आपके व्यक्तित्व का आकर्षण केन्द्र-सद्व्यवहार

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सज्जन तथा दुर्जन, शिष्ट तथा अशिष्ट सुसंस्कृत और असभ्य में व्यवहार का अन्तर है। सभ्य व्यक्ति समाज का आकर्षक केन्द्र होता है। उसके आते ही समग्र समाज में आनन्द तथा उत्साह की चेतना फैल जाती है। सर्वत्र उसका आदर होता है। अपने इष्ट मित्रों, परिवार, दफ्तर, ऑफीसर, इत्यादि के सामने वह आदर और प्रतिष्ठा का पात्र होता है।

वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -1


सद्व्यवहार की महानता


सद्व्यवहार की महानता (Kavita)

सज्जनो, सद्व्यवहार महान।

सभ्यता का यह है संसार।

सुकर्मों का यह है भंडार॥

बढ़ाता जन-जन में यह प्यार।

विश्व का करता यह उपकार॥

बढ़ाता मानवता का मान।

सज्जनो, सद्व्यवहार महान॥1॥

सभी से कोमल, मृदु व्यवहार।

उच्च, प्रिय, सुन्दर, सत्य विचार॥

प्राणियों के प्रति सदा उदार।

सरलता, समता के आगार।

यही तो है इसकी पहचान।

सज्जनो, सद्व्यवहार महान॥2॥

सुखद सम्भाषण, मधुर स्वभाव।

न रहते ऊँच नीच के भाव॥

दया का सबके प्रति बर्ताव।

विरोधी से भी नहीं दुराव॥

व्यक्ति इससे पाता सम्मान।

सज्जनो, सद्व्यवहार महान॥3॥

सभ्य वाणी, आदर सत्कार।

बहा देता सुख सुरसरि धार॥

क्षणिक दुख दानव जल हों छार।

छिपी है इसमें शक्ति अपार॥

देवता बन सकता इन्सान।

सज्जनो, सद्व्यवहार महान॥4॥

(श्री भगवती प्रसाद सोनी ‘गुँजन’ लखनऊ)


संस्कार तथा भावनाओं का महत्व

शिक्षा का नया दृष्टिकोण-

मानव स्वभाव में भावना का सबसे अधिक महत्व है। भावना ही वह उत्पादक शक्ति है, जो समग्र कार्यों, सामाजिक राजनैतिक तथा अन्य व्यवहारों के मूल में रहने वाली मूल चालक वृत्ति है। मनुष्य के प्रारम्भिक संस्कार इसी भावना से सम्बन्ध रखने वाले होते हैं। प्रायः देखा जाता है कि अबोध बालक के मन में प्रारंभ में जिन भावनाओं के संपर्क, अभ्यास, परिस्थिति, पुनरावृत्ति द्वारा भर दिया जाता है, वे ही भावनाएँ विकसित होकर उसके गुप्त मन के संस्कारों का निर्माण करती हैं। भावना ही मनुष्य है। हम जिस भाव से प्रभावित हैं, उसे हृदय से निकाल नहीं पाते हैं।

अंतर्मन में वर्तमान भावना हमारे कार्यों को आगे बढ़ा कर हमें नवस्फूर्ति अन्तःप्रेरणा को प्रदीप्त करती हैं। हम सोचते विचारते या कार्य करते हैं किन्तु इनके जड़मूल में कोई न कोई भावना जुड़ी रहती है।

भावना का व्यापक प्रभाव :-

तर्क, बुद्धि, विचार, दर्शन इत्यादि सब महत्वपूर्ण मानसिक व्यापार हैं किन्तु इन सबमें भावना का पद श्रेष्ठतम है। भावना बुद्धि पर राज्य करती है। जिस भावना के वश में हम होते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा हमारा तर्क भी काम करता है। भावना कोई दलील नहीं सुनती। वह तर्क की दुनिया से ऊपर है। उसका सम्बन्ध मस्तिष्क से नहीं, हृदय से है।

मान लीजिए, किसी बच्चे के मन में देश प्रेम, माता पिता प्रेम की भावना अंतर्मन में जमा दी गई है। इस प्रकार के भावना युक्त व्यक्ति की बुद्धि यह तर्क उपस्थित करेगी, देश हमारा है, यह हमारी संस्कृति का आदि स्रोत, प्रतिष्ठा का सोपान है। हमें इसकी रक्षा करनी है; इसकी प्रतिष्ठा को निरन्तर ऊँचा उठाना है।’ आदि। इसके विपरीत यदि स्वदेश प्रेम की भावना अंतर्मन में न रहेगी तो बुद्धि इस प्रकार तर्क करेगी। “देश हुआ करे, हमारी जिन्दगी ही कितने दिन टिकने वाली है। हमें तो खाना पीना, मौज उड़ाना है। दुनिया का मजा लेना है, दूसरे मरें गलें चूल्हे में जायं। हमें देश, जाति से क्या प्रयोजन हैं?”

जर्मनी में हिटलर ने नाजियों की शिक्षा बचपन से ही भावना को लेकर की थी। वहाँ बच्चे बच्चे के हृदय में यह भावना भरी गई कि “तुम श्रेष्ठ हो, वीर हो, साहसी हो। जर्मन जाति संसार में सब जातियों से उच्च श्रेष्ठतम है। दूसरे तुम्हारे गुलाम हैं। तुम्हें उन पर राज करना है।” इन भावनाओं के संस्कार विकसित होकर जर्मन जाति उत्साह, वीरता, धैर्य, साहस के जीते जागते पुतले बने। यदि उनकी कहानियाँ, उनके नारे, उनके प्रारम्भिक गीत, राष्ट्र-प्रेम, स्वदेश भक्ति से भरे हुये न होते, तो उनकी बुद्धि कभी स्वदेश भक्ति के पक्ष में तर्क न करती।

आज शिक्षा संसार के सम्मुख सब से महत्वपूर्ण समस्या, भावनाओं की उचित शिक्षा, ठीक रीति तथा मार्गों में विकास, परिपुष्टि, उसी प्रकार का वातावरण निर्माण करने की है। यदि माता, पिता, देश, समाज, जाति हित, विश्व प्रेम, मातृत्व, की भावनाओं की शिक्षा हम प्रारम्भ से ही बच्चों में संस्कार के रूप में भर दें, तो उनकी बुद्धि भी विकसित होकर उसी प्रकार के तर्क उपस्थित करेगी।

भावना विकास के नियम :-

भावना का यह नियम है कि प्रारम्भ में इसके मार्ग दर्शन तथा कुछ वस्तुओं से जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। यह अन्ध भक्ति है। बच्चे के सम्मुख कोई भी महान् पुरुष, देवता, गुरु, विद्वान या धर्म पुस्तक आती है तो हमारा कर्त्तव्य यह है कि इनके प्रति प्रारम्भ से ही उच्चतम भावनायें श्रद्धा, प्रेम, पवित्रता को जोड़ दें। माता-पिता गुरु के प्रति श्रेष्ठ, पूज्य भाव के अंकुर प्रारम्भ से ही जमा दें, देश भक्ति , स्वदेश की महत्ता भली भाँति उनकी भावनाओं में भर दें। शैशव की भावनायें हमारे वीर पूजा भाव का एक अंग बनती हैं। हम उनसे विलग नहीं रह सकते, वे गुप्त रूप से हमारे विचार तथा क्रियाओं को प्रभावित किया करती हैं। भावना सोचती समझती, तर्क वितर्क न कर अन्धे प्रेम जैसी जम जाती है। एक बार जम गई तो स्थायी रूप से जमी समझना चाहिये।

शोक है आज शिक्षा तथा आध्यात्म संसार में भावना की शिक्षा का महत्व कम हो गया है। इस दृष्टि से हमारी प्राचीन शिक्षा अधिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर थी। बच्चों को गुरु, माता, पिता, बड़े व्यक्तियों, धर्म, धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न की जाती थी। उनके प्रति पूजनीय भाव प्रारम्भ से ही जोड़ दिये जाते थे, धार्मिक अंतःवृत्ति होने से बड़ा होने पर भी भारतीय भोगवाद की ओर प्रवृत्त न होते थे। ब्रह्मचर्य का संयम सदैव उन्हें संयमित किया करते थे, पवित्र भजन, पूजा, यज्ञ, चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था। घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

जैसा बीज, वैसा वृक्ष, तथा फल। जब हमारी भावनाओं में नैतिकता, श्रेष्ठता, पवित्रता का बीज नहीं डाला जायगा, तो किस प्रकार उत्तम चरित्र वाले मानव तथा समाज की या देश की सृष्टि हो सकती है?

खेद का विषय है कि हमारे बच्चों के हृदय में प्रारम्भिक भावना का बीज बोने वाले अध्यापकों की उचित शिक्षा नहीं होती। वे स्वयं गलत भावनाओं के शिकार होते हैं। यह गलती बढ़कर शिष्य का जीवन नष्ट करती है।

बच्चे के हृदय में उचित भावना की सृष्टि—

यदि हम इस अंग को लेकर व्यावहारिक सभ्यता, शिष्टाचार, मर्यादा, संयम, अनुशासन का कार्य करें तो बच्चों तथा नवयुवकों के जीवन में क्रान्ति हो सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि पहले माता पिता स्वयं भावनाओं की शिक्षा की उपयोगिता समझें; स्वयं आदर की भावनाओं को संस्कार रूप में शिशु मन पर स्थापित करें। प्रारम्भ में बच्चा विचार करना नहीं जानता। इन भावनाओं को बरबश उसके शैशव मन पर जमाना पड़ता है। बच्चे अनुकरण प्रिय होते हैं, वे वीर पूजा भाव से परिचालित होते हैं। अध्यापक तथा माता पिता बच्चों के सम्मुख एक आदर्श के रूप में उपस्थित होते हैं। उनकी रहन सहन, आचार व्यवहार, सत्यता, पवित्रता, सब कुछ अनुकरण किया जाता है। अतः बच्चों के सम्मुख आने वाले ये आदर्श उच्च चरित्र वाले, नैतिक बल से पूर्ण, उच्च संस्कार वाले होने चाहिये।

वातावरण का भारी महत्व है। वातावरण का अर्थ व्यापक है। घर, तथा संगति तो यह महत्वपूर्ण है हीं, घर की पुस्तकें, दीवारों के चित्र, हमारे गाने, भजन, इत्यादि भी बड़े महत्व के हैं। यदि इन्हीं से उन्नति तथा सुधार की भावना में चलाई जायँ, तो आचार व्यवहार के क्षेत्र में क्रान्ति हो सकती है।

आपके मुख से निकलने वाला प्रत्येक शब्द, आपके शरीर का अंग संचालन, आपके वस्त्र, घर पर माता पिता की गालियाँ, साथ खेलने वाले बच्चों के विचार, सभी हमारे, बच्चों पर गुप्त रूप से प्रभाव डाला करते हैं।

भावना की जड़ जमाने में बड़े सतर्क रहिए। पुनः पुनः प्रयत्न कीजिये कि अपने बच्चे में दया, कोमलता, मानवता, सच्चाई, प्रेम, सहानुभूति, अनुशासन की भावनाएं आती रहें। इन्हें बरबस बच्चों के कोमल मन में बसाइये। अच्छे-अच्छे भजन, पवित्र कर्त्तव्य की शिक्षा देने वाली कहानियाँ, उत्तमोत्तम व्यवहार द्वारा नये राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है। बचपन से ही शिशु के मन पर बड़ों के प्रति आदर प्रतिष्ठा सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, दया, सहानुभूति, सहकारिता, बराबर वालों से मैत्री, प्रेम, संगठन सहयोग की भावनाएं बच्चों के गुप्त मन में उत्पन्न करनी चाहिये। आचरण, आदर्श, तथा उचित निर्देशन से यह कार्य माता पिता, अध्यापक सभी कर सकते हैं।

मान लीजिये, एक बच्चा सिनेमा का एक भद्दा गाना अनजाने ही कुसंगति से सुनकर याद कर लेता है। वह उसका अर्थ नहीं समझता, किन्तु उसे पुनः पुनः दोहराता है। बड़ा होकर वह उसका अर्थ समझने लगता है और जीवन भर उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रहता। यही बच्चा यदि कोई राष्ट्रप्रेम का गीत, उत्तम भजन, पवित्र विचार वाली उक्ति अनजाने में सीख ले, (जो माता-पिता सतत् अभ्यास, पुनरावृत्ति से सिखा सकते हैं,) तो वह बड़ा होकर निरन्तर उच्च मार्ग की ओर ही अग्रसर होगा। हमारी आदि शिक्षा में अनेक पवित्र श्लोक, भजन, इत्यादि मौखिक रूप से स्मरण रखने की परिपाटी रही है। गुरुगण प्रारम्भ से ही बच्चों को अच्छे विचार वाली रचनाएँ, सुन्दर कविताएं भजन, स्तुतियाँ, प्रार्थनाएं याद कराते थे; मन्त्रों का निरन्तर उच्चारण होता था । इन्हें सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त बच्चा नहीं भूल सकता था। गुप्त रूप ये मंत्र हमारे संस्कारों में प्रविष्ट हो जाते थे। कालान्तर में हमारे नैतिक और धार्मिक जीवन की इस गहरी बुनियाद के कारण हमारे आचार व्यवहार श्रेष्ठ होते थे।

ऋग्वेद में लिखा है, (इला) मातृ-भाषा (सरस्वती) मातृ सभ्यता और (मही) मातृभूमि ये तीनों देवियाँ कल्याण करने वाली हैं। इसलिए तीनों देवियाँ अन्तःकरण में बिना भूले हुए स्थित हों।’ तात्पर्य यह है कि मातृभाषा, सभ्यता और मातृभूमि से प्रत्येक भारतीय बच्चे को अगाध प्रेम होना चाहिये। वह इसी भावना को सामने रख कर बड़ा किया जाय। ये ही बातें उसे प्रारम्भ से सिखाई जायें। वह इनके विषय में तर्क न करें, उसके मन में इनके प्रति संदेह उत्पन्न न हो। हम जब उपर्युक्त तीनों देवियों के प्रति पूजा भाव, श्रद्धा, जोड़ लेंगे तो इनके प्रति शुभ ही देखेंगे, शुभ ही सोचेंगे; शुभ योजनाओं को ही कार्यान्वित करेंगे, जो आपका हृदय स्वीकार करता है, वह बुद्धि या मस्तिष्क की परिधि से दूर है। यदि वे भावनाएं हृदय मजबूती से पकड़ लें तो भावी जीवन में वे विलग नहीं होतीं।


व्यवहार कुशलता तथा वाक्-चातुर्य

शिष्टाचार का महत्व-

हमारा दूसरों के प्रति व्यवहार, हमारी मान-प्रतिष्ठा एवं योग्यता का परिचायक है। हम समाज में अनेक प्रकार के व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं। मूल रूप से इन व्यक्तियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। (1) अपने से ऊँचे, (2) बराबर वाले, (3) अपने से वय, योग्यता, पद में छोटे। इन तीनों वर्गों के अंतर्गत हमारा शिष्टाचार, हमारी शिक्षा, सभ्यता एवं संस्कृति का द्योतक है। जब हम इनके संपर्क में आते हैं, तब हमें अनेक तत्वों को स्मरण रखना पड़ता है।

हमारी व्यवहार शिक्षा का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे चरित्र के सम्बन्ध में दूसरों पर पड़ता है। हमारा एक एक कार्य, रहन-सहन, वस्त्र, बोल-चाल का ढंग, उठने-बैठने तथा चलने की रीति निरन्तर हमारे चरित्र को प्रकट किया करता है। यदि हम तनिक भी असावधानी कर बैठते हैं, तो संसार में हमारे व्यवहार को लेकर टीका टिप्पणी होने लगती है। अच्छी से अच्छी योग्यता वाले व्यक्ति को अशिष्ट और असभ्य कह कर निकाल दिया जाता है। लोग उनसे बातें नहीं करना चाहते, कन्नी काटकर निकल जाते हैं। वे संसार में असफल होते हैं।

डॉक्टर जॉनसन अपने युग के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हो गये हैं। अँग्रेजी का एक युग उनकी विचारधारा से प्रभावित और आतंकित रहा। यही विद्वान् व्यावहारिक कुशलता से अनभिज्ञ था। पार्टी में जाता, तो उसे भोजन करना, ठीक तरह बैठना, बातचीत करना या हाथ मिलाना तक न आता था। वह सब्जियों के छींटे आस पास बैठी हुई स्त्रियों के वस्त्रों पर छिड़क देता, डकार इस अशिष्टता से लेता की लोग हँसने लगते, चाय के तीस चालीस प्याले पी डालता। इसी प्रकार एक नहीं अनेक विद्वानों की मूर्खता के दिये जा सकते हैं।

एक बार इंग्लैण्ड में एक सहभोज हो रहा था। बहुत से व्यक्ति उपस्थित थे। उनमें से एक हिन्दुस्तानी भी वहाँ मौजूद था। चाहे और अनेक दुर्गुण उनमें हों अंग्रेज जाति सभ्यता और शिष्टता में बहुत ऊँची है। हमारे हिन्दुस्तानी भाई ने चाय को प्लेट में डालकर पीना प्रारम्भ किया। उसकी सम्मान रक्षा के लिये अन्य उपस्थितजनों को भी वैसा ही करना पड़ा।

आपकी शिक्षा का प्रथम चिन्ह आपका दैनिक व्यवहार ही है। अशिष्ट व्यक्ति चाहे कुछ काल के लिये कृत्रिम व्यवहार द्वारा अपनी असभ्यता को छिपाते, किन्तु उसकी अशिष्ट आदतों हँसने, बोलने चालने, खाने पीने में किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाती हैं। हम अपनी आदतों को अकस्मात् ही नहीं परिवर्तित कर सकते क्योंकि उनकी जड़ें हमारे अंतर्मन में प्रविष्ट हो जाती हैं। हमारे माता-पिता या घरेलू परिस्थितियों का व्यापक प्रभाव हमारे अंतर्मन पर पड़ा करता है। एक अशिष्ट या असभ्य आदत जो माँ-बाप ने बच्चे को असावधानी से पालन पोषण करने में डाल दी है, इतनी जटिलता से जम जाति है कि विकसित अवस्था में उसका उन्मूलन कठिन हो जाता है। जो गन्दी गालियाँ या सेक्स सम्बन्धी घृणित आदतें, बचपन में कुसंगति द्वारा पड़ जाती हैं, वे बड़ेपन तक चलती रहती हैं।


अपने आपके साथ सद्व्यवहार

प्रशस्त पद एवं आत्म गौरव की स्थापना करने वाले व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने पर एक तत्व जो हमें सर्वत्र विद्यमान उपलब्ध है, वह है अपने सम्बन्ध में उच्च धारणाएँ, अपने मानसिक, शारीरिक या स्वास्थ्य के सम्बन्ध में हितैषी भावनाएँ। जो व्यक्ति अपने विषय में तुच्छ सम्मति रखता है और बेकदरी करता है, वह मानो ईश्वर की निन्दा करता है, क्योंकि मनुष्य ईश्वर का पुत्र है, ईश्वर का स्वरूप शरीर धारण कर पृथ्वी पर अधिष्ठित होता है, ईश्वर की समस्त विभूतियों से अलंकृत है।

मैं ईश्वर का रूप हूँ-

ईश्वर ने जब सब प्रकार के जलचर, ‘नभचर’ स्थल-चर जीवों का निर्माण किया, तो उन्होंने यह सोचा कि अब किसी ऐसे जीव की सृष्टि करनी चाहिए जो मेरा स्वरूप हो, तथा इन समस्त जीवों पर नियन्त्रण रख सके। उन्होंने अपनी आकृति का एक जीव निर्माण किया, उसमें अपनी आमोघ शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का समावेश किया, और पृथ्वी पर राज करने के निमित्त भेज दिया। यह असंख्य शक्तियों का शक्तिपिंड, जीवों का महाराजाधिराज, सृष्टि का सिर-मौर, शक्ति का अवतार, परमेश्वर का पुत्र मनुष्य ही था। ईश्वर ने मनुष्य को अपने रूप में बनाया है, उसमें अपनी समस्त शक्तियों का समावेश किया है।

ईश्वर से उत्पत्ति होने के कारण मनुष्य का संकल्प भव्य है। उत्तमोत्तम मानसिक तथा अध्यात्मिक शक्तियों की मंजूषा उसके पास है। ईश्वरत्व का प्रतिनिधि स्वरूप होकर उसने संसार पर एकछत्र राज्य किया है। बड़े से बड़े हिंसक पशुओं, भयंकर विषैले जन्तुओं पर भी मनुष्यों का राज्य है।

जब आप ईश्वर के प्रतिनिधि हैं, सर्वोच्च विभूति के पुञ्ज हैं, तो आपको क्या अधिकार है कि अपने को दीन, हीन, या अभागा समझें? ईश्वर का अपमान आप नहीं कर सकते। ईश्वरत्व संसार की मृत क्रियात्मक शक्ति है। संसार में जो सबसे सत्य, सुन्दर, शिव हो सकता है, वह ईश्वरत्व के नाते आपके रग और पट्ठों में प्रवाहित है।

अपने साथ सद्व्यवहार सीखिये। आप दूसरों की भलाई चाहते हैं। अपने पुत्र की शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रसिद्ध, हितकामना के लिये आप एड़ी चोटी का पसीना एक कर देते हैं। पत्नी, पुत्री अन्य सम्बन्धियों के हितचिंता में निरन्तर निमग्न रहते उससे उत्कृष्ट हैं। दूसरों के हितचिंतन में रहना अच्छा है किन्तु मार्ग तो वह है, जिसके द्वारा आप स्वयं अपने विषय में हित चिंतन करते हैं।

दूसरों के साथ बुराई करने को आप पाप कहते हैं। इस दुर्व्यवहार को आप घृणा की दृष्टि में अवलोकित करते हैं। ठीक है। किन्तु जब आप स्वयं अपने ही विषय में निंद्य विचार रखते हैं, मेरे विचार में तो यह और भी जघन्य पाप कमाते हैं। दूसरों के साथ किये हुए पाप को संसार देखता है, पर आपको स्वयं अपने साथ किया हुआ पाप नजर नहीं आता। अंतर्दृष्टि से अन्तरात्मा उसे देखता है। वह कभी-कभी आपको धिक्कारता भी है, पर उसके निर्देशनों पर ध्यान न देने से वह क्षीण हो जाता है।

ईश्वर ने आपको उत्पन्न किया है, तो उन्होंने सम्पूर्ण विभूतियों सहित ही पृथ्वी पर भेजा है। जो कुछ कमी या निर्बलता तुम अपने अन्दर देखते हो, उसका उत्तरदायित्व स्वयं तुम्हीं पर है। उसका कारण अज्ञान और आलस्य है।

अपने हितैषी बनें :-

मुझे ईश्वर ने बनाया है। मैं ईश्वर का रूप हूँ। समस्त संस्थाओं की उच्चताओं का समावेश मुझमें किया गया है। मुझसे श्रेष्ठ जीव संसार में दूसरा नहीं हो सकता है। मेरा हृदय ईश्वर का मन्दिर है। उसमें सात्विक संकल्पों का ही निवास है। मेरे पाँव पवित्र स्थानों पर ही जाते हैं, मेरी जिह्वा पवित्र भाव ही उच्चारण करती है, मैं पवित्र विचारों को ही मन में स्थान देता हूँ।

यदि तुम जीवन को वास्तव में उपयोगी बनाना चाहते हो तो अपने विषय में क्षीणता और कमजोरी की भावनाएँ बहिष्कृत कर दो, अपने प्रति कर्तव्यों को समझ कर उन्हें पूर्ण करने में संलग्न हो जाओ।

वे क्या कर्तव्य हैं, जिन्हें हम पूर्ण करते चलें? सर्व प्रथम अपने शरीर की देखभाल है। अन्य वस्तुओं की भाँति शरीर भी घिसता है, टूटता है, बीमार होता है, खिदमत कराता है। टूट-फूट के पश्चात् दुरुस्ती चाहता है। जिस प्रकार आप किसी कीमती मशीन से बड़ी सतर्कता से काम लेते हैं, जरा खराब होते ही दुरुस्त कराने की भाग दौड़ करते हैं, उसी प्रकार शरीर भी है। संसार में जितनी भी मशीन हैं। उन सबसे अधिक कीमत इस मानव-शरीर की है। इसका दाम रुपये पैसों में आँका नहीं जा सकता इसे कितना भी रुपया देकर खरीद नहीं सकते। फिर, बेशकीमती मशीन के उपयोग में कितनी सावधानी की आवश्यकता है, इसे स्वयं सोच सकते हैं। शरीर वह साधन है, जिसमें संसार बनता है। इसी के माध्यम से संसार का अस्तित्व है। जिस दिन आपकी यह मशीन टूटती है, उसी दिन संसार का भी अन्त हो जाता है। महाप्रलय हो जाती है। शरीर की देख-भाल करना ही मानव का सर्व प्रथम पवित्र कर्तव्य है। मन्दिर में परमेश्वर की पूजा करते हैं, उससे आवश्यक, शरीर में आत्मा रूपी परमेश्वर का जो अंश है, उसकी पूजा है।

कुछ लोग शरीर की जो बेकदरी करते हैं, उसे देखकर अत्यन्त दुःख होता है। न उचित खान-पान करेंगे, न स्वस्थ स्थानों में रहेंगे, न पर्याप्त विश्राम ही करेंगे, रुपया उनके पास है। रुपया वे जीवन से अधिक मूल्यवान समझते हैं। जीवन के सामने रुपया अस्थिर, अल्प मूल्य का है। संसार का सब रुपया देकर भी जीवन की कुछ भी घड़ियाँ वापिस नहीं ली जा सकतीं।

मुझे अपनी छोटी बहिन की मृत्यु की वह घड़ी याद है। रुपयों की मुट्ठियाँ भर कर हम काम कर रहे थे। दवाइयों में जो कुछ जिसने बताया वही ले गया। इन्जेक्शन, गोलियाँ, परीक्षायें-जो कुछ भी मनुष्य का प्रयत्न हो सकता है, किया गया। तीन-तीन डॉक्टर समीप बैठे रहे। रुपयों से भरा बटुआ गहनों की अलमारी का गुच्छा उसके पास रक्खा रहा बचने की कोई आशा न थी। जीवन की घड़ियाँ निरन्तर कम होती जा रही थीं वह स्पष्ट स्वर में एक दृष्टि रुपये, बटुये, गुच्छे, दूसरी मेरी ओर डालते हुए बोली “भाई साहब मुझे बचाइये।” मैं एक दुर्बल मानव, मनुष्य की अपूर्णता से अपने आपको बँधा हुआ पा रहा था। मैं क्या उत्तर देता। जीवन उड़ गया। रुपया यों ही पड़ा रह गया।

आवश्यकता इस बात की है कि जरा सी टूट-फूट होते ही जीवन की रक्षा की जाय। इस ओर से तनिक भी लापरवाही न की जाय। अधिक दौड़ धूप की आवश्यकता नहीं है। जितनी आय शरीर की स्वास्थ्य स्थिर रखते हुए रह सके वही ठीक है। जीविका जीवन के लिए है। धन जीवन की कमर पर न चढ़ बैठे। जीवन में परिश्रम कीजिए किन्तु परिश्रम के पश्चात् समुचित विश्राम की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।

शरीर के पश्चात् अपनी मानसिक शक्ति को स्थिर रखने का सतत् प्रयत्न होना चाहिए। बाह्य संघर्षों से आन्तरिक स्थिति में उत्तरोत्तर हलचल तूफान, और विद्रोह नहीं चलना चाहिए। उच्च आध्यात्मिक शान्ति, जिसमें समस्त मानव इच्छाओं का निलय हो, जहाँ इच्छा आवश्यकताओं का संघर्ष न हो, जीवन को आगे बढ़ाने वाला है।

आप एक साधन हैं, साध्य जीवन का आनन्द है। जितने अंशों में आप जीवन का आनन्द ले सकते हैं, उतने ही अंशों में जीवन को सार्थक बनाते हैं। आनन्द जीवन का नवनीत है। यह आपको स्वयं ही प्राप्त करना है। जब तक आप अपने विषय में उच्च धारणाएं बनाकर संसार की कर्म स्थली में प्रविष्ट नहीं होते, तब तक आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता।


क्या पुरानी आदतों का छूटना असम्भव है?

अनेक व्यक्तियों के सन्मुख जब नई व्यावहारिक योजनाएँ प्रस्तुत की जाती है, “जो आदत या स्वभाव पड़ गया है, उससे मुक्ति असम्भव है।”-यह धारणा नितान्त भ्रममूलक है। आदत को छोड़ना कठिन है किन्तु असंभव नहीं है। यदि मनोबल को दृढ़ता से आत्म-विकास एवं सुधार में लगाया जाय, और मनुष्य यह संकल्प करले कि मुझे अमुक निन्दनीय आदत से मुक्ति प्राप्त करनी है, तो वह अवश्य उसका उन्मूलन कर सकता है।

आदत क्या है? यह एक मानसिक मार्ग है। जिस प्रकार गाड़ी के पहिये के एक ही मार्ग पर जाने से एक लकीर बन जाती है, उसी प्रकार एक कार्य को पुनः करने से एक मानसिक मार्ग का निर्माण हो जाता है। यह मानसिक मार्ग हमारे कार्य करने की संख्या से उत्तरोत्तर गहरा होता है, यहाँ तक कि इससे भिन्न-2 प्रकार की आदतों का निर्माण हो जाता है। प्रत्येक आदत की जड़ें अंतर्मन में गहरी बैठी रहती हैं। जिस प्रकार धीरे धीरे एक कार्य करने से आदत बनती है, उसी प्रकार धीरे-2 उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया करने से उसका उन्मूलन होता है। प्रत्येक गन्दी आदत के विरुद्ध आप उलटा काम करें। जब मन पुनः पुरानी कुत्सित आदत की ओर जाय, तो दृढ़ता से उसका सामना किया जाय और उसकी पुनरावृत्ति न होने दी जाय। पुरानी आदत करने में आसान होती है; इसलिए उसकी ओर स्वाभाविक रुचि रहती है। नई आदत का विकास प्रारम्भ में बड़ा अड़चन पूर्ण रहता है। किन्तु पुनःपुनः उसी को करने से उसी को करने में आनन्द आने लगता है और वह स्वाभाविकता का एक अंग बन जाता है।

व्यावहारिक दृष्टिकोण से आप में जो न्यूनताएँ हैं, या जो असभ्यताएँ आ गई हैं, उनका परिष्कार दीर्घ कालीन अभ्यास तथा सतत् संकल्प शक्तियों के समन्वय से ही संभव है। प्रत्येक आत्म विश्वास का इच्छुक यदि चाहे, तो इसके द्वारा मानसिक और व्यावहारिक कायाकल्प कर सकता है।

इसके विपरीत जो शिष्टता की आदतें हमारे बचपन में बरबस अंतर्मन में प्रविष्ट कर दी जाती हैं, वे हमारे आकर्षण का विषय बन जाती हैं। छोटे बच्चों को शिष्टाचार सम्बन्धी शिक्षा न देने के कारण उनका उच्च सोसाइटी में प्रविष्ट होना कठिन हो जाता है। बच्चे निरन्तर हमारा अनुकरण किया करते हैं।

यदि हम अपने बच्चों को शिष्ट, सभ्य, आकर्षक सुन्दर और उत्तरदायित्व पूर्ण नागरिक बनाना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि हम स्वयं उनके सन्मुख शिष्ट व्यवहार का ऐसा नमूना प्रस्तुत करें जिसका अनुकरण उन्हें जीवन में उत्साह और प्रेरणा प्रदान कर सके। जो माँ बाप स्वयं व्यवहार में ढीले ढाले हैं, प्रातः काल शय्या त्यागने, दन्त मंजन, स्नान, पूजा पाठ या वस्त्र धारण तथा उन्हें यथास्थान रखने में नियमों का पालन नहीं करते, उनके बच्चे, जो चौबीस घंटों में 15-16 घंटे उनके साथ रहते हैं, किस प्रकार सभ्यता और शिष्टाचार का पाठ पढ़ सकते हैं?

जैसे हम हैं, वैसा ही हमारा वातावरण भी है। सभ्य व्यक्ति की प्रत्येक वस्तु आपको यथा स्थान,साफ सुथरी,आकर्षक मिलेगी। जूतों से लेकर कमीज कोट टोपी या बाल काढ़ने का कंघा तक स्वच्छ रखा मिलेगा। उसके जूतों पर न मैल होगा, न कंघे में बाल लगे हुए होंगे। उसके कोट या पतलून या धोती में शिकन न मिलेंगी। वह वस्त्रों की देखभाल,सम्हाल के कारण दूसरों से आधे वस्त्रों में भी आकर्षक प्रतीत होगा। कम खर्चे में वह अधिक तरह के सुख-प्राप्त कर सकेगा। उसे लम्बा चौड़ा बढ़िया मकान नहीं चाहिए। छोटे से मकान में,या एक कमरे का ही वह इतना उत्कृष्ट प्रयोग करेगा कि उसकी सभ्यता प्रकट हो जायगी। शिष्टाचार का अर्थ यही नहीं कि आप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। स्वयं अपने साथ भी आपका व्यवहार उत्तम होना अनिवार्य है। यदि आप अपने साथ दुर्व्यवहार करते है तो बड़ा पाप करते हैं।

आप पूछेंगे कि हम अपने साथ किस प्रकार दुर्व्यवहार करते हैं? इसके अनेकों रूप हैं। आप जानते हैं कि ठीक समय पर उठने, व्यायाम करने टहलने, या विश्राम करने से आपका स्वास्थ्य ठीक रहता है। किन्तु शोक! आप न तो ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, न व्यायाम, टहलना या विश्राम करते हैं। आप रुपये के लोभ में दिन रात तेलों के बैल की तरह पाई पाई इकट्ठी करने में मारे मारे फिरते हैं। आपके पास पर्याप्त धन है, जिसके द्वारा आप भोजन, वस्त्र, तथा अच्छे मकान का प्रबन्ध कर सकते हैं, किंतु आप कंजूसी के कारण इनमें से कोई भी काम नहीं करते। यह सब अपने प्रति दुर्व्यवहार है।

अपने शरीर की बुराई की तरह जानते बूझते आप अपने बच्चों की आदतों, या सभ्यता से गिरे हुए व्यवहार को नहीं रोकते, या उसकी गलती पर सजा नहीं देते, तो आप अन्याय करते हैं। अपनी पत्नी की असभ्यताओं को रोकना आपका एक पुनीत कर्त्तव्य हो जाता है। परिवार के और सदस्यों की खराबियों या अशिष्टताओं का आप शिष्ट रीतियों से परिष्कार कर सकते हैं, अपने मातहत,नौकरों, आदि को अशिष्टता से रोक कर आप समाज में अच्छाइयों के बीज बो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं करते, तो यह आपका दुर्व्यवहार है।

आपकी दृष्टि कमजोर है, किन्तु फिर भी आप सिनेमा देखते हैं, मिर्च मसाले, खट्टी चीजों का व्यवहार करते हैं, यह अपने प्रति दुर्व्यवहार हुआ, अपने अन्दर किसी मादक दृव्य को लेने की आदत डाल कर विषपान करना आत्म-घात के बराबर गर्हित है।


Quotation

जब तक मनुष्य में कोई भी भलाई रहे तब तक उसका सत्कार करना चाहिए, पर जब मनुष्य अपना मनुष्यत्व त्याग देने का हठ करें, तब उसका त्याग करना मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य हो जाता है।


लोक व्यवहार की कुशलता के गुप्त रहस्य

गुप्त रहस्य छिपाये रखिए

न दूसरों से इतने खुल जाइये कि दूसरों को आपमें कुछ आकर्षण ही नहीं रहे, न इतने दूर ही रहिये कि लोग आपको मिथ्या अभिमानी या घमंडी समझें। मध्य मार्ग उचित है। दूसरों के यहाँ जाइये, मिलिए किन्तु अपनी गुप्त बातें अपने तक ही सीमित रखिए। “आपके पास बहुत सी उपयोगी मंत्रणायें, गुप्त भेद, ज्ञान विज्ञान संचित है”—दूसरों को अपने विषय में ऐसी धारणा बनाने दीजिये।

हँसी व्यवहार का आकर्षण है किन्तु ऐसी हँसी मजाक न कर बैठिए कि आपका काम दूसरे के अंतर्मन में पीड़ा उत्पन्न करे। यथा संभव दूसरों की न्यूनताओं तथा कमजोरियों पर हँसना मूर्खता है। जो काला कलूटा, काना, या बदतमीज है, उसे बीमार समझ कर अवहेलना ही कर देना श्रेष्ठ है। यदि आप चाहें तो एकान्त में मिलकर उसकी अशिष्टता का संकेत भर कर दीजिये। कोई भी अपनी कमजोरियाँ, अशिष्टताओं, चारित्रिक दुर्बलताओं को सुनना नहीं चाहता। आपकी हँसी पवित्र विनोद से सरस बने।

पराये घर जाकर अपना मनमाना व्यवहार न कीजिये। यथा संभव दूसरे के दृष्टिकोण तथा सुविधाओं का ध्यान रखिए। दूसरा आपको अपने घर, व्यक्तित्व, वस्तुओं, पशु, या बुद्धि के सम्बन्ध में अच्छे से अच्छा आभास देना चाहता है। वह चाहता है कि आप उसकी प्रत्येक वस्तु की प्रशंसा करें, उसकी बातें,कटु मृदु अनुभव दत्त चित्त होकर सुनें। यदि आप उसके घर को उसी के दृष्टिकोण से देखें, तो इसमें आपकी शिष्टता है।

चिढ़ाने वाले की उपेक्षा करें :-

यदि आपको चिढ़ाने, कुढ़ाने या अपमान करने के लिए कोई कुछ कहे या इशारा करे, गुप्त पत्रों से डरावे, दीवारों पर कुछ लिख दे तो उसकी अवहेलना कर देने से अपमान करने वाले को आन्तरिक पीड़ा पहुँचती है। चिढ़ाना एक प्रकार के दूषित संकेत हैं, जिन्हें ग्रहण करने से चिढ़ाने वाले को प्रसन्नता न ग्रहण करने से दुःख होता है। संकेत को न ग्रहण करना ही चिढ़ाने वाले के लिए सबसे बड़ी सजा है। तमाम अप्रिय संकेतों के विरुद्ध आप अपना व्यवहार पूर्ववत् रखिये। आपका निरपेक्ष स्वरूप, जिससे यह प्रतीत हो कि आपके ऊपर गाली, अपमान, दूसरे की चिढ़ाने वाली बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, अपमान कर्त्ता को मानसिक क्लेश देने के लिए पर्याप्त है।

किसी की गुप्त बात को, जो न सुनना चाहता हो, न सुनिये, न जानने की व्यग्रता ही कीजिए। दूसरा व्यक्ति जब अपनी गुप्त बात छिपाता है, तो इसका दूसरा मतलब यह है कि वह मन ही मन आपकी गुरुता बड़प्पन, चालाकी, मानसिक श्रेष्ठता को स्वीकार करता है। उसकी दृष्टि में वह जिस गन्दगी को छिपाता है, उससे-मुक्त होना चाहता है। जब आप उसकी गुप्त बातों को जान लेते हैं, तो वह एक प्रकार की आत्म हीनता का अनुभव करता है और आपसे ईर्ष्या करता है। संभव है, यह ईर्ष्या आपको हानि पहुँचा कर शान्त हो। बात को आपसे गुप्त रखने में दूसरे की आकाँक्षा उससे मुक्ति पाना, उन्नति करना, उन दुर्गुणों को निकाल डालना रहता है। आपके विचार तथा मत से दूसरे को जो लाभ होता, वह उससे वंचित रह जाता है।

चिकित्सक के अलावा किसी अन्य को अपने अन्तर के जख्म, अपने दुःख-दर्द, व्यथाएँ मत दिखाइये। दूसरे केवल अपना मजाक ही बना कर रह जाएंगे।

झूठी भावुकता एक अभिशाप है :-

दूसरों से व्यवहार करने में ठंडा दिमाग चाहिए। अनेक अवसर ऐसे आयेंगे, जब दूसरे तैश में, क्रोध के उफान में, या ईर्ष्या की अग्नि में आप उत्तेजित हो उठेंगे। उत्तेजना और क्रोध का आवेश तीव्रता से आग की ज्वाला की भाँति बढ़ता है। यदि उसे दूसरी ओर से अर्थात् आपकी तरफ से भी वैसा ही वातावरण प्राप्त हो जाय, तो तमाम लौकिक व्यवहार टूट-फूट जायेंगे, आप अनाप शनाप कह बैठेंगे। गुस्से में ऐसी-2 गुप्त बातें आपके मुख से प्रगट हो जायेंगी, जो कदाचित आप कभी उच्चारण करना पसन्द न करते। उद्वेग एक तेजी से आने वाले तूफान की तरह है, जिसमें मनुष्य अन्धा हो जाता है। उसे नीर क्षीर का विवेक नहीं रहता। दूसरे को जोश में आया देखकर आप शान्त रहिए। उसकी उत्तेजना को ठंडा होने का अवसर दीजिए। ठंडे दिमाग का महत्व आप स्वयं देखेंगे जब दूसरा अपनी जल्दबाजी, आवेश की उत्तेजना, क्रोध, के आवेश पर क्षमा चाहेगा। आवेश में बुद्धि पंगु हो जाती है। हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं रहता।

इसी प्रकार झूठी भावुकता के पंजे में फँसकर दयार्द्र, या सहानुभूति में इतने द्रवित न हो जाइये कि दूसरे की आफत आपके गले आ पड़े। भावुकता में बह कर लोग बड़े-2 दान देने का वचन दे बैठते हैं; छात्र वृति के वायदे करते है; संस्थाओं की सहायता का वचन पक्का कर लेते हैं। दीन दुखियों, घर परिवार वालों की सहायता करना ठीक है किन्तु झूठी भावुकता के कारण अपनी मर्यादा या आर्थिक स्थिति से बाहर न निकल जाइये। यदि क्रोध, प्रतिहिंसा, तैश बुरे हैं, तो अधिक भावुकता, नर्मी, सहानुभूति, दया आदि भी अधिक अच्छे नहीं हैं। ये दो सीमाएँ हैं। चतुर व्यक्ति को इन दोनों के मध्य में शान्त चित्त होकर अपना दृष्टिकोण स्वभाव तथा आदतें निर्माण करनी चाहिए। न इतने कठोर ही बनिये कि दूसरे आपसे मिलना, बातें करना सलाह लेना पसन्द न करें, न इतने सरल दयावान, भावुक ही बन जाइये कि आपका कोई अस्तित्व ही न रह जाय और उपेक्षा की जाय।

समय का विवेक :- जिस किसी को मिलने के लिए आप जो समय दें, उसी समय पर नियत स्थान पर मौजूद रहना चाहिए। जहाँ तक संभव हो प्रारम्भ ही में अपने कार्य, सुविधा, स्वास्थ्य या मित्रों को देख कर मिलने जुलने का समय दीजिए। कुछ व्यक्ति बड़े आलसी, लापरवाह, धोखेबाज होते हैं और ऐसा समय बतलाते हैं, जब वे घर पर उपस्थित नहीं होते। प्रायः कर्जदार, तकाजे वालों से यह व्यवहार किया जाता है। उत्तम तो यह है कि अनिश्चय की अवस्था में आप स्पष्ट कर दें कि नहीं मिल सकेंगे। नियत स्थान पर वायदे के अनुसार मिलना आपके चरित्र की नियमितता, निष्ठा, दृढ़ता, संयम और ईमानदारी प्रकट करता है। यदि नियत समय और ईमानदारी प्रकट करता है। यदि नियत समय पर कोई अप्रत्याशित कार्य भी आ पड़े तो कुछ न कुछ प्रबंध कर दूसरे को निराश नहीं करना चाहिए।

घर में भी अपने खाने, पीने, सोने, कार्य करने की पूर्व निश्चित एक योजना बनाया कीजिए। इस योजना को जहाँ तक हो न तोड़िये। वरन् प्रतिदिन कार्य पूरा न कर सकने की अवस्था में आत्म-प्रताड़ना कीजिये; और भविष्य में नियमित समय पर ही कार्य समाप्त कर लेने की प्रतिज्ञा कीजिए।

“इंडियन टाइम” भारतवासियों का कलंक है। इंडियन टाइम कह कर चिढ़ाने की जो प्रथा चल गई है, उसके जिम्मेदार हम ही हैं। समय की पाबन्दी कर हमें इस गन्दी आदत से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए।

मिलने जुलने के समय सावधानी :-

अपने व्यवहार में सहानुभूति, सत्याचार, प्रेम, दूसरे की सहूलियत का सदा ध्यान रखिए। अपने कार्यों को यदि आप दूसरों को दृष्टिकोण को देखें, तो आपको उनका औचित्य अनौचित्य प्रतीत होगा। आपकी जम्हाई, अपावन-वायु निष्कासन, खुजलाना नाक कुरेदना इत्यादि, दूसरों को कदापि प्रिय नहीं लगेंगे। दूसरों के सन्मुख ऐसा करना अपनी अपरिपक्वता का परिचय देना है।

यदि संयोग से आपको दूसरे का धक्का लग जाय, पाँव स्पर्श कर जाय, या अन्य कोई अशिष्ट कार्य अनजाने में हो जाय, तो आपको चाहिये कि तत्काल क्षमा याचना करने से आपका कुछ नहीं बिगड़ता; दूसरे व्यक्ति का मानसिक मैल धुल कर साफ हो जाता है। “क्षमा कीजिये”; “धन्यवाद”; “आप को बड़ा कष्ट हुआ”, “कृपा बनाये रखियेगा”, “मुआफ करें” इत्यादि, शिष्टाचार सूचक शब्दों का प्रयोग सरसता का संचार करता है। किसी से मिलते ही “नमस्ते”, “प्रणाम” या “कहिये मिज़ाज तो अच्छे हैं, घर पर सब ठीक ठाक है”—इत्यादि संबोधन प्रारम्भिक वार्तालाप में उपयोगी होते हैं। जब आप किसी से अपनी वार्ता समाप्त कर चुकें, तो “क्षमा कीजिये, आपका बहुत समय ले लिया है।” कह देना शिष्टता सूचक है। दूसरे व्यक्ति को भी शिष्टाचार वश कहना चाहिये, ‘कब दर्शन दीजियेगा’, ‘आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई’, ‘मिलते रहा कीजिये’ इत्यादि। इस प्रकार के वाक्यों से व्यवहार मधुर बनते हैं। मधुर वचनों के सम्बन्ध में कहा भी है—

“कहूँ-कहूँ गुण दोष ते, उपजत दुःख शरीर।

मधुरो बानी बोलके, परत पींजरे कीर ॥”

पत्र व्यवहार सम्बन्धी शिष्टाचार :-

पत्र व्यवहार सम्बन्धी शिष्टाचार की त्रुटियाँ अनेक बार कटुता का कारण बनती हैं। जो कोई आपको पत्र भेजता है, उसकी आन्तरिक इच्छा यह रहती है कि आप उसे उत्तर दें, परामर्श दें कुछ नई बात सिखायें, उन्नति में सहायता करें। किसी अजनबी का पत्र भी आये, तब भी शिष्टाचार वश पत्र का उत्तर तो दे ही देना चाहिये। पारिवारिक पत्रों के उत्तर न देने का यह बहाना किया जाता है कि “ये तो हमारे घर के ही आदमी हैं। जब अवकाश मिलेगा लिख देंगे।” यह धारणा नितान्त घृणित है। परिवार वालों को भी उत्तर लिखना, उतना ही आवश्यक है जितना मित्रों, अजनबी ग्राहकों, ऑफीसरों या अन्य व्यक्तियों के लिये है।

जिस किसी का भी पत्र आये, उसे सावधानी से अपने साथ रखिये। जब तक उसका उत्तर आप न लिख दें, जब तक उसे टेबल पर रखिये। उत्तर देने के पश्चात् भी उस पर उत्तर देने की तारीख लिखकर सुरक्षित रखिये। भविष्य में इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। व्यापारियों को तो रजिस्टर या फाइल में पत्रों का आना जाना लिख रखना, पत्रों का संग्रह अतीव आवश्यक है। साहित्यिकों के पुराने पत्र एकत्रित होकर उनकी मृत्यु के उपरान्त बड़े-बड़े मूल्य पर बेचे गये हैं। उनके आधार पर पुराना इतिहास, डायरियों में साहित्य रचना हुई है। अतः आप प्रत्येक पत्र का उत्तर अवश्य दें, चाहे देर से ही सही।

आपका पत्र एक चपरासी का, या रेडियो का काम करते हैं। आपके विचार, योजनाएँ, दृष्टिकोण दूसरों के पास ले जाते हैं। पत्र न भेजकर आप अपने व्यक्तित्व को संकीर्ण बनाते हैं, अपनी अच्छाइयाँ रोकते हैं, दूसरों से कुछ सीख या सिखाकर जो ज्ञान पा सकते थे, उससे वंचित हो जाते हैं। दूसरे को पत्र न भेजकर उसे रुष्ट न करें। मित्रभाव निरन्तर बढ़ाते रहें। पत्र द्वारा आप सरलता से दूसरों के प्रति दिलचस्पी दिखा सकते हैं और स्थायी मित्रता का लाभ कर सकते हैं। दुकानदार पत्रों से अपने ग्राहकों को स्थिर रख सकते हैं।

लेन देन में सावधानी :- यदि भूल से कोई वस्तु, दूसरे का पत्र, कलम, पुस्तक, रुमाल इत्यादि आपके पास आ गई है, तो शिष्टता इसी में है कि आप वस्तु को सधन्यवाद लौटा दें। चीजों को वापिस कर देने में पूरी पूरी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। प्रायः लौटाई हुई चीज आपसे दुबारा माँगी जाती है। पुस्तकों के बारे में लड़ाई झगड़े तक छिड़ जाते हैं। उधार लेने वाले व्यक्तियों के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है। जो रुपया पैसा लिया जाता है, वह समय पर वापिस कर देने से आपकी साख बनी रहती है, बाजार में आपका मूल्य बढ़ जाता है। दूसरे आपको वस्तुएँ देने में संशय का अनुभव नहीं करते। इसके विपरीत रुपया पैसा, शादी के अवसर पर लिये हुये बर्तन, कुर्सियाँ, कालीन, दरियाँ इत्यादि पढ़ने के लिये ली हुई पुस्तकें समय पर सम्हाल कर लौटा देनी चाहिएं। किसी की सुन्दर वस्तु देखकर माँगने लग जाना असभ्यता है।

यथाशक्ति ऐसे अवसर मत आने दीजिये कि दूसरे के सामने हाथ पसारना पड़े। माँगने से प्रतिष्ठा को धब्बा लगता है। उधार लेना—चाहे वह वस्तु हो, पुस्तक, साइकिल, कलम या रुपया पैसा हो, हीन कार्य है। इससे समाज में बड़ी निंदा और अपकीर्ति फैलती है।

यदि रुपया उधार लेने की नौबत आ जाय, तो वायदे के अनुसार उसका ब्याज देते रहिये और उसे उतार कर ही दम लीजिये।

पुस्तकों या दवाइयों का वी॰ पी॰ लौटा दिया जाता है। यह नैतिक और व्यापारिक दोनों ही दृष्टियों से हेय है। आपकी साख नष्ट हो ही जाती है, व्यापारी को भी व्यर्थ की हानि उठानी पड़ती है। सावधान!

दूसरों की हानि :-

यदि भूल से आपका कुछ नुकसान दूसरे व्यक्ति के द्वारा हो गया है, तो आगबबूला होने की आवश्यकता नहीं है। साधारण रूप से समझा दीजिये। उसे अवसर मत दीजिये कि पुनः नुकसान पहुँचा सके।

भूल से दूसरे व्यक्ति द्वारा तुम्हारी जो हानि हुई है, उसे ठीक होने का अवसर दीजिये। यदि आपने दूसरे की कोई हानि करदी है, तो अपने परिश्रम द्वारा उसे पूरा कीजिये। उसको हर्जाना दीजिये। यदि आपकी साइकिल या मोटर द्वारा चोट लगी है, तो रोगी की चिकित्सा कराइये। आपकी असावधानी से यदि किसी को आर्थिक हानि पहुँची है, तो उसे पूर्ण कीजिये।

खरीदा हुआ माल वापिस करना उचित नहीं है। खरीदने से पहले दस बार सोचिये, परखिये, मित्रों को दिखाकर पसन्द कर लीजिये; किन्तु एक बार उसे खरीद कर वापिस करने चले जाना, या व्यर्थ क्रोध करना सर्वथा अनुचित है। ऐसा व्यक्ति बाजार में हीन दृष्टि से देखा जाता है।

किसी ने आपके लिए परिश्रम किया है, तो उसके परिश्रम का मूल्य अवश्य दीजिये। अधिक काम लेना और कम मजदूरी देना भी अनुचित है। पूरा और खरा काम लीजिये, किन्तु दूसरे की मजदूरी चुका देने में बड़े सतर्क रहिये।

सम्भव है कोई व्यक्ति रुपये के रूप में आपसे मजदूरी न लेना चाहे। इस दशा में किसी अन्य रूप में, जैसे अपनी सेवा, उपहार या और कोई वस्तु देकर उसका बोझ आत्मा पर से हलका देना चाहिये, दूसरे के अहसान के बोझ में आदमी दब जाता है। वह उसके मन पर बैठा रहता है। उचित है कि उसे अवसर ही ने आने दिये जायं। “न किसी को उधार दीजिये, न उधार लीजिये”—यही सर्वश्रेष्ठ नियम है।

मित्र भाव की वृद्धि करते चलिये :-

सामाजिक व्यवहार मित्रता से चलते हैं। मित्र आड़े समय पर काम आते हैं; रुपये-पैसे, श्रम, सलाह सान्त्वना द्वारा सहायता करते हैं, व्यापार में तरक्की देते हैं। मित्र आपके सहायक होंगे। आपके अनेक जटिल काम निकल आयेंगे। आपकी दूसरों से जान पहिचान करा देंगे। मिलनसारी अधिक से अधिक बढ़ाइये। इसके लिये (1) दूसरों से प्रेम भाव रखें, (2) लेन देन चालू रखें,(3) खुशी रंज के अवसरों पर जाना कदापि न भूलें,(4) समय समय पर कुछ उपहार देना स्मरण रखें,(5) दूसरों के बच्चों से खूब वात्सल्य भाव बरतें और उसे अनुभव भी करें। प्रत्येक मनुष्य स्वभाव से अपने बच्चों को हृदय का एक टुकड़ा मानता है। बच्चों को प्रेम करना, उसकी प्रशंसा करना-मित्रता वृद्धि का अचूक उपाय है।

(6) उन्हीं बातों,कामों,पुस्तकों, विषयों की चर्चा कीजिये जिनमें मित्र रुचि रखते हों। दूसरों की रुचि पर बातें करने से घण्टों वे आपको अपनी बातें सुनाने को आतुर रहेंगे। गुप्त बातें तक प्रकट कर देंगे। आपको अपना प्रिय अभिन्न मानेंगे।

(7) मित्रों के यहाँ मिलने जाना न भूलिये। यादगार को ताजा रखने के लिये यह उचित है कि मय अपने कुटुम्ब के आप दूसरों के यहाँ जाया करें। प्रेमभाव बनाये रखें।

पत्र व्यवहार चालू रखिये। यदि दूसरा व्यक्ति भूलता भी है, तब भी आपको अपनी ओर से उनसे संपर्क जारी रखना चाहिये। जिस प्रकार मित्र के यहाँ जाना आवश्यक है, उसी प्रकार उसे तंग करना भी अनुचित है। यदि मित्र के कार्य का समय है, तो अनुचित ढंग से उसके समय का ध्यान रखते हुए उसे तंग न करो। किस समय वह अवकाश पाता है,उसका ध्यान रखो। उसकी अनुपस्थिति में उसके घर से न कोई चीज उठाओ, न इधर उधर चलते फिरो। चोरी करना, कलम पुस्तक इत्यादि ले जाना सज्जनता के विरुद्ध है।

आतिथ्य भावना का विकास :-

यदि कोई व्यक्ति आपसे मिलने के लिए आया हो, तो अधिक देर तक उसे बिठाये रखना उचित नहीं है। कुछ देर के लिए बिठा कर यथा सम्भव शीघ्र ही उससे बातचीत कीजिए।

कोई न कोई आये हुए अतिथि के समीप रहे, उससे बातचीत करता रहे, उसे काम में, दिलचस्प बातों में लगाये रखे। खाली छोड़कर चले जाना अशिष्टता है।

आये हुए अतिथि को पान, सुपारी, इलायची; सौंफ, लौंग, खोपरे की बारीक गिरी, या अन्य आवश्यक पदार्थ अवश्य भेंट कीजिये। ठण्डा जल पान कराइये। यदि सामर्थ्य है तो दूध, चाय या फल, लस्सी इत्यादि से उसकी खातिर कीजिये।

तुलसी की यह उक्ति स्मरण रखने योग्य है-

आवत ही हर्षे नहीं, नयनन नाहिं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

अतिथि के प्रति आपके हृदय में स्नेह हो, आपके नेत्र हर्षित हो उठें, आपका गात पुलकित हो उठे, आप प्रेम विभोर हो जायं, यही सच्चा आतिथ्य है। प्रेम भरी मीठी बोली से जो प्रसन्नता होती है, उसके बराबर कोई भी खातिरदारी नहीं कर सकती। आपके प्रेम-वचन सबसे उत्तम सुश्रूषा हैं।

यदि भेंट के समय आपके पास कोई आवश्यक कार्य आ गया है, तो पहले आप आगन्तुक से अनुमति लें फिर कहीं जायं।

भिक्षकों से व्यवहार

घर आये हुए भिक्षकों को यदि आप कुछ देना चाहते हैं, तो प्रसन्न मुद्रा तथा उदार हृदय से कुछ दे डालिये। शंकित मन, या आधे दिल से देने में कोई धर्म नहीं। भिक्षा को व्यापार या दूसरे के ऊपर एहसान समझ कर मत कीजिए। देकर कुछ पाने की इच्छा रखना मूर्खता है।

यदि उन्हें देने में आप समर्थ नहीं हैं, तो मानवता के नाते, उनका तिरस्कार मत कीजिये। प्रत्येक व्यक्ति भगवान का स्वरूप है। उसके हृदय में साक्षात् भगवान् विराजते हैं। जब आप भिक्षुक को दुत्कारते या झिड़कते हैं, या गन्दी गालियों का उच्चारण करते हैं, तो भगवान का निरादर करते हैं। उसे मानव मानिए, वही श्रद्धा दीजिये, समझा कर प्रेम पूर्वक हटा दीजिये। जो प्रेम आप भिक्षुक को देते हैं, वे उसके हृदय में विराजमान परमेश्वर के लिए श्रद्धा के फूल हैं।

किसी के ऊपर अपना एहसान न जताइये। छोटे-छोटे कार्यों का जिक्र करना ओछापन, संकुचितता, असभ्यता प्रकट करता है। दान का भी यह नियम है कि दूसरे के सामने स्पष्ट रूप से आत्म-विज्ञापन के लिए कहना उसके महत्व को कम करना है। गुप्त दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है।

न्योते और दावतें :- जब आप दूसरों के यहाँ न्योते पर जायं, तो समय पर जाइये। जिस प्रकार आपको बैठाया जाय, उसी प्रकार बैठ कर भोजन कीजिए। हिन्दू घरों में चौके में बैठ कर भोजन कराने की प्रथा है। यदि आपको कोई विशेष परहेज न हो तो उसी प्रकार बैठकर आनन्दपूर्वक भोजन कीजिए। स्वयं अपनी ओर से कोई आवश्यकताएँ पेश न कीजिए। ‘धन्यवाद’ देना न भूलिए।

लौकिक व्यवहार में ‘धन्यवाद’, ‘नमस्ते’, कृपा, बनाए रखिएगा’ आदि शब्दों का प्रयोग बहुत कम व्यक्ति करते हैं। यह भावना विकसित करने की बड़ी आवश्यकता है।

अच्छाइयाँ देखा कीजिये :- गुण ग्राहक बनिए। दूसरों की कमजोरियाँ तथा कमियाँ निकालना बड़ा आसान कार्य है। हममें से कौन ऐसा है, जिसमें निर्बलताएँ मौजूद नहीं हैं। श्रेष्ठ तो यह है कि हम दूसरों के गुणों को परखें, जाने, समझें, उनकी दाद दें और उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित करते रहें। वह व्यक्ति किस अर्थ का है, जो ईर्ष्या वश दूसरों की बुराई ही करता रहता है। उसके चरित्र के दुर्गुण ही निकलता रहता है। बुराइयाँ देखने की प्रवृत्ति एक मानसिक रोग है। इससे वृत्तियाँ नीचे की ओर गिरती हैं। अच्छाइयाँ देखने से गुणग्राहकता का गुण विकास होता है। जब आप दूसरों के गुण देख कर उन्हें व्यवहार में लाते हैं, तो दूसरे आपसे प्रसन्न रहते हैं। मित्रता भी बढ़ती है।

निन्दनीय बातें :-यदि आपने अपने मित्र, सम्बन्धी या घर के व्यक्ति के विषय में कोई निन्दनीय बात सुनी है, तो उसे सबके सामने मत कह बैठिए। कोई अपनी निन्दा पसन्द नहीं करता। चोर, डाकू, कातिल तक अपनी बुराई अपने कानों से नहीं श्रवण करना चाहता। उसे अपनी प्रतिष्ठा, आत्म सम्मान,इज्जत का फिर भी ख्याल रहता है। उसके विषय में जो आप कहना चाहते हैं उसे एकान्त में ले जाकर सहानुभूति पूर्ण शब्दों में व्यक्त कीजिए। यह जोड़ देना मत भूलिए कि आप उस निन्दा में कोई विश्वास नहीं करते हैं। वह आपकी राय में गलत बातें हैं जिसमें कोई तथ्य नहीं है।

दूसरे का अपने प्रति विश्वास न तोड़ डालिये। आपके पास अपनी स्वयं की, मित्रों की, ऑफिसों, व्यापारियों, स्त्री, घर-बाहर पड़ौसियों की अनेक गुप्त बातें,चरित्र विषयक गुप्त बातें संचित रहती हैं। ये गुप्त भेद आपके पास रखे रहने तथा उनके प्रकाश में आपको सम्हल कर काम करना है। स्मरण रखिए ये गुप्त भेद दूसरों के समक्ष प्रकट करने में आप दूसरों के साथ बड़ी बेईमानी का व्यवहार करते हैं। अपने गुप्त भेद भी दूसरों से न कहिए। बैंकों में बड़े-बड़े पूँजीपतियों का हिसाब रहता है, कुछ का दिवाला निकलने को रहता है,किन्तु बाहर से टीप-टाप बनी रहती है। यदि दुकानदारों, व्यापारियों, पूँजीपतियों या बड़े नेताओं के गुप्त भेद खुल जायं, तो समाज में उनका निरादर हो जाय।

सहिष्णुता के व्यवहार की आवश्यकता :-

विश्वासी बनिए। बिना विश्वास के काम नहीं चलता। किन्तु जिस पर विश्वास करना है, उसे बुद्धि प्रलोभन,दृढ़ता आदि से खूब परख लो।

प्रत्येक वस्तु को अपनाने की, और अपने को परिस्थितियों के अनुसार ढालने की क्षमता रखो। उन्हीं वस्तुओं को, गुणों, व्यक्तियों, संस्थाओं तथा पुस्तकों को अपनाना सीखो जो तुम्हारे योग्य हों।

जीवन को प्यार करो, किन्तु मृत्यु का भय त्याग दो। जब मरने का समय आएगा,चल देंगे। अभी से क्यों उसकी चिंता करें। जीवन को यदि प्यार न करोगे, तो उससे हाथ धो बैठोगे। किन्तु जीवन को आवश्यकता से अधिक प्यार करने की आवश्यकता नहीं है।

दैनिक व्यवहार में सहनशीलता ऐसा आवश्यक गुण है, जिसके असंख्य लाभ हैं। तुम्हारे अफसर, ग्राहक, घर वाले झगड़ बैठेंगे,माता-पिता लड़ेंगे, स्वयं तुम्हारे बाल-बच्चे तुम्हारे दृष्टिकोण से सहमत न होंगे,ऐसे अवसरों पर तुम्हें शान्त आत्मनिर्भर,दृढ़ रहना है। सहिष्णुता ही तुम्हारे लिए भविष्य में प्रशस्त मार्ग खोल देती है।

अपने विचारों को बरबस मत थोपिये :-

जिस वीणा के तार बहुत कसे हुए होते हैं,उसका संगीत ठीक नहीं होता। जब उसके तार ढीले होते हैं,तो उसकी ध्वनि मधुर नहीं रहती। लेकिन जब वीणा के तार न अधिक कसे होते हैं, न अधिक ढीले,तब इसके तारों से मधुर संगीत निकलता है। यही हाल मनुष्य के शरीर,व्यवहार तथा साँसारिक सम्बन्धों का है। जब तुम संसार के साथ कठोरता का व्यवहार करोगे, वह थक कर तुम्हारी ओर से वीतराग हो जायगा और तुम्हारी तरफ से लापरवाह रहेगा। जब तुम इसके साथ बहुत मुलामियत का व्यवहार करोगे, तो कोई तुम्हारी भावनाओं,दृष्टिकोणों,विचारधारा और व्यक्तित्व का महत्व न मानेगा। यदि तुम मध्य मार्ग का अनुसरण करोगे, तो जीवन के हर मोर्चे पर विजयी होंगे।

दूसरों को अपने विचार समझाइए। अपने विचार मत थोपिए। उन्हें आपके विचारों तक स्वयं तर्क करके आने दीजिए। सच्ची शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य लोगों से ठीक बात करना ही नहीं,वरन् ठीक बातों के करने में आनन्द अनुभव करना है। केवल परिश्रम में प्रेम का अनुभव करना है।

उपदेश देने की मूर्खताएं

बिना सोचे समझे, चाहे जिसको उपदेश न दे बैठिए, क्योंकि उपदेश जनता ना पसन्द करती है। उन्हें तर्क द्वारा आपके निष्कर्षों पर आना चाहिए। धीरे धीरे तर्क तथा बुद्धि से अपने मन्तव्यों पर लाइए।

धन के लोभ में उपदेश देने में धर्म का नाश होता है। किसी जिज्ञासु के पूछने पर अच्छी तरह उसका जिज्ञासा को समझ कर उपदेश दीजिए जिससे धर्म की हानि न हो।

सत्य,दान, क्षमा, अहिंसा, शिक्षा और बुद्धिमता आदि सद्गुण यदि शूद्र में हों तो वह शूद्र नहीं है; और जिस ब्राह्मण में ये गुण नहीं है; वह ब्राह्मण ही नहीं है। आपका व्यवहार दूसरों के उच्च गुणों को दृष्टि में रख कर होना चाहिए; न कि केवल उच्च जाति या पूँजी की कसौटी पर।

मनुष्य जो स्वयं दूसरों को दे; उसे भूल जाय; और जो दूसरों से ले; उसे सर्वथा स्मरण रखे; और उसका बदला उतार देने का प्रयत्न करे। सद्व्यवहार की यही जड़ है। खेद है कि लोग झूठ को दस वर्ष तक याद रखते है; पर सत्य को दस मिनट में विस्मृत कर बैठते हैं।

मनुष्य के दिमाग की तरह लचीली चीज और कोई नहीं है। बन्द की हुई भाप की तरह जितना ही दबाव इस पर पड़ता है; उतनी ही शक्ति से यह दबाव के साथ लड़ता है। जितना अधिक विकास इस पर आ पड़ता है; उतना ही अधिक यह उसे पूर्ण कर लेता है।

बकवास एक अशिष्टता :-

ज्यादा बोलना घमंड का प्रदर्शन है, क्योंकि जो बातूनी, शेखीखोरी, टीपटाप वाला व्यक्ति होता है, वह काम कम करता है।

मनुष्य को यह स्वीकार कर लेने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए कि उसने गलती की है। गलती को मान लेने में आपके धैर्य और आगे से उसके विषय में सावधानी, प्रकट होती है। दूसरे शब्दों में इसका यह अर्थ हुआ कि बीते हुए कल से आज अधिक बुद्धिमान है।

बेवकूफ व्यक्ति भय से पहले ही डर जाता है; कायर भय के समय ही डरता है; और साहसी भय पश्चात् डरता है।

लोक व्यवहार में केवल वही विजयी हो सकता है, जिसे अपनी कुशलता, विद्या, बुद्धि, योग्यता और विजय में विश्वास हो।

अपने को धोखा देना सबसे सरल है; क्योंकि हम जो चाहते हैं, उस पर फौरन विश्वास कर लेते हैं। इन हवाई किलों से निकलने की आवश्यकता है। अपने लिए ऐसी कल्पनाएं न बनाइये जिसमें कुछ सार न हो; जो कभी न हों, जिसके लिए आप हमेशा दूसरों को कोसते रहें; कल्पित झगड़ों में आन्तरिक समस्वरता शान्ति, आशा और अपने हाथ से जो उन्नति संभव है; उसे भी छोड़ बैठें। आप तो यह मान कर चलिए कि दूसरों से कुछ सहायता, पैसा या पथ प्रदर्शन न मिलेगा। यदि कोई सज्जन मदद देते हैं, तो यह उनकी विशेष अनुकम्पा मान कर ही ग्रहण कीजिए। स्वयं अपने ऊपर ही निर्भर रहना श्रेष्ठ धर्म है।

बेवकूफ व्यक्ति नहीं छिपता। वह चाहे सुनहले वस्त्र पहिन ले, बड़े आलीशान मकानों में निवास करे, अफसर बनाकर शासन की कुर्सी पर बिठा दिया जाय लेकिन उसकी बेवकूफियाँ कभी न छिपेंगी। बातचीत में, सामाजिक आचार व्यवहार में, वे अवश्य प्रकट हो जायेंगी। कहा भी है—

“भले बुरे सब एक से, जब तक बोलत नाहिं।”

“जान परत है काक पिक ऋतु बसन्त के माहिं;”

बुद्ध के इस वचन में गहरा तथ्य है :—

“मैं अज्ञानियों को ज्ञान से तृप्त करने आया हूँ। जब तक कोई मनुष्य प्राणियों के हित के लिए जान न लड़ादे, परित्यक्तों को साँत्वना न दे, तब तक वह पूर्ण नहीं हो सकता। मेरा सिद्धान्त करुणा का सिद्धान्त है। इसी कारण जो लोग दुनिया में खुशहाल हैं,वे मेरे सिद्धान्त को मुश्किल से समझते हैं। निर्वाण का मार्ग सबके लिए खुला हुआ है।”


बड़ों से व्यवहार की सफलता

चाहे आप विद्या बुद्धि में कितने ही विकसित क्यों न हो जाय, आप अपने माता पिता अथवा गुरुजनों की दृष्टि में बच्चे ही हैं। माँ अपने बूढ़े पुत्र को भी बालक समझती है, पिता उसमें आत्म भाव के कारण अपरिपक्वता ही देखा करता है। इसी प्रकार आपके गुरु, अध्यापक तथा अन्य गुरुजनों की दृष्टि में बड़े होकर भी आप छोटे ही बने हुए हैं। अतः उनसे अपना व्यवहार करते समय आपको बड़ा सतर्क रहना है। तनिक से मर्यादा के बाहर हो जाने का अर्थ अशिष्टता हो सकता है।

आपका पिता माता के प्रति चाहे वे कितने ही अनपढ़ या अशिक्षित हों, सम्मान-पूर्ण रहना चाहिए आपका सम्बोधन शिष्टता एवं मर्यादा का प्रतीक हो। उससे उनके प्रति आपके सद्विचार, व्यवहार तथा सम्मान की भावना प्रकट होनी चाहिए। यह ध्यान रखिये कि आप उनके सामने अपनी शेखी न बघारने लगें, या ऐसी बातें न कर बैठें, जो आपमें नहीं हैं। आपके बड़े अनुभव में बढ़े चढ़े होते हैं। वे संसार की कमजोरियों, गुप्त रहस्यों, उत्थान पतन इत्यादि का अधिक ज्ञान रखते हैं। अतः उनके सामने आपकी झूठी, मिथ्या गर्व से भरी बातें अधिक नहीं चल पातीं। आपकी जो सच्ची योग्यता है, उसी को लेकर आप सम्मान पूर्ण ढंग से शिष्टाचार और सभ्यता का ध्यान रखते हुए बातें करें।

बड़ों के सामने कोई गाली देना, या गुप्ताँगों को स्पर्श, कमीज के बटन या पेट खुला रखना बड़ी अशिष्टता का सूचक है। कमीज के खुले हुए बटन आपकी लापरवाही, बेहूदापन तथा आन्तरिक गन्दी आदतों को दिखाने वाले हैं। आजकल नेकर को इतना छोटा पहनने का रिवाज सा चल गया है, जिसमें जाँघ का ऊपरी हिस्सा तक दीखता रहता है। यदि समझदारी से न बैठा जाय, तो मनुष्य नंगा हो सकता है। यह अशिष्ट व्यवहार का एक प्रत्यक्ष नमूना है, जिसे नवयुवक अपनाते जा रहे हैं।

आजकल सिनेमा के भद्दे कामुकता से परिपूर्ण गन्दे गानों की बड़ी भरमार है। अबोध बच्चे जो प्रेम या काम वासना का तात्पर्य तक नहीं समझते हैं, ऐसे गन्दे गीत गाते देखे जाते हैं कि सुनकर लज्जा से सिर नीचा हो जाता है। सिनेमा देखने वाले युवक तो इन सस्ते फिल्मों से इतने प्रभावित रहते हैं कि उसी प्रकार की नाना प्रकार की नाना क्रियाएँ अनुचित और अनैतिक प्रेम सम्बन्ध,गीतों का गायन,अभिनय,गन्दे मजाक आदि किया करते हैं यह नितान्त अनुचित है। कम से कम फिल्म देखिये। अपने दैनिक व्यवहार में मर्यादा और बड़ों के सम्मान का ध्यान रखिये।

बड़ों के सामने आवेश या क्रोध में आकर हम प्रायः अनेक जली कटी बातें उच्चारण कर बैठते हैं, आवेश तथा भावुकता हमारी कमजोरियाँ भी बन जाती हैं। मनुष्य स्वभाव विचित्रताओं से परिपूर्ण है। राग अथवा द्वेष से, जिस भाव से भी वह किसी के प्रति भावुकता से बढ़ता है, तो उसी भाव के पोषक सारे अतीत के चित्र एक एक करके उसके सामने घूमने लगते हैं। बड़ों की अच्छाइयाँ, उनके द्वारा हम पर किए गये अनुग्रह जैसे लुप्त हो जाते हैं। प्रस्तुत रस को ही उत्तेजना मिलती रहती है।

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छोटों से व्यवहार कैसे करें?

आयु तथा अनुभव में आपसे छोटे व्यक्ति भिन्न भिन्न प्रकार के व्यवहार की आकाँक्षा रखते हैं। कुछ व्यक्ति आयु में बड़े होकर ज्ञान में आपसे छोटे हो सकते हैं। कुछ आपसे आयु तथा ज्ञान दानों ही में छोटे रहते हैं।

जो आपसे उम्र में छोटे हैं, उनसे आप प्रेम तथा सहानुभूति का व्यवहार कीजिए। वे आपको एक आदर्श के रूप में देखते हैं। आपके चरित्र, व्यवहार, रीति-रिवाज, दैनिक कार्यक्रम—सभी में निरन्तर आपका अनुकरण किया करते हैं। आप उनके सामने हर प्रकार से एक आदर्श बन रहे हैं। बोलचाल में उनसे पूर्ण शिष्टता का व्यवहार करें, उन्हें आयु ‘बाबू’ आदि से सम्बोधन करें। आपका यह मान प्रतिष्ठा पाकर वे चरित्र में आपके आदर्शों के अनुकूल उच्च स्तर पर आने का प्रयत्न करेंगे। आपके उत्तम भावों को कभी नष्ट न होने देंगे।

प्रेम तथा सहानुभूति का सद्व्यवहार पाकर बच्चों की गुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। वे उसी उच्च स्तर पर आपके चरित्र का अनुकरण कर पहुँचने का उद्योग करते हैं। आपके शब्द, बातचीत प्यार प्रकट करें किन्तु अति को न पहुँच जावें। अति का व्यवहार बच्चों को बिगाड़ने वाला, उनकी आदतों को नष्ट करने वाला, होता है।

बच्चों की अच्छी आदतों का विकास देर से होता है। बच्चों की जिद प्रायः ऊँचा उठने की भावना से प्रेरित रहती है। उचित बात को प्रोत्साहन दीजिए।

अनुचित बात की ताड़ना भी न भूलिए। व्यवहार कुशल व्यक्ति बालक का क्रमिक विकास देख कर प्रोत्साहन तथा ताड़ना का सदुपयोग करता है। उनकी प्रत्येक अच्छी बात पर प्रशंसा करना न भूलिये। आपकी प्रशंसा के दो मीठे शब्द पाने के लिए बच्चा कठिन परिश्रम करता है।

स्त्रियों के साथ व्यवहार :- नारी जाति पूज्य है, प्रत्येक स्त्री में एक माता छिपी हुई है। इस मातृत्व के नाते वे पूजनीय हैं—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”

बिना पूर्व सूचना दिये, जहाँ स्त्रियाँ बैठी हों, वहाँ जाना अशिष्टता है। यदि किसी अपरिचित के घर में आपका आना जाना भी हो, तब भी घर में पदार्पण करने से पूर्व कुछ आवाज देकर, जाना ही उचित है।

स्त्रियाँ स्वभावतः लज्जाशील, शर्मीले स्वभाव की होती हैं। अतः उनसे बातें करते समय उनकी ओर टकटकी लगाये रखना या घूर घूर कर देखना, चार आँखें करने की अशिष्टता न कीजिये। किसी दूसरी ओर दृष्टि रखिए अथवा नीची दृष्टि रखिये।

उनके लिए कुछ न कुछ पवित्र, शिष्ट आदर सूचक सम्बोधन—“बहिन जी;” बेटी, “माता जी, “चाची जी,” नानी; इत्यादि—आवश्यक प्रयोग में लाइये।

जहाँ स्त्रियाँ हों बड़ी सावधानी से रहिए। न ताली बजाइये, न चुटकियाँ, न असभ्यता सूचक सीटियाँ न वहाँ भँवरे की तरह मंडराइये, या घूमिये। चुपचाप बैठकर उनकी और न निहारिये। रेल या गाड़ी में बैठी हुई स्त्रियों की और भी घूर घूर कर देखना असभ्यता है। उनके सामने बैठकर अपने गुप्त अंग न खुजाओ, जाँघ पर से वस्त्र न हटाओ, छाती न खोल डालो, दिल्लगी मजाक न करो, बिना कारण बात न कर बैठो। पराई स्त्री में पूज्य मातृत्व भाव ही देखो, परायी स्त्री के पास अकेले में भी मिलने, बातचीत करने, या अनुचित सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयत्न मत करो।

अपनी पत्नी से शिष्ट व्यवहार :- अपनी पत्नी से भी सभ्यता का व्यवहार रखिये। जो पुरुष कभी उन पर हाथ उठा बैठते हैं; अपनी समझ कर तिरस्कार करते हैं; वे उनकी बेइज्जती करते रहते हैं, वे अश्लील हैं। गुप्त मन में उनकी स्त्रियाँ उन्हें दुष्ट राक्षस-तुल्य समझती हैं। ऐसा प्रसंग ही मत आने दीजिए कि नारी को मारने पीटने का प्रसंग आये। उसे अपने आचार व्यवहार, प्रेम भरे सम्बोधन से पूर्ण संतुष्ट रखिए।

पत्नी की भावनाओं की रक्षा, उसके गुणों का आदर, उसके शील लज्जा, व्यवहार की प्रशंसा मधुर सम्बन्धों का मूल रहस्य है। पत्नी आपकी जीवन सहचरी है। अपने सद्व्यवहार से उसे तृप्त रखिए। पत्नी पति की प्राण है, पुरुष की अर्द्धांगिनी है, पत्नी से बढ़ कर दूसरा कोई मित्र नहीं, पत्नी तीनों फलों—धर्म, अर्थ, काम, को प्रदान करने वाली है और पत्नी संसार सागर को पार करने में सबसे बड़ी सहायिका है। फिर, किस मुँह से आप उसका तिरस्कार करते हैं?

उससे मधुर वाणी से बोलिए। अपने मुँह पर मधुर मुसकान हो; हृदय में सच्चा निष्कपट, प्रेम हो वचनों में नम्रता, मृदुता, सरलता, प्यार हो। स्मरण रखिये, स्त्रियों का “अहं” बड़ा तेज होता है; वे स्वाभिमानी, आत्माभिमानी होती हैं। तनिक सी अशिष्टता, या फूहड़पन से क्रुद्ध होकर आपसे सम्बन्ध में घृणित धारणाएं बना लेती हैं। उनकी छोटी मोटी माँगों या फरमायशों की अवहेलना या अवज्ञा न करें। इसमें बड़े सावधान रहें। जो स्त्री एक छोटे से उपहार से प्रसन्न होकर आपसी दासता और गुलामी करने को प्रस्तुत रहती है, उसके लिए सब कुछ करना चाहिए, अतः पत्नी का आदर करें, उसके सम्बंध में कभी कोई अपमान सूचक बातें मुँह से न निकालें और उनकी उपस्थिति में या अनुपस्थिति में उनकी हँसी न करें। “हेम दान ,गज दान ते, बड़ो दान सम्मान” याद रखें।


मूर्खों की उपेक्षा किया करें।

समाज में आपकी खिल्ली उड़ाने तथा सद्मार्ग में बाधाएँ उपस्थित करने वाले मूर्खों की कमी नहीं है। प्रत्येक बड़े से बड़े व्यक्ति को ऐसे व्यक्तियों का सामना करना पड़ता है, जो विद्या, बुद्धि, चरित्र गौरव, निष्ठा, सहानुभूति या योग्यता में आपसे छोटे हैं। इन व्यक्तियों का कुछ ऐसा स्वभाव होता है कि शुभ कार्य में बाधा पहुँचाते हैं। सज्जनों के मार्ग में अड़चनें उपस्थित करते हैं। ईर्ष्या, द्वेष या सस्ती उपहास वृत्ति के वशीभूत होकर आपका मजाक उड़ाते चलते हैं।

इनके साथ आपका व्यवहार उपेक्षा का ही होना चाहिए। आप उनकी आलोचना, टीका टिप्पणी या हँसी मखौल की और ध्यान ही न दीजिए। उन्हें अपना राक्षसी स्वभाव दिखाने दीजिए; आप अपनी साधुता, सज्जनता और शालीनता न छोड़िये। अपने रास्ते चलते रहिये। उनसे व्यर्थ झगड़ा मोल न लेना ही श्रेष्ठ है।

ईर्ष्यालु मूर्खों से प्रभावित न हों :-

“शरीफ “ लोग अक्सर सोचा करते हैं कि अमुक व्यक्ति मुझसे क्यों जलता है; मैंने तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ा है। वे सोचते हैं, मैं तो पाक-साफ हूँ। मुझमें किसी भी व्यक्ति के लिये दुर्भावना नहीं है। बल्कि, अपने दुश्मनों के लिये भी मैं भलाई ही सोचा करता हूँ। फिर भी ये मेरे पीछे क्यों पड़े हुए हैं? मुझमें कौन से ऐसे ऐब हैं, जिन्हें दूर करके मैं इन दुष्टों को दूर कर सकता हूँ?”

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब इस तजुर्बे से होकर गुजरे तो उन्हें एक सूत्र कहा—‘तुम्हारी निन्दा वही करेगा, जिसकी तुमने भलाई की है।’

नीत्से जब इस कूचे से होकर निकला तब उसने जोरों का ठहाका लगाया और कहा कि ‘यार, ये तो बाजार की मक्खियाँ हैं, जो अकारण हमारे चारों ओर भिनभिनाया ही करती हैं। ये सामने प्रशंसा और पीछे निन्दा किया करते हैं। हम इनके दिमाग पर बैठे हुए हैं। ये मक्खियाँ हमें भूल नहीं सकतीं और चूँकि ये हमारे बारे में बहुत कुछ सोचा करती हैं। इसलिए ये हमसे डरती हैं और हम पर शंका भी करती हैं। ये मक्खियाँ हमें हमारे गुणों के लिए सजा देती हैं। ऐब को तो यह माफ कर देंगी, क्योंकि बड़ों के ऐब को माफ कर देने में भी एक शान है, जिस शान का स्वाद लेने को ये मक्खियाँ तरस रही हैं।”

उपरोक्त दृष्टिकोण ही उचित है ये मूर्ख, ये दुष्ट, ये शत्रु, बेचारे बड़े छोटे हैं; निम्न स्तर पर हैं, ना समझ और ईर्ष्या के शिकार हैं। इन मूर्खों की बातों की ओर तो उपेक्षा का भाव ही सर्वश्रेष्ठ है। जो इनकी ओर से चुप्पी साधे रहता है वही सफल रहता है।

इन लोगों से वचन के लिए नीत्से का उपदेश सुनिए—“बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो। जो कुछ अमर तथा महान् है उसकी रचना तथा निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर होकर ही किया जाता है। जो लोग नए मूल्यों का निर्माण करने वाले हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास नहीं फटकते। जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं।”

“सोने वाले कुत्तों को सोने दीजिए” अँग्रेजी की इस कहावत में गहरा मर्म छिपा है। ये दुष्ट व्यक्ति कटखने कुत्तों की तरह हैं। जितनी देर सोते हैं, इन्हें सोने दीजिये। अन्यथा ये अपनी दुष्टता छोड़ने वाले नहीं हैं।

आप अपना सत् कार्य किये जाइये। दूसरों की अनुमति, प्रेरणा, प्रोत्साहन या बढ़ावा दिलाने की क्यों प्रतीक्षा करते हैं? प्रसन्न और सफल हम तभी हो सकते हैं, जब इन्हें उपेक्षित छोड़ कर इनकी आलोचना या उत्साह की परवाह न करते हुए अपनी राह चलते रहें; अपने उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न रहें।

प्रत्येक दुष्ट के मन में अहं भाव बड़ी तीव्र मात्रा में होता है। वह उसी दर्प की पूर्ति के लिए आपको छेड़ता है। वह आपसे प्रशंसा चाहता है कभी कभी सहानुभूति के शब्द पाकर वह आपका मार्ग साफ छोड़ सकता है। इस तरीके को भी सोच समझकर अपना सकते हैं।

मूर्खों को उनके स्वर्ग में ही रहने दीजिये।


अशिष्टता-सार्वजनिक जीवन का अभिशाप

भारत में आजकल अशिष्टता का जो व्यापक प्रचार है, उसे देख कर देश के गणमान्य नेता विक्षुब्ध हो उठे हैं। नेहरू जी ने सार्वजनिक जीवन में शिष्टता की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्देश किया है कि अशिष्टता जीवन का अभिशाप है और सर्वथा त्याज्य है।

अशिष्टता हमारे सार्वजनिक जीवन का अभिशाप है। अशिष्ट व्यक्ति पशु तुल्य है, जिसे दूसरे की मान प्रतिष्ठा आत्म सम्मान का कोई ध्यान नहीं है; जो अपने स्वार्थों में तो निरत है, किन्तु दूसरों के ‘अहं’ की ओर से निश्चित है। अशिष्ट व्यक्ति इस योग्य नहीं होता कि उसे सभ्य समाज में स्थान दिया जा सके।

जिस व्यक्ति को दूसरों से बातें करने का शिष्टाचार नहीं आता, उससे कौन बोलना पसन्द करेगा? जिसे दूसरों के व्यंग्य और मजाक उड़ाने, त्रुटियाँ निकालने, उपहास करने में ही आनन्द आता है, वह महा अज्ञानी है। वह मद के गहन अन्धकार में डूब कर दूसरों के अन्धकार मय पक्ष को ही देखता है तथा निज अन्तःकरण में आवृत हीनत्व की भावना का प्रदर्शन करता है।

अशिष्टता मानव जीवन का कलंक है। अशिष्ट पुरुष जहाँ जाता है, अनादर का पात्र होता है। योग्यता रखने पर भी अपनी बदतमीज़ी की वजह से वह नौकरी खो बैठता है, मातहतों के ऊपर निज प्रभाव नहीं डाल पाता, समाज में सभ्य व्यक्ति उसका तिरस्कार करते हैं।

छोटी-छोटी बातों से अशिष्टता प्रारंभ होती है। बचपन में प्रायः अविवेकी माता-पिता बालकों पर उचित नियन्त्रण नहीं करते। कुसंगति में पड़कर वे कुत्सित गालियों का प्रयोग सीखते हैं, गुप्त अंगों से सम्बन्धी कुवाक्य बात बात पर उच्चारण करते हैं, एक दूसरे से बातें करते समय कीचड़ उछालते, लज्जा का अनुभव नहीं करते। निम्न समाज में गाली-गलौज और मारपीट चलती रहती है। उसका प्रभाव कोमल हृदय बालकों पर निरन्तर पड़ता है। भाँति भाँति की कुप्रथाओं, अशिक्षा, कुसंग, सिनेमा, निम्न स्तर का साहित्य पढ़ने, अशिष्ट बातों के न रोकने से चरित्र में बदतमीज़ी का प्रारम्भ होता है।

माता-पिता को उचित है कि बच्चों के प्यार के नामों का प्रयोग कम करें; शिष्टता पूर्ण नाम का ही प्रयोग करें। मित्रों को भी शिष्टता पूर्ण नाम का उच्चारण करना चाहिए। “यह हमारा मित्र है, इससे हम जैसे चाहें संबोधन इस्तेमाल कर सकते हैं।”-यह अशिष्ट धारणाएं हैं। जिसका जो नाम हो, उसी का प्रयोग करना चाहिए। नाम के अन्त में “जी”का प्रयोग उत्तम है।

पत्र व्यवहार में अनेक व्यक्ति प्रारम्भ तथा अन्त में शिष्टतासूचक सम्बोधनों का प्रयोग नहीं करते हैं। पत्रों के प्रारम्भ में “पूज्य,” का प्रयोग अपने से बड़े व्यक्ति के लिए भी प्रायः नहीं किया जाता है। नौकरी पेशा अर्जियों के नीचे “आपका आज्ञाकारी” लिखना शान के खिलाफ समझते हैं। वे लिखते हैं-“आपका हितैषी“ या “भवदीय” । ये भी प्रायः अंग्रेजी में लिखा जाता है। अफसर ऐसे प्रार्थना पत्रों को रद्दी में फेंक देता हैं। किसी को आदर सूचक बातें कहना या बोलना आत्म-अभिमान को कम करना नहीं है।

आवेश में आकर प्रायः बदतमीज़ी की जाती है। आपके अफसर ने क्रोध में आकर डाट दिया। आप भी उद्विग्न हो उठे और दो-चार जलीकटी कह गये। फलतः नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

सभा, समितियों, क्लबों, बैठक, रेल में टिकट खरीदते समय या रेल में प्रवेश करते समय अशिष्टता अपने गन्दे रूप में नजर आती है। सभी स्थान पाने के लिये बुरी तरह दौड़ते, गालियाँ देते हुए नजर आते हैं। देर से आने पर स्थान न होते हुए पर भी आने वाला सबको लाँघ कर आगे जाना चाहता है। इस बात की चेष्टा नहीं करते कि समय से पूर्व ही पहुँच जायं। बैठे रहने वाले व्यक्ति स्थान होते हुए भी फैल-फैल कर बैठते हैं और दूसरे को जगह देना पसन्द नहीं करते, चाहे वह बेचारा खड़ा ही क्यों न हो?

स्वयंसेवकों तथा स्वयंसेविकाओं की अशिष्टता देख कर दंग रह जाना पड़ता है। उनमें सहानुभूति, मृदुलता, दूसरे की सहायता करने की भावना, नहीं होती प्रत्युत निज महत्ता का मिथ्या प्रदर्शन होता है। वे शान के साथ इधर से उधर घूमते हैं, सैनिकों के अनुरूप रौब प्रदर्शित करते हैं। निज इष्ट मित्रों के निमित्त समरत सुविधाएँ तथा सर्व साधारण के निमित्त डाट फटकार और जबरदस्ती का पालन करते हैं। यहाँ तक कि लड़ाई झगड़ों, हाथापाई और कुशब्दों के व्यवहार तक की नौबत आ जाती है।

अधिकाँश अफसर अपने मातहतों के प्रति अशिष्ट व्यवहार में ही शान समझते हैं। जैसा देखा समय-असमय डाट दिया, कुशब्दों का उच्चारण कर दिया, ऊँचा-नीचा कहने में कुछ हर्ज नहीं समझते। यह उनकी शिक्षा, सभ्यता तथा उच्च संस्कृति का एक उपहास है।

कालेज स्कूलों में छात्रों में अशिष्टता अभिवृद्धि पर है। गुरुजनों के “प्रणाम” या “नमस्ते” तो दूर की बात है, साधारण शिष्टाचार भी नहीं किया जाता, बोलने में अक्खड़पन दिखाया जाता है। अध्यापक की अनुपस्थिति में कुर्सी पर बैठने में कोई अशिष्टता नहीं मानी जाती। इसके अतिरिक्त कमीज के बटन खुले रखना, नेकर इतना ऊँचा पहनना कि जाँघ दिखाई दे, खुले आम सिगरेट पीना, गन्दे अश्लील शब्दों का प्रयोग; स्कूल की दीवारों, या डेस्कों पर अश्लील चित्र बनाना, लिख देना, कुशब्द बोल देना, सिनेमाओं की वेश्याओं के चित्र पास रखना, शोर मचाना, अध्ययन तथा अनुशासन के नाम पर उत्तेजित हो जाना, सभा में बैठ कर सीटी बजाना, शोर करना, तालियाँ पीटना, बच्चों की तरह चिल्लाना आदि नाना प्रकार की अशिष्टताएं चल रही हैं।

विद्यार्थी वर्ग अनीति और अशिष्टता के मार्ग पर चल रहा है। उन्हें यह विदित नहीं है कि ये ही आदतें आगे बढ़ कर पक जायेंगी और फिर उन्हें निकालना दुष्कर हो जायगा। विद्यार्थी वर्ग की अनुशासनहीनता देश के लिए कलंक है।

अभिवादन करना विद्यार्थी वर्ग में लुप्त होता जा रहा है। पश्चिमी देशों में चाहे कोई कितना ही कुशल कारीगर क्यों न हो, अपनी योग्यता का घमण्ड रखता है किन्तु अपने अफसर के पास जा कर उसे अभिवादन करना नहीं भूलता।

समय सम्बन्धी अशिष्टता के लिए भारत बदनाम है। क्लर्क दफ्तर में, विद्यार्थी स्कूल कालेजों में, मुसाफिर स्टेशन पर, दर्शकगण सिनेमा नाटकों में, समय की पाबन्दी का कोई भी ध्यान नहीं रखना चाहता। शोक का विषय है कि हमारे उठने-बैठने, सोने-जागने, दूसरों से मुलाकात करने तक का समय निश्चित नहीं है। भोजन सम्बन्धी नाना प्रकार की असभ्यता चलती रहती हैं। सम्पूर्ण पश्चिमी संसार में एक ही समय पर भोजन के लिए भिन्न-2 प्रकार के नामों की व्यवस्था है। अंग्रेज धनी हो या निर्धन, मजदूर हो या क्लर्क—उसके भोजन का समय निश्चित है। संयोग से यदि कोई अतिथि आ जाय, तो उसे भी नियत समय पर भोजन प्राप्त होगा। हमारे देश में रात हो या दिन, उचित समय हो या अनुचित आतिथ्य सत्कार चलता रहता है। जो देश खाने के समय का पालन नहीं कर सकता, उससे यह आशा नहीं की जाती कि वह जीवन के अन्य कार्यों में समय के पालन का ध्यान रखेगा।

यह कहना युक्ति संगत नहीं है कि विद्या से ही शिष्टाचार आता है। अनेक अशिक्षित व्यक्ति भी शिष्ट जन समुदाय की संगत में प्रविष्ट हो शिष्टता सीखते हैं।

अशिष्टता किसी भी राष्ट्र, देश, जाति, वर्ण के लिए अशोभनीय एवं त्याज्य है। बदतमीज आदमी शिष्ट समाज में प्रविष्ट नहीं कर पाता क्योंकि सर्वत्र उसका निरादर होता है। अनुशासन की अवज्ञा करने वाला, दूसरों के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के प्रति निश्चेष्ट, वीतराग स्वार्थी व्यक्ति , दुर्व्यवहार करने वाला आदमी कभी शिष्ट समाज में आदर प्राप्त नहीं कर सकता। दैनिक सामाजिक जीवन की छोटी-2 बातों से हमारा चरित्र प्रकाशित हुआ करता है, जो हमें सभ्य, शिष्ट एवं सुसंस्कृत या अशिष्ट प्रमाणित करता रहता है।


Quotation

भारत ने जिस सभ्यता को जन्म दिया था विश्व की कोई सभ्यता उसकी बराबरी की नहीं है। हमारे पूर्व-पुरुष जो बीज बो गये हैं उसकी ममता करने वाली इस संसार में एक भी वस्तु नहीं है। रोम के धुर्रे उड़ गये : यूनान नाम-शेष हो गया; ब्रिटेन का साम्राज्य रसातल को चला गया; जापान पश्चिम के चुँगुल में फँस गया और जर्मनी की बात तो कुछ कहते ही नहीं बनती। परन्तु भारत से पत्ते झड़ जाने पर भी उसकी जड़ मजबूत है।


दैनिक व्यवहार की कुछ अशिष्टताएं

राशन की दुकान है। खरीददारों की लम्बी भीड़ खड़ी है, “पहले मैं, पहले मैं” की चिल्लाहट सुन पड़ती है। धींगा मुश्ती चल रही है। लोग एक दूसरे के ऊपर गिरे पड़ते हैं, भीड़ में श्वास तक नहीं आता है। किसी की गठरी बिखरती है, तो किसी को कम तोल माल मिलता है। इसमें किसका दोष है? कम तोलना, वाक्-युद्ध होने तथा गालियों, गठरी बिखरने, घंटों बैठने का उत्तरदायित्व किस पर है? यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र की कमजोरियाँ ही हैं।

व्यवहार की छोटी-छोटी भूलें हमें नीचे लाती हैं। हमारे राष्ट्रीय चरित्र को कमजोर करती हैं। कोई भी राष्ट्र अपने बड़े आदमियों के चरित्र पर नहीं, अपनी साधारण जनता के व्यवहार में बड़प्पन पाता है आचरण सभ्य है, सहृदय है, सज्जनता पूर्ण है, तो वह राष्ट्र उन्नत है। भारत में राष्ट्रीय चरित्र की निम्न कमजोरियाँ विशेष रूप से हटाने योग्य हैं :—

समय सम्बन्धी भूलें :- समय की पाबन्दी को पालन न करना। स्कूल, कालेजों, ऑफिसों रेल के स्टेशनों, गाड़ियों का समय पर न पहुँचना। विद्यार्थियों को समय की पाबन्दी का जरा भी ध्यान नहीं रहता। क्लर्क ऑफिसों में देर से पहुँचते हैं, डाकिया देर से डाक बाँटता हैं। यहाँ तक कि सिनेमा का मनोरंजन देखने वाले दर्शक भी समय की परवाह नहीं करते चाहे आधी फिल्म निकल जाय।

वायदे का पालन न करना :- जिस समय पर आने का वायदा किया जाय, उस समय पर न पहुँचना बड़ी अशिष्टता है। या तो वायदा ही न किया जाय, अन्यथा चाहे कुछ हो नियत समय पर, नियत स्थान पर अवश्य पहुँचा जाय।

पुलिस का निर्देश न मानना :- जब सड़क पर पुलिस मैन आपको एक ओर जाने को कहता है, तो उस ओर न बचकर दूसरी ओर बचना, फुटपाथ पर छोड़कर बीच सड़क पर चलना, सड़क पर छिलके कूड़ा करकट, गन्दी वस्तुओं को एकत्रित करना, सड़क या नालियों पर बच्चों को टट्टी बिठाना, अपने घर का पाखाना गन्दा रखना अशिष्टताएँ हैं। पुलिस की आज्ञा का उल्लंघन करना नागरिकता के नियम की अवहेलना करना है।

मनोरंजन के स्थानों में शोर—स्कूल, कालेज, सिनेमा, या खेल के मैदान हमारी सामाजिक आदतों तथा चरित्रों के प्रतिबिम्ब हैं। इनमें हम अनुशासन और शिष्टाचार की अनेक भद्दी भूलें करते हैं। सबसे पहली बात शोर मचाना है। न जाने लोगों के पास कितनी बातें और विषय व्यर्थ की टीका-टिप्पणी करने के लिए आ जाते हैं। विद्यार्थी समुदाय कक्षाओं तक में इतना शोर करता है कि कुछ कहना कठिन हो जाता है। सिनेमा हाल की गन्दी गालियाँ, गन्दे गाने, अशिष्ट आचरण तो सर्वत्र आलोचना का विषय बन गये हैं।

पंक्तियों में खड़े न होना :- स्टेशनों पर टिकट घर की खिड़कियों पर जो धक्का मुक्की चलती है, उसे कौन नहीं जानता। सिनेमा घरों में लोगों के चोटें तक आती हैं, पर कोई पंक्ति में खड़ा नहीं होना चाहता यह नागरिकता का अभिशाप है।

स्त्रियों का मान अपमान :-सम्पूर्ण पाश्चात्य संसार में नारी जाति श्रद्धा और आदर की वस्तु समझी जाती है। प्रायः उन्हें उचित स्थान देने के लिए बस या रेल के डिब्बे में बैठे हुए व्यक्ति को उठकर अपनी सीट उन्हें दे देनी पड़ती है। इसे गर्व का विषय माना जाता है। हमारे यहाँ यह परवाह नहीं की जाती कि कौन स्त्री कितनी देर से कहाँ खड़ी है? क्या चाहती है? उसे किस वस्तु की आवश्यकता है? या लज्जावश वह क्या नहीं कह पाती है। न जाने कब हम यह प्रतिष्ठा सीखेंगे?

दूसरों की सीट पर अधिकार :- बस, या रेल के डिब्बे से आप पानी पीने या किसी जरूरी वस्तु को लेने के लिए उतरते हैं, जब वापस आते हैं; तो क्या देखते हैं कि कोई दूसरा व्यक्ति उस स्थान पर जमा बैठा है। इसे अपने कृत्य पर जरा भी ग्लानि विक्षोभ नहीं है। आप उससे अपने स्थान के विषय में इंगित करते हैं, वह कुछ नहीं सुनता, यह है हमारे राष्ट्रीय चरित्र की नीचाई, असत्यता, चोरी, हठधर्मी।

गुप्त अंगों को खुले रखना :- सभ्य समाज मैं बैठकर जाँघें खोलना, गले के बटन खोल कर नंगा गला दिखाना, या छाती उघाड़े रखना, गुप्त अंगों का स्पर्श करते रहना भारी असभ्यता है इसी प्रकार नेत्रों का संचालन, विभिन्न अभिनयों की भूषा, अनुकरण हमारी असभ्यता की छाया है।

गालियाँ हमारा कलंक :- बात बात में अनेक भारतीय तकियाकलाम के रूप में अशिष्ट शब्दों, अश्लील अंगों, गालियों का प्रयोग करते रहते हैं। अनेक गन्दे शब्द तो समाज में निरन्तर व्यवहार में आ रहे हैं जब कि जनता उनका अभिप्राय नहीं समझती। आवश्यकता इस बात की है कि माँ बाप बच्चों को इन गालियों से बचावें। कुसंगति में रहकर प्रायः यह गन्दी आदत लगती है।

स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाने के पश्चात् हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि अपने भाई बहिनों को सुसंस्कृत और सभ्य बनावें, जिससे हमारी नागरिकता का स्तर उच्च हो सके। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण का ध्यान रखे, तो आने वाली पीढ़ी सुसंस्कृत हो सकती है।


दूसरों के कामों में हस्तक्षेप

अपनी महत्ता में अखण्ड विश्वास

कोई व्यक्ति अपने रहन सहन, चीजों के इधर उधर रखने, सोने-जागने या भोजन करने के तरीकों, बोलचाल वस्तुओं के चुनाव में जिस प्रकार से कार्य करता है, वे उसकी भावना से प्रायः परिचालित होते हैं। यदि आप अपने तर्क द्वारा उन बातों या असभ्यता या उत्तम मार्ग, अच्छी आदतों या दिनचर्या के विषय हस्तक्षेप करें, तो आपकी सर्वथा तर्कपूर्ण और पूर्णतः न्याय संगत बात भी दूसरे को बुरी मालूम होगी। कारण, कोई व्यक्ति यह पसन्द नहीं करता कि आप उसकी योजनाओं, रहन सहन के तरीकों या आदतों में हस्तक्षेप करें।

मान लीजिये, आप दूसरे के परिवार में मेहमान की हैसियत से जाते हैं। उसका कमरा, चीजों का इधर उधर रखना, कमरों में होने वाला कार्य, सामान, या उपयोग आपको पसन्द नहीं है। आप उसमें कुछ सुधार कराने के इच्छुक हैं। आप चाहते हैं, अमुक कमरे को स्टोर बनाइये, अमुक में बैठक रखिये, अमुक स्थान पर गाय-भैंस इत्यादि पशु बाँधा कीजिये, अमुक स्थान पर रसोई रखिये, या कुटी-सानी किया कीजिये—इन तर्कपूर्ण सलाहों के सम्बन्ध में स्मरण रखिये कि ये दूसरे व्यक्ति को मान्य नहीं हैं। आपको चाहे कितनी ही भली ये बातें प्रतीत होती हों, किन्तु दूसरा व्यक्ति कोई भी सलाह या योजना न मानेगा।

प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि सर्वश्रेष्ठ मानता है :- मनोविज्ञान का यह विषय है कि बिना चाही हुई राय, आचरण योग्य बातें, शिक्षा, सम्मति, योजनाएँ या आलोचनाएं दूसरा कोई भी पसन्द नहीं करता, चाहे वह कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो। दूसरे की योजना या राय स्वीकार करने में हमारे “अहं” को चोट लगती है और हम अपनी हेठी समझते हैं। अपने पराजय का भाव किसी को पसंद नहीं आता।

अनेक बार इसी बात को लेकर छोटे मोटे झगड़े उठ खड़े होते हैं। पिता पुत्र को कुछ बात, आचरण योग्य सिद्धान्त, अनुभव से निकली हुई बात समझाता है, नया खून उसे आचरण में नहीं लाता, पिता बुरा मानता है, पुत्र घर छोड़ कर पृथक हो जाता है।

अफसर क्लर्क को कुछ सुझाव देता है। लेकिन क्लर्क अपनी पुरानी आदतों को छोड़ नहीं पाता। संघर्ष होता है, और क्लर्क नौकरी छोड़ कर पृथक हो जाता है।

अध्यापक या प्रोफेसर विद्यार्थी को कुछ सुमति देता है; अध्यापक, मनन, शब्दों को याद करो, कुछ लिखने सीखने के विषय में कहता है किन्तु विद्यार्थी उसकी नहीं सुनता। फल, अशिष्टता या स्कूल कालेज छोड़ देना होता है।

सास या पति-पत्नी के आचरण में कुछ खराबियाँ निकालते हैं। “वह काम नहीं करती है, ठीक समय पर उठती नहीं है, आज्ञा पालन नहीं करती है, इसे भोजन बनाना नहीं आता है। यह अपने पीहर की बाबत ही सोचा करती है।” आदि आलोचनाएँ पत्नी को अप्रिय लगती हैं। ये निषेधात्मक संकेत हैं। इन्हें देने वाला पति और सास कभी नई बहू को नहीं सुधार सकते।

अपना अनुभव ही स्थायी रहता है :- जो जैसे रहता है, वैसे ही रहने में उसे अधिक से अधिक सुख और आत्म संतोष होता है। मनुष्य दूसरों के अनुभवों से लाभ नहीं उठाता। उसे दूसरे की विचारधारा अपनाने में आन्तरिक सन्तोष नहीं होता। अपने अनुभव का ज्ञान ही स्थायी लाभ करता है।

इसी प्रकार जो चीजें किसी को स्वयं बिना श्रम के मुफ्त में प्राप्त हो जाती हैं, उनके प्रति पाने वाले कभी सतर्क नहीं होते, न मूल्य ही समझते हैं। दूसरे की दी हुई चीजों में मनुष्य का “अहं”नहीं प्रविष्ट होता। “अहं” का लगाव न होने के कारण वे वस्तुएँ उसके व्यक्तित्व का एक अंश नहीं बन पाती।

पिता या ससुराल से पाई हुई बिना श्रम की वस्तुएँ कभी पुत्र या दामाद के पास नहीं टिकतीं, न उसका आदर प्राप्त करती हैं। धीरे-धीरे वे उसके बिना काम में आये हुए निकल जाती हैं, या विनष्ट हो जाती हैं। इसके विपरीत उसी पुत्र या दामाद की स्वयं बनाई या खरीदी हुई साधारण से साधारण वस्तु भी उसी का आदर प्राप्त करती है, अधिक दिन टिकती है, वह उस पर गर्व करता है। एक पुस्तक या मासिक पत्र के प्रति एक व्यक्ति जितना सतर्क और जागरुक है, दूसरे के लिए वह कागज का एक ढेर मात्र है।

एक विद्वान एक ग्राम में गये तो अनेक व्यक्ति उनके चारों ओर एकत्रित हो गये। विद्वान को अपनी विद्वता का गर्व था लेकिन वहाँ उससे जो प्रश्न पूछे गये, वे ये थे—

“आपकी क्या आमदनी है? आपने कितना रुपया जोड़ रखा है? आपकी पत्नी के पास तो बहुत से गहने होंगे? आपके पास कितने मकान हैं?”

किसी ने उसकी विद्वत्ता की परवाह न की, दूसरी ओर विद्वान् ने पूछा—

‘आप सज्जनों में कौन कौन राजनीति, अर्थशास्त्र या अध्यात्म को समझता है? आपकी समाज की रूढ़ियों के विषय में क्या क्या धारणाएँ हैं? राजनैतिक पुनः निर्माण की बाबत आपकी क्या क्या योजनाएँ हैं?’

ये प्रश्न ग्रामीणों तथा अशिक्षितों के लिए कुछ अर्थ नहीं रखते थे। दोनों की दृष्टियों में एक दूसरा मूर्ख था।

केवल सुझाव दीजिये :- यही बात संसार की अन्य रुचियों तथा मान्यताओं के विषय में हैं। अच्छा से अच्छा ज्ञान लोगों को अप्रियकर प्रतीत होगा। उत्तमोत्तम धाराएँ फेंक दी जायेंगी। यदि दूसरों के कमरों की वस्तुओं को आप अपनी रुचि के अनुसार जमावेंगे, तो वे नापसन्द की जायेंगी। यदि उग्रता पूर्वक आप अपने विचार दूसरों के ऊपर थोपेंगे, सख्ती करेंगे, तो दूसरा आपके हस्तक्षेप को अनुचित समझेगा, बुरा मानेगा और आप सदा के लिए उसकी मित्रता या स्नेह को खो बैठेंगे।

दूसरों के रहन सहन में हस्तक्षेप न करें। उनके विचारों को यकायक नहीं परिवर्तित किया जा सकता। दूसरों का सुधार करने का प्रयत्न अनेक बार कटुता और कलह का कारण बनता है।

घरों तथा परिवारों में जो जैसे रहता, उठता, बैठता, सोता, जागता है, उसको वैसे ही रहने देने में वह सबसे अधिक सुख-शान्ति का अनुभव करता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि तथा योग्यता को सर्वोपरि समझता है। अपनी अक्ल के सामने वह किसी दूसरे की बात या सुझाव नहीं मानना चाहता।

गुप्त मन में संस्कारों का निर्माण एक प्रकार के मानसिक मार्ग उत्पन्न करता है। जैसे गाड़ी के चलने से लकीरें बनती हैं, वैसे ही ये मानसिक लकीरें बना करती हैं। जिस धीमी गति से इनका निर्माण होता है, उसी धीमी रफ्तार से इन्हें हटा कर नये संस्कारों को जमाया जा सकता है।


मेहमान की अनुदारता :- एक कटु सत्य

मान लीजिए, आपके यहाँ कोई मेहमान आता है, और आपकी प्रेरणा से या स्वयं अनाधिकार चेष्टा से वह आपके यहाँ ठहरता है, अथवा कोई निकट सम्बन्धी स्थायी रूप से आपके यहाँ टिकता है, या किसी मित्र, सम्बन्धी के बच्चे को पढ़ाने, या नौकरी कराने के लिये आप कुछ समय के लिए अपने यहाँ रख लेते हैं। इस परिस्थिति में दूसरे का व्यक्ति, या मेहमान आपके विषय में क्या सोचता है।

नये वातावरण में फिट न होना :- मेहमान आपके घर तथा व्यवस्था को अपनी रुचि एवं आदतों के मापदंड, स्वभाव, मानसिक स्तर, तथा पारिवारिक स्टेंडर्ड से देखता है। उसका दृष्टिकोण स्वयं उसके घरेलू वातावरण तथा आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक स्थितियों से विनिर्मित होता है।

उसे अपने घर में रख कर आप उस पर अपनी विचारधारा या नियंत्रण में रह जाय; किन्तु उस नियंत्रण के हटते ही, आपके विरुद्ध अनेक शिकायतें उसके मानसिक क्षितिज पर उदित होंगी।

आप अपनी ओर से मेहमान तथा दूसरों के बच्चों को अधिक से अधिक प्रेम, सहानुभूति, सेवा, सहयोग देते हैं, पर यदि उसका “अहं” संतुष्ट नहीं है, तो उस पर किये गये अनेक अहसान व्यर्थ होंगे।

अहं—मानव की एक कमजोरी :- जो माता पिता, अक्सर अपने बच्चों या मातहतों पर अधिक नियंत्रण रखते हैं, वे उनके “अहं” स्वाभिमान को कुचलते हैं। मानव मात्र का यह स्वभाव है कि वह आजादी चाहता है; स्वतंत्रता उसे सबसे प्रिय है। किसी से दबने में उसकी आजादी में फर्क आता है। वह जब उन्मुक्त वायु में विचरण करना चाहता है, जब उसकी इच्छाएँ तथा मधुर कल्पनाएँ व्योम में विहार करती हैं, तब आप अपने कठोर अनुशासन, शुष्क प्रतिबन्ध, अथवा दमन द्वारा उसकी आजादी को कुचल डालते हैं। उसकी आकाँक्षायें अपूर्ण रह जाती हैं। आपके अनुशासन में निरन्तर उसका दमन होता है। यह दमन उसके अंतर्मन में अनेक गुप्त ग्रन्थियाँ निर्मित करता है। वह कुछ दिन आपकी प्रतिष्ठा की वजह से कुछ नहीं कहता किंतु अवसर पा कर उसकी स्वातन्त्र्य भावना विद्रोह कर बैठती है। इस विस्फोट से अनेक पुराने सम्बन्ध चूर-चूर हो जाते हैं।

दूसरे के बच्चों को पढ़ाने के लिये आप लाते हैं, बड़ी-2 आशायें बाँधते हैं। आप समझते हैं कि आपके संपर्क में रहकर बच्चा पढ़ लिख जायेगा किन्तु आपकी कल्पनाएं निर्बल साबित होती हैं। क्यों?

क्योंकि बच्चा अपने पुराने घर के वातावरण में आजाद था। माता पिता के प्यार ने उसे कोमल, काम से भागने वाला, आनन्दी स्वभाव, मस्त, “खाओ, पिओ, मौज उड़ाओ” वाली उक्ति को चरितार्थ करने वाला बना दिया था। अपने घर में कोई उसकी देखभाल न करता था; पढ़ने लिखने के सम्बन्ध में कोई सतर्क न था, उसकी “आवारागर्दी” को प्रेम की मिठास से दबा दिया जाता था। आपके घर में पदार्पण करने पर उसे ज्ञान होता है कि यहाँ वातावरण सर्वथा भिन्न है। यहाँ उसकी आजादी में फर्क पड़ता है, वह न बाहर इच्छानुसार घूम फिर सकता है, न मित्रों में हँसी ठट्ठा कर सकता है, सिनेमा, सैर सपाटा, रामलीला आदि के लिए भी उसे आपका मुहताज बनना पड़ता है। उसका पृथक कोई अस्तित्व नहीं है। यह परावलंबन की भावना ही उसके लिए अप्रिय है।

गुणों का प्रोत्साहन समस्या का एक मात्र हल :-

पुरानी परिस्थितियों में ढालना, पुरानी आदतें छोड़कर नई परिस्थितियों के अनुसार व्यक्तित्व को चलाना उसके लिए आसानी से संभव नहीं होता। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह उसके बने बनाये व्यक्तित्व के लिए आसानी से संभव नहीं होता। अतः आप दूसरों को मेहमान की तरह कितनी ही अच्छी तरह रखिये, उनके बच्चों को सबसे निष्कपट प्रेम दीजिए, किन्तु वे कभी संतुष्ट नहीं होते। उनके “अहं” की तुष्टि न होने से वे नये घर तथा वहाँ के रहने वालों से प्रेम नहीं कर पाते। किसी व्यक्ति को पूर्ण तृप्त करने का साधन उसके “अहं” भाव को संतुष्ट करना है। किसी मेहमान को इस तरह सम्हालना कि उसकी अहं भावना संतुष्ट रह सके, उसे प्रसन्न करने का सबसे प्रधान साधन है। मेहमानों के गुणों की प्रशंसा तथा प्रोत्साहित कर हम मेहमानों को प्रसन्न रख सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना चाहिए। समाज में पारस्परिक सम्बन्धों में मधुरता लाने के लिये इस दृष्टिकोण की विशेष आवश्यकता है। उत्तम यही है कि दूसरों को अधिक काल के लिये अपने घर का मेहमान न बनाया जाय। दूसरों के बच्चों को नौकरी या पढ़ने लिखने के लिए अपने घर में न ठहराया जाय। इससे वह स्नेह भी नष्ट हो जाता है, जो दूर रहने के कारण पनपता है। दूरी प्रेम को बढ़ाने वाली है, अधिक दिन तक पास रहना घृणा की उत्पत्ति करता है। घर जमाई उस प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाता जो दूर रहने और वर्ष में एक दो बार आने वाला जमाई प्राप्त करता है।

दूरी में आकर्षण है। दूर से अपने व्यक्तित्व को दिखाने वाले व्यक्ति समाज के लिए आकर्षण का केन्द्र बने रहते हैं।


अपने मातहतों से ऐसा व्यवहार कीजिए कि......

मातहतों के भिन्न भिन्न प्रकार :-

आप अफसर हैं, तथा आपके नीचे 25 मातहत काम करते हैं। इन मातहतों के भिन्न-2 स्वभाव, रुचियाँ, आदतें तथा मानसिक सुझाव हैं। कोई उग्र और क्रोधी है। आपके तनिक से दबाव या डाट या फटकार से सामना करने को प्रस्तुत हो जाता है। आप जितना ही उस पर दबाव डालते हैं, उतना ही उससे आपका सम्बन्ध कटु होता जाता है।

कोई मातहत दब्बू है। आपकी डाट फटकार से वह पूँछ दबा लेता हैं, किन्तु उसके गुप्त मन में आपके दुर्व्यवहार पर वह ईर्ष्या तथा घृणा से सुलगता और वह प्रतिशोध लेने की फिक्र में हैं। आप उलझन में हैं कि क्या करें?

कोई मातहत खुशामदी है। आपके सामने मीठी मीठी प्रशंसात्मक बातें करते हैं, लेकिन ज्यों−ही आपने कमर फेरी, आपकी हजार त्रुटियों और कमजोरियों की चर्चा करना आरम्भ कर दिया। अपनी प्रशंसा सुन कर आप मिथ्या गर्व से फूल उठते हैं। ताड़ना भी नहीं कर पाते।

कुछ मातहत बदतमीज, असभ्य, असंस्कृत होते हैं, जिन्हें अफसर से कैसा व्यवहार करना चाहिये, यह भी नहीं आता। ये व्यक्ति आपसे क्रोध पर बदतमीज़ी करते हैं। आप लाख प्रयत्न करते हैं कि उसे बदतमीज़ी का अवसर न आने दें किन्तु किसी न किसी तरह से ऐसा कटु अवसर आ ही जाता है। आप अपने स्कूल, कालेज या दफ्तर से उसे निकाल भी नहीं सकते और काम भी लेना चाहते हैं। तो क्या करें? कठिन समस्या है।

कुछ मातहत कूटनीति जानने वाले, चुपचाप षड़यन्त्र करने वाले, ऊपर से सीधे सादे, भोले मीठे लेकिन अन्दर ही अन्दर विरुद्ध षड़यन्त्र कर आपकी प्रतिष्ठा तथा मान को मिट्टी में मिलाने वाले होते हैं। ये आपके आफिस के लिए खतरनाक हैं।

कुछ मातहत शेखचिल्ली टाइप के होते हैं, जो बढ़-बढ़ कर अनेक प्रकार की सच्ची झूठी बातें बनाते हैं। हवाई किले बनाने में सानी नहीं रखते। ये व्यक्ति आपके सामने बातचीत खूब करेंगे, लेकिन आपके दफ्तर का काम अपेक्षाकृत कम करेंगे।

इन्हीं भिन्न भिन्न प्रकारों में कुछ व्यक्ति सच्चे निस्पृह भी मिलेंगे, जो वास्तव में आपके मित्र, हितैषी हैं। सच्चे दिल से आपका भला चाहते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः पीछे रह कर चुपचाप काम करने वाले, कम दिखावा पसन्द, सरल, बिना शान शौकत वाले होते हैं। आपसे कम मिलेंगे, लेकिन जो कुछ कहेंगे, करेंगे या सुझाव देंगे वे हृदय के गहन तल से प्रादुर्भूत होंगे और आपका सच्चा हित करेंगे।

कौशल : एक मात्र हल :-

इन सब परिस्थितियों में आपको एक गुण की आवश्यकता है। वह है कौशल या चातुर्य। अंग्रेजी में इसे ‘टैक्ट’ कहते हैं। भिन्न-2 प्रकार के व्यक्तियों से भिन्न-2 परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार करना और उनकी योग्यता के अनुसार अधिक से अधिक कार्य निकालने की कला को कौशल या टैक्ट कहते हैं

ये भिन्न-2 प्रकार के व्यक्ति भिन्न-2 कठपुतलियाँ जो भिन्न तारों से जुड़ी हुई हैं, और उनसे काम लेने के लिए भिन्न-2 तार हिलाने पड़ते हैं।

यह कार्य निकालने का कौशल दो प्रकार को होता है। (1) जन्मजात (2) विस्तृत अनुभव और मनोवैज्ञानिक अध्ययन का परिणाम। कुछ व्यक्तियों में मूल रूप से यह प्रस्तुत रहता है। वे अपन अनुभव से इसे और विकसित कर लेते हैं, लेकिन जिनमें यह प्रतिभा नहीं होती वे हर व्यवहार में गलती करते हैं।

फिर भी, साधारण व्यक्ति चातुर्य एवं अंतःदृष्टि विकसित करता रहे और जनता की भिन्न प्रवृत्तियों का सूक्ष्म अध्ययन करता रहे, तो उसे इन व्यक्तियों की स्वभावगत रुचियों तथा कमजोरियों का ज्ञान हो जायेगा।

प्रत्येक माता-पिता, अफसर, सार्वजनिक कार्यकर्त्ता तथा अध्यापक को इस कला का अध्ययन करना चाहिए। इस दृष्टि से निम्न आवश्यक तत्वों पर ध्यान विशेष रूप से रखना चाहिए—

दूरी का आकर्षण :- अपने मातहतों, विद्यार्थियों, यहाँ तक कि बाल-बच्चों तक से कुछ दूरी अवश्य रखिये अर्थात् अधिक मत खुल जाइये। अफसर और मातहत, शिक्षक और विद्यार्थी, माता-पिता और बच्चों, सार्वजनिक और जनता के मध्य में एक फासला अर्थात् कुछ दूरी अवश्य रखनी चाहिये। दूर से प्रत्येक वस्तु हमें स्वभावतः बड़ी सुन्दर प्रतीत होती है। सिनेमा में तस्वीर दूर से सबसे आकर्षक प्रतीत होती है। समीप आने से हमें उसका खुरदरापन, कुरूपता, छोटी मोटी खराबियाँ, त्रुटियाँ बड़ी होकर स्पष्ट दीखने लगती हैं। जो बातें हम दूर से कभी न देखते, या ध्यान से न परखते वे भी पास आकर किसी भी महान् व्यक्ति के प्रति हमारे हृदय में घृणा उत्पन्न कर देती हैं।

बर्नार्ड शा नामक विख्यात साहित्यकार ने मानव मनोविज्ञान के विषय में एक बड़े मार्के की बात कही है। यह लेखकों के विषय में है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिये उपयोगी है। आपने कहा कि लेखक (इसी प्रकार अफसर और अध्यापक) यदि अपनी और ख्याति चाहते हैं, तो उन्हें यथा समाज (मातहत, विद्यार्थियों, नौकरों) के सम्मुख आने से बचना चाहिये; अकसर लेखकों की बुद्धि उनकी देह से अधिक प्रतिभावान होती है, और उनके विषय में, उनकी रचनाएँ पढ़ कर जनता जो कल्पना करती है, वह लेखक (तथा अफसर, अध्यापक, नेता, प्रचारक, सुधारक, प्रोफेसर, अभिनेता, अभिनेत्री, बड़े-2 व्यक्तियों) को समीप से देखने पर नष्ट हो जाती है। यह सौभाग्य कम व्यक्ति को होता है कि उनके विचार जितने गम्भीर, मौलिक तथा ऊंचे हों, तथा वे दूर से जितने अच्छे और आकर्षक जँचते हों, उनकी देह भी उतनी ही सुगठित और तेजवान हो।

प्रत्येक की रुचि के अनुसार व्यवहार :- प्रत्येक व्यक्ति की रुचि का अध्ययन कर तदनुकूल व्यवहार करना चाहिए। सबको एक ही लाठी से हाँकना मूर्खता है। ऐसे अवसरों को कुशलता से दूर हटाइये जिनमें व्यर्थ ही मातहत, पुत्र-पुत्री,या विद्यार्थी आदि को आपका सामना करने का अवसर प्राप्त हो।

सुझाव संकेतों द्वारा ही दिया कीजिये। जो बात स्पष्ट करने में कटु और अप्रिय होती है, वही घुमा फिरा कर संकेत मात्र करने में सहन कर ली जाती है और मान भी ली जाती है।

लोगों के ‘अहं’ को कुचलने न दीजिये वरन् थोड़ी सी प्रशंसा की मिठाई देकर उसे ऊँचा रखिये। प्रारम्भ में प्रशंसा कर अपनी ओर दूसरे की भावना को उत्तेजित कर आप चाहें, तो दो चार खरी खोटी भी सुना सकते हैं। दूसरे की अच्छी भावनाओं को अपने पक्ष में उत्तेजित रखिये।

ऐसे अवसर निकालिये, जिनमें आप अपने मातहतों को आभारी तथा कृतज्ञ बना सकें। कोई प्रशंसात्मक बात का दूसरे के प्रति सहानुभूति की उक्ति आपके मातहत को आत्मीयता से भर देगी।


सर्वोत्तम वशीकरण

मीठे वचन बोलिये :- मधुर भाषण सर्वोत्तम वशीकरण मन्त्र है। जो व्यक्ति मधुर वाणी के कौशल को जानता है, वह ममता के हृदय पर राज्य करता है। शत्रु भी उसके मित्र बन जाते हैं, तमाम प्रतिरोध नष्ट हो जाते हैं और पराये भी अपने बन जाते हैं। कहा भी है—

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय।

मीठे वचन सुनाय के, मन बस में कर लेय॥

मीठे वचन बोलिये। कटु वचन ईर्ष्या से युक्त वाली, क्रोध से तपे हुये शब्द संसार के समस्त झगड़ों के जड़ मूल हैं।

महाभारत में कहा गया है—“गाली देने वाले को बदले में गाली न दे, बुरा करने वाले का भी बुरा न करे, क्रोध के बदले क्षमा करे, अन्याय पूर्ण नीच साधनों द्वारा किसी से कार्य न ले।”

‘दूसरों पर जलने वाला दुराग्रही व्यक्ति स्वयं अपने हृदय की जलन से दग्ध होता रहता है। किसी का हृदय दुखे ऐसी कठोर वाणी मुँह से न कहो। अपने कठोर वचन बाणों से जो दूसरे का हृदय बेधता है, वह सर्वथा भाग्यहीन हो जाता है, उसके मुख-मण्डल पर अलक्ष्मी, मनहूसियत के चिन्ह प्रकट होने लगते हैं।’

‘सत्पुरुष दुष्टों के द्वारा की हुई निन्दा और गर्व भरी कटूक्तियों को सह लेते हैं तथा सन्तों द्वारा निर्दिष्ट शान्तिमय मार्ग पर चलते हैं।’

‘दुष्ट पुरुषों के मुँह से निरन्तर कटु वचन रूपी तीक्ष्ण बाण निकल निकल दूसरों को अन्तर्वेदना प्रदान करते हैं। वे चोट लाये हुए मानव रोते और कलपते रहते हैं।’

अतएव उत्तम पुरुष को चाहिए कि वे भूलकर भी दूसरों को कष्ट, वेदना या अन्तर्वेदना पहुँचाने वाले कटु शब्दों का व्यवहार न करे। तीनों लोकों के समस्त जीवों के साथ दया, मैत्री, दान तथा मिष्ठ भाषण का व्यवहार करना चाहिये। यही सर्वोत्तम वशीकरण है”

मैत्री भाव का चमत्कार :— उपरोक्त प्रवचन में बड़ा मार्मिक सा संकेत है। यदि हम सबसे अधिक मैत्री भाव का व्यवहार करें, अपने तथा दूसरों के प्रति अकल्याण की बात त्याग दें, अन्तः करण में प्रबल संवेगों का काम, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ इत्यादि के अनुचित भावों को एकत्र न होने दें, तो ये दूषित मनोविकार हमारे दैनिक व्यवहार में प्रकट न हों और हमारा सुसम्बन्ध बना रहे। अकल्याण के भाव हमारे अचेतन मन में ग्रंथियों का रूप ग्रहण कर लेते हैं। फलतः हमारा व्यवहार संशयापन्न, ईर्ष्यालु या क्रोधी होता है।

हमारे प्रत्येक कटु, निर्मम, दुष्ट या पाप कर्म के पीछे कोई दलित भावना होती है। यह भावना ग्रन्थि हमारे अनेक दुष्कर्मों, गालियों, बातचीत, शब्द चयन इशारों, अकारण भय, मारपीट में प्रकाशित होती है। प्रोफेसर लालजीराम शुक्ल ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि—‘जो व्यक्ति दूसरे के अकल्याण की बात सोचता है, वह पीछे अपना ही अकल्याण सोचता है। दूसरे के अकल्याण का विचार जिस समय अदृश्य मन में जाता है वह भावना ग्रन्थि बन जाता है; और इसी कारण अपने आप के प्रति अनेक कुविचार आने लगते हैं। आत्मघात की इच्छा उसी मनुष्य के मन में उठती है, जिसके मन में दूसरे को विनाश करने की इच्छा आई हो। दूसरे को मारने की प्रवृत्ति तथा आत्महत्या की प्रवृत्तिं के मूल में एक ही लक्ष्य है। जो मनुष्य दूसरे को मारने में असमर्थ रहता है, उसके मन में आत्म हनन के विचार स्वयं ही उदय होने लगते हैं।

अतः दूसरे की कल्याण की ही भावना मन में रखकर बोलिये, व्यवहार कीजिए या संपर्क बढ़ाइये। अपना कल्याण दूसरों के कल्याण में ही निहित है। कलुषित मन न बनाइये अन्यथा नर्क में पड़े रहेंगे। मन एक बार कलुषित विचारों से भरने पर नर्क हो जाता है। दूसरों से व्यवहार का एक गुरु मन्त्र इस प्रकार है :—

जो तोकूँ काँटा बुवे, ताहि बोइ तू फूल।

तो को फूल के फूल हैं, वाको हैं तिरसूल॥

दूसरों के हित की बातें सोचिये, मैत्री भाव बढ़ाइये :—

भव्यजनों की हृदय भूमि में, बढ़ता है शुभ मैत्रीभाव।

विश्व प्राणियों पर होता है, जिससे अनुपम प्रेम प्रभाव॥

मैत्री का क्रम :—

भगिनि, बन्धु, पुत्र, पत्नी; गृहजन संबंधीजन प्रियतम्। सहधर्मी निज जातिजनों पर, बढ़ता मैत्री भाव प्रथम॥ ग्राम निवासी और देशवासी समस्त जीवों के ऊपर।

बढ़ा पूर्ण मैत्री प्रभाव को, रखना मित्र! भाव सुखकर। पशु पक्षी कीड़ी वृक्षादिक सभी प्राणियों पर हितधार। दया भाव रख नित्य बढ़ाना अतिशय मैत्रीभाव उदार॥ जग में कोई जीवन जो पत्नी पितु पुत्र न हुए कभी। मैत्री भाव योग्य बाँधव सम हैं इस जग में जीव सभी॥

मैत्री भाव का कारण :-

आत्मशुद्धि होने से बढ़ता जग में मैत्री भाव प्रभाव। पूर्ण सिद्धि होने पर होता तीन लोक पर मैत्री भाव॥

दोष कहे अपमान करे या तन पर कोई करे प्रहार।

पूर्व कर्म का कोप जान कर रखना मैत्रीभाव अपार॥

बैर भाव रख क्लेश बढ़ाना रखना द्वेष कपट अभिमान। अति दुःखकर यह पशु प्रवृत्ति है रखते कभी न ज्ञान निधाम।

द्वेष रोष तज सम रस सर में कर विहार क्षमता ले भर। शत्रु न समझ किसी को जग में रख मैत्री सब जीवों पर॥

किसके द्वारा किसको जीते?

संकल्पों के त्याग से काम पर और काम के त्याग से क्रोध परः जिसे लोग अर्थ कहते हैं :—उसे अनर्थ समझ कर लोभ पर, और तत्व के विचार से भय पर विजय प्राप्त करें।

आध्यात्म विद्या से शोक एवं मोह पर, महापुरुषों की उपासना से दम्भ पर, मौन के द्वारा योग के विघ्नों पर और शरीर प्राण आदि को चेष्टारहित करके हिंसा पर विजय प्राप्त करें॥

दया के द्वारा आधिभौतिक दुःख पर, समाधि के द्वारा आधि दैविक दुःख पर, योग शक्ति के द्वारा आध्यात्मिक दुःख पर एवं सात्विक आहार, स्थान; संग आदि के द्वारा निन्दा पर विजय प्राप्त करें।

सत्वगुण के द्वारा रजोगुण और तमोगुण पर, उपरति द्वारा सत्वगुण पर विजय प्राप्त करें। श्री गुरु भक्ति के द्वारा पुरुष इन सब दोषों पर सहज ही विजय प्राप्त कर सकता है। (महाभारत 7। 15। 22-25)

मतभेद के समय क्या करें? समाज में आपको अनेक प्रकार के व्यक्तियों से संसर्ग पड़ता है। कहीं उसका मतभेद होता है, कहीं भावों में संघर्ष होता है; कहीं उसे शंका होती है, कहीं उसे उदासी, आक्षेप, प्रतिरोध या प्रतिकूलता जैसे अन्यान्य भावों का सामना करना पड़ता है।

ऐसे अवसरों पर आपको ठण्डे दिल से भावना शान्त कर पूर्ण रूप संयम से शिष्ट व्यवहार करना अपेक्षित है। सभ्य पुरुष की आँखें उपस्थित समाज में चारों ओर होती हैं। उसे संकोचशील व्यक्तियों के साथ विनम्र होना चाहिये; मूर्खों का उपहास न करना चाहिये। शिष्ट व्यक्ति से बात करते समय उससे पूर्व सम्बन्धों की स्मृति रखता है ताकि दूसरा व्यक्ति यह न समझे कि वह उसे विस्मृत किए हुए है और ऐसे वाद-विवाद वाले प्रसंगों से मुक्त रहे, जो दूसरों के चित्त में खीज, प्रतिशोध, कटुता, व्यंग दुरभिसन्धि, दुष्टता आदि की कुत्सित भावनाएँ उत्पन्न न करें।

शिष्ट व्यक्ति जानबूझ कर संभाषण में अपने आपको प्रमुख आकृति नहीं बनाना चाहता और न वार्त्तालाप में अपनी थकावट व्यक्त करता है। उसके भाषण और वाणी में मिठास होता है। वह अपनी प्रशंसा को अत्यन्त संकोच के साथ ग्रहण करता है। जब तक कोई बाध्य न करे अपने विषय में मुँह नहीं खोलता तथा किसी आक्षेप का भी अनावश्यक उत्तर नहीं देता है। अपनी निन्दा पर वह कान नहीं देता; न व्यर्थ किसी का हमला मोल लेता है। दूसरों की नीयत पर आक्रमण करने का दुष्कृत्य वह कभी नहीं करता प्रत्युत यथा संभव जहाँ तक बनता है, दूसरों के भावों का अच्छा अर्थ बैठाने का प्रयत्न करता है। यदि झगड़े का कारण उपस्थित हो जावे, तो वह अपने मन की नीचता कभी नहीं प्रदर्शित करता।

शिष्ट पुरुष ऐसी बात मुँह से उच्चारण नहीं करता जिसे प्रमाणित करने की सामग्री उसके पास सुरक्षित न हो। वह बात में अपने अपमान की कल्पना नहीं करता; अपने प्रति की गई बुराइयों को स्मरण नहीं रखता तथा किसी के दुर्भाव का बदला चुकाने का भाव मन में छुपाकर नहीं रखता। संक्षेप में शिष्ट व्यक्ति दूसरों के भावों, विचारों एवं आदेशों के प्रति अधिक से अधिक उदार और उचित व्यवहार करता है। ‘पड़ौसी से प्रेम करो’ इस स्वर्ण सूत्र से उसका प्रत्येक कार्य परिचालित होता है।

ईर्ष्या और घृणा से दूर रह कर मुक्त प्रेममय हृदय से दूसरे से व्यवहार कीजिए। जिसके लिए आपके मन में ऐसे भाव उत्पन्न हों उसकी इच्छाओं सद्गुणों चरित्रों के उज्ज्वल पक्ष पर ही दृष्टिपात कर उससे मृदु व्यवहार करें और स्वयं अपनी योग्यता बढ़ाते रहें।

आप जिस स्थिति में हैं, उसी को अच्छी मानकर मन में दूसरों से मैत्री सहानुभूति तथा गुण ग्राहकता को लेने का व्यवहार करें, यह प्रारम्भिक विचार है, जिसे आधार भूत मान कर चलें।

जो आपकी समालोचना करे, उससे मत बिगड़िये उसको अपना मित्र समझ कर उसकी कही हुई बातों पर विचार कीजिए और अपने आप में जो कमी है उसे दृढ़ प्रयत्न से उन्मूलित कीजिये।

प्रशंसा और यश के लिए अधिक उत्सुक न रहिये, क्योंकि यदि आप प्रतिभावान हैं, तो आपको बढ़ने से कोई भी आलोचना नहीं रोक सकेगी। दूसरे की आलोचना को आन्तरिक सच्ची प्रेरणा के सम्मुख कोई महत्व न दीजिए वरन् जितनी भी आलोचना हो उससे दुगुनी इच्छा शक्ति लगा कर कार्य को आगे बढ़ाते चलिए।

असफलता, निराशा, भूल और दुःखों से मन को पराजित न होने दीजिए। ये प्रतिकूलताएँ लोकव्यवहार में अति साधारण बातें हैं, जो प्रत्येक महान् व्यक्ति के जीवन में आई हैं। इनको जीत कर निरन्तर कार्य करते रह कर ही मनुष्य सफलता लाभ कर सके हैं।

सदा प्रफुल्ल चित्त रहने का प्रयत्न कीजिए। मित्रों के साथ सात्विक हास परिहास करने से आपके मन का बोझ हलका हो जायगा। वे भी आपके संग रह कर मनका भार हलका कर सकेंगे। तत्पश्चात् काम में जी भी एकाग्र हो सकेगा।

अपने परिश्रम, कर्त्तव्य, और शुभ भावनाओं पर विश्वास कीजिए तथा जो कुछ कर रहे हैं, उसको और भी अधिक शक्ति लगाकर पूर्ण कीजिए।


अप्रिय बात प्रकट करना

समाज में दूसरों से व्यवहार करते समय अनेक बार आपको अनेक कटु सत्यों का उद्घाटन करने के अवसर प्राप्त होते हैं। आप अफसर हैं, आपका मातहत काम नहीं करता है। आपको उसकी ताड़ना करनी है। आपका नौकर ठीक समय पर नहीं आता या काम से जी चुराता है। डाट फटकार करने से उसके भाग जाने का भी डर लगा है। आप दुकानदार हैं; ग्राहक उधार माँगता है उधार के कारण आपकी पूँजी व्यर्थ ही नष्ट होती जा रही है। ग्राहक से पुराने रुपयों का तकाजा या वसूल बाकी करनी है; नया उधार नहीं देना है। किस प्रकार यह अप्रिय बात प्रकट करें? आपका बड़ा पुत्र, पुत्री, पत्नि, माता या पिता कोई अनुचित बात करता है। उसे बिना नाराज किये आपको रोकना है। किस प्रकार की बातें करें कि वे अपनी आदत भी छोड़ दें, और आपके पारस्परिक सम्बन्ध भी मृदु बने रहें? आप अध्यापक या व्याख्याता हैं। आपको अपने शिष्यों की ताड़ना करनी है; श्रोताओं पर क्रोध प्रकट करना; वह भी उस ढंग से कि वे नाराज न हो जायं। आप मातहत हैं आपका अफसर आपके ऊपर अत्याचार करता है। आप अपने ऊपर होने वाले इस अत्याचार को कैसे प्रकट करें?

मनुष्य नाराज तब होता है, जब उसकी मान हानि हो; या जब वह यह समझे कि आपने उसकी “अहं” भावना पर अनुचित दबाव डाला है। “अहं” को ऊँचा रखना, आत्म-प्रतिष्ठा बनाये रखना प्रत्येक मानव का सहज स्वभाव है।

जब आप दूसरे को डाटें फटकारें, तो इस ढंग से अपने व्यवहार तथा शब्दों को व्यवहार में लाइये कि “अहं” भाव को न्यूनतम ठेस पहुँचे। एक फटकार सुनाकर फिर उसके अहं को धीरे धीरे उभार दें। अथवा पहले दूसरे व्यक्ति के शील गुण या योग्यताओं की प्रशंसा कर चतुराई से यह सुझा दे कि इस प्रकार की गलती करना उसके जैसे महान् व्यक्ति के लिए उचित नहीं है। यदि आप उसे ऊँचा उठाकर उसकी निर्बलताएँ दिखाएँगे तो दूसरा व्यक्ति बुरा न मानेगा।

यदि आपको दूसरे से कुछ काम निकालना है, तो यकायक अपना अभिप्राय न कह बैठिये, वरन् बातचीत का प्रारम्भ मित्रता से कीजिए। जब दूसरा व्यक्ति प्रसन्न मुद्रा में हो तब आप अपनी माँग पेश कर सकते हैं। दूसरे की परिस्थिति का ध्यान रखिए। किसी के सामने ऐसी माँग पेश न कर बैठिये जिसे वह पूर्ण न कर सके और अपनी आत्महीनता समझें।

बच्चों को ताड़ते समय ऐसे संकेतों का प्रयोग कीजिए जिसमें नकारात्मक या ध्वंसात्मक आलोचना न हो वरन् जिसके प्रत्येक शब्द से यह प्रतीत हो कि आप उसे बहुत ऊँचा समझते हैं। वह आपके द्वारा विज्ञापित स्तर तक उठाने के लिये जमीन आसमान एक कर डालेगा।

आप अफसर हैं; मातहत से काम निकालना है तो उसे इस प्रकार धमका दीजिए कि वह आपके संकेतों को समझ ले। उदाहरणार्थ आप कहिए, “मिस्टर शर्मा, आप तो इतना अच्छा टाइप करते हैं, आपका ड्राफ्ट इतना अच्छा होता है कि मुझे कलम लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर आज कैसे यह गलतियाँ, यह गन्दगी, यह जल्द बाजी दीखती है। नहीं, आपको अपनी उत्कृष्टता से नीचे नहीं आना चाहिए। मैं समझता हूँ आप ऐसा कर ही नहीं सकते। यह काम आपका नहीं किसी दूसरे का हो सकता है, आदि।”

उधार माँगने वाले से दुकानदार को कहना चाहिए, “बाबूजी हाथ तंग है। नकद पैसों से काम चलता है। थोड़ी पूँजी से काम चलाते हैं। आपके लिए तो यह साधारण सी बात है। नकद पैसे देंगे, तो हमारे दस काम चलेंगे। कुछ ग्राहक कर्जे के पैसे देने में बड़ा तंग करते हैं। हमारा मतलब यह है कि बड़ी मुश्किल से देते हैं। अब सब के लिए यही नियम कर दिया कि नकद लेन देन चले” आदि।

पत्नि की ताड़ना में विशेष सतर्क रहिए, क्योंकि स्त्रियाँ अधिक अधिक संवेदनशील होती हैं। उनकी संवेदन शीलता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। एक कटु बात के साथ एक मृदु बात करनी चाहिए, कटु मृदु का सम्मिलित रूप उन्हें ग्राह्य हो सकता है। उनकी ताड़ना का स्वरूप कुछ इस प्रकार का हो सकता है-

“आप के कारण घर बड़ा सुव्यवस्थित रहता है। प्रत्येक वस्तु ठीक स्थान पर, झाडू बुहारी सब लगा हुआ। बच्चे साफ सुथरे पर अगर तुम स्वयं भी सलीके से कपड़े पहने रहो, तो क्या ही उत्तम रहे। तुम घर तो साफ रखती ही हो, यदि जरा रसोई घर भी साफ रहा करे, तो बड़ा मजा आये। पूजा पाठ पड़ोसिन से बातचीत में तुम्हारा समय जाता है। वह ठीक है। इन में समय करना चाहिए पर यदि तुम घंटा भर अध्ययन पठन पाठन भी कर लिया करो, तो तुम्हारी बराबरी करने वाला दूसरा कोई न होगा।” आदि।

अप्रिय बात एक दम मत पुकार कर बैठिये, वरन् उसके लिए प्रस्तावना बाँध कर धीरे-धीरे कौतुक से प्रकट कीजिए। जितने क्रम-2 से आप अग्रसर होंगे, उतनी ही दूसरों को मानसिक वेदना कम होगी।

क्या आपके परिवार में कलह, झगड़े और नाना प्रकार के बुरा मनव्वल होते रहते हैं? क्या कभी ऐसे समय आते हैं, जब आप एक दूसरे से नहीं बोलना पसन्द नहीं करते? या जब परिवार के किसी व्यक्ति पर आपको क्रोध हो आता है? क्या आपका परिवार आपको समझ नहीं पाता है?

यह स्मरण रखिये, कि आयु में कमी या अधिकता कार्य तथा दृष्टिकोण का अन्तर अनेक बार झगड़ो तथा कलह का प्रधान केन्द्र बन जाता है। अतः परिवार के हर व्यक्ति को अपने आपको प्रसन्नतापूर्वक या अप्रसन्नता से परिवार में ढालना या फिट करना होता है। कुछ आप अपनी स्वतन्त्रता छोड़िये कुछ दूसरे त्याग की भावना से काम लें, तो परिवार में स्वर्ग की सृष्टि हो सकती है। संभव है, जब आप यह समझते हैं कि आपके परिवार वाले आपको नहीं समझते हैं, स्वयं आप ही उनके लिए एक कठिन बन गये हों? यदि ऐसा है तो आपको अपनी आदतें सुधारनी होंगी।

मनुष्य का स्वभाव ही दूसरे में दोष निकालना है। इस प्रकार प्रत्येक अपनी बड़प्पन की भावना प्रदर्शित करना चाहता है। अतः दूसरों को क्षमा करते चलिए। उनके स्वभाव तथा परिस्थितियों को परखिये, और आयु, परिस्थिति के अनुसार उनसे कार्य की आशा रखिए। अप्रिय आलोचनाओं में सबके लिए प्रशंसा का मधु भी मिश्रित किया कीजिए।


Quotation

-जब तक मनुष्य में कोई भलाई रहे तब तक उसका सहकार करना चाहिए, पर जब मनुष्य अपना मनुष्यत्व त्याग देने का हट करे, तब उसका त्याग करना मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य हो जाता है।

-निश्चय समझ रखिए कि अगर हमारा जीवन संयम मय हो जायगा तो हम जो चाहेंगे प्राप्त कर सकेंगे।

-प्राचीन काल में जीवन का आधार संयम था, पर आजकल उसका आधार आनन्द-मंगल है। इसका फल यह हुआ है कि हम लोग बल-हीन होकर, कायर हो गये हैं।

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रूठे को मनाना

मानव के मानसिक संस्थान में “अहं” वृत्ति महत्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति अपने गर्व की रक्षा के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सचेष्ट रहता है। मनुष्य का बाह्य बनाव शृंगार, रहन, सहन, व्यवहार इत्यादि इस “अहं” की तृप्ति के नाना विधान हैं। कोई व्यक्ति अच्छे वस्त्र पहिन कर दूसरों पर शान जमाता है, तो दूसरा अच्छे मकान में रहकर, पूँजी एकत्रित कर या विद्वता द्वारा अपने अन्तः करण की “अहं” वृत्ति को संतुष्ट करता है। गरीब लोग अच्छे बाल काढ़ कर, गीत गाकर, फूलों की मालाएँ पहिन कर, इत्र लगाकर, सिनेमा में जाकर अपने अपने उपायों से अहं भाव की पूर्ति करते हैं। वे अपने लिए स्वयं ऐसे अवसर उपस्थित करते हैं, जिसमें वे सबसे महत्वपूर्ण स्थान पर कार्य कर सकें , बड़े प्रतीत हों और दूसरे उनके अनुशासन में रहें।

हम कब रूठते हैं? इसका उत्तर यही है कि जब हमारे अहं को चोट लगती है, तो हम रूठ जाते हैं। अहं की चोट को हम सम्हाल नहीं पाते। किसी ने कोई तीखी बात कह दी, दूसरे से हमारी चुगली कर दी, हमें डाट दिया, या मानहानि कर दी तो हमारे अहं को चोट लगती है। “अहं” की चोट हमें आन्तरिक परिताप देती है। आन्तरिक दुःख को हम रूठ कर व्यक्त करते हैं। जिससे हम प्रेम करते हैं, उससे रूठ कर हम अप्रत्यक्ष रूप से अपने प्रेम का प्रतिदान चाहते हैं। हम समझते हैं कि दूसरा अवश्य हमें मनाने आवेगा।

रूठने का अभिप्राय है अहं की विग्दग्घता। “अहं” को यदि पुनः किसी प्रकार प्रोत्साहन प्रदान किया जा सके और आन्तरिक घाव को भर दिया जाय, तो रूठा हुआ व्यक्ति पुनः मनाया जा सकता है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि रूठने की क्रिया में मनुष्य की भावना की तीव्रता रूठने की क्रिया तथा फल को और भी उद्दीप्त करती है। जिसकी अनुभूतियाँ जितनी ही अधिक सचेत और तीव्र होंगी, वह तनिक सी चोट पाकर उतना ही दुःखी होगा, उतने ही काल तक रूठा रहेगा।

अधिक देर तक या बार बार रूठने के कारण रूठना मानसिक स्वभाव बन जाता है। एक बार अहं की मरहम पट्टी करने पर पुनः पुनः तनिक सी आलोचना से वह व्यथित होता रहता है। अतिशय भावुकता एक अभिशाप बन जाती है। अतिशय भावुकता साधारण टीका-टिप्पणी को भी सम्हाल नहीं सकती। भावुक व्यक्ति प्रायः तनिक सी बात पर रूठ जाते हैं तथा अपने मानसिक संस्थान को दृढ़ नहीं रख पाते हैं।

बच्चों का रूठना तथा मनाना साधारण है। वे साधारण सी प्रशंसा तथा प्रलोभन से अपना रूठना छोड़ देते हैं। उनका अहं सरल और निर्मल होता है। उसके विचार क्षण भर में ही दूर हो जाते हैं। उसमें प्रायः बुद्धि का योग नहीं होता। बड़े व्यक्तियों के रूठने में भावात्मक तथा बौद्धिक समन्वय चलता है। इसलिए उन्हें मनाने के लिए दो पृथक-पृथक मानसिक उपचार करने पड़ते हैं।

(1) बौद्धिक उपचार :- मनाने के लिए आपको चाहिए कि अपने समस्त बुद्धि कौशल एवं युक्तियों से पीड़ित व्यक्ति के मन में यह स्थिर कर दें कि उनका रूठना असत्य तथा अदूरदर्शिता पूर्ण है। प्रायः दो प्रेमी एक दूसरे से रूठ कर अपने प्रेम का प्रतिदान चाहते हैं। आप अपनी समस्त युक्तियों से यह साबित कीजिए कि आपका प्रेम स्थिर, अडोल और सात्विक है।

(2) भावात्मक उपचार :— आपको चाहिए कि रूठे हुए व्यक्ति की भावना को उभारें। इसमें उसके मन में अपने प्रति सहानुभूति, दया, तथा करुणा की भावनाएं उत्पन्न करना सर्वोत्कृष्ट साधन है। उसे यह अनुभव करने दीजिए कि वह आप पर अत्याचार कर रहा है। भावना की विदग्धता दूर करने के लिए आप अपने जीवन के पुराने सुखद संस्मरण, मृदुल स्मृतियाँ याद दिला सकते हैं। उसकी थोड़ी-2 प्रशंसा कीजिए। अन्य विषयों पर बातें कर उसे बोलने, हंसने, खुलने का अवसर प्रदान कीजिए। हंसने से वह रूठना छोड़ देगा।

रूठे को मनाना अभ्यास पर निर्भर है। किसी व्यक्ति को कितनी मानसिक वेदना लगी है? कितनी सहानुभूति की आवश्यकता है?—यह सब व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक अध्ययन से ही ज्ञात हो सकता है। कुछ व्यक्ति तनिक सी, भावात्मक सहानुभूति से पसीज उठते हैं, कुछ बड़े कट्टर और जिद्दी होते हैं व्यक्ति का “अहं” बड़ा जटिल होता है। वह सरलता से, जिस कारण से रूठा है, उसे भुलाना नहीं चाहता। उसके लिए पुनः पुनः बौद्धिक उपचार करने चाहिए।

बड़ा व्यक्ति भी भावात्मक विकास में एक प्रकार का शिशु ही है। उसकी भावनाएँ बच्चों की तरह सहानुभूति और प्रशंसा से पसीज उठती हैं। यदि आप उसकी दया प्राप्त कर सकें, उसे आप की दयनीय स्थिति पर करुणा हो उठे, तो उसके “अहं” को संतोष हो जायगा। वह एक बार पुनः मिथ्या गर्व से फूल उठेगा। गर्व के उभरते ही वह रूठना छोड़ कर प्रसन्न हो उठेगा।

भावना की जटिलता गहरी नहीं बैठ पाती। बुद्धि की जटिल ग्रन्थि अंतर्मन में गहराई तक प्रविष्ट हो जाती है। उसका मानसिक इलाज आसानी से नहीं हो पाता। भावना के ऊपरी केन्द्रों में सहानुभूति का संचार सरलता से हो सकता है।

रूठे के हृदय में यह बात बिठाने का प्रयत्न कीजिए कि बिना उसके आपकी कैसी दुर्दशा हो जायगी; आपका घर बिगड़ जायगा; भोजन इत्यादि का क्रम टूट जायगा; आपका स्वास्थ्य सुख, प्रतिष्ठा नष्ट हो जायगी इत्यादि। करुण, हास्य, दया, प्रेम, सहानुभूति, गौरव, की भावनाओं का उद्रेक कीजिए। आप जितना ही रूठे के हृदय में इन्हें स्थिर कर सकेंगे, उतना ही उत्तम है।

अनेक बार समय व्यतीत होने से हृदय के घाव स्वयं ठीक होने लगते हैं। दुखद प्रसंग विस्मृत होते हैं। रूठना स्वयं दूर हो जाता है। यदि जिद्दी रूठने वाला व्यक्ति हो तो उसे मनाना छोड़ कर नित्य प्रति जैसा व्यवहार प्रारंभ कर देना चाहिए। आप स्वयं भी भूल जाइये कि उसने क्या गलती की थी? कब किस बात पर रूठा था? धीरे धीरे समय के साथ वह साधारण स्थिति में स्वयं आ जायगा। रूठना मन की अस्वाभाविक और कृत्रिम दशा है। अपनी सहज स्वाभाविक गति में मन सरल निष्कपट रहना चाहता है। उसमें जो गुत्थियाँ आ रही हैं, वे अप्राकृतिक हैं। अतः कुछ समय पश्चात् धीरे धीरे लड़ाई झगड़े की कटुता स्मृति पटल से दूर हो जाती है। जिद्दी को मनाना आफत मोल लेना है। अतः साधारण सहानुभूति के पश्चात् उसे समय के लिए छोड़ देना ही श्रेयस्कर है।


ठहरो और प्रतीक्षा करो।

अधीरता बचपन की निशानी है। छोटा बालक क्षुद्र सी वस्तु के लिये रोता पीटता है। जिद कर माता-पिता के नाक में दम कर देता है; जो कुछ कार्य करता है, उसका फल तुरन्त चाहता है। उसमें परिपक्वता नहीं होती। उसका मन ललचाता रहता है। हर वस्तु के प्रति उसके मन में एक सहज आकर्षण होता है।

इस अधीरता का बड़े व्यक्तियों में होना एक कमजोरी है। जो व्यक्ति आज पेड़ लगाकर आज ही उसका फल चखना चाहता है, उसे मूर्ख कहा जायगा। संसार में सभी वस्तुओं के विकास तथा परिपक्वता के लिए एक निश्चित समय का क्रम है। उस समय का पालन प्रत्येक वस्तु तथा जीवन में होना अवश्यंभावी है। समय के पूर्व कुछ भी नहीं हो सकता। ‘ठहरो, और प्रतीक्षा करो’-इसमें गहरा तथ्य छिपा हुआ है। ठहरो का यह अभिप्राय नहीं कि आपका जीवन आलस्य या शून्यता में व्यतीत हो। ठहरने से हमारा अभिप्राय यह है कि उस काल में सतत् परिश्रम कर आप उत्तरोत्तर अपनी शक्तियाँ, योग्यताएँ, अच्छाइयाँ बढ़ाते रहें। कमजोरियों को छोड़ते रहें। एक एक सद्गुण चुन कर चरित्र रूपी उद्यान में लगावें। यह उन्नति का कार्य जितनी तीव्रता से चलेगा उतनी ही संसार में बढ़ने के लिए कम प्रतीक्षा करनी होगी।

जीवन के प्रारम्भ में हो सकता है आपको दूसरों से जली कटी बातें सुननी सहनी पड़ें। मन के घाव, दूसरों के द्वारा कही हुई कटी जली बातों के घाव समय के बहाव के अनुसार स्वयं विनष्ट हो जाते हैं। प्रतीक्षा करने से एक समय ऐसा अवश्य आता है, जब पुराना जमा हुआ मैल धुल कर साफ हो जाता है। प्रतीक्षा करने का अभिप्राय है अपने आपको बहते हुए समय, परिस्थिति तथा नई आवश्यकताओं के अनुसार ढालते चलना। प्रत्येक दिन संसार की प्रगति तेजी से होती जा रही है। जीवन में संघर्ष भी तीव्र होता जा रहा है। प्रतीक्षा काल आपके लिये अपनी योग्यताएँ बढ़ाने का समय है। संसार के अन्य देशों के उन्नतिशील व्यक्तियों, संस्थाओं, पुस्तकों से ज्ञान संग्रह करना बड़े से बड़े संघर्ष के लिए तैयारी का समय है।

प्रतीक्षा-काल कठिन परिश्रम का समय तो है ही, सतर्कता ध्यान और देखभाल का समय भी है। इस काल में आपको संसार की गति देखनी है। जन-रुचि का सचमुच अध्ययन करना है। आप जिस दिशा में उन्नति कर रहे हैं, उसका महत्व तथा मूल्य कितना घट या बढ़ रहा है, यह भी ध्यान रखना है। जो व्यक्ति समय और परिस्थितियों के प्रति सतर्क है, वह विकास-पथ का पथिक है। कूप मण्डूक की भाँति पड़े सड़ने वाले आदमी संसार में पिछड़ जाते हैं, जब कि सतर्क रहने वाले उन्नति के चरम शिखर पर आरुढ़ होते हैं। सतर्क व्यक्ति समय की मार के ऊपर हैं। वह समय की आवश्यकताओं से सदा-सर्वदा अपने को ऊँचा उठाये रहता है। जो समय चाहता है, उससे कहीं अधिक उसे देने के लिए प्रस्तुत रहता है। संसार में जितने महान् व्यक्ति हुए हैं। वे अपने ज्ञान, अनुभव तथा विद्या बुद्धि से इतने परिपूर्ण रहे कि उनकी योग्यता का स्तर कभी नीचा न हुआ। उन्होंने अपने ठहरने और प्रतीक्षा के समय इतनी योग्यताएँ इकट्ठी करली कि वे उच्च से उच्च पद पर प्रतिष्ठित हो सकें।

अंग्रेजी में एक कहावत है कि ‘कुत्ते के भी दिन फिरते है।’ अभिप्राय यह है कि हम में से प्रत्येक के जीवन में ऐसा महत्वपूर्ण लक्ष आता है, जब हमारी योग्यताएँ इतनी विकसित हो जाती हैं कि हम संसार की प्रतियोगिताओं में हिम्मत से खड़े होकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यदि मनुष्य धीरे धीरे आत्मा विकास करता रहे, तो वास्तव में एक दिन वह उच्चतम पद के योग्य हो सकता है। हमारा अनुभव हमें आगे बढ़ाता है।

अनुभव का बड़ा मूल्य है। पुस्तकीय ज्ञान अपूर्ण और अधूरा-सा रहता है। संसार के विषय में जो मान्यताएँ हम स्वयं अपनी इन्द्रियों के ज्ञान से एकत्रित करते हैं, का अभिप्राय यही है कि अपना अनुभव बढ़ाइये। संसार की गति, मनुष्यों की आदतों, कूटनीतियों तथा गुप्त रहस्यों को देखिये आपको अनेक प्रचार की नई नई बातों का ज्ञान होगा। यही गुप्त रहस्य मिलकर आपका अनुभव बन जाएँगे। आपके अनुभव में अनेक ऐसी कटु अनुभूतियाँ भी सम्मिलित होंगी। आपको जहाँ ठोकर लगती है, आपका जो नुकसान होता है, वह दूसरे अर्थों में आपका अनुभव बढ़ाता है। आगे के जीवन में सतर्क रहने का आदेश देता है।


Quotation

सत्यनिष्ठ अपने शरीर की परवा नहीं रखते। वे जिस बात को सत्य समझते हैं उसे छोड़ते नहीं। पराजय का शब्द-कोश में है ही नहीं। वे शत्रु का नाश नहीं चाहते, शत्रु पर रोष नहीं करते किन्तु उस पर दया भाव रखते हैं।


दुष्टों से निपटना

दया, धर्म, सत्य, को स्थिर रखने के लिए जितनी शक्ति और तलवार की आवश्यकता है, उतनी ही कौशल, बुद्धि चातुरी और कूटनीति की भी है। राजनीति में कूटनीति का प्रयोग विकसित होकर एक विज्ञान बन गया है। सत्य और अहिंसा की सर्वत्र स्थापना स्पष्ट और खुले तरीकों से प्रायः संभव नहीं होती। संसार में कपटी, छली, चतुर, स्वार्थी, धोखेबाज, बगल में छुरी मुँह में राम राम कहने वाले व्यक्ति हैं। इनसे व्यवहार करने में मनुष्य को कूटनीति की आवश्यकता है।

संसार के व्यक्ति नवीनता से घबराते हैं, पुरानी कही सुनी, बातों पर पिष्ट पोषित मार्ग पर आरुढ़ रहते हैं। वह स्वयं अपने आप नहीं चलता, नाक पकड़ कर चलाया जाता है, जैसे हजारों भेड़ों को एक गड़रिया चराता है, उसी प्रकार संसार के मानव समाज को इने गिने पुरुषों पर भरोसा करना पड़ता है। संसार में बाहुबल का मूल्य पीछे है, बुद्धिबल का पहले, उसमें छल, कपट, नीति, आदर्श की स्थापना के लिए झूठ, फरेब, प्रतिशोध आदि सभी कुछ आ जाता है। कूटनीति को जानने वाला साम, दाम, दण्ड, भेद सभी का प्रयोग करता है। ऋषियों का वाक्य है-“शाठे शाठ्यं समाचरेत्”। संसार में जितने राज हैं उनमें अधिकतर छल मक्कारी की नींव पर खड़े हैं। जहाँ अहिंसा है, वहाँ हिंसा भी है; सत्य के साथ झूठ भी है।

वस्तु स्थिति को समझिये :- बुद्धिबल, कूटनीति, कौशल किसे कहते हैं? इसका उत्तर यही कि जो व्यक्ति वस्तु स्थिति, देश काल, निज शक्ति , सामर्थ्य इत्यादि को समझें, और तदनुकूल इस प्रकार व्यवहार करे कि किसी उच्च आदर्श की स्थापना हो; अधिक से अधिक व्यक्तियों का भला हो, संसार को अधिक सुख मिले, दुष्ट पापी अत्याचारी का नाश हो; “बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय” आपको कूटनीति से कार्य लेना उचित है।

जब कर्ण ने अपना कवच दान में दे डाला और अपने व्यक्तिगत जीवन की रक्षा का आखरी उपाय भी सत्य, अहिंसा और दान शीलता के जोश में नष्ट कर लिया तो वह असमर्थ और निरुपाय हो गया। कूटनीति की दृष्टि से इन्द्र ने उसका कवच लेकर अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया था, किन्तु कर्ण की यह भारी मूर्खता थी। शकुनि ने उसे समझाते हुए कहा—

“अरे मूर्ख कर्ण दया! धर्म सत्य को स्थिर रखने के हेतु जितनी तलवार की अपेक्षा है, उतनी ही छल चातुरी की भी आवश्यकता है। यही राजनैतिक कौशल है। यही चातुरी राजनीति का गुप्त रहस्य है। सत्य बोलने के लिए कला और नीति की आवश्यकता है ...और तुम जिस सत्य अहिंसा की उपासना करते हो, वह तो एक कोरा आदर्शवाद है। वह व्यावहारिक नहीं है। कभी थके, माँदे, झुँझलाये हुए आदमी को शान्त करने के लिए उसे एक औषधि के रूप में अच्छा असर समझा गया है;पर उस मनुष्य के इतिहास को जब प्रारम्भ से अन्त तक फरेब, प्रेम के साथ क्रोध, अहिंसा के साथ साथ हिंसा, सजा, और खून का बदला खून, मनुष्य क्या चींटी से लेकर हाथी तक ने स्वीकार किया है। देखते हो एक बड़ी मछली रहती है। बुद्धिमान मनुष्य भी ऐसा ही करता है। दुर्गम पर्वतों को खंड खंड कर धराशायी कर दिया है, दुर्गों का निमार्ण किया है, प्रकृति की असंख्य दुष्ट शक्तियों, हिंसक पशुओं, भयंकर व्याधियों से युद्ध किया हैं। विश्व को विजय करने में मनुष्य ने बुद्धि, छल, कूटनीति का प्रचुर प्रयोग किया है।

निश्चय ही तुमने कवच देकर नादानी का कार्य किया है। तुमने हमारी नींव पर कुल्हाड़ा मारा है। तुम्हें बुद्धि से कार्य लेना उचित था।”

उपरोक्त वक्तव्य में शकुनि ने जो बातें प्रकट की हैं, उनमें से बहुत सी सत्य हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य को अपने कार्य तथा फल का निर्णय करना चाहिये।

दुष्टों से सीधा संघर्ष मोल लेना, बहुधा उपयुक्त नहीं होता। उन्हें अवसर देखकर नीचा दिखाना चाहिए और सबक याद रखना चाहिए जिससे वे अपनी दुष्टता से बाज आवें, दुष्ट लोग बहुधा अशिष्ट होते हैं, न अपनी इज्जत प्यारी होती है न दूसरों की इसलिए उनसे प्रत्यक्ष संघर्ष तभी लेना चाहिये जब उनका मुँह भली प्रकार कुचल देने की स्थिति हो। अन्यथा उनके दुर्व्यवहार को विष के घूँट की तरह पीने में सहनशीलता और धैर्य का परिचय देना चाहिए ताकि अपने को भी लोग उस दुष्ट की श्रेणी का ही अशिष्ट न समझें। अपने धैर्य और तर्क द्वारा शिष्ट रहते हुए भी दुष्ट का विरोधी वातावरण तैयार कर अन्यों के सहयोग से उसकी दुष्टता का समुचित अतिकार किया जा सकता है।


अपनी साख जमाइए।

‘साख’ से अभिप्राय आपकी वह प्रतिष्ठा है, जो समाज में आपका आचरण, व्यवहार, आर्थिक स्थिति सामाजिक लेन देन तथा पारस्परिक सद्भाव पर निर्भर है। इसमें वे समस्त तत्व सम्मिलित हैं, जो समाज में आपकी सामूहिक प्रसिद्धि के कारण बनते हैं। आपके पास बहुत उज्ज्वल चरित्र है, गहन अध्ययन मनन तथा ज्ञान-विज्ञान आदि सब कुछ है, किन्तु यदि दूसरे आपका मान नहीं करते हैं, आवश्यकता के समय आपको रुपया प्राप्त नहीं होता, या जन्म, विवाह, मृत्यु के अवसरों पर आपके चार जातीय बन्धु आकर आपका सुख-दुःख नहीं बाँटते है, तो आपका ज्ञान-विज्ञान सब व्यर्थ है।

दूसरे आपके चरित्र, धर्म, अर्थ के सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, यह आपके लिए अत्यन्त महत्व पूर्ण विषय है। अपने घर में सभी राजा हैं, सबका मान होता है, किन्तु समाज के विस्तृत क्षेत्र में आपको कितनी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, यह भी विचारणीय है। समाज की विस्तृत कर्मस्थली में समाज के अन्य सदस्यों के विचार इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके कारण हर प्रकार से सफल व्यक्ति भी असफल प्रतीत होते हैं।

सफलता एक सापेक्षित गुण है। इसका संबंध समाज से है। जिस समाज में आप रहते हैं, उसके सदस्य आपके विषय में जो कुछ विचार रखते हैं, उससे आपका ही नहीं, आपके परिवार का, प्रत्येक घर में रहने वाले व्यक्ति का भविष्य बनता बिगड़ता है। अपनी आंख से आप व्यापार में तो कार्य सम्पन्न करते ही हैं, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक आदि अन्य क्षेत्रों में भी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।

अपनी साख बनाने के लिए आपको अपने चरित्र में सामाजिकता के तत्व की अभिवृद्धि करनी चाहिए। सामाजिकता के अंतर्गत आने वाले अनेक छोटे बड़े कार्य हैं, जो आपके चरित्र में उभरने चाहिए। सर्वप्रथम मिलनसारी की अभिवृद्धि आवश्यक है। आपका समाज में अधिक से अधिक लोगों से मिलना-जुलना, व्यवहार, लेन देन चलना चाहिये आप कितने व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं? किन किन से किस किस प्रकार का काम पड़ता है? यह तो आवश्यक है ही, आपको यह भी ध्यान में रखना है कि किन से आगे चल कर काम पड़ सकता है। मान लीजिये आपके समाज में कुछ प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं; विद्वान् हैं तथा उच्चपदाधिकारी हैं। इनमें से प्रत्येक से आपको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ न कुछ सहायता प्राप्त हो सकती है। प्रारम्भिक जान पहिचान के पश्चात् धीरे धीरे मित्रता की वृद्धि करते रहिए। उत्सव त्यौहारों के अवसरों पर मिलने जाना, छोटे मोटे उपहार भेजना, दूसरों के सामाजिक उत्सवों पर सम्मिलित होना अतीव आवश्यक है।

प्रतिष्ठित नागरिक की भाँति रहना अनिवार्य है। आपके वस्त्र वेशभूषा, आचार व्यवहार आदि ऐसे पवित्र हों कि उनका सात्विक प्रभाव आस पास के व्यक्ति पर पड़ सके। घर में आप जो कुछ चाहें खायें-पीयें; जैसे चाहें बैठें-उठें, कोई देखकर आलोचना करने वाला नहीं है। आप किस प्रकार के बाजे से मनोरंजन करते है, कैसी पोशाक में रहते हैं, यह इतना विचारणीय नहीं है, जितना कि आपका सामाजिक आचार तथा व्यवहार। समाज में आपको प्रत्येक नागरिक की रुचि, आराम आदि ध्यान रख कर कार्य करना होगा।

आपकी सज्जनता, चरित्र की निर्मलता, योग्यता और व्यवहार की मृदुता ऐसे दैवी गुण हैं, जिनका बहुत प्रभाव गुप्त रूप से आपके चारों ओर निरन्तर फैला करता है। आपका प्रत्येक कार्य गुप्त रूप से इस चरित्र रूपी सम्पदा को विकीर्ण करता है। सज्जनता आपके प्रत्येक कार्य से पुरुष के सौभाग्य की तरह निरन्तर निकला करती है। इन दैवी गुणों पर आश्रित आपकी साख स्थायी चीज है। यह साधारण वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति एक दो दिन में जादू के जोर से उत्पन्न की जा सके। इसका विकास क्रमिक होता है। धीरे-धीरे जैसे जैसे आप जनता के संपर्क में आते हैं, लोग आपके विषय में धारणाएँ बनाते हैं। आपका बोलना-चालना, लेन देन, दूसरों से बोलचाल सब कुछ आपके विषय में दूसरों के मस्तिष्क में धारणाएँ निर्मित किया करती हैं। अतः अपने व्यवहार में सावधान रहिए। दूसरों के सामने अपना सबसे आकर्षक पहलू रखिये, जिसे वे देखकर आकर्षित हो सकें। एक बार आकर्षित होने के पश्चात् आपके चरित्र के गुण और योग्यता उसे स्थिर रख सकेंगे।

रुपये उधार देने या लेने में बड़े सावधान रहें। जिसका जितना रुपया लिया जाय, वह ठीक समय पर, या वाजिब समय से पूर्व ही दे देने में समस्त पंडताई, योग्यता और भलमनसाहत है। समय पर रुपये की अदायगी से साख कायम रहती है। जो व्यक्ति रुपये उधार लेकर उसे अदा करना भूल जाते हैं; जो दुकानदार उधार लेकर बड़े व्यापारियों को समय पर पैसा अदा नहीं कर पाते, उनकी साख नष्ट हो जाती है। उन्हें कोई रुपया उधार नहीं देता; समाज में भी प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है।


अनमोल बोल


अनमोल बोल (Kavita)

—किसी के गुण दोष की आलोचना मत करो। तुम्हारा काम सेवा करना है। कर्मों का निर्णय करना नहीं।

—चाहे कोई हो यदि तुम्हारी सेवा की उसे आवश्यकता है, तो अवश्य करो।

—दूसरे तुम्हें क्या कहते हैं इस पर ध्यान मत दो तुम अपनी दृष्टि में अच्छे बनो, महान् बनो।

—उदार बनो। दूसरों के विचारों को सुनो, सोचो और यदि ठीक हो तो मानने में मत हिचको।

—किसी की आपत्ति में हँसी मत करो। क्योंकि तुम पर भी आपत्ति आ सकती है।

—यदि तुम आपत्ति में दूसरों की सहायता नहीं करते, तो तुम्हें भी विपत्ति में दूसरों से सहायता पाने की आशा नहीं करनी चाहिये।

—दूसरों से जैसा व्यवहार अपने प्रति चाहते हो, वैसा ही दूसरों के साथ भी करो।

—दूसरों का सम्मान करो; पर अपने लिये सम्मान मत चाहो।

—यदि उपकार किया है तो बदले की आशा मत करो। यह तो वाणिज्य होगा।

—किसी के साथ उपकार किया है, तो उसे प्रसिद्ध करके उपकृत को लज्जित मत करो।

—स्पष्ट बोलो, जो कुछ कहना हो नितान्त स्पष्ट कह दो।


सहस्राँशु यज्ञ की पुण्य प्रगति

प्रसन्नता की बात है कि सहस्राँशु यज्ञ की सन्तोष जनक प्रगति हो रही है। 1 हजार स्थानों में, सहस्रों ऋत्विजों द्वारा, 125 करोड़ गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास और 125 हजार (सवा लक्ष) सत्पुरुषों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान कराना, यह सहस्राँशु यज्ञ का विशाल कार्यक्रम है। इतने बड़े आयोजन की पूर्ति इस वातावरण में-जिसमें धार्मिक कृत्यों की ओर व्यापक अश्रद्धा, एवं उपेक्षा परिव्याप्त है—साधारण तया कठिन ही दिखाई पड़ती है, परन्तु हर्ष की बात है कि सर्व शक्तिमान सत्ता की प्रेरणा से, इस युग का यह अभूत पूर्व यज्ञ अपने नियत समय के भीतर ही निश्चित रूप से पूरा होता दृष्टि गोचर हो रहा है। इस यज्ञ में प्रतिदिन नवीन ऋत्विज् उत्साह पूर्वक सम्मिलित होकर गायत्री तपश्चर्या में प्रवृत्त हो रहे हैं। कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिनने अपने अब तक के जीवन में कभी पूजा उपासना की राह नहीं जानी थी वे उग्र तपश्चर्या में प्रवृत्त हो रहे हैं। जिनमें थोड़े से भी पूर्व संस्कार मौजूद थे, उनने तो इस यज्ञ में स्वयं ऋत्विज् बनने और दूसरों को बनाने में बहुत अधिक उत्साह दिखाया है।

यह सार्वजनिक यज्ञ है। किसी एक व्यक्ति को इसका श्रेय या पुण्य नहीं मिलेगा। वरन् साझे की खेती की तरह हर एक भागीदार को उसके परिश्रम के अनुसार उपयुक्त भाग प्राप्त हो जायगा। एक एक मनुष्य अलग अलग अपना काम करे तो वह छोटा, अधिक खर्चीला, अधिक श्रम साध्य, एवं कम लाभ-दायक होता है। किन्तु यदि अनेक मनुष्य एक साथ सम्मिलित होकर अपने श्रम; धन, कौशल, चातुर्य आदि को इकट्ठा करके कोई उत्पादन, या व्यवसाय करें तो वह कार्य भी बहुत विशाल होगा और उसमें लाभ भी हर एक भागीदार को अधिक होगा। किसी देश में बहुत बड़ी संख्या में योद्धा हों पर वे बिखरे हुए अपने अपने घरों पर रहें, और अपनी अपनी योजनानुसार देश की रक्षा करें तो उतना कार्य नहीं हो सकता जितना कि उससे चौथाई योद्धा एक फौज के रूप में संगठित होकर अनुशासित रूप से कर सकते हैं। जैसे थोड़ी थोड़ी पूँजी से एक एक आदमी दियासलाई बनाने का काम करे तो उससे दियासलाई बहुत थोड़ी बनेंगी, अधिक महंगी पड़ेंगी और उन्हें सर्वत्र भेजने की व्यवस्था भी न हो सकेगी किन्तु यदि उस व्यवसाय में लगे हुए व्यक्ति अपना धन और श्रम इकट्ठा करके दियासलाई का एक बड़ा कारखाना चलावें तो उन लोगों को भी अधिक लाभ होगा और देश की आवश्यकता भी बड़े पैमाने पर, सरलतापूर्वक पूरी हो जायगी। इस यज्ञ को भी ऐसा ही साझे की फैक्टरी, लिमिटेड कम्पनी, मुक्ति फौज, सार्वजनिक संस्था या सामूहिक तपश्चर्या समझना चाहिए। किसी पुण्य पर जैसे असंख्य लोग एक ही दिन; एक ही समय, एक ही स्थान पर, गंगा स्नान करके पुण्य लाभ करते हैं वैसे ही पुण्य पर्व यह यज्ञ भी है।

ऋत्विजों को यह न भूलना चाहिए कि इस यज्ञ के जप उपवास, हवन, आराधना, ब्रह्म संदीप यह 5 अंग हैं और वे पाँचों ही समान रूप से उपयोगी एवं आवश्यक है। इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। फोड़े का आपरेशन तो कर दिया जाय पर उसे धोना, दवा लगाना, पट्टी बाँधना, आराम देना आदि आवश्यक उपचार की उपेक्षा की जाय तो वह चिकित्सा उपयुक्त न मानी जायगी। इसी प्रकार जिन्हें साधना करनी हो, सम्मिलित होना हो उन्हें पूर्ण तत्परतापूर्वक ही सम्मिलित होना चाहिए।

ऋत्विजों को चाहिए कि वे जिस गायत्री शक्ति की उपासना करते हैं उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने से वंचित न रहें। जो वैद्य निदान, निघंटु, नाड़ी परीक्षा, औषधि कूटना और गोली बनाना मात्र जानता है, उसे चिकित्सा के महत्वपूर्ण कार्य में कितनी सफलता मिलेगी, इसका अनुमान लगाना कुछ कठिन नहीं है। चिकित्सा शास्त्री की भाँति ही गायत्री विद्या का भी एक अत्यन्त महत्व पूर्ण विज्ञान है, उसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए समुचित अध्ययन करने की आवश्यकता है। जो लोग उस ज्ञान की उपेक्षा करके जप करने मात्र को ही पर्याप्त समझते हैं, वे उपयुक्त लाभ प्राप्त नहीं कर सकते।

इसी प्रकार इस यज्ञ की वंश वृद्धि होना भी आवश्यक है। किसी का वंश डूब जाना अशुभ माना जाता है। जिसका कुटुम्ब परिवार है, पुत्र पौत्रों से घर भरा है उसे ही सौभाग्य शाली मानते हैं। उसी प्रकार प्रत्येक ऋत्विज् की सफलता अपना आध्यात्मिक वंश बढ़ाने में है। आध्यात्मिक तत्वों का व्यापक प्रसार करने के लिए अधिकाधिक व्यक्तियों को गायत्री की पारस मणि से स्पर्श कराना है, यदि ऋत्विज् अपना जप भाग पूरा करके चुपचाप संतुष्ट बैठे रहें तो उनका यह कार्य अधूरा ही रहेगा। बट, पीपल वृक्षों की पूजा इसलिए की जाती है कि उनमें उपकारी परम्परा की, वंश वृद्धि की विशेष शक्ति है। एक एक बट पीपल के फल में अगणित बीज छिपे रहते हैं। जबकि अन्य वृक्षों के फलों में एक ही बीज रहता है। गायत्री विद्या का प्रसार करना, अधिक लोगों में इस महान ज्ञान का विस्तार करना, एक उच्च कोटि का ब्रह्म दान है, जिसकी तुलना अन्न दान, वस्त्र दान, हेम दान आदि से नहीं हो सकती। ऋत्विजों के पास अपना जो गायत्री साहित्य है उसे बार बार स्वयं पढ़ें और गायत्री पुस्तकालय के रूप में अधिकाधिक व्यक्तियों को पढ़ाना चाहिए और इस बात का प्रयत्न करना चाहिए कि वे पढ़ने वाले भी अपना स्वतंत्र गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके आपकी ही तरह अनेक लोगों को ज्ञान दान करें। इस प्रकार अपनी आध्यात्मिक वंश वृद्धि करना, अपनी आध्यात्मिक पुत्रों पौत्रों, प्रपौत्रों का मुख देखना आनन्द दायक मानें।

सहस्राँशु यज्ञ की प्रगति संतोष जनक है। सर्व शक्ति मान माता की प्रेरणा से इस युग का यह अभूतपूर्व यज्ञ पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न होगा ऐसा विश्वास है। इसके जो सूक्ष्म लाभ होंगे उनकी गुरुता का अनुमान लगाना भी कठिन है। इससे विश्वव्यापी दूषित वातावरण की शुद्धि होगी, जिन अगणित ताप तापों से प्राणि मात्र को भारी पीड़ाएं सहन करनी पड़ रही हैं, उनकी समाप्ति होगी, प्राचीन सात्विकता, धार्मिकता एवं शान्ति का पुनः अवतरण होगा, इसके अतिरिक्त इस महान अभियान में भाग लेने वाले ऋत्विजों को अनेक दृष्टियों से आशाजनक सत्परिणाम प्राप्त होंगे। इस परम कल्याणकारी यज्ञ की भागीदारी बहुत ही सरल है। इसमें भाग लेने के लिए हम सभी धार्मिक प्रवृत्ति के सत्पुरुषों का आह्वान करते हैं और जो ऋत्विज् इसमें संलग्न हैं उनसे अधिक तत्परता, दृढ़ता जागरुकता एवं उत्साह को अपने की प्रार्थना करते है।


Quotation

सभ्यता उस आचरण का नाम है जिससे मनुष्य अपना कर्तव्य पालन करता रहता है। नीति का पालन करना अपने मन और इन्द्रियों को अपने वश में रखना है। ऐसा करने से हम अपने को पहचान सकते हैं। यही सभ्यता है, इसके विरुद्ध जो है वह सब असभ्यता है।


गायत्री मन्दिर के लिये श्रद्धाँजलियाँ

मथुरा में गायत्री तीर्थ बनाने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है, यह इस युग की एक अत्यन्त उपयोगी आवश्यकता है। ब्रह्म विद्या, तपश्चर्या, संयम, सद्ज्ञान एवं शक्ति विज्ञान का गम्भीर अन्वेषण एवं विशद् प्रस्तार करने के लिए एक केन्द्रिय स्थान होना जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म, एवं रहस्य मय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया। पूर्व युगों में भी ऐसे प्रयत्न इसी पुण्य भूमि से प्रारम्भ हुए थे।

माता की प्रेरणा अपूर्ण रहे, दैवी संकल्प निष्फल हो जाय, यह संभव नहीं। यह तीर्थ तो छोटे या बड़े किसी न किसी रूप में बनेगा ही। इस यज्ञ में कौन श्रद्धालु अपनी कितनी श्रद्धा उपस्थित करता है, केवल इसका एक अवसर माता ने परीक्षा के रूप में सामने रखा है। हर्ष की बात है कि श्रद्धालु लोग इस परीक्षा में असफल नहीं हो रहे हैं और कार्य की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए समुचित श्रद्धाँजलियाँ उपस्थित कर रहे हैं।

जिनके मन में माता जितनी प्रेरणा एवं श्रद्धा उत्पन्न कर रही हों वे अपनी श्रद्धाँजलि भेज दें। मन्दिर निर्माण कार्य अधिक दिन रुका न रहेगा। माता चाहेंगी तो एक दो व्यक्ति ही इस कार्य को पूरा कर सकते हैं परन्तु उनने अपनी अपनी उदारता की परीक्षा परिचय देने का सभी को अवसर दिया है। जो चाहे इस पुण्य पर्व में सहयोग देकर अपने को, अपने धन को, धन्य बना सकते हैं।


शिष्टाचार

(ले.-श्रीमती विद्यावती मिश्र)

यह तो है कर्त्तव्य, समझना इसे नहीं उपकार!

यदि इतना है सत्य कि मानव है सामाजिक प्राणी,

अगणित स्वर मिल कर देते हैं मानवता को वाणी।

सूर्य चन्द्र ने सब पर ही सम, है प्रकाश बिखराया,

सबके लिए समान रूप से है बादल की छाया॥

तो आवश्यक नर का नरके प्रति शुभ शिष्टाचार॥ यह.॥

शिष्टाचार चाहता छोटों के प्रति अति अनुराग,

गुरुजन पाते रहें सदा ही निज श्रद्धा का भाग।

सहचर पायें मोद-पूर्ण मंजुल समता का भाव,

परिजन पुरजन, खजन मिलन की लिए हुये हों घाव॥

दया-क्षमा बिखरें बनकर गंगा जमुना की धार॥ यह.॥

शिष्टाचार न कहता- होता धन से ही सम्मान,

यहाँ वचन से ही मिलता है सदा तुष्टि का दान।

विनय यहाँ पर, अहंभाव पर आ पाती है जीत,

संयम पुलकित हो बन जाता है विश्वास पुनीत॥

लोलुपता भी बन जाती है यहाँ अतीव उदार!॥ यह.॥

दिन प्रति दिन बढ़ती ही जाती है आर्थिक कठिनाई,

भय कायरता से लेकर आई भीषण महंगाई।

अब आतिथ्य-निभाना तुमको है मीठे वचनों से,

अब यथार्थ के महल बनाना है मंजुल सपनों से॥

शिष्टाचार सुरक्षित रखना ही है किसी प्रकार!॥ यह.॥

तुम हो ऋषि संतान तुम्हारे उच्च सदा आदर्श,

जिनकी रक्षा में झेले तुमने लाखों संघर्ष।

आज यहाँ संकट में युग-युग रक्षित शिष्टाचार,

दया तुम्हारी माँग रहा है तुमसे बारम्बार॥

स्वजन आज सुनलो तुम उसकी माता भरी पुकार॥ यह.॥

स्वजन आज सुनलो तुम उसकी माता भरी पुकार॥ यह.॥

*समाप्त*