—शरीर को कर्मशील उद्योग में और मन को शान्ति और प्रेम में रखने का अर्थ इसी अन्त में दुःख और पाप से मुक्ति है।
—अपने जीवन पर दृष्टि डालो तुम्हें ज्ञात होगा कि जीवन के वे दिन अधिक सुखमय थे जब तुमने किसी के लिए दया के शब्द मुख से निकाले थे अथवा परोपकार के कार्य किए हों अथवा दूसरों को अपने स्वार्थ की आहुति दी हो।
—प्रत्येक मनुष्य के अन्तःकरण में निरन्तर उच्च तप बनाने के लिए अंतर्ध्वनि होती है किन्तु विरला ही कोई इस ध्वनि की ओर लक्ष्य देने की चेष्टा करता है।
—अमरपुरी आपके भीतर है स्वर्ग तथा आनन्द का धाम आपके अंदर है तब भी आप सुख को बाजारों में अन्य पदार्थों में ढूँढ़ते हो, यह कैसा आश्चर्य है।
“अखंड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें
इन पुस्तकों की एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव एवं अनुसंधान के साथ लिखी गई है।
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बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें।
1-सूर्य चिकित्सा विज्ञान। 2-प्राण चिकित्सा विज्ञान। 3-स्वस्थ बनने की विद्या। 4-भोग में योग। 5-बुद्धि बढ़ाने के उपाय। 6-आसन और प्राणायाम। 7-तुलसी के अमृतोपम गुण। 8-महान जागरण। 9-तुम महान हो। 10-घरेलू चिकित्सा। 11-बिना औषधि के काया कल्प। 12-पंच तत्वों द्वारा रोग निवारण। 13-दीर्घजीवन के रहस्य। 14-नेत्र रोगों की चिकित्सा। 15-स्वप्न दोष की चिकित्सा। 16-दूध की आश्चर्यजनक शक्ति। 17-उन्नति का मूलमंत्र-ब्रह्मचर्य। 18-उपवास के चमत्कार। 19-स्त्री रोग चिकित्सा। 20-बाल रोग चिकित्सा। 21-निरोग जीवन का राजमार्ग। 22-कब्ज की सरल चिकित्सा। 23-चिरस्थायी यौवन। 24-सौंदर्य बढ़ाने का उपाय।
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें।
1-मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार। 2-धनवान बनने के गुप्त रहस्य। 3-पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि। 4-मरने के बाद हमारा क्या होता है। 5-मित्र भाव बढ़ाने की कला। 6-आकृति देखकर मनुष्य की पहचान। 7-संजीवनी विद्या। 8-अमृत पारस और कल्पवृक्ष। 9-स्वप्न क्यों दीखते हैं। 10-विचार करने की कला। 11-हम वक्ता कैसे बन सकते हैं। 12-लेखन कला। 13-सफलता के तीन साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संपदाएं। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला। 18-प्रभावशाली व्यक्तित्व। 19-अमृतकण। 20-प्रसिद्धि और समृद्धि। 21-हमारी पारिवारिक समस्याएं। 22-हमारे आन्तरिक शत्रु।
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें।
1-ईश्वर कौन है? कैसा है? 2-क्या धर्म? क्या अधर्म? 3-गहना कर्मणोगति। 4-जीवन की गुत्थियों पर प्रकाश। 5-शास्त्र मंथन की नवनीत। 6-शक्ति संचय का पथ। 7-आत्म गौरव की साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास का विकास। 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन। 12-ब्रह्म विद्या का रहस्य। 13-ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग। 14-विवेक सतसई। 15-आध्यात्म शास्त्र। 16-अध्यात्म विद्या का प्रवेश। 17-वैज्ञानिक अध्यात्मवाद। 18-प्रेम का रहस्य। 19-भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत। 20-यज्ञोपवीत द्वारा धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति। 21-जीवन संगीत। 22-दैनिक जीवन में मनोविज्ञान के प्रयोग।
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें।
1-मैं क्या हूँ। 2-परकाया प्रवेश। 3-स्वर योग से दिव्य ज्ञान। 4-वशीकरण की सिद्धि। 5-जीव जन्तुओं की मूक भाषा। 6-ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग। 7-यम नियम। 8-प्रत्याहार, धारणा ध्यान और समाधि। 9-मैस्मरेजम की शिक्षा। 10-हस्तरेखा विज्ञान। 11-गायत्री की चमत्कारी साधना। 12-गृहस्थ योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था। 16-आत्मोन्नति का मार्ग। 17-प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं। 18-योग के नाम पर मायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।
मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-13 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक- 9
उत्तुँग शिखर के निर्झर-सा,
निर्मल हो जीवन का प्रवाह।
अभिराम शैल का हरिताञ्चल,
ऊपर हँसता नीलाभ गगन
मोती-सी जल की बूँदों का
बिखरावे चंचल मृदुल पवन।
जग के आँगन में ज्योतिर्मय
जीवन का ही सुन्दर नर्तन।
हो ज्वलित न मेरे अन्तस् में,
सागर तल का वह विषम दाह।
खेलें तट पर कोमल निश्छल,
मञ्जुल मृग छौने उछल-उछल,
कुटिला आशा की पंक-राशि कलुषित न करे मेरा हृत्तल।
मेरे संगी बन के पंछी नाचें
नाचें सुनकर मेरा कल-कल।
फूलों की शैया बन जावे चट्टानों की यह विषम राह।
उत्तुँग शिखर के निर्झर-सा निर्मल हो जीवन का प्रवाह।
(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, टेढ़ा-उन्नाव)
रेवेव निर्मला नारी पूजनीया सदा मता।
यतो हि सैव लोकेऽस्मिन् साक्षात्लक्ष्मी मताबुधैः॥
अर्थ—नारी सदैव नर्मदा नदी के समान निर्मल है। वह पूजनीय है। क्योंकि संसार में वही साक्षात् लक्ष्मी है।
जैसे नर्मदा नदी का निर्मल जल सदा निर्मल रहता है उसी प्रकार ईश्वर ने नारी को स्वभावतः निर्मल अन्तःकरण प्रदान किया है। परिस्थिति तथा संगति से दोष होने के कारण कभी-कभी उसमें भी विकार पैदा हो जाते हैं पर यदि उन कारणों को बदल दिया जाय तो नारी हृदय पुनः अपनी शाश्वत निर्मलता पर लौट आता है।
स्फटिक मणि को रंगीन मकान में रख दिया जाय या उसके निकट कोई रंगीन पदार्थ रख दिया जाय तो वह मणि भी रंगीन छाया के कारण रंगीन ही दिखाई पड़ने लगती है। परन्तु यदि उन कारणों को हटा दिया जाय तो वह शुद्ध निर्मल एवं स्वच्छ रूप में ही दिखाई देती है। इसी प्रकार नारी जब बुरी परिस्थिति में पड़ी होती है तब वह बुरी, दोषयुक्त दिखाई पड़ती है परन्तु जैसे ही उस परिस्थिति का अन्त होता है वैसे ही वह निर्मल एवं निर्दोष हो जाती है।
नारी लक्ष्मी का साक्षात अवतार है। भगवान् मनु का कथन पूर्ण सत्य है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात् सुख शान्ति के समस्त उपकरण उपस्थित रहते हैं। सम्मानित एवं सन्तुष्ट नारी अनेक सुविधाओं तथा सुव्यवस्थाओं का केन्द्र बन जाती है। उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनन्द बरसता है। धन दौलत निर्जीव लक्ष्मी है। किन्तु स्त्री तो लक्ष्मी जी की सजीव प्रतिमा है उसके प्रति समुचित आदर का, सहयोग का एवं सन्तुष्ट रखने का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए।
नारी में नर की अपेक्षा सहृदयता, दयालुता, उदारता, सेवा, परमार्थ एवं पवित्रता की भावना अत्यधिक है। उसका कार्यक्षेत्र संकुचित करके घर तक ही सीमाबद्ध कर देने के कारण ही संसार में स्वार्थपरता, हिंसा, निष्ठुरता, अनीति एवं विलासिता की बाढ़ आई हुई है। यदि राष्ट्रों का सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व नारी के हाथ में हो तो उसका मातृ हृदय अपने सौंदर्य के कारण सर्वत्र सुख शान्ति की स्थापना कर दे।
नारी के द्वारा अनन्त उपकार एवं असाधारण सहयोग प्राप्त करने के उपरान्त नर के ऊपर अनेक पवित्र उत्तरदायित्व आते हैं, उसे स्वावलम्बी, सुशिक्षित, स्वस्थ, प्रसन्न एवं सन्तुष्ट बनाने के लिए नर को सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। मारना पीटना, अपमानजनक व्यवहार करना, हीन दृष्टि से देखना, उसे अपनी सम्पत्ति समझना सर्वथा अधार्मिक व्यवहार है ऐसा गायत्री के ‘रे’ अक्षर में स्पष्ट किया गया है।
नारी के स्वाभाविक असाधारण गुणों के कारण यही सम्भावना सदा ही बनी रहती है उसके छोटे मोटे दोषों को आसानी से सुधारा जा सकता है। गाय में दैवी तत्व अधिक होने से उसे अवध्य माना गया है। ब्राह्मण को सताना अन्य जीवों को सताने की अपेक्षा अधिक पाप है। इसी प्रकार नारी और बालक को भी गौ ब्राह्मण की तुलना में रखा गया है। बच्चों से कोई गलती हो या उसके स्वभाव में कोई दोष हो तो उसके प्रति क्षमा, उदारता और वात्सल्य पूर्ण तरीकों से ही सुधारा जाता है। कोई सहृदय अभिभावक अपने पथभ्रष्ट बालक के प्रति प्रतिहिंसा का भाव नहीं रखता और न उसे सताने या पीड़ित करने का भाव मन में लाता है, हमारी यही भावना नारी के प्रति होनी चाहिये। क्योंकि मुद्दतों से नारी जाति जिन परिस्थितियों में रहती आ रही है उन्होंने उसे भी बौद्धिक दृष्टि से एक प्रकार का बालक ही बना दिया है। नारी पर हाथ उठाना कायरता का लक्षण माना गया है। उसके स्त्रीधन का अपहरण करना, उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट करना या घातक आक्रमण करना तो अत्यन्त ही निकृष्ट कोटि का, पुरुषत्व को कलंकित करने वाला कुकृत्य है।
आज नारी जाति में भी जहाँ तहाँ चरित्र दोष, कटु व्यवहार आदि बुराइयाँ दृष्टिगोचर होने लगी हैं। इसमें प्रधान दोष उन परिस्थितियों का है जो उनमें यह विकार पैदा करती हैं। पुरुष समाज चारित्रिक दृष्टि से नारी की अपेक्षा हजार गुना अधिक पतित है उसी की छाया से नारी भी अपवित्र बनती है तब लोग उन कारणों तथा पुरुषों का तो दोष नहीं देखते बेचारी बालबुद्धि नारी पर बरस पड़ते है और उस पर अमानुषिक अत्याचार करते हैं इस प्रक्रिया से अविश्वास, असन्तोष, कटुता, द्वेष, पाप और प्रतिहिंसा की ही वृद्धि होती है। इन तत्वों को पारिवारिक जीवन में बढ़ाने वाले लोग अपना और समाज का अहित ही करते हैं।
स्त्री को जीतने और सुधारने का एकमात्र अस्त्र उनके प्रति गहरी ममता, आत्मीयता, उदारता, करुणा, एवं हित कामना ही है। जिसके मन में यह भावना होंगी वह नारी की बुरी से बुरी आदतों को स्वल्प प्रयास से दूर करके उसके पूर्ण अनुकूल एवं उपयोगी बना सकेगा। इसके विपरीत जो उससे विरानेपन का, बदले का, अनुदारता का, स्वामित्व का एवं उसकी कमजोरों से नाजायज लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं वे उसे कदापि नहीं सुधार सकते हैं और वरन् ऐसे प्रयत्नों से उलटा विद्वेष बढ़ाते हैं और अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेते हैं।
गृहस्थ जीवन की 90 प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सच्ची आत्मीयता पर निर्भर है। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से जीता जा सकता है। हीरे के अंगूठी से यदि कोई अशुद्ध वस्तु लग जाय तो उसे कोई तोड़ नहीं डालता वरन् उस अशुद्धि को हटाकर उस मूल्यवान वस्तु को पूर्ववत् प्रेमपूर्वक रखा जाता है, इसी प्रकार नारी की छोटी-मोटी त्रुटियों, बुराइयों से निराश या विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है, वरन् रोगी के प्रति डॉक्टर या परिचर्या करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है।
गायत्री के ‘रे’ अक्षर में नारी के प्रति उदारता और सहृदयता का व्यवहार करने के लिए आदेश दिया गया है। इस आदेश को पालन करने से हमारे गृहस्थ जीवन में स्वर्गीय शान्ति, समृद्धि एवं उन्नति के अनेकों अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। आज लड़की के पिता से दहेज माँगा जाता है, ठहराव कम दहेज मिलने पर वधू का अपमान किया जाता है, कन्याओं की शिक्षा पर, उनके स्वास्थ पर माँ बाप पूरा ध्यान नहीं देते, ससुराल में लड़की को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित होना पड़ता है, उसकी इच्छा को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसे स्वावलम्बी तथा उन्नतिशील बनाने के लिए भी किसी का ध्यान नहीं होता, केवल उससे अधिकाधिक सेवा लेने की ही सबकी दृष्टि रहती है। इस प्रकार की अनुदारता बन्द करके ओर उदार एवं सहृदय व्यवहार करने का आदेश गायत्री मन्त्र में दिया गया है। यदि हम इस आदेश को मानें तो निस्सन्देह नारी अन्तःकरण निर्मल नर्मदा नदी के समान स्वच्छ, शीतल एवं शान्तिमय बन सकता है और वह साक्षात् लक्ष्मी बन कर हमारे जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण कर सकती है।
—जिन बन्धनों में तुम जकड़े हुए हो उन पर क्रोध करना अथवा चिड़चिड़ाना व्यर्थ है। तुम्हें उचित है कि तुम इस बात का पता लगाओ कि तुम क्यों और किस प्रकार इस विपत्ति में आ पड़े और इससे निकलने का सच्चा उपाय क्या है?
—अज्ञान से तुम अपने को शरीर कहते हो, परन्तु शरीर तुम हो नहीं। तुम अनन्त शक्ति हो, नित्य स्थायी और निर्विकार स्वरूप हो। वही तुम हो उसे जानो और फिर तुम अपने को समस्त विश्व में बसा हुआ पावोगे।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
बड़े-बड़े धर्मवक्ता आपने देखे होंगे और उनके व्याख्यान सुने होंगे। सोचना चाहिए कि उनके शब्दों का अनुकरण उनका हृदय कहाँ तक करता है? वे अपने अन्तःकरण के भावों को यदि स्पष्टतया प्रकट करने लगें तो आप निश्चय समझिए कि उनमें से अधिकाँश लोगों को ‘नास्तिक’ कहना पड़ेगा। वे अपने बुद्धि को चाहे जितनी भगतिन बनावें, वह उनसे यही कहेगी कि “किसी पुस्तक में लिखा है या किसी महापुरुष ने कहा है इसलिये मैं उस पर बिना विचार किये विश्वास क्योंकर करूं? दूसरे भले ही अन्धश्रद्धा के अधीन हो जायँ, मैं कभी फँसने वाली नहीं।” इधर जाते हैं तो खाई और उधर जाते हैं तो अथाह समुद्र है। यदि धर्मोपदेशक या धर्मग्रन्थों का कहना मानो तो विवेचक बुद्धि बाधा डालती है और न मानो तो लोग उपहास करते हैं, ऐसी अवस्था में लोग उदासीनता की शरण लेते हैं। जिन्हें आप धार्मिक कहते हैं, उनमें से अधिकाँश लोग उदासीन अथवा तटस्थ हैं और इसका कारण धर्म पर यथार्थ विचार न करना ही है। धर्म की उदासीनता यदि ऐसी बढ़ती ही जायगी और लोग धर्माचरण के लाभों से अनभिज्ञ ही बने रहेंगे तो धर्म की पुरानी इमारत भौतिक-शास्त्रों के एक ही अघात में हवाई किले की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जायगी। भौतिक शास्त्र जिस प्रकार विवेक बुद्धि की भट्टी से निकलकर अपनी सत्यता सिद्ध करते हैं उसी प्रकार धर्म शास्त्र को भी अपने सिद्धान्तों की सत्यता संसार के सामने सप्रमाण सिद्ध कर देनी चाहिये। ऐसा करने पर बुद्धि के तीव्र ताप से यदि धर्मतत्व गल-पच भी जायेंगे तो भी हमारी कोई हानि नहीं है। जिसे आज तक हम रत्न समझे हुये थे, वह पत्थर निकला। उसके नष्ट होने का हमें दुःख क्या? अन्ध-परम्परा से उसे सिर पर लादे रहना ही मूर्खता है। मेरी समझ में ऐसे सन्दिग्ध पत्थरों की जहाँ तक शीघ्र हो, परीक्षा कर व्यवस्था से लगा देना ही अच्छा है। यदि धर्मतत्व सत्य होंगे तो वे भट्टी में कभी न जलेंगे, उलटे वे ही असत्य पदार्थ भस्म हो जायेंगे जिनके मिश्रण से सत्यधर्म में सन्देह होने लगा है। आग में तपाने से सोना मलीन नहीं किंतु अधिक उज्ज्वल हो जाता है। विवेक बुद्धि की भट्टी में सत्य धर्म को डालने से उसके नष्ट होने का कोई भय नहीं है किन्तु ऐसा करने से उसकी योग्यता और भी बढ़ जायगी तथा उसका उच्च स्थान सर्वदा बना रहेगा। पदार्थ विज्ञान और रसायन शास्त्रों की तरह धर्मशास्त्र भी प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध करना चाहिये। यदि कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियों की योग्यता अधिक है तो जड़ (भौतिक) शास्त्रों पर ज्ञान-प्रधान धर्मशास्त्र की विजय क्योंकर न होगी? भौतिक शास्त्रों की सिद्धि तो इन्द्रियों के भरोसे है और धर्मशास्त्रों की सिद्धि अन्तरात्मा से सम्बन्ध रखती है, फिर क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं है कि हम इसी आवश्यक और प्रधान शास्त्र की सिद्धि का पहले यत्न करें?
जो यह कहते हैं कि विवेकबुद्धि की तराजू पर तोलना मूर्खता है, वे निश्चय अदूरदर्शी है। मान लीजिए, एक ईसाई किसी मुसलमान से इस प्रकार झगड़ रहा है :—”मेरा धर्म प्रत्यक्ष ईश्वर ने ईसा से कहा है।” मुसलमान कहता है :—”मेरा भी धर्म ईश्वर-प्रणीत है।” इस पर ईसाई जोर देकर बोला—”तेरी धर्म पुस्तक में बहुत सी झूठी बात लिखी हैं, तेरा धर्म कहता है कि हर एक मनुष्य को सीधे से नहीं तो जबरदस्ती मुसलमान बनाओ। यदि ऐसा करने में किसी की हत्या भी करनी पड़े तो पाप नहीं है। मुहम्मद के धर्म प्रचारक को स्वर्ग मिलेगा।” मुसलमान ने कहा :—”मेरा धर्म जो लिखा है सो सब ठीक है।” ईसाई ने उत्तर दिया :—”ऐसी बातें मेरी धर्म पुस्तक में नहीं लिखी हैं, इससे वे झूठी नहीं हैं।” मुसलमान झल्लाकर बोला :—”तेरी पुस्तक से मुझे क्या प्रयोजन है? काफिरों को मार डालने की आज्ञा को झूँठ करने का तुझे क्या अधिकार है? तेरा कथन है कि ईसा का लिखा सब सच है मैं कहता हूँ मुहम्मद जो कुछ कह गये हैं, वही ठीक है।” इस प्रकार के प्रश्नोत्तरों से दोनों को लाभ नहीं पहुँचता। एक दूसरे की धर्मपुस्तक को बुरी दृष्टि से देखते हैं इससे वे निर्णय नहीं कर सकते कि किस पुस्तक के नीतितत्व श्रेष्ठ हैं। यदि विवेचक बुद्धि को दोनों काम में लावें तो सत्य वस्तु का निर्णय करना कठिन न होगा। किसी धर्म पुस्तक पर विश्वास न होने पर भी उसमें लिखी हुई किसी खास बात को यदि विवेचक बुद्धि स्वीकार कर ले तो तुरन्त समाधान हो जाता है। हम जिसे विश्वास कहते हैं वह भी विवेचक बुद्धि से ही उत्पन्न हुआ है। परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि दो महात्माओं के कहे हुए जुदे-जुदे या परस्पर विरुद्ध विधानों की परीक्षा करने के शक्ति हमारी विवेचक बुद्धि में है या नहीं? यदि धर्मशास्त्र इन्द्रियातीत है और उसकी मीमाँसा करना हमारी शक्ति के बाहर का काम हो तो समझ लेना चाहिये कि पागलों की व्यर्थ बकबक या झूठी किस्सा कहानियों की पुस्तकों से धर्मशास्त्र का अधिक महत्व नहीं है। धर्म ही मानवी अन्तःकरण के विकास का फल है। अन्तःकरण के विकास के साथ-साथ धर्म मार्ग चल निकले हैं। धर्म का अस्तित्व पुस्तकों पर नहीं किन्तु मानवी अन्तःकरण पर अवलम्बित है। पुस्तकें तो मनुष्यों की मनोवृत्ति के दृश्यरूप मात्र हैं। पुस्तकों से मनुष्यों के अन्तःकरण नहीं बने हैं किन्तु मनुष्यों के अन्तःकरणों से पुस्तकों का आविर्भाव हुआ है। मानवी अन्तःकरण का विकास ‘कारण’ और ग्रन्थ रचना उसका ‘कार्य’ है, ‘कारण’ नहीं। विवेचक बुद्धि की कसौटी पर रख कर यदि हम किसी कार्य को करेंगे तो उसमें धोखा नहीं उठाना पड़ेगा। धर्म को भी उस कसौटी पर परख लें तो उसमें हमारी हानि ही क्या है?
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(श्री स्वामी शिवानन्द जी, सरस्वती)
आपको अपने दोष जानने के लिये अन्तर्मुखी वृत्ति और सूक्ष्म बुद्धि रखनी चाहिये। शान्तिपूर्वक सुनसान कमरे में आँख मींचकर बैठ जाओ और मन की क्रियाओं को देखते रहो। अपने दोषों को दूर करने का ठीक उपाय जानना चाहिये। सदा मन को काम में लगाये रहिये। बराबर साधन करते रहिये। समय-समय पर जैसे सप्ताह में एक बार या महीने में एक बार अपनी उन्नति देखते रहना चाहिए और इसका ब्यौरा रखिये। यदि एक उपाय सरल नहीं हो तो दो उपायों को मिलाकर काम में लाना होगा।
सन्तोष, लगन, श्रद्धा, दृढ़ निश्चय की साधना में आवश्यकता होती है। इन सद्गुणों को पैदा करके बढ़ाना होगा। तभी सफलता हो सकती है। मार्ग में जो-जो कठिनाइयाँ आ जाती हैं उन्हें देखिये। इसलिये आध्यात्मिक मार्ग कठिन है। हजारों मनुष्यों में से एक ही इस मार्ग का अनुकरण करता है। यत्न करने वालों में बहुत कम ही सफल होते हैं। बहुत से मनुष्य आधे मार्ग में ही साधन छोड़ देते हैं क्योंकि आगे चलना उन्हें कठिन मालूम होता है। धैर्य और उत्साह युक्त साधक ही सच्चिदानन्द अवस्था को प्राप्त करते हैं, ऐसी आत्माओं को धन्य है।
जो काम नहीं पसन्द करता उसके करने की आज्ञा मन को दी जावे तो विद्रोह करने लगता है। प्यार से बहलाकर यदि समझाया जाय तो यह फौरन मान लेता है।
मन के साथ खींचातानी मत करो। इससे शक्ति क्षीण होती है। सत्य में रहो। विचार, ब्रह्म भावना और निदिध्यासन के द्वारा आत्मा में रहो। सारी बाधाएँ स्वयं ही नष्ट हो जावेंगी। विचार-उपाय की उपयोगिता इसके अभ्यास द्वारा समझ लो।
अपने मन और इन्द्रियों पर विश्वास मत करो। स्वयं अपने अंतर्जगत में खूब छान-बीन करो। स्त्री और धन आपके शत्रु हैं। ध्यान से देखो कि आप अध्यात्म मार्ग में उन्नति कर रहे हो, जहाँ थे वहाँ ही हो या पीछे हट रहे हो, आपका मन एकाग्र है या व्यस्त है। यदि मन में व्यग्रता है तो धैर्यपूर्वक उपयुक्त प्रयत्नों से इस व्यग्रता के कारणों को एक-एक करके दूर करना होगा।
जब कभी आपको बड़ी चिन्ता हो, मन में गिरावट हो, बड़ा दुःख हो तो विचार करो कि आप आनन्द के भण्डार आत्म स्वरूप हो। मन को संसारी वस्तुओं और विचारों से हटाकर आत्मा पर लगा दो। एकान्त स्थान में जाकर कहो ‘मैं आनन्दमय आत्मा हूँ। मुझे दुःख कैसे हो सकता है। दुःख तो मन का लक्षण है। मैं तो मन से ऊपर हूँ। आत्मा, आनन्द, शक्ति और ज्ञान का भण्डार है। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं शुद्ध चैतन्य, व्यापक चेतना हूँ जो इन सब रूपों के पीछे छिपी हुई हैं। मैं आत्मा हूँ। मैं आनन्द ही आनन्द हूँ।’ इस अभ्यास से आपको असीम आनन्द और बल प्राप्त होगा।
मन के स्वभाव को देखो इसका विश्लेषण करो। मन के तीनों दोष मल, विक्षेप और आवरण को दूर हटाओ। मन को पवित्र बनाकर स्थिर करो। इसे ईश्वर पर लगा दो। निरन्तर तीव्र विचार के अभ्यास से मन को ईश्वर में भुला दो। मनोनाश के साधन का अभ्यास करो। मन के भुलावे और लालच से ऊंचे उठ जाओ। यह आपका धर्म है। आपका जन्म ही इसके लिये हुआ है। और सारे धर्म तो अविद्या के कारण आपने स्वयं ही अपने ऊपर डाल लिये हैं।
तृष्णा को सन्तोष, उदासीनता और दान के द्वारा नाश करो। आशाएँ मत बनाओ। आपको कभी खेद नहीं होगा। मोक्ष राज्य के चार पहरेदारों में से एक सन्तोष है। सन्तोषी मन सदा तृप्त रहता है। यदि आपको सन्तोष होगा तो दूसरे तीन पहरेदार भी आपकी सहायता करेंगे। इन चारों की सहायता से आप ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हो।
इन तीन शब्दों को याद रखो :—
(1)पवित्र करना (2) एकाग्र करना और (3) मग्न कर देना-काम और क्रोधादि मलों से मन को शुद्ध कर लो। इच्छा रहित निःस्वार्थ बुद्धि से कर्म करो। इससे मन निर्मल हो जायगा। उपासना, प्राणायाम, त्राटक और चित्त वृत्ति-निरोध का अभ्यास करो। इससे मन को एकाग्र करने में सहायता मिलेगी। फिर निरन्तर गम्भीर ध्यान का अभ्यास करो। आखिर में मन मग्न हो जावेगा।
जल में शीतलता, अग्नि में तेज और वायु में गति किसने प्रदान की। यह इनके स्वभाव हैं। ऐसे ही मन का स्वभाव है वस्तुओं की ओर दौड़ना, बुद्धि का स्वभाव निश्चय करना, अहंकार का स्वभाव आत्मसंवेदन, चित्त का स्वभाव स्मृति है। जब आप अपनी छाया पर मिट्टी डालकर उसे दबाना चाहते हो तो छाया हमेशा ऊपर ही रहती है। इसी प्रकार जब आप संकल्पों को विवेक वृत्ति से नाश करने का यत्न करते हो तो वे बार-बार प्रकट हो जाते हैं। मन को वस्तुओं की ओर से हटा लो और अपने गुरु के वचनों के अनुसार चलो। मन को शुद्ध करके चिदाकाश में स्थिर करो। समय पाकर मन का क्षय हो जावेगा इसमें सन्देह नहीं है।
मोक्ष का अर्थ यह नहीं है कि समस्त संसारी कार्यों से भौतिक वियोग कर लिया जावे किन्तु इसका अर्थ ऐसी मानसिक स्थिति है जो सारी मलिन वासनाओं से राहत होकर संसारी वस्तुओं में सामान्य रूप से कार्य करता रहे। संसार में रहते हुये संसार के द्वारा ही ईश्वर प्राप्ति करनी चाहिये। गीता और योग वशिष्ठ का मुख्य उपदेश यही है।
मन की रुचि जिस वस्तु में विशेष हो उसे ही त्यागना चाहिये। यदि आप बैंगन या सेब ज्यादा पसन्द करते हैं तो पहले उनको ही छोड़ दो। आपको बहुत शान्ति, इच्छाशक्ति और मन का निग्रह प्राप्त होगा।
मन के सारे सुख केन्द्र नष्ट कर दो जैसे स्वादु वस्तुओं का बार-बार भोजन, ज्यादा गप-शप करना, सैर करना, गाना सुनना और स्त्रियों की संगति में रहना-इन सबको धीरे-धीरे सावधानी से छोड़ते चले जाओ, केवल तीन सात्विक सुख-केन्द्र बचाये रखो—आत्म ज्ञान सम्बन्धी पुस्तकों का स्वाध्याय, ध्यान और मनुष्य जाति की सेवा। जब ध्यान में उन्नति हो जाय तो सेवा और स्वाध्याय को भी कुछ काल के लिये छोड़ दो। जब निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाओ तो गीता का ज्ञान-यज्ञ प्रारम्भ करो अर्थात् दिव्य ज्ञान का उपदेश करो इसी का प्रचार करो और उसके लिये ही कार्य करो।
मन जिस काम को करना नहीं चाहता वही करो। मन जिस काम को करना चाहता हो उसे नहीं करो। मन के निग्रह और इच्छाशक्ति को बढ़ाने का एक उपाय यह है।
गौएँ अनेक रंग, शक्ल-सूरत की होती हैं परन्तु दूध वैसा ही होता है। यदि रीति, आचार, वेशभूषा और भोजन के भेद को निकाल दिया जाय तो संसार में सारे मनुष्य समान हैं। उसके भाव और भावनाएँ संसार भर में समान ही होती हैं। अनेकों देशों में भाषा की भिन्नता होती है परन्तु इन भाषाओं के पीछे छिपा हुआ विचार एक ही समान होती है। यदि भिन्नता, द्वैत और अनेकता में एकत्व है। निद्रा में एक रस होता है जिसका अनुभव सब समान रूप से करते हैं। निद्रा में नाना भाव नहीं होता। इसी प्रकार पदार्थों के पीछे भी एक ही सजातीय तत्व-आत्मा या ब्रह्म है यही आपका सच्चा स्वरूप है।
संसार की किसी वस्तु में भी सुख नहीं है। यह अज्ञान का विचार है कि हमको विषय पदार्थों से अथवा मन से सुख प्राप्त होता है। जब कभी हमें वासना तृप्ति का अनुभव होता है तो हम देखते हैं कि मन अपने अधिष्ठान आत्मा में लौट जाता है और आत्म सुख का आनन्द लेता है। इष्ट वस्तु की प्राप्ति करके मन अन्तर्मुख हो जाता है और आत्मानन्द प्राप्त कर लेता है।
अनेक प्रकार के घृणा और वैरभाव से दोष निकालना, चिढ़ाना, निरादर करना, असंगत आलोचना, बुरा बताना, झूठे किस्से फैलाना, पीछे निन्दा करना, छोटे से दोष को भी बहुत बढ़ा करके बताना और शिकायत करना—ये सब बातें निकलने लगती हैं। इसी से मनुष्य के मन की तुच्छता का पता लगता है। इन बातों को दूर कर देना चाहिये।
सदा प्रसन्न रहो। हँसते और मुस्कराते रहो। उदास मन ईश्वर का विचार ही कैसे कर सकता है। आपका स्वभाव ही प्रसन्नता है। इसे अनवसाद कहते है। सब साधकों को यह प्रसन्नता का स्वभाव बना लेना चाहिये।
मन में हर्ष का अतिरेक मत होने दो। जैसा पहले बता चुके हैं मन सदा सीमा का उल्लंघन करता है यह तो असीम उदासी या असीम प्रसन्नता ग्रहण करता है। ज्यादा खुशी में मन कभी शान्त नहीं हो सकता। मन को प्रसन्न और शान्त रहने दो। हर्ष और शोक के अतिरेक से ठेस लगने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।
गुरु वस्तुतः अपनी आध्यात्मिक शक्ति शिष्य को प्रदान करता है। एक विशेष आध्यात्मिक स्पन्दन गुरु की ओर से शिष्य के मन की ओर जाता है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति यथार्थ में स्वामी विवेकानन्द को दे दी थी। ईसामसीह ने भी अपने शिष्यों के साथ ऐसा ही किया था। समर्थ रामदास ने एक वेश्या पुत्री को जो उन पर मोहित हो रही थी इसी प्रकार शक्ति प्रदान की थी। उस पर दृष्टि जमा कर समाधि प्राप्त करा दी। उसकी कामवासना जाती रही। वह बहुत धार्मिक बन गई। एक महाराष्ट्र सन्त मुकुन्दराय ने बादशाह को समाधि प्राप्त करा दी थी।
बाह्य पदार्थों से मिलने वाला सुख क्षणभंगुर होता है। यह केवल नाड़ी संचालन और मानसिक भ्रम होता है। शरीर दुःख और रोग का स्थान है। धन उपार्जन करने और उसकी रक्षा करने में बड़ा कष्ट होता है। प्रत्येक संसर्ग से दुःख निकलता है। स्त्रियाँ निरन्तर चिन्ता देने वाली होती हैं। खेद है फिर भी मनुष्य आध्यात्मिक आनन्द-पथ को छोड़ कर संसार के दुःख-पथ पर जाना पसन्द करते हैं।
आप चाहे जिस योगमार्ग का अभ्यास करो आपको राग, द्वेष, अहंकारादि से रहित इंद्रिय-दमन करना चाहिये। चित्त शुद्धि और यम-नियम का पालन सारे योगों में समान रूप से आवश्यक है। कर्मयोग में मनुष्य क्या कर सकता है? यदि उसको आत्मसंयम नहीं है और वह अत्यन्त स्वार्थी है। यदि आप हर एक चीज अपने ही वास्ते चाहते हो तो आप दूसरों के लिए कोई चीज कैसे त्याग कर सकते हो। आप विश्व के साथ प्रेम, निःस्वार्थ सेवा और दान के द्वारा ही मिल सकते हो।
सच्चा त्याग मन के संयम में है। इसमें सारी कामनाओं और अहंकार का त्याग करना होता है संसार की सत्ता का नहीं। तब जीवन में अमृतत्व या अहंकार से रहित ब्रह्म में सबकी एकता पर स्थिर जीवन का असीम आनन्द प्राप्त होगा। केवल चित्त त्याग ही सबका त्याग कहलाता है। मन ही सब कुछ है और इसके संयम से सबका त्याग हो जाता है। इस प्रकार के मानसिक त्याग के द्वारा आप सारे दुःखों से मुक्त हो जाओगे।
संन्यास केवल मानसिक दशा है। वास्तव में तो मन को गेरुआ रंगने की आवश्यकता है, कपड़ों को नहीं। जो अहंकार और वासनाओं से रहित है जिसमें सारे सात्विक सद्गुण हैं वह यद्यपि संसार में परिवार के साथ भी रहता है तो भी वह सच्चा संन्यासी है। रानी चूणाला एक संन्यासिनी रानी थी यद्यपि वह राज्य का कार्य-भार सम्भालती थी। जो संन्यासी जंगल में रह कर भी वासनाओं से भरा हुआ है वह गृहस्थी और संसारी मूर्ख से भी गया बीता है। चाहे शिखिध्वज बरसों तक जंगल में नंगा रहता रहे तो भी वह संसारी ही बना रहेगा। बहुत से मनुष्यों ने सच्चे त्याग का मतलब नहीं समझा है। सारी वासनाओं अहंकार और काम का त्याग ही सच्चा त्याग है। यदि आपका मन निर्मल है आशक्ति, वासना और अहंकार से रहित है तो चाहे आप जंगल में रहें या शहर में, श्वेत वस्त्र पहनें या गेरुआ, सिर मुंड़वा लें या जटा बढ़ा लें आप संन्यासी ही हो।
मन की शुद्धि तब होगी जब सारी कामनाओं से हीन होकर सुख और दुःख में उदासीन रहें और कोई वस्तु इसको आकृष्ट न कर सके तब ही यह माया के फन्दे से दूर हो जायेगा। जैसे पिंजरे से निकला हुआ पक्षी जो इच्छानुसार आकाश में घूमता है। जब मन में वैराग्य उत्पन्न होता है तो ईश्वरीय ज्ञान के लिये द्वार खुल जाता है।
संसारी वस्तुओं के भोग से सच्ची स्थायी तृप्ति नहीं मिलती। यह जानकर भी कि संसारी पदार्थ अनित्य हैं और संसार दुःखपूर्ण है मनुष्य संसारी पदार्थों की ओर ही दौड़ते हैं। यही माया है। जब मन आत्मा में स्थिर हो जायगा तब ही नित्य तृप्ति मिलेगी क्योंकि आत्मा परिपूर्ण है। आत्मा में आपको सब कुछ मिल जाता है, आत्म साक्षात्कार से सारी इच्छाएँ तृप्त हो जाती हैं।
इस विद्रोही मन के निग्रह के सिवाय इस संसार में और कोई नौका नहीं है जिसके द्वारा जन्म-मरण के सागर को पार किया जा सके। जिन्होंने वासनाओं और कामनाओं से पूर्ण, मनरूपी सर्प का निग्रह कर लिया है केवल वही मोक्ष प्राप्त करेंगे।
विवेक की बुद्धि करके एकाग्र मन के द्वारा चंचल मन के भ्रमजाल का नाश कर दो जैसे लोहे से लोहा काटा जाता है। बुद्धिमान पुरुष मैले वस्त्र को मिट्टी से ही साफ करता है। घातक अग्नि अस्त्र का प्रति-घात वरुणास्त्र से होता है। सर्पदंश का विष दूसरे विष के इन्जेक्शन से ही दूर होता है। यही बात जीव के लिये भी सत्य है।
जो आपको ईश्वर से जुदा करता है वह मन है। इसको ॐकार चिन्तन या भक्ति के द्वारा हटा दो तो आपको ईश्वर का दर्शन हो जायगा।
(महात्मा गाँधी)
‘यज्ञ’ अर्थात् इस लोक या परलोक में बिना किसी प्रकार का बदला लिये या बदले की इच्छा किये परार्थ किया गया कोई भी काम। वह कायिक, वाचिक या मानसिक तीनों प्रकार का हो सकता है। काम या कर्म का यहाँ विशाल अर्थ करना चाहिये। ‘पर’ अर्थात् केवल मनुष्य वर्ग ही नहीं, पर जीवमात्र। इसलिए, एवं अहिंसा की दृष्टि से भी मनुष्य जाति की सेवा के लिए ही क्यों न हो, दूसरे जीवों की बलि चढ़ाना या नाश करना यज्ञ नहीं माना जा सकता। वेदादि में अश्व, गाय इत्यादि को बलि चढ़ाने का उल्लेख मिलता है। हम उसका खण्डन करते हैं। सत्य और अहिंसा की तराजू में, पशु-हिंसा के अर्थ में होम या यज्ञ चढ़ नहीं सकते। हमने इतने ही से संतोष माना है। धार्मिक कहे जाने वाले वचनों के ऐतिहासिक अर्थ लगाने के लिये हम नहीं कह सकते और ऐसे अर्थों की शोध करने की अपनी अयोग्यता को हम स्वीकार करते हैं। ऐसी योग्यता प्राप्त करने का प्रयत्न भी हम नहीं करते। क्योंकि ऐतिहासिक अर्थ जीव-हिंसा को पसन्द करता हो तो भी सत्य और अहिंसा को सर्वोपरि धर्म स्वीकार कर चुकने के बाद हमारे लिये वह आचार त्याज्य है, जो ऐसे अर्थ को पसन्द हो। उक्त व्याख्या की दृष्टि से विचार करने पर हम देख सकते हैं कि जिस कर्म से अधिक से अधिक जीवों का विशाल क्षेत्र में—व्यापक रूप से कल्याण हो, जो कर्म अधिक से अधिक सरलता के साथ किया जा सके, और जिससे अधिक से अधिक सेवा होती हो, वह महायज्ञ है—अथवा अच्छे से अच्छा यज्ञ है। अर्थात् किसी की भी सेवा के लिये दूसरे किसी का अकल्याण चाहना या करना, कदापि यज्ञ कार्य नहीं। और यह बात तो भगवद्गीता तथा अनुभव दोनों हमें सिखाते हैं कि यज्ञ व्यतिरिक्त कर्म-बन्धन है। ऐसे यज्ञ के बिना यह जगत् एक क्षण भी नहीं टिक सकता। इसलिए गीताकार ने दूसरे अध्याय में ज्ञान की थोड़ी झाँकी कराने के बाद तीसरे अध्याय में उसकी प्राप्ति के साधनों का दिग्दर्शन कराया है, और स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि जन्म से ही हम यज्ञ को अपने साथ लाये हैं—अर्थात् हमें यह देह केवल परमार्थ के लिए मिली है, और इसलिए जो बिना यज्ञ किये जीमताडडडडड है, वह चोरी का अन्न खाता है। गीताकार ने अपना यह कठोर निर्णय दिया है। शुद्ध जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखने वाले के समस्त कार्य यज्ञ रूप होने चाहिये। हम यज्ञ को साथ लेकर पैदा हुए हैं—अर्थात् सदा के ऋणी हैं, देनदार हैं। अतः हम जगत के सदा के सेवक—गुलाम हैं और जैसे गुलाम को उसका स्वामी सेवा के बदले में अन्न वस्त्रादि देता है, वैसे ही हमें जगत् का स्वामी हमारी सेवा के बदले या हम से सेवा लेने के कारण जो अन्न वस्त्रादि दे उसे हम आभार पूर्वक ले लें। इतने के भी हम हकदार हैं, ऐसा न मानें, अर्थात् न मिलने पर स्वामी को बुरा भला न कहें। यह शरीर उसका है, वह अपनी इच्छानुसार इसे रखे या नष्ट करे। यह स्थिति न तो दुःखद है, न दयनीय। यदि हम अपना स्थान समझ लें तो स्वाभाविक है और इसीलिए सुखद तथा वाञ्छनीय भी। इस परमसुख का अनुभव करने के लिये अविचल श्रद्धा की आवश्यकता है ही। मैंने तो सब धर्मों में यही आदेश पाया है कि अपनी चिन्ता ही न करनी—सब परमेश्वर के भरोसे छोड़ देना।
पर इस वचन से डरने का किसी के लिए कारण ही नहीं है। जो मन साफ रखकर सेवा का आरम्भ करता है, उसे उसकी आवश्यकता दिन-प्रतिदिन स्पष्ट होती जाती है और वैसे-वैसे उसकी श्रद्धा भी बढ़ती जाती हैं। जो स्वार्थ छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं, उसके लिए अलबत्ता सेवा मार्ग कठिन है। उसकी सेवा में स्वार्थ की गन्ध आया ही करेगी। पर दुनिया में ऐसे स्वार्थी बिरले ही पाये जायेंगे। हम सब कुछ न कुछ निःस्वार्थ सेवा तो जाने-अनजाने करते ही हैं। इसको हम विचारपूर्वक करने लगें तो हमारी सेवा-वृत्ति—परमार्थिक सेवा-वृत्ति, उत्तरोत्तर बढ़ती ही जायगी—इसी में हमारा सच्चा सुख और संसार का कल्याण है।
जिस वस्तु को जन्म से साथ लेकर हमने इस जगत में प्रवेश किया है, उसका कुछ और विचार करना निरर्थक न होगा। यह सोचते हुए कि यज्ञ नित्य का कर्त्तव्य है, चौबीसों घण्टे आचरण करने की चीज है, और यह जानते हुए कि यज्ञ का अर्थ सेवा है, ‘परोपकाराय सताँ विभूत्यः, जैसा वचन खटकता है। निष्काम सेवा परोपकार नहीं, अपना उपकार है। जैसे कर्ज अदा करना परोपकार नहीं, बल्कि निज की सेवा है, अपना उपकार है। अपने सिर का बोझ हलका करना है, अपने धर्म को निभाना है। दूसरे, यह कि सन्त की ही पूँजी—विभूति—’परोपकार के लिए’ अर्थात् अधिक उपयुक्त शब्दों में ‘सेवा के लिए’ है, ठीक नहीं, बल्कि मनुष्य की पूँजी मात्र सेवा के लिए है। और यही बात है तो जीवन मात्र से भोग का उच्छेद हो जाता है और यह त्यागमय बनता है, अथवा त्याग को ही भोग समझता है। मनुष्य का त्याग ही उसका भोग है। यह है पशु और मनुष्य के बीच का भेद। बहुतेरे लोग इस पर यह आपत्ति करते हैं कि जीवन का ऐसा अर्थ करने से जीवन शुष्क बन जाता है, कला का नाश हो जाता है। इसी कारण वे उक्त विचार को दोषपूर्ण मानते हैं। पर मेरे विचार में ऐसा कहने में त्याग का अनर्थ होता है। त्याग का अर्थ संसार से भागकर अरण्यवास करना नहीं, बल्कि जीवन की समस्त प्रवृत्ति में त्याग की भावना का होना है। गृहस्थ-जीवन त्यागमय भी हो सकता है और भोगमय भी। मोची के जूते बनाने में, किसान के खेती करने में, व्यापारी के व्यापार में और नाई के हजामत बनाने में त्याग की भावना हो सकती है, अथवा भोग की लालसा। यथार्थ व्यापार करने वाला करोड़ों का व्यापार करता हुआ भी लोक सेवा का ही विचार करेगा। वह किसी को धोखा न देगा, सट्टेबाजी न करेगा, न उठाने योग्य जोखिम नहीं उठावेगा और करोड़ों का स्वामी होते हुए भी सादगी से रहेगा। करोड़ों की कमाई करते हुए भी वह किसी का नुकसान नहीं करेगा किसी का नुकसान होता होगा तो करोड़ों पर लात मार देगा। कोई मेरी इस बात को काल्पनिक समझकर हँसे नहीं। संसार के सौभाग्य से ऐसे व्यापारी पश्चिम में भी हैं और पूर्व में भी। भले ही इनकी संख्या उंगली पर गिने जाने योग्य हो। पर एक भी जीवित उदाहरण के रहते हुए ऐसा व्यापारी काल्पनिक नहीं रह जाता। ऐसे दरजी को तो हमने बढ़वाण (काठियावाड़ एक देशी राज्य की राजधानी) में ही देखा है। ऐसे एक नाई को मैं जानता हूँ और ऐसे जुलाहे को हम में से कौन नहीं जानता? विचार करने और शोध करने से हमें सब धन्धों में केवल यज्ञार्थ जीवन बिताने वाले और अपना धन्धा करने वाले लोग दिखाई पड़ेंगे। यह सच है कि ऐसे याज्ञिक अपना धन्धा करते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं। पर वे आजीविका के लिए धन्धा नहीं करते। आजीविका तो उनके लिए उक्त धन्धे का गौण फल है। मोतीलाल पहले भी दरजी था और ज्ञान के होने पर भी दरजी ही रहा। उसकी भावना बदल गई, इससे उसका धन्धा यज्ञ रूप बना। उसमें पवित्रता ने प्रवेश किया। उस धन्धे में दूसरे के सुख का विचार समाया, तब उसके जीवन में कला ने प्रवेश किया। यज्ञमय जीवन कला की पराकाष्ठा है। सच्चा रस ही उसमें है क्योंकि उसमें से इसके नित नये झरने झरते हैं। मनुष्य उसे पीते हुए थकता नहीं, झरने कभी सूखते नहीं। जो यज्ञ बोझ रूप लगे, वह यज्ञ नहीं, खटके वह त्याग नहीं। भोग का परिणाम नाश है। त्याग का फल अमरता। रस स्वतन्त्र वस्तु नहीं। रस हमारी वृत्ति में है। एक को नाटक के पदों में मजा आवेगा, दूसरे को आकाश में जो नित नये परिवर्तन रहते हैं, उसमें मजा आवेगा। अर्थात् रस तालीम या अभ्यास का विषय है। बचपन में रस के रूप में जिनका अभ्यास कराया जाता है, रस के रूप में जिनकी तालीम जनता लेती है, वे रस माने जाते हैं। एक राष्ट्र या प्रजा को जो रसमय प्रतीत होता है, वह दूसरे राष्ट्र या दूसरी प्रजा को रसहीन लगता है। इसके उदाहरण हमें मिल सकते हैं।
यज्ञ करने वाले बहुतेरे सेवक यह मानते हैं कि हम निष्काम भाव से सेवा करते हैं, इसलिए लोगों से जो चाहिये वह और जिसकी जरूरत नहीं है, वह भी लेने का परवाना मिल गया है, यह विचार जिस सेवक के मन में जिस वक्त आता है, तभी से वह सेवक मिटकर सरदार बनता है। सेवा में अपनी सुविधा के विचार को कोई स्थान ही नहीं है। सेवक की सुविधा को देखने वाला स्वामी—ईश्वर—है। उसे जो सुविधा देनी होगी, वह देगा। यह सोचकर सेवक को चाहिये कि जो मिले उसे, अपना समझ कर बैठ न जाय, बल्कि जितनी आवश्यकता है, उतना ही ले और बाकी का त्याग करे। अपनी सुविधा की रक्षा न होने पर भी ऐसा सेवक शान्त रहेगा, रोष-रहित रहेगा, मन में भी नहीं झुँझलाएगा। याज्ञिक का बदला सेवक की मजदूरी, यज्ञ-सेवा ही है। उसे उसी में सन्तोष होगा।
साथ ही सेवा-कार्य में बेगार कदापि नहीं टाली जा सकती, उसे आखिरी स्थान नहीं दिया जा सकता। अपनी चीज को सजाना और दूसरे की उपेक्षा करना अथवा मुफ्त में करना है, इसलिए जैसा और जब करेंगे तो भी काम चलेगा, इस तरह के विचार करने वाला या ऐसा आचरण करने वाला यज्ञ के मूलाक्षर भी नहीं जानता। सेवा में तो शृंगार सजाने होते हैं, अपनी समस्त कला उसमें उड़ेलनी होती है, वह है पहली चीज, और बाद में है अपनी सेवा। साराँश यह की शुद्ध यज्ञ करने वाले का अपना कुछ भी नहीं है, उसने सब कृष्णार्पण किया होता है।
(श्री अगर चन्द, नाहटा)
मनुष्य में किसी भी गुण व दोष की प्रकर्षता होती है तो उसके अनुसंगिक इतर गुण दोष स्वयं उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए ‘एक ही साधे, सब सधे’ उक्ति कही गई है।
वैसे प्रत्येक मनुष्य बहुत से गुण व दोषों का पिटारा है। किसी भी व्यक्ति में सभी गुण ही गुण हो या दोष ही दोष हों, गुण कुछ भी न हों ऐसा प्रायः नहीं होता, पर एक को प्रधानता देने से दूसरा दब जाता है, महत्वहीन हो जाता है। इसीलिए प्रत्येक मानव को कम से कम एक गुण को तो बहुत अच्छी मात्रा में पनपाने का लक्ष्य रखना व प्रयत्न करना चाहिए।
गुण चाहे एक ही हो व अच्छी व अधिक मात्रा में हो तो उसका प्रभाव बहुत पड़ता है और उसके कारण दूसरे, अनेक दूषण दबे हुए रहते हैं या लोग उनको दस गुना कर लेते हैं। इसी प्रकार कोई एक भी दुर्गुण जब जीवन में जोर पकड़ लेता है तो उसके अन्य बहुत से गुण दब जाते हैं—महत्वहीन व हृतप्रभाव हो जाते हैं अर्थात् जिस किसी एक भी गुण व दोष का जीवन में विशिष्ट स्थान हो जाता है तो वही उभरा हुआ सहज दृष्टिगोचर होता है दूसरे छोटे मोटे गुण-दोष तिरोभूत से पड़े रहते हैं। लोग विशिष्ट गुण-दोष को प्रधानता देकर उनसे अपना व्यवहार चलाते हैं। एक गुण के पीछे कई दोष निभा लिए जाते हैं।
प्रत्यक्ष जीवन में हम इस सत्य का अनुभव पद-पद पर करते ही रहते हैं। एक ही परिवार के विभिन्न व्यक्तियों में किसी में कोई गुण अच्छे परिणाम में होता है तो किसी में कोई अवगुण वैसे ही उत्कृष्ट मात्रा में होता है। ऐसी परिस्थिति में साधारणतया हम गुण को प्रधानता देते हैं, दोषों को दरगुजर कर लिया जाता है। जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग देखने को मिलते हैं कि एक कर्मचारी बड़ा तुनक मिज़ाज का होता है पर ईमानदार या किसी कार्य में विशेष दक्ष होता है तो उसके गुण से लाभ उठाने के लिए उसके स्वभाव व व्यक्तिगत दोष निभा लिए जाते हैं। वैसे ही अन्य बातों में तो एक व्यक्ति बहुत ठीक हो पर कोई स्वभाव व चरित्रगत दोष उसमें पड़ा हो तो उस व्यक्ति को अलग कर देना पड़ता है। हम प्राय कहा करते हैं कि अमुक बातें ठीक होने से क्या? यह अवगुण जो बड़ा लगा हुआ है। इससे कभी बड़ा नुकसान होना सम्भव है अतः ऐसे दोष पहले से ही दूर कर दिया जाना उचित है।
कुछ वर्ष पूर्व शान्ति निकेतन के आचार्य, सन्त साहित्य के विशिष्ट अनुभवी श्री क्षिति मोहन सेन से मिलने पर आध्यात्मिक साधना व आत्मानुभव प्राप्ति का उपाय पूछने पर आपने कहा था कि मनुष्य आत्मानुभव तथा आत्मसाक्षात्कार इसीलिए नहीं कर पाता कि वह जितनी बातें करता है वैसी साधना नहीं करता। अन्यथा किसी भी एक धर्म की साधना अच्छे रूप से की जाय तो बाकी के गुण भी स्वयं भी विकसित होते रहेंगे व दोष क्रमशः क्षीण होते चले जायेंगे। ‘एक ही साधे सब सधे’ आप जैन हैं अहिंसा जैन धर्म का प्रधान उपदेश है उसी की ठीक से साधना करिये। जीवन में प्रतिक्षण होने वाली हिंसा भावना व कार्य को टटोलकर उसे दूर हटाइये और विश्व प्रेम, प्राणी मात्र के साथ आत्मीय भाव की अभिवृद्धि, अहिंसा तत्व, भावों की निर्मलता करते रहिये, आप इस एक ही गुण की साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा। एक गुण की प्रकर्षता से अन्य गुण भी खींचे हुए चले आयेंगे अन्यथा बहुत से साधन बतलाने पर भी उसे जीवन में नहीं उतारेंगे तो कोई लाभ नहीं होने वाला है। ऐसी ही भावना के कुछ शब्द कह कर वे अपने कार्य में लग गये। विचार करने पर उन्होंने इन थोड़े से शब्दों में ही बहुत बड़ी बात कह दी प्रतीत हुई कि उसके लिए अपनी तैयारी कहाँ?
इस बार उसी सत्य को पुनः एक साधु से सुन कर इस लेख के लिखने का विचार हो आया। स्वयं उसकी साधना न करने पर भी दूसरे जिज्ञासु व साधक तो उस साधना से लाभ उठावें। इसी अन्तः प्रेरणा से यहाँ उन साधु महात्मा से इस सम्बन्ध में जो बातचीत हुई नीचे उद्धृत की जाती हैं।
इन महात्मा का नाम लक्ष्मणगिरि है। इनकी आयु इस समय 64 वर्ष की है। 40 वर्ष पूर्व वे साधु हो गये थे। उनके कहने से विदित हुआ कि वे पढ़े लिखे तो अधिक नहीं पर बहुत से साधुओं के संपर्क में आने से अनुभव ठीक है। अभी वे आसामवर्ती बदरपुर के शिव मन्दिर के सेवायत हैं। सिलचर की शिवबाड़ी की भी व्यवस्था उनके हाथ में आई है उसी प्रसंग से वे सिलचर आये थे वापिस बदरपुर जाते सिलचर स्टेशन पर गाड़ी में उनसे मिलना हुआ। वे बदरपुर जा रहे थे और मैं गौहाटी जा रहा था। पहले दार्शनिक विषयों पर बातचीत प्रारम्भ हुई। फिर आपने प्राणीमात्र की दया पर विशेष महत्व देते हुए परोपकार-सेवा को ही अपना जीवनवृत्त बतलाया। अन्त में आत्म साक्षात्कार के सम्बन्ध में पूछने पर आपने कहा कि साधक के लिए यह बहुत सुगम है वैसे साधारण लोगों के लिये दुर्गम है ही। मैंने उसका सरल उपाय पूछा तो आपने कहा कि सत्य की साधना कीजिए। इससे भूमिका यानी चित्त शुद्धि हो जायगी व वृत्त उपवास के द्वारा शरीर शुद्धि हो जायगी फिर रास्ता स्वयं सूझ पड़ेगा। इस पर भी आगे का मार्ग जानना हो तो इसकी साधना कर लेने के बाद मेरे से पत्र व्यवहार करिये या स्वयं मिलियेगा। मैंने पीछे की बात पहले ही पूछ लेने की उत्सुकता दिखाई तो आपने पुनः पहली बात को दुहराया और सत्य की साधना पर ही जोर दिया। पीछे की बात पीछे ही होगी।
उन्होंने उस सत्य साधना करने की विधि इस प्रकार बतलाई कि पहले महीने में दो दिन किसी पर्व तिथि को ही इसकी साधना शुरू करें। उस दिन व्रत उपवास किया जाय और दृढ़ निश्चय किया जाय कि आज किसी भी प्रकार का तनिक भी झूठ नहीं बोलूँगा। उसी निश्चय को ध्यान में रखते हुए सचेत रहकर व्यवहार करिये।
यदि उसके विपरीत झूठ शब्द मुँह से निकल जाय तो उसी समय उसका पश्चाताप करिये। सन्ध्या काल एकान्त में दिन भर की चर्या को ध्यान से विचार कीजिए, प्रतिज्ञा में कहीं गड़बड़ी तो नहीं हुई है? यदि कुछ हो गई ध्यान में आवे तो उसके लिए कठिन दण्ड लीजिए। प्रिय से प्रिय खाद्य पदार्थ आदि को छोड़ दीजिए या 2-4 उपवास मुक्ति के लिये कर डालिये इससे झूठ छटती या मन्द होती चली जायगी। विचारपूर्वक अन्तः निरीक्षण करने पर जिस साधारण असत्य की ओर आपका लक्ष्य नहीं जाता वह भी सामने आ जायगा और उससे छुटकारा पाने की व्याकुलता बढ़ेगी। सत्य के प्रति निष्ठा और झूठ को छोड़ने की दृढ़ प्रतिज्ञा एक ही बात है—ये दोनों साथ-साथ होते हैं। साधना में जो विघ्न बाधा आवे, धैर्य से सहिये, विचलित न होइये।
जब महीने में दो दिन आपकी सत्य साधना ठीक से हो रही है अनुभव हो जाय तो फिर दो दिन और बढ़ाइये। वह भी ठीक से निभ जाय तो महीने में छः दिन कर दीजिये। फिर तो सत्य आपका स्वभाव ही बन जायगा। झूठ अपने आप भाग जायगा। कमजोरियाँ नष्ट हो जायेंगी। तेज प्रकटेगा।
सत्य के लाभ प्रत्यक्ष व सर्वविदित हैं। इसकी महिमा को सब जानते हैं पर जीवन में उतारते नहीं तभी हम धर्म से कोसों दूर हैं -तेजहीन हैं।
सत्य को नारायण मान कर ही “सत्यनारायण व्रत” को महत्व दिया गया है। साधना करने से इसका प्रभाव स्वयं विदित होगा व आगे का मार्ग चित्तशुद्धि व निर्मलता बढ़ने से स्वयं दीखने लगेगा।
उनके चले जाने पर मैं इस पर काफी देर तक विचार करता रहा। मुझे मानों हजारों ग्रन्थों का सार ही मिल गया। महात्मा गाँधी ने अपने जीवन को सत्य प्रयोग स्वरूप बतलाया है व सत्य को ही ईश्वर कहा है। महर्षियों ने भी ‘सत्य ही परमं तपः, सत्यमेव जयते’ सत्यं हि परम तप है इत्यादि कहा है। सत्य की साधना जीवन को ऊंचा उठाती है परमेश्वर बनाती है। अन्त में महात्मा गाँधी के सत्य सम्बन्धी विचार गाँधी विचार दोहन से उद्धृत किये जाते हैं जिनसे सत्य महत्व-सत्य क्या है? संक्षेप में विदित हो जाता है।
1—”सत्य का अर्थ है परमेश्वर-यह सत्य का ‘पर’ अथवा ऊंचा अर्थ हुआ ऊपर अथवा साधारण अर्थ में सत्य के माने हैं सत्य विचार सत्य वाणी और सत्य कर्म।
2—जो सत्य है, दूर का हिसाब लगाने से, हितकर अथवा भला है। इसलिए सत्य अथवा सत् का भला ही होता है, और जो विचार वाणी और कर्म सत्य है वही सद्विचार-सद्वाणी और सत्कर्म है।
3—जो विचार हमारी राग-द्वेषहीन श्रद्धा और भक्ति युक्त तथा निष्पक्ष बुद्धि को सदैव के लिए अथवा जिन परिस्थितियों तक हमारी दृष्टि पहुँच सकती है उनमें अधिक से अधिक सफलता के लिए उचित और न्याय प्रतीत हो वही हमारे लिए सद्विचार है।
4—जो वाणी कर्त्तव्य रूप हो जाने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही-सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमी वेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्य वाणी है।
5—विचार में जो सत्य प्रतीत हो उसके विवेकपूर्वक आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।
6—चाहे यह कहिये कि पर सत्य को जिसे हमने परमेश्वर कहा है, जानने के लिये यह अपर सत्य साधन है, अथवा यह कहिए कि सत्य विचार वाणी और कर्म की-अपर सत्य पालन की पूर्ण सिद्धि का ही नाम- परमेश्वर का साक्षात्कार है, साधक के लिए दोनों में कोई भेद नहीं है।”
आज हमारे जीवन में पद-पद पर असत्य प्रतिष्ठित है। कहते हैं कुछ, विचार कुछ हैं, करते कुछ हैं इसी से जीवन पतन की ओर प्रवाहित है इनकी एकता होना आवश्यक है। असत्य की रक्षा के लिये हजारों झूठ अपनाने पड़ते हैं, अतः सत्य को ही अपनाइए इससे आत्मा का उत्थान निश्चित है।
(पं. माधव राव सप्रे, बी. ए.)
सम्भाषण में सबसे बड़ा अवगुण पर-निन्दा करना है। परनिन्दक मनुष्यों की दशा ठीक उस पागल मनुष्य की तरह होती है जिसके हाथ में एक तलवार दे दी जाती है और जो किसी भी मनुष्य को मारने में नहीं हिचकता। निन्दा करने वाले प्रत्येक मनुष्य में कुछ भी नैतिक साहस नहीं रहता। वह प्रत्यक्ष में कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखता। वह उस कायर शत्रु के समान है जो छिपकर वार करना चाहता है। सिवा इसके दूसरों की निन्दा करने में यह भी एक नुकसान है कि वह मनुष्य, जिसकी निन्दा की जाती है अपना दुश्मन बन बैठता है। जो मनुष्य यह समझते है कि हम जब दूसरों की जब निन्दा किया करते हैं तब वह बात उसके कानों तक नहीं पहुँचती, वे बड़े मूर्ख हैं। ऐसा होना असम्भव है। दूसरों की तुम हजार तारीफ करो, परन्तु यह बात उसके कानों तक नहीं पहुँचेगी, परन्तु जब तुमने किसी की निन्दा की तब याद रखो यह बात उसे हवा के द्वारा मालूम हो जायगी। इस तरह से जिन-जिन मनुष्यों की निन्दा की जाती है वे सब दुश्मन बन जाते हैं और अन्त में निन्दा करने वाले मनुष्य की दशा ठीक वैसी ही हो जाती है जैसी कि किसी फुटबाल की जो कि एक जगह से लात खाकर दूसरी, और दूसरी से तीसरी जगह चली जाती है। इसलिए पर-अवगुण-अन्वेषण करते रहने और दूसरों को तीर के समान तीखी बातों के मारने से चुप रहना अच्छा है। जहाँ तक हो सके मुँह की अपेक्षा, आँखों से, अधिक काम लेना चाहिए।
समयानुकूल बात करना और सम्भाषण चातुरी का होना भी परमावश्यक है। जो काम अधिक द्रव्य से या शक्ति प्रयोग से भी नहीं हो सकता, वह काम मौके की बात कहने से सहज ही में हो जाता है। पाठकों को मालूम होगा कि अकबर का मन्त्री बीरबल अपनी सभा चातुरी के कारण कैसे-कैसे अनहोने तथा कष्टसाध्य कामों को क्षणभर में कर सकता था।
(1) जिस तरह से तुम अच्छी किताबों को केवल अपने लाभ के लिए चुनते हो उसी तरह से साथी या समाज भी ऐसा चुनो जिससे कि तुम्हें कुछ लाभ हो। सबसे अच्छी किताब और अच्छा मित्र वही है कि जिससे अपना किसी तरह से सुधार हो अथवा आनन्द की वृद्धि हो। यदि उन साथियों से तुम्हें कुछ लाभ नहीं हो सकता तो तुम उनके आनन्द और सुधार की वृद्धि करने का प्रयत्न करो। और यदि उन साथियों से तुम कुछ लाभ नहीं उठा सकते या उनको तुम स्वयं कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकते तो तुम तुरन्त उनका साथ छोड़ दो।
(2) अपने साथियों के स्वभाव का पूरा ज्ञान प्राप्त करो। यदि वे तुम से बड़े हैं तो तुम उनसे कुछ न कुछ पूछो और वे जो कुछ कहें उसे ध्यानपूर्वक सुनो। यदि छोटे हैं तो तुम उनको कुछ लाभ पहुँचाओ।
(3) जब परस्पर की बातचीत नीरस हो रही हो तो तुम कोई ऐसा विषय छेड़ दो जिस पर सभी कुछ न कुछ बोल सकें और जिससे सभी मनुष्यों की आनन्द वृद्धि हो। परन्तु तब तक ऐसा करने के अधिकारी नहीं हो जब तक तुमने नया विषय आरम्भ करने के पहले कुछ न कुछ नए विषय का ज्ञान न प्राप्त कर लिया हो।
(4) जब कुछ नयी महत्वपूर्ण अथवा शिक्षाप्रद बात कही जाय तब उसे अपनी नोटबुक में दर्ज कर लो उसका सार अंश रखो और कूड़ा कचरा फेंक दो।
(5) तुम किसी भी समाज में अथवा साथियों के संग आते-जाते समय पूरे मौनव्रती मत बनो। दूसरों को खुश करने का और उनको शिक्षा देने का प्रयत्न अवश्य करो। बहुत सम्भव है कि तुमको भी बदले में कुछ आनन्दवर्धक अथवा शिक्षाप्रद सामग्री अवश्य मिल जायगी। जब कोई कुछ बोलता हो तो तुम आवश्यकता पड़ने पर भले ही चुप रहा करो परन्तु जब सब लोग चुप हो जाते हैं तब तुम सबों की शून्यता को भंग करो। सब तुम्हारे कृतज्ञ होंगे।
(6) किसी बात का निर्णय जल्दी में मत करो, पहले उसके दोनों पक्षों का मनन कर लो। किसी भी बात को बार-बार मत कहो।
(7) इस बात को अच्छी तरह से याद रक्खो कि तुम दूसरों की त्रुटियों-दोषों को जिस दृष्टि से देखते हो वे भी उसको उसी दृष्टि से नहीं देखते। इसलिए समाज के सम्मुख किसी मनुष्य के दोषों पर स्वतन्त्रतापूर्ण आक्षेप, कटाक्ष अथवा टीका-टिप्पणी करने का तुमको सदैव अधिकार नहीं है।
(8) यदि अहंकारपूर्ण, आत्मप्रशंसक अथवा शेखचिल्ली मनुष्यों से काम पड़ जाय तो उनको तुम कुछ कड़े शब्दों में समझा सकते हो। इससे यदि वे न मानें तो चुप रहो। यदि इसका भी कुछ असर न हो तो उनसे दूर हट जाओ।
(9) बातचीत करते समय अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने का व्यर्थ प्रयत्न मत करो। यदि तुम बुद्धिमान् हो तो तुम्हारी, बातों से मालूम हो सकता है। यदि तुम प्रयत्न करके हमेशा अपनी बुद्धिमानी प्रकट करना चाहोगे तो सम्भवतः तुम्हारी बुद्धिहीनता अधिकाधिक प्रकट होती जायगी।
(10) किसी की बात यदि तुम्हें अपमानजनक या किसी तरह से गुस्ताखी की मालूम हो तो भी कुछ देर तक चुप रहने का प्रयत्न करो। ऐसा भी हो सकता है कि वह बात तुम्हारे स्वभाव के कारण तुम्हें खराब मालूम हो, परन्तु सब लोगों को अच्छी मालूम हो। और यदि बात ऐसी ही हुई तो तुम्हें कुछ देर तक चुप रहने के लिए कभी भी पछताना नहीं पड़ेगा, बल्कि तुम धैर्य का एक नया पाठ सीखते जाओगे।
(11) तुम स्वयं स्वतन्त्रतापूर्वक तथा सरलतापूर्वक बातचीत करो और दूसरों को भी ऐसा ही करने दो। अमूल्य शिक्षा को अल्प समय में प्राप्त करने का इससे बढ़कर साधन संसार में नहीं है।
(12) बातचीत करने का सबसे अधिक महत्वपूर्ण नियम यह है कि सदैव बोलने का प्रयत्न करो और जो कुछ बोलो उसे शान्त और नम्रता के साथ। मृदु भाषण में जादू की शक्ति होती है।
अब हम अपने प्रिय पाठकों को उसी कही हुई बात को एक बार फिर भी बतला देना चाहते हैं, कि सम्भाषण-शक्ति ईश्वर की एक अमूल्य देन है, जिसका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करने के अधिकारी और जिम्मेदार हमीं हैं। इसी शक्ति के सदुपयोग से हमारे जीवन की आँशिक सार्थकता है। अतएव हमें सदैव इस शक्ति को स्वस्थ तथा मार्जित अवस्था में रखने का प्रयत्न करना चाहिये।
(श्री काका कालेलकर)
अपने जीवन को शुद्ध और समृद्ध बनाने की प्रार्थना जिन्होंने की है, वे अनुभव से कहते हैं कि आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः”। इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते हैं, क्योंकि सत्व के दो माने हैं—शरीर का संगठन और चारित्र्य। अगर आहार शुद्ध है, याने अच्छा है, ताजा है, परिपक्व है, सुपाच्य है, प्रमाणयुक्त और उसके घटक परम्परानुकूल हैं तो उसके सेवन शरीर के रक्त मज्जा, शुक्र आदि सब घटक शुद्ध होता हैं। वात, पित्त, कफ आदि की मध्यावस्था रहती है और सप्तधातु परिपुष्ट होकर शरीर निरोगी, सुदृढ़, कार्यक्षम तथा सब तरह के आघात सहन करने के योग्य बनता है और इस आरोग्य का मन पर भी अच्छा असर होता है।
“आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः” का दूसरा और सार्थक अर्थ यह है कि आहार अगर प्रामाणिक है, हिंसाशून्य है, द्रोहशून्य है और यज्ञ; दान, तप की अदा करने के बाद प्राप्त किया है तो उससे चारित्र्य शुद्धि को पूरी-पूरी मदद मिलती है। चारित्र्य शुद्धि का आधार ही इस प्रकार को आहार शुद्धि है।
अगर यह बात सही है, आहार का चरित्र पर असर है, तो विहार का यानी लैंगिक शुद्धि का चरित्र पर कितना असर हो सकता है, उसका मन कठिन नहीं होना चाहिए।
जिसे हम काम विकार कहते हैं अथवा लैंगिक आकर्षण कहते हैं, वह केवल शारीरिक भावना नहीं मनुष्य के व्यक्तित्व के सारे-के सारे पहलू उसमें लुप्त हो जाते हैं; और अपना-अपना काम करते हैं। इसीलिए जिसमें शरीर, मन, हृदय की भावनाएं आध्यात्मिक निष्ठा—सबका सहयोग अपरिहार्य है, प्रकृति का विचार एकाँगी दृष्टि से नहीं होना चाहिए। जीवन के सर्वभौम और सर्वोत्तम मूल से ही उसका विचार करना चाहिए। जिस आचरण में शारीरिक प्रेरणा के वश होकर बाकी सब तत्वों का अपमान किया जाता है, वह आचरण समाज द्रोह तो करता ही है, लेकिन उससे भी अधिक अपने व्यक्तित्व का महान द्रोह करता है।
लोग जिसे वैवाहिक प्रेम कहते हैं, जिसके तीन पहलू हैं। एक भोग से सम्बन्ध रखता है, दूसरा प्रजातन्तु से और तीसरा भावना की उत्कटता से, पहला प्रधानतया शारीरिक है, दूसरा मुख्यतः सामाजिक और तीसरा आध्यात्मिक। यह तीसरा तत्व सबसे महत्व का सर्वभौम है और उसी का असर जब पहले दोनों के ऊपर पूरा-पूरा पड़ता है, तभी वे दोनों उत्कट, तृप्तिदायक और पवित्र बनते हैं।
इन तीन तत्वों में से पहला तत्व बिल्कुल पार्थिव होने से उसकी स्वाभाविक मर्यादाएँ भी होती हैं। भोग से शरीर क्षीण होता है। अति सेवन से भोग शक्ति भी क्षीण होती है, और भोग भी नीरस हो जाते हैं। भाग में संयम का प्रमाण जितना अधिक होगा उतनी ही अधिक उसकी उत्कटता होगी। भोग में संयम का तत्व अपनाने से ही उसमें आध्यात्मिकता आ सकती है। संयम पूर्ण भोग से ही निष्ठा और परस्पर आदर टिक सकते हैं और संयम और निष्ठा के बिना वैवाहिक जीवन का सामाजिक पहलू कृतार्थ हो ही नहीं सकता।
केवल लाभ-हानि की दृष्टि से देखा जाय तो भी वैवाहिक जीवन का परमोत्कर्ष संयम और अन्योन्य निष्ठा में ही है। भोग तत्व पार्थिव है और इसीलिए परिमित है। भावना तत्व हार्दिक और आत्मिक होने से उनके विकास की कोई मर्यादा ही नहीं है।
आजकल के लोग जब कभी लैंगिक नीति को स्वच्छन्द का पुरस्कार कहते हैं, तब वे केवल भोग प्रधान पार्थिव अंश को ही ध्यान में लेते हैं। जीवन की इतनी क्षुद्र कल्पना वे ले बैठे हैं कि थोड़े ही दिनों में उन्हें अनुभव हो जाता है कि ऐसी स्वतन्त्रता में किसी किस्म की सिद्धि नहीं है और न सच्ची तृप्ति। ऐसे लोगों ने अगर उच्च आदर्श ही छोड़ दिया तो फिर उसमें नरक असन्तोष भी नहीं बच पाता। विवाह सम्बन्ध में केवल भोग-सम्बन्ध का विचार करने वाले लोगों ने भी अपना अनुभव जाहिर किया है—
एतत्कामफलं लोके यद्द्वयो एकचित्तता।
अन्यचित्तकृते कामे शक्योरिव संगमः॥
यह एकचित्तता यानी हृदय की एकता अथवा स्नेहग्रन्थों अन्योन्य निष्ठा और अपत्यनिष्ठा के बिना टिक ही नहीं सकती। बढ़ने की बात दूर ही रही। संयम और निष्ठा ही सामाजिक जीवन की सच्ची बुनियाद है। संयम से जो शक्ति पैदा होती है, वही चारित्र्य का आधार है।
चारित्र्य का दूसरा आधार है निष्ठा। व्यक्ति के जीवन की कृतार्थता तभी हो सकती है। जब यह स्वतन्त्रतापूर्वक समष्टि के साथ ओत-प्रोत हो जाता है व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को सम्हालते हुए अगर समाज परायणता सिद्ध करनी हो तो वह अन्योन्य निष्ठा के बिना हो नहीं सकती और अखिल समाज के प्रति एक सी अनन्य निष्ठा तभी सिद्ध होती है, जब आदमी ब्रह्मचर्य का पालन करता है। अथवा कम से कम वैवाहिक जीवन परस्पर दृढ़निष्ठा से प्रारम्भ करता है। अन्योन्य निष्ठा जब आदर्श कोटि को पहुँचती है तब वहीं से सच्ची समाज-सेवा शुरू होती है।
इन सब का विवेचनानुसार यह निकला कि “व्यक्तिगत विकास के लिये, कौटुम्बिक समाधान के लिए, सामाजिक कल्याण के लिए और आध्यात्मिक प्रगति के लिए संयम और इसलिए समाजिक जीवन में लैंगिक सदाचार का इतना महत्व है।”
अब इस सदाचार का आत्यन्तिक स्वरूप क्या है, कौन सा स्वरूप तात्विक है और कौन साँकेतिक, यह विचार समय-समय पर करना पड़ता है। उसमें चन्द बातों में परिवर्तन भी आवश्यक हो, लेकिन इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि लैंगिक सदाचार के बिना समाज सेवा निष्ठा के साथ हो नहीं सकती।
जिनका विकास एकाँगी हुआ है जिनके जीवन में विकृति आ गई है, उससे भी कुछ न कुछ सेवा ली जा सकती है, लेकिन वे समाज के विश्वासपात्र सदस्य नहीं बन सकते। समाज निर्भयता से उनकी सेवा नहीं ले सकता और ऐसे आदमी का विकास अशक्यप्राय होता है। उसकी प्रतिष्ठा नाम मात्र की रहती है।
विषय गम्भीर है। उसके पहलू भी असंख्य हैं और उनका शुद्ध विचार करने की पात्रता आज के अपूर्ण समाज में पूरी-पूरी है भी नहीं, तो भी इस विषय को हम छोड़ नहीं सकते। लीपा-पोती से काम नहीं चलता। केवल रूढ़ि को सम्हाल कर हम समाज को सुरक्षित नहीं रख सकते। और अनेक रूढ़ियों का तुलनात्मक अध्ययन किये बिना और उनका सार्वभौम समन्वय किये बिना हम सामाजिक प्रगति भी नहीं कर सकते। इसीलिए समय समय पर मनुष्य जाति को इस सवाल की चर्चा करनी ही पड़ती है।
(श्री प्रताप मल जी, नाहटा)
महाभारत में लिखा है “जिनके क्रोध से भीत होना पड़ता है, शंकित मन से जिनकी सेवा करनी होती है, वे मित्र-रूप से कदापि नहीं ग्रहण किये जा सकते। पिता के समान विश्वासपात्र व्यक्ति ही यथार्थ मित्र होता है, औरों के साथ मित्रता केवल सम्बन्ध न होने पर भी जो मित्र भाव रखते हैं, ये सच्चे मित्र हैं।”
चंचल चित्त, स्थूल बुद्धि और वृद्धोपदेश पराँमुख व्यक्ति के साथ मित्र भाव नहीं ठहरता। जैसे हंस-वृन्द सूखे सरोवर को छोड़ देते हैं, वैसे ही सब अर्थ अव्यवस्थित चित्त, इन्द्रिय वशवर्त्ती व्यक्ति को छोड़ देते हैं। दुर्जनों का स्वभाव चपल मेघ के समान अव्यवस्थित होता है। उन्हें सहसा क्रोध आ जाता है और बिना किसी कारण के अकस्मात् प्रसन्नता भी। जो व्यक्ति मित्रों द्वारा सत्कार और कृतकार्यता प्राप्त करके भी उनका उपकार नहीं करता, वह कृतघ्न है। उसके मरने पर उसके शरीर को चील कौए भी स्पर्श नहीं करते। धनी हो या निर्धन, मित्र की हित कामना करना नितान्त कर्त्तव्य है।”
सुप्रसिद्ध आँग्ल तत्व वेत्ता बेकन ने अपने मित्र की इस तरह याद की है—
“हमारा यदि कोई सच्चा मित्र न हो, तो यह जगत निर्जन वन के समान प्रतीत होगा और हमारा जीवन एकान्त-वास में व्यतीत होने के कारण दुःखदायी होगा। जब अपनी चित्तवृत्ति और विचारों में उधेड़ बुन होने लगती है, उस समय मन किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है और हम अन्धेरे में जिस प्रकार टटोल-टटोल कर चलते हैं, उसी तरह बर्ताव में भी चलते हैं। उस समय मित्रों के सहायता से हमें उजाला मिलकर सीधा मार्ग दिखाई पड़ने लगता है और विपत्ति के समय हमारा मन प्रसन्न रहता है। उनके साथ वार्तालाप करने से अपने विचार एक से जारी रह कर योग्य प्रणाली मिलती है। वे विचार यदि लिखे जायं तो कैसे होंगे; यह मालूम हो जाता है और अपने आप उनका मनन करने से जितना ज्ञान होता है, उतना ज्ञान मित्रों के साथ घड़ी भर वार्तालाप करने से हो जाता है और हम अधिकाधिक बुद्धिमान बनते चले जाते हैं।”
नीतिकार का यह कथन बड़ा ही मार्मिक है कि—
पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तत् दुर्लभम्
सुख-दुःख में एक सा साथ दे, ऐसा मित्र दुर्लभ होता है। परन्तु ऐसे दुर्लभ मित्र ही सच्चे मित्र होते हैं। सन्मित्र की जो महिमा है, वह ऐसे ही मित्रों की है। ऐसे ही मित्रों के विषय में याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा है :—
हिरण्यभूमिलाभेभ्यो मित्रलब्धिर्वरा यतः।
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै रक्षेत सत्यं समाहितः॥
सुवर्ण लाभ अथवा भूमि लाभ की अपेक्षा मित्र लाभ श्रेष्ठ है। इसीलिए मित्र लाभ के लिए प्रयत्न करें और स्वस्थचित्त से उनकी रक्षा करे।
सज्जनों की मैत्री का भर्तृहरि ने बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है—
क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरातेऽखिलाः।
क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा आत्मा कृशानौ हुतः॥
गन्तु पाबकमुन्मनस्तद भवद्दृष्ट् वा तु मित्रापदम्।
युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतों मैत्री पुनस्त्वीदृशी॥
दूध और पानी जब मिल जाते हैं, तब उनकी मैत्री ऐसी होती है कि दूध पानी को अपने सब गुण पहले ही दे डाले रहता है। यह दूध जब आग पर रखा जाता है और दूध को आँच असह्य होने लगती है, तब पानी उसके लिये अपने आपको जला देता है। मित्र की यह दशा देख, दूध भी आग में कूद पड़ता है। फिर जब पानी से उसका मिलाप होता है, तब उसे शान्ति मिलती है। सज्जनों की मैत्री ऐसी होती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है :—
आपदकाल परीखिये चारी। धीरजधर्म मित्रअरुनारी॥
संकट-काल में ही सन्मित्र की परिक्षा होती है। संकट-काल में जो साथ नहीं देता, वह मित्र नहीं है विपत्ति मानो मित्रता की कसौटी ही है। इससे “हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।”
जब अच्छे दिन होते हैं, तब तो शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, परन्तु सच्चा मित्र कौन है, इसकी पहचान तो विपत्ति में ही होती है।
तुलसी सम्पत्ति के सखा, परत विपत्ति में चीन्ह।
सज्जन सोना कसन विधि, विपत्ति कसौटी दीन्ह॥
सन्मित्र का यही प्रधान लक्षण है। गुसाई तुलसीदास जी सन्मित्र के लक्षण इस प्रकार कथन करते हैं :—
“जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिनहिं विलोकत पातक भारी॥
जिन दुख गिरिसम रज करजाना।
मित्र के दुख रज मेरु समाना॥
जिनके असमति सहज न आई।
ते शठ कत हठि करत मिताई॥
देत लेत मन संक न धरईं।
बल अनुमान सदा हित करईं॥
कुपथ निवारि सुपथ चलावा।
गुण प्रगटइ अवगुणहिं दुरावा॥
विपत्ति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
इन्हीं लक्षणों का इससे कुछ अधिक विस्तार एक संस्कृत श्लोक में इस प्रकार किया गया है—
पापान्निवारयति योजयते हिताय,
गुह्यानि गुह्यति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपदताँ न जहाति ददाति नित्यं
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदंति सन्ताः॥
इन्हीं कवि ने मित्रता के छः लक्षण गिनाये हैं-मित्र (1) पाप से बचाता है, (2) हित के काम में लगाता है, (3) गुप्त रखने योग्य बातों को गुप्त रखता है, (4) गुणों को प्रकट करता है, (5) संकट काल में साथ नहीं छोड़ता, और (6) सदा मुक्त हस्त से देता रहता है।
मनुष्य के चरित्र पर संग-सोहबत का बड़ा असर पड़ता है। संग सोहबत से मनुष्य बनता बिगड़ता है। जितनी बुरी आदतें हैं, उन्हें कोई जन्म से ही अपने साथ नहीं ले आता, संगी-साथियों की देखा-देखी ही मनुष्य उनका आदी होता है। मित्र का यह धर्म है, सन्मित्र का यह लक्षण है, कि वह अपने मित्र को ऐसी बुराइयों से बचाये। बुराइयों से बचाने के साथ आप ही अच्छे कामों में उसे लगाने का भार भी उस पर आ ही पड़ता है। ये दोनों बातें एक दूसरे से मिली हुई हैं।
बुराइयों से बचाने और अच्छे कामों में लगाने वाला मित्र स्वभावतः मुँह देखी बात करने वाला नहीं होता, स्पष्ट वक्ता होता है। अनेक बार स्पष्ट वक्ता मित्र की स्पष्टोक्ति बहुत कड़वी मालूम होती है। परन्तु यह कड़वापन मित्र की हृदय वेदना का परिणाम होता है, यह जानना और मुँह देखी बात को छोड़ इस कड़वी दवा को पी जाना भी सन्मित्र का ही लक्षण है। हित की बात कहने वाला स्पष्ट वक्ता मित्र मुँह पर चाहे जितना स्पष्ट कहे, पर पीछे निन्दा नहीं करता, न अपने मित्र की ऐसी बातें प्रकट करता है, जो प्रकट करने योग्य न हों। बुराई से बचाने का यह मतलब तो है ही नहीं कि अपने मित्र की बुराई करता फिरे। मित्र का लक्षण यह है कि मित्र के दोष मित्र से ही कहे, औरों से नहीं, औरों से गुणों का ही बखान करे।
मित्र का फिर सबसे बड़ा लक्षण यह है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, कि आपातकाल में साथ ‘कभी न छोड़े। कर्ण को पाँडव अपना ज्येष्ठ भ्राता जानकर युधिष्ठिर के बदले उसी को राज गद्दी पर बैठाते, पर इतने बड़े निष्कण्टक राज्य के लोभ से कर्ण ने विपत्ति में अपने मित्र दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। उसका मित्र-प्रेम कितना गाढ़ा था और मित्र-धर्म का उसे कितना खयाल था, यह उसके उस प्रसंग के इन उद्गारों से स्पष्ट ही प्रकट होता है।
वधाद्वन्धाद्भयाद्वापि लाभाद्वापि जनार्दन।
अनृतं नोत्सहे कर्त्तधार्तराष्ट्रस्य धीमतः॥
यदि जानाति माँ राजा धर्म्मात्मा संयतेन्द्रियः।
कुन्त्याः प्रथमजं पुत्रं न स राज्यं गृहीष्यति॥
प्राप्य चापि महाद्राज्यं तदहं मधुसूदन।
स्फीतं दुर्योधनायेव संप्रदष्यामरिन्दम॥
“वध, बन्धन, भय अथवा लोभ से मैं धीमान् दुर्योधन के साथ मिथ्या-व्यवहार कदापि नहीं कर सकता। जितेन्द्रिय, धर्मात्मा युधिष्ठिर को यदि यह मालूम हो कि मैं (कर्ण) कुन्ती का प्रथम पुत्र हूँ, तो वे राज्य ग्रहण न करेंगे और (इस प्रकार) यदि वह विस्तीर्ण राज्य मुझे प्राप्त हो तो मैं उसे दुर्योधन को प्रदान कर दूँगा।”
भगवान् श्री कृष्ण के धर्म राज्य संस्थापन के महान उद्देश्य का विचार छोड़ दें और केवल मित्र प्रेम का विचार करें, तो कर्ण के मित्र प्रेम का यह दृष्टान्त कितना उद्दात्त, कितना गम्भीर और कितना दिव्य है।
युद्ध करि जय लहन को अति मोर जाहि भरोस।
तजब ऐसे काल ताहि विश्वासघात कुदोस॥
होत सब पातकनसो विश्वासघात गरिष्ट।
परम धर्मी विदित हम किमि करें सो गति इष्ट॥
मित्र से ही यह ध्रुव विश्वास रहता है कि संकट-काल में वह सहायक होगा। किसी का मित्र कहलाना ही यह विश्वास दिलाना है कि वह विपत्ति में साथ रहता है और विश्वासघात से बढ़कर कोई पाप नहीं है। सन्मित्र यह प्रधान लक्षण है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
अभी क्या आवश्यकता, जब जरूरत होगी तब यह काम कर लेंगे, अभी कहाँ अवकाश है? इतनी जल्दी तैयारी की क्या जरूरत? अभी कुछ दिन या घण्टे आराम कर लें, फिर हो जायगा। अभी तो पर्याप्त समय है, काम हो ही जायगा—यह मनुष्य की एक बड़ी कमजोरी है।
बात को कल पर टाल देना, या काम को उचित समय पर सम्पन्न करना, इच्छा शक्ति की न्यूनता के कारण उत्पन्न होता है। टालने या गम्भीर परिस्थितियों का मुकाबला न करने वाला व्यक्ति चंचल मन पर उचित नियन्त्रण नहीं कर पाता। उसकी विवेक बुद्धि उससे किसी कार्य या बात को करने का संकेत करती है, उसका मन उसकी उपयोगिता को स्वीकार भी करता है, किन्तु जब असली कार्य को करने का समय आता है, तो उसकी इच्छा शक्ति का शैथिल्य पुरानी आदतों पर काबू नहीं पाता। आलस्य-प्रमाद, आमोद-प्रमोद, ढीले-ढाले रहने की आदत उभर उठती है। सारी योजनाएँ धराशायी हो जाती हैं। ऐसा व्यक्ति कार्य सम्पन्न न करने के पक्ष में तरह-तरह की दलीलें निकालता है। “स्वास्थ्य ठीक नहीं है। अभी थोड़ा विश्राम कर लें। इतनी जल्दी इस कार्य के करने की क्या जरूरत है। फुरसत से करेंगे, लाओ थोड़ा खेल लें, सो लें, थोड़ा घूम आएँ या अमुक मित्र से मिल लें’—इस प्रकार की सैकड़ों दलीलें पेश कर मनुष्य बात को हटाता जाता है। विवेक दबकर चुपचाप हो जाता है, आवेश मनुष्य को अपना दास बना लेता है। बुद्धि का राज्य भ्रष्ट हो जाता है, आलस्य और प्रमाद की वृत्तियों का विप्लव होने लगता है और अविवेक की कुयंत्रणा से वासना को शासन करने का अवसर प्राप्त हो जाता है।
बात टालने का मतलब है, परिस्थिति से हार जाना। गम्भीर परिस्थिति से डट कर मुकाबला करने की शक्ति जब मनुष्य में नहीं होती, तो वह आज का काम कल पर छोड़ता है। थोड़ी देर के लिए ही सही, अपने को कष्ट साध्य कार्य से बचा लेना चाहता है। टालना एक प्रकार की कायरता है। ऐसा व्यक्ति डरपोक, अस्थिर, टिड्डी जैसा एक स्थान से दूसरे, दूसरे से तीसरे पर फुदकने वाला होता है। वह अति चंचलता का शिकार होता है। विचार तथा संकल्प की अस्थिरता उसकी मानसिक कमजोरी है।
हम देखते हैं कि कितने ही व्यक्ति उन्नति की बड़ी-बड़ी योजनाएँ तैयार करते हैं। शिक्षा तथा व्यवसाय के लिए बड़ी भारी कागजी कार्यवाही की जाती है, किन्तु प्रायः यह सब कुछ कागज का कागज पर ही रह जाता है। वास्तविक कुछ भी नहीं हो पाता। उसमें हमारा मन पूरी तरह नहीं रमता। हम उस कार्य में तनिक सी कठिनाई देखते ही छोड़ भागते हैं। मन की यह चंचलता हमारा प्रधान शत्रु है, जो न हमें आगे बढ़ने देता है, न हमें उन्नति करने देता है।
संसार में अनेक व्यक्ति हैं, जिनके पास जीवन को परिपुष्ट, उन्नत और उत्कृष्ट बनाने वाले विचारों और योजनाओं की न्यूनता नहीं है। उनके हृदय सरोवर में अनेक आशापूर्ण तरंगें उद्वेलित हुआ करती हैं, मन में अनेक दिव्य भावनाओं को उदय होता रहता है, आत्मा में महत्वाकाँक्षाओं का उद्भव चलता रहता है, किन्तु इन समृद्ध विचारों के होते हुए भी वे अनेक वर्षों से वहीं हैं, जहाँ से चले थे। तिल भर भी उन्नति नहीं कर पाये हैं।
विचार ही संसार की सबसे महान शक्ति हैं पर असंगठित, अव्यवस्थित काल्पनिक विचार केवल दिल बहलाव, क्षणिक मनोरंजन एवं निष्प्रयोजन सामग्री है, उसी प्रकार केवल शुभ्र विचारों में रमण कर लेना और कुछ काल तक इन शुभ्र विचारों से चमत्कृत हो जाना—एक प्रकार का मनोरञ्जन है।
थोड़ी देर के लिए तो आप उन्नति करने की सोचते हैं, फिर वही आलस्य, वही शैथिल्य, वही बात को टालमटोल कर देना। यही हमारी गुरुतम त्रुटि है।
विचार के दो रूप हैं—एक काल्पनिक, दूसरा क्रियात्मक (प्रैक्टिकल) यह दूसरा भाग अर्थात् कार्य को क्रियात्मक स्वरूप दे डालना, उसे फौरन कर डालना, चैन न लेना मुख्य वस्तु है। काल्पनिक और क्रियात्मक दोनों ही तत्वों से विचार समूचा, पूर्ण उत्पादक बनता है। अभिलाषा का क्रिया के साथ सम्मिलित होने से ही उत्पादक शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और फल की प्राप्ति होती है। ठोस कार्य का ही संसार में मूल्य है।
जो कर्म क्षेत्र में प्रविष्ट होता है, वही आगे बढ़ता है। जो अपनी योजनाओं को क्रियात्मक रूप प्रदान करता है वही आगे निकलता है। खरगोश की तरह जरा देर आराम के बहाने बात टालने वाले हारते हैं, कछुए की तरह निरन्तर कार्य करने वाले चाहे छोटे ही हों विजयी होते हैं। प्रत्येक मनुष्य का कार्य में संलग्न होना, आलस्य से दूर भागना ही व्यक्ति की उन्नति का मूल मन्त्र है। उत्तम कार्य, उचित कार्य और निरन्तर साधना युक्त जीवन ही राष्ट्र निर्माण करता है। कर्म-योग ही श्रेष्ठ धर्म है।
आप जो कुछ सोचें, विचारें या योजनाएँ बनाएँ, वे कार्यशीलता को दृष्टि में रखकर ही बनाइए। नए काम में हाथ डालने से पूर्व सोचिए, “क्या मैं इन बातों को दैनिक जीवन में उतार सकूँगा? क्या मेरे पास इतने साधन हैं कि उनकी सहायता से यह कार्य सम्पन्न हो सके? मैं यह योजना क्षणिक उत्तेजना के वश में होकर तो नहीं बना बैठा हूँ? मैं इन्हें बीच ही में तो नहीं छोड़ भागूँगा? मेरा स्वास्थ्य, मनःदशा आर्थिक सामाजिक स्थिति ऐसी है या नहीं कि इसका बोझ सम्हाल सकूँ।” इस प्रकार किसी योजना का हाथ में लेने से पूर्व पर्याप्त विचार मन्थन कर लेना चाहिये।
कार्य की दृष्टि को सामने रखने से कल्पना की थोथी उड़ान टूट जाती है। व्यर्थ के हवाई किले धराशायी होकर हम ठोस जगत पर उतर आते हैं। अनिश्चयता दूर हो जाती है और वास्तविकता हमारे सामने रहती है। हमारे पाँव वस्तु जगत में ही रहते हैं।
कार्यशीलता हमारी शक्ति की परीक्षा लेती है। यह सामर्थ्य का मापदण्ड है। जब हम शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शक्तियों का परीक्षण करते हैं तो हमें अनेक मानसिक और शारीरिक कमजोरियाँ विदित हो जाती हैं। अपनी सामर्थ्य से अधिक योजनाओं में हाथ डालने वाला व्यक्ति एक प्रकार का ढ़पोल शंख है जो थोथी योजनाएँ ही बनाया करता है। ये कच्ची योजनाएँ उन कागज के फूलों की तरह हैं। जिनमें न रंग हैं, न गन्ध। मूर्खों के इस स्वर्ग से हम जितनी जल्दी निकल आवें, हमारी उन्नति के लिए श्रेयस्कर है।
—मनुष्य अपनी दुर्बलता पर रोता है, वह अपनी अवस्था पर शोक, पश्चाताप और सन्ताप किया करता है। यह क्यों? यही कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप का कुछ भी अनुभव नहीं है वह चाहे तो अपनी अनन्त शक्ति द्वारा उस नैतिक परिसीमा तक पहुँच सकता है जहाँ कोई भी विकार स्पर्श नहीं कर सकता।
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
बेन्थाम, मिल आदि पारिश्चमात्य विद्वानों ने कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णय करने के लिए “अधिकाँश लोगों का अधिकतम सुख” का नियम निश्चित किया है। कर्त्तव्याकर्त्तव्य-निर्णय को व्यावहारिक रूप देने में इससे अच्छी-मुक्ति दिखलाई नहीं देती। भारतवर्ष के प्रत्येक धर्म में इस नीति को स्वीकार किया गया है। परन्तु इस नीति का जो साधारण अर्थ किया जाता है, उसमें कुछ त्रुटि रह जाती है। इस त्रुटि को लोकमान्य तिलक ने इन शब्दों में रक्खा है—
“इस आधिभौतिक नीति-तत्व में जो बहुत थोड़ा दोष है वह यही है कि इसमें कर्ता के मन के हेतु या भाव का कुछ भी विचार नहीं किया जाता और यदि अन्तस्थ हेतु पर ध्यान दें, तो इस प्रतिज्ञा से विरोध खड़ा हो जाता है कि अधिकाँश लोगों का अधिक सुख ही नीतिमत्ता की कसौटी है।... केवल बाह्य परिणामों का विचार करने के लिए उससे बढ़कर दूसरा तत्व कहीं नहीं मिलेगा। परन्तु हमारा यह कथन है कि जब नीति की दृष्टि से किसी बात को न्याय अथवा अन्याय कहना हो, तब केवल बाह्य परिणामों को देखने से काम नहीं चल सकता। पाँडवों की सात आक्षौहिणियाँ थीं और कौरवों की ग्यारह, इसलिए यदि पाँडवों की हार हुई होती, तो कौरवों को अधिक सुख हुआ होता। क्या उसी युक्तिवाद से पाँडवों का पक्ष अन्याय कहा जा सकता है? व्यवहार में सभी लोग यह समझते हैं कि लाखों दुर्जनों का सुख हो, वही सच्चा सत्कार्य है।”
भाव की प्रधानता सभी धर्मशास्त्रों में बहुत अधिक परिमाण में पाई जाती है। हिंसा हो जाने पर भी अगर हमारी भावना हिंसा करने की न हो, तो हमें हिंसा का दोष नहीं लगता और भाव होने पर हिंसा न होने पर भी हिंसा का दोष लगता है। यह बात अहिंसा के विवेचन में स्पष्ट की जायगी।
अधिकाँश लोगों को अधिकतम सुख वाली नीति व्यवहार में अत्यन्त उपयोगी है इसलिए हम उसका त्याग नहीं कर सकते। और भाव विशुद्धि के बिना आत्म विश्वास नहीं हो सकता, न ठीक-ठीक निर्णय ही हो सकता है, इसलिए हम भाव को गौण स्थान भी नहीं दे सकते। इस समस्या को सुलझाने के लिए अधिकाँश प्राणियों के अधिकतम सुख वाली नीति में कुछ संशोधन आवश्यक है, उसके लिए हमें निम्नलिखित सूत्रों को स्वीकार करना चाहिए—
(क) अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख में ‘लोग‘ शब्द का अर्थ प्राणी है। धर्म के सामने त्रिकाल त्रिलोक की समस्याएं हैं, इसलिए इतना व्यापक अर्थ करना उचित है।
(ख) सभी जीवों का सुख समान नहीं होता। चैतन्य की मात्रा बढ़ने से सुखदुःखानुभव की मात्रा बढ़ती है। द्वींद्रियादि जीवों में वनस्पति की अपेक्षा कई गुणा चैतन्य है। इससे अधिक पशु-पक्षियों में और इनसे अधिक मनुष्य में। इनमें भी परस्पर तारतम्य देखना चाहिए। इस नीति में केवल संख्या का विचार नहीं करना है, सुख की मात्रा का भी विचार करना है।
(ग) नीति का निर्णय सार्वत्रिक और सार्वकालिक दृष्टि से करना चाहिए। दस चोर एक आदमी को लूट लें, इससे दस चोरों को सुख और एक ही आदमी को कष्ट होगा, परन्तु इस नीति को हम अच्छा नहीं कह सकते। क्योंकि चोरी करने की नीति से एक समय और एक जगह भले ही अधिक सुख हो परन्तु अन्य समय में और अन्य क्षेत्रों में दुःख की वृद्धि बहुत अधिक होगी। जो सर्वत्र और सर्वकाल में अधिकतम सुख कारक हो वही नीति ठीक है।
(घ) जो परोपकार परोपकार-बुद्धि से न किया गया हो वह बहुत ही कम सुखवर्द्धक है। उसका श्रेय कर्त्ता को बहुत कम मिलता है।
एक आदमी यश के लिए परोपकार करता है। यह इसलिए ठीक नहीं है कि जब उसे यश की आशा न होगी या यश की चाह न होगी तब वह परोपकार न करेगा। यह सुख-वृद्धि में बड़ा भारी बाधक है। उसका ध्येय यश है। इसलिए अगर यश के लिए कभी उसे अनुचित कार्य करने की आवश्यकता होगी तो वह अनुचित कार्य भी करेगा। इस प्रकार परोपकार का मूल्य तभी हो सकता है जब वह भाव पूर्वक किया गया हो।
(ड़) अशुभ भाव से कोई कार्य किया जाय, और उसका फल शुभ हो जाय, तो वह अशुभ ही कहलायेगा, इसी तरह शुभ भाव से कोई कार्य किया जाय किन्तु उसका फल अशुभ हो जाय तो वह शुभ ही कहलायेगा। क्योंकि भावना अच्छी होने पर भी बुरा कार्य होना कादाचित्क है। सामान्य नियम यही है कि उससे शुभ कार्य हो, इसलिए शुभ भावना सुखवर्द्धक है। दूसरी बात यह है कि भावना के अनुसार अगर अच्छे बुरे का निर्णय न किया जाय, तो अच्छा काम करना अशक्य प्रायः हो जायगा। अच्छी भावना से डॉक्टर आपरेशन करे और रोगी मर जाय, इस पर डॉक्टर को खूनी के समान मृत्यु-दण्ड दिया जाय, तो कितने डॉक्टर आपरेशन को तैयार होंगे? इसलिए अधिकतम सुख के लिए भावना को प्रधानता देना आवश्यक है।
इस सबका सार यह है कि सार्वत्रिक और सार्वकालिक अधिकतम प्राणियों के अधिकतम सुख की भावना से जो कार्य किया जाय वह कर्त्तव्य है और बाकी अकर्त्तव्य। इस तरह आधिभौतिक और आध्यात्मिक के सम्मिश्रण से हमें कर्त्तव्याकर्त्तव्य के निर्णय की कसौटी मिल जाती है, और अनेक तरह की शंकाओं का समाधान हो जाता है। जैसे कि-रावण ने सीता को चुराया, राम ने युद्ध करके रावण के वंश का नाश कर दिया। अगर राम युद्ध न करते, तो राक्षस वंश के लाखों मनुष्य मरने से बच जाते, सिर्फ राम और सीता इन दो व्यक्तियों को दुःख होता और लाखों को सुख।
यद्यपि वर्तमान की दृष्टि से यह घटना विपरित नीति की सूचक है, परन्तु सार्वत्रिक विचार से इनका निर्णय हो जाता है। इस घटना को लक्ष्य करके अगर यह नियम बना दिया जाय कि अगर कोई किसी की पत्नी को चुरा ले जाय तो उसे उसकी रक्षा के लिए विशेष प्रयत्न न करना चाहिए तो इसका फल यह होगा कि प्रतिदिन हजारों लाखों स्त्रियों का सतीत्व नष्ट होने लगेगा। यह दुःख एक बार युद्ध में मर जाने वाले सैनिकों के दुःख की अपेक्षा बहुत अधिक होगा मतलब यह है कि अन्याय का प्रतिकार करना एक बार भले ही अधिक प्राणियों को दुःखद हो, परन्तु सदा के लिए यह सुखद है। समाज के भय तथा चिन्ता को रोकने के कारण उसकी सुखदाता और बढ़ जाती है।
—अपने से पूरा न हो सके ऐसी शर्त मारे, बिना काम बड़-बड़ावे सभा में बिना बतलाये बोल उठे, बिना बुलाये पर घर जावे, चोर को मित्र बनावे, बिना इजाजत किसी की वस्तु को हाथ में लेकर देखने लग जाए, किसी वस्तु को अनधिकार लेने की चेष्टा करे वह मूर्ख है।
—समर्थ के साथ मत्सर करे, अलभ्य वस्तु की आशा करे, अपने ही घर में चोरी करे, घमंड के साथ बात करे, बायें हाथ से जल पीये एवं शौचादि करते बोले वह मूर्ख है।
—ईश्वर को भूलकर मनुष्य पर विश्वास करे, निरर्थक अपनी आयु को नष्ट करे, संसार दुःख से भरा है-ऐसा जान कर भी विषयों में फँसे, और मित्रों को भला बुरा कहे, दूसरे के आश्रम में बिना कहे उच्चासन पर बैठे बहुत मूर्ख है।
—लक्ष्मी मिलने पर पहली पहचान भूल जावे, अपने स्वार्थ तक नम्रता दिखलावे स्वार्थ निकलने पर कृतघ्न हो जावे वह मूर्ख है।
(गताँक से आगे)
किसी मनुष्य पर परमात्मा की कृपा है या नहीं, इसकी पहिचान करनी हो तो वह इस प्रकार हो सकती है कि वह मनुष्य उत्साहपूर्वक, तन्मयतापूर्वक श्रम, जागरुकता और रुचि के साथ काम करता है या नहीं। जिनका स्वभाव इस प्रकार का है, समझना चाहिए कि इनको विकसित करने के लिये परमात्मा ने इन्हें ‘धी’ तत्व प्रदान किया है।
कितने व्यक्ति आलसी, निकम्मे, हरामखोर होते हैं, निराशा उन्हें घेरे रहती है, काम को आधे मन से अरुचिपूर्वक, बेगार भुगतने की तरह करते हैं, जरा सा काम उन्हें पहाड़ मालूम होता है, थोड़े से श्रम में भारी थकान अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों को ‘धी’ तत्व से रहित समझना चाहिये, यह प्रत्यक्ष है कि वे ईश्वर के अकृपा पात्र हैं, कर्म प्रेरक बुद्धि के अभाव में वे दुर्भाग्य ग्रस्त ही रहेंगे।
मौद्गल्य का उपरोक्त कथन कितना गम्भीर और सत्य है इसके बारे में दो मत नहीं हो सकते। भाग्य का रोना रोने वाले, तकदीर को ठोकने वाले, अपनी त्रुटि का दोष किसी दूसरे ज्ञात-अज्ञात पर थोप कर झूठा मनः सन्तोष भले ही कर लें, पर वस्तुस्थिति यही है कि उन्होंने ईश्वर की कृपा को प्राप्त नहीं किया। यह कृपा हर किसी के लिए सुलभ है हर किसी के अपने हाथ में है। धी तत्व को—कर्मशीलता को-अपनाकर हर कोई ईश्वरीय कृपा और उन्नति का अधिकारी बन सकता है। परमात्मा अपनी कृपा से किसी को वंचित नहीं रखता मनुष्य ही अपनी दुर्बुद्धि के कारण उसका परित्याग कर देता है।
मन एव सविता वाक् सावित्री यत्रह्मेव मनस्तद्वाक।
यत्र वै वाक् तन्मन इति एते द्वे योनि एकं मिथुनम्॥
मन सोचता है वाक् सावित्री जहाँ मन वहाँ वाक् है, जहाँ वाक् है वहाँ मन ये दोनों एक योनि और एक मिथुन हैं।
अग्निरेव सविता पृथ्वी सावित्री यत्र ह्येवाग्निरतत्पृथ्वी
यत्र वै पृथ्वी तदन्निरिति एते द्वैयोनि एकं मिथुनम्॥
अग्नि सविता है, पृथ्वी सावित्री, जहाँ अग्नि है वहाँ पृथ्वी है जहाँ पृथ्वी है वहाँ अग्नि है दो योनि तथा एक मिथुन हैं॥ 2॥
वायुरेव सविता अन्तरिक्ष सावित्री, यत्र ह्मेव वायुस्तदन्तरिक्षम्। यत्र वा अन्तरिक्षं तद्वायुरिति एते द्वे योनि एकं मिथुनम्॥ 3॥
वायु सविता है अन्तरिक्ष सावित्री है, जहाँ वायु है वहाँ अन्तरिक्ष है जहाँ अन्तरिक्ष है वहाँ वायु है। ये दो योनि और एक मिथुन हैं॥ 3॥
आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद् द्यौः यत्र वै द्यौ इतदादित्य इति। एते द्वे योनि एकं मिथुनम्॥ 4॥
आदित्य सविता है, द्यौ सावित्री। जहाँ आदित्य है वहाँ द्यौ है, जहाँ द्यौ है वहाँ आदित्य है। ये दो योनि और एक मिथुन है॥ 4॥
चन्द्रमा एव सविता नक्षत्राणि सावित्री यत्र ह्मेव चन्द्रमा स्तन्नक्षत्राणि। यत्र वैं नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा इति। एते द्वे योनी एकं मिथुनम्॥ 5॥
चन्द्रमा सविता है नक्षत्र सावित्री है, जहाँ चन्द्रमा है वहाँ नक्षत्र हैं जहाँ नक्षत्र हैं वहाँ चन्द्रमा है। यह दो योनि और एक मिथुन है॥ 5॥
अरेव सविता रात्रिः सावित्री यत्र ह्येवाहस्तद्रात्रिः।
यत्र वै रात्रि स्तदहरिति एते द्वेयोनि एकं मिथुनम्॥ 6॥
दिन सविता है रात्रि सावित्री है जहाँ दिन है वहाँ रात्रि है। जहाँ रात्रि है वहाँ दिन है। यह दो योनि और एक मिथुन है॥ 6॥
उष्णमेव सविता शीतं सावित्री यत्र ह्येवोष्णं तच्छीतं।
यत्र वैशीतं तदुष्णमिति एते द्वे योनि एकं मिथुनम्॥7॥
उष्ण सविता है, शीत सावित्री है, जहाँ उष्ण है वहाँ शीत है जहाँ शीत है वहाँ उष्ण है। ये दोनों योनि और एक मिथुन है॥ 7॥
अभ्रमेव सविता वर्ष सावित्री यत्र ह्येवाभ्रं तर्द्वष, यत्र
वै वर्ष तदभ्रमिति एते द्वै योनी एकं मिथुनम्॥ 8॥
बादल सविता है वर्षण सावित्री। जहाँ बादल हैं वहाँ वर्षण है, जहाँ वर्षण है वहाँ बादल हैं। ये दोनों योनी तथा एक मिथुन है॥ 8॥
विद्यु देव सविता स्तनयित्नुः सावित्री। यत्र ह्येव विद्युत्त त्स्तनतित्नुः यत्र वस्तनयित्नुस्तद्विद्युदित्ति। एते द्वेयोनी एकं मिथुनम्॥ 9॥
विद्युत सविता है और उसकी तड़क सावित्री, जहाँ बिजली है वहाँ उसकी तड़क है जहाँ तड़क है वहाँ बिजली है। ये दोनों योनी और एक मिथुन है॥ 9॥
प्राण एव सविता अन्नं सावित्री यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नम्। यत्र वा अन्नं तत्प्राण इति। एते द्वे योनी एकं मिथुनम्॥ 10॥
प्राण सविता है अन्न सावित्री। जहाँ प्राण है वहाँ अन्न है जहाँ अन्न है वहाँ प्राण है। यह दो योनि तथा एक मिथुन है॥ 10॥
वेद एव सविता छन्दाँसि सावित्री यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दाँसि यत्र वै छन्दाँसि तद्वेदा इति द्वे योनी एकं मिथुनम्॥ 11॥
वेद सविता है छन्द सावित्री। जहाँ वेद हैं वहाँ छन्द हैं जहाँ छन्द हैं वहाँ वेद हैं। ये दो योनी और एक मिथुन हैं॥ 11॥
यज्ञ एव सविता दक्षिणा सावित्री यज्ञ ह्येव यज्ञस्त दक्षिणा। यत्र वैदक्षिणाः तद्यज्ञ इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम्॥ 12॥
यज्ञ सविता है और दक्षिणा सावित्री। जहाँ यज्ञ है वहाँ दक्षिणा है जहाँ दक्षिणा है वहाँ यज्ञ है ये दोनों योनी तथा एक मिथुन है॥ 12॥
एतद्धस्मैतद्विद्वाँसमोपकारी मासःतुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इति।
विद्वान तथा परोपकारी महाराज! आपकी सेवा में यह ब्रह्मचारी आया है।
अथैव आसस्तुरा चित इव चितो बभूव अथोत्थाय प्रावाजीदिति।
यह ब्रह्मचारी आपके यहाँ आकर ज्ञान से परिपूर्ण हो गया है। इसके बाद वे वहाँ से चले गये। एतद्वा अहं वेदनी तासु ताम योनिध्वितएतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः संभतोब्रह्मचारी मम परायुषः प्रेयादिति।
और उन्होंने कहा कि अब मैं इसे जान गया हूँ इन योनियों अथवा इन मिथुनों में आया हुआ मेरा कोई ब्रह्मचारी अल्पायु नहीं होगा।
अब प्रश्न होता है कि सविता क्या है? और सावित्री क्या है? गायत्री का देवता सविता माना गया है। प्रत्येक मन्त्र का एक देवता होता है; जिससे पता चलता है कि इस मन्त्र का क्या विषय है। गायत्री का देवता सविता होने से यह प्रकट है कि इस मन्त्र का विषय सविता है। सविता की प्रधानता होने के कारण गायत्री का दूसरा नाम सावित्री भी है।
मैत्रेय पूछते हैं—भगवन्! सविता क्या है? और यह सावित्री क्या है? महर्षि मौद्गल्य उन्हें उत्तर देते है कि सविता और सावित्री का अविछल सम्बन्ध है, जो एक है वही दूसरा है। दोनों का मिलकर एक जोड़ा बनता है, एक केन्द्र है दूसरा उसकी शक्ति है, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।
शक्ति मार्ग का महत्व उसकी शक्ति के विस्तार से है। यों तो प्रत्येक परमाणु अनन्त शक्ति का पुञ्ज है। एक परमाणु के विस्फोट से प्रलय उपस्थित हो जाती है। पर इस प्रकार की गतिविधि होती तभी है जब उस शक्ति का विस्तार एवं प्रकटीकरण होता है। यदि यह प्रकटीकरण न हो तो अनन्त शक्तिशाली पदार्थ का भी कोई अस्तित्व नहीं, उसे कोई जानता तक नहीं। सविता कहते हैं—तेजस्वी परमात्मा को और सावित्री कहते हैं—उसकी शक्ति को। सावित्री, सविता से भिन्न नहीं, वरन् उसकी पूरक है, उसका मिथुन अर्थात् जोड़ा है। सावित्री द्वारा ही अचेतन, अज्ञेय, निराकार एवं निर्लिप्त परमात्मा इस योग्य होता है कि उससे कोई लाभ उठाया जा सके।
यह बात बहुत सूक्ष्म और गम्भीर विचार के उपरान्त समझ में आने वाली है। इसलिये उपनिषद्कार उसे उदाहरण दे देकर सुबोध बनाते हैं और इस गूढ़ तत्व को इस प्रकार उपस्थित करते हैं कि हर कोई आसानी से समझ सके। वे कहते हैं—
मन सविता है, वाक् सावित्री है, जहाँ मन है वहाँ वाक् है, जहाँ वाक् है वहाँ मन है। ये दो योनियाँ हैं। एक मिथुन है। इसी प्रकार अग्नि और पृथ्वी का, वायु और अन्तरिक्ष का, आदित्य और द्यौ का, चन्द्रमा और नक्षत्रों का, दिन और रात्रि का, उष्ण और शीत का, अग्नि और वरुण का, विद्युत और तड़क का, प्राण और अन्न का, वेद और छन्द का, यज्ञ और दक्षिणा का मिथुन बताया गया है। यह तो थोड़े से उदाहरण मात्र हैं, यह उदाहरण बताकर उपनिषद्कार ने यह बताया है कि अकेली कोई वस्तु प्रकट नहीं हो सकती, प्रकाश में नहीं आ सकती, विस्तार नहीं कर सकती। अव्यक्त पदार्थ तभी व्यक्त होता है जब उसकी शक्ति का प्रकटीकरण होता है। केवल परमात्मा बुद्धि की मर्यादा के बाहर है, उसे न तो सोच सकते हैं और न उसके समीप तक पहुँचकर कोई लाभ उठा सकते हैं। यह अव्यक्त परमात्मा- सविता, अपनी शक्ति सावित्री द्वारा सर्व-साधारण पर प्रकट होता है और उस शक्ति की उपासना द्वारा ही उसे प्राप्त किया जा सकता है।
लक्ष्मी नारायण, सीताराम, राधाकृष्ण, उमा-शंकर, सविता, सावित्री, प्रकृति परमेश्वर के मिथुन यही बताते हैं। यह एक दूसरे के पूरक हैं, प्रकट होने के कारण हैं। जीव भी माया के कारण अव्यक्त से व्यक्त होता है। यह मिथुन हेय या त्याज्य नहीं है। वरन् क्रियाशीलता के विस्तार के लिये हैं। मनुष्य का विकास भी एकाकी नहीं हो सकता, उसे अपनी शक्तियों का विस्तार करना पड़ता है। जो अपनी-अपनी शक्तियों को बढ़ाता है वही उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
शक्ति और शक्तिवान से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध हैं। जैसे सविता अपनी सावित्री से ओत-प्रोत है उसी प्रकार हमें भी अपने आपको बहुमुखी शक्तियों से परिपूर्ण करना चाहिये। अपने साथ अनेक शक्तियों का सहयोग संगठित करना चाहिये। जिसके स्थान जितने अधिक हैं वह उतना ही सुखी है।
इस शक्ति और शक्तिवान के रहस्य को जानकर मैत्रेय बड़े सन्तुष्ट हुये, उन्होंने कहा मैं आपका शिष्य अब ज्ञान की वास्तविक जानकारी से परिपूर्ण हो गया हूँ। अब मैं जान गया हूँ कि मेरा भी शिष्य इस योनि और मिथुन के रहस्य को जान लेगा वह अल्पायु न होगा। वह शान्ति को अपना अविच्छिन्न अंग मान कर उसका दुरुपयोग नहीं करेगा वरन् सदुपयोग द्वारा सब प्रकार का लाभ उठावेगा। इस प्रकार शक्ति का महत्व समझकर उसका सदुपयोग करने वाले अल्पायु कदापि नहीं हो सकते।
ब्रह्य हेदं श्रिवं प्रतिष्ठामायतनमैक्षित तत्तपैस्का यदि तदूव्रते ध्रियेत तत्सत्ये प्रत्यतिष्ठत्।
ब्रह्म ने भी, प्रतिष्ठा और आयतन को देखा, वह था कि—तप करो। यदि तप के व्रत को धारण किया जाय, तो सत्य में प्रतिष्ठा होती है।
स सविता सावित्र्या ब्राह्मणं सृष्टवा तत्सावित्री पर्यदधात्।
उस सविता ने सावित्री से ब्राह्मण की सृष्टि की तथा सावित्री को उससे घेर दिया।
तत्सवितुर्वरेण्यं इति सावित्र्याः प्रथमः पादः।
‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ यह सावित्री का प्रथम पाद है।
पृथ्व्यर्चं समदधात् ऋचा अग्निम्। अग्निनाश्रियम्। श्रिया स्त्रियम्। श्रिया मिथुनम्। मिथुनेन् प्रजाम्।
प्रज्या कर्म। कर्मणा तपः। तपसा सत्यम्। सत्येन ब्रह्म। ब्रह्मणा ब्राह्मणम्। ब्राह्मणेन व्रतम्। व्रतेन वै ब्रह्मणः संशितो भवति। अशून्यो भवति, अविछिन्नो भवति।
पृथ्वी को ऋक् को जोड़ा, युक्त किया। ऋक् से अग्नि को। अग्नि से श्री को। श्री से स्त्री को। स्त्री से मिथुन को। मिथुन से प्रजा को। प्रजा से कर्म को। कर्म से तप को। तप से सत्य को। सत्य से ब्रह्म को। ब्रह्म से ब्राह्मण को। ब्राह्मण से व्रत को। ब्राह्मण व्रत से ही तीक्ष्ण होता है, पूर्ण होता है और अविच्छिन्न होता है।
अविछनोऽस्य तंतुरविच्छिन्नं जीवनं भवति, य एवं वदेत् यश्चैवं विद्वानेवेमेतं सावित्र्याः प्रथमपादंव्याचष्टे
जो इस प्रकार इसे जानता है और जानकर जो विद्वान् इसकी इस प्रकार व्याख्या करता है उसका वंश तथा उसका जीवन अविच्छिन्न होता है।
(क्रमशः)
गायत्री की विशेष उपासना के लिए नवरात्रि का पुण्य पर्व बहुत ही शुभ है। जैसे रात्रि और दिन के मिलन का समय “सन्ध्या” काल कहलाता है वैसे ही सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल में आश्विन और चैत्र की नवरात्रि आती हैं इन ऋतु संध्याओं में साधना का भी विशेष महत्व है। जैसे स्त्री के ऋतुमती होने पर गर्भाधान सफल होने की संभावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है।
आश्विन की आगामी नवरात्रि ता. 20 सितम्बर शनिवार को प्रारम्भ और 28 सितम्बर रविवार को समाप्त होगी। जिन्हें सुविधा हो वे इस अवसर पर एक छोटी सी 24 हजार की तपश्चर्या कर लें। 9 दिन में 24 हजार जप करना होता है। प्रति दिन 2667 मंत्र जपने होते है। एक माला में 108 दाने होते है। प्रति दिन 25 माला जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। प्रायः चार घंटे में यह माला आसानी से पूरी हो जाती है। जिन्हें एक साथ इतने समय तक लगातार जप करना कठिन हो वे अधिकाँश भाग प्रातः काल पूरा करके शेष को सायंकाल पूरा कर लें।
इन दिनों जिससे जितनी तपश्चर्या सध सके उसे उतनी साधने का प्रयत्न करना चाहिए। भूमिशयन, चमड़े के जूते तथा वस्तुओं का त्याग, पशु सवारी का त्याग, हजामत, कपड़े आदि अपनी शारीरिक सेवाएँ स्वयं ही करना, अनुचित आचरणों का त्याग आदि नियमों को यथासंभव पालना चाहिए। परन्तु ब्रह्मचर्य का पालन हर हालत में आवश्यक है। साधना की समाप्ति ता. 29 सोमवार को करनी चाहिए। उस दिन हवन, ब्राह्मण भोजन तथा यथाशक्ति दान पुण्य करना चाहिए। जो लोग स्वयं हवन न कर सकें उनका हवन मथुरा हो सकता है जो जितने पैसे भेजेंगे उतने की सामग्री और घी लेकर यहाँ उनकी ओर से हवन कर दिया जायगा। हवन की दक्षिणा किसी से कुछ नहीं ली जाती। ब्राह्मण भोजन के स्थान पर सस्ता गायत्री साहित्य सत्पात्रों को वितरण किया जा सकता है। अन्न दान की अपेक्षा ज्ञान दान का महत्व अधिक है।
जो साधक अपनी चौबीस हजार अनुष्ठान की पूर्व सूचना हमें दे देंगे उनकी साधना का संरक्षण और त्रुटियों का दोष परिमार्जन हम करते रहेंगे।
नवीन साधक :- जो सज्जन अभी तक गायत्री उपासना नहीं करते उनके लिए आश्विन सुदी 1 शनिवार ता. 28 सितम्बर को प्रातःकाल उपासना आरम्भ करने का मुहूर्त बहुत ही शुभ है। उस दिन उपवास, नवीन यज्ञोपवीत धारणा, अपने गायत्री गुरु का अभिवन्दन करके नई माला से जप आरम्भ करना चाहिए। पहले दिन 5 मालाएं जपनी चाहिए बाद को अपनी सुविधानुसार कम या ज्यादा मालाएं जपने का नियम रखा जा सकता है। जिन्हें नियमित साधना करने का अवकाश नहीं मिलता वे 24 मंत्र प्रातःकाल आँख खुलते ही और 24 मंत्र रात को सोते समय मौन मानसिक रूप में मन ही मन जप लिया करें। जप के समय ध्यान भी करते जाना चाहिए। जिन्हें पूरा मंत्र याद नहीं वे पंचाक्षरी गायत्री (ॐ भूर्भुवः स्वः) की उपासना आरम्भ कर दें।
मथुरा न आइये :- नवरात्रि के नौ दिन हमारा उपवास केवल जल के आधार पर रहता है और उन दिनों उपासना का उग्र कार्यक्रम रहने के कारण हमारा अधिकाँश समय एकान्तवास में ही व्यतीत होता है। इसलिए उन दिनों कोई सज्जन मथुरा आकर हमारी शान्ति भंग न करें और न अनावश्यक पत्र व्यवहार ही करें।
मन्त्र लेखन यज्ञ :- गायत्री मन्दिर का कार्य वर्षा समाप्त होते ही प्रारम्भ हो जावेगा। संभवतः यह आगामी गायत्री जयन्ती तक बनकर पूर्ण हो जावेगा। इसमें सदैव सुरक्षित रखने के लिए 24 लक्ष मन्त्र गये थे और उनके भेजने की अवधि आश्विन सुदी 10 सं 2009 रखी गई थी पर अब अवधि बढ़ा दी गई है। मंत्र जेष्ठ सुदी 10 (गायत्री जयन्ती) तक भेजे जा सकते हैं। मन्त्रों की संख्या 24 लक्ष की बजाय 125 लाख (सवा करोड़) कर दी गई है। इसलिए यह लेखन यज्ञ अभी चालू ही रहेगा।
सहस्राँशु ब्रह्म यज्ञ :- गतवर्ष कार्तिक सुदी 11 (देवोत्थान) को सहस्राँशु ब्रह्म यज्ञ प्रारम्भ किया गया था इस योजना के अंतर्गत 125 करोड़ जप 125 लाख आहुतियों का हवन 125 हजार उपवास 2400 ऋत्विजों द्वारा देश के विभिन्न स्थानों पर संपन्न हो रहा है। यज्ञ का दो तिहाई भाग पूरा हो चुका है। शेष एक तिहाई भी आगामी गायत्री जयन्ती तक पूरा हो जाने की संभावना है। चूँकि ऋत्विजों की संख्या पूरी हो चुकी है। इसलिए नये ऋत्विज् अब वरण न किये जायेंगे। जिन ऋत्विजों ने एक वर्ष का संकल्प लिया था वे अपना वर्ष पूरा होने पर साधना समाप्त कर सकते हैं या आगामी गायत्री जयन्ती तक चालू रख सकते हैं।
गायत्री प्रेमियों के आवश्यक कर्तव्य
गायत्री प्रेमियों तथा गायत्री संस्था के सदस्यों के कुछ ऐसे कर्त्तव्य हैं जिनका पालन करने के लिए उन्हें निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(1)नित्य प्रति थोड़ा बहुत गायत्री मन्त्र का शुद्धता पूर्वक जप करें। जप के साथ-साथ ध्यान भी करना चाहिए।
(2) गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में जो बहुमूल्य शिक्षाएं सन्निहित हैं उन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में प्रयुक्त करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।
(3) अपनी उपासना की प्रगति की सूचना आप समय-समय पर गायत्री संस्था को देते रहें और तत्संबन्धी आवश्यक परामर्श प्राप्त करते रहें।
(4) आप अपनी ही गायत्री साधना से संतुष्ट न रहें वरन् अपने निकटवर्ती लोगों, मित्रों, सम्बन्धियों, परिचितों को भी इसी मार्ग पर लगाने के लिए सदैव प्रयत्न करते रहा करें। गायत्री प्रचार एक उच्च कोटि का पुण्य परमार्थ है।
(5) “अखण्ड ज्योति” पत्रिका, गायत्री संस्था की प्रमुख पत्रिका है। इसको स्वयं पढ़ना और इसके नये सदस्य बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।
(6) आपके पास गायत्री साहित्य का पूरा सैट होना चाहिए। जिससे आप इस विद्या के सभी रहस्यों को भली-भाँति जान सकें और आपके मित्र तथा स्वजन सम्बन्धी भी उनसे लाभ उठा सकें। जो पुस्तकें आपके आस न हो उन्हें मँगाने का प्रयत्न करें।
(7) गायत्री साहित्य का मूल्य बहुत ही उचित रखा है फिर भी उनकी बिक्री से जो थोड़ा सा लाभ होता है उससे संस्था का प्रबन्ध, प्रचार, यज्ञ, पुरश्चरण आदि का खर्च चलता है आप गायत्री साहित्य को मँगाने के लिए दूसरों को भी बराबर प्रेरणा देते रहें ताकि उनके आत्म कल्याण के साथ-साथ संस्था का पोषण भी होता रहे।
(8) पत्र व्यवहार करते समय अपना पूरा पता साफ अक्षरों में हर पत्र में लिखने की तथा जवाबी पत्र भेजने की पाठकों से विशेष प्रार्थना है।
पुण्य नर्मदा सदृश्य शुद्ध है नारी का मृदु अन्तर।
उसे शुद्ध करता रहता है कल-करुणा का निर्झर॥
क्षण दो क्षण को यदि उसमें है कभी मलिनता आती।
शुभ्र व्योम में काले घन की छाया सी छा जाती॥
किन्तु शीघ्र ही वह स्वाभाविक पवित्रता पाती है!
इसीलिए तो युगों-युगों से वह पूजी जाती है!!
यह है सत्य कि उस पर पड़ती अवसर की भी छाया।
जबकि विवशताओं से घिर कर हो जाती निरुपाया॥
पर उनके हटते ही होती वह जैसी की तैसी।
समझ नहीं पाते हम प्रभु यह तेरी लीला कैसी॥
युग का विष पीकर के जग में अमृत बरसाती है!
कल्पवृक्ष के सदृश युगों से वह गौरव पाती है!!
लक्ष्मी का अवतार दिव्य यह उसकी पावन गरिमा।
शब्दों से तो परे रही हे देवी! तेरी महिमा॥
कहा गया है “जहाँ कहीं नारी पूजी जाती है।
वहीं देवताओं की ममता, मानवता पाती है॥”
सम्मानिता, संतुष्ट नारी है घर को स्वर्ग बनाती!
निर्धनता, दुःख, पीड़ा उसके पास नहीं, है आती!!
नर से बहुत अधिक नारी में सहृदयता होती है।
वह निज दुःख से नहीं अन्य के दुःख में ही रोती है॥
है समाज रचना की केवल वह ही उत्तरदायी।
हिंसा, स्वार्थ, अनीति न उसके पास फटकने पाई॥
राष्ट्रों का है सामाजिक नेतृत्व उसी के कर में!
कल्पलता छाई है देखो यहीं तुम्हारे घर में!!
नारी जहाँ कहीं गृह लक्ष्मी वहीं स्वर्ग-सा घर है।
धन से और धान्य से पूरित वह परिवार रुचिर है॥
बाल रूप भगवान वहीं पर आकर मोद मनाते।
हरे खेत, श्यामल घन, मंगल गीत मनोहर गाते॥
नारी को सुविधा, समता, शिक्षा दो उच्च बनाओ!
शुद्ध नेह का दीप पुण्य-गृह मन्दिर बीच जलाओ!!
*समाप्त*
(श्री शिवशंकर जी मिश्र, एम. ए.)