नीति धर्म को मत छोड़िए।

(श्री महात्मा गाँधी)

मनुष्य जब तक स्वार्थी है अर्थात् वह दूसरों के सुख की परवाह नहीं करता तब तक वह पशु-सदृश, बल्कि उससे भी गया बीता है। मनुष्य पशु से श्रेष्ठ है यह हम देख सकते हैं, पर यह तभी होता है जब हम उसे अपने कुटुम्ब का बचाव करते देखते हैं। वह उस समय मानव जाति में और ऊँचा स्थान पाता है जब अपने देश या अपनी जाति को अपना कुटुम्ब मानता है। जब सारी मानव जाति को वैसा मानता है तब उससे भी ऊँचे सोपान पर चढ़ता है, अर्थात् मनुष्य मानव जाति की सेवा में जितना पीछे रहता है उस दर्जे एक वह पशु है अथवा अपूर्ण है। अपनी स्त्री के लिए, अपने बेटे के लिए, मुझे दर्द हो, पर उससे बाहर के आदमी के लिए मेरे दिल में दर्द न हो तो स्पष्ट है कि मुझे मानव जाति के दुख की अनुभूति नहीं है, पर स्त्री, बच्चे या कौम जिसको मैंने अपना मान रखा है उनके लिये भेद-बुद्धि या स्वार्थ बुद्धि से कुछ दर्द होता है।

अतः जब तक हमारे मन में हर एक मानव-संतान के लिए दया न हो तब तक हमने नीति धर्म का पालन नहीं किया और न उसे जाना अब हम देख रहे हैं कि ऊँची नीति सार्वजनिक होनी चाहिए। हमसे सम्बन्ध रखने बाला हर आदमी हमारे ऊपर ऐसा हक रखता है यानी हम सदा उसकी सेवा करते रहें यह हमारा फर्ज है। हमें यह सोच कर व्यवहार करना चाहिए कि हमारा हक किसी के ऊपर नहीं है। कोई यह कह सकता है कि ऐसा करने वाला आदमी इस दुनिया के रेले में पड़कर पिस जायगा। पर ऐसा कहना निरा अज्ञान है, क्योंकि यह जगत्-प्रसिद्ध अनुभव है कि ऐसी एक-निष्ठा से सेवा करने वाले आदमी को ईश्वर ने हमेशा बचा लिया है।

इस नीति के पैमाने से मनुष्य मात्र समान हैं। इसका अर्थ कोई यह न करे कि हर आदमी समान पद अधिकार भोगता है, या एक ही तरह का काम करता है। उसका अर्थ यह है कि अगर मैं ऊँचा पद अधिकार भोगता हूँ तो उस पद की जिम्मेदारी उठाने की मुझमें शक्ति है। इससे मुझे गर्व से इतराना न चाहिए और न यह मानना चाहिए कि दूसरे लोग जो छोटी जिम्मेदारी उठाते हैं मुझमें हेठे हैं।

इस नियम के अनुसार एक जाति या राष्ट्र अपने स्वार्थ के लिए दूसरी जाति या राष्ट्र पर राज्य नहीं कर सकता। अमरीका की गोरी जनता का वहाँ के मूल निवासियों को दबाकर उन पर हुकूमत करना, यह नीति विरुद्ध है। ऊँची शिक्षा संस्कार वाली जाति का नीची जाति से साबका पड़े तो उसका यह कर्त्तव्य होता है कि उसको उठाकर अपने बराबर कर ले। इस नियम के अनुसार राजा प्रजा पर हुकूमत करने वाला नहीं बल्कि उसका नौकर होता है। अधिकारी अधिकार भोगने के लिए नहीं बल्कि प्रजा को सुखी करने के लिये होता है। जिस राज्य में शासक लोग स्वार्थी हों तो वह राज्य निकम्मा है।

फिर इस नियम के अनुसार एक राज्य में बसने वाले या एक कौम के आदमियों में जो बलवान हों उनका काम है दुर्बलों की रक्षा करना, न कि उनको कुचलना, उनका दलन करना। ऐसी राज्य-व्यवस्था में भूखों मरने वाले नहीं हो सकते और न यही हो सकता है कि कुछ लोगों के पास बेहद दौलत इकट्ठी हो जाय, इसलिए कि हम अपने पड़ोसी का दुःख देखते रहें और सुखी रहें यह हो नहीं सकता। श्रेष्ठ नीति का अनुसरण करने वाले आदमी से धन बटोरने का काम होने वाला नहीं। ऐसी नीति दुनिया में थोड़ी दिखलाई देती है, यह सोचकर नीतिमान को घबड़ाना न चाहिए क्योंकि वह अपनी नीति का मालिक है, उसके नतीजे का नहीं।

वर्ष -13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -5


संकट के अवसर पर


संकट के अवसर पर (Kavita)

मत हो निराश! मत हो निराश!!

तेरे सम्मुख संघर्ष खड़ा।

तू मत घबड़ा! तू मत घबड़ा॥

है कितना साहस शक्ति लिये, यह आती, जाती हुई श्वांस!

मत हो निराश! मत हो निराश!!

लहरों की गति है बड़ी प्रबल।

टूटा-सा भूला-सा सम्बल॥

संकेत पार का कहता है, फिर भी सागर का अट्टहास!

मत हो निराश! मत हो निराश!!

पथ सूना, सूना अन्धकार।

हिम्मत न हार, हिम्मत न हार॥

इस तट के घन-दल से छनकर, आयेगा तुझ तक नव प्रकाश!

मत हो निराश! मत हो निराश!!

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


धन का उचित उपयोग

वित्त शक्त्या तु कर्त्तव्या उचिताभाव पूर्तयः।

न तु शक्त्या नया कार्य दर्पोद्धत्य प्रदर्शनम्।

अर्थ-धन की शक्ति द्वारा अभावों की पूर्ति करनी चाहिए। उस शक्ति द्वारा घमण्ड और उद्धतता का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए।

गायत्री के ‘तत्’ और ‘स’ अक्षरों की व्याख्या करते हुए यह बताया जा चुका है कि ‘ज्ञान’ और ‘सत्ता’ का उपयोग स्वार्थ और अनीति के लिये नहीं वरन् परमार्थ और सेवा के लिये होना चाहिए। अब तीसरे अक्षर ‘वि’ में यह बताया जा रहा है कि तीसरी शक्ति-वित्त शक्ति का उपयोग भूलोक हित के लिए, उचित अभावों की पूर्ति के लिए ही होना चाहिए। अमीरी का बड़प्पन दिखाने एवं उद्दंडता पूर्ण कुकृत्य करने के लिए धन की शक्ति नहीं बनी है।

विद्या और सत्ता की भाँति धन भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इसका उपार्जन केवल इसी लिए आवश्यक है कि अपने तथा दूसरों के उचित अभावों की पूर्ति की जा सके। शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा के विकास के लिए, साँसारिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए धन का उपयोग करना चाहिए और इसीलिए उसे कमाया जाना चाहिए।

परन्तु आश्चर्य है कि आज अधिकाँश व्यक्ति उसके सदुपयोग को भूल कर उसके जमा करने में अपनी प्रतिष्ठा अनुभव करते हैं। धन का जमा करना उसकी दृष्टि में कोई बहुत बड़ी बात होती है, अधिक कीमती सामान का उपयोग करना, अधिक अपव्यय, अधिक भोग, अधिक विलास, उन्हें जीवन की सफलता के चिह्न मालूम पड़ते हैं। इसलिए जैसे भी बने वैसे धन कमाने की उनकी तृष्णा प्रबल रहती है। इसके लिए वे धर्म-अधर्म का, उचित-अनुचित का विचार करना छोड़ देते हैं। धन की उसकी इतनी तन्मयता होती है कि स्वास्थ्य, मनोरंजन, स्वाध्याय, आत्मोन्नति, ईश्वराधना आदि सभी उपयोगी दिशाओं से मुँह मोड़ लेते हैं। धनपतियों को एक प्रकार का नशा सा चढ़ा रहता है, जिससे उनकी सद्बुद्धि, दूरदर्शिता और सत् असत् परीक्षणी प्रज्ञा कुण्ठित हो जाती है।

विचार करना चाहिए कि क्या धन का यही उपयोग है? क्या इसी गतिविधि के लिए धनोपार्जन होना उचित है? धन कमाना इसलिए आवश्यक है कि उससे हमारी वास्तविक आवश्यकताएं उचित सीमा तक पूरी हो सकें। कमाने का सही तरीका और उसके उपयोग का उचित मार्ग इन दोनों ही बातों को हमें भली प्रकार समझ लेना है। तभी धन की शक्ति से लाभ उठाया जाना संभव है, अन्यथा अनुपयुक्त अमीरी का परिणाम तो गरीबी की अपेक्षा अनेक गुना अधिक दुख-दायक होता है।

कमाने का उचित तरीका वह है जिसमें मनुष्य का पूरा शारीरिक और मानसिक श्रम लगा हो, जिसमें किसी दूसरे के हक का अपहरण न किया गया हो जिससे कोई चोरी, छल, प्रपंच, अन्याय, दबाव आदि का प्रयोग न किया गया हो। देश या समाज के लिये किसी प्रकार की हानि न पहुँचाकर सहायक एवं उपयोगी सिद्ध हो वही सच्ची कमाई कही जा सकती है। ऐसी ही कमाई से उपार्जित किया हुआ पैसा फलता फूलता है और उसी से मनुष्य की सच्ची उन्नति होती है। आजकल लोग बहुत जल्दी, अन्धाधुन्ध धन कमाने के लिए उतावले हो रहे हैं। इसके लिए वे सट्टा, दड़ा, फाटका, वायदा, जैसे जुए खेलते हैं। रिश्वत, चोरी, छल, फरेब, अनाचार, अन्याय, शोषण, आदि का आश्रय लेते हैं या ऐसे व्यापार करते हैं जिनसे लोगों को प्रकारांतर में हानि ही होती है, ऐसी कमाई से कोई मनुष्य यदि तत्काल धनी बन भी जाय, तो वह धन उसके लिए अभिशाप ही सिद्ध होता है। उससे शारीरिक रोग, द्वेष, शत्रुता, पारिवारिक वैमनस्य, व्यसन, व्यभिचार, दुर्गुण, बुरी आदतें, चिन्ताएँ, उद्दंडता, अहंकार, तृष्णा आदि अनेकों ऐसी बुराइयाँ उठ खड़ी होती हैं जो जीवन की शक्ति को नष्ट करती रहती हैं। बाहर से देखने में ऐसे अमीर लोग, सम्पन्न और सुखी दिखाई पड़ते हैं पर वस्तुतः वे गरीबों की अपेक्षा अधिक दुखी, अशान्त एवं चिन्ताग्रस्त रहते हैं। अनुचित रीति से कमाया हुआ पैसा कभी किसी को सुख नहीं दे सकता यह बात पूर्णतया निश्चित है।

जिस प्रकार धन के उपार्जन में औचित्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है वैसे ही उसके खर्च करने में, उपयोग में, सतर्कता बरतनी उचित है। अपने शरीर को, मन को, आत्मा को, परिवार को समुचित रूप से विकसित करने के लिये जिन वस्तुओं या परिस्थितियों की आवश्यकता है उनके लिये धन का व्यय होना प्राथमिक कर्तव्य है। भविष्य के लिये जोड़ना, जायदादें खरीदकर सात पुश्तों को अमीर बनाये रखने की बात सोचना, नितान्त मूर्खतापूर्ण है। जो लोग अपने बच्चों को सुशिक्षित, स्वस्थ और स्वावलम्बी बनाने में खर्च करने की अपेक्षा उनके लिए जायदाद खरीदते हैं वे यह भूल जाते हैं कि जिसने जिस पैसे को कमाने में पसीना नहीं बहाया है वह उस पैसे का मूल्याँकन नहीं कर सकता। मुफ्त की कमाई उपयोग के लिए मिलने पर वह सन्तान आलसी, व्यसनी, अपव्ययी, और अन्य बुराइयों की शिकार बन सकती है और वह पैतृक सम्पत्ति उसके लिए अन्ततः दुखदायक ही सिद्ध हो सकती है।

चाहे सन्तान के लिए हो, चाहे अपने लिए, फालतू पैसा जमा करना सर्वथा अनुपयुक्त है आज की अपनी सर्वोत्तम आवश्यकताओं की पूर्ति करने से ही वह दृढ़ता आती है जिसके कारण मनुष्य कभी भी गरीबी का मुँह नहीं देखता। जोड़ा हुआ धन चोरी, अग्नि, मुकदमा, बीमारी आदि में खर्च हो सकता है पर अपना ज्ञान, अनुभव, स्वास्थ्य, यश, योग्यता, मित्रता, प्रतिष्ठा आदि बढ़ाने में जो धन लग गया है, वह कभी नष्ट नहीं होता, वह आड़े वक्त में भी काम आता है और गिरी हुई परिस्थिति में पहुँचने पर भी फिर उठ खड़े होने की क्षमता उसमें बनी रहती है। जो लोग केवल जोड़ना ही सीखे हैं और उस जोड़ने की धुन में अपना सब कुछ गवाँ चुके हैं, वे यदि भाग्यवश गरीब बन जायं तो उन्हें सीधी तरह कोई धक्के भी नहीं देता।

कई व्यक्तिओं की आमदनी काफी होती है। पर वे उसको अपनी शान शौकत, अमीरी के चोचले, फैशन, ठाठ-बाठ, प्रदर्शन की वाह वाही में ही उड़ा देते हैं। बड़े बड़े राजा रईस, अमीर उमराव, अपने खर्च इतने बढ़ा लेते हैं कि उनकी भारी आमदनी भी पूरी नहीं पड़ती। ब्याह-शादियों, मृतभोजों, त्योहारों में लोग इतने इतराते हैं कि वर्षों की गाढ़े पसीने की कमाई एक दो दिन में ही फूँक देते हैं। कपड़े, गहने, सवारी, नौकर आदि को लोग अपनी आवश्यकता के अनुरूप नहीं शान के अनुरूप रखते हैं। नशेबाजी, जुआ, नाच तमाशे, सैर सपाटे, ऐय्याशी आदि के ऐसे चस्के किन्हीं किन्हीं को लगते हैं कि वे आदमी अच्छी आमदनी को उसी में खो देते हैं। यदि इन अपव्ययों से पैसे को बचाकर केवल जीवनोपयोगी कार्यों में उसे खर्च किया गया होता तो निश्चय ही वे अनेक दृष्टियों से बहुत उन्नत दशा को पहुँच गये होते।

गायत्री मन्त्र का तीसरा अक्षर ‘स’ हमें बताता है कि धन के महत्व को, उसके उचित उपार्जन की आवश्यकता को, उसकी सदुपयोग प्रणाली को भूलना नहीं चाहिये। वह तीन भूलें ऐसी हैं जिनके कारण अमीरी भी दुखपूर्ण हो जाती है, और इन तीनों तथ्यों को ठीक प्रकार समझ लेने से भी गरीबी में भी आनन्द उल्लास कम नहीं होता।

अधिक धन के स्वामित्व की तृष्णा एक मनोवैज्ञानिक भूल है जिस पर मुहम्मद गजनी और सिकन्दर जैसे अतुल सम्पत्ति के स्वामियों को मृत्यु के समय भारी पश्चाताप करके आँसू बहाने पड़े थे, सिकन्दर ने अपने मृत शरीर के खाली हाथ अर्थी से बाहर निकले रहने का आदेश किया था ताकि उसकी भूल को दूसरे लोग न दुहरावें और देखें कि सिकन्दर जैसे धनी को भी बिना एक पाई साथ लिए खाली हाथ यहाँ से जाना पड़ा था। खेद है कि लोग इस सत्य का समझते हुए भी धन को अधिक मात्रा में जोड़ने के पीछे पागल हो रहें है। अमीर से लेकर गरीब तक इसी बीमारी से ग्रस्त हैं। कुछ दिन पूर्व मथुरा में एक कोढ़ी की मृत्यु हुई थी, उसके पास 64 गिन्नी निकली थीं। वह कोढ़ी दिन भर भीख माँगता था, और आधे पेट खाकर अपनी भिक्षा के पैसों को जोड़ता जाता था। उसकी जीवन भर की कमाई उसके किसी काम न आई। उसने गिन्नियाँ जोड़ने की अपेक्षा यदि उन पैसों से जीवन का स्वस्थ विकास किया होता तो निश्चय ही वह अधिक सुखी जीवन व्यतीत कर सका होता।

आज अधिकाँश व्यक्तियों की मनोदशा उस कोढ़ी जैसी ही है। जेवर बनवाने, जायदाद खरीदने, नफा कमाने, दौलत बढ़ाने की तृष्णा में क्या गरीब क्या अमीर सभी अपनी सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार लगे हुए हैं। वे यह नहीं सोचते कि जीवन को समुन्नत और शान्तिमय बनाने के लिए धन की कितनी आवश्यकता है। उसके विपरीत वे उन्नति और शक्ति को नष्ट करके भी धन का स्वामित्व बढ़ाने में संलग्न रहते हैं। यह स्थिति सर्वथा अनावश्यक एवं अनुपयुक्त है, ऐसा गायत्री के इस तीसरे अक्षर में बताया गया है।

धन को कमाने में कोई दोष नहीं, उसे जितना अधिक कमाया जा सके अच्छा है। परन्तु दो कसौटियों पर उस धन को सदैव कसते रहना चाहिए (1) अनुचित रीति से तो नहीं कमाया गया है, (2) उसका दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है? इन दो कसौटियों पर कसते हुए धन उपार्जन का जो प्रयत्न किया जायगा वह आत्मा की एक शक्ति ही बनेगा, उससे जीवन की एक महत्वपूर्ण दिशा की उन्नति ही होगी। हमारा लक्ष जीवन की सर्वांगीण उन्नति है। उसके लिए स्वास्थ्य, विद्या, धन, कुशलता, मित्र, समुदाय, यश, मनोबल, आदि सभी बलों की आवश्यकता है। जीवन को हँसी खुशी का बनाने को, उसे आनन्द और उल्लासमय बिताने को, उपरोक्त सातों शक्तियों को बढ़ाना और उपयोग करना आवश्यक है। इन सातों पर ही समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्यों की उपेक्षा करके केवल एक को ही बढ़ाना और उसको भी अवरुद्ध एवं अनुपयुक्त रखना किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। आज अमीर और गरीब सभी इस अनौचित्य के शिकार हो रहे हैं।

धन को जीवन केन्द्र न मान कर उसे अमुक सीमा तक शक्ति रखने वाला एक साधन जब मान लिया जाय तभी यह संभव है कि मनुष्य अपने जीवन का, अन्य दिशाओं का विकास करने की ओर ध्यान दें और स्वस्थ शरीर, परिमार्जित मस्तिष्क, व्यवस्थित व्यवहार, हेल मेल भरी मधुर सामाजिकता, उचित मनोरञ्जन, परमार्थ और लोक सेवा (यश) आत्मिक उन्नति आदि के लिए समुचित प्रयत्न करें। सच्चा धनी उसे ही कहा जा सकता है जिसकी सभी जीवन दिशाएं परिपुष्ट हैं। जो जोड़ने के चक्कर में कोल्हू के बैल की तरह लगा हुआ है, जिसे अन्य कार्यों के लिए फुरसत नहीं उसकी विचार धारा को बीमार ही कहा जायगा, ऐसे बीमारों को अस्पताल की चारपाई पर भले ही न पड़ा रहना पड़े पर वे वस्तुतः सदा उतने ही दुखी रहते हैं जितने कि अन्य रोगों के रोगी।

पाश्चात्य देशों के निवासी बहुत कुछ इस महान् सत्य को समझते जा रहे हैं। और उनकी बढ़ी हुई आमदनी उनकी चौकीदारी की चिन्ता नहीं बढ़ाती वरन् आनन्द उल्लास के साँसारिक और आध्यात्मिक साधन जुटाने में प्रयुक्त होती है। गायत्री की शिक्षा हमारे लिए भी यही है कि हम धन की उपयोगिता के एवं शक्ति के वास्तविक रहस्य को समझें, उसे अधिकाधिक कमावें किन्तु उचित साधनों से ही कमावें। जो कुछ भी थोड़ी और बहुत कमाई हो उसका एक छोटा अंश भविष्य के लिए बचाना भी बुरा नहीं है पर सबसे अधिक ध्यान अपनी आज की अवस्था से ऊँची दशा में उठने के लिए रहना चाहिए। धन की निश्चय ही हमें आवश्यकता है पर इसीलिए कि हमारे वास्तविक अभावों की पूर्ति उससे हो। जो धन अनुपयुक्त रीति से कमाया जाता है और जिसका सदुपयोग नहीं होता वह मनुष्य में घमंड, दुर्व्यसन आदि नाना प्रकार की बुराइयां ही उत्पन्न करता है।


धर्म का तत्व ज्ञान

(लोकमान्य तिलक)

नित्य व्यवहार में धर्म शब्द का उपयोग केवल “पारलौकिक सुख का मार्ग, इसी अर्थ में किया जाता है। जब हम किसी से प्रश्न करते हैं कि ‘तेरा कौन-सा धर्म है?” तब उससे हमारे पूछने का यही हेतु होता है कि तू अपने पारलौकिक कल्याण के लिये किस मार्ग—वैदिक, बौद्ध, जैन, ईसाई, मुहम्मदी या पारसी—से चलता है और हमारे प्रश्न के अनुसार ही वह उत्तर देता है। उसी तरह स्वर्ग प्राप्ति के लिये साधनभूत यज्ञ योग आदि वैदिक विषयों की मीमाँसा करते समय ‘अथातो धर्म जिज्ञासा’ आदि धर्म सूत्रों में भी धर्म शब्द का इतना ही संकुचित अर्थ नहीं है। इसके सिवा राजधर्म, प्रजाधर्म, देशधर्म, जातिधर्म कुलधर्म, मित्रधर्म इत्यादि साँसारिक नीति बोधकों को भी धर्म कहते हैं। धर्म शब्द के इन दो अर्थों को यदि पृथक करके दिखलाना हो तो पारलौकिक धर्म को ‘मोक्षधर्म’ अथवा सिर्फ मोक्ष और व्यावहारिक धर्म अथवा केवल नीति को केवल धर्म कहा करते हैं। उदाहरणार्थ चतुर्विध पुरुषार्थों की गणना करते समय हम लोग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, कहा करते हैं।

महाभारत में धर्म शब्द अनेक स्थानों पर आया है और जिस स्थान में कहा गया है कि ‘किसी को कोई काम करना धर्म-संगत है’ उस स्थान में धर्म शब्द से कर्त्तव्य शास्त्र अथवा तत्कालीन समाज व्यवस्था शास्त्र ही का अर्थ पाया जाता है, तथा जिस स्थान में पारलौकिक कल्याण के मार्ग बतलाने का प्रसंग आया है उस स्थान पर मोक्ष धर्म इस विशिष्ट शब्द की योजना ही है। इसी प्रकार मनु आदि स्मृति ग्रन्थों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के विशिष्ट कर्मों अर्थात् चारों वर्णों के कर्मों का वर्णन करते समय केवल धर्म अर्थ का ही अनेक स्थानों पर कई बार उपयोग किया गया है।

गीता में भी ‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य (गीता. 2-31) स्वधर्में निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः (3-35) आदि कई स्थानों पर धर्म शब्द इस लोक के चातुर्वर्ण्य के धर्म के अर्थ में ही किया गया है।

पुराने जमाने के ऋषियों ने श्रम विभाग रूप चातुर्वर्ण्य संस्था इसलिये चलाई थी कि समाज के सब व्यवहार सरलता से होते जावें। किसी एक विशिष्ट व्यक्ति या वर्ग पर ही सारा बोझ न पड़ने पावें और समाज का सभी दशाओं से संरक्षण और पोषण भली भाँति होता रहे। यह बात भिन्न है कि कुछ समय के बाद चारों वर्णों के लोग केवल जाति मात्रोपजीवी हो गये, अर्थात् सच्चे स्वधर्म को भूल कर वे केवल नामधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र हो गये।

ऊर्ध्व बाहुर्विरौम्येषः न च कश्चिच्छ्रुणोति माम्।

धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्म किं न सेव्यते॥

अरे, भुजा उठाकर मैं चिल्ला रहा हूँ, परन्तु कोई भी नहीं सुनता, धर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है इसलिये इस प्रकार के धर्म का आचरण तुम क्यों नहीं करते हो।

क्या संस्कृत क्या भाषा सभी में धर्म शब्द प्रयोग उन सब नीति नियमों के बारे में किया गया है जो समाज धारा के लिये शिष्ट जनों के द्वारा अध्यात्म दृष्टि से बनाये गये हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर नीति के उन नियमों अथवा शिष्टाचार को धर्म की बुनियाद कह सकते हैं जो समाज धारणा के लिए शिष्ट जनों के द्वारा प्रचलित किये गये हों। और इसलिए महाभारत (अनु 140-157) में एवं स्मृति ग्रन्थों में “आचार प्रभवो धर्मः” अथवा आचारः परमोधर्मः (मनु॰ 1-108) अथवा धर्म का मूल बतलाते समय “वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य प्रियमात्मनः” (मनु॰ 12-2) हत्यादि वचन कहे हैं।

धर्म शब्द की दूसरी एक और व्याख्या प्राचीन ग्रन्थों में दी गई है, यह व्याख्या मीमाँसकों की है। “चोदनालक्षणोंऽर्थों धर्मः” (जै. सू. 1-1-2) किसी अधिकारी पुरुष का यह कहना अथवा आज्ञा करना कि ‘तू अमुक कर’ अथवा ‘मत कर’ ‘चोदना’ यानी प्रेरणा है। जब तक इस प्रकार कोई प्रबन्ध नहीं कर दिया जाता तब तक कोई भी काम किसी को भी करने की स्वतन्त्रता होती है। इसका आशय यही है कि पहले पहल निर्बंध या प्रबन्ध के कारण धर्म निर्माण हुआ। धर्म की यह व्याख्या कुछ अंश में प्रसिद्ध अंग्रेज ग्रन्थकार हाब्स के मत से मिलता है। असभ्य तथा जंगली अवस्था में प्रत्येक मनुष्य का आचरण समय-समय पर उत्पन्न होने वाली मनोवृत्तियों की प्रबलता के कारण हुआ करता है। परन्तु धीरे-धीरे उस समय के बाद यह मालूम होने लगता है कि इस प्रकार का मनमाना बर्ताव श्रेयस्कर नहीं है और यह विश्वास होने लगता है कि इंद्रियों के स्वाभाविक व्यापारों की कुछ मर्यादा निश्चित करके उसके अनुसार करने में ही सब लोगों को कल्याण है, तब प्रत्येक मनुष्य ऐसी मर्यादाओं का पालन कायदे के तौर पर करने लगता है। जो शिष्टाचार से, अन्य रीति से,सुदृढ़ हो जाया करती है। जब इस प्रकार की मर्यादाओं की संख्या बहुत बढ़ जाती है, तब उन्हीं का एक शास्त्र बन जाता है। पूर्व समय में विवाह व्यवस्था का प्रचार नहीं था पहले पहले उसे श्वेत केतु ने चलाया, इसी प्रकार शुक्राचार्य ने मरा पान को निषिद्ध ठहराया। यह ने देखकर कि इन मर्यादाओं को बनाने में श्वेत केतु अथवा शुक्राचार्य का क्या हेतु था, केवल किसी एक बात पर ध्यान देकर कि इन मर्यादाओं के निश्चित करने का काम या कर्त्तव्य इन लोगों को करना पड़ा, धर्म शब्द की ‘चोदनालक्षणोऽर्थों धर्मः’ व्याख्या बनाई गई हैं।

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे राग द्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न वश मागच्छेत् नौ हास्य परि पंथिनौ॥

प्रत्येक इन्द्रिय में अपने-अपने उपयोग अथवा त्याज्य पदार्थ के विषय में जो प्रीति अथवा द्वेष होता है वह स्वभाव सिद्ध है। इनके वश में हमें नहीं पड़ना चाहिये। क्योंकि राग और द्वेष दोनों हमारे शत्रु हैं। तब भगवान भी धर्म का वह फलक्षण स्वीकार करते हैं जो स्वाभाविक मनोवृत्तियों को मर्यादित करने के विषय में ऊपर कहा गया है। मनुष्य की इन्द्रियाँ उसे पशु के समान आचरण करने के लिये कहा करती हैं और उसकी बुद्धि उसके विरुद्ध दिशा में खींचा करती है। इस कलहाग्नि में जो लोग अपने शरीर में संचार करने वाले पशुत्व का यज्ञ करके कृत कृत्य (सफल) होते हैं, उन्हें ही सच्चा याज्ञिक कहना चाहिये और वही धन्य भी हैं।


योगिराज अरविन्द की अनुभूतियाँ

भाषा और कर्म की तरंग से ही काम नहीं चल सकता। उसके साथ ज्ञान का मिश्रण चाहिये। ज्ञान का मिश्रण हुये बिना सब निष्फल हो जायगा। पूर्ण साधनों में ज्ञान और शान्ति है। उसमें कर्म भी है, किन्तु साधारण नहीं, भक्ति भी है। किन्तु चित्तवृत्ति के भाव से उत्पन्न नहीं। कर्म में भक्ति का स्थान है, किन्तु हमें भक्ति एवं कर्म के ऊपर रहना होगा। वहाँ से ही हम शान्ति के आनन्द का अनुभव करेंगे। कर्म एवं भक्ति में भी आनन्द है, किन्तु वह आनन्द शान्ति का आनन्द नहीं है। कारण यह है कि, इनमें पूर्णता नहीं है, इसलिये इनका आनन्द भी शान्ति का आनन्द नहीं। जब कर्म एवं शक्ति को छोड़कर ऊपर निकल जायेंगे, तब जो ज्ञान प्राप्त होगा, उसी में शान्ति का पूर्ण आनन्द है।

किसी प्रकार भी अहंकार नहीं रहने देना चाहिये। बहुतों में सात्विक गर्व रहता है। बाहर से सात्विक अहंकार-राजसिक अहंकार या तामसिक अहंकार की अपेक्षा अच्छा दिखायी पड़ सकता है, किन्तु वास्तव में यह भी अहंकार ही है। सात्विक अहंकार देखने से ही, एक दिन राजसिक या तामसिक अहंकार प्रकट हो सकता है। क्योंकि जहाँ सात्विक अहंकार रहता है, वहाँ राजसिक और तामसिक अहंकार भी भीतर में सूक्ष्म रीति से अलक्षित पड़ा रहता है। राजसिक और तामसिक अहंकार के प्रकट होने पर आपत्ति की मात्रा अधिक हो जाती है। कुशल इसी में है कि, अहंकार बिलकुल रहने ही न पावे—चाहे वह सात्विक अहंकार हो, चाहे राजसिक अहंकार अथवा तामसिक अहंकार कोई भी क्यों न हो।

ध्यान रखते समय बैठा रहने पर चिन्ता-प्रवाह जब कम हो जाय, तब इस ओर पूरी शक्ति लगानी चाहिये। ऐसा करने से भीतर में शान्ति उत्पन्न होगी और उस शान्ति से मानव ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण हो जायगा। उस समय ऐसा मालूम होगा कि ऊपर से ज्ञान-धारा गिरकर मानस में आ रही है। इस प्रकार करते-करते जब साधक विज्ञान में पहुँच जाता है, तब उसकी यह अवस्था विलक्षण नाम से सम्बोधित की जाती है, और इस ज्ञानकोष में जो स्थित अवस्था है, वह स्वभाव कहलाता है। पहले पहल योग की जो अवस्था होती है, उस अवस्था से मनुष्य की अवस्था ही स्वाभाविक होती है। बस इस ज्ञान की अवस्था का नाम ही विलक्षण है, साधारण लोग कर्म की प्रवृत्ति से कर्म करते हैं और योगफलोग यह देखते हैं कि, कर्म के बाद एक महान विराट् भाव रहता है—उसी ज्ञान के अनुभव के सहारे वे कार्य (कर्म) करते हैं।

कर्म से परे जो महान और विराट् भाव रहता है, उसका अनुभव तो होगा ही, उसके बाद और भी अनुभव करना पड़ता है—पुरुष का—उस पुरुष का जो शक्ति से भी परे रहकर कार्य कर रहा है। इस पुरुष का अनुभव होने पर ही पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधना के ज्ञान की तीन अवस्थाएँ हैं। पहली अवस्था है आत्मज्ञान की, दूसरी ब्रह्मज्ञान की और तीसरी है भगवद्ज्ञान की। आत्मज्ञान होने पर यह प्रतीत होने लगता है कि, मैं सब में स्थित हूँ और सब मुझ में स्थित हैं, इसके बाद जब ब्रह्मज्ञान हो जाता है,उस समय यह प्राप्त हो उठता है कि, सब एक है, किसी में भेद नहीं है—और सृष्टि की सारी वस्तुएँ ही ब्रह्म हैं, सबके अन्त में जब भगवद्ज्ञान हो जाता है, तब यह प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने लग जाता है कि, ब्रह्म ही भगवान् हैं, भगवान् सब प्राणियों में हर समय विराजमान रहा करते हैं। उस समय एक विश्व-ज्ञान से साधक परिपूर्ण हो जाता है—संसार में उसे फिर कुछ भी भेद दिखायी नहीं पड़ता। सारा जगत् ही इस समय उसे भगवान्मय दीखने लग जाता है। यह जो हमने विभिन्न ज्ञान की बात कही है, इसमें कौन ज्ञान पहले होता है और कौन पीछे, इसका कोई नियम नहीं है।

एक बात और है। यह है कि, संसार भर के प्रति स्नेह का भाव पूर्ण रीति से हृदय में रक्खो, किन्तु सबके लिये समान भाव से। किसी के लिये कम और किसी के लिये विशेष नहीं। प्राणीमात्र में भगवान क्रीड़ा कर रहे हैं—यह स्मरण रहे। इस ज्ञान में किसी प्रकार की रुकावट पैदा न होनी चाहिये। एक से गम्भीर स्नेह करना ही त्याग है। त्याग और पूर्ण-श्रद्धा होने से ही हृदय की सारी बाधाएँ दूर हो जायेंगी। भगवान् सारी बाधाओं को ध्वंस कर डालते हैं। अधीर या विचलित न होकर स्थिर भाव से निष्ठापूर्वक आगे बढ़ते चलो—जब विज्ञान प्रारम्भ हो जायगा, तब स्वरूप-लाला सिद्ध-रूप से सम्पन्न हो जायगा।

मन के स्थिर और शान्त होने पर ही सत्य का प्रकाश होता है। भगवान् जो स्वयं प्रकाश-स्वरूप कहे जाते हैं, वह बहुत ही ठीक और उचित है। मन के निश्चिन्त और स्थिर हो जाने पर भगवान् अपने-आप ही प्रकाशमान होते हैं, अर्थात्-उनका रूप दीखने लगता है। विज्ञान—मय कोष को वेदों और उपनिषदों में सूर्य-स्वरूप कहा गया है, यह भी बिल्कुल ज्वलन्त सत्य की अनुभूति है। सूर्य वर्ण ज्योति-पुरुष का अनुभव किया भी जाता है। यहाँ पहुँचने पर सब लोग इस स्वरूप का अनुभव करते हैं और कर सकते हैं।

कर्मयोग का प्रवाह भी इसी तरह का है। पहले फलाफल का समर्पण करके, अर्थात्—फलाफल की आशा त्याग कर कार्य करते जाना चाहिये। हृदय में भगवान हैं, ऐसा समझकर उनका स्मरण करते हुये सब कार्यों का आरम्भ करना चाहिये। यथा नियुक्तोऽस्मि। इसमें भी मैं करता हूँ। इसके पश्चात् इस कर्तव्य के अभिमान का भी त्याग (उत्सर्ग) कर देना चाहिये। फल के साथ-ही-साथ कर्म का भी स्मरण करना पड़ता है। सब कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं, इसे पुरुष दृष्टाभाव से देखता रहे। इसमें भी ज्ञानयोग सा वही दृष्टत्व ही आया है। देखोगे कि, वह विश्व भाव की शक्ति, सारी चिन्ताओं, अनुभवों और सृष्टि का सम्पादन करके चल रही है। उस समय एक शान्त, समदर्शी और साक्षी अवस्था प्राप्त होती है।

ऊपर उठना चाहिये, इसके माने यह नहीं हैं कि कोई ठीक स्थान है, उसी जगह यह सब प्रपञ्च छोड़कर उठ जाना होगा। इसका मतलब यह है कि हमारा वर्तमान स्वभाव बड़े ही बुरे स्वभाव का हो गया है, इसलिये उन बुराइयों को दूर करने की आवश्यकता है। वास्तव में सभी वस्तुओं को ब्रह्मत्व और सत्यत्व को लेकर ही हम वर्तमान स्वभाव को छोड़कर उठते हैं—उस समय इसके सब अंगों का असली स्वरूप प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि आगे इस शारीरिक ज्ञान, इस जड़ बुद्धि और देह चैतन्य को छोड़कर उठे बिना सूक्ष्म, सत्य अथवा अध्यात्म—सत्य का कुछ भी अनुभव नहीं किया जा सकता।

पूर्ण विश्वास एवं भक्ति-द्वारा मनुष्य बहुत बड़े-बड़े काम कर सकता है। एक व्यक्ति को पीछे रखकर उस पर निर्भर रह कर मनुष्य उस स्थल पर किसी प्रकार की भावना न करके काम करता जा रहा है, क्योंकि उस व्यक्ति पर कर्म की असाधारण भक्ति है—किसी दिन भी वह यह नहीं सोचता कि, जो कर्म किया जा रहा है, इसका परिणाम क्या होगा एवं इसकी सुदूर-प्रसारित सार्थकता क्या होगी और क्या नहीं। निर्भरता, बहुत ही श्रेष्ठ उपाय है, इसमें कोई सन्देह नहीं, किन्तु इससे मनुष्य कितना आगे बढ़ सकता है, यह विचारने की बात है। और फिर निर्भरता से कर्म ही कितने दिनों तक किया जा सकता है? ऐसी-दशा में इस प्रकार की भी व्यवस्था आ सकती है, जबकि वह पछाड़ खाकर गिर जायगा। इसका कारण यह है कि, इस प्रकार के क्षेत्र में अधिकाँश मनुष्यों की भक्ति तामसिक होती है। इस तामसिक भक्ति को लेकर मनुष्य बहुत दिनों तक अपने कर्म पर दृढ़ नहीं रह सकता, जिस दिन उसकी भक्ति का प्राबल्य कम हो जायगा, उस दिन वह काम पूर्ण-उत्साह और सहायता से करता हुआ आगे बढ़ता रहेगा, उस काम में बिल्कुल शिथिलता आ जायगी और धीरे-धीरे वह काम एकदम नष्ट भ्रष्ट हो जायगा।

कार्य करना भी एक साधना है। अपने जीवन में हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सब भगवान के लिये ही कर रहे हैं, बस ऐसा ज्ञान रख कर या ऐसा समझकर ही कर्म करना चाहिये। कुछ-न-कुछ करना ही चाहिये, ऐसा समझकर जो कुछ सामने आवे उसी में लग जाय, यह कोई उचित बात नहीं है। हमें कर्म करना चाहिये, किन्तु अपनी अन्तरात्मा की पूर्ण आज्ञा से, यों ही नहीं। भीतर से हमें जिस काम करने के लिये जैसी प्रेरणा हों, उसी के अनुसार कर्म करने के लिये हमें तत्पर होना चाहिए। अब यहाँ पर यह समस्या उपस्थित होती है कि, सामने जो बहुत से काम उपस्थित हैं, उनमें कौन-सा काम हमें करना चाहिए, कौन-सा कर्म हमारा निदृष्टि कर्म है, इसी को निश्चय करने की आवश्यकता है।


Quotation

समय की कदर करो। प्रत्येक दिवस एक जीवन है। एक मिनट भी फिजूल न गँवाओ। जिन्दगी की सच्ची कीमत हमारे वक्त का एक-एक क्षण ठीक उपयोग करने में है।”


भगवत् प्रेम का त्रिकोण

(श्री स्वामी जी विवेकानन्द)

प्रेम को एक त्रिकोण के रूप से दिखाया जा सकता है। उसका प्रत्येक कोना मानों उसके एक-एक समूचे रूप को प्रकट करता है। तीन कोने के बिना कोई त्रिकोण नहीं हो सकता, इसी प्रकार तीन गुणों के बिना प्रेम—प्रकृत अथवा सच्चा प्रेम—भी नहीं हो सकता। प्रेम रूप त्रिकोण का एक कोना यह है कि प्रेम में किसी प्रकार का क्रय-विक्रय, लेवा-बेची का भाव नहीं है। जहाँ किसी बदले की आशा रहती है वहाँ सच्चा प्रेम नहीं उत्पन्न हो सकता। वह एक दुकानदारी सी हो जाती है। जब तक हमारे हृदय में भगवान का भय, निश्चित भक्ति और उसकी आज्ञा पालन के बदले में उससे किसी प्रकार वर पाने की इच्छा रहती है तब तक हमारे हृदय में प्रकृत-प्रेम पैदा नहीं हो सकता। जो लोग कुछ पाने की आशा से भगवान् की उपासना करते हैं वे वर-प्राप्ति की आशा न रहने पर उपासना न करेंगे, किन्तु भक्त तो भगवान् को प्रेमास्पद जान प्रेम करता है।

प्रकृत भक्त के इस देववाँछित प्रेमोच्छ्वास में कोई और स्वार्थ नहीं होता। एक कथा है कि किसी समय वन में एक राजा की एक साधु से भेंट हुई। थोड़ी ही देर बातें करने पर साधु की पवित्रता और ज्ञान का परिचय पाकर राजा को सन्तोष हुआ और राजा ने साधु को कुछ देना चाहा और प्रार्थना की कि मुझे कृतार्थ करने के लिये कुछ ग्रहण कीजिये। किन्तु साधु ने स्वीकार नहीं किया और कहा—”वन के फल मेरे भोजन के लिये बहुत हैं, पर्वत से निकला हुआ पवित्र जल मेरे पीने को काफी है, पहनने को पेड़ों की छालें बहुत हैं और रहने को पर्वत-कन्दरा यथेष्ट है, फिर मैं क्यों आपसे या किसी से कुछ लेने लगा।” राजा ने फिर विनय की और कहा—”भगवान्, मुझे कृतार्थ करने के लिये ही मेरे हाथ से कुछ ग्रहण कीजिये, मेरे साथ राजधानी में पधारिये।” बहुत अनुरोध के बाद साधु राजा के साथ गया। राजा साधु को कुछ दान देने के पहले उससे बार बार वर माँगने लगा—”प्रभो, मेरा शरीर नीरोग रहे” इत्यादि। राजा की प्रार्थना समाप्त होने के पहले ही साधु चुपचाप उठकर जाने लगा। यह देखकर राजा चकित हो गया तथा उसके पीछे-पीछे चला और पुकारने लगा-”महात्मन्, जा रहे हो? मेरा दान नहीं ग्रहण किया!’ साधु ने उसकी ओर फिरकर कहा-अरे भिखमंगे, मैं भिखमंगे से भिक्षा नहीं लेता। तुम स्वयं एक भिक्षुक हो, तुम मुझे क्या दे सकते हो? मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ कि तुम्हारे जैसे भिक्षुक से भिक्षा लूँ। जाओ, मेरे पीछे न लगो।”

इस उदाहरण में भिक्षुक और भगवान् के सच्चे प्रेमी का अच्छा भेद दिखलाया गया है, और तो क्या, मुक्ति प्राप्ति के लिए भगवान् की उपासना करना भी अधर्म बताया गया है। प्रेम किस फलाभ की आकाँक्षा नहीं रखता। प्रेम केवल प्रेम के लिए ही होता है। भक्त भगवान् से प्रेम इसलिए करता है कि वह प्रेम किये बिना रह ही नहीं सकता। तुम एक सुन्दर प्राकृतिक दृश्य देखकर उससे प्रेम करने लगते हो, तुम इस दृश्य से कुछ माँगते नहीं हो और न दृश्य ही तुमसे कुछ प्रार्थना करता है। दृश्य के दर्शन से हृदय में आनन्द का उदय हो जाता है, यह आनन्द अशाँति दूर करके मन को शान्त कर देता है और एक प्रकार क्षण भर के लिए नश्वर प्रकृति से बाहर ले जाकर स्वर्गीय आनन्द से आनन्दित कर देता है। प्रेम का यह भाव ऊपर कहे हुए त्रिकोणात्मक प्रेम का एक कोना है। प्रेम का बदला मत चाहो, बस केवल देते चले जाओ, भगवान को अपना प्रेम दो, पर उससे भी इसके बदले में कुछ न चाहो।

प्रेम रूप त्रिकोण का दूसरा कोना यह है कि प्रेम में किसी प्रकार का भय नहीं है। जो भगवान् को भय से प्रेम करते हैं वे अधम मनुष्य हैं। उनमें मनुष्यत्व का अभी तक भी विकास नहीं हुआ। वे दण्ड के भय से भगवान् की उपासना करते हैं। उनका ख्याल है कि भगवान् एक बड़े आदमी हैं, उनके एक हाथ में सोटा और दूसरे में चाबुक है, उनका हुकुम न मानने से डंडा पड़ने लगेगा, दण्ड के भय से की हुई उपासना के नाम से ही पुकारना हो तो कहना पड़ेगा कि यह प्रेम की अत्यन्त अविकसित अवस्था है। जब तक हृदय में किसी प्रकार का भय बना हुआ है तब तक प्रेम का विकास कैसे हो सकता है? प्रेम स्वभाव से ही सम्पूर्ण भय को नाश कर देता है। मान लीजिए एक माता रास्ते में खड़ी है, किसी कुत्ते के भूँकते ही वह डरी और पास घर में चली गयी। किन्तु सोचिये, यदि माँ के साथ उसका बच्चा होता और सिंह बच्चे के ऊपर झपट पड़ता तो माँ कहाँ जाती? अवश्य सिंह के मुँह में आ जाती। प्रेम वास्तव में सम्पूर्ण भय का नाश कर डालता है। कहीं संसार से नाता टूट जायगा, ऐसे ही किसी स्वार्थ-भाव से भय उत्पन्न होता है।

हम अपने को जितना ही अधिक तुच्छ और स्वार्थी बना लेंगे, हमारा भय भी उतना ही अधिक हो जायगा। यदि कोई सोचे कि मैं कोई चीज नहीं हूँ, तो अवश्य वह भय भीत होगा। मनुष्य अपनी तुच्छता को जितना कम सोचेगा उतना ही उसका भय कम हो जायगा। जब तक तुममें तनिक सा भी भय बना हुआ है तब तक तुम में प्रेम नहीं रह सकता। प्रेम और भय दो विपरीत भाव हैं। जो भगवान् से प्रेम करता है वह कभी उससे भयभीत नहीं होता। सच्चा भगवत्-प्रेमी ‘भगवान् का नाम वृथा न लेना, -यह आदेश सुनकर हंस पड़ता है। प्रेम-धर्म में भगवन् निन्दा का क्या काम? किस रूप में हो, भगवान् का नाम जितना ले सको, उतना ही भला है। तुम उसे चाहते हो इसी से उसका नाम जपते हो।

प्रेम रूप त्रिकोण का तीसरा कोना यह है कि प्रेमी का कोई दूसरा प्रेम पात्र न रहे, क्योंकि वही प्रेमी का सर्वोच्च आदर्श होगा। जब तक प्रेमपात्र सबसे ऊंचे आदर्श के रूप में नहीं देख पड़ता तब तक प्रकृत प्रेम नहीं उत्पन्न होता। हो सकता है कि अनेक स्थलों में मानवीय प्रेम असत् मार्ग में जा रहा हो, किन्तु प्रेमी के लिये उसकी प्रिय वस्तु ही सर्वोच्च आदर्श होती है, कोई तो अत्यन्त नीच मनुष्य में अपने उच्च आदर्श को देखता है और कोई अत्यन्त उच्च मनुष्य में। किन्तु सर्वत्र ही प्रकृत और प्रगाढ़ रूप से अपने आदर्श को प्यार किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के उच्चतम आदर्श को ही ईश्वर कहते हैं। ज्ञानी, अज्ञानी, साधु, असाधु, पुरुष, स्त्री, शिक्षित अशिक्षित-मनुष्य मात्र का उच्चतम आदर्श ईश्वर है। सम्पूर्ण सौंदर्य, महत्व और शक्ति के उच्चतम आदर्शों के मिले हुए रूप में प्रेममय और प्रेमास्पद भगवान् का पूर्ण भाव पाया जाता है। ये आदर्श किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति के मन में स्वभावतः वर्तमान हैं और ऐसे वर्तमान हैं कि मानों मन के अंग या अंश विशेष बन गये हैं। मानव प्रकृति में जिन क्रियाओं का विकास देख पड़ता है वे सब आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में परिणत करने की चेष्टा-स्वरूप हैं।

समाज में जितने काम और आन्दोलन होते हुए देख पड़ते हैं वे सब केवल भिन्न-भिन्न आत्माओं के भिन्न-भिन्न आदर्शों को कार्य में परिणत करने की चेष्टाओं के परिणाम हैं। जो भीतर है वह बाहर आना चाहता है। मानव-हृदय में आदर्शों का यह प्रबल प्रभाव ही सर्वानयंत्री महाशक्ति है, उसकी क्रिया मानव-जाति में सदा होती रहती है। सम्भव है सैकड़ों जन्म में सहस्रों वर्ष तक चेष्टा करने पर मनुष्य यह समझ सके कि आभ्यन्तरिक आदर्श बाहर की अवस्थाओं के साथ पूर्णरूप से नहीं मिल सकता। किन्तु जब समझ जायगा तब बाह्य जगत् को अपने आदर्श के अनुसार गढ़ने की चेष्टा छोड़ देगा और उच्चतम प्रेम के साथ अपने आदर्श की उपासना आदर्श रूप में करना प्रारम्भ कर देगा। वह समझ लेगा की अन्य सब आदर्श इस आदर्श के भीतर ही हैं।


प्रतिभा का प्रकाश

(श्री भगवती प्रसाद जी श्रीवास्तव)

जीवन-संघर्ष में सफलता प्राप्त करने के निमित्त अकेले बुद्धि-कौशल या योग्यता का सहारा नहीं लिया जा सकता। अपने आसपास आप अनेक ऐसे लोगों को पायेंगे जो बुद्धि या योग्यता की दृष्टि से कुछ अधिक ऊँचे नहीं है, फिर भी अपने क्षेत्र में उन्होंने विशेष सफलता प्राप्त कर ली है जब कि अनेक लोग जो विद्वता में उन लोगों से कहीं श्रेष्ठ हैं, जीवन में असफलता ही प्राप्त कर सके हैं। प्रायः लोगों का ख्याल है कि व्यक्तित्व प्रकृति की देन है जिसके बनाने बिगाड़ने में हमारा कोई हाथ नहीं है।

तो क्या व्यक्तित्व निरे प्रारब्ध की बात है? फिर तो प्रकृति ने जिसे इस अमूल्य वरदान से वंचित रखा है, उसे सदैव के लिए जीवन में सफलता प्राप्त करने की आशा त्याग देनी चाहिए। अथवा व्यक्तित्व ऐसा गुण है जिसका विकास हम अध्यवसाय और लगन द्वारा प्राप्त कर सकते हैं? आधुनिक मनोविज्ञान ने व्यक्तित्व का विश्लेषण भलीभाँति किया है— किन्तु व्यक्तित्व वास्तव में है क्या वस्तु? इस प्रश्न पर विचार करने के पूर्व अच्छा होता है कि हम एकाध दृष्टान्त पर गौर करें।

ट्रेन में आप यात्रा कर रहे हैं। बीसियों मनुष्य डिब्बे में बैठे हैं—कोई समाचार पत्र पढ़ रहा है, कोई लेटा हुआ है तो कोई बैठे-बैठे ही ऊँघ रहा है। इतने में कोई चर्चा वहाँ छिड़ती है और उतने सब लोगों में एक व्यक्ति ऐसा निकलता है जो वहाँ के वार्तालाप का केन्द्र बन जाता है। बरबस सबका ध्यान उसी की ओर आकृष्ट हो जाता है—मानो वार्तालाप की कुँजी उसके हाथ में ही हो, अन्य लोग थोड़ा थोड़ा योग मात्र दे पाते हैं। निस्सन्देह उस मनुष्य में व्यक्तित्व वाला मनुष्य सहज ही अपने विशेष गुणों द्वारा अन्य लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेने की क्षमता रखता है। अपने व्यक्तित्व के बल पर ही वह प्रायः जिस काम को हाथ में लेता है, उसे पूरा करता है। उसे हर कहीं सफलता ही स्वागत करने को तैयार रहती है।

आधुनिक मनोविज्ञान ने इस सिलसिले में विशेष रूप से छान बीन की है। व्यक्तित्व के निर्माण के लिए यह आवश्यक नहीं कि किसी विशेष क्षेत्र में हद दर्जे का कमाल हासिल किया जाय। व्यक्तित्व के निर्माण के लिए आवश्यक यह है कि मनुष्य की प्रतिभा का सर्वतोमुखी विकास किया जा सके। ऐसे व्यक्ति का मानसिक संतुलन पूर्णतया निर्दोष होता है। बुद्धि, कौशल या औरों को चमत्कृत करने वाले गुणों की भी व्यक्तित्व के विकास के लिए कोई विशेष आवश्यकता नहीं। क्योंकि अनेक व्यक्ति इन गुणों के बावजूद भी जीवन के संघर्ष की दौड़ में पीछे ही रह जाते हैं—क्योंकि उनके अन्दर व्यक्तित्व का अभाव रहता है। वास्तव में निर्विवाद रूप से यह प्रमाणित किया जा चुका है कि व्यक्तित्व का विकास प्रयत्न करने पर हासिल किया जा सकता है क्योंकि अनेक छोटे-छोटे किन्तु महत्वपूर्ण गुणों के समष्टि रूप से परस्पर मिलने पर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इच्छा शक्ति का विकास, अध्ययन, एकाग्रचित्त होना, प्रबल स्मरण शक्ति, समय-पालन तथा आत्म नियन्त्रण इनमें मुख्य हैं।

इच्छा-शक्ति और एकाग्रचित्त होने का अभ्यास ये दोनों ही गुण परस्पर घनिष्ठ सूत्र द्वारा संबद्ध हैं। इच्छाशक्ति को प्रबल बनाने के निमित्त आवश्यक है कि एकाग्रता पर पूर्ण नियन्त्रण हासिल करना सीखा जाय। इसके लिए एक सहज तरकीब यह है कि प्रतिदिन नियमित रूप से एक निश्चित अवधि के किसी खास काम को करने लगिये—निर्दिष्ट समय पर उस काम में अवश्य लग जाइये, आपकी तबियत उस काम को करना न चाहे तब भी बरबस उस काम में आप लगे ही रहिए। आपका मन इधर-उधर सैकड़ों प्रलोभनों की ओर भागेगा, किन्तु आपको तो उसे बाँधकर ही रखना होगा। कुछ ही दिनों के अभ्यास के उपरान्त आप पायेंगे कि आपका मन आपका सेवक है— वह आपके अंकुश के नीचे रहता है। हर्षातिरेक, क्रोध, भावावेश, आह्लाद आदि पर काबू पाना इच्छा-शक्ति की प्रौढ़ता के लक्षण हैं। इन प्रवृत्तियों पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करने वाला ही अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठा सकता है। वरना जिन्दगी के हर साधारण प्रलोभन से डिग जाने वाले व्यक्ति तो असफलता की बेड़ी ही पैरों में डाले हुए जीवन-यापन करते हैं। व्यक्तित्व के विकास में स्मरण शक्ति का योग भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। क्षीण स्मरण शक्ति वाला मनुष्य प्रायः ऐसी ही परिस्थितियों में पड़ जाता है। जब कि उसकी स्मरण शक्ति की कमी उसके व्यक्तित्व को हलका बना देती है—सभ्यजनों के बीच वार्तालाप में अचानक वह रुककर भूली हुई बात को अपने मस्तिष्क के कानों में टटोलने लग जाता है। कालेज का प्रिंसीपल अपनी उत्तम स्मरण शक्ति की सहायता से यदि कालेज के प्रत्येक विद्यार्थी के नाम की याद रख सकता है तो सहज ही वह कालेज के विद्यार्थी-समाज में सर्वप्रिय बन जाता है। स्मरण शक्ति को सुदृढ़ बनाने के निमित्त एक आसान सा प्रयोग किया जा सकता है। रात को सोने से पहले नियम बना लीजिए कि दिन भर की घटनाओं का विस्तृत विवरण क्रम-बद्ध रूप में आप लिखेंगे। एक आध महीने के उपरान्त आप पायेंगे कि आपकी स्मरण शक्ति काफी प्रौढ़ हो गयी है। स्मृति की सहायता के लिए दिन भर के काम के लिए प्रातः में ही एक सूची बना लीजिये और प्रयत्न कीजिए कि सूची के सभी कामों को आप दिन में पूरा कर सकें।

व्यक्तित्व के विकास में आत्म-नियन्त्रण को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। विचारशील व्यक्ति आत्म नियन्त्रण को भी पहचानता है—क्षणिक आवेश में आकर वह अपने मस्तिष्क का संतुलन खोता नहीं है। हर्ष या शोक के ज्वार-भाटे उसकी जीवन-नौका को न बहुत ऊँचा फेंक सकते हैं, न उसे नीचे ही गिरा पाते हैं। आत्म-नियन्त्रण की सहायता से वह अपने अन्दर सम्भाव का सृजन कर लेता है। ऐसे मनुष्य का व्यक्तित्व जीवन की उथल-पुथल में एक दृढ़ चट्टान की भाँति अचल बना रहता है। अवश्य आत्म नियन्त्रण का अभ्यास करने की निमित्त मनुष्य को निरन्तर प्रयत्नशील तथा जागरुक बना रहना पड़ता है। जीवन के हर क्षेत्र में पग-पग पर मनुष्य के आत्म-नियन्त्रण की जाँच होती रहती है।

व्यक्तित्व के निर्माण में अच्छे स्वास्थ्य के बिना आप कभी सफल नहीं हो सकते। थोड़े ही परिश्रम से थककर बैठ जाने वाला मनुष्य अपने आस पास के लोगों पर अपने व्यक्तित्व, असर भला डाल ही कैसे सकता है? आत्म-नियन्त्रण, इच्छा-शक्ति पर विजय प्राप्त करना, एकाग्रता आदि के गुण जो व्यक्तित्व की आधारशिलाएं हैं, अच्छे स्वास्थ्य के अभाव में कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। अतः स्वास्थ्य के प्रति उदासीन रहकर आप अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकते। अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ तथा शुद्ध वायु, सही ढंग का और समुचित मात्रा में भोजन, यथोचित व्यायाम तथा पर्याप्त विश्राम आवश्यक है। स्वास्थ्य के ये नियम सभी को मालूम हैं; किन्तु कुछ इने गिने लोग ही इन नियमों का पालन करते हैं। स्थानाभाव के कारण कुछ अधिक इनके सम्बन्ध में यहाँ लिखा नहीं जा सकता, किन्तु चेतावनी के रूप में इतना अवश्य कहूँगा कि व्यायाम अपनी सामर्थ्य के अनुकूल ही होना चाहिये, वरना अत्यधिक श्रम-युक्त व्यायाम स्वास्थ्य के लिए हानिकर साबित हो सकता है। वयस्क पुरुषों के लिए सबसे उपयुक्त व्यायाम प्रातः तथा शाम को खुली हवा में टहलना है। इस सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का दृष्टान्त हमारे सामने है। काम के बोझ से दबे-रहने पर भी महात्मा गान्धी का टहलने का क्रम कभी नहीं टूटा।

ऊँचे दर्जे का व्यक्तित्व हममें से प्रत्येक हासिल कर सकता है किन्तु इसके लिये उसे प्रतिक्षण जागरुक तथा प्रयत्न शील बनना पड़ेगा।


चारित्रिक दृढ़ता

(महात्मा जेन्स ऐलन)

सत्यवादी अपने अंगीकृत दैवी नियमों से विचलित नहीं होता। रोग, दारिद्रय, दुःख, मित्र-विछोह स्थानाच्युति—इन सब आपत्तियों के अतिरिक्त, यदि उसे मौत का भी सामना करना पड़े तो वह अपने सच्चे तथा न्याय-पथ से नहीं डिगता। सब पाप समूहों से बढ़कर यदि कोई वस्तु अधिक दुःखद भयावह और त्याज्य है तो वह है “नियम-च्युति”। यदि सच्चे नियम से तुरन्त सुन्दर, स्वास्थ्य, द्रव्य तथा आराम न मिले और इस कारण कोई दैवी नियम से मुख मोड़ कर परीक्षा के समय में कायर बनता है—भय, वासना, तथा दुष्ट अन्तःवेगों का दास हो जाता है तो—वह अपना आत्मपतन करता है। यह सब दोषों से बढ़कर दोष और सब पापों से बढ़कर पाप है।

हम रोग और मृत्यु से छूट नहीं सकते। यद्यपि बहुत काल तक हम उनसे बचते रहते हैं, किंतु अन्त में उसके शिकार हो जाते हैं। परन्तु हम दुष्कर्म से बच सकते हैं। हम डर तथा कायरता को दूर कर सकते हैं। जब हम दुष्कर्म का त्याग कर भय को हटा देंगे, तब जीवन के घोर पाप-कर्म हमारे पास आने पर भी हमें विचलित न कर सकेंगे—पराजित होने के कारण उनसे जी चुराने के स्थान पर हम उन्हें पूर्ण रूप से उन्हीं के घर में उन पर विजय प्राप्त कर चुके रहेंगे।

बहुत से लोगों का कहना है कि पर-रक्षार्थ कुकर्म करना उचित है। अर्थात् परोपकारार्थ झूठ बोलना अच्छा है अथवा दूसरे शब्दों में यों कहिये कि कठिन परीक्षा काल में सत्य का त्याग करना उचित है। उच्च कोटि के अत्यन्त उदात्त पुरुष, सिद्ध तथा ऋषिगण ऐसी बातों का समर्थन नहीं करते। क्योंकि दिव्य चक्षु वाले महात्मा इस बात को भली भाँति जानते हैं कि कोई भी परिस्थिति, किसी दुष्कर्म को सुकर्म का रूप नहीं दे सकती और वे यह भी समझते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते। दुःख की अपेक्षा कुकर्म अधिक पापमय है। असत्य बोलना मृत्यु से भी बढ़कर भयावह और विनाशकारी है। पीटर अनुचित कार्य द्वारा अपने स्वामी की रक्षा करना चाहता था, इस पर महात्मा ईसा ने उसे बहुत धिक्कारा। कोई भी बुद्धिमान पुरुष यथा अवसर दूसरे का नैतिक पतन कराकर अपने जीवन की रक्षा कभी न चाहेगा।

सब धर्मों को एक दृष्टि से देखने वाले मनुष्य का आदर और प्रशंसा सभी करते हैं। जो स्त्री और पुरुष कुकर्म, कायरता और असत्य से डरकर दुःख और मृत्यु का सामना करते—कठिन परीक्षा-काल में अपने निश्चित समय पर दृढ़ तथा शान्त खड़े रहे—और जिस समय शत्रुगण उनको निरुत्साही करने के लिये उनकी हँसी उड़ाकर उन पर ताना मारते थे और प्रेमीगण अपने अश्रु तथा दुःखद शब्दों द्वारा आपत्ति के चंगुल से निकलने के लिए उनसे प्रार्थना करते थे—वे अपने स्थान पर खड़े रहे, पीछे कदम नहीं हटाए। क्योंकि उन्हें यह काफी अच्छी तरह ज्ञात था कि अखिल विश्व का कल्याण तथा मोक्ष उनकी अन्तिम परीक्षा पर ही निर्भर था। इसीलिए वे धर्मरूपी पर्वत की और सर्व मानवजाति की रक्षा तथा उन्नति करने वाली शक्ति के केन्द्र की भाँति, आवश्यक काल तक दृढ़ रहे। परन्तु जिसने अपने अभिन्न प्रेमियों के लिए असत्य का आश्रय लिया— उसका नाम कहीं सुनाई तक नहीं पड़ता। क्योंकि उस निश्चित पथ से विचलित होते ही उसकी शक्ति नष्ट हो गई। यदि उसका नाम कोई लेता भी तो उस असत्य के लिए नहीं। उसे लोग कायर समझते हैं और संकेत करते हैं कि यह कठिन परीक्षा काल में असफल रहा। उच्चतम धर्म के आदर्श की दृष्टि से, सब समय में सब लोग उसे ठुकराते चलते हैं।

यदि सब लोगों का विश्वास होता कि कठिन परिस्थितियों से असत्य बोलना उचित है तो स्वधर्मार्थत्यक्त जीवित मनुष्य तथा ऋषि कभी न होते। मनुष्य जाति का नैतिक जीवन समूल नष्ट हो गया होता और संसार-उसे विश्वव्यापी अन्धकार में टटोलता फिरता।

जो मनुष्य परोपकारार्थ अनुचित कर्म को उचित समझता है—उसके दृष्टिकोण में खिन्नता, दुःख और मृत्यु की अपेक्षा, दुष्कर्म तथा असत्य उपेक्षणीय पाप हैं। परन्तु धर्मात्मा के लिये दुष्कर्म और असत्य अति महान पाप हैं। इसीलिये अपने तथा दूसरों के लाख प्रयत्न करने पर भी वह इन बुराइयों के पास नहीं फटकता।

सुख तथा वैभव के समय में सब लोग दृढ़व्रती होने की डींग हाँकते हैं। परन्तु जब दुःख उनको पकड़ता—दुर्भाग्यमय अँधेरा उन्हें घेरता है और कठिन परिस्थितियाँ अपने भार से उन्हें दबाना चाहती हैं—तभी उनके परीक्षा का समय होता है। इसी समय में यह भली भाँति निश्चित हो जाता है कि वह सत्य का पुजारी है या स्वार्थमय वासनाओं का दास।

आवश्यक समय पर नियम हमारे मुक्ति के साधन होते हैं। उस समय यदि हम उन्हें ठुकरा देते हैं तो स्वार्थ-जन्य दुःख तथा मायाजाल से छुटकारा कैसे होगा?

तात्कालिक दुःख से बचने के लिये अथवा कोई पाप छिपाने के लिये जो आत्म-विरोधी कार्य किया जाता है, उससे दुःख तथा पाप की वृद्धि होती है। भला आदमी दुःख से बचने की चिन्ता में उतना नहीं रहता जितना पाप-कर्म से छुटकारा पाने में। हमारे आनन्द की बाजी लगते ही, नित्य तथा रक्षक नियम को त्याग कर, न तो हम कोई कौशल दिखाते हैं और न रक्षा का ही प्रबन्ध करते हैं। यदि हम प्रेम के लिये श्रेय को छोड़ते हैं, तो यह श्रेय और प्रेम दोनों से हाथ धो बैठेंगे। परन्तु यदि हम प्रेम की तिलाँजलि दे दें तो श्रेय-जन्य शान्ति से हमारे दुःख की शान्ति हो जायगी। यदि हम अच्छी चीज देकर बुरी चीज खरीदते हैं, तो हम मनस्ताप तथा असारता (शून्यता) का बलिदान करेंगे। अनन्त तथा अनित्य के त्यागने से हमें शरण कहाँ मिलेगी? परन्तु यदि हम तुच्छ वस्तु के बदलें श्रेष्ठ वस्तु को लेते हैं, तो श्रेष्ठ-वस्तु-जन्य बल और सन्तोष के हम भागी होंगे! हम पूर्ण आनन्द को प्राप्त करेंगे। जीवन के पापों तथा चिन्ताओं से विलग होने पर सत्य की आश्रय-शिला पर हमें स्थान मिलेगा।

जीवन के सब परिवर्तनों के बीच की नित्यता को पाना—और सर्व परिस्थितियों में इसको अपनाये रहना ही सच्चा आनन्द है। यही मुक्ति तथा अन्तिम शान्ति है।


जाकी रही भावना जैसी

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

एक बार एक अदालत में एक स्त्री ने एक युवक पर मुकदमा दायर किया था और कारण यह बताया था कि अमुक व्यक्ति उसको बड़े अजीब ढंग से निहारता है। वह हत्या कर सकता है तथा अन्य कुछ हानि युवती को पहुँचा सकता है। युवक के चरित्र की पुलिस ने छानबीन की तो ज्ञात हुआ कि वह साधारण मानसिक स्थिति वाला निर्मल चरित्र व्यक्ति था, जिससे किसी प्रकार के अपराध की आशा नहीं की जा सकती थी। मुकदमा खारिज कर दिया गया था।

जब उस युवती का मनः विश्लेषण किया गया तो ज्ञात हुआ कि वह स्वयं ही सन्देह वृत्ति से ग्रसित थी। वह स्वयं दूसरों में हत्या, भय, सताने की वृत्ति, चोरी, डकैती, खूँरेजी, अपवित्रता, व्यभिचार, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिहिंसा इत्यादि की घृणित भावनायें आरोपित किया करती थी। चूँकि उपरोक्त दुर्गुण स्वयं उसकी कमजोरियाँ थीं, वह दूसरों में इन्हीं की प्रतिच्छाया देखा करती थी। उसे सभी लोग खराबियों से परिपूर्ण दुर्बल चरित्र वाले दिखाई देते थे।

दूसरों में हम प्रायः उन्हीं गुणों की परछांई देखते हैं, जो वास्तव में स्वयं हमारे अन्तःकरण में गुप्त रूप से मानसिक ग्रन्थियों के रूप में निवास करते हैं। यदि हम सावधानी से अपने मनः क्षेत्र के गहन गह्वर की परीक्षा करें तो हमें विदित हो सकता है कि हमारे गुप्त मन में किस प्रकार के विचारों की भावना ग्रन्थियाँ विनिर्मित हो चुकी हैं।

मालूम कीजिये कि दूसरों-अपने आस-पास के व्यक्तियों, जान पहचान वालों, नये व्यक्तियों, भाई-बहिनों, परिचितों, विद्यार्थियों, ग्राहकों के विषय में आपके मन में कैसे विचार आते हैं। क्या आप उनके प्रति नेकी और भलाई की बात सोचते हैं या ईर्ष्या, द्वेष, फरेब की परछांई आती है? यदि वे संकट में हों तो क्या आप उनकी सेवा और सहायता को प्रस्तुत होंगे, या हाथ झाड़कर दूर खड़े हो जायेंगे? यदि वे अकेले में मिल जायें तो क्या आप उन पर प्रहार करेंगे या प्रेम के दो शब्दों से हँस कर स्वागत करेंगे? यदि उन्हें किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो, तो क्या आप उनकी सहायता को प्रस्तुत करेंगे? इन प्रश्नों पर निष्पक्षता से विचार करने पर आपको आरोप की वृत्ति का ज्ञान हो जायेगा। आपको यह मालूम कर आश्चर्य होगा कि अनेक व्यक्तियों को हम योंही बिना पर्याप्त कारण के घृणा करते हैं। हम अपने दुर्गुण उनमें आरोपित कर उन्हें रुचि-अनुसार भला बुरा बनाया करते हैं। दूसरों के चरित्र के विषय में हमारे निर्णय सदैव हमारी गुप्त मन में बसी हुई मान्यताओं से स्वचालित होते रहते हैं।

महात्मा गाँधी जी पर दो बार घातक प्रहार हुआ था। जिस व्यक्ति ने प्रथम बार उनकी हत्या का प्रयत्न किया था उसे गाँधी जी ने माफ कर दिया। वे यह समझ ही नहीं सकते थे कि कोई व्यक्ति उनके प्रति दुर्भाव रख सकता है। चूँकि वे स्वयं सज्जन पुरुष थे, सदा सर्वदा दूसरों की नेकी और भले का ही ख्याल रखते थे।

आरोप की प्रवृत्ति मनुष्य की एक दुर्बलता है, जो सही विचार एवं तर्क में बाधा स्वरूप खड़ी हो जाती है। अनेक व्यक्तियों में यह कुछ के प्रति बड़े अत्याचार का कारण बन जाती है। भारत में भंगी, चमार, कोली, भील इत्यादि निम्न जातियों के प्रति जो घृणा और तुच्छताओं की भावनायें हैं उनका कारण एक प्रकार से आरोप ही हैं। पशुओं में सूअर के प्रति बड़ा अत्याचार देखने में आता है। मुहल्ले टटियाँ, गन्दगी, सड़ी गली चीजें जिन्हें खाकर सूअर सफाई में योग पहुँचाते हैं, उनकी ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। मनुष्य के संचित आरोप उनकी इस घृणा का कारण हैं।

अधिक विकसित होकर आरोप की प्रवृत्ति क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिशोध, घृणा, लोभ, जनित भयंकर मानसिक जटिल मानस रोगों में प्रस्फुटित होती है। मनुष्य को अपने इर्द-गिर्द सभी अपने शत्रु, दुष्ट, पापी, खूनी, हत्यारे, चोर, डाकू प्रतीत होते हैं। उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी उसका बुरा चाहते हों, उससे प्रतिशोध लेने को समुत्सुक हों, सदा उसी की टीका-टिप्पणी करते हों और हाथ धोकर उसके पीछे पड़ गये हों। वह स्वयं असंख्य शंकाओं, दुश्चिन्ताओं, कल्पित भय, कायरता, अंतर्द्वंद्व, आवेश से उद्विग्न हो उठता है। घर में, उद्यान में, सभा सोसाइटी में, बाजार में, कभी भी उसे मानसिक सन्तुलन प्राप्त नहीं होता। उसका जीवन एक विडम्बना बन जाता है।

तुलसीदास जी ने भक्तों पर भगवान राम का दर्शन वर्णन करते हुए एक स्थान पर निर्देश किया है-

‘जाकी रही भावना जैसी।

प्रभु मूरति देखी तिनतैसी॥”

प्रभु एक हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न, रुचि प्रकृति स्वभाव वाले भक्तों को प्रभु की भिन्न-भिन्न आकृति और रूप दृष्टिगोचर हुए। विद्वानों को विद्वान भक्त और शक्तिवालों को वे शक्ति के अवतार दिखाई देते हैं। मूल अभिप्राय भावना की विभिन्नता ही है। जैसी जिसकी भावना, वैसा उसका दर्शन। यही बात संसार के विषय में भी लागू होती है। इस त्रिगुण जगत् के अनन्त भण्डार में सत, रज, तम आदि अनेक प्रकार के गुण अवगुण भरे पड़े हैं, किन्तु मनुष्य अपनी भावना के अनुसार उनकी प्रतीति करता है।

हम जैसे अन्दर से स्वयं हैं, हमारा बाह्य संसार भी वैसा ही है। जिनकी भावना भीतर से भलाई, सचाई, प्रेम, सहानुभूति, करुणा, शील, सौहार्द, वात्सल्य, सद्भाव की ओर झुकी हुई है, उसे उसके संसार में इन्हीं दैवी गुणों का बाहुल्य प्रतीत होता है। वह सर्वत्र उत्तम पवित्र वस्तुओं के ही दर्शन करता है। दूसरों की भलाई की ओर ही देखता है। उसके संसार में ये ही सत्य गुण फलित पुष्पित होते हैं। दुर्भाव की विषबेल नहीं उगती। वह सर्वत्र प्रेम वितरण करता है, परिवर्तन में वही भाव दुगना चौगुना प्राप्त करता है।

महात्मा ईसा को सूली पर ले जाया गया। रूढ़िवाद तथा अज्ञान के अन्धकार में फँसी हुई जनता उनके दिव्य दर्शनों को समझ नहीं पा सकी थी। मृत्यु से पूर्व उनके मुख से ये शब्द निकले, “मेरे प्रभु! इन लोगों को क्षमा करना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।” ईसा के इन वचनों में कितना मर्म भरा हुआ है! उनकी ममता, प्रेम, सहानुभूति की अजस्र धारा प्रवाहित हो रही है। जनता मूर्ख है। वह धर्म का मर्म नहीं समझती। वह ईसा को धर्म का शत्रु मान बैठी है क्योंकि उनके गुप्त मन में हिंसा, विद्वेष, क्रोध, प्रतिशोध के भयंकर कीटाणु बैठे हुए हैं। लेकिन उदार हृदय ईसा अपनी सद्भावना फिर भी बखेर रहा है। ईसा! तुम धन्य हो!

पर छिद्रान्वेषण आज का प्रमुख दुर्गुण है। अमुक व्यक्ति ऐसा है, वैसा है। झूठ बोलता है, चोरी करता है, ईर्ष्या, द्वेष, बैर में फँसा हुआ है। समाज का शत्रु है। उससे इतनी हानि हो रही है। इत्यादि बातें कोई भी व्यक्ति दूसरों के विषय में कह देते हैं। ऐसी टीका टिप्पणी करने वाला व्यक्ति ये बातें उच्चारण करते हुए केवल दूसरों की ओर ही दृष्टिपात करता है, जबकि ये समस्त दुर्गुण स्वयं उसी के गुप्त संस्कारों में जटिलता से बैठे रहते हैं। वह यह नहीं सोचता कि दूसरों की आलोचना करने वाला वह स्वयं कितने दुर्गुणों, पापमय दीपक के नीचे स्वयं कितना अन्धकार एकत्रित है?

एक पाश्चात्य विचारक का कथन हैं कि यदि सज्जन कहलाने वाले व्यक्तियों के समस्त दोष प्रकट हो सकें, (जोकि उसके गुप्तमन, अन्तःकरण में छुपे रहते हैं) तो हममें से प्रत्येक व्यक्ति इतने अंशों में दोषी है कि उसे फाँसी की सजा मिल सकती है। अन्दर से हम सब नानाप्रकार के पापमय संकल्पों एवं गुप्त अनुभवों से भरे रहते हैं। चूँकि उनके पाप ढके रहते हैं जब तक लोग हमें सज्जन समझते हैं। प्रकट होने पर इन्हीं पापमय संकल्पों के कारण हम भयंकर से भयंकर सजा के अधिकारी हो सकते हैं।

इस कथन में गहरी सत्यता है। हममें से सबके पास एक बड़ा जरूरी कार्य करने के लिए मौजूद है—स्वसंस्कार अर्थात् हमें सर्वप्रथम भावनाओं की सफाई करनी चाहिए। यह बड़ा कठिन कार्य है। इसकी प्राप्ति के दो ही उपाय हैं। (1) आत्म-नियन्त्रण, (2) दीर्घकालीन अभ्यास। प्रथम तो यह कि जब किसी के प्रति मन में कुसंस्कार उदित हों तो ठीक उनके विपरित मैत्रीभाव द्वारा, दुर्भाव का निराकरण द्वारा आत्मशुद्धि का उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य हो सकता है। दुर्भावों से युद्ध करना उनके स्थान पर दया, प्रेम, सहानुभूति का पालन करना हमारी साधना का प्रधान अंग होना चाहिये। जिसने इस ओर पग उठाया है, उसने जीवन में एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। सबके प्रति सद्भाव, मित्रभाव, प्रेम, सहानुभूति, सेवा, सहायता की मनोवृत्ति आन्तरिक शान्ति प्रदान करने वाली अवस्था है। मैली भावना के अभ्यास से मानव दिन रात अमित सुख का अनुभव करता है, रात्रि में मीठी नींद सोता है; बुरे स्वप्न नहीं देखता, सबका प्रिय हो जाता है; अमानव दुष्टों का भी प्रिय होता है, देवता उसकी रक्षा करते हैं; अग्नि, विष या हथियार तक से उसे हानि नहीं पहुँचती, शीघ्र ही उसे समाधि लग जाती है, उसका आकार सदा प्रसन्न रहता है। बिना किसी अंतर्द्वंद्व के मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि वह अर्हन्त पद तक नहीं पहुँच पाता तो अवश्य ही वह ब्रह्म लोक में जन्म लेता है।

सबसे मित्रता, सबका कल्याण, सबकी भलाई प्रेम की भावना से जब मानव का अंतःकरण परिष्कृत हो उठता है, तो उसके शुभ भावों की विद्युत् तरंगें समीप के वातावरण को भी विशुद्धता, पवित्रता से भर देती हैं। जब हम दूसरों का भला चाहते हैं तो हम सबको प्रेममय, मित्र सखा के रूप में देखने लगते हैं। किसी के प्रति दुर्भाव, ईर्ष्या, द्वेष का होना ही अशान्त, ईर्ष्यामय अन्तर्द्वन्द्वपूर्ण जीवन बिताना है। सद्भावना न केवल कर्त्ता को सुख शान्ति प्रदान करती है वरन् समीप के व्यक्तियों में भी उसी भाव को विस्तृत कर स्वार्थ, दुष्कर्म एवं संकुचिता से मुक्त करती है।


श्रद्धा तथा स्नेह

(सुश्री शुभा कुमारी महेन्द्र एम. ए. (प्री.)

श्रद्धा और स्नेह, मानव-मन में प्रवाहित एक भाव सरिता की दो निर्मल धाराएं हैं। पारस्परिक विभिन्नता होते हुए भी दोनों ही हृदय की रागात्मक प्रवृत्तियाँ हैं। श्रद्धा अधिक व्यापक है तो स्नेह कुछ सीमित। श्रद्धा समष्टि से सम्बन्धित है तो स्नेह व्यष्टि प्रधान है। स्नेह व्यक्तिगत रुचि और पारस्परिक परिचय पर पलता है, श्रद्धा के लिये ऐसा स्नेह नियम नहीं।

श्रद्धा का उद्भव-

श्रद्धा वह सात्विक, पूज्य एवं आनन्द भाव है जो किसी व्यक्ति विशेष में किन्हीं असाधारण, असामान्य एवं महत्वपूर्ण गुणों से साक्षात्कार होने पर हृदय में उदित होता है। किसी व्यक्ति की शालीनता, विद्वत्ता, वाक् विदग्धता, धर्मज्ञता अथवा इसी प्रकार के अन्य गुणों को असामान्य रूप में देख कर हृदय विचित्र रूप से प्रभावित होता है और यह प्रभाव अनन्तः आनन्दानुभूति में परिणित हो जाता है। किसी अप्रत्याशित, अनुचित एवं आपत्तिजनक व्यवहार के अभाव में यह आनन्द-भाव हृदय की एक स्थायी सम्पत्ति का रूप धारण कर लेता है। हमारा समस्त स्नेह, सारा सम्मान, निस्वार्थ सद्भावनाएँ और समस्त शुभकामनाएँ ऐसे श्रद्धेय जन के लिए सुरक्षित हो जाती हैं। हृदय में संचरित यही स्नेह-सम्मान, यही उल्लास भाव, यही परमहत्व स्वीकृति, यही पूज्य बुद्धि का संचार, यही निस्वार्थ अनुराग सम्बन्ध-श्रद्धा है।

यह है श्रद्धा का साधारण स्वरूप, किंतु इससे अधिक उच्च एवं व्यापक रूप में श्रद्धा मन की वह आध्यात्मिक, उच्च एवं गम्भीर है। एक विद्वान के शब्दों में “श्रद्धा मन का वह भाव है जो मनुष्य की उत्कृष्ट विचार-बुद्धि को अनन्त की ओर, अज्ञात, अगोचर, परात्पर की ओर प्रेरित करता है और चेतना को उस सूक्ष्म जगत् की ओर ले जाता है जहाँ सभी पूर्ण हैं और स्थूल, दृश्यमान वस्तु से भी कहीं बढ़कर सत्य है। यह मन की वह अवस्था है जो ज्ञानपूर्ण है क्योंकि वह सदा चैतन्य बुद्धि और प्रकाश के उच्चतम शिखर पर आसीन रहता है”। श्रद्धा ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है, इहलोक और परलोक में श्रद्धा ही उसकी वास्तविक प्रतिष्ठा है। गीता का अमर सन्देश है—

“सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः”

मनुष्य को श्रद्धा सम्पन्न होने की प्रेरणा देता है। श्रद्धा की प्रेरणा से निष्काम भाव से किये गये कर्म, ध्यान, सेवा, सत्संग मनुष्य के हृदय-जगत को पवित्र एवं शुद्ध बना देते हैं, ज्ञान-सूर्य के प्रकाश से वह आलोकित हो जाता है। तब श्रद्धा ईश्वर प्राप्ति का साधन बन जाती है। मनुष्य का प्रथम और प्रधान कर्तव्य है आत्मा को उन्नत बनाना। प्रभु का कथन है :—

‘उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानवसादयेत्’

पूर्ण-प्राप्ति की ओर उन्मुख कर श्रद्धा मानव आत्मा की उन्नति के महान कार्य में पूर्ण योग देती है।

श्रद्धा विश्वास की चरम सीमा है उसकी अग्रिम स्थिति है। अटल प्रतीति तथा दृढ़ विश्वास श्रद्धा को जीवन देता है। यही आत्म-प्रतीति और पर-प्रतीति श्रद्धा की प्रेरक है। श्रद्धा प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखती, वह निःस्वार्थ स्नेह-भाव है जो स्वार्थियों और अभिमानी, संकुचित एवं मलिन हृदय को अपना उद्गम स्थल नहीं बना सकती। श्रद्धा का मूलभाव है पर-महत्व-स्वीकृत, किन्तु दर्पपूर्ण, दम्भी एवं अभिमानी हृदय ऐसी महत्व-स्वीकृति की अभ्यस्त नहीं। श्रद्धा सलिल-सरिता उसके हृदय की मरुभूमि में प्रवाहित ही कैसे हो सकती है? उसका उदय तो ऐसे कर्मों के प्रतिकार में होता है जिनका शुभ प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष पर ही नहीं समस्त मनुष्य समाज पर पड़ता है। स्वार्थी व्यक्ति को ऐसी आनन्दपूर्ण कृतज्ञ-भावना की अपेक्षा नहीं जो केवल समाज के प्रतिनिधि रूप में प्रकट की जा सकती है।

स्नेह की सुकुमार भावना-

मानव-हृदय की द्वितीय सुकुमार रागात्मक प्रकृति है स्नेह। स्नेह को प्रेम की पवित्र और निस्वार्थी अनुजा कहें तो अनुचित न होगा। मनुष्यों के विविध पारस्परिक सम्बन्धों के साथ प्रीति का रूप भी परिवर्तित होता है। माता-पिता और शिशु के मध्य का प्रीति-सम्बन्ध वात्सल्य कहलाता है, भाई बहिनों, मित्रों और अन्य परिचितों के मध्य का रागात्मक सम्बन्ध स्नेह है तथा प्रिय-प्रेमी और युवक-युवती के मध्य का सुकोमल स्नेह सम्बन्ध प्रेम है। यों स्नेह एक व्यापक सा शब्द है और समस्त प्रीति सम्बन्धों को स्वयं में समेटने का क्षमता रखता है। स्नेह और प्रेम दोनों में कौन अधिक महत्व पूर्ण है यह एक विवाद ग्रस्त विषय है। भाई बहिन और परिचितों के मध्य का स्नेह भाव, माता, शिशु, पति पत्नी या प्रिय प्रेमी के प्रेम से कम सरस और कह सकते हैं कम मादक भी नहीं है। यह कभी नहीं कहा जा सकेगा कि इस प्रकार के स्नेह और उस प्रकार के प्रेम में कौन अधिक सुखद और उपयोगी है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि उस प्रकार के प्रेम की गहराइयों में जाने वाले बहुत हुए हैं और इस प्रकार के स्नेह की गहराइयाँ अभी बहुत कम खोजी गई हैं।

श्रद्धा के समान स्नेह भी हृदय का राग प्रधान भाव है किन्तु दोनों में महान विभिन्नता है। स्नेह श्रद्धा से हल्की वस्तु है। वह व्यक्ति प्रधान है तो यह कर्म प्रधान। श्रद्धा में दृष्टि पहले कर्मों की प्रकृति से टकराती है, स्नेह किसी विशिष्ट व्यक्ति या विशेष वस्तु के प्रति उत्पन्न होने वाला वह रागमय भाव है जो पारस्परिक परिचय और परस्पर सान्निध्य के पश्चात् हृदय में जाग्रत होता है। व्यक्तिगत रुचि पारस्परिक परिचय और पारस्परिक निकट-सम्बन्ध स्नेह की जीवनदायिनी शक्तियाँ हैं। ब्रज की ग्वालिनें जब माता यशोदा से आग्रह करती हैं।

‘नैक गोपाल मोको दैरी’

तो व्यक्तिगत परिचय के कारण ही तो। किन्तु श्रद्धा ऐसी व्यक्तिगत परिचय और सान्निध्य की अपेक्षा नहीं रखती। हमारे ही बापू के प्रति आज विश्व के सैकड़ों, हजारों, लाखों ही नहीं करोड़ों व्यक्तियों की अपार श्रद्धा है किन्तु इन असंख्य नर नारियों में से संभवतः मुट्ठी भर ही ऐसे मिलेंगे जिनका बापू से व्यक्तिगत परिचय हो, निजी संपर्क रहा हो। योगी अरविंद का नाम लेते ही राष्ट्रीयता के आचार्य, बंग भंग विरोधी आन्दोलन के प्रचंड नेता, नवयुवकों में नवीन जीवन फूँकने वाले आदर्शवादी, मानव आत्मा में बसी सनातन आध्यात्मिक प्यास का बुझाने में प्रयत्नशील महान कर्मयोगी का जो चित्र नेत्रों के सम्मुख चित्रित हो उठता है हृदय उसके सम्मुख स्वतः ही श्रद्धानत हो उठता है, किन्तु हम भारतीयों में से ही कितने इतने भाग्यशाली हैं जिन्होंने उस महान् विभूति के कभी दर्शन भी किये हों। स्नेह लतिका के सिंचन के लिये जिस परिचय जल की आवश्यकता है वह श्रद्धा लतिका के लिये निरर्थक है।

स्नेह शील हृदय प्रतिदान की आकाँक्षा रखता है। स्नेह तभी टिक सकेगा जब दोनों ओर से स्वभावतः ही यह उत्पन्न हो। तभी वह पुष्प में समाई सुरभि के समान स्थायी रह सकता है। एकाँगी स्नेह मरुभूमि में वर्षा के समान निरर्थक सिद्ध होगा। श्रद्धा एक सामाजिक भावना है इसलिए हम श्रद्धेय से अपनी श्रद्धा के विनियम में कुछ नहीं चाहते। स्नेहशील व्यक्ति अपने स्नेह भाजन पर एक अधिकार सा अनुभव करता है अपने स्नेह सूत्र में उसे बाँधकर रखना चाहता है। वह उसके हृदय में प्रवेश पाकर उसमें समाने की चेष्टा करता है, उसके अन्तः स्थल में एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान सुरक्षित कर लेने में प्रयत्नशील रहता है। श्रद्धावान व्यक्ति श्रद्धेय पर किसी ऐसे अधिकार का विचार तक नहीं कर पाता और श्रद्धेय भी व्यक्तियों के हृदय में प्रवेश पाने की क्या कामना करेगा?

आज विश्व की विशेष विषम स्थिति को सुलझाने में मानव-मन की ये दोनों रागयुक्त भावनाएं श्रद्धा एवं स्नेह अद्भुत योग दे सकती हैं। श्रद्धा मानव-जाति को स्वार्थ एवं सस्ते साँसारिक सुखों की पूर्ति के हेतु सर्वनाश की सड़क पर सरपट दौड़ने से रोक कर उसे विश्व-कल्याण और प्रगति के प्रशस्त पथ की ओर उन्मुख कर सकती है। विशुद्ध स्नेह भाव मानव-मन में विश्व-बन्धुत्व, निस्वार्थ पारस्परिक प्रेम, सद्भावना और अगाध विश्वास को जन्म देगा। श्रद्धा और स्नेह मनुष्य के मानस नेत्रों के सम्मुख सत्य के उस निगूढ़ सत्य को प्रदर्शित कर सकेंगे, जिसका ज्ञान उसे सभी प्रकार की दुर्बलताओं से मुक्त कर सकेगा और तब क्या हम विश्वशान्ति और विश्व-संघ सरकार की संस्थापना के स्वप्नों को साकारता नहीं दे सकेंगे?


शिक्षा सुधार के लिए कुछ उपयोगी सुझाव

(श्री राम लौटन प्रसाद जी अध्यापक, बीकानेर)

भारत माता को स्वाधीनता प्राप्त हो जाने के पश्चात् जो सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य राष्ट्र के मुख है वह है—”शिक्षा”। शिक्षा को ही किसी देश का मेरुदंड कहा जा सकता है। इसी आधारशिला पर उसकी उन्नति अवनति निर्भर रहती है। भावी पीढ़ी को जैसा कुछ भी बनाना हो वैसी ढालने के लिए शिक्षा पद्धति ही साँचे का काम देती है।

अंग्रेजों की गुलामी की जड़ें भारत में गहरी जमाने का प्रयत्न करते हुए मैकाले महोदय ने शिक्षा का विधान ऐसा बनाया था जिससे उस साँचे में ढले हुए नवयुवक केवल नौकरी करने के ही लायक रहें। वे जानते थे कि शिक्षा पद्धति ही किसी समाज का मेरुदण्ड होता है। इस तथ्य को हमें भी भली भाँति समझ लेना है और अपने राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए शिक्षा सम्बन्धी समस्याओं पर समुचित ध्यान देना है।

यों तो अंग्रेजों से विरासत में मिली हुई वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अनेक त्रुटियाँ हैं परन्तु उसका एक दम परिवर्तन होना कठिन है। अतएव उसमें जो सुधार सरल एवं अधिक आवश्यक हों उनकी ओर शीघ्र ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ ऐसे ही सुधारों की चर्चा इस लेख में की जा रही है।

पाठशाला में प्रवेश करते समय बालक की आयु 6 वर्ष से कम न हो, यदि वह 7 वर्ष का हो और भी अच्छा। क्योंकि इससे छोटी आयु में शिक्षा का दबाव पड़ने से बालक के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता।

पाठ्यक्रम में व्यावहारिक जीवन संबन्धी जानकारियों को स्थान अवश्य दिया जाय, जिससे विद्यार्थी को स्वास्थ्य, यात्रा, शिष्टाचार, रेल, डाक, तार,व्यापार तथा राजकीय नियमों की आवश्यक जानकारी हो जाय।

(3)परीक्षा में उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण होना वार्षिक परीक्षाओं पर निर्भर न रहे। वरन् विद्यार्थी के कार्य की मासिक प्रगति के विवरण के आधार पर उसे उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण किया जाय।

(4) प्राइवेट परीक्षाओं में किसी प्रकार की अड़चन न हो। जिससे अन्य कार्य करते रहकर भी शिक्षा में उन्नति करने की हर किसी को सुविधा रहे।

(5) सब प्रान्तों में एक ही प्रकार का पाठ्य क्रम हो जिससे एक प्रान्त के विद्यार्थी को दूसरे प्रान्त में जाने पर दाखिला सम्बन्धी कोई अड़चन न हो।

(6) पाठ्य क्रम में पुस्तकों का बहुत भारी बोझ न रहे। वरन् थोड़ी किन्तु उपयोगी पुस्तकें ही रखी जावें।

(7) लड़के और लड़कियों की सम्मिलित शिक्षा न हो विशेषता तथा वयस्क बालक बालिकाओं का पठन पाठन तो पृथक स्कूलों में ही होना चाहिए।

(8) छात्रों और अध्यापकों की आदतें वेशभूषा तथा अनुशासन प्रियता पर कड़ाई से ध्यान दिया जाय। उच्छृंखलता को शिक्षा के क्षेत्र से बहिष्कृत किया जाय। सफाई, सादगी, सदाचार, शिक्षाचार और सेवा भाव को पुरस्कृत एवं प्रशंसित किया जाय।

(9) बालकों का सामान्य ज्ञान बढ़ाने के अधिक साधन उपस्थित किये जायं। इसके लिये एक अध्यापक एवं घंटा स्वतंत्र रूप से भी रखा जाना चाहिए।

(10) अध्यापक की आयु 25 वर्ष से कम न हो यदि वह 30 वर्ष रखी जाय तो और भी अच्छा। शिक्षकों को उनके स्वास्थ्य के अनुसार 60-65 की आयु तक काम करने दिया जाय।

(11) अध्यापकों को वेतन इतना दिया जाय कि वे आर्थिक चिन्ताओं से दुःखी न रहकर शान्त चित्त से शिक्षण कार्य में मन लगा सकें। उनके स्थान परिवर्तन किसी अनिवार्य कारण से ही हों, अन्यथा उन्हें अपनी सुविधा के एक स्थान पर जम कर काम करने दिया जाय।

(12) स्कूलों पर उत्तम निरीक्षण की सुव्यवस्था रहे। शिक्षा की प्रगति पर उच्च अधिकारी कड़े निरीक्षण की व्यवस्था रखें, जिससे कहीं ढील पोल न चलने पावें।

(13) शिक्षा शुल्क, इतना कम हो कि उसे साधारण श्रेणी के लोग भी आसानी से उठा सकें। असमर्थ एवं होनहार बालकों के लिए विशेष सुविधाओं की उदार व्यवस्था रहे।

(14) प्रत्येक स्कूल में ईश्वर प्रार्थना के उपरान्त ही शिक्षा कार्य प्रारम्भ किया जाय। प्रार्थनाओं में कर्त्तव्य पालन, सदाचार एवं लोक सेवा की बुद्धि देने की प्रार्थनाओं को प्रधानता दी जानी चाहिए।

(15) पाठ्य पुस्तकें बार बार बदलने से शिक्षकों, विद्यार्थियों तथा पुस्तक बनाने वालों को असुविधा होती है। पुरानी पुस्तकें रद्दी हो जाने से कागज आदि का व्यर्थ ही अपव्यय होता है और पुरानी पुस्तकें खरीद कर काम चलाने की सुविधा से गरीब विद्यार्थी वंचित हो जाते हैं। इसलिए पाठ्य पुस्तकें बहुत सोच समझ कर चुनी जायं जो चुन ली जायं वे बार बार बदली न जाय।

(16) सरकारी धन उच्च शिक्षा पर अधिक व्यय होने की अपेक्षा प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का अधिक व्यय होना चाहिए।

(17) स्कूलों में औद्योगिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो।

(18) लड़कियों की शिक्षा में उनके भावी जीवन से सम्बन्ध रखने वाली जानकारियों का आवश्यक समावेश रहे।

(19) अशिक्षित प्रौढ़ स्त्री पुरुषों के लिए भी उनकी सुविधा के समय का ध्यान रखते हुए पाठशालाएँ खोली जायं और उनका पाठ्यक्रम उनकी स्थिति के अनुकूल रखा जाय।

(20) स्कूलों का वातावरण प्राचीन गुरु कुलों जैसा सात्विक बनाने का प्रयत्न किया जाय जिसकी अच्छी छाप पड़ने से बालक बड़े होने पर राष्ट्र के सुयोग्य एवं प्रतिष्ठित नागरिक सिद्ध हो सकें।

यह सुझाव ऐसे हैं जो साधारण होते हुए भी अपना विशेष महत्व रखते हैं। सरकार को, शिक्षा विभाग के, विद्वानों के एवं प्रत्येक अभिभावक के इन सुझाव एवं सुधारों पर मनोयोग पूर्वक विचार करना चाहिए। यदि उन्हें कार्यान्वित किया जा सका तो शिक्षा क्षेत्र में उत्साहवर्धक स्थिति उत्पन्न हो सकती है, राष्ट्र निर्माण के लिये इन सुझावों पर विचार किया जाना उचित दिशा में कदम उठाना सिद्ध होगा।


धर्ममय समाज

(श्री शचीन्द्र नाथ सान्याल)

आधुनिक शिक्षित जन के मन से धर्म के विरुद्ध एक संस्कार-सा बनता जा रहा है। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त अधिकाँश व्यक्ति धर्म का नाम सुन ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। जब राजनीति के क्षेत्र में धर्म की भावना को मिलाया जाता है, तब वे अधीर हो जाते हैं, और कहने लगते हैं, कि बस अब चौपट हो गया, वे ही पुरानी बातें फिर आई जिनके कारण भारत का अधःपतन हुआ।

धर्म की तरह धर्माधीशों और मठाधीशों के प्रति जनसाधारण के मन में एक प्रकार के विरोध की भावना बनी हुई है। ऐसा होने का एक विशेष कारण है।

जिस दिन से हम धर्म को समाज से एक भिन्न वस्तु समझने लगे, सामाजिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति, विधि-व्यवस्था, आदि से धर्म को अधिक महत्व देने लगे, परमार्थ- साधन को ऐहिक साधन से भिन्न एवं श्रेष्ठ लगने लगे, उस दिन से न हमारी धार्मिक साधना ही उत्कर्ष को प्राप्त हुई और न व्यावहारिक जीवन में ही हमने उन्नति प्राप्ति की, जिस दिन से संसार को अविद्या समझकर हम उसकी उपेक्षा करने लगे, और सामाजिक निष्क्रियता को ही धार्मिक जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्षण समझने लगे, जिस दिन से पार्थिव ज्ञान को अविद्या मान कर उसे हेय समझने लगे और इस अभिव्यक्त संसार से अपने को भिन्न समझकर पारमार्थिक विद्या को ही एकमात्र विद्या समझने लगे, उस दिन से हमारा समाज, हमारा धार्मिक जीवन धन- तमसावृत हो गया, उस दिन से हमारी दुर्गति प्रारम्भ हुई और उस दिन से हम समाजनीति और राजनीति से अलग होने लगे। उसी दिन यह निश्चय हो गया कि हमारा देश पराधीन हो जायगा और धार्मिक जीवन में भी हम अधःपतित हो जायेंगे।

आज के दुर्दिन में हम देखते हैं कि आलसी, निर्जीव, स्वार्थपरायण, अज्ञान में डूबा हुआ व्यक्ति धर्म की दुहाई देकर राजनीति और समाज-सेवा से अपने को दूर रखते हैं और मदमत्त होकर दूसरे को यह उपदेश देते हैं कि ‘धर्म के साथ राजनीति का क्या सम्बन्ध? स्वार्थी व्यक्ति ही अपना काम बनाने के लिये राजनीति में भाग लिया करते हैं और अपने को बड़े-बड़े नेता समझने लगते हैं’। फिर जग अधिकारी राज-पुरुषों की खुशामद करने से कुछ स्वार्थ सिद्धि होती है, तब यही धर्मध्वजी गण प्राचीन संस्कृति की दुहाई देकर राष्ट्रीयता-विरोधी संस्थाओं में जाकर सम्मिलित होते हैं और जिस राजनीति से उन्हें घृणा थी, उसी राजनीति में जाकर घृणित मार्ग का अवलम्बन करते हैं। इससे उनका अपना भी अकल्याण होता है और समाज का भी।

यथार्थ में ऐसे व्यक्तियों के कारण ही प्राचीन संस्कृति आज लुप्त होने जा रही है। यथार्थ में आज हम आधुनिक विज्ञान से भी परिचित नहीं हैं और प्राचीन संस्कृति से भी हाथ धो बैठे हैं। प्राचीन संस्कृति में इह लौकिक साधना को छोड़कर केवल पारलौकिक साधना को ही महत्व नहीं दिया गया है। इस तत्व को भूलने से ही आज हम अन्धकार में पड़े हैं। इसका संकेत यजुर्वेद में भी दे दिया गया है। ईशोपनिषद् इसी यजुर्वेद का एक अध्याय है। ईशोपनिषद् के नवें श्लोक में इसी बात का संकेत है—

अन्धं तमः प्रविशन्ति य्रेऽविद्यामुपासते।

ततो भूय इव ते तमो यउ विद्यायाँ रवाः॥9॥

अर्थात्— जो अविद्या में रत रहते हैं, वे घोर अन्धकार को प्राप्त होते हैं, और जो केवल विद्या की ही आराधना करते हैं, वे और भी भीषण अन्धकार में निमज्जित होते हैं। इसका सबसे ज्वलन्त दृष्टान्त आधुनिक भारत है, समाज से धर्म को अलग करने से अथवा धर्म को समाज से अलग करने से ऐसी घोर दुर्दशा में निमज्जित होना पड़ता है। धार्मिक जीवन और सामाजिक जीवन को हम अलग-अलग रूप में देखने लगे थे, इसीलिये आज हम न धार्मिक जीवन का ही लाभ कर सके हैं और न सामाजिक जीवन में ही विजय को प्राप्त कर सके हैं।

परा और अपरा—दोनों विद्याओं में हमें पारदर्शी होना है। इहलोक और परलोक—इन दोनों लोकों के विज्ञान से हमें अच्छी तरह परिचित होना है। एक को छोड़ कर दूसरे की उपासना करने से हम इहलोक और परलोक दोनों से गिर जायेंगे; इसका भी संकेत ईशोपनिषद् में ही ग्यारहवें श्लोक में किया गया है—

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वोदोभयं सह।

अविद्यया मृत्युँ तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥11॥

अर्थात्- जो व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को ही तत्व के अंतर्गत समझता है, वही मृत्यु को लाँघ कर अमृतत्व को प्राप्त करता है ।

इसी प्रकार हमारे श्रुति- स्मृति आदि ग्रन्थों में सामाजिक जीवन और धार्मिक जीवन को समग्र रूप में देखने की चेष्टा हुई है। मानव का जो सर्वोत्कृष्ट परिपूर्ण आदर्श है उसमें सामाजिकता और धार्मिकता का अपूर्व समन्वय है। इस समन्वय से हम गिर गये हैं, इसीलिये हमारी दुर्दशा का अन्त नहीं है।

आज हमने एक महान् युगसन्धि के मुहूर्त में जन्म ग्रहण किया है। एक युग का अन्त और दूसरे युग का उदय होने वाला है इसलिये एक ओर तो अधःपतन के लक्षण दिखाई दे रहे हैं और दूसरी ओर अभ्युदय के। इसी से हम भविष्य के अरुणोदय की प्रतीक्षा में दिन बिता रहे हैं। हमें आशा है,विश्वास है, हम जानते हैं कि इसकी प्रेरणा से यह संसार अभिव्यक्त हुआ है, जिसकी प्रेरणा से संसार में नित्य नव-नव परिवर्तन होते रहते हैं, जिसकी प्रेरणा से बड़े-बड़े साम्राज्य का ध्वंस होता है और जिसकी प्रेरणा से सबकी आँखों की ओट में नवीन धर्मराज्य सहसा उदय होकर सबको अचम्भे में डाल देता है, उस फलीलायम की अव्यर्थ प्रेरणा से बेचैन होकर समाज-सेवा की वासना सबके मन में आज जागृत हो रही है।

आज इस अरुणोदय के दिन हम सामाजिक और धार्मिक आदर्शों को भिन्न रूप में नहीं देख पाते हैं। आज समाज की सेवा धर्मबुद्धि के साथ ही करनी है और धार्मिक जीवन में सामाजिकता को साथ लेकर ही चलना है। सामाजिक जीवन में धर्म को छोड़कर चलने से हमें पाश्चात्य की तरह दुर्भोग भोगना पड़ेगा और धर्म की दुहाई देते हुए यदि हम सामाजिक जीवन से अलग हो जाते हैं, तो भी हमें विनाश को ही प्राप्त होना पड़ेगा। यही प्राचीन संस्कृति का सन्देश है।


निर्जीव और सजीव आहार

(डॉ. युगल किशोर जी चौधरी, एन. डी.)

जिन्दा अथवा जीवित वस्तु ही जीवन प्रदान कर सकती है ऐसा प्रकृति का नियम है। हर एक भोज्य पदार्थ के विषय में भी यही नियम लागू होता है।

अगर आज हम अपनी थाली या मेज पर रोजाना खाई जाने वाली खुराक की जाँच करेंगे तो निश्चय हो जायगा कि उनमें 80 या 90 फीसदी खुराक मुर्दा खुराक है। इसकी पहचान यह है कि आप उस अनाज को जमीन में बोवें वह न उगेगा, क्योंकि उसके प्राण नष्ट हो चुके हैं।

मनुष्य सृष्टि के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है इस लिए ईश्वर ने सबसे ऊँचे दर्जे का आहार मेवा, फल, शाक, कंद मूल, हरा कच्चा अन्न, दूध आदि पदार्थ उसके लिए बनाये हैं। कहा जाता है कि आदम इस भोजन पर दृढ़ रहा परन्तु ईवा इस स्वाभाविक भोजन को छोड़कर अभक्ष्य भक्षण करने लगी और परिणाम में बीमार रहने लगी। स्वयं हमारे पाप ही हमारे लिए दण्ड स्वरूप बन जाते हैं।

मुर्दा भोजन से कभी प्राण स्थिर नहीं रह सकते यह रसायन शालाओं के प्रयोगों से भली भाँति सिद्ध हो चुका है। हम थोड़ी बहुत मात्रा में जीवित भोजन तैयार करते हैं इसीलिए अपने जीवन को कायम रखने में समर्थ हो रहे हैं।

यद्यपि हमारी थाली में कुछ न कुछ फल, मेवा, हरा शाक, कच्चा दूध आदि जीवित पदार्थ कुछ मात्रा में रहते हैं परन्तु सर्वसाधारण इतनी अधिक मात्रा में मुर्दा खुराक खाते हैं कि उनको पोषण तो बहुत कम मिलता है और मल मूत्र बहुत अधिक बनता है और अधिकाँश पदार्थ बेकार चले जाते हैं। इतना होने पर भी यह ठीक न होगा कि सदा से पके हुए अन्न आदि खाने वाले एक दम उन्हें छोड़कर कच्चा स्वाभाविक आहार करने लग जाएं, ऐसा करना अनुचित होगा। शरीर एकदम कच्चे आहार का आदी न हो सकेगा और अनेक शिकायतें पैदा हो जायेंगी। आग से आपकी मुर्दा खुराक खाने वाले स्वस्थ दीर्घजीवी हो सकते हैं परन्तु वे लोग अगर स्वाभाविक कच्चे आहार पर गुजारा करते तो न जाने कैसे नीरोग, सुन्दर निष्पाप व दीर्घ जीवी होते।

जिन रोगियों की जठराग्नि लगभग नष्ट होने वाली है जैसा किसी तेज बीमारी के बाद होता है या जो हालत पुराने रोगों के अन्त में हुआ करती है, ऐसे समय कम लोग कच्चे भोज्य पदार्थों को स्वाभाविक रूप में नहीं खिलाते बल्कि हम समय फलों का रस अथवा हरे कच्चे शाक आदि का रस निकाल कर रोगियों को देते हैं और जब यह उन्हें पचने लगते हैं तब फल व शाक आदि खिलाते हैं। इसके बाद धीरे धीरे पके हुए पदार्थ बिलकुल बन्द कर दिये जाते हैं और ज्यों-ज्यों शरीर आदी होता जाता है एक दम सभी आहार कच्चा स्वाभाविक अवस्था में देने लगते हैं।

इन प्रयोगों से धीरे धीरे बिलकुल क्षीण, नष्ट प्रायः जठराग्नि भी फिर से लौट आती है और फिर से अपना काम ठीक करने लग जाती है, यहाँ तक कि असाध्य मरणासन्न रोगी भी पुनः स्वास्थ्य लाभ कर लेते हैं और बहुत से तो बाद में जाकर बड़े ही तन्दुरुस्त, हट्टे-कट्टे बन जाते हैं, अलबत्ता उनका कोई अंग या भाग जो बिलकुल ही नष्ट हो चुका हो वह शायद फिर पहले जैसा न भी बने।

हर एक वैज्ञानिक कच्चे और पकाये हुए पदार्थों के अन्तर या भेद को भली भाँति जान सकता है कि गर्मी से पदार्थों का स्वभाव सर्वथा बदल जाता है। आग से पक जाने पर टमाटर उतने गुणदायक नहीं रहते जितने की कच्चे, परन्तु उबाले हुए भी खाये जा सकते हैं। टमाटर बड़े ही आरोग्य दायक होते हैं और उनमें विटामिन काफी मात्रा में पाये जाते हैं। फलों में प्रत्यक्ष अमृत है और ताजे फलों में सब रोगों को दूर करने की शक्ति होती है, परन्तु उन्हें अप्राकृतिक रूप से पकाने व उबालने पर वे प्राण रहित मुरदा हो जाते हैं। यह बात नहीं है कि फलों को आग में सेंकने या पकाने से वे हानिकर हो जाते हैं अर्थात् वे सारहीन, गुणहीन बन जाते हैं।

बहुत समय आग से पकी हुई मुरदा खुराक खाते रहने से हमारा पेट, आँतें इतने खराब हो गये हैं कि कच्चा आहार, कच्ची तरकारी, सलाद आदि खाने में हमें बड़ी कठिनाई उठानी पड़ती है। यद्यपि कच्चे शाक, सलाद अत्यन्त गुणकारी होते हैं।

इसीलिए पहले कच्ची व हरी तरकारियों को पीस कर उनका रस निकाल लेना चाहिए और नारंगी, मौसमी, अनार या और किसी फल के रस में मिलाकर उसे पीना ठीक रहेगा और धीरे-धीरे शरीर स्वयं कच्चे शाक आदि को ग्रहण करने लग जायगा। धीरे-धीरे शरीर हर एक फल व शाक को कच्चा ग्रहण करके पचाने लगेगा और इस अवस्था में शरीर को स्वस्थ व सशक्त रखने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में भोजन काफी होगा।

इसी प्रकार धारोष्ण कच्चा दूध जीवित गुण युक्त होता है, परन्तु औटाने पर उसका अधिकाँश गुण नष्ट होकर वह भारी हो जाता है, परन्तु दूध अकेले पर बहुत अधिक काल रहना ठीक न होगा, उसके साथ साथ फल, हरे शाक, मेवा, हरा व कच्चा अन्न आदि वस्तु भी खाना आवश्यक है।

फिर भी छोटी उम्र के बालकों के लिये कच्चा दूध बड़ा ही उत्तम भोजन है परन्तु हमारे समाज में तो बकरी या गाय के स्वाभाविक अमृत तुल्य दूध को अधिक महत्व नहीं दिया जाता। हम लोग अपने बच्चों को विलायती दूध, सूखा दूध, बालामृत, आदि सारहीन मुरदा चीजें पिलाकर नीरोग व दीर्घजीवी रखने की आशा करते हैं जो भारी भूल है।

जिन घरों में, खास कर धनवानों में माताएँ फल दूध, हरे शाक आदि का सेवन नहीं करती और जिनके बच्चे भी ताजा फल, हरे शाक, कच्चा दूध आदि नहीं खाते पीते, वहाँ वे अधिकाँश कमजोर, बुज़दिल, मन्दाग्नि वाले हो जाते हैं।

परन्तु आप डॉक्टर वैद्यों से तो पूछिये, कच्चे दूध में कीटाणु बताये जाते हैं, इसलिये क्षय आदि रोगों से बचने के लिए सूखा विलायती दूध पिलाने की राय देते हैं, भला हमारे बच्चों की तरह क्या कोई जानवरों के बच्चे भी विलायती दूध पीकर जिन्दा रह सकते हैं, कभी नहीं। जो जानवर आग से पकी चीजें खाते हैं वे बीमार ही रहते हैं।

कुछ भी हो यह निश्चित सिद्धान्त है कि कोई भी खुराक जो आग से पकाई जाती है, असली व कुदरती खुराक नहीं कहलाई जा सकती क्योंकि आग की गर्मी से उसके गुण व स्वभाव बिलकुल बदल गये हैं और इसीलिए सेके व उबाले हुए बीज आदि फिर नहीं उग सकते क्यों? उनके प्राण जा चुके जो वापस नहीं आ सकते।

मनुष्य जब पैदा होता है उस समय उसमें एक सीमित मात्रा में जीवन शक्ति को हम जीवित स्वाभाविक भोजन द्वारा स्थाई कर सकते हैं अथवा अस्वाभाविक मुर्दा आग से पके पदार्थ खाकर धीरे-धीरे नष्ट कर सकते हैं।

जरा सोचिए कि अगर हम मुर्दा खुराक खाते रहेंगे तो हमारी जीवन शक्ति उससे कायम ही कैसे रहेगी और इसीलिये मुर्दा भोजन से हमारे शरीर क्षीण हो जाते हैं। साराँश यह है कि जो मनुष्य थोड़े फल, हरे शाक और मेवे खाकर रहेगा वह कभी भी बीमार नहीं होगा। बहुत बड़ी उम्र तक जवान बना रहेगा क्योंकि इन्हीं चीजों में सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद हैं और जो ऐसा करते हैं वे इसके असाधारण गुणों को जानते हैं।

यह भी ध्यान रहे कि खाने की चीजों को एक दम निगलना बड़ा ही बुरा है उन्हें खूब चबा-चबा कर खाना ठीक है, बस ऐसी हालत में आरोग्य स्थाई रह सकता है।

गायत्री चर्चा—


शक्तियों का केन्द्र-तप ही है।

तप से शक्ति उत्पन्न होती है और उस शक्ति के द्वारा मनुष्य अनेक प्रकार के साँसारिक एवं आध्यात्मिक सुख साधन प्राप्त करता है। तप के द्वारा किसी भी जड़ चेतन वस्तु का निखार एवं उत्कर्ष होता है। जड़ जगत् में, पंच भौतिक संसार में और अध्यात्म क्षेत्र में यह नियम एक समान काम कर रहा है।

जड़ जगत् पर दृष्टि डालिये, सोना तपाने पर निखरता है, कच्चे लोहे को तपाने के बाद ही उससे मशीनें तथा औजार बनते हैं, मिट्टी के बर्तन जब अवे में पकते हैं तब उसमें मजबूती और सुन्दरता आती है। कढ़ाई में तपने पर अन्न से बढ़िया पकवान बनते हैं, लुहार, सुनार, हलवाई, रसायन बनाने वाले, रंगरेज, धोबी, आदि की भट्टियाँ नित्य चेतती हैं, और उन पर चढ़ने वाले पदार्थ थोड़े ही समय में कुछ से कुछ बन जाते हैं।

घर्षण से भी अग्नि उत्पन्न होती है और उस आतप से अनेक वस्तुओं का परिपाक होता है। खराद एवं शान पर चढ़कर वस्तुओं में तीक्ष्णता, सफाई एवं चमक पैदा होती है। हथियार, बर्तन, औजार, पुर्जे, रत्न, पत्थर आदि की घिसाई से उनके पूर्व रूप में भारी परिवर्तन होता है। बिजली, भाप, पेट्रोल, ऐटम आदि शक्ति स्रोतों का मूल उद्गम उनकी अग्नि ही है और उसी पर विज्ञान का सारा आधार निर्भर है। सूर्य की अग्नि में तप कर ही सारा जड़ चेतन संसार जन्म, विकास और विनाश के चक्र में चढ़ा हुआ गतिशील हो रहा है। वर्षा बादल, और वायु का संचार एक भौतिक तप का ही परिणाम है। अंडे और बच्चे, बीज और फल, जिस शक्ति के कारण पलते और पकते हैं उसका नाम तप ही है। तप के तथ्य को यदि हटा दिया जाय तो शून्य निस्तब्धता और गहन अन्धकार के अतिरिक्त इस संसार में ओर कुछ भी शेष न रहेगा।

सजीव प्राणिजगत पर दृष्टि डालिए तो मालूम पड़ेगा कि जिसको जो कुछ प्राप्त है वह उसके तप के कारण ही है। परिश्रम, कष्ट, सहिष्णुता, लगन, अध्यवसाय, एकाग्रता, निरन्तर साधना, प्रयत्न, पुरुषार्थ के कारण लोगों को तरह-तरह की शक्तियाँ, योग्यताएं, सामर्थ्य एवं सम्पदाएं प्राप्त होती हैं। विद्यार्थी, व्यापारी, किसान, मजदूर, शिल्पी, संगीतज्ञ, चिकित्सक, नेता, साधु आदि सभी वर्गों के लोग अपने अपने कार्य क्षेत्र में, हमको अपने उद्देश्य के लिए, अपने अपने ढंग से तप करते हैं, जिसका तप जितना अधिक होता है उसे उसी हिसाब से सफलता एवं सम्पन्नता मिलती चलती है। इतिहास बताता है कि पुरुषार्थ प्रधान जातियाँ आगे बढ़ीं और ऊँची उठीं इसके विपरीत आलसी, विलासी, भीरु, अकर्मण्य लोग व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से विनाश के गर्त में चले गये। जो वृक्ष ऋतु प्रभावों को सहते हैं वे ही दीर्घजीवी होते हैं और जिनकी सहनशक्ति निर्बल होती है वे थोड़ी सी सर्दी गर्मी में ही नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार तपस्वी मनुष्य ही सफल होते देखे गये हैं।

कहीं कहीं तप और सत्परिणाम की संगति दिखाई नहीं पड़ती, उसका कारण संचित और आगत कर्मों का विधान ही है। किन्हीं को स्वल्प प्रयत्न में या बिना प्रयत्न के ही बहुत लाभ होता देखा गया है, इसमें उसके पूर्व संचित सुकृत ही प्रधान कारण है। जब उसकी वह संचित पूँजी समाप्त हो जायगी तो उसे अपने वर्तमान स्वल्प प्रयत्नों के अनुकूल स्वल्प परिणाम ही उपलब्ध रहेगा। इसी प्रकार जिनके पिछले दुष्कृत, दुर्भाग्य इस समय भोगने अनिवार्य है उनका वर्तमान तप असफल रहता हुआ दिखाई पड़ता है परन्तु जैसे ही वह पुराना भोग समाप्त हुआ कि नवीन सुकृत का आशा जनक सत्परिणाम तुरन्त सामने आ उपस्थित होता है। संचित और आगत कर्मों के परोक्ष विधान के अनुसार किन्हीं के तप से न्यूनाधिक लाभ होता दिखाई दे तो भी इतना निश्चित है कि तपस्या कभी भी निष्फल नहीं जाती, उसका यथोचित परिणाम अवश्य ही प्राप्त होता है। संसार का यह अविचल और अकाट्य नियम है।

शक्ति का उद्गम स्थान तप है। तप से शक्ति उत्पन्न होती है। उस शक्ति को उचित या अनुचित मार्ग में लगाना मनुष्य की अपनी इच्छा के ऊपर निर्भर है। चोर, डाकू, लुटेरे एवं कुकर्मी लोग भी अपने ढंग से काफी तप करते हैं और अपने क्षेत्र में उसका परिणाम भी पाते हैं। यह दूसरी बात है कि शक्ति का दुरुपयोग करने एवं कुमार्ग में लगाने का पीछे चलकर उन्हें दुष्परिणाम भुगतना पड़े। चाकू का काम काटना है उससे फल काटना या उँगली काटना अपनी इच्छा पर निर्भर है। तप से शक्ति उत्पन्न होती वह शक्ति कहाँ, कब,किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार प्रयुक्त की जाय यह उस प्रयोक्ता की इच्छा पर निर्भर है।

यह संसार तप के आधार पर बना है, और उसी के आधार पर उसकी जीवनचर्या एवं गतिशीलता निर्भर है। जड़ चेतन सभी पर इस दैवी विद्यमान के नियम समान रूप से काम कर रहे हैं। यह नियम आध्यात्मिक क्षेत्र में तो और भी व्यापक रूप से काम करता है। सृष्टि के आदि काल से लेकर आज तक जितने भी आत्म शक्ति सम्पन्न महापुरुष हुए हैं उनकी महत्ता का एक ही कारण रहा है और वह था-तप।

परमात्मा ने मनुष्य के शरीर और मन में अनेक सूक्ष्म शक्तियों के अद्भुत भण्डार भर दिये हैं, उसके अणु अणु में चमत्कारी दिव्य शक्तियों के कोष छिपे हुए हैं। यह कोष सुषुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं। जिस प्रकार रात्रि में सब जीव जन्तु सोते रहते हैं और प्रातः काल सूर्य की गर्मी फैलते ही निद्रा खुल जाती है उसी प्रकार तप की गर्मी से वे सुषुप्त शक्तिकोष जागृत होते हैं और मनुष्य उन ईश्वर प्रदत्त सूक्ष्म शक्तियों के बल से सुसज्जित हो जाता है जो चिरकाल में उसके भीतर सोई हुई पड़ी थी। जैसे चिड़ियों की छाती की गर्मी से अण्डे पकते हैं, जैसे आम के कच्चे फलों को अनाज या भूसे में पाल लगाकर उन्हें पकाते हैं वैसे ही तप की गर्मी से गुप्त मनः शक्तियों का परिपाक होता है और सुपक्व मधुर परिणामों का आविर्भाव होता है।

स्थूल से सूक्ष्म की शक्ति सदा ही असंख्य गुनी होती है। शरीर से बुद्धि सूक्ष्म है और बुद्धि से आत्मा सूक्ष्म है। शरीर से मजदूरी करने वाला मजूर एक दिन जितना कमाता है बुद्धि से मजूरी करने वाला वकील उससे अधिक कमा लेता है। पहलवान की अपेक्षा विद्वान की प्रतिष्ठा अधिक होती है। क्योंकि शरीर की अपेक्षा बुद्धि सूक्ष्म है और उसकी सामर्थ्य भी अधिक है। शरीर बल और बुद्धि बल, दोनों की अपेक्षा आत्म बल अधिक महान है क्योंकि शरीर और बुद्धि दोनों की अपेक्षा आत्मा असंख्य गुनी सूक्ष्म है। तप के द्वारा आत्मा की उन शक्तियों का प्रकटीकरण एवं विकास होता है, जिसके कारण मनुष्य देव श्रेणी में पहुँच जाता है, जिनके कारण हमारे पूर्वज जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे।

शारीरिक और मानसिक तपश्चर्या में आज अधिकाँश लोग लगे हुए हैं, वे उसका विवेक सम्मत सदुपयोग नहीं करते तो भी अपना काम चलाने लायक भोग ऐश्वर्य उसी के आधार पर उपार्जित करते हैं। जो तप विहीन हैं, आलसी अकर्मण्य और दुर्बुद्धि हैं वे इस संसार में भी अपनी कमजोरी के कारण दुर्दशा ग्रस्त बने रहते हैं। आत्मिक तप की श्रेष्ठता का महत्व और महात्म्य सर्वोपरि है जो इस क्षेत्र में तपस्या करते हैं वे उन सुख सुविधाओं के स्वामी बनते हैं जिनका अन्य किसी मार्ग से प्राप्त होना सम्भव नहीं है। आत्मिक क्षेत्र की तपश्चर्या का इतिहास ही भारतीय संस्कृति का इतिहास है। भारतवासियों ने इसी क्षेत्र की सफलताओं और सम्पत्तियों को सच्ची सफलता और सम्पत्ति माना है, इसीलिए ये देव पुरुष माने जाते रहे हैं और उनकी भूमि को “स्वर्गादपि गरीयसी’ कहा जाता है।

प्राचीन काल में राजा से लेकर रंक तक तप की दिशा में उत्साहपूर्वक अग्रसर होते थे। राजा अपने बालकों को गुरुकुलों में तपस्वी जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त करने के लिए वनवासी ऋषियों के सुपुर्द कर देते थे। उसी का परिणाम कि भारत माता की कोख से सदैव महापुरुष उत्पन्न होते रहे हैं। आज उस महानता का परित्याग करके लोग भोग और लोभ के निम्नस्तर पर उतर आये हैं उसी का फल है कि वे व्यक्तिगत और सामूहिक शान्ति और उन्नति से रहित होते जा रहे हैं और चिन्ता, कलह, पाप एवं अशान्ति से सारा वातावरण दूषित हो रहा है।

सच्ची शान्ति, उन्नति और सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए हमें तप का आश्रय लेना पड़ेगा। शारीरिक और बौद्धिक क्षेत्रों से ऊँचा उठकर आध्यात्मिक क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाना होगा। तब हम साँसारिक सुख साधनों को सहज ही प्राप्त करते हुए उन महान लाभों के भी अधिकारी बन सकेंगे जो सार्वभौम आनन्द के हेतु होते हैं।

मनुष्य जीवन की सच्ची सम्पत्ति तप है और तप का एकमात्र केन्द्र गायत्री है। गायत्री के अतिरिक्त तप का और कोई मार्ग नहीं। जितनी अनेक प्रकार की तपश्चर्याएं विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ती हैं उन सब का उद्गम गायत्री है। बिना गायत्री के कोई तप सफल नहीं हो सकता। जैसे बिना नींव जमाये कोई मकान खड़ा नहीं हो सकता, यदि खड़ा भी हो जाय तो ठहर नहीं सकता इसी प्रकार बिना गायत्री के कोई तपस्या न तो पूर्ण होती है और न उसमें सफलता ही मिलती है। तप का मूल तत्व गायत्री में सन्निहित “भर्ग” ही है जिसकी चर्चा अगले अंक में करेंगे। पाठकों को यह भली प्रकार समझ लेना है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए तप आवश्यक है तप से ही सच्चा आत्म कल्याण संभव है।


गायत्री अंक के लिए

अखण्ड ज्योति का जुलाई का अंक ‘गायत्री अंक’ होगा। उसमें उन सज्जनों के वृत्तान्त रहेंगे जिनने गायत्री की उपासना में सन्तोषजनक सफलता पाई है। ऐसे लोगों के चरित्रों का वृत्तान्त जानने से साधारण साधकों को आशा और उत्साह के साथ इस कल्याण मार्ग पर चलने का प्रोत्साहन मिलता है।

भूतकाल में ऐसे अनेक गृहस्थ और विरक्त महानुभाव हुए हैं जिन्होंने गायत्री की सफल उपासना की थी। वर्तमान समय में भी ऐसे अनेक सज्जन हैं जो गायत्री महाशक्ति की तपस्या करके अपने में अनेक विशेषताएं उत्पन्न कर चुके हैं, ऐसे सज्जन बहुधा स्वयं अपनी विशेषताएं प्रकट करने में संकोच करते हैं। इसलिए अखण्ड-ज्योति के पाठकों से प्रार्थना है कि उन्हें किन्हीं स्वर्गीय गायत्री उपासक का उत्साहवर्धक वृत्तान्त मालूम हो या वर्तमान काल के किन्हीं सफल साधक का परिचय हो तो उनकी सफलता प्रकट करने वाली घटनाओं का पूरा हाल छपने के लिये भेजें। उन महात्माओं के फोटो, या उनके द्वारा जिनको लाभ हुआ हो उनके फोटो अथवा लेखक महोदयों के फोटो भी छपने के लिए भेजे जा सकते हैं। लेख यथासंभव जल्दी ही भेजने चाहिए।

अपनी साधारण उपासना या मामूली अनुभवों को छपने के लिए भेजने का कोई सज्जन कष्ट न करें। क्योंकि इस अंक में सर्वसाधारण का, सामान्य साधनाओं का प्रकाशन न तो उपयोगी है और न आवश्यक।

फोटो आधे शरीर के और अच्छे कैमरे के खिंचे हुए होने चाहिए। सस्ते कैमरों के धुँधले फोटो का बलाक ठीक नहीं बनता और न उसकी छपाई ही ठीक होती है इसलिए फोटो भेजते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह यथासंभव अच्छे कैमरे के खिंचे हुए, साफ हों।


गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व

जेष्ठ सुदी 10 ता. 3 जून मंगलवार को गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इसी दिन भागीरथ जी का तप सफल होने से भगवती भागीरथी (गंगा जी) पृथ्वी पर आई थीं, इसलिए गंगा दशहरा भी यही है। और इसी दिन सृष्टि के आदि काल में ब्रह्मा जी के घोर तप करने पर गायत्री महाशक्ति का अवतरण हुआ था। वर्ष भर के सम्पूर्ण पुण्य पर्वों में यह गायत्री जयन्ती का पर्व सबसे अधिक पवित्र और सबसे अधिक सतोगुणी है।

गायत्री उपासकों के लिए तो यह दिन सबसे बड़ा पर्व, उत्सव एवं त्यौहार का दिन है। इस पुण्य पर्व पर हर एक उपासक को यथासंभव माता के चरणों में अपनी श्रद्धा का प्रकटीकरण करना चाहिए। इस पर्व के लिए कुछ कार्यक्रम नीचे उपस्थित किया जाता है। इसमें से जिससे जितना हो सके वह उतना पालन करने का प्रयत्न करे।

गायत्री जयन्ती के दिन उपवास रखें।

उस दिन कुछ घंटे मौन रहकर आत्म चिन्तन किया जाय।

उस दिन जो गायत्री मन्त्र हाथ से लिखे जायं, उन्हें गायत्री मन्दिर में सुरक्षित रखने के लिए मथुरा भेज दिया जाय।

सामूहिक गायत्री यज्ञ किया जाय।

सस्वर गायत्री मंत्र की वेद ध्वनि का गान किया जाय।

गायत्री की प्रतिमाओं का विशेष रूप से पूजन अर्चन किया जाय।

गायत्री चालीसा, गायत्री के चित्र, सर्वशक्तिमान गायत्री या अन्य गायत्री साहित्य प्रसाद दान, या उपहार रूप अधिकाधिक सज्जनों को दिया जाय।

नये यज्ञोपवीत बदले जायं। जो लोग यज्ञोपवीत नहीं पहनते हैं उन्हें यज्ञोपवीत दिये जायं और यज्ञोपवीत तथा गायत्री का सम्बन्ध समझाया जाय।

जहाँ गोष्ठी या सत्संग होने संभव हो वहाँ गायत्री के महत्व पर प्रवचन हों।

गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्र नाम, गायत्री स्तोत्र आदि का पाठ किया जाय।

उस दिन घी का अखण्ड दीपक जलाया जाय।

नये गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना कराई जाय।

यह द्वादश सूची कार्यक्रम गायत्री जयन्ती के उपलक्ष में सर्वत्र उत्साहपूर्वक मनाये जाने का प्रयत्न करने की जागृत आत्माओं से हमारी विनम्र प्रार्थना है।


गायत्री मन्दिर की पुण्य प्रगति

101) श्री॰ लक्ष्मण भीकाजी देसाई, पंचगनी

101) श्री॰ प्रेमकली के पिता जी, नकुड़

40) श्री॰ जे. के. ठाकुर साकर वाडी-द्वारा

32) श्री॰ रणछोड़ भाई सोमाभाई पटेल सादानपुर

27) श्री॰ सवाई लाल जी व्यास बड़ौदा

25) पं॰ विश्वनाथ जी दीक्षित, वेतिया

25) श्री॰ गोपीलाल गुप्ता, जबलपुर

21) श्री॰ शेर सिंह जी अध्यापक, देहरी कलाँ

25) श्री॰ हरीराम वर्मा, कटनी

21) श्री॰ भँवर लाल सुन्दरिया, छिन्दवाड़ा

20) श्री॰ रंग नाथ नाना जी वराडे, सावदा

20) श्री॰ रनछोड़ जी, एग्रीको,

16) श्री॰ महाबीर सिंह जी, एकडेरवा

15) श्री॰ जगन्नाथ जी अवरोल, सहारनपुर

15) श्री॰ प्रताप नरायन जी श्रीवास्तव, अंजड़

11) श्री॰ लक्ष्मी नारायण छोटेलाल, मुरादाबाद

11) श्री॰ रामदयाल जी सैनी, जबलपुर

11) श्री॰ हरवंशराय जी श्रीवास्तव, कटनी


विश्लेषण


विश्लेषण

( 1 )

यह विज्ञान, जिसे नर-आहुति पाने की है अमिट पिपासा,

महानाश के राग भयंकर मुखरित करती जिसकी आशा;

यह विज्ञान, ज्ञात है जिसको नहीं ज्ञान की भी परिभाषा,

जिसको जीवन समझ भटकता जग मरुथल में मानव प्यासा,

यह विज्ञान, दिव्य-संसृति के उर पर जलने वाली ज्वाला!

अरे बावले बता कि कब तक समझेगा इसको जयमाला!!

( 2 )

युद्ध, किस लिये? किसी निर्बल को अपने पैरों तले दबाने,

किसी अभागिन राज्य-श्री से पौरुष का शृंगार सजाने,

युद्ध, किस लिये? जीवन की प्रिय प्रतिमा को निस्तेज बनाने,

धर्म, कला, साहित्य, सभ्यता को शूलों की सेज बनाने;

युद्ध, किस लिये? क्या लाने को फिर से नव कल्याणी सीता!

पर तू तो है खड़ा पढ़ रहा कब से महाप्रलय की गीता!!

( 3 )

शाँति, स्वप्न का स्वप्न, स्वप्न का मोह, मोह का मीठा पन है,

पीड़ित भावों की तड़फन पर क्षीण बुद्धि का आमंत्रण है,

शाँति-सत्य की शुचि समाधि पर आदर्शों का काव्य सृजन है,

महाशक्ति की दीन सेविका और युद्ध का आकर्षण है,

शाँति, न इसको छूना, देखो, महाकाल फुँकार रहा है!

इसके चारों ओर गरल को सागर हाथ पसार रहा है!!

( 4 )

नियति, नियत के पास अभी तो दिखता केवल रक्त रंग है,

कुछ घावों का कुछ श्वासों का एक कारवाँ चला संग है,

नियति, चरण कुछ डगमग से हैं और पंथ भी खड़ा दंग है,

बजा रहा कापालिक कोई अमिट मृत्यु का कटु मृदंग है,

नियति-वृद्ध विधि के हाथों की प्राण-हीन निष्प्रभ जर्जरता!

नियति-प्रलय की अंगड़ाई है दानव की व्यापक बर्बरता!!

*समाप्त*

(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए.)