“अखंड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें
इन पुस्तकों की एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव एवं अनुसंधान के साथ लिखी गई है।
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बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें।
1-सूर्य चिकित्सा विज्ञान। 2-प्राण चिकित्सा विज्ञान। 3-स्वस्थ बनने की विद्या। 4-भोग में योग। 5-बुद्धि बढ़ाने के उपाय। 6-आसन और प्राणायाम। 7-तुलसी के अमृतोपम गुण। 8-महान जागरण। 9-तुम महान हो। 10-घरेलू चिकित्सा। 11-बिना औषधि के काया कल्प। 12-पंच तत्वों द्वारा रोग निवारण। 13-दीर्घजीवन के रहस्य। 14-नेत्र रोगों की चिकित्सा। 15-स्वप्न दोष की चिकित्सा। 16-दूध की आश्चर्यजनक शक्ति। 17-उन्नति का मूलमंत्र-ब्रह्मचर्य। 18-उपवास के चमत्कार। 19-स्त्री रोग चिकित्सा। 20-बाल रोग चिकित्सा। 21-निरोग जीवन का राजमार्ग। 22-कब्ज की सरल चिकित्सा। 23-चिरस्थायी यौवन। 24-सौंदर्य बढ़ाने का उपाय।
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें।
1-मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार। 2-धनवान बनने के गुप्त रहस्य। 3-पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि। 4-मरने के बाद हमारा क्या होता है। 5-मित्र भाव बढ़ाने की कला। 6-आकृति देखकर मनुष्य की पहचान। 7-संजीवनी विद्या। 8-अमृत पारस और कल्पवृक्ष। 9-स्वप्न क्यों दीखते हैं। 10-विचार करने की कला। 11-हम वक्ता कैसे बन सकते हैं। 12-लेखन कला। 13-सफलता के तीन साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संपदाएं। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला। 18-प्रभावशाली व्यक्तित्व। 19-अमृतकण। 20-प्रसिद्धि और समृद्धि। 21-हमारी पारिवारिक समस्याएं। 22-हमारे आन्तरिक शत्रु।
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें।
1-ईश्वर कौन है? कैसा है? 2-क्या धर्म? क्या अधर्म? 3-गहना कर्मणोगति। 4-जीवन की गुत्थियों पर प्रकाश। 5-शास्त्र मंथन की नवनीत। 6-शक्ति संचय का पथ। 7-आत्म गौरव की साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास का विकास। 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन। 12-ब्रह्म विद्या का रहस्य। 13-ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग। 14-विवेक सतसई। 15-आध्यात्म शास्त्र। 16-अध्यात्म विद्या का प्रवेश। 17-वैज्ञानिक अध्यात्मवाद। 18-प्रेम का रहस्य। 19-भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत। 20-यज्ञोपवीत द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति। 21-जीवन संगीत। 22-दैनिक जीवन में मनोविज्ञान के प्रयोग।
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें।
1-मैं क्या हूँ। 2-परकाया प्रवेश। 3-स्वर योग से दिव्य ज्ञान। 4-वशीकरण की सिद्धि। 5-जीव जन्तुओं की मूक भाषा। 6-ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग। 7-यम नियम। 8-प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि। 9-मैस्मरेजम की शिक्षा। 10-हस्तरेखा विज्ञान। 11-गायत्री की चमत्कारी साधना। 12-गृहस्थ योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था। 16-आत्मोन्नति का मार्ग। 17-प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं। 18-योग के नाम पर मायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।
मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -3
(1)
अपार तिमि-शिखर सदैव पंथ पर अड़ा रहे,
अथाह सिंधु मुक्त -राह रोक के खड़ा रहे,
बनी रहे परन्तु साधना पुनीत अमरण!
रुकें कभी नहीं चरण!
(2)
न फूल माँग, किंतु भय कभी न मान शूल से,
छिपा न तू भविष्य शून्य भाग्य के दुकूल से,
सदैव शक्ति मान ने किया है भूमि का वरण!
रुकें कभी नहीं चरण!
(3)
पुकार भानु कह रहा प्रभात है, प्रकाश है,
नवीन रात, प्रेरणा नयी, नया प्रयास है,
नवीन विश्व का, नवीन कुम्भकार कर सृजन!
रुकें कभी नहीं चरण!
(श्री विद्यावती मिश्र)
तत्वाज्ञास्तु विद्वान्सो ब्राह्मणाः स्वतपश्चयैः।
अन्धकारमया कुर्युार्लोकादज्ञान सम्भवम्॥
—गायत्री स्मृति
अर्थ—तत्वदर्शी विद्वान ब्राह्मण अपने तप द्वारा संसार के अज्ञानजन्य अन्धकार को दूर करें।
अन्धकार में अनेक प्रकार के भय, त्रास एवं विघ्न छिपे रहते हैं। दुष्ट तत्वों की घात अंधकार में ही लगती है। चोर, डाकू, हत्यारे, दुराचारी अपने कुकर्म अंधेरे में ही करते हैं। भूत, पलीत, साँप, बिच्छू, सिंह व्याघ्र, उल्लू, चमगादड़ आदि निशाचरों से अंधकार के समय ही विशेष हानि होती है। रात्रि में सब काम रुक जाते हैं। प्रकाश के अभाव में व्यापक जीवनी शक्ति में शिथिलता आ जाती है और मनुष्य, पशु, जीव, जन्तु, वृक्ष, वनस्पति आदि सभी निद्राग्रस्त हो जाते हैं। अंधकार से आलस्य और अकर्मण्यता पैदा होती है एवं प्रगति का क्रम अवरुद्ध हो जाता है।
भौतिक जगत में अंधकार से जो अवरोध, भय एवं त्रास उत्पन्न होता है, यही सूक्ष्म जगत् में, आँतरिक जीवन में भी होता है। अविद्या के अंधकार में बुद्धि को दिशाभूल हो जाता है, और जिस प्रकार अँधेरे में रास्ता भूल कर कोई पथिक इधर-उधर ठोकरें खाता फिरता है उसी प्रकार मस्तिष्क भी अवांछनीय विचार और कार्यों में उलझकर, निर्धारित लक्ष से विपरीत दिशा में भटक जाता है और कुकर्म करता हुआ दुखदायक परिणाम प्राप्त करता है।
अविद्या को अहंकार कहा गया है। अविद्या का अर्थ “अक्षर ज्ञान की जानकारी का अभाव” नहीं है वरन् “जीवन की लक्ष भ्रष्टता” है। इसी को नास्तिकता, अनीति, माया, भ्राँति, पशुता आदि नामों से पुकारते हैं। इस बौद्धिक अंधकार में, आत्मिक निशा में विचरण करने वाला जीव-ईश्वर द्वारा निर्धारित धर्म, नीति, लक्ष, आचरण और कर्त्तव्य से विमुख होकर ऐसी गतिविधि को अपनाता है जो उसके लिए नाना प्रकार के दुखों को उत्पन्न करती है।
संसार में दुखों के तीन कारण हैं। (1) अज्ञान (2) अशक्ति (3) अभाव। इन तीनों में सबसे प्रधान कारण अज्ञान जन्य अंधकार ही है। अपने चारों ओर दृष्टि पसार कर देखिए लोगों के बहुत प्रकार के दुखों की जड़ में प्रायः उनका गलत विचार, गलत कार्य, गलत दृष्टिकोण ही होगा। ईश्वर के सुरम्य उपवन संसार में उसके अमर युवराज, मनुष्य के लिए केवल सुख ही सुख विनिर्मित किया गया है। प्रभु के निर्धारित आदेशों पर यदि वह भलमनसाहत से चले तो कभी कोई दुख भी उसके पास न फटके। परंतु जब प्राणी अपने धर्म कर्त्तव्य को भूल कर अवांछनीय विचार और कार्यों को अपनाने की भूल करता है तो वह भूल रूपी अँधियारी ही उसके लिए असह्य दुखों की जननी बन जाती है।
हमारे चारों ओर दुखों का सागर भरा पड़ा है, उसमें अधिकाँश जन समुदाय डूबा रहता है। इस वैतरणी में बिलखते हुए लोगों को पार करना उन व्यक्तियों का परम पावन कर्त्तव्य है जो सामर्थ्यवान साधन सम्पन्न और सहृदय हैं। ब्राह्मण उसे ही कहते हैं जो उपरोक्त सामर्थ्यों से सम्पन्न है। गायत्री का प्रथम अक्षर “तत्” ब्राह्मणों को यही आदेश करता है कि वे तपश्चर्या द्वारा, विद्या द्वारा, तत्वज्ञान द्वारा संसार के समस्त दुखों के मूल कारण अज्ञानान्धकार को दूर करें।
गायत्री का पहला अक्षर ‘ब्राह्मण’ को आदेश देता है। यहाँ यह ब्राह्मण शब्द किसी जाति, वंश, कुल एवं वर्ण के लिए प्रयोग नहीं हुआ है। आत्मा का सर्व प्रधान गुण ब्रह्म निष्ठा, आध्यात्मिकता है। यह तत्व जिसमें जितना न्यूनाधिक है वह उतने ही न्यूनाधिक अंश में ब्राह्मण है। इसी ब्राह्मणत्व को गायत्री ने सबसे प्रथम चुनौती दी है, ललकारा है, जगाया है, और कहा है कि “अपने और दूसरों के कल्याण के लिए व्यापक अज्ञानान्धकार को घटाना तेरा परम पवित्र कर्त्तव्य है।”
दूसरे शब्दों में हम विवेकशीलता, आस्तिकता, सात्विकता, मनुष्यता, उदारता, दयालुता पवित्रता की वृत्ति को “ब्राह्मणत्व” कह सकते हैं, जिसमें यह वृत्ति जितनी अधिक हो, उसका उतना ही बड़ा कर्त्तव्य है कि वह शिश्नोदर परायणता से विमुख होकर अपना और अपने आत्म बंधुओं का कल्याण करने वाले सद्ज्ञान रूपी प्रकाश की ज्योति जगावे। जिसके हृदय में दया है, करुणा है, पुण्य है, परमार्थ है, वह दूसरों के दुखों को भी अपना दुख अनुभव करेगा और उसे दूर करने के लिए पूरी तत्परता के साथ प्रवृत्त होगा। विषय भोग, धन संचय, मान-बड़ाई आदि के लिए मनुष्य तब तक प्रवृत्त नहीं होता जब तक कि ऊपर आये हुए त्रासदायक दुख का निराकरण न कर लें। ब्राह्मणत्व के साथ-साथ अपार करुणा जुड़ी होती है वह संसार में सर्वत्र फैले हुए दुखों को देखकर रो पड़ता है और उन्हें मिटाने के लिए अज्ञानान्धकार को हटाने में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसी दशा में उसकी गति विधि अपने लक्ष की ओर ही रहती है। धन संचय, विषय भोग की ओर उसकी इच्छा एवं प्रवृत्ति ही नहीं होती और उन निरर्थक बातों में गँवाने के लिए उसके पास फालतू समय भी नहीं होता।
जिसकी आत्मा में जितना ब्राह्मणत्व है वह उतना ही (1) तपस्वी, (2) दूरदर्शी और (3) विद्यावान् होता है। गायत्री के प्रथम अक्षर में ब्रह्मणत्व का आह्वान किया है, उसे आमंत्रण दिया है और कहा है कि ‘हे ब्राह्मणत्व! तू सच्चिदानन्द स्वरूप है, ज्ञान और प्रकाश का पुँज है। अपने स्वरूप को निखार और सर्वत्र सुख शाँति की किरणें फैला।” यह ईश्वरीय आदेश यदि अन्तःकरण ने सुन लिया तो वह स्वयं भी तरता है और अनेकों को तारता है। स्वयं भी प्रकाशवान होता है और अनेकों को प्रकाशित करता है।
आत्मा जब गायत्री के प्रथम अक्षर ‘तत्’ का सन्देश सुनती है तो उसे प्रतीत होता है कि इस दैवी प्रेरणा का अनुमान करने के लिए उसे तीन आधार गृहण करने होंगे। (1) तप (2) तत्वज्ञान (3) दूरदर्शिता। तप के बिना आत्मा के मलों का, कषाओं का, कुसंस्कारों का, परिमार्जन हो नहीं सकता, तप के बिना आत्मबल प्राप्त नहीं हो सकता, तप के बिना ब्रह्म शक्ति , तितीक्षा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, दैवी सान्निध्य की उपलब्धि नहीं हो सकती इसलिए तप अत्यावश्यक है। निश्चय ही ब्राह्मणत्व के विकास के लिए तप आवश्यक है। जिस प्रकार तप आवश्यक है उसी प्रकार तत्वज्ञान, वास्तविकता की जानकारी भी अभीष्ट है। उसके लिए स्वाध्याय और सत्संग का आयोजन होना चाहिए। तीसरे उसे यह भी चाहिए कि वर्तमान काल के प्रलोभनों, तात्कालिक क्षुद्र साँसारिक लाभों की अपेक्षा दूरवर्ती, जन्म जन्मान्तरों तक फल देने वाले परिणामों को महत्व देने वाला दृष्टिकोण अपनाये। जो इस निष्ठा का अवलम्बन करता है, वह सच्चा ब्राह्मण बन जाता है, उसका ब्रह्मत्व दिन-दिन सुविकसित होता है और स्वल्प काल में ही पूर्ण ब्राह्मी स्थिति प्राप्त हो जाती है।
दीपक जब स्वयं जलता है तो उसका प्रकाश चारों ओर फैलता है और उससे बहुत दूर तक का अन्धकार नष्ट होता है। इसी प्रकार तप, तत्व ज्ञान, और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने से जो अन्तर्ज्योति प्रकाशित होती है वह उस व्यापक अज्ञानाँधकार को हटाती है जो समस्त प्रकार के दुखों का प्रधान कारण है। सद्ज्ञान के द्वारा प्रकाशवान होने से मस्तिष्क ऐसे विचारों को अपनाता है, शरीर ऐसे कार्यों को करता है, जो केवल शान्ति दायक परिणाम ही उपस्थित कर सकते हैं। दुखों को हटा कर सुख की स्थापना करने के लिए ही संसार में समस्त पुण्य दान किये जाते हैं, पर वे अन्न, वस्त्र, धन आदि भौतिक वस्तुओं पर आधारित होने से तात्कालिक एवं क्षणिक परिणाम ही उत्पन्न करते हैं। परिणामतः उनका पुण्य फल भी वैसा ही स्वल्पकालीन होता है। परन्तु ब्राह्मणत्व की अभिवृद्धि से जो प्रकाश उत्पन्न किया जाता है वह चिरस्थायी एवं दीर्घकालीन परिणाम उत्पन्न करने वाला होता है फलस्वरूप उसका पुण्य भी अक्षय होता है।
गायत्री के प्रथम अक्षर ‘तत्’ का संदेश यही है कि हम अपने ब्राह्मणत्व को जागृत करें, तपस्वी बनें, तत्वदर्शी बनें, दूरवर्ती दृष्टिकोण अपनावें, जिससे हमारा जीवन पुण्य परमार्थ में ओत-प्रोत हो जाये। गायत्री की इस प्राथमिक शिक्षा को जितना ही अपनाया जायगा उतना ही मनुष्यता का, दिव्य भावनाओं का व्यापक प्रसार होगा और उसी अनुपात से मनुष्य जाति की असंख्यों उलझी हुई गुत्थियाँ सुलझेंगी, और उसी अनुपात से पीड़ाओं, वेदनाओं, चिन्ताओं और व्यथाओं का विनाश होगा। गायत्री कहती है कि मनुष्य की अन्तरात्मा में ब्राह्मणत्व का तीव्र गति से विकास होना चाहिए। यही हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक सुख शान्ति का उपाय है।
(महामंडलेश्वर स्वामी श्री विद्यानन्दजी महाराज)
गीता के अठारहवें अध्याय में लिखा है—’सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।’ यहाँ धर्म शब्द अधर्म का भी वाचक है, क्योंकि ‘नाविरतो दुश्चरितात्।’ ‘त्यज धर्ममधर्म च।’ इत्यादि श्रुति और स्मृति के वचनों से मनुष्य को अन्त में धर्म-अधर्म का त्याग कर नैष्कर्म्य प्राप्ति ही करनी चाहिये, यही बात कही गई है। इसलिए धर्म-अधर्म जो कुछ कर्मरूप वस्तु है, उस सबका त्याग एकमात्र परमात्मा की शरण में जाने का ही भगवान् अर्जुन को उपदेश देते हैं।
परमात्मा की शरण छोड़कर अन्य की शरण में जाना इस महा मूल्यवान् शरीर पाने के समस्त सौभाग्य को तिलाञ्जलि समर्पित कर देने जैसा है। जब परमात्मा को छोड़कर दूसरी वस्तु ही नहीं है, तब अन्य की शरण में जाने का विचार अज्ञानमूलक न कहा जाय तो और क्या कहा जायगा?
मनुष्य शरीर से कुछ न कुछ कर्म तो हुआ ही करेंगे—’न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।’ कोई क्षण भर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। शुभाशुभ कर्म स्वर्ग और नर्क में डालने वाले हैं, इसलिए जन्मान्तरादि संसार पैदा करने वाले सुख-दुख हेतु कर्मों का परित्याग करना ही चाहिए। यों भगवान् ने उक्त वाक्य से उत्तर दिया है।
जैसे अकर्म में भी बीजरूप से कुछ कर्म करना पड़ता है—वैसे ही कर्मा भाव के लिए कुछ कर्म करना ही होता है। नैष्कर्म्य के लिए किया गया कर्म बन्धक नहीं होता। जैसे यह कहा जाय कि शरीर को शुद्ध स्वच्छ बनाने के लिए सब कर्म छोड़कर स्नान करना चाहिए। इससे स्नान के लिए जो कर्म करना पड़ेगा वह शरीर की अस्वच्छता में हेतु नहीं होगा, परन्तु स्वच्छता में ही उपकारक होगा। इसी न्याय से नैष्कर्म्य प्राप्ति के लिए जो कर्म करना होगा, वह बंधक नहीं हो सकता।
‘परमात्मा से सिवा कुछ है नहीं’ इस प्रकार की नैष्कर्म्य-सिद्धि के अनंतर हुई परमात्म शरणागति की स्थिति से क्या फल होगा? तो इसका भी भगवान उत्तर देते हैं—’सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।’ उक्त शरणागति के बाद सब पापों से मैं मुक्त कर दूँगा, शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं। धर्म-अधर्म के बंधनों से यानी संसार रूपी महान दुःख रूप अग्नि से मुक्ति पानी है, तो मनुष्य को सब कुछ छोड़कर भगवान के बतलाए हुए मार्ग का अवलम्बन करना ही पड़ेगा। भगवान ने जिस मार्ग का अनुसरण करने के लिए अर्जुन के बहाने से समस्त मानव जाति को उपदेश दिया उसका बिना पालन किये आप इस घोर दुःख से मुक्ति चाहेंगे तो, मुक्ति नहीं होगी, कभी नहीं। भगवान ने मनुष्य को बताया, उसकी रक्षा के लिए अनेक वनस्पति औषधि आदि का निर्माण किया, शरीर में उन वनस्पतियों को पहुँचाने के लिए मुखरूपी द्वार, जानने के लिए इन्द्रिय, चलने के लिए पैर आदि बनाये।
किसी आदमी को पेट में खूब भूख लगी है, वह यदि पेट पर जौनपुर की उत्तम ढाई सेर इमरती बाँध ले, तो क्या उसकी उससे भूख मिट जायगी। नहीं, भूख की निवृत्ति तो बत्तीस दाँतों से चबाकर मुख द्वारा गले के नीचे उतारने पर ही होगी। इसी प्रकार परमात्मा ने इस संसार दुःख से मुक्ति चाहने वाले पुरुष को गीता द्वारा जो मार्ग बतलाया है, उसके सिवा दूसरे किसी मार्ग से मुक्ति नहीं हो सकती।
इस विषय में विद्वान लोग अनेक तरह के संदेह करते हैं—इस गीता में भगवान ने कौन सा मुक्ति साधन बतलाया है? क्या ज्ञान से मुक्ति होती है, यह बतलाया है या कर्म से मुक्ति होती है, यह बतलाया है? या क्या ज्ञान और कर्म दोनों से मुक्ति होती है, यह बतलाया है? ‘ज्ञात्वामृतमश्नुते’ ‘ततो मा तत्वतो ज्ञात्वा विशते’ इन वाक्यों से तो ज्ञान ही मुक्ति का साधन है, यह मालूम पड़ता है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ ‘कुरुकमैव तस्मात्वम्’ इत्यादि से कर्म ही मुक्ति के साधन हैं, यह प्रतीत होता है, ज्ञान कर्म दोनों को मुक्ति साधन कहने से यह भी बात हो सकती है कि दोनों मिलकर मुक्ति के कारण हैं।
इस तरह के संशयों का निर्णय कर लेना परम आवश्यक है, क्योंकि यदि निर्णय न किया जाय तो मुक्ति साधनत्व के अज्ञान से कौन कहाँ प्रवृत्त होगा।
उपर्युक्त जो संशय हुए हैं, उनका निर्णय यही है कि मुक्ति ज्ञान से ही होती है, न कर्म से या न कर्मज्ञान दोनों से। भेदबुद्धि ही दुःख का कारण है, भेदबुद्धि का कारण अज्ञान है, इसलिए अज्ञान की जिससे निवृत्ति होगी, वही मुक्ति का कारण होगा। अज्ञान की निवृत्ति ज्ञान से ही होगी, ज्ञान प्रकाशरूप होता है और अज्ञान अन्धकार रूप। प्रकाश से ही अन्धकार की निवृत्ति होती है, घड़े आदि से नहीं।
कर्मों से अज्ञान की निवृत्ति रूप मुक्ति होगी यह तो हो नहीं सकता, अपिच कर्म नित्य बुद्ध मुक्त आत्मा में क्या उपकार कर सकते हैं, कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जैसे जमीन पर रखे हुए गले के हार को गले में धारण कर भूल से जमीन पर खोजने वाले उदास पुरुष को कोई बतला दे कि तुम्हारे गले में हार है, क्यों व्यर्थ परिश्रम करते हो। तो हार प्राप्त समझ कर खोजने वाला मारे खुशी के नाच उठता है। वैसे ही अनेक जन्म जन्मान्तरों के संस्कार को पुरुष आत्मा को भूल गया है, ज्यों−ही तत्वज्ञ महापुरुष उसको बतलाता है, त्यों−ही अखण्ड भूमण्डल के साम्राज्य से भी कोटि गुण आनन्द पाकर मारे खुशी के वह इतना आनन्दविभोर बन जाता है कि उसका वर्णन ही नहीं कर सकता, सारे लौकिक साम्राज्य सुखों को भूलकर अपनी आनंदरूप आत्मा में डूबा रहता है।
यह ज्ञान ही अद्वैत आत्मा का है, जब तक द्वैत का मान रहता है तब तक भय और भय जनित दुःख उसे मिला करते हैं। श्रुति कहती भी है—’द्वितीयाद्वै भयं भवति।’ द्वितीय से ही भय होता है यानी भेदबुद्धि ही दुःख की जननी है। ‘यत्र सर्वमात्मैवाभूत।’ जिस दशा में सारे संसार में अपनी आत्मा का ही स्वरूप दीखने लगा—सब अपनी ही आत्मा बन गये, तब दृश्य-दर्शन रहा ही कहाँ; यानी किस कारण की वृत्ति किस विषय पर आक्रमण करेगी, कहीं भी नहीं। इससे फल यह होगा कि बाहर या भीतर के सुख दुःख तो उसे स्पर्श ही नहीं कर पायेंगे, फलतः आत्मा के अखण्ड आनन्द का भोग करता हुआ वह जीवनमुक्ति का आनंद भोगता रहेगा।
इस विषय पर अधिक और किसी खास लेख में विचार होगा, पर निष्कर्ष यह निकलता है कि ज्ञान के सिवा मुक्ति नहीं। ज्ञान प्राप्ति के लिए ही भगवान् का उपदेश है, ज्ञानोपार्जन के समय एकमात्र गुरुवाक्यों का सावधानी से अर्थानुसंधानपूर्वक श्रवण करते रहना चाहिए। उसमें अविश्वास या अश्रद्धा करने से महान क्षति होगी, जब तक श्रद्धा नहीं, तब तक गुरु के वाक्य भीतर बोध नहीं करते। इसलिए कहा गया है—’श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।’ श्रद्धावान् ही ज्ञान पाता है, यह ज्ञान आत्मा के विषय का ही समझना चाहिए।
अबोध बालक पढ़ते समय गुरु में अश्रद्धा रख कर उनके वचन श्रवण करे तो वह कभी पढ़ नहीं सकता सारी जिंदगी पश्चाताप करता रहेगा। उसी प्रकार कठिनतम आध्यात्मिक विषय पढ़ने को तो उसके तत्ववेत्ताओं के पास श्रद्धा रखकर ही जाना होगा। तभी तत्वदर्शी आत्म सम्बन्धी गहन तत्व का अत्यंत सुँदर सरल भाषा में उपदेश देंगे और जानने के लिए मार्ग बतलायेंगे। पर इन सबमें मूल है श्रद्धा। जैसे खेत में धान बोने के बाद जल के बिना सूख जाता है, कुछ भी फल नहीं मिलता, वैसे ही गुरु के पास जाने पर भी यदि श्रद्धा नहीं रही, तो कुछ भी फल नहीं होता।
एक समय की बात है—गैया चराने वाले दो बालक अपनी गैया लेकर जंगल में गये, वहाँ उन्होंने एक तपस्वी महात्मा देखे, ये महात्मा उसी जंगल में कुटिया बनाकर रहते थे और नियमपूर्वक ध्यान करते थे, दोनों बालकों को उन पर बड़ी श्रद्धा हुई, दर्शनार्थ उनके पास गये। निर्दोष दस बारह वर्ष के उन बालकों को देखकर महात्मा ने उनसे भाषण किया कि बेटा, यहाँ क्यों आये? कहाँ के रहने वाले हो? पढ़ते हो कि नहीं? इन बालकों ने कहा—बाबाजी कुछ दूर के गाँव के हम लोग निवासी हैं हम दोनों का घर पास पास है—पड़ोसी हैं, गैया चराने आये हैं, कुछ भी पढ़ते नहीं, केवल गैया चराना और खाना-पीना यही काम हैं, आपको दूर से देखकर दर्शनार्थ हम आये हैं। महात्मा इनकी बात सुनकर प्रसन्न हो गये और कहा—कहो क्या चाहते हो, मैं तुम जो चाहोगे, दूँगा। तुम लोगों की बात से मैं बहुत खुश हूँ। उन दोनों में से एक लड़के ने कहा—महाराज, यदि आप मुँहमाँगा दे सकते हैं तो हमें एक हजार गौएं दीजिये। एक गौ से कुछ नहीं होता। उन्हें हम प्रेम से चरायेंगे और खूब दूध की पैदा करेंगे, आपकी भी सेवा करते रहेंगे। इतना कह कर वह चुप हो गया। बाबाजी ने दूसरे से पूछा—बेटा, तुम भी माँगो। तब दूसरा बोला—महाराज, हमें तो एक ही गौ दीजिए, पर उससे इतना दूध घी मिले जितना कि एक हजार गौएँ रखने पर हमें मिल सकता है।
तब महात्माजी ने सोचा—इनमें हजार गौएँ माँगने वाला बालक चंचल है और एक गौ माँगने वाला धीर मालूम पड़ता है। यों विचार करके कहा—भाई देखो, बात ऐसी है कि हजार गौओं के समान एक गौ यदि चाहते हो, तो तुम्हें आठ दिन तक हमारे पास रहना होगा, नौवें दिन जरूर मिलेगी, बोलो है मंजूर? लड़के ने कहा—हाँ बाबाजी; मुझे मंजूर है।
यह सुनकर बाबाजी ने दूसरे बालक से कहा—बेटा; तुम नौवें दिन के बाद आना; फिर तुम्हारे लिए व्यवस्था करूंगा। महात्माजी के पास एक गौ चाहने वाला लड़का रह गया। महात्माजी के पास एक अत्यंत छोटी दूसरी कुटिया थी, उसमें बैठकर जाने लायक छोटा-सा एक ही द्वार था। उस कुटिया को बतला कर महात्माजी ने उस लड़के से कहा—बेटा; जाओ इस कुटिया में, वहाँ एक आसन पड़ा है, उस पर बैठ जाओ ‘गौ-गौ’ जपते जाओ। आठवें दिन तुमको वैसी गौ मिल जायगी, पानी आदि लेना हो तो बाहर आकर ले जाना।
वह लड़का कहने के अनुसार उसमें घुस गया और आसन पर बैठ कर गौ-गौ जपने लगा। न उठता है, न जल पीता है, न खाता है और न सोता है, उसे गौ की धुन लग गई। पाँचवे दिन महात्मा को चिन्ता हुई कि यह तो निकला बड़ा अक्खड़, बाहर बुलाकर कुछ जलपान कराना चाहिए। यों सोचकर लड़के को पुकारा, लड़के ने उत्तर दिया—महाराज, क्या आज्ञा है? महाराज ने कहा—भैया बाहर आओ, जल पीलो, तब उस लड़के ने कुछ क्षण बाद उत्तर दिया—गुरुवर! द्वार छोटा है, मैं कैसे बाहर आऊँ, मुझे तो बड़े सींग, चार पैर आये हैं बड़ी पूँछ है, स्थूल शरीर है, निकलूँ कैसे? महात्मा को आश्चर्य हुआ और सोचा—अरे, गौ को जपते-जपते यह तो स्वयं अपने को गौ समझ गया है, यह बड़ा उत्तम अधिकारी है। तब गुरु ने कहा—बेटा, तुम अपने को ऐसा मत समझो, किन्तु यह समझो कि मैं नित्य, शुद्ध मुक्त स्वभाव हूँ, स्वयं प्रकाश हूँ, मेरे प्रकाश से सूर्य चन्द्र सब प्रकाशित हो रहे हैं, सारी सृष्टि मेरे संकल्प से हुई है, मेरा किसी से भेद नहीं है, मैं कहीं पर नहीं रहता, सब मेरे में रहते हैं, सबका आधार मैं हूँ।
बालक ने ध्यान से सुना और कहा—अच्छा गुरुजी, अब मैं गैया पाने के लिए वैसा ही अपने को समझकर गौ का जप करता हूँ, अब आप अपने कार्य में लगें, आठ दिन नहीं होंगे, तब तक बाहर निकलूँगा नहीं। यह कह कर गुरुजी के उपदेश के अनुसार फिर धुन लगाकर जपने लगा। केवल दो दिन व्यतीत भी नहीं हो पाये थे कि एकदम वह लड़का बाहर निकल पड़ा और महात्मा जी के चरणों को पकड़कर कर कहने लगा—महाराज, यह आपने मुझको कौन सी वस्तु प्रदान की, आपने मेरा जन्म सफल कर दिया। महाराज, आपने वह चीज मुझे दी है, जिसको इन्द्र आदि देवता भी नहीं पा सकते। बड़े-बड़े महर्षियों की दृष्टि में भी जो अभी नहीं आया है, वह तत्व मुझको दे दिया। महाराज, मेरे पास वह कामधेनु गौ आई है, जिसके सामने करोड़-करोड़ सूर्य चन्द्र सब फीके हैं, चौदह ब्रह्माण्ड मेरे संकल्प से चल फिर रहे हैं। भगवन् आपकी स्तुति किन शब्दों में करूं, महाराज, मैं आपके ऋण से कैसे मुक्त होऊँ, आज्ञा दीजिए, ऐसी कौन सेवा करूं जिससे आपकी प्रसन्नता का कुछ अंश से भाजन बनूँ।
महात्मा उस बालक के ये शब्द सुन कर सोचने लगे—मैं जिस तत्व को जानने के लिए कई वर्षों से यहाँ वास करता हूं, अनेक कष्ट झेलता हूँ, पंचाग्नि तपता हूँ, पर उस तत्व को दूर से भी नहीं जान पाता हूँ, इसने तो केवल सात ही दिन में जान लिया। इसने अपनी आत्मा का साक्षात्कार कर लिया, परमतत्व पहचान लिया, इसके संकल्प से हजारों तत्वज्ञानी बन सकते हैं अतः गुरुदक्षिणा में ज्ञान ही माँगना चाहिए। ऐसा विचार कर महात्मा जी ने उस लड़के से अत्यन्त कोमल शब्दों में कहा—भैया, मैं तो यही चाहता हूँ कि जैसा इस समय बने हो, वैसा मुझे भी बना दो। लड़के ने महात्माजी के सिर पर हाथ रक्खा, रखते ही महात्माजी के सारे शरीर में रोमाँच हो उठे और उस बालक के पैर पकड़ लिए। लड़के ने कहा—गुरुवर! ऐसा मत कीजिए, यह आपका कर्त्तव्य नहीं है, आप ही मेरे गुरु हैं, रास्ता आपने दिखाया, फल भोग में पूर्वापर भाव हुआ है। इसमें चिन्ता नहीं, प्रारम्भ वैसा ही था। नौवें दिन दूसरा लड़का आया, दोनों ने उसको पास में बैठाया। प्रारब्ध की गति से परिचय हुए महात्मा ने उसे एक हजार गौएँ प्रदान कर उसे विदा किया।
इस दृष्टान्त से निकला क्या, निकला यही कि श्रद्धा रखने से ही उस बालक को सिद्धि मिल गई, आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, यदि श्रद्धा नहीं रखता और यों ही बैठता तो न उसका चित्त लगता और न उसे तत्वज्ञान ही होता। इसलिए श्रद्धा तो आध्यात्मिक बोध के लिए चाहिए ही।
इसी बात को लेकर भगवान ने अर्जुन के माध्यम से हमको उपदेश दिया है कि परम श्रद्धा से—’मामेकं शरणं ब्रज।’
(श्री भूपेन्द्रनाथ सन्याल)
हम क्या प्रेम कर सकते हैं प्रेम करने वाले वे प्राण ही हमारे अन्दर कहाँ हैं? तन मन की सुधि भुला देने वाले और जगत की विस्मृति करा देने वाले भाव में डूबने के लिए हमारे प्राणों में वह आकर्षण ही कहाँ है? इसी से हम न तो प्रेम का स्वरूप ही जान सकते हैं और न प्रेम कर ही सकते हैं? हम इस संसार में जो प्रेम करते हैं, वह तो मानो राक्षसी प्यार है, वह प्रेम तो हम करते हैं। प्रेमास्पद को खा डालने के लिए उसे पददलित कर उसके सारे सौंदर्य को नष्ट कर डालने के लिए और लोक में उसे घृणा पात्र बना देने के लिए छिःछिः क्या इसी का नाम प्रेम है? प्रेम का स्वरूप समझे बिना प्रेम करने से वह असली प्रेम नहीं होता है, वह तो केवल इन्द्रिय-चरितार्थता होती है। जिस प्रेम का उद्देश्य इन्द्रिय-चरितार्थता है, वह कभी विशुद्ध नहीं हो सकता। इसलिए संसार में अन्त तक किसी के साथ प्रेम करके सुख नहीं मिलता। हम सभी के अन्दर जैसे देवता निवास करते हैं, वैसे ही पशु भी हैं। सभी समय हमारे हृदय सिंहासनों पर केवल देवता ही विराजित नहीं रहते। अधिकाँश समय तो हमारे अन्दर रहने वाले पशु (पशुवृत्ति) ही छिपकर प्रेम के सिंहासन पर बैठ जाते हैं और समय-असमय धीरज के बाँध को तोड़कर वे अपने असली रूप में प्रकट हो जाते हैं। इसी से संसार में इतना हाहाकार मच रहा है और इसी से जगत में इतनी अशान्ति फैल रही है।
इस संसार में प्रेम का यत्किंचित् स्वरूप समझना या देखना हो तो माता के समीप जाओ। वहाँ बहुत कुछ विशुद्ध प्रेम का स्वरूप देख सकोगे। यह माता भी हमारी उस जगजननी का ही अंश है, उस त्रिलोक प्रसविनी नित्य माता का ही स्वरूप है, उसी का प्रतिबिम्ब है, इसी से इससे जो प्रेम मिलता है वह इतना सुन्दर और निर्मल है, ठीक मानो पुण्य सलिला भागीरथी की पवित्र धारा के समान अत्यन्त स्वच्छ, अत्यंत शुद्ध और परम पवित्र है। जो इस माता की भक्ति कर सकता है, दिल खोलकर ‘माँ’ पुकार सकता है, वह शीघ्र ही उस चिन्मयी माता को भी पहचान सकेगा। वह सर्व चराचर रूपिणी जगत्मयी हमारी माँ कितने रूपों में, कितने भावों में और कितने स्वाँगों में सजकर हमें अनवरत कितना आनंद दे रही है। हम कभी उसे आँखें खोलकर देखते हैं? माँ जैसे बच्चे को गोद में लेकर उठाकर नचाती है, वैसे ही वह सच्चिदानंदमयी माँ हमें कितने नाच-नचा रही है उसके नित्य नवीन मनोहर नित्य की भाव-भंगिमाओं में न मालूम कितने जन्म और हमारा कितना रूपांतर हो जाता है। उस माँ की हम क्या पूजा करेंगे? कितना समय उसकी पूजा में लगावेंगे? वह तो प्रतिक्षण ही हमें लाड़-लड़ा रही है, हमारी पूजा कर रही है। हम उसके मातृ हृदय को तृप्त करने के लिए ‘माँ’ ‘माँ’ पुकारें, हमारे मुख से इस ‘माँ’ शब्द को सुनने के लिए ही वह न मालूम कितने दिनों से कान लगाये बाट देख रही है कितने युग बीत गये, बाट देखते-देखते कितनी बार सृष्टि स्थिति और प्रलय हो चुके। तब भी हम ‘माँ-माँ’ पुकार कर उसके हृदय को सुखी नहीं कर सके। हाय दुर्भाग्य! हाय रे पाशविकता! हमारी उस माँ का हृदय अनन्त प्रेम का निर्झर है, इसी से वह हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है, इतनी उपेक्षा करने पर भी वह हमारी अपेक्षा कर रही है। हमारे लिए न मालूम कितने युगों से माता के वक्षःस्थल से स्तन्यसुधा की अनवरत धारा बह रही है। उस प्रेम सुधा-धारा से आज कल न मालूम कितनी प्रेम-नदियाँ और कितने प्रेम समुद्र बन गये परंतु हमारे अभागे हृदय पाषाण का एक कण भी नहीं बहा। यह जीवन की कैसी विडम्बना है? हम किस अभिमान के पहाड़ की चोटी पर बैठे हैं? वह अनंत प्रेम धारा कितने हृदयों को धोकर चली गयी, पर क्या उसने हमारे हृदय तीर को स्पर्श ही नहीं किया? नहीं निश्चय ही उसने स्पर्श किया है। हम सोच-समझ कर इस बात को नहीं देखते वह तो रोज-रोज ही स्पर्श कर सकती है, परन्तु हम उसे दिल लगाने तक ही देखते हैं! हम तो अपने मन के आवेग में ही मस्त हुए बैठे हैं, न मालूम किस काल्पनिक सुख के नशे में चूर हो रहे हैं फिर उसकी पूजा हमारे कानों में कैसे प्रवेश कर सकती है, सुनने वाला तो स्वयं पागल हो रहा है। जगत में न मालूम कितनी तरह के पागल हैं।
किसी किसी पागल को ऐसा ख्याल होता है कि हम माता की पूजा करते हैं, उसके लिए अनेक साधन करते हैं। वह हमारे इस भजन साधन से आकर्षित होकर हम पर कृपा दृष्टि करेगी। हाय रे मूर्खता! हाय रे पागलपन! इस बात को सुनते ही हँसी आती है। हम उसे आकर्षित कर सकें, ऐसी हमारे अन्दर कौन-सी शक्ति है तब भी हमारी वह माँ हमारी व्याकुलता देखकर पुकार उठती है। यह उसकी हम पर असीम कृपा है। हम उसको कहाँ पुकारते हैं? वह माँ ही तो हमें पुकारती है। हम क्या धूल उसकी पूजा करते हैं, वह तो हमारी पूजा करती है खिलौने सजकर खिलाड़ी को आनन्द देते हैं यों खिलाड़ी ही खिलौनों को सजाकर उनसे आनन्द प्राप्त करता है?
उसकी पूजा के लिए बड़ी भारी तैयारी चाहिए विराट आयोजन होना चाहिए। ऋषि मुनियों ने भक्ति विहल चित्त से इस बात को समझा था, इसी से वे मनुष्यों के लिए कुछ-कुछ प्रकट कर गये हैं। हम अज्ञानी यदि कभी उसे समझ सकेंगे, हम अन्धों की भी किसी दिन आँखें खुल जायेंगी तो पता लगेगा। अहा! ऋषियों की कितनी दया है, व्यथित पीड़ित आर्तों के लिये उनके हृदय में कितनी सहानुभूति है? क्यों न हो? माता के सच्चे सपूत तो वही हैं, जिन्होंने माँ ही को समझा है, वह माँ के मन की बात जान सके हैं। हमारी वह माँ नित्य आर्तत्राण-परायणा है, सन्तान वत्सला है। पर हम ऐसे कपूत हैं ऐसे पाषाण हृदय हैं कि ऐसी माता की ओर भी एक बार आँख उठाकर नहीं देखते। हम जिस जमीन पर बैठे हैं जिस पर से चल-फिर रहे हैं, उठते-बैठते हैं, और जिसका रस प्रतिदिन फल फूलों के रूप में नाना प्रकार के अन्न के रूप में हमें तृप्ति कर रहा है, वह कौन है? अरे, वही तो हमारी माँ है, माँ को दूसरी जगह ढूँढ़ने कहाँ जाओगे? रोज ही तो नन्हें से शिशु की तरह उसके हृदय पर चढ़ कर शक्ति भर उसका रस खींचकर पी रहे हो उसी से तुम पुष्ट हो, वही तो हमारी करुणामयी है, वही तो धरणी है—हमारी माँ! ‘महीस्वरूपेण यतः स्थितासि।’ रोज जो प्यास से व्याकुल होकर कुल-2 करते हुए जल पीते हो और उससे प्राण बचे समझते हो। जानते हो उस जल के अन्दर जीवनी शक्ति कौन है? जल पीकर क्यों तृप्ति होते हो? इस जीवन रूप में भी जगत की जीवन स्वरूपा हमारी वह माँ ही है, ‘अपाँ स्वरूपा स्थित्यात्वयेतत्’ यह जो मंद-मंद सुख भरी हवा चल रही है, जिससे शरीर और मन शाँत हो रहे हैं। यह उसी का तो स्पर्श है। जो इतना सुख देती है, इतनी स्पष्टता के साथ सदा तुम्हारे सामने खड़ी रहती है—तुम उसको कहाँ पहिचानते हो? कहाँ समझते हो अरे तुम तो समझने की चेष्टा भी नहीं करते। इतने पर भी यह कहने में नहीं सकुचाते कि वह कहाँ है? उसके दर्शन कहाँ हो सकते हैं उसको प्राप्त करना केवल बात ही बात है।’ तुम समझते हो मानो माँ सदा छिपी ही रहती है उसे खोज निकालने का भार मानो तुम्हारे ही ऊपर पड़ा हुआ है इसी से तुममें से कोई माला खटकाते हैं तो कोई फूँ-फूँ करते हुए प्राणायाम करते हैं और सोचते हैं कि माँ हमारे साधन जाल में फँस गई है, क्यों? पर यह सब कुछ भी नहीं है। बात तो ठीक इससे उल्टी है। हम उसे नहीं खोजते हैं, वहीं हमें खोज रही है। न जाने कितने दिनों से, कितने युग-युगाँतरों से वह अपना मातृस्नेहपूर्ण वक्षःस्थल लिये हमारे पीछे-पीछे दौड़ रही है, और पुकार रही है, ‘बेटा आ! दौड़ आ!’ एक बार मेरी छाती से लग जा, अरे चंचल, अरे अबोध, मेरे लाल चला आ, एक बार फिर माँ की गोद में।’
वह हमें हिलाती है, उठाती है, बैठाती है, खिलाती-पिलाती और सुलाती है, हमारे लिए वह कितने रोने-हँसने के खेल खेलती है, तब भी हम अपनी उस माँ को याद नहीं करते। उसको पुकारने और साधना करने का अब और क्या आयोजन कर रहे हो भाई? वही तो तुम्हारी सब कुछ है, वही तो तुम्हारे भीतर बाहर है, वही अस्थि-माँसमय शरीर है, वही तो तुम्हारे प्राण-मन-बुद्धि है, वही तो तुम्हारा प्रिय अन्तरतर है, अरे वही तो तुम्हारा आत्मा है। उसकी भेंट भी क्या चढ़ाओगे? वह न हो तो तुम्हारी जबान ही नहीं खुले। जो कुछ है सो तो उसी का है, किसकी चीज किसे दोगे? इतना-सा ज्ञान होने पर ही तो सारे साधन-भजन का अंत हो जाता है। इतना तो हमें अवश्य ही करना पड़ेगा, जिससे उसकी स्मृतिधारा बहती रहे। कैसे अचरज की बात है? इतनी उधेड़ बुन कर रहे हो, परन्तु उसे याद नहीं करते। लोग दिखाऊ जो ध्यान करते हो, वह भी कितनी देर? फिर उसमें भी न मालूम कितनी बार अन्यान्य विषयों का चिंतन करते हो? यह न तो उसका असली स्मरण है और न साधना ही है। उसका निरंतर चिंतन करना पड़ेगा; प्रत्येक बोध में उसी का अनुभव करना होगा। क्या तुम जानते हो कि इन्द्रियों के द्वारा यह मन जो असंख्य खेल खेलता है; वह क्या अपनी शक्ति से खेलता है जितने भी बोध के विषय हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका विकास उस माँ के पदनिक्षेप के बिना हो सकता हो। क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया है? मन जो इन्द्रियों के द्वारा दौड़ता फिरता है, इसके प्रत्येक वेग से जो कल्पना या चिन्ता रहती है वह उस माँ के चरण-कमलों से प्रस्फुटित रहती है। इसके सिवाय अंट-संट और जो कुछ होता है सो सब तो भूत की बेगार के ढोने के समान है। उसमें कोई भी लाभ नहीं है। उठो, जागो। नींद में ही उठकर इधर-उधर हाथ मारने से कोई लाभ नहीं होगा। भली भाँति जाग उठो, सब छोड़कर एक बार जगकर बैठ जाओ। जो कुछ है, सब उसी का है, वही सच है, इस स्मृति को स्पष्ट कर डालना होगा। इसी का नाम यथार्थ साधना है इसके अतिरिक्त और सब तो गुड़ियों के खेल हैं। इसी साधना से मातृ स्नेह का आदर कर माता की यथार्थ पूजा करो।
(स्वामी श्री शिवानन्दजी सरस्वती)
जब हम किसी वस्तु से प्रेम करते हैं तो क्या इसलिए कि हम उससे युक्त होने की इच्छा को प्रकट करते हैं? वास्तव में सिद्धान्त तो यह है कि हम वह वस्तु स्वयं बनना चाहते हैं। परमात्मा की पूजा उपासना के अंतर्गत यही भाव है कि हम विशुद्ध, पवित्र और पूर्ण बन जावें, जैसा कि परमात्मा का स्वरूप है—’वह भूमा है,जो सुख है, सो सुख अल्प है, उसमें आनन्द ही कैसे—अन्तः भूमा में ही सुख है और उसी की प्राप्ति करनी चाहिये। ईश्वर का आनन्दमय, दिव्य-स्वरूप हम पाना चाहते हैं तो हमें अवश्य तद्गुणात्मक ही हो जाना चाहिये।’
श्री राम ने कहा था—”जो कोई मेरी शरण में आता है और अभय याचना करता है उसे मैं निर्भय कर देता हूँ—यह मेरा वचन है”। परन्तु कोई भी व्यक्ति रामजी के उस आदर्श का प्रतीक तब तक नहीं बन सकता, जब तक वह उनके गुणों की भक्ति न करे, उनको स्वयं के-जीवन में ग्रहण न करे। भगवान तो दया, सरलता और बुद्धि की ज्वलन्त-छटा थे। हमने क्या उन गुणों को अपने जीवन में ओत-प्रोत करने की चेष्टा की है। भगवान राम की पूजा का अर्थ, सच्चे शब्दों में उनकी सरलता, पवित्रता, सहिष्णुता और सद्चरित्र को हृदयंगम करना है।
भगवान् का नियम था कि सत्य मार्ग में कोई आपत्ति आ भी जाये तो सत्य से विचलित न होना। अपने-अपने स्वजनों का माया-मोह भी हमारे आदर्श को डगमगा न पावे, क्योंकि सत्य का शासन एक है, और वह है न्यायपरायणता।
जो राम के निकट प्रेम के उपहार समर्पण करता है, उसका हृदय विशाल, भावना पवित्र, स्वभाव सरल, विचार आदर्श और कर्म वासनारहित हो जाते हैं। वह राम-रूप-धर्म का प्रतिनिधि हो जाता है और शक्ति और विद्वत्ता का भी। राम का नाम तो अज्ञान, कामना और पाप के समूल को दग्ध कर देता है। ज्ञान हो या न हो, विधि या अविधिपूर्वक, रामनाम का उच्चारण करने से भक्त अमर और शान्ति को पाता और उसकी वर्षा चारों ओर करता रहता है।
योगक्षेम का उत्तरदायित्व भी उसके कन्धों पर छोड़ना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि हम महान है और योग सम्पन्न हैं। योग, जप, तप, व्रतादि-नियम भी बिना राम के निःसार में रमते हैं। राम का आदर्श परिपालन करना यही है कि हम उनके समान पवित्र-आचरण को अपने जीवन का दैनिक-अंग बनावें।
राम कोई महात्मा ही नहीं समझे जाने चाहिये और न कोई जीवकोटि से विकास को प्राप्त हुये महापुरुष ही। वे साक्षात विश्व के नियन्ता हैं। भक्त का राम दशरथ का ही पुत्र नहीं, अयोध्या का ही राजा नहीं, परंतु सर्वव्यापी राम है, परमात्मा और विभु राम है।
राम ने ही तो दस-विषयोन्मुखी इंद्रियों वाले राक्षस-मन का संहार किया था। अतः वे हमारे जीवन की परम-शक्ति हैं, उनकी पूजा विराट की पूजा ही है, क्योंकि वे स्वयं विराट-आत्मा थे। श्री रामजी की भक्ति एक साधारण मनोवृत्ति नहीं, जैसा कि आजकल के रँगे हुए मानव वर्ग का मत है। मैं निःसंकोच होकर कहना चाहता हूँ कि राम की भक्ति तीक्ष्ण-वैराग्य और सात्विक भाव के उदय होने का लक्षण है। हमको, अतः जो सात्विक-गुण श्रीराम के जीवन चरित्र में मिलते हैं, उनको ग्रहण करना चाहिए। यदि ऐसा न हुआ तो हम आवेश में आकर, थोड़े ही समय के उपरान्त उस महिमा को भूल जायेंगे। भगवद्भक्ति का तो यही दर्शन है कि मनुष्य जो भक्ति करता है, संयमी हो और सर्व शुद्ध आचारवान हो। उसके अनन्तर में सच्चा वैराग्य हो, जो कालान्तर में उसकी भक्ति को परिपक्व करेगा।
जब संसार की वस्तुओं से अत्यंत अनासक्ति हो जाती है, तब परमसिद्धि की प्राप्ति संभव होती है। अतः सर्वप्रथम इंद्रिय निग्रह ही शास्त्रीय भक्ति है। मन की कामनाओं को क्षत-विक्षत कर; ईश्वर का स्मरण करो। कष्ट भी आ जाये तो अपने पथ से विचलित नहीं होना। कष्ट ही हमारे जीवन पथ के कंटकों का निवारण करते हैं वे ही हमारी दृष्टि में अंजन का प्रलेप करते हैं। दुःख ही में तो भगवान स्मरण आते हैं उनकी भक्ति की भावना का श्रीगणेश होता है और आत्मदर्शन द्वारा दुःख निवृत्ति की चेष्टा का सूत्रपात होता है।
आज भी विश्व ‘शाँति-शाँति’ चिल्ला रहा है। परंतु इसका मूल्य ही क्या है? ‘बबूल का अंकुर और आम के लिए चिल्लाना’ कहाँ तक हास्यास्पद नहीं है। न सदाचार, न तप, न ज्ञान, न सात्विकता न धर्म और न कोई नियम केवल मात्र अपनी-अपनी ख्याति के लिए शाँति-शाँति का गंर्दब राग अलापते हैं। हमारे देश के वे महात्मा, जिन्होंने अहोरात्र भगवान के चरणों में अपने जीवन को न्यौछावर कर दिया, वे ही शाँति के सच्चे नेता हो पाये और होते रहेंगे, क्योंकि उन्होंने श्री राम के आदर्श को अपने में हृदयंगम कर तदनुसार अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को आमंत्रित किया और वे अक्षरशः विश्वशाँति के लिए अपना उपहार दे पाये।
यदि आज भी मानव समाज विपरीत-पथ को त्याग कर हमारे आदर्श की चरण रजों का अनुसरण करे तो शाँति की तो कोई बात ही क्या—विश्व का दुरूह कार्य भी क्षणार्द्ध में सम्पन्न हो सकता है क्योंकि शाँति तो अपने अंदर ही है और उसकी खोज करने के लिए बारह देखना असफलता का प्रथम संकेत हैं। तब जो लोग शाँति के लिए बाहर की ओर भाग रहे हैं, वे असफलता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पा सकेंगे। हमारा आश्वासन यही है कि वे लोग यदि श्री राम के समान आचरण करना प्रारम्भ कर दें और उनके जीवन के प्रत्येक आदर्श को अंगीकार करें तो हमारा मानव मण्डल समृद्ध और एक सूत्राबद्धित हो सकेगा और एक हृदयात्मवान हो पायेगा।
यदि कोई मनुष्य तुम्हें जल पिलावे और उसके बदले में तुम भी उसे जल पिलाओ, तो तुम्हारा यह काम कुछ भी नहीं है। शोभा इसी में है कि अपकार करने वाले के साथ भी तुम उपकार करो।
(श्री मोहनलाल वर्मा एम ए. एल. एल. बी.)
घोर निराशा को जीतने वाला—प्रसिद्ध अंग्रेज आर्थर पियर्सन से कौन परिचित नहीं है? जन्म से ही उसकी आँखें कमजोर थीं, किंतु नेत्रों की दुर्बलता की क्षतिपूर्ति बुद्धि की कुशाग्रता से हो गई थी। युवावस्था प्राप्त होने पर उसने अनुभव किया कि शायद मेरी दृष्टि बिलकुल ही जाती रहेगी। 24 वर्ष की आयु में उसके नेत्रों की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गई। यूरोप के प्रवीण-प्रवीण नेत्र-चिकित्सकों के इलाज करने पर भी वह अंधा हो गया। जीवन की आशा-अभिलाषाओं का एक बृहत् कोष लिए उसके नेत्रों की अंतिम झिलमिलाहट भी जाती रही।
जिस वर्ष वह नेत्र खो चुका था, उसके अगले ही वर्ष योरोप में महायुद्ध आरम्भ हो गया और युद्ध के फलस्वरूप कुछ काल पश्चात् ही लंदन के निकट विषैली गैसों, धुएँ तथा अन्य जहरीली दवाओं से अंधे किये हुए सैनिक एक बृहत् संख्या में दृष्टिगोचर होने लगे। एक दिन पियर्सन को एक ऐसे ही अस्पताल से फोन आया कि शीघ्र आइए। अस्पताल में एक सिपाही ने जब यह सुना कि उसके नेत्र सदा के लिए खो गये है तो वह पागल-सा हो गया था। सब उसे शाँत करने में लगे थे, किंतु असमर्थ पाकर उन्होंने पियर्सन को बुलाया था। उनकी आशा थी कि यह अंधा कदाचित उस तरुण अंधे सिपाही के भय तथा निराशा को कम कर सकेगा।
पियर्सन ने उस अंधे को टटोला और उसकी क्षमता की कल्पना की, फिर यों बोला—”तरुण सिपाही! आज तू अपने इस चमत्कारी शरीर के सिर्फ एक भाग के खराब होने से निराश हो गया? क्या एक जरा सी क्षति से तेरे अरमान मिट्टी में मिल गये। तुझे पस्त हिम्मत नहीं होना है, कोई शक्ति तेरा मुकाबला नहीं कर सकती। अपने हाथों की मजबूती को देख, अपने मस्तिष्क के आश्चर्यों को प्रकट कर। अपनी गुप्त शक्ति यों को संसार में दिखा। अभी तेरे शरीर की मशीन वैसी की वैसी ही है। जब तक एक पुर्जा भी काम करता है, साँस आती है, तब तक भी उत्तम भविष्य की आशा है।”
पियर्सन न जाने क्या-क्या कहता गया, किंतु इस क्षण उसके अन्तःकरण में एक दिव्य प्रेरणा उदित हुई। उसे अन्तःप्रदेश में एक नवज्योति के दर्शन हुए और उसे कुछ ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई कह रहा हो—”पियर्सन तू जीवन में एक बहुत पवित्र कार्य कर सकता है। तू अंधे सिपाहियों के लिए एक विशेष अस्पताल की योजना तैयार कर, उसे संगठित कर और उन्हें जीवन में पुनः काम पर लगाने की एक रीति का आविष्कार कर। यह क्षेत्र तेरे लिए है। इसी को सम्पन्न करने के लिए तुझे सृष्टि में भेजा गया है।”
पियर्सन देर तक इस गुप्त प्रेरणा पर विचार करता रहा। बारम्बार वही प्रतिध्वनि अधिकाधिक स्पष्ट होती हुई सुनाई पड़ने लगी। वह अहर्निश उसी विचार में प्रवृत्त होने लगा। अंत में उस प्रेरित व्यक्ति ने अपनी कल्पना को पूरा किया।
जब युद्ध समाप्त हुआ तो उसकी अध्यक्षता में सेन्ट डस्टन में 1700 अंधे सिपाही थे। वह देवदूत भाँति पूजा जाता था। उसने इस बात पर जोर दिया कि वहाँ रहने वाला प्रत्येक सिपाही उंगली से छूकर पढ़े जाने वाले अंधों के लिए उभरे हुए अक्षर सीखे। प्रत्येक सिपाही कोई ऐसा काम (टोकरी बनाना चिक, हैड, कपड़े धोना, खेती इत्यादि) सीखे, जिससे वह स्वावलम्बी बन सके और प्रत्येक मनुष्य उनके मनोरञ्जन के लिए दान देने में सहयोग प्रदान करे।
उस गुप्त प्रेरणा के बल पर पियर्सन यह अद्भुत कार्य सम्पन्न कर सका। किसी को भी पता नहीं कि उसने कितने अंधों को मृत्यु तथा पागलपन से बचाया, या कितने हजार हृदयों तथा परिवारों में नव प्रेरणा का संचार किया।
बंदा वैरागी लोहे के पिंजरे में बंद करके दिल्ली लाया गया, फिर उसे और उसके साथियों को काली भेड़ों की खून से लथपथ खालें पहनाई गई तथा काला मुँह कर गधों पर सवार करा गली-कूचों में फिराया गया। काजियों ने कहा कि इस्लाम मजहब कबूल कर लो तो तुम्हें प्राण दान दिया जायगा। अस्वीकार करने पर उसे प्राण दण्ड मिला। जब उसके मरने की बारी आई तो मुहम्मद अमीन नाम के एक मुसलमान ने उससे कहा—’तुम जैसे समझदार व्यक्ति ने ऐसा कर्म क्यों किया, जिसका दण्ड तुम आज भुगतने को हो?” वैरागी ने कहा—
“मैंने स्वयं यह काम नहीं किया है। न मैं ऐसे महान कार्य को कर ही सकता था। मैं तो प्रजा पीड़िकों को दण्ड देने के लिए ईश्वर के हाथ में एक शस्त्र था। क्या तुमने नहीं सुना कि जब संसार में अभिमान और अत्याचार सीमा का उल्लंघन कर जाते हैं तब मुझ जैसे दण्डदाता उत्पन्न होते हैं।”
गरम चिमटों से खींच-खींच कर उसके माँस के लोथड़े निकाल लिए गए; फिर हाथी के पाँव के नीचे कुचलवाकर मरवा डाला गया और उसका मृत शरीर एक खाई में फेंक दिया गया। अंत समय तक एक दिव्य प्रेरणा उसे प्रोत्साहन प्रदान करती रही।
मोरोपंत महाराष्ट्र देश के एक प्रसिद्ध कवि तथा संत हो गए हैं। वे पहिले क्लर्क थे तथा हिसाब-किताब रखने में अपना सानी नहीं रखते थे। एक पाई की भी गलती होने पर सारी रात बिता देते थे और भूल निकाल कर उचित सुधार कर देने पर ही शाँति लेते थे। उनकी यह वृत्ति देखकर किसी ने कहा—”इतना ध्यान प्रभु के चरणों में रखते तो ....!” बस यह वाक्य उनके दिल में लग गया। गुप्त प्रेरणा प्रदीप्त हो उठी। मोरोपंत क्लर्क से संत और महाकवि हो गए! उनकी कविता आज घर-घर में गाई जाती है।
एक बार एक बेंत की कुर्सी बुनने वाले के यहाँ जज की कुर्सी मरम्मत के लिए आई। उसे आदेश मिला था कि उसकी बुनाई अत्यंत सुन्दर होनी चाहिए तथा कुर्सी खराब न हो जाय यह भी ध्यान रखना चाहिए। कुर्सी बुनने वाले ने बड़ी मेहनत से उसे तैयार किया। वह किसी आवश्यक कार्य वश बाहर गया। बाहर से आने पर क्या देखता है कि उसका तेरह वर्ष का लड़का उस पर शान से बैठा है। अबोध पुत्र की इस क्रीड़ा पर उसके पिता को अपनी हीनता पर क्षोभ हो उठा। वह बोला—’बेटा, यह जज की कुर्सी है। हमारा ऐसा भाग्य कहाँ कि इस पर बैठें। आओ, उस पर से उतर आओ।’
लड़का धीरे-धीरे कुछ सोचता हुआ, कुछ खोया-खोया सा कुर्सी पर से उतर आया, पर उसके मन में एक विचित्र क्राँति मची हुई थी। उसने सोचा, बहुत विचार किया। अंत में अपनी योग्यता तथा मनोबल से बड़ा होकर वह सचमुच जज बना और जज की कुर्सी पर बैठा।
जब मनुष्य की गुप्त प्रेरणा जाग्रत हो जाती है तो उसे अपूर्व बल प्राप्त होता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह सोते-सोते एक दम जाग्रत हो उठा हो, जैसे अंधकार में प्रकाश की किरण आ गई हो। प्रेरणा एक ऐसी विद्युत तरंग है, जिसके प्रवेश से समस्त शरीर झंकृत हो उठता है। मनुष्य की शक्तियाँ दुगुनी-चौगुनी हो उठती हैं। जैसे नदी में बाढ़ आने पर वह किनारों को तोड़ती-फोड़ती अपना मार्ग साफ करती हुई प्रबल वेग से अग्रसर होती है, उसी प्रकार प्रेरणा प्राप्त हो जाने पर मनुष्य कुछ का कुछ हो जाता है। उसकी विघ्न-धाराएँ, कठिनाइयाँ छू मंतर हो जाती हैं। तथा उसकी उन्नति बड़े प्रबल वेग से होने लगती है।
महापुरुषों की उन्नति का रहस्य :—
यदि आप महापुरुषों के मन का विश्लेषण करें तो आपको प्रतीत होगा कि प्रायः प्रत्येक के जीवन में एक क्षण ऐसा आया जब उन्हें किसी न किसी प्रकार से प्रेरणा प्राप्त हुई। इस दिव्य ज्योति के मार्ग निदर्शन से उन्हें अपने उद्देश्य का ज्ञान हुआ तथा वे उसी मार्ग में निरंतर अग्रसर होते रहे। यदि सीजर को इस आत्म प्रेरणा की प्राप्ति न होती तो निस्सन्देह वह हरी घास की खोज में रोम की विचित्र पहाड़ियों पर अपनी भेड़ों को साधारण गड़रियों की तरह चराता फिरता। नेपोलियन को गुप्त प्रेरणा मार्ग न दिखाती तो सम्भवतः वह साहित्य संसार के किसी अन्धकारमय कौने में अज्ञात रूप से अपनी जीवन-यात्रा समाप्त कर देता। यदि लेनिन, मुस्तफा, कमालपाशा; डीबेलरा जैसे पुरुष अन्तर्प्रेरणा से प्रेरित न होते तो अपने-2 देशों के भाग्य विधाता कदापि न बन पाते। इसी प्रकार यदि रेम्जेमेक्डानल्ड जैसे मजदूर को विलक्षण प्रेरणा न मिलती तो उसकी अद्भुत प्रतिभा तथा राजनैतिज्ञता भीतर ही भीतर दम घुटकर शाँत हो जाती। वह योग्य प्रधान मन्त्री बनने के स्थान पर वह कोयले की खानों में कोयले की बोरियाँ ही ढोया करता। इन सब को संचालन शक्ति इनके अंतःकरण में प्रवेश करने वाली आत्म प्रेरणा ही थी।
प्रेरणा क्या है? :— प्रेरणा के विषय में अनेक मत प्रचलित हैं। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा को स्पष्ट करने के लिए परिभाषाएँ गढ़ने का प्रयत्न किया है। कुछ परिभाषाएँ देखिये—
‘प्रेरणा ईश्वरीय शक्ति है। जो सात्विक प्रकृति के महापुरुषों को अपना जीवन कार्य करने का आदेश देती है।’
“प्रेरणा मनुष्य के अन्तःस्थित अगाध सामर्थ्य को बाहर प्रकट करने की चेतावनी है। हमारे मनःप्रवेश में जो वास्तविक सामर्थ्य है हम उसका करोड़ हिस्सा भी बाह्य जीवन में प्रवेश नहीं करते। प्रेरणा आत्मा को देदीप्यमान कर मनुष्य को आगे ढकेलती है।”
‘प्रेरणा के बिना हम उस दैवी शक्ति से हीन हैं जो परमेश्वर के पुत्र होने के नाते हममें गुप्त रूप से विद्यमान है।’
प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर एक कार्य सौंपता है, किंतु संसार में पदार्पण करने के पश्चात हम उस दैवी आज्ञा को विस्मृत कर बैठते हैं। प्रेरणा एक ऐसी आवाज है जो हमें उस सर्वव्यापक महाशक्ति के साथ संयुक्त कर देती है जो समस्त संसार का संचालन करती है।
डॉक्टर दुर्गा शंकर जी नागर का विचार है कि ईंधन के समान हमारे भीतर गुप्त शक्ति अग्नि सुलगाने की बाट जोह रही है। ईंधन को सुलगाया न जाय तो सैंकड़ों वर्षों तक उसमें अग्नि होते हुए भी वह जहाँ का तहाँ पड़ा रहेगा। उसी प्रकार बिना प्रेरणा के मनुष्य की अन्तःस्थिति गुप्त सामर्थ्य भी निश्चेष्ट पड़ी रहती है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रोया करते हैं। प्रेरणा भीतरी अग्नि को सुलगा देती है।
प्रेरणा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण :-
आधुनिक मनोवैज्ञानिक प्रेरणा को ईश्वरीय तत्व नहीं मानते। ईश्वर हमसे कोई विशेष कार्य करने को अपने आप कहता हो—ऐसी बात नहीं है। आधुनिक मनोवेत्ताओं ने ऐसी अद्भुत प्रतिक्रियाओं का केन्द्र मनुष्य का अव्यक्त मन या अचेतन मन माना है। वे यह नहीं मानते कि प्रेरणा कोई नयी बात है या किसी नवीन रीति से मनःकेंद्र में प्रविष्ट करायी जा सकती है। उनके अनुसार सब कुछ हमारे अव्यक्त या अचेतन मन में पहले ही से मौजूद था। गुप्त रूप में समस्त शक्ति पहले से ही अन्तःस्थिति थी। वह अप्रकट रूप से प्रस्तुत थी, पर उस पर मिट्टी, कीचड़ जम जाने से वह व्यक्त या चेतन मन से अचेतन में प्रविष्ट कर गयी थी। उपयुक्त अवसर पाकर या कोई भारी ठेस लगने पर एकाएक गुप्त सामर्थ्य प्रकट हो गयी। उन आश्चर्यजनक सामर्थ्यों को देखकर मनुष्यों ने समझा कि कोई नवीन अदृष्ट शक्ति शरीर में प्रविष्ट हो गयी।
महान कार्य करने का आश्चर्यजनक बीज पहले से ही विद्यमान था, किंतु उनके इर्द-गिर्द ऐसी उत्तम भूमि न थी कि वह अंकुरित, पल्लवित या फलित हो पाता। बीज को वृक्ष के रूप में लाने के लिए जल, खाद, सूर्य की किरणें इत्यादि अनेक चीजों की आवश्यकता होती है। इन तत्वों के अभाव में मनुष्य यह मान बैठते हैं कि उनमें ऊंचे उठने की शक्ति नहीं है। मन के बीजों को अंकुरित करने के लिए श्रद्धा, प्रयत्न, उत्साह इत्यादि तत्वों की बड़ी आवश्यकता होती है। अतः आधुनिक मनोवैज्ञानिक प्रेरणा को मन की अगाध सामर्थ्य की प्रतीति ही मानेगा।
जिस मनुष्य ने अपना अधिकाँश जीवन योंही व्यर्थ खराब किया तथा ‘उष्ट्र’ शब्द का भी शुद्ध उच्चारण न कर सका, वही बाद में ‘रघुवंश’, ‘कुमार-सम्भव’, ‘मेघदूत’ जैसी विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकें निर्माण कर गया। यह मूर्खता एवं विद्वता की चरम है। बंगाल प्राँत के महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त एक दिन यह नहीं समझते थे कि ‘पृथ्वी’ और ‘पृथ्वी’ में शुद्ध कौन सा है। तिस पर भी उन्होंने युगान्तरकारी काव्य लिख डाला। जो मनुष्य आज कंगाल है कल वही धन कुबेर बन जाता है। जिसने जीवन भर तलवार बन्दूक का नाम नहीं लिया वही कुछ काल पश्चात् रणक्षेत्र में शस्त्र विद्या की वह बहादुरी दिखाता है कि लोग देखकर चकित रह जाते हैं। आप मनोवैज्ञानिक से उक्त चमत्कारों का कारण पूछिए। क्या ये सब प्रेरणा के अद्भुत कार्य नहीं है?
मनःशास्त्र वेत्ता कहेगा—’जी नहीं, यह प्रेरणा नहीं। इन व्यक्तियों में किसी भी बाह्य शक्ति ने प्रवेश नहीं किया है। इसके अन्तःकरण में पहले ही से गुप्त सामर्थ्य भरी पड़ी थी। समस्त अद्भुत कृत्यों का भण्डार भीतर प्रस्तुत था। केवल ये भूले हुए थे। किसी अज्ञात ठेस से एकाएक मन अव्यक्त प्रदेश से वह सामर्थ्य उबल उठी। वास्तव में महा मूल्यवान भण्डार पहले से ही अन्तःकरण में प्रस्तुत थे।
प्रेरणा के तत्व-प्रेरित व्यक्ति की मनोदशा देखने पर कई तत्व मिलते हैं। सर्वप्रथम तो एक निश्चित उद्देश्य की प्रतीति है। प्रेरणा किसी खास दशा में होती है। यह किसी भी क्षेत्र के लिए सम्भव है। जोन आफ आर्क को प्रेरणा हुई कि वह अपने देश का उद्धार करने के उद्देश्य से भेजी गई है। उसने सब ओर से चित्त मोड़ कर केवल उसी महत कार्य पर समस्त शक्तियाँ केन्द्रित कर ली। अन्य सभी ओर यहाँ तक कि अपने विवाह तक की ओर से उसने मन मोड़ लिया। अन्त में सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करने के पश्चात् उसने अपना कार्य पूर्ण किया।
द्वितीय तत्व है असाधारण मनोबल। प्रेरित व्यक्ति परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी से भी नहीं डरता। उसके शरीर में अधिक बल नहीं होता, किन्तु उसमें दृढ़ निश्चय तीव्र इच्छा तथा प्रबल प्रयत्न का बल होता है। वह तुच्छ विघ्नों से अकारण ही भयभीत नहीं होता प्रत्युत महान् साहसिक कार्यों की पूर्ति के लिए अग्रसर होता है। मनोबल उसकी शक्तियों को दूना कर देता है तथा उसकी अंतःदृष्टि तीव्र हो उठती है।
तृतीय तत्व है अपूर्व आत्म श्रद्धा। उसे पूरा-पूरा विश्वास होता है कि परमेश्वर की सेना मेरे साथ है। मैं ठीक पथ पर हूँ। मुझमें कार्य सम्पादन की पूरी-पूरी योग्यता है। मैं ही अपने उद्देश्य में कृतकृत्य हो सकता हूँ। आत्म श्रद्धा सब प्रकार की सफलताओं की मूल है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इससे अद्भुत प्रकाश मिलता है। विशिष्ट उद्देश्य मनोबल तथा आत्म श्रद्धा से प्रेरणा प्राप्त हो गई है सचमुच वह व्यक्ति धन्य है।
(पं. श्रीलालजीरामजी शुक्ल, एम. ए.)
प्रत्येक मनुष्य निरन्तर अपने में किसी न किसी कमी का अनुभव करता है—किसी को धन की कमी है, तो किसी को मकान की, किसी को सम्बन्धियों की कमी है, तो किसी को अपने शारीरिक स्वास्थ्य की कमी का अनुभव होता है। कोई व्यक्ति अपने चरित्र की कमी के लिए अपने-आपको दुखी बनाये रहता है। इन सब प्रकार की कमियों की पूर्ति कैसे हो? सभी मनुष्य अपने-अपने दुख से दुखी रहते हैं। एक कमी की पूर्ति दिखाई पड़ी तो दूसरी कमी का अनुभव होने लगता है। अब प्रश्न यह है कि क्या कोई ऐसा एक ही उपाय है कि जिससे सभी कमियों की पूर्ति हो जाय।
इस प्रश्न पर विचार करने से एक उपाय सूझता है, वह यह कि जिस प्रकार की कमी की अनुभूति कोई व्यक्ति अपने-आप में करे, दूसरे में उसी प्रकार की कमी की खोज कर के उसे पूरा करने की चेष्टा करे तो उसकी अपनी कमी की अनुभूति नष्ट हो जाय। हाल में ही लेखक को चिन्ता हुई कि उसके पास रहने के लिए मकान नहीं है और उसके बाद उसके बच्चों के लिए भी मकान नहीं है। इस विचार ने कुछ देर तक परेशान किया। आज प्रातःकाल इस चिन्ता का निवारण अपने-आप हो गया। मन में विचार आया कि जिस प्रकार की वस्तु की कमी तुम अपने लिए अनुभव करते हो, उसी प्रकार की कमी की पूर्ति दूसरे के लिए करो तो तुम्हारी कमी की पूर्ति अपने-आप ही हो जायगी।
वास्तव में यह विचार ठीक है। मनुष्य अपनी कमी के विषय में जब तक चिन्ता करता है, तब तक उसका विचार नकारात्मक रहता है। वह कमी के बारे में ही सोचता रहता है। पर जब मनुष्य दूसरे व्यक्ति की कमी के बारे में सोचने लगता है और उसकी पूर्ति की चिन्ता करने लगता है तब उसका विचार रचनात्मक हो जाता है। प्रत्येक मनुष्य दूसरे व्यक्ति की सहायता में जितना सफल हो सकता है, अपने-आपके लिए प्रयत्न करने में उतना सफल नहीं होता है। जब मनुष्य का मन रचनात्मक कार्य में लग जाता है तो वह अपने-आपके लिये भी स्वयमेव ही सुन्दर सृष्टि कर लेता है।
मनुष्य की इच्छाएँ उसकी कमी की सूचक हैं। ये इच्छाएँ केवल उसे दुखी ही बनाती हैं। ये तब तक फलित नहीं होती, जब तक मनुष्य इच्छाओं की ओर से मुख नहीं मोड़ लेता। इच्छाओं की ओर से मुख मोड़ने से इच्छाएँ फलित होने लगती हैं। जब हम किसी व्यक्ति से अपने लिए पैसा माँगते हैं तो हम अपने-आपके गिर जाने का अनुभव करते हैं। पर जब हम अपने लिये न माँग कर सार्वजनिक कार्य के लिये पैसा माँगते हैं, तब हम आत्म-उत्थान का अनुभव करते हैं। इस मानसिक स्थिति में दूसरे लोग हमारी सहायता भी करने लगते हैं। देखा गया है कि जिस बात की मनुष्य को चिन्ता हो जाती है वह उसे पूरी करने में कभी भी सफल नहीं होता। उसकी चिंता की मनोवृत्ति दूसरे लोगों की इच्छा शक्ति को भी निर्बल बना देती है। अतएव वे उसे सहायता न देकर उससे भागते हैं।
किसी प्रकार की कमी के बारे में नित्यप्रति चिंता करने से मन निर्बल हो जाता है। ऐसी अवस्था में नकारात्मक भाव और नकारात्मक मन भी प्रबल हो जाता है। जो व्यक्ति अपनी कमी को हटाने के लिए जितना ही अधिक चिंतित रहता है, वह उतना ही उस कमी को दृढ़ बना देता है। रोगों के विषय में देखा गया है कि जो व्यक्ति अपने रोग के विषय में जितना ही अधिक चिंतित होता है, वह उस रोग से उतना ही अधिक जकड़ जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने रोग के प्रति उदासीन हो जाता है और सभी प्रकार के कष्ट और मृत्यु तक के लिए अपने मन को तैयार कर लेता है तब उसका रोग जाने लगता है।
लेखक के एक छात्र को क्षय रोग का सन्देह हो गया था। कुछ डॉक्टरों ने भी कहा था कि उसे क्षय रोग होने जा रहा है। यह उसकी पहली हालत है। रोगी को चारपाई से न उठने का आदेश एक डॉक्टर ने दिया। घर के लोग घबड़ाये हुए थे। वह कुछ दिनों तक इसी प्रकार रहा। अपनी चारपाई से नहीं उठता था। इस प्रकार वह प्रतिदिन निर्बल होता गया। एक दिन उसके मन में आया कि मरना यदि निश्चित है तो इससे डरना क्या? अब मृत्यु का स्वागत ही करना चाहिये। इस विचार के आते ही उक्त विद्यार्थी के विचार आशावादी बन गये। वह फिर अपने अभिभावकों से छिपकर घूमने जाने लगा। कुछ दिनों बाद वह अपने-आप में परिवर्तन देखने लगा। अन्त में उसके क्षय रोग का अन्त हो गया।
लेखक के एक दूसरे मित्र के क्षय रोग का अन्त दूसरे लोगों की उसी रोग की चिकित्सा के प्रयत्न से हो गया।
एक बार लेखक के पास एक सभा में जाने के लिये अच्छे कपड़े नहीं थे। उसे इस कमी की अनुभूति हो रही थी। वह विचार करता था कि कपड़े कैसे तैयार हो जायं, अभी पैसा भी नहीं मिला था। इसी बीच लेखक के एक शिष्य ने अपने शिक्षक की इसी प्रकार की कमी की चर्चा की। इस शिक्षक को उसी सभा में पुरस्कार पाने के लिये बुलाया गया था। पर यह बेचारा इतना गरीब था कि सभा में उपस्थित भी नहीं हो सकता था। उसके विद्यार्थी को उस पर दया आयी और उसने ओढ़ने-बिछाने के कपड़े ही शिक्षक को दे दिये। इसे देखकर लेखक अपनी कमी को भूल गया। इसी बीच उसने दर्जी को कुछ कपड़े सिलने के लिये दिये थे। उसका मन इनसे उदासीन हो गया। पुराने कपड़े ही उसे फिर प्रिय बन गये। लेखक के मन में भावना आती थी कि उस गरीब शिक्षक की सहायता की जाय। उसकी वास्तव में सहायता कुछ भी नहीं की गई, पर केवल भावना मात्र ने ही उसकी गरीबी को दूर कर दिया।
कोई भी मनुष्य धन को प्राप्त करने की चेष्टा से धनी कदापि नहीं बन सकता। धन दान करने की इच्छा से ही मनुष्य धनी बनता है। दान करने का भाव मनुष्य के ध्यान को अपनी कमी से हटाकर दूसरे व्यक्ति की कमी पर लगा देता है। इस प्रकार वह अपने-आप में पूर्णता की अनुभूति करने लगता है। वह जितना ही दूसरे को पूरा बनाने की चेष्टा करता है, अपने-आप भी वह उतना ही पूर्ण बनता जाता है।
जो विद्यार्थी भली प्रकार से विद्या-अध्ययन करना चाहता है उसे चाहिये कि वह दूसरे विद्यार्थी को पढ़ाने लगे। अपने से कमजोर विद्यार्थी को पढ़ाने से न केवल उस विद्यार्थी को विद्या आ जाती है वरन् अपना मन भी पढ़ने में ठीक से लगने लगता है। इससे उस विद्यार्थी में आत्मविश्वास आ जाता है और वह दिन-प्रति-दिन अपनी उन्नति करने लगता है। किसी विषय का ज्ञान हमें तब तक ठीक से नहीं होता, जब तक हम उसे किसी दूसरे को नहीं सिखा देते। दूसरे के सिखाने के प्रयत्न से ही विद्या ठीक से आती है। विचार प्रकाशित करने से दृढ़ होते हैं और अपने-आप की समझ में आते हैं। अधिक पुस्तकें पढ़ने वाला व्यक्ति विद्वान् नहीं बनता। उसका ज्ञान केवल पुस्तक में ही रह जाता है। पर जो अपने ज्ञान का दूसरे के लिये वितरण करता है; वही सच्चा विद्वान बनता है। उसी की विद्या समय पर काम में आती है। वह केवल मस्तिष्क के लिये बोझ बनकर नहीं रहती। जिस समय लेखक कालेज का छात्र था, अपने साथियों को पाठ्य विषय पढ़ाया करता था। इसके परिणाम स्वरूप उसके साथी तो परीक्षा पास होते ही थे, वह स्वयं भी उस विषय को भली भाँति जान लेता था। जो विषय जितना ही कठिन होता था, वह लेखक को उतना ही याद भी रहता था। सरल विषय को अधिक साथी नहीं पूछते थे, अतएव उसके संस्कार मन पर दृढ़ होते थे। कठिन विषय को अधिक लोग पूछते थे, इसलिए उसे बार-बार अनेक प्रकार से दुहराना पड़ता था। इस तरह वह विषय पक्का हो जाता था।
यदि कोई व्यक्ति अपने-आप में किसी ऐसे दोष की उपस्थिति देखे जिसके कारण उसे बार-बार आत्मग्लानि हो तो इसके अन्त करने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति को उसी प्रकार कमी की से छूटने में सहायता करे। एक व्यक्ति को सिगरेट पीने की भारी लत लग गई थी। वह इसे छोड़ना चाहता था, पर वह लत उसे नहीं छोड़ती थी। उसने अपने एक मित्र से सलाह पूछी। मित्र मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने उस समय कोई सलाह नहीं दी। किसी प्रकार की कमजोरी की अनुभूति करने वाले व्यक्ति को उस कमजोरी के विषय में व्याख्यान देना हानिकारक होता है। उसके मन को अपनी कमजोरी का चिन्तन करने से मुक्त करना ही उसे कमजोरी से छुटाने का पहला उपाय है। अतएव मित्र ने उसकी सिगरेट की आदत पर कोई बातचीत नहीं की। कुछ दिनों बाद उसने एक लड़के की उसकी अभिभावकता में रख दिया। इस लड़के को सिगरेट पीने की आदत थी। मित्र ने इसकी आदत के विषय में कुछ भी चर्चा नहीं की थी। इस आदत की खोज स्वयं अभिभावक ने की। अब उसे चिंता लगी कि इस लड़के की आदत इतनी कड़ी न हो जाय कि वह पीछे उसको मेरे ही समान छोड़ न सके। अतएव उसने प्रतिदिन उस बालक को सिगरेट पीने के दुष्परिणाम पर उपदेश देना प्रारम्भ किया और अपना ही उदाहरण देकर उसे समझाया कि तुम भी पीछे मेरे ही सदृश्य पछताओगे। इस उपदेश का बड़ा ही अच्छा प्रभाव बालक के मन पर पड़ा। उसने सिगरेट पीना छोड़ दिया। पर कुछ दिनों बाद उपदेशक ने भी अपने-आप में इतना परिवर्तन पाया कि वह न केवल अपनी एक सिगरेट पीने की आदत को ही छोड़ दिया, वरन् अनेक दूसरी बुरी आदतों से भी वह मुक्त हो गया।
जब कोई व्यक्ति बालक को केवल व्याख्यान अथवा उपदेश देकर चरित्रवान बनाना चाहता है तो वह बालक को चरित्रवान न बनाकर और भी निर्बल इच्छाशक्ति का व्यक्ति बना देता है। नैतिक उपदेश से बालक समझ जाता है कि उसके लिये क्या करना चाहिये। पर वह बालक की इच्छाशक्ति को मजबूत नहीं बनाता। फिर बालक भली बात को जान कर जब उसके विरुद्ध आचरण करता है तो वह आत्मग्लानि की अनुभूति करता है। इससे उसकी इच्छाशक्ति और भी निर्बल हो जाती है। फिर वह अपने-आपको बुरे कामों से रोक नहीं पाता। अतएव केवल उपदेश देना बालक के चरित्र का विनाशक है। इससे अपने-आपको भी कोई लाभ नहीं होता है। जब कोई व्यक्ति अभिमानरहित होकर बालक से बात करता है और अपने-आपको उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करता, तभी वह बालक का और अपना लाभ करता है।
अपनी कमी पर न तो रोना उचित है और न दूसरों की कमी पर हँसना। जो अपनी कमी पर रोता है, वह कमी को बढ़ाता है और जो दूसरों की कमी पर हँसता है वह उस कमी को अपने-आप में ले आता है। अपनी कमी पर हँसना और दूसरों की कमी पर रोना—यही कमियों के अन्त करने का सर्वोत्तम उपाय है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
संसार में, दूरी में आकर्षण है। जो वस्तु समीप है, खुद हम उसके मालिक हैं, जिस पर हमारा स्वत्व है, हम उसके प्रति न दिलचस्पी लेते हैं, न उसकी सुन्दरता, महत्व, लाभ और उपयोगिता को ही समझते हैं। मानव जगत की अतृप्ति का यह एक बड़ा कारण है।
जो वस्तु हमारे पास रहती है, हम उससे इतना अधिक परिचित हो जाते हैं कि उसकी उपयोगिता हमारे लिये कुछ अर्थ नहीं रखती। घर में जो व्यक्ति हैं, उनसे हमारा काम आसानी से चलता है। हमारी वृद्धा माँ, वृद्ध पिता, बड़ा भाई, बहिन इत्यादि के निकट निरन्तर रहते रहने के कारण हम उनका महत्व दृष्टिगत नहीं करते। पुराने कुटुम्बों में जो नयी रोशनी के युवक-युवती हैं, वे वृद्ध पितामहों का आदर सत्कार सेवा इत्यादि में अपनी प्रतिष्ठा की हानि समझते हैं। इसका कारण यही है कि हम प्राप्त का अनादर करते हैं।
महाजन रुपया देता है, उसकी दृष्टि में मूलधन का इतना महत्व नहीं है जितना कि सूद का है। उसके पास रुपये की कमी नहीं है। यदि वह चाहे तो उसी रुपये का आदर कर (अर्थात् सदुपयोग कर) जीवन पर्यन्त सुखी रह सकता है। किन्तु उसका लोभ उसके मार्ग में बाधा उपस्थित करता है। वह सूद को वसूल करने के लिए जमीन-आसमान सिर पर उठा लेता है, मुकदमेबाजी में फँसता है, वर्षों अदालत में खड़ा रह कर समय व्यर्थ नष्ट करता है, यदि मुकदमा सफल रहा तो उसे कुर्की द्वारा मूलधन सूद सहित प्राप्त होता है। अनेक बार कर्ज लेने वाले का दिवाला निकल जाता है और सूद के प्रलोभन में मूलधन भी जाता रहता है। यदि वह व्यक्ति जो प्राप्त है, उसी का समुचित आदर करता, तो क्यों अपना मूलधन भी व्यर्थ गँवाता।
लोग स्वयं यह नहीं देखते कि वास्तव में उन्हें कितनी सौभाग्यशील प्रसन्नता प्रदान करने वाली सुख, समृद्धि, मोददायी वस्तु प्राप्त है? यदि विवेक पूर्ण नेत्रों से देखा जाय, तो आपको विदित होगा कि आपके गरीब घर में, निर्धनता, प्रतिकूलता और संघर्ष के वातावरण में भी महा कृपालु प्रभु ने आनन्द प्रदान करने वाली अनेक वस्तुओं की सृष्टि की है। अन्तर केवल यह है कि आपके स्थूल नेत्र उनके सौंदर्य और उपयोगिता का अवलोकन नहीं करते।
आपको कौन-कौन वस्तुएँ प्राप्त हैं? क्या आपके पास उत्तम स्वास्थ्य है? यदि अच्छा स्वास्थ्य है तो आपको संसार का समस्त स्वर्ण, बेशकीमती मूँगे मोती, हीरे, जवाहरात दौलत इत्यादि फीके हैं। वास्तव में संसार का अस्तित्व ही आपके स्वास्थ्य पर है। आपको जो स्वास्थ्य रूपी सम्पदा प्राप्त है, उसका आदर कीजिये। अपनी पाँचों इंद्रियों—स्वाद, घ्राण, श्रवण, स्पर्श, दर्शन इत्यादि के अनेक आनन्दों का सुख लूटिये। विश्व में ऐसे सैकड़ों सुख एवं आनन्द हैं, जिनका आधार उत्तम स्वास्थ्य है। जब यह आपको प्राप्त है, तो इसके द्वारा रस-पान करना जीवन में आनन्द उठाना आपकी बुद्धि पर निर्भर है। बुद्धि के सदुपयोग से स्वास्थ्य के आधार पर रहने वाले अनेक सुखों को प्राप्त कर जीवन को सुख शाँतिमय बनाया जा सकता है। लम्बी सैर को जाइये फूलों से परिपूर्ण उद्यान में टहलिये, नदियों में स्वच्छन्दता से तैरिये, खेलिये-कूदिये, आप बिना किसी रुपये पैसे के आनंद प्राप्त कर सकते हैं। स्वास्थ, बल, शक्ति, स्वाभाविक सौंदर्य जो आपको प्राप्त है, उसके आनंद की पहुँच के भीतर जो हैं उन्हें प्राप्त कीजिये।
यदि आप के पास बहुमूल्य कीमती वस्त्र, आभूषण, सुसज्जित मकान इत्यादि नहीं हैं, तो दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है। जैसे वस्त्र हैं, उन्हीं को स्वच्छ निर्मल रख कर सादगी से आप अपनी विशेषताएँ प्रदर्शित कर सकते हैं। वस्त्रों के विषय में अपनी रुचि सरल बना लीजिये। इस बात के लिए व्यर्थ क्यों दुःखी होते हैं कि आप छैल-छबीलों की तरह क्यों सजे-धजे नहीं हैं? जो व्यक्ति अत्यधिक बनाव शृंगार में निमग्न रहते हैं वे मिथ्याभिमानी, छिछोरे अल्पबुद्धि हैं, कपड़ों के माया जाल में झूँठा सौंदर्य लाने की चेष्टा करते हैं। केवल कुरूप व्यक्तियों को यह विश्वास होता है कि वस्त्रों द्वारा उनकी कुरूपता छिप जायगी। बहुव्यय, कृत्रिमता और अत्यंत बनाव शृंगार की बातों के लिये अशाँत रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप के पास जो, जैसा अच्छा-बुरा है, उसी का सदुपयोग करना प्रारम्भ कर कीजिये। अपने साधारण वस्त्रों को ब्रुश से स्वच्छ कीजिये, यदि मैले हो गये हैं, तो साबुन मोल लेकर उन्हीं को धो डालिये, इस्तरी कर लीजिए। यदि बाल कटाने के लिये पैसे नहीं हैं, उन्हीं को धोकर ठीक तरह सम्हाल लीजिए। खद्दर के सस्ते, स्वच्छ, चलाऊ वस्त्रों में व्यक्ति बड़ा आकर्षण प्रतीत होता है। आवश्यकता है शऊर और शिष्टाचार की। स्त्रियाँ प्रायः दुकानों पर नई-नई साड़ियाँ, जम्पर, के कपड़े, नये डिजाइन के आभूषण देखकर अतृप्त, अशाँत हो जाती हैं घर में कलह उत्पन्न हो जाती है। पति के पास आर्थिक संकट होता है तो वह इस गृह कलह को दूर करने के निमित्त ऋण लेता है। यह महा-मूर्खता है। स्त्रियों को यह देखना चाहिए कि उन्हें प्राप्त कितना है? कितने कपड़े उनके ट्रंकों में भरे पड़े हैं? फैशन कितनी द्रुतगति से परिवर्तित होते हैं? यदि हर वर्ष पुराने स्वर्ण आभूषणों को तुड़वाकर नवीन रूप से उनका पुनः निर्माण किया कराया जावेगा, तो असली सोना क्या खाक अवशेष बचेगा? यदि वे प्राप्त समुचित आदर करना सीख जायं और अपनी जो साधारण-सी वस्तु हैं, उन्हीं की सहायता से अपनी प्रतिभा, योग्यता और विशेषताएँ प्रदर्शित करना प्रारम्भ कर दें, तो सुख शाँतिमय जीवन व्यतीत कर सकती हैं।
(श्री वीरेन्द्र सिंह जी, कोटा)
अविवाहित रह कर ब्रह्मचर्य पालन करने के समान, विवाहित होते हुए भी ब्रह्मचर्य पालन करना सम्भव है, वरन् बहुत हद तक सुगम भी है। जो लोग विवाहित हैं उन्हें समझना चाहिए कि—पत्नी गृहस्थ धर्म का मूल है। उसे कामोपभोग की सामग्री या ब्रह्मचर्य का विघ्न समझना भूल है।
साधारण तथा पत्नी से दूर रहने से नारी जाति के प्रति वासनामय विचारों की सृष्टि होती है। दूरी में सदैव एक आकर्षण रहता है जो समीपता में नष्ट हो जाता है। जिन्हें दाम्पत्य जीवन अप्राप्य है उन्हें वह अप्राप्य वस्तु बड़ी आकर्षक और सरस दीखती है और उसकी प्राप्ति के लिए उनके मनः क्षेत्र में बड़ी घुड़दौड़ मचती रहती है, किंतु जो पति-पत्नी साथ साथ रहते हैं वे यदि चाहें तो स्वाभाविक और सरल जीवन व्यतीत करते हुए उन विकारमय विचारों से सहज ही बच सकते हैं।
जब तक परीक्षा की कसौटी न हो तब तक यह नहीं जाना जा सकता कि किस की साधना किस हद तक परिपक्व हो चुकी है। जो लोग अविवाहित रह कर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उनकी निष्ठा किस हद तक परिपक्व हो चुकी है इसका ठीक प्रकार पता नहीं चलता, वे प्रलोभन के समय फिसल सकते हैं। परन्तु जो प्रलोभन से नित्य संघर्ष करते हैं उन्हें पता रहता है कि वे कितने संयमशील हो चुके हैं। साधन सामने रहते हुए जो त्याग कर सकता है उसी का त्याग परीक्षित है। अभाव को त्याग मान कर सन्तोष कर लेना, एक कच्चा आधार ही रहता है।
पति-पत्नी यदि वासना पर विजय प्राप्त करते हुए संयमशील जीवन बितावें तो वासना के स्थान पर एक अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक तत्व का आविर्भाव होता है जिसे ‘पतिव्रत’ या ‘पत्निव्रत’ कहते हैं। यह तत्व दाम्पत्य जीवन की पूर्णता, पारिवारिक सुव्यवस्था उत्तम संतति एवं आत्म शाँति के लिए बहुत ही उपयोगी एवं आवश्यक होता है। यह तत्व मानव जीवन की एक अपूर्णता को पूरा कर देता है।
द्वैत को मिटाये बिना, अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। स्त्री से दूर रहने वाला उससे घृणा करने वाला व्यक्ति , उसे अपने से भिन्न एवं विपरित मानता है ऐसी दशा में उसकी द्वैत बुद्धि मजबूत होती जाती है और उसे अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति में भारी बाधा दिखाई देती है। अद्वैत की प्राप्ति के लिए अपनी पत्नी (अर्धांगिनी) को अभिन्न मानने की आवश्यकता है। जैसे अपने ही सौंदर्य पर कोई मोहित नहीं होता, जैसे अपने आप से स्वयं ही वासना पूर्ति करने के भाव नहीं आते वैसे ही यदि पत्नी को अभिन्न मान लिया जाय तो वह बाधा सहज ही दूर हो जाती है, जिसके भय से ब्रह्मचारी लोग दूर-दूर भागते फिरते हैं। अपनी अर्धांगिनी को आत्म रूप समझना अद्वैत तत्व ज्ञान की प्रारम्भिक साधना है। इसमें परीक्षित हो जाने पर आत्म भावना का विश्वव्यापी विस्तार करना सुगम होता है।
शुद्ध ‘प्रेम’ को परमात्मा का प्रत्यक्ष रस कहा है। यह प्रेम नर-नारी के पवित्र मिलन से सुगमता पूर्वक और अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है। माता का पुत्र में, बहिन-भाई में, पति-पत्नी में जितने विशुद्ध प्रेम का उद्रेक होता है, उतना पुरुष में या स्त्री स्त्री में नहीं होता। प्रकृति ने उभय लिंग के प्राणियों के सम्मिलन में एक सहज प्रेम धारा छिपा रखी है। यदि उसे स्वार्थपरता या वासना से दूषित न किया जाय तो प्रकृति प्रदत्त एक स्वर्गीय निर्झरिणी के अमृत जल का रसास्वादन हर आत्मा कर सकती है। यह समझना भारी अज्ञान है कि काम सेवन से ही दाम्पत्य प्रेम बढ़ता है। सच बात तो यह है कि संयमी आत्मा ही ‘प्रेम’ को उत्पन्न कर सकती है और उनके रसास्वादन का आनन्द ले सकती है।
प्राचीन काल में अधिकाँश ऋषि मुनि सपत्नीक रहते थे। ऋषिकाएँ तपोभूमि की व्यवस्था करती थीं और ऋषि लोग स्वयं पर कल्याण के महान आध्यात्मिक आयोजनों में प्रवृत्त रहते थे। योगेश्वर शंकर और योगिराज कृष्ण ने भी योग मार्ग के पथिकों के सम्मुख अपने को विवाहित ही उपस्थित किया ताकि अनुगमन करने में अनुयायियों को सुविधा रहे। यह ठीक है कि प्राचीन काल में अनेक महात्मा अविवाहित भी थे, परंतु वैसा वे केवल अपनी रुचि, सुविधा एवं कार्य प्रणाली के अनुसार ही करते थे अविवाहित रहना उनके लिए कोई आवश्यक प्रतिबंध न था।
काम को ‘मनसिज’ कहा है। यह विकार मन में उत्पन्न होता है और यहीं से संहार लीला प्रारम्भ करता है। मन में यदि काम चिंतन करते रहा जाय और शरीर से ब्रह्मचर्य रखा जाय तो उसका कोई विशेष लाभ न होगा क्योंकि मन में उत्पन्न होने वाली वासना से मानसिक व्यभिचार होता रहेगा और आत्मिक बल संचय न हो सकेगा। उसके विपरित यदि कोई व्यक्ति साधारण गृहस्थ धर्म का पालन करता है और मन से निर्विकार रहता है तो उसका थोड़ा सा शारीरिक स्खलन उतना हानिकारक नहीं होता, जितना कि अविवाहित का मानसिक उद्वेग। यों शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार का संयम रखा जाय तो सर्वोत्तम है।
‘अर्धांगिनी’ और ‘धर्मपत्नी’ यह दोनों ही शब्द आत्मिक पूर्णता और धर्म प्रतिपालन के अर्थ बोधक हैं। पत्नी इन दोनों कार्यों में सहायक होती है, इसलिए उसे अभिन्न अंग एवं जीवन सहचरी माना है। कामिनी, रमणी, रूपसी आदि की विकारग्रस्त दृष्टि स्त्री के प्रति रखना नारी जाति के प्रति अपराध एवं अपमान व्यक्त करना है। स्वाभाविक एवं सरल दृष्टिकोण अपनाकर नारी को एक सच्चा साथी, मित्र एवं आत्म-भाग माना जाय तो उससे जिस प्रकार साँसारिक जीवन में सुविधा मिलती है वैसे ही आत्म कल्याण के मार्ग में भी भारी सहयोग मिल सकता है। स्त्री ब्रह्मचर्य की बाधा नहीं। वह असंयम के विकारों को अनियंत्रित नहीं होने देती, और मनुष्य को सुसंयत जीवन व्यतीत करने में सहायता प्रदान करती है।
(पं. तुलसी राम शर्मा, वृन्दावन)
यों तो संसार में धन, बल, योग्यता, चतुरता आदि शक्ति यों के आधार पर मनुष्यों का आदर-सम्मान होता है पर उसके त्याग, चरित्र, ज्ञान, उपकार, दृष्टिकोण, आदर्श एवं आत्म बल के आधार पर जो आदर होता है वास्तव में वही मनुष्य का परम सौभाग्य है। ऐसे गुणों से न केवल संसार में उसका सम्मान होता है वरन् ऋषि, महर्षि, महापुरुष ही नहीं परमात्मा तक उसकी वन्दना करते हैं। नीचे कुछ ऐसे ही प्रमाण देखिये :—
विप्रान स्वलाभ सन्तुष्टान् साधून्भूतसुहृत्तमान्।
निरहंकारिणः शान्तान् नमस्ते शिरसाऽकृत्॥
श्री. भा. 10। 52। 20
श्री कृष्ण भगवान कहते हैं कि अनायास प्राप्त हुए में सन्तोष करने वाले, साधु, (परकार्य को साधने वाले) सब प्राणियों के प्यारे, अहंकार रहित, और शान्त चित्त, ऐसे ब्रह्म परायण के लिए मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ॥ 20॥
नरपेक्षंमुनिं शान्तंनिर्वैरं समदर्शिनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यंपूज्ये येत्यंघ्रिरेणुभिः॥
श्री. भा. 11। 14। 16
जिसको कुछ परवाह नहीं, मननशील, शान्त चित्त, वैर रहित, समदृष्टि (राग द्वेष रहित) ऐसे पुरुष के मैं (श्री कृष्णचन्द्र कहते हैं) पीछे-2 चलता हूँ कि ऐसे की चरण रेणु से मैं पवित्र हो जाऊँ।
इसी प्रकार नारद जी जैसे देवर्षि ने भी सत्पुरुषों के लिये अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए उन्हें अभिवन्दनीय ठहराया है।
हरिकीर्तन शीलोबा तद्भक्त नाँ प्रियोपिवा।
सुश्रूषुर्वापि महताँस वंद्योऽस्माभिरुत्तमः॥54॥
बृहन्नारदीय पुराण अ. 3
जो हरिनामोच्चारण करने वाला, भगवद्भक्तों का प्रिय, महत्पुरुषों का सेवक है ऐसे सुजन को हम (नारद जी कहते हैं) नमस्कार करते हैं।
गुरुभक्तः शिवध्यानी ह्याश्रमाचार तत्परः।
अनसूयः सदाशान्तः स वंद्योऽस्माभिरुत्तमः 55
गुरु भक्त, शिव का ध्यान करने वाला, निज आश्रम धर्म में रत, निन्दा रहित, शाँत, ऐसा श्रेष्ठजन हम से वन्दनीय है।
ब्राह्मणानाँ हितकरः श्रद्धावान् वर्ण धर्मसु।
वेद वादरतानित्यं स वंद्योऽस्माभि रुत्तमः॥56॥
ब्राह्मणों को हितकारी, वर्णाश्रम धर्म में श्रद्धावान्, और नित्य वेदपाठ करता ऐसा सुजन हमसे वन्दनीय है।
गोषुक्षान्तो ब्रह्मचारी पर निंदा विवर्जितः।
अपरिग्रहशीलश्च स वन्द्योऽस्माभि रुत्तमः॥58॥
जो गउओं में दयावान्, ब्रह्मचारी, पराई निंदा से रहित, संग्रह रहित ऐसे श्रेष्ठ जन की हम वंदना करते हैं।
स्तेयादि दोष विमुखः कृतज्ञः सत्यवाक् शुचिः।
परोपकार निरतः स वंद्योऽस्माभि रुत्तमः॥ 59॥
चोरी, व्यभिचार आदि दोषों से रहित, उपकार को मानने वाला, सत्यवादी, पवित्र, परोपकारी ऐसे श्रेष्ठ जन की हम वंदना करते हैं।
अभुवत्वा देवकार्याणि कुर्वतेयेऽविकत्थनाः।
संतुष्टाश्चक्षमा युक्त स्तान्न मस्या म्यहं विभो॥ 9॥
जो पुरुष भोजन से पूर्व देवकार्य करते हैं, अपनी प्रशंसा नहीं करते, संतोषी, क्षमाशील हैं, उनको मैं (नारद जी श्रीकृष्ण जी के प्रति कहते हैं) प्रणाम कहता हूँ॥ 9॥
ये वेदं प्राप्यदुर्धर्षांवाग्मिनो ब्रह्मचारिणः।
या जनाध्यापने युक्त नित्यंतान् पूजयाम्यहम्॥ 13॥
जो वेद का अध्ययन कर तेजस्वी हो जाते हैं, धर्मोपदेश में अच्छे वक्ता होते हैं ब्रह्मचर्य पालते हैं मैं उनकी पूजा करता हूँ॥ 13॥
प्रसन्नहृदयाश्चैव सर्व सत्वेषु नित्यशः।
आपृष्ठतापात्स्वाध्याये युक्त स्तान् पूजयाम्यहम् ॥14॥
जो सब जीवों पर प्रसन्न चित्त हैं और मध्याह्न काल तक धर्म ग्रंथों का स्वाध्याय करते हैं उनकी मैं सदा पूजा करता हूँ॥ 14॥
अहिंसानिरता येच येच सत्यव्रता नराः।
दान्ताः शमपरश्चैव ताम्नमस्यामि केशवः॥19॥
अहिंसाशील, सत्यवादी, इंद्रिय और मन को वश में करने वाले ऐसे पुरुषों को मैं प्रणाम करता हूँ॥19॥
येषाँ त्रिवर्गः कृत्येषुवर्तते नोपहीयते।
शिष्टाचार प्रवृत्ताश्चतान्नमम्यहं सदा॥ 21॥
जो पुरुष कर्त्तव्य कर्मों में धर्म अर्थ काम इस त्रिवर्ग का ध्यान रखते हैं अर्थात् किसी को नष्ट नहीं होने देते और शिष्ट पुरुषों का सा आचरण करते हैं उनको मैं सदा प्रणाम करता हूँ॥ 21॥
महाभारत अनुशासन पर्व के अध्याय 59 में भीष्म जी ने ऐसे ही विचार प्रकट किये हैं। देखिए—
य एवं नैवकुप्यन्ते नलुभ्यंति तृणेष्वपि।
त एव नः पूज्यतमाये चापि प्रिय वादिनः॥ 22॥
भीष्म जी कहते हैं कि हे राजन् युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण क्रोध नहीं करते, लोभ रहित हैं प्रिय वादी हैं वे हमारे पूजने योग्य हैं॥ 22॥
भर्तृहरिजी ने भी सज्जनों का अभिवादन करते हुए अपने को धन्य माना है। भर्तृहरि नीति शतक का 62 वाँ श्लोक देखिए—
वाञ्छासज्जन संगमे परगुणे प्रीति गुरौ नम्रता।
विद्यायाँव्यसनं स्वयोषितिरतिर्लोका पवादाद्भयम्॥
भक्तिः शूलिनिशक्ति रात्मदमने संसर्ग मुक्तिः खले।
एतेयेषु वसन्ति निर्मल गुणास्तेभ्योनरेभ्योनमः॥
सज्जनों के संग की इच्छा, दूसरे के गुणों में प्रीति, बड़े लोगों से नम्रता, विद्या में व्यसन, अपनी ही स्त्री में प्रीति, लोक निंदा से भय, ईश्वर की भक्ति, अपने मन को वश में रखने की शक्ति और दुष्ट संग का त्याग ये निर्मल गुण जिनमें हैं उन पुरुषों के लिए नमस्कार है।
(ले. श्री जयदत्त त्रिपाठी आयुर्वेद शास्त्री)
“नींबू” भारत का एक उत्तम फल है। यह थोड़ा बहुत भारत के सभी भागों में पाया जाता है। यह एक ऐसा फल है कि जिसके प्रयोग में किसी प्रकार का डर नहीं रहता। जब जहाँ जो भी चाहे, बेखटके व्यवहार करे; हानि की आशंका ही नहीं। किसी भी रूप में इसका प्रयोग कीजिए, सभी रीति से लाभ करता है। नींबू में कौन सा गुण नहीं इसका बताना कठिन है, यह फलों का सिरमौर, औषधि में प्राणदाता, भोजन की जान, सुन्दरता का साथी है। यह जितना लोकप्रिय तथा सहज प्राप्य फल है उतना और कोई फल नहीं है। गरीब और अमीर सभी के यहाँ मिल सकता है।
भोजन के साथ नींबू का सेवन भी बहुत लाभदायक है। नींबू की अनेक जातियों में से कागजी नींबू तो प्रायः हर अवस्था के आदमियों के लिए लाभकारी है। जहाँ कागजी नींबू न हो वहाँ कोई भी खट्टा नींबू ले सकते हैं। भोजन के बाद तथा रात के समय आधा नींबू गिलास भर पानी में निचोड़ कर पीने से कैसी भी मन्दाग्नि हो दूर हो जाती है। नींबू के रस के प्रभाव से विशूचिका तथा आंतरिक-ज्वर के कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है। उनमें जिगर की बीमारी या वात (गठिया) रोग में लाभ पहुँचाने की अपूर्व शक्ति होती है। पानी में नींबू की थोड़ी सी बूँदें मिलाकर एक प्याला रोज भी पी लेने से पेट के लिए अत्यंत हितकारी है। मेदा साफ रहता है और बदहजमी का रोग सहसा नहीं होता। कब्ज के मरीज को एक काँच या चीनी के प्याले में थोड़ा सा नींबू का रस निचोड़ और एक चुटकी सेंधा नमक डालकर प्रातः उठते समय तथा शाम को सोते समय पीने से थोड़े ही दिनों में आश्चर्य प्रद लाभ होता है। मौसमी बुखार के लिए नींबू बहुत ही उपयोगी है। दूध में नीबू निचोड़ कर रात को या प्रातःकाल मुख पर उबटन के रूप में उपयोग करने से चेहरे का रंग निखरता है। खूबसूरती बढ़ती है और स्वास्थ्य अच्छा रहता है। सिर के बाल गिर जाते हों तो नींबू का टुकड़ा सिर पर घिसने से बाल गिरना रुकता है। सिर की अधिक पीड़ा में माथे पर नींबू घिसने से पीड़ा में शीघ्र आराम होता है। किसी जन्तु ने काटा हो तो उस जगह इसके रस की बूँदें लगाकर घिसने से आराम होता है। जुकाम हो, गला दुखता हो, कोष्ठबद्धता हो अथवा जोड़ों में दर्द हो तो नींबू बहुत हितकारी है। किन्तु नींबू के प्रयोग में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसका रस गुड़ में मिलाकर न खाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इसका प्रभाव बहुत बदल जाता है। इसका शरबत बहुत गुणकारी होता है। जिस समय शहर में कोई संक्रामक रोग फैल रहा हो उस समय रोजाना दिन में 2-3 बार नींबू का शरबत पी लेने से रोग के आक्रमण का भय नहीं रहता। क्योंकि नींबू अपने अद्भुत गुणों के कारण कृमि नाशक तो है ही, यह संक्रमण विरोधक भी है। यह विशूचिका, पेचिश, टाइफ़ाइड, संग्रहणी के कीटाणु नष्ट करता है। दाँत के रोगियों को पानी में नींबू निचोड़ कर कुल्ला करना और मलना अच्छा रहता है, यदि उसमें सोडा बाईकार्बोनेट भी मिला लिया जाय तो दाँतों का हिलना व दुखना बंद हो जाता है।
नींबू के रस में 89.30 प्रतिशत पानी होता है। यह प्रकृति का बनाया हुआ सबसे साफ जल है और दिमाग और खून को लाल कोषों का मुख्य योग्य होकर स्नायविक शक्ति के उत्पादन में उपयोगी होता है। 2.13 प्रतिशत सोडियम, 3.24 प्रतिशत चूना, 5.15 प्रतिशत मैग्नेशियम जो कि दाँतों की पालिश को कड़ापन देता है, फेफड़ों के रग रेशों की रक्षा करता है, शरीर के कोषों विशेषतः स्नायविक कोषों को बनाता है और खून को लाल रखता है। .11 प्रतिशत लोहा, 3.62 प्रतिशत तेजाब, 3.08 प्रतिशत गंधक और 0.48 प्रतिशत क्लोराइड तत्व होते हैं। इनके सिवाय .12 प्रोटीन व 0.1 प्रतिशत चर्बी होती है। यह ठीक है कि नींबू में चर्बी और प्रोटीन कुछ विशेष नहीं हैं, लेकिन ये दोनों चीजें अन्य खाद्यों में काफी और प्रायः अक्सर अंदाज से अधिक मिला करती हैं। 85 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और काफी तौर पर फास्फोरस भी पाया जाता है। श्वास क्रिया को ठीक रखने के लिए लेसिथीन बहुत आवश्यक है और लेसिथीन बनाने के लिए फास्फोरस चाहिए। इसलिए यह प्रत्यक्ष है कि फास्फोरस युक्त खाद्य दमा या खाँसी में ब्रोंकाइटिस बड़ा उपयोगी सिद्ध होता है। नींबू में कैल्शियम भी है जो कि दाँतों और हड्डियों की बनावट और मरम्मत में काम आता है। जीवन शक्ति भी इसमें बहुत होती है—विशेषकर विटामिन सी. तो इसमें बहुत ही अधिक मात्रा में पाया जाता है। नींबू में यों तो कई प्रकार के अम्ल विद्यमान हैं, किन्तु साइटिक अम्ल का प्रतिशत एक बड़े अंश में होता है।
कुछ विशेष उपयोग :- 1—शराब पीने के पश्चात् यदि नींबू का रस पी लिया जाय तो शराब का नशा नहीं चढ़ता।
2—यदि नींबू को सूँघा जाय तो नजला को दूर करता है और नजले को उत्पन्न नहीं होने देता।
3—सिर के दर्द हर—काले रंग की चाय में दूध के बजाय नींबू का रस डाल कर पीने से सिर का दर्द जाता रहता है। नींबू के सूँघने से गर्मी का सरदर्द जाता रहता है।
4—आँखों की फूली पर—नींबू के रस में हरे रंग की काँच की चूड़ी को महीन पीस कर फूले वाली आँख में लगाने से फूला और जाला कट जाता है।
5—नक्शीर पर—ताजा नींबू के रस को नाक से सूँघने से नक्शीर का आना तुरंत बंद हो जाता है। नक्शीर को बंद करने लिए इससे अच्छी और कोई दवा नहीं है।
6—कान दर्द पर—समुद्र-झाग को बारीक पीस कर थोड़ा चूर्ण कान में डाल दें। उसके ऊपर नींबू का रस डालने से एक प्रकार का जोश पैदा होगा— जिससे कान साफ होकर कान का दर्द दूर हो जाता है। यदि कान में जख्म हो—तो उपरोक्त प्रकार से कान साफ करके—फिर कोई तेल डालने से जख्म ठीक हो जावेगा।
7—हैजा पर—नींबू के रस में हैजे के कीड़े मारने की शक्ति है, इसलिए जो व्यक्ति नित्य नींबू के रस का सेवन करता है—उसे हैजा नहीं होता। नींबू का रस कै को रोकता है; प्यास को बंद करता है, भूख को बढ़ाता है, जिगर को साफ रखता और मेदे के मल को दूर करता है। हैजे के कीड़े नींबू के रस से 15 मिनट में दूर हो जाते हैं।
त्यागो! और अवश्य त्यागो!!
1—बुद्धि से संकोच।
2—मन से कुविचार।
3—हृदय से भय।
4—समाज से कुरीतियाँ।
5—देश से स्वार्थपरता।
6—धर्म से निरर्थक रूढ़ियां।
7—राजनीति से साम्प्रदायिकता।
8—अछूतों से अस्पृश्यता।
9—दीनों का तिरस्कार।
10—रोगी से घृणा।
11—शरीर से निर्बलता।
12—इन्द्रियों से अपवित्रता।
13—नेत्रों से कुदृष्टि।
14—मुख से अप्रिय वचन।
15—श्रवण से निंदा स्तुति की रुचि।
16—रसना से रसास्वादन की कामना।
17—हाथों से क्रूर कर्म।
18—पैरों से कुमार्ग गमन।
—ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम.ए.एल.टी. फैजाबाद
गायत्री चर्चा-
(1)गायत्री भारतीय धर्म की आधार शिला है। मनुष्य के लौकिक और परलौकिक जीवन को पूर्णतया आनन्द मय बना देने की शक्ति गायत्री में है। आत्म कल्याण का इससे बढ़ कर और कोई उपाय नहीं। गायत्री की अलौकिक विशेषताओं के कारण ही उसे भूलोक की कामधेनु, अमृत निर्झरिणी, ज्ञान गंगा, पारस मणि, तरण तारिणी, ब्रह्म ज्योति और ईश्वरीय वाणी कहा है। प्राचीन काल में हम इसी महाशक्ति के द्वारा जगद्गुरु चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे। आज हम इसी महाशक्ति से विमुख होकर दीन हीन बने हुए हैं। इस तथ्य को हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए।
(2) पश्चिम के देशों ने भौतिक विज्ञान की उन्नति करके संसार पर अपनी बहुमुखी प्रभुता स्थापित की है। चिर प्राचीन भारतीय अध्यात्म विज्ञान की शक्ति वर्तमान भौतिक विज्ञान की अपेक्षा असंख्य गुनी अधिक है। और उसी के द्वारा मनुष्य को सच्ची सुख शान्ति एवं पूर्णता की प्राप्ति हो सकती है। इस लुप्तप्राय ब्रह्म विद्या का पुनरुत्थान करना ही हमारे इस गायत्री मा अभियान का एक मात्र उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति में हाथ बटाना और भाग लेना प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का पवित्र कर्त्तव्य है।
(3) ‘अखण्ड ज्योति’ के तत्वावधान में अ. भा. गायत्री संस्था का जो संगठन है, वह देश भर की जागृत आत्माओं को एक सम्बन्ध सूत्र में बाँधने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस माध्यम द्वारा जो प्रयोग, अन्वेषण, तप, साधन तथा प्रशिक्षण का कार्य हो रहा है, उसके अब तक के छुटपुट परिणाम बहुत ही उत्साहवर्धक और आशाजनक रहे हैं। भविष्य बहुत ही उज्ज्वल दिखाई पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि चिर प्राचीन भारतीय सूक्ष्म शक्ति विज्ञान एवं दर्शन के पुनरुत्थान में भगवान इस गायत्री संगठन को भी निमित्त बना रहे हैं। यह हम सब के लिए बड़ी ही प्रसन्नता की बात है।
(4) इस गायत्री संगठन द्वारा आत्म विद्या के प्रेमियों को समय-समय पर कुछ परामर्श दिये जाते हैं और कुछ कार्य सौंपे जाते हैं। संवत् 2009 के नववर्षारंभ में निम्न लिखित परामर्श इस मार्ग के पथिकों को दिये जा रहे हैं। इन की एक-एक पंक्ति को आवश्यक समझकर विशेष मनोयोग पूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए।
(5) नव वर्षारंभ की नवरात्रि चैत्र सुदी 1 बुधवार तदनुसार 26 मार्च से आरंभ होकर नवमी गुरुवार ता. 3 अप्रैल को समाप्त होंगी। गायत्री उपासना के लिए यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण समय है। इस समय में की हुई साधना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इस वर्ष संध्या की ऋतु बेला में साधारण साधना की अपेक्षा कुछ न कुछ अधिक साधना करनी चाहिए।
(6) 9 दिन में 24 हजार का एक छोटा अनुष्ठान हो सकता है। प्रतिदिन 2667 मंत्र (25 मालाएं) जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। प्रायः 4 घन्टे में इतनी माला आसानी से जपी जा सकती हैं। यदि एक साथ इतने समय लगातार बैठना कठिन हो तो अधिकाँश भाग प्रातः काल पूरा करके शेष भाग सायंकाल को पूरा कर लेना चाहिए।
(7) जिन सज्जनों ने गायत्री उपासना के क्षेत्र में अब तक प्रवेश नहीं किया है, उनके लिए इस नवरात्रि से प्रारम्भ करना एक बहुत ही शुभ मुहूर्त है। जो लोग नियमित साधना न कर सकते हों वे सुविधा के समय मौन मानसिक जप कर सकते हैं थोड़ी सी साधना भी श्रद्धा बढ़ाती है और परीक्षा के लिए की हुई थोड़ा उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।
(8) नव रात्रियों में जप ही चलता रहेगा। दशमी शुक्रवार 4 अप्रैल को साधना की समाप्ति होगी। उस दिन हवन करना चाहिए। ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन, प्रसाद वितरण गायत्री साहित्य का दान आदि दक्षिणाओं के साथ अनुष्ठान को समाप्त कर देना चाहिए।
(9) इन नौ दिनों में जिससे जितनी तपश्चर्या बन पड़े उतना ही उत्तम है। (1) ब्रह्मचर्य (2) उपवास। यह दो तप प्रधान हैं। जो लोग केवल एक समय फलाहार पर नहीं रह सकते वे दो बार फल दूध ले सकते हैं। जिसके लिए यह भी कठिन है वे दोपहर को बिना नमक का एक अन्न से बना हुआ भोजन और शाम को दूध लेकर अपना उपवास चला सकते हैं।
(10) उपरोक्त दो प्रधान व्रतों के अतिरिक्त नवरात्रि में अन्य तितीक्षाएँ भी उत्तम हैं (1) भूमि शमन (2) चमड़े के जूतों का त्याग (3) शृंगार सामग्रियों का त्याग (4) पशुओं की सवारी का त्याग (5) अपना भोजन, जल, वस्त्र धोना, हजामत आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना (6) प्रतिदिन कुछ समय मौन आदि संयम नियमों को भी यथासंभव पालन करने का प्रयत्न करना चाहिए।
(11) जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देंगे, उनके साधन का संरक्षण, उनकी भूलों का परिमार्जन, आवश्यक पथ प्रदर्शन एवं तपश्चर्या का परिपोषण हम करते रहेंगे।
(12) नव रात्रियों में हमारा केवल जल के आधार पर पूर्ण निराहार व्रत होता है और उन दिनों हमारा अधिकाँश समय एकान्त में व्यतीत होता है। इसलिए उन दिनों कोई सज्जन मथुरा हमसे मिलने न आयें। उन दिनों केवल अत्यन्त आवश्यक पत्रों के ही उत्तर दिये जा सकेंगे।
(13) नवरात्रि में गायत्री तपश्चर्या की उष्णता से कच्चे सद्विचार पकते हैं, पाप एवं कुसंस्कार नष्ट होते हैं, आत्मबल एवं सतोगुण की वृद्धि होती है, शारीरिक एवं बौद्धिक शक्ति बढ़ती है तथा अन्य प्रकार के सत्य परिणाम उपलब्ध होते हैं। इसलिए नवरात्रि में गायत्री उपासना के लिए पाठकों से हमारा विशेष अनुरोध है। परीक्षा के रूप में इस ओर कदम बढ़ाने से सज्जनों को इससे आशा जनक सन्तोष मिलेगा।
(14) गायत्री उपासकों को यह जान कर बड़ी प्रसन्नता होगी कि सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ की प्रगति बहुत ही आशाजनक हो रही है। 125 करोड़ गायत्री महामंत्र का जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास, 125 हजार व्यक्तियों को गायत्री शिक्षण का जो महान संकल्प गत नवरात्रियों के अवसर पर माता की प्रत्यक्ष प्रेरणा से किया गया था, उसकी पूर्ति सैकड़ों ऋत्विजों द्वारा हो रही है।
(15) सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। इतने विशाल संकल्प की कल्पना मात्र से मस्तक चकरा जाता है परन्तु उसकी पूर्ति के साधन माता स्वयं जुटा रही है। इस यज्ञ के पीछे प्रभु की प्रचण्ड प्रेरणा एवं महान योजना सन्निहित है। इसके सूक्ष्म परिणाम अत्यन्त ही महान होंगे। मनुष्य जाति की विश्वव्यापी कठिनाइयों का समाधान होने में इस महान यज्ञ द्वारा भारी सहायता मिलेगी। इस यज्ञ में भागीदार बनने के लिए सभी जागृत आत्माओं को हमारा सादर आमंत्रण है।
(16) प्रतीत होता है कि सहस्रांशु यज्ञ का 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, 125 हजार उपवास के संकल्प में से अधिकाँश भाग इसी वर्ष पूरा हो जायगा। किंतु 125 हजार (सवालक्ष) सज्जनों को गायत्री विद्या का समुचित ज्ञान करने वाला भाग बहुत पीछे है। यह ब्रह्मसंदीप भी यज्ञ का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु यज्ञ के भागीदार ऋत्विजों ने इस ओर बहुत कम ध्यान दिया है। अब इस ओर भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्यथा यज्ञ की पूर्णाहुति न हो सकेगी।
(17) ब्रह्मसंदीप के लिए गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना आवश्यक है। गायत्री की 17 पुस्तकों का पूरा सैट 21) मात्र का है। जो सज्जन इतना भी खर्च नहीं कर सकते वे छोटी 10 पुस्तकें 3।॥) की ही मँगा लें। इतने मात्र से ही गायत्री पुस्तकालय स्थापित हो जाता है इन पुस्तकों को स्वयं पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना, प्रत्येक गायत्री उपवास का परम पावन कर्त्तव्य है। जैसे बिना आयुर्वेद पढ़े कोई व्यक्ति वैद्य नहीं बन सकता वैसे ही गायत्री साहित्य पढ़े बिना कोई व्यक्ति गायत्री महाशक्ति का पूरा रहस्य उपयोग विधान, और साधन नहीं जान सकता। जिन सज्जनों के गायत्री पुस्तकालय अभी तक अधूरे हैं उनसे प्रार्थना है कि आगामी नवरात्रि तक उन्हें पूरे कर लें और यथा सम्भव नये पुस्तकालय स्थापित करावें जिससे गायत्री प्रचार की अमर बेल अपनी शाखा प्रशाखाओं सहित फले फूले और सहस्रांशु यज्ञ का एक महत्वपूर्ण भाग अधूरा रहने का गतिरोध न रहे।
(18) आगामी गायत्री जयन्ती जेठ सुदी 10 (गंगा दशहरा) 3 जून को है। इस पुण्य अवसर पर 24 लक्ष हस्तलिखित गायत्री मन्त्रों की श्रद्धाँजलि माता के चरणों में अर्पित की जायगी। उस पुण्य योजना में प्रत्येक साधक को भाग लेना चाहिये। कापी साइज में सफेद कागज पर प्रतिदिन 24 मन्त्र लिखते रहा जाय तो उस पुण्य पर्व तक 2400 मन्त्र लिखे जा सकते हैं। जो इससे न्यूनाधिक लिख सकें वे वैसा करें। लेखन प्रारम्भ करते समय सबसे प्रथम अपना पूरा नाम और पता लिख कर क्रमाँक (सिलसिले का नम्बर) डालते हुए मन्त्र लिखने चाहिए जिससे गणना में सुविधा रहे। यह मन्त्र 3 जून से पूर्व मथुरा पहुँच जाने चाहिये। यदि साथ में कोई पत्र न हो तो खुले मुँह के बुक पोस्ट द्वारा तीन पैसे का टिकट लगाकर उन्हें भेजा जा सकता है। यह हस्तलिखित मंत्र गायत्री संस्था में चिरकाल तक सुरक्षित रहेंगे और उनका प्रदर्शन सदैव होता रहेगा इसलिए मंत्र सुन्दर लिपि में लिखने चाहिए।
(19) गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 1 जुलाई का अखण्ड ज्योति का ‘गायत्री विशेषाँक’ निकलेगा उसमें गायत्री उपासना के ऐसे अनुभव रहेंगे जिनसे इस मार्ग के पथिकों का पथ-प्रदर्शन हो और उनके उत्साह एवं श्रद्धा-विश्वास में अभिवृद्धि हो। गायत्री उपासना से जिन सज्जनों को स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हों, या किन्हीं दूसरों को प्राप्त हुए लाभों का वृत्तांत विदित हो तो वह घटनाएँ सम्बन्धित व्यक्तियों का आधे शरीर का फोटो भी भेजने का प्रयत्न करना चाहिए। उस प्रकार के लेख यथासम्भव शीघ्र ही भेजने चाहिए ताकि फोटो ब्लॉक बनवाने और लेख संशोधन का कार्य समय पर पूरा हो सके।
(20) साधारणतया, साधना सम्बन्धी चमत्कारी अनुभव गुप्त रखें जाते हैं परन्तु सार्वजनिक हित, नये पथिकों का पथ-प्रदर्शन एवं माता की महिमा पुण्य प्रसार होने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में इस प्रकार के लेखों का प्रकाशन होने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जैसे कुपात्रों के सन्मुख उन्हें गुप्त रखना आवश्यक है वैसे ही सत्पात्रों के सन्मुख उन्हें प्रकट करना भी आवश्यक है। इसलिए गायत्री साधना के उत्साहपूर्वक अनुभवों को छिपाने की अपेक्षा प्रकाशित करना ही श्रेयस्कर समझ कर विशेषाँक के लिए अनुभव माँगे जा रहे हैं।
(21) “अखण्ड-ज्योति” में हर महीने गायत्री सम्बन्धी महत्वपूर्ण लेख और सूचनाएँ रहती हैं। माता का एक चित्र भी रहने लगा है। हर वर्ष गायत्री विशेषाँक निकलता है। इस प्रकार गायत्री उपासकों के लिए यह पत्रिका उनके लिए अत्यंत उपयोगी पथ-प्रदर्शक है। मूल्य के सस्तेपन और लेखों की उत्कृष्टता की दृष्टि से वह अनुपम आध्यात्मिक भोजन है। इसलिए गायत्री उपासकों को उसका ग्राहक अवश्य रहना चाहिए। 2॥) वार्षिक में उनके लिए यह अलभ्य वस्तु है। गायत्री प्रचार की दृष्टि से भी अखण्ड-ज्योति का प्रचार करना आवश्यक है। अ. भा. गायत्री संगठन में बँधे रहने के लिए तो यह एकमात्र संगठन सूत्र है।
(22) गायत्री मन्दिर की उपयोगिता एवं आवश्यकता विज्ञ सज्जनों से छिपी नहीं है। प्रसन्नता की बात है, उसके लिए अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुरूप सहायताएँ भेजी भी हैं। अब मन्दिर निर्माण का कार्य शीघ्र ही आरम्भ होने वाला है। वस्तुओं की महंगाई के कारण छोटा स्थान बनाने में भी बहुत पैसा लग जाता है। इसलिए माता जिनके अन्तःकरण में प्रेरणा दें वे इस पुण्य प्रयोजन के लिये अधिक उदारता, अधिक प्रयत्न एवं अधिक श्रद्धा का परिचय दें ताकि यह अखिल भारतीय गायत्री तीर्थ बनने में अनावश्यक विलम्ब न हो।
(23) गायत्री साहित्य की जितनी भी पुस्तकें हैं उनकी बिक्री का लाभ गायत्री संस्था के संचालन एवं सहस्रांशु यज्ञ सम्बन्धी आयोजनों में लगता है। पुस्तकों के लाभ की एक-एक पाई गायत्री प्रयोजन में खर्च होती है। इसलिए इन पुस्तकों को स्वयं मँगाना या दूसरों को प्रेरणा देना अप्रत्यक्ष रूप से गायत्री संस्था की सहायता करना है।
(24) प्रत्येक गायत्री उपासक को यह भली भाँति समझ लेना चाहिये कि (1) गायत्री के अक्षरों में सन्निहित 24 शिक्षाओं के अनुपम अपनी जीवन नीति निर्धारित करना और (2) साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाना यह दोनों ही कार्य आवश्यक हैं। इनमें पहला कार्य सर्व प्रथम होना चाहिए, दूसरा कार्य उसके पीछे है।
नोट- जिन सज्जनों को इस ओर रुचि हो और जो इन सूचनाओं में से कुछ भी अनुगमन करने के लिये प्रयत्नशील हों वे अपनी तैयारी संबंधी पूर्ण सूचना नवरात्रि से पूर्व दे सकें तो बहुत ही उत्तम हो। जवाबी पत्र भेजने और पूरा नाम पता स्पष्ट अक्षरों में लिखने का भी अनुरोध है।
—श्रीराम शर्मा, आचार्य।
संसार को तारने के लिए जब से जिसे गंगाजी इस प्रत्यक्ष जगत में हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में जीवात्मा का निस्तार करने वाली ज्ञान गंगा—गायत्री है। वृहन्नारदीय पुराण के अध्याय 6 में गंगा और गायत्री को लोक-परलोक के लिये परम कल्याण कारक बताया गया है देखिए—
गायत्री जान्हवी चो भे सर्वपाप हरेस्मृते।
एतयोर्भक्ति हीनोय स्तं विद्यात्पतितं द्विजाः॥60॥
हे द्विजों! गायत्री और गंगाजी ये दोनों सब पाप हरने वाली हैं। इनकी भक्ति से जो हीन है उसको पतित जानो।
गायत्री छन्दसाँ माता माता लोकस्य जाह्नवी।
उभेते सर्वपापानाँ नाशकारणताँ गते॥61॥
गायत्री वेदों की माता और लोक माता गंगाजी हैं ये दोनों सब पापों के नाश करने वाली हैं।
यस्य प्रसन्ना गायत्री तस्य गंगा प्रसीदति।
विष्णु शक्ति युतेतेच सर्व कामार्थ सिद्धदे ॥62॥
जिस पर गायत्री प्रसन्न हैं, जिस पर गंगा जी प्रसन्न हैं। ये दोनों विष्णु शक्ति सहित सब काम अर्थ देने वाली हैं।
धर्मार्थ काम मोक्षाणाँ फलरूपे निरंजने।
सर्व लोकानुग्रहार्थ प्रवर्तते महोत्तमे॥63॥
धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष इनके फलरूप हुई ये दोनों (गंगा-गायत्री) सब लोक के अनुग्रह (कृपा) के अर्थ वर्तमान हैं।
अतीव दुर्लभानृणाँ गायत्री जाह्नवी तथा।
तथैव तुलसी भक्ति हरि भक्ति श्च सात्विकी॥64॥
गायत्री और गंगाजी मनुष्यों को अत्यन्त ही दुर्लभ हैं वैसे ही तुलसी की भक्ति और सत्व गुण वाली विष्णु भक्ति है।
[1]
यह कैसा संसार, जहाँ पर जीवित रहना एक पहेली।
यह कैसा संसार, जहाँ पर मृत्यु जन्म की सगी सहेली॥
यह कैसा संसार, जहाँ पर रहता मानव पशु का मेला।
यह कैसा संसार, जहाँ पर है समूह में व्यक्ति अकेला॥
यह कैसा संसार, जहाँ पर जलता दीप प्रकाश न होता!
यह कैसा संसार, जहाँ नर को नर पर विश्वास न होता!!
[2]
कैसा अजब समाज, कि जिसमें छूआ-छूत होती ओटी में।
कैसा अजब समाज, कि जिसमें पुण्य बँधा रहता चोटी में॥
कैसा अजब समाज, कि जिसमें बड़ा भंद भीतर बाहर में।
कैसा अजब समाज, कि जिसमें विष गाता अमृत के स्वर में॥
कैसा अजब समाज, कि जिसमें पीतल कहलाता है सोना!
कैसा अजब समाज, कि जिसमें व्यर्थ हुआ कवि का भी रोना!!
[3]
कैसा है यह धर्म, कर्म से इसका कुछ संबंध नहीं है।
कैसा है यह धर्म, नीति का जिस पर कुछ प्रतिबंध नहीं है॥
कैसा है यह धर्म, न जिस पर सदाचार की शीतल छाया।
कैसा है यह धर्म, सत्य का जिसने मर्म नहीं है पाया॥
कैसा है यह धर्म, रक्त ने जिसके जीवन तक को सींचा!
कैसा है धर्म, किया है जिसने नर का मस्तक नीचा!!
[4]
यह भी क्या इंसान, कि जिसने अपना दर्द नहीं पहचाना।
यह भी क्या इंसान, भाग्य-दीपक पर बना रहा परवाना॥
यह भी क्या इंसान, कि जिसने अब तक देवों को अपनाया।
यह भी क्या इंसान, न जिसने पृथ्वी को है स्वर्ग बनाया॥
यह भी क्या इंसान, न जिसने है पत्थर को भी पिघलाया!
इस जग के प्यासे मरुथल में निज करुणा का नी बहाया!
*समाप्त*
(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए. शास्त्री)