स्वर्ण सूक्तियाँ

-धर्माचरण से दीर्घ आयु, उत्तम संतान तथा अक्षय धन की प्राप्ति होती है। इसी धर्म का निष्काम आचरण मोक्ष पद है सदाचार धर्म का मूल है, सत्य कर्म तथा सत्पुरुषों का आचरण ही सदाचार है।

-मनुष्य को उचित है कि धर्म से वेद शास्त्र का स्वाध्याय तथा गायत्री प्रणव (ॐ) का अर्थ, विचार जप पौर्णमास्य आदि हवन, पंच यज्ञ, न्याय से अपनी वर्णानुसार जीविका उपार्जन, निष्काम कर्म, परोपकार योगाभ्यास आदि उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी स्थिति के योग्य बनावें।

-मनुष्य को उचित है कि वह तब तक कर्म का त्याग न करें, जब तक कर्म स्वयं न त्याग दे अर्थात् ईश्वर प्रेम में सुध-बुध न रहे। जब तक भूख प्यास शरीर के दुःख सुख का भान है तब तक कर्म, नाम स्मरण, आदि चलने अति आवश्यक हैं।

-सत्कर्मों से होने वाला आनंद ही सच्चा आनंद है और इसी आनंद के द्वारा हृदय की सद्वृत्तियों का विकास होता है और उत्तरोत्तर सत्कार्य करने के लिए मनुष्य अधिकाधिक प्रवृत्त होता है।

-जब तक जीव संज्ञा है, जब तक अपनी पृथकता का अनुभव है तथा दुख से छूटकर सुख पाने की इच्छा है तब तक जीवन को अपने धर्म का पालन करना ही चाहिए। जैसे भगवान का धर्म कृपा है वैसे ही जीव का धर्म-साधन है। वह साधन क्या है? भगवान कृपा पर विश्वास करो इतना ही पुरुषार्थ है।

-वास्तव में हमें जो आवश्यक है, उचित रूप से चाहिये वह हमें प्रभु अवश्य देते हैं तथा आगे भी जो आवश्यक होगी उसकी पूर्ति भी वे अवश्य करेंगे। जो हमें प्राप्त नहीं उसकी आवश्यकता भी हमें नहीं है हमारे लिए जो आवश्यक है, वह प्रभु न दें यह असम्भव है। क्योंकि उन जैसा स्वामी, रक्षक, हेतु रहित दयालु, भर्ता कोई नहीं है। केवल हमारी इच्छाएं किवाड़ बन कर हमें प्रभु के दान से वंचित कर रही है।

-जिनकी कामादि कामना दुख नहीं हुई है अर्थात् जिनका रज, तम, शाँत नहीं हुआ है उन कुयोगी पुरुषों को प्रभु का दर्शन दुर्लभ है। निष्पाप व्यक्ति, प्रभु में प्रीति रखने वाला अंतःकरण सकल वासनाओं को धीरे-धीरे त्याग देता है।

वर्ष-13 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-4


प्रेम-वन्दना

(श्री नारायण लाल जी परमार)


प्रेम-वन्दना (Kavita)

प्रेम दुनिया में बड़ा है।

प्रेम का वरदान पाकर।

आज अपना सर उठाकर॥

देवताओं की सभा में आदमी जाकर खड़ा है!

प्रेम दुनिया में बड़ा है!!

प्रेम है रस जिन्दगी में!

प्रेम प्रभु की बन्दगी में!!

प्रेम से मानव चरण में स्वर्ग का वैभव पड़ा है!

प्रेम दुनिया में बड़ा है!!

प्रेम में अविराम क्षमता!

प्रेम से अमृत बरसता!!

इसलिये इंसानियत के जय मुकुट में वह जड़ा है!

प्रेम दुनिया में बड़ा है!!


परमार्थ और स्वार्थ का समन्वय

त्यन्दनं परमार्थस्य परार्थोहि बुधैर्मतः। योऽन्यान् सुखयते विद्वान तस्य दुःखं विनश्यति॥

अर्थ- लोकहित में ही अपना परम स्वार्थ सन्निहित है। जो दूसरों के सुख का आयोजन करता है उसके दुख स्वयं नष्ट हो जाते हैं।

मनुष्य की कार्य पद्धति तीन प्रकार की होती है। (1) अनर्थ- अर्थात् दूसरों को हानि पहुँचा कर भी अपना मतलब सिद्ध करना (2) स्वार्थ- व्यापारिक दृष्टि से दोनों ओर के स्वार्थों का सम्मिलन एवं संतुलन (3) परमार्थ- अपनी कुछ हानि सहकर भी लोक हित की साधना। इन तीनों में से परमार्थ में ही अपना परम स्वार्थ समाया हुआ है।

अनर्थ में प्रवृत्त व्यक्ति असुर, स्वार्थ में प्रवृत्त पशु, और परमार्थ में रत व्यक्ति को ‘मनुष्य’ कहते हैं। मनुष्यता को ही सर्वत्र श्रद्धा, प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा प्राप्त होती है।

देव उसे कहते हैं जो दूसरों को अपना सहयोग एवं सेवा से सुखी बनाये। देव स्वभाव का अवलम्बन करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में स्वर्गीय सुख शान्ति का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।

दूसरों को अभाव ग्रस्त, दुखी, निर्बल एवं विपन्न देखकर जिनकी अन्तरात्मा रो पड़ती है, जो दूसरों को सुखी एवं समुन्नत देखकर प्रसन्न होते हैं ऐसे देव पुरुषों को ही परमार्थी कहते हैं। वे अपनी शक्तियों और योग्यताओं को अपने शौक मौज में न लगाकर दूसरों की सहायता में व्यय करते हैं। ऐसा करने के कारण वे यद्यपि भौतिक सम्पत्तियों से वंचित रहते हैं, फिर भी उनकी मनोभूमि स्वर्गीय आनंद से ओत-प्रोत रहती है। जहाँ देवत्व रहेगा वहाँ स्वर्ग भी अवश्य रहेगा।

लोकहित में संलग्न व्यक्ति को लोगों का सहयोग, आदर, प्रेम, सद्भाव एवं प्रत्युपकार प्राप्त होता है। वह अजात शत्रु बन जाता है। फलस्वरूप उसे अनेकों कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है और अनेकों अभावों की पूर्ति अपने आप होती रहती है।

हमारे धर्म ग्रंथों में देवता, मनुष्य और राक्षसों के आलंकारिक वर्णन मिलते हैं। वास्तव में यह तीनों ही मनुष्य होते हैं। गुण, कर्म और स्वभाव के भेद से उन्हें तीन श्रेणियों में रख दिया गया है। कवि ने अपनी कवित्वमयी भाषा में उनका वर्णन किया है और चित्रकारों ने अपनी कल्पनाशीलता का आलंकारिक उपयोग करके उन्हें चित्रित किया है। देवताओं की असाधारण सुँदरता, उनके आत्मिक सौंदर्य का प्रतिबिंब है और राक्षसों की आँतरिक शैतानी को उनके चेहरे कुरूप, भयानक एवं घृणास्पद बनाकर उनकी बुरी शक्लें बनाई गई हैं।

देवता वे होते हैं जो दिया करते हैं। जिनका स्वभाव सात्विक होता है, जिन्हें सात्विक विचार एवं कार्य पसंद होते हैं, परोपकार, सेवा सहायता, ज्ञानदान, सत्कर्मों की वृद्धि, गिरों को उठाना, सब को अपना समझना प्राणिमात्र से प्रेम करना, अपनी शक्तियों को अपने लिए कम से कम काम में लेकर अधिकाँश को दूसरों को दे देना, लोक कल्याण में जन सेवा में, दत्त-चित्त करना, आत्म शुद्धि, संयम, ईश्वराधना में अधिक रुचि होना, भीतर और बाहर सुख शान्ति की वृद्धि करना यह देवताओं का काम है। स्वर्ग में- (आन्तरिक शान्ति में) निवास करने वाले देवता- शुभ कर्म करने वालों पर आकाश से पुष्प बरसते हैं, ऐसे अनेक प्रसंग पुराणों में आते हैं। पुष्प बरसाने से तात्पर्य प्रोत्साहन देने से है। इस प्रकार के गुण कर्म स्वभाव वाले व्यक्ति देवता कहलाते हैं।

मनुष्य वह है जो अपनी मर्यादा पर, कर्तव्य निष्ठा पर, अविचल रूप से स्थिर है। जिसे अपनी आत्मिक महानता का, ज्ञान है। जो आत्म गौरव की, आत्मिक श्रेष्ठता की रक्षा के लिए नीच कर्मों से सदा ही बचता रहता है। वचन को पूरा करना, प्रतिज्ञा को निबाहना, कर्तव्य मर्यादा की रक्षा करना जिसे प्राण प्रिय होता है, पुरुषार्थ द्वारा जो समृद्धि उपार्जित करता है, साहस द्वारा जो यशस्वी बनता है, जो स्वयं निर्भय रहता है और दूसरों को आश्रय प्रदान करता है वह मनुष्य है। रजोगुण प्रधान होते हुए भी, भोग-ऐश्वर्य में प्रवृत्ति होते हुए भी, वह निरन्तर सतोगुण की ओर प्रगति करता है। मनुष्यता को कलंकित करने वाले विचारों, कार्यों और व्यक्तियों से लड़ने के लिए वह सदैव तत्पर रहता है। एकता, मेल-जोल, सब की बढ़ोतरी, प्रेम और सुख शान्ति उसे पसन्द होती है। इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ जिनमें प्रधान हों उन्हें मनुष्य कहते हैं।

असुर वे हैं- जिनको अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि है। अपने लाभ के लिए जो दूसरों की हानि की परवाह नहीं करते, कभी-कभी तो अपना लाभ न होते हुए भी अकारण दूसरों को सताते हैं। हिंसा, हत्या, निष्ठुरता, क्रूरता, शोषण, उत्पीड़न, अन्याय एवं अनाचार करने में जिन्हें आनन्द आता है, अहंकार में डूबे रहते हैं, आलस्य, प्रमाद एवं मनोरंजन में जिन्हें विशेष प्रीति होती है, काम वासना की असीम तृष्णा में जो रात-दिन डूबे रहते हैं। उनकी जिह्वा का चटोरापन बेकाबू होता है। आवश्यकता-अनावश्यकता की, भक्ष-अभक्ष की, परवा न करके वे स्वाद को ही प्रधानता देते हैं धर्म की ओर आत्म चिन्तन की ओर, स्वाध्याय एवं सत्संग की ओर उनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वास घात, बेईमानी लीनता, एवं दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा आच्छादित रहता है। धन संचय करके सोने की लंका बनाने की धुनी उन्हें सताती रहती है।

उपरोक्त तीन प्रकार के मनुष्यों को- देवता, मनुष्य और राक्षस कहा जाता है। यह श्रेणियाँ प्राचीन काल में भी थीं और आज भी हैं। पूर्व काल में राक्षस थोड़े थे और उन्हें खदेड़ते-खदेड़ते भारत के अन्तिम कोने में, समुद्र पार, लंका में पहुँचा दिया था, पर आज तो चारों और राक्षस ही राक्षस फैले दीखते हैं। सब ओर लोग अनर्थ ही अनर्थ करने में जुटे हुए हैं। स्वार्थ, विशुद्ध स्वार्थ-नीति, न्याय और धर्म युक्त स्वार्थ, साधन करके मनुष्यता की रक्षा करने की प्रवृत्ति भी बहुत कुण्ठित हो गई है। परमार्थ के तो दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। बेचारा देवत्व तो किसी कौने में अपने प्राण बचा कर छुपा बैठा है। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर लेने पर संसार को रोग, शोक, कष्ट, युद्ध, भय, संकट एवं दैवी प्रकोपों का ही सामना करना पड़ता है। आज पृथ्वी के एक कोने से दूसरे तक जो सन्ताप छाया हुआ है उसका कारण परमार्थ की, देवत्व की, उपेक्षा एवं अनर्थ, असुरत्व की अभिवृद्धि ही है।

गायत्री का तेरहवाँ अक्षर “स्व” वर्तमान दुख-दायक नारकीय परिस्थिति से छूटने और आनन्ददायक स्वर्गीय सुख शान्ति उपलब्ध करने का मार्ग बताता है। गायत्री माता के ‘स्व’ अक्षर का सन्देश है कि यह भली भाँति समझ लो कि समाज के सुख में ही तुम्हारा सुख समाया हुआ है। यदि दूसरों की उन्नति और सुख शान्ति के लिए तत्पर होंगे तो ही तुम्हारी कठिनाइयाँ हल हो सकेंगी।’ दूसरों की, समाज की, उपेक्षा करने, केवल अपने ही लाभ की बात सोचने का मनोवृत्ति ऐसी दूषित है कि वह केवल विपत्ति ही उत्पन्न कर सकती है। चारों ओर दावानल से जला देने वाला मनुष्य बीच में सुख शान्ति को स्वयं भी नहीं रह सकता। फुलवारी लगाने वाला ही उसके बीच में बैठने पर हरियाली तथा सुगन्ध में अपनी अन्तरात्मा को प्रफुल्लित कर सकता है।

परमार्थ का जीवन नीति बनाने वाला व्यक्ति भले ही सोने की लंका खड़ी न कर सके, भले ही विलास की सामग्रियों के पहाड़ और अहंकार का अट्टहास कराने वाले उपकरण एकत्रित न कर सके पर जो कुछ उसके पास होगा वह उतना मूल्यवान होगा कि करोड़ों कुबेरों की सम्पदा को उस पर निछावर किया जा सकता है।

गायत्री माता हमें ‘देव’ बनाना चाहती है। देवत्व का असाधारण सौंदर्य एवं अमरत्व हमें प्रदान करना चाहती है। इसीलिए उसकी शिक्षा यह है कि हमारी जीवन नीति अनर्थ की न हो, स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ में प्रवृत्त हो। असुरता से बचें, मनुष्यत्व की रक्षा करें और देवत्व की ओर तेजी से बढ़ते चले। माता का यह सन्देश शिरोधार्य करने वाला साधक माता की सच्ची कृपा प्राप्त करता है, ऐसा निश्चित है।


योगी अरविन्द की अमृतवाणी

हमारे पास कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम अपनी कह सकें, सब वस्तु भगवान की हैं, यह जीवन उसी के लिए है, हमारी वासना, हमारी कामना हमारा मतामत, हमारा आदर्श, उचित-अनुचित, सम्भव-असम्भव- जो कुछ ज्ञान है उन सबको इसी भगवत् ज्ञान के अनुगामी करना होगा। हृदय की समस्त आशा आकाँक्षा एवं बुद्धि के सब विकारों को हटाना होगा। धारणा करनी होगी कि यह जगत् और हम अभिन्न हैं, इस अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड के भीतर सत्-चित् आनन्द है, यह सब उसी परब्रह्म के विकास हैं, वे ही इस विश्व पट पर ज्ञान, शक्ति और प्रेम की अनन्त लीला प्रकट करते और दिखलाते हैं। सभी प्रकार के भेद-भावों को दूर करके, उस विश्व शिल्पी के हाथ में अपने को खिलौने की तरह समर्पण करके निश्चिंत होने से ही परम आनन्द मिल सकेगा। अहंकार इस उत्तम मार्ग का कण्टक है, अहंकार दूर होने से भगवान की पूर्ण लीला इन लोगों के जीवन कुँज में अभिनीत होगी, पूर्ण ज्ञान, प्रेम, आनन्द और शान्ति से हमारा यह जीवन पूर्ण रूप से विकसित हो उठेगा और तभी हम दिव्य जीवन का उपभोग कर सकेंगे, क्योंकि हमारा जीवन भगवत् लीला का आधार स्वरूप बन जाएगा। इस प्रकार का आत्मोत्सर्ग यदि साधक अशंतः भी कर सकेंगे तो उनके कुसंस्कारों की दुष्प्रवृत्तियाँ और बुरे कर्मों की ओर झुलाने वाली अन्धचेष्टा की वृत्तियाँ दूर हो जायगी।

जिसे देखिये वही यह कहता सुनाई देता है कि सत्युग अब नहीं रहा, ईमानदारी, विश्वास, सत्यता सब इस संसार से उठ गई। अब कलियुग आया है और बढ़ता चला जा रहा है। पर किसी ने एक बार भी विचार नहीं किया कि यह सत्युग क्या है। सत्युग कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो जन्म जन्मान्तर में किसी एक नियमित समय पर ही आवेगी और फिर चिरकाल के लिए दृष्टि पथ से ओझल हो जायगी। हम अपना सत्युग और कलियुग अपनी प्रेरणा से आप बना सकते हैं। जिस समय मनुष्य इस जाग्रत जीवन का अधिकार बढ़ाकर इस सूक्ष्म स्थान पर पहुँच जाता है, वासना, कामना, संस्कार आदि से किसी तरह का सम्बन्ध नहीं रखता, इस पार्थिव शरीर में अवस्था भेद की समता नहीं रखता अर्थात् आधार और आधेय इन दोनों की भिन्नता पूर्ण रूप से अलग कर देगा उसी समय इस संसार में स्वर्गीय राज्य पुनः उदय हो जायगा, यही सत्युग है। इस समय पृथ्वी तल पर रहने वाली मानव जाति बुद्धि, मन और शरीर को ही सर्वप्रधान मानती और बतलाती है, इन्हीं के चक्कर में पड़ी वह नाना प्रकार की लीलाएं किया करती है। स्वर्ग लोक की खोज-खबर वह नहीं रखना चाहती। वहाँ की चर्चा वह एकदम भूल गई है। आज फिर नये सिरे से हमें अनुष्ठान करना होगा। शक्ति को पुनः जगाना होगा। अहंकार का सिर हमें नीचा करके रखना होगा। हम दिव्य लोक के अधिकारी हैं, इस बात का हमें फिर से ज्ञान प्राप्त करना होगा। इसी से सत्युग की पुनः स्थापना होगी और इसीलिए साधना तथा तपस्या का सारा प्रयास है। यदि इस प्रयास से हम लोग एक बार भी उस स्थान तक पहुँच गए तो हम लोग यन्त्रणाओं से मुक्त होकर, सिद्ध बनकर, सत्य और आनन्द की लीला में रहकर इसी मृत्यु लोक को ही स्वर्ग बना देंगे। उस युग के लोग (अर्थात् सतयुग के जीव) इस स्वर्गधाम का पता लगाकर इस पृथ्वीतल से संबन्ध त्यागकर उस महत धाम को पहुँचते थे। पर आज हम लोग इस योग के द्वारा स्वर्गलोक के अधिकारी बन कर भी इस पृथ्वी से सम्बन्ध नहीं त्यागेंगे? जिस प्रकार तपस्वी भागीरथ स्वर्ग से गंगा की धारा बहाकर इस अवनीतल को पवित्र कर सके, उसी प्रकार हम लोग भी अमृत का भांड़ लेकर इस संसार में भी अमरलोक की लीला करेंगे, इस मर्त्यलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे।

जीव इस समय माया के फन्दे से छूट जाता है और भेदभाव का विचार उसके मन से दूर हो जाता है उस समय उसे ज्ञान होता है और वह दिव्य दृष्टि से देखता है कि उसमें और ब्रह्म में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, अखिल ब्रह्माण्ड, यह संसार, हमारा शरीर सभी ब्रह्ममय हैं। इसलिए हे साधक! इस ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर मृत्युलोक में विचरण करते हुए दिव्य युग की एक बार पुनः स्थापना का भार तुम्हारे ही ऊपर है।

यह आदि और अन्त रहित ब्रह्म अखण्ड है, इसमें खण्ड नहीं हो सकता। इस अवनी तल की समस्त वस्तुएं भी इसी ब्रह्म के द्वारा प्रकाशित हैं। इस विश्व के समस्त तथा प्रत्येक पदार्थों में व्याप्त रहने पर भी इसकी पूर्णता में किसी प्रकार का अन्तर नहीं आने पाता क्योंकि वह सदा और सर्वदा परिपूर्ण है, पूर्णता ही उसका प्राकृतिक गुण और भाव है।

यह परमेश्वर पूर्ण है बल्कि पूर्ण से भी पूर्ण है। इसलिए जिस वस्तु में इस पूर्ण का पूर्णरूप से समावेश होगा वह सदा पूर्ण रहेगा। इस भाव को अंतर्गत करके केवल चैतन्य पदार्थों में ही नारायण शिव तथा शक्ति का ज्ञान प्राप्त करना होगा, यह बात नहीं है, बल्कि इस संसार की सभी जड़ वस्तुओं में भी श्रीभगवान की उपस्थिति की भावना करनी होगी। पर हमारी जड़ चक्षु अवनीतल को अंगुल-अंगुल खोज कर डालने पर भी ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाती, ब्रह्म का साक्षात् नहीं कर पाती। अन्धों की भाँति केवल भगवान की रट लगाने से तो कोटि जन्म में भी भगवान का दर्शन नहीं हो सकता। जिस दिन स्वर्ग की पवित्र तेजमय किरण से हमारी जड़ चक्षु प्रकाश प्राप्त कर माया के अन्धकार से निकल भागेगा, जिस दिन ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से हमारे मन की शंकाएं और भ्रम दूर हो जाएंगे, उसी दिन हम धन्य तथा कृत-कृत्य हो जांयगे। उस दिन संसार को मोहित करने वाला सत्-चित आनन्दमय भगवान का रूप देखकर, उसका दर्शन करके हम धन्य होंगे।

जब तक इस दिव्य चक्षु का उद्घाटन नहीं होता अर्थात् जब तक यह दिव्य नेत्र नहीं खुलते तब तक साधन निष्फल और निष्प्रयोजन है, केवल मायाजाल है और जिस दिन यह ज्ञानचक्षु खुल जाएंगे उस दिन प्रतीत होगा कि इस संसार में कोई भी पदार्थ अचेतन नहीं है, संसार की सभी वस्तुओं में सच्चिदानन्द परमेश्वर का निवास है। सब के अंतर्गत प्राण, चेतना, मन तथा विज्ञान अधिष्ठित हैं, सब वस्तु के बीच में लीलामय श्रीहरि निवास करके अपने अनन्त गुणों का अपार आनन्द उपभोग करते हैं। संसार की सभी व्यक्त, अव्यक्त प्रकाशोन्मुख वस्तु में, जिसके बीच में परात्पर पुरुष पूर्ण रूप से अव्यक्त रूपेण विद्यमान हैं, अथवा जिसके प्रकाश में चैतन्य का कोई भी रूप देखने में नहीं आता, दिव्य चक्षु प्राप्त हो जाने पर उसके बीच में भी श्री आनन्द स्वरूप भगवान की दिव्य लीला देखने को मिलेगी। पत्र, पुष्प, पत्थर, मिट्टी, पेड़, पौधा- इन सभी वस्तुओं की रचना में विशेष-विशेष प्रकार का आनन्द है। उस आनन्द का आभास उसकी रचना चातुरी से प्रकट होता है। प्रत्येक वस्तु के अंतर्गत श्रीहरि चित् रूप से विराजमान होकर भिन्न-भिन्न रसों का उपभोग कर आनन्द लेते हैं। एक-एक ही ब्रह्म का अनन्त रूप से, अनेक वस्तुओं में निवास देखकर कभी भी इस बात की कल्पना नहीं करनी चाहिये कि ब्रह्म खण्ड है, वह विभक्त होकर आँशिक रूप से इन नानाविधि वस्तुओं में विराजमान है। भगवान द्विधा या विभक्त नहीं हो सकता। काल, स्थान अथवा समय का उस पर किसी तरह का प्रभाव नहीं पड़ सकता। अभेद व अखण्ड होकर ही वह संसार की सभी वस्तुओं में समभाव से विराजमान होकर लीला करता है।

जिस साधक में तमोगुण की प्रधानता रहती है उसे दो प्रकार की विपत्ति में फँसने की सम्भावना रहती है। सबसे पहले साधक के हृदय में उठता है कि- “मैं दुर्बल, पापी, घृणित, अज्ञानी, अकर्मण्य हूँ। जिस किसी को मैं देखता हूँ सभी मुझसे ऊँचे दिखाई देते हैं। मैं सबसे नीच हूँ। भगवान को हमारी आवश्यकता नहीं। भगवान मुझे अपनी शरण में लेकर क्या करेंगे?” यानी ईश्वर की शक्ति परिमित है और अवस्था विशेष के ऊपर निर्भर करती है और यह उक्ति मिथ्या है कि वह गूँगे को बोलने की शक्ति प्रदान कर सकता है और लूले को चलने की शक्ति दे सकता है। दूसरे यदि साधक को थोड़ी बहुत शान्ति मिल गई तब उसी का आनन्द उपभोग कर वह मन में सोचने लगता है कि चलो सारा प्रपंच दूर हुआ, मुझे शान्ति मिल गई। इस प्रकार कह कर वह सब प्रकार के कर्मों में मुंह मोड़कर आनन्द करने लग जाता है। साधक को सदा इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि वह भी परब्रह्म का अंश है और आदिशक्ति उसके हृदय में अवस्थान करके उसका संचालन करती है। सर्वशक्ति मान भगवान की लीला तरह-तरह की होती है। किसी एक लीला के परवश होकर साधक को उदासीन होकर बैठे रहना सदा अनुचित है। वह जो कुछ करता है सब उसकी आनन्द लीला है। उसे उत्पात या और कुछ समझना सर्वथा भूल है। पर जब तक किसी तरह का अहंकार विद्यमान रहता है तब तक इस तरह की धारणा का उत्पन्न होना सम्भव नहीं है। कर्मबन्धन के कट जाने पर भी हमें कर्म तो करना ही होगा।


ईश्वर और उसकी प्रार्थना

(महात्मा गान्धी)

ईश्वर और उनके नियम भिन्न नहीं है। कर्म किसी को छोड़ता नहीं, न ईश्वर किसी को छोड़ता है। दोनों एक वस्तु है। एक विचार हमें कठोर बनाता है दूसरा नम्र! संसार में कोई न कोई अपूर्व चेतनामय शक्ति काम कर रही है, उसे आप चाहे जिस नाम से पुकारें, लेकिन वह हमारे प्रत्येक काम में हस्तक्षेप तो किया ही करती है। हमारा प्रत्येक विचार कर्म है। कर्म का फल होता है। फल ईश्वरीय नियम के आधीन है। यानी हमारे प्रत्येक काम में ईश्वर उसका नियम हस्तक्षेप किया ही करता है। फिर भले ही हम इसको जानते हों या अनजान हों। स्वीकार करें का अस्वीकार।

लेकिन में बुद्धिवाद द्वारा ईश्वर पर श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकता। मैंने थोड़े तर्क का उपयोग किया है, इसका किसी पर प्रभाव पड़े तो ठीक है। मैं अपने लेखों द्वारा दूसरों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सकता, मैं कबूल करता हूँ कि मेरा अनुभव अकेले मुझे ही मदद कर सकता है जिन्हें शंका हो वे सत्संग की खोज करें और खोज करने में पुरुषार्थ है वह सब को भले मिले।

मैं यह नहीं मानता कि बौद्ध और जैन लोग अज्ञेयवादी या नास्तिक हैं। वे अज्ञेयवादी हरगिज नहीं हो सकते। जो लोग आत्मा को शरीर से भिन्न मानते हैं और शरीर के नष्ट हो जाने पर भी उसकी स्वतंत्र हस्ती रहना स्वीकार करते हैं वे नास्तिक नहीं कहे जा सकते। हम सब ईश्वर की जुदी-जुदी व्याख्यायें करते हैं। हम सब ईश्वर की व्याख्यायें अपनी मरजी के मुताबिक करें तो उतनी ही व्याख्यायें होंगी जितने कि स्त्री या पुरुष होंगे लेकिन इन जुदी-जुदी व्याख्याओं के मूल में भी एक किस्म की अभ्रांत सा दृश्य होगा, क्योंकि मूल तो सब का एक ही है। ईश्वर तो वह अनिर्वचनीय (लाकलाम) वस्तु है कि जिसका हम सब अनुभव करते हैं लेकिन हम सब जिसे जानते नहीं। बेशक चार्ल्स ब्रेडला ने अपने को नास्तिक कहा है, लेकिन बहुतेरे ईसाइयों ने उन्हें ऐसा नहीं माना है। मुख से अपने को ईसाई कहने वाले बहुत से लोगों को मुकाबले में उन्हें ब्रेडला में अपने तई अधिक समानता मालूम हुई थी। भारत से उस भले मित्र की अन्त्येष्टि क्रिया के समय मौजूद रहने का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उस समय हमने बहुत से पादरियों को वहाँ देखा। उनके जनाजे के साथ कुछ मुसलमान और बहुतेरे हिन्दू भी थे। वे सब ईश्वर के मानने वाले थे। ब्रेडला ने वैसे ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार किया था जैसा कि वे जानते थे कि उसका वर्णन किया जाता है। उस समय जो शास्त्रीय विचार थे उसके तथा आचार और विचार के भयंकर भेद के खिलाफ उनका पाँडित्य पूर्ण और तेज विरोध था। मेरा ईश्वर ही मेरा सत्य और प्रेम है। नीति और सदाचार ईश्वर है। निर्भयता ईश्वर है। ईश्वर जीवन और प्रकाश का एक मूल है। और साफ भी इन सब से परे है। ईश्वर अन्तरात्मा ही है। वह नास्तिकों की नास्तिकता भी है। क्योंकि वह अपने अमर्यादित प्रेम से उन्हें भी जिन्दा रहने देता है। वह हृदय को देखने वाला है। वह बुद्धि और वाणी से परे है। हम स्वयं जितना अपने को जानते हैं उससे कहीं अधिक वह हमें और हमारे दिलों को जानता है जैसे कहते हैं वैसा ही वह हमें नहीं समझता। क्योंकि वह जानता है कि जो हम जबान से कहते हैं अक्सर वही हमारा भाव नहीं होता। और यह कुछ लोग तो जानकर करते हैं तो कुछ अनजान में। ईश्वर उन लोगों के लिये एक व्यक्ति ही है जो उसे व्यक्ति रूप में हाजिर देखना चाहते हैं। जो उसका स्पर्श करना चाहते हैं उनके लिए वह शरीर धारणा करता है। वह पवित्र से पवित्र तत्व है। जिन्हें उसमें श्रद्धा है उन्हीं के लिए उसका अस्तित्व है। सब लोगों के लिए वह सभी चीज है। वह हम में व्याप्त है और फिर भी हमसे परे है।

क्योंकि वह हमें पश्चाताप करने के लिए मौका देता है। दुनिया में सबसे बड़ा प्रजातंत्र-वादी वही है, क्योंकि वह बुरे-भले को पसन्द करने के लिये हमें स्वतंत्र छोड़ देता है। वह सबसे बड़ा जालिम है, क्योंकि वह अक्सर हमारे मुँह तक आये हुए कोर को छीन लेता है और इच्छा स्वतंत्र की ओट में हमें इतना कम छूट देता है कि हमारी मजबूरी के कारण उससे सिर्फ उसी को आनन्द मिलता है। यह सब हिन्दू-धर्म के अनुसार उसकी लीला है, उसकी माया है, हम कुछ नहीं हैं, सिर्फ वही है और अगर हम हों तो हमें सदा उसके गुणों का गान करना चाहिए और उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहिये। आईये, उसकी वंशी के नाद पर हम नाचें। सब अच्छा ही होगा।

करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिए निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह तो सृष्टा के साथ एक होने को हृदय की उत्कटेच्छा को प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करते हैं। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृभाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है। गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो कि असल गायत्री में होता है। राम शब्द के उच्चारण से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फोरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका उन पर कोई असर न होगा। चिरकाल के उपयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजित पवित्रता से शब्दों की शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए सबसे अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों की संस्कृत भाषा रखने के लिए बहुत सी दलीलें दी जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिये यह बात तो बिना कहे ही मान ली जानी चाहिये ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहिये इसका कोई नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी-जुदी व्यक्तियों के आधार पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये लक्ष्य बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियाएँ हमें नम्र और शान्त बनाने के लिए होती हैं और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो ‘उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।’ ये लक्ष्य ऐसे हैं कि इसमें मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है, अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है और क्षमा याचना करते हुए अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिए प्रार्थना करता है। कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घंटे भी काफी नहीं हो सकते हैं।

उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजदूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत् प्रार्थना और भक्ति के कार्यों में बना होता है। परन्तु वे लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना कम होगा। यदि उन में धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा।

यह कहना कि मैं ईश्वर को नहीं मानता, बड़ा आसान है। क्योंकि ईश्वर के बारे में चाहे जो कुछ कहा जाय- उसको ईश्वर बिना सजा दिये कहने देता है। वह तो हमारी कृतियों को देखता है। ईश्वर के बनाए हुए किसी भी कानून के खिलाफ काम करने से वह काम करने वाला सजा जरूर पाता है लेकिन वह सजा सजा के लिए नहीं होती, बल्कि उसे शुद्ध करने और अवश्य ही सुधारने की सिफत रखने वाली होती है। ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध हो नहीं सकता और न उसके सिद्ध होने की जरूरत ही है। ईश्वर तो है ही। अगर वह दीख नहीं पड़ता तो यह हमारा दुर्भाग्य है। उसे अनुभव करने की शक्ति का अभाव एक रोग है और उसे हम किसी न किसी दिन दूर कर देंगे- वह हम चाहें या न चाहें।

प्रार्थना करना याचना करना नहीं है, वह तो आत्मा की पुकार है- वह अपनी त्रुटियों को नित्य स्वीकार करना है। हम में से बड़े से बड़े मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था, दुर्घटना इत्यादि के सामने अपनी तुच्छता का भान हर दम हुआ करता है। जब अपने मनसूबे लमहे भर में मिट्टी में मिलाये जा सकते हैं, जब अचानक या पल भर में हमारी खुद हस्ती मिटाई जा सकती है। जब ‘तुम्हारे मनसूबों’ का मूल्य ही क्या है?

लेकिन अगर हम यह कह सकें कि ‘हम तो ईश्वर के निमित्त तथा उसी की रचना अनुसार ही काम करते हैं’ तब हम अपने को मेरु की भाँति अचल मान सकते हैं। तब तो कुछ फसाद ही नहीं रह जाता। उस हालत में नाशवान कुछ भी नहीं है। तथा दृश्य जगत ही नाशवान् मालूम होगा। लेकिन केवल मृत्यु और विनाश सब असत मालूम होते हैं, क्योंकि मृत्यु या विनाश उस हालत में एक रूपांतर मात्र है-उसी प्रकार जिस प्रकार कि एक शिल्पी अपने चित्र को इससे उत्तम चित्र बनाने के हेतु नष्ट कर देता है और जिस प्रकार एक घड़ीसाज अच्छी कमानी लगाने के अभिप्राय से रद्दी को फेंक देता है।

सामुदायिक प्रार्थना बड़ी बलवती वस्तु है। जो काम हम प्रायः अकेले नहीं करते, उसे हम सबके साथ करते हैं। लड़कों को निश्चय की आवश्यकता नहीं। अगर वे महज अनुशासन के पालनार्थ ही सच्चे दिल से प्रार्थना में सम्मिलित हों, तो उनकी प्रफुल्लता का अनुभव होगा।


मित्र का महत्व

(श्री विट्ठलदास मोदी, सम्पादक-’आरोग्य’)

कभी मैंने बच्चों की एक पत्रिका में एक कहानी पढ़ी थी। वह यों हैः- ‘नीचे के एक हिस्से में कुछ सिपाही यात्रा कर रहे थे। एक दिन रात होने पर वे एक सूखे नाले के निकट ठहरे। रात को थक कर सो रहे थे तो अचानक उन्होंने ये शब्द सुने- “सूखे नाले की तह से मुट्ठी भर पत्थर उठा लो। ऐसा करने पर तुम्हें सुख भी होगा और दुःख भी।”

सिपाहियों ने वैसा ही किया और सवेरा होते होते वे अपनी यात्रा पर चल पड़े। दोपहर को जब उन्होंने भोजन के लिये यात्रा स्थगित की तो एक सिपाही ने अपनी जेब में से वह पत्थर निकाले सूर्य के प्रकाश में वह देखता क्या है कि वह पत्थर नहीं हीरे और लाल हैं। दूसरे सिपाहियों ने भी देखा उनकी जेबों में भी पत्थर नहीं हीरे और लाल ही थे।

तब उन्होंने सोचा कि जिसने यह कहा था कि नाले की तह से मुट्ठी भर पत्थर ले लो तो तुम्हें सुख भी होगा और दुःख भी, सत्य ही कहा था। उस समय तो वे इन शब्दों का अर्थ नहीं समझ सके थे पर अब अर्थ स्पष्ट हो गया था। वे खुश थे कि उन्हें हीरे-मोती मिले और दुःख था कि क्यों मुट्ठी भर ही लिया।’

ठीक ऐसा ही दुःख-सुख जीवन की अनेक चीजों के साथ जुड़ा होता है। मेरे अपने शिक्षा काल की बात है। कालेज में अध्ययन को सारी सुविधाएँ मुझे प्राप्त थीं, पर मैं उस समय कक्षा की किताबों के सूखे तह से हीरे-मोती चुनने के लिए प्रयत्नशील नहीं था। उनकी ओर मैं कम ध्यान देता और कहानियाँ लिखने, उपन्यास, कविताएँ पढ़ने हस्तलिखित पत्रिकाओं का सम्पादन करने, कृषि-सम्मेलनों में जाने, फुटबाल खेलने, कसरत करने और साथ पढ़ने वाले लड़कों के सम्बन्ध में चर्चा करने में अधिक रस लेता। कालेज जाने का मुख्य ध्येय शिक्षा प्राप्त करना-उसकी ओर से मैं उदासीन था। मेरा खयाल है कि कालेज में पढ़ने वाले युवकों में से प्रायः नब्बे प्रतिशत युवक अपना समय मेरी ही तरह गँवा देते हैं। फिर उनकी मुट्ठीभर शिक्षा उन्हें सुख और दुःख दोनों देती है। सुख तो यह है कि कुछ तो उन्होंने सीखा ही, और दुःख यह कि सारी सुविधाएँ रहते भी उन्होंने समय का सदुपयोग नहीं किया- पूरा लाभ नहीं उठाया।

लोग यही मैत्री स्थापित करने के सम्बन्ध में भी करते हैं। किशोरावस्था से जवानी तक जब हम बनते होते हैं हमें मैत्री स्थापित करने-मित्र रूपी हीरे-मोती जोड़ने के अनेक मौके मिलते हैं पर हम अपनी लापरवाही के कारण या जल्दबाजी में उन सुयोगों से लाभ नहीं उठाते। मेरा अपना ख्याल यह है कि अपने मन के बढ़िया आदमियों को खोजने और उनसे मैत्री स्थापित करने-जैसा अधिक कीमती कोई अन्य संग्रह कार्य नहीं है। मेरे इस कथन की सत्यता साबित तब होती है जब बुढ़ापा आता है। उस समय जीवन का अन्तिम मंजिल पर अफसोस करने पर हो भी क्या सकता है।

जो मैत्री स्थापित करना जानता है वह मित्रों की संख्या से कभी सन्तुष्ट नहीं होता। उसका वही असन्तोष उसका चिर सुख बनता है। श्री जगदीश प्रसाद जी की अपने शहर और प्रान्त के सैकड़ों ही लोगों से मैत्री है। वे एक पत्र के सम्पादक हैं, और अच्छे वक्ता। उनके ये कार्य-क्रम रोचक नहीं हैं पर मित्र बनाने की फ्रिक में हमेशा रहते हैं। मैंने एक दिन उनसे कहा- “जगदीश प्रसाद जी, आपने तो जीवन पथ पर मिले सभी रत्नों को चुन लिया है?”

उन्होंने थोड़े अफसोस के साथ उत्तर दिया-

“नहीं मित्र, ऐसे अनेक अच्छे व्यक्तियों को मैं अपना नहीं बना सका जिनसे मैत्री स्थापित कर सकना मेरे लिए सम्भव था।”

‘पर आपके जितने मित्र तो किसी के नहीं हैं।’

‘आपका यह कहना तो सत्य है पर मुझे कई ऐसे मित्र और मिल सकते थे जो मुझ गरीब के बुढ़ापे के इन दिनों को अपनी आत्मीयता की मधुरता से अधिक रसमय बना देते।’

मैंने उनसे उनके मैत्री स्थापित करने के रहस्य को पूछा, तो वे बोले -

‘जो अपने साथ के गरीब कुचले हुए लोगों को अपनी सहानुभूति, रक्षा और प्यार नहीं देता, उसे सच्चे मित्र कभी नहीं मिलते।’

अमेरिका की एक पत्रिका में एक पत्रकार ने कोई मोटर कम्पनी के मालिक श्री हेनरी फोर्ड से उनके अन्तिम दिनों में की गई अपनी एक मुलाकात का एक लम्बा बयान छपवाया था उसके कुछ आवश्यक अंश यहाँ आपको भेंट करता हूँ।

पत्रकार ने पूछा, आपको सभी सुख प्राप्त हैं, आपके पास धन भी है, यश भी आपने कम उपार्जन नहीं किया। बड़े-बड़े कार्य सम्पादन करने का आपको गौरव भी है पर क्या कोई ऐसी चीज नहीं जिसे आप समझते हैं कि आपको नहीं मिली?

‘यह आप ठीक ही कहते हैं कि मुझे धन भी मिला और यश भी, पर मुझे एक बहुत कीमती चीज नहीं मिली, वे हैं मित्र। यदि मुझे अपना जीवन फिर से शुरू करना पड़े तो मैं मित्रों की तलाश करूंगा। मेरे धन ने मुझे लोगों से दिल से मिलने नहीं दिया। और अब मैं महसूस करता हूँ कि मेरा कोई सच्चा मित्र नहीं है।’

मैं आज कुछ बढ़िया मित्रों के बदले में अपना सारा धन और मान देने को तैयार हूँ। सच्चे मित्रों की प्राप्ति से ऊँचा सुख दूसरा नहीं है। आप मुझे फिर कहने दीजिए कि अगर मुझे जीवन फिर से शुरू करने का मौका मिले तो पहला काम जो मैं करूंगा वह होगा- मित्रों की तलाश।

‘आप धन देकर मित्र नहीं पा सकते। मित्र पा सकते हैं अपने को देकर- वह मैंने नहीं किया। मैंने अपने चारों और लोहे की एक दीवार बना दी थी- या यों कहिये कि मेरे व्यापार और मेरे धन ने चारों और यह दीवार खड़ी कर दी थी जो मित्रों को मेरे पास तक आने से रोकती रही। वह मेरी गलती थी। यदि इसकी प्रतीति मेरी जवानी में मुझे हो जाती तो आज मेरा यह बुढ़ापा कितना सुखमय होता।’

पत्रकार ने पूछा, पर आपने तो मुझे पहले एक बार यह कहा था कि आपको आपके मित्रों ने जितनी सहायता दी किसी अन्य ने नहीं। और उस समय आपने अपनी बातों की पुष्टि के लिए अनेक ऐसी घटनाएँ भी सुनाई थी जिससे आपको कहीं सहायता मिली तो मित्रों से?

‘हाँ आप ठीक कह रहे हैं, पर मैंने उनकी उतनी सहायता नहीं की जितनी उन्होंने मेरी की। वहाँ से मेरी गलती शुरू हुई थी। उस समय मुझे उसका ज्ञान नहीं हुआ कि मुझे बुढ़ापे में ऐसे मित्रों की जरूरत होगी जो अपना दिल खोल कर मुझसे व्यक्तिगत समस्याओं, साहित्य, समाज और राजनीति पर बात कर सकें। जिनके पास समय का अभाव न हो, मुझसे दुराव-छुपाव न हो। मुझे मित्र तो मिले पर मैंने उन्हें अपने को बाहर-बाहर से ही छूने दिया, कभी मैंने उन्हें अपना नहीं बनाया, मैंने उन्हें अपना कुटुम्ब नहीं बनाया।’

सोचिए, हेनरा फोर्ड को इन बातों के पीछे कितना दर्द है!


Quotation

इस जगत में एक ही बन्धन है वह है कामना। जो मनुष्य कामना के बन्धन से मुक्त हो जाता है वही मुक्ति सुख का अधिकारी है। वह धैर्य से जीवन व्यतीत करता है। न वह चाहता है कि लम्बी आयु भोगूँ, न यह चाहता है अभी मृत्यु हो जाये। जैसे कुम्हार के चक्र से बर्तन उतार लेने पर भी चक्र अवधि न आने तक घूमता रहता है ठीक वैसे ही कर्मों का नाश हो जाने पर भी जीवन मुक्त पुरुष निष्कर्मी होकर जगत में विचरता रहता है।


मंगलमय महावीर

(सन्त श्री टी.एल. वास्वानी)

चैत्र का परम पावन महीना महावीर का स्मारक है। इस पुण्य मास में वे आज से 25 शताब्दी पहले अवतीर्ण हुए। उन्होंने पटना के समीप एक स्थान को अपनी जन्म भूमि बनाया। अशोक और गोविन्द सिंह का भी स्मारक होने के कारण पटना पवित्र है।

परम्परा से उन महाभाग की जन्म-तिथि चैत्र शुक्ला त्रयोदशी मानी जाती है। यह दिन- महावीर की वर्ष गाँठ का दिन-युवकों के कैलेण्डर में स्मरणीय है। युवकों को याद रहे, यह तिथि अनेक महावीरों की जननी है।

यद्यपि भारत दरिद्र है, फिर भी वह श्री- सम्पन्न है। उसकी यह श्री उसके मनुष्यों में है। उसके करोड़ों मनुष्य, यदि कुछ करने का संकल्प करें, तो क्या नहीं कर सकते? और प्रत्येक शताब्दी में भारत ने ऐसे कितने महापुरुष पैदा नहीं किये, जो आत्मा की शक्ति में महान थे? क्योंकि वह, जिनकी कीर्ति का प्रसाद यह चैत्र शुक्ल 13 कर रही है, हमारे इतिहास का एक मात्र महावीर नहीं हुआ है, अन्य महावीर भी हुए हैं। वे हुए हैं अन्य युग में। वे आत्मिक क्षेत्र के योद्धा थे। उन्होंने भारत भूमि को पुण्य भूमि बना दिया और उसे आध्यात्मिक आदर्शवाद की श्री से सम्पन्न कर दिया।

ये महावीर- अर्थात् महान विजयी- ही इतिहास के सच्चे महापुरुष हैं। ये उद्धतता और हिंसा के नहीं, किन्तु निरभिमानता और प्रेम के महावीर थे।

रूस के महान ऋषि टाल्स्टाय ने इस राग को बार-बार अलाप है कि ‘जिस प्रकार अग्नि, अग्नि का शमन नहीं कर सकता।” कहा जाता है कि इस पर ईसा के इस प्रवचन की कि ‘पाप का प्रतिकार मत करो’ छाप है, परन्तु ईसा से भी पाँच शताब्दी पहले अहिंसा की यह शिक्षा भारत के दो आत्मज्ञों और ऋषियों- बुद्ध और महावीर द्वारा उपदिष्ट और आचरति हो चुकी थी। जैन लोग भगवान, ईश्वर, महाभाग इत्यादि कह कर महावीर को पूजते हैं।

वे उन्हें तीर्थंकर भी कहते हैं। मैं जिसका अर्थ करता हूँ “सिद्ध पुरुष”। महावीर का स्मरण उन्हें चौबीसवें तीर्थंकर मानकर किया जाता है। उनके प्रथम तीर्थंकर का नाम ऋषभनाथ अथवा आदि नाथ है, जो अयोध्या में जन्में और कैलास पर्वत पर महत्तम आत्मज्ञान (कैवल्य) के अधिकारी हुए। वे उस धर्म के सबसे प्रथम प्रवर्त्तक थे, जिसे इतिहासों में जैन धर्म कहा है। महावीर जैन धर्म के प्रवर्तकों की लम्बी सूची में 24 वे हैं। उन्होंने बौद्ध धर्म से भी प्राचीनतम इस जैन धर्म की पुन घोषणा की, और उसका पुनर्निर्माण किया।

महावीर के विषय में मैंने जो कुछ जाना है, उससे मुझ पर बड़ा भारी प्रभाव पड़ा है। उनका जीवन अद्वितीय सौंदर्य से परिपूर्ण था। बुद्ध के त्याग का, बुद्ध के तप का और बुद्ध के मानव-प्रेम का स्मरण दिलाते हैं।

वे ईसा से 599 वर्ष पूर्व बिहार- प्राँत के एक शहर में जन्में थे। उनके पिता ‘सिद्धार्थ’ एक क्षत्रिय राजा थे। उनकी जननी ‘त्रिराला’- प्रिय-कारिणी बज्जियों के प्रजातंत्र के मुखिया चेटक की पुत्री थी। महावीर अन्य लड़कों के समान पाठशाला में भेजे जाते थे, परन्तु जान पड़ा कि उन्हें शिक्षक की आवश्यकता नहीं है। उनके हृदय में वह ज्ञान विद्यमान था, जिसे कोई भी विद्यालय प्रदान नहीं कर सकता। बुद्ध के समान ही वे इस जगत को त्याग देने के लिए व्याकुल हो उठते हैं। अट्ठाईस वर्ष की अवस्था पर्यन्त वे कुटुम्ब में ही रहते हैं। अब उनके माता-पिता गुजर जाते हैं और उन्हें संन्यास के प्रवाह में प्रवेश करने के लिए अन्तःप्रेरणा होती है। तब वे अपने ज्येष्ठ भाई के समीप अनुमति के लिए जाते हैं। उनके भाई कहते हैं- ‘घाव अभी हरे हैं, ठहरो’ वे दो वर्ष और ठहर जाते हैं। अब वे तीस वर्ष के हैं। ईसा के समान अब उन्हें अन्तः प्रेरणा होती है कि सब कुछ छोड़कर सेवा के सुमार्ग में प्रवेश करना चाहिए। बुद्ध के समान वे अपनी सब सम्पत्ति दरिद्रता का दान कर देते हैं। कुटुम्ब को त्यागने के दिन वे अपना सारा राज्य अपने भाइयों को और सारी सम्पत्ति गरीबों को दे देते हैं। फिर वे तपश्चर्या और ध्यान का जीवन व्यतीत करते हैं। बुद्ध को 6 वर्ष की साधना के बाद प्रकाश के दर्शन हुए थे। महावीर को यह ज्योति 12 वर्ष के अन्तर्ध्यान और तपस्या के बाद दीखती है ऋजुकूला नदी के किनारे जम्मक ग्राम में वे परम-आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं। ग्रन्थों की भाषा में अब वे तीर्थंकर, सिद्ध, सर्वज्ञ अथवा महावीर हो जाते हैं। वे अब उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जिसे उपनिषदों में कैवल्य-दृष्टा की अवस्था कहा है। जैन ग्रन्थों के अनुसार अब उनका नाम ‘केवली’ हो जाता है।

तब वे बुद्ध के समान धर्म प्रचार के लिए एक महान मिशन लेकर लोगों के ज्ञान का उपदेश देने को निकलते हैं। तीस वर्ष तक वे यहाँ से वहाँ घूमते फिरते हैं। बंगाल और बिहार में वे सच्चे सुख की “ सुघात ” का सदुपदेश देते हैं। अपने सन्देश को जंगली जातियों तक भी ले जाते हैं, और इसमें वे उनके क्रूर व्यवहारों की परवाह नहीं करते। वे अपने मिशन में स्रवश और हिमालय तक जाते हैं। अनेक पीड़ को और पीड़ाओं के बीच में वे कितने गम्भीर और शान्त बने रहते हैं, और इस गम्भीरता तथा शान्ति में कितना सौंदर्य है।

वे गुरु हैं और व्यवस्थापक भी। उनके ग्यारह प्रधान शिष्य हैं। चार सौ से ऊपर मुनि और अनेक श्रावक उनके धर्म को धारण करते हैं। ब्राह्मण और अब्राह्मण दोनों ही उनके समाज में शामिल होते हैं। उनका विश्वास वर्ण और जाति में नहीं है। ये दिवाली के दिन ऐवापरी (बिहार) में 72 वर्ष की आयु में ईसा से 527 वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त करते हैं।

इन महावीर का-जैनियों के इस महापुरुष का चरित्र कितना सुन्दर है! वे धनवान क्षत्रिय कुल में जन्म लेते हैं और ग्रह को त्याग देते हैं। वे अपना धन दरिद्रों में दान कर देते हैं, और विरक्त होकर जंगल में अन्तर्ध्यान और तपस्या के लिए चले जाते हैं। कुछ लोग उन्हें वहाँ ताड़ना देते हैं, परन्तु वे शान्त और मौन रहते हैं।

तपस्या की अवधि समाप्त होने पर वे बाहर आते हैं। वे अपने सिद्धान्त की शिक्षा देने के लिए जगह जगह घूमते हैं, और बहुत से लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, सभाओं में वे उन्हें तंग करते हैं, उनका अपमान करते हैं, परन्तु वे प्रशान्त और मौन बने रहते हैं।

उनका एक शिष्य उन्हें त्याग देता है और उनके विरुद्ध लोगों में मिथ्या प्रवाद फैलाता है, पर फिर भी वे शान्त तथा मौन रहते हैं।

वे एक महावीर- एक विजेता- एक महापुरुष हो जाते हैं, क्योंकि वे शान्ति की शक्ति का विकास करते हैं।

निःसन्देह ही उनके जीवन ने उनके भक्तों पर गहरा प्रवाह डाला। उन्होंने उनके सन्देश को सब तरह फैलाया। कहा जाता है कि “पायरो” नामक यूनानी विचारक ने जिमिनोसाफिस्टों के चरणों में दर्शन शास्त्र सीखा। मालूम होता है कि वे जिमिनोसोफिस्ट लोग जैन योगी थे, जैसा कि उनकी यह नाम निर्देश करता है।

बचपन में उनका नाम ‘वीर’ रक्खा गया। उस समय वे ‘वर्द्धमान’ भी कहलाते थे, परन्तु आगे चलकर वे ‘महावीर’ कहलाये। महावीर शब्द का मूल अर्थ महान योद्धा है। कहा जाता है कि एक दिन जबकि वे अपने मित्रों के साथ क्रीड़ा कर रहे थे, उन्होंने एक बड़े काल सर्प को उसके फन पर पैर रख कर बड़े गौरव से वश में किया और तभी से उन्हें यह विशेषण मिला। मुझे यह कथा एक रूपक मालूम पड़ती है, क्योंकि महावीर ने सचमुच ‘कषाय’ रूपी सर्प को वश में किया था। वे दर-असल एक महान वीर महान विजेता थे। उन्होंने रोग और द्वेष को जीत लिया था। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य चैतन्य था। वह जीवन परम शक्ति का था। ‘पीत वर्ण’ और ‘सिंह’ ये दो उनके प्रिय चिन्ह हैं। आधुनिक भारत को भी महान वीरों की आवश्यकता है। सिर्फ धन या ज्ञान बहुत कम उपयोगी है। आवश्यकता है ऐसे पुरुषार्थी पुरुषों की, जो अपने हृदय से डर को निर्वासित कर स्वातन्त्र्य की सेवा करें। महावीर की वीरता उनके जीवन और उपदेशों में प्रतिबिंबित है। यह जीवन अद्वितीय आत्म-विजय का है। उनका उपदेश भी वीरतापूर्ण है। ‘सब जीवों को अपने समान समझो और किसी को कष्ट न पहुँचाओ।’ इन शब्दों में अहिंसा के द्विगुण सिद्धान्तों का प्रतिपादन है। एक स्पष्ट है और दूसरा गूढ़। इनमें ‘स्पष्ट’ स्पष्ट ऐक्य के सिद्धान्तों का अनुकरण करता है अर्थात् अपने को सबमें देखो, और ‘गूढ़’ उसमें से विकसित होता है, अर्थात्- किसी की हिंसा मत करो। सबमें अपने आपका दर्शन करने का अर्थ ही किसी को कष्ट देने से ही रुकना है। अहिंसा सब जीवनों में अद्वैत के आभास से ही विकसित होती है।


गंगाजल का वैज्ञानिक महत्व

(श्री मदनगोपाल सिंहल)

हमारे धर्मशास्त्रों में गंगा-जल की बड़ी महिमा गाई गई है। यहाँ तक कहा गया है कि गंगा-जल के स्पर्श मात्र से ही बड़े-से-बड़ा पाप नष्ट हो जाता है। अनेक धर्मवेत्ताओं का कथन है कि गंगा-जल में जीवन देने की सबसे अधिक शक्ति है। इसके द्वारा मनुष्य अपने अन्तःकरण को पवित्र करने में समर्थ होता है।

धर्म ही नहीं किन्तु आयुर्वेद की दृष्टि से भी गंगाजल में जो गुण पाए जाते हैं। उन्हें देखकर भी चकित रह जाना पड़ता है। चरक ने जिसका काल आज से दो हजार वर्ष पूर्व है- गंगाजल को पथ्य माना है। चक्रमणि दत्त ने भी, जो सन् 1060 के लगभग हुए हैं, इसका समर्थन किया है। ‘भण्डारकर ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट’ में एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ है ‘भोजन कुतूहल’। उसमें गंगाजल की उपयोगिता बताते हुए लिखा है- ‘गंगाजल श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, रुचिकर, पथ्य, भोजन पकाने योग्य, पाचक शक्ति बढ़ाने वाला और बुद्धि को तीव्र करने वाला है।’

यही नहीं अपने यहाँ गंगाजल के स्वास्थ्य संबंधी गुणों पर इससे भी कहीं अधिक बल दिया गया है और अब तो विज्ञान की कृपा से गंगाजल का महत्व भारत से बाहर भी प्रकाशित हो उठा है और इस जल के गुणों पर मुग्ध होकर विदेशियों ने भी इसे अपनाना प्रारम्भ कर दिया है।

आज के विज्ञान का परीक्षण यह सिद्ध कर चुका है कि गंगाजल में शरीर की शक्ति बढ़ाने की अपूर्व शक्ति है और इसका सेवन करते रहने पर रोगी तथा दुर्बल व्यक्ति को डाक्टरी टानिक पीने की आवश्यकता नहीं रहती। इसके पीते रहने पर अजीर्ण रोग, जीर्ण ज्वर तथा संग्रहणी, तपेदिक, दमा इत्यादि रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। प्लेग, हैजा, मलेरिया आदि संक्रामक रोग गंगाजल के सेवन से अदृश्य हो जाते हैं। रोगों के कीटाणुओं को नाश करने की शक्ति इसमें अद्वितीय है।

अपने इस कथन की पुष्टि में हम उन अनेक पाश्चात्य विद्वानों तथा वैज्ञानिकों को उपस्थित कर सकते हैं जिन्होंने गंगाजल की स्थूल शक्ति का निर्णय करके संसार की आंखें खोल दी हैं। डॉक्टर आर.सी. नेल्सन, एम.डी. ने लिखा है- ‘गंगा को हिन्दू पवित्र समझते हैं, उनका कहना है कि गंगा का जल शुद्ध है और कभी दूषित नहीं होता। हम लोग गंगाजल को ऐसा नहीं समझते क्योंकि भारत के प्रधान नगर काशी में ही लाखों मनुष्य अपना धर्म समझकर प्रतिदिन गंगा में स्नान कर उसे गन्दा कर देते हैं। नालियों का जल, शव और कूड़ा-कर्कट भी इसमें बहाया और फेंका जाता है। इस पर एक अद्भुत बात है कि कलकत्ते से इंग्लैंड जाने वाले जहाज इसी गंगा के एक मुहाने हुगली नदी का मैला जल लेकर प्रस्थान करते हैं और यह जल इंग्लैंड तक बराबर ताजा बना रहता है। इसके प्रतिकूल जो जहाज इंग्लैंड से भारत को प्रस्थान करते हैं वे लन्दन से जो पानी लेकर चलते हैं वह बम्बई पहुँचने के समय तक ताजा नहीं रहता। इन जहाजों को पोर्ट सईद, स्वेज व अदन पर फिर ताजा पानी लेना पड़ता है। यह एक अद्भुत सी बात प्रतीत होती है, किन्तु गंगाजल के सम्बन्ध में बैक्टीरिया सम्बन्धी जो अन्वेषण हुए हैं उनसे उपर्युक्त कथन की पुष्टि होती है।’

इतना ही नहीं पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की कसौटी पर कस कर भी गंगाजल की उपयोगिता और महत्ता को आश्चर्यकारी ही पाया है। विज्ञानाचार्यों श्री हैनवरी हैकिंस किसी समय उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश की सरकारों के रसायन परीक्षक थे। आपने गंगाजल का वैज्ञानिक यन्त्रों द्वारा परीक्षण करके यह सिद्ध किया है। गंगाजल में हैजे के कीटों को नष्ट कर डालने की प्रबल शक्ति विद्यमान है। उन्होंने स्वयं काशी जाकर गंगाजल की परीक्षा की और देखा कि काशी के गन्दे नालों का जो जल गंगा में गिरता है उसमें हैजे के लाखों कीट हैं, किन्तु गंगाजल में मिलने के कुछ समय पश्चात ही वे सब नष्ट हो गए। गंगाजल में हैजे के कीटों को नष्ट करने वाली इस बात का समर्थन पेरिस के सुविख्यात डॉक्टर मि. डेरेल ने भी किया है। भारत में जब हैजे और आँव के रोग व्यापक रूप में फैले हुए थे और इन रोगों से मरे व्यक्तियों के शव गंगा में फेंक दिये जाते थे तब उक्त डॉक्टर महोदय ने इन शवों के कुछ ही फुट नीचे गंगाजल की परीक्षा करके देखा कि हैजे और आँव के कीटाणुओं के होने की आशा थी वहाँ वास्तव में उनका एक भी कीटाणु नहीं था।

उक्त परीक्षा के उपरान्त डॉक्टर ने गंगाजल के प्रयोग से एक औषधि का आविष्कार भी किया जिसका नाम ‘बैक्टीरिया फैज’ है और जिसे वर्तमान समय में अनेक रोगों की चिकित्सा में प्रयोग किया जा सकता है।

डॉक्टर कहाविटा के प्रयोगों के अनुसार गंगाजल से सन्निपात ज्वर और संग्रहणी भी नष्ट हो जाते हैं।

अभी कुछ समय हुआ अँगरेजी के एक प्रमुख दैनिक पत्र में प्रकाशित हुआ था कि गंगाजल में दुष्ट व्रण नष्ट करने की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। इसका कारण यह बताया गया था कि गंगाजल का प्रवाह जिस भूमि भाग पर से आया है उसमें रेडियम के समान वस्तु है, जिससे प्रवाहित जल में उपयुक्त गुण दीख पड़ता है।

डॉक्टर रिचर्डसन ने तो इससे भी अधिक आश्चर्यमय बात लिखी है और वह यह कि ‘गंगा-गंगा’ कहने और उसके दर्शन करने मात्र से भी मानव हृदय पर अत्यन्त उत्तम प्रभाव पड़ता है।

प्रसिद्ध संसार यात्री मार्क टूइन ने अपनी ‘संसार-यात्रा’ में लिखा है- ‘गंगाजल’ की मैंने स्वयं परीक्षा की है। इसमें बीमारियों के कीटाणुओं को मारने की बड़ी शक्ति है। यह जल अत्यन्त शुद्ध और पवित्र है। यही कारण है कि गंगाजल के पीने और उसमें स्नान करने से पापी मनुष्य के विचार भी शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं।’

फ्राँसीसी यात्री टैवनियर ने भी गंगाजल के सम्बन्ध में इस प्रकार का बहुत कुछ लिखा है।

गंगाजल की इन्हीं उपयोगिताओं के कारण हमारे यहाँ अनादि काल से राजाओं से लेकर निर्धनों तक इसका प्रयोग होता आया है। केवल हिन्दुओं में ही नहीं किन्तु मुस्लिम शासन काल में बादशाहों के महलों में भी गंगाजल का ही प्रयोग होता था।

इब्न बतूता ने, जो चौदहवीं शताब्दी में भारत आया था, लिखा है- ‘सुलतान मुहम्मद तुगलक के लिए गंगाजल बराबर दौलताबाद जाया करता था।’

अबुल फजल ने ‘आइने अकबरी’ में लिखा है-

“बादशाह अकबर गंगाजल को अमृत समझते हैं और उसके आने का प्रबन्ध रखने के लिए अनेक योग्य व्यक्तियों को नियुक्त किया हुआ है। वह घर में या यात्रा में गंगाजल ही पीते हैं। खाना बनाने के लिए वर्षा जल या जमना जल जिसमें गंगाजल मिला दिया जाता है काम में लाया जाता है।

बर्नियर ने, जो सन् 1959 से 67 तक भारत में रहा और जो शाहजादा दाराशिकोह का चिकित्सक, था, अपने यात्रा विवरण में लिखा है- ‘बादशाह औरंगजेब के लिए खाने-पीने की सामग्री के साथ गंगाजल भी रहता है। प्रतिदिन सवेरे नाश्ते के साथ बादशाह के पास एक सुराही गंगाजल भेजा जाता है।’

कप्तान एडवर्ड मूर ने, जिसने टीपू सुलतान के साथ युद्ध में भाग लिया था, लिखा है- “सबन्नर के नवाब केवल गंगाजल ही पीते थे।” और भी अनेक मुस्लिम नवाबों तथा बादशाहों का इतिहास पढ़ने से यह ज्ञात होता है कि वे अपने पीने में केवल गंगाजल का ही प्रयोग करते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री गुलाम हुसैन ने बंगाल के इतिहास ‘रियाजुप्त सलातीन’ में गंगाजल की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

फारसी के सुविख्यात कवि श्री आफरी ने भागीरथी के जल का गुणगान करते हुए लिखा है- ‘गंगा के जल में गोता लगाओ ताकि पुण्य का मोती हाथ लगे। यदि तुम अपने होठों को गंगाजल से तर कर लोगे तो फिर महायात्रा (मृत्यु) के वन में प्यास से न तड़पोगे और प्रलय के भयंकर ताप में पड़कर भी न जलोगे।’

कहने का तात्पर्य यह है कि अतीव प्राचीन काल से लेकर आज के विज्ञान प्रधान युग तक गंगाजल के महत्व में कोई कमी नहीं आई है। प्रत्येक जाति और प्रत्येक देश के विद्वानों द्वारा गंगाजल की महिमा मुक्त कण्ठ से गाई गई है।


मंत्र बल से रोग निवारण

(श्री सुरेशचन्द बेदालंकार, हटा)

मानसिक चिकित्सा का आधार संकल्प और आवेश है। जब तक प्रयोजक के मन में प्रबल तथा साधिकार इच्छा और उसका पुनः पुनः आवर्तन नहीं होगा तब तक वह मानसिक शक्ति के प्रयोग द्वारा दूसरे पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेगा। परन्तु इस मानसिक प्रयोग को शीघ्र तथा अधिक प्रभावशाली बनाने की जो क्रियायें की जाती हैं उनमें अभिमर्ष और मार्जन मुख्य हैं।

अभिमर्ष क्रिया को पाश्चात्य विद्वान ‘मेस्मरेजिम कहते हैं और अभिमर्ष क्रिया को ‘पास करना’ कहते हैं। अभिमर्ष उस हल्के स्पर्श का नाम है जो शरीर में सनसनाहट उत्पन्न कर देता है। इसके लिए प्रयोजक को अपने हाथ ढीले रखने चाहिए और अंगुलियों का स्पर्श अंग पर असर न डालने वाला होना चाहिए। यह ऐसा होना चाहिये कि अंगुलियों के आगे सरकने से रोगों के उस अंग में या बाहर भीतर त्वचा में एक संस्पर्श या सनसनाहट उत्पन्न हो। इसका मनुष्य के शरीर पर यह प्रभाव पड़ता है कि जिस अंग में सनसनाहट उत्पन्न होती है वहाँ के आन्तरिक तन्तुओं में विचित्र विद्युत की लहरों जैसी गति उत्पन्न हो जाती है और परिणामतः नाड़ियों की गति तीव्र हो जाती है। इसका न केवल अंग विशेष पर ही प्रभाव पड़ता है अपितु सारे शरीर पर उसका प्रभाव पड़ता है और रोगी अपने अन्दर विद्युत जैसी स्फुरणा अनुभव करता है। इस प्रकार इस क्रिया द्वारा शारीरिक रोग और मानसिक दोष दूर किये जा सकते हैं।

इस अभिमर्ष क्रिया द्वारा मानसिक रोग, स्वप्नदोष, पागलपन, हिस्टोरिया आदि रोगों में बहुत लाभ देखा गया है। स्वप्न दोष के अनेक रोगियों को तो हमने स्वयं इस क्रिया द्वारा लाभ पहुँचाया है। इसका प्रयोग जागृतावस्था की तरह स्वयं सुलाकर या अपने आप सो जाने पर किया जा सकता है। दोनों हालतों में उसमें स्वास्थ्य की भावना भरते हुए कहना चाहिए कि हे योगी, तू चिन्ता न कर मैं अपने हाथों द्वारा तेरे अन्तर से सब प्रकार के विकारों एवं दूषित विचारों को निकाल बाहर कर रहा हूँ और तुझमें भारी बल, वीर्य, स्वास्थ्य और सुख भरता हूँ।”

वेद में अभिमर्ष द्वारा चिकित्सा करने का विधान स्पष्ट रूप में पाया जाता है। वहाँ इसके द्वारा क्षय जैसे भयंकर रोगों को दूर करने का भी विधान है। वास्तव में मनुष्य रोगों की अपेक्षा रोग के भय से अधिक ग्रस्त हैं। हैजा, प्लेग, क्षय और साँपादि के काटने से जितने रोगी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उनमें से बहुत कम को यह रोग होते हैं- ऐसा डाक्टरों का कथन है। वास्तव में वे भय के कारण रोगी होते हैं। कहते हैं कि एक बार प्लेग किसी गाँव का खात्मा करके लौटी आ रही थी। रास्ते में उससे किसी ने पूछा कि कहो जी गाँव के कितने आदमियों को खाकर आर ही हो? प्लेग ने बड़े सरल भाव से कहा कि तीन और चार व्यक्तियों से ही मेरी तृप्ति हो गई थी, शेष तो सब मेरे ‘भय से ही इस लोक से चल बसे हैं।’ ठीक यही बात दूसरे रोगों के विषय में भी कही जा सकती है। ऐसी दशा में यदि किसी की मानसिक शक्ति को अपने दृढ़ संकल्प और अभिमर्ष क्रिया द्वारा शक्तिशाली बना दें तो वह निश्चित रूप से रोगों का मुकाबला कर सकेगा और स्वस्थ हो सकेगा। अभिमर्ष क्रिया का वर्णन निम्न मंत्र में है-

अयं में हस्तो भगवान्नयं में भगवत्तरः। अयं में विश्वभेषजोऽयं शिवाभि मर्शन।

हस्ताभ्याँ दशशाखाभ्याँ जिह्वावाचः पुरोगवी। अनामयितुलुर्या हस्ताभ्याँ ताभ्याँत्वाभिमृशामसि।

हे मेरे प्रिय रोगी, मेरा यह हाथ बड़ा यशस्वी और फलदायक है और यह दूसरा तो उससे भी अधिक बलवान है। दूसरे तुम्हारे समस्त रोग शान्त हो जायेंगे, तुम्हें सुख और शान्ति मिलेगी। मैं ऐसे ही हाथों से तुझे अभिमर्ष करता हूँ- छूता हूँ। तू निश्चित रूप से स्वस्थ हो जायगा।

यह तो हुई अभिमर्ष क्रिया। दूसरी वस्तु जिसका रोगी पर असर पड़ता है मार्जन या पुरश्चरण है। मनुष्यों के नित्य कर्मों में लिए संध्या का प्रार्थना के रूप में उपयोग किया जाता है उससे भी मार्जन मंत्र का विधान है। मार्जन का अर्थ है माँजना, शुद्ध करना। संध्या में मंत्र के अर्थों पर ध्यान देते हुए सिर आदि अंगों को माँजना या शुद्ध करना होता है। इस मार्जन द्वारा जहाँ मनुष्य अपना मन और अपनी आत्मा को शुद्ध करता है। वहाँ वह इसके द्वारा दूसरों को भी आराम पहुँचाया जा सकता है। यह साधारण जनता में झाड़ फूँक के नाम से कहा जाता है।

इस मार्जन, पुरश्चरण या झाड़ फूँक का जहाँ तक विज्ञान से सम्बन्ध है वहाँ तक तो यह ठीक है। पर जो विज्ञान सम्मत नहीं वह केवल ढोंग तथा मिथ्या है। मार्जन करने के साधन हैं वस्त्र, जल, कूर्च आदि। जब कोई व्यक्ति बेहोश हो जाता है मस्तिष्क में चक्कर आने लगते हैं या कोई विषैला जन्तु काट लेता है तब रोगी को ओझा, साधु या किसी झाड़-फूँक करने वालों के पास ले जाते हैं, वह वहाँ पर पानी के छींटे देकर या गीला कपड़ा सिर आदि पर रखकर अथवा नीम या अन्य किसी वृक्ष की डाली या कूर्च से रोगी को होश में ले आता है। लोग इसे जादू या मंत्र विद्या मानते हैं। परन्तु यदि हम आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन करें तो हमें पता लगेगा कि ‘पानीयं क्षयनाशनं क्लभदर मूर्च्छापिपासदम्’ पानी में, मूच्छा, बेहोशी, थकावट आदि को दूर करने के गुण विद्यमान हैं। आजकल प्राकृतिक चिकित्सा तो लुई कूने द्वारा प्रतिपादित जल-चिकित्सा के व्यवहार द्वारा अनेक रोग ठीक करते हैं।

कूर्च द्वारा रोग दूर करना तो आजकल भी हमारे गाँवों में आम प्रथा है। वहाँ लोग नीमादि वृक्षों की डाली से झाड़-फूँक करते ही हैं। परन्तु बहुत पुराने समय में भी त्वचा के रोग और कृमियों के संसर्ग से उत्पन्न रोगों को दूर करने के लिए चमर मृग (चम्बरी गौ) की पूँछ की बाल मंजूरी का उपयोग करते थे। शरीर में पित्ती उछल आने पर जुलाहे के ताना संवारने वाले (ब्रश) से पुनः-पुनः अनुलोम स्पर्श से पित्ती दब जाती है। इसी प्रकार तृणादि द्वारा यकृत, प्लीहा जैसे रोग झाड़ने वाले और दूर करने वाले पाये जाते हैं। वैसे तो इन सब चीजों का मूल कारण यह प्रतीत होता है कि रोगी की मानसिक शक्ति को दृढ़ करना और उसे विश्वास दिलाना कि तुम अब बिल्कुल स्वस्थ हो रहे हो।

जनता में यह धारणा भी पाई जाती है कि मंत्र विद्या द्वारा रोग पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं इतर वस्तुओं पर उतारे जा सकते हैं। मंत्र-विद्या के ज्ञाता, साधु, महात्मा ऐसा करते देखे भी जाते हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि प्रभु को यह विचित्र सृष्टि पारस्परिक सहयोग से चल रही है। जो वस्तुऐ मल-मूत्रादि हमारे शरीर को हानि पहुँचाती हैं वह वृक्षादियों के लिए पोषक एवं वृक्षादि के दोष गोंद, छाल और मदादि हमारे लिए लाभदायक हैं। यही कारण है कि बहुत से वृक्ष हमारे दोषों को अपने ऊपर ले लेते हैं, क्योंकि वे उनके लिए लाभदायक होते हैं। सब अपने-अपने अनुकूल दोषों को ही ग्रहण करते हैं प्रतिकूल को नहीं। जैसे यक्ष्मा के रोगी के रोग को दूर करने के लिए देव-दारु का वृक्ष और बकरी तथा बन्दर अधिक उपयोगी हैं। वेद में पीलिया (कामला) रोग को दूसरों पर उतारने के विषय में एक मंत्र आया हैः-

शुकेषुतेहरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि। अथो हारिद्रबेषुते हरिमाणं निदध्यसि॥

हे रोगी, (ते) तुम्हारे (हरिमाणं) हलीमक या कामला रोग को (शुकेषु) तो तों तथा (रोपथाकासु) सदा रोहणा करने वाली हरी-भरी दूब के पौधों में (दध्मति) धरते हैं। और (ते) तुम्हारे (हरिनाणाम्) कामला रोग को (हरिद्रवेषु) दारुहल्दी के वृक्षों पर (निदध्मसि) निहित करते हैं।

वास्तव में कामला रोग के रोगी के पास तोते रखने, उसे हरी-भरी दूब में टहलाने एवं उसका रस पिलाने तथा दारु हल्दी के वन में रखने से आश्चर्य जनक लाभ पहुँचता है और वह स्वस्थ हो सकता है। यही रोग का वृक्षों पर उतारना है।

इसी प्रकार निम्न मंत्र में उन्माद क्षयादि के रोगी को जंगलों एवं पर्वतों पर रखने का विधान है। मंत्र है-

मुँच शीर्षक्तया उस कास एतं परुष्पसराविवेशा यो अस्य। यो आपजा, वातजा यश्चशुव्यो वनस्पतीन्त्सचलाँ पर्वताँश्च।

अर्थात् उन्मादादि शिरो रोग, वार्तिक रोग, पैत्तिक एवं श्लेष्मिक रोग, जो रोगी के जोड़-जोड़ में घुसे हुए हैं उन्हें वनस्पतियों एवं पर्वतों का सेवन करने के द्वारा दूर करना चाहिए।

इस प्रकार मानसिक चिकित्सा के लिए अभिमर्ष और मार्जन यह दोनों क्रियायें अत्यन्त आवश्यक हैं और यदि हम इनका समझदारी और बुद्धिमत्ता पूर्वक उपयोग करें तो अधिकाँश रोगों में हमें सफलता मिल सकती है।


Quotation

-जो पुरुष धर्म का नाश करता है धर्म उसका नाश कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमें न मार डाले इस भय से धर्म का हनन (त्याग) कभी न करना चाहिए।

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मनुष्य को चाहिए कि झूठ से कामना सिद्ध न करे। निन्दा, स्तुति, तथा भय से भी झूठ न बोलें और न लोभ वश। चाहे राज्य भी मिलता हो झूठ, अधर्म को न अपनावें। भोजन, जीविका बिना भी चाहे प्राण जाते हों तो भी धर्म का त्याग न करें क्योंकि जीव और धर्म नित्य हैं। वे मनुष्य धन्य हैं जो धर्म को किसी भी भाव नहीं बेचते।


जीवन के सच्चे कलाकार बनिए।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

सफल मानव जीवन व्यतीत करना भी एक कला या आर्ट है। कलाकार जिस प्रकार एक साधारण कूची और मिट्टी की प्यालियों के थोड़े से रंग द्वारा एक परम आकर्षक चित्र का निर्माण करता है मालूमी इकतारे, सारंगी, या बाँस की एक पतली सी बाँसुरी के सहारे जिस प्रकार संगीतज्ञ मधुर संगीत की वर्षा करता है, सड़क के किनारे पड़े हुए टेढ़े, तिरछे बेढंगे पत्थर को अपनी छेनी से काट-काट कर जिस प्रकार शिल्पकार उत्तम मूर्ति का निर्माण करता है, या मिट्टी से जैसे मूर्तिकार सुन्दर बर्तनों या खिलौनों का निर्माण करता है, उसी प्रकार मानव जीवन का कलाकार संसार और समाज में उपलब्ध साधारण से उपकरणों द्वारा आनन्दमय जीवन का निर्माण करता है।

मिट्टी, स्वर्ण, लकड़ी, रंग, पत्थर, वाद्ययन्त्र सब निर्जीव पदार्थ हैं। स्वयं इनमें कोई महत्ता, शक्तियाँ आकर्षण नहीं है। ये जड़ पदार्थ हैं जो कलाकार की कला के स्पर्श से जाग उठते हैं। इन तत्वों द्वारा विनिर्मित नाना कलात्मक वस्तुओं में कलाकार के आर्ट, सूझ-बूझ, सौंदर्य, बोध और बुद्धि वैभव का ही चमत्कार है। साधारण वस्तुओं के सहारे भी सुनार, मूर्तिकार, शिल्पकार और संगीतज्ञ चित्रकार इत्यादि नाना प्रकार की एक से एक आकर्षक कलात्मक वस्तुएँ निरन्तर बनाते आ रहे हैं।

जीवन के कलाकार के पास कौन-कौन से उपकरण हैं? उसकी मिट्टी पत्थर क्या हैं? वह किस सोने-चाँदी को पिघला कर आभूषण बनाता है? उसके पास कौन से बाजे हैं जिनमें वह जीवन संगीत उत्पन्न करता है? उसका बचा पदार्थ क्या है? वह किन औजारों की सहायता से अपनी कला का सौंदर्य प्रकट करता है?

जीवन निर्माण और सामग्री

जीवन के शिल्पकार के पास मनुष्य का जीवन, समय, आयु, स्वास्थ्य, गृह सौख्य एवं परिवार इत्यादि वस्तुएँ हैं, जिनमें उसे अपनी कला का प्रदर्शन करना होता है। सच्चे जीवन के कलाकार की कैसी ही परिस्थितियाँ क्यों न हों, वह उन्हें अपने पक्ष में मोड़ने की चेष्टा करता है। नाना प्रतिकूलता, प्रतिघात, संघर्षों के होते हुए भी वह अपनी कला का चमत्कार प्रदर्शित करने लगेगा। वह ऊबड़-खाबड़ मार्ग को समतल बना लेगा, कंटकाकीर्ण स्थान को स्वच्छ, साफ-सुथरा कर लेगा, रेगिस्तान में उद्यान सृष्टि करेगा, जहाँ रास्ता नहीं दीखता, वहाँ मार्ग बना लेगा। बाहर से नरक दीखने वाली विषम परिस्थितियों में स्वर्ग का निर्माण कर लेगा। जीवन के दिन, सप्ताह, मास और वर्ष ये कच्ची धातु हैं, जिन्हें जीवन के शिल्पकार को अपनी कला के स्पर्श से आकर्षक बनाना होता है। महत्व बाह्य भौतिक पदार्थों का नहीं, उसकी कला, जीवन दर्शन, योजना और दृष्टिकोण का है। अपने मानसिक नियन्त्रण, साँसारिक पदार्थों को देखने की रीति सत्य, प्रेम, विवेक तथा धैर्य के चमत्कारी उपयोग द्वारा वह अपनी जीवन-कला का चमत्कार प्रदर्शित करता है।

जिस प्रकार उद्यान का माली अपने हाथ से लगाए हुए पुष्पों का अवलोकन कर आनन्दित होता है, उसी प्रकार जीवन का कलाकार, हृदयरूपी मंजुल उद्यान में ज्ञान, करुणा, प्रेम, सौहार्द, विवेक रूपी पुष्पों को विकसित देखकर आनंदित होता है।

जीवन कला के उद्देश्य

जीवन-कला का उद्देश्य क्या है? सौंदर्य की सृष्टि, नवीनता की उत्पत्ति, सुन्दरता का निरूपण, कम से कम वस्तुओं द्वारा अधिक से अधिक आनन्द उपभोग। जीवन कलाकार उस तथ्य को प्रकट करता है, जो सत्य है, शिव है, सुन्दर है। जीवन कलाकार अपने विघ्न बाधा संकुल इस कुरूप जगत में भी सुन्दर जीवन की सृष्टि करता है। जीवन-सौंदर्य उसका ध्येय है। यह जीवन को सुन्दरतम रूप में व्यतीत करना चाहता है। विषमता, प्रतिकूलता और कठिनाई में भी वह सौंदर्य की आभा निरखता है। जब जीवन क्षितिज पर काले-काले भयंकर मेघ आवृत होते हैं और दुर्भाग्य की बिजली कौंधती है, तब भी वह काले बादलों के किनारे-किनारे दीखने वाली रुपहली क्षीण आभा को देखकर प्रसन्न होता है। आलोचना और टीका-टिप्पणी के काँटों से घिरा रहने पर भी उसे उसके आनंदरूपी पुष्प ही दिखाई देते हैं।

जीवन का कलाकार सच्चे स्थायी सौंदर्य का पुजारी है। यह सौंदर्य कहाँ है? यह सौंदर्य है, उसके उच्च आदर्श में, पवित्रतम उद्देश्यों तथा जीवन के एक सुनिश्चित, सुकल्पित लक्ष्य में। उच्च उद्देश्यों का निर्माण वह पर्याप्त चिन्तन-मनन के पश्चात करता है, किन्तु निश्चयों में ढ़ोला नहीं रहता। अपनी शक्ति से उनमें सौंदर्य भरता चलता है। उसका दृष्टिकोण कम से कम साधनों द्वारा जीवन को सच्चे सौंदर्य से भर लेना है।

आप कहेंगे, ‘सुन्दर जीवन के लिए सौंदर्य-वृद्धि के उपकरण अपेक्षित हैं? असंख्य साज-सामान चाहिए, ढेर के ढेर वस्त्र, टीपटाप की वस्तुएँ, कहीं प्रदर्शन की फैशनेबल चीजें चाहिएं? वास्तव में जीवन को कलाकार के लिए लम्बी-चौड़ी सौंदर्य करने वाली वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है। वह साधारण चीजें मालूमी और परिस्थितियों में ही काम चलाता है।

अल्प साधनों द्वारा जीवन-निर्माण

जीवन के सच्चे कलाकार को अधिक साधनों की जरूरत नहीं होती। वह मामूली साधनों और साधारण परिस्थितियों द्वारा ही आनन्दमय जीवन की सृष्टि करता है। छोटी शक्ति और अल्प साधनों द्वारा ही आप अपने कलात्मक दृष्टिकोण को प्रकट करना प्रारम्भ कर दीजिए। यदि आपके पास मनचाही सौंदर्य की नाना वस्तुएं हैं, तो घबराने और निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आपके पास जो टूटी-फूटी साधारण वस्तुएँ हैं, अल्प साधन गरीबी की सम्पदा या झोंपड़ी है, उसी के सहारे अपनी जीवन कला के चमत्कारों को प्रदर्शित करना प्रारंभ कर दीजिए।

मिट्टी के दीपक को देखिए। जब चारों ओर घनघोर अन्धकार छाया रहता है, तो दीपक जिसमें छदाम की मिट्टी, अधेले का तेल और दमड़ी की क्षीण बत्ती रहती है- अर्थात् कुल मिलाकर एक पैसे की पूँजी नहीं है- सुन्दर प्रकाश से गृह को जगमग-जगमग कर देता है, तथा अपने शुभ्र प्रकाश से सैकड़ों कार्य सम्पन्न करता है। जब सहस्रों रुपये वाली बिजली क्षण भर में फेल हो जाती है, तो यह मिट्टी का दीपक, यह बिना पूँजी वाला दीपक, प्रकाशमान होता है, अपनी महत्ता प्रकट करता है, लोगों का प्यारा बनता है, प्रशंसित होता है और निज अस्तित्व को धन्य बनाता है। क्या दीपक ने कभी ऐसा रोना रोया है कि मेरे पास इतने मन तेल होता इतने सेर रुई होती, इतना बड़ा मेरा आकार होता, तभी मैं इतना प्रकाश करता?

दीपक को कर्महीन आलसी की भाँति बेकार शेख-चिल्लियों की तरह निरी कपोल कल्पना में समय व्यर्थ नष्ट करने के लिए अवकाश कहाँ? वह तो आज की परिस्थिति, आज की हैसियत तथा अपने सामने मौजूद अल्प साधनों को निरखता है। अपनी उसी दीन-हीन स्थिति का आदर करता है। और अपनी केवल एक पैसे मात्र की छोटी सी पूँजी से कार्य करता है। उसका छोटा सा कार्य है बेशक, किन्तु उस छोटेपन में भी सफलता का उतना ही महत्व है, जितना कि सूर्य के तथा चन्द्र के चमकने की सफलता का है।

फिर, आप अपने अल्प साधनों से क्यों परेशान और चिन्तित होते हैं, अपनी शक्तियों (चाहे वे साधारण ही सही) को देखिए, समझिए, तौलिए अपनी परिस्थिति, हैसियत, औकात को आ किए और अपनी छोटी सी शक्ति से ही कार्य आरम्भ कीजिए, जीवन को सुन्दर और आनन्दमय बनाइए।

इस कुरूपता का परित्याग कीजिए

उन आदतों का परित्याग कर दीजिए, जो असुन्दर, निंद्य और कुरूप हैं। व्यसन तथा व्यभिचार कुरूप और राक्षसी की आदतें हैं। वस्तुतः इन गन्दी आदतों का सहारा न कीजिए। इसी प्रकार नीच विचार रखना एक खतरा है। ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, झूठ, छल-कपट और स्वार्थ परता की गन्दी नीति का अवलम्बन लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही दृष्टियों से कुरूप, हानिकारक और दुःखदायी है। भ्रष्टाचार के मार्ग पर चलने वालों को पग-पग का घृणा, अपयश, तिरस्कार, अपमान, उपहास, और अविश्वास का सामना करना पड़ता है। उनको सच्चे मित्र एवं सहयोगियों की प्राप्ति प्रायः असम्भव हो जाती है। बदनाम आदमी सबसे कुरूप है। उसमें निन्दा, द्वेष, चरित्रहीनता की सामाजिक कुरूपता है। ईर्ष्यालु, क्रोधी, कुढ़ने वाला इन भयंकर आवेशों में फँसकर वैसा भद्दा लगता है। ओछी मनोवृत्ति एक ऐसी अग्नि है जो मनुष्य के मन तथा जीवन की समस्त सुन्दरता को भस्मीभूत कर देती है। कुढ़न, द्वेष, ईर्ष्या, अशान्ति सब असुन्दर हैं, जिनके वश में हो जाने से जीव की समस्त कलात्मकता विलुप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति का चित्त सदा मरघट की तरह जलता रहता है।

अतः असुन्दर क्लाविहीन ओछे नीच विचारों का परित्याग करना ही श्रेष्ठ है। इन कुरूप आवेशों में फँस जाने से जीवन निरर्थक, अनुचित, एवं अनुपयोगी कार्यों में व्यतीत हो जाता है।

जीवन का सच्चा कलाकार वह है, जो अपने अल्प साधनों द्वारा ही अपने जीवन को शान्त, संतुष्ट, सरस और सुन्दर बनाता है। उसकी विशेषता उसकी योजना एवं जीवन दृष्टि है, साधना या परिस्थितियाँ नहीं।


मिट्टी की प्राकृतिक चिकित्सा

(श्री डाँ. ज्ञानचन्द जी)

मिट्टी प्रकृति की मुफ्त दवा है, जो सबको घर बैठे मिल सकती है। जिस मिट्टी का प्रयोग हम चिकित्सा में करें वह बिलकुल स्वच्छ, ताजी और दुर्गन्ध रहित होनी चाहिए। उसे साफ करके प्रयोग में लेनी चाहिए। मिट्टी चार रंग की होती है- काली, पीली, सफेद और लाल।

काली मिट्टी विष को हरने वाली है। सब प्रकार के विष को तत्काल नष्ट करके शरीर को स्वस्थ करती है। साँप, बिच्छू, ततैया, पागल कुत्ते आदि के काटे जहर को दूर करने में इसका प्रयोग लाभकारी है। साँप के काटे में रोगी का मुँह खुला छोड़ कर शेष सारा शरीर आँगन में गड्ढा खोद कर मिट्टी से अच्छी तरह दबा देना चाहिए। थोड़े समय का काटा रोगी 2-3 घण्टे में तथा बहुत अधिक देर का मरणासन्न रोगी 24 घण्टे में बिलकुल स्वस्थ हो जायगा। विष खा लेने, बिजली गिर जाने, हैजा अथवा मोतीझरा होने पर रोगी के गर्दन का भाग बाहर रखकर शेष गड्ढे में इसी प्रकार दबा देना चाहिए। परन्तु यह ध्यान रहे कि जिस जमीन में रोगी को दबाया जाय, वह गरम या सूखी न हो बल्कि गीली और ठण्डी होनी चाहिए। ततैया, मधुमक्खी आदि कम विषैले डंक लगने पर तमाम शरीर को मिट्टी में दबाने की आवश्यकता नहीं, बल्कि जिस स्थान पर डंक लगा हो, उसी स्थान को जमीन में दबाना चाहिये या उस पर गीली मिट्टी की पुल्टिस बाँधना चाहिए। कुत्ते के तुरन्त काटे में भी दंशित भाग को मिट्टी में दबाना या पुल्टिस बाँधना काफी होगा।

शरीर पर कुष्ठ के दाग हर एक प्रकार के फोड़े, फफोले आदि चमड़ी के रोगों के लिए गीली मिट्टी एक बहुत ही उत्तम प्राकृतिक दवा है। क्योंकि शरीर की मिट्टी सड़ जाने से ही उसमें कुष्ठ आदि रोग होते हैं और इसीलिए सड़ी मिट्टी पर नई मिट्टी पड़ने पर घाव अच्छे हो जाते हैं। चमड़ी के रोग होने का मूल कारण यह है कि रक्त में अनेक प्रकार के दुर्गन्ध युक्त विषैले तत्व संचित हो जाते हैं। वे गीली मिट्टी के लेप से अच्छे हो जाते हैं। क्योंकि अन्दर के भागों में इकट्ठे हुए दोषों को बाहर निकालने में मिट्टी अद्भुत शक्ति रखती है।

गरमी की सूजन, मस्तिष्क और नेत्रों का विकार, प्रदर और प्रमेह आदि विजातीय द्रव्यों से उत्पन्न रोगों के लिए गेरुआ इट जैसी लाल मिट्टी काम में लायी जाती है।

सब प्रकार के चर्म रोग, हथियारों के घाव, रक्त, विकार, नासूर, फफोले, गाँठ, कोढ़, हड्डी का टूटना, बादी का दर्द आदि सम्पूर्ण दर्दों में मिट्टी बहुमूल्य औषधि साबित हुई है। इन रोगों में मिट्टी की पुल्टिस बाँधनी चाहिये। उसकी विधि यह है-काली या चिकनी मिट्टी बारीक छलनी में छानकर ठण्डे पानी में भिगोकर और उसे आटे की तरह गूँथ कर घाव पर रोटी सी बनाकर रख देना और गहरा घाव हो तो घाव में भर देना तथा साफ कपड़े की पट्टी बाँध देनी चाहिए। कुछ डाक्टरों की राय है कि घाव और मिट्टी के बीच में कपड़ा रख देना चाहिये। मिट्टी स्वच्छ और गन्दगी से रहित होनी चाहिये। यह मिट्टी दिन में दो बार बदलनी चाहिये। पेट, छाती, आँख, गला, गाल, कनपटी, मूत्राशय, जिगर और पीठ आदि भागों पर जहाँ दर्द और सूजन हो वहाँ गीली मिट्टी रखकर ऊपर से पट्टी बाँध देनी चाहिये। मिट्टी ठीक दर्द की जगह पर हो। यदि शरीर में गर्मी कम हो तो ऊपर ऊन की पट्टी भी लपेटी जा सकती है। पेडू और पेट शरीर के सब रोगों का मूल आधार है। गरमी की किसी प्रकार की बीमारी होने पर इन स्थानों पर मिट्टी की पुल्टिस बाँधने से लाभ होता है। रोग और रोगों की स्थिति देखकर दो चार घण्टे तक मिट्टी रहने दी जा सकती है। मिट्टी यदि जल्दी नर्म हो जाय, तो बदली जा सकती है। दाँत के दर्द में गाल के बाहर दूखती जगह पर मिट्टी की पट्टी बाँधनी चाहिये। पट्टी खोलने पर सूखी मिट्टी के कुछ कण किसी अंग या घाव में लगे रहें और छुटाने में तकलीफ हो तो लगा रहने दो, कुछ हानि नहीं।

सिर के दर्द में गर्दन और गले में बाँधनी चाहिये। गठिया और लकवे के रोगी को कुछ गर्म बालू में गर्दन तक दबा देने से बड़ा लाभ होता है। चिकनी मिट्टी से दूषित शरीर को कई बार रगड़ कर धोने से चमड़ी नरम, निर्मल, सुन्दर एवं रोग रहित हो जाती है। इस काम के लिए मुल्तानी मिट्ठी ठीक है, इसका उपयोग बढ़िया से बढ़िया साबुन से भी अधिक लाभदायक है। यदि स्त्रियाँ इसी से सिर धोती रहें तो उनके बाल कभी कमजोर तथा सफेद नहीं पड़ सकते हैं।

लू लगने पर पीली मिट्टी में पानी छिड़क कर लेट जाना चाहिए। और कुछ दिन तक पीली मिट्टी के ऊपर ही खाट बिछाकर सोना चाहिये। गर्मी के दिनों में आँगन में पीली मिट्टी डलवा कर खूब छिड़काव करो तो उसमें से सुगन्ध बहेगी। उस हवा में बैठे रहने से नेत्र, मस्तिष्क और मन को अतीव शान्ति प्राप्त होती है। गोबर में पीली मिट्टी मिलाकर लीपने में यही वैज्ञानिक आधार है। गोबर रोग उत्पादक कीटाणुओं को नष्ट करता है और मिट्टी शरीर को स्वास्थ्यप्रद वायु प्रदान करती है।

गोबर का वैज्ञानिक अन्वेषण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। चूल्हों में जो रोटी सिंकती है वह अधिक सुपाच्य, मधुर, पौष्टिक और गुणकारी होती है। कोयलों अथवा लकड़ी की सिकी रोटी वैसी नहीं होती।

कल्प क्रिया में तीन कोठरी कच्ची मिट्टी बनाकर उसमें डेढ़ मास पर्यन्त रहना पड़ता है। आयुर्वेद शास्त्र में तीनों कोठरियों के निर्माण का विस्तृत वर्णन है जिसमें कच्ची मिट्टी की विशेषता बार-बार बताई गई है। काली मिट्टी के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर एक हाथ मोटी दीवार बनानी चाहिये। उसके अन्दर लेटे रहने के लिए काली मिट्टी का ही चबूतरा भी बनाना चाहिये। डेढ़ मास तक काली मिट्टी के वायु कण मनुष्य शरीर पर अपना चमत्कारिक प्रभाव करते हैं, फेफड़े शुद्ध होते हैं, जरा अवस्था दूर होती है, शरीर के यौवन अवयव पुष्ट होकर फिर प्रकट होते हैं।

हिस्टीरिया, भ्रम, मूर्छा आदि मानसिक रोगों में भी मिट्टी सफल औषधि है। ऐसे रोगी को हरियाले स्थान में रखना चाहिये। पीपल, बड़ और नीम के सघन वृक्ष हों, उनके बीच में थोड़ा मैदान हो, जिसमें एक-एक गज गहरी पीली मिट्टी बिछी हो, फैली मिट्टी तथा फूस के छप्परों की एक छोटी सी साफ हवादार खुली कोठरी हो। कोठरी की दीवारों पर प्रेम चित्र टंगे हो। दीवार के पीछे सितार, बाजा तथा मधुर रेकार्ड बजने का प्रबन्ध हो। रोगी के निद्राकाल में सितार की मीठी झंकार रोगी की व्याधि को हरती है। उसके सम्मुख प्रेम और आनन्द की बातें करनी चाहिये। मैदान की मिट्टी को ठंडे जल से छिड़कते रहना चाहिये। यदि सम्भव हो और विशेष गर्मी के दिन हों तो खस के दस-बीस पौधे जड़ समेत वहाँ लगा देने चाहिये खुली चाँदनी रात में रोगी को मिट्टी पर नंगे पैर टहलने का अवसर देना चाहिए। मिट्टी के ढेले को हाथ में लेकर वह सूँघे तो भी अच्छा है। अच्छा तो यह है कि रोगी के समवयस्क मित्रों को ही उसके पास अधिक बने रहने दिया जाय। उसे कठोर पीड़ा पहुँचाने वाली, भूली हुई बात याद नहीं दिलानी चाहिये। उसे ऐसा लगना चाहिए कि संसार सुन्दर है, संसार में आनन्द और प्रेम है।

अनिद्रा रोग के लिए भी यही उपचार करना चाहिये। इसके खाट के चारों और खस की जड़ों को डाल देना चाहिये जिससे जड़ में लगी मिट्टी की भीनी सुगन्ध उसके दिमाग में पहुँचे। रोगी को छेड़ना, चिढ़ाना या उससे दुःखद बातें नहीं करनी चाहिये।

अनेक रोगों में मिट्टी की पुल्टिस बाँधने की आवश्यकता नहीं होती। केवल सेंकने से ही लाभ होता है। सेंकने की विधि यह है कि मोटी फला लेन या नर्म कम्बल का टुकड़ा लेकर उसमें गर्म-गर्म मिट्टी को भरो और तह करके रोगी के अवयव पर सेको। त्वचा न जले इसका ध्यान रखो। कपड़ा सूखा न होकर गीला निचोड़ कर लेना चाहिये। इससे मिट्टी की भाप शीघ्रता से अवयव पर पहुँचती है। बवासीर के रोगी को लाल मिट्टी से सेंकना चाहिये। ईंट को चूल्हें में लाल करके कम्बल के टुकड़े में लपेट कर मस्सा के पास रख दो और अच्छी तरह भाप लगने दो। आधा घण्टे तक सेको। दिन भर में दो-तीन बार ऐसा करना चाहिए। रोगी को इट बुझा मट्ठा देना चाहिए और इट बुझा हुआ पानी भी।

रीढ़ के सेंकने के लिए 6 या 8 इंच चौड़ा और इतना ही लम्बा टुकड़ा फला लेन का लेना चाहिए जितना पूरी रीढ़ तक पहुँच सके। रोगी को औंधा लिटाकर उसकी कमर पर पहले कपड़ा बिछा दो, फिर काली मिट्टी तवे पर गरम करके सुहाती-सुहाती कपड़े के ऊपर बिछा दो और सेक लगने दो। मिट्टी ठण्डी होने पर बदल देनी चाहिए। 15 से 20 मिनट का सेक काफी है। अधिक पीड़ा होने पर अधिक देर तक सेक सकते हैं। परन्तु एक घण्टे से अधिक नहीं सेंकना चाहिए। यदि हर सेंकने से पीछे थोड़ी ठण्डक पहुँचाई जाय तो सेंकने का अधिक गुण होगा। ठंडक पहुँचने की रीति यह है कि किसी पतले कपड़े की दो तह करके उसे ठण्डे पानी में भिगोकर निचोड़ो और सेके हुए अवयव पर लगाओ। फिर शीघ्रता से उठकर अंग को सुखा डालो और तुरन्त ही सेको।

पैरों के सेंकने के लिए टखनों तक कपड़ा लपेट कर पैर नीचे लटका देने चाहिये और गर्म-गर्म मिट्टी में चारों और से दबा देने चाहिए। इसकी गरमी 105 डिग्री की होनी चाहिये। यदि पसीना भी लाना हो तो रोगी को कम्बल ओढ़ा देना चाहिये और बीच-बीच में राई का गरम पानी भी पिलाते रहना चाहिए। सिर पर ठण्डा कपड़ा रखना चाहिए। मिट्टी ठण्डी हो जाय तो बदल सकते हैं। यह सेक भी 30 मिनट से अधिक नहीं होनी चाहिये। इस क्रिया से सिरदर्द निद्रानाश, जननेन्द्रिय के अवयवों की सूजन, ठंड और शीत, पैर की पीड़ा सब अच्छा हो जायगा।

मिट्टी में रोग नाश की अद्भुत शक्ति है। उससे लाभ उठाकर हम आसानी से निरोग रह सकते हैं।


अपने ऊपर विश्वास कीजिए।

(श्री राल्फ वाल्डो एमर्सन)

अपने निजी विचार पर भरोसा करना और जो बात अपने दिल में ठीक जमती है उसको सब लोगों के लिए सही समझना- बस यही ‘प्रज्ञा’ है।

हम मूसा, प्लेटो और मिल्टन की सबसे बड़ी विशेषता यही मानते हैं कि उन्होंने पुस्तकों और पुरानी परम्पराओं पर ध्यान नहीं दिया, और उन्होंने और लोगों के स्वर में स्वर न मिलाकर अपने दिमाग की ही बात कही।

मनुष्य को अपनी अन्तरात्मा से मिलने वाले प्रकाश की किरण को पहचानने और देखने का अभ्यास करना चाहिये। किन्तु अक्सर होता यह है कि वह अपने विचार को गौर किये बिना ही इस कारण खत्म कर देता है क्योंकि वह उसका अपना होता है। प्रज्ञावान के प्रत्येक काम में हम अपने उन्हीं विचारों की छाया देख सकते हैं, जिन्हें हम खत्म कर देते हैं, वे हमारे पास पराई विभूति बन कर लौटते हैं। महान कलात्मक वस्तुओं के बारे में हमारे लिये इससे बढ़कर और कोई सबक नहीं हो सकता।

हर व्यक्ति के शिक्षा-काल में ऐसा मौका जरूर आता है जबकि वह मानने लगता है कि स्पर्धा करना अज्ञान है, अनुकरण आत्मघात है, उसे अपने ही भरोसे पर अच्छा या बुरा जैसा भी बन पड़े अपना भाग अदा करना चाहिये, और इस विस्तृत भूमण्डल के धन धान्य पूर्ण होते हुए भी उसका पेट भरने लायक मुट्ठी भर अनाज भी उसे तभी हासिल हो सकता है जबकि वह अपने खेत में अपना पसीना बहाये। जो शक्ति उसके अन्दर विद्यमान है वह प्रक्रिया रूप से बिल्कुल नई है, और वह क्या कर सकती है उसे उसके सिवाय दूसरा कोई नहीं जानता, और वह स्वयं भी उसे तभी जान पाता है जबकि वह कोशिश कर देखे।

अपने ऊपर विश्वास रखे, यह विश्वास ही वह अटूट तार है जिसके सहारे हृदय स्पन्दित होता है। प्रेम ने तुम्हारे लिये जो स्थान, समकालीन लोगों को समाज और घटनाओं का संयोग लिख दिया है उसे स्वीकार करो। महापुरुषों ने सदैव ऐसा ही किया है, उन्होंने अपने जमाने के प्रज्ञावानों के सामने अपने को शिशुवत् ही समझा है, उन्होंने अपनी अनुभूति को व्यक्त भी किया है कि उनके हृदय में सर्वशक्ति मान विराजमान है जो उन्हीं के हाथों से अपने काम करता है और उसके समस्त क्रियाकलापों में छाया रहता है।

हम मानव हैं, हमें अपने उस अदृश्य भविष्य को पूरे भरोसे के साथ स्वीकार करना चाहिये- बच्चे या अपाहिज बनकर किसी कौने में दुबकते हुए नहीं। क्रान्ति के समय कायरों की तरह भाग कर जान बचाते हुए नहीं, बल्कि उस सर्वशक्तिमान के आदेश को शिरोधार्य करके अशाँति व अंधकार को चीरते हुये मार्गदर्शक, मुक्ति दाता और परोपकारी बन कर स्वीकार करना चाहिये।

एकाकी होकर जो आवाज सुनाई देती है वह दुनिया के गोरखधन्धे में फँसकर मन्द और अस्पष्ट हो जाती है। समाज सर्वत्र ही अपने प्रत्येक सदस्य के मानव के विरुद्ध षड़यन्त्र किये हुए हैं। समाज एक ऐसी जोइण्ट स्टाक कम्पनी है जिसके सदस्य हर एक भागीदार का पेट अधिक अच्छी तरह भरने के लिये, यह तय कर लेते हैं कि लाभ उठाने वाला अपनी आजादी और संस्कृति का स्वामित्व सौंप दे। जिस गुण का अधिकतम आदर है वह है सहमति। आत्म-विश्वास से तो उसे खास चिढ़ है। समाज वस्तु-स्थिति और निर्माताओं के बजाय नामों और रूढ़ियों पर अधिक ध्यान देता है।

जो कोई भी हो यदि वह मनुष्य होगा तो लकीर पीटने वाला नहीं हो सकता। सबसे बड़ी चीज अपने मन की पवित्रता ही है।

उन पुराणी परम्पराओं का अनुकरण करने में जो तुम्हारे लिए बिलकुल असामयिक हो चुकी है, आपत्ति यही है कि उससे तुम्हारी शक्ति का अपव्यय होता है। उससे तुम्हारा समय बर्बाद होता है और तुम्हारे चरित्र का तेज नष्ट हो जाता है।

यदि तुम एक निर्जीव चर्वे को चलाते हो, एक मृतप्राय बाइबिल-सोसाइटी को चन्दा देते हो, एक बड़ी पार्टी को सरकार बनाने या सरकार का विरोध करने के लिए वोट देते हो, तो मैं इन सभी स्थितियों में ठीक-ठीक यह नहीं जान सकता कि तुम्हारा व्यक्तित्व क्या है और निश्चय ही तुम्हारे असली जीवन में से इतनी शक्ति बेकार चली जाती है।

हर आदमी को यह समझ लेना चाहिए कि यह सहमति का रास्ता कितना बेहूदा है। यदि मैं तुम्हारे पन्थ को जान लूँ तो मैं तुम्हारे युक्ति क्रम का पहले से ही अन्दाजा लगा सकता हूँ। मैं एक धर्म-प्रचारक को अपने पन्थ की किसी धार्मिक प्रक्रिया की पूर्ण उपादेयता बतलाते हुए सुनता हूँ। क्या मुझे यह पता नहीं है कि उसने सिर्फ एक ही ओर दृष्टि डालने की कसम खा रखी थी और उसका वह स्वीकृत रास्ता एक मनुष्य के रूप में न होकर गिरजे के पादरी की हैसियत से ही है?

कुछ भी हो अधिकाँश लोग तो अपनी आँखें एक या दूसरे रंग की पट्टी बाँध रखते हैं और अपना बन्धन किसी मत या सम्प्रदाय से जोड़ रखा है। उससे सहमति रखकर चलना हर दशा में गलत नहीं होता, किन्तु उसके द्वारा प्रतिपादित हरेक सत्य विशुद्ध सत्य भी नहीं होता। उसका बतलाया हुआ दो असली दो, और चार असली चार, नहीं होता, इसलिए उनका हरेक शब्द हमें परेशान कर देता है।

एक दूसरी चीज जो हमें आत्म विश्वास से दूर-दूर भगाती है, वह है हमारा अतीत की संगति पर बल देना- अपने पिछले कार्यों या वचनों के लिए हमारी आदर-बुद्धि।

किन्तु आप अपने दिमाग को भूतकाल में क्यों उलझाते हो? अपनी पुरानी याददाश्त पर इतना भरोसा क्यों करते हो- शायद इस भय से कि आपको अमुक सार्वजनिक स्थान में कहे गये अपने वचन से पीछे फिरना पड़ेगा? मान लो कि आपको अपनी बात का खण्डन करना पड़ता है, तो उसकी चिन्ता क्या है?

क्षुद्र हृदय वालों पर अतीत से संगति रखने का भूत सवार रहता है, क्षुद्र राजनीतिज्ञ, दार्शनिक और धर्मोपदेशक उसे बड़ा महत्व देते हैं। किंतु महापुरुष को उस संगति से कोई सरोकार नहीं रहता। वह तो उसे दीवार पर पड़ने वाली अपनी छाया जैसा ही समझता है। आप आज जो कुछ सोचते हैं उसी को बाहर प्रकट करें और जो कल सोचें उसे कल मुँह से निकालें, चाहे वह आपकी आज कही हुई बात से बिलकुल ही उलटा क्यों न हो।

ओह, इससे तो आपके बारे में गलतफहमी होना बहुत सम्भव है? पाइथागोरस को लोगों ने गलत समझा, और सुकरात, ईसामसीह, लूथर, कौपर निकस, गैलीलियो और न्यूटन तथा प्रत्येक अन्य महापुरुष व विद्वान गलत समझा गया है।

मुझे आशा है कि इस जमाने में ‘सहमति’ और ‘संगति’ शब्दों की इतिश्री हो जायगी। अच्छा हो कि इन शब्दों का ऐलान करके भविष्य के लिये उन्हें मूर्खता सूचक करार दे दिया जाय। अब हमें और अधिक झुकना व अफसोस जाहिर करना बन्द कर देना चाहिये।

कोई बड़ा आदमी मेरे घर पर दावत खाने आ रहा है। मैं उसे खुश करना नहीं चाहता मेरी इच्छा है कि वह मुझे खुश करने की इच्छा करे। यह बात मैं मानव-मात्र का प्रतिनिधि होकर कहता हूँ उसे चाहे मैं नम्रता से कहूँ पर उसकी यथार्थता में उससे कमी नहीं होगी। हमें इस जमाने की आम चाल और क्षुद्र सन्तोष पर प्रहार करके उनका प्रतिकार करना चाहिए। हमें रीति रिवाजों, परम्पराओं और संस्थाओं की परवाह न करके इतिहास का यह तथ्य सामने रखना होगा कि मनुष्य काम करके ही महान विचारक और क्रियाशील बनता है- सच्चा इंसान किसी स्थान या समय से बँधा नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं गतिविधियों का केन्द्र बन जाता है, संक्षेप में, जहाँ वह है वहीं जीवन की सहज स्वाभाविकता है।


पूर्णाहुति यज्ञ में आप भी भाग लीजिये।

आगामी गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 (ता. 20-21-22 जून सन् 53) को होने वाले पूर्णाहुति यज्ञ में मथुरा आकर सम्मिलित होने की स्वीकृति बहुत कम लोगों को दी गई है। जितने आवेदन पत्र आये हैं उनमें से दसवाँ हिस्से को भी स्वीकृति नहीं दी जा सकती। कारण यह है कि यज्ञ को तामसिक प्रदर्शन और राजसिक अपव्यय से बचाते हुए, निश्चित मर्यादा में रखते हुए परम सात्विक बनाना है। जिससे ऋषि कल्प ब्रह्म दर्शन उत्पन्न होने का मूल उद्देश्य पूर्ण हो और अनावश्यक भीड़ जमा न हो।

यह ‘पूर्णाहुति यज्ञ’ अपने ढंग का अपूर्व यज्ञ है। (1) 125 लाख हस्तलिखित मंत्रों की स्थापना, (2) 2400 तीर्थों का जल तथा रज का एकत्रीकरण, (3) सहस्रांशु साधना के अंतर्गत देश भर में 125 करोड़ गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, तथा 125 हजार उपवासों के विशाल आयोजन की पूर्ति (4) गायत्री तीर्थ का निर्माण (5) एक प्रभाव शाली अखण्ड अग्नि की स्थापना (6) हमारे 24 महापुरश्चरणों की आहुति (7) 24 दिन का केवल गंगाजल पर हमारा उपवास (8) 240 नैष्ठिक गायत्री उपासकों का सम्मिलन। वह सभी कार्य ऐसे हैं जिनके द्वारा यह आयोजन छोटा होते हुए भी अपना विशेष रहस्य रखेगा।

इस मार्ग में रुचि रखने वाले प्रायः सभी व्यक्तियों द्वारा इसमें सम्मिलित होने की इच्छा रखना स्वाभाविक है। कितने ही व्यक्ति आर्थिक कारणों से, कार्य व्यस्तता में अवकाश न मिलने से, अस्वस्थता या अन्य विशिष्ठ परिस्थितियों के कारण न आ सकेंगे। कितने ही जो आसानी से आ सकते हैं उनमें से अधिकाँश को मथुरा आने की स्वीकृति नहीं मिली है। इतना होते हुए भी यह यज्ञ इतना सूक्ष्म एवं व्यापक विस्तार का है कि इसमें हर एक श्रद्धालु घर रह कर भी सम्मिलित हो सकता है, भागीदार बन सकता है।

मथुरा में तो एक बहुत ही छोटा सा कार्यक्रम नेत्रों को दिखाई देगा। वस्तुतः इसका रहस्य असंख्य आत्माओं के सच्चे संबंध समन्वय एवं सहयोग में है। युग परिवर्तन के, विश्व कल्याण के जो अत्यन्त प्रभावशाली सूक्ष्म कार्य हो रहे हैं वे किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हो सकते, उनका क्षेत्र अत्यन्त विशाल है- लाखों करोड़ों योजनों में फैला हुआ है। उस विस्तृत फैलाव का एक बहुत ही तुच्छ सा प्रस्फुरण मथुरा में होगा। वस्तुतः तो वह भारत भूमि के कोने-कोने तक फैला हुआ है। उसमें असंख्य आत्माएं सम्मिलित हैं। अपने-अपने स्थान पर रहकर ही अधिकाँश महापुरुष इस पुण्य सत्र में अपनी अदृश्य चेतना को सम्मिलित करेंगे। जिन लोगों को मथुरा आने की स्वीकृति नहीं मिल सकी है या जो अपनी परिस्थितियों वश नहीं आ सके हैं। उनके लिए भी पूरा-पूरा अवसर इस यज्ञ में भागीदार बनने का अवसर मौजूद है। वे घर रह कर भी यज्ञ में सम्मिलित होने की भागीदारी को प्रसन्नता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं।

नीचे लिखे कुछ कार्यक्रम प्रत्येक गायत्री प्रेमी के संमुख उपस्थित किये जाते हैं। अब से लेकर यज्ञ के समय तक इन कार्यक्रमों के लिए प्रयत्न किया जाय तो केवल यज्ञ ‘देखने’ के लिए मथुरा आने की अपेक्षा उसका मूल्य, महत्व, महात्म्य, पुण्य और परिणाम निश्चय ही अधिक होगा। कार्यक्रम यह है-

(1) अपने आसपास के क्षेत्र में गायत्री विद्या की जानकारी का अधिक से अधिक प्रसार कीजिए। लोग इस महान् ज्ञान को आज प्रायः भूल गये हैं। आपका कर्तव्य है कि अधिक से अधिक लोगों को गायत्री महाशक्ति का परिचय करावें ताकि उनमें इस मार्ग पर चलने की इच्छा जागृत हो। भारत वर्ष में पुनः गायत्री गौरव की स्थापना करना गायत्री यज्ञ का उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होना- उस यज्ञ में भाग लेने के बराबर है।

(2) जिन लोगों की थोड़ी भी रुचि पूजा उपासना में पावें, उन्हें गायत्री मंत्र लेखन यज्ञ में सम्मिलित करें। चाहे कम से कम 240 मंत्र ही लिखें जाय पर लिखने वालों की संख्या बढ़ाने का अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अभी यज्ञ में सवा करोड़ मंत्रों की स्थापना की ही सम्भावना है, पर यदि आप सब लोग इस दिशा में थोड़ा अधिक उत्साह दिखावें तो 24 करोड़ मंत्रों की स्थापना करके गायत्री तपोभूमि को और भी अधिक शक्ति सम्पन्न बनाया जा सकता है। आप इसके लिए प्रयत्न कीजिए।

(3) अपने समीपवर्ती तीर्थों का जल तथा रज संग्रह करें। तथा जिन स्थानों में किन्हीं विशिष्ट आत्माओं ने तपस्या की हो उन स्थानों की मिट्टी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में गायत्री मन्दिर की स्थापना के लिए भिजवाने का प्रयास करें। जल डाक से भेजने में असुविधा हो मिट्टी को जल में भिगोकर सुखा लो इस प्रकार दोनों का सम्मिश्रण हो सकता है। हर तीर्थ का एक-एक छटाँक जल तथा रज पर्याप्त है। जिन स्थानों का जल तथा रज भेजा जाय उनका पूरा परिचय तथा वर्णन भी लिखना चाहिए। आप जिन तीर्थों का जल तथा रज भिजवा सकें उसकी पूर्व सूचना हमें दे दें ताकि उन स्थानों के सम्बन्ध में निश्चिन्त रहा जाय। इस पुण्य कार्य द्वारा गायत्री तीर्थ की स्थापना में आपका भी भाग रहेगा।

(4) हमारे उपवास के 24 दिन में ता0 28 मई से 22 जून तक, यथासम्भव अपनी गायत्री साधना बढ़ा दें। और यज्ञ के तीन दिनों में 20,21,22 जून को दूध फल पर अथवा केवल नमक छोड़ कर उपवास करें। इस प्रकार एक महान व्यापक उपवास में एक भाग आपका भी हो सकता है।

(5) ता0 22 जून को अपने यहाँ एक छोटा या बड़ा सामूहिक गायत्री यज्ञ करें और गायत्री के महत्व पर प्रवचन करायें। हो सके तो कुछ सस्ता गायत्री साहित्य भी वितरण करें। इस प्रकार पूर्णाहुति यज्ञ में आप भी सम्मिलित रहेंगे।

(6) हमारे प्रतिनिधि के रूप में आप अकेले अथवा वहाँ के कुछ अन्य सज्जनों को साथ लेकर एक प्रतिनिधि मण्डल के रूप में अपने आसपास के ज्ञान वृद्ध, आयु वृद्ध लोक सेवी, भगवत् भक्त, पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पास जावें। और उनसे हमारे उपवास के लिए, पूर्णाहुति यज्ञ की सफलता के लिए, गायत्री तीर्थ की उपयोगिता के लिए, आशीर्वाद माँगें। ऐसे मौखिक या लिखित आशीर्वाद हमें भेज दें। इन तीर्थ स्वरूप सत्पुरुषों को “गायत्री परिचय” पुस्तिकाएं भेट करके उन्हें गायत्री संस्था का परिचय अवश्य करा देना चाहिए। इसके लिये जितनी पुस्तिकाएं आवश्यक हों बिना मूल्य मँगा लें।

(7) जिन देवियों ने आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य का व्रत लिया हुआ हो उनके चरणोदक प्राप्त करें। नैष्ठिक ब्रह्मचारिणी महिलाएं गंगा स्वरूप होती हैं। ऐसी 24 देवियों को ढूँढ़ने और उनका चरणोदक प्राप्त करने के प्रयत्न में आपका सहयोग विशेष रूप से वाँछनीय है।

(8) अपने गायत्री साहित्य को अधिकाधिक लोगों को पढ़ाइये। जो पुस्तकें कम हों उन्हें मँगाकर अपना सैट पूरा कर लीजिए। तथा श्रद्धालु व्यक्तियों को प्रेरणा कीजिए कि वे भी गायत्री साहित्य मँगाकर बार-बार स्वयं पढ़ने का स्थायी लाभ उठावें और अन्य व्यक्तियों को इस साहित्य द्वारा लाभ पहुँचाने का पुण्य लें। ऐसी प्रेरणा देते रहने से आप अनेक व्यक्तियों के सच्चे कल्याण का आयोजन कर सकेंगे।

(9) आपकी पहुँच से अधिक दूर रहने वाले साधना प्रिय, धार्मिक प्रकृति के सज्जनों के परिचय तथा पते हमें भेजिए ताकि उन्हें गायत्री उपासना के लिए प्रेरणा दी जा सके एवं आशीर्वाद प्राप्त किये जा सकें।

उपरोक्त नौ कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए आप किस प्रकार, क्या तैयारी कर रहे हैं इसकी सूचना हमें बराबर भेजते रहना चाहिए। जो जितने अंशों में इन कार्यक्रमों में सहयोग देते हैं वे उतने ही इस पूर्णाहुति यज्ञ एवं तीर्थ स्थापना में पुण्य के भागीदार हो जाते हैं। इस प्रकार कोई भी सज्जन घर रहते हुए भी इन कार्यों में सहयोग करके मथुरा आने की अपेक्षा अधिक भागीदारी प्राप्त कर सकते हैं। गायत्री महा अभियान का लक्ष कोरे दर्शकों से नहीं वरन् सक्रिय कार्यकर्ताओं से ही पूरा हो सकता है। सर्वत्र कार्य का ही आदर एवं महत्व माना जाता है। दैवी शक्तियाँ भी बातून हुल्लड़ बाजों की अपेक्षा सच्चे, नैष्ठिक, प्रयत्नशील एवं शान्तचित्त उपासकों पर ही विशेष रूप से अनुग्रह करती हैं।

मथुरा आ सकना या न आ सकना कोई विशेष महत्व की बात नहीं हैं। महत्व की बात यज्ञ में सम्मिलित होना एवं भागीदार बनना है। इसके लिए हम उसी धर्मात्मा सत्पुरुषों को आमन्त्रित करते हैं। उपरोक्त 9 कार्यक्रम आपके सामने हैं। आज से ही इनमें लग जाइए और अपने इस महान आयोजन को सच्चे अर्थों में सफल बनाकर परम शान्तिदायक आत्म लाभ प्राप्त कीजिए।

मथुरा पधारने वालों को सूचनाएँ

जिन सज्जनों को यज्ञ में सम्मिलित होने की स्वीकृति दी जा चुकी है, उन्हें निम्न बातें भली प्रकार ध्यान में रखनी चाहिए।

(1) ता. 20, 21, 22 जून का उत्सव है। ता. 19 को शाम तक मथुरा आ जाना चाहिये ताकि 20 को प्रातःकाल के कार्यक्रम में सम्मिलित हो सकें।

(2) इन तीन दिनों में आँधी तथा वर्षा का योग है। इसलिए असुविधा तथा कठिनाई सहने के लिए तैयार होकर आना चाहिए।

(3) तीनों दिन उपवास, भूमि शयन, ब्रह्मचर्य आदि की निर्धारित तपश्चर्याएँ करनी पड़ेंगी। फलाहार की जो व्यवस्था यज्ञ आयोजन की ओर से होगी उसी पर निर्वाह करना पड़ेगा।

(4) वृन्दावन वाली सड़क पर गायत्री तपोभूमि में यज्ञ होगा। पुरुष वहीं ठहरेंगे। जो लोग स्त्रियाँ समेत आवेंगे उनके ठहरने की व्यवस्था शहर की धर्मशाला में कर दी जायगी। छोटे बच्चे वाली स्त्रियों को विशेष असुविधा रहेगी इसलिए वे न आवें तो ठीक है।

(5) हमारे उपवास के दिनों में कोई सज्जन बिना स्वीकृति के मथुरा आकर हमारी शान्ति भंग न करें। जो सज्जन एक सप्ताह पूर्व आवश्यक कार्यों में सहयोग देने के लिए आ सकते हों वे इसकी सूचना देदें। यदि आवश्यकता होगी तो उन्हें बुला लिया जायगा।

(6) ता. 28 मई से 22 जून तक ब्रह्मचर्य पूर्वक रहें।

(7) यज्ञ में सम्मिलित होने वाले सभी सज्जनों की वेशभूषा एक सी रहेगी। धोती एवं कुर्ता सबके सफेद और कन्धे पर पीले रंग का दुपट्टा। पैरों में लकड़ी की चट्टी या खड़ाऊँ।

(8) ऊपर लिखे हुए नौ कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए अधिक परिश्रम करना उन लोगों का विशेष कर्त्तव्य है जिनको मथुरा आने की स्वीकृति मिल चुकी है।

(9) अपने आने की पूर्व सूचना दे देने से मथुरा जंक्शन पर स्वयं सेवक मिल जांयगे जो यथा स्थान पहुँचाने में सहायक होंगे।

स्मरण रखिए यह पूर्णाहुति यज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। इसके परिणाम भी अभूतपूर्व ही होंगे। अलग-अलग 100 प्रयत्नों की अपेक्षा 100 व्यक्तियों का एक सम्मिलित प्रयत्न विशेष कारगर सिद्ध होता है। यह आयोजन भी ऐसा ही है। इसमें भाग लेने वाले अपना और दूसरों अनेक आत्माओं का महान कल्याण कर सकते हैं।


गायत्री संहिता

(फरवरी अंक से आगे)

एक वारं सकन्मालाँ न्यूनतो न्यूनमाजपन्। धीमान्मंत्र शतं नूनं नित्यमष्टोत्तरं जपेत्॥ 39 ॥

प्रतिदिन कम से कम एक माला 108 मंत्रों का अवश्य ही जप कर लेना चाहिए।

ब्राह्मे मुहूर्ते पाच्यास्यो मेरु दण्डं प्रतन्य हि। पद्मासनं समासीनः सन्ध्यावन्दन माचरेत् ॥ 40 ॥

ब्राह्म मुहूर्त में पूर्वाभिमुख होकर मेरुदण्ड को सीधा कर पद्मासन पर बैठ कर संध्यावन्दन करें।

दैन्यरुक्रछोक चिन्तानाँ पिरोधाक्रमणापदाम्। कार्यं गायत्र्यतुष्ठानं भयानाँ वारणाय च ॥ 41 ॥

दीनता, रोग, शोक, चिन्ता, विरोध, आक्रमण, आपत्तियाँ और भय इनके निवारण के लिए गायत्री का अनुष्ठान करना चाहिए।

जायते स्थितिरस्मात्सः भिलाषा मन ईप्सिताः। यतः सर्वेऽभिजायन्ते यथा कालं हि पूर्णताम्॥ 42॥

इस अनुष्ठान से वह स्थिति पैदा होती है जिससे समस्त मनोवाँछित अभिलाषाएँ यथासमय पूर्णता को प्राप्त होती हैं।

अनुष्ठानात्तु वै तस्माद्गुप्ताध्यात्मिक शक्ययः। चमत्कार मायालोके प्राप्यन्तेऽनेकधाबुधैः॥ 43॥

उस अनुष्ठान से साधकों को संसार में चमत्कार से पूर्ण अनेक प्रकार की गुप्त आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

सपादलक्षमंत्राणाँ गायत्र्या जपनं तु वै। ध्यानेन विधिना चैवानुष्ठानं हि प्रचक्षते॥ 44॥

विधि एवं ध्यानपूर्वक गायत्री के सवा लाख मंत्रों का जप करना ही अनुष्ठान कहलाता है।

पंचम्याँ पूर्णिमायाँ वा चैकादश्याँ तथैव हि। अनुष्ठानस्य कर्तव्य आरम्भ, फल प्राप्तये॥ 45॥

पंचमी पूर्णमासी और एकादशी के दिन अनुष्ठान का प्रारम्भ करना शुभ होता है।

मासद्वयेऽविरामं तु चत्वारिशद्दिनेषुवा। पूरयेत्तदनुष्ठानं तुल्यसंख्यासु वैजपन्॥ 46॥

दो महीने में अथवा चालीस दिनों में बिना नागा किये तथा नित्य समान संख्याओं में जप करता हुआ उस अनुष्ठान को पूर्ण करे।

तस्या प्रतिमाँ सु संस्थाप्य प्रेम्णा शोभन आसने। गायत्र्यास्तेषु कर्तव्या सत्प्रतिष्ठा तुवाग्मिभिः॥ 47॥

प्रेम से सुन्दर और ऊँचे आसन पर गायत्री की प्रतिमा स्थापित करके उसकी भली प्रकार प्रतिष्ठा करनी चाहिए।

तद्विधाय ततो दीप धूप नैवेद्य चन्दनैः। नमस्कृत्याक्षतेनापि तस्याः पूजनमाचरेत्॥ 48॥

इस प्रकार से गायत्री की स्थापना करके तदनन्तर उसे नमस्कार करके दीपक, धूप, नैवेद्य और चन्दन तथा अक्षत इन सबसे गायत्री का पूजन करे।

पूजनानन्तरं विज्ञः भक्तया तज्जप मारभेत्। जप काले तु मनः कार्य श्रद्धान्वितम चंचलम्॥ 49॥

बुद्धिमानों को चाहिए कि वह पूजा के अनन्तर भक्ति से उस गायत्री का जप आरम्भ करे। जप के समय मन को श्रद्धा से युक्त और स्थिर कर लेना चाहिए।

कार्यतो यदि चोत्तिष्ठेन्मध्य एव ततः पुनः। जल प्रक्षालनं कृत्वा शुद्धैरंगैरुपाविशेत्॥ 50॥

और यदि किसी काम से साधना समय के बीच में ही उठना पड़े तो फिर पानी से हाथ मुँह धोकर बैठें।

आद्यशक्तिर्वेदमाता गायत्री तु मदन्तरे। शक्ति कल्लोलसंदोहान् ज्ञानज्योतिश्चसंततम्॥ 51॥

उत्तरोत्तरमाकीर्य प्रेरयन्ती विराजते। इत्येवाविरतं ध्यायन् ध्यानमग्न स्तुताँ जपेत्॥ 52॥

आद्यशक्ति वेदों की माता स्वरूप गायत्री मेरे भीतर लगातार शक्ति की लहरों के समूह को और ज्ञान के प्रकाशों को उत्तरोत्तर फैलाकर प्रेरित करती हुई विद्यमान है, इस प्रकार से निरन्तर ध्यान करता हुआ ध्यान में निमग्न उसका जाप करें।


धावक का मनुहार


धावक का मनुहार (Kavita)

मैं प्रतीची दूर युग की अरुणिमा लेकर चला हूँ।

छिप गये हँसते सितारे क्षितिज की इस लालिमा में, छिप गया हँसता दिवाकर गगन की इस कालिमा में,

पी गई अतृप्त धरती ओस के मनुहार कण वे, बीतते जाते अनेकों प्राण मय संचार क्षण ये,

क्रूर बन्धन मय जगत को प्राण मय कुछ दे चला हूँ। मैं प्रतीची दूर युग की अरुणिमा लेकर चला हूँ॥

वेदना हँसती रही कुछ क्षण उसे सहता रहा मैं, तार वीणा तोड़कर भी कुछ अरे कहता रहा मैं,

इस जगत के नियम से भी शेष कुछ क्या रह सका है, वेदना अपने हृदय की कौन किससे कह सका है,

वेदना का भार निज उर में छिपा कर ले चला हूँ। मैं प्रतीची दूर युग की अरुणिमा लेकर चला हूँ॥

अट्ठासी रात्रि में संसार जब निज रूप लिखता, मैं उसी क्षण विश्व के उस रूप की छाया निरखता,

सोचता, संसार को विभु ने अरे क्योंकर सजाया, जब यहाँ पर शेष अब तक कुछ कभी रहने न पाया,

बस इसलिए ही मैं यहाँ निज रूप को देकर चला हूँ। मैं प्रतीची दूर युग की अरुणिमा लेकर चला हूँ॥

प्राप्त होता स्वप्न की दुनिया सजाकर मनुज जगता, बीतता हर क्षण अरे इस विश्व की कुछ बात कहता,

स्वप्न मय संसार में यह स्वप्न तूने क्यों सजाया, क्या किसी का स्वप्न अब तक बाग बन कर लहलहाया,

इसलिये मैं अध खिला ही स्वप्न बन लेकर चला हूँ। मैं प्रतीची दूर युग की अरुणिमा लेकर चला हूँ॥

*समाप्त*

(श्री राधेश्याम जैसवाल)