मनुष्य न केवल दूसरों से छिपाता है वरन् अपने आपसे भी छिपाता है। समाज से विरुद्ध किया कार्य अपराध कहलाता है और अपने आपके विरुद्ध किया गया कार्य पाप। धर्म की भाषा में पाप ईश्वर के विरुद्ध होता है और अपराध राज द्वारा दण्डनीय होते हैं और कुछ समाज निन्दा के द्वारा अथवा अपराधी को बहिष्कार के द्वारा दण्डित करता है। मनुष्य के प्रायः सभी अपराध पाप होते हैं पर सभी पाप अपराध नहीं होते हैं। समाज व्यवस्था को जब ईश्वरीय मान लिया जाता है तो उसके प्रतिकूल आचरण करना न केवल अपराध माना जाता है वरन् पाप भी माना जाता है। परन्तु पाप का दायरा अपराध से बड़ा है। अपने बच्चों की शिक्षा की चिन्ता न करना अपराध नहीं है पर पाप है। इसी प्रकार किसी अतिथि का सत्कार न करना अपराध नहीं है पर पाप है।
अब नैतिक चर्चाओं में ईश्वर का स्थान नहीं किया जाता। धर्म से मनुष्य ऊब गये हैं। अतएव पाप की कोई दूसरी ही परिभाषा होना आवश्यक है। मनुष्य का कुछ आचरण ऐसा अवश्य है जो समाज के द्वारा दण्डनीय नहीं है। पर तिसपर भी बुरा माना जाता है। यह बुरा क्यों माना जाता है। इस प्रकार के आचरण को कैसा आचरण कहा जायगा? हम उस सभी आचरणों को अपराध कहेंगे जिससे मनुष्य अपने ही आदर्श स्वत्व के प्रतिकूल आचरण करता है। इस आदर्श स्वत्व का आरोपण ही ईश्वर कहलाता है। धर्म भावना के लोग ईश्वर के भय से डरते हैं, दूसरे लोग अपनी अन्तरात्मा के भाव से डरते हैं। यह अन्तरात्मक मनुष्य का आदर्श स्वत्व है। जब कोई मनुष्य इसके प्रतिकूल आचरण करता है तो उसके मन में फूट उत्पन्न हो जाती है। अपने घृणास्पद कार्यों से स्वयं व्यक्ति दुःखी होता है। पर वह इनके लिए प्रायः निश्चित न करके उन्हें भूल जाने की चेष्टा करता है। इस प्रकार से अपने आपको भुलाने से पाप की प्रवृत्ति और भी प्रबल हो जाती है। फिर यह मनुष्य कुछ ऐसे कार्य कर बैठता है जो समाज की दृष्टि में निन्दनीय माने जाते हैं। और कुछ भूलें भी करता है जिससे उसका अपराध प्रकाशित हो जाय और उसके लिए उसे दण्ड मिले। इस प्रकार पाप का दण्ड बाहरी दण्ड के रूप में मिलता है।
कभी कभी पाप का दण्ड समाज से न मिलकर प्रकृति से मिलता है। मानसिक विच्छेद मानसिक अथवा शारीरिक रोग का रूप धारण कर लेता है। पाप दबाया जा सकता वह किसी न किसी रूप में प्रकट होता है। पाप की मनोवृत्ति के कारण मनुष्य अपने ही निकट सम्बन्धियों से ऐसा व्यवहार करने लगता है जिससे वे उससे घृणा करने लगे। फिर उसे बार बार क्रोध सताने लगता है। क्रोध में आकर वह कुछ का कुछ कर बैठता है और इस प्रकार वह अपने आपका नुकसान कर लेता है।
कितने ही लोग कठोर पाप करते हैं। वे ऐसे होते हैं कि यदि समाज उनका पता चला ले तो वे दण्डित हैं। धनी लोग अपने धन के बल पर चोरी, हत्या और व्यभिचार करके भी राज दण्ड से बच जाते हैं। पर इस प्रकार राजदण्ड से बच जाने पर वे पूरी तरह से नहीं बचते। उन्हें दूसरे प्रकार का दण्ड होता है। किसी भी बुरे काम के करने के बाद मनुष्य का मानसिक साम्य नष्ट हो जाता है। जब तक मनुष्य पाप के लिए प्रायश्चित नहीं कर लेता तब तक उसे अपना खोया मानसिक साम्य फिर से प्राप्त नहीं होता। यह प्रायश्चित जान बूझ कर हो अथवा अनजाने हो, मनुष्य की इच्छा के अनुसार हो अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसका होना नितान्त आवश्यक है। बिना प्रायश्चित के मनुष्य के, मानसिक विकास की प्रगति रुक जाती है। मनुष्य का सच्चा स्वत्व व्यापक है। वह तब तक अपने आप में चैन नहीं पाता जब तक वह निश्चय नहीं कर लेता कि वह संसार के भले लोगों की दृष्टि में भला है। उसे दूसरे लोग भले ही न पहिचाने पर वह अपने आपको तो पहचानता है? अतएव किसी प्रकार की बुराई को अपने आपमें देखकर मनुष्य उद्विग्न मन हो जाता है। वह उस बुराई को दूर करने की चेष्टा करता है। जब वह ऐसा करने में समर्थ नहीं होता तो वह उसे भुलाने की चेष्टा करता है। पर बुराई को अन्तरात्मा स्थान कैसे दे सकती है। इसी के कारण मनुष्य को अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं और वह अनायास ही घोर विपत्तियों में पड़ जाता है। मनुष्य इस प्रकार रोग ग्रस्त होता अथवा विपत्तियों में पड़ता है। उसकी आत्मा की परिष्कृत होने की चेष्टा को दर्शाता है।
मानसिक रोगों की अवस्था में देखा गया है कि मनुष्य के मन में कुछ ऐसी बातें रहती हैं जो वह दूसरों के सामने प्रकट करने से भय करता है। जब वह इन बातों को मनो विश्लेषक के प्रति प्रगट कर देता है और मनो विश्लेषक उसके प्रति प्रेम का भाव बनाये रखता तो रोगी को अपनी नैतिकता के विषय में आत्म विश्वास उत्पन्न हो जाता है। अपने आपका सुधार मनुष्य तभी कर सकता है जब वह अपने आपको जाने अर्थात् जब वह अपनी भूलों को तथा भूल करने वाली प्रवृत्तियों को भली प्रकार से पहचान ले। मनोविश्लेषण से इन भूलों का, जो विस्मृत हो चुकी है, और अपनी दबी प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है। जब ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य की चेतना पर आ जाती है तो मनुष्य अपने आपको नैतिक दृष्टि से गिरता हुआ पाता है। पर साथ ही साथ ये प्रवृत्तियाँ निर्बल भी हो जाती हैं। अब उनकी शक्ति का उदात्तीकरण करना सरल हो जाता है। इस उदात्तीकरण के प्रयत्न से पुरानी भूलों का वास्तविक प्रायश्चित होता है।
किसी भूल का सच्चा प्रायश्चित पुराने पाप के लिए रोना, आत्मभर्त्सना करना अथवा अनेक प्रकार पश्चाताप करना नहीं है। पुरानी भूल का सच्चा प्रायश्चित नये भले काम को करना है। यदि भूल समझ में आ गई तो भूल का मार्ग छोड़कर सही मार्ग पर चलने लगना यही उसका प्रायश्चित है।
—संसार
(श्री कमलाकर बी. ए.)
आप शायद मृत्यु से डरते होंगे। मृत्यु-समय के कष्ट के बारे में बहुत कुछ सुना गया है कोई गला घोंट देता है, शरीर में भाले के घोंपने जैसी पीड़ा होती है आदि आदि। मृत्यु की ऐसी अनेकों भीषण शक्लें हमारे सामने चित्रित की जा चुकी हैं।
मृत्यु का सम्बन्ध कष्ट, रक्त, अन्धकार तथा असीम शरीर की पीड़ा से जोड़ा जा चुका है। इसके साथ ही हममें से प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि मृत्यु अवश्यम्भावी है। अन्य कोई भी चीज हट सकती है, लेकिन मृत्यु नहीं। लेकिन इतनी निश्चित वस्तु होते हुये भी मृत्यु का बेफिक्री से आमन्त्रण कोई विरला ही कर पाता है।
हममें से प्रत्येक मृत्यु को एक भयावनी छाया के रूप में अनुभव करता है। लेकिन इस सत्य को बहुत कम ही लोग जानते हैं कि समस्त डाक्टरी अनुसन्धानों के पश्चात् भी मृत्यु कोई कष्टदायक वस्तु नहीं सिद्ध हो सकी। निद्रा की तरह धीरे धीरे विस्मृति के गर्भ में डूब जाने का नाम ही मृत्यु है।
प्रसिद्ध अन्वेषक डॉक्टर केरेल के कथनानुसार मृत्यु फौरन नहीं हो जाती। यह दो श्रेणियों में बाँटी जा सकती है। साधारण मृत्यु और साँसारिक अंगों की मृत्यु। साधारण मृत्यु हृदय की गति बन्द हो जाने के साथ ही हो जाती है। इसके अनन्तर आदमी शरीर-शास्त्रियों के सिद्धान्तानुसार सदैव के लिए सो जाता है। लेकिन मनुष्य के विभिन्न अंग उसके बाद भी क्रिया करते रहते हैं। इनकी मृत्यु क्रमशः होती है। गुर्दे आदि तो मृत्यु के एक घन्टे बाद तक कार्य करते पाये गये हैं।
डॉ. केरेल की खोज के अनुसार यह प्रथम अर्थात् साधारण-मृत्यु पुनः जीवन के रूप में भी परिणत हो सकती है। पानी में डूब जाने के उपराँत मनुष्य को उपचार आदि के द्वारा पुनर्जीवित करने के दृष्टाँत मौजूद हैं। लेकिन अंगों की मृत्यु हो जाने के अनन्तर मृत्यु से छुटकारा पाना असम्भव है।
हृदय की गति बन्द हो जाने के अनन्तर मृत्यु हो जाने पर मनुष्य कैसा अनुभव करता है, इसकी बहुत सी खोजें की गई हैं। कुछ आदमी जिन्हें हृदय की गति बन्द होने के बाद पाँच से बीस मिनट के बीच उपचारों से जीवित किये जाने में डॉक्टरों को सफलता प्राप्त हुई है, उनके अनुभव मृत्यु के सम्बन्ध में नोट किये जा चुके हैं। इन लोगों में से किसी ने भी मृत्यु समय पर किसी प्रकार का कष्ट होने का उल्लेख नहीं किया।
इसमें से एक के अनुसार “सहसा ही सब वस्तुएँ मुझे स्पष्ट प्रतीत होने लगीं। एक महान शान्ति ने मुझे घेर लिया। अब मैं मृत्यु से कभी भी न डरूंगा।”
एक भुक्त -भोगी के अनुभव के आधार पर “मृत्यु निद्रा के समान कष्ट रहित है। इससे पूर्व का द्वन्द्व अर्थात् मृत्यु के आगमन की सूचना मात्र क्षण भर के लिए मुझे कष्ट प्रतीत हुई। मृत्यु समय मैंने किसी प्रकार की कंपकंपी तक अनुभव नहीं की।” इस प्रकार डूबने वाले व्यक्ति और मरने के कुछ देर बाद स्वयं जीवित हो उठने वालों के अनुभव नोट किये गये हैं। इनमें से सबके ही कथानुसार मृत्यु से पूर्व भले कष्ट अनुभव हुआ हो लेकिन जब मृत्यु की छाया आकर छप गई तब चित्त में एक पूर्ण शान्ति की भावना उग आई जो धीरे-धीरे विस्मृति की गोद में व्यक्ति को ले चली। द्वन्द्व की समाप्ति के अनन्तर बिना किसी प्रकार का कष्ट अनुभव किये धीरे धीरे चेतना लुप्त होने लगी और हृदय की गति बन्द हो गई।
सर जेम्स गुडहर्ट नामी एक डॉक्टर ने लन्दन के गाई हस्पताल के प्रत्येक मरने वाले व्यक्ति के मृत्यु समय उपस्थित रह इस सम्बन्ध में उनके मनोभावों का अध्ययन करने की चेष्टा की है। उनके परिणामों के अनुसार-जहाँ तक कष्ट का सम्बन्ध है मृत्यु स्वयं किसी प्रकार के कष्ट का कारण नहीं। दुनिया के बीच बादल का-सा परदा रहता है। एक परदा फट जाता है और अनजान में ही उसका स्थान दूसरा ले लेता है।’
कैन्सर सबसे अधिक कष्ट दायक फोड़ा समझा जाता है, ज्यों-ज्यों मृत्यु निकट आती जाती है, इसकी वेदना बढ़ती ही जाती है। लेकिन इसके सम्बन्ध में भी डॉ. हौर्सले का कथन है कि मृत्यु से पूर्व किसी प्रकार का कष्ट बीमार अनुभव नहीं करता।
एक दूसरे अमेरिकन डॉ. के कथनानुसार ‘अन्त तो गत्वा’ मृत्यु बिलकुल सुगम और कष्ट रहित हो जाती है।
इन सब खोजों से स्पष्ट है कि मृत्यु के सम्बन्ध में फैली वर्तमान धारणाओं के परिवर्तन करने की आवश्यकता है। मृत्यु कष्टदायक नहीं, एक दूसरे अन्य जीवन की भूमिका मात्र है। और इस परिणाम पर पश्चिम के डॉक्टर किसी सिद्धाँत विशेष में विश्वास रखे बिना ही पहुँचे हैं। ऐसी दशा में जो लोग पुनर्जीवन में विश्वास रखते हैं उनके लिये तो मृत्यु और भी कम भयप्रद होनी चाहिये।
(पं. दुर्गा प्रसाद शास्त्री)
वैज्ञानिक तरीके से यह बात प्रमाणित हो चुकी है, कि सूक्ष्म वस्तु स्थूल में प्रवेश करती है, स्थूल सूक्ष्म में नहीं घुस सकती। आटे में मिली हुई शक्कर के सूक्ष्म परमाणुओं को पृथक-पृथक करने में मनुष्य की अँगुली सर्वथा असमर्थ है, लेकिन चींटी का सूक्ष्म मुँह उसको पृथक-पृथक कर देता है। उसी प्रकार दुनिया के विज्ञान-वेत्ताओं का मत है कि तपेदिक का कीड़ा इतना सूक्ष्म होता है, कि पच्चीस हजार कीड़े एक इञ्च स्थान में समा जाते हैं तथा वजन में इतने हल्के होते हैं, कि एक खसखस के दाने पर करोड़ों कीड़े चढ़ जाते हैं। बुद्धिमान इस बात को जानते हैं, कि इतने सूक्ष्म से सूक्ष्म कीड़ों के पास स्थूल कण वाली औषधियों की बड़ी-2 मात्राओं की पहुँच कैसे हो सकती है? यही कारण है, कि लोग तपेदिक रोग को लाइलाज कह कर पुकारते हैं, क्योंकि स्थूल पदार्थों का सूक्ष्म में प्रवेश सर्वथा असम्भव है और इलाज करते करते ही रोगी परलोक धाम को सिधार जाता है। होम्योपैथिक चिकित्सा के आविष्कार कर्त्ता महात्मा हैनीमन साहब लिखते हैं, कि अधिक निर्बल रोगियों को किसी भी प्रकार की औषधि खिलाने की अपेक्षा सुँघाना बहुत लाभदायक है। आपने लिखा है कि मेदे के अतिरिक्त जिह्वा और मुँह में ऐसे भाग हैं जो औषधि के प्रभाव को बड़ी शीघ्रता से ग्रहण करते हैं इसके अलावा नाक का भीतरी भाग औषधि के गुण से अतिशीघ्र प्रभावान्वित हो जाता है। औषधि का सबसे अधिक प्रभाव सूँघने और श्वांस लेने से होता है।
प्रोफेसर मैक्समूलर “फिजिकल रिलीजन” में लिखते हैं, कि सुगन्धयुक्त पदार्थों को आग में जलाने से अनेक प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। आगे आप लिखते हैं, कि स्काटलैंड, आयरलैंड, दक्षिणी अमेरिका में महामारी जैसे भयंकर रोग को दूर करने के लिये यह प्रथा प्रचलित रह चुकी है। जापान और चीन में होम को घोम कहते हैं और नित्य मन्दिरों में घृत के साथ सुगन्धित द्रव्य जलाकर भयंकर रोग दूर किए जाते हैं। जर्मनी में लवेन्डर की बत्ती जलाई जाती है। ईरान के पार्सी लोग हवन यज्ञ को हिन्दुओं की तरह बड़ी उत्तमता से करते हैं। जर्नल किंग आई. एम. एस. सेनेटरी कमिश्नर मद्रास में “ब्यूबानिक प्लेग“ नामी पुस्तक में लिखा है—”सुगन्धयुक्त रोगनाशक औषधियों के जलाने से महामारी प्लेग और अनेक प्रकार के विष युक्त रोग दूर हो जाते हैं।” इस प्रकार के हवन की क्रिया मेडिकल साइंस के सर्वथा अनुकूल है। इसकी भूमिका डब्लू. एम. टैफकिन साहब मुम्बई वालों ने लिखी है। उन्होंने अनेकों प्रणाम देकर इस यज्ञ की क्रिया को प्रमाणित किया है।
हवन करने से सुगन्धि फैलती है, जिसकी साक्षी प्रत्येक नासिका रखने वाला नीरोग मनुष्य दे सकता है, इस सुगन्धि के कारण वायु में “ऑक्सीजन” तथा ‘ओजून” भर जाता है। जिसको पश्चिमी डाक्टरों की परिभाषा में ‘ओजून’ कहा गया है, उसको संस्कृत भाषा में सुगन्धित वायु अथवा शुद्ध वायु कहते हैं और ‘ऑक्सीजन गैस’ का ‘प्राणवायु’ नाम है।
तपेदिक के लिए वेद का आदेश :-
“मुञ्चामि त्वा हविषा जीवन य-अज्ञात यक्ष्मादुत राजक्ष्मात ग्राहिः जग्राहि यद्यते देवं तस्या इन्द्राग्नि प्रभु मुक्त मेनम्।
अथर्ववेद- काँ 3, अ. 3, सूक्ल 11, मन्त्र 1।
अर्थात् हे व्याधिग्रस्त (त्वा) तुझको (कम) सुख के साथ (जीवनाय) चिरकाल तक जीने के लिये (अज्ञात यक्ष्मात्) गुप्त यक्ष्मा रोग से (उत्) और (राजयक्ष्मात्) सम्पूर्ण प्रकट राजयक्ष्मा रोग से (हविषा) आहुति द्वारा (मुञ्चामि) छुड़ाता हूँ (यदि)जो (एतत्) इस समय में (एनमा) इस प्राणी को (ग्राहिः) पीड़ा ने वा पुराने रोग ने (जग्राहि) ग्रहण किया है (तस्याः) इससे (इन्द्राग्नि) वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुड़ावें।
इससे स्पष्ट हुआ, कि वेद हर प्रकार के तपेदिक की चिकित्सा वायु और अग्नि द्वारा बतलाता है।
मसिहुलमुल्क हकीम अजमल खाँ साहब ने लिखा है कि गलाई हुई औषधि अपनी तीव्रता के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों को निःसन्देह दूर करती है।
चरक, चिकित्सा-स्थान, अध्याय 8, श्लोक 184 में लिखा है :—
“यया प्रयुक्त चेष्टया—राजयक्ष्मा पुराजितः ताँ वेद विहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्।
जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में ‘राजयक्ष्मा’ रोग नष्ट किया जाता था। उस वेद-विहित यज्ञ को रोग दूर करने के लिए करना चाहिए।
मि. ‘ट्रिलिट साहब ने लिखा है, कि खाँड के शीघ्र जलने से ‘फार्मिक एललि हाइड’ नामी वाष्प उत्पन्न होती है, जो रोग के सूक्ष्म जन्तुओं के नाश के लिये प्रबल औषधि है—यह खाँड रोग—नाशक औषधियों के साथ जलाई जाती है।
यज्ञ से इलाज :- अग्नि के साथ रोग नाशक औषधि जलाने से जन-विध्वंसकारक रोग शमन होते हैं तथा श्वास प्रश्वास के द्वारा इस वायु द्वारा विषैले कृमियों का नाश हो जाता है, क्योंकि जिस द्रव्य का हवन किया जाता है, वह उसको सर्वत्र फैला देता है। इसके लिये सम्पूर्ण औषधियों को विधिपूर्वक एकत्रित करके धूप में सुखा लेवें, पश्चात् कूट छानकर उत्तम गाय का घी मिलाकर इसके लड्डू सरीखे बना लेवें, क्योंकि सामग्री सूखी रह जाने से रोगी को कुछ खाँसी हो जाने या बढ़ जाने का अँदेशा रहता है। औषधियों के नाम जो नीचे लिखे हैं वे बहुत प्राचीन नाम हैं, इन औषधियों की नामावली निघण्टु, भाव-प्रकाश अथवा अन्य ग्रन्थ या अनुभवी वैद्यों द्वारा कर लेनी चाहिये।
औषधियों की नामावली :- मंडूटपर्णी, ब्राह्मी, इन्द्रायण की जड़, सतावरी, असगन्ध, विधारा, शालपर्णी, मकोय, अडूसा, गुलाब के फूल, तगर, राशना, वंशलोचन, क्षीरकाकोली, जटामासी, पण्डरी, गोखरु, तालमखाना, बादाम, मुनक्का, जायफल, बड़ी इलायची, बड़ी हरड़, आँवला, छोटी पीपल, जीवन्ती, पुनर्नवा, नगेन्द्रवामड़ी, चीड़ का बुरादा, गिलोग, चन्दन, कपूर, केशर, अगर, तगर, गूगल, पानड़ी, मोथा, चीता, पित्तपापड़ा। यह सब औषधियाँ सम भाग इनका दसवाँ भाग शक्कर तथा आठवाँ भाग शहद डालकर गाय के घृत में लड्डू समान बनाया जावे। इसके अतिरिक्त गाय के दूध में साठी के चावलों की खीर पृथक बनाई जावे। सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय यज्ञ करना चाहिए। रोगी, देश, काल और बलाबल के अनुसार स्वाहा शब्द का उच्चारण करें। यज्ञ की अग्नि खूब प्रदीप्त हो जिससे धुआँ ने होने पावे—उपवन अथवा अन्य प्रकार का बाग, तालाब मुख्य तथा चीड़ अथवा बाँस के जंगल में बैठकर यज्ञ करना परमोपयोगी है। साधारण रोगी को वेद-मंत्र उच्च स्वर से उच्चारण करने से यह यज्ञ सद्य फलदायक प्रमाणित होगा। उष्ण काल में दूर बैठकर आहुति देनी चाहिए तथा शीत काल में दोपहर को यज्ञ करना विशेष लाभदायक है। इन दिनों रोगी को बलाबल के अनुसार केवल फलों का रस अथवा अवस्था अच्छी हो तो फल ही सेवन करना चाहिए। दोनों समय वायु-सेवन करे, सुगन्ध युक्त पदार्थों से सुसज्जित वस्त्र धारण करे, एवं अन्य प्रकार के मनोरंजक सामान जुटावे तथा पुरुष रोगी हो तो स्त्री के, स्त्री रोगी हो तो पुरुषों के सम्भाषण, संसर्ग आदि से सर्वथा पृथक एकान्त निवास करे। कभी स्वप्न में भी एक दूसरे का संपर्क न करे।
----***----
(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए. साहित्य रत्न, शास्त्री)
युद्ध जन्य आर्थिक संकट का सबसे घातक प्रभाव मध्यम वर्ग पर पड़ा। युद्ध और युद्धोत्तर काल में श्रम जीवियों का वेतन पर्याप्त मात्रा में बढ़ गया। कृषक ने अन्न की महंगाई का लाभ उठाया। इस दुर्भाग्य ग्रस्त मध्यम वर्ग की आय में वृद्धि नगण्य रही, उसकी साधारण आय में कुछ महंगाई भत्ता जोड़ दिया गया। फलतः युद्ध-जन्य आर्थिक कठिनाइयों के वडंम्बर को सबसे भीषण रूप में मध्यम वर्ग ने अपनी ही छाती पर झेला।
यह आर्थिक संकट मकान और भोजन की कठिनाई के रूप में सबसे स्पष्ट रूप में प्रकट हुआ। भोजन वितरण की व्यवस्था ‘राशन’ द्वारा की गई और मकान के लिए समय समय पर भिन्न भिन्न नियम बनाये गये। अपने दैनिक जीवन का अधिकाँश समय अपने अपने कार्यालयों में बिताने वाला मध्यम वर्ग दोनों ही व्यवस्थाओं का पूरा पूरा लाभ उठाने में असफल रहा और फलतः उसे आधे पेट भोजन और टूटे फूटे सड़े गले मकानों से ही सन्तोष करना पड़ा। कुछ काल तक उसकी आत्मा ने विद्रोह किया, कुछ दिनों तक उसे ग्लानि रही, कुछ दिनों वह अपना निवराता पर खीज और आज वह निराशा और पराजित होकर काल-चक्र द्वारा समय परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहा है।
इस आर्थिक संकट के व्यापक प्रभाव के अंतर्गत सबसे दुखद मध्यम वर्ग का नैतिक पतन रहा। आज वह पहले की अपेक्षा कहीं अधिक असहिष्णु और अनुदार हो गया है। अब वह दिन, जब कोई स्वजन, परिजन अथवा अतिथि उसके यहाँ पधारता है उसके लिए शुभ नहीं। अब वह भोजन पर बैठते समय भूल कर भी यह नहीं सोचता कि कितना अच्छा होता यदि कोई अतिथि भी उपस्थित होता। सड़क पर निकट से निकट सम्बन्धी से भेंट होने पर वह यही मानता है कि अच्छा हो यदि वह साथ घर न जावे और उसे उसकी दरिद्रता का परिचय न हो पाये। घर के द्वार पर किसी अथिति का ताँगा रुकते ही गृह पति के मस्तिष्क में न जाने कितनी समस्यायें चक्कर काटने लगती हैं-उसे क्या खिलाया जावेगा। अस्थायी राशन कार्ड बनवा सकता तो अच्छा होता, अतिथि बैठेगा कहाँ कमरे के अतिरिक्त उसके पास एक छोटा-सा बरामदा ही तो है जिस पर उसकी साइकिल अधिकार जमाये रहती है और लो अतिथि महोदय तो बिस्तर भी नहीं लाये, जाड़े का मौसम है कैसे प्रबंध होगा-इत्यादि। लोकाचार और संस्कार की कठिन जंजीर न होती तो संभवतः उसका विद्रोही हृदय आत्मग्लानि से भर कर कह उठता कि दया कीजिए, किसी धर्मशाला या सराय में आश्रय लीजिए, वहाँ भटियारिन कुछ पैसों में ही आपको संपूर्ण सुविधायें प्रदान कर सकेगी। चलिए आपको मंजिल तक मैं पहुँचाये देता हूँ। बैठिये इसी ताँगे पर। अरे मियाँ करीम वहीं ले चलो कलकत्ते वालों की धर्मशाला में। रास्ते में नूर बेगम की सराय में वहाँ एक मिनट ठहर जाना। यह सब कह डालना और संभवतः कुछ इससे भी अधिक। पर यह सब नहीं कहता है, उसके मुँह से यह निकल भी नहीं सकता। उसका जन्म उस भारतीय परिवार में हुआ है जहाँ चिर-काल से अतिथि भगवान माना जाता है, जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सिद्धान्त मंत्र बन कर गूँजा है, जहाँ का कण-कण आत्म-त्याग, उत्सर्ग और शिष्टाचार का पाठ पढ़ता रहा है। यह सब संस्कार जो कभी उसके जीवन पथ पर कुसुम बन कर शाँति और सौरभ का प्रसार करते थे, आज उसके लिए भार स्वरूप हो रहे हैं। वह उन्हें छोड़ने के लिये व्यग्र है। किसी समय वह उन्हें नहीं छोड़ना चाहता था और वे स्वयं उसके पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं। कैसी विचित्र है इन सूक्ष्म वृत्तियों की लीला।
कुछ भी हो किसी प्रकार शिष्टाचार की रक्षा तो होना ही है और उसकी रक्षा यदि समाज की सर्वश्रेष्ठ देन मध्यमवर्ग नहीं करेगा तो क्या अनपढ़, श्रम जीवी या विलासी पूंजीपति द्वारा हो सकेगी। विश्व और मानवता को सर्वश्रेष्ठ उपहार मध्यमवर्ग द्वारा ही प्राप्त हुये हैं और यह शिष्टाचार की देन भी उसे इसी वर्ग द्वारा मिलेगी।
मध्यम वर्ग के अंतर्गत अतिथि भी हैं और स्वागत करने वाले गृह पति भी। यदि दोनों समय और स्थिति के अनुकूल अपने में परिवर्तन कर लें, कुछ अधिक व्यवहार-कुशल बन सकें तो संभव है कि शिष्टाचार इस आर्थिक-संकट के आक्रमण को साहस पूर्वक झेल सके। इस प्रयास में निम्नलिखित परामर्श क्रमशः अतिथियों और ग्रह पतियों के लिये सहायक हो सकेंगे।
(1)अतिथियों को चाहिये कि अपने साथ भोजन की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य रखें। दो एक दिन से अधिक रुकना हो तो किसी भोजनालय में अपना प्रबंध कर ले। गृह पति अधिक आग्रह करे तो अस्थायी राशन कार्ड की व्यवस्था कर ले। (2) मौसम के अनुकूल साथ में बिस्तर और कपड़े अवश्य रखें चाहे एक या दो दिन ही रहना हो। (3) जाने के पूर्व अपने आने की सूचना अवश्य दे दें। साथ में कौन कौन आयेगा, कितने दिन ठहरना है, इसकी सूचना भी आवश्यक है। पत्र में यह भी लिख दें कि यदि स्थानाभाव के कारण आपको कोई कठिनाई हो तो मेरा प्रबन्ध किसी होटल या धर्मशाला में करवा दीजिये। (4) गृह पति से विनय पूर्वक यह कह दे कि भोजन तथा अन्य व्यवस्था में किसी प्रकार अनावश्यक व्यय या बाह्य दिखाने की आवश्यकता नहीं, ऐसा होते देख उसे मानसिक कष्ट होगा। (5) इस सबके अतिरिक्त कम से कम यात्रा करने का नियम तो है ही। अधिक यात्रा का तात्पर्य आप और आपके साथियों को कठिनाई में डालना है।
गृह पतियों को भी स्मरण रखना चाहिए कि (1)अपनी विवशताओं का ज्ञान अत्यन्त विनयपूर्वक अपने अतिथियों को करा दें और उसके लिए क्षमा माँग लें (2) भोजन और स्थान के अभाव को मधुर वचन और सद् व्यवहार से पूरा करने का प्रयत्न करें (3) ऐसा कुछ भी न करें जिसके कारण उसे और उसके अतिथि को किसी भी समय ग्लानि हो। ऐसे अवसरों पर थोड़ी बहुत असुविधा भी हो तो उसे उदारता पूर्वक अंगीकार करें। वह यह स्मरण रखें कि आज वह गृहपति है, शायद कल उसे भी अतिथि बनना पड़े। आज तो वह कुछ दूसरे को देगा कल वही दूसरे से पाने की आशा कर सकता है। यदि प्रतिकार की इच्छा न करे तो भी आतिथ्य द्वारा आत्म-संतोष तो वह पा ही चुका है।
वस्तु-स्थिति को बदलने वाले तो युग प्रवर्तक नेता और अग्रइत होते हैं, और उस पद को पाने की तो सब में क्षमता भी नहीं। मध्यम वर्ग का साधारण प्राणी तो केवल अपने आपको स्थिति के अनुकूल बनाने का अधिकारी है। जिसमें पात्र बदल देने की शक्ति न हो उन्हें जल-वत तरल होने की क्षमता चाहिये।
आज घर घर में शिष्टाचार की रक्षा का प्रश्न दैनिक जीवन का सबसे दुखद भाग बन गया है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिये यह अधिक विषम रूप में उपस्थित होता है। उनमें दिखावा अधिक और सहिष्णुता बहुत कम रहती है। उनकी संकुचित बुद्धि तथा असहिष्णुता के कारण बेचारा मध्यम वर्ग का प्राणी कहीं और भी अधिक संकट में पड़ जाता है। एक ओर तो अतिथि की मर्यादा निभाना और दूसरी ओर श्रीमती जी की चढ़ी त्यौरियों की बौछार को झेलना। इन दोनों के बीच में खड़ा हुआ पुरुष करुणा का पात्र है।
भगवान अतिथि को विवेक और गृहपति को क्षमता दे, जिससे शिष्टाचार की नाव आर्थिक-संकट के तूफान में लय न हो जाये।
----***----
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
भारत की आर्थिक स्थिति का सुधार तब तक नहीं आरम्भ होगा, जब तक बच्चे पैदा करना कम न होगा। मेरा यह निश्चित विचार है और मैं इसे सही तौर से ठीक मानता हूँ। यह एक स्पष्ट और सच्ची बात है। भारत की आर्थिक समस्या जटिल होने का मुख्य कारण यहाँ की बढ़ती हुई आबादी है। आप इसे कुछ और समझ सकते हैं, पर मेरे विचार से जब तक आप जन्म निरोध नहीं करेंगे, यहाँ की गरीबी कभी भी दूर नहीं होगी। मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ कि भारत की आबादी भयानक रूप से बढ़ती चली जा रही है, आप मेरे कथन पर विश्वास कीजिये। आज भारत की जो स्थिति है, वही सौ वर्ष पूर्व यूरोप की भी थी, किंतु विज्ञान और शिक्षा बल पर वहाँ की स्थिति एक दम बदल गयी है। भारत में भी वैसा ही किया जा रहा है। यहाँ शिक्षा का प्रसार करना होगा और डॉक्टरों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे देहात में जाकर लोगों को जन्म निरोध का महत्व और तरीके समझायें। अगर आप यह कर लेंगे, तो तीस वर्षों में ही भारत में एक बहुत बड़ा परिवर्तन हो जायगा।
उपर्युक्त कथन में बरट्रैंड रसल ने हमारे समाज के एक मर्मस्थल, पर उँगली रख दी है। निःसंदेह खाद्य-स्थिति सुधारने के लिये हमें अपनी जनसंख्या को रोक देना होगा या कम से कम वृद्धि करनी होगी। कल्पना कीजिए, जिस भारत में कम आयु में विवाह किए जाते हैं, उनसे उत्पन्न लाखों नये प्राणी जो प्रतिवर्ष बढ़ रहे हैं, उनके लिए अन्न, वस्त्र, काम और मकान इत्यादि कहाँ से आयेंगे? बरट्रेंड रसल के कथनानुसार जन्म-नियन्त्रण के बिना केवल बाहर से अनाज मँगा मँगा कर खाद्य समस्या पर काबू पाना सम्भव नहीं है। मद्रास धारा सभा में श्री. ति. विश्वनाथ ने परिवार वृद्धि रोकने के लिए एक बिल पेश करने का नोटिस दिया है। इसके अतिरिक्त “नया समाज” मासिक-पत्र ने इस समस्या पर अनेक विद्वानों के एवं लेख प्रकाशित कर जनता का ध्यान इस रोग की ओर आकृष्ट किया है। सर्व श्री. सन्तराम बी. ए. भँवरमल सिंधी इत्यादि ने अपने लेखों द्वारा सन्तानोत्पत्ति पर नियंत्रण रखने पर जोर दिया है। जनता में इस सम्बन्ध में जागृति उत्पन्न करने की विशेष रूप से आवश्यकता है।
संतति-निरोध से व्यक्तियों, कुटुम्बों, समाज और जाति की सभी समस्याएँ हल हो सकती हैं। हमारे परिवारों में जो आर्थिक दैन्य दिखाई देता है, उसका प्रधान कारण यह है कि कमाने वाला एक है, तो खाने वाले आठ या दस हैं। औसत परिवार में बच्चों की संख्या 6-7 है। कहीं कहीं तक तो दस बारह तक होते हैं। भारत में अल्प आयु में विवाह की तौक गले में डाल दी जाती है। अतः अनियंत्रित संतानोत्पत्ति के कारण कुटुम्ब की औसत आय न्यूनातिन्यून होती जा रही है। बेचारा पिता क्षणिक भोग के लालच में फँसकर अपनी वासना को नहीं दबा पाता। फलतः प्रति दूसरे वर्ष एक नवीन व्यक्ति का कुटुम्ब में पदार्पण होता जाता है। वह खाने पहनने की कमी अनुभव करता है। अपना पेट काटकर अपने बच्चों को खिलाता है। स्वयं अपने आप नंगा भूखा रह कर बच्चों को पहनाता है। पिता की आय भी कम होती जाती है। सबसे अधिक दूषित प्रभाव तो माता पर पड़ता है। संतति धारण, प्रजनन तथा पालन-पोषण की जिम्मेदारी माता पर अपेक्षाकृत अधिक है। पुरुष को आर्थिक कठिनाइयों का ही अनुभव होता है, किंतु माता को अपने रक्त और दूध के अतिरिक्त सेवा-ममता और पालन-पोषण रात रात भर जगना, बीमारी में देख रेख हजारों छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को सहन करना होता है। उसका स्वास्थ्य शीघ्रता से गिरने लगता है। अधिक संतान उत्पन्न करने वाली नारियाँ उत्फुल्ल यौवन में ही वृद्धावस्था के समीप आ जाती हैं। पुरुष प्रायः स्त्रियों की इच्छा-अनिच्छा, समय-असमय का भी विचार नहीं करते हैं और बलात्कार से विषय-क्षुधा शान्त करने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं। फलतः स्त्रियों को अनिच्छापूर्वक मातृत्व प्राप्त होता है। इस प्रकार उत्पन्न बच्चों का मानसिक संस्थापन आरम्भ से ही दुर्बल हो जाता है। वे कमजोर, पागल, अन्धे, लँगड़े-लूले, बदसूरत, बुद्धिहीन होते हैं इससे समाज जाति या राष्ट्र का कोई हित नहीं हो सकता। आजीविका के साधन तो जल्दी जल्दी वृद्धि को प्राप्त नहीं होते, अनावश्यक बच्चों, विशेषतः पुत्रियों की संख्या के साथ दारिद्रय भी बढ़ता जाता है। दारिद्रय के साथ साथ स्त्री-पुरुषों की काम करने और रोजी कमाने की शक्ति भी क्षीण होती है। शक्ति हीनता का प्रभाव सम्पूर्ण परिवार पर है। स्वयं माता-पिता चिड़चिड़े, क्रोधी, निर्बल और निराश हो जाते हैं, पोषक भोजन प्राप्त न होने के कारण चिंता रहने लगती है। चिंता में न बच्चों का ही लालन पालन समुचित रीति से हो सकता है, न शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक उन्नति ही सम्भव है। ऐसे समाज की गति शराब, तम्बाकू तथा नशे की ओर जाती है। व्यभिचार जनित गुप्त रोगों से समाज में व्यक्ति अल्पायु होता जाता है।
सन्तति-निग्रह के साधन होते ही समाज उन्नति करेगा। जो थोड़े से बच्चों के पालन का उत्तरदायित्व एक परिवार पर पड़ेगा वह सरलता से वहन किया जा सकेगा न आवश्यकता से अधिक बच्चों की वृद्धि होगी, न परिवारों और समाज का दारिद्र बढ़ेगा। खाद्य समस्या हल हो जायगी। न स्त्रियाँ निर्बल, कमजोर, निराशावादी चिन्तित रहेंगी, न मनुष्य शराबी और व्यभिचारी होगा, न उसे तथा स्त्री को गुप्त रोग होंगे, न रोगी, विकलाँग, बुद्धिहीन बच्चे ही उत्पन्न होंगे न गृह-सौख्य नष्ट होगा। हमारे समाज में जो निर्धनता और आर्थिक कठिनाई फैल रही है वह सरलता से हल हो जायगी। ये सब लाभ तो हैं ही, इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य-धर्म, अध्यात्म-राष्ट्रीयता के दृष्टिकोण से भी अनेक लाभ हैं।
श्रीयुत बैजनाथ महोदय के शब्दों में इससे (1)माता-पिता की शक्ति और तेजस्विता बनी रहेगी (2) पुरुष इसी शक्ति को अन्य क्षेत्रों (कला साहित्य चित्रकारी, काव्य, देश सेवा, अध्ययन) में परिवर्तित कर अपने देश को अनेक फायदे पहुँचा सकेंगे। (3) यदि संयम धार्मिक होगा तो उसके द्वारा मनुष्य की असाधारण आध्यात्मिक उन्नति हो सकती है, जो सच्चे सुख और शान्ति का सीधा मार्ग है (4) जिस देश में स्त्री और पुरुष संचारी होंगे, आत्मविजयी होंगे, उसके लिए सुख और सम्पत्ति साधारण सी बात है, (5) इस मनोविजय के पुरुषों को जो शिक्षा प्राप्त होती है, वह अमूल्य है। (6) आस-पास का वातावरण स्वतन्त्र हो जायगा तथा बच्चों पर उच्च संस्कारों का प्रभाव पड़ेगा। (7) समाज में सन्तोष और भक्ति की वृद्धि हो जायगी क्योंकि ऐसा समय केवल भक्ति की सहायता से ही सुरक्षित रह सकता है।
संक्षेप में संतति निग्रह से माता और बच्चों का स्वास्थ्य सुधर जायगा, औसत आय, स्वास्थ्य, सौंदर्य की वृद्धि होगी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उत्तरदायित्व कम रहने से माता-पिता मानसिक स्वतन्त्रता का अनुभव करेंगे। स्वास्थ्य की रक्षा वीर्य की रक्षा के साथ स्वयं ही आ जायगी। आर्थिक दृष्टि से भुखमरी की समस्या हल हो जायगी। कम संतानों को कपड़ा और भोजन आसानी से दिया जा सकता है। भारत की जनसंख्या में कमी हो जायगी, नस्ल में सुधार होगा। बच्चे उतने ही होंगे जितना पालन पोषण श्रेष्ठ से श्रेष्ठ हो सकता है। जब माता थोड़े से हृष्ट-पुष्ट बच्चों को जन्म देंगी, तो मृत्यु संख्या भी कम हो जायगी। न कमजोर बच्चे उत्पन्न होंगे न मृत्यु होगी। अतः आज देश में संतान निग्रह की नितान्त आवश्यकता है।
संतति निग्रह का सर्वोत्तम उपाय संयम है, ब्रह्मचर्य रहने से ही स्त्री पुरुष दोनों का स्वास्थ्य और बल बना रहता है, एक दूसरे में आकर्षण रहता है और प्रेम की डोर टूटने नहीं पाती, गृहस्थियों को ब्रह्मचारी रहना चाहिए। महात्मा गाँधी ने यह उपाय सर्वश्रेष्ठ बताया है। गाँधी जी कहते है :—
“संभोग का एकमात्र उद्देश्य प्रजनन है। यह मेरे लिए एक प्रकार से नयी खोज है। इस नियम को मैं जानता तो पहिले ही था, लेकिन जितना चाहिए उतना महत्व इसे मैंने पहिले नहीं दिया था। अभी तक मैं इसे खाली पवित्र इच्छा मात्र समझता था लेकिन अब तो मैं इसे विवाहित जीवन का ऐसा मौलिक विधान मानता हूँ कि यदि इसके महत्व को पूरी तरह मान लिया जाय तो इसका पालन कठिन नहीं। मैं यह मानता हूँ कि कृत्रिम संतति निग्रह के साधनों का प्रतिपादन करने वालों में जो सबसे बुद्धिमान हैं, वे उन्हें उन स्त्रियों तक ही सीमित रखना चाहते हैं, जो सन्तानोत्पत्ति से बचते हुए अपनी ओर अपने पतियों की विषय वासना तृप्त करना चाहतीं हैं। लेकिन मेरे ख्याल में मानव प्राणियों में यह इच्छा स्वाभाविक है, और उसे तृप्त करना मानव कुटुम्ब की आध्यात्मिक प्रगति के लिए घातक है।”
गाँधी जी की उक्त विचारधारा में गहरा सत्य है। प्रत्येक व्यक्ति को विषय भोग की निःसारता समझनी चाहिए और अनावश्यक वीर्य नाश से सावधान रहना चाहिए। काम वासना जीवन दायिनी शक्ति है। इस शक्ति का उपयोग अन्य कार्यों में हो सकता है। हमें चाहिए कि ललित कलाओं की साधना में, देशोद्धार, समाज सेवा के पवित्र कार्यों में लग कर काम वासना की शक्ति का सदुपयोग करें।
जो व्यक्ति समय और ब्रह्मचर्य के पवित्र साधनों को प्रयोग करेंगे, वे निश्चय ही बड़े भाग्यवान हैं और मानव से बहुत उच्च स्तर पर हैं। जो यह पथ अपनाते हैं, वे अपना जीवन दीर्घकाल तक स्थिर रख सकते हैं। उनका तेज, बल, बुद्धि, वीर्य निरन्तर अभिवृद्धि को प्राप्त होता है। आत्म संयम ही विवाह का सच्चा सुख प्राप्त करता है।
जो लोग यह कार्य नहीं कर सकते उन्हें कृत्रिम उपाय काम में लाने चाहिये। ये तीन श्रेणियों में विभाजित हो सकते हैं-(1)याँत्रिक साधन (2) रासायनिक उपाय (3) शल्य क्रिया। याँत्रिक साधन कई प्रकार के हैं, जिनका प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। इस श्रेणी में रबर की बनी हुई कोमल शीथ इत्यादि आती हैं। जिनका प्रयोग पुरुष करते हैं। स्त्रियों के लिए चैक पेसरी या फीमेल शीथ है। इनके प्रयोग में सावधानी करनी चाहिए। —
—चाहे जितना गुस्से का कारण मिलने पर भी जो मनुष्य गुस्से के आधीन न होकर-नुकसान नहीं करता-वही जीतता है। उसी ने नियम का पालन किया कहा जायगा।
—जो मदद बदला चाहे वह भाड़े की मदद है। भाड़े की मदद भाई-चारे का चिन्ह नहीं कहाती। मिलावट की सीमेंट जैसे पत्थर नहीं जोड़ सकती उसी तरह ‘किराये की मदद से भाई-बन्दी नहीं होती।
—एक पशु दूसरे को केवल अपने शारीरिक बल से ही वश में कर लेता है। उसकी जाति का यही कायदा है। मनुष्य जाति का स्वाभाविक कायदा प्रेम-बल से-आत्मिक बल से-दूसरों को जीतने का है।
----***----
(श्री मालीराम जी पुरोहित)
निद्रा शरीर रूपी यन्त्र का स्वाभाविक विश्राम है। दिन में मानसिक एवं शारीरिक कार्य करने से शरीर क्लान्त हो जाता है, निद्रा से उसकी पूर्ति होती है। अतएव निद्रा स्वास्थ्य रक्षा और बल-वृद्धि के लिए आवश्यक है। निद्रा के बिना कोई भी मनुष्य अधिक दिन तक जीवित नहीं रह सकता। जिस प्रकार काम करने के लिए दिन है उसी प्रकार शयन के लिए रात्रि है। निद्रा में अधिक समय व्यतीत नहीं करना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए अधिक निद्रा की नहीं, किन्तु प्रगाढ़ निद्रा, स्वप्न-दूषित 8--10 घण्टे की हल्की निद्रा की अपेक्षा अधिक हितकारी है। दीर्घ निद्रा हानिकारक है इस कारण निद्रा जितनी दीर्घ होती है, उतनी ही हल्की होती है। एक युवा मनुष्य के लिए 24 घण्टे में केवल 5-6 घण्टे की निद्रा पर्याप्त है। शीतऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में, निरोग मनुष्य की अपेक्षा रोगी मनुष्य को, बड़े आदमी की अपेक्षा छोटे आदमी को या बालक को एवं शारीरिक परिश्रम करने वाले मनुष्य की अपेक्षा मानसिक परिश्रम करने वाले मनुष्य को अधिक निद्रा की आवश्यकता है। रात्रि ही गहरे विचारों को मन में प्रवेश कराने का सर्वोत्तम समय है। ऐसे श्रेष्ठ समय को केवल निद्रा में न व्यतीत कर, उसका कुछ भाग अन्य कार्यों के लिए भी निर्धारित करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में दोपहर के समय विश्राम करना स्वास्थ्य के लिये अच्छा है।
निद्रा प्रकृति दत्त अमूल्य वस्तु है। प्रकृति देवी की आज्ञानुसार चलने वाले इस स्वर्गीय सुख से कदापि वञ्चित नहीं रहने पाते। प्रकृति के नियमों को तोड़ने वाले मनुष्यों को ही अनिद्रा रोग होता है।
अनिद्रा आलस्य की जननी है। आलस्य में पड़े रह कर निद्रा के सुख की आशा करना व्यर्थ है। अतः परिश्रम ही उत्तम निद्रा का मूल कारण है। प्रकृति देवी के नियमानुसार स्वच्छ वायु में उपयुक्त परिश्रम करने से प्रगाढ़ निद्रा अवश्य आयेगी। किन्तु यह याद रखना चाहिए कि अधिक परिश्रम भी अनिद्राकारक और स्वास्थ्य नाशक है उत्तम निद्रा आने पर बुरे स्वप्न की सम्भावना नहीं रहती।
खुली हवा में भ्रमण करके मस्तिष्क सम्बन्धी दुस्तर रोगों से ग्रसित अनेक मनुष्य निरोग हुए हैं। भ्रमण का अर्थ रेल आदि पर घूमना नहीं है, लेकिन पैदल चलना ही श्रेष्ठ भ्रमण है। यह अनेक रोगों की अचूक औषधि है। दृढ़ शय्या सुनिद्रा के लिए उत्तम है। उत्तम निद्रा के लिए परिमित शारीरिक और मानसिक परिश्रम उत्तम पौष्टिक और सादा आहार, दृढ़ शय्या, शुद्ध शीतल वायु का सेवन, अन्धकार, निस्तब्धता, निश्चिन्तता, नियम और समय निष्ठादि विशेष अनुकूल हैं।
निद्रा के आने पर क्रम से दर्शन, स्पर्श, स्वाद, घ्राण आदि इन्द्रियाँ निद्रित होती हैं मस्तिष्क सबके पीछे निद्रित होता है। अनेक बार मस्तिष्क पूर्णरूपेण निद्रित नहीं होता। निद्रावस्था में भी उसकी किंचित क्रिया होती रहती है। मस्तिष्क के क्रिया शून्य न होने से निद्रा का उद्देश्य पूर्णतया सिद्ध नहीं होता। मस्तिष्क के निद्रित न होने पर उसको उत्तम निद्रा नहीं कहा जा सकता। इसलिए निद्रा आने से प्रथम मन को पूर्ण रूप से चिन्ता शून्य कर लेना आवश्यक है। शयन करते समय बहुत लोग समस्त चिन्ताओं को सहज ही में दूर करके तथा गम्भीर निद्रा का यथेष्ट सुख लाभ कर सकते हैं, बशर्ते वे अपना कालयापन, यावज्जीवन सात्विक आहार तथा सात्विक कामों से करें।
निद्रावस्था में मस्तिष्क में रुधिर का प्रवाह कम हो जाता है इसलिए तम्बाकू , चाय, काफी आदि जिन पदार्थों के सेवन से रुधिर का मस्तिष्क की ओर अधिक संचालन होता है, शयन करने के पहले उनका सेवन नहीं करना चाहिए। ये सभी पदार्थ निद्रा में व्याघात करते हैं। सिर के ऊपर शीतोपचार करने से सिर में जो तीव्रता से रुधिर का संचालन होता है वह तत्काल कम हो जाता है।
रात्रि के प्रथम भाग की निद्रा अर्थात् 12 बजे से पहले की आधी रात के बाद की निद्रा की अपेक्षा श्रेष्ठ है। उठने का समय 4 बजे लाभकारी होता है। समय पर सोना और सवेरे उठना स्वास्थ्य रक्षा का सबसे श्रेष्ठ नियम है। उत्तम निद्रा में स्वप्न आदि नहीं दीखते और यदि दीखते भी हैं तो याद नहीं रहते।
दायीं करवट सोने की अपेक्षा बायीं ओर सोना हित कारी है। दायीं करवट से सोने पर पाकस्थली के ऊपर भारयुक्त यकृत का और हृदय पिण्ड पर पाकस्थली का दबाव पड़ता है। सीधा याने चित होकर शयन करना अत्यन्त हानिकर है क्योंकि ऐसा करने से रुधिर संचालन में बाधा पड़ती है, स्नायुओं के ऊपर दबाव पड़ता है। इस कारण स्नायुओं में दुर्बलता उत्पन्न हो जाती है। इसलिए दक्षिण करवट से शयन करना ही हितकर है। सिर को उत्तर की तरफ करने से बहुत हानि होती है। दक्षिण की ओर पाँव करके शयन करना निषिद्ध बताया गया है।
जागते ही तत्काल बैठ नहीं जाना चाहिए। उस समय शरीर में कुछ आलस्य होता है। इसलिए ऐसी अवस्था में उठने से शरीर में दुर्बलता हो जाती है। निद्रा से मुक्त होने पर कुछ देर बाद शय्या से उठना चाहिए।
अधिक ऊँचा तकिया लगाकर शयन करना ठीक नहीं है। ऐसा करने से श्वासोच्छवास की क्रिया ठीक तरह से संचालित नहीं हो पाती।
शयन के स्थान से दीपक या लैम्प दूर रखना चाहिए, यानी उसकी रोशनी नेत्रों पर न पड़नी चाहिए।
(श्री मनोहरदास जी अप्रावत उम्मेदपुरा)
किसी घटिया चीज का रंग-रूप बदल कर किसी बढ़िया चीज के नाम और रूप का बताकर केवल अधिक दाम लेने के लिए किसी चीज को बनाना और बेचना धोखा है, नकली घी, तेल है उसमें घी का कोई गुण नहीं फिर भी घी का रंग रूप सुगन्धि देकर तेल से अधिक दामों पर बेचना ईमानदारी नहीं। यह धोखा और भी बढ़ जाता है जब वह असली चीज के नाम से या मिलावट करके बेची जाय।
प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. राईट की जाँच के अनुसार 90 प्रतिशत वनस्पति घी केवल मिलावट के काम आता है कारखाने वाले मिलावट के लिए घी का रंग रूप तथा सुगन्ध देते ही हैं, दुकानदार मिलावट करके बेचते हैं, किसान भी मिलावट करने पर मजबूर हुआ है। प्राचीन काल से किसी असली चीज में नकली की मिलावट करना या असली जैसी बनाना दोष और अपराध माना गया है, आज भी संसार के प्रायः सभी देशों में मिलावट करना एक संगीन जुर्म है। हमारे देश में भी एक कागजी कानून बना हुआ है। वनस्पति घी के प्रचार से कारखाने वाले ही नहीं दुकानदार और शुद्ध घी पैदा करने वाले किसान का नैतिक पतन हो रहा है। नैतिक पतन होने के कारण शुद्ध घी की तसल्ली नहीं रही। कितने ही लोग जो वनस्पति घी का नाम लेने में शर्म महसूस करते थे, मिलावट के कारण शुद्ध घी का विश्वास न होने से खुले बाजार वनस्पति घी खरीदते हैं। कारखाने वालों ने मूँगफली, बिनौले और नारियल के तेल को जमा, उसमें शुद्ध घी जैसी सुगन्ध दे दानेदार तो बनाया है, जिस इलाके में भैंस का घी अधिक होता है वहाँ हल्का हरा और जहाँ गाय का वहाँ हल्का पीला रंग मिलाकर, ऐसा नकली घी तैयार करते रहे हैं जिसकी मिलावट करने की जरूरत नहीं, वनस्पति का लेबल उतार कर कनस्तर खोलें तो यह शुद्ध वनस्पति, गाय या भैंस का शुद्ध घी प्रतीत होगा, यह नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
नकली घी जिन तेलों से बनता है उनमें अधिक गुण नहीं रहता, जमाने के कारण हजम करने में कुछ न कुछ कमी या खराबी ही आती है, इसमें शरीर को पौष्टिक करने वाले तत्व विटामिन या खनिज और प्रोटीन भी नहीं होते। सर्वप्रथम सन् 1937 में कैप्टन थामस आई. एम. एस. कैमिकल इनेलाईजर ने पंजाब सरकार से अनुभव करके बतलाया कि नकली घी के खाने से कोई लाभ नहीं हानि ही होती है। पंजाब सरकार ने अपने पत्र नं. 63186 ता. 15, 12, 17, द्वारा भारत सरकार को इसे बन्द करने के लिए लिखा। कर्नल मैकी आई. एम. एस. डायरेक्टर वैक्टोरी ओलोजीकल लैबोरेटरी बम्बई सरकार ने बताया कि बालक और वृद्ध इन तेलों को खाकर अपने स्वास्थ्य को बरबाद करे देंगे। इसकी बिक्री कतई बन्द कर देनी चाहिए। देश के प्रसिद्ध हाफकिन संस्था के संचालक सर साहिबसिंह, श्री सोखे ने भारत सरकार के भूतपूर्व खाद्य मन्त्री श्री बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी के इस कथन पर कि जमाये तेलों पर पोसे चूहों की तीसरी पीढ़ी अन्धी हो गई, अपना अभिप्राय देते हुए बताया कि हाफकिन संस्था के प्रयोग से यह तथ्य निकला कि जमाये तेल के खाने से शरीर की वृद्धि कम हुई, कैल्शियम (चूने) के परिपाचन में बाधा पहुँची, शरीर की घटना में बदल हुआ। आपने कहा जमाये तेल की अपेक्षा शुद्ध तेल का खाना अधिक अच्छा तथा सस्ता रहेगा। देश के प्रायः डॉक्टरों, वैद्यों तथा हकीमों ने इस जमाये तेल को सेहत के लिये खराब बतलाया।
इज्जत नगर (बरेली) की सरकारी प्रयोगशाला में 1-10-45 से 31-3-46 तक छः महीने मनुष्य जैसे पाचक शक्ति आदि रखने वाले चूहों पर शुद्ध घी तथा नकली घी का अनुभव करने पर परिणाम निकला कि वनस्पति घी खाने वालों में अधरंग, पेशाब की खराबी, या नपुंसकता आदि बीमारी हो गई, छः माह बाद 40 से सौ फीसदी तक मृत्यु भी हुई पर शुद्ध घी खाने वाले स्वस्थ रहे तथा बढ़े। भारत सरकार ने इज्जत नगर का नतीजा जनता को बतलाने के लिए एक चित्र द्वारा सन् 1947 की खाद्य तथा पशु प्रदर्शिनी में यह दिखलाया कि-चूहों पर यह नतीजा तीन पीढ़ी में मालूम हुआ, चूहों की यह तीन पीढ़ी छः महीने में ही हो गई पर मनुष्य की कम से कम साठ साल में होती है। अतः नकली घी का परिणाम मनुष्य शरीरों पर जल्दी मालूम नहीं होगा। जो लोग वनस्पति घी के साथ-2 अन्य पदार्थ खाते हैं उनका तो और भी देर में प्रतीत होगा। पर कारखाने वालों का यह कहना है कि उन्होंने पौष्टिकता की कमी दूर करने के लिए विटामिन मिला दिया है। यह विटामिन प्रायः मछली के तेल में से ही निकाले जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय भोजन पौष्टिक सम्मेलन होट स्प्रिंग (वर्जिनीया) ने निश्चय किया कि विटामिन का अलग मिलाना सेहत की दृष्टि से हानिकारक है। नकली घी में प्राकृतिक विटामिन नहीं, बाहर से मिलाना हानिकारक है अतः नकली घी में जो नकली पौष्टिकता मिलाई गई है वह और भी अधिक खराबी करती है।
अर्थशास्त्र का एक सर्वसिद्ध करेंसी या सिक्के का नियम है कि जब बाजार में नकली तथा जाली सिक्के आ जाते हैं तो असली को बाजार में से निकाल देते हैं। इस नियम का प्रभाव सब चीजों पर पड़ता है। इसी नियम के अनुसार नकली घी शुद्ध घी को निकाल रहा है। जिससे नकली घी की उत्पत्ति दिन-2 बढ़ती तथा शुद्ध घी कम हो रहा है जैसा कि नीचे सरकारी अंकों से प्रकट होता है—
सन् 1937 में शुद्ध घी की पैदावार देश भर में दो करोड़ 30 लाख मन थी, सन् 1947 में वह केवल 1 करोड़ 11 लाख मन रह गई अर्थात् आधे के करीब घट गई। इसके विपरीत वनस्पति घी के उत्पादन में पाँच गुनी वृद्धि हुई सन् 37 में वनस्पति घी 6॥ लाख मन थी वह सन् 47 में 31॥ लाख मन हो गई।
सरकारी तखमीने के अनुसार 1952 तक नकली घी का उत्पादन 4॥ लाख टन या 126 लाख मन हो जायगा। इसे पूरा करने के लिये नये कारखाने लगाये जा रहे हैं। यदि शुद्ध घी की कमी तथा नकली घी का उत्पादन बढ़ाने की यही गति रही तो अगले दस साल में शुद्ध घी का मिलना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जायगा शुद्ध घी से किसान को अनुमानतः दो अरब रुपये वार्षिक मिलते रहे हैं वह नहीं मिलेंगे। सन् 1937 में जब नकली घी की उत्पत्ति 25 हजार टन थी किसान को तीन करोड़ रुपये वार्षिक केवल मिलावट के कारण नुकसान था। अब इसका उत्पादन तथा मिलावट बढ़ाने के कारण इन दिनों भी 15 करोड़ सालाना से कम नुकसान नहीं। किसान प्रायः शुद्ध घी खाते हैं न नकली खरीद सकते हैं। उन्हें शुद्ध घी निकालने से तैयार हुई छाछ खाने से सी पौष्टिकता प्राप्त करने तथा बैसाख जेठ की तपती हुई धूप और पाँच माह की कड़कड़ाती सर्दी में काम करते हैं (हमारे देश में 6075 लाख मन छाछ तैयार होती है) शुद्ध घी की पैदावार कम होने से छाछ भी न मिलेगी। किसान शुद्ध घी की आमदनी से ही वंचित नहीं होगा। उसका शारीरिक ह्रास भी आवश्यक है। जब शुद्ध घी की पैदावार तथा बिक्री को धक्का लगेगा तो महात्मा गाँधी जी के 8-1-40 के लेख तथा शाही कृषि कमीशन की रिर्पोट के अनुसार पशुओं का रखना कठिन हो जायगा। कृषि तथा पशुपालन को नुकसान पहुँचेगा। नकली घी के कारखाने दिन-2 गाय को दबा रहे हैं तथा किसान भी नकली घी खरीद रहा है।
भारत सरकार के कृषि तथा पशुपालन महकमे में तथा भारत सरकार द्वारा नियुक्त की गो रक्षा विशेषज्ञ कमेटी ने गोवंश तथा किसान नुकसान को दृष्टि में रखते हुए तेलों के जमाने को बन्द करने की सिफारिश की है। नकली घी का खरीददार अज्ञान या ज्ञान से घी के नाम पर तेल खरीदता है। पर उसे शुद्ध तेल की अपेक्षा 50 प्रतिशत या 15 करोड़ रुपया अधिक देने पड़ते हैं। जिसके बदले उसे तेल नहीं तेल से घी घटिया चीज मिलती है। आज जब कि शिल्प कार्य बढ़ाने के लिए धन, समान, मजदूर तथा रेल गाड़ियों की बड़ी जरूरत है। वनस्पति के काम में 15 करोड़ रुपया, 50 लाख के रासायनिक पदार्थ, 15 हजार रेल गाड़ियाँ, हजारों मन कोयला और कितने ही मजदूर तथा कार्यकर्त्ता इस व्यर्थ चीज पर लगे हुए हैं। इतना धन जन तथा सामान लगने पर भी देश को तोला भी चिकनाई नहीं मिलती। बल्कि दक्षिणी भारत, मद्रास, उड़ीसा इत्यादि में जो लोग मूँगफली या नारियल का शुद्ध तेल खाते हैं उन्हें भी नकली घी नुकसान पहुँचा रहा है। भविष्य में तो मिलेगा भी नहीं। वनस्पति घी प्रायः मूँगफली के तेल से बनता है। इस तेल की कुल पैदावार अनुमानतः 4 लाख टन ही हैं। सन् 1952 तक नकली घी तैयार होगा साढ़े चार लाख टन।
शुद्ध तेल के खाने वाले को 50 रु . मन में शुद्ध तेल मिलता है उसे 90 या 95 रु . प्रति मन का नकली घी खरीदना पड़ेगा। नकली घी के प्रचार से किसान और इसके पशु तो बर्बाद होंगे ही, शुद्ध तेल खाने वाले लोगों को भी हानि उठानी पड़ेगी। उपयोगी और आवश्यक शिल्प बढ़ाने के साधनों में भी रुकावट आयेगी॥
—क्षत्रियता सीखने के लिये पुष्ट शरीर की (उतनी) जरूरत नहीं पर मजबूत निडर दिल की जरूरत है। क्रूरता, कठोरता, क्षत्रियता का गुण नहीं परन्तु सहन शीलता, क्षमा, दया, उदारता, अ-पलायन और घोर अशक्ति में भी स्थिर होकर निर्भयता से खड़े रहने की शक्ति में क्षत्रियता है।
*****
—केवल शान्ति और अटल निश्चय का मिलाप जब न्याय पूर्ण कारण के साथ होता है तब उसके परिणाम में सदा विजय ही होती रही है। न्याय के लिये मरना—मनुष्य का नियम है, मारना—जानवर का है।
*****
—ब्रह्मचर्य का अर्थ कान, आँख, नाक, जीभ और चर्म-इन सब इन्द्रियों का संयम है। यह धर्म केवल संन्यासी के लिए नहीं, सद्गृहस्थों के लिए है। जो इस सादा नियम का पालन न करता हो यह सद्गृहस्थ नहीं।
श्री कविराज महेन्द्र नाथ पाण्डेय ने “शहद के गुण और उपयोग“ नामक पुस्तक लिखी है। उसका कुछ अंश नीचे उद्धृत किया जाता है।
(1) त्रिफला का चूर्ण शहद, घी और कान्तिसार भस्म इन सब को मिलाकर रात में सेवन करने से पुरुषार्थ बढ़ता है।
(2) त्रिफले का काढ़ा शहद के साथ पीने से मेद रोग अर्थात् मोटापा दूर होता है।
(3) हल्दी का चूर्ण, आँवले का रस और शहद मिलाकर चाटने से प्रमेह नष्ट होता है।
(4) 3 माशे हल्दी का चूर्ण और एक तोला शहद एक में मिलाकर चाटने से प्रमेह नष्ट होता है। कोई कोई वैद्य इसको विद्या बागीश कहते हैं।
(5) गुरुच के स्वरस में शहद मिलाकर पीने से प्रमेह नष्ट होता है। इसी दवा से कामला या पीलिया रोग भी अच्छा होता है।
(6) गुरुच का रस एक माशा, सेंधा नमक एक माशा, शहद एक माशा तीनों को खरल करें और किसी बर्तन में रख लें। इसका अंजन आँखों में लगाने से आँखों की खुजली, मोतियाबिन्द और काले और सफेद भाग के सब रोग नष्ट होते हैं।
(7) एक तोला आँवले का रस और एक तौला शहद एक में मिलाकर चाटने से प्रमेह नष्ट होता है।
(8) एक तोला शहद में बारह रत्ती शुद्ध शिलाजीत मिलाकर चाटने से प्रमेह नष्ट होता है। यह प्रयोग कम से कम 21 दिन तक करना चाहिये।
(9) शहद, सेमर की छाल का रस और हल्दी का चूर्ण एक में मिलाकर चाटने से प्रमेह रोग नष्ट होता है।
(10) शहद, पका केला, आँवले का रस और मिश्री एक में मिलाकर खाने से पुरुषों का प्रमेह और स्त्रियों का प्रदर रोग नष्ट होता है।
(11) शहद को रुमी मरतगी के साथ देने से दिमाग की खराब रतूबत या विकार निकल जाता है। और इसी तरह मेदे को ताकत मिलती है।
(12) फालिज, लकवा, अंगों का टेढ़ा होना और वायु के विकारों में और पेट में वायु भरने पर भी शहद का उपयोग बहुत लाभदायक होता है।
(13) कुन्दूर एक प्रकार का गोंद है, इसके साथ शहद खाने से, कमल, तिल्ली को दूर करता है और गुरदे की पथरी को साफ करता है।
(14) शहद का गरारा करने से गले की सूजन और जीभ के छाले और घाव में लाभ पहुँचता है।
(15) सिर के में मिलाकर दाँत मलने से दाँत साफ होते हैं और दाँत और मसूड़ों में ताकत आती है।
(16) आँख में शहद का अंजन लगाने से आँख की रोशनी बढ़ती है।
(17) शहद गरम करके कान में डालने से कान का दर्द दूर होता है, यदि कान में घाव हो तो वह भी अच्छा हो जाता है।
(18) शहद घाव पर लगाया जाता है, इसके लगने से घाव साफ हो जाता है और भर जाता है।
(19) तिल काली पीस कर शहद मिला कर घाव में लगाने से घाव भर जाता है।
(20) सोया के बीज पीस कर शहद में मिला कर लगाने से दाद में लाभ होता है।
(21) सेंधानमक, कड़वा तेल और अदरक का रस तथा शहद सबको एक में मिला कर गरम करके कान में डालने से कान का दर्द दूर हो जाता है।
(22) असली शहद में रुई तर करके तुरन्त के उठे हुए फोड़े या शोथ में बाँधने से फोड़ा बैठ जाता है।
(23) अगर प्यास बहुत लगती हो और भीतर जलन होती हो तो ठण्डे पानी में मधु मिला कर पिला देने से शान्ति मिलती है।
(24) खाँसी में एक तोले की मात्रा में शहद दिन में तीन बार चटाने से कफ छँटकर निकल जाता है और खाँसी में आराम हो जाता है।
(25) उकबत या एक्जिमा के ऊपर कुछ दिनों तक लगातार शहद लगाया जाय तो रोग में धीरे-धीरे आराम हो जाता है।
(26) आग से जल जाने पर शहद लगाने से जलन मिटती है और यही शहद कुछ दिन तक लगातार लगाया जाय तो घाव भी अच्छा हो जाता है।
(27) पायरिया में मसूड़े में दर्द होता है सूजन होती है, मवाद आता है। अगर मुँह में शहद कुछ देर तक रखा जाय तो मसूड़े का दर्द, सूजन और मवाद का आना बन्द हो जाता है।
(28) ठण्डे पानी में मधु मिला कर कुल्ला करने से मुँह से छाले और घाव अच्छे होते हैं।
(29) गले का कौवा लटक आने से खाँसी आने लगती है। अंगूठे में शहद लगाकर अगर कौवे को उठाया जाय और दिन में तीन चार बार शहद लगा दिया जाय तो कौवा उठ जाता है।
(30) कानों में शहद डालने से कान की पीड़ा शान्त होती है।
(31) शरीर के किसी हिस्से में दर्द हो जैसे गठिया के कारण गाँठों में या दाँत में या अन्य कहीं, वहाँ कपड़े में शहद भिगोकर रख देने से आराम मिलता है।
(32) यदि सर्दी के कारण गला बैठ गया हो तो दिन में तीन चार बार एक-एक या आधा-आधा तोला शहद चटाना चाहिए।
(33) सूजाक की बीमारी पेशाब की नली में घाव होने से होती है। यदि उसमें शहद की पिचकारी दी जाय तो घाव साफ होकर भर जावेगी और सूजाक अच्छा हो जाएगा।
(34) आधी छटाँक पानी में एक तोला शहद मिलाकर दिन में कई बार पीने से कुछ दिनों में मोटापन दूर हो जाता है।
(35) प्रातःकाल खाली पेट तीन चार महीने तक प्रतिदिन तोले सवा तोले शहद चाटने से मानसिक परिश्रम में थकावट कम मालूम होती है और शरीर में सुस्ती भी नहीं मालूम होती है।
(36) एक बार में आधी छटाँक से ज्यादा शहद हरगिज न लेना चाहिए इससे ऊपर लेने से हानि की सम्भावना रहती है। आध पाव या तीन छटाँक शहद एक बार लेने से शहद के उपद्रव दिखाई देने लगते हैं। चार पाँच घन्टे तक भूख नहीं लगती। किसी को 12 घण्टे तक भूख नहीं लगती और मीठे से अरुचि हो जाती है।
(37) यदि घाव से मवाद आता हो और सूजन हो, साफ कपड़े में शहद भिगोकर रखने से पीब को पतला करके निकाल देता है और घाव को साफ करने के बाद उसमें अंकुर उठाकर जल्द भरने में सहायता देता है।
(38) यदि शहद की मक्खी डंक मार दे तो गाय का घी और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर डंक पर लगाना चाहिए। या मधु और सेंधा नमक लगाना चाहिए।
(39) खरबूजा, जायफल, चिरौंजी, गाय का दूध, बकरी का दूध, हरड़, शतावर, तरबूजा, तिल, कनेर, आँवला, शहतूत यदि इनमें से किसी के खाने से कुछ नुकसान मालूम हो तो कई दिनों तक उचित मात्रा में शहद का इस्तेमाल करने से विकार की शान्ति हो सकती है।
(40) शहद और बंसलोचन का चूर्ण चाटने से बालकों की खाँसी को आराम होता है। बंसलोचल का चूर्ण एक बार एक रत्ती लेना चाहिए।
(41) शहद, घी और चूना बराबर-बराबर लेकर एक में फेंट कर बिच्छू के डंक-स्थान पर लगाने से आराम हो जाता है।
(42) शहद को आँख में आँजने से रतौंधी दूर होती है।
(43) शहद में केशर घिस कर आँखों में आँजने से आँख की जलन मिटती है।
गायत्री महा शक्ति के दो पक्ष हैं। 1- गायत्री साधना द्वारा आत्मबल का विकास 2- गायत्री शिक्षाओं द्वारा व्यावहारिक जीवन की सुव्यवस्था। इन दोनों ही पक्षों पर गायत्री प्रेमियों को पूरा ध्यान देना चाहिये। क्योंकि साँसारिक जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए जो आदर्श, सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण आवश्यक है, उनको छोड़ दिया जाय तो केवल साधना से आत्मबल बढ़ाते रहना ही पर्याप्त न होगा। इसी प्रकार यदि गायत्री शिक्षाओं को अपनाकर साँसारिक जीवन क्रम तो ठीक कर लिया जाय पर ब्रह्म तेज में आत्मबल में अभिवृद्धि न की जाय तो भावी जीवन के लिए समुचित संस्कार जमा न हो सकेंगे।
गायत्री उपासना एवं तपश्चर्या की चर्चा इन पृष्ठों में होती ही रही है। सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है, उसमें भागीदार होने वाले ऋत्विज् आशाजनक गति से बढ़ रहे हैं। यह बड़े ही हर्ष की बात है। यह साधना पक्ष का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही ऋत्विजों का तथा प्रत्येक गायत्री प्रेमी का यह भी कर्त्तव्य है कि गायत्री माता की शिक्षा एवं नीति के अनुसार अपने जीवन की व्यवस्था बनावें जिससे अपने तथा अपने साथियों की सुख शान्ति में अभिवृद्धि हो।
‘गायत्री गीता’ के 13 श्लोकों में निहित शिक्षाओं की चर्चा हम गत अंकों के सम्पादकीय पृष्ठों पर करते रहे हैं। ‘गायत्री स्मृति’ के 24 श्लोक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह शिक्षाएं भी अत्यन्त आवश्यक हैं। नीचे गायत्री स्मृति के श्लोक और उनके अर्थ दे रहे हैं। आगे हर अंक में इसके एक एक श्लोक की विस्तृत विवेचना करते रहेंगे। यह शिक्षाएँ गायत्री प्रेमियों के व्यावहारिक जीवन का अंग बनें तभी उसकी गायत्री भक्ति रूपी रथ के दोनों पहिये सुसंचालित होंगे।
गायत्री स्मृति
ॐ भूर्भुवः स्वः
भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्तमोम्ब्रह्म तेषु हि।
स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेत्ति विचक्षणः॥1॥
भूः, भुवः और स्वः ये तीन लोक हैं। उन तीनों लोकों में ओऽम् ब्रह्म व्याप्त है। जो बुद्धिमान उस ब्रह्म को जानता है वह ही वास्तव में ज्ञानी है।
‘तत्’—तत्वज्ञास्तु विद्वान्सो ब्राह्मणाः स्वतपश्चयैः॥
अन्धकारमपाकुर्युर्लोकादज्ञानसम्भवम्॥2॥
तत्वदर्शी विद्वान ब्राह्मण अपने एकत्रित तप के द्वारा संसार से अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को दूर करें।
‘स’ सत्तावन्तरतथा शूराः क्षत्रिया लोक रक्षकाः।
अन्यायाशक्तिसम्भूतान् ध्वंसयेयुर्हि व्यापदः॥
सत्तावान् वीर संसार के रक्षक क्षत्रिय अन्याय और अशक्ति से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों को नष्ट करें।
‘वि’—वित्तशक्त्या तु कर्त्तव्या उचिताभाव पूर्तयः।
न तु शक्त्या नया कार्य दर्पौद्धत्यप्रदर्शनम्॥
धन की शक्ति द्वारा तो उचित अभावों की पूर्ति करनी चाहिए। उस शक्ति द्वारा घमण्ड और उद्धतता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
‘तु’—तुषाराणाँ प्रपातेऽपि प्रयत्नों धर्म आत्मनः।
महिमा च प्रतिष्ठा च प्रोक्तोऽपारः श्रमस्यहि॥4॥
तुषारापात में भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म है। श्रम की महिमा और प्रतिष्ठा अपार है ऐसा कहा गया है।
‘व’—वद नारीं विना कोऽन्यो निर्माता मनुसन्तते।
महत्वं रचना शक्तेः स्बस्याः नार्या हि ज्ञायताम्॥
नारी के बिना मनुष्य को बनाने वाला दूसरा और कौन है। अर्थात् मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। नारी को अपनी रचना शक्ति का महत्व समझना चाहिये।
‘रे’—रे वेव निर्मला नारी पूजनीया सता सदा।
यतो हि सैव लोकऽस्मिन् साक्षाल्लक्ष्मी मता बुधैः
सज्जन पुरुष को हमेशा नर्मदा नदी के समान निर्मल नारी की पूजा करनी चाहिए। क्योंकि विद्वानों ने उसी को इस संसार में साक्षात् लक्ष्मी माना है।
‘न्यं’—न्यस्यन्ते ये नराः पादान् पृकृत्याज्ञानुसारनः।
स्वस्थाः सन्तस्तु ते नूनं रोगमुक्ता भवन्ति हि ।7।
जो मनुष्य प्रकृति की आज्ञानुसार पैरों को रखते अर्थात् प्रकृति की आज्ञानुसार चलते हैं वे मनुष्य स्वस्थ होते हुए निश्चय ही रोग से मुक्त हो जाते हैं।
‘भ’—भवोद्विग्नमना नैव हृदुद्वेगं परित्यज।
कुरु सर्वास्ववस्थासु शान्तं सन्तुलितं मनः॥8॥
मानसिक उत्तेजना को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शान्त और सन्तुलित रखो।
‘गो’—गोप्याः स्वीया मनोवृत्तिर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।
स्थितिमन्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुपमाचरेत्॥9॥
अपने मनोभावों को नहीं छिपाना चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरे की स्थिति को देख कर उसके अनुसार आचरण करे।
‘दे’—देयानि स्ववशे पुँसा स्वेन्द्रियाण्यखिलानि वै।
असंयतानि खादन्तीन्द्रियाण्येतानि स्वामिनम्।10
मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने वश में रखनी चाहिए। ये असंयत इन्द्रियाँ स्वामी को खा जाती हैं।
‘व’—वसताँ ना पबित्रः सन् वाह्यतोऽभ्यन्तरस्तथा।
यतः पवित्रताया हिं राजतेऽतिप्रसन्नता ॥11॥
मनुष्य को बाहर और भीतर सब तरफ से पवित्र होकर रहना चाहिये। क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।
‘स्व’—स्पन्दनं परमार्थस्य परार्थो हि बुधैर्मतः।
योऽन्यान् सुखयते विद्वान् तस्य दुःखं बिनश्यति॥
दूसरे का प्रयोजन सिद्ध करना परमार्थ का रथ है ऐसा बुद्धिमानों ने कहा है। जो विचारवान् दूसरों को सुख देता है। उसका दुःख नष्ट हो जाता है।
‘धी’—धीरस्तुष्टो भवेन्नैव ह्येकस्याँ हि समुन्नतौ।
कृयता मुन्नतिस्तेन सर्वास्वाशासु जीवने ॥13॥
धीर पुरुष को एक ही प्रकार की उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए। मनुष्य को जीवन में सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।
‘म’—महेश्वरस्य विज्ञाय नियमान्न्याय संयुतान्।
तस्य सत्ताँ च स्वीकुर्वन् कर्मणा तमुपासयेत्॥14॥
परमात्मा के न्याय पूर्ण नियमों को समझकर और उसकी सत्ता को स्वीकार करते हुए कर्म से उस परमात्मा की उपासना करें।
‘हि’—हितं मत्वा ज्ञानकेन्द्रं स्वातन्त्र्येण विचारयेत्।
नान्धानुसरणं कुर्यात् कदाचित् कोऽपिकस्यचित्॥
हितकारी ज्ञान केन्द्र को समझ कर स्वतन्त्रता पूर्वक विचार करे। कभी भी कोई किसी का अन्धानुसरण न करे।
‘धि’—धिया मृत्युँ स्मरेर्न्मम जानीयाज्जीवनस्य च।
तदा लक्ष्य समालक्ष्य पादौ सन्ततमाक्षिपेत्॥16॥
बुद्धि से मृत्यु का ध्यान रखे और जीवन के मर्म को समझे तब अपने लक्ष्य की ओर निरंतर अपने पैरों को चलावे अर्थात् निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़े।
‘यो’—यो धर्मो जगदाधारः स्वाचरणे तमानय।
मा विडम्वय तं स ते ह्ये को मार्गे सहायकः॥17॥
जो धर्म संसार का आधार है उस धर्म को अपने आचरण में लाओ। उसकी विडम्बना मत करो। वह तुम्हारे मार्ग में एक ही अद्वितीय सहायक है।
‘यो’—योजनं व्यसनेभ्यः स्यात्तानि पुँसस्तु शत्रवः।
मिलित्वैतानि सर्वाणि समये घ्नन्ति मानवम्॥
व्यसनों से योजन भर दूर रहें अर्थात् व्यसनों से बचा रहे क्योंकि वे मनुष्य के शत्रु हैं। ये सब मिल कर समय पर मनुष्य को मार देते हैं।
‘नः’-नः शृण्वेकामिमाँ वार्तां “जागृतस्त्वं सदा भव”
स्वपमाणं नरं नूनं ह्याक्रामन्ति विपक्षिणः॥19॥ हमारी इस एक बात को सुनो कि—तुम हमेशा सावधान रहो, क्योंकि निश्चय ही असावधान मनुष्य पर दुश्मन आक्रमण कर देते हैं।
‘प्र—प्रकृते स्तु भवोदारो नानुदारः कदाचन।
चिन्तयोदार दृष्टयैव तेन चित्तं विशुद्धय़ति ।20।
स्वभाव से ही उदार होओ, कभी भी अनुदार मत बनो, उदार दृष्टि से ही विचार करो, ऐसा करने से चित्त शुद्ध हो जाता है।
‘चो’—चोदयत्येव सत्संगो धियमस्य फ लं महत्।
स्वमतो सज्जनै र्विद्वान् कुर्यात् पर्यावृतं सदा॥21॥
सत्संग, बुद्धि को प्रेरणा देता है। इस सत्संग का फल महान् है, इसलिए विद्वान् अपने आपको हमेशा सत्पुरुषों से घिरा हुआ रखे अर्थात् हमेशा सज्जनों का संग करे।
‘द’—दर्शन ह्यात्मनः कृत्वा जानीयादात्म गौरवम।
ज्ञात्वा तु तत्तदात्मानं पूर्णोन्नतिपथं नयेत्॥22॥
आत्मा का दर्शन करके आत्मा के गौरव को पहचानो, उसको जानकर तब आत्मा को पूर्ण उन्नति के मार्ग पर ले चलो।
‘या’—यायात्स्वोत्तरदायित्वं निवहन् जीवने पिता।
कुपितापि तथा पापः कुपुत्रोऽस्ति यथा यतः॥23॥
पिता अपने उत्तरदायित्व को निवाहता हुआ जीवन में चले क्योंकि कुपिता भी उसी प्रकार पापी होता है जैसे कुपुत्र होता है।
‘त्’—तथाचरेत्सदान्येभ्यो वाँछत्यंन्यैर्यथा नरः।
नम्रः, शिष्टः, कृतज्ञश्च सत्यसाहाय्यवान् भवन्॥24॥
मनुष्य दूसरे के साथ उस प्रकार का आचरण करे जैसा वह दूसरों के द्वारा चाहता है। और उसे नम्र, शिष्ट, कृतज्ञ और सचाई के साथ सहयोग की भावना वाला होना चाहिये।
गायत्री महिमा
यथामधु च पुष्पेभ्यों घृतं दुग्धाद्रसात्पयः।
एवं हि सर्ववेदानाँ गायत्री सार मुच्यते॥
जिस प्रकार पुष्पों का सारभूत मधु, दूध का घृत, रसों का सारभूत दध है, उसी प्रकार गायत्री मंत्र समस्त वेदों का सार है।
तदित्यृचः समो नास्ति मंत्रो वेदाचतुष्टये।
सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपाँसि च।
समानि कलया प्राहुर्नयो नतदित्यृचः॥
गायत्री के समान मंत्र चारों वेदों में नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं है ऐसा मुनि लोग कहते हैं।
हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णबे।
तस्मात्तामभ्यसे न्नित्यंब्राह्मणो हृदये शुचिः॥
गायत्री नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली है अतः द्विज नित्य ही पवित्र हृदय से गायत्री का अभ्यास करें अर्थात् जपे।
गायत्रीं चैव वेदाँश्च तुलया समतोलयन्।
वेदा एकत्र साँगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता॥
गायत्री और समस्त वेदों को तराजू से तोला गया, षट्अंगों सहित वेद एक ओर रखे गये और गायत्री को एक ओर रखा गया।
यद्यथाग्निर्देवानाँ, ब्राह्मणो मनुष्याणाँ,
वसन्त ऋतूनामेयं गायत्री छन्दसाम्॥
जिस प्रकार देवताओं में अग्नि, मनुष्यों में ब्राह्मण, ऋतुओं में वसंत ऋतु श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त छंदों में गायत्री छंद श्रेष्ठ है।
नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवाः केशवात्परः।
गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥
गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। गायत्री मंत्र के जप से श्रेष्ठ कोई जप न आज तक हुआ और न होगा।
गायत्र्या परमं नास्ति दिवि चेह न पावनम्।
हस्तत्राणप्रदादेवी पतताँ नरकार्णवे॥
नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री के समान पवित्र करने वाली वस्तु या मंत्र पृथ्वी पर तो क्या स्वर्ग में भी नहीं है।
परिवर्तन-स्यन्दन पर चढ़कर निशिदिन प्रति पल चलते देखा।
रूठ चला बालापन मुझसे,
कुन्द धवल किलकारी भरता।
यौवन रूठा प्यार हृदय में,
नयलों में मधु प्याली भरता॥
आज जरठता में अतीत की स्मृति पर, अश्रु बरसते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
मलय स्पर्श से पुलकित कलिका-
ने अपना अवगुण्ठन खोला।
विश्व ठगा सा रहा देखता,
मधुर मधुर,मधु षट्पद बोला॥
किन्तु दूसरे दिन उसका, अनुपम सौंदर्य झुलसते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
दो दिन का बसन्त का वैभव,
दो दिन सावन की हरियाली।
दो दिन नयनों का आकर्षण,
दो दिन अधरों की प्रिय लाली॥
दो दिन कुसुमित जीवन डाली फिर काँटों में पलते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
जाने किन अस्थिर तत्वों को,
लेकर निर्मित हुआ रूप है।
क्या अस्थिरता के भय से वह
कलाकार रहता अरूप है??
किन्तु रूप का जाल बिछाकर उसे जगत को छलते देखा।
रूप नहीं थिर रहते देखा॥
*समाप्त*
(श्री रामाघार जी द्विवेदी, वाजिदपुर)