गायत्री महाविद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न
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बड़ा सैट-
1- गायत्री महाविज्ञान [प्रथम भाग] गायत्री विद्या की वैज्ञानिक एवं तात्विक जानकारी, साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
2- गायत्री महाविज्ञान [द्वितीय भाग] गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, चौबीस गायत्री, पुरश्चरण, गायत्री कवच, गायत्री स्तोत्र, गायत्री तर्पण, गायत्री लहरी, गायत्री चालीसा, गायत्री सहस्रनाम आदि की भाषा टीका समेत संकलन।
3- गायत्री महाविज्ञान [तृतीय भाग] इसमें गायत्री द्वारा योग साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
4- गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- गायत्री की कृपा से अनेक प्रकार की आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले तथा सुख सफलता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के निजी अनुभव इस पुस्तक में हैं।
5- गायत्री चित्रावली- बढ़िया आर्ट पेपर पर छपे हुए बड़े ही कलापूर्ण गायत्री के 24 तिरंगे चित्र और उनके मार्मिक रहस्य एवं विवेचना की पुस्तक।
6- गायत्री का मन्त्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की शास्त्रीय विस्तृत व्याख्या है। राक्षस राज रावण, सायण, उव्वट, महीधर, व्यास, वशिष्ठ, शंख भारद्वाज, यज्ञावल्क आदि के द्वारा किए हुए गायत्री के अनेकों अर्थ।
छोटा सैट-
7- गायत्री ही कामधेनु है- ऋषियों, शास्त्रकारों महापुरुषों, अनेक स्त्रियों तथा पुरुषों के गायत्री सम्बन्धी अनुभव।
8- गायत्री का वैज्ञानिक आधार- अनेक तर्क प्रमाण, उदाहरण एवं विज्ञान सम्मत गायत्री का गुप्त मर्म।
9- गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
10- वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री- नित्य पाठ करने के लिए गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री स्तवन एवं गायत्री चालीसा का संग्रह।
11- गायत्री के चौदह रत्न। प्रथम भाग- गायत्री के ॐ, भूः, र्भुवः, स्वः, तत्, सवितुः वरेण्यं, भर्गो शब्दों की व्याख्या।
12- गायत्री के चौदह रत्न। द्वितीय भाग- गायत्री के देवस्य, धीमहि, धियो, यो नः, प्रचोदयात् शब्दों की व्याख्या।
13- अनादि गुरुमन्त्र गायत्री- गायत्री साधक के लिए गुरु की आवश्यकता का प्रतिपादन।
14- विपत्ति निवारिणी गायत्री- सम्पूर्ण विपत्तियों और कष्टों को नष्ट करने वाला तत्वज्ञान।
15- स्त्रियों को गायत्री का अधिकार- स्त्रियों को भी पुरुषों के समान ही गायत्री का अधिकार है। इसकी शास्त्रीय पुष्टि।
16- सचित्र गायत्री- ध्यान करने योग्य गायत्री के 16 रंगीन चित्रों की पुस्तक।
17- सर्व शक्तिमान गायत्री- यह अत्यन्त सस्ती सचित्र पुस्तक ब्रह्मदान में वितरण करने योग्य है। गायत्री का तिरंगा चित्र, गायत्री चालीसा।
6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 10
जीवन पथ पर निविड़ निशा में,
छा जाते जब संकट-बादल,
विकट परिस्थिति संघर्षमय,
कर देती मानव-उर व्याकुल।
एकाकी असहाय जीव तब,
बन जाता बालक सा निश्छल,
आती माँ की याद अचानक,
बहता निर्झर सा आँसू-जल॥
वही साँत्वना मय कुछ बूँदें,
हर लेतीं तब आतप जी का
पाकर केवल एक सहारा,
सिर पर वरद-हस्त जननी का॥
विजन विपिन की तरु-छाया में,
बैठा योगी ध्यानावस्थित,
छोड़-छाड़ जनपद-कोलाहल,
बनता उदासीन किसके हित। शीत-ग्रीष्म,
सुख-दुख में भी वह,
होता नहीं तनिक भी विचलित
बतलाओ है समय कौन सा,
पाता जब वह फल, मन-वांछित?
पा लेता है शान्ति-कोष वह,
तज कर भंगुर सुख धरती का।
हो जाता कृत-कृत्य प्राप्त कर,
सिर पर वरद-हस्त जननी का॥
शैशव में जिसकी गोदी ने,
कभी हँसाया कभी रुलाया, विद्या,
बुद्धि, शक्ति, सुख देकर,
मानव तन को श्रेष्ठ बनाया।
जिसने सागर, थल,
अम्बर में, अपना ही कौतुक फैलाया,
पाकर जिसकी कृपा, लोक यह,
सदा देव-दुर्लभ कहलाया॥
हमने सदा भुलाया फिर भी,
पाया नित्य स्नेह उसी का।
देता रहा विश्व को जीवन,
सिर पर वरद-हस्त जननी का॥
(श्री हरगोविन्द ठाकुर, इटैलिया)
नयस्यन्ते ये नराः पादान् प्रकृत्याज्ञानुसारतः। स्वस्थाः सन्तुस्तु ने नूनं रोग मुक्ता भवन्ति हि॥ अर्थ—जो मनुष्य प्रकृति के नियमानुसार आहार-विहार करते हैं वे रोगों से छुटकारा पाते हैं और सदा स्वस्थ रहते हैं।
स्वास्थ्य मनुष्य जीवन की प्रधान सम्पदा है। यह सम्पत्ति जिसके पास है वह आर्थिक, पारिवारिक आदि, अनेक कठिनाइयों के रहते हुए भी भली प्रकार जीवन यापन कर सकता है किन्तु जिसका स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ है, जो रोग ग्रस्त है, जिसका शरीर दुर्बल, अशक्त एवं पीड़ित है वह अन्य सब सुविधाओं के होते हुए भी सदैव दीन-हीन, बेचैन एवं दुखी रहता है। इसलिए जिन्हें जीवन का आनन्द लेने की इच्छा है उन्हें सबसे पहले अपने स्वास्थ्य को सम्भालने की, उसे स्थिर करने और बढ़ाने की आवश्यकता होती है।
यह विचारणीय बात है कि हम रोगी क्यों होते हैं? यदि रोगी होने का कारण समझ में आ जाय तो फिर उससे छुटकारा पाना भी कुछ कठिन न रहे। इस सम्बन्ध में हमें मनुष्येत्तर अन्य जीव जन्तुओं की गति-विधि पर दृष्टिपात करना होगा। हम देखते हैं कि जंगलों में रहने वाले समस्त पशु-पक्षी जीवन भर निरोग रहते हैं। कबूतर, मोर, साँप, छिपकली, कीट, पतंग आदि किसी भी जीव पर दृष्टिपात कीजिए किसी को न तो कभी बीमारी होती है और न दवा-दारु की जरूरत पड़ती है। कारण यह है कि वह प्रकृति माता की आज्ञा का पालन करते हैं, अपना आहार-विहार स्वाभाविक रखते हैं, इसके बदले में प्रकृति माता भी उन्हें स्वस्थता का अक्षय वरदान देती है।
मनुष्य अन्य जीव जन्तुओं की अपेक्षा बुद्धिमान है। परन्तु प्रकृति के नियमों की उपेक्षा करके कृत्रिम एवं अस्वाभाविक आहार-विहार अपनाने में उसने जो बुद्धिमत्ता दिखलाई है वह ‘मूर्खता’ से भी महंगी पड़ी है। मनुष्य जाति दिन-दिन अल्पजीवी, कमजोर, रोगग्रस्त होती जा रही है। यों अस्पताल और डॉक्टर आँधी-तूफान की तरह बढ़ते जा रहे हैं। पर उनसे बीमारी और कमजोरी की बढ़ोतरी में कोई कमी नहीं हो रही है। दवा-दारु से एक रोग जब तक दब नहीं पाता तब तक दूसरा नया रोग उभर पड़ता है। मनुष्य ने अपना जीवन क्रम प्रकृति नियमों के प्रतिकूल बनाया है इसका दण्ड उसे अस्वस्थता के रूप में मिला है। अपने को ही नहीं उसने अपने पालतू, संपर्क में रहने वाले पशु-पक्षियों को भी अपनी बुराइयाँ देकर इनमें भी तरह-तरह की बुराइयों का प्रवेश करा दिया है।
लोग बीमारी से छुटकारा पाने और बल बढ़ाने के लिए वैद्य, डाक्टरों की देहरी की धूल चाटते फिरते हैं। हजारों रुपये पानी की तरह बहाते हैं, तरह-तरह के खाद्य पदार्थ और नाना गुण−दोष वाली दवाइयों की तलाश करते रहते हैं। पर इस मृग-मरीचिका में उनके हाथ निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं आता। कारण यह है कि स्वास्थ्य कोई खोजने की वस्तु नहीं है वह तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, प्रकृति माता ने वह तो आरम्भ से ही परिपूर्ण मात्रा में प्रदान किया है। उसे सुरक्षित रखने के लिए किसी बाहरी प्रयत्न की जरूरत नहीं है। केवल इस बात की आवश्यकता है कि हम अपने शरीर पर अत्याचार करना, अपनी इन्द्रिय शक्तियों का दुरुपयोग करना बन्द कर दें। इतना करने मात्र से बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधर सकता है, और सुधरा हुआ स्वास्थ्य बढ़ सकता है।
यदि हम दीर्घजीवी रहना चाहते हैं तो सबसे पहले जिह्वा, इन्द्रिय और कामेन्द्रिय का दुरुपयोग छोड़ना पड़ेगा। पेट में भूख न रहते हुए भी लोग स्वादवश अनावश्यक भोजन ढूँढ़ते रहते हैं, भोजन को अपने स्वाभाविक रूप से विकृत करके उसे जायके के लिए ऐसा भूनते, जलाते, सड़ाते एवं बिगाड़ते हैं कि उसके पोषण तत्व नष्ट होकर वह केवल भूख बुझाने वाला बोझ मात्र रह जाता है। इन दोनों बुराइयों से बचने की आवश्यकता है। भोजन तभी किया जाय जब कड़ाके की भूख लगी हो, पेट की आवश्यकता और पुकार पर ही ग्रास तोड़ा जाय नहीं तो स्वाद की दृष्टि से तो अनावश्यक अमृत को भी ठुकरा देना चाहिए। जो भोजन किया जाय यथासंभव सजीव हो। फल, दूध, हरे शाक, भाजी, मेवे, पानी में भिगोए हुए अन्न भोजन का मुख्य भाग होना चाहिए यदि किसी चीज को पकाना ही पड़े तो पानी में उबाल लेना या थोड़ा सेक लेना पर्याप्त है। घी तेल में तली हुई, बहुत जलाई भुनी हुई, बासी, मसाले और चीनी मिलाकर जायकेदार बनाई हुई, नशीली, माँस आदि अभक्ष चीजें शरीर को लाभ के स्थान पर हानि ही पहुँचाती हैं। इसलिए सात्विक, स्वाभाविक, सजीव आहार यदि खूब भूख लगने पर, अच्छी तरह चबाकर और अन्न को अमृत बुद्धि और ईश्वर प्रसाद की भावना के साथ ग्रहण किया जाय तो वह साधारण कोटि का होते हुए भी बहुत बलपूर्वक बन जाता है।
काम वासना का अमर्यादित सेवन मौत की घंटी है। अन्य पशु-पक्षी इस सम्बन्ध में पूर्ण संयम से काम लेते हैं। जब मादा का शरीर सन्तानोत्पत्ति के लिए उत्तेजित होता है केवल तभी नर उससे काम सेवन करते हैं। इसके बाद मादा तो दूसरा बच्चा उत्पन्न करने की आवश्यकता होने तक मैथुन का नाम भी नहीं लेती। दूसरी ओर नर चाहे कितना ही तरुण हो, पर जब तक मादा की ओर से काम सेवन की स्पष्ट प्रेरणा न हो कभी विकार ग्रस्त नहीं होता। नर और मादा साथ-साथ रहते हैं, चरते हैं और उठते बैठते हैं पर अनावश्यक मैथुन की कोई प्रवृत्ति उनमें नहीं होती। यही क्रम मनुष्य का होना चाहिए। उचित तो यह है कि मनुष्य पशुओं से अधिक श्रेष्ठ, अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसे और भी अधिक संयमशीलता और ब्रह्मचर्य का परिचय देना चाहिए। यदि अधिक न हो सके तो कम से कम उतना तो आवश्यक ही है। असंयम और अमर्यादित वासना पूर्ति के कारण आज नर और नारी दोनों की ही शक्तियों का बेतरह क्षरण हो रहा है और जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोगों की बाढ़ सी आ रही है। अनावश्यक और असंस्कृत बच्चे मनुष्य जाति के लिए अभिशाप हो रहे हैं। अधिक बच्चे मनुष्य की आर्थिक, शारीरिक और मानसिक स्थिति को बिगाड़ते हैं और उसका स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।
जिह्वा इन्द्रिय और कामेन्द्रिय पर संयम प्राप्त करना प्रकृति के अनुसरण का प्रधान कार्य है। इसके अतिरिक्त अपनी दिनचर्या को ठीक रखना सामर्थ्य से अधिक या कम काम न करना, चिन्ताओं और कुविचारों को मन से दूर रखना, पूरी निद्रा लेना, खेल कूद एवं मनोरञ्जन की समुचित व्यवस्था रखना, ऋतुओं के प्रभाव सहने का अभ्यास करना, अधिक कपड़े न पहनना, आँखों को गैस बिजली आदि के तीव्र प्रकाश से बचाना, मस्तिष्क से बहुत अधिक श्रम न करना, स्वच्छ जलवायु का सेवन, खुली हवा में रहना, सब वस्तुएँ साफ सुथरी निर्मल रखना, रात में अधिक न जागना, कुसंग से बचना आदि बातें भी प्राकृतिक जीवन के आवश्यक अंग हैं। इन सब बातों को अपनाकर हम प्रकृति माता को प्रसन्न कर सकते हैं और ऐसा स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते हैं जो आसानी से नष्ट न हो सकेगा। कभी कोई अस्वस्थता आ भी जाय तो उपवास, वस्ति, फलाहार, जल, मिट्टी, भाप आदि के प्राकृतिक उपायों से सहज ही रोग मुक्ति हो सकते हैं।
गायत्री का आठवाँ “ण्यं” अक्षर हमें स्वस्थ रहने की महत्ता और उसकी प्राप्ति का सारा रहस्य बता देता है। इस अमूल्य शिक्षा को जो अपनाता है वह गायत्री का भक्त है और उसे माता की ओर से निरोगता का वरदान तत्काल प्राप्त होता है।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
मधुमक्खी छत्ते पर मधु चूसने के लिए बैठी। परन्तु उनके पैर छत्ते में फँस गये, अब वह निकलने नहीं पाती। अपनी दशा पर जब हम विचार करते हैं, तब अपने आपको ठीक उसी मधुमक्खी की सी अवस्था में पाते हैं। जीवन का यही सारा रहस्य है। यहाँ हम किसलिए हैं? हम मधु चूसने के लिए आये हैं परन्तु अपने आपको जब देखते हैं, तो हमें अपने हाथ, पैर उस मधु में ही लिपेटे हुए मिलते हैं। यहाँ हम ग्रहण करने के लिए आये हैं। किन्तु स्वयं शासित हो रहे हैं। यहाँ सुखोपभोग करने आये हैं, किन्तु स्वयं उपभुक्त हो रहे हैं। हम कर्म करने आये हैं किन्तु हमारे ही ऊपर कर्म किया जा रहा है। सदा ही हमें यह बात ज्ञात होती है। यह बात जीवन की हर एक बात में पाई जाती है।
दुःख, क्लेश का यही कारण है कि हम निग्रहित हो रहे हैं। बद्ध हो रहे हैं। इसीलिए गीता का कथन है कि निरन्तर कर्म करते जाओ, आसक्त मत होओ, बन्धन में मत पड़ो। संसार के समस्त पदार्थों से सम्बन्ध विच्छेद करने की शक्ति अपने में बनाये रहो। मनुष्य में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि वह इच्छानुसार किसी भी वस्तु से, चाहे वह उसे कितनी भी प्रिय क्यों न हो, अपना सम्बन्ध त्याग सके। मान लीजिए कि किसी वस्तु के प्राप्त करने के लिये आप लोग व्यग्र भाव से प्रयत्न कर रहे थे, अन्त में बड़ी दौड़-धूप बड़े परिश्रम के बाद आप उसे प्राप्त कर सकते हैं वह एक ऐसी वस्तु है, जिसके हाथ से निकल जाने पर आप को क्लेश भी कम न होगा। परन्तु फिर भी आप में इतना आत्मबल होना चाहिए कि इच्छा होने पर किसी समय भी आप उस वस्तु का प्रसन्न भाव से परित्याग कर सकें, उस वस्तु में आपकी जरा भी आसक्ति न हो।
दुर्बल के लिए संसार में स्थान नहीं है। वह न तो इस जन्म में अपने लिए स्थान बना सकता है और न दूसरे ही जन्म में । दुर्बलता मनुष्य को दासता की ओर ले जाती है। दुर्बलता के ही कारण, मनुष्य को शारीरिक तथा मानसिक सभी प्रकार के क्लेश सहन करने पड़ते हैं। वास्तव में दुर्बलता मृत्यु है। हमारे चारों ओर लाखों की संख्या में कीटाणु फैले हुए हैं। परन्तु जब तक हमारा शरीर दुर्बल नहीं हो जायगा, तब तक उन सब का सामना करने की शक्ति हममें रहेगी, तब तक वे हमें जरा भी हानि न पहुँचा सकेंगे। सम्भव है कि हमारे इर्द-गिर्द दुख-क्लेश के लाखों कीटाणु उड़ रहे हों परन्तु इसके लिए डरने की आवश्यकता नहीं है। जब तक हममें आत्मबल रहेगा, जब तक हममें मानसिक दुर्बलता न आ पावेगी तब तक वे सारे कीटाणु हमारे पास तक फटकने का साहस न करेंगे। यह एक महान् सत्य है। सबलता ही जीवन है और दुर्बलता मृत्यु। सबलता ही सुख है। जीवन चिरन्तन है, अमर है।
आसक्ति ही संसार के सारे सुखों की जड़ है। हमारी अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों में आसक्ति है, हम जितने भी शारीरिक तथा मानसिक कार्य करते हैं उन सभी में हमारा हृदय उलझा रहता है। हमारा मन बाह्य पदार्थों भौतिक पदार्थों में रमा है। ऐसी बात क्यों है? वह इसलिए कि इन पदार्थों से हमें सुख मिलता है। परन्तु केवल यह आसक्ति ही मन की यह उलझन ही, हमारे सारे दुःखों का एकमात्र कारण है। इसके अतिरिक्त भला ऐसा और कौन सा कारण हो सकता है? सुख प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि इच्छा करने पर हम किसी पदार्थ के मोह से छुटकारा प्राप्त कर लें। इस विश्व प्रकृति का आनन्द तो वही सौभाग्यशाली प्राप्त कर सकेगा जो कि सभी वस्तुओं को अपनी समस्त शक्ति से अपना सके, परन्तु साथ ही साथ इन समस्त वस्तुओं का परित्याग करने की भी उसमें शक्ति हो।
भिक्षुक कभी सुखी नहीं रहता। वह केवल मुट्ठी भर अन्न पाता है, कोई दयालु हृदय का व्यक्ति उसकी दया पर दुखी हो आदर से देता है और कोई चार बातें सुनाकर देता है। पर जो भी हो भिक्षुक सदा ही एक तुच्छ जीव, दया का पात्र समझा जाता है। उसे कोई सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता। समस्त दिन की दौड़-धूप के बाद वह जो कुछ पाता है उसे क्या वह संतुष्ट हृदय से खाता है?
हम सभी लोग भिक्षुक हैं। जो भी काम करते हैं उसके बदले में कुछ न कुछ चाहते अवश्य हैं। हम सभी लोग व्यापारी हैं। हम जीवन में व्यापार करते हैं, धर्म-कर्म में व्यापार करते हैं, पुण्य में व्यापार करते हैं, परमार्थ में व्यापार करते हैं। हमें धिक्कार है प्रेम तक में इस वैश्य वृत्ति को नहीं त्याग सकते।
जहाँ आप व्यापार करने के विचार से चलते हैं वहाँ लेन-देन का प्रश्न हो तो फिर उसी नियम पर आरुढ़ रहिए। व्यापार के लिए समय कभी अनुकूल रहता है और कभी प्रतिकूल। बाजार का भाव कभी स्थिर नहीं रहता, वह चढ़ता-उतरता रहता है। इससे घाटा उठाने के लिए सदा ही तैयार रहना चाहिए। इस प्रकार की वृत्ति धारण करना आइने में अपने आपको देखना है। आइने के सामने खड़े होकर आप जिस प्रकार की अपनी मुखाकृति बनाते हैं, ठीक वैसे ही वह आइने में प्रतिबिम्बित होती है। यदि आप हँसते हैं तो आइने से भी आप ही की तरह के किसी आदमी का हँसता हुआ चेहरा दिखाई पड़ता है। यही खरीदना और बेचना है, देना और लेना है।
हम निग्रहित होते हैं, बन्धन में पड़ते हैं, कैसे? इसलिए नहीं कि हम कुछ देते हैं, बल्कि इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं। प्रेम करके हम दुख पाते हैं। परन्तु दुख हमें इसलिए नहीं मिलता कि प्रेम करते हैं। हमारे दुख का कारण यह है कि हम प्रेम के बदले में प्रेम उपलब्ध करना चाहते हैं। जहाँ इच्छा नहीं है, चाह नहीं है, वहाँ दुख क्लेश भी नहीं हैं।
हमारी अभिलाषायें, हमारे अभाव समस्त संकटों के आदि कारण हैं। इन्हीं की बदौलत हमें तरह-तरह के दुख-क्लेश सहन करने पड़ते हैं अभिलाषायें सफलता और असफलता के नियमों से बँधी हुई हैं। ये दुखों को लाकर ही रहेंगी।
कोई वस्तु माँगिये नहीं, किसी को यदि कुछ दीजिए या उसका किसी प्रकार का उपकार कीजिए तो बदले में उस व्यक्ति से किसी प्रकार की आशा न कीजिए। आपको जो कुछ देना हो दे दीजिए। वह हजार गुना अधिक होकर आपके पास लौट आवेगा। परन्तु आपको उसके लौटने या न लौटने की चिंता ही न करनी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए, देते चलिए। देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। यह बात सीख लीजिए कि सारा जीवन दे रहा है। प्रकृति देने के लिए आपको बाध्य करेगी। इसलिए प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। आज हो या कल, आपको किसी न किसी दिन त्याग करना पड़ेगा ही।
जीवन में आप संचय करने के लिए आते हैं। संसार में सम्पदाएँ खूब मुट्ठी बाँध कर लिया करते हैं परन्तु प्रकृति आपका गला दबा कर आप से मुट्ठी खुलवा लेती हैं। जो कुछ आपने ग्रहण किया है, वह देना ही पड़ेगा, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो। जैसे ही आपके मुँह से निकलता है, ‘नहीं, मैं न दूँगा,’ उसी क्षण जोर का धक्का आता है। आप घायल हो जाते है। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जीवन की लम्बी दौड़ में प्रत्येक वस्तु देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस नियम के प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करता है वह अपने आपको उतना ही दुखी अनुभव करता है। नहीं। आप जितना भी देंगे, उतना ही लौटकर आपके पास आवेगा। इस कमरे में जितनी भी हवा है उसे जितनी शीघ्रता से निकाल दीजिएगा, बाहर की हवा से कमरा उतनी ही शीघ्रता से भर जायगा। यदि आप कमरे के दरवाजों और खिड़कियों से लेकर छोटे-छोटे सूराख तक बन्द कर दें तो भीतर की हवा वहाँ की वहाँ रहेगी अवश्य, परन्तु कमरे में फिर बाहर की न प्रवेश कर सकेगी। कमरे की हवा बँधी रहेगी और वह विकृत होते-होते विषैली हो जायगी। नदी निरन्तर बहकर अपना जल समुद्र में पहुँचा रही है और बाहर के जल से वह भरती जा रही है। आप त्याग के रहस्य को समझिए। और भिक्षुक न बनिए वरन् अनासक्त हूजिए।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती)
दिव्य प्रेम ही विशुद्ध प्रेम है। यह एक सच्चे भक्त का भगवान के प्रति उसके हृदय तल से सहज स्नेह और भक्ति का प्रवाह है। संसार में एकमात्र सारवस्तु प्रेम ही है। यह नित्य, अनन्त और क्षय रहित है। शारीरिक प्रेम तो काम का विकार और मोह का उन्माद है। विश्व प्रेम सच्चा है। ईश्वर प्रेम है और प्रेम ही ईश्वर है। स्वार्थपरता, लोभ, अहंकार, मिथ्याभिमान और घृणा हृदय को संकुचित करते हैं और विश्व प्रेम के विकास के मार्ग में बाधक हैं। हमें निस्वार्थ सेवा, महात्माओं के साथ सत्संग, प्रार्थना और गुरु मन्त्र द्वारा विश्व प्रेम को शनैः—शनैः बढ़ाना चाहिए।
जबकि स्वार्थपरता से हृदय संकुचित हो जाता है तो मनुष्य पहले केवल अपनी स्त्री, बच्चों थोड़े मित्रों और रिश्तेदारों से ही प्रेम करता है जैसे-जैसे उसका विकास होता जाता है तैसे-तैसे वह अपने जिले के तथा अपने प्रान्त के लोगों से प्रेम करने लगता है। तत्पश्चात् वह अपने देश के लोगों के प्रति प्रेम बढ़ाता है, इसी प्रकार वह देशवासियों से भी प्रेम करने लगता है। अन्त में वह सबसे प्रेम करना आरम्भ करता है। इस प्रकार जब वह विश्व प्रेम का विकास करता है तब उसके प्रतिबन्ध टूट जाते हैं। उसका हृदय असीम रूप से विकसित हो जाता है।
विश्व प्रेम की बात करना आसान है, किन्तु जब तुम इसे कार्य रूप में लाना चाहते हो तो यह अत्यधिक कठिन हो जाता है। सब प्रकार की तुच्छ हृदयता रास्ते में आ खड़ी हो जाती है। पुराने भ्रमपूर्ण संस्कार जिनको कि तुमने पहले अपने गलत विचारों से उत्पन्न कर लिया है, रोड़ा अटकाते हैं। सुदृढ़ निश्चय, बलवान इच्छाशक्ति, धैर्य, सन्तोष और विचार द्वारा तुम बिलकुल सरलता से सब विघ्नों को जीत सकते हो। मेरे प्रिय मित्र! यदि तुम सच्चे हो तो तुम्हें भगवान कृपा प्राप्त होगी।
विश्व प्रेम ही अन्त में आत्मदर्शी ऋषि, मुनियों की औपनिषदिक चेतना अथवा अद्वैत निष्ठा या एकता में समाप्त हो जाता है। साम्य अवस्था की प्राप्ति के लिए शुद्ध प्रेम बड़ा ही शक्ति सम्पन्न होता है। यह समानता और अंतःदृष्टि प्राप्त करता है मीरा, गौराँग महाप्रभु, तुकाराम, रामदास, हाफिज, कबीर—इन सबने इस विश्व प्रेम का आस्वादन किया था। विश्व प्रेम के एक ही आलिंगन में सब भेद-भाव और तुच्छ मायिक विभिन्नताएँ भूल जाती हैं। सर्वत्र प्रेम का ही साम्राज्य रह जाता है।
हम लोगों में ऐसे कौन है जो ईश्वर प्रेम या दिव्य प्रेम के यथार्थ स्वरूप को जानने के लिए सचमुच में विकल रहा करते हैं। हम लोग यही जानने के लिए उत्सुक रहा करते हैं कि आपका ‘इम्पीरियल बैंक’ में कितना रुपया जमा है? हमारे विरुद्ध यह बात किसने कही? क्या आप जानते हैं कि मैं कौन हूँ? आपकी स्त्री तथा बच्चे कैसे हैं? मेरे प्यारे भाइयों! इन प्रश्नों को तो हम पूछते हैं किन्तु यह हममें से कितने लोग पूछते हैं कि “मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? बन्धन क्या है? मुक्ति क्या है? मैं कहाँ से आया हूँ? ईश्वर कौन है? ईश्वर के क्या गुण हैं? हमारा ईश्वर से क्या सम्बन्ध है? मोक्ष किस प्रकार मिले?”
सत्संगति अर्थात् साधुओं और भक्तों की संगति विश्व प्रेम बढ़ाने में बहुत ही सहायक है। साधुओं की गोष्ठी में भगवद् चर्चा ही होती रहती है जो हृदय और कानों को बहुत प्रिय होती है। जगाई मघाई का उद्धार और डाकू रत्नाकर के पाप पूर्ण जीवन से छुटकारा ये साधु संग के परम कल्याणकारी होने के ज्वलन्त दृष्टान्त हैं।
प्यारे मित्रो! खड़े हो जाओ। खूब संघर्ष करो, दृढ़ता से अग्रसर हो। अहंकार, स्वार्थपरता, अभिमान, और घृणा को निर्मल करो। प्रेम करो। दान दो। सेवा करो। इस ‘द’ त्रैत की याद कर लो “दत्त दया दम” अर्थात् दान दो। दया करो । इन्द्रियों का दमन करो।
इस बात का भी अभ्यास डालो कि जो सेवाएँ तुम करते हो उसके बदले में कृतज्ञता स्तुति और धन्यवाद की आशा मत करो। प्रत्येक वस्तु को भगवान के चरण कमलों में भेंट चढ़ा दो। इस मंत्र को अपनाओ “प्रेम के लिए ही प्रेम करना-काम के लिए ही काम करना”।
एक सच्चे वैष्णव बन जाओ। पैर से कुचली हुई घास से भी विनम्र बनो, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनो। दूसरों से मान प्राप्त करने की चिन्ता न करो । प्रत्युत अन्य सबको मान दो।
सदैव हरि नाम का गान करो और मनुष्य वास्तव में परमात्मा का स्वरूप है ऐसा समझ कर उनकी सेवा करो तभी आप शीघ्रता पूर्वक विश्व प्रेम प्राप्त करोगे। आपको हरि के दर्शन होंगे। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ यही आपको अमरतत्व और चिर शान्ति प्रदान करेगा।
मानव शरीर के दो भाग हैं एक जड़ दूसरा चेतन। जड़ भाग में हाड़, माँस, रस, रक्त आदि से बना हुआ स्थूल शरीर है। इसके भीतर जो चेतना शक्ति काम करती है उसी के कारण जीवन स्थिर रहता है। उस चेतना का अन्त होते ही मृत्यु हो जाती है और शरीर तत्काल सड़ने लगता है।
चेतना शक्ति को चार भागों में बाँटा गया है। इस विभाजन का तात्पर्य यह है कि उसकी कार्य प्रणाली चार दिशाओं में काम करती है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चारों की सम्मिलित शक्ति को अन्तः करण चतुष्टय कहते हैं आइये, इनका कुछ परिचय प्राप्त करें।
(1)मन का कार्य इच्छा करना, चाहना, कल्पना करना है। तरह तरह की वस्तुओं की इच्छाएँ मन के द्वारा होती हैं, कल्पना करना इसका प्रधान गुण है, इसलिए क्षण में पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाता है इसकी उड़ान बड़ी तेज है। मन की बराबर तीव्र गति से और कोई नहीं दौड़ सकता। यह एक स्थान पर देर तक स्थिर नहीं रहता। भोग-भोगने का साधन तो इन्द्रियाँ हैं पर कारण, मन है। मन की इच्छा और प्रेरणा से ही इन्द्रियाँ विविध प्रकार के भोगों के लिए संलग्न होती हैं। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय भी कहा जाता है, यद्यपि वह अन्य इन्द्रियों की भाँति दिखाई नहीं देता तो भी रसानुभूति में सबसे आगे है, सब का नेता है। यदि मन उदास हो, खिन्न हो, तो आकर्षक भोग भी नहीं सुहाते और यदि मन की प्रेरणा प्रबल हो तो निर्बल इन्द्रियाँ भी उत्तेजित होकर उधर लग जाती हैं। मन की इच्छाएं और कल्पनाएं यदि सन्मार्ग गामी हों तो मनुष्य को आत्म कल्याण का मार्ग प्राप्त करने में देर नहीं लगती और यदि वह कुमार्ग गामी हों तो पतन का गहरा गर्त सम्मुख ही उपस्थित है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए गीताकार ने कहा है, कि-”मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयो” अर्थात् मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। वश में किया हुआ मन, सबसे बड़ा मित्र है और असंस्कृत मन से बढ़कर मानव प्राणी का दूसरा शत्रु नहीं। यही कारण है कि आत्मकल्याण की इच्छा करने वाले को मन को वश में करने की ओर विशेष ध्यान देना पड़ता है।
(2)बुद्धि का कार्य है- निर्माण करना। मन अनेक प्रकार की ऊबड़-खाबड़ कल्पनाएं करता रहता है। बुद्धि उसमें से उपयोगी कल्पनाओं को स्वीकृत करती है और अनुपयोगियों को त्याग देती हैं। तर्क करना बुद्धि का प्रधान हथियार है। कारण, परिस्थिति, अनुभव, उदाहरण, अवसर, प्रमाण, साधन, पात्र, सामर्थ्य आदि का ध्यान रखते हुए, इन कसौटियों पर कसते हुए, बुद्धि यह निर्णय करती है कि क्या करना चाहिए क्या न करना चाहिए। यह तो हुई बुद्धि की सामान्य कार्य पद्धति। विशुद्ध बुद्धि ऋतम्भरा बुद्धि प्रायः उच्च कोटि की आत्माओं की ही होती है।
साधारण मनुष्यों की बुद्धि श्रेय या प्रेम में से एक पक्ष की ओर झुकी होती है। श्रेय का अर्थ है— आत्मा का स्वार्थ, परमार्थ। प्रेम का अर्थ है साँसारिक सुख, भौतिक लाभ। जैसे मुकदमें में वादी और प्रतिवादी के वकील एक ही बात पर परस्पर विरोधी तर्क करते हैं और अपने पक्ष को निर्दोष तथा दूसरे पक्ष को दोषी सिद्ध करने के लिए बड़ी प्रभावपूर्ण बहस करते हैं उसी प्रकार श्रेयानुगामिनी बुद्धि उन तर्कों को प्रधानता और मान्यता देती है जो आत्मा के स्वार्थ को पूरा करते हों, चाहे उनके लिए कुछ साँसारिक लाभों को छोड़ना भी पड़ता हो। इसी प्रकार प्रेयानुगामिनी बुद्धि को वे तर्क, प्रमाण और उदाहरण पसंद आते है जो साँसारिक सुख साधनों को बढ़ावें फिर चाहें धर्म कर्त्तव्य को उसके लिए छोड़ना भी क्यों न पड़ता हो।
विवेकशील मनुष्य वे है जो दोनों का समन्वय करते हैं। वे ऐसी नीति एवं कार्य पद्धति को अपनाते हैं जो दोनों लाभों को साथ ले चले। वे जानते हैं कि ‘अति’ करना यह मध्यम स्थिति में उचित नहीं। सामान्य जीवन में अति लोभ की भाँति अति त्याग भी कष्ट दायक है। अति भोग की भाँति अति तितीक्षा भी स्वास्थ्य के लिए अहितकर है। धर्म पूर्वक जीविका कमाना असंभव नहीं है, संयमपूर्वक ऐश्वर्य का उपयोग न हो सके ऐसी बात नहीं है, गृहस्थ में रहकर राजा जनक की भाँति विरक्त रहना असाध्य नहीं, स्वार्थ और परमार्थ का एकीकरण हो सकता है। यही मध्यम मार्ग बुद्धिमान मनुष्यों को प्रिय होता है। इस साधना के उपरान्त धीरे-धीरे बुद्धि की स्थिति ऊँची हो जाती है तब वह ऋतम्भरा प्रज्ञा कहलाती है। उस दशा में वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों पक्षों को छोड़ देती है केवल दैवी प्रेरणा एवं ईश्वरीय आज्ञा ही उसका आधार रह जाता है परमहंस और जीवन मुक्त आत्माएँ उसी दिव्य प्रेरणा के आधार पर काम करती हैं।
(3) चित्त का तात्पर्य-स्वभाव, आदत, टेव, अभ्यास, संस्कार। दीर्घ काल तक जो विचार पद्धति एवं कार्य प्रणाली अभ्यास में, उपयोग में आती रहती है, मनुष्य उसका आदी हो जाता है। उसे छोड़ने में बड़ी हिचकिचाहट होती है। जैसे दो मित्र दीर्घ काल से साथ साथ रहते चले आये तो स्थायी वियोग के अवसर पर उनकी भावना उमड़ आती है और वे अलग नहीं होना चाहते। इसी प्रकार जो स्वभाव, विचार, आचार बहुत दिनों से अभ्यास में आये हैं वे चित्त में संस्कार रूप से जम जाते हैं और जीवन का क्रम उसी आधार पर चलने लगता है। भिखारी, चोर, नशेबाज, दुराचारी, आलसी स्वभाव के मनुष्य जानते हैं कि हमारी गतिविधि हमारे लिए दुखदायी है पर उनके मस्तिष्क और शरीर को ऐसा अभ्यास पड़ा होता है कि अनिच्छा होते हुए भी आदत से लाचार होकर उसी कर्म में बार-बार प्रवृत्त हो जाते हैं। कई व्यक्ति रूढ़ियों, मूढ़ विश्वासों अन्य परम्पराओं और पुरातन पंथी से ऐसे बेतरह चिपके होते हैं कि विवेक बुद्धि, उपयोगिता सामयिक आवश्यकता आदि का कुछ भी प्रभाव उन पर नहीं पड़ता और जो कुछ भला-बुरा अब तक होता चला आया है उसमें तनिक भी परिवर्तन स्वीकार नहीं करते। यह चित्त की स्थिति का ही खेल है।
धन को सुरक्षित रखने के लिए तिजोरी का घर में रहना आवश्यक है। पर यदि दुर्गन्धयुक्त गंदगी तिजोरी भर रखी जाय तो तिजोरी का भी दुरुपयोग होता है और गन्दगी की बदबू से होने वाली हानि भी चिरस्थायी हो जाती है। चित्त के संबंध में भी यही बात है। प्रभु ने मनोमय कोष में चित्त का बहुमूल्य भाग इसलिए दिया है कि उसके द्वारा उत्तम स्वभाव को सुरक्षित और चिरस्थायी रखा जा सके। आजकल हमारे चित्त बड़ी दुर्दशा में हैं उनमें बुरी आदतें, नीच विचारधाराएँ, सड़ी-गली परंपराएं, तुच्छ कामनाएँ भरी पड़ी होती हैं।
जैसे कच्ची मिट्टी पानी को सोख लेती है और पानी रंग तथा गंध को देर तक अपने में धारण किये रहती है उसी प्रकार मन के द्वारा जो विचार किये जाते हैं और शरीर द्वारा जो कार्य होते हैं उनका औचित्य-अनौचित्य, पाप-पुण्य, चित्त में संस्कार रूप से जम जाता है। यह संस्कार ही समयानुसार परिपाक होकर दुख-सुख के कर्म भोगों का निर्णय करता है। चित्त का संशोधन और परिमार्जन हो जाय तो उसमें जमे हुए जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कार भी विनष्ट हो जाते हैं और चालू प्रारब्ध भोगों के अतिरिक्त भविष्य में बनने वाले दुखदायी कर्म भोगों की अनायास ही जड़ कट जाती है।
चित्त में जमे हुए कुसंस्कारों का मूलोच्छेदन करना और नये सुसंस्कारों को मजबूती से गहराई तक जमाना, आध्यात्मिक साधकों के लिए आवश्यक होता है। इसलिए संस्कार भूमि का, चित्त चेतना का परिमार्जन करना मनोमय क्षेत्र की साधना में एक महत्वपूर्ण कार्य समझा जाता है।
(4)अहंकार का अर्थ है—अपने आपके सम्बन्ध में मान्यता। मैं कौन हूँ-इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न व्यक्तियों के मन में विभिन्न प्रकार का होता है। कोई अपने को व्यवसाय के आधार पर, कोई सम्पत्ति के आधार पर, कोई जाति के आधार पर, कोई सम्प्रदाय के आधार पर अपने को प्रधानता देता है। ऐसी ही विविध मान्यताओं से लोग अपने आपके संबन्ध में मान्यता बनाते हैं। जन समुदाय से पूछा जाय कि आप लोग अपने-अपने को क्या समझते हैं तो ऐसे उत्तर मिलेंगे जिससे पता चलेगा कि यह लोग अपने को ब्राह्मण, वैश्य, लखपती, गरीब, जमींदार, किसान, भिखारी, हिन्दू, ईसाई, विधुर, विवाहित, शिक्षित, अशिक्षित, अभागा, भाग्यवान, कैदी, शासक, रोगी, रूपवान, चोर, दानी, आदि परिस्थितियों का अपने आपको प्रतीक मानते हैं। यह मान्यता ही वह साँचा है जिसमें ढलकर वस्तुतः वह वैसा ही बन जाता है।
अपने सम्बन्ध में स्थिर की गई भावना को, मान्यता को अहंकार कहते हैं। अभिमान और अहंकार को कई व्यक्ति एक बात समझते हैं। यह शब्द समानार्थी भले ही समझे जाते हों पर अध्यात्म शास्त्र में अहंकार का प्रयोग ‘आत्म मान्यता’ के सम्बन्ध में ही होता है। अहंकार मन का वह भाव है जो मोटी दृष्टि से कुछ विशेष उपयोगी नहीं जान पड़ता पर वस्तुतः इसका भारी महत्त्व हैं। ईश्वर और जीव की पृथकता का प्रधान आवरण यह ‘अहम्’ ही है। यह अहंता जब तक रहती है तब तक सायुज्य मुक्ति नहीं हो सकती। ईश्वरीय प्रचण्ड तेज की एक छोटी चिंगारी जब अपने अस्तित्व की प्रथम मान्यता कर लेती है और ‘मैं’ का एक छोटे दायरे में अनुभव करती है तभी वह जीव संज्ञा को प्राप्त कर लेती है। ईश्वर से पृथकता में मैं की मान्यता ही जीवन का मूल कारण है। इस मान्यता को हटाकर, द्वैत को मिटाकर जब मैं और तू को एक कर दिया जाता है तो वह अद्वैत भाव ही ब्रह्म सायुज्य में परिवर्तित हो जाता है। कहा गया है कि—”अपनी खुदी मिटा दे, तुझको खुदा मिलेगा।”
अहंकार जिस प्रकार का होगा, उसी के अनुसार हमारे विचार, विश्वास, आदर्श होंगे। इच्छा और आकांक्षाएं उसी क्षेत्र में उन्नति एवं सफलता प्राप्त करना चाहेंगी। जिसके मन में अपने सम्बन्ध में यह निश्चित विश्वास है कि मैं अमुक नाम के भिखारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूँ उसकी विचारधारा भिक्षा में और कार्य प्रणाली याचना में अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए ही अग्रसर हो सकती है। आध्यात्मिक व्यक्तियों का अहंकार सज्जन, सत्पुरुष, महात्मा, आदर्शवादी, लोकसेवी, महापुरुष, ईश्वर भक्त, के रूप में होता है इसलिए वह इसी क्षेत्र में अग्रसर होता है। वह सम्पदाओं की अपेक्षा सद्गुणों में सुख एवं सफलता अनुभव करता है। तदनुसार उसके जीवन की गतिविधि उस ढांचे में ढ़ल जाती है जो आत्मा की महानता, प्रतिष्ठा और सुख शान्ति के अनुरूप होती है।
अन्तः करण चतुष्टय के चारों भागों को, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को, जब सात्विकता के शान्तिमय पथ पर अग्रसर किया जाता है तो हमारी चेतना शक्ति का दिन-दिन विकास होता है। यह मानसिक विकास अनेक सफलताओं और सम्पत्तियों का पिता है। मनोबल से बड़ी और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं है। मानसिक दृष्टि से जो जितना बड़ा है उसी अनुपात से संसार में उसका गौरव होता है अन्यथा शरीर की दृष्टि से तो प्रायः सभी मनुष्य लगभग समान होते हैं। उन्नति के इच्छुकों को अपने अन्तः करण चतुष्टय का विकास करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि इस विकास में ही साँसारिक और आत्मिक कल्याण सन्निहित है।
(श्री शिव शंकर मिश्र शास्त्री, एम.ए.)
“जीवात्म परमात्म संयोगो योगः” कहकर भगवान याज्ञवलक्य ने जिस योग की विवेचना की वह केवल कल्पना नहीं, अपितु हमारे दैनिक जीवन की एक अनुभूत साधना है और एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा हम अपने साधारण मानसिक क्लेशों एवं जीवन की अन्यान्य कठिनाइयों का बहुत सुविधापूर्वक निराकरण कर सकते हैं। हमारे अन्दर मृग में कस्तूरी के समान रहने वाली जीवात्मा एक ओर मन की चंचल चित्त वृत्तियों द्वारा अपनी ओर खींची जाती है और दूसरी ओर परमात्मा उसे अपनी ओर बुलाता है। इन्हीं दानों रज्जुओं से बंधकर निरन्तर काल के झूले में झूलने वाली जीवात्मा चिरकाल तक कर्म-कलापों में रत रहती है। यह जानते हुए भी कि जीवात्मा दोनों को एक साथ नहीं पा सकती और एक को खोकर ही दूसरे को पा सकना संभव है वह दोनों की ही खींचतान की द्विविधा में पड़ी रहती है। इसी द्विविधा द्वारा उत्पन्न संघर्षों का संकलन समाज और समाजों का सम्पादन विश्व कहलाता है।
उपर्युक्त विवेचन का एक दूसरा स्वरूप भी है और वह यह है कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच मन बाधक के रूप में आकर उपस्थित होता है। कुरुक्षेत्र में पार्थ ने मन की इस सत्ता से भयभीत होकर ही प्रार्थना की थी ‘चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढ़म्’। मन मनुष्य को वासना की ओर खींच कर क्रमशः उसे परमात्मा से दूर करता जाता है। उसे सीमित करना पवन को बंधन में लाने के समान ही दुष्कर है। आत्मा और परमात्मा के निकट आये बिना आनन्द का अनुभव नहीं होता। ज्यों-ज्यों जीवात्मा मन से सन्निकटता प्राप्त करती जाती है वह क्लेश एवं संघर्षों से लिपटती जाती है। आत्मा एवं परमात्मा का एकाकार ही परमानन्द की स्थिति है। सन्त कबीर ने इस एकाकार को ही आध्यात्मिक विवाह का रूप दिया है और गाया है—
जिस डर से सब जब डरे, मेरे मन आनन्द;
कब मरिहों कब पाइहों पूरन परमानन्द,
मन को वश में करने की मुक्ति ही योग है।
महर्षि पातंजलि ने कहा भी है—’योगश्चित्त वृत्ति निरोधः’। चित्त वृत्ति के निरोध से ही योग की उत्पत्ति होती है और इसी की प्राप्ति ही योग का लक्ष है। गीता में भगवान कृष्ण ने योग की महत्ता बतलाते हुए कहा है कि यद्यपि मन चंचल है फिर भी योगाभ्यास तथा उसके द्वारा उत्पन्न वैराग्य द्वारा उसे वश में किया जा सकता है।
व्यावहारिक रूप में योग का तात्पर्य होता है जोड़ना या बाँधना। जिस प्रकार घोड़े को एक स्थान पर बाँधकर उसकी चपलता को नष्ट कर दिया जाता है उसी प्रकार योग द्वारा मन को सीमित किया जा सकता है। विस्तार पाकर मन आत्मा को आच्छादित न कर ले इसीलिए योग की सहायता आवश्यक भी हो जाती है। भक्तियोग और राज योग से ऊपर उठकर त्रिकाल योग के दर्शन होते हैं और यही सर्वश्रेष्ठ योग है।
इन्हीं तीनों योगों का व्यावहारिक साधारणीकरण कर्म योग है और आज के संघर्षमय युग में कर्मयोग ही सबसे पुण्य साधना है। संसार और उसकी यथार्थता ही कर्मयोगी का कार्यक्षेत्र है। फल के प्रति उदासीन रहकर कर्म के प्रति जागरुक होकर ही मनुष्य क्रमशः मन पर विजय पाता है और परमात्मा से अपना संबन्ध सुदृढ़ करता है। कर्म योग की प्रेरणा किसी कर्मयोगी के जीवन को आदर्श मानकर ही प्राप्त होती है। अपने कर्त्तव्य के प्रति तल्लीनता तथा विषय जन्य भावनाओं के प्रति निरासक्ति ही कर्म योग की पहली सीढ़ी है।
कर्मयोगी के जीवन में निराशा अथवा असफलता के लिए कोई स्थान नहीं क्योंकि एक तो वह इनकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करता और दूसरे उसकी दृष्टि कर्म से ऊपर उठकर परिणाम तक पहुँच ही नहीं पाती। यहाँ तक कि सच्चा कर्मयोगी परमात्मा की प्राप्ति के प्रति भी वीतराग हो जाता है। उस स्थिति पर ‘तस्माद्योगी भवार्जुन’ के अनुसार कर्मयोगी वह पद प्राप्त कर लेता है जहाँ ‘मैं तुमसे हूँ एक, एक हैं जैसे रश्मि प्रकाश’ के रूप में आत्मा और परमात्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता।
पार्थिव शरीर को जगत के लिए उपयोगी बनाने एवं उसके उपरान्त मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र साधन योग है और योगों में श्रेष्ठ योग है
‘कर्म योग‘
(श्री स्वामी सत्य भक्त जी,)
सभ्य स्वच्छ अक्षुब्ध बन करो सदा व्यवहार।
वैसी रहे कुलीनता जैसा शिष्टाचार
परस्पर व्यवहार की बुनियाद शिष्टाचार में है। तुम्हारा बोलचाल रहन-सहन, बैठना-उठना कैसा है।
शब्दों का स्वर कैसा है मुखमुद्रा कैसी है। आदि बातों से कुलीनता समझी जाती है और इसी पर सहयोग प्रेम आदि निर्भर रहता है।
ऐसा व्यवहार करना जिससे दूसरों का अपमान न हो तथा उन्हें अनुचित रीति से शारीरिक आदि असुविधा न पहुँचाई जाय इसे सभ्यता कहते हैं।
सभ्यता के लिए स्वच्छता तथा अक्षोभ जरूरी हैं। जो अपने ओर गन्दगी फैलता है, जहाँ चाहे थूक देता है या अन्य मल डाल देता है वह असभ्य है, क्योंकि वह दूसरों को शारीरिक या मानसिक कष्ट देता है। इसीलिए सभ्यता के लिए स्वच्छता की जरूरत है। स्वच्छता का अर्थ शृंगार जरूरी चीज नहीं है।
सभ्यता के लिए अक्षोभ भी जरूरी है। जिसे बात-बात में क्रोध आ जाता है, जो अपने आवेग को वश में नहीं रख सकता, अपशब्द या गालियाँ जिसकी मुँह पर लगता है वह असभ्य है।
जिसमें सभ्यता नहीं, स्वच्छता नहीं, अपने आवेगों को वश में रखने की क्षमता नहीं है वह कुलीन नहीं कहला सकता भले ही उसका जन्म कैसे ही महान कुल में क्यों न हुआ हो। कुलीनता के लिए सभ्यता स्वच्छता और शान्ति रूप शिष्टाचार के पालन की सख्त जरूरत है।
जब तुम किसी व्यक्ति या समाज के संपर्क में आओगे तब सबसे पहले तुम्हारा शिष्टाचार देखा जायगा और उसी के अनुसार तुम्हारे साथ लोग व्यवहार करेंगे।
शिष्टाचार के असंख्य रूप हैं और देश काल पात्र के अनुसार इसके रूपों में अन्तर होता है फिर भी इस विषय की कुछ सूचनाएँ दी जाती हैं।
1—सम्माननीय व्यक्ति-गुरुजन आदि-के मिलते ही हाथ जोड़ कर या पैर छूकर या जैसे दैनिक नियम हो उसके अनुसार आदर प्रगट करो।
2—सम्माननीय व्यक्ति को अपने सम्मानित आसन पर बैठाओ। उनके खड़े रहने पर खुद बैठे रहना, आसन न छोड़ना, उच्चासन प बैठना अविनय है।
3—सम्माननीय व्यक्ति के पास शिष्टता से बैठो। टाँग पसारना, बैठने में कुछ शान बघारते हुए आराम तलब बनना आदि ठीक नहीं।
4—सम्माननीय व्यक्तियों के सामने उनके कारण के सिवाय, अपने ही कारण से किसी दूसरे आत्मीय व्यक्ति पर क्रोध प्रकट करना गालियाँ बकना ठीक नहीं। ऐसा काम आवश्यक ही हो तो यथा साध्य उनके उठकर चले जाने पर करना चाहिए। उनके सामने दूसरों पर अधिकार प्रदर्शन भी यथाशक्य कम करो।
5—उपर्युक्त शिष्टाचार अपने घर आये हुए जन समूह के सामने भी करना चाहिए। जैसे जब चार आदमी बैठे हों तब अपने आदमी को भी गाली देना आदि ठीक नहीं।
6—अपने साथियों का भी यथासाध्य शिष्टाचार करो।
7—अपने से छोटों के शिष्टाचार का ठीक प्रत्युत्तर करो।
8—खास जरूरत के बिना सदा मिठास से बोलो। आज्ञा में भी यथा योग्य शब्द और स्वर की कोमलता होनी चाहिए।
9—रेलगाड़ी आदि में दूसरों की उचित सुविधा का ख्याल रखो।
10—गुरुजनों, महिलाओं तथा जो लोग धूम्रपान नहीं करते उनके सामने खासकर पास से धूम्रपान मत करो।
11—साधारण दृष्टि से जो काम शारीरिक श्रम का हो वह काम अगर तुम्हारे बड़े करते हों तो तुम उस काम को लेलो या उसमें शामिल हो जाओ।
12—प्रवास में महिलाओं की सुविधा का पूरा ख्याल रखो।
13—दूसरों का नम्बर मारकर आगे मत बढ़ो। यह बात टिकट लेने, पानी भरने आदि के बारे में ही है। आत्मविश्वास की दृष्टि से नहीं।
14—साइकिल से गिर पड़ने आदि किसी के संकट में हँसो नहीं। दुर्घटना में सहानुभूति प्रगट कर सको तो करो, नहीं तो कम से कम चुप जरूर रहो।
15—साधारणतः अपने मुँह से अपनी तारीफ मत करो। न अपने कामों का झूठा और अतिशयोक्तिपूर्ण अविश्वसनीय वर्णन करो।
16—आपसी बातचीत में जहाँ बोलने की जरूरत हो वहीं बोलो, बीच-बीच में इस प्रकार मत कूदो जिसे सुनने वाले नापसन्द करते हों।
शिष्टाचार के ये साधारण नमूने हैं इस प्रकार की सैकड़ों सूचनाएँ हो सकती हैं। सीधी बात यह है कि घमण्डी मत बनो, नम्र बनो। दूसरों की सुविधाओं का ख्याल रखो, कृतज्ञता प्रगट करो, प्रेमल व्यवहार करो बस शिष्टाचार के सब नियम पल जायेंगे। शिष्टाचार सिखाना नहीं पड़ता, मन में विनय भाव होने पर वह अपने आप आ जाता है। इसलिए मन में विनय भाव लाओ।
अगर तुम शिष्ट हो तो कठिन से कठिन अवसरों पर भी दूसरों से अनेक सुविधाएँ पा सकते हो उनसे लाभ उठा सकते हो। अगर शिष्ट न हो तो दानी ज्ञानी उदार से उदार व्यक्ति के पास से भी कुछ न पाओगे। इसलिए सभ्य बनो, शिष्ट बनो। व्यवहार का यह सबसे पहला और जरूरी गुण है।
(पं. लक्ष्मण नरायण गर्दे)
तृष्णा मनुष्य-जीवन की सबसे नीचे की तह है। इससे और नीचे कोई उत्तर नहीं हो सकता। इसके शीतपंक और अन्धकूप में उसी अन्धी दुनिया के जीव-जन्तु रेंगा करते हैं। विषय तृष्णा, द्वेष, लोलुपता, अतिमान, दम्य, लोभ, प्रतिशोध, प्रतिद्वन्द्विता, दीर्घद्वेष, शठे शाठय, झूठी निन्दा, पीठ पीछे निन्दा, असत्य भाषण, चोरी, धोखेबाजी, दगाबाजी, क्रूरता, डाह—ये ही सब हैं वे पाशविक मोहान्ध मनोवृत्तियाँ जो तृष्णा के तहखाने में बसती ओर मानव मन के इस घोर वन में एक दूसरे को खाती और एक दूसरे का भक्ष्य बनती हुई विचार करती हैं।
अनुपात, क्लेश और दुःख की काली मनहूस सूरतें भी वहाँ रहती हैं और शोक, संताप और विलाप की प्रेतों जैसी आकृतियाँ भी।
इस अंधेरी दुनिया में मूर्ख ही जीया और मरा करते हैं, उन्हें पवित्रता की शान्ति कभी नहीं मिलती न उस भगवत्प्रकाश का आनन्द मिलता है सदा ही उनके ऊपर फैला तो रहता है पर वे उसे देख नहीं पाते, क्योंकि उनकी आंखें ऊपर को देखती ही नहीं, नीचे की ही ओर—रक्त, माँस, मूत्र, पुरीष के पिण्ड की ओर झुकी रहती हैं।
पर ज्ञानी ऊपर की ओर देखते हैं। उन्हें विषय तृष्णा का जीवन नहीं भाता, उनके पग उठते हैं शाँति के ऊर्ध्व जगत् की ओर, जिसका प्रकाश और वैभव पहले तो बहुत दूर टिमटिमाता सा दीख पड़ता है, पर ज्यों-ज्यों ऊपर चढ़ते हैं त्यों-त्यों उसकी जगमगाहट बढ़ती ही जाती है।
स्वार्थपरता के अंतर्जगत् का मूल अज्ञान परमात्मा के विधान का, परमात्मा की दया का और पवित्रता और शान्ति के मार्ग का। तृष्णा अँधेरी रात है, आत्मविस्मृति के अन्धकार में ही यह बढ़ती और फलती-फूलती है। आत्म ज्योति के प्रकाश में इसका प्रवेश नहीं। प्रबुद्ध मन से अन्धकार दूर हो जाता है, शुद्ध हृदय में तृष्णा के लिए कोई स्थान नहीं होता।
सब प्रकार की तृष्णा मन की एक प्यास है, बुखार है, यन्त्रणा से व्याकुल कर देने वाली एक विकलता है। जैसी आग किसी भव्य हवन को जला कर भस्म कर देती है वैसे ही तृष्णा की आग से मनुष्य जल जाते हैं और उनकी आशाएँ राख के ढेर हो जाती हैं।
यदि कोई शान्ति चाहता है तो उसे तृष्णा से बाहर निकल आना होगा। ज्ञानी वही है जो अपनी तृष्णा को अपने वश में करता है ओर मूर्ख वह जो तृष्णा के वश में हो जाता है। ज्ञान की जिसको चाह है उसका प्रयास मूर्खता की ओर पीठ फेरने के साथ आरम्भ होता है। शान्ति को चाहने वाला उस रास्ते पर आ जाता है जो शान्ति का रास्ता है और इस रास्ते पर एक-एक कदम जो वह चलता है उसके साथ तृष्णा और निराशा का अन्धकूप नीचे ही छूटता जाता है।
ज्ञान और शान्ति के इस उच्च स्थान की ओर जाने वाले रास्ते पर जो पहला कदम रखता है वह स्वार्थपरता की अन्धता और दुर्गति को समझ लेता है, जब वह समझ लिया तब उसे जीतना—उसमें से निकल आना—आरम्भ होता है।
जो मनुष्य सदा दूसरों की स्वार्थपरता को देखा करता है वह ऐसा करने से अपनी स्वार्थपरता से मुक्त नहीं होता दूसरों को स्वार्थपरता का दोष लगाने से नहीं बल्कि अपने आपको शुद्ध करने से हम स्वार्थपरता से मुक्त हो सकते हैं। तृष्णा से निकल कर शान्ति के रास्ते पर आना दूसरों पर चोट करने वाले अभियोग से बनता है। दूसरों की स्वार्थ परता को वश में करने के लिए अधीर होकर यत्न करने से हम तो तृष्णा में बँधे रह जाते हैं, और अपनी स्वार्थपरता धीरतापूर्वक जीतने से हम मुक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। जिसने अपने आपको वश में कर लिया हो वही दूसरों को वश में कर सकता है, और वह दूसरों को वश में करता है तृष्णा से नहीं बल्कि प्रेम से।
मूर्ख मनुष्य दूसरों पर दोष लगाता और अपने आपको निर्दोष बतलाता है, पर जो ज्ञान के रास्ते पर चलता है वह दूसरों को निर्दोष और अपने आपको दोषी बतलाता है। तृष्णा से निकल कर शान्ति के रास्ते पर आना संसार के बाह्य जगत की चीज नहीं है, यह विचारों का अंतर्जगत है, यहाँ दूसरों के चरित्रों को बदलने का काम नहीं है, बल्कि अपने ही चरित्र को सुधार कर आदर्श बनाने का काम है।
तृष्णा के वश में रहने वाला मनुष्य प्रायः दूसरों को ही दुरुस्त करने की सोचा करता है और ज्ञान के रास्ते पर चलने वाला मनुष्य अपने आपको सुधारा करता है। यदि कोई सचमुच ही संसार को सुधारना चाहता हो तो उसे पहले अपने आपको सुधार लेना चाहिए। केवल स्थूल विषय भोग से विरक्त होना ही आत्म-सुधार की पराकाष्ठा नहीं है, यह आरम्भ मात्र है और इसका परम उत्कर्ष तब समझना चाहिए जब कोई भी व्यर्थ विचार और स्वार्थ का हेतु मन में न रह जाय। पूर्ण पवित्रता और पूर्ण ज्ञान जब तक नहीं है तब मनोजय में कोई न कोई त्रुटि है, कोई न कोई मूर्खता है जिसे जीतना होगा।
तृष्णा वह जलता हुआ मशाल है जो स्वर्ग-द्वार की रक्षा करता है। मूर्खों को यह अन्दर नहीं आने देता, बाहर ही जला डालता है और बुद्धिमानों को स्वागत करता और सुरक्षित रखता है।
मूर्ख वही है जो अपने ही अज्ञान के फैले हुए जाल को नहीं समझता, जो अपने स्वार्थों का दास बना रहता है और तृष्णा के उद्रेकों पर नाचा करता है।
बुद्धिमान वही है जो अपने अज्ञान को समझता है, जो स्वार्थ भरे विचारों में छिछलापन देखता है, जो अपनी तृष्णा के उद्रेकों को अपने वश में करता है।
मूर्ख अपने अज्ञान की अधिकाधिक गहराई में उतरता है, बुद्धिमान उच्च से उच्चतर ज्ञान में आरोहण करता है।
मूर्ख कामना करता, दुःख उठाता और मरता है। बुद्धिमान शुभेच्छा करता, सुखी होता और जीता रहता है।
ज्ञान प्राप्ति का दृढ़ संकल्प धारण कर और मनश्चक्षु को ऊपर की ओर उठाये आध्यात्मिक योद्धा ऊपर जाने वाले रास्ते को देख पाता और अपनी दृष्टि शान्ति के शिखर पर चढ़ता है।
—दुख क्या है? भगवान के परमानन्द स्वरूप में विश्वास न होना और जगत के क्षुद्र पदार्थों में सुख के लोभ से आसक्त होना।
—जो साधक अपना भला चाहता है वह दूसरे की बुराई न देखे। अपनी बुराई को हजार आंखों से देखे, बड़ी सावधानी से देखे, कहीं छिपी न रह जाय और जो दिखाई दे उसे तुरन्त बड़े प्रयत्न से निकाले। जैसे साँप को घर से तुरन्त निकाल देना चाहते हैं, वैसे ही बुराई से बचना चाहिए। ऐसा न करें तो बुराई समुद्र की तरह बढ़ जायेगी।
—जो जितना सरल होगा, वह उतना ही भगवान को पाने का विशेष अधिकारी होगा सरल हृदय में ही विश्वास टिकता है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री विन्स्टन चर्चिल दिन-रात के चौबीस घण्टों में 18 घण्टे परिश्रम करने के आदि रहें हैं। उनसे जब पूछा गया कि क्या चिन्ता ने कभी उन पर आक्रमण किया है, तो उन्होंने उत्तर दिया-”मेरे पास इतना काम है कि चिन्ता करने के लिए समय ही नहीं मिल पाता।” चिन्ता फालतू आलसी निष्क्रिय मन का एक विकार है। कमजोर तबियत के व्यक्ति जब खाली होते हैं, तो बजाय उन्नत पहलू देने के, वे अपने विरोध, भय, दुःख, क्लेश की बातें सोचा करते हैं। जिनके पास पर्याप्त कार्य हैं उन्हें चिन्ता जैसे विलास के लिए कहाँ अवकाश है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने कहा है कि शान्ति दो ही स्थानों पर रह सकती है, पुस्तकालय में अथवा वैज्ञानिक प्रयोगशाला में। इन दोनों स्थानों में क्यों शान्ति की कल्पना की गई है? कारण इन दोनों में कार्य करने वाले व्यक्ति अपनी पुस्तकों तथा अनुसंधानों में इतने निमग्न रहते हैं कि उनके पास चिन्ता करने के लिए अवकाश ही नहीं रहता। अनुसंधान में रत व्यक्तिओं को स्नायविक दौरे नहीं पड़ते। चिंता जैसी व्यर्थ सारहीन चीज के लिए उनके पास समय नहीं बचता।
यह बात मनोविज्ञान की दृष्टि से ठीक नहीं है। चाहे किसी का मस्तिष्क कितना ही तेज बुद्धि, कुशाग्र क्यों न हो, दिमाग एक समय में एक ही बात पर केन्द्रित हो सकता है। जब आप अपने कार्य में सुई की तरह गढ़ जाते हैं, फिर मन की शक्तियों के चिंता के विषयों पर सोचने-विचारने का अवसर नहीं प्राप्त होता। काम में तन्मय हो जाना, रुचि और उत्साह से उसे पूर्ण करने का प्रयत्न करना चिंता से बचने का श्रेष्ठ उपाय है।
जौन कूपर पौव्प्त अपनी पुस्तक “अप्रिय को कैसे भूलें?” में लिखते हैं—’जब मनुष्य का मन किसी रुचिनुकूल कार्य में तन्मयता से लग जाता है, तो उसे एक प्रकार की आराम देने वाला संरक्षण, एक आन्तरिक शान्ति, एक आनन्ददायक विस्मृति का अनुभव होता है। उसके चिन्ता वाले तनाव का भी बन्धन टूट जाता है।’
ओसा जौनसन कहा करते थे—’ मुझे संसार की इस कर्मस्थली में कार्य में निमग्न हो जाना चाहिए, अन्यथा मैं निराशा तथा चिन्ता में घुल जाऊँगा।’
बात ठीक भी है। यदि हम आप किसी कार्य में अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को व्यस्त न रखें, यदि हम बैठकर गढ़े मुर्दे उखाड़ने लगे, दुखद प्रसंगों का स्मरण कर रोते रहें तो हमारा जीना ही दुष्कर हो जाएगा।
बर्नार्डशा ने सही कहा है—”दुखी रहने का सीधा मार्ग यह है कि आप इस चिन्ता में जाय कि मैं प्रसन्न हूँ या दुखी?’ अतः अहितकर चिंतन के लिए मन को ढीला छोड़ देना ही मूर्खता है। आइए, फालतू बैठने के स्थान पर किसी कार्य में व्यस्त हो जायं- अपना कमरा ही साफ कर लें, रुमाल ही धो डालें, बाहर से सब्जी ले आयें या अपने जूते पर पालिश ही कर लें। कार्य चाहिए। जहाँ आप किसी कार्य में लिप्त हुए कि चिन्ता भागी। यह सबसे सस्ती दवाई है जिससे चिन्ता की पुरानी शत्रुता है। चिन्ता से बचने के लिए कार्य-पढ़ाई लिखाई, घरेलू काम, बच्चों से खेल-कूद, गायन या बागवानी से लगे रहें।
कुछ व्यक्तियों की यह आदत होती है कि वे आने वाले भय को बहुत बढ़ा चढ़ा कर तिल का ताड़ बना कर देखते हैं। 4 शताब्दी पूर्व पेरक्लीज ने कहा था ‘सज्जनों हमारी बड़ी मानसिक कमजोरी यह है कि हम बैठकर छोटी-छोटी सी बातों की चिन्ता में समय नष्ट कर देते हैं।’ वास्तव में यदि हम अपनी चिन्ताओं को उनके ठीक रूप में देखें, तो हमें विदित होगा कि वास्तव में ये छोटी-छोटी चीजें है जो हमें परेशान करती रहती हैं।
डिजरायली ने कहा-’जीवन ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए चिन्तित रहने के लिए नहीं है। जीवन महान है। वह साधारण बातों में विनष्ट होने के लिए कदापि नहीं बना है।’ ऐन्ड्र मौरिस ने उक्त शब्दों के महत्व का निर्देश करते हुए कहा कि इन शब्दों ने मुझे जीवन के अनेक कारुणिक और चिन्तनीय स्थलों में सहायता की है। अनेक बार हम गहराई से न सोचने के कारण या दूरदृष्टि के अभाव में ऐसी बातों की चिन्ता में फस जाते है, जिन्हें हम भूलना चाहते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं। हम इस संसार में तीस-चालीस वर्ष और मजा लूटेंगे। हमारी ये छोटी-छोटी क्षुद्र चिंताएं काल के प्रवाह में स्वयं विलुप्त हो जायेंगी। हम क्यों जीवन के बहुमूल्य क्षण छोटे-छोटे चिन्ता उत्पन्न करने वाले कार्यों की बातें सोच-सोच कर क्यों बरबाद करें? समय स्वयं इन्हें अपने अन्दर आत्मसात कर लेगा। अधिक ऊँचे प्रश्न, उच्च स्तर की जीवन सम्बन्धी समस्याओं में हमें संलग्न रहना उचित है।
अनेक मनुष्यों को मिथ्या भय और चिन्ताएँ रहती हैं उनके भय, निराशा, शंका, चिन्ता आदि कल्पित बन्धनों पर आधारित होती हैं। वे इन थोथे बन्धनों में बँधे रहते हैं। अपने आने वाले लाभों और उन्नति के स्थान पर ये लोग मन की व्यथा, पीड़ा, रोग, कष्ट, भय आदि के बावत सोचा करते हैं। निन्यानवे प्रतिशत भय ऐसे हैं, जो आगे आते ही नहीं। यदि हम अपने इन कल्पित शत्रुओं को पराजित कर दें, तो सुव्यवस्थित जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
ईश्वर की इस सर्वांगपूर्ण सुन्दर सृष्टि में आसानी से नष्ट होने वाली कोई चीज नहीं है। वह पूर्णता से भरी है। जेनरल जार्ज क्रुक लिखते हैं— “मेरा सब दुख, चिन्ताएँ वास्तविक स्थिति से उत्पन्न न होकर कल्पित भयों से उत्पन्न हुए।” इसीलिए शेक्सपीयर ने कहा है कि कायर आदमी मौत से पहले कई बार मर चुके होते हैं—इसी ख्याल से कि मौत अब आई- अब आई बहादुर आदमी तो एक बार ही मरता है जबकि साक्षात् मृत्यु उसे घेर लेती है।
जो होना है, वह होकर रहेगा। यदि भवितव्यता निश्चय है, यदि आने वाली दुर्घटना, दुःख भरे अवसर आने ही वाले हैं, उनसे नहीं बचा जा सकता तो उनसे मेल कर लेना ही ठीक है। मेल करने से तात्पर्य यह है कि आप अपने आपको उसी स्थिति में समझ लीजिए। जिन बातों को आप अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के बावजूद बदल नहीं सकते और जो आपके हाथ की बात नहीं है, उनके विषय में चिन्तित होने से क्या लाभ? चिन्तित होकर तो जो रहा सहा है, उसका भी आनन्द न आयेगा।
महात्मा ईसा का नैतिक साहस इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों से लिखा रहेगा। मानवता ने उनके साथ जो व्यवहार किया वह पाशविक था, किन्तु उन्होंने बड़ी मनः शान्ति से उसे सहन किया। सुकरात के सामने मृत्यु दण्ड के फलस्वरूप जब विष का प्याला लाया गया। जेलर ने विष का प्याला उसे पीने के लिए देते हुए कहा, ‘जो कुछ होने वाला है उसे निश्चिन्त होकर सहन करो।’ सुकरात ने निश्चिन्तता से प्याला पी लिया और शक्ति से निर्भयता पूर्वक मृत्यु प्राप्त की। वह जिसे बदल न सका, उसे शान्ति से सहन किया। जो होना है, उसे होने दीजिए। प्रयत्नों द्वारा स्थिति को सुधारने का प्रयत्न कीजिए। चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं।
जो घटनाएं हो चुकी हैं, जो वर्ष दिन या घंटे हमारे हाथ से छूटे हुए तीर की भाँति अब हमारे वश की बात नहीं रहे है, उन पर हमारा क्या अधिकार हो सकता है? हम उन्हें किस प्रकार वापस ला सकते हैं? किसी भी प्रकार नहीं। यह मुमकिन नहीं कि उन दिनों को हम दुबारा पा सकें, जो हम एक बार कर चुके हैं। जो घटनाएँ व्यतीत हो चुकी है, हम उन्हें दूर नहीं कर सकते। हाँ उनके अभावों को थोड़ा बहुत सुधार अवश्य सकते हैं।
परमेश्वर की आनन्दमयी सृष्टि में पुराने अनुभवों से केवल एक ही लाभ सम्भव है। पुराने अनुभवों का विश्लेषण कर हम अपनी वे गलतियाँ मालूम कर सकते हैं, जिनके कारण हमें हानि उठानी पड़ती है। इन गलतियों से लाभ उठा कर उन्हें विस्मृति के गर्भ में विलीन कर देने में ही श्रेष्ठता है।
जब मन में पुरानी दुखद स्मृतियाँ सजग हों, तो उन्हें भुला देने में ही श्रेष्ठता है। अप्रिय बात को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है, जितना अच्छी बात का स्मरण करना। जब खेत में घास फूस उग आती है, तो आप उसे उखाड़ फेंकते है। घृणित, क्रोधी, ईर्ष्यालु, व्यथाजनक स्मृतियाँ उन्हीं कंटकों की तरह हैं, जो अन्तः करण शक्ति का क्षय कर देती हैं। हम घृणित चिन्ताजनक अनुभूतियों को पुनः पुनः याद कर अपने चहुँओर एक मानसिक नर्क निर्मित कर उसी में दुखी पीड़ित होते रहते हैं।
अमेरिका के एक प्रमुख डॉक्टर ‘मेडिकल टाक’ नामक पत्र में लिखते है कि ‘वर्षों के अनुभव के बाद मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि दुःख और चिन्ता दूर करने के लिए ‘भूल जाओ’ से बढ़कर कोई दवा नहीं है, अपने लेख में वे लिखते हैं—
“यदि तुम शरीर से, मन, से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।”
नित्य प्रति के जीवन में छोटी-मोटी चिन्ताओं को लेकर झींकते मत रहो। उन्हें भूल जाओ। उन्हें पोसो मत। अपने अव्यक्त या अन्तस्थल में पालकर मत रखो। उन्हें अन्दर से निकाल फेंको और भूल जाओ। उन्हें स्मृति से मिटा दो।
दुःख की, चिन्ता की, बीमारी की बातें न करो, न सुनो। स्वास्थ्य की, आनन्द और प्रेम की, शान्ति और सौहार्द्र की बातें करो और उन्हीं को सुनो। देखोगे कि तुम स्वास्थ्य लाभ करोगे, आनन्द लाभ करोगे, प्रेम पाओगे, शान्ति पाओगे।
(श्री दानेश्वर शर्मा, बी.ए.)
कथा है कि एक बालक ने अपने पिता जी को पूजा बीच नैवेद्य लगाते हुए देखा। जिज्ञासा बालकों की प्रवृत्ति है। उसने पिता जी से इसका मतलब पूछा। वात्सल्य प्रेमानुरक्त पिता ने बताया कि वह नैवेद्य ईश्वर को समर्पित किया जाता है और फिर उनका झूठन प्रसाद के रूप में लिया जाता है। बालक ही तो था, बात लग गई। दूसरे दिन उसने भी वही नाटक रचा। पूजा की सामग्री एवं नैवेद्य लेकर वह ईश्वर की मूर्ति के सामने बैठ गया। स्वभावानुसार पूजा करने के उपरान्त उसने दही का नैवेद्य लगाया और आँख मींचकर ईश्वर को दही खाने के लिए विवश करने लगा। साम, दाम में सफल न होते देखकर उसने वशीकरण का तीसरा प्रयोग अर्थात् दण्ड का उपक्रम किया। ईश्वर तुझे दण्ड अपेक्षित है या यह नैवेद्य? लकड़ी उसने हाथ में ले ली। प्रहार करने ही वाला था कि ईश्वर साकार होकर दही पीने लगे। ‘अरे सब को पी जाओगे या मेरे लिये भी कुछ रखोगे।’ एक मुस्कान के मध्य शेष दही भक्त वत्सल ने भक्त के लिए रख दिया।
यह एक कहानी है। भक्तगण इस कथा में भक्तिरस की प्रधानता देखेंगे। योगीजन योगीराज की लीला और अन्य उपासक अन्य ही विशिष्ट बातें। मैं यह समझता हूँ कि यह प्रत्यक्ष पूजा है जोकि उस अप्रत्यक्ष की प्राप्ति का एक साधन है।
प्रत्यक्ष- पूजा जो कि मेरा प्रतिपाद्य विषय है हमारे लिए कोई ऐसी वस्तु नहीं। चारों युग में हम इसका अस्तित्व देखते हैं।
सतयुग में प्रत्यक्ष सत्य की आराधना आज के ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ के तद्रूप था। अतः यहाँ तो कोई झगड़ा नहीं। त्रेता में, भरत, लक्ष्मणादि ने पुरुषोत्तम राम को- उस राम को जो सर्व मानवीय गुणों की प्रतिमूर्त्ति थे- सर्वस्व माना। उन्हें स्वर्ग एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए किसी अन्य देव की आराधना अपेक्षित न थी। राम ने भी जनता को जनार्दन माना। प्रजा उनकी सर्वस्व थी। प्रेमीजन ईश्वर को पूर्ण एवं अपने को अंश मानते हैं। राम ने भी अपनी प्रजा को ईश्वर समझा। प्रत्यक्ष पूजा के वे विधायक बने। अन्यत्र देखिए, सागर लाँघने के लिए उन्होंने अप्रत्यक्ष एवं निर्विकार देव की उपासना नहीं की। अर्चना की तो सागर ही की। छोड़िये त्रेता को।
अब आई द्वापर-युग में। ब्रज के नागरिक गोपजन आज यथाशक्ति पकवान तैयार किये हैं—क्षीरान्न मिष्ठान और न मालूम कितनी तरह के। आज इन्द्र पूजा जो है। अचानक युग-प्रवर्त्तक कृष्ण का ध्यान इस पर पड़ा।
“यह क्या है बाबा? आज क्या कोई त्यौहार है” “बेटा! आज इन्द्र की पूजा-दिवस है। उनकी पूजा कर हम यथासाध्य नैवेद्य से उनको खुश करेंगे जिससे वे प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे—सामयिक वर्षा, जिससे गोवंश की पुष्टि होगी।”
कृष्ण मुस्कराये। देवता भी घूँस लेते है? और उस दिन ब्रज के इतिहास में एक महान परिवर्तन हुआ प्रत्यक्ष-पूजा की परिपाटी चल पड़ी। इन्द्र के स्थान में गोवर्धन पहाड़ की पूजा होने लगी। अप्रत्यक्ष के स्थान में प्रत्यक्ष की पूजा-एक युगपुरुष द्वारा संचालन हुआ।
इस विषम युग में गाँधी युग-पुरुष हुए। सत्य और अहिंसा दो शस्त्र लेकर वे संसार में कूद पड़े। सत्य और अहिंसा ऐसे अस्त्र हैं जो दोनों ढाल और तलवार का काम करते हैं। पात्र की रक्षा और कुपात्र का विनाश। पर सत्य अहिंसा का प्रयोग ईश्वर (अप्रत्यक्ष) के लिए नहीं किया जाता। किया जाता है अपने समान भाइयों के लिए। लोग एक दूसरे के प्रति सत्य और अहिंसा का व्यवहार करें और तब देखिए कि इस अर्चना का क्या परिणाम होगा। यह एक महान यज्ञ होगा। आप पूछेंगे-क्या इससे ईश्वर का प्रादुर्भाव होगा? मैं कहूँगा कि एक नहीं अनेक। पूर्ण जगत तद्रूप हो जाएगा। “सीय राम-मय सब जग जानी” और ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ की अवस्था आ जायगी।
परन्तु यह सब अभी स्वप्न है। आज की कंटकाकीर्ण दुनिया को नष्ट करना होगा। प्रत्यक्ष मानवों की पूजा आरम्भ कीजिए। सहृदय होकर अपने निकट के भाइयों की भावनाएं जीतिए। उनको भी प्रत्यक्ष पूजा, जन पूजा का पाठ पढ़ाइए और तब देखिए क्या आनन्द आता है। प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक के सुख और दुख का भागीदार होगा। इससे दुख की मात्रा तो घटेगी ही पर सुख की मात्रा और बढ़ जायगी। पूरी दुनिया एक कुटुम्ब हो जायगी। भारतीय संस्कृति का आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उस वक्त स्वरूप दिखाई पड़ेगा। परन्तु जब तक हममें क्रियात्मक शक्ति नहीं आएगी तब तक ये ख्याली पुलाव हैं। आप यह न समझें कि हम इस वस्तु से सर्वथा अपरिचित हैं। कमजोरी यह है कि ध्यान नहीं देते। हमारे पाश्चात्य भाई तो इस वस्तु को-प्रत्यक्ष पूजा के रहस्य को समझते हैं। इस अवसर पर मुझे एक अंग्रेज कवि लेल्ट की एक कविता याद आती है। कविता का शीर्षक है “आदम का पुत्र अबू।” दस बारह पंक्तियों की इस कविता में जो रहस्य भरा है उसकी सराहना किये बिना मैं नहीं रह सकता। कविता कहानी के रूप में है--
“अबू ने एक रात देखा कि चन्द्र किरण को अधिक प्रकाशित करता हुआ एक दिव्य पुरुष उसके कक्ष में बैठकर कनक- पुस्तिका में कुछ लिख रहा है। अबू को पूछने पर मालूम हुआ कि वह उन लोगों का नाम लिख रहा है जो ईश्वर के प्रेमी हैं। यह भी मालूम हुआ कि उसका नाम उसमें नहीं है। पर इससे अबू अनुत्साहित नहीं हुआ। वह प्रसन्न मुद्रा से उस दिव्य पुरुष से कहने लगा—”कृपया मेरा नाम उन लोगों के साथ लिख लीजिए जो कि उनके निर्मित जीवधारियों को प्रेम करते हैं।” दिव्य पुरुष ने लिख लिया। दूसरे दिन उस दिव्य पुरुष ने अबू को उन लोगों की नामावली दिखाई जिन्हें कि ईश्वरीय-प्रेम का आशीर्वाद मिला था। और उसमें अबू का नाम सबसे पहले था।”
कितना महान आदर्श भरा है इस छोटी सी कविता में। गागर में सागर इसी को कहा जाता है। जीवन का परम रहस्य, परमानन्द का पथ प्रदर्शक प्रत्यक्ष-पूजा यही है। इसे चाहें आप प्रत्यक्ष पूजा कहें या जप-पूजा या व्यक्ति-पूजा। क्योंकि ईश्वर की इकाई है मानव, और मानव की इकाई है समष्टि।
(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम.ए.एल.टी.)
मनुष्य का स्वभाव है कि जिस काम को वह एक बार कर लेता है उसे फिर करना चाहता है, जिस विचार को एक बार मान में स्थान देता है उसे फिर मन में लाना चाहता है। अपने अनुभवों की आवृत्ति में उसे तृप्ति मिलती है। इस प्रकार जब कोई भाव चित्त में ठहर जाता है और बार-बार दुहराया जाता है, तो एक नई आदत बन जाती है। उदासीनता तथा आनन्द, क्रोध तथा शान्ति, लोभ उदारता-वस्तुतः समस्त मानसिक वृत्तियाँ—अपनी रुचि से ग्रहण की हुई आदतें हैं। जिस जगह से एक बार कागज मुड़ जाता है, अवसर आने पर दुबारा वही सरलता से मुड़ जाता है। पुराने अनुभव को दुहराने की यही वृत्ति हमारी सब आदतों का मूल है। और जो अनुभव विचार जितना ही दोहराया जाता है उसका संस्कार उतना ही दृढ़ होता जाता है और फिर वह जैसे हमारे स्वभाव का अंग ही बन जाता है और दृढ़ आदत का रूप धारण कर लेता है। ये ही आदतें जीवन के स्रोत हैं—जीवन की उत्पत्ति इन्हीं से है।
अपने अनुभवों की पुनरावृत्ति द्वारा ज्ञान प्राप्त करना मन का स्वभाव है। आरम्भ में जिस विचार को ग्रहण करना और उस पर स्थिर रहना बड़ा कठिन होता है, अन्त में वही विचार मन में निरन्तर घूमने से प्राकृतिक तथा स्वाभाविक वृत्ति बन जाता है। जैसे किसी कार्य या व्यापार के सीखने में आरम्भ में बड़ी कठिनता होती है किन्तु कुछ काल के पश्चात् धैर्य और अभ्यास से वही कार्य बिलकुल आसानी और पूरी चतुरता से सम्पादित हो सकता है वैसे ही किसी वृत्ति को मन में स्थापित करने के लिए चाहे पहले कितनी ही कठिनता या असंभाविता प्रतीत हो पर अध्यवसाय और अभ्यास से वह दृढ़ हो जाती है और
अन्त में चरित्र का स्वाभाविक और सहज अंग बन जाती है।
जिस प्रकार हमारी मूल प्रवृत्ति हमें विशिष्ट अनुभवों के लिए प्रेरित करती है, उसके लिए हमें आतुर बनाती है, वैसे ही आदत भी पूर्वानुभव की पुनः प्राप्ति के लिए हमें उतावला बना देती है। जो प्रातः काल उठकर स्नान करने और टहलने के आदी हैं उन्हें उस समय जब किसी कारण से नहाने या टहलने को नहीं मिलता तो वे खोये-खोये से दिखाई पड़ते हैं। अखबार पढ़ने का आदि व्यक्ति समय से अखबार न पाकर उसके लिए विकल हो उठा है। टेनिस का खिलाड़ी ठीक समय से हो क्लब की ओर चल पड़ता है। उस समय उसका मन न तो पढ़ने में और न बात करने में रमता है। अतएव व्यक्तित्व विकास एवं चारित्रिक शिक्षा में उचित आदतें डालने का विशेष महत्व है। आदत का चरित्र पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। सेमुअल स्माइल्स ने मनुष्य को ‘आदतों का पुँज’ कहा है। आदत किसी भी बात की डाली जा सकती है। श्रेष्ठ आचरण की आदत पड़ने से मनुष्य का चरित्र श्रेष्ठ हो सकता है। परन्तु बुरी आदत पड़ जाने पर आदमी दुश्चरित्र हो जाता है। वास्तविक शिक्षा तो वाँछनीय आदतें डालने का ही दूसरा नाम है।
किसी काम की हमें आदत पड़ जाती है वह कम समय एवं कम श्रम से ही सम्पादित होने लगता है। जब हम टाइप करना सीखते हैं तो आरम्भ में एक मिनट में पाँच-सात अक्षरों को टाइप कर लेना भी काफी मुश्किल मालूम पड़ता है। परन्तु आदत पड़ जाने के बाद 150 अक्षर तक प्रति मिनट के अनुपात से लोग टाइप करने लगते हैं। जो बालक आरम्भ में बड़े परिश्रम के बाद आधे घण्टे में कुछ ही अक्षर लिख पाता है वही लिखने की आदत पड़ जाने पर कई पृष्ठ उतने ही समय में बड़ी सरलता से लिखने लगता है।
आदत पड़ जाने पर काम में केवल शीघ्रता ही नहीं होती प्रत्युत कुशलता भी आ जाती है। जब कोई पहले मिट्टी के खिलौने बनाना आरम्भ करता है तो उसके बनाने में अधिक समय तो लगता ही है, खिलौना भद्दा भी बनता है। परन्तु अभ्यास से वही सुन्दर बनने लगते हैं। आदत कुशलता की जननी है।
जहाँ उपयुक्त आदत हमारा उपकार करती है वहाँ बुरी आदत हमारी हानि भी बहुत कर सकती है। जब एक बार आदत पड़ जाती है। तो हम उसके गुलाम बन जाते हैं, कोशिश करके भी छुटकारा पाना मुश्किल ही हो जाता है। कितने ही सत्संकल्प करके भी शराबी विवश होकर शराब पीता है। अतः अच्छी आदतें डालना जितना आवश्यक है, बुरी आदतों से बचना उससे कम जरूरी नहीं।
साधारणतः यह कहा जाता है कि भलाई करने से बुराई करना और पुण्य करने से पाप करना और सहज होता है।
यह बात सर्वमान्य है—लोग इसे एक स्वयं सिद्धि बात मानते हैं। गौतम बुद्ध जैसे श्रेष्ठ पुरुष ने भी कहा है—”बुरे और हानिकारक कार्य करने में सहज होते हैं, लेकिन लाभकारी और उत्तम अति कठिन।” परन्तु जैसे मनुष्य में बुरी लत पकड़ने की क्षमता है वैसे ही अच्छे लक्षण सीखने की भी है। अच्छी आदतों और वृत्तियों को बनाने और बदलने की जो मन में शक्ति है वही मनुष्य को इन्द्रियों के वश में मुक्त कर पूर्ण स्वतंत्रता का पथ दिखलाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मन में अच्छे विचार लाने और अच्छे काम करने की आदत डालने के लिए बहुत अभ्यास और निरन्तर उद्योग की आवश्यकता है, किन्तु अन्त में एक समय वह आता है जब अच्छे विचार और कार्य करना स्वाभाविक और सरल हो जाता है और बुरे कर्म करना कठिन तथा सर्वथा अस्वाभाविक।
लोगों के लिए पाप करना सरल और स्वाभाविक है, क्योंकि उन्होंने किसी बुरे काम को बराबर करके ज्ञानहीन विचारों की आदत डाल ली है। अवसर मिलने पर चोर के लिए चोरी करने से रुक जाना अति कठिन है, क्योंकि इतने दिनों तक उसके मानसिक भाव लाभ और लालच से परिपूरित थे। किन्तु ईमानदार आदमी के लिए—जिसने अब तक खरे और सत्य विचारों में अपना जीवन व्यतीत किया हो और इसलिए जिसे चोरी की क्षुद्रता, मूर्खता और निष्फलता का इतना ज्ञान हो गया हो कि उसके चित्त में चोरी करने का ध्यान तक भी नहीं आये—यह कार्य कुछ कठिन नहीं। समस्त पाप और पुण्य की नींव इसी तरह पड़ती है।
सहस्रों मनुष्यों के लिए क्रोध और अधीरता स्वाभाविक और सरल है, क्योंकि वे ऐसे विचारों और कार्यों को मन में बार-बार स्थान देते है और प्रत्येक बार दुहराने से यह आदत और अधिक दृढ़ तथा स्थायी होती जाती है। इसी प्रकार शान्ति और धैर्य गुण भी स्वाभाविक बनाए जा सकते हैं—प्रथम शान्ति तथा धैर्ययुक्त विचार मन में लाने और फिर उसे निरन्तर मन में घुमाने से और उसी में प्रवृत्ति हो जाने से वैसा ही स्वभाव हो जाता है। इस प्रकार शाँत रहने और धैर्य धरने की आदत पड़ जायगी और क्रोध और अधीरता सदा के लिए विदा हो जायगी। इसी तरह सभी खोटे विचार मन से निकाले जा सकते हैं, अशुभ कर्म से छुटकारा मिल सकता है और पाप पर विजय प्राप्त हो सकती है।
जिस बात की आदत डालनी हो हमें उसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिए। यदि मुमकिन हो तो यह प्रतिज्ञा बहुत लोगों के सम्मुख की जाय जिससे आत्म गौरव की रक्षा करने के लिए उसका पालन करना हमारे लिए आवश्यक हो जाय। प्रतिज्ञा करने के बाद उसे कार्य रूप में परिणत करने में शीघ्रता करनी चाहिए क्योंकि जैसे-जैसे समय टलता जाता है, इरादा ढीला पड़ता जाता है। कार्य आरम्भ करने के उपरान्त उसमें किसी प्रकार का अपवाद तब तक न होने देना चाहिए जब तक आदत पूर्ण रूप से पुष्ट न हो जाय। जिस प्रकार किसी सूत के गोले को बहुत देर तक लपेटने के बाद यदि छोड़ दिया जाय तो एक बार छूटने से बहुत देर का श्रम व्यर्थ हो जाता है वैसे ही बहुत दिनों की पड़ी आदत एक ही अपवाद से ढीली तथा शिथिल पड़ जाती है। याद रहे कि जब तक आदत पूरी तरह पुष्ट न हो जाय तब तक किसी प्रलोभन से उसके विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो काम किया जाय उस सम्बन्ध में विचार तथा बातचीत कम से कम की जाय। बात, सूक्ष्म विचार, ऊँची-ऊँची उड़ान मन को दूसरी ओर ले जाकर चित्त को चंचल करते हैं और आदत में सहायक बनने के स्थान में बाधक होते हैं। आदत पड़ जाने के बाद भी, कभी-कभी उसकी आवृत्ति करके अभ्यास बनाये रखना चाहिए।
उपरोक्त बातों का ध्यान रखने से अनेक अच्छी आदतें डाली जा सकती हैं। शिक्षा में तो इस प्रकार से, समय से काम करने की, शिष्टाचरण की, नियम मानकर चलने की, सच बोलने की, बड़ों का सम्मान करने की, स्वास्थ्य की, सफाई, ईमानदारी, आदि की सुन्दर आदतें यदि आरम्भ से ही डाली जाय तो सब अभ्यास होने पर याँत्रिक सी हो जाती हैं। परन्तु साथ ही हमें किसी भी बुरी बात की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए नहीं तो वही आदत का रूप धारण कर बालक के चरित्र को गिरा देगी। याद रहे कि जीवन में अच्छी आदतें डालना तथा बुरी आदतों से बचना दोनों ही आवश्यक हैं। आरम्भ से ही सुन्दर आदतों के डालने से श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण हो सकता है परन्तु बुरी आदतों से जीवन का पतन। अतः आदत की प्रबल शक्ति को जानकर अच्छी आदतों के डालने के लिए प्रयत्नशील और प्रत्येक बुरी आदत से बचने के लिए सदैव सावधान रहना चाहिए।
(श्री प्रभुनारायण जी त्रिपाठी, प्रजावैद्य)
सोने का प्रबन्ध असंख्य तारागणों से जगमगाते हुए आकाश के नीचे एवं खुली हवा में करना चाहिए। खुली हवा में सोने से खूब गहरी नींद आती है। ग्रीष्म ऋतु में खुले मैदान में नीम जैसे वृक्ष के नीचे सोने से गुलाबी और मीठी निद्रा आ जाती है। ऐसी घोर निद्रा से भी जागने पर आनन्द स्फूर्ति तथा मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है। यदि मौसम ठण्डा हो या ओस अधिक गिर रही हो तो भी जहाँ तक हो सके मैदान ही में एक कपड़ा तान ओस से बच कर उसके नीचे सोना चाहिए। ओस में न सोना चाहिए। क्योंकि ओस की ठण्ड फेफड़ों में घुस जाती है और खाँसी तथा दमा का रोग पैदा कर देती है, सवेरे को हाथ, पैर, देह टूटने लगती है और देह आलसी बनी रहती है। कभी-कभी ज्वर भी आ जाता है। यदि मच्छरों की अधिकता हो तो मसहरी लगा लें। मकान के बरामदे या दूसरे खुले हुए हिस्से में भी लेट सकते हैं, पर बन्द कमरे में या जिस स्थान में वायु की रुकावट हो वहाँ कभी नहीं सोना चाहिए।
यदि जाड़े के दिनों में बहुत ठण्डी हवा चल रही हो और कमरे में सोना लाजिमी हो तो भरसक विस्तार में जितना बड़ा, हवा व सजावटदार, मनमोहक और शान्त कमरा हो, उसी में खिड़की खोलकर या कभी-कभी उठकर किवाड़ खोल हवा बदल कर सोना चाहिए। सोने का कमरा सील, कीड़े, मच्छर और दुर्गंधयुक्त, तंग, सामान से भरा हुआ न होना चाहिए। सामान भरा होने से एक तो चोरों के भय से बन्द करना पड़ेगा दूसरे जितने स्थान में सामान भरा होगा उतने स्थान में वायु नहीं रहेगी जिससे वहाँ मच्छर दबे बैठे रहते हैं। प्रोफेसर हस्ली कहते हैं कि—सोने का कमरा इतना लम्बा होना चाहिए कि जिससे प्रत्येक मनुष्य को 800 घन फुट स्थान मिल सके । श्वासोच्छवास के लिए स्वच्छ वायु इससे कम स्थान में नहीं मिल सकती। सोने के कमरे में कोई गड्ढ़े या मोरी हो तो उसे सदा साफ रखना चाहिए, जरा भी गन्दा न रहने देना चाहिए। जिस कमरे में सूर्य का प्रकाश न पहुँचता हो उसमें सोने से शरीर की गर्मी कम पड़ जाती है और कीटाणु युक्त वायु साँस लेने को मिलती है। सोने की जगह रंगदार तस्वीरों का लगाना या ऐसे रंगों का पुतवाना कि जिनमें संखिया होता है, बहुत बुरा है। सफेद मिट्टी (पिंडोल) या हलका केसू का रंग या अन्य प्राकृतिक रंगों का पुतवाना कुछ बुरा नहीं। हवा के झकोरों से बचने के लिए दरवाजे खोलकर उनके सामने चारपाई डालकर न सोना चाहिए।
उत्तर की ओर सिर करके न सोना चाहिए। इस ओर सिरहाना करना अपशकुन माना जाता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी यह है कि जब मरते समय रोगी का दम छटपटाता है तब उत्तर की ओर सिर करके जमीन में सुला देते हैं। इससे सहज में ही बिना तकलीफ अन्य दिशाओं की अपेक्षा जल्द दम निकल जाता है। पर यथार्थ बात यह है कि मनुष्य के मस्तिष्क में विद्युत और चुम्बक का प्रमाण अधिक है और उत्तर की ओर रहने वाले पोलरादिकों में रहा हुआ विद्युत तथा चुम्बक का अधिक प्रमाण दिमाग के अल्प प्रमाण की हानि करता है। पश्चिमी विद्वान इस विषय को यों कहते हैं कि एक रेखा जो सदा शरीर में सिर से पैर की तरफ खड़ी लहर पैदा करती है वही रेखा उत्तर की तरफ सिराहना करने से ध्रुव की आकर्षण शक्ति से खिंच कर वेंड़ी लहर मारने लगती है जिससे मस्तिष्क में खराबी पैदा होती है और आँखों की ज्योति कम हो जाती है। सदा सोने से या तो पागलपन हो जायगा वरना अन्धा तो अवश्य ही हो जायगा। पूर्व और दक्षिण की ओर को सिराहना करके सोना अच्छा होता है। कहते हैं पूर्व की ओर सिर कर, सोने से विद्या तथा जीवनी शक्ति, दक्षिण की ओर आयु की वृद्धि और पश्चिम की ओर हानि एवं चिन्ता होती है। अपने घर में पूर्व की ओर, ससुराल में दक्षिण की ओर और यात्रा में पश्चिम की ओर सिर करके सोना चाहिए। पैरों की अपेक्षा सिराहना ऊँचा रखने से निद्रा अच्छी आती है।
सोते समय सिराहने-सिर के नीचे एक तकिया रख लेना चाहिए। किसी-किसी को बहुत से तकियों की जरूरत पड़ती है, यह ठीक नहीं। वैसे तो साधारण अवस्था में स्वस्थ मनुष्य को तकिया लगाकर शिर ऊँचा करने की आवश्यकता नहीं है। उत्तान सोने वाले को तकिये की आवश्यकता नहीं है, लेकिन दाहिने या बाँये करवट सोने वाले की गरदन टेढ़ी न रहे इसलिए समान तकिया अवश्य होना चाहिए। तकिये स्वरूप और आकार में भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं कोई तो बहुत पतला और 2 फुट के करीब लम्बा होता है और कोई चौकोर और कोई गोल होता है। तकिया बहुत पतला, चपटा, साधारण कड़ा, मुलायम और छोटा रखना चाहिए। तकिया केवल इतना ऊँचा या बड़ा होना चाहिए कि कन्धे और सिर का फासला बराबर हो जाय।
बड़े और ऊँचे तकिये से एक तो सोने में कुछ कष्ट होता है, दूसरे गर्दन की नसों को विश्राम न मिलने से उनको नुकसान पहुँचता है। तीसरे रक्त संचालन में बाधा पहुँचती है अधिक ऊँचा तकिया लगा कर सोने से नाक टेढ़ी होने की सम्भावना रहती है। परन्तु जिनको बड़ी कठिनता से नींद आती है उन्हें ऊँचा तकिया लाभ पहुँचा सकता है। इसी प्रकार तकिया बहुत नरम भी नहीं होना चाहिए। नहीं तो सिर अन्दर घुस जाने से श्वाँस लेने में अड़चन पड़ती है। तकियों में प्रायः रुई भरी जाती है, कहीं-कहीं सेमल की रुई भी काम में लाई जाती है। इसका प्रयोग केवल जाड़ों में ही ठीक समझा जाता है-गर्म होने के कारण गर्मियों में मस्तिष्क को यह लाभदायक नहीं होता। कोई-कोई गर्मी की वजह से न तो रुई और न सेमर की रुई का भरना पसन्द करते हैं। वे उड़ने वाली चिड़ियों के पर पसन्द करते हैं। आजकल तो हवा भरे हुए तकिये भी प्रचलित हो गये हैं। पंख या रुई से भरे तकियों के बजाय ऊन के भरे तकिये बहुत अच्छे होते हैं, यदि एक लम्बा सा तकिया मिल जाय तो, पायताने-पैरों के नीचे डाल ले। तकिये के बजाय अपना एक हाथ नीचे रख कर सोने की आदत अच्छी है, तकिये पर सिर दबाकर सोने का स्वभाव न डालना चाहिए।
जिस समय नींद का वेग आवे उसे रोकना नहीं चाहिए। जिसको जितनी नींद सोना आवश्यक है, उस को उतनी नींद न आने से, नींद का अभाव होने से अथवा नींद का वेग रोकने से अंगमर्द, सर्वांग का टूटना, जड़ता, ग्लानि, भ्रम, तन्द्रा, सुस्ती, मस्तिष्क सम्बन्धी रोग, सिर दर्द, सिर में चक्कर, भारीपन यहाँ तक कि मस्तिष्क दोष और जम्हाई आदि आने लगती हैं। शरीर के रसवातु को नष्ट करने लगता है एवं रुक्षता, नेत्रों में उत्तेजना, पाचन शक्ति क्षीण होकर मन्दाग्नि, मलबन्ध, अजीर्ण, अरुचि आदि हो जाते हैं। हृदयकम्प, अर्दित आदि अनेक वातज लक्षण दिखलाई पड़ते हैं। ताश-चौपड़-शतरंज, कैरम आदि के खिलाड़ी तथा गायन पार्टी के शौकीन निद्रा की परवाह न कर समय पर नहीं सोते और रात-रात भर खूब जागते हैं, वे रोगी और निर्बल होकर जीवन यापन करते हैं।
72 घण्टे का लगातार जागना बलवान से बलवान एवं स्वस्थ मनुष्य को भी रोगी बना देता है। समय के विरुद्ध, प्रमाण से अधिक और बिल्कुल न सोने से मनुष्य की आयु नष्ट हो जाती है। यदि कुछ दिनों तक बराबर न सोया जाय जैसा कि प्रायः सिनेमा, सर्कस, नाटक कम्पनियों में होता है। तो स्वास्थ्य अवश्य खराब हो जाता है। सोये बिना दिमाग में गर्मी चढ़ जाती है और तबियत ठिकाने नहीं रहती। जागना मनुष्य को अस्वस्थ, निर्बल, रोगी, हतबुद्धि और विक्षिप्त कर देता है। निद्रा का वेग जब सवार होता है तो काम करने में जी नहीं लगता, आँखें डगमगाती हैं, पलकें बन्द होती हैं और खुलती हैं, सिर आगे-पीछे झुकता है, श्वास-प्रश्वास की गति सुस्त हल्की हो जाती है, नाड़ी की गति एक मिनट में दस-बार के हिसाब से घट जाती है, गर्मी की उत्पत्ति कम हो जाती है, साराँश यह है कि शरीर के सारे अवयवों की क्रिया ढीली सी हो जाती है। डॉक्टर नेथेनील गिलटमैन्ट नामक एक सज्जन ने कुछ विद्यार्थियों को 115 घण्टे तक जगाए रहने के बाद परीक्षा की तो उसका फल यह निकला कि वे विद्यार्थी ज्यों−ही अपने अंग ढीले कर देते उन्हें नींद आ दबाती, किन्तु जब तक उनके अंग तने रहते तब तक वे जागते थे। जितना अधिक वे जागे उतना ही अधिक उनका शरीर विवश होता गया। दिन रात दो दिन तक जागने के बाद वे साफ-साफ लिख नहीं सकते थे, रंगों को उस समय भी पहचान सकते थे, किन्तु देर तक इसी काम में लगे रहने पर उनकी उनकी बुद्धि जवाब देती थी। वे जागृत अवस्था में ही स्वप्न देखने लगे थे।
गहरी नींद लेना स्वस्थ रहने के लिए बड़ा आवश्यक है। सोने के नियमों को ध्यान में रखा जाय तो निश्चय ही गहरी नींद आती है और स्वास्थ्य में उन्नति होती है।
—भगवान में लग जाना यही सर्वोत्तम भाग्य है, बाकी तो सब कुछ अभाग्य ही है। बड़ी से बड़ी सम्पत्ति भी प्राप्त हो गई, अधिकार भी प्राप्त हो गया, सम्मान का सेहरा भी बँध गया, पर यदि वे सब भगवान के प्रतिकूल हैं तो बहुत बड़ी अभाग्यता है। अतः जीवन में जो सबसे बड़ी बात करनी है, वह है—”जीवन की गति को भगवान की ओर मोड़ देना।
—मनुष्य के जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है। प्रत्येक क्षण भगवान की प्राप्ति में हेतु बन सकता है, इसलिए जीवन का कोई भी क्षण प्रमाद में, न करने योग्य कर्मों में या व्यर्थ में कभी नहीं जाना चाहिए।
(गताँक से आगे)
ब्रह्म जब तक अपने आप में केन्द्रित था, तब तक कोई पदार्थ न था। जब उसने “एकोऽहं बहुस्याम” की इच्छा की, एक से बहुत बनने का उपक्रम किया तो उस इच्छाशक्ति के कारण सृष्टि उत्पन्न हुई। जब ब्रह्म ने उस सृष्टि का साक्षात्कार किया तो उसमें उसे तीन वस्तुएं प्रधान दिखाई दीं (1) श्री (2) प्रतिष्ठा (3) आयातन अर्थात् ज्ञान। इन विलक्षण सुख सामग्रियों को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए ब्रह्म ने कहा—तप करो। अर्थात् तन्मयता पूर्वक श्रम करो। यह किस प्रकार, सम्भव है? तप से अभीष्ट वस्तुएं किस प्रकार प्राप्त हो सकती हैं? उसका भी ब्रह्म ने बड़े सुन्दर ढंग से स्पष्टीकरण कर दिया। यदि तप का व्रत धारण किया जाय, तप को—रुचिपूर्वक, श्रम शीलता को अपना स्वभाव बना लिया जाय तो अवश्य ही सत्य में प्रतिष्ठित हो जाता है। अवश्य ही सही मार्ग मिल जाता है ओर उस मार्ग पर चलता हुआ प्राणी अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।
अब इस श्री प्रतिष्ठा और ज्ञान का अधिकारी कौन नियुक्त किया जाय? इन विलक्षण सुख साधना का अधिकारी हर कोई नहीं हो सकता। सविता ने-परमात्मा ने अपनी सत शक्ति से ब्राह्मण को बनाया और उसको सावित्री से घेर दिया। जिसमें सत् तत्व विशेष है, जो ब्रह्म परायण है वह व्यक्ति ब्राह्मण है, ऐसे व्यक्ति ईश्वरीय दिव्य भावों से, दिव्य शक्तियों से घिरे रहते हैं, उन्हें ही श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान की प्राप्ति होती है, वे ही उनका सदुपयोग करके लाभान्वित होते हैं, अन्यों को इन तीनों का अधिकार नहीं है। यदि बलात्, अनधिकृत रूप से कोई इन्हें प्राप्त कर लेता है तो उसके लिए यह वस्तुएँ विपत्ति रूप बन जाती हैं।
आसुरी भावनाओं से आच्छादित मनुष्य तपस्वी नहीं होते। जिससे उचित मार्ग से, तप द्वारा, ईमानदारी से इन वस्तुओं को प्राप्त करें। वे अवैधानिक रूप से, अनुचित मार्ग से चालाकी से इन्हें प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में वह श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान उनके खुद के लिए तथा अन्य लोगों के लिए विपत्ति का कारण बनाते हैं। आज हम देखते हैं कि धनी लोग, धन संग्रह के लिए कैसे-कैसे अनुचित तरीके अपनाते हैं और फिर उस संचित धन को कैसे अनुचित मार्ग में खर्च करते हैं। अपनी प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करने वाले नेता, महात्मा, साधु-संन्यासी आदि की संख्या कम नहीं है, लोग औंधे सीधे मार्ग से नामवरी और वाहवाही लूटने के लिए प्रयत्न करते हैं। ज्ञान का दुरुपयोग करने वालों की तो कमी है ही नहीं। झूठे को सच्चा और सच्चे को झूठा सिद्ध करने वाले वकीलों की कमी नहीं है। अश्लील, कुरुचिपूर्ण पुस्तकें लिखने वाले लेखक, चित्रकार कम नहीं हैं, झूठी विज्ञापन बाजी करके अपनी ज्ञान शक्ति का दुरुपयोग करने वालों की संख्या पर्याप्त है। ऐसे असत् प्रकृति के लोगों को जब यह तीन शक्तियों मिल जाती हैं तो वे उनका दुरुपयोग करते हैं। दुरुपयोग का निश्चित परिणाम उसका छिन जाता है। प्रकृति का नियम है कि वह अयोग्य हाथों में किसी वस्तु को अधिक समय नहीं रहने देती।
जो ब्राह्मण हैं, ब्रह्म प्रकृति के हैं ब्रह्म ने उन्हें ही उपरोक्त तीन लाभों का स्थायी अधिकारी बनाया है। यही ईश्वरीय नियम है। जिन्हें स्थायी रूप से श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान का अधिकारी बनना हो, सदा के लिए इनका रसास्वादन करना हो, उन्हें ब्राह्मण बनना चाहिए। अपने गुण, कर्म स्वभावों में ब्राह्मी भावों की प्रधानता रखनी चाहिए। तभी यह तीनों तत्व उनके पास स्थायी रूप से ठहरेंगे।
(क्रमश.)
गायत्री का महत्व असाधारण है। वह एक ईश्वरीय वरदान है। इस महामंत्र में वह सब ज्ञान-विज्ञान भरा हुआ है। जिसकी मनुष्य जाति को-सारे संसार को-आवश्यकता है। आत्मा को अनन्त शक्ति प्रदान करने वाली ब्रह्म विद्या से लेकर इन 24 अक्षरों में अनेक प्रकार की साँसारिक विधाएँ भी छिपी हुई हैं।
अखण्ड ज्योति संस्था की ओर से लम्बे समय से इस महाविज्ञान सम्बन्धी कुछ शोध हो रही है। हजारों प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन करके गायत्री सम्बन्धी जानकारियों का संकलन, देशव्यापी गायत्री उपासकों के अनुभवों का संग्रह, महान तपस्वियों एवं विद्वानों का सहयोग, रहस्यमय सिद्ध पुरुषों की खोज, स्वयं की कठोर तपश्चर्याएँ, उपलब्ध ज्ञान का प्रयोग एवं परीक्षण आदि मार्गों द्वारा इस दिशा में जो कार्य हुआ है उसकी जानकारी रखने वाले विज्ञ पुरुषों को बड़ा हर्ष और सन्तोष है। इस कर्क प्रगति को देखते हुए ऐसा विश्वास होता है कुछ ऐसे आश्चर्यजनक परिणाम जल्दी ही सामने आवेंगे जिन पर भारत के आध्यात्मिक जगत को गर्व हो सके।
भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान के एकमात्र बीज मन्त्र गायत्री की महान प्रतिष्ठा की पुनः स्थापना करने के लिए सभी आध्यात्मिक पुरुषों विद्वानों एवं साधकों के सहयोग की आवश्यकता है। वह हमें मिलता भी है और आशा है कि दैवी प्रेरणा से यह कार्य हो रहा है उसी की सहायता से अधिकाधिक सत्पुरुषों का सच्चा सहयोग हमें और भी अधिक प्राप्त होगा।
दूसरी ओर हमें इस बात पर कभी-कभी खेद भी होता है कि कुछ सज्जन अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने के लिए ऐसे अभिमत प्रकट कर देते हैं जिससे अल्प श्रद्धा वाले लोगों में अकारण मतिभ्रम पैदा हो जाता है। ऐसे अनेक मतिभ्रम फैलाये जाने की सूचनाएं हमें मिलती रहती हैं और हमसे उनके स्पष्टीकरण या प्रत्युत्तर माँगे जाते हैं। ऐसे अवसरों पर एक विचित्र उलझन सामने आती है। हमारी सीमित शक्तियाँ गायत्री माता के चरणों में संलग्न हैं। हम उसकी गोदी में बैठकर वह पयपान करना चाहते हैं जो अभीष्ट है। वितंडावादों में उलझने का न तो हमारे पास समय है और न इच्छा, न रुचि, न शक्ति। अपने जीवन भर के विनम्र अन्वेषणों तथा देवतुल्य गुरुजनों की चरण रज के प्रसाद स्वरूप जो कुछ प्राप्त हुआ है उसे हमने अपनी पुस्तकों में प्रकाशित कर दिया है और करते रहते हैं। कोई गुरुजन कृपा करके हमारी कभी कोई भूल बता देते हैं तो उनके अनुग्रह के लिए अनेक उपकार मानते हुए तत्क्षण अपनी भूल को सुधार लेते हैं ऐसे अनुग्रह के लिए विद्वानों और अनुभवियों को हम सदा आमंत्रित भी करते रहते हैं ताकि लक्ष की ओर अधिक आशाजनक प्रगति हो सके।
हमारी प्रार्थना पर ध्यान न देकर कुछ सज्जन मतिभ्रम फैलाने में ही औचित्य अनुभव करते हैं। वे मौखिक रूप से एवं कभी-कभी अखबारों में छपा कर ऐसे विचार प्रकट करते हैं जिससे-बड़ी कठिनाई से उत्पन्न हुई लोगों की साधन श्रद्धा, विचलित हो जाती है और वे अपने आध्यात्मिक प्रयत्नों को छोड़ बैठते हैं। संभवतः वे सज्जन “धर्म रक्षा” की दृष्टि से ऐसे विचार प्रकट करते होंगे पर होता उसके विपरीत है। क्योंकि उनके अभिमत किसी मजबूत आधार पर निर्धारित नहीं होते। अपनी अल्पज्ञता का ध्यान न रखते हुए जब मनुष्य पूर्णता एवं सर्वज्ञता का अहंकार धारण कर लेता है तब उससे प्रायः अनुचित कार्य ही बन पड़ते हैं।
यों तो समय-समय पर अनेक आक्षेप और विरोध सामने आते रहते हैं और अपनी निर्धारित नीति के अनुसार हम उनकी उपेक्षा करते रहते हैं। ऐसा ही एक विरोध अभी हाल में बम्बई के एक गुजराती पत्र में छपा है। जिसमें अखण्ड-ज्योति द्वारा संचालित गायत्री मन्त्र लेखन का विरोध किया है, उस विरोध के जो कारण दिये गये है वे बड़े मनोरंजक हैं। पाठकों का कुछ मनोरंजन हो इस दृष्टि से उसका उल्लेख नीचे किया जाता है
विज्ञप्ति को छपाने वाले कोई ‘शास्त्री’ सज्जन हैं। उनमें मन्त्र लेखन का निषेध तीन तर्कों के आधार पर किया है। (1) हमारे पास चार-पाँच पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी हैं। उनमें से किसी में मन्त्र लेखन का विधान नहीं है (2) पुष्टि मार्ग के एक आचार्य ने कोई गुरुदीक्षा मंत्र पुस्तक में छप जाने पर उस कार्य का विरोध किया था (3) किसी तंत्र ग्रन्थ में लिखा है कि “मंत्र, माला तथा यन्त्र गुरोरपि न दर्शयेत्’ अर्थात् माला, मंत्र और यन्त्र इन्हें गुरु को भी न दिखाना चाहिए।”
आइए इन तर्कों की परीक्षा करें और देखें कि क्या सचमुच शास्त्री महोदय की बात युक्ति संगत है—
(1)उनके पास 4-5 पुस्तकें गायत्री संबंधी हैं। और चूँकि इनमें मन्त्र लेखन सम्बन्धी समर्थन या विरोध नहीं है। इसलिए वे सोचते हैं कि संसार में गायत्री साहित्य केवल 4-5 पुस्तकों का ही है। उनमें मन्त्र लेखन का विरोध भले ही न हो पर समर्थन नहीं है तो वह विरोध ही मान लेना चाहिए। यदि वे सज्जन चाहते तो यों भी सोच सकते थे कि संभव है संसार में गायत्री विद्या की जानकारी मेरे पास जो 4-5 पुस्तकें में है उनके अलावा भी किसी और ग्रन्थ में हो, जो मेरे देखने में न आई हो। और चूँकि इन पुस्तकों में कहीं विरोध नहीं है इसलिए संभव है किसी अन्य ग्रन्थ में मन्त्र लेखन का समर्थन हो। परन्तु वे ऐसा क्यों सोचते? उन्हें तो विरोध करने से काम था। अपने पास मन्त्र लेखन के विरोध में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है— न सही। समर्थक प्रमाण 4-5 पुस्तकों में न होना यही विरोध के लिए पर्याप्त प्रमाण है।
सच बात यह है कि गायत्री सम्बन्धी विज्ञान से सम्बन्धित लगभग 800 प्राचीन ग्रन्थ है जिनमें से उन्हें 795 का कुछ भी पता नहीं हैं। इतनी दुर्बल जानकारी के आधार पर एक सुसंचालित तपश्चर्या का विरोध करने के लिए वे तत्पर हुए हैं।
(2)पुष्टि मार्गी गुरु दीक्षा का मन्त्र उस सम्प्रदाय के आचार्य ने किसी पुस्तक में छापने का विरोध किया था। वे पंडित जी समझते हैं कि गायत्री भी किसी सम्प्रदाय का कोई ऐसा ही मन्त्र है जो केवल गुरुदीक्षा देने के काम आता है। उसे प्रकट कर देने से शिष्य लोग गुरु अपेक्षा न रखेंगे और उसे जान लेने से स्वयं ही उनके ज्ञाता बन जावेंगे।
पंडित जी यह भूल जाते हैं कि गायत्री वेद मंत्र हैं। प्रेस न होने से पहले वेद हस्त लिखित होते थे और अब प्रेस हो जाने पर तो लाखों की संख्या में वेद मंत्र प्रेस में छपते हैं। मन्त्र लिखे जाने का या छपने का आज तक किसी बड़े से बड़े कट्टरपंथी ने विरोध नहीं किया। यदि ऐसा निषेध होता तो कहीं कोई वेद या वेद मन्त्र छपा हुआ या लिखा हुआ दृष्टिगोचर न होता। पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय के गुरु दीक्षा मंत्र और गायत्री मन्त्र को एक समान मान लेने और उनके आचार्य के विरोध को एकमात्र प्रमाण मान लेने पर उसका फलितार्थ क्या होगा, इस बात को वे सज्जन विरोध के उत्साह में बिल्कुल भूल गये हैं। यदि उनकी बात स्वीकार कर ली जाय तो उन्हें उन 4-5 पुस्तकों से भी वंचित होना पड़ेगा जिनके आधार पर वे मंत्र लेखन में सन्देह करते हैं। चूँकि वे शास्त्र को मानने वाले हैं। पुष्टि मार्गी आचार्य का वाक्य ही उनका शास्त्र है। ऐसी दशा में उन्हें हर एक उस पुस्तक का पूर्ण निषेध करना चाहिए। जिससे वेद मन्त्र छपे या लिखे हों। गायत्री की भाँति ही अन्य वेद मन्त्र भी हैं। इतना न हो तो कम से कम जिस पुस्तक में गायत्री का उल्लेख हो उसे तो उन्हें ‘अछूत’ ही मानना चाहिए।
(3)किसी तंत्र ग्रन्थ का श्लोक है कि मंत्र, माला, और यंत्र गुरु को भी न दिखाये। यहाँ उनने मंत्र शब्द देखकर सभी मन्त्रों को एक लाठी से हाँक दिया है। वाममार्गी, कौल, सावर तंत्र के मन्त्र में और दक्षिण मार्गी, वेदोक्त मंत्रों में कोई अन्तर है या नहीं यह उन्हें पता नहीं। वे गायत्री को साँवर तंत्र का ऐसा मन्त्र मानते हैं जिसे मारण आदि अभिचारों के लिए प्रयोग किया जाता है और इतना गुप्त रखा जाता है कि और को तो क्या गुरु को भी न बताया जाय। यदि वेद मन्त्रों को इसी श्रेणी में रख लिया जाय तो फिर वेद विद्यालय पूर्णतया बन्द करने पड़ेंगे। क्योंकि मन्त्र को शिष्य भला गुरु को किस प्रकार सुना सकेगा? गुरु शिष्य से उसके वेद पाठ को पूछ भी कैसे सकेगा? क्योंकि इसे मालूम है कि मन्त्र को तो गुरु को भी सुनाना निषेध है। इसी प्रकार वेद गान—वेदपाठ, सामगान आदि भी बन्द करने होंगे। और विवाहादि संस्कारों में तथा यज्ञों में जो मन्त्रों का उच्चारण होता है वह निषिद्ध, शास्त्र विरुद्ध ठहरेगा।
पाठक देखेंगे कि उपरोक्त बातों में कितना तथ्य है? शास्त्री महोदय कितने दुर्बल आधार को लेकर एक कितने महत्वपूर्ण धर्म कार्य का विरोध करने खड़े हुए हैं? इससे उन्हें क्या लाभ हुआ? सम्भव है किसी महत्वपूर्ण बात का विरोध करने से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने और अपने पांडित्य का प्रकाश करना उनका मंतव्य हो जैसा कि आमतौर से होता है। यदि ऐसा हो तो हम शास्त्री महोदय तथा समय-समय पर ऐसे ही विरोध करने वाले अन्य सज्जनों की प्रसन्नता के लिए एक बड़ा स्वर्ण सुयोग भी उपस्थित कर सकते हैं। वह यह कि वे यदि अपनी बातों का आधार मजबूत समझते और हमारी बातों को अप्रामाणिक समझते हों तो इसके लिए एक विद्वज्जनोचित शास्त्रार्थ कर लें और उसमें यह शर्त रख लें कि (1) जिसकी बातें अप्रमाणिक सिद्ध हों उसे गोली मार दी जाय (2) विजेता को पराजित की सारी सम्पत्ति दे दी जाय। इन शर्तों को स्वीकार कर लेने से उन महानुभावों को तीन लाभ हो सकते हैं (1) उनकी विद्वता की विजय दुन्दुभी चारों ओर बज जायगी और जिस भावना की कुल बुलाहट से वे निर्मूल आक्षेप करने को बाध्य होते हैं उस प्रवृत्ति की भली प्रकार तृप्ति हो जायगी (2) अपनी विद्वत्ता के पुरस्कार में उन्हें हजारों रुपये की सम्पत्ति जीतने का लाभ मिलेगा (3) यदि वे सचमुच हमारे विचारों में कोई शास्त्र विरुद्ध व समझते होंगे तो उन्हें धर्मोद्धार का श्रेय भी मिलेगा।
वास्तविकता यह है कि उपासना और साधना का, आध्यात्मिकता का विषय तपस्वियों और साधना से सम्बन्ध रखता है। जिन व्यक्तियों की इस क्षेत्र में गति है, अनुभव है उन्हीं को कुछ कहना या बोलना चाहिए। यों साहित्य के अंतर्गत सभी बातें आती हैं। पुस्तकों में बहुत कुछ लिखा है पर केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर हर व्यक्ति को हर विषय में बोलने का अधिकार नहीं होता। शास्त्री लोग व्याकरण की, साहित्य की बारीकियों को आसानी से समझ सकते हैं, उस विषय में वे प्रामाणिक भी हो सकते हैं। परन्तु हर विषय में उनकी प्रामाणिकता नहीं हो सकती। जैसे एक डॉक्टर चिकित्सा तो खूब कर सकता है पर वकील, इंजीनियर, चित्रकार, शिल्पी आदि के कार्यों का उसे कोई अनुभव नहीं होता। इसी प्रकार यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति अक्षर ज्ञान की दृष्टि में पूर्ण पंडित होते हुए भी साधना, योग एवं अध्यात्म के क्षेत्र में बिल्कुल अनजान हो। ऐसी दशा में उसे अपनी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और उसे यह भी जानना चाहिए कि सभी आध्यात्मिक रहस्य पुस्तकों में लिखे हुए नहीं हैं। पुस्तकों से बाहर भी बहुत कुछ मौजूद है।
संसार में अनेक अधार्मिक कार्य हो रहे हैं। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, व्यभिचार, व्यसन, नास्तिकता आदि सभी कार्य शास्त्र विरुद्ध हैं। धर्मध्वजी लोगों के व्यक्तिगत आचरणों में भी शास्त्र विरुद्ध कार्यों की कमी नहीं रहती, इन सब बातों के सम्बन्ध में जो लोग सदैव मौन रहते हैं उन प्रसंगों पर बोलने या लिखने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती, परन्तु जब कोई कल्याण कारक श्रेष्ठ कार्य होता है तो गायत्री जैसी सर्वथा हानि रहित उपासना में भी बाल की खाल निकाल कर अधार्मिक सिद्ध करने और लोगों को उस मार्ग से रोकने के लिए उनका शास्त्रीय ज्ञान उछल पड़ता है।
इस सम्बन्ध में हम अपने पाठकों से एक ही बात कहना चाहेंगे कि—साधना पथ पर किसी का पथ-प्रदर्शन करते हुए हम जानते हैं कि हमारी जिम्मेदारी कितनी महान है। किसी को गलत सलाह दी जाय तो अपनी श्रद्धा, गुरु भक्ति, सच्चाई और साधना के बल पर वह साधक तो उस गलत साधना से भी अभीष्ट फल प्राप्त कर लेगा पर उसको जो फल मिलेगा वह उस पथ-प्रदर्शक की साधना में से कट कर मिलेगा और यदि उसके पास तप की इतनी पूँजी नहीं है तो उसे पेशगी उतना पुण्य फल उन शिष्यों को देना पड़ेगा और उसकी पूर्ति के लिए उसे हजारों जन्मों तक पिसना पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऐसा करने में हमारा कोई लाभ नहीं। हम लोकहित के लिए, दूसरों को कल्याण मार्ग पर ले जाने की पुण्य भावना से प्रेरित होकर ही दूसरों को कोई साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
कल्याण मार्ग पर कोई विरले ही प्रवृत्त होते है जिनके शुभ संस्कार प्रबल हैं उन्हें श्रेष्ठ पथ पर श्रद्धा एवं निष्ठा प्राप्त होती है। जिन्हें कल्याण प्राप्त नहीं होना है-वे यदि किसी प्रकार खड़े भी कर दिये जायं तो कोई न कोई विघ्न, प्रमाद, मतिभ्रम सामने आ खड़ा होता है और उनकी दुर्बल श्रद्धा नष्ट हो जाती है। तप और यज्ञ में अनेक विघ्न आते हैं उन्हीं विघ्नों में से ‘मतिभ्रम’ भी एक है। जो मूर्खों द्वारा; विद्वानों द्वारा, स्वजनों द्वारा, परिजनों द्वारा उपस्थित किया जा सकता है। ऐसा पूर्व काल में भी होता था और अब भी होगा। सन्मार्ग पर ले चलने वाली सतोगुणी शक्तियाँ संसार में कम हैं और रास्ता चलने वालों को रोकने वाली आसुरी शक्तियाँ बहुत हैं। वे अपना काम अवश्य करेंगी। हमारे या किसी और के द्वारा उन्हें पूर्णतया रोका नहीं जा सकता। इसीलिए हम सदा से ऐसे विवादों से दूर रहते हैं और आगे भी रहेंगे। हमने अब तक किसी आक्षेप का उत्तर नहीं दिया और आगे भी किसी वितंडावाद में पड़ने का हमारा विचार नहीं है। हमारे पास अपने लक्ष को पूर्ण करने में प्रवृत्त रहने लायक समय और साधन हैं। दूसरों को लोकहित की दृष्टि से उचित सलाह एवं शिक्षा देते रहना हमारा ब्राह्मणोचित कर्त्तव्य है उसे हम यथा सम्भव पालन करते रहते हैं। हमारी ही बातें ठीक मानी जायं ऐसा कोई हमारा आग्रह भी नहीं है, और न कोई इसमें संकुचित स्वार्थ ही है। हर व्यक्ति अपने विवेक एवं अन्तःप्रेरणा का अनुकरण करके आसानी से सत्य-असत्य का निर्णय कर सकता है।
यह पंक्तियाँ तो हमने अपनी नीति के स्पष्टीकरण करने मात्र के लिए लिखी हैं। जिससे पाठक तरह-तरह के आक्षेपों में भ्रमित होकर हमारा अकारण समय नष्ट न करें। इन पंक्तियों में एक सज्जन के आक्षेपों का प्रसंग वशात् ही उल्लेख हो गया है। किसी का प्रत्युत्तर देना हमें अभीष्ट नहीं, जिस बात को हम पूर्ण सत्य, उपयोगी एवं प्रामाणिक समझते हैं केवल उसी को दूसरों के सामने उपस्थित करते हैं। अपनी बातों की प्रामाणिकता के लिए हमारे पास ठोस आधार होते हैं इसलिए हम निरर्थक विवादों से अपने समय और शक्ति को सदैव बचाते रहते हैं। वितंडावाद से हमें घृणा है इसलिए उससे दूर रहना ही हमें अभीष्ट है।
(1)
जो भी नर हैं सदा प्रकृति के नियम निभाते,
वे शारीरिक और बौद्धिक स्वास्थ्य बढ़ाते॥
जो जितना भी दूर प्रकृति से हो जाता है,
वह अपना ही अन्त निकट अपने लाता है॥
इसीलिए जो रखते सामंजस्य प्रकृति से।
जड़ सकते हैं एक बार वे कठिन नियति से॥
(2)
मानव के अतिरिक्त सभी पशु पक्षी प्राणी,
मान चुके हैं “प्रकृति सदा उनको कल्याणी॥
सदा निभाते नियम प्रकृति के वे रहते हैं,
इसीलिए तन की पीड़ा में कम सहते हैं॥
यह उन्मादी पुरुष लड़ा उनसे करता है।
पग-पग पर टकराता ठोकर खा गिरता है॥
(3)
यह कुछ ऐसे नियम कि जिनको सदा निभाओ,
अत्याधिक जब भूख लगे तब ही कुछ खाओ॥
खाओ सात्विक वस्तु नशीली चीजें छोड़ो,
और अनिद्रा अति निद्रा से निज मुँह मोड़ो॥
बनो न कामुक नारी को भोजन न बनाओ।
स्वच्छ वायु, जल, वृत, संयम, का नियम निभाओ
(4)
जब शरीर है स्वस्थ तभी मन पुलकित रहता,
पुलकित मन में ही उत्तम मस्तिष्क ठहरता॥
कहते हैं यदि धन खोया तो कुछ न गंवाया,
खोया कुछ स्वास्थ्य कभी फिर हाथ न आया॥
पर यदि कभी चरित्र हाथ से खो जाता है।
तो जीवित नर मृतक सदृश ही हो जाता है॥
*समाप्त*
(श्री शिव शंकर मिश्र, एम. ए.)