गुरु गोविन्द गायो नहीं जन्म अकारथ कीन।
कहु नानक हरिभजु मना जिहविधि जल को मीन ॥1॥
विखियन सिउ काहे रचियो निमख न होहि उदासु।
कहु नानक भजु हरि मना परै न जमकी फास॥2॥
तरनापा उह ही गइयो लीयो जरा तनु जीत।
कहु नानक भजु हरि मना अवध जात है बीति॥3॥
बिरव भयो सूझे नहीं काल पहुँचियो आनु।
कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु॥4॥
धनु दारा सम्पति सगव निज अपनी कर मान।
इनमें कुछ संगी नहीं नानक साँची जानि॥5॥
पतित उधार भै हरन हरि अनाथ के नाथ।
कहु नानक तिह जानिए सदा बसंत तुम साथ॥6॥
तनु धनु जेहि कोउन दीयो तासिउ नेह न कीन।
कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन॥7॥
तनु धनु सवै सुख दीयो अरु जिह नीके धाम।
कहु नानक सुन रे मना सिमरत काहि न राम॥8॥
सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोई।
कहु नानक सुन रे मना तिह सिमरत गति होई॥9॥
जिह सिमरति गति पाईए तिहि भजु रे तै मीत।
कहु नानक सुन रे मना अवध घटत है नीत॥10॥
पाँच तत्व को तनु रचिया जानहु चतुर सुजान।
जिह ते उपजियो नानका लीन ताहि में मान॥11॥
घटि-घटि में हरिजू बसै सन्तन कहियो पुकारि।
कहुनानक तिह भजु मना भवनिधि उतरहि पारि।12।
सुख दुख जिह परसै नहीं लोभ, मोह, अभिमान।
कहु नानक सुनरे मना सो मूरति भगवान॥13॥
उसतत निन्द्या नाहि जिपि कंचन लोह समानि।
कहु नानक सुन रे मना मुकति ताहि तै जानि॥14॥
हरख सोग जाकै नहीं बैरी मीत समान।
कहु नानक सुन रे मना मुकति ताहि तै जानि॥15॥
भै काहू को देत नहिं नहिं भै मानतु आनि।
कहु नानक सुन रे मना ज्ञानी ताहि बखानि॥16॥
जिह बिखिया सगली तजी लीयो भेख बैराग।
कहु नानक सुन रे मना तिह नर माथे भाग॥17॥
जिह माया ममता तजी सभ ते भयो उदास।
कहु नानक सुन रे मना तिह घटि व्रह्म निवास॥18॥
जिह प्राणी ममता तजी करता राम पछान।
कहु नानक बहु कुमाँत तजु इहु मत साची मान॥19॥
भै नासन दुरमति हरन कल में हरि को नाम।
निसिदिन जो नानक भजे सकल होहि तिह काम॥20॥
जिह्वा गुरु गोविन्द भजहू करन सुनहु हरि नाम।
कहु नानक सुन रे मना परहि न जम के धाम॥21॥
जो प्रानी ममता तजै लोभ, मोह, अहंकार।
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार॥22॥
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कोउ जानि।
इनमें कछु साँचो नहीं नानक बिन भगवान॥23॥
निसि दिन माया कारने प्रानी डोलत नीत।
कोटन में नानक कोऊ नारायण जिह चीति॥24॥
जैसे जल से बुदबुदा उपजै विनसै नीति।
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुन मीत॥25॥
प्रानी कछू न चेतई मद माया के अन्ध।
कहु नानक बिन हरिभजन परत ताहि जम फन्द ॥26॥
जउ सुख कउ चाहै सदा सरन राम की लेहु।
कहु नानक सुन रे मना दुर्लभ मानुष देहि॥27॥
माया कारन धावही मूरख लोग अजान।
कहु नानकबिन हरिभजन विरथा जनम सिरानि॥28॥
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक -11
पन्थ अनेकों पथिक अनेकों हैं अगणित पाथेय।
किन्तु एक ही ध्यान चिरन्तन और एक ही ध्येय॥
प्रभु तेरे मन्दिर में आने के लाखों ही द्वार।
मन की गति तरणी श्वासों का विस्तृत पारावार॥
तेरी कृपा साधकों के हित, बनकर दिव्य विवेक।
वयं द्वार पर है अन्धे की लकड़ी देती टेक॥
ज्ञान-चक्षु लेते वह सीधी पगडण्डी पहचान।
जिस पर दूरी के पत्थर हैं गीता वेद पुराण॥
मैं भी तो भूली-भटकी सी रही अभी तक डोल।
जाने कितने द्वार अभी तक भ्रमवश चुकी टटोल॥
मेरे प्रभु पाये बिन तेरी उंगली का संकेत।
नहीं पा सकूँगी मैं तेरा भगवन् पुण्य निकेत॥
कर लेने दो प्राप्त मुझे अब तो दर्शन का श्रेय।
पन्थ अनेकों पथिक अनेकों हैं अगणित पाथेय॥
किन्तु एक ही ध्यान चिरन्तन और एक ही ध्येय!
भवोद्विग्नमना चैव हृदुद्वेगं परित्यज। कुरु सर्वारववस्थासु शान्तं सन्तुलितं मनः॥
अर्थ—मानसिक उत्तेजनाओं को छोड़ दो। सभी अवस्थाओं में मन को शान्त और संतुलित रखो।
शरीर में उष्णता की मात्रा अधिक बढ़ जाना ‘ज्वर’ कहलाता है और वह ज्वर अनेक दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। वैसे ही उद्वेग, आवेश, उत्तेजना, मदहोशी, आतुरता आदि लक्षण मानसिक ज्वर के हैं।
आवेश का अन्धड़ तूफान मनुष्य के ज्ञान, विचार, विवेक को नष्ट कर देता है और वह न करने लायक कार्य करता है। यह स्थिति मानव जीवन में सर्वथा अवाँछनीय है।
विपत्ति पड़ने पर लोग चिन्ता, शोक, निराशा, भय, घबड़ाहट, क्रोध, कार्यरता आदि विषादात्मक आवेशों से ग्रस्त हो जाते हैं और सम्पत्ति आने पर अहंकार, मद, मत्सर, अतिहर्ष, अतिभोग, ईर्ष्या, द्वेष आदि उत्तेजनाओं में फँस जाते हैं। यह दोनों उत्तेजनाएँ मनुष्य की आन्तरिक स्थिति, रोगियों, बालकों एवं विक्षिप्तों जैसी कर देती हैं। ऐसी स्थिति मनुष्य के लिए विपत्ति, त्रास, अनिष्ट, अनर्थ और अशुभ के अतिरिक्त और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकती।
जीवन एक झूला है जिसमें आगे भी और पीछे भी झोंटे आते हैं। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न हो जाता है और आगे आते हुए भी। अनियंत्रित
तृष्णाओं की मृग मरीचिका में मन अत्यन्त दीन, अभावग्रस्त और दरिद्री की तरह सदा व्याकुल रहता है। इस स्थिति में पड़ा हुआ मनुष्य सदा दुखी ही रहता है क्योंकि झूला झूलने वाले की तरह जीवन की भली-बुरी घटनाओं का खटमिट्ठा स्वाद लेने की अपेक्षा वह अपनी अनियन्त्रित तृष्णाओं को ही प्रधानता देता है और चाहता रहता है कि मेरे मनोनुकूल ही सब कुछ हो। ऐसा हो सकता सम्भव नहीं, इसलिए उसे मनोवाँछित सुख की प्राप्ति भी सम्भव नहीं, इस प्रकार के दृष्टिकोण वाले मनुष्य सदा, असंतुष्ट, अभावग्रस्त एवं दुखी ही रहते हैं वे हर घड़ी अपने को दुर्भाग्य ग्रस्त ही अनुभव करते रहते हैं।
हर्षोद्वेगों में अहंकार प्रधान है। थोड़ी सी सफलता, सम्पत्ति, सत्ता, रूप, यौवन, पदवी आदि मिलने पर मनुष्य इतराने लगता है, दूसरों पर अपनी सफलता और श्रेष्ठता प्रकट करने के लिए वह अवाँछनीय प्रदर्शन एवं अनावश्यक धन खर्च करता है। दूसरों का तिरस्कार, मानमर्दन, शोषण, अपहरण करके भी वह अपनी शक्तिमत्ता का परिचय देता है। अमीर, सामन्त, रईस, सेठ, ताल्लुकेदार, राजा, हाकिम, अफसर आदि वर्गों के लोग में बहुधा हर्षोन्माद देखा जाता है। किन्हीं स्त्री-पुरुषों को रूप यौवन का भी उन्माद होता है। फैशनपरस्ती, बनाव शृंगार, विलासिता, उच्छृंखलता आदि की प्रवृत्ति उनमें बढ़ती रहती है। विवाह शादियों में, प्रीतिभोजों में, उत्सवों में बहुधा अपनी नामवरी लूटने के लिए बहुत अनावश्यक खर्च करते हैं यह बातें भी इसी श्रेणी में आती हैं। हर्षोद्वेग में मनुष्य का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और वह न करने योग्य कार्यों को करने लगता है, न सोचने लायक बातों को सोचने लगता है।
विषादोद्वेगों का क्षेत्र बड़ा है। अधिकाँश मनुष्यों को वास्तविक एवं काल्पनिक विषाद घेरे रहते है और वे उनके कारण निरन्तर परेशान रहते हैं। चिन्ता, भय, शोक, घबराहट, बेचैनी, क्रोध, अस्थिरता, निराशा, आशंका, कायरता, हीनता आदि के विषादात्मक विचार जब किसी के मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं तो वह एक प्रकार से अर्ध विक्षिप्त हो जाता है। उसे सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें, क्या न करें? धैर्य, साहस, विवेक और प्रयत्न इन चारों बातों से वह हाथ धो बैठता है। यह मानसिक स्थिति स्वयं इतनी खतरनाक है कि बाहरी घटनाएँ परिस्थितियाँ जितनी हानि पहुँचा सकती हैं उनकी अपेक्षा अनेक गुना अनिष्ट इस आन्तरिक उद्विग्नता से हो जाता है।
घबराहट एवं बेचैनी से किसी समस्या का हल नहीं होता वरन् और नई उलझनें पैदा होती हैं। कठिनाइयाँ सभी के सामने आती हैं, मनुष्य जीवन संघर्ष असुविधा और अभावों से भरा हुआ है, प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा, बुद्धि और चतुरता द्वारा उनकी पूर्ति की जाती है। आपत्तियों और असुविधाओं से धैर्य और साहस के साथ जो लोग हँसते-हँसते मुकाबला कर सकते हैं वे ही उत्तम और उन्नत परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग असुविधाएँ देखकर घबरा जाते हैं, डर जाते हैं, उद्विग्न हो जाते हैं वे अपनी वर्तमान स्थिति की अपेक्षा भी और निम्न अवस्था को जा पहुँचते हैं।
उत्तेजना में अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों की भारी क्षति होती है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि मनुष्य लगातार 4॥ घण्टे क्रोध में भरा रहे तो उसका लगभग 8 औंस खून जल जायगा और शरीर में इतना विष उत्पन्न हो जायगा जितना कि एक तोला कुचला खाने से उत्पन्न होता है। चिता की अधिकता से हड्डियों के भीतर रहने वाली मज्जा सूख जाती है फलस्वरूप अनेकों बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। भविष्य का आशंका से जिनका चित्त भयभीत रहता है उनके रक्त में क्षार की मात्रा घट जाती है। बाल झड़ने और सफेद होने लगते हैं। शोक के कारण नेत्रों की ज्योति क्षीणता, गठिया, बहुमूत्र, पथरी सरीखे रोग हो जाते हैं, ईर्ष्या, द्वेष एवं प्रतिहिंसा की जलन के कारण तपैदिक, दमा, बहरापन, कुष्ठ सरीखी व्याधियाँ उत्पन्न होती देखी गई हैं। कारण स्पष्ट है। आवेशों के कारण जो अन्तर्दाह उत्पन्न होता है उसकी अग्नि से शरीर भीतर ही भीतर जलता रहता है और वह बीमारी तथा अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाता है। मानसिक दृष्टि से भी ऐसे मनुष्य आधे पागल हो जाते हैं। वे आगत कठिनाइयों से छूटने के जो प्रयत्न करते हैं वे बुद्धि हीनता के कारण उलटे पड़ते हैं और उनकी विपत्ति दूनी बढ़ जाती है। स्मरण शक्ति की कमी, सहनशीलता एवं विचार शीलता की कमी हो जाने पर वे एक प्रकार के बौद्धिक शीलता की कमी हो जाने पर वे एक प्रकार के बौद्धिक अपाहिज बन जाते हैं।
गायत्री के ‘भ’ अक्षर का आदेश है कि गायत्री माता पर जो लोग श्रद्धा रखते हैं उन्हें उसका आदेश भी मानना चाहिए और अपने को आवेशों से सदैव बचाये रखना चाहिए। समुद्र तट पर रहने वाले पर्वत से समुद्र की लहरें नित्य टकराती रहती हैं पर वे पर्वत जरा भी परवाह नहीं करते। खिलाड़ी खेलते हैं, कई बार हारते हैं, कई बार जीतते हैं। कई बार हारते-हारते जीत जाते हैं और कई बार जीतते-जीतते हार जाते हैं पर कोई खिलाड़ी उसका आत्मघाती असर मन पर नहीं पड़ने देता। विश्व के रंग मंच पर हम सब खिलाड़ी हैं। प्रारब्धानुसार, विधि के विधानानुसार हममें से हर एक को हार और जीत के, दुख और सुख के, खेल खेलने पड़ते हैं, पार्ट अदा करने पड़ते हैं। इसमें उद्विग्न होने की कोई बात नहीं। हम हँसते हुए जिएँ, जीवन की हर घटना में रस लें और हार जीत की प्रत्येक स्थिति में आनन्द का अनुभव करें।
उद्विग्नता एक मानसिक बीमारी है। उससे शरीर और मन दोनों की शक्तियों का भारी नाश होता है। इसलिए उससे हमें सदैव बचना चाहिए। जीवन को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा मानसिक संतुलन ठीक रहे, हम दिमाग को ठण्डा रखना सीखें, शान्त चित्त से हर बात पर विचार करें और क्षणिक आवेशों से बचते हुए दूरदर्शिता की विवेकपूर्ण नीति को अपनाएँ। गायत्री के नौवें अक्षर ‘भ’ की यही शिक्षा है।
—भगवान को भुलाने वाली तथा भोगों में लगाने वाली जो भी वस्तुएँ हैं-वे सभी त्याज्य हैं।
—मन बड़ा दुर्धर्ष है, पर यदि ठीक ठिकाने से उसे लगाया जावे तो वह बड़ी सहायता भी करता है।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
लोग ऐसा जानते हैं कि विश्वव्यापी आत्मा अनन्त है। परन्तु भला अनन्तता में खण्ड कैसे हो सकता है? यह तोड़ा कैसे जा सकता है? इसमें विभाग किस तरह होगा? यह कहना कि मैं उस अनन्त का एक कण हूँ, बहुत ही कवित्वमय है। परन्तु विवेकशील मन के लिये यह बात बहुत ही बेतुकी हैं। अनन्त को विभक्त करने का तात्पर्य क्या है? क्या यह कोई परमेय पदार्थ है, जिसे आप खण्ड-खण्ड में विभक्त कर सकेंगे? जिस वस्तु में परिमाण नहीं है, जिसे हम नाम नहीं सकते, उसके खण्ड भी नहीं किये जा सकते। जिसके खण्ड करना सम्भव है, उसमें फिर अपरिमेयता नहीं रह जाती। इसका निष्कर्ष यह निकला कि आत्मा जो कि विश्वव्यापी है वह “तुम” हो। और “तुम” एक खण्ड नहीं, बल्कि ईश्वर के पूर्ण अंश हो। परन्तु ये सब विभिन्नताएँ क्या हैं? इस संसार में हमें लाखों विभिन्न आत्माएँ मिलती हैं। ये सब क्या हैं? जिस समय पानी के लाखों बुद-बुदों पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उस समय उनमें से हर एक में सूर्य की प्रतिमूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं। हर एक बुद-बुदे में सूर्य की अविकल मूर्ति परिलक्षित होती है। इस प्रकार उस समय हमें लाखों सूर्य दिखाई पड़ते हैं, यद्यपि वास्तविक सूर्य केवल एक ही है। इस प्रकार वह माया-विशिष्ट आत्मा, जो कि हम में से प्रत्येक प्राणी के अन्तःकरण में वर्तमान है, ईश्वर की प्रतिमा-मात्र है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वास्तविक सत्ता जो कि अन्तराल में है, वह एकमात्र ईश्वर है। उसके समीप हम सभी लोग एक हैं।
इस विश्व ब्रह्माण्ड में आत्मा केवल एक है और वही हम, तुम तथा संसार के अन्य समस्त प्राणियों के शरीर में प्रतिबिम्बित होती है और वह भिन्न-भिन्न आत्माओं के रूप में प्रदर्शित होती है। परन्तु हम यह बात नहीं जानते। हमारी धारणा है कि हम सब एक दूसरे से भिन्न हैं और उससे-ईश्वर से- भी भिन्न हैं। जब तक हमारी यह धारणा बनी रहेगी तब तक संसार से दुखों का भी अन्त न होगा। यह भ्रान्ति है। इसके अतिरिक्त दुःख, क्लेश का एक और बहुत बड़ा कारण भय है।
भला एक व्यक्ति दूसरे के स्वार्थ का विघातक क्यों बनता है? कारण वह डरता है कि मैं यथेष्ट सुख न प्राप्त कर सकूँगा। मनुष्य को भय रहता है कि यथेष्ट धन न प्राप्त कर सकूँगा। इस भय के ही कारण वह दूसरों को हानि पहुँचाता है। इसी से वह दूसरों को धोखा देता है, ठगता है। यदि समस्त विश्व में केवल एकमात्र सत्ता होती तो भला इस तरह का भय क्यों होता? यदि मेरे ऊपर वज्र गिर पड़े तो मैं अपने ही ऊपर स्वयं गिर पड़ा हूँ। क्योंकि इस समस्त विश्व में मैं ही एक मात्र सत्ता हूँ। यदि प्लेग आती है, तो वह मैं हूँ, यदि कोई सिंह आता है, तो मैं हूँ, यदि मृत्यु आती है तो वह मैं हूँ। मैं जन्म और मृत्यु दोनों ही हूँ।
विश्व में दो सत्ताओं का अस्तित्व मानने पर भय का संचार होता है। इस तरह का उपदेश हम सदा से ही सुनते चले आ रहे हैं कि एक दूसरे से प्रेम करो। किस लिये? यह मत तो प्रचारित किया गया था, किन्तु इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है। हमें प्रत्येक व्यक्ति को प्रेममय दृष्टि से क्यों देखना चाहिये? वह इसलिये कि मैं तथा संसार के अन्य समस्त प्राणी अभिन्न हैं। मैं अपने भाई से प्रेम क्यों करूं? इसलिये कि वह और मैं एक हूँ। इस प्रकार समस्त विश्व के सुख-दुख को समान मानने में ही यह एकता है। हमारे पैरों से कुचले जाने वाले छोटे से छोटे कीड़े-मकोड़ों से लेकर सृष्टि के बड़े से बड़े प्राणी तक पृथक्-पृथक् शरीर धारण करते हुये भी एक ही जीव हैं। सभी मुखों द्वारा तुम खाते हो, सभी हाथों के द्वारा तुम काम करते हो और सभी नेत्रों के द्वारा तुम देखते हो। इन लाखों शरीरों के द्वारा तुम स्वास्थ्य का उपभोग करते हो, तथा रोगों की यन्त्रणा भी सहन करते हो।
जब मन में इस तरह की भावना आ जाती है और हम इसका अनुभव करने लगते हैं तब दुःख, क्लेश और भय का अन्त हो जाता है। मैं मर कैसे सकता हूँ? मेरे अतिरिक्त और तो कुछ है ही नहीं। भय का अन्त हो जाने पर पूर्ण आनन्द और पूर्ण प्रेम आता है। यह विश्व-व्यापी सहानुभूति, विश्वव्यापी आनन्द, जो कि सर्वदा निर्विकार और अपरिवर्तनीय है, मनुष्य को सबसे ऊँचा उठा देता है। इसमें प्रतिघात नहीं है। दुःख, क्लेश भी इसका स्पर्श नहीं कर पाते। परन्तु संसार के इन तुच्छ सुखों-विषय वासना में सदा ही प्रतिघात हुआ करते हैं। इसका समस्त कारण यह द्वैतवाद—इस विश्व तथा ईश्वर के पार्थक्य का भाव है। परन्तु जिस समय हम में यह भावना आ जायगी कि मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही विश्व की आत्मा हूँ, मैं सदानन्द हूँ, जीवन मुक्त हूँ! तब वास्तविक प्रेम उत्पन्न होगा, भय जाता रहेगा और दुःख-क्लेश का अन्त हो जायगा।
(श्री स्वामी शुकदेवानन्द जी)
हमारा प्राचीन उज्ज्वल इतिहास इस बात का साक्षी है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी बहुत से पुरुषों ने अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति कर ली। महाराज जनक, धर्मराज युधिष्ठिर आदि अनेक ऐसे उदाहरण हैं। गृहस्थाश्रम तो ऐसा आश्रम है जिसकी सहायता से तीनों आश्रमों की व्यवस्था सुचारु रूप से होती थी। तब में और अब में आकाश-पाताल का अन्तर है। उस समय के गृहस्थ अपने लक्ष परमार्थ की ओर ध्यान रखकर ही जीवन के समस्त व्यवहारों को करते थे अतएव उनका तन, मन, धन सर्वस्व परोपकारमय बन जाता था, यही कारण था कि वे सब प्रकार से इस संसार में सुखी रहकर अन्त में परम पद के अधिकारी बन जाते थे। उनकी पुनीत जीवन गाथा को पढ़कर आज भी हम आनन्द का अनुभव करते हैं।
यदि मनुष्य अपने लक्ष परमार्थ की ओर दृष्टि रखने का दृढ़ निश्चय करके जीवन की अन्तिम श्वाँस तक कृत संकल्प रहे तो वह अपनी गृहस्थी में बना रहकर अपने लक्ष की प्राप्ति कर सकता है तथा अपने कल्याण के साथ ही अनेक व्यक्तियों के कल्याण में सहायक बन सकता है। परमार्थ पर लक्ष्य रखने से समस्त व्यवहार ही परमार्थ बन जाते हैं जैसे चमेली और बेला के फूलों में बसाई हुई तिली का तेल जब निकाला जाता है तो उसकी संज्ञा तिली का तेल नहीं वरन् चमेली अथवा बेला का तेल हो जाता है। गंदा नाला जब गंगा जी से मिलने की कामना लेकर चलता है तो वह गंगा जी में मिलकर स्वयं भी गंगा जी बन जाता है।
मानव योनि के चरम लक्ष्य परमार्थ की ओर अपना ध्यान रखने के कारण ही शास्त्रों में “गृहस्थाश्रम” की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। आज भी मनुष्य यदि इस मूलमंत्र पर ध्यान रखे कि हमारा लक्ष्य भोग नहीं वरन् भगवान् हैं तो यही बना हुआ गृहस्थ-जीवन नन्दन कानन जैसा सुखदाई बन सकता है और वस्तुतः परमार्थ को लक्ष्य बनाने वाले ही गृहस्थी में रहकर भजन कर सकते हैं। यदि लक्ष्य परमार्थ न होकर भोग हैं तो उनका भजन असली नहीं नकली है, जैसे स्वर्ण और मुलम्मा।
लक्ष्य परमार्थ रहने पर दुकानदारी, नौकरी आदि प्रत्येक कार्य में परोपकार की भावना होने से समस्त व्यवहार परोपकारमय बन जायेंगे। सच्चे परोपकारी व्यक्ति बदले की भावना से परोपकार नहीं करते। दम्भ कपट और पाखण्ड का लेश उनके अन्तःकरण में नहीं होता। दुकानदार को चाहिए कि अपनी दुकान में शुद्ध वस्तुयें ही विक्रयार्थ रक्खे जितने पैसे ले ग्राहक को उतनी ही वस्तु दे। अनुचित लाभ की भावना का सर्वथा परित्याग करे। ग्राहक को शुद्ध वस्तु देकर उचित लाभ ले लेना भी परोपकार ही है। कोई दुकानदार यदि भजन-पूजन तो खूब करता है किन्तु दुकान में बैठकर ऐसी भावना करता है कि कोई आँख का अन्धा और गाँठ का पूरा आ जाय। समय मिलने पर ग्राहक को भली प्रकार मूँड़ लेने के अवसर पर सावधानी से जो व्यक्ति दृष्टि रखता है, उसका यह भजन और पूजन निरा दम्भ है, पाखंड है, उसका लक्ष्य परमार्थ न होकर भोग ही है। सर्वत्र ऐसी भावना हो जाने के कारण आज का वातावरण बहुत दूषित हो गया है।
दुकान पर बैठकर दुकानदार यह भूल जाता है किसी समय मुझे भी ग्राहक बन कर बाजार से सौदा लाना होगा। अपने शरीर, स्त्री और बाल बच्चों के उदर पूर्ति के लिए यदि हम सैकड़ों व्यक्तियों का हलाल करते हैं तो क्या यह पाप नहीं है? उदाहरणार्थ—एक व्यक्ति दूध का व्यापार करता है, उसकी दुकान पर कोई व्यक्ति दूध लेने आया और बोला भाई रोगी बालक के लिए शुद्ध दूध की आवश्यकता है कृपा करके शुद्ध दूध ही देना। दुकानदार की आंखों में तो स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है उसे तो अपने मुनाफे के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता, उसकी तो भावना है कि अगर मैं सत्य व्यवहार करूंगा तो मेरी और मेरे बाल बच्चों की गुजर कैसे होगी? अस्तु वह ग्राहक से कहता है कि दूध बहुत बढ़िया है और किसी दुकान पर इतना अच्छा दूध आपको मिल नहीं सकता। अधिक लाभ के लोभ से उस दूध में पानी और अरारोट आदि पदार्थ मिला रहता है। जब वह दूध रोगी बालक को दिया जाता है तो उसके प्रयोग से वह रोगी शिशु अधिक रोगी होकर अकाल में काल कवलित हो जाता है। कली खिलने के पहले मुरझा जाती है। आप विचार करें इस हत्या का अपराधी कौन हुआ? इस प्रकार अनेकों का कत्ल करके यदि हम अपने बाल बच्चों का भरण-पोषण कर रहे हैं और संसार को धोखे में डालने के लिए नित्य भजन, पूजन और सत्संग भी कर रहे हैं तो क्या भगवान प्रसन्न हो जायेंगे? भगवान ऊपरी आडम्बर और पाखण्ड में फँसने वाले नहीं हैं। उनका नाम तो अन्तर्यामी है वे तो अन्तर की भावना ही देखते हैं। अपने वर्णाश्रम धर्मानुसार आचरण के साथ-साथ भजन करते हुए जीवन यापन से मुक्ति हो सकती है।
अपने लक्ष की ओर से सचेत रहने वाले व्यक्तियों को चाहिए कि वे माया के लिए सीमित पुरुषार्थ करें। अपनी दिनचर्या का एक निश्चित कार्यक्रम अपने पथ-प्रदर्शन को आज्ञानुसार बना लें। नियम के साँचे में अपने जीवन को यदि ढाल दिया जाय तो जीवन सुन्दर और सुखमय बन जाता है तथा भगवान के मंगलमय चरणों में प्रेम निरन्तर बढ़ता रहता है। इसके विपरीत यदि दिनचर्या का क्रम अस्त−व्यस्त रहेगा तो भजन नहीं बन सकता, भजन ही क्या साँसारिक कार्य भी सुचारु रूप से नहीं हो पावेंगे और मस्तिष्क सदा एक उलझन में फँसा हुआ—सा प्रतीत होगा।
जहाँ नेम तहँ प्रेम है, जहाँ प्रेम तहँ नेम।
जा घर नेम न प्रेम है, तो घर कुशल न क्षेम॥
अपने परिवार के समस्त सदस्यों का एक निश्चय कार्यक्रम बना देने से सब तुम्हारे भजन में सहायक बन जायेंगे। सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पहले सब को उठ जाना चाहिए, बालकों को जागने की आवश्यकता ही न पड़ेगी वे तो स्वभाविक ही तुम्हारा अनुकरण करेंगे। माया का कार्य अधिक से अधिक बारह घण्टे होना चाहिए, इससे अधिक माया की गुलामी मत करो। छः घंटे की निद्रा स्वस्थ पुरुषों के लिए पर्याप्त है, अधिक अथवा आलस्य के वश में होना ठीक नहीं है। भोजन भी सदा सतोगुणी और निश्चित समय पर होना चाहिए। जिह्वा के स्वाद में अधिक ठूँस-ठूँस कर खाने वाले का भजन में मन नहीं लग सकता। भगवान श्रीकृष्ण ने इस सम्बन्ध में अपने सखा अर्जुन से कहा—
युक्त हार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
गीता 6।17
अर्थात्—यह दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करने वाले का तथा कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथा-योग्य शयन करने वाले तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
शयन का परित्याग करने के पश्चात् शौच स्नानादि से निवृत्त होकर घर के सब व्यक्ति मिलकर सम्मिलित प्रार्थना करो। प्रार्थना के पश्चात् यदि संभव हो तो घर से दूर किसी जलाशय अथवा नदी तट पर सुरम्य और मनोहर स्थान पर आसन बिछाकर नियम पूर्वक अपने इष्ट मन्त्र का जप और ध्यान करो। यदि ऐसी सुविधा न हो तो अपने घर में ही एक ऐसा स्थान बना लो जो हर समय पवित्र रहे, भजन के अतिरिक्त और किसी रजोगुणी अथवा तमोगुणी कार्य में उसका प्रयोग न हो अन्यथा वहाँ का वातावरण भजन के अनुकूल नहीं रहेगा। प्रातःकाल 4 बजे से 7 बजे तक समस्त मायिक कार्यों को भूल कर अपने मन को केवल प्रभु के पुनीत चरणों में ही लगा दो। दृढ़ संकल्प करो कि प्रातःकाल के तीन घण्टे केवल भगवान के निमित्त हैं। इन तीन घंटों में कोई भी साँसारिक संकल्प मन में न आवे अन्यथा भजन का आनन्द जैसा चाहिये वैसा नहीं रहेगा। जैसे बालू का एक कण ही आँख के लिए दुखदाई हो जाता है वैसे ही भजन के समय किसी प्रकार का संकल्प भजन के आनन्द में बाधक हो जाता है। प्रारम्भ काल में इस अभ्यास में अवश्य कुछ कठिनाई का अनुभव होगा किन्तु कुछ दिनों में अभ्यास करते रहने से मन वैसा ही बनकर भजन में सहायक बन जायेगा। इसी प्रकार सायंकाल को भी अन्य साँसारिक कार्यों से निवृत्त होकर 7 बजे से 10 बजे तीन घण्टे केवल प्रार्थना सत्संग और भजन के लिए रिजर्व रखो। घर के और लोगों को प्रार्थना के बाद प्रातःकाल सत्संग कराओ, भक्त-गाथा गीता रामायण आदि अन्य किसी ग्रन्थ का पाठ करो, ऐसा होने से उन लोगों का व्यवहार भी शुद्ध हो जायेगा और वे सब ही भगवद्भक्त बन कर भजन में सहायक हो जायेंगे, और परस्पर प्रेम की भावनाओं से व्यवहार करेंगे। तब यही नरक बना हुआ गृहस्थ जीवन बैकुण्ठ धाम जैसा सुखद बन जायेगा और लोग तुम्हारे अनुकरणीय परिवार की प्रशंसा करके उदाहरण में रखेंगे। घर के बाद इसी प्रकार मुहल्ले में सत्संग का आयोजन करो। सत्संग इस संसार में सबसे बड़ा उपकार है। सत्संग ही एक ऐसा अमोघ साधन है जिसके सहारे मानव 84 लाख फाँसियों के फन्दों को छिन्न—भिन्न करके शाश्वत शान्ति लाभ कर लेता है।
यदि केवल बालू की ही दीवार बनाई जाय तो प्रथम तो दीवार बनेगी ही नहीं और यदि बन गई तो शीघ्र गिर जायेगी, यदि उस बालू में सीमेंट छठा अंश भी मिला दिया जाये तो वही दीवार पत्थर की बन जाती है। इसी प्रकार माया के सब कार्य भी बालू की भाँति हैं। यदि इनसे परमार्थ रूपी कुछ सीमेन्ट मिल जायेगा तो वही बालू की दीवार सुदृढ़ बन जायगी।
घर में हर समय माया की चर्चा मत करो। व्यर्थ की वार्ता घर के वायुमण्डल को अशुद्ध कर देती है। अपनी गृहस्थी को भगवान शंकर और पार्वती की गृहस्थी की भाँति बनाने का प्रयत्न करो। भगवान शंकर और पार्वती में माया की चर्चा का वर्णन किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता, परमार्थ की चर्चा का ही वर्णन मिलता है। परमार्थ की चर्चा होती रहने से घर का वायुमण्डल शुद्ध हो जायगा। एक स्थान पर स्लेट अथवा तख्ता टाँग दो और अपनी धर्मपत्नी को सत्संग के द्वारा हृदयंगम करा दो कि हर समय की माया की चर्चा परिणाम में दुःखदायी होती है। एक स्थान पर स्लेट अथवा तख्ती टाँग दो जिसमें आवश्यक वस्तुओं की सूची लिखी रहे। ऐसा प्रयोग होने से समय की बचत होगी, व्यर्थ की वार्ता से समय नष्ट नहीं होगा और बचे हुए समय में परमार्थ चर्चा होने से बहुत लाभ होगा।
अपनी कमाई में से दशवाँश, सोलहवाँश अथवा बत्तीसवाँ अंश सतोगुणी दान के लिये अवश्य निकालना चाहिए। दान किये बिना धन की शुद्धि नहीं होती। दान करते समय इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि हमारे धन का दुरुपयोग न होने पावे। देश और काल के अनुसार दान करने से जनता जनार्दन की उचित सेवा हो जाती है।
जिस प्रकार अपनी शुद्ध कमाई से अपनी परिस्थिति के अनुसार दान करना आवश्यक है इसी प्रकार अपने समय का दान करना भी बहुत आवश्यक है। दिन में एक घण्टा महीने में एक दिन और वर्ष भर में कम से कम 15 दिन माया के कार्यों से छुट्टी लेकर किसी एकान्त और पवित्र स्थान में जाकर रहना चाहिए जहाँ सत्संग सेवा और परोपकार का सुअवसर मिल सके।
तन पवित्र किये सेवा, धन पवित्र दिए दान।
मन पवित्र किये भजन ते, तब उपजेगा ज्ञान॥
इस प्रकार सतत अभ्यास करते रहने से तन, मन और धन के पवित्र हो जाने से अन्तःकरण की शुद्धि हो जाती है, तब आन्तरिक ज्ञान और भक्ति का प्रादुर्भाव हो जाता है। युक्ति में ही मुक्ति है। इन युक्तियों का आश्रय लेकर मनुष्य परम भक्त बन जाता है। अन्तिम समय में भगवान का स्मरण करता हुआ सदा के लिए उनकी चिर शान्तिदायिनी गोद में विश्राम पा जाता है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
संसार के माया मोह के कर्दम में फँसा हुआ मानव प्राणी, निस्सार एवं क्षणिक सुखों के जाल में फँसा आगे बढ़ता जाता है। वह जिस ओर देखता है, उसे नाना प्रकार के आकर्षण पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं। भोजन का सुख, कामवासना की कभी न शान्त होने वाली क्षुधा, पदार्थों को एकत्रित कर अपनी प्रतिष्ठा, मान अहं, सामाजिक यश प्राप्ति में वह ऐसा व्यस्त रहता है कि उसे इनके अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता। वह अर्थ काम की प्राप्ति में भयानक कृत्य करता है। वह एक ऐसा पशु है जिसका मन सब क्षण साँसारिक प्रलोभनों में विचरण करता है।
वासना की अतृप्ति :- क्रमशः उसकी वृत्तियों का विकास होता है। भोजन के रस और सुख की क्षणभंगुरता उसे एक स्तर ऊंचा उठाती है। सुस्वादु भोजन खाते खाते वह अनुभव करता है कि उसके अन्दर अतृप्ति है। कोई ऐसी चीज है, जो कुछ पाने को तड़पती है। वह वासनापूर्ति की ओर दौड़ता है, किन्तु वासना पूर्ति के पश्चात् वह देखता है कि उसके अन्तस्थल की अतृप्ति ज्यों की त्यों बनी हुई चल रही है। वासना की पूर्ति नहीं हो पाती, प्रत्युत वह दुगुने वेग से उद्दीप्त हो मन को उद्विग्न करती है।
समग्र संसार में व्याप्त अशान्ति और क्लेश की विचारधाराएँ, उसकी मन शांति को भंग करती रहती हैं। वह जितना ही संसार के बन्धनों में लिप्त होता जाता है, उतना ही चिन्ता, भय, शंका, सन्देह और तुच्छ मनोविकारों के जाल में फँसता है। संसार के नाना पदार्थ, मकान, जायदाद, पुत्र-पुत्री का मोह, अन्य छोटी वस्तुओं में व्याप्त अतृप्त इच्छाएँ, उसे क्षण भर भी ऊंचे स्तर पर उठने नहीं देती। वह जीवन के प्रकाशमय भाग पर दृष्टि केन्द्रित न कर, किसी वस्तु या मनुष्य में कोई त्रुटि, दोष या बुराई देखता है। अकारण ही दूसरों पर सन्देह करता है। उसके मस्तिष्क में नानाप्रकार के काम, क्रोध, अहं, ईर्ष्या, क्षोभ, उद्वेग आदि दूषित मनोविकार प्रवेश कर उसे निरन्तर उद्विग्न रखते हैं।
जैसी मनुष्य की आन्तरिक स्थिति होती है, वैसे ही वातावरण की वह सृष्टि करता है। यदि आप अन्तःकरण में दूसरों के प्रति अविश्वास, कटुता, दुर्व्यवहार लेकर अग्रसर हो रहे हैं, तो निश्चय जानिये उन्हीं दुर्व्यवहारों की वापसी आपको प्राप्त होने वाली है।
उद्वेग तथा दुश्चिन्तन उत्पन्न करने वाली वृत्ति तमोगुणी है। आसुरी वृत्ति का निष्कासन प्रारम्भ कीजिए। ईर्ष्या, द्वेष तथा क्रोध को अन्तःकरण से बहिर्गत कर दीजिए। मनुष्य जब तक अपने आपको पार्थिव शरीर मानता है, तभी तक वह सात्विकता और पवित्रता से दूर रहता है। आसुरी वृत्ति की प्रधानता से दूसरों के प्रति पवित्रता से दूर रहता है। आसुरी वृत्ति की प्रधानता से दूसरों के प्रति कटुता, शत्रुता तथा शंका की संदेहात्मक वृत्तियों का आविर्भाव होता है। इसके विपरीत सतोगुणों के दृष्टिकोण को अपने समक्ष देखने से समस्त दैवी सम्प्रदाओं की सृष्टि होती है। क्रोध के स्थान पर त्याग, प्रतिशोध के स्थान पर प्रेम, करुणा, सहानुभूति की उत्पत्ति होती है।
मनुष्य जितना ही साँसारिक वस्तुओं के बन्धन से मुक्त होकर दिव्य भावना और दिव्य वातावरण की सृष्टि में निवास करता है, आत्मिक ज्ञान में लय होता है, उच्च सात्विक विचारधारा में निवास करता है, उतना ही उसे आनन्द प्राप्त होता है। सर्वत्र परमात्म तत्व का अनुभव करने वाला साधक प्रत्येक अणु परमाणु में एक आत्मा का प्रकाश देखता है। वह समग्र संसार के प्राणियों में आत्मभाव से विचरण करता है, सबके प्रति सत्य, प्रेम और न्याय के दिव्य विधान से प्रेरित रहता है। वह भय, चिंता, अहं और घबराहट की मनोभूमि से ऊंचा उठ जाता है। मनुष्य के कल्याण की अनेकों योजनाओं में से भारत की अहं नाश की योजना सबसे कल्याणकारी है। अहं से मुक्त होकर वह आत्म-भाव की वृद्धि करता है।
वह संकीर्णता से मुक्त है। उसका आत्म भाव चारों ओर से विकसित होता है, जिसमें सब प्रकार के कीट, पतंग, पशु-पक्षी मानव आदि सम्मिलित रहते हैं। वह साम्प्रदायिकता, रंग−रूप का भेद, कट्टरता से ऊंचा रहता है। उसके दृष्टिकोण में संसार एक शिक्षालय है, जिसमें मनुष्य को प्रेम, समता, सहानुभूति अथवा उच्च दैवी सत्ता से एकता की शिक्षा दी जाती है। संकीर्णता से मुक्त रहने के कारण उसका आत्म-भाव पृथ्वी और आकाश की समस्त जिन्दगी और व्यापार, अणु-परमाणुओं में व्याप्त है।
प्रकाश पुँज ईश्वरः- समस्त प्रकाश का पुञ्ज ईश्वर है। ईश्वर चिंतन मुक्ति का सर्वोपरि साधन है। भीतर बाहर सर्वत्र ईश्वरत्व का दर्शन करना को मुक्ति का साधन हो सकता है। हम ईश्वरत्व की आराधना करें। ईश्वरत्व का व्यवहार करें। जो कार्य ईश्वरत्व जैसे तत्व के विरुद्ध हो सकते हैं, हम उनसे बचकर ही ईश्वर के प्रिय पुत्र होने के अधिकारी हो सकते हैं।
ईश्वरत्व हमारे अन्तःकरण में जागृत एक दिव्य भावना है। आन्तरिक कल्मष से दूर वह दिव्य संपदाओं से प्रभावित है। अहंकार, क्रोध, काम, मद इत्यादि षटरिपुओं से उनका कोई सरोकार नहीं है। ईश्वरत्व से अभिप्राय है अक्षय प्रेम, सहानुभूति, करुणा, शील, आनन्द, सत्य आदि। इन दैवी गुणों से आन्तरिक प्रवेश इतना भरा पूरा रहना चाहिये कि कोई भी साँसारिक विकार आकर आन्तरिक शान्ति भंग न कर सके। व्यावहारिक ईश्वरत्व का पालन करने वाला यह पुरुष अपने दैनिक जीवन तथा व्यवहार में सब स्त्री-पुरुषों, समाज, पशु-पक्षी से वही शील सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करता है, जो वह अपने इष्ट-मित्रों तथा बन्धु-बाँधवों से करता रहता है। उसके प्रेम तथा आत्म भाव का दायरा अत्यन्त विस्तृत होता है। संसार का समस्त व्यापार उसमें सम्मिलित है। जब आप रोगी की सेवा करते हैं, तो ईश्वरत्व का अपने अन्दर मौजूद होना दिखाते हैं। दुखी को सहानुभूति, रोते हुए को आश्वासन, भूखे नंगे को रोटी कपड़ा देते हैं, प्यासे को जल पिलाते हैं तो आप ईश्वरत्व का परिचय देते है। जब आप न्याय की कुर्सी पर बैठ कर नीर-क्षीर विवेक करते हैं, दोषी को दण्ड तथा निर्दोष को मुक्त करते हैं, तो आपके मुख से ईश्वर बोलता है। आप सत्य पथ पर चल रहे हैं, किन्तु फिर भी लोग आपके विषय में झूठे आरोप करते हैं, गालियाँ देते हैं और अपशब्द व्यवहार में लाते हैं, उस कष्टकाल में आपकी आन्तरिक शान्ति को स्थिर रखने वाला तत्व ईश्वर ही है। ईश्वरत्व भूखे का सहारा, पीड़ित का साथी, और रोगों का आश्रय है। कोई ऐसा सद्गुण नहीं जो हम से दूर हो, या दुष्प्राप्य हो, यह तो हमारे इर्द-गिर्द सर्वत्र विद्यमान है। इसका आपसे निकट सम्बन्ध है। इसकी प्रगति से आप में दिव्य भावना, दिव्य संकल्प तथा दिव्यवाणी का संचार होता है। ईश्वरत्व की सिद्धि से ही मानव परमेश्वर का सबसे प्यारा पुत्र बनता है।
जिस व्यक्ति में ईश्वर का जागरण हो जाता है, वह उसी क्षण जीवन के महत्तम क्षण को प्राप्त करता है। वह यथार्थ में कष्ट और मृत्यु पर विजय पा लेता है, उसकी समस्त शारीरिक वासना जन्य दुर्बलताएं क्षार क्षार होकर उसके शरीर और अन्तःकरण से भूमिसात् हो जाती हैं। उसके शरीर और मन में ईश्वरत्व का अणु अणु जाग्रत हो उठता है, उसमें जैसे प्रकाश पुञ्ज भर रहा हो और कोने कोने का अन्धकार विलीन हुआ जा रहा हो। वह सत्य, प्रेम, ब्रह्म-रूप, चेतन, अमृत और दिव्य प्राणमय हो उठता है। ऐसे आत्म प्रकाश के क्षण जीवन में धन्य हैं।
सर्वव्यापक आत्मा :- आत्म तत्व से प्रकाशित व्यक्ति संसार में रहता हुआ भी विरागी है, मोह माया में संलग्न रहते हुए दीखने पर भी, वह वास्तव में इनसे ऊँचा, बहुत ऊँचा है। उसका जीवन, आदर्श और व्यवहार दिव्य आध्यात्मिक प्रबन्ध से सुव्यवस्थित है। परमात्मा का निवास उसके ऊपर नीचे चारों ओर है। वह संसार के कार्यों को कर्तव्य की प्रेरणा समझ कर करता है, किन्तु उनमें लिप्त नहीं रहता। संसार के सब मनुष्य, तथा अन्य उसके आत्मबन्धु हैं। सर्वत्र एक ही आत्मा का निवास है। उनका भोजन, प्रबन्ध, रहन सहन, व्यवहार ब्रह्म-रूप, चेतन, अमृत तथा दिव्य प्राण से संचरित है। उसका मन सत्य और शिव संकल्प मय है। वह जीता है, तो उसके जीवन का अभिप्राय संसार में दूसरे अन्धकार में रहने वाले प्राणियों को प्रकाश में लाना है। वह कर्त्तव्य समझ कर इसी प्रकाशमय मार्ग पर आरुढ़ रहता है।
(श्री दौलत राम कटहरा बी.ए. दमोह)
सिद्धान्ततः क्रोध को सभी त्याज्य मानते हैं पर व्यवहार बुद्धि रखने वाले लोग कहते हैं कि-”लोक व्यवहार में यह आवश्यक है। अन्याय का प्रतीकार बिना क्रोध के नहीं हो सकता। जिन्होंने अकेले ही रहने का निश्चय किया है, और जिनके ऊपर दूसरों का उत्तर दायित्व नहीं है, वे क्रोध को अवश्य छोड़ कर अपना काम चला सकते हैं। परन्तु जिन्होंने लोक-सेवा का व्रत लिया है, उन्हें अपनी रक्षा के लिए न सही, पर कम से कम अन्याय से दूसरों की रक्षा के लिए तो दुष्टों और अन्यायियों पर क्रोध करना ही पड़ेगा।” अतः प्रायः लोग यही मानते हैं कि क्रोध का त्याग व्यवहार्य नहीं है।
मेरी समझ में जो लोग क्रोध को व्यवहार्य नहीं मानते हैं वे मानो कहते हैं कि यदि क्रोध छोड़ेंगे तो अन्याय का प्रतिकार भी छोड़ देंगे। अन्याय और बुराई का विरोध करेंगे तो एक शर्त के साथ। क्रोध करने दोगे तो बुराई का विरोध करेंगे अन्यथा नहीं। महाभारत लिखने में गणेश जी ने व्यास जी से शर्त कर ली थी कि यदि आप बोलते बोलते रुक जावेंगे तो हम लिखना छोड़ देंगे। ठीक ऐसी ही इनकी भी शर्त है। हमसे क्रोध रोकने को कहोगे तो हम अन्याय व बुराई का विरोध करना भी छोड़ देंगे। मतलब यह कि बिना क्रोध की प्रेरणा के हम अन्याय के विरोध में प्रवृत्त नहीं हो सकते।
मैं मानता हूँ कि क्रोध को जीतना बहुत कठिन है परन्तु मेरे सामने कुछ उदाहरण हैं जिनके बल पर मैं कह सकता हूँ कि बिना क्रोध किये भी बुराई का विरोध किया जाना सम्भव है। पहला उदाहरण गाँधी जी का है। उनका सारा जीवन अन्याय का विरोध करने में बीता, परन्तु उन्होंने ऐसा करने के लिए क्रोध करना आवश्यक नहीं बताया। दक्षिण अफ्रीका में कई बार उन्हें मारा-पीटा गया किन्तु उन्होंने उसका बदला नहीं लिया। विरोधियों को सहृदयता-पूर्वक क्षमा कर दिया। गाँधी जी ने बताया है कि अन्याय का विरोध न करना कायरता है, बुज़दिली है। और उन्होंने बार बार कहा है कि बुज़दिली से तो हिंसा अच्छी है। कहने का अर्थ यह है कि अन्याय का विरोध तो हर हालत में करना चाहिए। डरना तो किसी हालत में अच्छा नहीं है। यदि अन्याय का विरोध शान्त चित्त होकर नहीं कर सकते तो क्रोध का आश्रय लेकर ही करो, पर करो जरूर। हाँ, यह बात अवश्य है कि शान्त-चित होकर विरोध करना, क्रुद्ध होकर विरोध करने से कई गुना अच्छा है। अक्रोध और अहिंसा ही प्रशस्त धर्म है।
दूसरा उदाहरण गीता का है। गीता का उपदेश है [अध्याय 3, श्लोक 25] कि कर्म में आसक्त हुए अज्ञानी जन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही अनासक्त हुआ विद्वान भी लोक शिक्षा को चाहता हुआ कर्म करे।’ यह उपदेश गाँधी जी के विचार की पूर्णतया पुष्टि करता है। कर्म में आसक्त अज्ञानी जन क्रोध का आश्रय लेकर अन्याय का विरोध करते हैं परन्तु अनासक्त हुआ विद्वान पुरुष शान्त भाव से उसका विरोध करेगा और लोगों को अन्याय का प्रतिकार करने की तथा प्रतिकार करते हुए चित्त को स्थिर रखने की शिक्षा देगा।
अभी तक बहुधा लोग ही समझते थे कि क्रोध आदि को छोड़ने का अर्थ है, अन्याय और बुराई के विरोध को भी छोड़ देना। दोनों प्रायः पर्यायवाची ही समझे जाते थे, किन्तु गाँधी जी ने अपने जीवन में एक नया प्रयोग किया और अपने उदाहरण द्वारा यह सिद्धान्त हमारे सामने उपस्थिति किया कि यद्यपि साधारण तथा क्रोध जैसे मनोविकारों की प्रेरणा की आवश्यकता प्रतीत होती है तथापि वे अनिवार्य नहीं हैं। साधारण व्यक्ति मनोविकारों की प्रेरणा से ही कार्य करता है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि उसे कार्य में प्रवृत्त करने के लिए आवश्यक हैं परन्तु श्रेष्ठ व्यक्ति इनके बिना भी नियत कर्म करता रहता है। बिना मनोविकारों की प्रेरणा प्राप्त किये शास्त्र द्वारा नियत उत्तम कर्मों में पूर्ण मनोयोग और उत्साहपूर्वक निरत रहना कठिन आवश्यक है किन्तु साध्य है। बहुत कम लोगों ने इस दिशा में प्रयत्न किया है। जीवन में इस सिद्धान्त के व्यापक प्रयोग की आवश्यकता है और तब अनेक व्यक्तियों के उदाहरण सम्मुख उपस्थित होने से वह बात साधारण सी हो जायगी और तब कोई यह सन्देह न करेगा कि मनोविकारों को छोड़ कर भी गृहस्थ-धर्म निबाहना सम्भव है। काम भी मनोविकारों के ही अंतर्गत आता है और मैं अपने विश्वास के लिए इसे अपवाद रूप नहीं मानता।
मुझे आश्चर्य होता है कि लोग बिना ईर्ष्या आदि किये आगे बढ़ने का प्रयत्न संभव मानते हैं किन्तु उसी तरह क्रोध आदि किये बिना अन्याय का प्रतिकार करना संभव नहीं मानते?
इस प्रश्न पर एक दूसरे दृष्टिकोण से भी विचार करें। जब कोई हम पर अन्याय करता है, तो उससे हमारी किसी वस्तु पर गहरा आघात लगता है। धन-दौलत पर चोट लगती है या मान-सम्मान को धक्का लगता है या किसी सिद्धान्त को ठेस लगती है। किसी प्रिय वस्तु का विनाश हमें सहना पड़ता है और प्रिय वस्तु का विनाश अपनी आँखों के सामने होता हुआ देखकर हम विक्षुब्ध हो उठते हैं और तिलमिला जाते हैं। फिर हानि पहुँचाने वाले को पहिचान लेने पर यही क्षोभ, क्रोध का रूप धारण कर लेता है। अतएव मैं समझता हूँ कि प्रिय का विनाश होता हुआ देखकर जिसे क्षोभ होवेगा वह अपने क्रोध को न रोक सकेगा। इसलिए जब तक प्रिय से प्रिय वस्तु के विनाश को सहन करने की हममें शक्ति न होगी तब तक हम अपने क्रोध को न रोक सकेंगे। प्रिय वस्तु के विनाश को सहन करने का मेरा यह मतलब कदापि नहीं है कि हम जानबूझ कर उसका विनाश हो जाने दें। हमें तो प्रिय वस्तु की रक्षा करने का भरसक प्रयत्न उत्साहपूर्वक करना चाहिए पर साथ-साथ वैसा प्रयत्न करते हुए यह सम्बोधन भी हृदय को देते जाना चाहिये कि यदि प्रिय वस्तु का विनाश हो ही गया तो भी मैं उसे अविचलित भाव से सहन करूंगा। मैं समझता हूँ कि गाँधी जी इस सम्बन्ध में भी हमारे मार्ग दर्शन रहे हैं। विचारों में प्रिय वस्तु के साथ संसर्ग छोड़ दें, विचार में प्रिय का विनाश देखने के लिए तत्पर रहें तो, प्रिय का विनाश होने पर हमें अपनी इस तत्परता के कारण चित्त को अविचल बनाए रखने में बड़ा बल मिलेगा। कोई उसका विनाश कर देगा अथवा विरोध करेगा तो हमें वैसा उद्वेग, दुःख अथवा क्रोध न होगा। इस सम्बन्ध में मुझे एक घटना याद आ जाती है। मेरा नन्हा सा बच्चा बीमार था। मैं उसकी दवा करता जाता था पर ख्याल करता था कि कहीं इसकी मृत्यु हो गई तो उसे भी सहन करूंगा। अन्ततोगत्वा बच्चे की मृत्यु हो गई और मुझे उसकी मृत्यु पर कुछ अफसोस हुआ अवश्य, परन्तु वह इतना कम था कि उसकी तुलना में विचारों में उसका संग पहले से ही न छोड़ने पर होने वाला दुख कई गुना होता। मुझे इस सम्बन्ध में अपने एक मित्र का एक सिद्धान्त याद आता है। वे कहा करते थे “सर्वश्रेष्ठ के लिए प्रयत्न करो। पर घोर अनिष्ट के लिए भी तैयार रहो।” यही सिद्धान्त अनेक अवसरों पर चित्त को शान्त बनाए रखने में मुझे सहायता देता रहा है और मेरा विश्वास है अन्य लोगों को भी यह सिद्धान्त लाभदायक सिद्ध होगा।
यदि हम अपनी प्रिय वस्तुओं व सिद्धान्तों का विरोध व विनाश अविचलित चित्त से देखने का निश्चय कर लें तो हमारा यह निश्चय अवश्य ही चित्त को शान्त बनाए रखने में सहायक होगा। किन्तु जो व्यक्ति क्रोध की आवश्यकता में विश्वास रखेगा वह क्रोध को हरगिज न रोक सकेगा।
(प्रो. लालजी राम शुक्ल)
हम अपने विचारों को साधारणतः बोलकर व्यक्त करते हैं। जब हम किसी दूर रहने वाले व्यक्ति को अपने विचार बताना चाहते हैं तो हम उसे पत्र अथवा तार द्वारा सूचित करते हैं। बिना भौतिक साधन के विचार किसी दूर रहने वाले व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं—इस बात पर हमारा कदापि विश्वास नहीं होता। किन्तु हम यदि अपने व्यावहारिक जीवन को सूक्ष्मता से देखें तो हम भौतिक साधनों के बिना विचारों के अपने मित्रों तक पहुँचने के बहुत कुछ प्रमाण पायेंगे। हाल की ही बात है, लेखक अपने एक मित्र के बारे में और उसके प्रेम-सम्बन्ध में कुछ कह रहा था। उस मित्र से कई दिनों से पत्र व्यवहार बन्द हो रहा था। ठीक उसी समय पर उस मित्र ने भी लेखक के विषय में सोचा और उसने लेखक को पत्र लिखा। इसी प्रकार जब लेखक एक दूसरे मित्र के बारे में चिन्ता कर रहा था, लेखक का वह मित्र भी लेखक के बारे में चिन्ता करने लगा। लेखक उसके घर गया और इस अनुभव की सत्यता ज्ञात की।
हमारे विचार प्रकाशित न होने पर भी जिस व्यक्ति के प्रति जैसे होते हैं वे उसको ज्ञात हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने मन को एकाग्र करके किसी व्यक्ति की अपने प्रति धारणा के विषय में यदि जानना चाहे तो वह जान सकता है। यदि वह व्यक्ति अपने सामने है तो उसकी धारणा का जानना सरल ही है, पर दूर रहने पर भी उसकी मुखाकृति को कल्पना में लाकर उसके विषय में चिन्तन करे और जो विचार उस समय उसके मन में उठें उन्हें ध्यान में रखे। यह देखना कि विचार उस व्यक्ति की धारणाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति हमसे वास्तविक प्रेम करता है उसके विषय में चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होने लगता है और जो व्यक्ति हमें नहीं चाहता उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली भाँति समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।
हृदय का परिवर्तन :- हम अपने स्थान में रहकर भी दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय की धारणा बदल सकते हैं। दूसरे व्यक्ति के विचारों का बदलना अपने चित्त की एकाग्रता पर निर्भर रहता है। एक व्यक्ति यदि दूसरे व्यक्ति को कोरे तर्क के बल पर प्रभावित करना चाहे तो वह देखेगा कि उसका प्रयत्न व्यर्थ गया। जब तक तर्क करने वाले व्यक्ति के प्रति किसी व्यक्ति की श्रद्धा नहीं होती, युक्तियों को सुनने वाले के मन पर कोई भी अनुकूल असर नहीं होता। तर्क करने से कभी-कभी प्रतिकूल परिणाम होता है। मनुष्य की बुद्धि उसके हृदय की दासी है। जब तक हम मनुष्य के हृदय पर अधिकार नहीं करते, उसकी बुद्धि को भी प्रभावित नहीं कर सकते। दूसरे के हृदय पर अधिकार मन की साधना अर्थात् एकाग्रता से होता है, हृदय के प्रभावित हो जाने से बौद्धिक परिवर्तन सरलता से हो जाता है। हृदय का परिवर्तन अपनी सद्भावना के दर्शाने से होता है। इसके लिए अधिक बकवास करने की भी आवश्यकता नहीं होती। किसी को दो-चार शब्दों से भी प्रभावित करके उसके हृदय को परिवर्तन कर सकते हैं। आवश्यकता यह है कि हम उसके प्रति वास्तविक सद्भावना रखें। सद्भावना के लिए अपने ही स्थान में रह कर उसके शुभ-चिन्तन की आवश्यकता है।
रोग में सद्भावना का महत्व :- शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार में सद्भावना का महत्व भली भाँति देखा जाता है। रोगी के प्रति सद्भावना प्रकट करने से रोग नष्ट होता है। शारीरिक रोगों के उपचार में जितनी भौतिक औषधि कार्य करती है उससे कहीं अधिक डॉक्टर की रोगी के प्रति सद्भावना कार्य करती है। देखा गया है कि पैसे की दृष्टि से रोजगार करने वाले व्यक्ति रोगी की योग्य चिकित्सा नहीं कर सकते। जो वैद्य जितना ही अधिक पैसे का साथी होता है वह रोगियों की चिकित्सा करने में उतना ही अयोग्य होता है। लोभी वैद्य रोगी को स्वस्थ नहीं करना चाहता क्योंकि इससे उसकी आमदनी का जरिया चला जाता है। वह आन्तरिक मन से रोगी को रोगी ही बनाये रखना चाहता है ताकि वह बार-बार उसे बुलावे और उसे फीस तथा दवा का दाम भी दे। इससे उसकी आन्तरिक भावना उसकी दवाइयों की अपेक्षा अधिक कार्य करती है और बीमार ही बना रहता है। देखा गया है कि कुछ वैद्य पहले सफल चिकित्सक रह कर भी बाद में अपने रोगियों को आरोग्य प्रदान करने की शक्ति खो बैठते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन का कारण उनके विचारों में दोष उत्पन्न हो जाना ही होता है।
चिकित्सक अपने घर रह कर भी रोगी को आरोग्य प्रदान करने में सफल हो सकता है। यदि चिकित्सक निःस्वार्थ भाव से किसी रोगी को चंगा करने की सोचे तो उस रोगी को अवश्य लाभ होगा। यहाँ चित्त की एकाग्रता और चिकित्सक की सद्भावना कार्य करती है। हम चित्त को एकाग्र करके दूर से ही किसी व्यक्ति के विचारों को बदल सकते हैं। जब किसी रोगी के हृदय की तन्त्री किसी आरोग्यवान् व्यक्ति से जुड़ जाती है तो उसे सफलता से आरोग्य लाभ हो जाता है। रोगी के विचार आरोग्यवान् व्यक्ति के विषय में चिन्तन करने से बदल जाते हैं। उसके आत्म भर्त्सना के भाव भी विनष्ट हो जाते है और आशा का संचार हो जाता है। मन के आशान्वित होने पर रोग का नष्ट होना अनिवार्य है।
रोगी के विचारों को आशान्वित बनाने में चिकित्सक भारी काम करता है। स्वयं रोगी के विचारों में किसी प्रकार की स्थिरता नहीं रहती। नैराश्य युक्त रहता है और रोग से मुक्त होना चाहता है पर उसे मुक्त हो सकने का विश्वास नहीं होता। स्वयं चिकित्सक को ऐसी अवस्था में प्रयत्न करना पड़ता है। उसे मानो दल-दल से हाथ पकड़ कर निकालना पड़ता है। इस कार्य में चिकित्सक को रोगी से बातचीत कराना आवश्यक नहीं होता जितना उसके विषय में चिन्तन करना और उसकी सेवा करना लाभदायक होता है। निःस्वार्थ सेवा करने से रोगी के हृदय पर चिकित्सक का अधिकार हो जाता है और उसके विचार फिर बदल देना सरल हो जाता है।
घटना का आभास :- हम जितनी एकाग्रता के साथ दूसरे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं। वह उतना ही अधिक हमारे विषय में चिन्तन होता है। मरते समय मनुष्य दूर रहने वाले अपने प्रियजन का बड़ी एकाग्रता से चिंतन करता है। देखा गया है कि जिस व्यक्ति के बारे में मनुष्य ऐसा सोचता है वह उद्विग्नमन हो गया है। या तो उसे जाग्रत अवस्था में ही उसका स्मरण आने लगता अथवा वह उसके विषय में स्वप्न देखने लगता है। इस प्रकार के कितने ही स्वप्न सत्य होते पाये गये हैं। लेखक के एक छात्र ने एक बार अपने पिता की मृत्यु का स्वप्न देखा और दूसरे दिन उसकी मृत्यु का तार आया। सत्य होने वाले और साधारण स्वप्नों में अन्तर यह होता है कि स्वप्नावस्था के पूर्व ही मनुष्य उद्विग्नता का पता लगाना चाहे तो वह होने वाली घटना का पता लगा सकेगा।
तपस्या द्वारा मनोबल की वृद्धि :- जो मनुष्य अपने भीतर जितना ही अधिक अपने मन को ले जाता है वह दूसरों की घटनाओं को जानने की उतनी ही अधिक शक्ति प्राप्त कर लेता है। दूसरे मनुष्यों के विचारों को प्रभावित करने की शक्ति तथा अपने संकल्प को सफल बनाने की शक्ति भी अपने मन को अपने भीतर ले जाने से आती है। कई दिनों के उपवास से इस प्रकार की शक्ति का उदय होता है। संसार के अनेक विद्वान् और सभी महात्माओं ने अपने विचारों को प्रभावशाली बनाने के लिए अनेक प्रकार की तपस्याएँ की हैं। जो व्यक्ति जितनी तपस्या करता है उसके विचार उतने ही प्रभावशाली होते हैं। सत्य और शक्ति दोनों को ही प्राप्त करने के लिए तपस्या की आवश्यकता है। हमारा आन्तरिक मन कल्पनातीत शक्तियों का केन्द्र है। हम जिस प्रकार की शक्ति का साक्षात्कार करना चाहते हैं मन की एकाग्रता के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। अपने स्वार्थ को त्यागने से शक्ति की असीम वृद्धि हो जाती है। जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति को अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये कामना में नहीं लाता वह उतना ही अधिक उस शक्ति को बली बना लेता है। हम इस तरह देखते हैं कि तप और निःस्वार्थ भावना के कार्य मनुष्य को अपार शक्ति प्रदान करते हैं। हमारी मानसिक शक्ति हमारे विश्वास पर निर्भर है। जैसा मनुष्य का अपनी शक्ति के विषय में निश्चय होता है उसके मन में उसी प्रकार की शक्ति का उदय होने लगता है। पर निश्चय की दृढ़ता तप का परिणाम है। तप और योग में मौलिक भेद नहीं, दोनों में ही मन को रोकना पड़ता है। मन की एकाग्रता से ही निश्चय की दृढ़ता अर्थात् विश्वास आता है। विश्वास सिद्धि का कारण होता है। मनुष्य जितनी ही अधिक तपस्या करता है मानसिक शक्ति को उतना ही अधिक बढ़ा लेता है। पर यह बढ़ी हुई शक्ति अपने ही काम में लाने से नष्ट हो जाती है। इस शक्ति को लोकोपकार में लगा देने से चिरस्थायी हो जाती है। शक्ति का उदय तप अर्थात् चित्त की एकाग्रता से होता है और उसका स्थायी रहना उसके उपयोग से।
वैयक्तिक और समष्टि-मंन :-
हमारे वैयक्तिक मन के परे समष्टि मन है। यही मन शक्ति और प्रतिभा का केन्द्र है। चित्त की एकाग्रता से मनुष्य अपने आपको समष्टि-मन से मिला देता है। तपस्या का यही परिणाम है। इस मनुष्य का वैयक्तिक मन शक्तिशाली हो जाता है, जब तक मनुष्य के वैयक्तिक मन और समष्टि मन में एकता रहती है मनुष्य शक्तिशाली बना रहता है, जब मनुष्य अपने आपको समष्टि-मन से अलग कर लेता है तो उसकी शक्ति का ह्रास हो जाता है। शक्ति समष्टि मन अर्थात् विराट पुरुषों से, जो कि हमारा अन्तर्यामी है, आती है। जब हम विराट पुरुष से प्राप्त शक्ति उसी के काम में लाते हैं तो वह नष्ट नहीं होती। जितना ही अधिक हम अपनी शक्ति को लोकोपकार में खर्च करते हैं हमारी शक्ति उतनी ही अधिक बढ़ती है। अपने स्वार्थ की सिद्धी वाले कार्यों में खर्च करने से उसका ह्रास होता है।
मानसिक शक्ति का सम्बन्ध मनुष्य की शारीरिक शक्ति से प्रायः स्थापित किया जाता है। कहा जाता है कि मनुष्य की जैसी शारीरिक शक्ति होती है उसी के अनुसार उसकी मानसिक शक्ति भी होती है। हमारी इस प्रकार की धारणा भ्रमात्मक है। देखा गया है कि मोटे-ताजे मनुष्य का मानसिक बल नहीं के बराबर होता है और दुर्बल मनुष्य के मानसिक बल से संसार डरता रहता है। अपढ़ और पढ़े लिखे लोगों के मानसिक बल को ही देखें। सुशिक्षित मनुष्य का मानसिक बल सदा अशिक्षित से अधिक होता है। जितना आत्म विश्वास शिक्षित में पाया जाता है उतना अशिक्षित व्यक्ति में नहीं। उसमें न तो उतना आत्म विश्वास होता है न मानसिक दृढ़ता ही। इसका कारण भी चित्त की एकाग्रता का अभ्यास है। जो व्यक्ति किसी विषय को लेकर जितना ही अधिक मानसिक एकाग्रता का अभ्यास करता है उसमें उतनी ही अधिक मानसिक दृढ़ता और आत्म विश्वास की उत्पत्ति होती है।
(डॉ. गौरीशंकर जी श्रीवास्तव)
मनुष्य बुद्धि प्रधान होने के कारण सृष्टि के अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ और भिन्न है। बुद्धि की विशेषता ही उसे मनुष्य बनाती है। बुद्धि का कार्य विचार करना है। इसका क्षेत्र मस्तिष्क है। विचारों का उत्पादन करना बुद्धि का काम नहीं मन की क्रिया है। संकल्प पहले मन में जाग्रत होते हैं। बुद्धि के क्षेत्र में आकर वे विचार का रूप धारण करते हैं। बुद्धि की निरन्तर क्रिया शीलता के कारण हमारे मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार एकत्रित हो जाते हैं। इनमें अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। हमारे शरीर की क्रिया इन्हीं विचारों के आधीन रहती है। जब हमारी बुद्धि किसी बात को तय कर लेती है तो उसी के अनुसार शारीरिक क्रियाएँ होने लगती हैं। यह फैसला अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी।
विचारों के जमघट में हमें यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनमें से कौन सा हित-कारक और कौन सा अहितकर, कौन सा करणीय और कौन सा त्याज्य एवं कौन से सही और कौन सा गलत है। इस स्थिति में कोई विशिष्ट शक्ति हमें निर्णय सुझाती है। मस्तिष्क की इसी निर्णायक शक्ति का नाम विवेक है। यह हमारे अन्तरात्मा की वह पुकार है जिस पर हम सत् और असत् न्याय और अन्याय तथा अच्छे और बुरे का फैसला करते हैं। उलझनों की अँधेरी घड़ियों में— चिन्ता के भयंकर क्षणों में यही विवेक हमारा पथ प्रदर्शन करता है।
जिसमें विवेक की कमी होती है वे नाजुक क्षणों में अपना सही मार्ग निश्चित नहीं कर पाते और गलत रास्ते पर चल उठते हैं जिसके कारण उन्हें पतन और असफलता के गर्त गिरकर लाँछित और अपमानित होना पड़ता है। जिनमें शक्ति का प्राधान्य होता है वे दूरदर्शी होते हैं, काम के परिणाम को समझते हैं, अपने विचारों के महत्व को जानते हैं और इसीलिए उपयुक्त मार्ग अपनाते हैं। यही शक्ति साधारण व्यक्ति को नेता, महात्मा और युग पुरुष बनाती है।
विवेक प्रत्येक व्यक्ति में जन्मजात रूप से वर्तमान रहता है। इस पर हमारे संचित और क्रियमान कर्मों की छाया का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण वह किसी में कम और किसी में अधिक दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हम अपने संचित एवं क्रियमान कर्मों से इतने अधिक प्रभावित रहते हैं कि विवेक की पुकार हमें ठीक से सुनाई नहीं पड़ती। यही विवेक हमारी वास्तविक मानवता का प्रतीक और सद्बुद्धि का द्योतक है। इसके अभाव में मनुष्य पशु या उससे भी गया बीता बन जाता है और वह स्वयं के लिए, समाज के लिए, राष्ट्र के लिए और अन्ततः सृष्टि के लिए एक भार एवं अभिशाप हो जाता है।
मानव होने के नाते हमारा यह प्राथमिक कर्त्तव्य है कि हम इस विवेक को जाग्रत करें और उसकी आवाज को सुनना सीखें। संसार के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े सभी मनुष्य इसकी कृपा के लिए लालायित रहते हैं।
इसकी प्राप्ति का क्या उपाय है? इसके उत्तर को पाने के लिए नीचे का उदाहरण सहायक होगा।—
बाण शय्या पर, महाभारत के पश्चात्, भीष्म पितामह पड़े थे। उनके समीप ही युधिष्ठिर, द्रौपदी आदि बैठे थे। भीष्म कह रहे थे—
“मनुष्यत्व का तकाजा यही है कि वह अपनी आँखों से पाप और अधर्म को होता देखकर सहन न करे। यदि उसके समक्ष कोई अन्याय युक्त बात कही जाय तो उसका कर्त्तव्य है कि वह उस बात का विरोध करे और यदि विरोध करने की सामर्थ्य न हो तो उस स्थान से उठकर चला जाए।”
भीष्म के इन वाक्यों को सुनकर द्रौपदी को पहले कुछ हँसी आई फिर उनकी मुद्रा विकीर्ण हो गई। उन्होंने सोचा कि दुनिया में उपदेश करना कितना सरल काम है और पालन करना कितना दुस्साध्य। भीष्म का यह ज्ञान उस दिन कहाँ चला गया था जब दुर्योधन ने राज सभा में इन्हीं के सामने चीर खींचकर मेरा अपमान किया था। उस दिन प्रार्थना करने पर भी इनका मुँह क्यों न खुला? क्या मेरे प्रति वह अन्याय नहीं था? फिर भीष्म की मनुष्यता उस समय कहाँ थी?-इस विचार से उन्हें किंचित व्यंग्यात्मक हँसी आई।
उन्होंने फिर सोचा कि इतनी लाँछना और अपमान सहकर भी मैं आज तक दुनिया में जीवित हूँ,- कितने कलंक की बात है यह मेरे लिए- इस विचार से उनकी मुख श्री म्लान हो गई।
भीष्म से द्रौपदी का यह भाव छिपा नहीं रहा। उन्होंने उस अन्तर्द्वन्द्व को समझते हुए कहा—
“पुत्री द्रौपदी, तुम्हारी शंका झूठ नहीं है। मैं ही उस कुकर्म का मूल कारण हूँ। यदि मैं दुःशासन के उस कुकृत्य का उसी समय विरोध करता तो उसकी सामर्थ्य नहीं थी कि वह तुम्हारा अपमान कर सकता। किन्तु समझती हो- मैं यह क्यों नहीं कर सका?— मेरी बुद्धि पर उसके कुधान्य का प्रभाव था। मेरी विवेक शक्ति पर अज्ञान का परदा पड़ा था। कर्त्तव्य के ज्ञान से मैं उस समय शून्य था।
आज 56 दिनों से बिना अन्न जल के मैं बाण शय्या पर पड़ा हुआ हूँ। दुर्योधन के धान्य का कुप्रभाव इस तपाग्नि में जलकर नष्ट हो गया है और मुझे विवेकशक्ति का प्रकाश पुनः प्राप्त हुआ है। मैंने जो कुछ किया उसकी स्थिति आज में समझने के योग्य हूँ।”
तात्पर्य कहने का यह कि भीष्म ने जब अपने कुकृत्यों के दुष्परिणाम को तप द्वारा भस्म सान कर दिया तब उन्हें विवेक का प्रादुर्भाव हुआ। यह सिद्धान्त सभी के लिए लग रहे। यद्यपि भीष्म की तपश्चर्या भीष्म के ही अनुकूल है, जनसाधारण का इतने भीष्म साधन से जीवन ही संदिग्ध हो सकता है।
हमें क्या करना चाहिए :-
[1] हमारा आहार तथा शक्ति शुद्ध और पवित्र कमाई के धान्य का हो।
[2] भोजन सात्विक हो ताकि उसका दुष्प्रभाव हमारी बुद्धि पर न पड़े।
[3] हमारे कार्य सौम्य और अहिंसात्मक हों।
[4] अंतर्मुखी बनकर अपने संकल्पों का बारीक विश्लेषण करिए और देखिए कि वहाँ व्यर्थ की भीड़ जमा न हो।
[5] चित्त को निःसंकोच करने का प्रयत्न करिए।
[6] यम और नियम के पालन में यथाशक्ति तत्पर रहिए। आप देखेंगे कि विवेक की आवाज सुनने में आप समर्थ होंगे।
(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम.ए.एल.टी.)
संसार में जो कुछ है सो सब मनुष्य जीवन के लिए है, तुम्हारे लिए है। चाहे वह आनन्द हो या क्लेश, भय हो या निर्भयता, जन्म हो या मृत्यु, विपत्ति हो या सम्पत्ति, रोग हो या आरोग्य, ज्ञान हो या अज्ञान, प्रेम हो या द्वेष, जड़ता हो अथवा चैतन्यता। चाहे जो हो, सब तुम्हारे लिए है।
यदि ऐसा है तो क्या तुम्हें दुखी ही होना चाहिए? बिलकुल नहीं। फिर भी मैं तुम्हें जहाँ तहाँ दुःख की एवं सब प्रकार से प्रतिकूलता की पुकार करते हुए सुनता हूँ, इसका क्या कारण है?
जगत की सत्ता मात्र तुम्हारे लिये है, और उस सत्ता द्वारा तुम जो कुछ करना चाहो सो कर सकते हो फिर भी तुम में इतनी अधिक दुर्बलता बनी है, इसका क्या कारण ?
जगत में जो कुछ उत्तम है सो तुम्हारा ही है, तो फिर तुम्हें उत्तम क्यों नहीं मिलता और अधर्म ही मिलता है, इसका क्या कारण?
संसार का सब कुछ तुम्हारे आधीन है। उसमें तुम जो कुछ परिवर्तन करना चाहो सो कर सकते हो, तो फिर तुम्हें भी कुछ मिलता है, उसे छोड़कर दूसरा क्यों नहीं कर सकते, अथवा उसमें अपनी इच्छानुकूल परिवर्तन क्यों नहीं कर सकते, इसका क्या कारण?
तुम्हारे पास सुख और दुख दोनों हैं, उसमें से तुम दुःख को छोड़कर सुख को ही क्यों नहीं लेते, इसका क्या कारण?
बस सबका कारण एक ही है, वह यह कि सब तुम्हारे लिये है, सब तुम्हारे आधीन है, किन्तु स्वयं तुम तुम्हारे (अपने)लिए नहीं- तुम स्वयं (अपने) तुम्हारे अधीन नहीं हो।
तुम जानते हो कि मैं दुःख के अधीन हूँ, रोग के वश में हूँ, मृत्यु के अधीन हूँ, विपत्ति के पंजे में हूँ, काम के अधीन हूँ, प्रारब्ध के अधीन हूँ, ग्रहों के वश में हूँ, इस प्रकार हर एक के अधीन अपने को मानते हो, और यह आज से ही नहीं, किन्तु बहुत काल से अर्थात् परम्परा से मानते चले आये हो!
इस प्रकार दृढ़ता पूर्वक मान लेने से वही तुम्हें मिलता है और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो नहीं मिलता।
तुम समझते हो कि यदि सुख सम्पत्ति आदि केवल अनुकूल वस्तुएँ ही तुम्हें मिली होती तो तुम अधिक सुखी, विशेष आनन्दमय और बहुत प्रसन्न होते, परन्तु यह तुम्हारी भूल है। परमात्मा ने दोनों तुम्हें दिये हैं दोनों प्रकार की सामर्थ्य तुम्हें ग्राह्य हैं और यही एक तुम्हारी उन्नति का साधन है।
तुम यह न समझो कि सुख तुम्हारा हित करने वाला है और दुःख हितकारी नहीं, बल्कि दोनों तुम्हारे हितकारक ही हैं। इसीलिए दोनों वस्तुएँ तुम्हें प्राप्त हुई हैं, किन्तु अपने को एक ही वस्तु के आधीन समझ लिया है, यह तुम्हारी बड़ी भूल है।
सच पूछो तो दोनों पर ही तुम्हारी सत्ता है। सत्ता द्वारा ही तुम उनमें से जो चाहो सो ग्रहण कर सकते हो। यह इच्छा योग्य नहीं कि हमें कभी दुःख मिले ही नहीं, किन्तु दुःख से सुख किस प्रकार उत्पन्न करना होता है इस कला की सामर्थ्य प्राप्त करना तुम्हारे लिये योग्य है। क्या तुम समझते हो कि जिसे तुम इस समय प्रतिकूल कहते हो, उसमें से क्या तुम्हारे लायक कुछ भी लाभदायक नहीं मिल सकता? परन्तु ऐसा समझने का कुछ भी कारण नहीं! वास्तव में जब तक सुख की एकरसता को वेदना की विषमता का गहरा आघात नहीं लगता तब तक जीवन के यथार्थ सत्य का परिणाम नहीं मिल सकता।” याद रहे कि “काले बादलों के अँधेरे में ही बिजली की चमक छिपी होती है, दुःख के बाद सुख- निराशा के बाद आशा- पतझड़ के बाद बसन्त ही सृष्टि का नियम है।”
सच तो यह है कि दुःखादि के आधीन होकर जो मनुष्य उसे सहन करते हैं, वे दुःख से कुछ भी लाभ नहीं प्राप्त कर सकते। परन्तु जो दुखादि को अपने आधीन जानकर उनको भोगते हैं वे ही उनमें से वास्तविक सुख तथा हित प्राप्त करते हैं। दुःख के आधीन तुम नहीं वरन् तुम्हारे आधीन दुःख है, यह जानकर, जिस समय दुःख प्राप्त हो उस समय उसमें लाभ संशोधन के लिए तैयार हो जाना चाहिये।
पूर्व कालीन दृष्टान्तों पर विचार करो— अपने शरीर की हड्डियाँ वज्र बनाने के लिये दधिचि ऋषि ने जब स्वयं अपने को प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र को समर्पण कर दिया था, तब क्या उन्हें कष्ट हुआ था? नहीं। कारण उन्होंने उस दुख को अपने आधीन मानकर ही उसे स्वीकार किया था। भीष्म पितामह, ध्रुव पार्वती आदि स्त्री-पुरुष तथा बालक जाति ने विविध प्रकार के दुःख स्वीकार किये थे। परन्तु दुःखों के ऊपर अपना सामर्थ्य जानकर ही उन्हें ग्रहण किया था। अन्त में उन्होंने उस में अपना इस प्रकार हित साधन किया जो उन्हें अन्य किसी प्रकार से भी मिलना सम्भव न था। इसी कारण आज वह मर कर भी अमर है और सदैव अमर रहेंगे।
साराँश यह है कि हमें दुःखों से न डरना चाहिए और न उनके आधीन होना चाहिए। वरन् उन्हें आया हुआ देख, उनमें हितकर क्या है, यह जानने का प्रयत्न करना चाहिए। कई सद्गुण ऐसे भी हैं जो दुःखों के द्वारा ही प्राप्त होते हैं। ऐसे बलवान सद्गुण सिद्ध करने के लिए अनेक जन ऐसे दुःख अथवा कष्टों को स्वयं ही स्वीकार करते हैं। अब भी अनेक मनुष्य उपवासादि के कष्ट स्वयं स्वीकार करते हैं जिनका हेतु सुख अथवा कुछ अधिक लाभ प्राप्त करना ही है।
इस प्रकार सुख, दुख दोनों तुम्हारे आधीन हैं। तुम स्वतन्त्र हो, परतन्त्र नहीं। जो कुछ प्राप्त करने के लिए तुम्हें जैसा प्रयत्न करना हो करो और उसमें जिन साधनों का उपयोग करना पड़े निःसंकोच भाव से करो।
तुम सुख-दुख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रस-युक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्त्तव्य है। इसलिये तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्त्तव्य को सिद्ध करो। प्रतिकूलता से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही को सर्वस्व मानकर न बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे, जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों-ज्यों उच्च बनेगा त्यों-त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है, वह सब अनुकूल दीखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर, दुःख मात्र की निवृत्ति हो जावेगी।
आगामी वर्ष का विशेषाँक
“ अखण्ड-ज्योति “ का जनवरी सन् 53 का अंक “मनुष्यता” अंक होगा। मनुष्यता के लक्षण, कर्त्तव्य, उसके नाश के कारण तथा उत्थान के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डाला जायगा।
इस अंक का सम्पादन भी पिछले नववर्षों को की तरह इस वर्ष भी सुप्रसिद्ध विद्वान प्रो. रामचरण महेन्द्र ही करेंगे, इस अमूल्य विशेषाँक की अभी से प्रतीक्षा कीजिए।
(श्री राम सिंह जी)
महाराज मनु ने सुखमय दाम्पत्य जीवन के सम्बन्ध में लिखा है— कि जिस परिवार में स्त्री और पुरुष सन्तुष्ट रहते हैं वहाँ नित्य कल्याण होता रहता है। जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है और जहाँ उनका सत्कार नहीं होता वहाँ की प्रत्येक क्रिया निष्फल हो जाती है। जिस कुल में स्त्रियों में शोक होता है अर्थात् जिस कुल में स्त्रियाँ शोकातुर रहती हैं, वह कुल नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं उस कुल की वृद्धि होती है।
सुखमय दाम्पत्य जीवन के लिए पति-पत्नी का प्रसन्न रहना आवश्यक है। जब तक दोनों व्यक्ति सन्तुष्ट नहीं रहेंगे तब तक सुख नहीं प्राप्त हो सकता।
किस प्रकार यह प्रसन्नता प्राप्त हो, यह प्रश्न टेढ़ा है और इसका उत्तर बहुत विशाल है। पति-पत्नी की प्रसन्नता की कोई परिभाषा नहीं बनायी जा सकती। कोई पति किसी बात पर प्रसन्न होता है तो कोई उसी बात पर अप्रसन्न भी हो सकता है। संसार के प्रत्येक प्राणी का स्वभाव भिन्न होता है और रुचि भी भिन्न। ऐसी स्थिति में तर्क सर्वमान्य उत्तर होना चाहिए जो सब पर लागू हो सके। विचार किया जाय तो पारिवारिक प्रसन्नता निम्नलिखित बातों पर अवलम्बित रहती है—
1- स्वास्थ्य और सौंदर्य।
2- शील तथा प्रेम।
3- विद्या और गृह प्रबन्ध की योग्यता।
अधिकतर इन्हीं तीन बातों पर ध्यान देने से दाम्पत्य जीवन सुखमय हो सकता है।
स्वास्थ्य और सौंदर्य :- स्त्री स्वास्थ्य पर विचार करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होगा कि स्त्रियों का आज कल स्वास्थ्य अधिक गिरा हुआ है। जब स्वास्थ्य ही ठीक नहीं रहेगा, तो सौंदर्य नहीं रह सकता। वस्तुतः स्वास्थ्य का नाम ही सौंदर्य है। जो स्त्री हँसमुख होगी, वह सुन्दर लगेगी। सुन्दरी स्त्री पति के हृदय की स्वामिनी होगी और जब स्त्री पति के हृदय को अपने वश में रखेगी तो उसका जीवन सर्वदा सुखी रहेगा। रोगी स्त्री या चिड़चिड़ी स्त्री को पति का प्रेम कभी प्राप्त ही नहीं हो सकता और जब तक स्त्री को पति का प्रेम न प्राप्त हो व सुखी नहीं रह सकती।
कल्पना कीजिए, आप दिन भरके श्रम से थक कर विश्राम के लिए संध्या समय पर घर लौटे। आकर देखा पत्नी खाट पर लेटी है, चूल्हे में आग नहीं जली है। आप सोच रहे हैं घर चल कर आराम करेंगे और यहाँ आकर डॉक्टर के घर जाना पड़ता है। कभी आप स्वयं को कोसते हैं कभी पत्नी को, लेकिन हार मानकर दवा लेने जाना ही पड़ता है। कभी सुख सन्तोष नहीं। दिन भर ऑफिस के काम से थके माँदे घर आये पर यहाँ भी शान्ति नहीं मिली। आप इस पर खीज तो उठते हैं लेकिन कभी आपने सोचा ऐसा हुआ क्यों? आइए, हम आप विचार करें कि पत्नी के बीमार होने का क्या कारण है।
खान पान में असावधानी, बेकारी, चिन्ता अथवा भोगविलास की अधिकता से तो वह अस्वस्थ नहीं हो गयी। अवश्य! तो इन्हीं कारणों में से कोई कारण होगा, या तो पत्नी की गलती होगी या फिर आपकी।
खान-पान में असावधानी :- स्त्रियाँ प्रायः भोजन में बड़ी असावधानी करती हैं। जो मिला खा लिया, पेट भरने से काम रहता है। आपको यह देखना है कि क्या खाती हैं और कब खाती हैं। यह नहीं कि रूखा सूखा जो मिल गया खा लिया। जब मन में आ गया, खा लिया। दोपहर का खाना तीन बजे और शाम का भोजन रात के 10 बजे! यह सब असावधानी है। भोजन नित्य नियत समय पर करना चाहिए।
अनेक स्त्रियाँ बासी खाने की शौकीन होती हैं। ऐसा भोजन बहुत हानिकारक होता है। कुछ लालची होकर भी बासी खाती हैं। रात का भोजन बच गया, घर में और कोई नहीं खा सकता, पति और बच्चों को ताजा खिला कर स्वयं बासी खाकर रह जाना अच्छा नहीं होता। चाहिये तो यह कि भोजन इस परिणाम से बनाया जाय कि बासी बचे ही नहीं।
बहुतेरी स्त्रियाँ खटाई, मिर्च और अचार बहुत खाती हैं। इससे स्वास्थ्य की हानि होती हैं, पेट खराब हो जाता है, आँख की रोशनी धूमिल हो जाती है। मासिक धर्म सम्बन्धी अनेक शिकायतें उपस्थित हो जाती हैं। स्वाद के लिए जो भोजन किया जाता है वह पहले तो अच्छा लगता है, पर बराबर मसालेदार और चटपटा भोजन करने से पाचन-शक्ति खराब हो जाती है। भोजन सादा होना चाहिये और पौष्टिक।
भोजन का समय नियत रखना चाहिये। प्रातः काल का भोजन 10-11 बजे तक शाम का 7-8 बजे तक कर लेना चाहिए। भोजन करने के 2-3 घण्टे बाद सोना चाहिये। नियत समय पर भोजन न करने से जठराग्नि मन्द पड़ जाती है।
बेकारी :- इन्हीं सब बातों पर ध्यान न देने से स्त्रियाँ रोगी बनी रहती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बेकार रहने से भी स्त्रियाँ रोगी हो जाती हैं। आलस्य में पड़े रहने से भी शरीर रोगी हो जाता है। व्यायाम करते रहने से शरीर के प्रत्येक अंक गठित रहते हैं शरीर में फुर्ती रहती है।
स्त्रियों का सबसे अच्छा व्यायाम चक्की चलाना है, लेकिन आजकल इसका रिवाज केवल देहातों तक ही सीमित है, आज कल तो देहातों में भी आटा चक्की मिल खुल गयी हैं। मिल का चावल और मशीन का आटा खाते-खाते हम निर्बल होते जा रहे हैं।
आजकल की स्त्रियाँ चक्की चलाना, बर्तन मलना, झाडू देना आदि बुरा समझती हैं। इन कामों को नौकरों का काम समझती हैं। पहले स्त्रियाँ अँधेरे उठ कर झाडू हाथ में लेतीं और सारा घर झाड़-पोंछ कर, दो-तीन सेर गेहूँ पीसती थी। बर्तन वगैरह मल कर भोजन की व्यवस्था करती थी। लेकिन आज की कुमारियाँ बिस्तर पर पड़े-पड़े अजीर्ण तथा मासिक धर्म सम्बन्धी शिकायत से परेशान रहती हैं।
कुछ स्त्रियाँ, जो अकेले पति के साथ ही रहती हैं, बेकार रहती हैं। उन्हें चाहिये कि कोई गृह-उद्योग सीखें जिसमें उनका मन लगा रहे। शिल्प विद्या सीखना, बेल-बूटा काढ़ना, पीसना तथा सिलाई कटाई का काम स्त्रियाँ बेकारी में कर सकती हैं। बेकार कभी नहीं बैठना चाहिये। प्रत्येक को कुछ न कुछ करते रहना चाहिये।
चिंता :- घर में कई प्रकार की चिन्ताएँ लगी रहती हैं। रुपये पैसों की चिन्ता, बच्चों की या घर के किसी और प्राणी की बीमारी की चिन्ता तथा पति के दुर्व्यसनी होने की चिन्ता।
चिन्ता को चिता के समान कहा गया है। चिन्ता से बढ़कर स्वास्थ्य का नाश करने वाली कोई अन्य बात नहीं है। इसलिए चिन्ता से बचना चाहिये! चिन्ता शरीर में घुन की तरह है जिससे शरीर की कान्ति नष्ट हो जाती है और मनुष्य दुबला- पतला हो जाता है। अन्त में चिता पर ही उसे शान्ति मिलती है।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चिन्ता बरबस गले लग जाती है। संसार में धन ही सब कुछ है इसलिए धन की रक्षा करनी चाहिए। कहा भी है- “सर्वे गुणाः काँचन माश्रयन्ति।” सब कुछ कंचन में ही है। पैसा न हो तो कोई किसी से बात ने करे। पैसे बिना मन में शान्ति नहीं रहती है, सगे सम्बन्धी सभी आदर करते हैं। नीतिशास्त्र में कहा गया है
कि सम्बन्धियों के बीच निर्धन होकर रहने से मृत्यु श्रेष्ठ है। यदि सिर पर ऋण हो गया हो तो घबराना उचित नहीं है परमात्मा पर भरोसा कर उद्योग करना चाहिए। चिन्ता या शोक करने से तो ऋण दिया नहीं जा सकता। ऐसी हालत में पत्नी को लज्जा त्याग कर पति के कष्टों में सहायता पहुँचाना चाहिए। उसे सान्त्वना देनी चाहिए और स्वयं भी कोई काम करना चाहिए जिससे चार पैसे मिलें। विलायत और अन्य देशों जैसे चीन, जापान आदि में स्त्रियाँ कुछ न कुछ उद्यम करती ही रहती हैं। इस प्रकार वे पति पर भार न बन कर स्वयं कुछ उपार्जन कर लेने में अपनी बड़ाई और सम्मान समझती हैं।
द्वन्द्वः-बच्चों की चिन्ता स्त्री को बहुत रहती है। किसी के बच्चे होते ही नहीं। किसी के मर ही जाते हैं या किसी को लड़कियाँ ही पैदा होती हैं। विवाहित लड़कियों की चिन्ता भी माता को अधिक रहती है। ससुराल में उस पर क्या बीत रही होगी, कैसे वह सबको प्रसन्न रखती होगी, आदि चिन्ताएँ माता को लगी रहती हैं। कभी-कभी अपनी बहू की भी चिन्ता रहती है। यदि बहू से सास-ससुर को सुख प्राप्त न हो सका, तो यह बड़े दुःख की बात है।
बहू समझती है कि पति हमारा है अतः हमारी बात प्रधान होनी चाहिए। सास समझती है पुत्र हमारा है, इससे हमारी बात प्रधान माननी चाहिये, हमारा इस पर अधिकार है। मरण बेचारे लड़के का होता है, किसे क्या कहे। नासमझ युवक कभी माँ के कारण बहू की ओर, कभी बहू के कारण माँ की दुर्दशा करते हैं। इसलिए माता को बड़ी समझदारी से काम लेना चाहिए। सास को सोचना चाहिए कि उसकी बहू किसी की लड़की है अतः अपनी ही लड़की के समान है। उसकी भूलों को प्रेम से क्षमा कर देना चाहिये और उचित मार्ग बतला देना चाहिए। यदि सास उसकी माता बन कर रह सकेगी तो वह भी पुत्री बन कर रहेगी ही।
घर में जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाता है तो उसकी देख-भाल करने वाला भी एक प्रकार से बीमार हो जाता है। स्त्री को चाहिए कि वह पूरे मनोयोग से रोगी की सेवा करे। रोगी अक्सर चिड़चिड़े स्वभाव के हो जाते हैं। उसी समय सम्हलना चाहिए, घबराने से काम नहीं चलता।
पति का दुर्व्यसनी होना भी स्त्री के लिए चिंता का कारण होता है। विशेषकर जब पति जुआरी, शराबी अथवा वेश्यागामी हो जाता है तो पत्नी बहुत चिन्तित हो जाती है। सचमुच वह चिन्ता का विषय है। कितने परिवारों का नाश इन्हीं दुर्व्यसनों के कारण हो गया, कितनी स्त्रियों न आत्महत्या कर ली, कितनी स्त्रियाँ खुलेआम वेश्या हो गयीं। यह सामाजिक दुराचार तत्काल बन्द होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि इस दुराचार को रोकने में कड़ाई से काम ले। स्त्री को चाहिये कि धैर्य से काम ले और विनय और प्रेम से पति का दुर्व्यवहार छुड़ाए। यद्यपि यह अत्यन्त कष्ट साध्य है परन्तु सिवा इसके और मार्ग भी नहीं है।
भोग- विलास की अधिकता भी स्वास्थ्य नाश का जबरदस्त कारण है। विवाह के प्रारम्भिक दिनों में प्रायः पति-पत्नी भोग-विलास की अधिकता के शिकार हो जाते हैं। किसी भी चीज की अति बुरी भयावह होती है, यौवन एक बरसाती नदी है, इसको मार्ग की कठिनाई का अनुभव नहीं होता। लेकिन यौवन की तरंग में बह कर अपना जीवन नष्ट कर लेना बुद्धिमानी नहीं है। तरंगों पर नियन्त्रण रखना चाहिये। स्त्री पुरुषों को संयम से रहना चाहिए।
इस प्रकार हमने देखा, स्त्री का स्वास्थ्य और सौंदर्य प्रधान कारण है जिससे वह पति की प्यारी बन सकती है। सौंदर्य लिपिस्टिक और पाउडर लगाने से नहीं बढ़ता। सुन्दरी स्त्री की शोभा वस्त्राभूषणों से नहीं, बल्कि उसके स्वास्थ्य से होती है। जो स्त्री स्वस्थ है और सुन्दर है वह पति का हृदय जीत सकती है, और उसका जीवन सुखमय हो सकता है।
शील और प्रेम :- दाम्पत्य-जीवन में जिस प्रकार स्वास्थ्य और सौंदर्य का प्रथम स्थान है उसी प्रकार शील और प्रेम का भी द्वितीय स्थान है, सच तो यह है कि यदि स्त्री में शील और प्रेम नहीं तो वह लाख सुन्दरी रह कर भी गृहस्थ जीवन के अनुकूल नहीं रह सकती। चाहे पति उसके रूप माधुरी पर लट्टू रहे पर वह घर की और पड़ोस की दृष्टि में प्यारी नहीं बन सकती। पति भी चार दिन की चाँदनी की भाँति उसका मुँह जोहता रहेगा लेकिन फिर वह भी ऊब जायेगा। जिस स्त्री में शील है, पति के प्रति सच्चा प्रेम है उसी को सच्ची सुन्दरी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ समझना चाहिए, क्योंकि वह बीमारी, कुरूपता और वृद्धावस्था में भी अपने आन्तरिक सौंदर्य के कारण सुन्दरी ही बनी रहेगी।
उपरोक्त बातें साधारण दिखाई पड़ती हैं पर वस्तुतः ये इतनी महत्वपूर्ण हैं कि इन पर समुचित ध्यान देने से हमारा पारिवारिक जीवन सुख शान्तिमय बन सकता है।
(श्री जितेन्द्रिय प्रसाद सिंह वर्मा)
अधिकाँश लोगों में बीमारियों के किसी न किसी कीटाणु से होने का भ्रम फैला हुआ है। वास्तव में मनुष्य बीमार इसलिए पड़ता है कि वह प्रकृति के स्वाभाविक नियमों का उल्लंघन करता है और इस दृष्टि से उसे पशुओं से भी बदतर कहा जा सकता है। मनुष्य की कुछ आदतें ऐसी हैं जो उसे स्वस्थ नहीं रहने देतीं।
मनुष्य के स्वाभाविक ढंग से रहने में उसकी जो आदतें बाधा डालती हैं, उनमें निम्न मुख्य हैं—
(1) भोजन सम्बन्धी बुरी आदतें— बीमारी का सब से मुख्य कारण यह है कि अक्सर मनुष्य उन पदार्थों को नहीं खाता, जिन में शरीर और मस्तिष्क को पुष्ट बनाने वाले तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद रहते हैं। भोजन की अधिकता, भोजन में नियमित समय के बीच अनाप- शनाप खाते रहने तथा उसके सम्बन्ध की अन्य अनियमित आदतों के कारण बीमारियाँ शरीर में डेरा जमाने लगती हैं। लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ने का एक कारण यह है कि लोग भोज्य पदार्थों का सेवन ऐसे रूप में करते हैं, जिसमें कि उनके आवश्यक विटामिन तत्वों और खनिजों का विनाश हो चुका होता है। इसके अलावा यह गलत धारणा बीमारियों के सम्बन्ध में फैली हुई है कि सभी बीमारियां कीटाणुओं के कारण होती हैं। बीमारियों के सम्बन्ध में प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्तों से जो लोग अपरिचित हैं उन में यह भ्रम और भी अधिक फैला हुआ है। इस विषय में स्पष्टीकरण के लिए हमें इस प्रश्न पर कुछ तफसीलवार विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है।
आरम्भ में यह स्पष्ट करना असंगत न होगा कि वस्तुओं में बाजार से ही बहुत सी दूषित चीजें मिली आती हैं, जिनसे मनुष्य के स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ता है मनुष्य भोजन के सिवाय चाय, काफी, शराब इत्यादि पीने की अस्वाभाविक आदतें भी डाल लेता है।
(2) शारीरिक श्रम की कमी।
(3) ऐसी हवा में साँस लेना, जिसमें ऑक्सीजन की कमी रहती है।
(4) मानसिक और शारीरिक श्रम की अधिकता।
(5) दवाई, टीका आदि का प्रयोग।
(6) अनियमित भोग-विलास।
(7) खड़े रहने या बैठने के गलत तरीके।
(8) शराब या तम्बाकू का उपयोग।
(9) मानसिक कुविचार और सोचने की बुरी आदतें।
(10) अप्रत्यक्ष प्रभाव
ऊपर जो बीमारियों के कारण बतलाये गये हैं, उन्हें मनुष्य के अस्वस्थ रहने में मुख्य स्थान दिया जा सकता है। इसके अलावा कुछ अन्य अप्रत्यक्ष कारण भी हैं जैसे अपच, कब्ज, छूत लगना अनिद्रा इत्यादि। इनका महत्व गौण इसलिए है कि यह उपर्युक्त कारणों के परिणामस्वरूप हैं, जिनके विषय में सतर्क रहने से हम इनके खतरे से भी बच सकते हैं।
अक्सर लोगों के मन में एक और भ्रम है कि प्राकृतिक चिकित्सक यह नहीं मानते कि कीटाणु होते ही नहीं। इसमें तनिक भी सन्देह के लिए स्थान नहीं है कि हवा, जिसमें हम साँस लेते हैं, भोजन, जिसे हम खाते हैं, पानी जिसे हम पीते हैं, कीटाणुओं से परिपूर्ण हैं। इनके अस्तित्व से भी हम इनकार नहीं करते। परन्तु इनकार हम इस बात से करते हैं कि कीटाणु बीमारी के कारण नहीं होते हैं, वास्तव में कीटाणु बीमारी के कारण नहीं होते।
इस सिद्धान्त से सभी प्राकृतिक चिकित्सक भी सहमत हैं कि बीमारियों में उनके कीटाणु वर्तमान रहते हैं। हमारा कहना तो यह है कि बीमारियों में मनुष्य के शरीर में उक्त कीटाणुओं की मौजूदगी इस बात का प्रमाण नहीं है कि कीटाणु ही उन बीमारियों के कारण हैं। बीमारियों के समय मनुष्य के शरीर में जो अन्य विकार प्रवेश करते हैं, उनमें कीटाणु भी हैं।
यह कहने की आवश्यकता हम नहीं समझते कि यदि कीटाणु बीमारियों के वास्तविक कारण होते तो बीमारियों के आरम्भ होने के पूर्व ही वे शरीर में मौजूद रहते, किन्तु ऐसा वास्तव में होता नहीं। यह एक अनुभव सिद्ध बात है। कभी-कभी कीटाणु न रहने पर भी लोगों में बिमारियों के लक्षण प्रगट होने लगते हैं। कितने ही प्रसिद्ध डाक्टरों ने इस सत्य को स्वीकार किया भी है किन्तु यह प्रश्न अभी विवादास्पद है। डॉ. आर. एल. वाटकिन्स ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि लोगों को तपेदिक होने के पूर्व उनके शरीर में उस बीमारी के कीटाणु मौजूद रहने का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। डॉक्टरों की तरफ से दावा किया जाता है कि तपेदिक के कीटाणु खून के जरिये स्नायुओं में प्रवेश कर जाते हैं, किन्तु प्रयोगात्मक रूप से खून में कीटाणु कभी भी नहीं पाय गये।
शारीरिक शक्ति का महत्व :- कीटाणुशास्त्र- विशारदों के बड़े बड़े ग्रन्थों में इस बात को मान लिया गया है कि अक्सर मनुष्यों के शरीर में बीमारियों के कीटाणु ऐसी अवस्था में भी पाये जाते हैं, जब कि उन्हें ये बीमारियाँ होती ही नहीं। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि बीमारियाँ कीटाणुओं के कारण नहीं होती। कहा जा सकता है कि यदि कीटाणु वास्तव में बीमारियों के कारण होते तो किसी के लिए उन बिमारियों से मुक्त रहना ही असम्भव हो जाता क्योंकि हवा से कीटाणुओं को नष्ट किया जाना किसी प्रकार सम्भव नहीं है। संक्रामक बीमारियों के विषय में लोगों में सब कार्य इस आधार पर किये जाते हैं कि जिन कीटाणुओं से वे फैलती हैं, उससे बचना चाहिए। परन्तु देखा यह जाता है कि शहर या नगर में बीमारी फैलाती है उसमें के अधिकाँश व्यक्ति उससे मुक्त रहते हैं और उसका आक्रमण केवल कुछ ही व्यक्तियों पर होता है।
डॉक्टरों की तरफ से कहा जाता है कि कीटाणु जो प्रत्येक व्यक्ति पर आक्रमण नहीं करते इसका कारण यह है कि कुछ व्यक्तियों में अन्य की अपेक्षा अवरोध शक्ति अधिक होती है और इसीलिए वे बीमार भी नहीं पड़ते। कीटाणु-शास्त्र के ज्ञाताओं का कहना है कि स्वस्थ शरीर में बीमारी के प्रति अवरोध शक्ति अधिक होती है, इस कारण कीटाणु उसमें पनपने नहीं पाते। दूसरे शब्दों में उन का कहना है कि कीटाणुओं को-फैलने फूलने के लिए आवश्यक जमीन की आवश्यकता होती है। डॉक्टर लोग जब इस परिणाम पर पहुँचते हैं तो प्राकृतिक चिकित्सक यदि यह कहें कि बीमारी कीटाणुओं के कारण नहीं, बल्कि “शरीर की विशेष अवस्था” के कारण होती है तो इनमें अनुचित ही क्या है।
कीटाणु हानिकार नहीं होते :- कनाडा के एक प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. जोन फ्रेजर ने अपने एक लेख में “क्या बीमारियाँ कीटाणुओं के कारण होती है?” अपने प्रयोगों का विवरण देकर उपरोक्त सिद्धान्तों से सत्य को प्रमाणित कर दिया था। कीटाणु खतरनाक हैं या नहीं इस प्रश्न को स्पष्ट करने के लिए टोरन्टो में सबसे अधिक काम हुआ है। सन् 1911,1912 और 1913 के 3 वर्ष तो केवल इसी बात का प्रयोग करने में निकल गये कि कीटाणुओं का आक्रमण कब होता है। वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे कि बीमारी आरम्भ होने के बाद ही कीटाणु प्रगट होते हैं। इससे यह परिणाम निकला कि कीटाणु बीमारी के परिणाम स्वरूप होते हैं और शायद वे हानिकर भी नहीं होते।
सन् 1914 में कुछ नागरिकों ने इस सिद्धान्त को प्रमाणित किये जाने के लिए अपनी सेवाएं देने का अनुरोध किया। तब इस बात का पता लगाने के लिए कि कीटाणु हानिकारक होते हैं या नहीं कुछ लोगों को ताजे और तेज भोजन और पानी में मिला कर दिये गये। इन लोगों के मित्रों और सम्बन्धियों ने उनके इस कार्य का कड़ा विरोध किया और कहा कि यह अपने सिर पर आप ही आफत मोल लेना है।
पहले प्रयोग में डिप्थीरिया के (गले की झिल्ली में सूजन होने पर साँस लेने में कठिनाई होने का रोग) 50,000 कीटाणुओं को पानी में मिला कर पिया गया। कुछ दिन की प्रतीक्षा के बाद देखा गया कि बीमारी के कोई लक्षण उस व्यक्ति में नहीं दिखलाई दिये। डिप्थीरिया की बीमारी के कीटाणुओं पर सबसे पहले इसलिए प्रयोग किया गया कि इन्हें दबाने के लिए अचूक औषधियाँ अविष्कृत हो चुकी हैं। दूसरे प्रयोग में इसी बीमारी के हजारों कीटाणुओं को एक व्यक्ति के गले, जीभ, और नयनों में लपेट दिया गया, फिर भी बीमारी के कोई लक्षण प्रगट नहीं हुए। चूँकि इन कीटाणुओं का सन्तोषजनक रूप से प्रयोग हो चुका था इसलिए अन्य बीमारियों के कीटाणुओं के भी प्रयोग आरम्भ किये गये। निमोनिया के कीटाणुओं को करोड़ों की संख्या में दूध, पानी, रोटी, आलू और माँस के साथ मनुष्यों को खिलाया गया और उन्हें उभारने के प्रयत्न भी हर तरह से किये गये, फिर भी कोई परिणाम न निकला। बीमारी के कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति में नहीं पाये गये।
अन्य प्रयोग टाइफ़ाइड बुखार के कीटाणु पर हुए। स्वच्छ पानी, दूध, रोटी और आलू में बीमारी के करोड़ों कीटाणु मिला दिये गये किन्तु उनके भक्षण से किसी भी व्यक्ति को टाइफ़ाइड नहीं हुआ। गरदन तोड़ बुखार के करोड़ों कीटाणुओं को नथुने, गले, जीभ में लिपटाया गया और साथ ही भोजन में भी मिलाया गया किन्तु इससे कुछ भी परिणाम नहीं निकला।
इन प्रयोगों के आधार पर प्राकृतिक चिकित्सक इस सिद्धान्त पर पहुँचे हैं कि कीटाणु बीमारियों के कारण नहीं हैं, बल्कि बीमारियाँ शरीर की विशेष अवस्थाओं के कारण होती हैं।
“निर्दोष सरल यौवन एक अमूल्य सम्पत्ति है। वह भोगलिप्सा में जिसे भूल से सुख कहा जाता है-लुटा देने की वस्तु नहीं है।”
“ संसार में सबसे बढ़कर प्रेम है, प्रेम साक्षात् परमात्मा का स्वरूप है, इसलिए जहाँ प्रेम है वहाँ सुख और शान्ति का साम्राज्य है। वह प्रेम स्वार्थ त्याग पूर्वक दूसरों की आत्मा को सुख पहुँचाने से होता है।”
“जिस प्रकार अवगुणों की तरफ ख्याल न करके उनके गुणों को ग्रहण करना ही बुद्धिमानी है।”
“जिस प्रकार ऊसर जमीन में बीज नहीं जमता, उसी प्रकार दुष्ट मनोवृत्तियों से घिरे हुए हृदय में सद्वृत्तियों का प्रादुर्भाव नहीं होता।
(गताँक से आगे)
गायत्री के प्रथम पाद का शब्दार्थ तो बहुत साधारण है। उसे समझने मात्र से उतना लाभ नहीं मिल सकता, जितना कि मिलना चाहिये। ब्रह्म ने श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान रूपी तीन रत्नों का जिसे अधिकारी बनाया है, उसे घेर दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि गायत्री की मर्यादा के भीतर जिन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है— वे ही भौतिक और अधिक आनन्दों को प्राप्त करेंगे। जिनकी जठराग्नि तीव्र है उनके लिये साधारण श्रेणी के पदार्थ भी बड़े रुचिकर और पुष्टिकर होते हैं और जिनकी जठराग्नि मन्द है उनके लिए बढ़िया मोहन भोग भी रोग उत्पन्न करते हैं। गायत्री से आच्छादित ब्रह्मकर्मा मनुष्य की आत्मिक जठराग्नि ऐसी ही तीव्र होती है वह थोड़ी मात्रा में प्राप्त हुये पदार्थों से भी पर्याप्त रसास्वादन कर सकता है।
जो यह जानता है कि गायत्री के प्रथम पाद का वास्तविक उद्देश्य मानव जीवन को आदर्शवाद की प्रतिज्ञा से ओत-प्रोत बनाना है। वही उसका तात्पर्य जानता है। जो इस ज्ञान को व्यवहार में लाता है, अर्थात् अपने को वैसा ही बनाता है, उसका जीवन अविच्छिन्न रहता अर्थात् जीवन पर पथ-भ्रष्ट नहीं होता और उसका वंश भी नष्ट नहीं होता। पीछे भी जन्म-जन्मान्तरों तक वह भावना नष्ट नहीं होती, इस अविच्छिन्नता के कारण उसे श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान का कभी भी अभाव नहीं होता ।
‘भर्गो देवस्य धीमही त सावित्र्याः द्वितीयः पादः’।
भर्गो देवस्य धीमहि— यह सावित्री का दूसरा पाद है।
अन्तरिक्षेण यजुः समदद्यात् यजुषा वायुम् वायुना वनस्पतिभिः पशून पशुभिः कर्मः, कर्मणा तपः, तपस्या सत्यम्, सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्राह्मणाम्, ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवत्शून्यो भवत्यविछिन्नो भवति।
अन्तरिक्ष से यजु को युक्त करता है। यजुर्वेद से वायु को, वायु से मेघ को, मेघ से वर्षा को, वर्षा से औषधि वनस्पतियों को, कर्म से तप को, तप से सत्य को, सत्य से ब्रह्म को, ब्रह्म से ब्राह्मण को, ब्राह्मण से ब्रह्म को। तथा व्रत से ब्राह्मण तीक्ष्ण, पूर्ण और अविच्छिन्न होता है।
अविच्छिन्नोऽस्यतन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं सावित्र्याः द्वितीयं पादं च्याचष्टे।
जो विद्वान इस प्रकार जानकर सावित्री के द्वितीय पाद की व्याख्या करते हैं उनका वंश तथा जीवन अविच्छिन्न होता है।
पिछली काण्डिका में भूः से ऋक् को सम्बन्धित करके प्रथम पाद का रहस्य समझाया था। इस काण्डिका में गायत्री के दूसरे पाद का विवेचन करते हैं। भुवः से अन्तरिक्ष से यजुः को सम्बन्ध किया है। यजुः कहते हैं यज्ञ को। यज्ञ कहते हैं परमार्थ को। पहली काण्डिका में ज्ञान द्वारा आदर्श जीवन की प्राप्ति का उपाय बतलाया था यहाँ यज्ञ द्वारा व्रत मय जीवन होने की शृंखला का वर्णन करते हैं।
भुवः से अन्तरिक्ष में यजुः को संयुक्त किया, यजुः से वायु को, वायु से मेघ को, मेघ से वर्षा को,वर्षा से औषधि और वनस्पतियों को, औषधि वनस्पति से पशुओं को सम्बन्ध किया। गीता में भी यज्ञ विधान का ऐसा ही वर्णन है। यज्ञ से वायु शुद्ध होती है,वायु के संपर्क से गुणदायक जल बरसता है उससे वृक्ष, वनस्पति और पशु, श्रेष्ठ तत्वों वाले होते हैं, उनका उपयोग करने से मनुष्य का मन श्रेष्ठ बनता है और श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कर्म होते हैं।
कर्म से तप को, तप से सत्य को, सत्य से ब्रह्म को, ब्रह्म से ब्राह्मण को, और व्रत से सम्बन्ध किया। अन्ततः वही कर्म आ गया । व्रत धारण करने से ब्राह्मण सुतीक्ष्ण परिपूर्ण एवं अविच्छिन्न वंश वाला होता है।
जो बात ज्ञान से प्राप्त होती है वही प्रकारान्तर से यज्ञ द्वारा श्रेष्ठ कर्मों द्वारा भी प्राप्त हो सकती है। उच्च अन्तःकरण से निकली हुई सद्भावनाएँ समस्त आकाश को, वातावरण को सत्मय बना देती हैं और उस वातावरण में पलने वाले सभी पदार्थ सत् से परिपूर्ण होते हैं। जिस वातावरण के कारण मनुष्य ब्रह्म परायण व्रतवान होकर अविच्छिन्न हो जाता है यह इस दूसरी काण्डिका का तात्पर्य है।
धियो यो नः प्रचोदयादिति सावित्र्यास्तृतीयः पादः।
धियो यो नः प्रचोयात्— यह सावित्र का तीसरा पाद है
दिवा साम समदधात् साम्नाऽदित्यम् आदित्येन रश्मीन् रश्मिभिवर्षम् वर्षेणौषधिवनस्पतीन् औषधि वनस्पतिभिः पशून्, पशुभि कर्मः, कर्मणातपः तपसा सत्यम् सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणम् ब्राह्मणेन व्रतम् व्रतेन वै ब्राह्मण सरातो भवत्यशून्यो भवत्य-विच्छिन्नो भवति। अविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद, यश्चैवं विद्वानेवमेतं सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे।
द्यु लोक से साम को युक्त करता है साम से आदित्य को, आदित्य से रश्मियों को, रश्मियों से वर्षा को, वर्षा से औषधि वनस्पतियों को, औषधि, वनस्पतियों से पशुओं को, पशुओं से कर्म को, कर्म सके तप को, तप से सत्य को, सत्य से ब्रह्म को, ब्रह्म से ब्राह्मण को, ब्राह्मण से व्रत को, व्रत से ब्राह्मण तीक्षणा, पूर्ण और अविच्छिन्न वशं होता है। जो यह जानकर सावित्री के तृतीय पाद की व्याख्या करते हैं वे अपने वंश एवं जीवन को अविच्छिन्न बनाते हैं।
गायत्री का तीसरा पाद ‘स्व’ से आविर्भूत हुआ है। ‘स्व’ कहते हैं द्यु लोक को। द्यु लोक सामवेद से संयुक्त किया गया है। साम से आदित्य, आदित्य से रश्मियाँ, रश्मियों से वर्षा, वर्षा से औषधि वनस्पति, उनसे पशुओं का सम्बन्ध है। इनका उपयोग करने से पूर्व कंडिकाओं में वर्णित प्रकार से मनुष्य ब्रह्मचारी व्रतधारी बनकर अविच्छिन्न जीवन और वंश वाला बन जाता है।
गायत्री के तीन पदों में यह विज्ञान सन्निहित है जिसके द्वारा मनुष्य को श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान की उपलब्धि होती है। तीन पाद तीन वेदों से बने हैं। प्रत्येक पाद तीन-तीन लोकों का प्रतीक है। इन तीन लोकों से यह तीनों वेदों के मन्त्र आवश्यक सावित्री को खींच कर लाते हैं और गायत्री साधक को सब प्रकार सुखी बना देती है। इससे व्यक्तिगत लाभ ही नहीं वरन् सामूहिक लाभ भी है। जैसे यज्ञ करने से वायु की शुद्धि, उत्तम वर्षा और उससे गुणकारी वनस्पति तथा दूध की उत्पत्ति होती है वैसे ही गायत्री द्वारा भी वह प्रक्रिया पूरी होती है।
यह सम्बन्ध-श्रृंखलाएँ अपने में एक बड़ा भारी पदार्थ विज्ञान सम्बन्धी रहस्य छिपाये बैठी हैं। एक पदार्थ से दूसरे का सम्बन्ध किस प्रकार है इसकी थोड़ी सी विवेचना हमने आध्यात्मिक शैली से की है, परन्तु इसमें और भी विशद् रहस्य मौजूद हैं। भौतिक विज्ञान के अनुसार भी वह फलितार्थ उपस्थिति होते हैं जिनके कारण गायत्री का साधक उन तीनों लाभों से श्री, प्रतिष्ठा एवं ज्ञान से पर्याप्त मात्रा में लाभान्वित होता है और अन्त में ईश्वर की प्राप्ति करके अविच्छिन्न जीवन— अर्थात् अमर हो जाता है उसे जरा- मृत्यु के जीवन बन्धन में नहीं बँधना पड़ता। ऐसा है इस त्रिपदा गायत्री का महान् रहस्य।
तेन ह वा एवं विदुषा ब्राह्मणेन ब्रह्माभिषन्नं प्रसितं परामृष्टम्।
सावित्री के तीन पाद जानने वाले ब्राह्मण से ब्रह्म प्राप्त ग्रसित और परामृष्ट होता है।
ब्रह्मणा आकाशमभिशन्नं, ग्रसितं परामृष्टम् आकाशेन वायुरभिषन्नो ग्रसितः परामृष्ट। वायुना ज्योतिरभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टः। ज्योतिषापोऽभिपन्ना ग्रसित परामृष्टाः। अद्भिर्भूमिरभिपन्ना ग्रसिताँ परामृष्टा भूम्यान्न मभिषन्नं ग्रसितं परामृष्टम्। अम्नेन प्राणोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्ट। प्राणेन मनोऽभिषन्नं ग्रसितं परामृष्टम्। मनसा वागभिषन्ना ग्रसिता परामृष्टा। वाचा वेदा अभिषन्ना ग्रसिताः परामृष्टाः। वेदैर्यज्ञोऽभिषन्नो ग्रसितः परामृष्टः। तानि ह वा एतानि द्वादश महाभूतान्येवं विदिप्रतिष्ठितानि। तेषाँ यज्ञा एव परार्ध्यः।
ब्रह्म से आकाश प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। आकाश से वायु प्राप्त ग्रसित तथा परामृष्ट है। वायु से ज्योति अभिपन्न ग्रसित और परामृष्ट है। ज्योति से जल प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। जल से पृथ्वी प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। भू में से अन्न अभिपन्न, ग्रसित और, परामृष्ट है। अन्न से प्राण अभिपन्न, ग्रसित तथा परामृष्ट है। प्राण से मन अभिपन्न, ग्रसित तथा परामृष्ट है। मन से वाक् अभिपन्न, ग्रसित तथा परामृष्ट है। वाक् से वेद अभिपन्न, ग्रसित एवं परामृष्ट है। वेदों से यज्ञ प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। इस प्रकार का ज्ञान करने वालों में ये बारह महाभूत प्रतिष्ठित रहते हैं। इनमें यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है।
पिछली तीन कर्णिकाओं में वर्णित गायत्री के तीन पादों के रहस्य को जो भली प्रकार जानता है उस ब्राह्मण से ब्रह्म प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट होता है। अर्थात् वह ब्राह्मण- ब्रह्म को प्राप्त करता है, प्राप्त करके उसे अपने में पचाता है और उससे परामृष्ट- आच्छादित होता है। उसके भीतर और बाहर सब ओर ब्रह्म की ही सत्ता काम करती है।
अब 12 ऐसी कड़ियां बताई जाती हैं, जिन पर विचार करने से यह प्रकट हो जाता है कि पंच भूत, अन्तःकरण चतुष्टय, वेद और यज्ञ सब का मूल केवल ब्रह्म है। ब्रह्म से ही एक कड़ी के बाद दूसरी कड़ी की तरह यह सब जुड़े हुए हैं उसी से ओत-प्रोत हैं।
बताया गया है कि ब्रह्म से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से प्राण, प्राण से मन, मन से वाक्, वाक्. से वेद और वेद से यज्ञ प्राप्त होता है, ग्रसित किया जाता है आच्छादन होता है।
ब्रह्म प्रत्यक्ष रूप से आँखों से दिखाई नहीं पड़ता, स्वल्प ज्ञान वाले मनुष्य समझते हैं कि पंच भूतों का यह पुतला ही सब कुछ करता है। उन्हें यह बताया गया है कि यह पंच भूत और तुम्हारे अन्दर काम करने वाली मन, बुद्धि आदि की चैतन्यता ब्रह्म से पृथक नहीं है वरन् उसी से आच्छादित है। यदि ब्रह्म का आच्छादन इन पर न हो तो इनकी क्रिया-शीलता समाप्त हो जाय और कोई तत्व कुछ भी काम करने में समर्थ न हो सके।
जो प्रकृति में, पंच-भूतों में, शरीर में, मन में ब्रह्म को, परमात्मा को समाया हुआ देखता है, वह ब्राह्मण कहलाता है, वह वेद और यज्ञ से घिरा होता है। अर्थात् सद्ज्ञान और सत्कर्म उसके कण-कण में व्याप्त होते हैं। इस सब ज्ञान में यज्ञ ही, सत्कर्म ही, सर्वोत्तम हैं। क्योंकि इस ज्ञान का तात्पर्य ही यह है कि मनुष्य सत्कर्म में लगे। जिसे यह सब रहस्य मालूम है उसमें सब भूत प्रतिष्ठित रहते हैं अर्थात् समस्त सृष्टि विस्तार को वह अपने भीतर ही समझता है।
त ह स्मैतमेषं विद्वाँसो मन्यन्ते विद्यैनमिति याथातथ्यम विद्वसिः।
जो विद्वान यह समझ लेते हैं कि हम इस यज्ञ के जानकार हो गये, वे इसे नहीं जानते।
अयं यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितः। वेदा वाचि प्रतिष्ठिताः वाड् मनसि प्रतिष्ठिता। मन प्राणो प्रतिष्ठितम्। प्राणेऽन्ने प्रतिष्ठितः अन्नं भू मौ प्रतिष्ठितम्। भूमि रप्सु प्रतिष्ठिता आपो ज्योतिषी प्रतिष्ठिताः ज्योतिर्वायो प्रतिष्ठितम्। वायु राकाशे प्रतिष्ठितः आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितम्। ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्म विदि प्रतिष्ठितम्।
यो हवा चित् स ब्रह्मवित्पुण्याँ च कीर्ति लभते सुरभींश्च गन्धान्। सोऽपहतपाप्मानन्ताँ श्रियमश्नुतेय एवं वेद, यश्चैवं विद्वानेवभेताँ वेदानाँ मातरं सावित्री संपदमुपनिषदपुयास्त इति ब्राह्मणम्।
यह यज्ञ वेदों में प्रतिष्ठित है। वेद वाक् में प्रतिष्ठित है। वाक् मन में प्रतिष्ठित है। मन प्राण में प्रतिष्ठित है, प्राण अन्न में प्रतिष्ठित है, अन्न भूमि में प्रतिष्ठित है, भूमि जल पर प्रतिष्ठित है। जल तेज पर प्रतिष्ठित है, तेज वायु पर प्रतिष्ठित है वायु आकाश पर प्रतिष्ठित है, आकाश ब्रह्म पर प्रतिष्ठित है। ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण पर प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार जानने वाला ब्रह्म ज्ञानी पुण्य एवं कीर्ति को प्राप्त करता है तथा सुरभित गन्धों को पाता है। वह व्यक्ति पापहीन होकर अन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होता है।
पिछली कण्डिका में यज्ञ को सर्वोत्तम बताया है परन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि जो यह कहते हैं कि हमको जानते है वे नहीं जानते। कारण यह है कि दूसरे आदमी किसी कार्य के वाह्य रूप को देख कर ही उसे भले बुरे होने का अनुमान लगाते हैं। परन्तु यथार्थ में काम के बाहरी रूप से यज्ञ का कोई सम्बन्ध नहीं वह तो आन्तरिक भावनाओं पर निर्भर होता है, यह हो सकता है कि कोई व्यक्ति बड़े बड़े दान, पुण्य, होम, अग्निहोत्र, ब्रह्मभोज, तीर्थयात्रा आदि करता हो पर इसमें उसका उद्देश्य यश लूटना या कोई लाभ उठाना हो, इसी प्रकार डॉक्टर के आपरेशन करने के समान ऐसे कार्य भी हो सकते हैं जो देखने में पाप प्रतीत होते हैं परन्तु कर्त्ता की सद्भावना के कारण वे श्रेष्ठ कर्म हों। इसलिए कौन आदमी यज्ञ कर रहा है या यहीं, इसका निर्णय उन व्यक्तियों की अन्तरात्मा ही कर सकती है बाहर के आदमी के लिये बहुत अंशों में उसका जानना सम्भव होने पर भी पूर्ण रूप से शक्य नहीं है।
पिछली काण्डिका में जिन बारह कड़ियों को एक ओर से गिनाया था इस काण्डिका में उन्हें दूसरी ओर से गिनाया गया है। अर्थात् क्रम उलटा कर दिया गया है-
यज्ञ वेदों में, वेद वाक् में, वाक् मन में, मन प्राण में, प्राण अन्न में, अन्न भूमि में, भूमि जल में, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश ब्रह्म में और ब्रह्म ब्राह्मण में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इस शृंखला का एक सिरा ब्राह्मण है तो दूसरा यज्ञ, एक सिरा यज्ञ है तो दूसरा ब्राह्मण, ब्राह्मण वही है जो सद्ज्ञान और सत्कर्म से ओत-प्रोत है। दूसरी तरह से इसी को यों कह लीजिये कि जो सद्ज्ञान और सत्कर्म से ओत-प्रोत है वही ब्राह्मण है।
जो इस प्रकार जानता है जो ब्रह्मज्ञानी है, वह सुगन्ध की तरह उड़ने वाली पुण्यमयी कीर्ति को प्राप्त करता है, वह निष्पाप हो जाने से अनन्त ऐश्वर्यों को भोगता है, वह ज्ञान का उपासक बन कर इस वेद माता गायत्री की उपनिषद् का उपासक बनता है। अर्थात् इस उपनिषद् में वर्णित महान ब्रह्म ज्ञान को अपने अन्तःकरण में धारण करके उससे अपना जीवन ओत-प्रोत बनाता है। ऐसा व्यक्ति ही ब्राह्मण है,ऐसा शास्त्रों का अभिवचन है।
उपरोक्त पंक्तियों में गायत्री उपनिषद् और उसकी व्याख्या समाप्त हो जाती है। मोटी दृष्टि से देखने पर यह सामान्य ज्ञान प्रतीत होती है परन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय, इस उपनिषद् में सन्निहित तत्व ज्ञान का बारीकी से निरीक्षण किया जाय, तो मनुष्य जीवनोपयोगी समस्त ज्ञान इसमें भरा हुआ मिलेगा। अध्यात्म, योग, दर्शन, धर्म, राजनीति, समाज विज्ञान, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य, सुख-शान्ति आदि की अनेक जानकारियाँ इसमें गागर की सागर की तरह भरी हुई हैं। मनुष्य जाति की बहुत सी बिना सुलझी हुई गुत्थियों को इसमें सुलझाया गया है
गायत्री उपनिषद् की इतनी महत्ता को ध्यान में रखते हुए ही गत तीन अंकों में क्रमशः उसे प्रकाशित कर दिया है, विज्ञ पाठक उसके रहस्य समझने का प्रयत्न करेंगे तो उन्हें बहुत ही उपयोगी जानकारी प्राप्त होगी।
तन में बढ़ता ताप वही ज्वर कहलाता है,
तरह तरह के भय विकार वह उपजाता है,,
इसी तरह जब मन में है उद्वेग समाता,
मद-होशी, आवेश स्वयं ही है बढ़ जाता,,
उसको ही सब लोग मानसिक ज्वर कहते हैं।
इसी रोग को प्रायः सारे जन सहते हैं॥
यह विकार का अंधड़ सारा ज्ञान मिटाता,
है विवेक को ग्रस लेता सद् बुद्धि छिपाता,
उसके चिंतन में न सत्य, भ्रम ही होता है,,
उसके कर्मों में न धर्म का क्रम होता है,,
बड़ी दुःखद होती है जीवन की यह अवनति।
और अनेकों त्रस्त इसी से रहते हैं नित॥
आती जब कि विपत्ति लोग चिन्ता करते हैं,
क्रोध निराशा और ग्लानि मन में भरते हैं,,
वैभव पाकर अहंकार में रत हो जाते,
मद, मत्सर, आवेश अमर्यादा दिखलाते,,
दोनों ही में नर होते रोगी के सम हैं।
रहते पागल और बालकों से कब कम हैं॥
हार जीत सुख दुःख सदैव रहते जीवन में,
खेला करता मानव है उत्थान-पतन में,,
बनकर मृग वह जग मरीचिका में भरमाता,
यह अमूल्य मानव जीवन है व्यर्थ गंवाता,,
पर सदैव जो एक भाव से ही हैं रहते।
वीत राग बनकर जो कुछ आता वे सहते॥
धीर सदा हंसते हैं कब उत्तेजित होते,
हर्ष शोक में नहीं मानसिक स्थिरता खोते,,
उनको वातावरण तनिक भी बदल न पाता,
चिंता, भय, मद, लोभ नहीं इनसे डर जाता,,
पथ की बाधाओं से होता उन्हें न भय है।
गायत्री का साधक तो जग में निर्भय है॥
*समाप्त*
[पं. शिव शंकर मिश्र एम. ए.]