गायत्र्या परमं नास्ति दिवि चेह न पावनम्।
हस्तत्राणप्रदादेवी पतताँ नरकार्णवे॥
नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली वस्तु या मन्त्र पृथ्वी पर तथा स्वर्ग में भी नहीं है।
बहुना किमिहोक्तेन यथावत् साधु साधिता।
द्विजन्मानामियं विद्या सिद्धा कामदुधास्मृता॥
यहाँ पर अधिक कहने से क्या लाभ? अच्छी प्रकार सिद्ध की गई यह गायत्री विद्या द्विज जाति की कामधेनु कही गयी है।
या नित्या ब्रह्मगायत्री सैवगंगा न संशयः।
सर्व तीर्थमयी गंगा तेन गंगा प्रकीर्तिता॥
गायत्री तंत्र
गंगा सर्व तीर्थ मय होने से ‘गंगा’ कहलाती है। वह गंगा ब्रह्म गायत्री का ही रूप है।
गायत्री तु परित्यज्य अन्य मंत्रमुपासते।
सिद्धान्नं च परित्यज्य भिक्षामटति दुर्मति।
जो गायत्री को छोड़ कर दूसरे मन्त्रों की उपासना करता है वह दुर्बुद्धि पुरुष पकाये हुए अन्न को छोड़ कर भिक्षा के लिए घूमने वाले पुरुष के समान है॥42॥
नित्यनैमित्ति के काम्ये तृतीये तप वर्धने।
गायत्र्यास्तु परं नास्ति इहलोके परत्र च ॥2॥
नित्य, नैमित्तिक, काम्य की सफलता तथा तप की वृद्धि के लिए इस लोक तथा परलोक में गायत्री से बढ़कर कोई नहीं है।
सर्व वेद सारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना।
ब्रह्मादयोऽपि संध्यायाँ ताँ ध्यायन्ति जपन्ति च॥
दे. भा. कं. 16 अ. 16।15
गायत्री मन्त्र का आराधन समस्त वेदों का सारभूत है। ब्रह्मादि देवता भी सन्ध्या काल में गायत्री का ध्यान करते हैं और जप करते हैं।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादनुष्ठानादिकं तथा।
गायत्री मात्र निष्ठस्तु कृतकृत्यो भवेद्विजः॥
गायत्री तंत्र। 8
अन्य अनुष्ठानादि करे या न करे, गायत्री मात्र की उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।
मोक्षय च मुमुक्षूणाँ श्रीकामानाँश्रियेप्तदा।
विजयाय युयुत्सूनाँ व्याधि नानामरोगकृत्॥1॥
गायत्री पंचांग 1
गायत्री साधना से मुमुक्षुओं को मोक्ष मिलेगा, श्री कामियों को श्री का युद्धेच्छुओं को विजय तथा व्याधि ग्रस्तों को निरोगता प्राप्त होगी।
य एताँ वेद गायत्रीं पुन्याँसर्वगुणान्विताम्।
तत्वेन भरतश्रेष्ठ! स लोके न प्रणश्यति॥
महा भा. भीष्म प. अ. 14।16
हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य तत्व पूर्वक सर्वगुण सम्पन्न पुण्य गायत्री को जान लेता है। वह संसार में दुखित नहीं होता है।
गायत्री रहितो विप्रः शूद्रादप्य शुचिर्भवेत्।
गायत्री ब्रह्म तत्वज्ञः सम्पूज्यस्तु द्धिजोत्तमः॥
गायत्री से रहित ब्राह्मण शूद्र से भी अपवित्र है। गायत्री रूपी ब्रह्म तत्व को जानने वाला द्विज सर्वत्र पूज्य है।
एवं यस्तु विजानाति गायत्री ब्राह्मणस्तुसः।
अन्यथा शूद्र धर्मस्याद्वेदानामपि परागः॥
यो. याज्ञ.
जो गायत्री को जानता है और जपता है वह ब्राह्मण है अन्यथा वेदों में पारंगत होने पर भी शूद्र के समान है।
किं वेदैः पठितैः सर्वैः सेतिहास पुराणकैः।
साँगैः सावित्र हीनेन न विप्रत्वमवाप्नुयात्॥
इतिहास पुराणों के तथा समस्त वेदों के पढ़ लेने पर भी यदि ब्राह्मण गायत्री मन्त्र से हीन हो तो वह ब्राह्मणत्व को नहीं प्राप्त होता है।
वर्ष -13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक- 7
भूरी किरणों की डोरी से अम्बर से भू पर उतर उतर,
मुखरित नीड़ों करते हैं गिरते पड़ते तारों के स्वर,
कलियाँ अपनी उर-प्याली में करती मधु सौरभ का संचय!
मंगलमय हो यह पुण्य उदय!
सर के सरिता के सूने तट
हो गये निनादित मृदु पनघट, भर-भर कर भावों के संपुट,
हो गये बन्द रजनी के पट,
मिलने वाले मिल गये, दूर हो गया मुग्ध अलिदल का भय!
मंगलमय हो यह पुण्य उदय!
नूतन आशाओं ने गति दी निश्चय ने पथ निर्माण किया,
अम्बर ने शत-शत हाथों से, बिखरा भू पर वरदान दिया,
कितनी मंगलमय हुई, तिमिर पर प्रिय प्रकाश की दिव्य विजय!
मंगलमय हो यह पुण्य उदय!
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
गायत्री उपासना ऐसी तपश्चर्या है जिसे गृही और विरागी, स्त्री और पुरुष, बालक और वृद्ध समान सुविधा से कर सकते हैं। तप ही एकमात्र वह साधन है जिससे आत्मिक शक्ति बढ़ती है और आत्म शक्ति ही संसार की वह सर्वोपरि वस्तु है जिसके द्वारा मनुष्य इच्छानुकूल पदार्थ, मनोवाँछित परिस्थिति और अक्षय शाँति प्राप्त कर सकता है। दैवी शक्तियों को सहायता एवं ईश्वरीय कृपा को उपलब्ध करना भी तप द्वारा उपार्जित आत्म शक्ति पर ही निर्भर है।
कथा है कि—अनादि काल में जब नाभि कमल में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए तो वे अकेले थे वे बहुत सोचते थे कि में क्या हूँ, क्यों हूँ, यह सब क्या है, पर कोई बात समझ में न आती थी। जब वे कुछ भी न सोच सके और बहुत हैरान हो गये तब आकाशवाणी हुई कि “तप करो,” ब्रह्माजी ने दीर्घ कालीन तप किया, तब उन्हें आत्म ज्ञान हुआ, और अपना उद्देश्य एवं कार्यक्रम जाना। उन्हें गायत्री प्राप्त हुई उसकी सहायता से उन्होंने चारों वेद रचे। उन्हें सावित्री प्राप्त हुई उस की सहायता से उन्होंने सृष्टि की रचना की। इस प्रकार हम देखते हैं कि ज्ञान और विज्ञान का, चैतन्य और जड़ का मूलकारण, तप ही है, तप के बिना किसी भी वस्तु , विचार, तत्व या गुण का होना सम्भव न था।
समुद्र मंथन की कथा में देवता और असुर दोनों ही मंथन का घोर तप करते हैं। कूर्म, शेष जी, मदिराँचल को भी उसमें सम्मिलित होना पड़ता है। उस तप की घोर उष्णता से सूर्य, चन्द्र, अमृत, लक्ष्मी जैसे 14 रतन निकलते हैं। यदि वह समुद्र मंथन का तप न हुआ होता तो सूर्य, चन्द्र, जैसी वस्तुओं से वंचित रहकर इस दृष्टि को घोर अन्धकार में अचेतन जैसी पड़ा रहना पड़ता। श्री-हीन वसुन्धरा में जीवों को जीवन धारण करने के लिए कोई आकर्षण न रहता।
तप की शक्ति साधारण नहीं है। स्वयंभु मनु और सतरूपा रानी ने तप करके भगवान को अपनी गोदी में खिलाने की असम्भव इच्छा को सम्भव बना लिया। दशरथ और कौशल्या के रूप में उन्होंने राम को गोदी में खिलाने के सौभाग्य का रसास्वादन किया। नन्द और यशोदा, देवकी और वासुदेव ने भी पूर्व जन्मों में ऐसी ही तपस्या करके भगवान के भी माता पिता बनने का अद्भुत अवसर पाया था।
अवतारी आत्माओं को भी तप करना पड़ा है क्योंकि बिना तप के उनका शरीर भी ब्रह्मा जी की भाँति ही अशक्त रह जाता। राम का विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में जाना और 14 वर्ष तक वनवास में तपस्वी जीवन बिताना सर्वविदित है। लक्ष्मण का ब्रह्मचर्य प्रसिद्ध है। सीता का वनवास में अशोक वाटिका में और अन्त में बाल्मीकि ऋषि के आश्रम में तप करना किसी से छिपा नहीं है। भरत जी ने 14 वर्ष तक जो तप किया था उसी का प्रताप था कि वे बाण पर बिठाकर हनुमान को लंका पहुँचा सके।
भगवान कृष्ण ने संदीपन ऋषि के आश्रम में सुदामा के साथ गुरुकुल का तपस्वी जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त की थी। रुक्मिणी से विवाह होने के पश्चात् कृष्ण और रुक्मिणी ने दीर्घकाल तक हिमालय पर्वत के उच्च शिखर पर तप किया था, वहाँ वे केवल जंगली बेर खाकर रहते थे बेर को संस्कृत में बद्री कहते हैं। बद्रीनारायण का तीर्थ भगवान कृष्ण के उसी तप का स्मारक है।
शंकर जी तो साक्षात् योगिराज ही हैं। योग और तप ही उनका प्रधान कार्य है। उनकी वेशभूषा का अनुकरण करके योगियों की एक परम्परा बन गई है। अनेक लम्बी समाधियों का वर्णन ग्रन्थों में मिलता है। ऐसे अवधूत को पुनर्विवाह के लिए तैयार करना कोई साधारण कार्य न था परन्तु पार्वती के तप ने उस असाधारण को भी साधारण बना दिया।
चौबीस अवतारों की कथाओं का वर्णन करने का इस छोटे लेख में अवकाश नहीं है पर विज्ञ पाठक जानते हैं कि उनमें से हर एक ने तप किया है। यद्यपि उनकी आत्मा पूर्ण थी परन्तु स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में आवश्यक क्षमता उत्पन्न करने के लिए उनके लिए भी तप करना आवश्यक था। इन्द्र की इन्द्र पदवी उसकी तपस्या के कारण ही थी। अनेक कथाओं में यह प्रकट है कि किसी अधिक तपस्वी की उग्र तपस्या को देखकर इन्द्र डरता है कि कहीं यह इतना तप इकट्ठा न करले कि मुझसे इन्द्र पदवी छीन ले। इसीलिए वह बहुधा तपस्वियों का तप भ्रष्ट करने के लिए प्रयत्न करता है। विश्वामित्र के उग्र तप से भयभीत होकर उसने मेनका अप्सरा को भेजकर उनका तप खंडित कराया था। अर्जुन को पराक्रम-हीन करने के लिए भी उसने उर्वशी भेजी थी, यह कथा महाभारत में विस्तारपूर्वक आई है। इन्द्र का आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा जी के पास जाना और ब्रह्मा जी द्वारा उसे थोड़ी थोड़ी शिक्षा देकर सौ वर्ष तक तप करना और तब फिर आगे की शिक्षा देना यह कथा उपनिषदों में आती है। इससे प्रकट है कि देवता भी तप के प्रभाव से ही देवत्व के अधिकारी रहते हैं। देवत्व का भी पिता तप ही है।
अन्य देवदूतों पर दृष्टि डालिए वे भी इसी मार्ग के पथिक रहे हैं, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, ईसा, मुहम्मद साहब, जरथुस्त्र, सुकरात, शंकराचार्य, गान्धी आदि ने जो तप किये हैं वे इतिहास के पाठकों को भली प्रकार विदित हैं। इनमें से प्रत्येक ने अपने अपने ढंग से आत्म शुद्धि और दिव्य शक्ति प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचर्य, व्रत, उपवास, तितीक्षा, त्याग, आराधना आदि तपश्चर्याओं का अवलम्बन किया था। उसी के कारण उनका चरित्र, व्यक्तित्व एवं प्रभाव बढ़ा और उसी के कारण वे अपने विचारों की छाप अपने अनुयायियों पर डाल सके। संसार के प्रत्येक देश में वे ही व्यक्ति पूजनीय माने गये हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को तपाकर निर्मल एवं प्रकाशवान् बनाया है।
यों यद्यपि तप के अनेक मार्ग हैं। विदेशी या विधर्मी लोग अन्य पद्धतियों से भी अपनी साधनाएं करते हैं और उनसे यथासंभव लाभ भी उठाते हैं परन्तु अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म दर्शी ऋषियों की सहायता के बिना कोई तप अधिक फल दायक नहीं हो सकता, इसलिए भारतीय पद्धति में इस महामन्त्र को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि यहाँ इसी महा-विज्ञान के आधार पर आत्म कल्याण के महान अभिमान किये जाते हैं। प्रायः सभी ऋषियों ने इस राज मार्ग को अपनाया है।
ऋषि महर्षियों में जो विशेषताएं थी उनमें उनकी तपस्या ही एकमात्र कारण थी। विश्वामित्र, वशिष्ठ, याक्षवल्क, व्यास, वाल्मिकी, च्यवन, शुकदेव, नारद, दुर्वासा, आदि ऋषियों के जीवन वृत्तांत पर विहंगावलोकन किया जाय तो सहज ही पता चल जाता है कि उनकी महानता का, उनके अद्भुत एवं महान् कार्यों का कारण उनका गायत्री तप ही था।
विश्वामित्र जी के द्वारा अपने तपोबल की शक्ति से नई सृष्टि का बनाया जाना और त्रिशंकु को शरीर स्वर्ग भेजने की कथा प्रसिद्ध है। वशिष्ठ की कामधेनु गौ (गायत्री) को लेने के लिये जब राजा विश्वामित्र गये थे तब वशिष्ठ जी ने निःशस्त्र होते हुए भी राजा की भारी सेना को परास्त कर दिया था। भागीरथ जी तप करके गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाये थे। अम्बरीष का तपोबल जब दुर्वासा ऋषि के पीछे मृत्यु चक्र बनकर दौड़ा तो अंत में दुर्वासा को अम्बरीष की शरण लेकर ही प्राण बचाने पड़े थे। इस प्रकार की अगणित कथाएं ऐसी हैं जिनसे प्रकट है कि तप के द्वारा कुछ विलक्षण शक्तियाँ तपस्या में उत्पन्न होती हैं।
शाप वरदान की अनेक कथाएं मौजूद हैं। कपिल के शाप से राजा सागर के सौ पुत्र जल गये थे। ऋषियों को पालकी में जोत कर सवारी करने वाले राजा नहुष को ऋषि के क्रोध का शिकार बनकर सर्प होना पड़ा था। राजा नृग ऐसे ही क्रोध के भाजन बनकर गिरगिट की योनि को प्राप्त हुए थे। गौतम के शाप से अहिल्या शिला हो गई थी और इन्द्र को शत भग होने की कुरूपता धारण करने पड़ी, गुरु पत्नी से गमन करने का शाप चन्द्रमा के ऊपर कलंक रूप में अब भी विद्यमान है। ऋंगि ऋषि के शाप से राजा परीक्षित को तक्षक सर्प ने काटा था, शुक्राचार्य के शाप से कच की विद्या निष्फल हो गई थी। श्रवण कुमार को मृग जानकर तीर मारने पर उसके पिता का शाप राजा दशरथ को लगा था और अन्त में राजा को भी पुत्र शोक में प्राण त्यागने को विवश होना पड़ा था। ऋष्य मूक पर्वत पर बाली शाप वश ही नहीं जा पाता था। मेघदूत का यक्ष शापवश ही अपनी प्रियतमा से वियोग का दुख सहता है। इसी प्रकार वरदानों का भी इतिहास है। देवताओं और ऋषियों के वरदान से अनेकों को अनेक प्रकार की दिव्य शक्तियाँ प्राप्त हुई हैं और वे उस कृपा के कारण असाधारण लाभों से लाभान्वित हुए हैं।
तप के द्वारा साँसारिक सुख सौभाग्यों से परिपूर्ण बनने वालों के उदाहरण भी कम नहीं हैं। ध्रुव ने तप करके राज्य पाया था। राजा दलीप के संतान न थी उसने पत्नी समेत वशिष्ठ जी के आदेशानुसार नन्दिनी (गायत्री) की उपासना की थी तदनुसार उन्हें महा प्रतापी पुत्र की प्राप्ति हुई। योगीराज मछीन्द्र नाथ की भस्म विभूति के द्वारा महायोगी गोरखनाथ का जन्म हुआ था। अंजनी ने कठिन तप करके बजरंगी हनुमान जी का प्रसव किया था। दशरथ जी को यज्ञ के पुण्य प्रताप से संतान हीन के दुख से मुक्ति मिली थी और चार पुत्र प्राप्त हुए थे। कर्ण को नित्य सवा मन स्वर्ण प्राप्त होने का वरदान प्राप्त हुआ था, वह इस स्वर्ण को नित्य दान कर देता था।
केवल पुरुषों को ही तप करने का अधिकार हो सो बात नहीं है। स्त्रियाँ भी पुरुषों के समान ही इस क्षेत्र में पूर्ण अधिकारिणी हैं। आत्मा न स्त्री है न पुरुष वह ईश्वर का विशुद्ध स्फुल्लांग है, उसे तप करके आत्मा को परमात्मा में मिला देने का स्वाभाविक अधिकार सदा से ही प्राप्त है। पार्वती जी का तप अहिल्या, मदालसा, देवयानी, कुन्ती, सतरूपा, वृन्दा मन्दोदरी, तारा, द्रौपदी, दमयन्ती, गौतमी, अपाला, सुलमा, शाश्वती उशिजा, सावित्री, लोपामुद्रा, प्रतिशेयी, वैशालिनी, वेहुला, गान्धारी, अंजनि, शर्मिष्ठा, देवहूति, आदिति, दिति, शची, सत्यवती, सुकन्या, शैब्या, तारा, मन्दोदरी, घोषा, गोधा, विश्ववारा, जुहू, रोमशा, श्रूता, वयुना आदि अगणित तपस्विनी एवं आत्म शक्ति सम्पन्न नारियों के वृत्तांत इतिहास पुराणों में विस्तार पूर्वक वर्णित हैं उसे पढ़कर यह भली प्रकार जाना जा सकता है कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ भी पुरुषों के समान ही तपश्चर्या के क्षेत्र में बढ़ी हुई थी। गायत्री माता की गोदी में उसके पुत्र और पुत्री समान रूप से क्रीड़ा कल्लोल कर सकते हैं और समान रूप से पय पान कर सकते हैं।
कुन्ती ने कुमारी अवस्था में गायत्री मन्त्र द्वारा सविता के भर्ग को आकर्षित करके गर्भधारण किया था और उसके द्वारा कर्ण का जन्म हुआ था। नारद जी द्वारा सावित्री को जब यह बता दिया गया कि सत्यवान् का जीवन काल केवल एक वर्ष है। तब सावित्री ने तप करना आरम्भ कर दिया और एक वर्ष में ही वह शक्ति प्राप्त करली कि वह अपने पति को यम के हाथों में से वापिस लौटा सकीं। दमयन्ती का तप ही था जिसके कारण कुचेष्टा प्रयत्न करने वाले व्याध को उस देवी के शाप से भस्म होना पड़ा। गान्धारी आंखों से पट्टी बाँधे रह कर नेत्रों का तप करती थी जिससे उसकी दृष्टि में इतनी शक्ति उत्पन्न हो गई थी कि उनके देखने मात्र से दुर्योधन का शरीर अभेद्य हो गया था। जिस जंघा पर उसने लज्जावश कपड़ा डाल लिया था वही कच्ची रह गई और उसी पर प्रहार करके भीम ने दुर्योधन को मारा था। अनुसूया के तप ने ब्रह्मा विष्णु, महेश को छः-छः महीने के बालक बना दिया था। सती शाण्डिली के तपोबल ने सूर्य के रथ को रोक दिया था।
तप, शक्ति उत्पादन का विशुद्ध विज्ञान है। तपस्वी को निश्चित रूप से आत्म शक्ति मिलती है। उस शक्ति का किस कार्य में किस प्रकार उपयोग किया जाय यह दूसरा प्रश्न है। जैसे धन बल, बुद्धि बल, शरीर बल, अधिकार बल आदि का कोई मनुष्य सदुपयोग या दुरुपयोग कर सकता है वैसे ही तपोबल को दैवी का आसुरी कार्यों में प्रयुक्त किया जा सकता है। प्राचीन कान में असुरों ने बड़े बड़े तप किये थे और अपने अपने पुरुषार्थ के अनुरूप वरदान भी पाये थे। परन्तु उनका मार्ग अनुचित था इसलिए वह तप उनकी प्रभुता बढ़ाते हुए भी नाश का ही कारण सिद्ध हुआ। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद ने बड़े बड़े तप किये थे और उन्हीं के फलस्वरूप वे इतने सामर्थ्यवान् हो गये थे कि उन्हें तीनों लोकों में कोई भी जीत न सकता था, अन्त में उन्हें समेटने के लिए एक अवतार को ही आना पड़ा।
भस्मासुर स्वयं अपने वरदाता शंकर जी तक को भस्म कर देने के लिए तैयार हो गया था। हिरण्यकश्यपु, हिरण्याक्ष, महिषासुर, शुम्भ निशुम्भ, कंस, जालंधर, अहिरावण, महिरावण, मारीच, खरदूषण सहस्रबाहु, कालनेमि, सुन्द, उपसुन्छ आदि अनेकों असुरों ने तप द्वारा ही इतनी शक्तियाँ प्राप्त की थीं कि उनके आतंक से समस्त संसार कम्पायमान होने लगा था और उनके विनाश के लिए भगवान को विशेष आयोजन करना पड़ा था।
तपोबल का आसुरी उपयोग करने वाली स्त्रियों की संख्या भी बहुत है। सूर्पणखा, ताड़का, त्रिजटा, लंकिनी, सुरसा, पूतना, विशिखा, कर्कटी, होलिका, ढ़ेढुरा, आदि के उपाख्यान सर्वविदित हैं। ताँत्रिक विधान के अनुसार साधन करने वाले अघोरी, कापालिक, ब्रह्मराक्षस, बैताल, अग्निमुख, दृष्टि शूल आदि पुरुषों की भाँति विशिखा, कृत्या, कूष्माण्डी, भैरवी, शत चक्रा, भद्रा भ्रामरी, डाकिनी शाकिनी आदि प्रकृति की स्त्रियाँ भी तपोबल का आसुरी उपयोग करती हैं। यह मार्ग दूषित अवश्य है पर इसमें दोष विज्ञान का नहीं उसके प्रयोक्त है। चाकू से कलम बनाना या किसी का पेट फाड़ना यह अपने ही भले बुरे कर्म हैं। इनसे चाकू की निन्दा नहीं होती।
वे महापुरुष जो इतिहास में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमक रहे हैं उनके पीछे उनका भौतिक नहीं आत्मिक बल ही था। भीष्म जी शरशैय्या पर उत्तरायण सूर्य आने की प्रतीक्षा में महीनों तक मृत्यु को दुत्कारते रहे। शीश कटा हुआ रावण अपनी अन्तिम सांसें लेता हुआ लक्ष्मण जी को राजनीति सिखाता रहा। बभ्रु, वाहन का कटा हुआ शिर भी अपनी अनुभूतियाँ ओर अभिलाषाएं प्रकट करता रहा है। संजय को वह दिव्य-दृष्टि प्राप्त थी कि घर बैठे महाभारत के सारे दृश्य धृतराष्ट्र को सुनाते रहे। बाल्मीकि जी ने रामावतार से पूर्व ही उनका सारा इतिहास लिख दिया। दधीचि ऋषि की हड्डियों में इतना प्रचण्ड तेज था कि उन्हीं के द्वारा बना हुआ वज्र वृत्तासुर को मारने में सफल हुआ। परशुराम जी अकेले होते हुए भी पृथ्वी के समस्त राजाओं को सेना समेत संहार करने में सफल हुए। धौम्य ऋषि के आशीर्वाद मात्र से अरुणि को समस्त विद्याओं की विद्वत्ता प्राप्त हो गई।
जिन्होंने इतिहास पुराण पढ़े हैं, उन्हें इस प्रकार के असंख्यों उपाख्यानों का पता है। तप की महत्ता अनादि काल से लेकर अब तक समान रूप से अक्षुण्य बनी हुई है। पूर्ण काल में तप की ओर लोगों की अधिक रुचि थी इससे वे अधिक प्रतापी थे, यह रुचि घटने के साथ प्रताप में भी घटोत्तरी होती गई। मध्यकाल में भी जब जो आत्माएं चमकी हैं उनमें आत्म तेज का ही प्रकाश रहा है। सन्त कबीर, नानक, दादूदयाल, रैदास, रामानुज, सूरदास, तुलसी दास, रामकृष्ण परमहंस, रामतीर्थ, विवेकानन्द; विरजानंद, दयानंद, तिलक, गान्धी, मालवीय, अरविन्द, रमण, आदि के पीछे तपस्या की ही ज्योति जगमगाती हुई देखी जा सकती है। यों तपस्या के अन्य मार्ग भी हैं। पर स्मरण रखना चाहिए कि उन मार्गों में भी सूक्ष्म रीति से गायत्री का ही विज्ञान संबद्ध है। गायत्री के द्वारा ही अधिकाँश तपस्वी तप करते हैं क्योंकि यह रास्ता सबसे सरल, सर्वसुलभ, हानि रहित, शीघ्र फलदायी और गृही-विरक्त, स्त्री-पुरुष सभी के लिये सुसाध्य है।
(प्रो. रामाचरण महेन्द्र एम.ए.)
जो व्यक्ति जिस वस्तु से लाभ उठाना चाहता है उसे उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। कोई व्यक्ति वेश कीमती तलवार का स्वामी हो परन्तु उसे पकड़ना, चलाना, न जानता हो तो वह उस तलवार से मिलने वाले लाभ का उपयोग नहीं कर सकता। भारतीय तत्वज्ञान से लाभ उठाने की इच्छा रखने वालों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे उस विद्या के कारण, विज्ञान, रहस्य, विधान और प्रयोग को समझें। बिना आवश्यक जानकारी प्राप्त किये हमारा बहुमूल्य विज्ञान हमारे लिए आज निरर्थक ही नहीं अनुपयोगी एवं भार रूप भी सिद्ध हो रहा है।
जीव की स्वाभाविक इच्छा सुख प्राप्त करने की है और वह इसी प्रयोजन के लिए नाना प्रकार के विचार और कार्य किया करता है। परन्तु देखा जाता है कि उसका प्रयत्न बहुधा निष्फल चला जाता है। सुख प्राप्ति के लिए जो कुछ सोचा गया था और जो कुछ किया गया था वह अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने की अपेक्षा उलटा दुखदायक बन जाता है। हम देखते हैं कि आज अधिकाँश मनुष्य दुखी हैं। उन्हें अपनी वर्तमान दशा से घोर असंतोष है और अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए सदैव छटपटाते रहते हैं। यह अवस्था अल्प वृद्धि, अल्प विकसित, निम्न वर्ग के लोगों की हो सो बात नहीं है- अपने को बुद्धिमान, विद्वान, साधन-संपन्न और उस वर्ग के समझने वाले लोगों की भी यही दशा है। सभी लोग सुख की आकाँक्षा रखते हैं पर सभी लोग दिन दिन दूर पड़ते जा रहे हैं। उनका मन और शरीर जो कुछ भी करता है वह अभिष्ट उद्देश्य की पूर्ति में सहायक नहीं बाधक होता प्रतीत होता है।
मानव प्राणी की इस कठिनाई को हमारे पूजनीय ऋषि बहुत पहले से जानते थे इसलिए उन्होंने आनन्द के अक्षय भण्डार के वास्तविक स्थान को युग−युगांतर की खोज के पश्चात् ढूँढ़ निकाला और उसे सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित कर दिया। इस खोज का नाम है- “ब्रह्म विद्या”। इसी का दूसरा नाम है भारतीय संस्कृति या भारतीय तत्व ज्ञान।
भारतीय संस्कृति एक विशुद्ध विज्ञान है जिसका उद्देश्य मनुष्य जीवन के बाहरी और भीतरी आनन्द का परिपूर्ण विकास करना है। इस विज्ञान को जब हम जानते थे तब यह भारत भूमि ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ थी, तब हम चक्रवर्ती शान्ति रक्षक और संसार की अतृप्त आत्माओं को अमृत पिलाने वाले जगद्गुरु थे। आज उनकी उपेक्षा करके हम दीन हीन हो गये हैं। अपनी दीनता को मिटाने के लिए इधर उधर ओस चाटते फिरते हैं पर आँगन में बने हुए सुधा सरोवर की ओर ध्यान नहीं देते। यही कारण है कि जिसे भी देखिए वह अशान्त, असंतुष्ट, अभाव ग्रस्त दिखाई पड़ता है, किसी को चैन नहीं, किसी को शान्ति नहीं, किसी को प्रसन्नता नहीं, किसी को उल्लास नहीं धनी से लेकर गरीब तक और विद्वान से लेकर मूर्ख तक सभी एक सी बेचैनी से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं।
भारतीय संस्कृति में वह सब कुछ मौजूद है जिससे मनुष्य सच्चे अर्थों में सुखी बन सकता है। कुछ समय पहले तक यह विश्वास किया जाता था कि भौतिक विज्ञान की उन्नति से मनुष्य जाति के सुखों में वृद्धि होगी। रेल, तार, जहाज, बिजली आदि नाना प्रकार के आविष्कार करने वालों का यही अनुमान था पर परिणाम विपरीत निकला। सुविधाएं तो जरूर बढ़ी पर उस सुविधा से बचे हुए समय का सदुपयोग करने वाले ज्ञान के अभाव में यह सब अभिशाप साबित हुए। धनी अधिक धनी बन गये-गरीब अधिक गरीब हो गये। श्रम की उपेक्षा होने लगी और ऐश आराम की प्रवृत्ति ने चरित्र और स्वास्थ्य का सत्यानाश कर डाला और अस्पतालों, औषधालयों, जेलखानों, न्यायालयों के द्वारों पर भीड़ खड़ी कर दी। यह भौतिक विज्ञान आज तो भस्मासुर की तरह प्रलय ताण्डव करने तैयार खड़ा है। परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, मृत्यु विरण, पौइजन गैस, कीटाणु, बम की आड़ में खड़ा हुआ हिरण्याक्ष दैत्य आज फिर अट्टहास कर रहा है, लोग उस पौराणिक कथा पर विश्वास नहीं करते जिसमें कहा गया है की हिरण्याक्ष दैत्य पृथ्वी को चुरा ले गया था। परमाणु बमों और हाइड्रोजन बमों से सजा हुआ हिरण्याक्ष आज पृथ्वी को निकल जाने के लिए, चूर्ण विचूर्ण कर देने के लिए कैसा विकराल रूप बनाये खड़ा है इसे हम आज आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं। उस पौराणिक कथा की पुनरावृत्ति होने में बहुत देर दिखाई नहीं पड़ती। यह असम्भव नहीं कि उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ विज्ञान समस्त मानव जाति को ही नहीं, पृथ्वी ग्रह को ही भस्म कर दे।
यह नई बात नहीं हैं। भूत काल में भौतिक विज्ञान के अत्यधिक विकास के परिणामों का परीक्षण हो चुका है। उनसे चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सुविधाएं मिलती हैं। पर वे सुविधाएं अन्ततः घातक परिणाम ही उपस्थित करती हैं। रावण आदि वैज्ञानिकों ने भौतिक आधार पर चमत्कारी शक्तियाँ प्राप्त की थीं और कितने ही तपस्वियों ने योग और तंत्र के आधार पर चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियों का रास्ता निकाला था। पर दोनों ही अन्तः अनुपयोगी ठहराये गये और उनका सार्वजनिक उपयोग बन्द करने के लिए कठोर प्रतिबन्ध लगाये गये। लंका का सारा विज्ञान प्रदेश हनुमान के द्वारा जलवा दिया गया ताकि वे प्रयोगशालाएं वही नष्ट हो जायं। इसी प्रकार तंत्र के वाम मार्ग अनैतिक ठहराकर उसके साधनाओं का बहिष्कार किया गया। कापालिका, अघोरी, बैतालिक आदि को समाज से बहिष्कृत करके अछूत घोषित किया गया। ऋद्धि सिद्धियों के चमत्कार न दिखाने की प्रतिज्ञा और शपथ लेने पर ही कोई गुरु अपने को योग विद्या सिखावे यह नियम बनाये गये। कहने का तात्पर्य यह है कि हर प्रकार से भौतिक विज्ञान की अनावश्यक उन्नति को रोका गया। ऋषि जानते हैं कि मनुष्य जाति की सामूहिक मनोदशा बालकों के समान है यह बच्चे बारूद से खेलेंगे तो जल मरने के अतिरिक्त और किसी परिणाम पर न पहुँचेंगे।
मनुष्य के सुख की अभिलाषा अकेले विज्ञान से, अकेले धन से, अकेले बुद्धि चातुर्य से, कदापि पूर्ण नहीं हो सकती, यह सब भी जरूरी है पर इनकी जरूरत एक सीमित मात्रा में ही है। सुखों की वास्तविक संभावना किस मार्ग में है, इस सम्बन्ध में भारतीय तत्व वेत्ताओं ने दीर्घकालीन अन्वेषण किये हैं और उन्होंने वह मार्ग ढूँढ़ निकाला है जिस पर चल कर कोई भी मनुष्य निश्चित रूप से सुख, शान्ति आशा उन्नति और आनन्द, उल्लास का निश्चित रूप से आस्वादन कर सकता है। इस सुख शान्ति की वैज्ञानिक पद्धति का नाम है- भारतीय संस्कृति। दुर्भाग्य से आज इसे भी मजहबों की पंक्ति में पटक दिया गया, पर जब वास्तविकता को पहचाना जायगा तब सोने और पीतल को आसानी से अलग किया जा सकेगा।
भारतीयता-वस्तुतः मानवता की प्रतीक है। इसलिए भारतीय संस्कृति का वास्तविक अभिप्राय मानव संस्कृति से है। यह संस्कृति एक विशुद्ध विज्ञान है जिसका आधार प्रकृति के जड़ परमाणु नहीं-वरन् प्राणी के गहन अन्तराल में रहने वाली वह चेतना है जो यदि स्वस्थ दिशा में विकसित हो जाय तो आनन्द के फव्वारे की तरह फूट पड़ती है और चारों ओर पवित्रता, शान्ति, स्नेह, सौंदर्य और सुख ही सुख फैला देती है। यह संस्कृति एक व्यवस्थित जीवन पद्धति है, एक विशुद्ध शास्त्र है। ब्रह्म बोध, तत्व ज्ञान, शुद्ध दृष्टि, जीवन शास्त्र, एवं धर्म धारणा भी इसी को कहते हैं। इसके अंग प्रत्यंगों का विवेचन करने के लिए अनेक ग्रन्थ मौजूद हैं। वेद-शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन, पुराण, स्मृति में भारतीय संस्कृति की एक एक बात की पूरे विस्तार के साथ विवेचना की गई है। परन्तु जिनको इतना अवकाश नहीं है कि उन सब बातों को जानें या पढ़े उनके लिए एक बहुत ही छोटा 28 अक्षरों का मन्त्र भी मौजूद है। जिसमें बीज रूप से उस महान अध्यात्म विज्ञान की सभी बातें बीज रूप से मौजूद हैं। इसीलिए उसे भारतीय संस्कृति का बीज मन्त्र भी कहते हैं। इस मन्त्र का नाम है-”गायत्री।”
गायत्री को अनजान लोग एक ऐसा मन्त्र मात्र समझते हैं जो झाड़ फूँक के काम आता है, या जिससे घर, सन्तान, स्त्री, लाभ, विजय आदि की प्राप्ति होती है। यह जानकारी बहुत ही अधूरी और एकाँगी है। इस प्रकार की विशेष शक्तियाँ और सुविधाएं गायत्री साधक को प्राप्त नहीं होतीं यह कहने का हमारा अभिप्राय नहीं है। पर यह समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार के विशेष लाभ, तो विशेष व्यक्तियों को, विशेष तपस्या से, विशेष परिस्थितियों में ही प्राप्त हो सकते हैं। गायत्री का सर्वोपरि महत्व आदर्शों और सिद्धान्तों का प्रकाश करना है जिनके द्वारा मनुष्य जाति को, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का सुलझाव हो सकता है। ‘गायत्री विश्व धर्म है। गायत्री को तराजू के एक पलड़े में रखा जाय और संसार के समस्त ग्रन्थों को दूसरे पलड़े में रखा जाय तो गायत्री ही भारी बैठेगी। मनुष्य अन्य शिक्षाओं की दृष्टि से भले ही अशिक्षित हो पर यदि उसे गायत्री के गर्भ में छिपी हुई शिक्षा प्राप्त है तो उसे पूर्ण विद्वान कहा जा सकता है। क्योंकि अन्य शिक्षाएं तो साधन और सुविधाएं ही बढ़ा सकती हैं पर गायत्री तो जीवन को जीने की ही कला सिखाती है।
यदि हम अपने मनुष्य जन्म को जीने की विद्या भी सीखनी चाहिए। यदि हम सुखी बनना चाहते हैं तो सुख साधनों का प्रयोग करने की विद्या भी जाननी चाहिए। तलवार रखने का लाभ उसे ही मिलेगा जो तलवार चलाना जानता है। जीवन उसी का सफल होगा जो जीवन को जीने की विद्या से परिचित है। इस महा विद्या को “गायत्री “ कहते है। गायत्री गीता और गायत्री स्मृति के आधार पर यदि इन चौबीस अक्षरों में सन्निहित सिद्धांतों पर मनुष्य ध्यान दें, उन्हें हृदयंगम करे तो यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि वह व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव करता हुआ अपने मानव जन्म को धन्य बना सकता है।
मैं गायत्री को भारतीय संस्कृति मानता हूँ और इसीलिए उसके सम्बन्ध में मुझे विशेष रुचि एवं उत्साह है। मनुष्य जाति का सच्चा हित-इसी विज्ञान के आधार पर संभव दिखाई पड़ता है।
(श्री गोविन्द बलवन्त दशाने, सातारा)
मनुष्य समाज के दो भाग हैं (1) स्त्री (2) पुरुष। जितनी-जनसंख्या है उसमें आधे नर और आधी नारी हैं। संसार रथ का एक पहिया नर है तो दूसरा नारी। मनुष्य समाज का स्वस्थ विकास तभी हो सकता है जब यह दोनों ही अंग समान रूप से विकसित हों।
प्राचीन काल में नर और नारी समान रूप से सुविकसित थे, किन्तु मध्यकाल में एक ऐसी अन्धकार मय स्थिति आई जब यह संतुलन बिगड़ गया और समाज का आधा अंग सक्रिय और आधा निष्क्रिय हो गया। स्त्री हीन दशा में पहुँची और पुरुष कुछ उठा रहा। पिछले बहुत दिनों से नारी की जो स्थिति रही है उसे बहुत ही करुणा जनक कहा जा सकता है। पिंजड़े में बन्द पक्षी की तरह कुंए के मेंढक की भाँति जीवन के दिन पूरे कर देना, भोजन बनाना और बच्चे पैदा करना इन दो कार्यों के अतिरिक्त उनके जीवन का कोई उद्देश्य, लक्ष, महत्व न रहा। पैसे की दृष्टि से, जन संपर्क की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से, वे पूर्ण पराधीन हो गईं। उनकी अपनी इच्छा, रुचि, भावना, योजना, मान्यता के लिए कहीं कोई स्थान न रहा। पशुओं पर जिस प्रकार मनुष्य का अधिकार है वैसे ही स्त्री पर भी पुरुषों का स्वामित्व रहा। उनकी खरीद फरोख्त अब तक होती है। विधवा हो जाने पर एक नारी की दुर्गति होती है उसका कोई सहृदय मनुष्य अनुभव करे तो उसकी आत्मा करुणा से द्रवित हुए बिना न रहेगी।
नारी के इस स्थिति में पहुँच जाने पर नर भी सुखी और समुन्नत नहीं बन सका। आधी देह को लकवा मार जाय तो शेष आधी देह कोई बड़ा काम नहीं कर सकती। गाड़ी का एक पहिया टूट जाय तो दूसरा पहिया अकेले ही गाड़ी को द्रुत गति से नहीं चला सकता। अपंग, पराधीन, अविकसित, नारी के उदर से जो बच्चे हुए वे भी उन्हीं संस्कारों को लाये। फलस्वरूप नस्ल दिन दिन खराब होती गई। हर पीढ़ी अपने पूर्वजों की अपेक्षा अधिक हीन होती गई। पशुओं की तरह नारी का पराधीन रहना मनुष्यता धर्म, नीति, न्याय, ईश्वरीय इच्छा और कुदरत के नियमों के पूर्ण विपरीत था। इस अवाँछनीय स्थिति का परिणाम भी अवाँछनीय ही होने वाला था। उन्नति के अनेक प्रयत्न किये गये पर झूठी मन समझावनी के अतिरिक्त हमारी कोई वास्तविक उन्नति नहीं हो सकी वरन् सच तो यह है कि दिन-2 अवनति ही होती जा रही है।
जिस समय भारत में घर-घर सीता, सावित्री, अनुसूया, गार्गी, मैत्रेयी, कौशल्या, मंदोदरी, कुन्ती, द्रौपदी मदालसा, जीजी बाई, लक्ष्मी बाई जैसी देवियाँ मौजूद थीं, उसी समय यह देश नर रत्नों की खान था। विद्वानों, शूरवीरों, त्यागियों, योगियों, वैज्ञानिकों और महापुरुषों से भारत भूमि भरी पूरी थी, इसका एकमात्र रहस्य यही था कि यहाँ का स्त्री समाज पुरुषों के ही समकक्ष था। उसे मनुष्योचित सुविधा, सम्मान, स्वाधीनता, एवं शिक्षा प्राप्त थी। यह उपयोगी पद्धति आज नष्ट हो गई है और साथ ही हमारे वास्तविक विकास की रीढ़ भी टूट गई है।
आज पुरुष का पाप और अन्याय उसके सिर पर शैतान की तरह से सवार है और वह-नारी में अपने पाप की प्रतिच्छाया देखकर भयभीत होता है। कंस ने अनेक बालकों का वध किया था, उसे स्वप्न में भी बालक के रूप में अपनी मृत्यु दिखाई पड़ती थी गिर पड़ता था। आज पुरुष समाज की वही मनोदशा है वह स्त्री के सतीत्व के प्रति अविश्वासी हो रहा है, उसे भय है कि स्त्रियों का स्वास्थ विकास होने दिया गया तो वे पतिव्रता न रहेंगी। अपनी माता, पुत्री बहिन और वधू के प्रति इतना अविश्वास करना एक अत्यन्त ही निकृष्ट एवं पतित मनोदशा का चिन्ह है। इस पतित, स्थिति में पुरुष का मन इसलिए जा पहुँचा है कि वह पिछले दिनों स्त्रियों कि प्रति बहुत ही अनुदार, स्वार्थपूर्ण एवं अनीति-युक्त व्यवहार करता रहा है, उसे भय है कि कहीं उलट कर उसका प्रतिशोध न लिया जाय, इसलिए वह उसके स्वस्थ विकास का अवसर देने से डरता है और मध्यकालीन बर्बर परम्पराओं की दुहाई देकर, अवाँछनीय रूढ़ियों को धर्म मान कर नारी को विवश एवं हीन दशा में ही रखने का समर्थन करता है। हमारा यह भय ही हमें खा रहा है। अविकसित नारी नर के गले में भारी पत्थर की तरह दबी हुई है। कठोर बन्धनों में जकड़ कर वह उसे वशवर्ती तो रख लेता है पर उस स्वर्गीय गृहस्थ जीवन से सर्वथा वंचित रह जाता है जो सुविकसित एवं स्वच्छ नरक बने हुए हैं, पशु जीवन की अभ्यस्त नारी परिवार के लिए उसका लाखवाँ भाग भी सुखदायक कार्य नहीं कर पाती जितना कि वह सुविकसित मनुष्य होने की स्थिति में कर सकती थी।
हमारे राष्ट्र और समाज को दीन दशा से निकाल कर ऊँचा उठाने के लिए नारी समाज का समुचित विकास होना अत्यन्त आवश्यक है इसे अब हर कोई विचारवान मनुष्य मानने लगा है। स्त्री शिक्षा, पदों निवारण, सामाजिक कार्यों में नारी का सहयोग आदि की दिशा में कुछ कार्य होने भी लगा है, परन्तु खेद है कि “सिर मुँड़ाते ही ओले पड़ने”की कहावत चरितार्थ होने के अवसर भी सामने आने लगे हैं। पाश्चात्य देशों में स्त्री स्वातंत्र्य से जिस प्रकार रूप की प्यास और वासना की अग्नि भड़की है वैसे ही यहाँ भी, उसका अनुकरण हो रहा है इस खतरे से ही हमें बचना होगा।
नारी समस्या-पुरुष के जीवन की आधी समस्या है। यह समस्या इन दिनों बहुत बुरी तरह उलझी हुई है। उसे सुलझाने के प्रयत्नों में सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि नारी के प्रति नर का दृष्टिकोण उदार हो? यदि यह दृष्टिकोण सही हो-तो नारी जागरण का महान कार्य सहज ही हो सकता है और वे सब खतरे निर्मूल हो सकते हैं जो इस मार्ग में दिखाई पड़ रहे हैं।
“नारी के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण का निर्माण-गायत्री आन्दोलन का एक प्रमुख आधार है” जब यह बात आचार्य जी ने मुझे बताई तो मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।
ईश्वर को माता के रूप में पूज कर-मातृ जाति के प्रति सहज ही श्रेष्ठता की, पवित्रता की, भावनाओं का आविर्भाव होता है। कन्याओं को भोजन, कराना उनका पूजन करना, उनके चरण स्पर्श करना; ब्राह्मण की तरह उनका मान करना यह पद्धति नारी की पवित्रता एवं पूज्यतत्व को हृदयंगम कराती है। गायत्री साधना में ब्रह्मचर्य का प्रधान प्रतिबन्ध है। जिसके कारण वासना के प्रति घृणा की स्वाभाविक वृति पैदा होती है। गायत्री के 28 अक्षरों की शिक्षाओं में भी नारी के प्रति पूज्य एवं पवित्र बुद्धि रखने के आदेश हैं। गायत्री शब्द स्त्री लिंग है, ज्ञान विज्ञान का, आध्यात्मिकता का मूल स्त्रोत नारी को मान लेने से नर के मन में आज की संकीर्णता नहीं रह सकती वरन् उसकी भावना में जब इस महा मन्त्र के प्रताप से थोड़ा भी परिवर्तन होगा तो वह नारी जाति को वासना विकार, अविश्वास और हीनता की दृष्टि से नहीं वरन् उसे पवित्रता, महानता एवं दैवी तत्वों के प्रतिनिधि के रूप में देखेगा। वह दृष्टिकोण ही एक महान सामाजिक क्रान्ति का आधार हो सकता है और इस आधार पर विकसित हुआ नारी समाज ही मानव जीवन की अपूर्णताओं को पूर्ण कर सकता है।
नारी के मन में स्वभावतः नर के प्रति पूज्य बुद्धि है। नर के मन में भी यही बुद्धि जागृत हो जाय तो उभय पक्ष से एक दूसरे के प्रति एक दिव्य आदान प्रदान का सिलसिला शुरू हो सकता है। उस वातावरण में विकसित हुई स्त्री भी पुरुष के कन्धे से कन्धा लगाकर एक सच्चे दाम्पत्ति जीवन का निर्माण करने में योग दे सकती है। तब हमारा समाज पच्छिम की तरह वासना का गुलाम न होगा और न आज की तरह अंधतमिस्रा में पड़ा सड़ेगा। गायत्री आन्दोलन नारी उत्थान की, उसके स्वस्थ विकास की एक महान् भूमिका है। इस महान् आन्दोलन के द्वारा हमारे परिवारों में स्वर्ग स्थापित हो सकता है, हमारी आगामी पीढ़ियां उच्च हो सकती हैं, हमारे राष्ट्र का अर्ध मूर्छित अंग सक्रिय एवं सजीव हो सकता है।
नर में लड़ाकूपन एवं पुरुषार्थ अधिक है और नारी में स्वभावतः सेवा, सहृदयता, सात्विकता और संयम-अधिक है। आज-संसार में नर की शक्तियों का विकास है फलस्वरूप युद्ध, कलह, शोषण, संघर्ष, छल और स्वार्थ का सर्वत्र बोलबाला है। जब प्रसुप्त नारी तत्व जागृत होगा और समाज में उसका भी उचित आदान प्रदान और आदर होगा तो उसके साथ-साथ उन विचारों, योजनाओं और कार्यों का भी विस्तार होगा जो सुहृदय, सेवा और सात्विकता से परिपूर्ण होंगे। नर के एकाँगी विकास ने संसार के लिए आज एक मुसीबत खड़ी कर दी है, इसका हल नारीत्व के मृदुल भावों के विकास ही है। हत्यारा पुरुष अणुबम लेकर मनुष्यता को भून डालने को उन्मत्त हो रहा है। ममतामयी मातृजाति में यदि थोड़ी शक्ति हो तो वह अपने समस्त बालकों को अंचल में छुपाने और उनके सिसकते प्राणों को बचाने के लिये शैतान के हाथ में लपलपाते हुए छुरे को रोकने के लिये अवश्य ही कुछ करेगी और नष्ट होने वाली सभ्यता बच जायगी। समाज निर्माण में भी जब स्त्रियों का समुचित हाथ होगा तो बर्बरता के स्थान पर स्नेह, सेवा और सौजन्य का वातावरण बनेगा।
गायत्री आन्दोलन की वास्तविकता जानने के लिए मैं आचार्य जी के निकट रहा हूँ। मुझे पूरा और पक्का विश्वास हो गया है कि यह युग परिवर्तन का एक महान् अभियान है जिसमें हमारे राष्ट्र और समाज का सुन्दर भविष्य झिलमिला रहा है। इस आन्दोलन को सफल बनाने में मैंने अपने आप को समर्पण कर दिया है-मेरी अन्तरात्मा निरन्तर यह कहती है कि यह मानुषी प्रयत्न नहीं वरन् कोई दैवी आयोजन है, जिसका संचालन किन्हीं व्यक्तियों को निर्मित बनाकर उस अदृश्य शक्ति द्वारा ही किया जा रहा है।
(श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती, उत्तरकाशी)
गायत्री की उपासना एक बड़ा ही महत्वपूर्ण आध्यात्मिक व्यायाम है। जैसे शारीरिक व्यायाम से शरीर का बल बढ़ता है वैसे ही उपासना रूपी आध्यात्मिक व्यायाम से आत्मिक बल बढ़ता है। जैसे रुपए की शक्ति से बाजार में बिकने वाली चाहे जिस वस्तु को खरीद सकते हैं वैसे ही आत्मिक शक्ति के बदले में भी नाना प्रकार की साँसारिक एवं आत्मिक समृद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
“व्यायाम से शक्ति प्राप्त होती है” यह एक पूर्ण सत्य और पूर्ण निश्चित सिद्धान्त है। तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि इतने व्यायाम का परिणाम निश्चय यही हो जायेगा। कोई व्यक्ति यह पूछे कि मैं अपनी छाती की चौड़ाई बढ़ाना चाहता हूँ इसके लिए मुझे क्या व्यायाम करना पड़ेगा तो अनुभवी व्यायाम विशारद उसे उसका तरीका बता सकता है पर वह व्यक्ति यह चाहे कि छाती की इतनी इंच चौड़ाई, इतने दिनों में निश्चित रूप से बढ़ जायेगी इसकी गारण्टी दी जा सके तो वैसा नहीं हो सकता। क्योंकि यद्यपि निर्विवाद रूप से व्यायाम करना एक अच्छा स्वास्थ्य सुधारक उपाय है पर उसके साथ ही भोजन, दिनचर्या, ब्रह्मचर्य, मानसिक सन्तुलन, जल वायु, अवस्था, ऋतु, स्वभाव आदि भी बहुत बड़े कारण हैं जिनसे स्वास्थ्य का सम्बन्ध है। फिर माता-पिता के रज वीर्य का सूक्ष्म प्रभाव एवं शरीर का ढांचा भी अपना विशेष महत्व रखता है। यह सब परिस्थितियाँ यदि अनुकूल हों तो वह व्यायाम बहुत भारी लाभ थोड़े ही समय में दिखा देता है और परिणाम ऐसा आश्चर्यजनक निकलता है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। इस व्यायाम के करने वाले ने जितने इंच छाती की चौड़ाई बढ़ाने के लिए व्यायाम किया था उससे भी अधिक बढ़ जाती है और वह व्यायाम करने वाला व्यायाम की महत्ता का गान करते-करते नहीं थकता।
इसके विपरीत एक दूसरा व्यक्ति व्यायाम करता है। उसकी भी इच्छा छाती की चौड़ाई बढ़ाने की है। वह भी उसी रीति से वही व्यायाम आरम्भ करता है परन्तु उसके माता-पिता का रज वीर्य निर्बल है। बाल्यावस्था में विवाह हो जाने से कच्चे वीर्य का क्षरण होने से देह खोखला हो गई है। निर्धनता के कारण पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं है, जो पेशा उसका है, उसमें बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है, कर्जदारों की चिन्ता से हर वक्त परेशान रहता है, रहने का मकान गन्दे मुहल्ले में है, तमाखू शराब आदि के व्यसन लगे हुए हैं। इन सब कठिनाइयों के रहते हुए वह कुछ दिन व्यायाम करता है पर कोई विशेष लाभ दिखाई नहीं पड़ता। उसका व्यायाम की महत्ता पर से विश्वास उठ जाता है और थोड़े ही दिनों में उसे छोड़ बैठता है। उसका कहना है कि व्यायाम की प्रशंसा करना बिल्कुल झूठी बात है मैंने कसरत करने में इतना समय बर्बाद किया पर मेरी छाती एक इंच भी चौड़ी न हुई? मैं कैसे मानूँ कि किसी दूसरे की छाती इसी व्यायाम से चौड़ी हुई होगी। कभी-कभी उसकी निराशा छिद्रान्वेषी भी हो जाती है। वह सोचता है कि उस्ताद ने मुझे वह विधि नहीं बताई है जो अमुक लाभ उठाने वाले को बताई थी। कभी कभी वह सोचता है मेरा भाग्य ही विपरीत है मुझे किसी उपाय से भी लाभ न होगा। मेरे लिए कोई प्रयत्न करना बेकार है।
ऐसे ही उदाहरण आध्यात्मिक व्यायाम में—गायत्री उपासना में भी उपस्थित होते हैं। कई व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों के संचित शुभ संस्कारों और वर्तमान जीवन में उपयुक्त मनोभूमि रहने के कारण बहुत शीघ्र उन्नति कर जाते हैं और उन्हें आशाजनक आत्मिक उत्कर्ष एवं आश्चर्यजनक साँसारिक लाभ मिलते हैं परन्तु दूसरा व्यक्ति जिसके संचित कर्म, एकत्रित संस्कार और वर्तमान जीवन के उपयुक्त अवसर प्राप्त नहीं हैं, वे उसी साधना को उसी रीति से करते हुए भी कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे लोग खिन्न होते हैं और साधना के प्रति अश्रद्धा भी प्रकट करते हैं। वे बहुत शीघ्र तात्कालिक सफलता असफलता के आधार पर अपना निर्णय दे देते हैं परन्तु उन सूक्ष्म बातों के अन्तर पर दृष्टिपात नहीं करते जो इन सफलता और असफलता की तह में काम करती हैं।
कोई पहलवान बने या न बनें,किसी की छाती की चौड़ाई बढ़े या न बढ़े यह सर्वमान्य सिद्धान्त सदा ही स्थिर रहेगा कि “व्यायाम स्वास्थ्य के लिए एक उत्तम साधन है।” गायत्री उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। साधक का अपनी साँसारिक या आत्मिक उन्नति का मनोवाँछित लक्ष पूर्ण हो चाहे न हो पर इस महान साधना की उपयोगिता वैसे ही रहेगी जैसी अनादि काल से असंख्य प्रयोगों के बाद महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। जिन्हें लाभ नहीं हुआ है उन्हें व्यायाम को कोसने से काम न चलेगा, उन्हें वे कारण ढूँढ़ निकालने होंगे जो असफलता के कारण हैं। वे सब कारण यदि दूर न हो सकते हों तो उस अच्छे व्यायाम से यदि उन्नति कुछ कम होती हो तो उससे भी सन्तोष करके धीरे धीरे अधिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
घी और दूध निर्विवाद रूप से शरीर के लिए उत्तम पदार्थ हैं, उनसे देह का पोषण ही होता है परन्तु कोई व्यक्ति घी दूध सेवन करते हुए भी बीमार पड़ जाय तो उसका यह कहना कि “घी दूध खाना बिलकुल बेकार है इससे मेरी तन्दुरुस्ती बढ़ाना तो दूर उलटा बीमार हो गया।” ऐसे लोगों का निर्णय बहुत ही अदूरदर्शिता पूर्ण निर्णय है, इस दोषारोपण से उन्हें कुछ लाभ न होगा, बीमारी से उठने पर वह इन उपयोगी पदार्थों से घृणा करने और छोड़ बैठने के फलस्वरूप स्वास्थ्य सुधार में और भी देर होगी। इस व्यक्ति के लिए बुद्धिमानी का मार्ग यह था कि वह बीमारी के उन कारणों को ढूँढ़ता जिनसे कि घी दूध का सेवन ही व्यर्थ नहीं गया, बीमारी भी गले पड़ी। वे कारण वस्तुतः दूसरे ही होंगे और थोड़ी सी गम्भीरता पूर्वक दृष्टि डालने से वे आसानी से ढूँढ़े जा सकते हैं। उन्हें दूर करना ही जल्दी अच्छे होने और भविष्य में बीमार न पड़ने का मार्ग है।
कोई चिकित्सा पद्धति अनेक रोगियों को निरोग बनाती है पर यदि किसी एक रोगी को उससे लाभ नहीं होता तो रोगी को उस चिकित्सा पद्धति को कोसने की अपेक्षा उन कारणों को ढूँढ़ना चाहिए जिससे उसके ऊपर की जाने वाली चिकित्सा सफल नहीं हो रही है।
व्यापार से धन कमाया जाता है यह सर्व विदित तथ्य है। किसी को व्यापार में घाटा हो तो उसे व्यापार विज्ञान की निंदा करने से कुछ लाभ न होगा। उसे उन बातों को ढूँढ़ना होगा जिनके कारण उसे घाटा उठाना पड़ा। इस सुधार से ही वह भविष्य में घाटे से बच सकता है और लाभ उठा सकता है।
एक ही स्कूल में एक ही शिक्षक से एक ही पाठ्यक्रम में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से कुछ फेल होते हैं, कुछ तीसरी श्रेणी में-कुछ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं और किन्हीं को वजीफा एवं पुरस्कार मिलता है। ऐसे विषम परिणाम देखकर फेल होने वाले विद्यार्थी को स्कूल, शिक्षक या शिक्षा पद्धति को दोष देना पर्याप्त नहीं वरन् आत्म निरीक्षण करके उन उपायों को अपनाना चाहिए जिनसे असफलता का खतरा भविष्य में सामने न आये।
उत्तम मार्ग के लिए बढ़ाया हुआ कदम हमेशा उत्तम ही परिणाम उत्पन्न करता है। किसी मनुष्य ने अमुक पहलवान को पछाड़ने के लिए पहलवानी आरंभ की और कदाचित वह उस पहलवान को पछाड़ न सके तो भी इतने दिन पहलवानी करने के फलस्वरूप उसे अनेक लाभ मिलेंगे। सुडौल शरीर, तेजस्वी चेहरा, निरोगता, दीर्घ जीवन, अधिक श्रम करने की शक्ति, प्रभावशाली व्यक्तित्व, साँसारिक सुखों व भोगों की क्षमता, बलवान संतान, शत्रुओं पर विजय, आदि अनेकों लाभ ऐसे हैं जो पहलवान को पछाड़ने की असफलता मिलने पर भी होते हैं। इसी प्रकार गायत्री उपासना से यदि मनोवाँछित सीमा तक लाभ न भी हो तो भी स्वभाव में, चरित्र में, विचारों में, स्वास्थ्य में, बुद्धि में जो भारी परिवर्तन होते हैं उनके कारण जीवन का विकास सुख शान्ति की दिशा में ही होता है। यह विकास एक दिन पूर्णावस्था तक पहुँच सकता है।
मैं गायत्री की निष्काम उपासना पर विश्वास करता हूँ। क्योंकि उस दिव्य शक्ति से अधिक लाभ उठाने का यही मार्ग सर्वोत्तम है। जब साधक का मन कामना के स्वार्थ और लोभ में लगा रहता है तो वह दिव्य शक्ति को अपना मतलब निकालने का एक जरिया मात्र समझता है। ऐसी क्षुद्र मनोभूमि को घटघट वासिनी माता भली प्रकार जानती है, और उसे कुत्ते को टुकड़ा फेंक देने की भाँति कभी कुछ दे देती है। परन्तु जो साधक स्वार्थ की कामनाओं से दूर रह कर सच्चे हृदय से भक्ति एवं आत्म समर्पण करता है,उसे वे अपनी गोद में ले कर वह वस्तु देती हैं जिसे संसार में कोई व्यक्ति नहीं दे सकता।
गायत्री उपासना एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक व्यायाम है। उसके लाभ महान् हैं और सुनिश्चित हैं। परन्तु उसे प्राप्त करने के लिए साधक में आवश्यक धैर्य, विवेक और, भावना का होना आवश्यक है। जिनमें यह तीनों बातें होती हैं वे माता के दरबार से कदापि खाली हाथ नहीं लौटते।
माधवाचार्य जी की वाणी सिद्धि
(श्री शंकर दत्त अवस्थी वैद्य पूर्नियाँ)
आयुर्वेद में निदान विषयक एक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ”माधव निदान” है। इसकी रचना ऐसी सुन्दर ढंग से हुई है कि उसे रोग,निदान सम्बन्धी सर्वोत्तम पुस्तक कहा जा सकता है। इस ग्रन्थ के निर्माता श्री माधवाचार्य जी महाराज की शिक्षा बहुत साधारण थी, पर उनकी प्रवृत्ति गायत्री उपासना में बहुत थी।
उनने एक सच्चे नौष्टिक ब्राह्मण की भाँति बड़ी तत्परता पूर्वक गायत्री की उपासना की। वृन्दावन में रहकर उन्होंने 13 वर्ष तक निरन्तर गायत्री पुरश्चरण किये। इतना करने पर भी उन्होंने अपने में कोई विशेषता दिखाई न दी और न कोई अन्य प्रकार का लाभ दिखाई दिया। इतने लम्बे समय तक निरन्तर इतना परिश्रम करना और फिर उसका कुछ भी लाभ दिखाई न देना,सचमुच ही एक बड़ी निराशा की बात थी, माधवाचार्य जी को भी निराश हुई और वे उस साधना को तथा वृन्दावन को छोड़कर काशी चले गये।
काशी में वे बहुत दिन तक इधर उधर भटकते रहे। निराशा और खिन्नता के कारण उनका मन किसी बात में न लगता था। एक दिन मणिकर्णिका घाट पर एक अवधूत से उनकी भेंट हुई। घनिष्ठता बढ़ी। माधवाचार्य जी ने अपने मन की सारी व्यथा उनसे कह सुनाई! अवधूत ताँत्रिक थे उन्होंने कहा तुम भैरव की उपासना करो। भैरव उपासना का सारा विधान उन्हें समझा दिया।
एक वर्ष तक भैरव का अनुष्ठान करने पर उनकी साधना सफल हुई। जब वे साधना कर रहे थे तब छत के पीछे भाग में से आवाज आई की “मैं प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो सो मुझ से माँग ले।”
माधवाचार्य जी बड़े धैर्यवान् और गम्भीर व्यक्ति थे, वे अविचल भाव से अपने साधन में लगे रहे कुछ न बोले। दूसरी बार वही आवाज फिर आई ‘कि जो माँगना हो सो माँग ले’ वे फिर भी चुप रहे तो तीसरी बार फिर वही आवाज आई।
माधवाचार्य जी ने कहा - मैं आपके दर्शन चाहता हूँ। आप कृपा कर पीछे से बोलने की अपेक्षा मेरे सम्मुख आकर अपने असली रूप में दर्शन दीजिए। “इस पर छत में से पीछे की ओर से फिर आवाज आई कि मैं तुम्हारे सामने नहीं आ सकता। क्योंकि तुमने गायत्री के इतने पुरश्चरण किये हैं। मुझ भैरव की इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं गायत्री उपासक के सम्मुख प्रकट हो सकूँ। इस पर आचार्य जी ने कहा कि जब आपमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि गायत्री उपासक के सम्मुख प्रकट हो सकें तो आप के वरदान भी अल्प सामर्थ्य के ही होंगे। इसलिए मैं आपसे कुछ नहीं चाहता। यदि आप प्रसन्न हैं तो केवल यह बता दीजिए कि मेरी गायत्री साधना क्यों निष्फल गई और उनकी सिद्धि प्राप्त करने का क्या मार्ग है।
भैरव ने छत के पिछले भाग में से फिर कहा कि तुम्हारे पूर्व जन्मों के पापों का नाश करने में तेरह वर्षों की साधना लग गई, अभी एक वर्ष और ऐसी ही साधना करो तो तुम्हारे पूर्व जन्मों के सब दुष्कृत नष्ट हो जायेंगे और जब तुम्हारी आत्मा पूर्ण निष्पाप हो जायेगी तब तुम्हें गायत्री का ब्रह्म तेज प्राप्त होगा। वृन्दावन जाकर फिर एक वर्ष साधना करने पर तुम्हें सिद्धि मिलेगी। इतना कहकर भैरव अन्तर्ध्यान हो गये।
वे वृन्दावन फिर लौट आये और उन्होंने उसी स्थान पर फिर साधना प्रारम्भ कर दी जहाँ पर पहले 13 वर्ष तक की थी। एक वर्ष के बाद उन्हें गायत्री का साक्षात्कार हुआ और उन्हें वाणी सिद्ध हो गई। भगवती से उन्होंने प्रार्थना की कि मैं ऐसा एक ग्रन्थ रचना चाहता हूँ जिससे संसार की बहुत भलाई हो और मेरा यश रहे। उनकी इच्छा पूर्ण हुई। साधारण शिक्षा होते हुए भी उन्होंने माधव निदान जैसे ग्रन्थ की रचना कर डाली।
गायत्री सतोगुणी शक्ति है। इसका सबसे पहला प्रभाव मनुष्य के जन्म जन्मान्तरों से संचित पापों और कुसंस्कारों को नष्ट करने में लगता है। जब वे नष्ट हो जाते हैं और आत्मा निर्मल बन जाती है तब कोई प्रत्यक्ष लाभ दिखाई पड़ता है। जिस स्थान में गहरी खाई खुदी हुई है उस स्थान पर यदि सुन्दर महल बनाना है तो सबसे पहले उस खाई को पाटने में शक्ति लगानी पड़ेगी। उसके पट जाने पर जब भूमि समतल हो जाती है तब वहाँ महल खड़ा करने में देर नहीं लगती। जो लोग पूर्व संचित संस्कारों को नष्ट हुए बिना थोड़ी सी साधना से तुरन्त लाभ चाहते हैं उन्हें माधवाचार्य की आरंभिक असफलता की भाँति निराश होना पड़ता है। परन्तु जो लोग धैर्यपूर्वक इस महाशक्ति की आराधना करते रहते हैं अन्त में उन्हें उसका मधुर फल अवश्य प्राप्त होता है।
अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सूचना :-
अखंड ज्योति के पाठकों को खेद के साथ सूचित करना पड़ता है कि जनवरी से लेकर मई 52 तक का अखण्ड ज्योति का अब एक भी अंक स्टॉक में नहीं बचा है। जिनका इनमें से कोई अंक गुम गया हो वे अब उसे दूसरा मँगाने के लिए न लिखें। अंकों के बिलकुल समाप्त हो जाने के कारण अब भेजने में विवशता है।
(कुँ. वीरेन्द्र सिंह जी, कोटा)
श्री स्वामी मगनानन्द जी महाराज छोटी अवस्था में ही घर बार छोड़ कर विरक्त हो गये थे। कोटा से खतौली और ग्वालियर के श्यौपुर कस्बे में 12-14 वर्ष विराजे और यहीं उन्होंने शरीर छोड़ा। खातौली से 7 मील की दूरी पर शंकर जी का स्थान है। वहाँ पर धौकड़े में वृक्षों की भरमार है इसी कारण वह स्थान धौकड़ेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है यह स्थान बिलकुल निर्जन है तथा प्रायः शेर आदि जंगली जानवर यहाँ तथा इसके आस पास पड़े रहते हैं।
स्वामी जी कहा करते थे कि यह स्थान सिद्ध पीठ है इसलिए मैं नासिक छोड़कर यहाँ आया हूँ। आज भी इस इलाके के 40 वर्ष की अवस्था से ऊपर के किसी भी व्यक्ति से स्वामी जी की चर्चा की जाये तो वह उनका नाम सुनते ही गदगद हो जाता है। यह सभी को विदित है कि उन्होंने गायत्री की उपासना करके सिद्धावस्था को प्राप्त किया था। उनकी सिद्धियों के बारे में वहाँ के सत्संग प्रेमी सज्जनों के मुख से अनेक गाथाएं सुनी जा सकती हैं।
ठिकाना खातौली के एक सज्जन के ठिकाने के विरुद्ध जमीन का मामला चल रहा था। मुकदमे के कारण ठिकाने की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी। कोटा के पॉलिटिकल एजेन्ट का दफ्तर भरतपुर होता था। एजेन्ट ने उसका अपमान करके दफ्तर से बाहर निकल वा दिया था।
इन ठिकाने दार महोदय को भरतपुर में घूमते-2 इन स्वामी जी महाराज के दर्शन हुए। उन्हें दुखी देखकर स्वामी जी ने पूछा क्या भूखे हो। उनके हाँ कहने पर उन्होंने धूनी में से निकाल कर एक अखरोट दिया। इसी में उनकी क्षुधा पूर्ण रूप से तृप्त हो गई। इसके बाद उन्होंने अपनी दुख भरी गाथा स्वामी जी को सुनाई। सुनकर स्वामी ने गम्भीरता तथा उदासीनता के साथ कहा कि कल स्वयं एजेन्ट तुझे बुलाकर अनुकूल फैसला कर लेगा। सचमुच ऐसा ही हुआ। एजेन्ट ने दूसरे दिन उन ठिकानेदार को स्वयं बुलाया और उनकी जब्त की हुई भूमि की वापसी का हुक्म दे दिया।
लगभग एक साल स्वामी जी विचरण करते हुए उधर से निकले तो ठिकानेदार ने बड़े आग्रहपूर्वक उधर रख लिया और आजीवन उनकी सेवा की। आज भी उनके घर पर महाराज की धूनी की अंशभूत अखंड अग्नि जलती रहती है वह कभी बुझने नहीं दी जाती।
एक दूसरी घटना यह है कि मेरे नाना जी जो बड़े ही शुद्ध हृदय तथा साधु सेवी थे, महाराज की सेवा में प्रायः रहा करते थे। एक दिन नाना जी महाराज जी के पास जा रहे थे जो चुपके से मामा जी (जो उस समय पाँच साल के थे, उनके पीछे हो लिए नाना जी को इसका कुछ ध्यान न था। रास्ते में नदी थी। नाना जी तो नदी पार कर गये पर मामा जी जब उसे पार करने लगे तो बीच में ही डूब गये। मामा जी अब भी सुनाया करते हैं कि जब वे डूब गये तो उन्हें ऐसा लगा कि कोई महात्मा हाथ पकड़ कर उन्हें बाहर निकाल रहे हैं। वे निकल आये और बच गये।
नाना जी जब स्वामी जी के पास पहुँचे तो उन्होंने बहुत डाँटा कि “बच्चों को साथ क्यों लाते हो?” नानाजी ने कहा कि मैं तो नहीं लाया। थोड़ी देर में मामा जी आ गये और डूबने का वृत्तांत उन्होंने सुनाया। वास्तव में स्वामी जी के सूक्ष्म शरीर ने ही उन्हें डूबने से बचाया था।
इस प्रकार की अनेक घटनाएं हैं जिनका उल्लेख इस छोटे लेख में होना संभव नहीं। गायत्री उपासना की महिमा अपार है उससे गृहस्थ और महात्मा सभी उच्च स्थिति पर पहुँच सकते हैं।
(श्री कविराज वासुदेव कृष्ण जोशी काव्यतीर्थ चूरु,)
विक्रमी सं. 1914 में विद्वद्वर पं. भूधरमल जी जोशी के घर नन्द किशोर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ये अपने पिता की आज्ञा अक्षरशः पालन करते रहते थे इसलिए पिता ने इनका नाम “हुक्मी चन्द” के नाम से बदल दिया। श्री हुक्मी चन्द जी की माता का देहान्त इनकी तीस साल की अवस्था में ही हो गया था। उप नयन संस्कार के बाद सारे शास्त्रों का अध्ययन किया ये तीनों काल संध्या किया करते थे। किसी कार्य वश ये कलकत्ता गये तब 1957 में लौट कर रतन गढ़ (राजस्थान) में आ गये। फिर एक शहर से बाहर की धर्मशाला में ठहर कर गायत्री जपने लगे। गायत्री जाप करते हुए उन्होंने गायत्री के तीन पुरश्चरण सम्पन्न किये। बाद में 1966 में काशी आ गये। अन्त तक काशी में ही रहे और वचन सिद्ध हो गये। बहुत से सेठ साहूकार इनके भक्त हो गये।
माँ गायत्री की कृपा से अपनी मृत्यु का पता उन्हें एक मास पहले चल गया। उन्होंने ऐसा जाना तो उस दिन से अन्न छोड़ दिया और अल्प दूध का आहार करने लगे। जब मृत्यु में 18 रोज अवशेष रहे तो दूध भी छोड़ दिया और जल पर रहने लगे। जब केवल 4 दिन रह गये तो जल भी छोड़ दिया। पूरे एक मास बाद ब्राह्मणों द्वारा वेद पाठ विष्णु सहस्रनाम आदि सुनते हुए, गायत्री माँ का जप करते हुए 1982 विक्रमी आषाढ़ मास की पंचमी अभिजित मुहूर्त में क्षण भंगुर शरीर छोड़ते हुए गायत्री लोक को प्राप्त हो गये। इनके आशीर्वाद से अत्यन्त साधारण श्रेणी के कई सेठ लक्षाधीश हो रहे हैं। इनके एक सुयोग्य पुत्र विद्वद्वरत्न पं. वैद्य नाथ जी जोशी ने इनकी ही प्रेरणा से काशी में एक “मारवाड़ संस्कृत पाठशाला” के नाम से छोटी सी संस्था गरीब छात्रों के संस्कृत पढ़ने के लिए खुलवाई थी जो आज मारवाड़ी संस्कृत कालेज के नाम से काशी में बड़ा मशहूर हो रहा है। इनके दो पुत्र पं. शिवलाल जी जोशी कथावाचक शिरोमणि,तथा पं. रामेश्वर जी जोशी कर्मकाण्ड शिरोमणि आजकल रतन गढ़ में बड़े ठाठ बाठ से रहते है। इनके अनेक पुत्र पौत्र अच्छे-2 सरकारी पदों पर अवस्थित हैं, गायत्री तपश्चर्या का यह अनुभव महाराज के पुत्रवर पूज्य पं. शिवलाल जी जोशी से प्राप्त हुआ है। इस विषय का सारा वर्णन श्लोक बद्ध देखना हो तो “मंगल महर्षि चरित काव्यंम्” नामक पुस्तक के पंच दश सर्ग में देख सकते हैं जिसे काशी के कवि चक्रवर्ती पं. देवी प्रसाद जी शुक्ल ने कविता मय किया है।
(पं. यमुना शंकर त्रिपाठी शास्त्री, उज्जैन)
लगभग 50 वर्ष पहले की एक सत्य घटना है। बूँदी (राजस्थान) राज्य में ‘खटकड़’ नामक एक प्राचीन ग्राम है जिसके अत्यन्त समीप से अरावली पहाड़ की श्रेणी चली गई है। इसी पर्वत श्रेणी के बीच में एक नदी बहती है। दृश्य अत्यन्त रमणीय एवं शान्त है। यहीं पर उस समय पं. कन्हैयालाल जी ब्रह्मचारी नामक एक महात्मा रहते थे, वे गायत्री के परम उपासक थे, उन्होंने जीवन भर अनेकों पुरश्चरण किये थे, समस्त ऋद्धि-सिद्धियाँ उनके करतलगत थीं, जिनका वर्णन इस लेख में असम्भव है। उस प्रान्त के सभी सज्जन उनके प्रभाव से परिचित थे।
6 मास पूर्व ही अपने निर्वाण काल को तत्वज्ञान से जानकर वे उन ग्रामों में जाकर अपने परिचित स्नेही व्यक्तियों से मिले एवं अत्यन्त प्रसन्न व गम्भीर वाणी में उनसे अन्तिम विदाई ली और कहाँ ‘बंधुओं! अब हम जाते हैं, अन्तिम नमस्कार’। निर्माण के दिन ‘केशोराय पाटन’ नामक स्थान (जो कि चम्बल नदी के किनारे पर कोटा शहर से 8 मील दूर है एवं नदी का प्रवाह पूर्व दिशा में होने से गंगा के तुल्य पवित्र तीर्थ माना जाता है तथा प्रतिवर्ष कार्तिक की पूर्णिमा को मेला लगता है) पर सहस्रों ग्रामीणजन उपस्थित हुए। पहले गाय के पवित्र गोबर से भूमि लिपाई गई। स्नान, सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म से निवृत्त हो ब्रह्मचारी जी लिप्त भूमि पर कुशासन बिछाकर पद्मासन से बैठ गये। उनके आदेशानुसार उनके सिर पर एक नवीन श्वेत वस्त्र दूर से ही ओढ़ा दिया गया। ब्रह्मचारी जी ने कहा कि जब तक मेरा शरीर अपने आप गिर न जाये तब तक कोई स्पर्श न करे। सब लोगों को इस प्रकार समझाकर ब्रह्मचारी जी ने प्राणायाम द्वारा जीव को सहस्रार कमल में चढ़ा लिया। करीब एक पहर तक सब लोग शान्त व आश्चर्य पूर्वक देखते रहें। इसके उपरान्त एकाएक उनके सिर से तोप छूटने के समान ध्वनि हुई और ब्रह्मचारी जी का शरीर भूमि पर गिर पड़ा। ततः उनका शरीर नदी के बीचों बीच छोड़ दिया गया। स्थान-स्थान पर उनके निर्वाण के उपलक्ष में ब्रह्मभोज हुए। आज भी उस प्रान्त के वृद्ध व युवक लोग उनके तप के प्रभाव से परिचित हैं।
(श्री गौरीशंकर वशिष्ठ, रंगपर)
महात्मा शुभानन्द जी एक अच्छे बंगाली महात्मा थे। उनका स्वर्गवास अभी तीन वर्ष पूर्व 65 वर्ष की अवस्था में हुआ है। अंग्रेजी, संस्कृत बंगला भाषा का उनको बहुत ऊँचा ज्ञान था। वेदों का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। जब कभी वे हमारे नगर में आते थे तब उनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। शिक्षित वर्ग के लोग उनका बहुत मान करते थे।
उनमें थोड़ी सी पागलपन की झलक थी। वे बहुधा बैठे-बैठे अचानक चौक पड़ते थे और चारों और घूर-घूर कर इस प्रकार देखते थे मानों कोई उनकी कुछ वस्तु उठा कर भाग गया हो और वे उसे ढूंढ़ रहे हों। कभी-कभी उनकी आकृति हो जाती थी मानों कोई खतरा उनके ऊपर टूटने वाला है और वे उसका बचाव करने की तैयारी कर रहे हों।
साधारणतया उनकी हालत ठीक रहती थी, पर कभी-कभी ऐसी स्थिति हो जाती थी। जब वे ठीक होते थे तब उनके ज्ञान,वैराग्य,अनुभव और अध्ययन से परिपूर्ण प्रवचन सुनकर लोगों को बड़ा आनंद प्राप्त होता था, पर जब उनके पागलपन का दौरा आता था तब सभी को बड़ा आश्चर्य और दुःख होता था।
पूछने पर वे अपने मानसिक विक्षेप का कारण इस प्रकार बताया करते थे-
“मैं विद्याध्ययन के उपरान्त आर्य समाज का उपदेशक बना। बहुत जगह भ्रमण किया एक स्थान पर एक महात्मा से उनकी भेंट हुई। उनमें मैंने अनेक अध्यात्मिक विशेषताएँ देखी , इसलिये कुछ समय उनके साथ ठहर गया। मेरे ऊपर उनका बहुत प्रभाव पड़ा। उनसे शिक्षा ली। उपदेश का काम छोड़ दिया और गुरुजी के बताये हुए विधान से एक निर्जन स्थान पर रह कर गायत्री पुरश्चरण करने लगा।”
“गुरुजी ने योग और तन्त्र के निश्चित विधान का गायत्री पुरश्चरण बताया था। वह तीन वर्ष में पूरा होने को था। ढाई वर्ष बड़ी अच्छी तरह व्यतीत हो गये। अन्तिम छः महीने में मेरे सामने विलक्षण-विलक्षण दृश्य आने लगे। लोभ और भय दिखाने वाले तरह तरह के अवसर सामने आये। मुझे पहले ही सचेत कर दिया गया था कि साधना के अन्त में परीक्षा होती है, तरह-तरह के लोभ,आकर्षण ,भय और उपद्रव सामने आते हैं, साधक उनसे बचा रहे तब ही उसकी तपस्या पूर्ण हो सकती है।”
“अनेक अवसर तो मैंने धीरता पूर्वक टाल दिये। पर एक बार को ऐसा हुआ कि मैं रात्रि को 11॥ बजे के करीब अपनी कुटी में बैठा साधना कर रहा था द्वार पर कोई स्त्री घूमती हुई मालूम पड़ी। जब बहुत देर हो गई और वह स्त्री वहीं घूमती रही तो मैं झोंपड़ी से बाहर निकला, चन्द्रमा अस्त होने को था। चाँदनी में अत्यन्त ही सुन्दर 19-20 वर्ष की एक युवती दिखाई दी। मैंने पूछा तू कौन है ? यहाँ क्यों आई है? तो उसने बताया कि मैं पड़ोस के गाँव की रहने वाली हूँ। अपने भाई के पास दूसरे गाँव में जा रही हूँ। रास्ता भूल जाने से इधर आ निकली हूँ। अँधेरे में डर रही हूँ और रात्रि यही कुटी पर बिताना चाहती हूँ।”
“कुटी घने जंगल में थी, वहाँ जंगली जानवर और कभी चोर डाकू उधर से निकला करते थे। इसलिए मैंने उचित समझा कि रात को इसे कुटी में ठहर जाने दिया जाये वह पास में पड़ी चटाई पर लेट गई। मैं बैठा-बैठा जप कर रहा था पर उसके सुन्दर शरीर पर नजर थी। वासना जगी। वह मेरी ओर तिरछी नजर करके मुस्कुरा रही थी। परिणाम यह हुआ कि मैंने उससे विषय किया। इसके बाद वह स्त्री उठी, उसने मेरी पीठ में एक जोर की लात मारी मैं चक्कर खाकर गिर पड़ा। वह तूफान की तरह उड़ी और मेरे झोंपड़े को तोड़ मरोड़ कर एक फर्लांग दूर पर फेंक गई।”
“मैं रात भर बेहोश पड़ा रहा। दूसरे दिन होश आया। ज्वर चढ़ रहा था। पटक लगने से घुटने बुरी तरह छिल गये थे। दो दाँत टूट गये थे और मुँह से खून निकल रहा था। गुरुजी को जब यह समाचार मिला तो आये और मुझे उठवाकर ले गये। उनके उपचार से मैं एक महीने में अच्छा हुआ। प्राण तो बच गये पर तभी से मेरा दिमाग फिर गया है। मुझे बार-बार डर और खतरा दिखाई पड़ता है उसी के कारण मैं चौंक पड़ता हूँ।”
अपना यह अनुभव सुनाते हुए वे यह शिक्षा दिया करते थे कि सब साधारण के लिये गायत्री दक्षिण मार्गी, वेदोक्त साधना ही उपयोगी होती है। ताँत्रोक्त मार्ग से साधना करके कुछ लाभ और चमत्कार तो अधिक मिल सकते हैं पर वह मार्ग खतरे का भी बहुत है। ताँत्रिकी साधना में जो भयंकर प्राण घातक दृश्य दिखाई पड़ते हैं उनमें हिम्मत बाँधे रहना और प्रलोभन तथा आकर्षण के समय विचलित न होना साधारण काम नहीं है। थोड़ी सी भी चूक होने पर इस मार्ग के पथिक के प्राणों पर बन आती है। इसलिए तन्त्र की अपेक्षा योग मार्ग ही सरल और उत्तम है, उन्नति धीरे-धीरे होती है पर जो होती है उसमें पूर्ण निर्भयता है और लाभ भी असंदिग्ध है।
(पं. मधूसूदनाचार्य खाण्डल, इनद्रगढ़)
लगभग 125 वर्ष पहले की पुरानी बात है। जयपुर प्रान्त के बूढ़ा देवल ग्राम में दधीचि वंश के दाहिवाँ ब्राह्मणों में श्री विष्णुदास ब्रह्मचारी नामक एक महान् गायत्री उपासक का उद्भव हुआ था।
आठ वर्ष की आयु में ही वे गायत्री उपासना में प्रवृत्त हो गये। कुछ बड़ी आयु होने पर माता जी उन्हें धन उपार्जन के लिए प्रेरणा देने लगी ताकि निर्वाह की कठिनाई दूर हो। ब्रह्मचारी जी ने जगत जननी गायत्री से प्रार्थना की। आज्ञा हुई कि अमुक स्थान पर भूमि में धन गढ़ा है। उसमें से अपनी आवश्यकतानुसार निकाल लो। ब्रह्मचारी जी ने उसमें से आवश्यकतानुसार धन लेकर अपने आसन के नीचे रख लेते थे और माता जी की आवश्यकतानुसार उसमें से दे देते थे। माता जी को सन्देह हुआ कि यह करता तो कुछ नहीं है पर धन कहाँ से ले आता है। इस पर एक दिन आसन उठा कर देख लिया। ब्रह्मचारी जी को जब यह बात मालूम हुई कि माता जी ने गायत्री द्वारा धन प्राप्त होने की बात जान ली है और कइयों से कह दी है तो उन्हें बहुत दुख हुआ और वे पुष्कर जाकर गायत्री का विशेष जप करने में प्रवृत्त हो गये।
पुष्कर में एक कुटी में उन्होंने पुरश्चरण आरम्भ किया। 24-24 लक्ष के तीन पुरश्चरण किए पर उन्हें कोई विशेषता दृष्टि गोचर नहीं हुई। उन्होंने समझा मेरा तप व्यर्थ गया और वे दुखी रहने लगे। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके पीछे तीन बड़ी-बड़ी चिताएँ जल रही हैं। आकाशवाणी हुई कि “जन्म जन्मान्तरों में तुमने तीन ब्रह्म हत्याएँ की थीं वे इस तप के प्रभाव से निर्मूल हुई हैं। आगे बढ़ो, सिद्धि होगी।”
अब वे नये उत्साह के साथ पुनः गायत्री तप में संलग्न हुए। इस बार उनका तप तेज इतना प्रचण्ड हुआ कि सर्वत्र उनकी कीर्ति फैल गई। बड़े बड़े राजा उनकी कुटी की धूल को मस्तक पर रखने लगे। जयपुर और जोधपुर के महाराज उदयपुर ने अपने यहाँ चलने के लिए उनसे अत्यधिक आग्रह किया। ब्रह्मचारी जी ने कहा-हमारे पुरश्चरणों की पूर्णाहुति ब्रह्मभोज,दक्षिणा आदि नहीं हुई है। इसलिये हम कहीं नहीं जा सकते। महाराज ने स्वयं सब पूरा करने का वचन दिया और उन्हें उदयपुर ले गये। उदयपुर में उनका शाही स्वागत किया गया और पुरश्चरण की पूर्णाहुति के समस्त कार्य सानन्द सम्पन्न कराये गये। ब्रह्मचारी जी की आज्ञा से महाराज ने और भी अनेक धार्मिक कार्य पूर्ण किये।
महाराज के कल्याण के लिए उनके दोष दुरितों के निवारण के लिए ब्रह्मचारी जी ने “काल पुरुष का दान” नामक एक उल्लेखनीय कृत्य कराया। स्वर्ण आदि अष्ट धातुओं और नवरत्नों से निर्मित एक कालपुरुष की मूर्ति बनाई गई जिसमें भूत शुद्धि और प्राण प्रतिष्ठा अत्यन्त ही शुद्ध शास्त्रोक्त रीति से हुई। कहते हैं कि जो कोई ब्राह्मण कालपुरुष की उस मूर्ति का दान लेने आता था, वह मूर्ति उसे स्पष्ट रूप से दान न लेने का संकेत करती थी, फलस्वरूप कोई उसे लेने को तैयार न हुआ।
अन्त में एक ऐसा ब्राह्मण तैयार हुआ जिसका वंश कई पीड़ियों से गायत्री का परम उपासक था। उसने दान लिया तो तत्क्षण उसका शरीर काला पड़ गया। उसने उस मूर्ति का सारा धन तथा अपनी निजी सारी सम्पत्ति दान कर दी। जिससे उसका शरीर का कालापन तो चला गया, पर जिस हथेली पर दान का जल लिया था वह हथेली काली ही रही जोकि उसकी तीन गायत्री पुरश्चरण करने पर दूर हुई। महाराज के लाभ के लिए इस ब्राह्मण ने इतना कष्ट सहा था उसके लिए महाराज सदैव उसके कृतज्ञ रहे और उसके परिवार की सदैव सहायता करते रहे।
ब्रह्मचारी जी के तप के प्रभाव से अनेकों, के जो असंख्य प्रकार के कल्याण हुए उनकी आशा बहुत विस्तृत हैं, ब्राह्मणों की ब्रह्मनिष्ठ एवं गायत्री उपासक बनाने के लिए वे सदैव बहुत प्रयत्न करते रहे उनके प्रभाव और उपदेश से अनेकों ब्राह्मणों ने गायत्री की शरण ली थी और परम कल्याण का लाभ किया था।
यदि शुभ कार्य करे तो उसे फिर फिर करें। उसमें रत होवे। पुण्य का संचय सुख का कारण होता है।
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जो शुद्ध निर्मल दोष रहित मनुष्य को दोषी ठहराता है तो उस दोषी ठहराने वाले मूर्ख को ही पाप लगता है जैसे हवा की दिशा के विरुद्ध फेंकी हुई धूल फेंकने वाले पर पड़ती है।
(श्री शिव भगवान प्रसाद अग्निहोत्री, पठानान पुरवा)
हमारे नाना सूरज बली जी गायत्री के अनन्य उपासक थे। उनका अधिकाँश समय पूजा पाठ में ही व्यतीत होता था। उनके द्वारा यदि किसी रोगी को कोई औषधि दे दी जाती तो उसका असर तुरन्त होता था। उनको सभी लोग बड़ी आदर की दृष्टि से देखते थे।
बिजुआ रियासत के राजा साहब इनको बहुत मानते थे। प्रति वर्ष उनके कृष्ण उत्सव पर राजा साहब अपने अहलकारों के साथ स्वयं आते थे। राजा साहब ने उन्हें बहुत सी भूमि दान दी थी जिसके उत्तराधिकारी होने के नाते आज कल हम लोग काबिज हैं। नाना जी के घर अतिथियों और अभ्यागतों की सदा भीड़ लगी रहती थीं, उनके द्वार पर लोग अनेक प्रयोजन लेकर आते थे और गायत्री माता की कृपा से सभी लोग संतुष्ट होकर जाते थे।
गायत्री साधना के फलस्वरूप नाना जी में बहुत ब्रह्मतेज पैदा हो गया था जो उनके चेहरे पर निरंतर चमकता रहता था। उन्हें सताने या छेड़ने की किसी की हिम्मत न होती थी जो ऐसा दुस्साहस करता था उसे उसका समुचित परिणाम भी मिल जाता था।
एक बार इनके एक पण्डिताई के गाँव बोकरिहा के भूधर जी जोशी ने अपने यहाँ श्रीमद्भागवत् की कथा कहने का नाना जी को आमन्त्रण दिया। उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया परन्तु पीछे भूधर जी बदल गये और उन्होंने एक दूसरे पण्डित को कथा कहने बुला लिया। नाना जी को यह बात बुरी लगी। उनका अपमान भूधर जी तथा उनके भाई के लिए बहुत ही हानिकारक हुआ। कथा के यज्ञ के समय अचानक ऐसा अन्धड़ आया कि जलता हुआ हवन ऊपर आकाश में सैकड़ों गज ऊँचा उड़ गया और उसी समय से वे पागल हो गये। किसी को यह समझने में देर न लगी कि यह सूरज बली जी के कोप का फल है। उनके अपराध के लिए बहुत क्षमा माँगी ,उन्हें संतुष्ट किया, उनके शिष्य बने तब, कहीं जाकर उनका पागलपन दूर हुआ।
एक बार एक लोधा नाना जी का शिष्य बना। उसके घर में कोई और न था अकेला होने के कारण उन्हीं के यहाँ रहने लगा। उन्हीं का काम करता और रोटी खाता। एक दिन उसकी नीयत बिगड़ी और नाना जी का, सोना चुरा लिया। जब कोई अपनी चोरी मंजूर करने को तैयार न हुआ तो वे एक पीपल के नीचे कुछ विशेष साधन करने चले गये। इधर वह लोधा जब थाली में भोजन करने बैठा तो हमारी मौसी ने देखा कि वह जो ग्रास भोजन का उठाता है वह काँप कर थाली में बार-बार गिर जाता है। उसके हाथ बिलकुल निकम्मे हो गये थे मानों लकवा मार गया हो। लोधा घबरा गया और उसने चुराया हुआ सोना लाकर चुपचाप वापिस कर दिया।
ऐसी-ऐसी उनके जीवन की अनेकों घटनाएँ हैं। करीब 40 वर्ष पूर्व 80 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ था। जो कोई उनके समीप रहा उसे भली भाँति यह विश्वास हो गया कि गायत्री माता में तथा उसके भक्त में कितनी शक्ति होती है।
हम लोग भी नाना जी का अनुगमन करके गायत्री उपासना में लगे हुए हैं। जितना कुछ बन पड़ता है माता की सेवा-पूजा करते हैं। अपने थोड़े से प्रयत्न को देखते हुए, उससे प्राप्त होने वाले सत्परिणामों की मात्रा बहुत भारी है। जब हम स्वल्प साधना से इतना लाभ उठाते हैं तो नाना जी की तपस्या को देखते हुए उनका इतना प्रताप उचित ही था।
(श्री स्वामी योगानन्द संन्यासी, प्याना)
परम तत्व की जिज्ञासा और आत्म साक्षात्कार की अभिलाषा से प्रेरित होकर मैंने भोग का मार्ग छोड़ा और त्याग का अपनाया। संन्यास लेकर मैं सदा उस उपयुक्त साधना पथ की तलाश में अनेक तीर्थों और क्षेत्रों में भ्रमण करता रहा। उत्तराखण्ड का हिमालय प्रदेश भी मैंने छाना और कितने ही महात्माओं के लँगोट धोये पर अभीष्ट शान्ति न मिली। जिसने जो बताया वही किया अनेक प्रकार के साधन, अभ्यास, जप, प्राणायाम, पाठ आदि करता रहा पर कहीं से भी आत्मा में प्रकाश का दर्शन न हुआ।
इसी भ्रमण में कही पर मैंने अखण्ड ज्योति के गायत्री साहित्य की बड़ी प्रशंसा सुनी। एक जगह वह पुस्तकें मिल भी गई। मैंने उन्हें पढ़ा। पढ़ने के साथ साथ ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान होता था कि यह किसी अनुभवी साधक की लिखी हुई हैं। मेरी आत्मा ने इन पुस्तकों को ही गुरु मान लिया और उनके बताये हुए मार्ग से गायत्री उपासना प्रारम्भ कर दी।
साधना का सबसे पहला प्रभाव यह हुआ कि मन में जो नाना प्रकार की चिर संचित वासनाएँ और दुर्भावनाएँ छिपी पड़ी थीं और जो मुझे समय-समय पर परेशान करती थीं, उनका शमन हो गया। चित्त में शान्ति, स्थिरता और सात्विकता दिन-दिन बढ़ने लगी। मेरा शरीर बहुधा अस्वस्थ रहा करता था वह भी बिना किसी दवा दारु के अपने आप स्वस्थ हो गया।
मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा मानो गायत्री माता मेरी रक्षा के लिए सदैव प्रस्तुत रहती है और अपने अन्दर कोई दैवी शक्ति बढ़ रही है। इसका एक बार बड़ा ही आश्चर्यजनक अनुभव मुझे हुआ।
मैं भ्रमण करता हुआ एक बार बेहरा नामक ग्राम में पहुँचा। वहाँ ग्रामवासियों को प्रोत्साहित करके गायत्री हवन कराया। उस गाँव में मुसलमानों की संख्या अधिक थी जो बहुत अनुदार और झगड़ालू थे। अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण हमारे हवन में उन्होंने ईंट फेंकी और तरह तरह के विघ्न फैलाये। मेरे विरोध करने पर वे मुझे मारने को तैयार हो गये। मैं वहाँ कई दिन ठहरा वे रोज ही कोई न कोई शरारत मेरे लिये तैयार कर लेते। एक दिन तो उन्होंने रात को मेरे एकान्त स्थान में हमला करके मुझे मार डालने का षड़यन्त्र तक बना लिया।
रात को जब मैं सो रहा था तो गुरुदेव सामने खड़े दिखाई दिये उन्होंने हाथ पकड़ कर उठाया और कहा-देखो तुम्हारे मारने के लिये भीड़ सामने खड़ी है। मैं उठ बैठा। देखा तो कुछ ही दूर कई आदमी मुझे मारने को सुसज्जित होकर आ रहे हैं। अब मैं क्या करता। मैंने गायत्री मन्त्र का अग्नेयास्त्र प्रयोग किया! मैंने उस विद्या को सीखा तो था पर प्रयोग केवल उसी दिन किया था। उन आततायियों पर जब मैंने मन्त्र प्रहार किया तो उनका शरीर बेतरह जलने लगा और वे चीखते हुए गाँव को भाग गये। उनकी चिल्लाहट सुन कर लोग जाग आये। वे कहते थे कि-”हम जले जा रहे हैं हमारे प्राण बचाओ।” उनके इस कथन पर किसी को विश्वास न होता था क्योंकि वहाँ अग्नि कहीं दिखाई नहीं पड़ती थी। लोगों ने कोई उन्माद समझ कर उन चिल्लाने वालों को पकड़ा। परन्तु पकड़ने वालों को ऐसा लगा मानों हमने जलते तवे को छू लिया। वे उन्हें छोड़ कर अलग हट गये।
यह अजब तमाशा था। सारा गाँव जमा हो गया। पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि स्वामी जी को हम मारने गये थे वहाँ से वह व्यथा हमसे लगी है। अब सब लोग उन्हें लेकर मेरे पास आये। मैंने शान्ति पाठ किया तो उनके शरीर का दावानल शान्त हो गया। चूँकि मेरी इस चमत्कारी शक्ति की प्रसिद्धि रही थी और लोग मुझसे लाभ उठाने के लिए भेंट पूजा लेकर घेरने लगे थे, इसलिए दूसरे दिन ही मैं वहाँ से चल दिया।
उपरोक्त प्रयोग में एक उल्लेखनीय बात यह हुई कि ठीक विधि न मालूम होने से गायत्री का आग्नेयास्त्र प्रयोग करने के कारण मेरा मुँह और हाथ भी जल गया और लगभग 15 दिन में ठीक हुआ।
उस दिन से मेरी श्रद्धा गायत्री पर अत्यधिक सुदृढ़ हो गई है और उसी तपस्या में लगा हुआ हूँ। मेरी सलाह से गायत्री की उपासना करके और भी कई लोग लाभ उठा चुके हैं। सीकरी गाँव में एक ब्राह्मण के कोई सन्तान न थी उसने गायत्री की साधना की। उसके एक पुत्र हुआ जो अब बड़ा ही होनहार और सुन्दर दिखाई पड़ता है। एक रागी का 6 मास का पुराना आधाशीशी का सिर दर्द दूर हो गया। नगरिया गाँव का एक लड़का जो वर्ष में तीन महीने भी स्कूल नहीं गया था और उसके पास होने की कोई आशा न थी गायत्री जप करने से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। इस प्रकार छोटे मोटे लाभ अनेक लोग उठाते रहते हैं। परन्तु गायत्री उपासना का वास्तविक लाभ सतोगुण की वृद्धि और आत्म कल्याण ही है। इसी मार्ग पर मैं स्वयं प्रवृत्त हूँ और इसी भावना से गायत्री की उपासना करने की मैं अन्य लोगों को सलाह देता रहता हूँ।
(श्री स्वामी ब्रह्मर्षिदास जी उदासीन)
भारतवर्ष के धार्मिक एवं संस्कृत साहित्य से परिचय रखने वाला कोई व्यक्ति ऐसा न होगा जिसने श्री. विद्यारण्य स्वामी का नाम न सुना हो। वे विद्या के भण्डार-सरस्वती के वरद पुत्र, महान तपस्वी और अद्भुत प्रतिभावान् थे। संस्कृत वाङ्मय में इतनी अधिक एवं उनकी इतनी उच्चकोटि की कृतियाँ है कि उन्हें इस युग के व्यास कहा जाता है। उनकी प्रतिभा का इतना विकास गायत्री उपासना द्वारा ही हुआ था।
श्री स्वामी विद्यारण्य जी दक्षिण भारत के एक सम्भ्रान्त ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। इस परिवार के सभी बालक बड़े बुद्धिमान और कर्त्तव्य शाली हुए हैं। स्वामी जी ने बाल्यकाल विद्याध्ययन में व्यतीत करके ज्यों−ही युवावस्था में प्रवेश किया त्यों−ही उन्होंने गायत्री महामन्त्र के द्वारा तपस्या आरम्भ कर दी। और यह तपस्या पूरे 14 पुरश्चरणों तक चलती रही। इसकी पूर्णाहुति करने के उपरान्त भी जीवन मुक्त स्थिति में रहकर वे संसार का कल्याण करते रहे।
स्वामी जी जब अपने साधना काल में संलग्न थे तब दो राजपुत्र उनकी शरण में पहुँचे। उनका राज्य छिन गया था और मारे-मारे फिर रहे थे, स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त करके उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य फिर प्राप्त कर लिया और जीवन भर स्वामी जी की शिक्षाओं एवं आदर्शों पर ही राज्य चलाते रहे। जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास जी महाराज का अप्रत्यक्ष प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी ने आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए राज्य स्थापना की थी वैसे ही स्वामी विद्यारण्य जी की कृपा और प्रेरणा से यह दो राजपुत्र विजय नगर राज्य की स्थापना में समर्थ हुए।
स्वामी जी को तप करते हुए दीर्घ काल व्यतीत हो गया, चौबीस पुरश्चरण पूरे हो गये, फिर भी उन्हें गायत्री माता का साक्षात्कार न हुआ। अपनी इस असफलता पर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और निराश होकर उन्होंने संन्यास धारण कर लिया। संन्यास धारण करने के उपरान्त ही उनका नाम स्वामी विद्यारण्य प्रसिद्ध हुआ।
जब वे संन्यासी हो गये तब एक दिन गायत्री माता ने उन्हें दर्शन दिया। इस पर स्वामी जी को बड़ी प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भी। स्वामी जी ने माता से पूछा कि “मैंने 24 पुरश्चरण आपके दर्शनों की इच्छा से किये तब आपने मुझे दर्शन नहीं दिया और अब मैं सब प्रकार की, आपके दर्शन की भी कामना छोड़ कर जब संन्यासी हो गया हूँ तब आप अनायास ही दर्शन देने क्यों पधारी हैं?” इस पर माता ने उत्तर दिया कि—”इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि जब तक पूर्व जन्मों के सब पाप नष्ट न हो जायं तब तक साधक के वे दिव्य नेत्र नहीं खुलते जिनमें मेरा साक्षात्कार होता है। तुम्हारे 24 पुरश्चरणों से पूर्व जन्मों के 24 महा पातक नष्ट हुए हैं और अब तुम इस योग्य हुए हो कि मेरे दर्शन प्राप्त कर सको। दूसरा कारण यह है कि जब तक साधक के मन में कामनाएँ भरी रहती हैं तब तक वह मुझसे सच्चा प्रेम नहीं कर सकता। कामना से और इष्ट देव से साथ साथ प्यार करते रहना सम्भव नहीं है। अधूरे प्रेम से मैं प्रसन्न नहीं होती। तुम्हारे मन में यद्यपि वह इच्छा सतोगुणी थी, फिर भी थी तो कामना ही। अब जब कि तुमने सब कामना त्याग कर मेरा आश्रय लिया है और मेरी सच्ची भक्ति में प्रवृत्त हुए हो तो फिर मेरा वात्सल्य रुक न सका और मैं तुम्हें दर्शन देने को दौड़ी आई हूँ।” माता के यह वचन सुन कर स्वामी विद्यारण्य जी के आनन्द की सीमा न रही और वे आनन्द सागर में मग्न होकर प्रेमाश्रुओं से माता के चरण धोने लगे।
गायत्री माता ने स्वामी जी से कहा—”कुछ वरदान माँगो।” स्वामी जी ने कहा-’जिस निष्काम भावना के कारण आपके दर्शन मिले है उसे मैं किसी भी वरदान के बदले में नहीं खो सकता। मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं।” तब माता ने अपनी ओर से उनसे कहा—“तुम संसार के कल्याण के लिये सद्ग्रंथों की रचना करो। जैसे गणेश जी की कृपा से महर्षि व्यास अठारह पुराण लिखने में समर्थ हुए वैसे ही मैं तुम्हारी लेखनी पर बैठकर संसार के कल्याण करने वाले ग्रन्थों की रचना करूंगी।” स्वामी जी ने माता का आदेश शिरोधार्य किया और वे सद्ग्रंथों की रचना में लग गये।
स्वामी विद्यारण्य जी की प्रसिद्ध रचनाएँ यह हैं—(1) ऋग्वेद भाष्य, (2) यजुर्वेद भाष्य, (3) सामवेद भाष्य, (4) अथर्ववेद, भाष्य (5) चारों वेदों के शतपथ, ऐतरेय, तेतिरीय, ताण्य आदि ब्राह्मण ग्रंथों के भाष्य, (6) दशोपनिषद् दीपिका, (7) जैमनीय न्याय माला विस्तर, (8) अनुभूति प्रकाश, (9) ब्रह्म गीता, (10) सर्वदर्शन संग्रह, (11) माधवीय धातु वृत्ति, (12) शंकर दिग्विजय, (13) काल निर्माण, (14) श्री विद्या महार्णव तन्त्र, (15) पंचदर्शी आदि आदि। इसके अतिरिक्त भी उनके अनेक ग्रन्थ हैं जिसमें से कई तो उपलब्ध भी नहीं होते। उनकी अगाध विद्वता और महान आध्यात्मिक अनुभूति में गायत्री माता की कृपा का प्रत्यक्ष प्रकाश परिलक्षित होता है।
स्वामी जी के जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाएँ हैं। पर उन चमत्कारों में सबसे बड़ा चमत्कार उनका ब्रह्म बल ही था जिसके द्वारा वे अपना और संसार के असंख्य प्राणियों का आत्म कल्याण करने में समर्थ हो सके और शृंगेरी पीठ के अधिपति प्रतिष्ठित हुये।
—सभी दंड से डरते हैं सभी को मृत्यु से डर लगता है और सभी को जीवन प्रिय है, इसलिये सभी को अपना जैसा समझो, न किसी को मारो न किसी को मरवाओ।
—पानी ले जाने वाले पानी ले जाते हैं। बाण चलाने वाले बाण बनाते हैं। बढ़ई लकड़ी बनाते हैं और सुब्रती जन अपना दमन करते हैं।
—यह सब कुछ जल रहा है पर तुम्हें आनन्द और हँसी सूझ रही है? अन्धकार से घिरे रह कर भी तुम प्रदीप को क्यों नहीं खोजते?
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(श्री रंगनाथ नाना जी बराडे, फैजपुर)
मेरे बीस वर्षीय पुत्र शान्ताराम की मृत्यु हो जाने के उपरान्त चित्त की स्थिति बड़ी अस्थिर रहने लगी थी, साँसारिक कार्यों से उदासीनता हो रही थी, पर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए कोई उपयुक्त पथ प्रदर्शन नहीं मिल रहा है। इसी विषम स्थिति में मेरा संपर्क अखण्ड ज्योति से हुआ, व्यावहारिक पथ प्रदर्शन से साधन में मेरी रुचि, श्रद्धा और अन्तः प्रेरणा बढ़ी और में बताये हुए मार्ग से उपासना करने लगा।
योग का विषय बड़ा गम्भीर है। उसमें अनेक बार बड़े बड़े विद्वानों की गम्य नहीं पहुँचती; और योगी यती तक चक्कर में पड़ जाते हैं, फिर मेरे जैसे अल्प बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए वह और भी कठिन है। परन्तु प्रभु की कृपा का महत्व बहुत है। उनकी कृपा से लघुता में भी परमगति का प्रसाद मिल सकता है।
मैंने गायत्री माता का अंचल पकड़ा। अखंडित अविरल धारा में जप करने से चैतन्य शक्ति का अनुभव हुआ। उस चैतन्य शक्ति के आँगन में खेलते रहने से अनेकों समझ में न आने वाली बातें स्वयमेव समझ में आ रही हैं। नील वर्ण की धारणा का दृढ़ निश्चय कर लेने से मनुष्य उस शक्ति का आकर्षण कर प्रकर्षक कर सकता है इस तथ्य की जानकारी प्राप्त हो रही है।
प्रत्यक्षतः योगिक क्रियाओं का साधन करने में सामान्य मनुष्य की शक्ति बहुत कम पड़ती है। साधना समर में विजय प्राप्त करना तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है। इस मार्ग का ठीक पथ प्रदर्शन प्राप्त न हो तो भयंकर परिणाम होने की आशंका रहती है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इन गुप्त रहस्यों का पथ प्रदर्शन, गायत्री उपासक के लिये बहुत सरलता से उपलब्ध हो जाता है।
इन थोड़े ही दिनों के साधन में नासाग्र दृष्टि, भू मध्य दृष्टि, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, आज्ञाचक्र, ज्ञानेन्द्रियों के उद्गम केन्द्र, सहस्रदल कमल, अनाहत ध्वनि, आदि का साधन किस प्रकार होना चाहिए, उसमें जो कड़ी बाधाएं हैं और उनका सुलझाव किस प्रकार हो सकता है, यह सब बातें इतनी स्पष्ट दृष्टि गोचर होती है मानों कोई दिव्य पुरुष एक एक करके भली प्रकार समझा रहा हो और उनको क्रियात्मक रूप से करके दिखा रहा हो।
में सुनता रहता हूँ कि गायत्री उपासना से मनुष्य को आत्मिक उन्नति में बहुत शीघ्र सफलता मिलती है। अब उसका कारण भी मेरी समझ में आ गया। अन्य मार्गों से साधना करने में सही पथ प्रदर्शन ढूँढ़ने और प्राप्त करने में ही बहुत भारी शक्ति व्यय करनी पड़ती है पर गायत्री उपासना में वह सब अनायास ही प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि इस मार्ग के पथिक, अन्य मार्गों की अपेक्षा अधिक शीघ्र निर्धारित लक्ष तक पहुँच जाते हैं।
प्राप्त हुए पथ प्रदर्शन पर यदि इस शरीर से अमल बन पड़ा तो यह असम्भव नहीं कि मुझ जैसा तुच्छ व्यक्ति भी उस दिव्य महान तत्व का भागीदार बन सके।
—इन्द्रिय सुख को ढूँढ़ते हुए मैं अनेक जन्मों तक लगातार संसार में दौड़ता रहा, बार-बार जन्म लेना दुख है। हे अज्ञान तू-दिखाई दे गया। अब फिर तू नहीं फंसा सकेगा। तेरी सब कड़ियाँ टूट गई, घर का शिखर बिखर गया। चित्त संस्कार हित हो गया। तृष्णाओं का क्षय हो गया।
(पं. प्रशादीलाल शर्मा दिनेश, कराहल)
संवत् 2007 की बात है। मैं बीमार पड़ा। बीमारी भी बड़ी विचित्र थी। छाती और कंठ में कफ बे-हिसाब जमा हो गया जिससे साँस लेने में भारी कठिनाई होती थी और हर घड़ी दम घुटने जैसी पीड़ा से छटपटाना पड़ता था। किसी की भी औषधि काम नहीं दे रही थी। पन्द्रह दिन तो मैं बेहोश पड़ा रहा। थोड़ी चेतना हुई तो जीवन भार मालूम पड़ने लगा। बीमारी की भयंकरता तो धीरे धीरे घटी पर कष्ट और बेचैनी के मारे मैं जिन्दगी से ऊब रहा था और सोचता था कि प्रभु किसी प्रकार जीवन लीला समाप्त कर दें तो मुझे शान्ति मिले।
प्राण त्यागने का विचार लगातार कई दिन तक मस्तिष्क में चक्कर लगाता रहा। सोचा कि उत्तराखण्ड की पुण्य भूमि में चलकर प्राण त्यागे जायं। घर वालों के बहुत मना करने पर भी मैं हरिद्वार के लिए चल पड़ा। किसी प्रकार हरिद्वार पहुँचा। आगे के लिए कार्य क्रम यह बनाया कि धीरे धीरे उत्तर दिशा की ओर चलते चला जाय और हर घड़ी गायत्री की जप करते रहा जाय। अत्यन्त दुर्बल और अशक्त शरीर, कफ की बीमारी, शीत प्रदेश की ओर यात्रा, पहाड़ पर चढ़ाई, दवा का त्याग, भोजन की अव्यवस्था यह सब प्रत्यक्ष ही मरने का आयोजन था। इसी योजना को लेकर मैं धीरे-धीरे गिरता पड़ता आगे बढ़ने लगा। सो जाने के अतिरिक्त जागृत अवस्था में हर घड़ी गायत्री मन्त्र मुख और मन में रहता।
जिस उद्देश्य के लिए यह यात्रा चलाई गई थी-उसे माता ने मंजूर नहीं किया। उनकी करुणा दूसरे रूप में प्रकट हुई, मैं धीरे-धीरे ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला होते हुए बद्रीनारायण तक जा पहुँचा और साथ ही हर मंजिल पर बीमारी को भी पीछे छोड़ता गया बद्रीनारायण, केदारनाथ पहुँचते पहुँचते मैं इतना स्वस्थ हो गया कि शायद ही नव यौवन आयु में वैसी तन्दुरुस्ती कभी रही हो।
यात्रा करके घर लौटा तो लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। जब गया था तो मृत्यु के मुख में प्रवेश की तैयारी करके गया था। पर लौटा तो तन्दुरुस्ती की निराली ही छटा छटक रही थी। माता की कृपा से क्या नहीं मिल सकता है? सब कुछ मिल सकता है-भक्ति भी और मुक्ति भी।
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(प्राणाचार्य वैद्य मनीराम शर्मा श्री गंगा नगर)
आज अखंड ज्योति के पाठकों के सम्मुख अपने जीवन की एक नितान्त सत्य घटना, इच्छा न होते हुए भी आचार्य जी के आग्रह के कारण उपस्थित कर रहा हूँ।
मैं अपने अतीत जीवन की धुँधली सी छाया में अपने गुरुदेव के वे वाक्य आज भी सुन रहा हूँ-”बेटा! गायत्री में अचिन्त्य शक्तियाँ हैं जो तर्क गम्य नहीं, इसके सिद्ध होने पर सब सिद्धियाँ संभव हैं।”
विक्रमी संवत् 1983 में मैं चुहड़ीवाला धन्ना जि. फोरेजपुर (पंजाब) में अध्यापन कार्य करता था। सनातन धर्म सभा के तत्वावधान में हमारा स्कूल बड़ी अच्छी तरह चल रहा था। इसी बीच में एक प्रति द्वन्द्वी संस्था पैदा हुई और उसने भी अपना एक स्कूल खोल दिया। नये उत्साह में नया प्रवाह अधिक होता है, लोग उसकी ओर अधिक आकर्षित हुए। उन दिनों पंजाब में कचहरी की भाषा उर्दू थी। अतः उर्दू का उधर बहुत प्रचार था। प्रतिद्वंद्वी स्कूल में उर्दू की पढ़ाई का अच्छा प्रबन्ध कर दिया। जनता को उर्दू की आवश्यकता थी। अधिकाँश विद्यार्थी उसी ओर खिसक गये।
हमारा धार्मिक स्कूल था, इसीलिए उसमें हिन्दी ही पढ़ाई जाती थी। मैं उर्दू जानता न था। आर्थिक स्थिति भी अच्छी न थी जिससे उर्दू का मास्टर रखा जाता। निदान ऐसा प्रतीत होने लगा कि हमारा स्कूल बन्द हो जायगा। इस समस्या पर विचार किया गया पर कोई हल न निकल सका।
स्मरण रहे इससे पूर्व में गुरुदेव के आदेशानुसार गायत्री का एक अनुष्ठान कर चुका था। जिसका पूर्ण वर्णन न आवश्यक है न उचित। एक रात्रि को मैं किंकर्तव्य विमूढ़ होकर अपनी दयनीय दशा पर आँसू बहाये माँ के चरणों पर वे ही अश्रु बिन्दु चढ़ाकर सो गया।
प्रातः काल 4 बजे का समय था। स्वप्न में मुझे एक ज्योतिर्मय स्वरूप नजर आया। उसने चमकते हुए एक एक पत्र पर उर्दू के कुछ अक्षर लिखकर दिखाये, स्वप्न में ही मैंने कहा मैं नहीं जानता यह सब क्या है। इस पर वे अक्षर बदले और ऊपर हिन्दी और नीचे उर्दू के अक्षर हो गये। मेरे नेत्र खुले। जाग्रत में भी वे अक्षर मुझे दीख से रहे रहे थे। मैंने शीघ्र ही उन्हें एक पत्र पर लिख डाला जो आज भी मेरी डायरी में अंकित हैं।
मैंने स्कूल में जाकर एक उर्दू का “कायदा” मँगाया और सारा पढ़ डाला। उसी दिन पहली और दूसरी पुस्तक भी पढ़ डाली और तीन दिन के बाद हमने यह घोषणा कर दी कि आठवीं कक्षा तक हमारे स्कूल में पढ़ाई की जायगी। वैसा ही हुआ भी दूसरे स्कूल की अपेक्षा हम अधिक अच्छी तरह उर्दू पढ़ाने लगे और हमारा स्कूल पूर्ववत् अच्छी स्थिति में चलने लगा।
इस घटना को हमारे साथी बिल्कुल न समझ सके कि उर्दू से बिल्कुल अनभिज्ञ व्यक्ति अचानक कैसे अध्यापक बन गया। इसकी सत्यता में यदि किसी को संदेह हो तो आज भी चुहड़ी वाला जाकर इस बात की सच्चाई की जाँच कर सकते हैं। हमारे स्कूल के विद्यार्थी दूसरे स्कूल के मुकाबले में सदा ही अच्छे नम्बरों से पास होते थे। भले ही किसी को यह साधारण सी बात प्रतीत हो पर मेरे लिए यह महान आश्चर्य की घटना है। इसी प्रकार की अन्य कई घटना मेरे जीवन में हुई हैं।
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(श्री वीरेन्द्र स्वरूप भटनागर बरेली)
मेरे जीवन में अभी हाल में एक ऐसी घटना घटी है जिसका स्मरण करने मात्र से मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
मार्च सन् 51 में मेरी दाहिनी हसली के ऊपर एक फोड़ा उठा। बरेली, डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में मुझे भरती किया गया। अनेक इंजेक्शनों तथा दवाओं के बावजूद फोड़ा बढ़ता गया। दो महीने मेरी हालत बहुत ही नाजुक हो गई। ता. 14 ई 51 को फोड़ा फटा। काफी मवाद निकला। साथ ही हसली की हड्डी भी टूट गई। इस समय मेरी हालत मृतक जैसी हो गई थी। देह पर सब ओर मुर्दनी छा गई थी।
माता पिता का धैर्य टूट गया। वे बिलख बिलख कर रोने लगे। रिश्तेदारों को तार द्वारा खबर दी गई, वे भी मुझे अन्तिम रूप से देखने आ गये। सिविल सर्जन स्पष्ट कह चुके थे कि मर्ज उनके काबू से बाहर है यदि जिन्दगी बच भी जाय तो हसली की हड्डी टूट जाने के कारण दाहिना हाथ बिलकुल बेकार हो जायगा। मृतक या कम से कम अपाहिज होने की कल्पना रोगी को तथा उसके अभिभावकों को कितनी कष्ट कारक होती है इसकी कल्पना कोई भुक्त भोगी ही कर सकता है।
इस विपत्ति के घोर अन्धकार में पिता जी को गायत्री माता का सहारा सूझा। वे दिन रात गायत्री का जप और ध्यान करते और उसी से मेरे प्राणों की भिक्षा माँगते, इसी बीच उन्हें मुझे लखनऊ ले जाने का उपाय सूझा। यद्यपि ऐसी स्थिति में रोगी के लिए इतनी लम्बी यात्रा खतरे से खाली न थी पर वे अपनी अन्तः प्रेरणा के अनुसार मुझे लखनऊ ले पहुँचे और मेडीकल कॉलेज के अस्पताल में भर्ती कर दिया। डॉक्टर इलाज करते थे और माता पिता गोमती नदी के पुण्य तट पर गायत्री के सवालक्ष अनुष्ठान में संलग्न रहते।
माता ने उनकी आर्तपुकार को सुना और मेरा आपरेशन सफल हुआ। हसली की हड्डी निकाल दी गई है, फिर भी मेरा दाहिना हाथ अपाहिज नहीं हुआ और माता की असीम कृपा के अतिरिक्त और क्या कहा जाय?
पिता जी आर्य समाजी विचार के हैं। उनका अब गायत्री पर इतना अटूट विश्वास हो गया है कि अपना अधिकाँश खाली समय वे गायत्री उपासना में ही लगाते हैं। मैं भी अपनी जीवनदात्री महाशक्ति को कैसे भूल सकता हूँ। मैं भी यथासम्भव गायत्री उपासना में भूल नहीं करता और विश्वास करता हूँ कि जो शक्ति इतना बड़ा संकट टाल सकती है उसके लिए किसी भी कठिनाई को दूर कर सकना कठिन नहीं है।
(श्री सरदार रतन सिंह जी इंजीनियर)
महात्मा अनासक्त जी गंगा जी के पुण्य तट पर उन स्थानों में रहते हैं जहाँ मनुष्यों का आवागमन नहीं होता। उनका कोई स्थान, आश्रम या ठिकाना नहीं है फिर भी कभी कभी भागलपुर के आस-पास गंगातट पर उनके दर्शन हो जाते हैं। एक वर्ष में सवा महीने के लिए वे भोजन त्याग देते हैं और केवल गंगा की बालू खाकर एवं गंगाजल पीकर रहते हैं। पैसा छूते नहीं। एक कमण्डल, एक माला, तथा दो वस्त्रों के अतिरिक्त और कोई सामान इनके पास नहीं रहता।
श्री महात्मा अनासक्त जी की तपस्या असाधारण है। उनकी आत्मा का दिव्य प्रकाश उनके चेहरे पर चमकता रहता है। कभी कभी वे गंगातट के गांवों में आते हैं और अन्नाहार करने की इच्छा होती है तो यह तलाश करते हैं कि इस ग्राम में पूर्ण सदाचारी ब्राह्मणों के घर कितने हैं, वे उन्हीं के यहाँ की भिक्षा ग्रहण करते हैं। जहाँ ठहरते हैं वहाँ गायत्री सम्बन्धी उपदेश अवश्य देते हैं। वे स्वयं गायत्री उपासना में संलग्न हैं और अपने प्रेमियों को वही बताते रहते हैं कि अनासक्त जीवन व्यतीत करना एवं गायत्री की उपासना करना आत्म कल्याण के यह दो ही मार्ग हैं।
एक बार की घटना है कि वे एक गाँव में गये और वहाँ पर ऐसा ब्राह्मण तलाश करने लगे जो त्रिकाल संध्या एवं गायत्री का जप करता हो। जब ऐसा एक भी घर न मिला तो वे बहुत दुखी हुए और वहाँ के ब्राह्मणों की भर्त्सना करते हुए कहा कि “तुम अपने पूर्वजों की धरोहर की इतनी उपेक्षा करते हो तो अन्य वर्णों का अधिकार है कि वे गायत्री विद्या को अपनावें।” उनने कुछ द्विजेतर जाति के व्यक्तियों को गायत्री मन्त्र की शिक्षा दी।
इस पर उस प्रदेश के ब्राह्मणों में बड़ा रोष फैला, वे लाठियाँ लेकर स्वामी जी को मारने जंगल में चल दिये। पर दैव वश वे रास्ते में ही अन्धे हो गये। रात भर वे लोग जंगल में भटकते रहे। दूसरे दिन राहगीरों ने उन्हें घर पहुँचाया। इस विपत्ति परिणाम से वे बहुत दुखी हो रहे थे। अन्त में उन्होंने स्वामी जी का पता लगाया और उनके चरणों पर गिर कर अपनी भूल की क्षमा माँगी और खोई हुई नेत्र ज्योति फिर प्राप्त की।
एक बार की घटना है कि एक नव युवती कन्या की मृत्यु हो गई। लोग गंगा तट पर उसके मृत शरीर को ले गये। चिता में उसे लगा दिया गया। केवल अग्नि प्रवेश की देरी थी। इतने में स्वामी जी उधर से आ निकले। उनने कहा इस लड़की की आयु अभी समाप्त नहीं हुई है। इसे जलाओ मत। स्वामी जी की बात पर किसी को भरोसा न हुआ और उसके अग्नि दाह की तैयारी करने लगे। इस पर स्वामी जी ने चिता के पास जाकर जोर से लड़की को पुकारा वह चिता में से उठ खड़ी हुई। यह दृश्य देखकर पहले तो उसके सम्बन्धी लोग डरकर भागे, पीछे पर स्वामी जी के समझाने बुझाने पर उसे वापिस घर ले गये।
इस प्रकार उनके जीवन की अनेकों चमत्कारी घटनाएं हैं। पर वे उन्हें प्रकट नहीं होने देते और जहाँ उनकी अधिक आवभगत होने लगती है वहाँ जाना आना ही छोड़ देते हैं। साँसारिक पदार्थों और बन्धनों से उन्हें आसक्ति नहीं इसलिए उनका नाम “अनासक्त” है। पर हाँ, एक आसक्ति उनमें देखी जाती है वह है स्वयं गायत्री उपासना में अत्यधिक तल्लीन रहना और दूसरे अधिकारी व्यक्तियों को इस महान् साधना में प्रवृत्त होने के लिए आग्रहपूर्वक प्रेरणा देना। उनकी यह आसक्ति वस्तुतः अनासक्ति साधना की ही एक पद्धति है। ऐसे महात्माओं से भारत भूमि को फिर प्राचीन युग उपस्थित करने की आशा की जा सकती है।
(श्री वाला शंकर दुर्लभ जी भट्ट जूनागढ़)
बात बहुत दिन की है। अपने ग्राम से मैं अपने पिता जी के साथ दूसरे गाँव को जा रहा था। पिता जी घोड़े पर थे और मैं पैदल। रास्ते में एक बरसाती नदी पड़ती थी, जो गहरी बहुत न थी पर चौड़ाई बहुत थी। वर्षा के दिन थे, थोड़ा थोड़ा पानी बरस रहा था। हम लोगों ने नदी को पार करने के लिए उसमें प्रवेश किया, कीचड़ बहुत था इसलिए चलना धीरे-धीरे हो रहा था।
अचानक एक दम मूसलाधार वर्षा होने लगी। और नदी में पानी इतने जोर से बढ़ा कि दो चार मिनट में ही नदी में भारी उफान आ गया। बीच नदी में पहुँचते-पहुँचते पानी इतना बढ़ आया कि पिता जी का घोड़ा बहने लगा मैंने उसकी पूछ पकड़ ली, पिता जी ने उसकी गरदन पकड़ ली इस प्रकार हम दोनों पिता पुत्र उस घोड़े के साथ उफनती हुई नदी के तीव्र प्रवाह में बहने लगे। एक दो डुबकी लगीं और यह दिखाई देने लगा कि अब मृत्यु निश्चित है। पिता जी ने घबराकर कहा बेटा गायत्री माता को पुकारो अब हमारे प्राण केवल वही बचा सकती हैं। मैं हत बुद्धि हो रहा हूँ। गायत्री माता जोर जोर से चिल्लाने लगा। पिताजी की घिग्घी बंध रही थी वे भी माता पुकार रहे थे। हमारी जीवन नौका बना हुआ वह घोड़ा बार-बार उलटा तिरछा हो जाता था और अब डूबा तब डूबा दिखाई पड़ता था।
हमारी पुकार निष्फल नहीं गई। एक बड़ा सा टूटा हुआ पेड़ आगे बहता जा रहा था। हम लोग उससे अटक गये घोड़ा भी साथ साथ आसानी से बहने लगा इस प्रकार एक दो घंटा बीत गया। वर्षा रुकी, नदी का प्रवाह कम हुआ और पेड़ एक ऐसी जगह जा पहुँचा जहाँ से नदी को पार करना सरल था, हम तीनों पार हो गये। उस दिन की घटना किसी दूसरे की दृष्टि में कितनी ही सामान्य क्यों न हो पर वह हमारे लिए ग्राह के मुख से गज के बचाने के समान महत्वपूर्ण थी। माता ने हमें भुजा पकड़ कर उस दिन बचाया था, ऐसा ही हम मानते हैं।
अभी आठ वर्ष पूर्व की बात है। मेरे पैर में काँच लगा। काँच का विष ऐसा फैला कि रक्त दूषित होकर धनुर्वात रोग हो गया। बुखार था और शरीर में ऐंठन बेतरह रहती थी।
स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि एक दिन मेरी मृत्यु निश्चित समझ ली गई और चार पाई से उतार कर मृत्यु की प्रतीक्षा के लिए जमीन पर लिटा दिया गया। उस बेहोशी में भी मुझे गायत्री का ध्यान आ रहा था। माता ने कृपा की मेरे साँस बढ़े। जमीन से उठाकर चार पाई पर लाया गया और कुछ दिन में अच्छा हो गया इस घटना को लोग मेरी मृत्यु से वापसी कहते हैं।
प्रारम्भिक जीवन में मेरी शिक्षा और योग्यता किसी भी विषय में न थी परन्तु माता की कृपा से मुझे फोटोग्राफी का आर्ट मालूम हो गया। ख्याति इतनी फैली की जूनागढ़ के नवाब ने मेरे घर पर अपनी मोटर भेज कर मुझे बुलाया और राजमहल का फोटोग्राफर नियुक्त कर लिया। मेरे काम से वे इतने प्रसन्न थे कि कई बार उन्होंने पाँच पाँच सौ रुपये के इनाम दिये। मुझ से कुढ़कर नवाब साहब का ए. डी. सी. मुझे अलग करना चाहता था, मैं स्वयं चला गया और उसने अपने एक रिश्तेदार को उस जगह नियुक्त कर दिया। यह समाचार जब नवाब साहब को मिले तो ए. डी. सी. पर बहुत नाराज हुए और उसे अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। मुझे उन्होंने 25) मासिक तरक्की अतिरिक्त इनाम और गैर हाजिरी के दिनों का वेतन देकर पुनः मेरी जगह पर नियुक्त कर दिया।
अब मैं दिनकर स्टूडियो के नाम से अपना स्वतंत्र फोटोग्राफी का काम करता हूँ। उसमें मुझे अच्छी सफलता, प्रतिष्ठा और आजीविका प्राप्त होती है यह सब गायत्री माता की कृपा ही है।
(श्री रामचन्द्र प्रसाद जी दानापुर केन्ट)
भागवत जी मिस्त्री हमारी दुकान के पड़ोस में ही रहते हैं। वे जाति के लुहार हैं। इनके पिता गरीवा मिस्त्री बड़े गुणी थे, इनके पूर्वज भी ओझा होते आये हैं। इनके घर में लगभग सौ वर्ष से एक बैमत (स्त्री प्रेतात्मा) रहती थी। जिसे भगाने का इनके पूर्वज भी जी तोड़ प्रयत्न करते रहे और इनने भी किया पर किसी प्रकार सफलता न मिली। यह बैमत (चुड़ैल) घर में किसी न किसी प्रकार परेशान करती रहती थी। इसे हटाने के सभी प्रयत्न निष्फल हो गये थे। भागवत जी के चचा कपूर चंद मिस्त्री भूत विद्या के बारे में बड़े अनुभवी हैं इनने तो यहाँ तक कह दिया था कि अब इस बैमत को दुनिया में कोई मनुष्य नहीं हटा सकता। निराशा और परेशानी से सबका चित्त बड़ा दुखी रहता था।
मैंने भागवत जी को गायत्री अनुष्ठान करने की सलाह दी। वे कठिन से कठिन साधना करने को तैयार थे। गायत्री उपासना के लिये प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गये। मैंने उन्हें सारा विधि विधान समझा दिया। वे 40 दिन की साधना में लग गये। इस साधना को भंग करने के लिए वैमत ने ऐसे ऐसे उपद्रव खड़े किये कि यह लगता था कि यह इस साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी। पर साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
एक दिन भागवत जी ने अपनी आँखों देखा और कानों सुना कि कोई औरत छप्पर पर बैठी हुई जोर जोर से रो रही है और कह रही है कि— “मैं इतने दिन से इस घर में हूँ, मुझे मत निकालो, तुम भी रहो और मुझे भी रहने दो।” इसी प्रकार एक दिन उनके साधना स्थान से कुछ दूर एक काले रंग की भयंकर प्रेतात्मा घबराई हुई दशा में घूमते देखी। और भी अनुभव उस अनुष्ठान काल में हुए जिससे यह प्रकट होता था कि गायत्री उपासना का भारी असर उस बैमत (प्रेतात्मा) पर हो रहा था।
अनुष्ठान पूरा हुआ। गायत्री यज्ञ का धुँआ घर के कौने-कौने में पहुँचाया गया। सब लोगों ने माता की पूजा में भाग लिया, यज्ञ की भस्म माथे पर लगाई। उस दिन के बाद वैमत का कोई उपद्रव उनके घर में नहीं हुआ, जिससे विश्वास होता है कि अब उनके घर में कोई भूत बाधा नहीं रही। जिस घर में गायत्री उपासना होती है उस घर में भूत पिशाच जैसी मलीन आत्माएँ रह नहीं सकतीं, ऐसे घरों में तो देव वास ही रहता है।
(श्री बंशीलाल शर्मा टेलीग्राफ वर्कशॉप, जबलपुर)
मेरे पिता जी बड़े धर्मनिष्ठ थे, वे तीनों सन्ध्या करते थे मैं सिर्फ 14 वर्ष का था तभी वे परलोक चले गये सो मुझे पूरा पता नहीं कि वे कितना गायत्री जप करते थे। उनके आशीर्वाद से व ईश्वर कृपा से मेरी भी इस ओर टूटी फूटी रुचि हो गई और मैं भी माता का उपासक हूँ।
पिताजी के जीवन की एक घटना इस प्रकार है। एक रोज हमारी एक भैंस थी वह घर न आई रात को दो बजे तब तक पता नहीं। मेरे पिता जी उसकी खोज में घूम रहे थे। उसी समय एक जंगल में भैंसाकार जिंद उनके सामने आया। वे समझे कि यही वह भैंस है पर वह तो कुछ और ही था। उन पर झपटा। वे साथ में डंडा रखे थे सो मारने लगे पर ज्यों−ही डंडा पड़े और वह जिंद दूर भागे। वे उससे बड़े परेशान हो गये परन्तु घबराये नहीं कारण कि महामन्त्र पर उन्हें पूर्ण विश्वास था। रात भर भैंसे से युद्ध होता रहा, वे इस युद्ध में थक कर चूर-चूर हो गए और उस दुष्ट दानव से अपनी प्राण रक्षा का उपाय न देख कर भय से काँपने लगे। इसी समय उन्हें एक युक्ति सूझी वह यह कि वे वहीं आसन लगाकर गायत्री मन्त्र जपने लगे। ज्यों ही मन्त्र जप प्रारम्भ किया कि उनकी परेशानी हट गई व थोड़ी देर में वहाँ जिंद आदि दृष्टिगोचर नहीं हुआ। वे फिर भगवती की कृपा से घर लौटे व नित्यकर्मों में लग गये, इस प्रकार के कठिन समय वे महामन्त्र के प्रभाव से पार कर लेते थे।
मेरे पिताजी की ईश्वर ने जीवनी अच्छी बिताई। जगदम्बे की शरण में, मैं भी पड़ा हूँ व जो बन पड़े कर लेता हूँ। विश्वास है कि माता अपने इस अधम सेवक की नौका भी पार लगावेंगी।
—जय से बैर पैदा होता है। पराजित दुखी रहता है। जय पराजय दोनों को छोड़ कर शान्त मनुष्य सुखपूर्वक सोता है।
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—निः रोग रहना सबसे बड़ा लाभ है। सन्तुष्ट रहना परम धन है। विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
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—एकान्त और शान्ति के रस को पान कर आदमी निडर होता है। और धर्म के प्रेम रस को पान कर निष्पाप।
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—सत् पुरुषों का दर्शन अच्छा है। सत्पुरुषों की संगति सुखकर है, मूर्खों का दर्शन न होने से आदमी सुखी रहता है।
(श्री नारायण प्रसाद काश्यप, राजनाँदगाँव)
आज मैं आप लोगों को गायत्री—की आध्यात्मिक महिमा और शक्ति के विषय में कुछ नहीं कहना चाहता क्योंकि उसके विषय में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। आज मैं अपने निजी अनुभव की बातें बतलाऊँगा कि जिस तरह गायत्री मन्त्र की शक्ति के द्वारा हमारे घर की सब विघ्न बाधाएँ और आपत्तियाँ दूर हुई।
सन् 1946 में भण्डारे के एक प्रमुख व्यक्ति ने मेरे बड़े भाई को एक बनावटी फौजदारी मुकदमे में फँसा दिया। मुकदमा चार वर्ष तक चलता रहा अफसरों पर दबाव डाल कर वह हम लोगों को बरबाद करना चाहता था। हमने अपनी विपत्ति कथा सतगुरु स्वामीनाथ तथा ब्रह्मचारी जी को कह सुनाई। उनने हमें आश्वासन दिया और गायत्री जप करने के लिए कहा। और श्री ब्रह्मचारी जी ने स्वयं विधिपूर्वक अनुष्ठान किया और मुझे एक अनुष्ठान बतलाया जिसे मैंने चार बार में समाप्त किया। इस अनुष्ठान के प्रताप से वह विपत्ति टल गई जिसके कारण हम लोगों को बहुत ही भय सताता रहता था।
सन् 1951 के जनवरी माह में कुछ बड़े आदमी पुलिस से मिलकर मेरे छोटे भाई पर कत्ल करने का मामला चलाया। हमारे परिवार पर वज्रपात हो गया। एक के बाद दूसरी विपत्ति पर विपत्ति आ गई। हमने इस मामले को अपने गुरुजनों के सामने रखा। इस बार भी माता का ही अंचल पकड़ा गया वही तरण तारणी है। उसे छोड़कर और किसका अंचल पकड़ा जाय। माता की कृपा हुई। गुरुजनों ने तथा हमने माता की निरन्तर प्रार्थना को ही अपना सहारा बनाया।
हम दिन रात गायत्री मन्त्र का ही जप करते थे। उसका यह परिणाम हुआ कि आज हमारे दोनों भाई निर्दोष मान कर रिहा कर दिये गये और मेरे छोटे भाई को फँसाने वाला वह आदमी उलटा एक मामले में गिरफ्तार है।
अन्त में मैं अपने निजी अनुभव के द्वारा अपने सब पाठकों से प्रार्थना करता हूँ कि वे भी रोज गायत्री मन्त्र का जप किया करें।
(श्री पुरुषोत्तम आत्माराम साखेर, पवारखेड़ा)
वैसे तो हमारे परिवार की धार्मिक प्रवृत्ति वंश परम्परा से चली आती है, पर श्री रामेश्वर प्रसाद जी सोनी एग्रीकल्चर असिस्टेंट की प्रेरणा से मेरे मन में गायत्री साधना के लिए विशेष प्रवृत्ति उत्पन्न हुई। काफी अरसे से मैं गायत्री साधना में लगा हुआ हूँ और देखता हूँ कि उसके कारण आत्मा की दिन-दिन उन्नति हो रही है। अनेक दोष दुर्गुण छूट गये हैं और उनके स्थान पर नये सद्गुणों का विकास हुआ है।
यहाँ और भी कई नए महानुभाव गायत्री उपासना करते हैं उनमें से कई को गायत्री माता की कृपा के चमत्कारी अनुभव हुए हैं—
(1) मेरे परम मित्र विनायक रावजी वैद्य कम्पाउन्डर मेन हास्पिटल के बालक 4-6 महीने के होकर मर जाते थे। आप अँग्रेजी, आयुर्वेदिक, होमियोपैथीक, यूनानी उपचार करके तंग आ रहे थे मेरा उनसे परिचय होने पर आपको गायत्री मन्त्र में विश्वास बढ़ा उनको बहुत कार्य होने की वजह से यह कार्य मुझे सौंपा गया, तब मैंने वेद माता की अनुमति प्राप्त करके यह कार्य प्रारम्भ किया। माता की अनुकम्पा से एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ जो सबकी गोदियों में किलोल करता फिरता है।
(2) श्रीवासन सदाशिव देहाडराय कृषि विभाग के सुप्रिन्टेन्डेंट पवारखेड़ा फार्म पर सरकार को कुछ आर्थिक क्षति पहुँचाने के अभियोग में फौजदारी मुकदमा चलाया गया जब मुझसे उनका परिचय मुकदमे के दौरान में हुआ तो मैंने उनको वेद माता गायत्री का अनुष्ठान कराने को कहा तो उनके आग्रह से मैंने खुद यह अनुष्ठान किया फलस्वरूप वे इस मुकदमे से निर्दोष बरी हुए।
(3) ऐसे ही मेरे मझले भाई निरोत्तम रावजी साखरे सरकारी नौकरी दीवानी मुहकमे से इस्तीफा देकर बेकार बैठे थे, उनके लिए वेद माता गायत्री का अनुष्ठान किया और वह आज कल भोपाल में सुपरेन्टेन्डेन्ट (बेलिफ ) की जगह पर काम कर रहे हैं।
यह तो हमारे अत्यन्त निकटवर्ती उदाहरण हैं। गायत्री माता की शरण में जाने वाले मनुष्य सदा लाभ में ही रहते हैं उन्हें आध्यात्मिक लाभों और साँसारिक सुविधाओं की कमी नहीं रहती।
(श्री अयोध्या प्रसाद दीक्षित, कानपुर)
मेरी धर्मपत्नी ने अपने विवाह से पूर्व हिन्दी मिडिल किया था। इस बात को एक लम्बी मुद्दत बीत गई। विवाह के उपरान्त वह घर गृहस्थ के झगड़ों में लग गई। बच्चों का पालन पोषण तथा गृहस्थ के अनेक कामों में शक्ति और समय खर्च होता है उसके बाद प्रायः स्त्रियों को आगे की परीक्षा देने का न अवकाश रहता है और न उत्साह।
पिछले वर्ष मेरी धर्मपत्नी सौ॰ शान्ति देवी ने घर पर पढ़ कर मैट्रिक देने का विचार प्रकट किया। उसका मनोरथ अच्छा था पर उसके पूरे होने के कोई लक्षण न दिखाई पड़ते थे। कारण कई थे— एक तो वह आये दिन बीमार बनी रहती है। हाल ही में उसके बच्चे का स्वर्गवास हुआ था जिसके कारण चित्त में हर घड़ी दुख रहता था। फिर घर पर रह कर पढ़ाई की भी कोई समुचित व्यवस्था न थी, इतने वर्षों से छूटी हुई शिक्षा, फिर एक वर्ष में इतने बड़े कोर्स की तैयारी, इन सब बातों पर विचार करने से सहज ही यह दृष्टिगोचर हो जाता है कि मंजिल आसानी से पार होने वाली नहीं है। पत्नी ने अपना अभिप्राय प्रकट किया तो मैंने खुशी खुशी सहमति प्रकट कर दी। इसलिये नहीं कि उसके सफल होने की आशा थी वरन् इसलिये कि पुत्र शोक से उसका चित्त एक दूसरे काम में बंट जायगा और इसी बहाने कुछ न कुछ शिक्षा की वृद्धि भी होगी। पर परीक्षा के लिए जैसी तैयारी होती है उसकी तुलना में तो यह सब एक मजाक हो रहा था।
गायत्री उपासना को इस शिक्षा के साथ साथ उसने अपना आधार बनाया। वह पढ़ाई की भाँति ही वरन् उससे भी अधिक गायत्री उपासना पर ध्यान रखती। इसी प्रकार धीरे धीरे कई महीने बीते परीक्षा का फार्म भर दिया गया। देखते देखते तिथि भी आ गई। तैयारी बहुत कम थी, इसलिए फेल होने की बात मन में बैठी हुई थी। परीक्षा समाप्त हुई तो मैंने पूछा कि कैसी आशा है? उत्तर मिला कि-कम्पार्टमेन्टल में नाम आ गया तो बहुत है। दुबारा परीक्षा में शायद एक और अवसर मिले।
परीक्षा फल निकला। उसका नाम द्वितीय श्रेणी के उत्तीर्ण छात्रों में आया। उत्साह का ठिकाना न रहा। परीक्षार्थिनी कहती है कि जब मैं उत्तर लिखने बैठती थी तो कोई शक्ति कलम पकड़ कर ऐसे उत्तर लिखता जाता था जो साधारण स्थिति में लिखना मेरे लिए कठिन था। परीक्षा भवन में प्रवेश करते समय वह गायत्री माता का जप और ध्यान करती जाती थी। वह कहती है कि उत्तर लिखते समय मेरी बुद्धि और स्मरण शक्ति बहुत तीव्र रहती थी, अपनी साधारण समय की अयोग्यता और परीक्षा समय में असाधारण प्रतिभा इन दोनों बातों का सामंजस्य वह सोच नहीं सकती थी। इसी से उसे अनुत्तीर्ण होने का सदा भय रहा। अब वह कहती है कि गायत्री माता की कृपा से मनुष्य की बुद्धि इतनी स्वच्छ होती है कि उससे जीवन की अनेकों परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो सकता है। उसने अभी से अगले वर्ष की पढ़ाई की तैयारी प्रारम्भ कर दी है। देखें माता उसे कहाँ तक ले पहुँचती हैं।
(श्री अशफी लाल जी मुख्तार, बिजनौर)
वर्तमान युग में अधिकाँश वकीलों में आस्तिकता और धार्मिकता का अभाव पाया जाता है। क्योंकि इन दोनों का ही मूल आधार श्रद्धा एवं भावना है। वकील तार्किक होता है, बुद्धि उसका प्रधान साधन है। बुद्धि की दौड़ भौतिक सुख साधनों की ओर ही चलती है। उसे परमार्थ एवं तप त्याग की ओर मोड़ने का काम श्रद्धा एवं भावना का होता है। बुद्धि को अत्यधिक प्रधानता मिलने से अन्तरात्मा की आवाज दब जाती है और मनुष्य इन लौकिक सुखों एवं समस्याओं की उधेड़ बुन में ही लगा रहता है। इस श्रेणी के लोगों में वकील वर्ग सब से आगे रहता है क्योंकि ‘तर्क’ ही उसका सब प्रधान अस्त्र होता है। इस अस्त्र से उसकी परमार्थ वृत्ति पर भी कुठाराघात होता है।
मैं स्वयं वकील हूँ। वकालत मेरा भी पेशा है। जीवन का अधिकाँश भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ है। इसीलिए मेरी भी प्रवृत्ति उपरोक्त प्रकार की होनी स्वाभाविक थी। किसी बात को तर्क की कसौटी पर पूरी तरह कसे बिना उसे मानना मेरे स्वभाव और अभ्यास के प्रतिकूल है। कुछ वर्ष पूर्व मेरा मन दर्शनशास्त्र की ओर झुका क्योंकि वह तर्क को आधार मान कर अपनी बात कहता है और लोभ एवं भोग से ऊपर उठाकर एक उच्च महानता की ओर चलने का निष्कर्ष उपस्थित करता है। दर्शन शास्त्र का जितनी गहराई से अध्ययन किया उतना ही मेरी बुद्धि यह स्वीकार करती गई कि मनुष्य जीवन की सफलता लोभ और भोग में नहीं वरन् आध्यात्मिक महानता सम्पादन करने में है।
आत्मिक उन्नति का मार्ग ढूँढ़ने के लिए बुद्धि ने फिर खोज आरम्भ की अन्तः करण चतुष्टय का मानसिक चेतना के विभिन्न स्तरों के स्वरूप, विधान, कार्य, को समझने और उनमें हेर-फेर कराने वाले उपचारों को परखने के लिए मैंने मनोविज्ञान शास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया। पाश्चात्य मनोविज्ञान शास्त्र इस दिशा में बहुत लँगड़ा मालूम पड़ा। वह काम (सैक्स) और वासना (इच्छाओं) को मनुष्य की मूल प्रवृत्ति मानता है और इनकी परिपूर्ण तृप्ति को जीवन का स्वस्थ विकास एवं प्रतिरोध को मानसिक विकृतियों का कारण मानता है। नैतिकता, सामाजिक नियम, संयम, इन्द्रिय दमन आदि उस दृष्टि से अनुपयोगी सिद्ध होते हैं। ऐसे गलत निष्कर्ष पर पहुँचाने वाले पाश्चात्य मनोविज्ञान से निराश होकर पूर्वात्य (भारतीय) मनोविज्ञान का मैंने अध्ययन आरम्भ किया। उपनिषदों में जिस ब्रह्म विद्या का विस्तृत वर्णन एवं विवेचन है, वही भारतीय मनोविज्ञान है। इसका तार्किक, वैज्ञानिक एवं बुद्धि संगत अध्ययन करने से यह प्रकट हो जाता है कि चिर संचित कुसंस्कारों और दुवृत्तियों से छुटकारा पाने के लिए एकमात्र उपाय उपासना है। साधना, तपस्या, व्रत, आराधना, उपासना की वैज्ञानिक पद्धति से ही हम अपनी मनोभूमि को निम्नस्तर से उठाकर उच्च भूमिका में परिवर्तन कर सकते हैं। जैसे अग्नि संस्कार से संसार के स्थूल पदार्थों में भारी हेर-फेर हो जाता है वैसे ही साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
अपनी अन्तरात्मा को उच्च स्थिति तक पहुँचाने के लिए मैंने साधना का मार्ग पकड़ा। इसके लिए विभिन्न साधना पद्धतियों को परखा। योग विद्या के ग्रन्थों को देखा, साधना मार्ग पर चलने वाले लोगों से परामर्श किये और यह देखा कि इस साधना के प्रयोग से किस व्यक्ति को क्या उपलब्ध हुआ है? यों कहने को कई लोग अपनी प्रिय साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
कई बार कई साधनाओं की उलट पलट करनी पड़ी। पर ऐसा मार्ग न मिला जो प्रीति और प्रतीति दोनों ही उत्पन्न करता, बुद्धि और अनुभव की कसौटी पर खरा उतरता। बहुत सा समय इस ढूँढ़ खोज एवं प्रयोगों में लग गया।
इसी ऊहापोह में मुझे अखण्ड ज्योति की प्रकाशित गायत्री पुस्तकें मिलीं, उन्हें पढ़ा तो मेरी तार्किक बुद्धि और पिछले वर्षों के अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर बनी हुई अभिरुचि को उनसे असाधारण तृप्ति मिली और ऐसा प्रतीत हुआ कि मानों यह सब मुझ जैसे व्यक्तियों को दृष्टि में रखकर ही किसी अधिकारी एवं अनुभवी व्यक्ति ने लिखा हो। परन्तु केवल पुस्तकें पढ़ना पर्याप्त न समझा गया मैं इनके लेखक से मिलने मथुरा पहुँचा। आचार्य जी के दर्शनों से ही मैं गदगद होगा। उनकी प्रशंसा में कोई बात कहना मेरे लिए उचित न होगा पर अपनी आत्मा पर उनकी आत्मा का प्रकाश पड़ते ही मुझे वह मिल गया जिसकी तलाश में बहुत दिनों से लगा हुआ था।
गायत्री उपासना में मेरी श्रद्धा, विश्वास, जानकारी और अनुभूति दिन दिन बढ़ती जा रही है और यह अनुभव होता है कि प्रगति सन्तोष जनक हो रही है।
मेरे कई मित्रों ने भी इस आत्मकल्याण के मार्ग को मेरी ही भाँति अपनाया है। मेरे परम मित्र श्री नेमी शरण जैन वकील (पार्लियामेंट सदस्य) वा. श्यामचन्द्र जी मुख्तार आदि बिजनौर के कई बुद्धि जीव सम्भ्रान्त सज्जन गायत्री उपासना की ओर अग्रसर हुए हैं ओर वे भी मेरी ही भाँति आन्तरिक शान्ति एवं प्रगति का अनुभव कर रहे हैं। मैं अन्ध श्रद्धालु नहीं हूँ। हर बात की वास्तविकता का परीक्षण करके ही उसे स्वीकार करना मेरा स्वभाव है। गायत्री उपासना मेरी दृष्टि में एक विशुद्ध विज्ञान है जिसके आधार पर चलने वाले मनुष्य के लिए यह सुगम है कि वह अपने विचार, स्वभाव और दृष्टिकोण में उच्च कोटि का परिवर्तन हो जाने के कारण संसार में शान्तिपूर्ण सुविकसित जीवन व्यतीत करें और आत्मा को परमात्मा के समीप पहुँचा देने की दिशा में दिन दिन तीव्र गति से अग्रसर होता चले।
-जो शीलवान है, विद्वान है, जो धर्म स्थिति हैं, जो सत्यवादी हैं, जो अपने कामों को करने वाले हैं, ऐसे आदमियों को लोग प्यार करते हैं।
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-क्रोध को अक्रोध से, बुराई को भलाई से, कंजूस पन को दान से और झूठ को सत्य से जीतो।
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—सत्य बोलो। क्रोध न करो। माँगने पर थोड़ा भी दो इन तीनों बातों के करने से आदमी देवताओं के समीप पहुंचता है।
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—काया की चंचलता से बचो। काया का संयम रखो। शारीरिक दुश्चरित्रों को छोड़कर शरीर से सदाचरण करो।
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-बहुत बोलने से कोई पंडित नहीं होता, जो ज्ञानवान, अवैर और निर्भय है वही पंडित कहलाता है।
(श्री अम्बाशंकर गोविन्द जी व्यास, जूनागढ़)
परिस्थितियों-वश मैं स्कूली शिक्षा बहुत ही कम प्राप्त कर सका। कक्षा 4 उत्तीर्ण करने के बाद रोटी कमाने की चिन्ता हुई और 12) रुपया मासिक की नौकरी पर लग गया। बड़ा परिवार, छोटी नौकरी, अल्प शिक्षा, सहायकों का अभाव, इस प्रकार की विपन्नताओं से घिरे होने पर कोई मार्ग न सूझता था, उस समय मैंने गायत्री माता का आश्रय लिया।
भगवती का अञ्चल पकड़ने पर मुझे नया प्रकाश प्राप्त हुआ नया मार्ग सूझा। मैंने कुछ अँग्रेजी सीखी, टेलीग्राफी सीखी, तारबाबू की परीक्षा दी और पास हो गया। इतने पर भी रेलवे की नौकरी मिलना मेरे लिए कठिन था। सबसे बड़ी बाधा तो उस अँग्रेज डॉक्टर की थी जो रेलवे की नौकरी में बहुत अच्छे स्वास्थ्य के लोगों को लेने का कट्टर पक्षपाती था। वह कमजोर लोगों को हरगिज पास नहीं करता था। मेरा स्वास्थ्य पहले से ही दुर्बल था, उन दिनों तो मैं बीमारी से उठा था इसलिए और भी कमजोर हो रहा था। घोर निराशा के वातावरण में मैंने भी एक तारबाबू की खाली जगह के लिए अर्जी दी। ऐसी 15 अर्जी और थीं। हम 16 उम्मीदवार डाक्टरी मुआइने के लिए पेश हुए। मेजर हेन्स बहुत ही उग्र स्वभाव के थे, पक्षपात करना उनकी प्रकृति में ही न था। शेष सभी उम्मीदवार मुझसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छे थे। मैं मन ही मन माता का जप और ध्यान करने लगा। डॉक्टर ने 16 उम्मीदवार नापास कर दिये और मुझे पूर्ण स्वस्थ होने और फिट होने का प्रमाण पत्र दे दिया इस प्रमाण से हर कोई आश्चर्य चकित था पर मैं जानता था कि माता की कृपा से दुनिया में सब कुछ सम्भव है।
मुझे तारबाबू की नौकरी मिल गई। अँग्रेजी की भी योग्यता दिन दिन बढ़ती गई। मेरे ऊपर छोटे से लेकर बड़े अफसरों तक की विशेष कृपा रहती थी। और समय समय पर सभी का अनुग्रह प्राप्त होता रहता था, इस प्रकार मैं उन्नति करते करते स्टेशन मास्टर के पद पर पहुँच गया।
एक बार मैं गार्ड के डिब्बे में से नीचे उतर रहा था तो रेल के तेज रंगतार पकड़ लेने के कारण मैं बुरी तरह गिरा। टंकी के खम्भे से बुरी तरह टकराया ठोकर खाकर फिर बोर्ड पर औंधे मुँह गिरा और उससे धक्का खाकर फिर पटरी पर गिर पड़ा। इस प्रकार की घटना घटित होने पर आमतौर से किसी का प्राण बचना कठिन है, पर गायत्री की कृपा से मैं कुछ घन्टे बेहोश रह कर और मामूली चोट खाकर ही अच्छा हो गया।
मेरे पिताजी गायत्री के परमभक्त थे। वे अन्तिम समय केवल 4 दिन तक बहुत ही मामूली बीमार रहे थे। मृत्यु से दो दिन पूर्व उन्होंने पास बैठे हुए लोगों से कहा कि—”देखो सामने वह कैसी सुन्दर लड़की खड़ी है और मुझसे कह रही है दो दिन बाद तुम मेरे घर चलना” मैं भी उस समय मौजूद था। मैंने कहा यहाँ तो कोई लड़की नहीं है आपको व्यर्थ ही भ्रम हो रहा है। वे यह कहते हुए चुप हो गये कि इन्हें तुम नहीं देख सकते यह गायत्री माता है, मुझे तीसरे दिन इनके धाम को जाना है।” तीसरे दिन ब्रह्म मुहूर्त में गायत्री का जप करते-करते उनका शरीर शान्त हो गया।
एक बार मैं 42 दिन के टाइफ़ाइड से मरते-मरते बचा। डॉक्टर जवाब दे चुके थे और साँस निकलने की प्रतीक्षा की जा रही थी, उस बेहोशी में ही माता ने मुझे दर्शन दे कर अभयदान दिया और मृतक से जीवित हो गया। एक बार मेरी नौकरी छूट गई थी पर कुछ समय बाद ही टेलीग्राफी शिक्षक के पद पर मेरी फिर नियुक्ति हो गई।
ऐसे अनेकों अवसर मैंने अपने जीवन में देखे हैं जिनसे यह अटूट विश्वास हो गया है कि गायत्री उपासक को सदैव सुख शान्ति की ही प्राप्ति होती है।
(श्री जगन्नाथ जी शास्त्री ॐ, साक्चीसराय)
मेरे पिता ताँत्रिक साधना के भक्त थे। वे एक बढ़े चढ़े जुआरी थे। अपनी साधना के बल पर वे जुआ जीतते थे और बहुत कुछ कमाते थे। छोटी आयु में जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब वे अपने प्रयोजन के लिए मुझे भी उन साधनाओं में लगाते थे। ‘साधना द्वारा जुआ जीता जा सकता है।’ इस मान्यता ने मुझे इस मार्ग की ओर आकर्षित किया और मैं पिताजी की अपेक्षा किसी अधिक ऊंची साधना की तलाश में रहने लगा।
सीवान में एक पहुँचे हुए योगी “खाकी जी” रहते थे। उनके द्वारा मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हुआ और गायत्री मन्त्र मिला। खाकी जी ने मुझे बताया कि संसार का सर्वश्रेष्ठ मन्त्र गायत्री है। इसे अपनाने वाले का सदा लौकिक और पारलौकिक कल्याण ही होता है। उनकी बात मेरे हृदय में बैठ गई और मैं पूरे उत्साह से गायत्री का जप करने लगा।
गायत्री साधना से थोड़े समय में ही मुझे 3 लाभ प्राप्त हो गये। (1) मेरी बुद्धि पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र हो गई। स्कूल में सबसे अधिक नम्बर लाता और प्रथम श्रेणी के विद्यार्थियों में गिना जाता, (2) गायत्री मन्त्र से जल अभिमन्त्रित करके किसी रोगी को दे दिया जाय तो वह जल्दी ही अच्छा हो जाता है इसलिए कितने ही रोगी रोज मेरे पास आने लगे, (3) कभी कभी अनायास ही ऐसी भविष्यवाणी कर देता जो पूर्ण सत्य निकलती। कई बार तो ऐसी आश्चर्यजनक बातें बताई जिनके भविष्य में घटित होने की किसी को भी पूर्व कल्पना न थी।
मुझे इस प्रकार आत्मोन्नति की ओर अग्रसर होते देखकर पिताजी भी बहुत प्रभावित हुए और माँसाहार तथा ताँत्रिक साधना छोड़कर उनने भी गायत्री उपासना को अपना लिया और वे शेष जीवन उसी को अपनाये रहे जिससे उनके स्वभाव में बड़े ही उत्तम सतोगुणी परिवर्तन हुए और शान्ति पूर्ण सद्गति के अधिकारी बने।
स्कूली शिक्षा काल से अब तक मैं एकनिष्ठ भाव से गायत्री का उपासक रहा हूँ। इस बीच में जो अनुभव हुए हैं उनसे मेरी श्रद्धा, महा महिमामयी गायत्री माता पर दिन दिन बढ़ती ही चली आ रही है। माता अन्तःकरण में यही प्रेरणा करती हैं कि आत्म कल्याण की साधना एवं संसार में धार्मिक प्रवृत्तियों का प्रसार करते रहने में ही जीवन व्यतीत किया जाय। तदनुसार मैं एक पुरोहित एवं धर्म प्रचारक की भाँति इस प्रदेश के लोगों की धार्मिक प्रवृत्तियों को जागृत करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहता हूँ। इस सुन्दर सेवा पथ पर चलने का सौभाग्य मुझे माता की कृपा में ही मिला है। अपने आज के विचार और कार्यों पर जब विहंगावलोकन करता हूँ तो प्रतीत होता है कि माता मुझे श्रेय मार्ग की ओर तेजी से घसीटे लिए जा रही है।
गायत्री उपासना से अनेकों को अनेक लाभ प्राप्त करते हुए मैंने देखा है। पर सबसे बड़ा लाभ इस साधना का मुझे यह दिखाई पड़ता है कि गायत्री उपासक के विचार और कार्यों में दिन दिन सात्विकता एवं सेवा का सम्पुट बढ़ता जाता है। उसकी बुराइयाँ अपने आप घटती हैं और सन्मार्ग की ओर चलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति पैदा हो जाती है।
—वाणी की चंचलता से बचो, वाणी का संयम रखो, वाणी का दुश्चरित्र छोड़कर वाणी का सदाचरण करो।
*****
—मन की चंचलता से बचो, मन का संयम रखो, मन का दुश्चरित्र छोड़कर मानसिक सदाचरण करो।
(डॉक्टर वि. सम्पत्कुमार आचार्य, नेगी)
हमारे इस प्रदेश में बिच्छू बहुत निकलते हैं। जिनके द्वारा मनुष्यों को काटे जाने की घटनाएँ आये दिन घटित होती रहती हैं। बिच्छू के काटने में कितनी पीड़ा होती है इसे वही जान सकता है जिसे कभी बिच्छू ने काटा हो। कुछ बिच्छू इतने विषैले होते हैं कि उनका डंक लगने से मनुष्य की मृत्यु तक हो जाती है।
इस प्रदेश में बिच्छू काटने की कोई अचूक चिकित्सा उपलब्ध नहीं है। बड़े शहरों को छोड़ कर दूरवर्ती देहातों में सुशिक्षित डॉक्टर का मिलना तो दूर, मामूली दवा दारु बनाने वाले भी नहीं मिलते। जो मिलते हैं उनकी चिकित्सा ऐसी कारगर नहीं होती जो बिच्छू के काटे हुए रोगी की पीड़ा में जल्दी सहायता पहुँचा सकें। दूसरी ओर मन्त्र द्वारा विषोपचार करने वाले इस विद्या में अच्छे जानकार होते हैं। उनकी झाड़ फूँक से बहुधा आश्चर्यजनक परिणाम होते हैं। ‘रोता आवे, हँसता जावे’ वाली उक्ति इस सम्बन्ध में यहाँ बहुधा चरितार्थ होती है।
जिन लोगों को बिच्छू उतारने का मन्त्र आता है वे दूसरों को उसे नहीं बताते। दूसरे वह मन्त्र बड़ी कठिन विधि से सिद्ध होता है। जब तक सिद्ध न किया जाय तब तक मन्त्र लाभ नहीं होता। इस कारण जहाँ सिखाने वाले का इनकार बाधक होता है वहाँ सीखने वालों का हिम्मत हार बैठना भी उस विद्या में अवरोध का कारण बताता है। कुछ समय पूर्व जैसे शक्तिशाली मन्त्रोपकारक थे अब वैसे कहीं कोई विरले ही दीखते हैं।
मेरे एक मित्र बिच्छू विष उतारने का मन्त्र सीखने के लिये बहुत उत्सुक थे परन्तु उपरोक्त कठिनाइयों के कारण उनका मनोरथ पूरा न हो रहा था। एक दिन उनने गायत्री की महिमा पढ़ी। उन्हें विश्वास हो गया कि सबसे बड़ा मन्त्र गायत्री है जो कार्य संसार के अन्य किसी मन्त्र से हो सकता है वह गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। उनने गायत्री का एक अनुष्ठान किया और उसके पश्चात् बिच्छू के काटे हुए पीड़ितों का मन्त्रोपचार करना शुरू कर दिया। फलस्वरूप उन्हें भारी सफलता मिलने लगी, जो लोग अन्य मन्त्रों से विष उतारते हैं उनकी अपेक्षा हमारे मित्र का गायत्री द्वारा विष उतारना अधिक एवं शीघ्र परिणाम उपस्थित करने वाला सिद्ध होता है।
इसी प्रकार भयंकर विषैले सर्पों के विष को भी गायत्री मन्त्र द्वारा निर्विष किये जाने के अनेक उदाहरण हैं।
मेरी धर्मपत्नी भी मेरे साथ-साथ गायत्री उपासना में प्रवृत्त रहती है। पड़ोस की स्त्रियाँ उस पर बहुत श्रद्धा करती हैं और कोई बच्चा बीमार होता है तो उसके पास ले जाती हैं। धर्मपत्नी गायत्री से जल अभिमन्त्रित करके देती है और उसका प्रभाव औषधि से भी अधिक होता है।
गायत्री द्वारा निस्सन्देह मनुष्य के शरीर और आत्मा पर चढ़े हुये विषों को उतारा जा सकता है और स्वच्छ शान्ति का आनन्दोपभोग किया जा सकता है।
“अखण्ड ज्योति के पुराने अंक”
रिआयती मूल्य में—
अखण्ड-ज्योति के आरम्भ से लेकर इस 50 तक के अंकों में से कुल 40 अंक बचे हैं। किसी भी वर्ष के पूरे अंक नहीं हैं। इन 40 अंकों का रिआयती मूल्य 5) और रजिस्ट्री पार्सल खर्च 1) होगा। जो सज्जन मँगाना चाहें 6) का मनीआर्डर भेज कर शीघ्र मँगा लें।
—व्यवस्थापक-’अखण्ड-ज्योति’ मथुरा।
(श्री यमुना प्रसाद जी पालीवाल, वैद्य शास्त्री, खात)
दो वर्ष पहले मैं नासूर की भयंकर बीमारी से ग्रसित हो गया था। चलना फिरना तक सम्भव न रहा। घर के लोगों का भार रूप तो पहले ही से था इस बीमारी से वे और भी परेशान हुए और मुझे साफ उत्तर दे दिया कि— तुम अपने को आप सम्भालो।
मैं अपने लिए कहीं शरण खोजने निकला, पर दुर्दैव कब पीछा छोड़ने वाला था। एक गाँव से पुजारी का काम मिलने के लिए बुलावा आया था पर वहाँ भी सफलता न मिली। एक जगह औषधालय में जगह प्राप्त करने की कोशिश की वहाँ से भी निराशा ही मिली।
ऐसे कुसमय में जब मैं बीमारी, गरीबी और लाचारी में बुरी तरह परेशान था ता. 8-8-51 की अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रकाशित एक छोटी गायत्री सम्बन्धी पुस्तिका मिली। उसे पढ़ने से मुझे आशा की किरण दिखाई देने लगी। दूसरे दिन से ही विशेष मनोयोग पूर्वक गायत्री उपासना करने लगा।
इस साधना के द्वारा थोड़े ही समय में मेरी परिस्थिति में एक प्रकार से पूर्ण परिवर्तन हो गया है। जिस नासूर रोग से पीछा छुड़ाना असम्भव समझता था, उसे परास्त करने में मुझे विजय मिली। जिस तंगदस्ती के कारण एक एक पैसा कठिन था वह दूर हुई और अपना निजी और अपना निजी औषधालय चलाकर धन और धर्म उपार्जित करता रहा हूँ। जहाँ घर वालों तक ने अपने पास रखने से इनकार दिया था वहाँ एक अपरिचित सज्जन दुबे जी और उनकी धर्मपत्नी की मेरे ऊपर इतनी आत्मीयता है कि घर से बहुत दूर निकल जाने पर भी यह परदेश मुझे घर सरीखा लगता है।
मैं सोचता हूँ जब मेरे जैसे साधारण श्रद्धालु को माता की शरणागति का थोड़ा सा प्रयत्न करने पर इतना लाभ हो सकता है, तो जो लोग पूर्ण निष्ठा से माता का अंचल पकड़ते हैं उन्हें निश्चय ही मुझसे अनेक गुना लाभ होता रहेगा।
(पं. रामशंकर त्रिवेदी, टिकरा)
भारत के स्वाधीनता संग्राम में मुझे कई बार जेल जाने का अवसर मिला। जेल मेरे लिए तपोभूमि बनी और मैंने वहीं से गायत्री की विशेष साधना प्रारम्भ की। साधना प्रारम्भ करने से पूर्व की स्थिति और वर्तमान स्थिति की तुलना करने पर यह साफ दिखाई देता है कि मेरे जीवन में इस उपासना ने अन्तर एवं परिवर्तन उपस्थित कर दिया है।
इस बीच में अनेक बार मुझे ऐसे अनुभव हुये हैं जिनसे यह प्रतीति हो गई की माता की विशेष कृपा अपने को प्राप्त है और उनके सन्देश समय-2 पर प्राप्त होते हैं।
एक बार की घटना है कि मकान की छत ऊपर से गिरी और गिरने से एक दो सैकिंड पूर्व ही किसी ने वहाँ से घसीट कर मुझे बाहर कर दिया था। अन्तिम पैर बाहर रखते ही छत ऊपर से गिरी और मैं बाल-बाल बच गया। मुझे इस प्रकार मृत्यु के मुख में से बचा लेने वाली माता गायत्री ही थी।
इसी प्रकार एक बार मैं अकबरपुर ग्राम में गया, वहाँ पं. छेदालाल दीक्षित के पुत्र का यज्ञोपवीत था। समारोह में बहुत व्यक्ति जमा थे। अचानक वर्षा होने लगी और सारे रंग में भंग हो गया। न तो संस्कार करने की ठीक व्यवस्था बन रही थी और न प्रीतिभोज का अवसर बन रहा था उस दिन मेरा मौन था। मैंने लिखकर उन्हें दिया कि दो ब्राह्मण गायत्री जप के लिए बिठा दिये जायं तो सम्भव है विघ्न का निवारण हो। उनने तुरन्त वैसी व्यवस्था कर दी। सब लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि थोड़ी ही देर में वर्षा खुल गई और सब कार्य आनन्द पूर्वक पूरे हो गये।
मेरे एक मित्र पं॰ प्रकाश नारायण शुक्ल एक अच्छे गायत्री उपासक हैं। वे लकड़ी ला रहे थे कि उनके 9 विपक्षियों ने हमला कर दिया। शुक्ल जी दो आदमी थे और विरोधी 9। संकट आने पर माता का नाम लेकर वे मुकाबला करने खड़े हो गये और दो ने नौ को पीट कर भगा दिया। यद्यपि यह दो बिल्कुल निहत्थे थे और वे 9 पहले से ही पूरी साज सज्जा के साथ तैयार होकर आये थे।
इस प्रकार की कई घटनाएं मेरे जीवन में घटित हुई हैं और दूसरों को भी मैंने माता की कृपा से अनेक सफलताएं प्राप्त करते देखा है।
(श्री छेदीलाल शर्मा आयुर्वेद रत्न, कुण्डेश्वर)
मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। मेरे मामा जी श्री पंचदेव जी मुझे अपने यहाँ ले आये और उन्हीं के अनुग्रह एवं प्रबन्ध से मेरी शिक्षा हुई। शिक्षा काल में नवाब सिंह जी नामक एक सत्पुरुष से घनिष्ठता बढ़ी। जहाँ उन्होंने अनेक अन्य सत्य परामर्श देकर मेरे जीवन को सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया वहाँ उन्होंने गायत्री उपासना में तत्पर रहने लगा।
इस साधना से मुझे असाधारण लाभ हुए हैं। कुमार्ग से, कुविचारों से स्वभावतः घृणा हुई और उस मार्ग पर चलने के भीतर से ही ऐसा उत्साह पैदा हुआ जिसके लिए अनेक साधन और सत्संग भी बहुधा सफल नहीं होते। ब्राह्मण का कर्तव्य है उसके जीवन की गतिविधि क्या होनी चाहिए इन शिक्षाओं को अन्तःकरण में बैठी हुई कोई शक्ति मुझे हर घड़ी सिखाती रहती, यह शक्ति और कोई नहीं गायत्री माता ही थी। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यदि छोटी ही आयु से किसी बालक को गायत्री का उपासक बना दिया जाय तो वह सहज ही अनेक प्रकार के दुर्गुणों से बचता हुआ सन्मार्ग का पथिक बन सकता है।
आध्यात्मिक जीवन के अतिरिक्त साँसारिक कार्यों में भी माता की कृपा एवं सहायता के अनेक प्रमाण समय-समय पर मुझे मिलते रहे हैं। कुछ दिन पूर्व ही मैं कम्पाउण्डरी की नौकरी पर नियुक्त हुआ था। उस नियुक्ति को अधिक दिन न बीतने पाये कि उन्नति का नया अवसर आ गया, मैं इंचार्ज वैद्य के पद पर आ गया और आज कुण्डेश्वर औषधालय में सफलता पूर्वक चिकित्सा कर रहा हूँ।
मेरे एक मित्र श्रवण कुमार जी नौकरी की तलाश में कुछ दिन से परेशान थे। मैंने उन्हें गायत्री उपासना की सलाह दी, उन्होंने गत नवरात्रियों में मेरे साथ चौबीस हजार का लघु अनुष्ठान किया। उन्हें माता की कृपा प्राप्त हुई और 10 दिन बाद ही एक अच्छी नौकरी मिल गई। उनके अफसर भी बहुत खुश हैं और आगे उन्नति के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
आयु की दृष्टि से मैं तो अभी बालक ही हूँ। पर आयु वृद्ध और ज्ञानवृद्ध सज्जनों से यही बात सुनने को मिलती है कि गायत्री से बढ़ कर आत्मकल्याण का और कोई मार्ग नहीं है। जो माता का अंचल पकड़ता है उसको आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ ही होता है।
(श्री शुभकार नाथ कपूर, खैराबाद)
जब मनुष्य का बाहुबल, पराक्रम और पुरुषार्थ थक जाता है तब वह हार कर परमात्मा को पुकारता है, ग्राह से पकड़ा हुआ गज जब सब प्रकार हार गया तो उसने सच्चे हृदय से प्रभु को पुकारा उसकी पुकार व्यर्थ नहीं गई। प्रभु को उसकी रक्षा करने के लिए नंगे पाँवों ही दौड़ते बना। सच्ची पुकार का प्रभाव अवश्य होता है।
कुछ समय पहले की बात है हमारे परिवार पर आपत्तियों का एक बहुत बड़ा आक्रमण हुआ था। एक साथ कई संकट सामने आये। बहिन भयंकर रूप से बीमार पड़ी, उसके प्राणों के लाले थे। तार आया था कि ‘दशा अत्यन्त चिन्ताजनक है पेट का आपरेशन होने वाला है” बहिन के बिछोह की कल्पना मात्र से आँखों में आँसू की धारा बह चली।
उन्हीं दिन भाभी जी भी अस्पताल में पड़ी थी। घर के अन्य लोग भी छोटी मोटी बीमारियों के शिकार थे। स्वयं मेरी भी तबियत खराब हो रही थी। इन उलझनों से किस प्रकार पार हुआ जाय, इसका कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ रहा था।
दस दिन की छुट्टी प्राप्त हुई, मैं उसमें गायत्री माता का अनुष्ठान करने बैठ गया। बीमारी के इतने बड़े आक्रमण का मुकाबला करने का साहस न था। माता के अंचल में संकट से बचने का प्रयत्न करने लगा।
साधना साधारण सी थी उसका फल असाधारण हुआ। बहन के यहाँ से तार आया कि “पेट ठीक हो गया। आपरेशन की आवश्यकता नहीं रही।” इस समाचार से भारी सन्तोष हुआ। इतने में खबर आई कि भाभी जी भी ठीक हैं और अस्पताल से छुट्टी होने वाली है। देखते देखते घर के अन्य लोगों का भी स्वास्थ्य सुधर गया। इन दस दिनों में स्वयं मेरा स्वास्थ्य बहुत सुधर गया। जो घर चंद दिन पहले बीमारियों और चिन्ताओं का केन्द्र बना हुआ था, वहाँ की परिस्थिति बिल्कुल बदल गई सब लोग संतोष की साँस लेने लगे।
उन्हीं दिनों मेरी परीक्षा आ गई। तैयारी बहुत कम हो पाई थीं इससे चित्त में बड़ी चिन्ता रहती थी। परन्तु जब प्रश्न पत्र हल करने बैठा तो ऐसा लगता था मानो कोई उनके उत्तर बताता जा रहा है और मैं लिखता जा रहा हूँ। मेरे आनन्द और उत्साह की सीमा न रही।
अब मैं गायत्री का नैष्ठिक उपासक हूँ। ऐसा अन्तरात्मा में आभास होता है कि इसके आँचल को पकड़ कर भावी जीवन की सभी कठिनाइयों को पार कर लेना मेरे लिए सुगम होगा।
थोड़े सुख के परित्याग से यदि बहुत सुख की प्राप्ति होती दिखाई दे तो बुद्धिमान को चाहिए बहुत सुख के लिए थोड़े सुख को त्याग दे।
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सत्पुरुष हिमालय पर्वत की तरह दूर से प्रकाशित होते हैं, और असत्पुरुष रात में फेंके बाण की तरह दिखाई नहीं देते।
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जो फटे पुराने वस्त्रों को धारण करता है, जो पतला दुबला है, जिसकी नसें दिखाई देती हैं, जो वन में अकेला ध्यान करता है, वह ब्राह्मण है। ब्राह्मणी माता से पैदा होकर कोई ब्राह्मण नहीं होता।
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जिसके पास कुछ नहीं है, जो अक्रोधी है, व्रती है, सदाचारी है, घृणा रहित है, वे ही ब्राह्मण हैं। कमल के पत्ते पर बूँद की तरह जो काम भोगों से अलिप्त है, वही ब्राह्मण है। जो गम्भीर प्रज्ञावाला है, जो मेधावी है, जो मार्ग कुमार्ग को पहचानता है, जो असंग्रही है, वह ब्राह्मण है।
जो केन्द्रीय गायत्री तीर्थ मथुरा में बन रहा है उसकी अपनी कुछ विशेषता रहेगी। लाखों मन्दिरों में एक की संख्या और बढ़ा देने से कुछ लाभ नहीं। इस तीर्थ को तो बनाना है जिसमें गायत्री की विशेष सत्ता की उपस्थिति प्रत्यक्ष अनुभव में आवे। जैसे बर्फखाने में प्रवेश करते ही ठण्ड मालूम पड़ती है और जलती हुई भट्टी के पास गर्मी अनुभव होती है वैसे ही उस तीर्थ में ऐसी चैतन्य शक्ति का अवतरण किया जाना चाहिये जिसको शाँति और सात्विकता का, प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सके। ऐसा चैतन्य शक्ति केन्द्र बनाने में आपके विशेष सहयोग की आवश्यकता है। उस सहयोग को देकर आप अपना भी और समस्त संसार का भी भारी कल्याण करेंगे।
पूर्व युग में जब असुरों के उत्पात अत्यधिक बढ़ गये थे और देवताओं से उसका निवारण न हो सका तब ब्रह्माजी की सलाह से सब देवताओं ने अपनी थोड़ी-थोड़ी शक्ति एक केन्द्र पर एकत्रित की। उस सम्मिलित शक्ति केन्द्र से प्रचण्ड बल शालिनी सिंह वाहिनी दुर्गा पैदा हुई और जिन असुरों को वे देवता नहीं मार सकते थे उन्हें उस महाकाली ने अपनी विकराल शक्ति से चूर्ण विचूर्ण कर डाला। इसी प्रकार की एक घटना त्रेता में हुई थी। लंका के असुर अत्यधिक उत्पात करने लगे तो ऋषियों ने मिलकर एक योजना बनाई। सबने अपने शरीर से थोड़ा-थोड़ा रक्त निकाला और उसका एक घड़ा भरकर भूमि में गाढ़ दिया। कालान्तर में खेत जोतते समय राजा जनक को यह घड़ा सुन्दर बालिका के रूप में मिला। उस बालिका का नाम ‘सीता’ रखा गया और वे सीताजी ही आगे चलकर राक्षसों के कुल का विनाश करने का कारण बनी। उच्च आत्माओं का ब्रह्मबल एवं तप एक स्थान पर एकत्रित हो तो निश्चय ही उसका सम्मिलित केन्द्र अनन्त और प्रचण्ड शक्ति का उद्गम बन सकता है। आज भी असुरता के उत्पात कम नहीं हैं, हमारे भीतर, बाहर,चारों ओर असुरता का साम्राज्य छाया हुआ है, उसके कारण मनुष्य जाति नाना प्रकार के कष्टों से संत्रस्त हो रही है। उसका निवारण करने के लिये पूर्व काल के ऋषियों और देवताओं की भाँति ही सम्मिलित अध्यात्मिक प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता होगी।
अनेकों तत्ववेत्ता और सूक्ष्मदर्शी आत्माओं की अभिमति यह है कि यदि 24 हजार सत्पुरुष चौबीस-चौबीस सौ गायत्री मन्त्र श्रद्धापूर्वक लिखें और वे सब एक स्थान पर एकत्रित हों तो इतनी विस्तृत साधना, भावना, श्रद्धा एवं तपश्चर्या का सम्मिलित केन्द्र गायत्री की सूक्ष्म चैतन्यता से इतना ओत-प्रोत हो सकता है वहाँ उपस्थित होने वाला मनुष्य उस महाशक्ति की सत्ता को इस स्थान पर प्रत्यक्ष अनुभव करे। ऐसे स्थान पर बैठने मात्र से लोगों की सद्बुद्धि बढ़ सकती है, और उस स्थान में की हुई साधना भी अपना विशिष्ठ परिणाम उपस्थित कर सकती है।
आप बन्धुओं के प्रयत्न और सहयोग से जो गायत्री मन्दिर मथुरा में बन रहा है वह ऐसा ही शक्ति सम्पन्न बने। इस आशा से यह प्रयत्न किया जा रहा है कि चौबीस हजार सत्पुरुष 24-24 सौ गायत्री मन्त्र लिखकर इस तीर्थ के लिए अपना आध्यात्मिक सहयोग प्रदान करें। यह कार्य कठिन और बहुत विस्तृत तो अवश्य है पर आप बन्धुओं के सहयोग और प्रयत्न से तथा माता की कृपा से पूरा हो सकता है। प्राचीन काल में आत्म कल्याण के लिये ऋषि मुनि त्याग और तपस्या से पीछे नहीं हटते थे और परमार्थ के लिए अपना शरीर तक छोड़ने को तैयार रहते थे। उस मार्ग पर यदि हमें भी चलना है तो थोड़ा बहुत त्याग और तप तो हमें भी करना ही होगा।
आप सम्भवतः गायत्री जयन्ती के अवसर पर 24 सौ मन्त्र लिख कर भेज चुके होंगे, या कुछ कम रहे होंगे तो उनको पूरा करने में लगे होंगे, अथवा अब लिख रहे होंगे। यदि अभी आरम्भ न किया हो तो अब आरम्भ कर दें। एक मिनट में एक मन्त्र बड़ी आसानी से लिखा जा सकता है, यदि 24 मिनट लगाकर 24 मन्त्र नित्य लिखे जायं तो वे सौ दिन में आसानी से पूरे हो सकते हैं। यदि अधिक समय लगाया जाय तो और भी जल्दी एवं अधिक संख्या में लिखे जा सकते हैं। मन्त्र जपने की अपेक्षा लिखने का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया है। चौबीस सौ मन्त्र लिखने का पुण्य करीब सवा सवालक्ष के दो पुरश्चरण पूरे करने के बराबर हो जाता है। इतना कर लेना आत्म-शुद्धि एवं पुण्य परमार्थ की दृष्टि से एक बहुत बड़ा काम कर लेने की बराबर है।
हमें विश्वास है कि आप इस मन्त्र लेखन यज्ञ में सम्मिलित हो चुके हैं या होंगे पर इतने से ही काम न चलेगा। 24 हजार व्यक्तियों को तैयार करने का काम बहुत बड़ा है, इस संख्या में शेष कुछ की पूर्ति आपको भी करनी है। अपने निकटवर्ती धार्मिक प्रवृत्तियों के लोगों में आप गायत्री की महिमा उसके मन्त्र लेखन का महत्व, चैतन्य तीर्थ की आवश्यकता समझावें तो थोड़े बहुत सत्पुरुष इस पुण्य कार्य में सहयोग देने के लिए तत्पर अवश्य हो सकते हैं। क्या आप दो-चार व्यक्तियों को भी इस कल्याणकारी कार्य के लिए तत्पर नहीं कर सकते हैं।
धार्मिक प्रवृत्ति के और साधना पूजा में निष्ठा रखने वाले कुछ ऐसे सज्जनों के पूरे पते आप हमें भी लिख भेजें जो आपसे दूर रहते हों या जिन तक आपकी पहुँच न हो सकती हो। उन पतों पर हम यहाँ से इस “मन्त्र लेखन यज्ञ”में सम्मिलित होने के लिए प्रेरणा पत्र भेजेंगे। अपने निकटवर्ती लोगों के उन सज्जनों के पते भेजने की जरूरत नहीं है जिन तक आप स्वयं पहुँच सकते हैं।
मंत्र लेखन के नियम बड़े सरल हैं कोई भी द्विज स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध उसमें प्रसन्नता पूर्वक भाग ले सकती हैं। स्कूली कापी साइज की कापियों पर सुबोध अक्षरों में शुद्धतापूर्वक मंत्र लिखने चाहिए। स्याही या कलम का कोई प्रतिबंध नहीं है। साधारणतः एक व्यक्ति से 2400 मंत्र लिखने की अपेक्षा की जाती है। जो अधिक लिख सकते हों वे प्रसन्नता पूर्वक अधिक लिखें। रोगी, असमर्थ, वृद्ध, कम पढ़े, या कार्य व्यस्त लोग अपनी स्थिति के अनुसार एक हजार या कम से कम 240 मंत्र लिख सकते हैं। पूरे हो जाने पर इन्हें रजिस्ट्री बुक पोस्ट से “अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा” के पते पर भेज देना चाहिए।
कापी के आरम्भिक पृष्ठ पर अपना नाम, पूरा पता, शिक्षा, आयु, वर्ण, व्यवसाय, परिवार तथा अब तक के जीवन का संक्षिप्त वृत्तांत भी लिखना चाहिए और यदि संभव हो तो फोटो भी भेजा जाय। कारण यह है कि सम्भवतः गायत्री संस्था की ओर से देश भर के गायत्री उपासकों का एक विस्तृत सचित्र परिचय एवं इतिहास ग्रन्थ छपेगा उसमें इन सब बातों का उल्लेख होगा।
सम्भव हो तो मन्त्रों की पुस्तक जिल्द बनाकर भेजनी चाहिये। वैसे न हो सके तो जिल्दें यहाँ बनायी जायेंगी और उनको मन्दिर के समग्र कक्ष में सुन्दर रीति से सुसज्जा के साथ हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखा जायगा और उनका नित्य पूजन होता रहेगा। आपका यह परम पुनीत आध्यात्मिक स्मारक ऐसे स्थान पर अवस्थित होगा जहाँ का सूक्ष्म पुण्य प्रभाव आपकी आत्मा तक निरन्तर पहुँचता रहेगा।
आश्विन मास की विजयादशमी पर आपकी यह श्रद्धांजलि अर्पित की जा सके तो बहुत ही उत्तम है। वैसे आप अपनी सुविधानुसार उससे आगे पीछे अथवा न्यूनाधिक संख्या में भी भेज सकते हैं। यदि आप कुछ मन्त्र लिखकर भेज चुके हैं तो भी और अधिक मंत्र लिखने के लिए पुनः प्रयास आरम्भ कर सकते हैं। “अधिकस्य अधिकं फलम्”।
(1)
धर्म-नीति, विज्ञान ज्ञान का तत्व छिपा है इसमें,
परम ब्रह्म का इतना ज्यादा है रहस्य प्रिय किसमें?
योग-तंत्र, ज्योतिष्य, आदि इसके सारे अनुचर हैं,
देव असुर भी हुए न इसकी सीमा के बाहर हैं॥
कैसे बन्दी हो शब्दों में गायत्री की महिमा।
कोई कवि क्या लिखे भला इस परम शक्ति की गरिमा॥
(2)
इसके प्रति अक्षर में ही हैं छिपी एक प्रिय शिक्षा,
जो देती युग युग से मानव को पावनतम् की दीक्षा।
इस संवंल को पकड़ पार हम भव बन्धन से होते,
इस गंगा में कलुष कल्मषों को हैं जग जग धोते॥
नियम यही इन शिक्षाओं को जन प्रति जन अपनायें।
इसके द्वारा होने वाले शुभ फल को भी पायें॥
(3)
भूला नर अध्यात्म इसी से कष्ट बढ़े हैं जग में,
शूल बिछे हैं इसीलिए तो जीवन के शुभ मग में।
नष्ट हुआ इससे ही जग का सारा उन्नति क्रम है,
बदले जग में, बदला सब कुछ, सत्य बन गया भ्रम है॥
जग का पुनरोद्धार स्वयं कर सकती है गायत्री।
फिर से मुख संपत्ति शाँति भर सकती है गायत्री॥
(4)
सुनते हैं सब लोग ध्यान से पुण्य मन्त्र गायत्री,
दुःख मोचन, सुखकारी सुन्दर दिव्य तंत्र गायत्री।
अन्धकार मय जीवन पथ पर है प्रकाश गायत्री,
मानव को दैवत्व प्राप्ति के हित प्रयास गायत्री॥
गायत्री है परम ब्रह्म की मंगल कारी वाणी।
गायत्री है इस कलियुग की कामधेनु कल्याणी॥
*समाप्त*
(श्री शिव शंकर मिश्र एम. ए.)