भगवान बुद्ध के उपदेश

-जिसका चित्त मल रहित है। जिसका चित्त स्थिर है जो पाप विहीन है उस जागरुक पुरुष के लिए भय नहीं है।

-अहो! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतन रहित हो काठ की भाँति धरती पर गिर पड़ेगा।

-न माता पिता, न दूसरे रिश्तेदार आदमी की उतनी भलाई करते हैं जितनी भलाई सन्मार्ग पर गया हुआ चित्त करता है।

-न दूसरों के दोष को, न दूसरों के कृत-अकृत को देखो। अपने ही कृत-अकृत को देखते रहो।

-जागते रहने वाले की रात लम्बी होती है। थके हुए का योजन लम्बा होता है। इसी प्रकार सद्धर्म को न जानने वाले मूर्ख आदमी का साँसारिक आवागमन लम्बा हो जाता है।

-यदि विचरण करते हुए अपने से श्रेष्ठ व अपने जैसे साथी को न पाये तो आदमी दृढ़ता पूर्वक अकेला ही रहे। मूर्ख की संगत अच्छी नहीं।

-पुत्र मेरे हैं। घर मेरा है। ऐसा सोच मूर्ख आदमी दुखी हो जाता है जब शरीर तक अपना नहीं है तब पुत्र कहाँ? और धन कहाँ?

-यदि मूर्ख अपने को मूर्ख समझे तो उतने अंश में तो बुद्धिमान है। असली मूर्ख तो वह है जो मूर्ख होते हुए भी अपने को पंडित समझता है।

-उस काम का करना अच्छा नहीं है जिसे करके पछताना पड़े और जिसके फल को रोते हुए भोगना पड़े।

-जब तक पाप कर्म फल नहीं देते तब तक मूर्ख उन्हें मधु की तरह मीठा समझता है लेकिन जब पाप कर्म फल देता है तब उसे दुःख होता है।

-लाभ का रास्ता दूसरा है और निर्वाण का दूसरा। इसे इस प्रकार जानकर बुद्ध का शिष्य भिक्षु सत्कार की इच्छा न करे विवेक व एकान्तचर्या की वृद्धि करे।

-जो आदमी अपना दोष दिखलाने वाले को धन दिखलाने वाले की तरह समझे, जो संयम के समर्थक मेधावी पंडित की संगति करे उसका कभी अकल्याण नहीं हो सकता है।

-न दुष्ट मित्रों से संगति करे। न अधर्मी पुरुषों की संगति करे। अच्छे चित्रों की संगति करे। उत्तम पुरुषों की संगति करे।

-जो पार पहुँचते हैं वे तो मनुष्यों में थोड़े ही हैं। बाकी आदमी तो किनारे पर ही दौड़ते रहते हैं।

-सत् पुरुष आसक्त नहीं होते। वह काम भोगों के लिये बात नहीं बनाते। उन्हें चाहे दुख हो चाहे सुख। वे विकार को प्राप्त नहीं होते।

-सारथी द्वारा सुरक्षित घोड़ों की तरह जिनकी इन्द्रियाँ शान्त हैं जिसका अभिमान नष्ट हो गया है जो आश्रय रहित है। ऐसे पुरुष की देवता भी स्पृहा करते हैं।

-एक आदमी संग्राम में लाखों आदमियों को जीत ले और एक दूसरा अपने आपको जीत ले। यह दूसरा आदमी ही सच्चा संग्राम विजयी है।

-जो अभिवादन शील है जो नित्य बड़ों की सेवा करता है। उसके आयु, बुद्धि तथा बल में वृद्धि होती है।

-आलसी और अनुद्योगी के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ता पूर्वक उद्योग करने वाले का एक दिन का जीवन अच्छा।

-शुभ कर्म करने में जल्दी करो। पापों को मन से हटाओ। शुभ कर्म करने में ढील करने पर मन पाप में रत होने लगता है।

-यदि पाप बने तो उसे दुबारा फिर न करे उसमें रत न होवे। पाप का संचय दुःख का कारण होता है।

वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -6


पथिक!


पथिक (Kavita)

(श्री हरगोविन्द वर्मा, राठ)

राही साहस छोड़ न देना!

एकाकी बढ़ता जा अपने बीहड़ दुर्गम पथ पर।

स्थान दूर है देर न कर, रह चलने में ही तत्पर॥

होकर श्रम से कातर चलने से मुँह मोड़ न लेना!

राही साहस छोड़ न देना!

कहीं बितानी तुझे पड़ेगी, रात्रि दुःख-प्रद काली।

और साथ ही कहीं मिलेगी, वैभव की हरियाली॥

दुख से व्यग्र न होना, सुख से नाता जोड़ न लेना!

राही साहस छोड़ न देना!

हिंसक जीवों से डर कर के, अपना धैर्य न खोना।

सावधान रहना माया का, लख कर जादू-टोना॥

देख राह में इन्द्र-परी को रे व्रत छोड़ न देना!

राही साहस छोड़ न देना!

तेरे अटल-धैर्य के आगे, मार्ग सुगम सब होगा।

और शीघ्र ही पावन सारा, नर जीवन तब होगा॥

किन्तु कहीं पथ में ही प्रभु से, नाता तोड़ न लेना!

राही साहस छोड़ न देना!


आपत्तियों से डरिये मत

तुषाराणाँ प्रपातेऽपि प्रयत्नो धर्म आत्मनः।

महिमाच प्रतिष्ठाच प्रोक्तोऽपारः श्रमस्यहि॥

अर्थ- आपत्ति आने पर भी प्रयत्न करना आत्मा का धर्म है। प्रयत्न की महिमा और प्रतिष्ठा अपार है।

मनुष्य के जीवन में विपत्तियाँ, कठिनाइयाँ, विपरीत परिस्थितियाँ, हानियाँ और कष्ट की घड़ियाँ भी आती ही रहती हैं। जैसे रात और दिन समय के दो पहलू हैं वैसे ही सम्पदा और विपदा सुख और दुख भी जीवन रथ के दो पहिये हैं। दोनों के लिए ही मनुष्य को धैर्यपूर्वक तैयार रहना चाहिए।

विपत्ति में छाती पीटें और न सम्पत्ति में इतराकर चलें।

कठिन समय में मनुष्य के चार साथी हैं (1) विवेक (2) धैर्य (3) साहस (4) प्रयत्न। इन चारों को मजबूती से पकड़े रहने पर बुरे दिन धीरे धीरे निकल जाते हैं। और वे जाते समय अनेक अनुभवों, गुणों, योग्यताओं तथा शक्तियों का उपहार दे जाते हैं। चाकू पत्थर पर घिसे जाने पर तेज होता है, सोना अग्नि में पड़कर खरा सिद्ध होता है, मनुष्य कठिनाइयों में पड़ कर इतनी शिक्षा प्राप्त करता है जितनी कि दस गुरु मिलकर भी नहीं सिखा सकते। इसलिए कष्ट से डरना नहीं चाहिए वरन् उपरोक्त चार साधनों द्वारा संघर्ष करके उसे परास्त करना चाहिए।

मनुष्य जीवन में दुख और कठिनाइयों का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। कठिनाइयों के आघातों में ही प्रगति का विधान छिपा हुआ है। यदि सदा केवल सरलता और अनुकूलता ही रहे तो चैतन्यता घटती जायगी और मनुष्य शनैःशनैः आलसी, और अकर्मण्य बनने लगेगा उसके मनः क्षेत्र में एक प्रकार का अवसाद उत्पन्न हो जायगा जिसके कारण उन्नति, अन्वेषण, आविष्कार और महत्वाकाँक्षाओं का मार्ग रुद्ध हुए बिना न रहेगा। जब तक दुख की अनुभूति न हो तब तक सुख में कोई आनन्द नहीं मिल सकता। रात न हो सदैव दिन ही रहे तो उस दिन से किसे क्या आनन्द मिलेगा? यदि नमक मिर्च, कडुआ कसैला स्वाद न हो और केवल मीठी ही मीठी सदा खाने को मिले तो वह मधुरता एक भार बन जायगी। इसी प्रकार सुख में आनन्द का आस्वादन होना तभी संभव है जब दुख का पुट साथ-साथ में हो। दुख को हम बुरा कहते हैं पर वस्तुतः वही प्रगति का वास्तविक केन्द्र है।

संसार में जितने महापुरुष हुए हैं, उनकी महानता, यश एवं प्रतिष्ठा का कारण उनकी कष्ट सहिष्णुता ही है। राजा हरिश्चन्द्र यदि भंगी के हाथों न बिके होते तो वे भी मामूली राजा रईसों की भाँति मर खप गये होते, कोई उनका नाम भी न जानता होता। दधिचि, शिवि, प्रहलाद, मोरध्वज, सीता, दमयन्ती, द्रौपदी, कुन्ती, आदि के जीवन में यदि कठिनाई न आतीं, वे लोग भोग ऐश्वर्य से पूरित जीवन बिताते रहते तो उनकी महानता का कोई कारण शेष न रहता। दुर्गम पर्वतों पर उगने वाले वृक्ष ही विशाल आकार के और दीर्घजीवी होते हैं, जो फुलवारी नित्य सींची जाती है वह कुछ ही दिन में मुरझाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती है। जो समाज एवं राष्ट्र परिश्रमी और कष्ट सहिष्णु होता है वही विजय और उन्नति का वरण करता है। इतिहास बताता है कि जो जातियाँ सुखोपभोग में डूबी वे थोड़े ही समय में हतप्रभ होकर दीनता और दासता के गर्त में गिर पड़ी।

हमारे पूर्वज कष्ट सहिष्णुता के महान लाभों से भली प्रकार परिचित थे, इसलिए उन्होंने उसके अभ्यास को जीवन व्यवस्था में प्रमुख स्थान दिया था। तितीक्षा और तपश्चर्या के कार्यक्रम के अनुसार वे दुखों से लड़ने का वैसा ही पूर्णाभ्यास करते थे जैसे युद्ध-स्थल में लड़ने से पूर्व फौजी जवान को बहुत दिन तक युद्ध कौशल की शिक्षा प्राप्त करनी होती है। राजा रईसों के बालक भी प्राचीन काल में शिक्षा प्राप्त करने के लिये ऋषियों के गुरुकुलों में जाया करते थे और कठोर श्रम-जीवी दिनचर्या को अपना कर विद्याध्ययन करते थे। जैसे जलाशय को पार करने का अवसर मिलने पर तैराक को बड़ा उत्साह और आनन्द होता है वैसे ही कष्ट सहिष्णु जीवन के अभ्यासी को नाना प्रकार की उलझनों और आपत्तियों को पार करने में अपने पौरुष और गौरव के विकास का उत्साहवर्धक अवसर दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत जो लोग केवल सुख ही सुख को चाहते हैं, वे अति सामान्य-रोजमर्रा के जीवन में आती रहने वाली घटनाओं से भी ऐसी घबराहट, चिन्ता, बेचैनी और पीड़ा अनुभव करते हैं मानों उन के सिर पर कोई भारी वज्र टूट पड़ा हो।

कठिनाइयाँ हर मनुष्य के जीवन में आती हैं, उनका आना अनिवार्य और आवश्यक है। प्रारब्ध कर्मों के भोग के बोझ को उतारने के ही लिए नहीं वरन् मनुष्य की मनोभूमि और अन्तरात्मा को सुदृढ़, तीक्ष्ण, पवित्र, प्रगतिशील, अनुभवी और विकसित करने के लिए भी कष्टों एवं आपत्तियों की भारी आवश्यकता है। जैसे भगवान मनुष्य को दया करके नाना प्रकार के उपहार दिया करते हैं वैसे ही वे दुख और आपत्तियों का भी आयोजन करते हैं, जिससे मनुष्य का अज्ञान, अहंकार, आलस्य, अपवित्रता और व्यामोह नष्ट हो। किसी विद्वान का यह वचन पूर्णतया सत्य है कि “एक आपत्ति दस गुरुओं से अधिक शिक्षा देती है।”कठिनाइयाँ आने पर हतप्रभ, किंकर्त्तव्यविमूढ़ या कायर हो जाना और हाथ पैर फुलाकर रोना झींकना शुरू कर देना, अपने को या दूसरों को कोसना सर्वथा अनुचित है। यह तो भगवान् की उस महान् कृपा का तिरस्कार करना हुआ। इस प्रकार तो वह कठिनाई कुछ लाभ न दे सकेगी वरन् उलटे निराशा, कायरता, अवसाद, दीनता, आदि का कारण बन जायगी। कठिनाई देखकर डर जाना, प्रयत्न छोड़ बैठना, चिन्ता और शोक करना किसी सच्चे मनुष्य को शोभा नहीं देता। आपत्ति एक प्रकार से हमारे पुरुषार्थ को ईश्वरीय चुनौती है। जिसे स्वीकार करके ही हम प्रभु के प्रिय बन सकते हैं। अखाड़े के उस्ताद, पहलवान नौसिखिये पहलवानों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं तो उन्हें पटक मार कर दाव पेंच सिखाते हैं। नौसिखिये लोग पटक खाकर शोक संतृप्त नहीं हो जाते वरन् अपनी भूल को समझ कर फिर उस्ताद से लड़ते हैं और धीरे-धीरे पूरे एवं पक्के पहलवान बन जाते हैं। ईश्वर ऐसा ही उस्ताद है जो आपत्तियों की पटक मार मार कर हमारी अनेक अपूर्णताएं दूर कर पूर्णता तक पहुँचाने की महान् कार्य करता है।

गायत्री का “तु” अक्षर इस रहस्य को हमें बताता है। वह स्पष्ट करता है कि कठिनाइयों से डरने या घबराने की कोई बात नहीं, वह तो इस सृष्टि का एक उपयोगी, आवश्यक एवं सार्वभौम विधान है। उससे न तो दुखी होने की जरूरत है, न घबराने की, न किसी पर दोषारोपण करने की। हाँ, हर आपत्ति के बाद नये साहस और नये उत्साह के बाद उस परिस्थिति से लड़ने की और प्रतिकूलता को हटाकर अनुकूलता उत्पन्न करने के लिए प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। यह प्रयत्न आत्मा का धर्म है, इस धर्म को छोड़ने का अर्थ अपने को अधर्मी बनाना है। प्रयत्न की महिमा अपार है। आपत्ति द्वारा जो दुख सहना पड़ता है उसकी अपेक्षा उसे विशेष समय में विशेष रूप से प्रयत्न करने का जो स्वर्ण अवसर मिला उसका महत्व अधिक है। प्रयत्नशीलता ही आत्मोन्नति का प्रधान साधन है जिसे आपत्तियाँ तीव्र गति से बढ़ाती हैं।

प्रयत्न, परिश्रम, एवं कर्त्तव्य-पालन से मनुष्य के गौरव एवं वैभव का विकास होता है। जो आनन्दमय जीवन का रसास्वादन करना चाहता है उसे गायत्री शब्द का उपदेश सुनना चाहिए और कठिनाइयों से निर्भय होकर अपने कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ता पूर्वक आरुढ़ हो जाना चाहिए और हँसते हुए हर स्थिति का मुकाबला करना चाहिए।


मेरे जीवन के तीन प्रमुख सिद्धान्त

(श्री आचार्य विनोबा भावे)

अपने जीवन में मैं तीन बातों को प्रधान पद देता हूँ। उनमें पहली है उद्योग। अपने देश में आलस्य का भारी वातावरण है। यह आलस्य बेकारी के कारण आया है। शिक्षितों का तो उद्योग से कोई ताल्लुक ही नहीं रहता। और जहाँ उद्योग नहीं वहाँ सुख कहाँ? मेरे मत से जिस देश से उद्योग गया उस देश को भारी घुन लगा समझना चाहिए। जो खाता है उसे उद्योग तो करना ही चाहिए, फिर वह उद्योग चाहे जिस तरह का हो। पर बिना उद्योग के बैठना काम की बात नहीं।

घरों में उद्योग का वातावरण होना चाहिए। जिस घर में उद्योग की तालीम नहीं है उस घर के लड़के जल्दी ही घर का नाश कर देंगे। संसार पहले ही दुःखमय है। जिसने संसार में सुख माना है उसके समान भ्रम में पड़ा और कौन होगा? रामदास जी ने कहा है—”मूर्खामाजी परम मूर्ख। जो संसारी मानी सुख।” अर्थात् वह मूर्खों में भारी मूर्ख है जो मानता है कि इस संसार में सुख है। मुझे जो मिला दुःख की कहानी सुनाता ही मिला। मैंने तो तभी से यह समझ लिया है और बहुत विचार और अनुभव के बाद मुझे इसका निश्चय हो गया है। पर ऐसे इस संसार को जरा सा सुखमय बनाना हो तो उद्योग के सिवाय दूसरा इलाज नहीं है, और आज सबके करने लायक और उपयोगी उद्योग सूत-कताई का है। कपड़ा हरेक को जरूरी है और प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुष सूत कातकर अपना कपड़ा तैयार कर सकता है। चर्खा हमारा मित्र बन जायगा, शाँतिदाता हो जायगा—बशर्ते कि हम उसे सम्हालें। दुःख होने या मन उदास होने पर चर्खे को हाथ में ले लें तो फौरन मन को आराम मिलता है। इसकी वजह यह है कि मन उद्योग में लग जाता है और दुःख बिसर जाता है। गेटे नामक कवि का एक काव्य है उसमें उसने एक स्त्री का चित्र खींचा है। वह स्त्री बहुत शोक-पीड़ित और दुखी थी। अन्त में उसने तकली सम्हाली। कवि ने दिखाया है कि उसे उस तकली से साँत्वना मिली। मैं इसे मानता हूँ।

स्त्रियों के लिए तो यह बहुत ही उपयोगी साधन है। उद्योग के बिना मनुष्य को कभी खाली नहीं बैठना चाहिए। आलस्य के समान शत्रु नहीं है। किसी को नींद आती हो तो सो जाय, इस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा, लेकिन जाग उठने पर समय आलस्य में नहीं बिताना चाहिए। इस आलस्य की वजह से ही हम दरिद्र हो गये, परतंत्र हो गये। इसीलिए हमें उद्योग की ओर झुकना चाहिए।

दूसरी बात जिसकी मुझे धुन है, वह भक्ति मार्ग है। बचपन से ही मेरे मन पर यदि कोई संस्कार पड़ा है तो वह भक्ति मार्ग का है। उस समय मुझे माता से शिक्षा मिली। आगे चलकर आश्रम में दोनों वक्त की प्रार्थना करने की आदत पड़ गई। इसलिये मेरे अन्दर वह खूब हो गई। पर भक्ति के माने ढोंग नहीं है। हमें उद्योग छोड़कर झूठी भक्ति नहीं करनी है। दिन भर उद्योग करके अन्त में शाम को और सुबह भगवान का स्मरण करना चाहिए। दिनभर पाप करके, झूठ बोलकर, लबारी-लफ्फाजी करके प्रार्थना नहीं होती। वरन् सत्कर्म करके दिन भर सेवा में बिताकर के वह सेवा शाम को भगवान् को अर्पण करनी चाहिए। हमारे हाथों अनजाने हुए पापों को भगवान क्षमा करता है।

पाप बन आवे तो उसके लिए तीव्र पश्चाताप होना चाहिए। ऐसों के पाप ही भगवान माफ करता है। रोज 15 मिनट ही क्यों न हो, सबको—लड़कों को, स्त्रियों को—इकट्ठे होकर प्रार्थना करनी चाहिए। जिस दिन प्रार्थना न हो वह दिन व्यर्थ गया समझना चाहिए। मुझे तो ऐसा ही लगता है। सौभाग्य से मुझे अपने आसपास भी ऐसी ही मंडली मिल गई है। इससे मैं अपने को भाग्यवान मानता हूँ। अभी मेरे भाई का पत्र आया है। बाबा जी उसके बारे में लिख रहे हैं कि आजकल वह रामचंद्र भाई के ग्रन्थ पढ़ रहे हैं। उन्हें उस साधु के सिवाय और कुछ नहीं सूझ रहा है। इधर उसे रोग ने घेर रखा है, पर उसे उसकी परवा नहीं है। मुझे भाई भी ऐसा मिला है। ऐसे ही मित्र और गुरु मिले। माँ भी ऐसी ही थी। ज्ञानदेव ने लिखा है कि भगवान् कहते हैं—मैं रोगियों के हृदय में न मिलूँ, सूर्य में न मिलूँ और कहीं भी न मिलूँ, तो जहाँ कीर्तन—नामघोष चल रहा है वहाँ तो जरूर ही मिलूँगा। लेकिन यह कीर्तन कर्म करने, उद्योग करने के बाद ही करने की चीज है। नहीं तो वह ढोंग हो जायगा। मुझे इस प्रकार के भक्तिमार्ग की धुन है।

तीसरी और एक बात की मुझे धुन है, पर सबके काबू की वह चीज नहीं हो सकती। वह चीज है खूब सीखना और खूब सिखाना। जिसे जो आता है उसे वह दूसरे को सिखाये और जो सीख सके उसे वह सीखे। कोई बुड्ढा मिल जाय तो उसे वह सिखाये। भजन सिखाये, गीता पाठ करावे, कुछ न कुछ जरूर सिखाये। पाठशाला की तालीम पर मुझे विश्वास नहीं है। पाँच-छह घंटों बच्चों को बिठा रखने से उनकी तालीम कभी नहीं होती। अनेक प्रकार के उद्योग चलने चाहिए और उसमें एक-आध घंटा सिखाना काफी है। काम में से ही गणित इत्यादि सिखाना चाहिए। क्लास इस तरह के होने चाहिये कि एक पैसा मजदूरी मिली तो उसे पहला दर्जा और उससे ज्यादा मिली तो दूसरी दर्जा। इसी प्रकार से उन्हें उद्योग सिखाकर उसी में शिक्षा देनी चाहिए।

मेरी माँ ‘भक्ति-मार्ग-प्रदीप’ पढ़ रही थी। उसे पढ़ना कम आता था, पर एक-एक अक्षर टो-टोकर पढ़ रही थी। एक दिन एक भजन के पढ़ने में उसने 15 मिनट खर्च किये। मैं ऊपर बैठा था। नीचे आया और उसे वह भजन सिखा दिया। और पढ़ा कर देखा, पन्द्रह—बीस मिनट में ही वह भजन उसे ठीक आ गया। उसके बाद रोज मैं उसे कुछ देर तक बताता रहता था। उसकी वह पुस्तक पूरी करा दी। इस प्रकार जो-जो सिखाने लायक हो वह सिखाते रहना चाहिए और सीखते भी रहना चाहिए। पर यह सबसे बन आने की बात नहीं है। पर उद्योग और भक्ति तो सबसे बन आ सकती है। उन्हें करना चाहिए और इस उद्योग के सिवाय मुझे तो दूसरा सुख का उपाय दिखाई नहीं देता है।


भारत की आध्यात्मिक सम्पदा

(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती,)

दुःख तथा पीड़ा पर स्थायी विजय प्राप्त करने में ही महानता अन्तर्हित है। भारत का गौरवपूर्ण उत्तराधिकार जीवन के दुःखों के विनाश तथा पूर्ण आनन्द और शान्ति की महत्वपूर्ण प्रणाली है। जब तक मनुष्य अपने व्यक्तिगत सुख के लिए सचेष्ट है, तब तक मानव पीड़ा का निवारण नहीं हो सकता। भारत की प्रतिभा के लिए यह अमर महत्व की बात है कि उसने प्रचलित बन्धनों तथा सामाजिक प्रतिबन्धों का अतिक्रमण कर सत्य का अनुभव किया है, समझा है और जगत् के सम्मुख यह घोषणा की है कि जीवन एक है अनेक नहीं। संसार के राष्ट्र परस्पर पृथक जान पड़ते हैं और यह पार्थक्य-भावना ही युद्ध तथा विनाश की जननी है। आज के मानव ने जीवन के मौलिक अर्थ समझने की चेष्टा नहीं की है। वह भौतिक-अस्तित्व के दृश्यमान् तल पर ही तैरने में संतुष्ट है। वर्तमान विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म भेदी होने पर भी संसार की जाग्रतावस्था में उसके साधारण अनुभव की खोज मात्र से गम्भीरावस्था में मनुष्य में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं, उन पर इसने ध्यान नहीं दिया है। भारत को इसका गौरव है कि वह जीवन के मूल तह तक जा पहुँचा है और उस स्थाई स्थान का पता लगाया है, जिस पर यह जीवन नाटक खेला जा रहा है। यदि सम्पूर्ण जीवन में कोई वस्तु मूल्यवान् है तो वह जीवन की समस्याओं के समाधान का ज्ञान है। जो पारदर्शी, उत्तम तथा आदर्श जीवन व्यतीत करते हैं उन्होंने सफलता का वह रहस्य पा लिया है जो मानवता को अन्तिम विजय तक पहुँचाता है।

भारतीयों ने जीवन के प्रति जिस दृष्टिकोण का विकास किया है, उसका आधार उस लक्ष पर है, जो जीवन में प्राप्त किया जायगा और जो इसके लिए एक पग, एक अवस्था है, स्वयं लक्ष्य नहीं। यही मानव धर्म अथवा नैतिक विधान है। यह विश्व धर्म क्षेत्र है। धर्म का उद्देश्य ऐसी नीति है, जिस पर उस मनुष्य के जीवन का सम्पूर्ण प्रसाद निर्मित किया जाता है, जो जीवन-संग्राम में विजय प्राप्ति के लिये उत्सुक है। धर्म एक सद्गुण है और सद्गुण ऐसी वस्तु है, जो मनुष्य को पूर्णावस्था में पहुँचाती है। अत्यन्त पूर्णता ही तो जीवन का चरम-लक्ष्य है। इसकी पूर्णता अपरिमित, अप्रतिबन्धित तथा अविच्छिन्न है।

अहिंसा :- अहिंसा सर्वश्रेष्ठ-सद्गुण है, जो मानव मन निषेध सूचक कथन की प्रणाली है। यह ऐसे कर्म, वाणी और विचार से निषेध करती है, जिससे किसी अन्य को दुःख तथा पीड़ा पहुँचे। इसे सिद्धान्तों में हिंसक निषेधमय पक्ष कहते हैं। इसका क्रियात्मक पक्ष विश्व-प्रेम है। वह प्रेम भी ऐसा कि जिसमें पक्षपात नहीं हो और न उसके परिणाम की चिन्ता ही। विश्व प्रेम का आदर्श क्या है? सब में अपने को ही जानकर, सर्वभौम और परिपूर्ण और कूटस्थ। यही विश्व प्रेम का आदर्श है। और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक कोई सभ्यता खरी नहीं और कोई संस्कृति सत्यात्मक नहीं और कुछ भी पूर्ण और शाश्वत नहीं। एक ही शब्द में यदि कहें तो यह सिद्ध होता है कि पूर्ण चैतन्य के प्रकाश में तथा व्यावहारिक अहिंसा में अभिन्नता है। जो क्रिया भी है और भावना भी है।

सत्य व्यवहारः-सत्य द्वितीय सद्गुण है। आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न व्यक्तियों के लिए इसका अर्थ केवल सत्य-भाषण के अतिरिक्त भी और कुछ होता है। सत्य ही विजयी होता है न कि असत्य। सत्य शुद्ध है और अशुद्ध-रूप असत्य है। जो ज्ञान, जो भाषण और जो कर्म हमें अभ्युत्थान और उत्कर्ष की ओर ले जावें,वह शुद्ध है। जिससे अवनति और अपकर्ष हो और जो हमें विश्वपति से दूर ले जावें, वह अशुद्ध है। वासनाओं का नियन्त्रण सत्य का सार है। आत्मत्यागी होना तथा प्रलोभनों से रहित होकर जीवन व्यतीत करना ही सत्य का आचरण करना है। सत्य हमारे जीवन की शाश्वत सत्ता है जो असत्य है हमारे जीवन में उसका परिणाम विनाश और मृत्यु है। घृणा और युद्ध इसके गौण-स्वरूप हैं। आपेक्षिक सत्य उसी समय तक व्यवहार्थ है, जब तक वह उस पूर्ण सत्य का खण्डन नहीं करता, जो हमारे जीवन की पूर्णता है और लोक कल्याण है।

आत्म नियन्त्रण :- आत्म-नियन्त्रण अथवा ब्रह्मचर्य— एक ही कर्म के दो पर्याय हैं। यह वह साधन है, जिससे हम उन प्रलोभनों को रोकते हैं, जो व्यक्तियों को सत्य से दूर रखते हैं। आत्म नियन्त्रण विश्वव्यापी नियम है, जो संसार के समस्त नर नारियों में प्रतिष्ठित हो सभी स्थानों और सभी कालों में व्यवहार्य है। यह जान लेना चाहिए कि विषयों में हमारी अनुरक्ति का कारण है, सत्य और असत्य में विवेक द्वारा भिन्नता जान लेना तथा बाहरी वस्तुओं के संपर्क में आने से उसके अज्ञान जनित-परिणाम को ही सत्य और आनन्ददायक समझ लेना। तब फिर आत्म-नियन्त्रण क्या है। मन की बाहर जाने वाली, अर्थात् पदार्थवाद की ओर जाने वाली, प्रवृत्तियों का अवरोध करना तथा अपनी समस्त वृत्तियों को एक ही सत्य-आदर्श पर केन्द्रित कर देना ही आत्मनियन्त्रण माना गया है। वही एक धर्म है (कर्त्तव्य का अर्थ धर्म होता है) जो जग जीवन का सहायक है। स्वार्थपरता तथा अहंकार हमारे कर्त्तव्य नहीं, वे अधर्म हैं क्योंकि वे मनुष्य जीवन को दुःखमय तथा असफल तथा बन्धमय बना देते हैं। पूर्ण औचित्य का अर्थ होता है विश्व कल्याण के निमित्त आत्मत्याग। केवल भौतिक-कल्याण के लिए, जिसका सम्बन्ध सर्वोच्च अध्यात्मिक सत्य से है। यह मैं हूँ, अथवा अमुक व्यक्ति मेरा विरोधी है अथवा मैं धनी और सम्राट हूँ यह तो सत्य का विपरीत दृश्य है, जिससे ही तो मनुष्य का जीवन अमर नहीं हो पाया। इस विचार पर नियन्त्रण रखना आत्मनियन्त्रण का मौलिक स्वरूप है।

आत्मीयता :- मानवीय सम्बन्धों का यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक कार्यों में हम साहंकारडडडड—परन्तु प्रेम का व्यवहार करें। भारतीय बौद्धिकता अपने पड़ौसी से अपने ही समान प्रेम करने की शिक्षा में इतना जोड़कर पूर्णता प्राप्त करेगी क्योंकि तेरा प्रतिवासी तू ही है। यह सर्वात्म-भाव क्या है? यह असीमित-जीवन के साथ शाश्वत एकता का सूचक है, जो विश्व की गम्भीरता में निहित है। यदि परिवार, समाज अथवा राष्ट्र एक दूसरे से पृथकता का साधन समझा जाता हो तो इसमें मनुष्यों की एकता का जितना अवसर हो, उसकी वंचना होती है और ऐसा परिवार, समाज अथवा राष्ट्र विजयी नहीं हो सकता। मानव के पारस्परिक-भेदभाव सत्ता की पूर्ण एकता में अन्तर्हित किये जा सकते हैं। अपने दैनिक-जीवन की प्रक्रियाओं पर ध्यान रखना चाहिए, जिस से हमारे कार्य स्वार्थपरता से रहित हों और प्रगतिमय प्रकृति के विश्वव्यापी विधान के अनुकूल हों। हमारा जीवन ईश्वर की उपासना के अतिरिक्त और क्या हो सकता है। परिवार देश तथा समाज के शासन में उचित व्यवहार ऐसे विश्वव्यापी शासन का एक अंग है, जो निष्पक्ष दृष्टि से जीवों की सम्पूर्णता को देखता है। विश्व का शासक भगवान् है और संसार का शासक भगवान् की एक किरण है। हम जीवित हैं, क्योंकि ईश्वर की एक सत्ता है। अतः जिस प्रकार भगवान् न्यायपूर्ण और सर्व आनन्द है। उसी प्रकार हम भी हमारा जीवन भी पूर्ण तथा न्याययुक्त हो सकता है।

भारत का महान उत्तराधिकार :- भारत का महानतम उत्तराधिकार उसकी आध्यात्मिक ही है—यही भारत की सर्वश्रेष्ठ-निधि है। यही सभ्यता तथा संस्कृति की चरमावस्था है। यही सर्वोत्तम ज्ञान है, जिसके प्राप्त करने की मनुष्य में चेष्टायें जागृत हैं। केवल विश्व प्रेम से ही हमारे कर्त्तव्य का अन्त नहीं होता। यह तो हमारे महान् कार्य की भूमिका है, जिसकी पूर्णता वेदान्तिक सत्य की प्राप्ति है और जो अनेकता में नहीं एकता में ही आधारित है, जो बाह्य नहीं आभ्यान्तरिक है। वास्तविक महान और पूजनीय वही है, जिसने इस शाश्वत सिद्धान्त को अनुभव किया और उसे अपने नित्य के जीवन का अर्थ और स्पष्टीकरण बनाया हो। ऐसे ही पुरुष को हम कहते हैं कि उसने प्रकृति के बन्धनों का अतिक्रमण किया है। भारतीय सिद्धान्त के अनुसार एक ही धर्म है जो भारत का ही नहीं विश्व का भी है और वह विश्व धर्म जीवन के अंतिम सत्य का अनुभव है। यह समझना भ्रम है कि संसार में परस्पर विरोधी अनेक धर्म हैं, क्योंकि जो परस्पर विरोधी हैं, वे धर्म नहीं, अपितु किसी जाति विशेष के विचारों का प्रकटीकरण है। एक धर्म ही ईश्वर प्राप्ति का साधन है अतः ईश्वर एक तो धर्म भी एक ही होना चाहिए।

यदि मनुष्य, जीवन के संकटों से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अपनी इच्छाओं में न्यूनता करनी चाहिए और आत्म-संतुष्ट रहना चाहिए। तर्क-विवाद और भौतिक-कला को ही जीवन की शान्ति का सच्चा स्वरूप जानना हमारी बड़ी भूल होगी। यदि हम सत्य में विश्वास करेंगे और उसी का आचरण अपने नित्य के जीवन में करेंगे, जैसा कि महात्मा गान्धी जी ने किया था, जैसा अनेकानेक-हमारे पूर्वजों का जीवन रहा है, तो अवश्यमेव हम अपने उत्तराधिकार से वंचित नहीं रह सकेंगे, क्योंकि यह ऐसी परम्परा है जो मनुष्य के आन्तरिक गुणों और युग धर्म के साथ-साथ जीवित रहती चली आयी है।

हमारे आध्यात्मिक उत्तराधिकार का अर्थ यह नहीं कि हम उसके विषय में ही जानकर सन्तोष धारण कर लें और समझें कि यही हमारे कर्त्तव्य कर्म की इति श्री है। सच्चा उत्तराधिकारी वही होगा, जो विश्व के वार्तमानिक आचार, विचार, लोक धर्म, सभ्यता, संस्कृति और लौकिक शिक्षा और व्यवहार को अपने गुरुतर उत्तरदायित्व की गोद में संभालकर, भारत का ही नहीं, विश्व के चर और अचर, चेतन, अवचेतन और अति चेतन प्राणि समुदाय को सुख, शान्ति और विश्व कल्याण के मार्ग की ओर ले जायगा।


शरीर पूजा नहीं आत्म-प्रतिष्ठा

(श्री बाबा राघवदास जी)

‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण चगृह्यते।’

—गीता

मनुष्य का शरीर और आत्मा—ये दोनों अलग-अलग होते हुए भी जीवन काल में एक-दूसरे से इतने अभिन्न रहते हैं कि इनको दो कहने में संकोच होता है। शरीर के स्थूल, सूक्ष्म, कारण या महाकारण—कितने भी भेद किये जायँ, तो भी अजर-अमर से उनका इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि साधारण मनुष्य अपने चर्म-चक्षुओं से उनको आत्मा से अलग देखने में असमर्थ ही रहता है। आत्मा के बारे में हमारे उपनिषदों और स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने जो कुछ प्रतिपादन किया है, वह संसार के लिये एक अमूल्य देन है। उससे अधिक आत्मा के विषय में कोई क्या कह सकता है? परन्तु शरीर के सम्बन्ध में लोग नित्य नये नये विचार करते रहते हैं। वर्तमान संसार में तो शरीर को लेकर नाना प्रकार के विचार हो रहे हैं। आजकल हम लोग जितने ‘वाद’ या ‘इज्म’ की बातें पढ़ते-सुनते हैं, वे सब शरीर के सम्बन्ध में किये गये विचार ही तो हैं। ‘शरीर’ शब्द से जिस प्रकार आयुर्वेदशास्त्र कथित शरीर का बोध होता है, उसी प्रकार उससे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, साँस्कृतिक अथवा साहित्यिक शरीर का भी बोध होता है। चूँकि आजकल इस भौतिक संसार में सर्वत्र राजनीति का ही बोलबाला है, इसलिए हम यहाँ राजनैतिक दृष्टिकोण से ही हमारा शरीर तथा साधना का यत्किंचित् विचार करें तो अनुचित न होगा।

राजनीति में आजकल शरीर की रक्षा तथा विनाश के लिए जितना विचार किया जाता है’ उतना शायद ही किसी दूसरे शास्त्र में किया जाता होगा। वर्तमान महायुद्ध इसका एक सुन्दर उदाहरण है। इन दिनों संसार के बड़े-बड़े आला दिमाग इसी योजना के अनुसन्धान में लगे हुये है कि कम-से-कम समय में लाखों अबाल-वृद्ध नर-नारियों के शरीर किस प्रकार नष्ट किये जा सकते हैं। इसी तरह दूसरी ओर संसार के अच्छे अच्छे मस्तिष्क छल-कपट और कूटनीति द्वारा अरबों भाई-बहिनों के शरीर को किस प्रकार पाला पोसा जा सकता है, इसका उपाय सोचने में लगे हैं। इन परस्पर विरोधी उद्योगों में मानव शरीर की विडम्बना भारी है या स्तुति, यही समझ में नहीं आता।

मनुष्य शरीर की जो यह दुर्गति या अन्ध पूजा हो रही है, उसे देखकर मन में यह भाव आता है कि यदि इन दोनों के बीच का रास्ता—मध्यम मार्ग निकल आता तो उससे जगत् का वास्तविक कल्याण होता। यहीं ‘साधना’ का प्रश्न उपस्थित होता है। संसार के सभी सन्तों ने चाहे वे हिंदु हों अथवा बौद्ध, सिक्ख हों या ईसाई, पारसी हों या मुसलमान-एक स्वर से साधना पर जो विशेष जोर दिया है, वह इसलिए नहीं कि वे इन बड़ी-बड़ी बातों का प्रचार करके अपने को पूजावें, बल्कि उनका उद्देश्य यह रहता है कि मानव-शरीर की अवहेलना तथा उपासना के कारण उसके वास्तविक स्वरूप का जो अपमान होता है, उससे उसकी रक्षा हो।

विचार करके देखा जाय तो मनुष्य शरीर की आवश्यकताएं बहुत थोड़ी दिखायी देंगी। खाने के लिए थोड़ा सा अन्न, पहनने के लिये कुछ वस्त्र और रहने के लिए थोड़ा सा स्थान-यही तो उसकी प्रधान आवश्यकताएँ हैं। मनुष्य चाहे राजा हो या रंक, स्थिति भेद से थोड़ा—बहुत अन्तर भले ही हो जाय, परन्तु इन वस्तुओं के परिणाम में विशेष अन्तर नहीं होता। अतः आज का मानव-समाज यदि इस बात को समझ जाय और तदनुसार आचरण करे तो संसार की शान्ति सर्वथा स्थायी बनी रह सकती है। परन्तु आज का मनुष्य इस बात को समझें कैसे जब कि उसके भीतर साधना शक्ति का अभाव है। हाँ किसान, मजदूर आदि वर्ग के लोग जो रोज परिश्रम कर अपने अपने ढंग से मानव समाज की सेवा में लगे रहते हैं, वे न केवल अधिक सुखी और सच्चे हैं, पर इन्हीं के कारण यह संसार अब भी आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। परन्तु जो लोग शारीरिक परिश्रम न करके केवल अधिकार, धन और चातुर्य के बल पर अपना जीवन निर्वाह करना चाहते हैं, उन्हीं के कारण सारे संसार में हाहाकार मचा हुआ है।

सच पूछिए तो संसार को इसी प्रताड़णा से बचने के लिए हमारे शास्त्रकारों ने अन्तद्रष्टा ऋषि-महर्षियों ने ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चार आश्रमों की सुन्दर व्यवस्था की थी। उनका यथाविधि पालन करने पर आपने आप मनुष्य की वृत्तियाँ संयमित हो जाती थीं, वह अपने पैरों पर खड़ा रहता था और फलतः उसके द्वारा संसार में अशान्ति की सृष्टि नहीं होती थी। एक ब्रह्मचर्य आश्रम को ही लीजिए। उस आश्रम में सुदामा जैसे दीन-हीन ब्राह्मण को और श्रीकृष्ण जैसे राजपुत्र को गुरु के यहाँ समान भाव से शारीरिक परिश्रम की साधना करनी पड़ती थी। इसीलिए उन दोनों में राजा रंक का भेद-भाव मिटकर इतना घनिष्ठ प्रेम हो गया था कि वह अनन्त काल तक संसार के लिए एक आदर्श बन गया। इस प्रकार जब हम शतरूपा-जैसी महारानी और पारवती-जैसी राजकन्या को तप की साधना करते देखते हैं तब हमें आश्रम-जीवन का महत्व सहज ही समझ में आ जाता है। रघु और भर्तृहरि जैसे राजाओं को जब हम अपना सर्वस्व लुटाकर मिट्टी के बर्तनों का व्यवहार करते देखते हैं तो हमारे हृदय में उनके प्रति घृणा नहीं होती बल्कि महान आदर का भाव उत्पन्न होता है। क्योंकि उन्होंने शक्तिशाली सम्राट होते हुए भी स्वावलंबन का पाठ पढ़ा और उसे अपने जीवन में उतारा।

इसीलिए आज राजनीति की यह गुहार है कि मनुष्य परिश्रमी बनें, चाहें वह महान् से महान् पथ पर आरुढ़ हो या साधारण नागरिक हों। केवल कुल, विद्वत्ता, अधिकार अथवा धन के कारण ही किसी को महान पद का अधिकारी न बनाया जाय, उसमें तपस्या, संयम और स्वावलम्बन की मात्रा का होना भी अत्यावश्यक है। प्राचीन काल में राजाओं को जो तपस्या करने की आवश्यकता बताई जाती थी, उसका उद्देश्य यही था। आज कल भी परीक्षा लेने के बाद ही किसी पद पर नियुक्ति होती है, परन्तु उस परीक्षा में केवल बौद्धिक विकास की ही जाँच होती है-बल्कि अधिकाँश स्थलों में तो वह भी नहीं होता क्योंकि यह सिफारिश का युग है। कम से कम भारतवर्ष में यही बात देखी जाती है। इस बात को लोग प्रायः भूल जाते हैं कि बौद्धिक विकास के साथ साथ हृदय तथा शरीर का विकास होना भी आवश्यक है। नहीं तो कोई कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो वह रावण जैसा राक्षस बन सकता है यदि उसमें हृदय तथा शरीर का विकास न हो।


आदर्श जीवन का रहस्य

(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्ता एम. ए. एल. टी. फैजाबाद)

जीवन क्या है? चित्रकला, मूर्तिकला, और संगीत कला की भाँति “जीवन भी कला है।” पूज्य बापू के शब्दों में तो “जीवन समस्त कलाओं से श्रेष्ठ है।” जो अच्छी तरह जीना जानता है वही सच्चा कलाकार है और उसी का जीवन वास्तविक तथा आदर्श जीवन है। जैसे समस्त कलाएँ-चित्रकला, मूर्तिकला तथा संगीत कला-अदृश्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति करती है वैसे ही जीवन भी सत्य, शिव और सुन्दर के प्रच्छन्न रहस्यों की अनुभूति और प्रकाशन करता है। जीवन कला के चित्रण के लिए शरीर, मन और बुद्धि का सम्यक् सामंजस्य उसी प्रकार वाँछित है जिस प्रकार चित्रकार के लिए रंग और कूची, मूर्तिकला के लिए पत्थर और छैनी तथा संगीतकार के लिये शब्द, सुर ताल और लय।

जिस जीवन में अच्छी तरह जीने की क्षमता नहीं वह जीवन जीवन ही नहीं। परन्तु अच्छी तरह जीना है क्या? क्या केवल पैदा होना, पेट भरना और एक दिन मर जाना ही जीवन है? क्या ताश, सिनेमा, नाचरंग, इन्द्रिय लोलुपता और विषय वासना का सुख ही सच्चा सुख है? नहीं और कदापि नहीं। मानव योनि समस्त योनियों से श्रेष्ठ है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन, इत्यादि वृत्तियाँ तो पशु पक्षियों में भी पाई जाती हैं। परन्तु जिस बुद्धि और विवेक रूपी धन का अथाह कोष मानव जीवन को प्राप्त है वह अन्य किसी जीवन को नहीं। वास्तव में मानव योनि प्राप्त करना ही दुष्कर है अतएव इसी जीवन में आत्मा को प्राप्त करने की भरपूर चेष्टा करना मानव जीवन का ध्येय एवं परम उद्देश्य है, यही अन्तिम लक्ष्य है जिसके अनेक नाम यथा-निर्वाण, परमगति, परमधाम और ब्राह्मी स्थिति इत्यादि हैं। अतः शरीर की, मन की, बुद्धि की और इन सब के द्वारा आत्मा की शक्तियों का अनुभव और उनका अपने तथा जगत् के कल्याण के लिये विनियोग ही वास्तविक जीवन है।

शरीर को लें तो स्वास्थ्य तथा खान-पान सम्बन्धी नियमों पर ध्यान रखकर उसे जीवन के अन्तिम काल तक शक्तिमान और समर्थ बनाये रखें, श्रेष्ठ कार्यों में उसका उपयोग करें, थकावट और आलस्य को पास न फटकने दें, उसे नीरोग और रोग से लड़ने तथा उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति से भरा रखें। यह शरीर को अच्छा रखना है। मस्तिष्क सक्षम, मुख तेज पूर्ण, शरीर शक्तिमान, जिह्वा मृदु वचन बोलने वाली, नेत्र श्रवण हाथ, पैर-कुदृष्टि निंदा, क्रूर कर्म और कुमार्ग गमन से दूर रहने वाले और इन्द्रियाँ अपवित्र कार्य से घृणा करने वाली तथा निग्रही और नियन्त्रित हों।

मन वह जिसमें अच्छे विचार आयें, आदर्श की कल्पना हों, जो जीवन को, मार्ग में चलते हुए, दृढ़ता प्रदान करें, जिसमें स्वार्थ की भावना न हो दूसरों के हित तथा कल्याण का ध्यान रहें, जो शरीर में उत्साह की तिरंगे बहावे। जिसमें ईर्ष्या, द्वेष, को घटाने तथा हटाने के लिये प्रयत्न हो। ये हैं स्वस्थ मन के लक्षण। वास्तव में मन ही पर मनुष्य का जीवन निर्भर है :—

‘मन होता है जिसका जैसा’

जीवन भी होता है वैसा

यह सत्य ही कहा गया है कि “मनुष्य वैसा ही बनता है जैसे कि उसके विचार होते हैं। विचार साँचा है और जीवन गीली मिट्टी। जैसे विचारों में हम डूबे रहते हैं, हमारा जीवन उसी ढांचे में ढल जाता है, वैसे ही आचरण होने लगते हैं, वैसे ही साथी मिलते हैं, उसी, दिशा में जानकारी, रुचि तथा प्रेरणा मिलती है। शरीर, परिस्थितियाँ, संसार हमारे हृदय के विचारों के आधार पर बनते हैं। उनका रूप हमारे विश्वास के अनुरूप होता है।”

आँतरिक विचार चरित्र और जीवन को बनाते है। अर्थात् विचारों ही पर चरित्र और जीवन पूर्णरूप से अवलम्बित है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह प्रतिदिन कम बुराई और अधिक भलाई करने का अभ्यास करे और विचारशील तथा दृढ़ प्रकृति होकर तत्परता और उद्योग के साथ धीरे धीरे हृदय की समस्त बुरी वृत्तियों और विचारों को त्याग दे और अच्छी वृत्तियों का निरन्तर अभ्यास करता रहे। इस कार्य में उसे श्रेष्ठ मनुष्यों के संपर्क में रहने, श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ने, श्रेष्ठ बातें सोचने, श्रेष्ठ घटनाएं देखने, श्रेष्ठ कार्य करने, तथा दूसरों में जो श्रेष्ठताएं हैं उनकी कद्र करने और उन्हें अपनाने अर्थात् सदैव श्रेष्ठ बातों में ही श्रद्धा रखने से बड़ी सफलता मिलेगी। ऐसा करने से वह दिनों दिन अधिक बलवान, श्रेष्ठ और बुद्धिमान बन जायगा और उसका जीवन उज्ज्वल, शुद्ध, शांतिप्रद, आनन्दमय, और मनोहर होगा। यह है विचारों का जीवन पर प्रभाव।

अब बुद्धि को लीजिए। बुद्धि वह जो विचारों को लक्ष्य की ओर संचालित करे, जो बुराई भलाई का विश्लेषण कर श्रेय की ओर प्रेरित करे, जिसमें समस्याओं के मूल में पैठने की शक्ति हो, जो प्रश्नों को समझे और हल करे, जो जीवन को अंधकार से निकाल कर प्रकाश के मार्ग पर डाल दे, जो अपने और दूसरों के हितों में समन्वय साधे और व्यक्ति तथा समाज के पारस्परिक सम्बन्धों का उचित दिशा में विकास करे। बुद्धि का विकास इस तरफ होने के लिए सत्संग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। सत्संग बुद्धि को प्रेरणा देता है। इस सत्संग का फल महान् है। अच्छाई की दिशा में उन्नति करने के लिए अनिवार्य है कि मनुष्य अपने को अच्छे वातावरण में रखें, अच्छे लोगों को अपना मित्र बनायें, उन्हीं से अपना व्यापार, व्यवहार तथा संघर्ष रखें, सम्भव हो तो परामर्श, उपदेश और पथ प्रदर्शन भी उन्हीं से प्राप्त करें। यथा-साध्य अच्छे व्यक्तियों का संपर्क बढ़ाने के अतिरिक्त अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय भी वैसा ही उपयोगी है। जिन जीवित या स्वर्गीय महापुरुषों से प्रत्यक्ष सत्संग सम्भव नहीं उनकी पुस्तकें पढ़कर सत्संग का लाभ उठाया जा सकता है। एकान्त में स्वयं भी अच्छे विचारों का चिन्तन और मनन करके तथा अपने मस्तिष्क को उसी दिशा में लगाये रहने से भी आत्म सत्संग होता है जो आत्मोन्नति के लिए अति आवश्यक है।

इस प्रकार जिस जीवन में शरीर, मन और बुद्धि का सम्यक् सामंजस्य है वह कितना आनन्दमय और सुखमय जीवन बितायेगा इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। वास्तव में ऐसा ही जीवन आदर्श जीवन है।


आज के मानव की सबसे बड़ी आवश्यकता

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

यदि आज के सभ्य मानव का अन्तः करण चीर कर उसके अन्तः प्रदेश का विश्लेषण किया जाय तो हमें उसकी विक्षुब्धता, अन्तर्द्वन्द्व, मनोवेगों का संघर्ष एवं इच्छाओं का नर्तन देखकर आश्चर्य में आ जाना पड़ेगा। ऊपर से सभ्यता का आवरण पहिन अपनी सम्पूर्ण शिक्षा-संस्कृति के मद में चूर वह अनेकों दुरभिसन्धि, प्रताड़ना, अवसाद, व्यक्ति-क्रम, प्रवंचना, दुर्वाद, परछिद्रान्वेषण, स्वार्थ सिद्धि से आवृत है, तो दूसरी ओर आर्थिक चिन्ताओं की मृगतृष्णा में आच्छन्न है। वह छल, ठगी, धूर्तता से स्वार्थ सिद्धि करना चाहता है। दूसरों को नीचे छोड़ उनकी सुख सुविधा का विचार न कर वह आनन्द की ओर दौड़ता है। उसके पूरे जीवन का पर्यवसान अतृप्ति तथा अशान्ति में होता है।

वासना-मूलक अशान्ति :- अशान्ति का प्रारम्भ वासना की प्रदीप्ति से होता है। जिस अवस्था में वासना का ताण्डव नहीं है, वह शान्ति और प्रसन्नता में व्यतीत होता है। इच्छाओं का आवेग धीमा रहता है। साधारण वस्तुओं के प्रति क्षणिक आकर्षण होता है किन्तु बच्चे को जिद की वस्तु प्राप्त होते ही थोड़ी देर के लिए परितुष्टि का अनुभव होता है। बच्चा सहृदय शान्त, प्रसन्नचित, सुखी जीवन व्यतीत करता है। उसका आन्तरिक जगत् जटिल मानसिक यंत्रणाओं से मुक्त है। वह न किसी से प्रतिशोध लेना चाहता है, न वैर रखता है। उसे आर्थिक, सामाजिक वासना जन्य चिन्ताएँ नहीं होती।

यौवन के प्रारम्भ के साथ वासना की उदीप्ति होती है। वासना भड़क उठती है। दूसरे लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षण होने लगता है। पुरुष स्त्री के प्रति तथा स्त्री पुरुष के प्रति आकर्षित होती है। यह आकर्षण मनः शान्ति को भंग करने का प्रथम केन्द्र है। जब वासना का लगाव या सम्बन्ध प्रारम्भ होता है, तो अशान्ति, अतृप्ति, मायाजाल और सैकड़ों बन्धनों का भी प्रारम्भ हो जाता है। वासना मनुष्य को संसार के मायाजाल से जकड़ने वाली जंजीर है। यह एक ऐसा पत्थर है, जिसे गले में बाँधे मनुष्य इधर से उधर भाराक्रान्त हुआ मारा फिरता है वासना वह नशा है जो हमें पागल कर देता है और मन की शान्ति को भंग करता है।

वासना अपने पूरे जोर पर यौवन काल में रहती हैं। युवक वासना की उत्तेजना से अशान्त रहते हैं। जहाँ उन्हें सुन्दरता दीखती है, वहीं रुककर वे उसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। स्त्री को पुरुष का पुरुष को स्त्रियों का आकर्षण तथातत् सम्बन्धी उत्तेजक वासनामूलक स्मृतियाँ अनन्त मधुर वेदनाओं से भर देती हैं। हृदय में असंख्य हिलोरे उठा करती हैं। वासना भी प्रवंचना निर्वाणोन्मुख दीपशिखा की भाँति भटकती है।

संसार में अतृप्त कौन है? अशान्ति किसे सबसे अधिक है? इसका एक मात्र उत्तर है-वासना के चंगुल में फँसा हुआ युवक, युवती। ये दोनों वासना की उत्तेजना से जीवन संघर्ष में फँसते हैं। विवाह एक सामाजिक बन्धन के रूप से उनके ऊपर असंख्य उत्तरदायित्व लाता है। विवाह का तात्पर्य है सन्तानोत्पत्ति। संतान दुःख का साधन है। संतान का उत्तरदायित्व, भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा, विवाह इत्यादि की नाना चिंताएं मनुष्य की संतान के साथ संयुक्त हैं। जो व्यक्ति जितना विलासी है, भोग में जितना अधिक लिप्त रहता है, उसे ईश्वरीय सजा के रूप में उतने ही बच्चों के भरण पोषण तथा समाज में स्थापन का भार प्राप्त होता है। वासना से संतान और संतान से असंख्य चिंताएं चिंताओं से मनःशक्ति का भंग होना ये सब घटनाएं परस्पर एक दूसरे से संयुक्त हैं। मृगजल सी ये छाया इच्छाएं मानस सरिता में लहराती हैं।

वासना का प्रक्षालन ही इन तमाम उत्पातों से बचने का उपाय हो सकता है। जो व्यक्ति समझते हैं कि विवाह कर लेने से वे वासना से मुक्त हो सकेंगे, वासना शान्त हो जायगी, वे भूल करते हैं। वासना विष भरी बेल है। एक बार जड़ पकड़ने या ढील देने से यह बुरी तरह फैलता है। “आज आनन्द कर लें, कल से इन्द्रिय निग्रह करेंगे” ऐसा सोचने वाले अपने निश्चय को ढीला कर देते हैं और आजन्म इन्द्रिय लोलुपता के कुचक्र में फँस कर मनः शान्ति को खो देते हैं।

कितने परिताप का विषय है कि इन्द्रिय लोलुपता, भोगविलास, अश्लीलता को प्रोत्साहन देने वाले साधन आजकल बहुत बढ़ गये हैं। समस्त उत्पातों की जड़ सिनेमा है। सिनेमा की अर्द्धनग्न तस्वीरें, प्रेम सम्बन्धी गन्दी कहानियाँ, गन्दे गाने तथा कुसंग का प्रलोभन आज जितना है, उतना कभी नहीं रहा है। विकारों की उत्तेजना पैदा करने वाला सिनेमा है। यह मोहक स्वप्नों का एक ऐसा संसार बनाता है, जो अमिट लालसा, तृष्णाओं की सृष्टि करता है, मन नाना इन्द्रजाल बुनता है, जिसमें उद्याम वासना शत शत फन फैलाये हमारी बुद्धि को निगलने को तैयार रहती है। इन्हीं माया जाल के चक्र में सौरभ-मृग सा अंधा होकर युवक इन्द्रिय सुख के पीछे दौड़ा-दौड़ा फिरता है।

यश, धन, तथा मद द्वारा अशान्ति :- इसी आयु में मनः शक्ति को नष्ट करने वाले और कई प्रलोभन मन में प्रविष्ट होते हैं। प्रथम मद है आर्थिक शक्ति की उपासना। मैं समाज में बड़ा कहलाऊँ, लोग मेरा आदर करें। रुपया होने से मैं आदर का पात्र बन सकूँगा। ‘ऐसे अनेक विचार मनः शक्ति को भंग करते हैं। यश, लाभ, सामाजिक प्रतिष्ठा की अनेक योजनाएं मनुष्य बनाया करता है, जिनमें कुछ पूर्ण तथा कुछ कभी पूर्ण न होने वाली होती हैं। लाभ के लिए वह ऐसे अनेक व्यापारों में संलग्न होता है जहाँ से लाभ उठाने के लिए उसे प्राणपण से अपनी समस्त शक्तियाँ उसमें केन्द्रित करनी पड़ती हैं।

व्यापारी की मनः शक्ति सदा भंग रहती है। वह सोकर, जागकर, बैठकर और सदा सर्वदा अपने हानि लाभ के हवाई महल बनाया करता है। अमुक प्रकार लाभ कर लूँ, अमुक से अधिक झपट लूँ, इस वस्तु को ऐसे बेचूँ, इस प्रकार काला बाजार करूं- ऐसी अनेक धूमिल योजनाएँ उसके मनः क्षेत्र में टकराया करती हैं। उसके प्राण उस पूँजी में लगे रहते हैं, जिसे उसने व्यापार में लगाया है तथा जिसका बढ़ना घटना उसके जीवन मरण का प्रश्न है। यदि उसे व्यापार में लाभ भी हो रहा है, तो वह और लाभ के लोभ में लगा है, यदि हानि है तो बाजार में अपनी साख स्थिर रखने की फिक्र में है। व्यापार एक ऐसा सर दर्द है, जो सदैव आन्तरिक शक्ति को भंग किये रखता है।

व्यापारी की लोभ वृत्ति, अन्तः शक्ति को भंग करने का कारण है, तो उच्च पदाधिकारियों अफसर, वकील, प्रोफेसर, इंजीनियर डॉक्टर इत्यादि अधिक वेतन प्राप्त करने वालों का दंभ और मद उनकी चिन्ता का विषय है। वे समाज के सम्मुख अपना झूठा, अतिरंजित, आकर्षक रूप प्रस्तुत करना चाहते हैं जब कि वस्तुतः अन्दर से वे खोखले, आर्थिक चिन्ताओं से आक्रान्त, फैशन के बाह्य चटकीलेपन में ग्रस्त हैं। उनकी आवश्यकताएँ इतनी बढ़ी हुई हैं कि उनकी पूर्ति के लिए उसी अनुपात में वे धन कमा नहीं पाते। उनकी विलासिता ही उनकी मनः शक्ति को भंग करने वाली राक्षसी है। उन्हें अच्छे वस्त्र चाहिए, आलीशान मकान चाहिए, दूसरों के सामने शान-शौकत प्रदर्शित करने वाले नाना उपकरण चाहिए। उनकी धर्म पत्नियों को आधुनिक फैशन के असंख्य प्रसाधन चाहिए। यह वर्ग थोथी शान, मिथ्या आवश्यकताओं, बाह्याडम्बर, आर्थिक चिन्ताओं, व्यसनों के कारण अशान्त रहता है।

यदि कोई वर्ग शान्त, सन्तोषी और निर्भय हो सकता है तो वह श्रमिक वर्ग है। उनकी थोड़ी सी आवश्यकता हैं, सरल आडम्बर विहीन जीवन है, व्यर्थ ही शान, शौकत दिखावों से वे दूर रह सकते हैं। यदि वे व्यसनों तथा वासना लोलुपता से रक्षा कर सकें तो श्रमिक वर्ग का जीवन मनः शान्ति पूर्ण हो सकता है। लेकिन हम देखते हैं कि उनमें अशिक्षा है। वे अंधविश्वासी, व्यसनी, उजड्ड, अल्पज्ञ मूर्ख हैं। उन्हें आसानी से मूर्ख बनाकर उनका सर्वस्व अपहरण किया जा सकता है। उनका अज्ञान इतना घना है कि वह उन्हें यह प्रतीत नहीं होने देता कि वे ही सरल, संतुष्ट, शांत जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

मनः शान्ति प्राप्त करने के नियम :- ईश्वरीय सृष्टि का कुछ ऐसा नियम है कि जितनी साँसारिकता बढ़ती है, उतनी ही मनः शक्ति नष्ट होती है। मनुष्य जितना दुनिया की भाग दौड़, संघर्ष, रुपये के लोभ, लालच, वासना, झूठी शान, मिथ्या आडम्बर, विलासिता व्यसन में फंसता है, उसी अनुपात में वह अशान्त रहता है।

जगत् में सर्वत्र महंगाई :- महंगाई की पुकार है। वास्तव में महंगाई विलासिता के ऊपर है। जिन्हें कृत्रिम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नाना प्रकार की सामग्रियाँ चाहिए, वे ही दुखी और अशान्त हैं। यदि व्यर्थ की चीजों का परित्याग कर हम आत्म नियंत्रण करें, अपनी शौकीनी को वश में रखें और साँसारिकता छोड़ दें तो मनः शान्ति प्राप्त हो सकती है।

जीवन मुक्त वह पुरुष है, जिसमें साधारण मनो विकारों से उत्पन्न उत्तेजना नहीं है। उत्तेजक स्वभाव सबको शत्रु रूप में देखता है और प्रतिशोध, ईर्ष्या, आदि में उद्विग्न रहता है।

साँसारिकता को (अर्थात् अविद्या को) छोड़कर ज्यों-ज्यों मनुष्य आध्यात्मिक जीवन के समीप आता है उसे जगत् के मिथ्या तत्व का भान होता है। कंचन कामिनी तथा अन्य वस्तुओं का क्षणिक आनन्द दूर होकर वह ब्रह्मानन्द को ही अपने सुख का केन्द्र मानता है।

ज्यों-ज्यों मनुष्य बाहर जगत् में फैली हुई वृत्तियों को अन्तर्मुखी करता है,उसे संसार की तुच्छता का ज्ञान होता है। धीरे-धीरे उसे दैवी विचार तथा ब्रह्म चिन्तन में रस प्राप्त होने लगता है। उसके हृदय में दैवी विचारों का राज्य हो जाता है। “सब देवों का देव मेरे हृदय में विराजमान है” यह भाव जमते ही वह जगत की तुच्छता को समझ जाता है।


आत्म-कल्याण का मार्ग

(श्री गिरीश देव वर्मा, बहराइच)

आत्म-कल्याण का उपाय केवल एक है और वह केवल भगवान को जान लेना। यह तो सभी जानते हैं कि ईश्वर सभी जगह रम रहा है मगर इतना जानने से उस परम पुरुष का ज्ञान नहीं होता है। उसके लिए ईश्वर का उत्कट प्रेम प्राप्त करना आवश्यक है। उसकी भक्ति करना अनिवार्य है। भक्ति का तात्पर्य केवल कर्मकाण्ड से नहीं है। तिलक लगाने, कण्ठी पहनने, गेरुआ कपड़ा रंगने से भी भक्ति नहीं होती है। भक्त तो भगवान के प्रति कहता है कि :—

याप्रीतिरविवेकनाँ विषयेष्वनपायिनी।

त्वामनुस्मरतः सा में हृदयान्मापसर्पत्॥

मूर्ख मनुष्यों को इन्द्रिय भोग विषय के प्रति जिस प्रकार की प्रगाढ़ प्रीति होती है मेरे हृदय में तेरे लिये हे भगवान! वैसी ही प्रीति बनी रहे।

एक बार कोई शिष्य अपने गुरु के पास जाकर बोला प्रभो! भगवान का प्रेम प्राप्त करना चाहता हूँ उपाय बताइये। गुरु ने शिष्य की ओर देखा पर कुछ बोले नहीं, हंस कर रह गये। शिष्य रोज रोज आकर तंग करने लगा कि मुझे भगवान का प्रेम प्राप्त करा दीजिए। एक दिन गुरु उसको लेकर नदी की ओर गये और स्नान करने लगे। शिष्य ने ज्यों ही पानी में डुबकी लगाई कि गुरु ने आकर उसका गला धर दबाया। शिष्य ने पानी से निकलने के लिए खूब हाथापाई की, अन्त में गुरु ने उसे छोड़ दिया और पूछा कि जब तुम पानी में थे तब तुम्हें सब से अधिक किस चीज की जरूरत पड़ी थी। शिष्य ने उत्तर दिया ‘हवा की।’ गुरु ने कहा कि भगवान के लिए भी जब तुम इतने व्याकुल होंगे और संसार रूपी जल के ऊपर आना चाहोगे तब उसके प्रेम को पाओगे।

जब हृदय इतना व्याकुल हो जायगा तब भक्त के हृदय में केवल ईश्वर का ही ध्यान रहेगा। उसके मुँह से अनायास निकल जायगा कि—

“जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है”

फिर तो उसे उपनिषद् के यह वाक्य सत्य मालूम होंगे।

“ईशावास्यमिंदँ सर्व’ यक्तिञ्च जगत्याँ जगत्”

यह जो कुछ जगत में चराचर है सब ईश्वर से परिपूर्ण है। जब इस उच्च कोटि का वैराग्य हो जाता है तब न कोई चिन्ता है, न भय है, न अशक्ति है, न शोक है न मोह है और न ग्लानि है।

“तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः

इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि भी छुट जाते हैं। इस उत्कृष्ट प्रेम को प्राप्त करने का सरल उपाय यह है कि सदैव मृत्यु को याद करते रहो। मृत्यु जब हर समय सामने खड़ी रहेगी तो मनुष्य से कोई पाप नहीं होगा। वह बराबर राम नाम लेता रहेगा। एकनाथ महाराज की एक कथा है। एक सज्जन ने उनसे पूछा कि “महाराज! आपका जीवन कितना सीधा, सादा, कितना निष्पाप, हमारा जीवन ऐसा क्यों नहीं, आप कभी क्रोध नहीं करते, किसी से झगड़ा नहीं करते, कितना शान्त,कितना प्रेम पूर्ण, कितना पवित्र है आपका जीवन “एक नाथ ने कहा।” फिलहाल मेरे बात रहने दो। तुम्हारे सम्बन्ध में मुझे एक बात मालूम हुई है। आज से सातवें दिन तुम्हारी मौत आ जायगी।” अब एकनाथ की बात को झूठ कौन माने। सात दिन में मृत्यु, सिर्फ 168 घन्टे ही बाकी रहे। हे भगवान! यह क्या अनर्थ! वह मनुष्य जल्दी जल्दी घर गया, कुछ सूझ नहीं पड़ता था कि क्या करे। आखिरी समय की, सब कुछ समेट लेने की बाते कर रहा था। अब बीमार हो गया। बिस्तर पर लेट गया। छः दिन बीत गये सात वे दिन एकनाथ उससे मिलने गये। उसने नमस्कार किया। एकनाथ ने पूछा कि क्या हाल है। उसने कहा कि “बस अब चला”। नाथ जी ने पूछा “इस छः दिन में कितना पाप किया? पाप के कितने विचार मन में आये?” वह आसन्न मरण व्यक्ति बोला ‘नाथ जी! पाप के विचार करने की तो बिल्कुल फुरसत ही नहीं मिली। मौत एक सी आँखों के सामने खड़ी थी। ‘नाथ जी ने कहा- ‘हमारा जीवन इतना निष्पाप क्यों है इसका उत्तर अब मिल गया न’ मरण रूपी शेर सामने खड़ा रहे तो फिर पाप सूझेगा किसे। पाप करने के लिए भी निश्चिन्तता चाहिए। मरण का सदैव स्मरण रखना पाप से मुक्त होने का उपाय है। यदि मौत सामने दीखती रहे तो मनुष्य किस बल पर पाप करेगा।

परन्तु मनुष्य मरण का स्मरण टालता है। पास्कल नामक फ्रेंच दार्शनिक ने कहा है कि मौत सदा पीछे खड़ी रहती है मगर मनुष्य उसको भूलने का प्रयत्न करता रहता है। यदि खाना खाते समय, शादी विवाह के अवसर पर किसी ने मौत का नाम ले लिया तो अशुभ माना जाता है। मगर वह एक कठोर सत्य है। हमारा एक एक कदम मौत की तरफ जा रहा है। बम्बई का टिकट कटाकर जब एक बार हम रेल में बैठ गये तो हम भले ही बैठे रहें, परन्तु गाड़ी हमें बम्बई ले जाकर छोड़ देगी। जन्म होते ही हमने मौत का टिकट लिया है। आप बैठे रहिए या दौड़ते रहिए तो भी मौत आयेगी। दौड़ते रहोगे तो भी आयेगी। आप मौत का विचार करें या न करें, वह आये बिना न रहेगी। मरण निश्चित है और बातें भले ही अनिश्चित हों। सूर्य अस्ताचल की ओर गया कि हमारी आयु का एक अंश खा जाता है। जीवन छीज रहा है,एक एक बूँद घट रहा है। जीवन, मृत्यु फिर जीवन, यह क्रम चला जा रहा है। यह मत समझ लो कि मरने के बाद छुट्टी मिल जायगी। जीवन की गंगा तो प्रभू से निकल कर प्रभू में ही मिलेगी। सुख-दुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, आशा-निराशा की जैसी जोड़ी है वैसी ही जन्म-मृत्यु की, न कि जीवन मृत्यु की। जो जन्मता है वह मरता है, जो मरता है वह जन्मता है।

“जन्म ही जीवन का आरम्भ नहीं है, न मृत्यु ही इसका अन्त है, जन्म और मृत्यु तो बस जीवन के एक अध्याय के अथ और इति है।”

इसलिये हमारा कर्तव्य है कि इस अमर अनन्त जीवन का यह छोटा सा अध्याय जो चल रहा है किसी प्रकार दूषित और कलंकित न होने पावे।

मनुष्य जीवन, को सुरदुर्लभ कहा जाता है। इसकी सफलता इसी में है कि चौरासी लाख के चक्र और भव बन्धन से अपने आपको मुक्त कर लिया जाय। यह कार्य आदर्श जीवन लोक सेवा आत्मज्ञान और ईश्वर उपासना द्वारा ही हो सकता है।


Quotation

“तुम संसार की असार वस्तुओं एवं सुखों के साथ समझौता करके जीवन की बहुमूल्य सम्पदा नष्ट न करो। जब तक तुम्हें संसार की वस्तुएँ प्रिय लगती रहेंगी तब तक अहंकार, कलह, कलंक, शोक, मत्सर, लोभादि दोषों से छुटकारा न होगा।


भेंट का शिष्टाचार

(श्री कामता प्रसाद गुरु)

लोग भेंट या मुलाकात के लिए उन्हीं के पास जाते हैं, जिनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध, स्नेह अथवा काम-काज होता है। कभी कभी परिचित व्यक्ति के द्वारा अपरिचित,परन्तु प्रतिष्ठित लोगों से भेंट की जाती है। गोसांई जी ने कहा है—

“इहि सन हठि करिहौं पहचानी।

साधु तें होइ न कारज-हानी॥”

जिसके घर भेंट करने को जाते हैं उसके सुभीते का भेंट करने वाले को अवश्य ध्यान रखना चाहिए। किसी के यहाँ ऐसे समय पर न जाना चाहिये जब उसे किसी से मिलने का अवकाश या सुभीता न हो! घनिष्ठ मित्र एक दूसरे से बिना किसी संकोच के दिन में कई बार मिलते हैं, पर इस अवस्था में भी शिष्टाचार पालने की आवश्यकता है। किसी के यहाँ बिना किसी आवश्यक कार्य के दिन निकलते ही अथवा भोजन के समय या ठीक दोपहरी में जाना अनुचित है। अधिक रात को भी साधारण अवस्था में किसी के यहाँ न जाना चाहिए। कामकाजी लोगों को समय का बहुत संकोच रहता है, इसलिये किसी के यहाँ प्रायः आधे घण्टे से अधिक बैठना उचित नहीं है। यदि इस अवधि में महत्वपूर्ण बातचीत पूर्ण हो सके तो बहुत अच्छी बात है। जिस समय किसी मनुष्य की बातचीत में उदासीनता, शिथिलता अथवा उकलाहट दीख पड़े उस समय समझ लेना चाहिए कि उसे मिलने का अधिक सुभीता नहीं है। इसलिये ऐसे संकेत को सूचना समझ कर उसके यहाँ से चले आने का उपक्रम करना चाहिए। यदि वह जाने वाले व्यक्ति के प्रस्ताव को सुनकर कुछ अधिक बैठने का अनुरोध करे तो यह अनुरोध मान लिया जावे और कुछ समय के पश्चात् उससे विदा ग्रहण की जावे । भेंट के लिए आये हुए सज्जन से उसकी जाति और पद के अनुसार ‘प्रणाम’ ‘नमस्कार’ ‘राम-राम’ अथवा ‘बन्दगी’ कहकर उसका अभिवादन करना चाहिए। परिचित लोगों को इस बात के लिए ठहरना चाहिए कि जब दूसरा अभिवादन करेगा तब हम उसका उत्तर देंगे, भेंट होने पर एक दूसरे का मुँह देखते रहना और कुछ न कहना बड़ी असभ्यता है। इसलिए मुख्य प्रयोजन अथवा और किसी उपयुक्त विषय पर चर्चा छेड़ देनी चाहिए। यदि दिन में एक से अधिक बार भेंट हो तो प्रत्येक बार मिलने पर भी अभिवादन करने में कोई हानि नहीं है। जहाँ तक हो अभिवादन के पश्चात् थोड़ी बहुत बात चीत अवश्य कर ली जावें। यदि और कुछ न हो तो केवल कुशल प्रश्न से ही काम चल सकता है।

किसी के यहाँ जाकर उसके कागज-पत्र, पुस्तकें अथवा दूसरे पदार्थ उठाना धरना अथवा उन्हें बड़े ध्यान से देखना अनुचित है। भेंट करने वाले को उसी कोठे में बैठना चाहिए जो बैठक के लिए नियत हो और उस स्थान में तभी प्रवेश करना चाहिये जब गृह स्वामी अथवा कोई अन्य पुरुष वहाँ उपस्थित हो। पुरुषों की अनुपस्थिति में किसी के यहाँ जाना संदेह की दृष्टि से देखा जाता है इसलिये सभ्य लोगों को संदेह की दृष्टि से बचना चाहिये। जिन लोगों में पर्दे का विशेष प्रचार नहीं है उनके पास अनुमति मिलने पर स्त्रियों के उपस्थित रहते हुए भी जा सकते हैं। यद्यपि पश्चिमीय देशों पर दरवाजा बन्द रहने पर बाहर से पुकारने के लिये साँकल खटकाना अथवा किवाड़ भड़काना अनुचित नहीं समझा जाता, तथापि हमारे देश में इन कार्यों को अनुचित समझते हैं। किसी के दरवाजे जाकर जोर जोर से और लगातार पुकारना भी अनुचित है। दो एक बार पुकारने पर मिलने वाले को यह देखने के लिए ठहर जाना चाहिए कि कदाचित आवाज सुनकर कोई द्वार खोलने को और कुछ सूचना देने आवे।

गृह स्वामी को उचित है कि वह अपने यहाँ आने-वाले सज्जन का उसकी योग्यता के अनुसार स्वागत करे और उसे आदर पूर्वक बिठावे। कुशल प्रश्न के पश्चात् उससे कुछ ऐसी बात करनी चाहिये जो उसकी रुचि के अनुकूल हो अथवा उसके काम काज से सम्बन्ध रखती हो। उसके आने का कारण पूछने की उतावली कभी न की जावे। वह बातचीत में बहुधा आप ही प्रकट हो जाता है अथवा कुछ समय के पश्चात् चतुराई से पूछा जा सकता है यदि तुम्हें अधिक समय न हो और बैठने वाले के कारण तुम्हारे किसी आवश्यक कार्य में हानि की सम्भावना हो तो तुम्हें अपनी कठिनाई नम्रता-पूर्वक और चतुराई से जता देनी चाहिए। ऐसे अवसर पर शिष्टाचार का अधिक पालन करने से लाभ के बदले हानि होगी। मिलने वालों को भी उचित है कि वह गृह स्वामी के सुभीते का पूरा ध्यान रक्खे और उसके कुछ कहने से अप्रसन्न न हो। यदि किसी मुलाकाती को हमारे यहाँ बैठने में अधिक समय लग जावे तो हमारा कर्त्तव्य यह है कि हम उससे कुछ जलपान करने के लिए निवेदन करें और यदि उसके अस्वीकृत करने पर भी हमें यह अनुमान हो कि आग्रह करने पर उसे आपत्ति न होगी तो हमें चाय, फल अथवा मिष्ठान्न से उसको तृप्त करना चाहिए।

यदि किसी मित्र या परिचित व्यक्ति से बाहर अथवा सड़क पर भेंट हो तो वहाँ घण्टों खड़े रहकर बात-चीत करना उचित नहीं। यदि विषय लम्बा हो तो कुछ दूर तक साथ साथ चलकर बात-चीत कर ली जावे, पर ऐसा न हो कि किसी को दूसरे की बात सुनने के लिए विवश होकर कई जरीबडडडडड जाना पड़े।

यदि किसी बड़े आदमी के यहाँ मिलने को जाना हो तो उनके अवकाश का पूरा पता लगा लेना चाहिये और जाकर किसी के द्वारा अपने आने की सूचना भिजवा देनी चाहिए। उन सज्जन के पास पहुँचने पर उपयुक्त आसन ग्रहण करना उचित है और संक्षेप में उन्हें भेंट का तात्पर्य बता देना चाहिये। कार्य हो जाने पर कुछ समय और बैठना अनुचित न होगा। इसके पश्चात् पूर्वोक्त महाशय से आज्ञा लेकर चले आना योग्य है। किसी के यहाँ कभी न जाना जैसा अनुचित है उसी प्रकार बार-बार जाना भी अनुचित है। यदि किसी के यहाँ जाने से जाने वाले को ऐसा जान पड़े कि उसके जाने से गृह-स्वामी को खेद होता है तो ऐसे मनुष्य के यहाँ उसे कभी न जाना चाहिए। कहा भी है—

बचनन में नहिं मधुरता, नैनन में न सनेह।

तहाँ न कबहूँ जाइये, कंचन बरसे मैह ॥

एक दूसरे के यहाँ आने जाने से परस्पर मेल मिलाप पढ़ता है, इसलिए यदि कोई परिचित व्यक्ति अथवा मित्र, जिसके साथ आवागमन का सम्बन्ध है बहुत समय तक किसी के यहाँ न जावे, तो दूसरे मनुष्य को उसके यहाँ उपयुक्त अवसर पर जाना अनुचित न होगा। इससे इस बात का भी निर्णय हो जायगा कि वह मनुष्य जाने वाले से किसी प्रकार अप्रसन्न तो नहीं है। बहुधा उच्चस्थिति के महानुभाव निम्न-स्थिति के लोगों के यहाँ मिलने नहीं आते। यदि उन्हीं का काम हो तो वे इन्हें बुलाने को बहुधा सवारी भेज देते हैं। दो चार बार ऐसे महानुभावों की इच्छा-पूर्ति की जा सकती है, पर उनके बढ़ते हुए दुराग्रह को कम करने की आवश्यकता है। ये लोग निमन्त्रण पाकर भी अपने से छोटे के लोगों के यहाँ आने की कृपा नहीं करते, जिससे शिष्टाचार की बड़ी अवहेलना होती है। ऐसी अवस्था में सज्जनों का यह कर्त्तव्य है कि सदाचारी कंगाल, के यहाँ भले ही चले जावें, पर दुराचारी महाजन के द्वार पर न झाँकें।

मुलाकाती के जाने के पूर्व हमें पान, सुपारी, इलायची आदि से उसका आदर करना चाहिए। जिस समय वह जाने लगे उसकी योग्यता के अनुसार खड़े होकर या दूर तक जाकर अथवा दस कदम बाहर चलकर उसे अभिवादन-सहित विदा देनी चाहिए।


Quotation

—साँसारिक वासना को तुम भयानक रोग की तरह समझो, संयम को, औषधि की तरह समझो। वासना रहित जीवन ही स्वस्थ जीवन है।


विद्वता की नहीं, भावना की आवश्यकता है।

(श्री स्वामी विवेकानन्द)

संसार में जितने ग्रन्थ उपलब्ध हो सकते हैं, उन सभी का पारायण करके भी हम धर्म या ईश्वर के सम्बन्ध में एक भी शब्द नहीं समझ सकते। जन्म जन्मान्तर तक वाद विवाद करके भी हम इस विषय का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते। यह भी सम्भव है कि संसार में जितने भी प्रतिमा सम्पन्न व्यक्ति हुए हैं, उन सभी से हमारी प्रतिभा बढ़ जाय, परन्तु जब भी हम ईश्वर के समीप तक पहुँचने में जरा भी समर्थ नहीं हो सकते। कभी-कभी तो इसका परिणाम बिलकुल विपरीत ही देखने में आता है। इस बुद्धि कौशल सम्बन्धी शिक्षा के द्वारा क्या कितने ही घोर अधार्मिक-नास्तिक- नहीं पैदा होते देखे गये? पाश्चात्य सभ्यता का यही सबसे बड़ा दोष है कि इसमें केवल बुद्धि कौशल सम्बन्धी शिक्षा मनुष्य को स्वार्थी ही अधिक बनाती है। इसके द्वारा मनुष्य दस गुना स्वार्थ परायण हो जाता है। इसका यही दोष एक दिन पाश्चात्य समाज के पतन का कारण बनेगा। यदि हृदय और बुद्धि में परस्पर विरोधी भाव दृष्टिगोचर हो तो हृदय का ही अनुसरण करना चाहिए बात यह है कि प्रतिभा की एक मात्र मर्यादा युक्ति है। इस युक्ति के अंतर्गत रह कर ही प्रतिभा काम करती है इसके बाहर जाने में वह समर्थ नहीं है।

केवल हृदय में इतनी शक्ति है कि वह हमें उच्चतम क्षेत्र तक पहुँचा सके। उस क्षेत्र तक पहुँचाना प्रतिभा का काम नहीं है। हृदय प्रतिभा से बहुत दूर निकल जाता है, और वह उस स्तर तक पहुँच जाता है, जो अनुभूति के नाम से प्रसिद्ध है। प्रतिभा, में तत्व-ज्ञान की अनुभूति कभी नहीं आ सकती। इसे प्राप्त करने में तो केवल हृदय ही—यदि उसके ज्ञान का प्रकाश हुआ—समर्थ हो सकता है। कोई व्यक्ति कितना भी प्रतिभा सम्पन्न हो, हृदय हीन होकर तत्वज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। हृदय ही एक ऐसा है जो सदा प्रेममय मनुष्य में बोलता है। हृदय अनुभूति के लिए ऐसे सुगम साधन का अनुसंधान कर सकता है, जिसका खोज निकलना प्रतिभा की शक्ति से परे है।

सच बात तो यह है कि प्रतिभा ज्ञान का साधन है और हृदय अनुरक्ति का। प्रारम्भिक अवस्था में हृदय प्रतिभा की अपेक्षा बहुत ही निर्बल होता है। एक अज्ञ पुरुष में सत् असत् का विचार नहीं होता। उस आदमी की कसी एक बड़े प्रोफेसर से तुलना कीजिए। प्रोफेसर में कितनी अद्भुत प्रतिभा होती है। परन्तु प्रोफेसर अपनी प्रतिभा के कारण बहुत कुछ बन्धन में रहता है इसके अतिरिक्त जहाँ वह प्रतिभा-सम्पन्न होता है वहीं पापात्मा भी हो सकता है। परन्तु जो व्यक्ति सहृदय होता है, वह कभी पापात्मा नहीं हो सकता। कोई भी भाव परायण व्यक्ति पापात्मा होते नहीं सुना गया। यत्न पूर्वक अनुशीलन करते करते हृदय विशेष रूप से उन्नत किया जा सकता है और अन्त में जाकर यह प्रतिभा से बहुत आगे निकाला जा सकता है। यही हृदय अनुभूति के रूप में परिणित किया जा सकता है। अन्त में मनुष्य को प्रतिभा से आगे बढ़ना ही पड़ेगा।

मनुष्य का ज्ञान, उसकी अनुभव शक्ति, तर्क, प्रतिभा और हृदय, इन सभी से इस संसार के दुग्ध का मन्थन करने के बाद मक्खन निकलता है और वह मक्खन ईश्वर है। जो लोग सहृदय होते हैं, वे मक्खन के अधिकारी होते हैं और मथा हुआ दूध प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तियों के लिए पड़ा रहता है।

यह सारा उद्योग हृदय को प्रस्तुत करने के लिए है प्रेम के लिए है, उस अपरिसीम सहानुभूति के लिए है, जो हृदय से सम्बद्ध है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए शिक्षित होना, शास्त्र का पारगामी होना जरा भी आवश्यक नहीं है। एक बार किसी महात्मा ने कहा था—किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या करने के लिए मनुष्य को ढाल तलवार से सुसज्जित होने की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु स्वयं अपनी ही हत्या करने के लिए एक सुई यथेष्ट होती है। इसी प्रकार दूसरों को उपदेश देने के लिए विशेष प्रतिभा और अध्ययन आवश्यक है, परन्तु स्वयं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए यह सब इतना आवश्यक नहीं है। क्या हृदय पाप रहित है? यदि हाँ, तो ईश्वर को प्राप्त करने में समर्थ हो सकोगे। जो लोग ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करके धन्य हो जाते हैं, उनका हृदय निष्पाप है, वे ईश्वर का दर्शन करेंगे। यदि तुम पाप रहित नहीं हो, तो संसार की सारी विद्याओं के पारदर्शी होकर भी इस विषय में जरा भी सफलता न प्राप्त कर सकोगे। जितनी भर पुस्तकें तुम पढ़ोगे उन्हीं के बीच में तुम दबे रहोगे, किन्तु उनसे तुम्हें कोई विशेष लाभ न होगा। वह हृदय है, जो लक्ष्य-स्थान पर पहुँचता है। हृदय का अनुसरण करो। पवित्र हृदय प्रतिभा से कहीं अधिक दूर तक देख सकता है, वह तत्व ज्ञान प्राप्त करता है, वह उन वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जिन्हें तर्क नहीं जान सकता।

पवित्र हृदय और प्रतिभा में जब कभी परस्पर विरोधी भाव परिलक्षित हों तब सदा हृदय का ही पक्ष ग्रहण करना चाहिए, तुम चाहे भले ही यह समझते रहो कि मेरा हृदय जो कुछ कर रहा है, वह न्याय संगत नहीं है। यदि तुम्हें किसी का उपकार करने की अभिलाषा हो, तो तुम्हारा मस्तिष्क यह बतलावेगा कि ऐसा करना नीति के अनुकूल नहीं है। परन्तु उस समय तुम अपने हृदय का अनुसरण करो। उस दशा में तुम्हें ज्ञात होगा कि मस्तिष्क का अनुसरण करने की अपेक्षा हृदय का अनुसरण करने में बहुत कम भूल करता हूँ। सत्य को प्रतिबिम्बित करने के लिये निष्पाप हृदय ही सबसे सुन्दर आइना है। इसलिए ये सारी शिक्षाएँ नियम पालन तथा कठोर व्रत आदि हृदय को विशुद्ध करने के ही लिए आवश्यक होते हैं, हृदय में विशुद्धता आते ही सारे तथ्य उसके ऊपर प्रस्फुटित हो जाते हैं। यदि तुम में यथेष्ट मात्रा में विशुद्धता होगी तो इस विश्व के सारे तथ्य तुम्हारे हृदय में अपने आप प्रस्फुटित हो जायेंगे।

मुट्ठी भर आदमियों ने जो इतने बड़े जन-समूह को दासता की बेड़ी में जकड़ रखा है, वह यह प्रतिभा के विकास का, तरह तरह के ज्ञान विज्ञान के आविष्कार का फल है। इस प्रतिभा के विकास के ही कारण तरह तरह की कृत्रिम आवश्यकताओं की सृष्टि हुई है और हर एक निर्धन व्यक्ति रुपयों के अभाव में भी इनकी पूर्ति के लिए व्यग्र रहता है। तरह तरह के प्रयत्न करके भी जब वह इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ नहीं हो पाता तब उसकी अन्तरात्मा में विकलता उत्पन्न होती है। उस विकलता से ही उसे अपने प्राण तक खो बैठने पड़ते हैं। प्रतिभा के विकास—बौद्धिक उन्नति-का यही फल है। इस दुख कोश की समस्या, प्रतिभा या बुद्धि की समायता से नहीं सुलझ सकती। इसे तो हृदय ही सुलझाता है। बौद्धिक विकास के लिए जितने भी उद्योग किये गये हैं वे ही यदि मनुष्य को अधिक विशुद्ध, अधिक नम्र और अधिक सहिष्णु बनने में उपयुक्त किये जाते तो यह संसार आज की अपेक्षा हजार गुना सुखमय होता। सदा हृदय को उन्नत बनाओ। हृदय के द्वारा भगवान बोलते हैं और प्रतिभा या बुद्धि के द्वारा आप स्वयं बोलते हैं।

पुरानी बाइबिल में मूसा से कहा गया है-”अपने पैरों से जूते उतार डालो, क्योंकि जहाँ तुम खड़े हो वह पवित्र यानी ईश्वर के बैठने का स्थान है।” हमें सदा ही बहुत श्रद्धा के भाव से धर्म के अध्ययन की ओर अग्रसर होना चाहिए। वह व्यक्ति जो पवित्र हृदय और श्रद्धा का भाव लेकर आता है, उसका हृदय खुल जायगा। उसके लिए द्वार मुक्त रहेगा और वह सत्य का दर्शन करने में समर्थ होगा।


Quotation

संसार में श्रेष्ठ वही है जो संसार के आधीन होकर न रहे। इस संसार में घुसते जाना सरल है लेकिन इससे निकलना ज्ञानी सत्पुरुष की सहायता बिना अति कठिन है।”


घर्षण स्नान के लाभ

(श्री वीरनरायण दलेला एम. कौम,)

हम श्वाँस केवल मुँह और नासिका पुट के द्वारा ही नहीं लेते प्रत्युत शरीर की त्वचा के छोटे छोटे छिद्रों द्वारा भी लेते हैं, यद्यपि कि यह शारीरिक क्रिया हमारी अनभिज्ञता में होती है त्वचा के रोम कूप बन्द हो जाने पर दीर्घ और निरोग जीवन प्रायः असम्भव है। त्वचा हमारे शरीर का वेष्टन यानी ओढ़ना है। वही (त्वचा) जब शुद्ध दशा में रहती है तो रात दिन शरीर का मल बाहर निकल जाता है। जिस मनुष्य की त्वचा शुद्ध नहीं है उसे निर्बलता, मन्दाग्नि, कब्ज ऐसे अनेक रोग होते हैं। यदि हम स्वस्थ एवं नीरोग जीवन के इच्छुक हैं तो हमें चाहिए कि त्वचा के इन सूक्ष्म छिद्रों को किसी प्रकार बन्द न होने दें। इसके लिए विधि पूर्वक घर्षण स्नान का स्थान बहुत ऊँचा है।

घर्षण का अर्थ है रगड़ना। प्रातः विधिपूर्वक घर्षण स्नान का अर्थ हुआ वह स्नान जिसमें किसी उचित विधि के अनुसार रगड़ने की क्रिया हो।

जिस तरह से एक बर्तन बिना रगड़े हुये अच्छी तरह से साफ नहीं होता और उसमें चमक नहीं आती उसी प्रकार हमारा शरीर भी, केवल दो चार लोटे पानी डालने से धूल मिट्टी के छोटे कणों को जो कि त्वचा के छिद्रों के अन्दर भर जाते हैं, परिमार्जित नहीं कर सकता। अतः स्नान से प्रथम हमें चाहिए कि हम समस्त शरीर को ऊपर से नीचे की ओर अपने दोनों हाथों की हथेलियों से शरीर के प्रत्येक अवयव को उचित शक्ति के साथ घर्षण करें। सिर के बालों को धीरे धीरे हाथ की अंगुलियों से रगड़ें। ऐसा करने से सिर की माँस पेशियों में रक्त की गति में वृद्धि हो जाती है अतः बाल पुष्ट होते हैं और कुसमय में हुए श्वेत बाल भी काले हो सकते हैं।

शरीर को रगड़ने की क्रिया किसी छोटे से खुरदरे वस्त्र से भी जा सकती है परन्तु हथेलियों से रगड़ने की क्रिया अधिक उत्तम है क्योंकि उसके द्वारा त्वचा के छिद्र तो साफ होते हैं, इसके साथ साथ हथेलियों की रगड़ से एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न होती है जो कि हमारे शरीर में स्फूर्ति एवं नवीन शक्ति का संचार करती है। तदुपरान्त, हमें स्वच्छ एवं शीतल जल से स्नान उस समय तक लेना चाहिए जब तक कि त्वचा अच्छी तरह से साफ न हो जावे। इसका समय 10-15 मिनट से लेकर आधे घण्टे तक ऋतु एवं शरीर की सहन शक्ति के अनुसार हो सकता है। स्नान में जल सबसे प्रथम सिर पर डालना चाहिए। हमें चाहिए कि पेडू को ऊपर से नीचे और बायें से दायें और दायें से बायें एक हाथ से रगड़ें और दूसरे हाथ से लोटे से जल पेडू पर डालते जावें। सीने को रगड़ना भी न भूलें। इससे सीना विस्तृत होता है और जमा हुआ कफ आसानी से निकल जाता है।

स्नानोपरान्त हम शरीर के प्रत्येक अवयव को अच्छी तरह से किसी वस्त्र से पोंछ डालें ताकि सारा बदन शीघ्र ही सूख जाय क्योंकि शरीर के बिना सूखे ही वस्त्र पहनने से कभी कभी दाद जैसे दुखदायी रोग से पीड़ित होना पड़ता है।

इस प्रकार के घर्षण स्नान से त्वचा के छिद्र खुल जाते हैं जिसके कारण शरीर का बहुत सा विष पसीने द्वारा निकल जाता है और त्वचा स्वच्छ वायु को श्वाँस द्वारा सेवन कर सकती है।

जिस प्रकार बर्तन माँजने के बाद उसे धोने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शरीर की त्वचा को रगड़ने के कारण निकले हुए विष को साफ करने के लिए जल स्नान की आवश्यकता है। फिर जल का कहना ही क्या, यह तो परम पिता परमात्मा ने प्राणी के लिए एक प्रकार का अमृत प्रदान किया है। जल पर तो एक प्रकार की चिकित्सा ही निर्भर है जिसे हम जल चिकित्सा के नाम से पुकारते हैं। परन्तु हाँ जहाँ दो चार दिन के लिए जल स्नान का प्रबन्ध न हो सके वहाँ शरीर को हाथों द्वारा रगड़ कर एक भीगे तौलिये से अवश्य पोंछ लेना चाहिए।

जो मनुष्य इस प्रकार का स्नान प्रतिदिन लेते हैं उन्हें चर्म रोग तो कभी हो ही नहीं सकते। मेरा अपना तो ऐसा विश्वास और दावा है कि उपयुक्त स्नान शरीर को चर्म रोगों से रोकने के लिए रामबाण है।

पेट और पेडू को रगड़ने के कारण,उनकी नसों को एक अच्छी कसरत मिल जाती है। बहुत समय का संचित हुआ विजातीय द्रव्य ढीला पड़ जाता है अतः गुदा मार्ग द्वारा निकलने में सुविधा हो जाती है। इस प्रकार से हम कोष्ठबद्धता अथवा कब्ज से जो कि प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार प्रायः समस्त रोगों की जड़ है, छुटकारा पा जाते हैं। इससे सिर की पीड़ा और आलस्य कोसों दूर भाग जाता है। शरीर में चैतन्यता आ जाती है और यह शीशे की भाँति चमकने लगता है। मुख भी सतेज हो जाता है, स्नानोपरान्त दिन भर चित्त प्रसन्न रहता है। नवीन शक्ति आयी हुई सी प्रतीत होती है अतः कार्य क्षमता में वृद्धि हो जाती है। ऐसा मेरा स्वयं का अनुभव है। मैं इसको किसी प्रकार भी एक पौष्टिक औषधि से कम नहीं समझता हूँ। जब जब मैंने अपने में मानसिक एवं शारीरिक थकान का अनुभव किया है तब तब मैंने इस स्नान द्वारा अपने को पुनः ही स्वस्थ किया है।


स्वप्न सच भी होते हैं।

(श्री ‘सत्य भक्त’ जी प्रयाग)

स्वप्न दरअसल क्या चीज हैं और वे किस कारण दिखलाई पड़ते हैं इसका पता आज तक ठीक ठीक नहीं लग सका है। कोई उनको शारीरिक विकार समझता है और कोई शुभाशुभ का सूचक मानता है। कोई उन्हें सूक्ष्म-जगत् के दृश्य बतलाते है।

यह तो हम नहीं कह सकते कि सभी स्वप्न एक बराबर सारगर्भित और तथ्यपूर्ण होते हैं, पर कभी कभी स्वप्न की घटना ऐसी सत्य हो जाती है कि उसे सुनकर चकित रह जाना पड़ता है। इस सम्बन्ध में जम्मू से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ‘दीपक’ में छपा एक समाचार नीचे उद्धृत किया जाता है :—

लुधियाना, 1 अगस्त

“स्थानीय पुराना बाजार के एक ब्राह्मण के पास एक झीवर नौकर था। वह नित्य प्रातःकाल पूजा के लिए विल्ववृक्ष पर चढ़ विल्वपत्र तोड़ लाया करता था। एक रात झीवर ने स्वप्न देखा कि मैं विल्वपत्र तोड़ रहा हूँ और नीचे खड़ा एक भैंसा कह रहा है कि उतरते ही मैं तुमको मार डालूँगा। प्रातःकाल वैसा ही हुआ और वह भयभीत हो गिरकर मर गया।”

इस उदाहरण से साबित होता है कि कम से कुछ स्वप्न जरूर सच होते हैं और उनके द्वारा होनहार घटनाओं का ज्ञान हो सकता है। कितने ही पाठकों के लिए शायद यह बात आश्चर्यजनक जान पड़ेगी कि स्वप्नों के आधार पर कितनी ही बार अदालतों में बड़े रहस्य पूर्ण मुकदमों का निर्णय किया गया है। एक लेखक के कथानुसार इंग्लैण्ड की लोरिपोर्टो में कम से कम छः मुकदमे ऐसे मौजूद हैं। इन सबमें अधिक रहस्यपूर्ण घटना वह है जिसमें हत्या का स्वप्न एक स्त्री को कई घण्टे पहले दिखाई पड़ा था। घटना इस प्रकार है :—

सन् 1800 से कुछ वर्ष बाद की बात है कि आयरलैण्ड के पोर्टलो नामक गाँव में एक छोटा सा होटल (पब्लिक हाउस) था जिसका मालिक राजर्स बड़ा लोकप्रिय व्यक्ति था। उसके होटल में सुबह से लेकर आधी रात तक आस पास के ग्राम निवासियों की भीड़ लगी रहती थी।

एक दिन राजर्स होटल खोलने की तैयारी कर रहा था कि उसकी स्त्री ने आवाज देकर उसे ऊपर बुलाया। उसने जाकर देखा कि वह बिस्तर पर पड़ी है और उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया है। पूछने पर कहने लगी कि उसने एक बड़ा भयंकर सपना देखा है जिससे उसका कलेजा अब धड़क रहा है। फिर उसने कहा :—

“सपना ऐसा स्पष्ट और असली जान पड़ता था कि डर के मारे मेरी जान निकलने लगी। जग जाने पर भी कई मिनट तक मैं यह विश्वास न कर सकी कि मैं अपने घर में हूँ।”

राजर्स इस तरह की बातों पर ध्यान देने वाला आदमी न था। उसने हँस कर कहा—’सपने की बातों से इतना डरना ठीक नहीं।”

स्त्री बोली—”यह सच है कि बह सपना ही था, पर मुझे अब भी साफ साफ दिखलाई पढ़ रहा है कि दो आदमी, जो पहनावे से जहाजी मल्लाह जान पड़ते थे और जिसमें से एक लम्बा था और दूसरा नाटा, हमारे होटल में आये। वे खूब हँस हँस कर बातें कर रहे थे। नाटा आदमी ही ज्यादा हंसता था। मैंने उन को हाथ में हाथ डाले हुए कैरिक गाँव की सड़क पर जाते देखा। चलते चलते उनको शाम हो गई। तब मैंने देखा कि लम्बा आदमी जरा पीछे रह गया और उसने मरे हुए आदमी की जेब से रुपया पैसा निकाल लिया और बाद में उसे झाड़ी के भीतर गाढ़ दिया। उस झाड़ी को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं, क्योंकि हम वहाँ कितनी ही बार घूमने को जा चुके हैं।”

पति ने बिना ज्यादा ध्यान दिये कहा—”खैर, यह सब सपना ही तो है, इसके लिए ज्यादा फिक्र मत करो। उठकर जल्दी से जलपान कर लो। आज का दिन सुहावना जान पड़ता है, इसलिए शायद होटल के काम में मदद करने की तुम्हारी जरूरत पड़े।”

राजर्स का कहना ठीक निकला। दस बजते- बजते उनका होटल ग्राहकों से भर गया, जिनमें ज्यादातर बाहरी लोग थे। राजर्स और उसकी स्त्री ग्राहकों को शराब और खाने की चीजें पहुँचाने के लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे। राजर्स और उसकी स्त्री ने एकाएक उसकी बाँह को पकड़ कर खींचा। वह कुछ असन्तुष्ट होकर उसकी ओर मुड़ा। स्त्री ने उसके कान में कहा कि जिन दो आदमियों को मैंने सपने में देखा था वे होटल में इसी समय दाखिल हुए हैं।

राजर्स ने एक बार जल्दी से उनकी ओर निगाह डाली और यह देखकर वह दंग रह गया कि उनका रंग-रूप तथा पहनावा बिल्कुल वैसा ही था जैसे उसकी स्त्री ने सपने में देखा था। इस बात का उस पर इतना असर पड़ा कि होटल में भीड़ रहने पर भी वह बराबर उनकी निगरानी करता रहा और उनकी बातें जहाँ तक बन पड़ा कान लगाकर सुनता रहा। इन बातों से उसने इतना पता लगा लिया कि उनमें से लम्बे आदमी का नाम फ्रेडरिक कालफील्ड है और नाटे का जैक हिकी। वे दोनों हाल ही में अमरीका से लौटे हैं और जहाज पर ही उन दोनों की मुलाकात हुई है। यह भी मालूम हुआ कि हिकी ने न्यूफाउण्डलैण्ड में मछली के रोजगार में काफी रुपया पैदा किया है।

उस समय इससे ज्यादा कुछ न हुआ। उन दोनों के चले जाने के बाद राजर्स और उसकी स्त्री दूसरे कामों में पड़ कर इस विषय को भूल ही गये।

दो महीने बाद एका एक उन्होंने किसी के मुँह से सुना कि हिकी नाम का शख्स कहीं गायब हो गया है और इससे उसके घर वालों और मित्रों को बड़ी चिन्ता हो रही है।

इस खबर को सुनकर राजर्स और उसकी स्त्री सन्न रह गयी और उन्हें ऐसा जान पड़ने लगा मानों वे ही इस हत्या के कसूरवार हैं। भय के मारे कई दिन तक तो उन्होंने इस बात का किसी से जिक्र करने का साहस ही नहीं किया। राजर्स खास तौर पर इस बात के खिलाफ था कि क्यों ऐसी बात को मुँह से निकाल कर मुँगत क्यों झंझट मोल लिया जाय। पर उसकी स्त्री को चैन नहीं पड़ा। उसका कहना था कि किसी दैवी शक्ति ने उसे समय से पहले यह रहस्य सपने के रूप में बतला दिया था। अब उसका कर्तव्य है कि वह इस बात को जाहिर करके सरकारी अधिकारियों को न्याय करने में मदद दे। इस मामले को लेकर कई दिन तक पति पत्नी में झगड़ा भी होता रहा। अन्त में वह राजर्स को लेकर स्थानीय मैजिस्ट्रेट के पास पहुँच ही गई।

उसने सपने वाली घटना इस प्रकार डरते-डरते बतलाई कि मैजिस्ट्रेट को शक हुआ कि उसे किसी तरह की दिमागी बीमारी है। चूँकि वे कस्बे के प्रसिद्ध व्यक्ति थे और भले आदमी माने जाते थे, इसलिए उसने इसकी जाँच करना उचित समझा। स्त्री की बताई हुई जगह को कुछ ही खोदने पर मनुष्य की टाँगे दिखाई पड़ी और थोड़ी देर में मैक हिकी का शव बाहर निकल आया।

फ्रेडरिक कालफील्ड की गिरफ्तारी पर जितना आश्चर्य उसके परिचितों को नहीं हुआ, उससे ज्यादा उसको स्वयं हुआ। उसे इस बात का गुमान भी न था कि इस हत्या का भेद कभी जाहिर हो सकेगा। उसने यह काम बहुत होशियारी से किया था और हिकी के गायब होने के बाद लोगों ने यही समझ था कि या तो वह फिर और रुपया कमाने को अमेरिका लौट गया या अपनी कमाई को खर्च करने इंग्लैण्ड चला गया। अगर कालफील्ड को इस बात का जरा सा भी शक होता कि उसका पाप जाहिर हो जायगा तो कभी का किसी जहाज पर नौकरी करने विदेश चला गया होता।

मुकदमा चलने पर कालफील्ड के वकील ने सपने को हँस कर उड़ा देने की कोशिश की। उसने राजर्स की स्त्री से बड़ी जोरदार जिरह की। उसने यहाँ तक कहा कि इस खून का ताल्लुक राजर्स और उसकी स्त्री से ही जान पड़ता है। उन्होंने जैक हिकी के पास बहुत-सा रुपया देखकर लालच में आकर उसे मरवा डाला और बाद में यह सपने की कहानी गढ़ ली।

पर राजर्स की स्त्री पर इन बातों का कुछ भी असर न पड़ा। वह बराबर अपनी बात पर कायम रही और हर एक सवाल का जवाब बिना जरा भी घबड़ाये ठीक-ठीक देती रही। आखिर में जब जूरी ने मुलजिम को दोषी करार दिया तो उसकी जवान पर लगा ताला खुल गया। उसने अपना कसूर मंजूर किया और कहा कि उसने धन के लालच में पड़ कर हिकी की हत्या ठीक उसी तरह की थी जैसा कि राजर्स की स्त्री ने सपने में देखा था।

इस अद्भुत सपने की घटना से एक भीषण हत्या का फैसला होते देख कर सभी देखने और सुनने वाले चकित रह गये। शुरू में कुछ लोग इसे किसी प्रकार की चालाकी या षड़यंत्र समझते थे, पर कालफील्ड के इकबाल कर लेने पर सन्देह की गुंजाइश ही न रही। फैसला करने वाले जज ने भी “इस मामले में ईश्वर ने स्वयं हस्तक्षेप किया है और वह भी बड़े अनोखे ढंग से।”


सदा नियमित और कार्य संलग्न रहिए।

(पं. गौरी शंकर जी शुक्ल)

यदि दुर्भाग्य से तुम अपने को असाधारण बुद्धिवान समझने लग गये हो और यदि तुम्हारी ऐसी समझ हो कि तुम सब बातें अपने आप सीख जाओगे, तो यह विचार त्याग कर यदि शीघ्र सावधान हो जाओगे तो अच्छा है। यह निश्चय समझ लो कि जो कुछ प्राप्त करना हो वह उद्योग द्वारा प्राप्त करो, इस उद्योग रूपी धन का अभी से संग्रह करो। क्षुद्र कामों में तत्परता दिखलाने से बड़े बड़े कार्यों के करने का मार्ग मिलता है। केवल उद्योग से क्या-2 हो सकता है, इसे जानकर वास्तविक आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। प्राचीन काल में लोग बड़े बड़े ग्रन्थ लिखते थे, उन्हें देखकर हम आश्चर्य चकित होते हैं, परन्तु उन सबकी जड़ उद्योग है, इससे समस्त संशय कपाट खुल जाते हैं। जो पुरुष प्रतिदिन तीन घण्टे तेजी से चलेगा वह सात वर्ष में पृथ्वी के परिधि इतना मार्ग क्रमण कर लेगा। निरुपयोगी बनने से अधिक कोई बुरी दशा नहीं है, और इससे अधिक दुःखदायक अन्य कोई आदत नहीं। उसमें भी शीघ्र पड़ जाने और कठिनता से मुड़ने वाली आदत के जैसी अन्य कोई टेव नहीं।

निरुद्योगी मनुष्य शीघ्र ही शिथिल हो जाता है, उसकी वृत्तियाँ अर्धमृत जैसी हो जाती हैं और तब वह निम्न कथन के अनुसार चलने लगता है वह इस प्रकार कि “दौड़ने की अपेक्षा चलना अच्छा है, चलने की अपेक्षा स्थिर खड़ा रहना उससे भी अच्छा है, खड़े रहने की अपेक्षा बैठ जाना अच्छा है, और बैठने की अपेक्षा लेट जाना सबसे अच्छा है।” हमारे विचार से जो अतिशय निरुद्योगी है वह सबसे अधिक दया का पात्र है, कारण कि पागलपन से सुख होता है, यह जो कहा जाता है, उस प्रकार निरुद्योगीपने से जो दुःख उत्पन्न होते हैं उनकी कल्पना निरुद्योगी ही कर सकता है। हम जानते हैं कि बहुतेरे मनुष्य अनेक कार्यों में फँसे रहने के कारण उद्योगी नहीं होते। कारण यह है कि जो गड़बड़ में रहता है वह उद्योग से दूर रहता है। सुज्ञ पुरुष इन दोनों दशाओं का सहज ही तारतम्य कर लेंगे।

जो पुरुष अपने कर्तव्य-कर्म और वास्तविक उद्योग की उपेक्षा करता है, वह अपनी मूर्खता के विस्मरणार्थ कोई खटपट अवश्य अपने पीछे लगा लेता है और अपने वास्तविक आचरण से उसे बुरा न लगे अतः वास्तविक कर्त्तव्य त्याग कर कुछ उलटा ही करने लगता है। जो उद्योगी होता है, वास्तविक देखने पर, उसे अधिक अवकाश मिलता है कारण उसका समय भिन्न भिन्न विभागों में विभक्त रहता है, और प्रत्येक भाग में जो कुछ नियमित कार्य करने को होता है, वह कार्य समाप्त होते ही अवकाश मिल जाता है। निरुद्योगी मनुष्य आलस्य-ग्रस्त रहता है। तूफान नष्ट हो जाने पर जैसे समुद्र स्तब्ध हो जाता है तद्वत् निरुद्योगी मनुष्य की अवस्था होती है। मनुष्य के उद्योग रूपी जल का स्तब्ध रहने की अपेक्षा झपाटे के साथ, बाँध तोड़कर इधर उधर बहना अच्छा है। सेनेका नामक किसी तत्व वेत्ता ने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था कि “किसी नवीन ग्रन्थ रचना किये अथवा किसी उत्तम को पढ़कर उसका तात्पर्य समझे बिना मेरा कोई दिन न बीता।’ उच्चता प्राप्त करने के लिए उद्योग की आवश्यकता है। जो पुरुष नियमित उद्योगी नहीं है, उसका जितना समय व्यर्थ जाता है, उसे देख तुम्हें आश्चर्य होगा।

अभ्यास और आदत के विषय में संकेत निश्चित कर उन्हें कागज पर लिख लेना सहज है, पर कठिन तो यही है कि कागज ही में रहते हैं कभी कभी ऐसा होता है कि वे संकेत एकदम सिद्ध न होने से हम सर्वथा निरन्तर परिश्रम करना छोड़ देते हैं। लूथर नामक एक खीष्ट धर्मोपदेशक ने देशाटन करते हुए तथा और और काम-धंधे करते हुए ही समग्र बाइबिल का अनुवाद कर डाला था, यह देख यूरोपवासी बड़े चकित हुए थे, पर इसका कारण एक शब्द मात्र से ज्ञात हो जाता है कि प्रतिदिन कुछ न कुछ करने का उसका दृढ़ निश्चय था। और जब कोई उससे पूछता कि यह अनुवाद कैसे कर लिया तो वह उत्तर देता कि “कुछ न कुछ अनुवाद किये बिना मैंने कोई दिन न जाने दिया” ऐसा करते पूर्ण अनुवाद हो गया।

समय का सदुपयोग करना एक भी क्षण निरर्थक न जाने देना, सदा कार्य संलग्न रहना एक बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है इसे अपना कर मनुष्य उन्नति के उच्च शिखर पर आसानी से पहुँच सकता है।

गायत्री चर्चा


गायत्री ही सर्वश्रेष्ठ तप है।

गत अंक में बताया जा चुका है कि तप के घर्षण से ही शक्ति उत्पन्न होती है। और उस शक्ति से ही संसार के सब कार्य चलते हैं। भौतिक संसार की भाँति आध्यात्मिक जगत् में भी यह नियम समान रूप से लागू होता है। मनुष्य की पाशविक मनोवृत्तियाँ उसे नीचे की ओर-पतन की ओर ले जाती हैं यदि उसे ऊँचा उठना है तो विशेष तत्परतापूर्वक प्रयत्न करना पड़ता है, इसे ही तप कहते हैं। पानी को कहीं भी छोड़िये वह नीचे ही बहेगा पर उसे नीचे की ओर से ऊपर की ओर ले जाना हो तो विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा। ऊपर से कोई चीज छोड़ी जाय तो वह क्षण भर में नीचे गिर पड़ेगी किन्तु यदि नीचे से कोई चीज ऊपर ले जानी हो तो उसके लिए बहुत साधन एवं उपकरण एकत्रित करने पड़ेंगे। पतनोन्मुखी मनोवृत्तियों को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए तप ही एकमात्र उपाय माना गया है। मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं- तप या पत, दोनों एक दूसरे के उलटे हैं। तप का अर्थ है ऊपर उठना, पत का अर्थ है पतित होना। जो तप नहीं करता उसे आध्यात्मिक पतन की ओर चलना पड़ेगा और जो आत्मिक पतन से बचना चाहता है उसे तपन के लिए अग्रसर होना पड़ेगा। दोनों में से एक ही मार्ग को चुना जा सकता है

यों अनेक धार्मिक प्रक्रियाएँ आत्म कल्याण के लिए बनाई गई हैं, उन सबके अपने-अपने महत्व हैं। कथा या सदुपदेश श्रवण करने से धार्मिक ज्ञान बढ़ता है तीर्थ यात्रा से पाप वासनाओं का शमन होता है, यज्ञ से देव शक्तियों का पोषण होता है, पाठ पूजा से भक्ति भावना जागृत होती है, दान-पुण्य से भविष्यकालीन सुख सौभाग्य का निर्माण होता है। यह सब कार्य अपने अपने महत्व के अनुसार फल देते हैं परन्तु एक कार्य ऐसा है जो इनमें से किसी से भी नहीं हो सकता वह है-शक्ति उत्पादन। यह कार्य केवल तप से ही हो सकता है। तप से ही आत्मबल बढ़ता है, तप से ही ब्रह्मतेज प्रदीप होता है, तप से ही दिव्यशक्ति की उपलब्धि होती है।

कोई मनुष्य अनेक वस्तुओं से सुसज्जित हो। उसे रेशमी कपड़े, स्वर्ण और रत्नों के बने आभूषण पुष्प मालाएँ, कस्तूरी चन्दन का सुवास, बढ़िया अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित करके बहुमूल्य पालकी में बिठाया जाये परन्तु उसके शरीर में शक्ति न हो, अशक्तता में वह जकड़ा हुआ हो तो वह सब सुसज्जा किसी काम का नहीं रहेगा। इसके विपरीत भी कोई हृष्ट-पुष्ट पहलवान यदि चिथड़े पहने हो तो भी वह अच्छी स्थिति में होगा। विविध प्रकार की धार्मिक क्रियाएँ एक प्रकार की सुसज्जा हैं जिनसे जीवात्मा की शोभा बढ़ती है परन्तु वह शोभा तभी विशेष उपयोगी हो सकती है जब उसके पीछे तपश्चर्या द्वारा संचित ब्रह्मशक्ति का भण्डार हो। यदि वह कोष खाली है तो शोभावर्धक अन्य धार्मिक उपकरणों से विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता।

साधन सम्पन्न धनी मानी लोग, अपना थोड़ा सा समय और धन देकर आसानी से अन्य धार्मिक प्रक्रियाएँ पूरा का सकते हैं, तीर्थ यात्रा, ब्रह्मभोज, यज्ञ, कथा, दान, पूजा, पाठ आदि की व्यवस्था बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें उन्हें कोई विशेष धन द्वारा अपने शारीरिक एवं मानसिक श्रम से सम्भव होते हैं। इस क्षेत्र में अमीर गरीब का कोई भेद भाव नहीं है। भौतिक साधनों की अधिकता या न्यूनता से किसी की तप सामर्थ्य घटती बढ़ती नहीं है। तपश्चर्या की ओर अग्रसर होने के लिये पवित्रता, सात्विकता, श्रद्धा, दृढ़ता एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा की आवश्यकता होती है। अन्य धार्मिक क्रियाओं से केवल मनोभूमि निर्माण का कार्य होता है परन्तु तप तो बीज बोने के समान है जिसका पौधा उत्पन्न होना और उसका पत्र पल्लवों, फल-फूलों से लदना अवश्यम्भावी है।

तप एक पुरुषार्थ है जिसके द्वारा सिद्धि, शान्ति, समृद्धि, स्वर्ग एवं मुक्ति जैसी सफलताएँ उपार्जित की जाती हैं और पाप, ताप, विघ्न, संकट, प्रारब्ध एवं आसुरी तत्वों को परास्त करके अपने पौरुष का विजय घोष किया जाता है। कहते हैं कि ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करता है। बहादुर और उद्योगी को ही पुरस्कार मिलते हैं। ईश्वरीय कृपा और विशेष सहायता का अधिकारी वही व्यक्ति होता है जो तपश्चर्या द्वारा अपनी प्रामाणिकता सिद्ध कर देता है। अन्य धार्मिक क्रियाएँ करके पुण्य लाभ करने वाले व्यक्ति सीमित मर्यादा तक आत्मोन्नति कर लेते हैं परन्तु तप की शक्ति किसी भी सीमा या मर्यादा से बँधी हुई नहीं है। अष्ट-सिद्धि, नवनिद्धि उसके कर तल गत हो सकती हैं। वह अपने को पूर्णता के अन्तिम लक्ष तक पहुँचा सकता है और अपने तेज से अन्य अनेकों को प्रकाश एवं बल प्रदान कर सकता है।

तप की सर्वोपरि महत्ता एवं उपयोगिता निर्विवाद है। इसीलिए अनादि काल से लेकर अद्यावधि सभी श्रेयाकाँक्षी, तपश्चर्या का मार्ग अपनाते रहे हैं। तप के जितने मार्ग हैं उनमें गायत्री से बढ़ कर सुलभ सुनिश्चित एवं शीघ्र फलदायक और कोई मार्ग नहीं है। केवल हठयोग के षट्कर्मों से स्थूल शरीर का शोधन होता है। नेति, धोति, वस्ति, न्यौलि, कपालभाति, वज्रौली क्रियाएँ करने में खतरे बहुत और लाभ कम है। केवल नादयोग से सूक्ष्म संवादों, सन्देशों को मालूम करना ही सम्भव है, केवल दृष्टि वेध योग (मैस्मरेजम) से दूसरों पर कुछ चमत्कारी प्रभाव डाले जा सकते हैं। इसी प्रकार लय योग, ऋजु योग, अभिष्यन्द योग, पंचाग्नि योग, प्रत्यावर्तन योग आदि के द्वारा सफलता प्राप्त करने में पूर्ण कुशल गुरु की समीपता आवश्यक है। भूल होने में काफी खतरा है, इतने पर भी लाभ एकाँगी है। चौरासी योगों में केवल गायत्री योग ही ऐसा है जिसे गृही, विरागी सभी, समान सुविधा से कर सकते हैं। जिसके लिए गुरु की समीपता अनिवार्य नहीं केवल उसके संरक्षण से काम चल सकता है। भूल होने में अधिक से अधिक इतनी हानि हो सकती है कि साधना निष्फल चली जाय, अन्य योगों की भाँति उलटे अनिष्ट का तो किसी प्रकार कोई खतरा है ही नहीं। फिर इसके द्वारा जो लाभ होते हैं वह केवल भौतिक या केवल आध्यात्मिक ही नहीं वरन् दोनों क्षेत्रों में समान लाभ होते हैं। साधक के साँसारिक जीवन को सुखी बनाता है और आत्म-शान्ति की भी निश्चित रूप से उपलब्धि होती है।

अन्य योग एकांगी हैं, उनके अनुकूल साधना करने से एक- एक देह का, एक एक कोष एक- एक प्राण का, एक- एक चक्र का क्रमशः जागरण होता है। स्थूल देह, सूक्ष्म देह, कारण देह यह तीनों देहें त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में साथ-साथ शुद्ध होती चलती हैं। इडा,पिंगला और सुषुम्ना का त्रिकोण साथ-साथ घूमता है। सत,रज,तम का समान सन्तुलन बनता है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि की खुलने की व्यवस्था एक साथ बनने लगती है। अन्य कोई योग या तप ऐसा नहीं है जो अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष को समान रूप से प्रस्फुटित करे या प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान इन पाँचों प्राणों का प्रत्यावर्तन कर दे। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय इन पाँच उपप्राणों तक को केवल किसी एक साधना से निर्बंध कर देना कठिन है परन्तु गायत्री योग की तपस्या कठिनाई नहीं पड़ती, परन्तु तप के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसमें मन का निरोध, इन्द्रियों का संयम, कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, त्याग, शम, दम, व्रत, उपवास, जप, धारणा, ध्यान, प्रत्याहार आदि अनेकों ऐसे कार्यों को अपनाना पड़ता है जो अमीर गरीब सभी को समान रूप से कष्ट साध्य होते हैं और वे करने पर यह सब कार्य एक साथ, एक समय में और एक समान गति से होते चलते हैं। पंच भूतों से मुक्ति का महान कार्य पंचमुखी गायत्री द्वारा ही होता है।

षटचक्रों का बंधन, कुण्डलिनी जागरण, खेचरी संदोह, सहस्रार कमल का प्रत्यवाय, ब्रह्मरंध्र का प्रतिबोध यह साधारण कार्य नहीं हैं, इन्हें अन्य योगों द्वारा कर सकना बहुत ही कठिन है,परन्तु गायत्री साधना द्वारा ऐसी संतुलित तपस्या होती है कि इन सभी महान् आध्यात्मिक केन्द्र बिन्दुओं का सरलतापूर्वक परिपाक होता चलता है। युग परिवर्तन के कारण वर्तमान काल की तात्विक सूक्ष्म स्थिति में जो हेर फेर हो गया है उसके कारण अन्य अनेक साधनाओं की उपयोगिता, संभावना एवं सफलता में भारी बाधा उत्पन्न हो गई है, किन्तु गायत्री साधना प्रत्येक युग के अनुकूल है। गायत्री के 24 अक्षरों के उच्चारण से 24 मर्म स्थानों में छिपे हुए 24 ग्रन्थि चक्र स्वयमेव जाग्रत होने आरम्भ हो जाते हैं जब कि अन्य विधानों से उनमें थोड़े से शक्तिचक्रों का भी जागृत होना कठिन होता है।

‘डायनुमा’ जब तक चलता रहता है तब तक वह निरंतर बिजली बनाता रहता है। गायत्री जप एक स्वसंचालित आध्यात्मिक डायनुमा है जिससे मनुष्य में सूक्ष्म शक्ति की असाधारण बढ़ोतरी होती हुई प्रत्यक्ष परिलक्षित होती है। तप के जितने भी लक्षण, विधान और साधन हैं वे सब गायत्री के साथ सम्बद्ध हो रहे हैं। इस महामन्त्र की शरण लेकर मनुष्य घर में, तपोवन गृहस्थ रहते हुए वैराग्य और सादा वस्त्र पहनते हुए महात्मा बन सकता है। तप की महिमा अपार है गायत्री तपस्या के रहस्य ऐसे हैं जिनका सम्पूर्ण ज्ञान तो मनुष्य बुद्धि के लिए संभव नहीं परन्तु इस उपासना के लाभों से लाभान्वित होना प्रत्येक श्रद्धालु एवं तपस्वी मनोवृत्ति के मनुष्य के लिए पूर्णतया संभव है।


मन्त्र लेखन महायज्ञ

इस गायत्री जयन्ती पर 24 लक्ष हस्तलिखित गायत्री मन्त्र माता के चरणों पर समर्पित करने का जो संकल्प था वह पूरा हो गया। अब ऐसा निश्चय किया गया है कि प्रत्येक गायत्री उपासक के हाथ के लिखे हुए मन्त्र गायत्री मन्दिर में एकचित्र किये जाएं और सब की सम्मिलित श्रद्धा का एक केन्द्रीय एकीकरण किया जाय। इतने उपासकों की भावना, तपस्या, श्रम, साधना, श्रद्धा, आत्मशक्ति का एक स्थान में एक प्रचंड, ब्रह्म तेज प्रज्ज्वलित रहेगा और उस स्थान पर बैठने मात्र से किसी भी अशान्त व्यक्ति को शान्ति मिल सकती है। इस आध्यात्मिक शक्ति संस्थान में प्रत्येक गायत्री उपासक को अपना भाग देना चाहिए।

इस गायत्री जयन्ती (जेष्ठ सुदी 10) से लेकर आश्विन मास की नवरात्रि तक प्रत्येक उपासक से 2400 मंत्र लिखकर भेजने की प्रार्थना है। जो इतना न कर सकते हों वे कम से कम 240 मंत्र अवश्य लिखें। लिखते समय की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। स्कूली कापी साइज की कापी ही उपयुक्त होगी। छोटे या बड़े साइज के कागज पर लिखने से उनकी बेसाइज जिल्दों को संभाल कर रखने में यहाँ बड़ी असुविधा होगी। आशा है उपासक बन्धु इस मन्त्र लेखन महायज्ञ में अपना सहयोग अवश्य देंगे।


गायत्री की महान् महिमा

स्तुता मया वरदा वेदभाता प्रचोदयन्ताँ पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजा पशुँ कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्।

(अथर्व वेद-19-71-1)

अथर्व वेद में स्वयं वेद भगवान ने कहा है।

मेरे द्वारा स्तुति की गई, द्विजों को पवित्र करने वाली वेदमाता गायत्री आयु, प्राण, शक्ति, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मतेज उन्हें प्रदान करे।

यथामधु च पुष्पेभ्यो घृतं दुग्धाद्रसात्पयः।

एवं हि सर्ववेदानाँ गायत्री सार मुच्यते॥

-व्यास

जिस प्रकार पुष्पों का सारभूत मधु, दूध का घृत, रसों का सारभूत दूध है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का सार है।

तदित्यृचः समो नास्ति मन्त्रो वेदाचतुष्टये।

सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपाँसिच।

समानि कलया प्राहुर्मुनयो नतदित्यृचः॥

- विश्वामित्र

गायत्री मन्त्र के समान मन्त्र चारों वेदों में नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं हैं ऐसा मुनि लोग कहते हैं।

नाम्नतोयं समं दानं न चाहिंसा परं तप।

न गायत्री समं जाप्यं न व्याहृति समं हुतम्॥

सूत संहिता यज्ञ वैभवखणड अ. 6-30

अन्न और जल के समान कोई भी दान, अहिंसा के समान तप, गायत्री के समान जप, व्याहृति के समान अग्नि होत्र, कोई भी नहीं है।

हस्तत्राणप्रदा देवी पतताँ नरकार्णंवे।

तस्मात्तामभ्यसेन्नित्यंब्राह्मणो हृदये शुचिः

गायत्री देवी नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली है अतः द्विज नित्य ही पवित्र हृदय से गायत्री का अभ्यास करे अर्थात् तपे।

गायत्री चैव वेदाँश्च तुलया समतोलयन्।

वेदा एकत्र साँगास्तु गायत्री चैकतः स्थिता॥

योगी याज्ञवलक्य

गायत्री और समस्त वेदों को तराजू से तोला गया षट्अंगों सहित वेद एक ओर रखे गये और गायत्री को एक और रखा गया।

सारभूतास्तु वेदानाँ गुह्योपनिषदो मताः

ताभ्यः सारस्तु गायत्री तिस्रो व्याहृतयस्तथा॥

योगी याज्ञ.

वेदों का सार उपनिषद् हैं और उपनिषदों का सार गायत्री और तीनों महा व्याहृतियाँ हैं।

गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।

गायत्र्यास्तु परन्नास्ति दिविचेह च पावनम्॥

गायत्री वेदों की जननी है, गायत्री पापों को नाश करने वाली है। गायत्री से अन्य कोई पवित्र करने वाला मन्त्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है।

तद्यथाग्निर्देवानाँ, ब्रह्मणो मनुष्याणाँ,

बसन्त ऋतूमामेवं गायत्री छन्दसाम्॥

(गोपथ ब्राह्मण)

जिस प्रकार देवताओं में अग्नि, मनुष्यों में ब्राह्मण, ऋतुओं में बसन्त ऋतु श्रेष्ठ है उसी प्रकार समस्त छन्दों में गायत्री छन्द श्रेष्ठ है।

नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवाः केशवात्परः।

गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥

वृ. यो. याज्ञ. अ. 10 2/79

गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं। गायत्री मन्त्र के जप से श्रेष्ठ कोई जप न आज तक हुआ और न होगा।


कुसमय में उद्बोधन


कुसमय में उद्बोधन (Kavita)

यदि संध्या बढ़ती आती है, गति मन्द-मन्द मन्थर चलकर।

संगीत रुक गया है दिन का, उसके इस नीरव इंगित पर॥

साथी-संगी भी नहीं एक, सूना सा है अनन्त अम्बर।

यदि अंग-अंग में भी तेरे, आई है गहरी क्राँति उतर॥

जाग्रत है अन्तर में तेरे यदि निस्वर आशंका महान।

सोये हैं सारे दिग्-दिगन्त अपने अवगुण्ठन श्याम तान॥

मेरे विहंग, अन्धे विहंग, पर पंख अभी तू बन्द न कर।

यह जो स्वर है सम्मुख तेरे, यह नहीं विजन का स्वर मर्मर।

यह तो है अजगर-सा गर्जन, फूत्कार कर रहा है सागर॥

लहलहा रहा या नहीं कुन्द, कुसुमों वाला निकुँज मनहर।

लहराती सागर की यह तो, कल्लोल कर रही फेन-लहर॥

रे कहाँ यहाँ उद्यान वही, जिसमें मृदु पल्लव मंजु-फूल।

वह आश्रय-शाखा, नीड़ कहाँ, रे, कहाँ यहाँ वह रुचिर कूल॥

मेरे विहंग, अंधे विहंग , पर पंख अभी तू बन्द न कर।

अब भी तेरे आगे विहंग, है रात बड़ी लम्बी-दूभर।

सम्मुख सुदूर अस्ताचल पर, है अब भी ऊँघ रहा दिनकर॥

संसार सकल निःश्वास रोक, एकान्त, स्तब्ध आसन ऊपर।

रजनी के ये धीमे-धीमे, है एक-एक गिन रहा प्रहर॥

तिर अंधकर सागर अकूल कढ़ अभी अभी ही लिये बाँक।

पश्चिम-दिशान्त पर वह सुदूर है क्षीण चन्द्रमा रहा झाँक॥

मेरे विहंग, अन्धे विहंग, पर पंख अभी तू बन्द न कर।

भय नहीं, भीति भी नहीं अरे, रे स्नेह-मोह का पाश किधर।

आशा न यहाँ आशा केवल, छल है जगत में-झूठा-नश्वर॥

मुँह में न अरे वाणी कोई, बैठना वृथा न रुदन लेकर।

टिक रहने को घर-बार नहीं फूलों की सेज नहीं सुन्दर॥

हैं पंख, पंख बस विद्यमान, फैला आँगल-सा आसमान।

है निबिड़-भयावह अन्धकार, है कहीं न ऊषा-दिशा-ज्ञान॥

मेरे विहंग, अन्धे विहंग पर पंख अभी तू बन्द न कर।

*समाप्त*

(श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर, अनु. सुधीन्द्र बी. ए.)