(श्री बलवीर सिंह ‘रंग’)
जो अयाचित हो उसी को दान कहते हैं!
क्या हुआ नभ पर न यदि खग का बसेरा हो सका? क्या हुआ अरमान यदि पूरा न मेरा हो सका?
जो अधूरा हो उसे अरमान कहते है!
चीर कर गिर के हृदय को बह रही सरिता अबाधित! उर्मियों में हो रहा कल कल, सजल क्रन्दन निनादित!!
कवि उसे गिर के हृदय का गान कहते हैं!
जो परायी पीर पर यदि आह भर सकता नहीं। जो किसी के प्यार पर विश्वास कर सकता नहीं॥
उस अभागे प्राण को पाषाण कहते हैं। जो अयाचित हो उसी को दान कहते हैं॥
(श्री स्वामी सत्यभक्त जी)
जीवन-निर्वाह के लिए जिस विशेष सामग्री की जरूरत पड़ती है वह धन है। इसलिए हमें धन की सख्त जरूरत है पर आज जीवन के लिए धन नहीं रह गया है, धन के लिए जीवन हो गया है! हर आदमी जीवन खोकर, भाईचारा खोकर, सुख-शान्ति खोकर, ईमान खोकर जिस किसी भी तरह धन कमाने के पीछे पागल बना फिरता है। पर इससे दुनिया में धन नहीं बढ़ा, धन का नशा बढ़ा, धन का पागलपन बढ़ा, इससे दुःख बढ़ा, अशान्ति बढ़ी, बैर और घमण्ड बढ़ा, क्रूरता बढ़ी, बेईमानी बढ़ी और हमारी शैतानियत बढ़ी। मनुष्य धन न खा सका, धन ने मनुष्य को खा लिया।
यह ठीक है कि धन के बिना काम नहीं चल सकता। थोड़ा बहुत धन तो हमें चाहिये ही, पर जितना चाहिये उसी के पीछे यह सब अनर्थ नहीं हो रहा है। अनर्थ वे ही लोग कर रहे हैं जिनके पास जरूरत से अधिक धन है। आखिर सवाल होता है कि ‘जरूरत’ से अधिक धन का लोग क्या करते हैं? क्यों मनुष्य उसके पीछे पागल हो रहा है?
मनुष्य को भोजन चाहिये, रहने को मकान चाहिये, यहाँ तक किसी की धन लालसा हो तो वह ठीक कही जा सकती है पर देखा जाता है कि इनकी पूर्ति होने पर भी मनुष्य अपने को दीन समझता है और उनके सामने गिड़गिड़ाने को तैयार हो जाता है, जिनके सामने झुकने को उसकी अन्तरात्मा तैयार नहीं होती। वह सदाचारियों, जनसेवकों और गुणियों को उतना महत्व नहीं देता, जितना अपने से अधिक धनियों को। इसलिए प्रत्येक मनुष्य धन-संग्रह की ओर बढ़ता चला जा रहा है। उतने धन की आवश्यकता है या नहीं इसका विचार वह नहीं करता क्योंकि जीवन के लिये जरूरत हो या न हो किन्तु महान बनने के लिए तो जरूरत है ही।
मनुष्य में महान कहलाने की लालसा तीव्र से तीव्र है और महत्ता का माप धन बन गया है इसलिये मनुष्य धन के पीछे पड़ा हुआ है। यह बिलकुल स्वाभाविक है। अगर दुनिया में धन से महत्ता मिलेगी तो लोग धन की ओर झुकेंगे, अगर गुण, सेवा सदाचार आदि से मिलेगी तो उसकी तरफ झुकेंगे। मनुष्य को महान बनना चाहिये और दुनिया को महान बनाने वालों की कद्र करना चाहिये। पर धन और अधिकार से महान बनने वाले की कद्र करना समाज के कष्टों को बढ़ा लेना तथा सच्चे सेवकों को नष्ट कर देना है। किसी आदमी की कद्र करने का अर्थ ही यह है कि वह समाज की ऐसी सेवा कर रहा है जिसका बदला हम भौतिक दृष्टि से नहीं चुका पा रहे हैं इसलिये उसे महान कहकर उसका आदर, यश बढ़ाकर हम दिला देना चाहते हैं। इसलिए जिस मनुष्य की जितनी निःस्वार्थ जन-सेवा हो उसी के अनुरूप उसे महान मानना चाहिये।
आम जनता महत्ता की यह परिभाषा भूली हुई है। वह समझती है कि जिसने किसी भी तरह धन पैदा कर लिया वह महान है और उसकी हमें इज्जत करनी चाहिये। जो जितने विलास का प्रदर्शन कर सकता है वह उतना ही महान है इसलिए हमें उसकी इज्जत करनी चाहिये। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोग धन और विलास की तरफ झुकते हैं। सच्ची सेवा, सदाचार और गुण नष्ट होते जाते हैं।
किसी जमाने में अधिक सेवा के बदले में अधिक धन को देखकर उसकी वास्तविक महत्ता का अंदाज बाँधना भी ठीक रहा होगा, पर वह समय हमारी कल्पना का ही विषय है, इतिहास के पन्नों में वह नहीं दिखाई देता। आज तो सैकड़ों हजारों में ऐसा एकाध आदमी होता है जो अपनी वास्तविक सेवा या महत्ता के कारण धनी बना हो। अधिकाँश धनी तो बाप-दादों की जायदाद से धनी बने हैं या सट्टे से, या किसी बेईमानी से या अकस्मात् किसी की सम्पत्ति हाथ आ जाने से, या दम्भ ठगी आदि से बने हैं, उनके इन कामों से जगत का नुकसान ही हुआ है। ऐसी हालत में उन्हें किसी तरह का महत्व क्यों दिया जाय? उन्हें महान क्यों माना जाय?
हाँ, हर एक तरह के विनयम् का आधार धन ही है इसलिये धनी महत्ता खरीद सकता है। आप गुणी सेवक होने पर भी धूल फाँकते हुए पैदल चलते हो और वह आपकी बगल से सर्राटे से चमचमाती मोटर में निकल जाय। आप थर्ड क्लास में सिकुड़कर बैठे हों और वह फर्स्ट क्लास में आराम से लेटा हुआ हो। आप सादा भोजन कर रहे हों और वह तरह तरह की विलायती चीजें उड़ा रहा हो। आप अपने घर में झाडू लगाते हो और वह नौकरों से सब काम कराता हो। इस प्रकार के अन्तर से वह आप पर महत्ता की छाप मार रहा हो यह सब हो सकता है पर इन सब बातों से आपमें दीनता पैदा होनी चाहिये। जब आप जानते है कि दुनिया सौ में निन्यानवे लोग अयोग्य होने पर भी, जनसेवक न होने पर भी दम्भ, अनीति, बेईमानी, शोषण आदि से धनी बन जाते हैं तब आप में दीनता का क्या कारण है? पाप, आलस्य, मूर्खता आदि ही दीनता के कारण कहे जा सकते हैं। अगर आप में ये नहीं हैं तो आप दीन नहीं हैं और अगर आप दुनिया की उपयोगी सेवा करके उसका बदला धन से पूरा नहीं ले रहे हैं तो आप महान हैं। फिर भले ही आप थर्ड क्लास में सफर करें, झोपड़ी में रहें, साधारण भोजन करें, घर के छोटे-मोटे काम अपने हाथ से करें। इन बातों से आप में किसी तरह की दीनता न आनी चाहिए। न आप खुद को दीन समझें, न आप धन और विलास देखकर किसी जगह महान समझें। जब आपका दृष्टिकोण बदल जाएगा और धीरे-धीरे समाज का दृष्टिकोण भी बदल जायेगा, तब व्यक्तियों का झुकाव धन संग्रह की तरफ इतना न होगा जितना सदाचार, परोपकार तथा गुणों की तरफ होगा। इस प्रकार दुनिया से पाप और दुःख की जड़ उखड़ जायेगी।
धन और धनियों के बारे में आपको अपना विचार, व्यवहार और शिष्टाचार सुधारना चाहिये। इससे इस पाप के उखाड़ने में काफी मदद मिलेगी। इस विषय में कुछ सूचनाएं यहाँ दी जाती हैं।
1- किसी भी धनवान को देखकर यह न सोचिए कि वह महान है। अगर वह वंश परम्परा से धनवान है जब यही सोचिये कि इसमें उसकी कोई बहादुरी नहीं है, यह तो उत्तराधिकारी सम्बन्धी सामाजिक पाप का परिणाम है, जिसमें उत्तराधिकारी की योग्यता से कोई मतलब नहीं। अगर पूँजीवाद के कारण धनवान है, तो यह सोचिये कि यह भी समाज के पाप का परिणाम है। अगर विद्या कला आदि के कारण वह धनी है तब यह सोचिये कि यह तो अकस्मात की बात है, नहीं तो सैकड़ों विद्वान और कलाकार मारे-मारे फिरते हैं, अकस्मात किसी को विद्या कला के कारण अन्य विद्वानों और कलाकारों से अधिक प्राप्ति हो गई है तो इसी से वह अन्य विद्वानों आदि से महान नहीं हो सकता, संभव है इस ऊपरी सफलता के लिये उसने दम्भ आदि से काम लिया हो, ईमानदारी की हत्या की हो ऐसी हालत में उसे महान कैसे कह सकते हैं?
2- जो विद्वान किसी कलाकार किसी धनी के आश्रित हैं और इससे कुछ विलास कर रहे हैं इससे उन्हें महान न समझिये। क्या कुत्ते भी धनियों के साथ उनकी मोटर में बैठकर नहीं निकलते?
3- सैकड़ों में एकाध के हिसाब से ऐसे भी धनी हैं या हो सकते हैं जो धन का घमण्ड नहीं दिखाते, जरूरत होने पर सेवा के लिये गरीबों, असहायों की झोपड़ियों में जाते हैं, दम्भ नहीं करते, विलास का प्रदर्शन नहीं करते, सम्पत्ति जगहित के काम में लगाते हैं, नम्र रहते हैं, गुणानुरागी हैं, उनकी प्रशंसा उनके धनी होने के कारण न कीजिये किन्तु उनके गुणों के कारण कीजिये। सदा गुणों को ही महत्ता दीजिये। ऐसे आदमी अगर लखपति हैं तो उनकी इज्जत साधारण करोड़पतियों से भी अधिक कीजिए।
4- दानी का सम्मान करते समय सिर्फ यह नहीं देखिए कि उसने कितना दान किया है किन्तु यह देखिये कि उसने अपनी सम्पत्ति का कौन सा हिस्सा दान किया है, सेवा और जनहित की दृष्टि से किया है या आत्मश्लाघा के लिए?
5- धन विनयम् का आधार बना हुआ है, धनी आदमी हर तरह धन के द्वारा मनचाही चीजें ले लेता है इसलिये उसका ध्यान रखने की जरूरत नहीं है, जरूरत है उसका ध्यान रखने की, जो अपनी सेवाएं आर्थिक विनियम के बिना या उसका ख्याल रखें बिना देते रहते हैं वे समाज के सच्चे साहूकार हैं। यश, आदर, सुविधाएं देकर समाज को उनका ऋण चुकाना चाहिये और आपको भी चुकाने में हिस्सा लेना चाहिये।
6- श्रम को नीची नजर से न देखिये। एक श्रीमान ने नौकर के हाथ से गुलाबजल मिला हुआ शरबत पिला दिया, इसकी अपेक्षा अपने हाथ से मामूली पानी पिलाने वाले का आदर अधिक कीमती है, उसे आप ऊंची निगाह से देखिये। श्रम-विभाग की बात दूसरी है। घर में श्रम का बंटवारा होने से किसी को कोई एक श्रम करना पड़ता हो, किसी को कोई दूसरा श्रम। इसमें कोई हर्ज नहीं, पर इस बात की शेखी मारें कि मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ती इसलिये मैं महान हूँ तो उसे महान न समझ कर हरामखोर समझिये।
7- सदाचारी, गुणी, परोपकारी आदि का विनय आप करते हैं उससे अधिक या उतना विनय धनी का कदापि न कीजिये। हाँ, धनी में उपयुक्त गुण हैं तो गुणी की हैसियत से सम्मान करना उचित ही है।
8- धनियों-धनियों में इस बात का विवेक रखिये कि किसने किस तरह धन कमाया है। बेईमानी, विश्वासघात, दुराचार आदि से धन कमाने वाले धनी की अपेक्षा उस छोटे धनी को अधिक महत्व दीजिये जिसने इस प्रकार पाप नहीं किये हैं।
9- धन के ही कारण जो लोग सार्वजनिक सेवा क्षेत्र के या राजनैतिक क्षेत्र के पद हथिया लेते हैं उनका विरोध कीजिये। धनियों को राजनैतिक पदों पर नियुक्त न होने दीजिये। ये पद विद्वान सत्सेवकों के लिए निश्चित करने की कोशिश कीजिये। धनियों के पास धन ही काफी बड़ी शक्ति और सुविधा है अब अगर उनके हाथ में ब्राह्मण तथा शासक की सुविधा भी आ जाय तो शैतानियत और हैवानियत का नंगा नाच होने लगे। इससे बचने बचाने की यथाशक्ति कोशिश कीजिए।
10- स्वार्थ की दृष्टि से नहीं किन्तु परमार्थ की दृष्टि से आप अपना व्यवहार शिष्टाचार आदि ऐसा बनाइए जिससे मालूम हो कि आप धनी कि अपेक्षा सदाचारी परोपकारी गुणी की अधिक इज्जत करते हैं।
आज धन का मनुष्य के ऊपर भयंकर आक्रमण हो रहा है। इसके लिये कोई निन्दा करने की जरूरत नहीं है। यह मनुष्य मात्र की या समाज की कमजोरी है। जो गरीब है वे भी धन में और विलास में महत्ता देखते हैं, उसी की तरफ झुकते हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि सत्य, अहिंसा, सेवा, सदाचार, विद्या कला आदि सभी लक्ष्मी के द्वारा कुचले जा रहे हैं। इससे मनुष्य, मनुष्य का घातक बन गया है और जब तक हम धन को महत्ता देंगे तब तक ऐसा होगा ही। आप धनियों को पीठ पीछे गालियाँ दें पर मुँह पर चापलूसी करें, गुणी जनसेवकों की अपेक्षा अधिक इज्जत करें, आप उनके गीत गायें, खुद भी धनी बनने के लिए हजार कार्य करने को तैयार रहें तो समाज का प्रवाह नहीं बदल सकता। धन की तरफ झुकना धनी की या व्यक्ति की ही कमजोरी नहीं है वह समाज की कमजोरी है। समाज को धन की कद्रदानी घटानी होगी, दूर करनी होगी, तब मनुष्यता की हत्या होने से बचेगी। समाज एक दिन में एक साथ ही यह पाप दूर करेगा नहीं, वह तो एक-एक व्यक्ति को धीरे-धीरे हटाना होगा सो उसके लिए हर एक व्यक्ति को तैयार होना चाहिये। हाँ, छोटे-छोटे संगठनों के जरिये इस आवाज को बुलन्द किया जा सकता है।
(आचार्य बिनोवा भावे)
मन्दिरों पर अनेक आक्षेप किये जाते हैं। उनमें एक आक्षेप यह है कि मन्दिरों में कई तरह का अनाचार होता आया है और हो रहा है। इसलिए मंदिरों को खत्म करना चाहिए। दरअसल यह कोई विचार का आक्षेप नहीं है। यह प्रतिक्रिया मात्र है। मंदिरों में से अगर अनाचार मिट जाय, तो यह आक्षेप स्वयं खत्म हो जाता है और यही उसमें से लेना है।
ईश्वर साक्षात्कार
दूसरा आक्षेप यह है कि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं है। श्रद्धा से उसे मान लेते हैं और उस श्रद्धा के आधार पर मन्दिर बनाकर पूजा करते हैं। यह मिथ्या आचार है। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में मैं दलील नहीं करूंगा। इतना ही कहूँगा कि यह आक्षेप अविचारमूल है। इसमें कुछ अहंकार भी है। अनेक सत्पुरुषों ने ईश्वर का साक्षात्कार और वर्णन भी किया है। ऐसी हालत में हम यह कहने का साहस कैसे कर सकते हैं कि ईश्वर है ही नहीं। हम इतना ही कह सकते हैं कि हमने उसको देखा नहीं है। लेकिन जिन्होंने ईश्वर साक्षात्कार का वर्णन किया है वे भ्राँत या मिथ्यावादी थे ऐसा हम नहीं मान सकते हैं और उन सत्पुरुषों की बात मानकर जो श्रद्धा से ईश्वर की पूजा करते हैं, उनको हम दोष भी नहीं दे सकते हैं।
तीसरा भी एक आक्षेप तात्विक विचार का है। परमेश्वर किसी एक ही मूर्ति में नहीं हो सकता, वह तो सब जगह है। ‘सबमें रम रहिया प्रभु एकै, पेख-पेख नानक विहंसाई’ सब दुनिया में ईश्वर भरा है, उसे देखकर आत्मानन्द का अनुभव करना चाहिये। उसके बदले मूर्ति-विशेष की पूजा करने का अर्थ यह होगा कि परमेश्वर दूसरी जगह नहीं है।
मेरी नम्र राय है कि यह आक्षेप भी एकाँगी है। परमेश्वर का वर्णन एक ही तरह के विशेषण से नहीं हो सकता। मनुष्य की वाणी में उसका वर्णन करने की शक्ति ही नहीं है। फिर भी मनुष्य अपने समाधान के लिए उसका वर्णन करने की चेष्टा करता है, तो विरोधी विशेषणों का प्रयोग करना पड़ता है। परमेश्वर का व्यापक होने पर भी मूर्ति विशेष में उसकी अभिव्यक्ति हो सकती है। दुनिया में बिजली भरी है। लेकिन विशेष ढंग से विशेष स्थान में वह प्रकट होती है। वैसे ही जहाँ हमारी मानसिक भावना रहती है वहाँ परमेश्वर हमारे लिए प्रकट हो जाता है। अपनी भावना के अनुसार मनुष्य उपासना करता है तो उसमें परमेश्वर की व्यापकता का निषेध नहीं है।
मानव सेवा
एक और भी आक्षेप आता है। हमें तो मानव सेवा करनी चाहिए। किसी प्यासे को पानी पिलाना भूखे को खिलाना, गन्दे को नहलाना यही परमेश्वर की सर्वोत्तम सेवा है। मानव-रूप में जो ईश्वर है उसकी उपेक्षा करके किसी देव को नैवेद्य चढ़ाना यह काहे का धर्म? इस आक्षेप में भी विचार दोष है। जो मनुष्य के साथ दयालु बर्ताव नहीं करता और पाषाण मूर्ति की पूजा करता रहता है वह ढोंगी कहा जा सकता है लेकिन जो मनुष्य प्राणी-सेवा में मग्न है उसे भी मूर्ति पूजा उपयुक्त हो सकती है। मानव की सेवा मानव का सर्वप्रथम कर्त्तव्य है इसमें कोई शंका नहीं। लेकिन हम देखते है कि मानवों में विकार होते हैं जो सेवा करता है उसमें और जिसकी सेवा की जाती उसमें भी। ऐसी दशा में हमारी सेवा में भी दोष पैदा हो जाता है, और मानव में भगवान का अंश देखने का भाव हमेशा नहीं टिकता। जिसकी सेवा की जाती है उसके विकार की प्रतिक्रिया सेवा करने वाले के मन पर होती है। इसका एक उपाय मानव ने यह किया कि निर्विकार पत्थर को प्रतीक मान उसमें मानव की परिपूर्ण आकाँक्षा भरदी। दूसरी भाषा में उस निर्विकार पत्थर में ईश्वर का आरोपण करके उसकी वह पूजा करने लगा और उसकी पूजा द्वारा अपने अहंकार और विकार को शून्य बनाने की कोशिश करने लगा। मानव का परम आदर्श वह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान माना गया है। योगसूत्र में भगवान की व्याख्या ‘रागद्वेषादि रहितपुरुषविशेषः’ की है। उसकी उपासना करने से मनुष्य धीरे-धीरे निरहंकार बनता है।
एक भाई ने मुझसे पूछा- ‘प्रार्थना में इतना समय क्यों दिया जाता है? क्या वह भी सेवा में लगाना बेहतर नहीं होगा? मैंने कहा ‘सेवा की कीमत उसके परिणाम पर निर्भर नहीं है। सेवा में वृत्ति जितनी रिहंकार रहेगी उतनी सेवा की कीमत बढ़ेगी।’
मैंने दस सेर सेवा की, लेकिन चालीस सेर मेरा अहंकार रहा तो मेरी सेवा की कीमत 10 बटा 40 यानी 1 बटा 4 हो गई। इससे उलटे एक मनुष्य के एक तोला भर सेवा की कीमत 1 बटा शून्य, यानी अनन्त होगी। हम जानते हैं कि गणित में विभाजक शून्य रहा तो भागाकार अनन्त आता है। अहंकार शून्य करने में प्रार्थना मदद दे सकती है। निरहंकारता से सेवा की कीमत उसकी निरहंकारता के कारण पृथ्वी के मूल्य की हो गई।
मूर्ति पूजा चित्त शुद्धि का साधन
जिन्होंने भगवान की मूर्ति की कल्पना की वे पागल नहीं थे। काफी चित्त शुद्धि उससे मनुष्य की हुई है। एक जमाना था जब मनुष्य ने अपनी कला और सौंदर्य वृत्ति का सारा प्रदर्शन मन्दिरों में किया। मूर्ति में भगवान की भावना करके मनुष्य ने अपना विकास किया। मूर्ति न होती तो बगीचे में से फूल तोड़कर मनुष्य अपने नाक में उसको लगाता। लेकिन भगवान की मूर्ति पर फूल चढ़ाकर जोकि फूल के लिए सर्वोत्तम स्थान है-मनुष्य ने अपनी गन्ध वासना संयत और उन्नत की। अपनी वासना मिटाने के लिए भगवान के समर्पण की युक्ति मनुष्य ने निकाली। रामदास स्वामी ने लिखा है- देवाचें वैभव बाढ़वावें’-(भगवान का वैभव बढ़ाओ।)
हम क्या भगवान का वैभव बढ़ावेंगे? वह महान है, हम रंक हैं। परमेश्वर का वैभव बढ़ाने की कोशिश करने में हम अपना जीवन उन्नत करते हैं। रामदास स्वामी की सीख शिवाजी ने समझ ली। उन्होंने रायगढ़ में-जो शिवाजी की राजधानी थी- अपने लिए उसने मकान बनाये जिनकी निशानी तक बाकी नहीं रही। और प्रतापगढ़ में जो देवी का मंदिर बनाया है जिसे कि 250 साल के बाद मैंने अच्छी हालत में देखा। रामदास स्वामी की शिक्षा का यह प्रदर्शन था।
भगवान का वैभव बढ़ाना, मानव-देह से करने लायक यही चीज है। वाणी से भगवान का गुणगान करें, हाथों से उसकी सेवा करें और अपनी बुद्धि को शुद्धि बनायें। बुद्धि की शुद्धि के लिए भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई भी साधन आज तक अनुभव में नहीं आया। शंकराचार्य महान ज्ञानी हुए। अद्वैत की गर्जना करते थे। लेकिन मलावार से चलकर हिमालय की तरफ जाते हुए रास्ते में जो बड़े-बड़े मन्दिर मिले उन पर उन्होंने स्तोत्र रचे हैं। कितने नम्र वे बने? क्या वे नहीं जानते थे कि यह पत्थर की मूर्ति मनुष्य की बनाई हुई है? यह भगवान कैसे हो सकती है? लेकिन मूर्ति के सामने उनका सिर झुक जाता था। नदियों पर भी उन्होंने सुन्दर स्तोत्र रचे। सार इतना ही है। किसी तरह भगवान की भक्ति करो और चित्त शुद्धि साथ। मानव देह का यही अधिकार है। यह जिन्होंने समझा उनका जीवन धन्य हुआ।
-जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिये भगवान के श्री चरणों की प्राप्ति और उसी को मानना चाहिये परम पुरुषार्थ। जितने भी पुरुषार्थ हैं-प्राप्त करने के पदार्थ हैं, वे सभी गिराने वाले हैं। जब तक यह निश्चय नहीं होता कि भगवान को प्राप्त करना ही परमपुरुषार्थ है तथा यही जीवन का लक्ष्य है, तब तक मनुष्य कहीं भी शान्ति प्राप्ति नहीं करता।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम.ए.)
यदि तुम अपनी निर्बलताओं से भयभीत होगे, तो स्मरण रखो वह भय द्विगुणित होकर तुम्हें अधिकाधिक क्षुब्ध करेगा। अप्रत्यक्ष रूप से, अपनी कमजोरियों का चिन्तन तुम्हारी इच्छा, संकल्प, सामर्थ्य की शक्तियों का क्षय करेगा। दिन रात अपनी निर्बलताओं के चिन्तन का घातक प्रभाव मानव मन पर पड़ता है। अपने विपक्ष में सोचना, विचारना अपने पतन का मार्ग तैयार करना है।
यदि तुम अपने शत्रुओं से डरोगे, तो तुम्हें तुम्हारे विपक्ष में युद्ध करने का बल प्राप्त होगा और तुम्हारी त्रुटियाँ स्वतः तुम्हारे ही विपक्ष में प्रतिकूलता में कटिबद्ध हो जायेंगी। शत्रु भय की दूषित कल्पना कितने ही उदीयमान पुरुषों के अन्तःकरण को श्मशान भूमि में परिणत कर देती हैं।
मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ जो अर्ध विकसित, मानसिक अवस्था में कल्पित शत्रुओं या अपनी कमजोरी की मिथ्या भावना के चंगुल में फंसकर क्रमशः अपनी कार्य-शक्तियों का क्षय कर रहे हैं। वे चुपचाप किसी के डर से परेशान हैं। प्रायः कभी न आने वाली विपत्तियों तथा कल्पित भय की भावना से वशीभूत होकर अपने साहस पूर्ण प्रयत्नों एवं महत्वाकाँक्षाओं को चूर्ण-चूर्ण कर बैठे हैं।
हमारे मन की निर्बल आदतों को जन्म देने वाला सबसे बड़ा विकार भय देने वाला है। हम यों ही डरा करते हैं। भय हमारे गुप्त मन में संस्कारों के रूप में बस जाता है। फलतः अन्धविश्वास, अकर्मण्यता, अधैर्य, ईर्ष्या, असन्तोष, मन की चंचलता इत्यादि मनोविकार उत्पन्न होते हैं। कल्पित भय की भावना मन से निकाल देने पर ये विकार स्वतः नष्ट हो जाते हैं। मूलोच्छेदन करने पर विषवृक्ष की शाखा-शाखाएं स्वतः शुष्क एवं निर्जीव हो जाती हैं।
कितने ही व्यक्ति साधारण सी बातों या स्वयं अपने कार्य, चरित्र, या योजनाओं के बारे में दूसरों की राय लेने के बड़े इच्छुक होते हैं। अमुक व्यक्ति के मेरे विषय में क्या-क्या विचार हैं? अमुक व्यक्ति मेरे चरित्र के बारे में क्या सोचता होगा? साधारण जनता ने मुझे कैसा समझा है? जब मैं बाजार में से निकलता हूँ तो वो मेरी साख की बाबत क्या सोचते हैं? मेरे बाल बच्चों, पुत्रों, परिवार आदि की शक्ति के विषय में क्या-क्या फैला है? जब मनुष्य इस प्रकार के तर्क वितर्कों में फंस जाता है, तो समझना चाहिये वह कल्पित मानसिक शत्रुओं के भय से ग्रसित है। उसके मन में निर्बलता की भावना गुत्थी छिपी है और वह तज्जनित भय-मित्रों की प्रतिच्छाया मा मात्र यत्र-तत्र देख रहा है। जिस प्रकार दूसरों के दोष दर्शन एक प्रकार का मानसिक विकार है, उसी प्रकार निरन्तर स्व-दोषों का चिंतन भी घृणित कार्य है।
बाईबल में एक बड़ा उपयोगी मनोवैज्ञानिक सूत्र मिलता है- “तुम्हारे पास जो वस्तु अधिक है, वह और भी अधिक तुम्हें प्राप्त होगी, जिस चीज की कमी है, वह जो थोड़ी बहुत है वह भी छीन ली जायेगी।”
यदि तुम्हारे पास कमजोरी का आधिक्य है, तो वह कमजोरी (निरन्तर चिन्तन द्वारा) तुम्हें और अधिक प्राप्त हो सकती है। यदि तुम्हारे पास साहस की पूँजी है तो उसके संपर्क से शुभ पौरुष पूर्ण विचारों की और भी अभिवृद्धि होगी। जैसा मन में बीज रहेगा, वैसा ही वृक्ष एवं फल प्राप्त होगा। तो चीज थोड़ी है, उसका कारण यह है कि उसका तुम उपयोग नहीं कर रहे हो। अतः एक समय ऐसा आ सकता है, जब इसका पूर्ण रूप से क्षय हो जाय।
यदि तुम दिव्य प्रकाश से अपना अन्तरिक्ष आलोकित करना चाहते हो, तो हृदय के गहनतम स्थल में भव्य विचार स्थिर करो। उज्ज्वल भविष्य की भावना करो। “हमारा भविष्य प्रकाशमय होगा, हमें यश, प्रतिष्ठा एवं नेतृत्व का गौरव प्राप्त होगा, हम श्रेष्ठतम नागरिकों जैसे कार्य करेंगे, हम निश्चित एवं निःशंक होकर जीवन -निर्वाह कर सकेंगे, हमारा अन्तःकरण श्रद्धा एवं उत्साह से परिपूर्ण रहेगा और हम परिपुष्ट भावना में रमण करेंगे।” ऐसी पवित्र संकल्पमयी विचारधारा में निवास करने से कल्पित भयों का समग्र नाश हो जाता है।
तुम्हारी व्यर्थ की चिन्ताएं, तुम्हारे कल्पित भय, तुम्हारा क्षोभ स्वयं तुम्हारे अपने उत्पन्न किये हुये मानसिक विकास हैं। प्राकृतिक रूप से, इन दुष्ट भावनाओं से तुम्हारा कोई साहचर्य नहीं है। तुम पूर्ण निर्भय हो। तुम्हें अपने सत्पथ पर आरुढ़ रहना चाहिए। खिल्ली उड़ाने वाले थोथे व्यक्तियों से तनिक भी विचलित नहीं होना चाहिए। तुम चाहो तो इन कंटकों को गले में हार की तरह धारण कर सकते हो।
तुम्हारा वास्तविक स्वरूप अत्यन्त पवित्र है। तुम सत् चित्त आनन्द स्वरूप हो। किसी प्रकार के अनिष्ट विचार की दूषित छाया तुम्हारे कार्यों पर नहीं पड़नी चाहिए। तुम्हारा अन्तःकरण रूपी दर्पण स्वच्छ रहना चाहिए। जिसमें तुम अपना अकलुष स्वरूप देख सको। उसे आत्मश्रद्धा, विवेक और निष्ठा की रेत से रगड़कर प्रशस्त कर डालो। तत्पश्चात् किसी प्रतिकूल भावना का उस पर प्रभाव न पड़ेगा।
मन में आत्म-श्रद्धा, विश्वास और अपनी महानता के विचार दृढ़ता से स्थिर कर लो, तो तुम अपने जीवन में एक नया पृष्ठ खोल सकोगे। तभी तुम मानव जीवन का दिव्य उद्देश्य समझोगे और उसका उचित आदर करना सीखोगे।
विज्ञान का अकाट्य सिद्धान्त है कि एक स्थान पर दो परस्पर विरोधी वस्तुएं नहीं टिक सकती, जब तुम आत्म विश्वास के दिव्य विचारों से मनो मंदिर को भर लोगे, उसी भावना में तन्मय हो जाओगे, तो कल्पित भयों का अन्धकार किस प्रकार टिका रह सकता है?
निर्भय होकर जिओ। अपनी दुर्बल भावनाओं को अपने ऊपर विजय न प्राप्त करने दो। तुम ईश्वर के दिव्य अंश हो, परमपिता परमेश्वर के राज्य में तुम पूर्ण निर्भय हो।
यदि तुम कभी हताश होकर डरपोकपन का एक शब्द भी बोलोगे, या स्थान दोगे, तो तुम्हारे विपक्षियों को मानों तुम्हारे ऊपर आधी विजय प्राप्त हो चुकी होगी। मन का वातायन खोलो और धैर्य, दृढ़ता, आत्म श्रद्धा का निर्मल प्रकाश अन्तःकरण में प्रविष्ट कर दो। प्रकाश-तुम्हें दिव्य प्रकाश चाहिए।
(पं. श्रीरामजी उपाध्याय, एम.ए.)
संसार में कदाचित ही कोई मनुष्य होगा जो सुख न चाहता हो। ऐसा होने पर भी हममें से इने-गिने व्यक्ति ऐसे मिलेंगे, जिनको वास्तव में सुखी कहा जा सके। सभी लोग अधिक से अधिक परिश्रम करते हैं, किन्तु प्रायः पचास प्रतिशत जनसंख्या के सन्मुख प्रातः और सायंकाल के भोजन की समस्या गम्भीर रूप से खड़ी रहती है, पारस्परिक वैर-विरोध का तो कुछ पूछता ही नहीं। कोई किसी का विश्वास नहीं करता। पुत्र का माता-पिता के प्रति, भृत्य का स्वामी के प्रति, स्त्री के पुरुष के प्रति-उपेक्षा का भाव है। मानव-समाज घृणा के रोग से बुरी तरह पीड़ित है। सर्वत्र दुःख का ही प्रसार है। कहीं शान्ति देखने को नहीं मिलती। सौजन्य, सहानुभूति, त्याग और सत्य का दर्शन भी दुर्लभ है। मानव-मस्तिष्क की जितनी भी बुराइयाँ कोई देखना चाहें, अपने में ही देख ले, अथवा घर से बाहर निकलकर भी सर्वत्र देख सकेगा।
अब प्रश्न यह उठता है कि हमारी ऐसी दुर्दशा क्यों हैं? क्या हम इन बुराइयों के प्रेमी हैं? क्या हम जानते नहीं कि इस भयंकर परिस्थिति से संसार को किस प्रकार मुक्त किया जा सकता है? इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम अपनी दुर्दशा से पूर्णतया परिचित हैं और उससे मुक्त होना चाहते हैं। इससे मुक्त होने के उपायों से भी हम अनभिज्ञ नहीं हैं। दर्शन और उपनिषद्-ग्रन्थों में सर्वत्र इसके उपायों का उल्लेख मिलता है, किन्तु ऐसा होने पर भी हम उस कुंए के मेढ़क की तरह आचरण करते हैं, जो कभी किसी के पात्र में पड़कर बाहर तो चला आता है किन्तु बाहर के प्रकाश को मूर्खतावश दुःखमय जानकर पुनः उसी कुंए में कूद जाता है। हमें सभी अच्छे साधन ज्ञात हैं, किन्तु उनका उपयोग हम इसलिये नहीं करते कि हमें विश्वास नहीं है कि वे साधन वास्तव में हमारे परम कल्याण के लिये हैं।
हम में से कुछ लोग दर्शन-शास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित है, किन्तु उनका भी आचरण साधारण मनुष्यों की तरह ही है। वे धन और विषय-वासनाओं में लिप्त हैं। यदि कोई उनसे बातचीत करे तो वे गीता उपनिषद् और पुराणों के श्लोक धड़ाधड़ कहते जायेंगे। उनका ज्ञान यदि उनके आचरण पर तनिक भी प्रभाव डालता तो वे महापुरुष हो जाते। किन्तु लज्जा की बात तो यही है कि सन्मार्ग जानते हुए भी उस पर आजकल के वाचनिक ज्ञानी चलते नहीं। यही दशा साधारण जनों की भी है। हम अपने सद्ज्ञान के आधार पर आचरण करने से डरते हैं। परिणाम यह होता है कि ऊँचे उठने के बदले हम प्रतिदिन गिरते जा रहे हैं। हमें विश्वास नहीं होता कि हमारे सद्ग्रन्थों में जिन मार्गों का आदेश किया गया है वे वास्तव में हमें सुख दे सकते हैं। संसार के महापुरुषों में भी हमारा वैसा ही अविश्वास है। कृष्ण और राम की शिक्षाओं और आदर्शों पर चलने वाला हम में से कदाचित ही कोई हो। आज भी हम राम और कृष्ण की पूजा करते हैं, किसी महान संन्यासी के सामने नतमस्तक हो जाते हैं और उसका आदर करते हैं किन्तु उसका आदर हम तभी तक करते हैं जब तक उसके सामने रहते हैं, उसकी नजर से हटते ही फिर पहले की ही भाँति गिर जाते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य को क्षणिक श्रद्धा न करने के शाश्वत श्रद्धा करने के लिए अपना जीवन महापुरुषों के जीवन के समान ही बनाने की चेष्टा करनी चाहिये, यही मनुष्यत्व का प्रथम लक्षण है। ऊँचा उठने के लिए महापुरुषों में शाश्वत श्रद्धा रखना पहली सीढ़ी पर चढ़ जाना है, इसके पश्चात तो इस मार्ग से पीछे हटने को जी ही न चाहेगा।
हम सभी लोग कहते हैं कि हम मनुष्य हैं, हिन्दू हैं, ब्राह्मण या क्षत्रिय आदि हैं, किन्तु वास्तव में हम में कोई गुण नहीं, जिसके आधार पर हम अपने को मनुष्य भी कह सकें। व्यर्थ के लिये ही हम अपने को हिन्दू और ब्राह्मण आदि नामों से पुकारते हैं। किसी भी धर्म का अनुयायी होने के पहले अपने को मनुष्य बना लेना आवश्यक है। मनुष्यता के आधार सत्य और सहानुभूति हैं। यदि किसी में सत्य और सहानुभूति हो तो वह अवश्य ही मनुष्य कहलाने योग्य है। यदि उसमें ये दो रत्न नहीं चमकते तो वह मनुष्य नहीं है।
सत्य के अभाव में ही मानव-समाज का यह विकृत स्वरूप हो गया है। जितने लड़ाई - झगड़े, कलह और वैमनस्य मनुष्य-समाज में हैं, उनकी जड़ असत्य ही है। हम यहाँ सत्य का व्यापक रूप नहीं लेते, क्योंकि सत्य के व्यापक रूप में तो माननीय उन्नति का निःशेष तत्व ही निहित है। मेरा तात्पर्य सत्य से पारस्परिक व्यवहार के सत्य से है हम वो हैं, वही अपने को बाहर से भी दिख जाने की चेष्टा करें। बाह्याडम्बर से हम दूसरों को धोखा देते हुए अपनी आत्मा को भी कलुषित करते हैं। जो बात हृदय में हो वही मुख से भी निकलनी चाहिये। इस प्रकार सत्य का आचरण करते हुए मनुष्य अपने उत्साह को बढ़ाता है और अपने सहवासियों का भी परम उपकार करता है। हमें परमात्मा से प्रतिदिन विनय करनी चाहिये कि हमें नित्यप्रति सत्य का ही दर्शन हो।
सहानुभूति का सिद्धान्त सत्य की ही भाँति मनुष्यता का परिचायक है। जिस पुरुष में सहानुभूति होगी उसके व्यवहार में घृणा और क्रोध को स्थान नहीं मिलेगा। आधुनिक युग में मनुष्य अपने को दूसरों से अलग समझने लगा है। उसके मन में स्वार्थ की भावना ही प्रधान रूप से कार्यशील है। परिणाम यह होता है कि वह दूसरों के सुख-दुःख का विचार न करके अपना स्वार्थ साधने की चेष्टा करता है। इस स्वार्थ-साधना के लिए उसे दूसरों की हानि करनी पड़ती है-दूसरों को वह अपना शत्रु मान लेता है, किन्तु वह गलत मार्ग पर है। मनुष्य को अपने को दूसरों से भिन्न व्यक्ति न समझना चाहिये। जिसका स्वार्थ परार्थ ही हो, वही पुरुष वास्तव में ‘पुरुष’ नाम को सार्थक करता है। हम सभी लोग एक परमात्मा के अंश हैं- यही भावना हमको सदैव अपने मन में रखनी चाहिए। यह भावना प्रत्येक मनुष्य को इस योग्य बना देगी कि वह दूसरों को सुख दे सके। जैसे कोई फूल किसी से कुछ नहीं लेता किन्तु सबको समान रूप से आनन्द देता है, उसी प्रकार सज्जन अपने सदाचार से सबको प्रसन्न करता है। यदि किसी मनुष्य को रोटी न मिलती हो तो इस बात को यह समझकर नहीं टाल देना चाहिए कि इससे मेरा क्या सरोकार है। दूसरों की कठिनाईयों को अपनी ही कठिनाई समझना चाहिए। दूसरों के दुःख को अपना ही दुःख समझकर उसे दूर करने की चेष्टा करनी चाहिए। यह दया केवल मनुष्य के ही प्रति नहीं, किन्तु पशु-पक्षियों के प्रति भी होनी चाहिए। जो ईश्वर हमारा पिता है, वह उनका भी पिता है।
आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमें श्रद्धापूर्वक ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें सत्मार्ग पर प्रवृत्त करें। अपनी सारी शक्तियों को परमात्मा के ही अर्पण कर देना सबसे बड़ी बात है। वही जो कुछ चाहे, हमसे कराये। हम जो कुछ करें, उसे ईश्वर का कार्य समझकर करें। ऐसी दशा में हम कोई भी बुरा काम कर ही नहीं सकते। ईश्वर सदैव हमारे पास है। वह हमारे कार्यों की परीक्षा करता है। हमारा सहायक है वह सबसे अधिक सहायता तभी करता है, जब हम सतत उनको अपने पास समझें। यदि ऐसा हमने समझ लिया तो हमारी आध्यात्मिक उन्नति होकर रहेगी और हम संसार के सुख और शान्ति का कारण बन सकेंगे।
(श्री शिवरतन लाल त्रिपाठी, गोलागोकरनाथ)
योग साधकों को अपने भोजन और शयन पर पूरा ध्यान रखना चाहिए क्योंकि शरीर धारी के समस्त कार्य उसके आहार-विहार पर निर्भर हैं। भगवान श्रीकृष्ण जी ने गीता में कहा है-
नात्वश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्त मनश्नतः।
न चाति स्वप्न शीलस्य जाग्रतो नैवचार्जुन॥
गीता अ. 6 श्लोक 16
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न बिलकुल न खाने वाले का तथा न अति शयन करने के स्वभाव वाले का और न अत्यन्त जागने वाले का ही (सिद्ध होता है) फिर कहा है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नाव बोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
गीता अ. 6 श्लोक 17
यह दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथा योग्य आहार और विहार करने वाले का तथा कर्मों में यथा चेष्टा करने वाले का और यथा योग्य शयन करने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
लघु पाक प्रियं स्निग्धं यथा धातु प्रपोषणम्। मनोभिलषितं भोज्यं योगी भोजन माचरेत॥
दूध भात हलकी रोटी (फुलके) इत्यादि प्रकार का शीघ्र पचने वाला और अपनी इच्छा के अनुसार प्रिय तथा स्निग्ध रक्त वृद्धि करने वाला, ऐसा भोजन योगाभ्यासी को करना चाहिए “अभ्यास काल प्रथमें शस्तं क्षीराज्य भोजनम” अभ्यास के आरम्भ काल में भोजन में दूध और घृत विशेष होना चाहिये। पश्चात न्यून होने पर भी काम चल सकेगा।
साधकों को चाहिये कि जब दाहिना स्वर चले तो भोजन करें और जब बायाँ स्वर चले तब शयन करें। जब मनुष्य कोई भी शुभ कर्म करना आरम्भ करता है तब उस के सामने नाना प्रकार के विघ्न उपस्थित होते हैं। जो उन विघ्नों को देखकर घबड़ा जाता है अथवा भयभीत हो जाता है वह सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए शुभ कर्म आरम्भ करते ही विघ्नों से सतर्क रहना चाहिए और पूर्ण दृढ़ता और धैर्य के साथ विघ्नों की किंचित् भी परवाह न करते हुए कर्म में लगा रहना चाहिये। समस्त विघ्न जो भी उपस्थित होते हैं वे वास्तव में वह हैं कुछ भी नहीं केवल दिखाई ही भयंकर पड़ते हैं। जब कर्म निष्ठ पुरुष दृढ़तापूर्वक धैर्य के साथ अपने कर्म में लगा रहता है और विघ्नों की किंचित् परवाह भी नहीं करता तो विघ्न अपनी प्रबल शक्ति से उपस्थित होकर बड़ा भय दिखाता है और प्रयत्न करता है कि कर्म निष्ठ पुरुष कर्म भ्रष्ट हो जाय परन्तु जब देखता है कि कर्म निष्ठ पुरुष अपने कर्म में ही लगता है तो फिर तत्काल ही विलीन हो जाता है और कर्म पुरुष सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
आलस्यं प्रथमों विघ्न उपभोगों द्वितीयकः। कीर्ति स्तृतीयकः प्रोक्तं औदासिन्यं चतुर्थकः ॥1॥
विघ्नाश्वत्वार एवंहि प्राप्नुवन्ति पुनः पुनः। तस्मात्प्रवल धैर्येण योगी विघ्नान्निवारयेत् ॥2।
आलस्य पहला विघ्न है, विषय भोग दूसरा, लोक में यशी होना तीसरा, सिद्धि में देर होने से उदासीनता होना चौथा विघ्न है। यह चारों विघ्न बार-बार आते हैं। इसलिये योगी बड़े धैर्य से इन विघ्नों की परवाह न करके योगाभ्यास करता रहे।
‘वह्नि स्त्री पति सेवानामादौ वर्जन माचरेत्”
अग्नि सेवन, स्त्री सेवन (स्त्रियों से संग, एकान्त में भाषण आदि) एवं राह चलना मना है।
अत्याहारः प्रयासश्च प्रबल्यों नियम ग्रहः।
जन संगश्ब लौत्यंच षद्भिर्योगो विनश्यति॥
(ह.प्र.)
बहुत आहार करना, विशेष श्रम होने का काम करना, अधिक बोलना, उपवास करना (आवश्यक उपवास छोड़ के) जो योगाभ्यासी नहीं हैं ऐसे लोगों से विशेष संग करना और मन को चंचल करना इन 6 बातों के करने से योगी का योगाभ्यास नष्ट होता है इसलिए योगी को इन उपरोक्त बातों से दूर रहना चाहिए।
उत्साहात्साहसा द्धैर्यात्तत्व ज्ञानाञ्च निश्चयात्।
जन संग परित्यागात्षड़ भिर्योगः प्रसिद्हयति॥
(ह.प्र.)
उत्साह रखने से, साहस करने से , धैर्य धरने से, तत्वज्ञान (योग से मोक्ष मिलेगा ऐसी भावना) करने से, योग जीवन अभ्यास चलाने का निश्चय रखने से और विषयी लोगों के संग का त्याग करने, इन 6 बातों से योगाभ्यास में सिद्धि प्राप्त होती है। महाभारत में लिखा है कि एक समय धर्मात्मा युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म जी ने कहा कि -
नैवास्याग्नि न चारिष्टो न मृत्युर्नंच दस्यवः।
प्रभवन्ति धनत्यागाद्विमुक्तस्य निराशिषः॥
-शा.गी.
रत्नादि वैभवों के त्यागी एवं आशारहित और मुक्ति स्वरूप मनुष्य को अग्नि, चोर, डाकू और मृत्यु का भय नहीं होता। अर्थात् योग साधक में त्याग गुण अवश्य आना चाहिये। क्योंकि -
नात्यक्ता सुख माम्नोति नात्यक्ता निन्दते परम्। नात्यक्ता चा भयः शेतेत्यक्ता सर्व सुखीभव ॥
-शी.गी.
त्याग के बिना सुख, निर्भयता, परमपद की प्राप्ति नहीं होती, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि साँसारिक वैभवों को छोड़ त्याग को धारण करे।
मोक्ष धर्मेषु निरतो लहवाहारो जितेन्द्रियः। प्रम्नोति परम स्थानं यत्परं प्रकृते ध्रुर्वम्॥
-हा.गी.
मोक्ष धर्म में रत स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय पुरुष ही प्रकृति से पृथक परब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है।
मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसा निंदयोः समः।
एतत्पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रयेत॥
-हा.गी.
संन्यासियों का परम पवित्र मार्ग प्रशंसा और निन्दा में समदर्शी होकर रहना ही है।
‘आत्मना यः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारी जितेन्द्रियः’ वाचो वेगं मनसः क्रोध वेगं, हिंसा बेग मुदरोपस्य वेगम्।
एतान्वेगान्विनये द्वैतपस्वी, निन्दा चास्य हृदय नोपहन्यात॥
-हा.गी.
समदर्शी हो, फलादि खाकर जीवन बितावे, स्वभाव से शान्ति चित्त, लघु भोजी और जितेन्द्रिय मन वचन कर्म से हिंसा न करे और उपस्थेन्द्रिय के वेगों को सहन करने वाला हो, यह तप है। जो तपस्वी है उन्हीं के हृदय को लोक निन्दा दुःखी नहीं कर सकती इसीलिए सबको पहले गृहस्थाश्रम में ही फल की इच्छा को छोड़ कर कार्य करने का अभ्यास करना चाहिये।
शैशवेभ्यस्तु विद्यानाँ, योवने विषयैषिणाम्। वर्द्धके मुनि वृत्तिनाँ, योगेनानते तनुत्यजाम॥
-रघुवंश
बालकपन में विद्याध्ययन करे, यौवन काल में विषय का सेवन अर्थात् सन्तान उत्पत्ति करे, तत्पश्चात अन्त में योग से शरीर को त्याग दें (ताकि पुनः शरीर प्राप्त करके नष्ट भोग न करना पड़ें यही मनुष्य जीवन का लाभ है। सुख दुःख की किंचित भी परवाह न करते हुए योग में लगा हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त करके फिर सदैव उसी में निवास करता है। जो सुख दुःख के वेग को सहन नहीं कर पाता वही अनन्त काल तक दुःख ही दुःख भोगता रहता है। अर्थात् जीवन मरण का कार्य कभी समाप्त नहीं होता।
सुखं वा यदि वा दुखं, प्रियं वा यदिवाऽप्रियम्।
प्राप्तं प्राप्त मुपासीत, हृदये ना पराजितः॥
-पि.गी.
सुख दुःख प्रिय अप्रिय इनमें से जो भी जिस समय आ प्राप्त हो उसको बड़ी सावधानी से सहन करें।
यज्ञकाम सुखं लोके यच्चदिव्यं महन्सुखम्।
तृष्णाक्षय सुखस्यैते, नार्हतः षोडशी कलाम्॥
-पि.गी.
संसार में विषय एवं अन्य जो बड़े बड़े सुख हैं तृष्णा के नष्ट हो जाने से सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं रह जाते हैं।
सदा संहरते कामान, कर्मोऽगाँनीवं सर्वशः। तदात्म ज्योतिरात्माय मात्मन्येब प्रयश्यति॥
-पि.गी.
कछुए के अंग की तरह समेटने से यह आत्मा जिस समय सम्पूर्ण कर्मों का संहार कर देता है उस समय उसको आत्म ज्योति स्वयं दीखने लगती है।
नास्ति विद्या समं चक्षुः, नास्ति सत्य समं तपः।
नास्ति रागऽसमं दुःखं नास्ति त्याग समंसुखम्।
-म.भा.
विद्या के समान नेत्र नहीं, सत्य के समान तप नहीं, राग के समान दुःख नहीं, और त्याग के समान सुख नहीं है।
नवि भेति यदा चायं, यदा चास्मान्न विन्यति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि, ब्रह्म संपद्यते तदा॥
-पिं.गी.
यह आत्मा जब किसी से नहीं डरता तथा न इससे कोई भयभीत होता है और इच्छा द्वेष से रहित होता है तभी इस आत्मा को ब्रह्मा की प्राप्ति होती है।
उभे सत्याघृतेत्यक्ता, शोकानन्दो भयाभये।
प्रियाऽप्रिये परित्यज्य प्रशान्ता भविष्यति॥
-पि.गी.
सत्य, झूठ, शोक, हर्ष, भय, अभय, प्रिय, अप्रिय इन सबका परित्याग करने से ही चित्त को शान्ति होती है।
“सुखं निराशः स्वपिति नैराश्य परमं सुखम्”
जो कोई किसी वस्तु की आशा (इच्छा) नहीं करता है वही सुख की नींद सोता है।
जो भगवान के हैं जो भगवान के हो गये हैं, जिनको भगवान का एकमात्र सहारा है, ऐसे जो भी - चाहे पक्षी हों, पशु हों बालक हो, वृद्ध हों- उन सबका भाव भगवान पर होता है। उनको कब किस वस्तु की आवश्यकता है इसकी जाँच करेंगे भगवान, और पूर्ति करेंगे भगवान!
-भगवत् नाम से पाप नाश होते हैं और पाप नाश से मन की शुद्धि होती है। अतएव जीभ से नाम का नित्य स्पर्श होता रहे तो बहुत अच्छा है। नाम में शक्ति है। जीभ से उस शक्ति का स्पर्श होता रहेगा तो वह शक्ति भीतर जायेगी और पापों को नष्ट करेगी।
(श्री रामप्रताप मिश्र ‘साहित्यरत्न’)
ईश्वर की रचनाओं में मानव सृष्टि एक अत्यन्त रहस्यात्मक कल्पना है। उसको समझने का अब तक अनेक प्रकार से प्रयत्न किया गया, किन्तु कोई निश्चित तथ्य न मिला। किसी ने उसकी परिधि के बाहर ही अपने को पूर्ण मान लिया, किसी ने उसका एक कौना छूकर “अहं ब्रह्मास्मि” कहकर अपने को पारंगत समझ लिया और किसी ने ‘नेति-नेति’ कहकर अपनी जान छुड़ायी। अब तक उसके रहस्य की खोज का यही क्रम रहा है।
सृष्टि प्रकृति-स्वरूप होने के कारण रहस्यात्मक थी ही, उसको गम्भीरतम बनाने में नर-नारी का मिथुन-स्वरूप और भी सहायक हुआ। नर अपने शौर्य, तेज, ओज और पौरुष के कारण एक भिन्न वर्ग में आ गया और उसी प्रकार नारी भी अपनी दया, त्याग, उदारता, सहनशीलता, सुकुमारता और धैर्य के कारण एक अलग वर्ग में समझी जाने लगी। एक में चुम्बक की तरह दूसरों को आकृष्ट करने की शक्ति आ गयी और दूसरे में धातु की तरह उसकी और आकृष्ट होने की। यह आकर्षण शक्ति सृष्टि में इतनी व्याप्त है कि कोई वस्तु ऐसी नहीं जिस पर अपना प्रभाव न रखती हो। अग-जग का एक-एक कण उसके प्रभाव से अछूता नहीं।
सृष्टि का वैधानिक क्रम
यद्यपि उक्त आकर्षण के लिए नर-नारी दोनों वर्गों की आवश्यकता होती है, किन्तु यदि इन वर्गों में से किसी एक वर्ग का अभाव हो जाय तो दूसरे वर्ग में ही अनुपस्थित वर्ग की भी शक्ति आ जाती है और धीरे-धीरे सजातीय वर्ग ही विजातीय की तरह आपस में आकृष्ट होने लगते हैं, यहां तक कि यदि कोई विजातीय वर्ग अनेक न होकर एक ही रह जाय तब भी उसी अकेले में मन्थन के द्वारा दूसरा तत्व हो जाता है और वह अपनी आकर्षण-क्रियाओं में लग आता है यह सृष्टि का वैधानिक क्रम है और इसी द्वन्द्वात्मकता के नाते हमारा सारा जीवन क्रम भी चल रहा है।
उपर्युक्त दोनों तत्व नर-नारी में बचपन से ही अपने स्वरूप अलग कर लेते हैं। उनकी आकृति इन्द्रिय आदि में जन्मतः अन्तर हो जाता है और वे ज्यों-ज्यों बढ़ते जाते हैं। उनमें अन्तर और भी बढ़ता जाता है। किशोरी होते-होते नारी में स्फुटयौवना होने के लक्षण प्रकट हो जाते हैं और श्मश्रु यौवन का चिन्ह बन जाता है। बच्चे को दूध पिलाने के लिए गर्भ की कल्पना में नारी का स्तन बड़ा हो जाता है और बहादुरी की आवश्यकता के लिए पुरुष के बाहुमाँसल। नारी गर्भाधान के लिए रजोधर्म के द्वारा विशुद्ध होकर सरस हो जाती है और पुरुष बीज वपन के लिए स्थिर-वीर्य होकर सुदृढ़। दोनों की ये क्रियाएं सृष्टि में प्रसरित आकर्षण-शक्ति को संयमित और उर्वर बनाने के लिए ही होती हैं, वह उनके वृद्धि-क्रम से स्पष्ट हो जाते हैं।
यौवन में दोनों में ही वासना पूर्ति की प्रधानता रहती है। वे अपनी इस तुष्टि के लिये संसार का महान से महान त्याग कर सकते हैं। समाज की निन्दा, परिवार की उपेक्षा, परिजन का सम्बन्ध-विच्छेद एक भी उन्हें टस से मस नहीं कर सकता। वे कभी-कभी अपने आपसी वादे पर चलकर सारे संसार को अंगूठा दिखा सकते हैं- माँ-बाप, भाई-बहिन, सगे-सम्बन्धी कोई भी उस मार्ग में रोड़ा नहीं बन सकते। यदि नासमझी से उन्होंने रोड़ा बनने का प्रयास किया तो यह एकदम निश्चित है कि वे अपने काबू से बाहर हो जायेंगे। बिना किसी परवाह के वे दोनों ही संसार की सभी शक्तियों को चुनौती देने में कभी हिचक नहीं सकते। उस समय संसार में कोई शक्ति नहीं जो उन्हें आपसी वादों से तनिक भी झुका सके। वे प्रस्तर की भित्ति की तरह अचल होकर सारी कठिनाइयों और आपदाओं को आसानी से झेल जायेंगे पर अपने निर्णय के विरुद्ध किसी प्रकार का मीन-मेख उन्हें सह्य नहीं हो सकता। उनकी एक अलग बुद्धि होती है और एक अलग संसार। दूसरी वस्तुओं से उनका कोई मतलब नहीं।
नारी का त्याग
बचपन से ही नारी में भोलापन होता है। उसमें सहनशीलता, सुकुमारता, लज्जा, उदारता आदि गुण स्वाभाविक होते हैं और साथ ही होती है आत्म-समर्पण की प्रबल साधना। यह जिसे आत्म-समर्पण करती हैं उसके दोषों को नीलकण्ठ की तरह जीवन भर बूँद-बूँद करके पी जाने में सतत प्रयत्नशील रहा करती हैं और उसे मानती हैं अपना वास्तविक देवता। वह उसे अपने हृदय से कभी विलग नहीं करना चाहती। साथ ही साथ आत्म समर्पण के बाद वह अपने जीवन धन के प्रत्येक कार्य की जानकारी चाहती है केवल घर के कार्यों से ही बस नहीं, वह तो अपने पतिदेव से सम्बद्ध सभी बाहरी कार्यों का भी लेखा चाहती है। यह सब क्यों? इसीलिए कि वह अपना सब कुछ उसे समर्पित करके उसकी अर्धांगिनी बन गयी है और अपने दूसरे अंग के विषय में चिन्ता करना उसका स्वाभाविक अधिकार है। इसके औचित्य को न मानना पुरुषों की नासमझी होगी।
इस प्रकार नारी प्रारम्भ से ही अपने जीवन को उत्सर्ग के मार्ग पर ले जाती है, उसका आदान भी अवसर आने पर उत्सर्ग के लिए हो जाता है। संसार में अपने लिए उसका कुछ नहीं। उसके पास जो कुछ है वह सब दूसरों के लिए-पति, परिवार और देश के लिए।
आदान के विषय में, व गर्भ धारण करती है, यह सबसे बड़ा उदाहरण दिया जाता है। परन्तु यदि गम्भीरता से सोचा जाय तो उससे उसको अपने लिए क्या मिलता है-वह तो हो जाती है देश और समाज के लिए महान देन।
वह अपना रक्त पिला-पिलाकर गर्भ का पालन करती है, नौ मास तक अनावश्यक बोझा ढोती है, घुमरी, मचलाहट, खुमारी आदि के प्रकोप से दिन रात परेशान रहती है, चलते समय अचानक गिर पड़ती है और कभी-कभी तो गर्भ प्रसव की असह्य पीड़ा से अन्त में जान तक खो देती है और यदि बच्चा सकुशल पैदा भी हो गया तो वह देश और समाज का होता है न कि उसका, क्योंकि बड़ा होने पर वह अपनी इच्छा के अनुसार मार्ग पकड़ लेता है। तब भला इसे आदान कैसे कहा जाय? शरीर भी जिसे वह अपना कह सकती, गर्भ के कारण क्षीण हो जाता है। तब उसे मिला क्या? वह तो शुक्र की कुछ बूंदें ग्रहण करती है और उसके साथ अपने शरीर के रक्त की सहस्रों बूँदें मिलाकर समाज के लिए एक नयी सन्तति का महान दान करती है। फिर आदान कैसा?
बच्चा पैदा होता है और वह उस समय काल के गाल से निकले हुए पीत शरीर को लेकर सप्ताहों चारपाई पर पड़ी रहती है। कराहती है, छटपटाती है और अपने को असमर्थ देखकर चुपचाप शय्या पर लेटी रहती है। इस व्यापार में गर्भधारण करना आदान कैसे कहा जाय? यह तो जगत को एक महान दान देने का बहाना है। अतएव गर्भाधान एक उदाहरण हो सकता है महान उत्सर्ग का, न कि आदान का।
और आगे सोचिए तो नारी की महत्ता और भी निखर उठती है। बच्चे बड़े होते हैं और वह उन्हें प्रसन्न रखने के लिए भैया, लाला, बाबू कहकर पुचकारती हुई खाना-पीना भूल जाती है। यदि उसका परिवार गरीब हुआ अथवा किसी कारणवश उसके भोजनालय में भोजन की कमी रही तो वह सारे परिवार को खिला पिला कर स्वयं निराहार सो जायेगी, किसी से इसके विषय में कुछ कहना या शिकायत करना उसके स्वभाव की बात नहीं। दूसरे दिन संयोग से यदि पर्याप्त भोजन न हुआ तो वह सबको खिला-पिलाकर पुनः भूखी रह सकती है यह क्यों? क्या उसे भूख नहीं सताती?
भूख उसे भी सताती है, उसी तरह जैसे सारे मानव प्राणी को! फिर वह वैसा क्यों करती है? इसीलिए कि वह दूसरों के लिए अपना उत्सर्ग करना बालापन से सीख चुकी है और यह गुण उसमें स्वाभाविक हो गया है।
यदि कभी पतिदेव किसी कारणवश घर से नाराज होकर कहीं चले गये तो कौन रात-रात भर बैठी हुई उनके लिये रोती रह जाती है? आपसी कलह के समय पति की गलती रहने पर भी उनसे कौन स्वयं क्षमा माँगती, रूठने पर मनाती और पग-पग पर बलैया लेती फिरती है? कौन अपनी मर्यादा की रक्षा के लिये चीमूर की स्त्रियों की तरह कुंए और नदी में कूद कर जान दे देता है? किसे अपने अस्तित्व को खोकर जीवन भर दूसरे के वश में रहना खुशी से अंगीकार है? कौन बारह -एक बजे रात में अतिथि के आ जाने पर शय्या और आलस्य त्यागकर उन्निद्र रहने पर भी उसके अशन वसन के सम्बन्ध में जुटा रहा सकता है?
मानव धर्मों का पालन
उक्त सभी प्रश्नों का एक स्वर से उत्तर मिलेगा-भारतीय नारी। धर्म और संस्कृति की प्रतीक स्वरूप भारतीय नारी किसका हल नहीं रखती? वह दानव को भी मानव, हत्यारे को भी धर्मात्मा और निर्दय को भी सदय बना सकती है। उसके आंसुओं में धर्म है पीड़ा में संस्कृति और हास्य में सुख का राज्य। मानव धर्मों का सच्चे अर्थ में केवल वही पालन भी कर सकती है।
मनु जी ने धर्म के दस लक्षण गिनाये हैं-
धृति-क्षमा दगोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्य सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम॥
इनमें से प्रत्येक को नारी किस तरह निभाती है, इस पर संक्षेप में दृष्टि डालना अधिक समीचीन होगा।
संसार का कोई भी मानव दस लक्षण सम्पन्न धर्म का पूर्ण रूप से शायद ही पालन कर पाता हो, यदि कोई करता भी होगा तो उसे ऐसा करने में असीम साधना करनी पड़ी होगी। परन्तु नारी के जीवन में उक्त दसों बातें स्वभाव बन गयी हैं। उनके बिना उसे चैन ही नहीं पड़ता। वह उन बातों का कठोरता से पालन करके सारे संसार की पथ प्रदर्शिका बन गयी है।
कठिन से कठिन परिस्थितियों में आपदाओं से घिरी रहने पर भी वह धैर्य के साथ पति की अनुगामिनी बनी रहती है। पति उसके साथ घोर से घोर अत्याचार कर डालता है, उसको पशु की तरह डंडों से पीट लेता है वेश्यागमन और शराबखोरी से उसका जीवन दूभर बना देता है, उसके जेवर बेचकर जुआ खेल लेता है, पर ज्यों−ही उसे विपन्नावस्था में घर आया देखती है वह सब कुछ भूलकर सहानुभूति के साथ उसकी सहायता में तत्पर हो जाती है। अपनी बीती पीड़ाओं के बदले में एक भी शब्द पति के विरुद्ध कहना उसके बूते का नहीं। वह अपने हृदय और स्वभाव से मजबूर है। कोमलता छोड़कर कठोर बनना उसे भाता ही नहीं। उसका शील हृदय क्षमा के अतिरिक्त और कुछ जानना नहीं चाहता। वह अपने में ही पूर्ण है।
दम के विषय में उसकी तितिक्षा इच्छा रहते हुए भी अच्छी वस्तुओं और आहार स्वयं न खाकर परिवार वालों को खिला देना, अपनी पीड़ा भूलकर दूसरे की पीड़ा में सम्वेदना प्रकट करना, क्रोध न करके सदैव सरस बनी रहना ही पर्याप्त है।
शौच और इन्द्रिय निग्रह के लिए उसका प्रतिदिन आचरण अनुकरणीय है। कुटुम्ब, साधु और पति की सेवा करने, उदार हृदय से पीड़ितों और दुखियों को सहारा देने और अपने सुखदुःख की बिना परवाह किये रात-दिन गृहकार्यों में निरत रहकर ‘गृहणी पद की जिम्मेदारी निभाने से बढ़कर शौच और इन्द्रिय निग्रह होगा ही क्या?
बुद्धि से काम लेना, सत्य बोलना और क्रोध न करना तो नारी सुलभ गुणों में एकदम स्वाभाविक गुण है। उनके बिना नारी अपना जीवन सुखमय बना ही कैसे सकती है? यदि वह उक्त गुणों को न प्राप्त कर सके तो उसके परिवार में नित्य नये कलह पैदा होते रहेंगे और उसका जीवन भार एवं परिवार दुःखागार हो जायेगा। अतएव यह निर्विवाद हो जाता है कि मनु के बताये हुए दस लक्षण-सम्पन्न धर्म का पालन नारी की तरह पुरुष नहीं कर पाता।
संस्कृति के प्रति निष्ठा
अब रही संस्कृति की बात। कोई भारतीय पुरुष आसानी से यूरोपीय पत्नी ला सकता है, परन्तु भारतीय नारी अपनी संस्कृति और मर्यादा को त्यागकर सम्पन्न अंग्रेज की पत्नी होना स्वीकार नहीं कर सकती। वह अपनी संस्कृति के विरुद्ध जाना अब भी-जब कि सारा भारतीय समाज यूरोपीय रंग में रंगता जा रहा है- बड़ा भारी पातक समझती है।
कोई माँसभक्षी, जुआरी या शराबी उसे छल से या जबरदस्ती अपनी पत्नी बनाना चाहता है तो पहले जी जान से उसका विरोध करती है, परन्तु किसी कारणवश यदि उसने पत्नीत्व स्वीकार कर लिया तो वह उसे अपना इष्टदेव मानकर उसकी अनुगामिनी बनी रहने में ही अपना कल्याण समझती है, उसके साथ निधन कर देने में ही वह अपना श्रेय मान लेती है। यह है भारतीय नारी!
वह साड़ी को फेंककर पायजामे में आने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती। इस पर यदि कोई जबर्दस्ती करना चाहता है तो वह अपनी चली आती हुई संस्कृति और मर्यादा की रक्षा में प्राण तक आसानी से दे सकती है।
कहीं कोई स्त्री पति के अत्याचारों से ऊबकर आत्महत्या कर रही है, कहीं रात में रेल की पटरी के नीचे कट जाती है, कहीं विष खाती हुई पकड़ ली जाती और कहीं घर से लापता हो जाती है। यह क्यों? यह सब नारी की मर्यादा और संस्कृति के विरुद्ध किये जाने वाले अत्याचारों का ही परिणाम है।
उपर्युक्त विवेचन के अपवाद भी भारतीय समाज में मिलेंगे, पर नगण्य अतएव अपवादस्वरूप कुछ नारियों के बल पर भारतीय नारियों की महत्ता और गुणों की अमान्यता उचित नहीं। यह कहना भी उचित नहीं कि आज की नारियाँ बहुत दिनों से पुरुषों की दासी रहने के कारण इतनी सहनशील बन गयी हैं, क्योंकि नारी की यह शीलवृत्ति और उसके साथ होने वाले अत्याचार सर्वदा जारी रहा है। अतएव मनु को भी ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ कहकर नारी की महत्ता का गुणवान करना पड़ा।
इस प्रकार नारी मानव सृष्टि की वह धारा है जो सर्वदा शीतल होकर रहती है और गर्म होना जानती ही नहीं। मानव जीवन की दुर्बलताओं को पी जाने में ही उसकी महत्ता है। वह सृष्टि की कल्याणकारी देवी है। यदि उसके स्वाभाविक गुणों का पुरुष मात्र सताशमी अनुकरण करते तो यह दुखमयी वसुधा स्वर्ग हो जाती। पर हमारी महत्वाकाँक्षा क्या कुछ करने देगी।
(श्री जगेश्वर नाथ खन्ना, फिरोजाबाद)
बड़े-बड़े विद्वानों का निश्चित मत है कि जीव जितना प्रकृति के समीप रहता है उतना ही स्वस्थ, शक्तिवान एवं प्राणवान रहता है। वस्तुतः इस मत की सत्यता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। नित्यप्रति के जीवन में ऐसे अनेक दृष्टान्त सम्मुख उपस्थित होते हैं जिनसे उक्त मत की पुष्टि होती है, पशु-पक्षियों का ही उदाहरण लीजिए। आज मनुष्य की अपेक्षा पशु-पक्षी कहीं अधिक बलिष्ठ दृष्टिगोचर होते हैं। यह दूसरी बात है कि अपनी बुद्धि एवं विवेक से चलकर मनुष्य उन पर अपना प्रभुत्व जमा सकने में सफल हो गया है। पशु-पक्षियों की अक्षय शक्ति और अहम्य साहस का भेद उनका प्रकृति के समीप का संबंध है। इन जीव-जन्तुओं में सर्दी और गर्मी की सहनशक्ति भी मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक बलवती होती है। ऋतु के अनुसार ये अपने खान-पान व रहन-सहन में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं। फलस्वरूप न इन्हें सर्दी सताती है न गर्मी परेशान करती है और न बरसात कष्ट पहुँचाती है।
किन्तु मानव में ऐसी अद्भुत एवं असीम शक्ति का पूरा अभाव है। आज का मनुष्य नवीन आविष्कारों एवं अनुसंधानों की अनेकतम सुविधाओं के फलस्वरूप पंगु सा बनकर कृत्रिमतापूर्ण जीवन व्यतीत करने का अभ्यस्त हो गया है। पुरातन इतिहास पर दृष्टि डालिये। प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि अपना जीवन-यापन वनों की स्वच्छंद छाया में करते थे। भोग-विलास एवं सुख के विविध कृत्रिम साधन उन्हें उपलब्ध नहीं थे और सम्भवतः यही दृश्य उनके अलौकिक आनन्द और अपने कार्यक्षेत्र में सफलता का कारण भी बना। अनेक साँसारिक दुखों, माया मोह के बन्धनों के अतिरिक्त प्रकृति-सामीप्य ने उन्हें रोगों के कष्ट से भी मुक्त रखा। केवल ऋषि मुनि एवं साधु संन्यासियों के लिये ही इस प्रकार के प्राकृतिक जीवन का आकर्षण नहीं था अपितु सामान्य गृहस्थियों के लिए भी निहित आयु के पश्चात वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था थी। इसके अतिरिक्त भी मनुष्य प्रकृति की गोद में ही वास्तविक सुख अनुभव करते थे।
निःसन्देह ही आज के युग में वानप्रस्थ का पुनः प्रारम्भ होना या तपस्वियों के समान वनों में एकान्तवास की आशा करना भूल होगी। प्राकृतिक जीवन से यह तात्पर्य है भी नहीं। केवल आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य ने प्राकृतिक ढंग के जीवन के स्थान पर कृत्रिमता एवं अनावश्यक आडम्बरों से परिपूर्ण जो जीवन अपना लिया है वह उसे त्याग दे। वह इस सत्य की गाँठ बाँध ले कि स्वास्थ्य ही जीवन है। किन्तु आधुनिक ‘सभ्य मानव’ के लिए रहन-सहन के कृत्रिम ढंग में स्वास्थ्य लाभ करना कठिन है। सब ओर कृत्रिमता एवं बनाव-ठनाव, दिखावे का बोलबाला है। अत्यन्त शिक्षित एवं सभ्य आज के 80 प्रतिशत मानव अपने उपयुक्त आहार तक का कुछ निर्णय कर नहीं पाते। फलस्वरूप सत्व रहित, कृत्रिम, पौष्टिक, तत्वों से विहीन भोज करके वे अभिन्न रोगों को निमन्त्रित कर बैठते हैं। इन्द्रिय सुख के सम्मुख शारीरिक सुख की अवहेलना करने में भी आज मनुष्य नहीं हिचकिचाते। कृत्रिमता एवं नाजुकता का तो जैसे यह युग ही है। सर्दी के दिनों में मूली का पत्ता पाँव के नीचे आने से लोगों को जुकाम हो जाता है जरा सी असावधानी से गर्मियों में लू लगते उन्हें देर नहीं लगती। वे भूल जाते हैं कि यह सब उनकी दास प्रवृत्ति है, स्वच्छन्द नैसर्गिक जीवन के सुखों से वे अछूते हैं। आज भी हजारों ही नहीं बल्कि लाखों, करोड़ों धनहीन अधिक सर्दी और गर्मी की प्रचण्डता को सहन करने की असाधारण शक्ति रखते हैं। गर्मियों में आम और करोदें के वृक्षों के नीचे स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करने वाले और सर्दियों में घास फूस की झोपड़ियों में आश्रय लेने वाले ये श्रमजीवी भी तो मनुष्य हैं, उनसे कहीं अधिक बलिष्ठ एवं साहसी। यह शक्ति एवं साहस प्राकृतिक, मुक्त जीवन का ही देन है। प्राकृतिक भोजन, शुद्ध एवं स्वच्छ वायु में मुक्त विचरण, व्यायाम यहीं सब उनके जीवन में अदम्य साहस, अपरिमित शक्ति एवं अलौकिक आनन्द भर देता है। प्रत्येक प्रकार की परिस्थिति एवं कष्ट और असुविधाओं से निपटने की क्षमता वे अर्जित कर लेते हैं।
कहने का यह तात्पर्य नहीं है कि आप इन्हीं व्यक्तियों के समान जीवन-यापन की व्यवस्था करिये। आवश्यकता इस बात की है कि आप अपने जीवन-यापन के कृत्रिम ढंग को बदल डालिए, स्वच्छ वायु एवं व्यायाम की महत्ता को समझिए, अलौकिक आनन्द के साधन चिन्ताहीन एवं उन्मुक्त जीवन के रहस्य को समझिए। इतनी सहनशक्ति रखिए कि कष्टों एवं आपत्तियों से विचलित न हो सकें। स्वयं कष्टों का निवारण करने के अभ्यस्त बनिये। परिस्थितियों के दास न बनकर उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करिए। स्वयं को समयानुसार ढालिए। हृदय को प्रसन्न रखने की कोशिश करिए।
(श्री कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’)
मैजनी ने अपनी पुस्तक ‘स्वतन्त्रता के सिद्धान्त’ में कहा है कि गुलाम देश में दोषों की खेती होती है। पिछली शताब्दियों की गुलामी में हमारे देश में भी बहुत दोष पैदा हो गये हैं और आदत बनकर हमारे स्वभाव में समा गये हैं।
स्वतंत्रता के इस प्रभात में देश के हर एक नागरिक को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वह कठोर परिश्रम करके दृढ़ संकल्प के द्वारा अपने जीवन से सब दोषों को शीघ्र ही दूर कर देगा क्योंकि इन दोषों का त्याग किये बिना हम गर्व के साथ यह कह नहीं सकते कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। इन दोषों के रहते तो हमारी स्वतंत्रता ऐसी ही है जैसे किसी भिखारी को यह गर्व करना कि उसके पास धन है।
1. आम वगैरह फल खाकर केला खाकर छिलका ऐसी जगह डालिये कि उस पर किसी का पैर पड़ने का डर न हो।
2. बातचीत में भूलकर गाली का प्रयोग न कीजिए।
3. रेल सिनेमा वगैरह में टिकट इस तरह खरीदिये कि दूसरों को कष्ट न लगे।
4. तम्बाकू किसी भी सूरत में न पीजिए। यह मुमकिन न हो तो बहुत कम पीजिए और इस तरह पीजिए कि न पीने वाले साथियों खासकर स्त्रियों के ऊपर उसका धुंआ हरगिज न जाये।
5. कमरे के कोनों, पार्क के घास-बिछौनों (लॉन्ज) धर्मशाला के आँगनों, प्लेटफार्म और साफ रास्तों पर पान की पीक न थूकिये।
6. रेल के डिब्बों, कारखानों, धर्मशाला-होटलों के कमरों, गली की दीवारों और इसी तरह की दूसरी जगहों पर कभी कुछ न लिखिये।
7. रेल या मोटर की यात्रा में दूसरे मुसाफिरों को चढ़ने बैठने और उतरने में जितनी मदद कर सकें, अवश्य कीजिए।
8. दूसरों से जेवर, कपड़े, पुस्तकें, छाता फाउन्टेन पेन, घड़ी वगैरह न माँगिये। बहुत ही मजबूरी हो तो काम होते ही फौरन सुरक्षित लौटाये बिना और कार्य न कीजिए। माँगी हुई चीज किसी दूसरे के माँगने पर हरगिज न दीजिये।
9. किसी के घर पहुँचने या किसी से अपने घर मिलने वगैरह के अपने किसी भी वायदे को पूरा करने में जरा भी ढील न कीजिए। बहुत ही मजबूरी हो, तो उसकी सूचना समय पर दीजिए। वायदे को सदा अपने चरित्र की कसौटी समझिए।
10. अपने घर के चूहे आँख बचाकर दूसरे के घर में न छोड़िये।
11. बातचीत में मीठे रहिए, कड़वी बात हरगिज न करिए और फालतू बातें न कीजिए।
12. पार्क, नदी-घाट या किसी ऐसी ही दूसरी जगह पर चाट खाइए तो पत्ते दूर फेंकना न भूलिए।
13. झाडू लगाने के बाद घर का कूड़ा सड़क पर कभी मत फेंकिए।
14 कमरों में घुसते या निकलते समय किवाड़ों को धीरे से खोलिए, ओढ़काइए और धमाका न मचाइए।
15. संकट की सम्भावना होते ही घबरा न जाइए। धीरज के साथ परिस्थिति को समझिए और संकट आ ही पड़े, तो उसे शान्ति से सहिए और मोर्चा लीजिए।
16. अपने घर को सदैव साफ रखिए और सामान को तरतीब में संजोकर।
17. अपने कपड़े साफ रखिए और हजामत (नाखून सहित) बनी हुई।
18. किसी की प्राइवेट बातें जानने की कोशिश न कीजिए, जान ही जायें तो उन्हें दूसरे से मत कहिए।
19. इधर की बात उधर मत लगाइये। दूसरों के बारे में बातें करते समय अनुभव कीजिए कि वे सुन रहे हैं। जो बात आप किसी के मुँह पर नहीं कर सकते, उसे पीठ पीछे भी मत कहिए।
20. हरेक साथी में कुछ गुण होते हैं, कुछ दोष। आप गुण देखिए और दोषों को नजरअन्दाज कीजिये।
21. जलसों और सभाओं में स्वयं चुप रहिये और दूसरों से चुप रहने के लिये मुँह से कभी न कहिये।
22. सभाओं, सिनेमा और खेल से लौटते समय भगदड़ न मचाइये। नम्बर पर शान्ति से चलिए और स्त्रियों-बच्चों का खास ध्यान रखिये।
23. रेल में तब तक न चढ़िये, जब तक उतरने वाले नीचे न उतर लें।
24. चौराहों और बाजारों में खेल दिखाकर दवा बेचने वालों के लैक्चर कभी न सुनिये।
25. पत्रों का जवाब देने में कभी देरी न कीजिए।
26. खेल, तमाशे, यात्रा या जलसे-जुलूसों में किसी को चोट आवे, तो उसे घेरकर खड़े न होइये। कुछ सेवा कर सकते हो, तो कीजिए, नहीं तो दूसरों को जाने दीजिए।
27. किसी के द्वारा किसी का पता पूछने पर यदि आप जानते हों, तो समझाकर बताइये, जिससे उसे सुविधा हो। न जानते हों, तो इन्कार कर दीजिये, पर गोलमोल या रूखा जवाब न दीजिये।
28 किसी के घर आप जायें, तो मेज, कुर्सियाँ या किसी दूसरे आधार पर रखी चीजों को न छूइये। उठाकर देखना ही पड़े, तो पूरी सावधानी से उसे उसी जगह रख दीजिए।
29. न खरगोश की तरह दौड़िये, न कछुए की तरह रेंगिये, अपने काम की गति में एक बेलेंस रखिए।
30. अपने साथ कभी अन्याय न सहिए। उसे रोक न सकते हो, तो भी उसका प्रतिरोध कीजिए।
31. आप जागते हो और पास में कोई दूसरा सो रहा हो, तो अपना हर काम धीरे से कीजिए कि उसकी नींद न उचटे।
32. वर्जित स्थानों पर पाखाना, पेशाब न कीजिए और उचित स्थानों पर भी सफाई के साथ कीजिए।
33. जो बर्ताव आप अपने साथ दूसरों से नहीं चाहते, वह स्वयं भी दूसरों के साथ न कीजिए।
(श्री शिकण्ठलाल शुक्ल ‘सरस’)
प्रायः यह देखने में आया है कि जब हम दूसरों को अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं या उनकी राय को बदलना चाहते हैं तो बुद्धि तत्व के आधार तर्क-वितर्क का अधिक सहारा होते हैं। मानव मन की भावनाओं और अनुभूतियों की लेशमात्र भी चिन्ता न करके तर्क-शास्त्र के शुष्क धरातल पर उतर आते हैं। इस बात पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया जाता है कि भावनाओं और विभूतियों का क्या स्थान है। सीधे अनावश्यक वाद-विवाद को छेड़ देते हैं। अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट और हृदय प्रभावी बनाने की अपेक्षा हम दूसरों के दृष्टिकोण की कटु-आलोचना करने लगते हैं। अपने विचारों की व्याख्या उनकी उपयोगिता तथा उससे अन्य लोगों के संबंध आदि बातों को आकर्षक ढंग से रखना चाहिए। पर ऐसा न करके दूसरों के विचारों पर ही अनुचित ढंग से प्रहार करना प्रारम्भ कर देते हैं। विचारों की झोंक में गंवारु ढंग से कह उठते हैं कि वह गुमराह है। इस प्रकार उसके आत्म-सम्मान और आत्म गौरव की भावनाओं पर कठोर प्रहार कर देते हैं। शीघ्र ही द्वेषपूर्ण घृणा उत्पन्न हो जाती है और आपस में अनुचित शब्दों का आदान-प्रदान होने लगता है। इस प्रकार न तो हम दूसरों के दृष्टिकोण को बदल पाते और न उनको अपना मित्र ही बना पाते वरन् उनके पूर्व विचारों को और दृढ़ करके उन्हें अपना शत्रु बना लेते हैं।
इस प्रकार की असफलता का कारण स्पष्ट है। मूल कारण यह है कि हम यह बिलकुल भूल जाते हैं कि मनुष्य तर्क शास्त्र की सृष्टि नहीं है। मनुष्य अनुभूतियों और भावनाओं, विचारों और इच्छाओं द्वेष और घृणा, अभिमान और अहंकार, भय और आदर, शक्ति और सम्मान का दास है। वह तर्कशास्त्र के वशीभूत कभी नहीं हो सकता। हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए कि वे लोग मनुष्य हैं देवता नहीं हैं। उनके विचार और भावनाएं शिलाखण्ड पर लिखे अक्षर नहीं हैं। हम में से प्रत्येक अपने को बुद्धिमान, विचारवान तथा तर्कशास्त्री होने का दावा करता है और उसके अनुसार प्रयत्न भी करता है। परन्तु जब वही बात प्रत्यक्ष अनुभव में आती है तो हमें ज्ञात होता है कि हमारा प्रदर्शन बुद्धितत्त्व की अपेक्षा पूर्व निर्मित धारणाएं तथा कल्पनाएं अधिक करती हैं। तर्कता हमारे साथ कार्य करने में असमर्थ सिद्ध होती है।
तर्क-वितर्क से विजय बहुत कम होती है। अधिकतर व्यर्थ सिद्ध होता है। यदि कभी विजय भी हो जाए तो वह विजय पराजय से भी गई बीती होगी। मान लिया कि हमने किसी को अपने तर्क-बल से कोई बात मन वाली और उसे स्वीकार भी कर ली। पर विश्वास रखना चाहिए कि यह मान्यता बाहरी और क्षणस्था है। उसके विचारों में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं हो सकता। वह हमारी आश्चर्यजनक प्रभावशालिनी तर्कता के सामने ठहर न सके, वह वचनबद्ध भी हो जाए, अपना आत्म-सम्मान भी कर दे और हाँ, भी कह दे। यह सब कुछ होने पर भी हृदय नहीं बदल सकता।
यह स्वाभाविक बात है कि हम उन्हीं बातों में विश्वास करना अधिक पसन्द करते जिनमें बहुत पहले से विश्वास करते आ रहे हैं। हम इस बात की बहुत कम परवाह करते हैं कि हमारा विश्वास तर्कपूर्ण या तर्कहीन है। मानव मन अपनी स्मृतियों से स्नेह करता है। जो विचार हमारे मस्तिष्क में घर कर चुके हैं उनके प्रति सम्मान की भावना अवश्य बढ़ती रहती है। उन विचारों से हमें ममता और मोह होता है अतः उनका अपहरण हमारे लिए अवहय होगा। जब हमें यह ज्ञात होगा कि कोई व्यक्ति उसको लूटना चाहते हैं, तो हृदय व्याकुल हो उठता है। हम यह कभी भी सुनने को तैयार नहीं होंगे कि हमारे विचार निरर्थक हैं। जब कोई हमारे प्रिय विचारों पर प्रहार करना चाहता है तो हम अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उनकी रक्षा करते हैं। दूसरों की ओर से बिलकुल कान बन्द कर रक्षा के लिए शत्रुता का रुख धारण कर लेते हैं। जितना ही इस बात का प्रयत्न किया जाता कि हमारे विचार ठीक नहीं उतना ही हम अपने विश्वासों में दृढ़ होते जाते हैं। यही है मानव स्वभाव। यह बात हमारे साथ, आपके साथ और के साथ है। तर्क-वितर्क, खण्डन-मण्डन में भेदभाव अधिक बढ़ता है। इसमें घृणा के कारण ऐसा अन्तर पड़ जाता है। कि उस अन्तर को भरना कठिन हो जाता है। ऐसी अवस्था में दूसरों पर वास्तविक विजय कभी सम्भव नहीं हो सकती।
यदि हम तर्क-वितर्क, वाद-विवाद तथा खण्डन-मण्डन आदि को त्यागकर मैत्रीपूर्ण ढंग से दूसरों के विचारों के प्रति प्रेम तथा सम्मान प्रकट करें तो सफलता के प्रयोग अधिक प्राप्त होते हैं। यदि हम किसी को प्रेम और सहानुभूति के साथ सन्तुष्ट कर सकें या कोई बात मनवा सकें तो निःसन्देह हम उसके वास्तविक शुभचिन्तक तथा सच्चे मित्र बन जायेंगे। उसका हम में विश्वास होगा। यदि और कुछ नहीं तो कम से कम हमारी बात तो ध्यानपूर्वक अवश्य सुनेगा। उसके विचारों को निरर्थक कहने की अपेक्षा यदि हम अपने सुलझे विचारों से उसको प्रभावित करते हुए उसके हृदय को छूने का प्रयत्न करें तो यह निश्चय है कि वह हमारी ओर आकर्षित होने लगेगा।
तर्क-वितर्क तथा बाल की खाल निकालने से हम मित्र नहीं बना सकते। सच्चे मित्र इस ढंग से प्राप्त नहीं होते हैं। वह मार्ग दूसरा ही है। वह प्रेम और सहानुभूति का मार्ग है जिस पर मित्र ही मित्र दिखाई पड़ते हैं। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक बात है। यदि आप किसी को गाली देंगे तो बदले में आप गाली खायेंगे। यदि आप किसी को मूर्ख कहेंगे तो आपको भी मूर्ख बनाया जायगा। आप आलोचना करेंगे तो आपको प्रत्यालोचना मिलेगी। अतः यदि आप प्रेम करेंगे तो अवश्य प्रेम प्रतिदान होगा। जैसा बोयेंगे वैसा काटेंगे यह सीधी सी बात है।
प्रेम ही ऐसी महान शक्ति है जो प्रत्येक दशा में जीवन को आगे बढ़ाने में सहायक होती है। हमें सदैव सहनशीलता तथा धैर्य का सहारा लेना चाहिये। प्रत्येक की बात को सुनने का स्वभाव होना चाहिए। कट्टरता और कायरता को त्यागकर प्रत्येक को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए। दूसरों की कटु आलोचना को छोड़ देना चाहिए, विश्वास रखिए कि आपकी प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण सच्ची बातों को सुनने के लिए दुनिया विशेष होगी।
सही मान्यता प्रेम द्वारा ही हो सकती है। बिना प्रेम के मान्यता कृत्रिम होगी। शेक्सपियर के अनुसार किसी के विचारों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। विचार तर्क-वितर्क की दृष्टि नहीं हैं। विचारधारणा तथा विश्वास बहुकाल के सत्संग से बनते हैं। अधिक समय की संगीत का ही परिणाम प्रेम है। इसलिए विचारधारणा अथवा विश्वास प्रेम का विषय है।
अतः यदि हम दूसरों पर विजय प्राप्त करके उनको अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं, उनके दृष्टिकोण को बदलकर अपनी बात मनवाना चाहते हैं तो प्रेम का सहारा लेना चाहिए। तर्क और बुद्धि हमें आगे नहीं बढ़ा सकते। वास्तव में प्रेम ही वशीकरण का मूल मंत्र है।
(पं. ठाकुरदास भार्गव)
गोवंश से हमारे देश का ऐसा ही सम्बन्ध है जैसे शरीर का प्राण से। हमारे शरीरों को स्थिर और ताकतवर रखने के लिए अन्न शाक, सब्जी, दूध, घृत आदि जिन पदार्थों की आवश्यकता है उन्हें उत्पादन करने का मुख्य आधार गोवंश से ही है। संसार के अन्य देशों में खेती का काम थोड़ा और मशीनों से लिया जाता है पर हमारे देश में मुख्यतः हल चलाने रहट के द्वारा कुएं आदि से सिंचाई करने, भार वहन आदि का काम बैलों से ही लिया जाता है। भूमि को उपजाऊ रखने के लिए गोबर और गोमूत्र सर्वश्रेष्ठ तथा सुलभ खाद हैं। देश के करोड़ों लोग जो निरामिषभोजी हैं उनकी शारीरिक शक्ति दूध ही पर निर्भर है। यद्यपि भोजन करने वालों के लिए भी स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिए दूध तथा दूध से बने पदार्थ आवश्यक हैं। दरअसल हमारे देश के लोगों की आर्थिक तथा शारीरिक उन्नति गोवंश पर ही निर्भर है। इसलिए सदैव से भारत में राजा और प्रजा दोनों ने गोवंश की उन्नति पर ध्यान दिया। हिन्दू राज्यकाल में ही नहीं मुसलमान बादशाहों ने भी गाय के महत्व को समझा। नवाब झझर ने देश की सर्वप्रसिद्ध गायों की हरियाणा नस्ल को तथा टीपू सुलतान ने अमृतमहल को उन्नत किया। बादशाह बाबर ने अपने पुत्र हुमायूं को गौवध बन्द रखने की नसीहत दी तथा प्रायः मुसलमान बादशाहों के समय में गौहत्या नहीं हुई। मुस्लिम काल में गोवध की उन्नति के कारण एक पैसे सेर दूध तथा एक आने सेर तक घी बिका है।
अंग्रेजी राज्य के साथ-साथ गोवंश का ह्रास तथा विनाश आरम्भ हुआ। नस्ल सुधार और उन्नत करने की प्राचीन प्रथाएं खत्म हुईं। चमड़े,चर्बी,हड्डी, आदि का विदेशों में निर्यात करने के लिए वृद्ध तथा अपंग ही नहीं बल्कि अधिक से अधिक दूध देने वाली गायों का वध होने लगा। 1950 में ही कलकत्ता के बन्दरगाहों से 40 लाख से अधिक पशुओं की खालें बाहर भेजी गयीं। और यह व्यापार यहाँ तक बढ़ा कि आज संसार भर में भारत गाय की हलकी खाले आवश्यक निर्यात करने में सर्वप्रथम स्थान रखता है। विदेशों में भी प्रायः अच्छे चमड़े और माँस की ही माँग रहती है जो वृद्ध अपंग पशुओं से नहीं नए जवान और स्वस्थ पशुओं से ही प्राप्त किया जा सकता है। खालों के निर्यात के लिए बछड़े भी मारे जाते हैं। संसार भर में किसी भी देश में उपयोगी पशुओं का वध नहीं होता। पर हमारे देश में बड़े नगर उपयोगी गाय, भैंस, बछड़े और बछड़ियों की वध भूमि बने हुए हैं। सरकार ने कुछ प्रान्तों में उपयोगी पशुओं का वध बन्द करने के कानून बनाये हैं। और उनसे जितना लाभ होना चाहिए उनसे उतना लाभ नहीं होता है।
गोवंश के विनाश के अतिरिक्त अंग्रेजी राज्यकाल में नस्ल सुधार के काम में बहुत नुकसान पहुँचा। सरकार और जनता दोनों की उपेक्षा के कारण गायों की अच्छी-अच्छी नस्लें खराब हो गयी। हिसार और रोहतक के जिला में 50 वर्ष पहले ऐसी गायें थी जो बीस-बीस सेर दूध देती थीं। बैल भी मजबूत थे पर आज वहाँ दस सेर वाली गाय का मिलना कठिन हो गया है तथा ऐसी हालत प्रायः देश भर की है। आज हरियाणा की साधारण गाय 6-7 सेर से अधिक दूध नहीं देती। कुछ लोगों का ख्याल है कि हिसार के सरकारी फार्म के जो सन् 1809 में स्थापित किया गया था, तैयार किए साँडों ने इस प्रसिद्ध नस्ल को खराब किया है। यह विशेषज्ञों का काम है कि वे इस फार्म के काम की जाँच करे। हिसार का सरकारी फार्म भारत की ही नहीं, एशिया की सबसे बड़ी पशुशाला है। इसका प्रभाव देश भर पर पड़ता है। इसलिए इसकी हानि और लाभ के साथ-साथ देश के बहुत बड़े भाग के हिताहित का सम्बन्ध है।
चारे की कमी
अंग्रेजी राज्य से पहले लोग अधिकतर ऐसी ही चीजों का उत्पादन किया करते थे जो जीवन के लिए उपयोगी हों। अतः उन दिनों देश में खाने पीने की चीजों की कमी नहीं थी। पर अंग्रेजी राज्य की उन्नति के साथ-साथ केवल मात्र धन पैदा करने वाली फसलों की उन्नति हुई जिसके कारण पशुओं के लिए आवश्यक चारा मिलना मुश्किल हो गया। जंगलों में पशुओं के चरने पर प्रतिबन्ध लगने के कारण भी समस्या उत्पन्न हुई। उनमें गौवंश के ह्रास और विनाश की भी एक समस्या है। गौवध की अवनति के कारण आज देश के लोगों को न पर्याप्त दूध, घी ही मिलता है न बैल। भोजन में विशेषज्ञों के मतानुसार कम से कम प्रति मनुष्य नित्य 10 औंस या 5 छटाँक दूध मिलना चाहिए। 1935 में 7 औंस के करीब मिलता था पर आज 4 औंस से अधिक नहीं। आवश्यक दूध या दूध के पदार्थ न मिलने से जनता की शारीरिक शक्ति दिन−प्रतिदिन कम होती जा रही है और बीमारी की समस्या बढ़ती जा रही है। खेती के लिए आवश्यक तथा अच्छा बैल न होने के कारण जितनी पैदावार होनी चाहिए उतनी नहीं होती।
हमारे देश की आर्थिक तथा शारीरिक उन्नति का मुख्य आधार गोवंश है। अतः हमें किसी और दृष्टि से नहीं राष्ट्रीय दृष्टि से विचार करना है। इसीलिए महात्मा गाँधी ने बेलगाँव में गोरक्षा परिषद के अध्यक्ष की हैसियत से कहा था कि मैं गोरक्षा के सवाल को स्वराज्य के प्रश्न से भी बड़ा मानता हूँ। जो सज्जन गोरक्षा के प्रश्न को गौण समझते हैं या महत्व नहीं देते है उन्हें गाँधी जी के वचनों पर ध्यान देना चाहिए।
गौरक्षा कैसे होगी
मनुष्य कई काम केवल मात्र भावना वश करता है। कितने ही कार्यों में ज्ञान को महत्व दिया है पर गोरक्षा का प्रश्न केवल मात्र भावना से हल नहीं होगा। भावना, ज्ञान और कर्म तीनों की आवश्यकता है। हमारे देश के करोड़ों लोग गोरक्षा की भावना रखते हैं। बार-बार जनता की ओर से कानूनी तौर पर गौहत्या बन्द करने की माँग की जाती है। इस माँग का समर्थन सन्त बिनोवा भावे जैसे महापुरुष ने किया है। राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी अखिल भारतीय गो प्रदर्शनी हिसार के भाषण में गौहत्या निषेध को महत्व दिया है। यह स्पष्ट देखा है कि गौहत्या बन्द किये बिना भारत की आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि गोवध बन्द के कानून से गोरक्षा नहीं होगी।
पशुओं से खाद
दुःख है कि आज हमारे देश में वृद्ध तथा अपंग ही नहीं उपयोगी पशुओं की भी हत्या होती है। उपयोगी पशुओं की हत्या बन्द करने के लिए सन 1944 ई. से सरकार जिक्र कर रही है पर अब तक कोई सफलता नहीं मिली। इसका मुख्य कारण है कि उपयोगी और निरुपयोगी में अधिक भेद और भिन्नता का न होना। देश के कितने ही भागों में लाखों पशु, दूध बैल नहीं, गोबर, गोमूत्र की खाद के लिये ही रखे जाते हैं। और वे भी उपयोगी हैं। प्रसिद्ध विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार हर एक पशु उपयोगी और लाभदायक है। भारत सरकार के प्रसिद्ध डॉक्टर राईट तथा कर्नल ओलीवर के मतानुसार सन 1930 में प्रति पशु गोबर गोमूत्र के खाद का मूल्य अनुमान से 13 रुपये था। अन्न तथा अन्य चीजों का भाव देखते हुए आज यह लाभ 30 रुपया वार्षिक प्रति पशु से कम नहीं। भारत सरकार के विशेषज्ञों के अनुसार जबकि गोसदनों में रखने वाले वृद्ध तथा अपंग पशु की औसत आयु पाँच वर्ष की हो तो प्रति अनुपयोगी या वृद्ध पशु पर 15 या 20 रुपये वार्षिक खर्च होगा। दस पन्द्रह रुपये सालाना की बचत होगी जिससे अनुपयोगी कहलाये जाने वाले पशुओं से भी देश को करोड़ों रुपये सालाना का लाभ होगा। क्योंकि गाय, बैल, जीते-जागते खाद के छोटे-छोटे कारखाने के रूप में सर्वत्र फैले हुए हैं। यह ठीक है कि गोबर गोमूत्र से होने वाला लाभ चाँदी सोने या कागज की शक्ल में नजर नहीं आता है। लाभ अवश्य है। यदि हम गोबर गोमूत्र का ठीक-ठीक उपयोग करें तो स्वयं निरुपयोगी कहलाने पशु उपयोगी बन सकते हैं। खाद के लिए कृत्रिम कारखाने की आवश्यकता नहीं होती है। यदि हम लाभ नहीं उठाते तो यह हमारा दोष है गाय का नहीं।
गोरक्षा का नैतिक पक्ष
गोरक्षा का प्रश्न आर्थिक ही नहीं नैतिक भी है। भारत में जीव को पालने वाला वृद्ध होने पर उसकी हत्या नहीं करता। अच्छा मालिक वृद्ध नौकर को पेंशन देता है फिर जिस गाय ने हमारे जीवन को कायम रखने के लिए सैकड़ों मन दूध दिया, जिस बैल ने हजारों मन अन्न उत्पन्न किया, वृद्ध होने पर हम उन्हें कत्ल करने की बात कहें तो यह कृतघ्नता है, नैतिक पतन है। भारतीय संस्कृति नैतिकता तथा कृतज्ञता प्रधान नहीं है और हमें गोरक्षा के विषय में भी इस संस्कृति को कायम रखना चाहिये। अतः हर प्रकार से गौहत्या कतई बन्द होनी आवश्यक है। इसीलिए सरकार द्वारा स्थापित की गई शिशु विशेषज्ञ कमेटी ने कानून से गौहत्या बन्द करने की सिफारिश की थी।
गोवध बन्दी की माँग मानी जाय
उचित होगा कि भारतीय परम्परा जनता की माँग आर्थिक तथा नैतिक लाभ और देश हित को दृष्टि में रखते हुए गौहत्या कतई बन्द की जाय। मैं फिर इस बात को दुहराता हूँ कि कानून के द्वारा गौहत्या बन्द भी कर दी जाय तो जब तक सरकार और जनता दोनों मिलकर नस्ल सुधार, चारे का उत्पादन आदि गोवंश की उन्नति के कार्यों पर पूरा ध्यान न देंगे तो पशु वध की हालत और खराब हो जायेगी।
हमारे देश में गोवंश की संख्या 15 करोड़ है। इतनी बड़ी संख्या की उन्नति और रक्षा के लिए बहुत अधिक रुपये और कार्यकर्ता तथा अन्य साधन चाहिये। देश की उन्नति के लिए भारत सरकार ने जो पंचवर्षीय योजना बनाई है उसमें 20 लाख से अधिक खर्च का अनुमान लगाया गया है पर गोवंश की उन्नति के लिये रखे गये हैं केवल चार करोड़ रुपये। यह रकम पशु संख्या और पशुओं से होने वाली आमदनी को दृष्टि में रखते हुए बहुत कम है। सरकार के अतिरिक्त यदि वर्तमान गोशालाओं को प्रोत्साहन दिया जाय तो थोड़े खर्चे से और थोड़े समय में अधिक लाभ हो सकता है। सरकार के अनुमान के अनुसार गोशालाओं की संख्या 3000 हजार है। गोशालाओं के पास निज के मकान तथा अन्य साधन हैं। कितनी ही गोशालाओं की अपनी जमीन है। प्रभावशाली तथा अनुभवी कार्यकर्ता हैं। जनता का सहयोग भी है। यदि सरकार सहयोग तथा सहायता दे तो गोशालाएं नस्ल सुधार के केन्द्र ही नहीं अच्छी दुग्धशालाएं भी बन सकती हैं।
(श्री प्रीतम देवी महेन्द्र)
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह जीव को जहाँ वंश का अंश मानती है वहाँ सृष्टि के मूल में ही आनन्द और कल्याण मानती है। जीवन का लक्ष्य प्रयोजन और आधार आनन्द है, दूसरी ओर यही सच पाश्चात्य संस्कृति में विषाद, अतृप्ति एवं निराशा है। हमारे यहाँ कला और साहित्य के माध्यम से जीवन की जय कुञ्जरित की गई है तो यूरोप में मृत्यु, सुख, नैराश्य की कालिमा बिखेरी गयी है। एक ओर आत्मा का शुभ प्रकाश है तो दूसरी ओर नास्तिकता का गहन अन्धकार।
अपने जीवन को आनन्द का आधार मानकर कार्य क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले भारतीय व्यक्ति के लिए जीवन उत्साह एवं प्रफुल्लता से भर जाता है।
जब आप अपने को आनन्दकन्द परमेश्वर का अंश मानते हैं तो कष्ट, कसक या वेद से आपका क्या सरोकार हो सकता है। बीज में जो गुण होते हैं वे ही अंकुरित पल्लवित पुस्थित एवं फलित होकर प्रकृति में प्रकट होते हैं आनन्दकन्द (अर्थात् जिसकी जड़ में आनन्द है) होने के कारण आपके जीवन का विस्तार आनन्द में ही होना चाहिए।
अपने जीवन को आनन्द के मापदंड से नापिये आपने कितना आनन्द प्राप्त किया है किस-किस रूप में उसे प्राप्त कर रहें हैं। आपका आनन्द किस कोटि का है जीवन को आप किस ओर चला रहें हैं।
आपने अपने आनन्द का जो आदर्श बनाया है। उसकी ओर चलने से आपको कितना उत्साह आन्तरिक शान्ति, संतुलन या स्थिरता प्राप्त हो रही है। इतने दिन इस आनन्द का उपयोग करने से आप कितनी आत्म शक्ति पा सके हैं।
आत्मिक आनन्द, उच्च विचारों एवं उद्देश्यों में रमण करने तथा उन्हें श्रम द्वारा कार्यान्वित करने का आनन्द हमारे अन्दर देश में दिव्यता का संचार करता है, उसमें सच्चे आनन्द एवं उत्साह की वर्षा करते हैं। दूसरी ओर साँसारिक वासनामूलक आनन्द क्षणिक है, जहाँ पहली प्रकार का आनन्द हमारा रक्षक है दूसरी श्रेणी का आनन्द हमारा भक्षक है।
अपने आनन्दों को देखकर उनका वर्गीकरण कीजिए जो क्षणिक और हानिकारक हैं उन्हें त्यागकर स्थायी और स्वास्थ्यकर आनन्दों से जीवन को मृदु बनाओ।
गायत्री तपोभूमि की स्थापना तथा पूर्णाहुति यज्ञ आयोजन का वृत्तांत पाठ पिछले अंक में पढ़ चुके हैं यह सब सर्वशक्तिमान सत्ता की इच्छा का छोटा सा चिन्ह मात्र था। उसे जो काम कराना होता है उसके वैसे ही साधन बन जाते हैं। मनुष्य का अपना प्रयत्न और पुरुषार्थ सीमित है। एक आकस्मिक बाधा उत्पन्न हो जाने पर उसके सारे मनसूबे धूल में मिल जाते हैं और प्रभु की कृपा की सहायता से हवा चलने लगे तो भंवरों में उलझा हुआ जहाज आसानी से किनारे पर लगता है। भगवती की इच्छा और प्रेरणा ही है जिसने एक आवश्यक कार्य का शुभ आरम्भ कर दिया।
भारतीय संस्कृति धर्म और भाषा विज्ञान की आधारशिला गायत्री है। इस महामन्त्र में वह सब रत्न भरे हुए हैं जिनकी आवश्यकता मनुष्य जाति को रहती है। प्राचीन काल में ऋषियों ने इसी महाशक्ति की उपासना करके संसार को ज्ञान-विज्ञान की भाषा से आलोकित किया था। प्राचीन भारत की जो महानता थी उसके मूल में उसकी आत्म शक्ति ही प्रधान थी। भौतिक सम्पन्नता भी उसे जो कुछ उपलब्ध थी वह भी आत्मिक योग्यताओं के आधार पर थी। आजकल छल, बनावट शोषण, अपहरण एवं अन्याय के आधार पर सुख सम्पदाएं एकत्रित की जाती हैं। प्राचीन काल में ऐसी कोई आवश्यकता न होती थी। योग्यता, शक्ति, सामर्थ्य, विद्या और बुद्धि जहाँ होती हैं वहाँ सुख शान्ति का साधन सामग्री बड़ी आसानी से इकट्ठी हो जाती है। पूर्व काल में भारत की जो अनन्त सम्पन्नता थी वह ऐसी ही थी।
आज हम सब प्रकार से दीन−हीन हैं। सब दृष्टियों से पिछड़े हुए हैं। उठने का प्रयत्न करते हैं तो गलत दिशा में पैर पड़ते हैं। केवल भौतिक आधार पर जो उन्नति होती है उसकी जड़ कमजोर रहती है, वह न तो स्थिर होती है और न ही सुरक्षित रहती है। अमेरिका ने किसी प्रकार बहुत सम्पत्ति संचित कर दी है पर नैतिक या आत्मिक आधार न होने के कारण अब उस सम्पत्ति की रक्षा के लिए परमाणु बमों का आश्रय लेना पड़ रहा है। फिर भी वह सुरक्षित दिखाई नहीं पड़ती। हमारे तत्वज्ञानी पूर्वज इस बात को भली प्रकार जानते थे इसलिए उनने आत्म बल के विकास पर सबसे अधिक जोर दिया था। क्योंकि इसी बल के आधार पर मनुष्य आन्तरिक शान्ति प्राप्त करता है। इसी के आधार पर सामाजिक शान्ति स्थिर रहती है। आपसी प्रेमभाव, स्नेह, अच्छाई, सहयोग बढ़ता है और इसी आधार पर स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, धन, वैभव आदि सुख आने की उपलब्धी होती है।
आजकल आत्मबल तिरस्कार करके लोग केवल भौतिक आधार पर सुखी एवं सम्पन्न बनना चाहते हैं। फलस्वरूप सम्पत्ति तो नाम मात्र की ही बढ़ती दीखती है पर नाना प्रकार के भय, क्लेश, द्वेष, उलझन, संघर्ष, छल,कपट द्रुत वेग से उलझते चले आ रहे हैं। गरीबी दूर नहीं होती परेशानी बढ़ती चलती है।
ऋषियों को इस फलितार्थ का पहले से ही पता था, इसलिए उन्होंने संसार की सर्वतोमुखी उन्नति का एकमात्र मार्ग ‘आत्मबल’ बढ़ाना बताया था। इसी धन के धनी वे स्वयं बने और इसी धन का धनी उन्होंने सम्पूर्ण देश को बनाया। अनाज की खेती के साथ-साथ जैसे घास फूस बिना प्रयत्न के ही उत्पन्न हो जाते हैं वैसे ही जहाँ आध्यात्मिक धन होता है वहाँ भौतिक धन का कोई अभाव नहीं रहता। इस तथ्य को उन्होंने प्रत्येक भारतीय के मन में बिठा दिया था। फलस्वरूप यह देश अपने आचरण और आन्तरिक बल के कारण संसार का प्रकाश स्तम्भ, ध्रुवतारा बना हुआ था, जगतगुरु कहलाता था।
समय के कुप्रभाव से अन्धकार का युग आया और हम अपना सम्बन्ध छोड़कर पथ भ्रष्ट हो गये। कहने की आवश्यकता नहीं कि पिछले दिनों विदेशियों द्वारा जिस प्रकार हम पददलित किये गये और नानाप्रकार की मूर्खताओं एवं दुर्बुद्धियों में प्रसिद्ध होकर किस प्रकार त्रास पाते रहे। समय सदा एक समान नहीं रहता। प्रभु की इच्छा फिर ऐसी दिखाई पड़ती है कि जिसकी प्रिय क्रीड़ा स्थली भारत भूमि पुनः अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करे, पुनः आत्म धन से धनी होकर अपने और अपने संसार के दुखों को दूर करे। भारत के आध्यात्मिक उत्कर्ष की दशा में जैसी प्रेरणा के अनेक चिन्ह यत्र तत्र दिखाई पड़ रहे हैं, अनेक दिव्य धाराएं भगवत् प्रेरणा के अनुरूप अपने-अपने ढंग से अपनी अपनी स्थिति के अनुरूप कार्य कर रही हैं। विश्वास करना चाहिए कि समय पलटेगा और हमारी व्यक्तिगत तथा सामूहिक समस्याएं सुलझेंगी। विध्वंस और निर्माण का उभय पक्षीय कार्यक्रम हमारा कायापलट करने ही वाला है।
गायत्री विद्या का पुनः प्रकाश भी विश्व कल्याण के आयोजनों का एक प्रमुख कार्य है। तप के बिना शक्ति उत्पन्न नहीं होती। कथा, कीर्तन, प्रवचन, दान, पुण्य, तीर्थयात्रा, ब्रह्मभोज आदि सभी कार्य शुभ हैं। इनके परिणाम भी उत्तम हैं। पर आत्मबल केवल तप द्वारा ही प्राप्त होता है। इतिहास साक्षी है कि जिस देव-दानव ने जब भी कोई अलौकिक शक्ति पाई है, महत्वपूर्ण वरदान पाया है तब उसे तप अवश्य करना पड़ा है। तप से ही तपी हुई आत्मा में ही वह गर्मी होती है जिसमें पाप, ताप, कलुष, कषाय, दुर्भाव एवं कुसंस्कार जल सकें। तप से तृप्त आत्मा में ही यह प्रकाश उत्पन्न होता है जिससे अविद्या और माया का अन्धकार नष्ट होकर सत्य तथा परमात्मा का साक्षात्कार हो सके।
तप का प्रधान मार्ग गायत्री है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर आधुनिक काल तक के ऋषियों तक का एक मात्र अवलंबन गायत्री रहा है। एक भी ऋषि ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता जिसने गायत्री उपासना के बिना ऋषित्व प्राप्त किया है। तप का निश्चित आधार गायत्री है। यह उस आत्म बल को गर्मी तथा प्रकाश को उत्पन्न करती है जिससे तपस्वी में प्रभाव, तेज, ब्रह्मचर्य-तड़ित द्युति एवं आवृत्ति का संचार होता है। तपस्वी ही किसी राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। करोड़ मन धोने की अपेक्षा एक तपस्वी का मूल अधिक है। असंख्य लीडरों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, मास्टरों की सम्मिलित शक्ति से जो कार्य नहीं हो सकता वह तपस्वियों के सूक्ष्म तप प्रभाव से हो सकता है। उसका स्थूल श्रेय बहुधा किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों या संस्थाओं को प्राप्त होता है। इस रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं कि सूक्ष्म वातावरण बनाने एवं प्रकट शक्तियों को उत्पन्न करने में प्रायः अज्ञान, भय, कष्ट एवं जनसाधारण की आंखों से ओझल रहने वाले तपस्वी ही प्रमुख कार्य करते हैं। महात्मा गाँधी और काँग्रेस को राष्ट्र निर्माता होने का श्रेय प्राप्त है पर कौन जानता है कि योगी अरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी राम आदि अनेक तपस्वियों द्वारा भारत को अच्छी स्थिति में लाने के लिए क्या कुछ किया होगा।
छत्रपति शिवाजी के पीछे समर्थगुरु रामदास की शक्ति काम करती थी। ऐसी अज्ञात शक्तियाँ पूर्व काल में हमारे राष्ट्र में प्रचुर परिणाम में थी। फलस्वरूप अनेक वीर योद्धा, चक्रवर्ती विद्वान, वाग्मी श्रीमन्त भरे पड़े हैं। आज वे शक्तियाँ लुप्त हो गयी हैं तो सब ओर से खोखलापन ही नजर आ रहा है। राष्ट्र सच्चे अर्थों में सबल एवं सम्पन्न बनाने के लिए तप एक आवश्यक तत्व है। इस तत्व के बिना अनेकों प्रवृत्तियाँ अधूरी ही रहती हैं।
तपोबल के द्वारा आत्मबल की वृद्धि यह आज की एक महानतम एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। प्रतीत होता है कि प्रभु इस आवश्यकता को भी अपूर्ण न रहने देंगे। उनकी इच्छा और प्रेरणा के अनुसार जहाँ अनेक उत्तम आयोजन यंत्र तंत्र हो रहे हैं, वहाँ गायत्री तपोवन का निर्माण भी एक ऐसी घटना है। जिसे बड़े से बड़े रचनात्मक कार्यों से कम महत्व नहीं दिया जा सकता। इस तीर्थ का स्थूल रूप बहुत ही साधारण है। इमारत व प्रदर्शन की दृष्टि से इसका कोई बड़ा महत्व नहीं है। पर इसके साथ जो सूक्ष्म शृंखला सब सुसंबद्ध है उसे असामान्य ही कहा जायेगा। भारतवर्ष के तपस्वियों, गायत्री उपासकों का यह एक ऐसा केन्द्रीय संगठन बिन्दु है जहाँ उनका पारस्परिक सम्बन्ध, सहयोग एवं सम्मिलन होता है। आपसी आदान प्रदान से तपश्चर्या में वृद्धि होती है। नये तपस्वियों को प्रेरणा, पथ प्रदर्शन एवं प्रोत्साहन की उपलब्धि होती है। जन साधारण में इस संख्या द्वारा व्यापक प्रचार करके गायत्री उपासना का अधिकाधिक विस्तार करने का जो आयोजन है, उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरथ पुष्प प्रस्फुटित होंगे।
अस्पताल खोलने से बीमारी दूर होती है यह एक समझ अधूरी है इस प्रकार का व्यवहार विचार को अपनाने या वातावरण यदि घर घर में उत्पन्न हो जाये तो बीमारियों की पीड़ा और अस्पताल खोलने की खर्चीली योजना का भार बहुत कुछ हलका होता है। शान्ति स्थापना और रक्षा का जो कार्य अफसर मिलकर भी नहीं कर सकते वह कार्य नैतिक वातावरण उत्पन्न होने से सहज ही हो सकता है और इतने कर्मचारियों के समय तथा व्रत को किसी रचनात्मक कार्य में लगाया जा सकता है। राष्ट्र निर्माण की सही आधारशिला यह है कि नैतिक एवं धार्मिक वातावरण उत्पन्न किया जाये। यह कार्य सरकारें नहीं कर सकती यह तो बन्दों और तपस्वियों द्वारा होता है। इन्हीं वर्गों की अभिवृद्धि करने के लिए गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ है। हम विश्वासपूर्वक यह आशा करते हैं कि यह संख्या इस महान आवश्यकता को पूरा करने के अपने प्रयत्न में असफल न रहेगी।
हमें समय समय पर ऐसे आध्यात्मिक अनुभव हुए हैं जिनमें आवश्यकता पूर्ति की ओर संकेत मिला है। गायत्री महाशक्ति को भारत पुनः प्राप्त करेगा। इस महाविद्या के आधार पर हम अपने खोये हुए अनेक रत्न भण्डारों को खोज सकेंगे। तप की राष्ट्रव्यापी अभिवृद्धि होने से ऐसे नर रत्न उत्पन्न होंगे जो व्यापक समस्याओं को आसानी से हल कर सकेंगे। यह गायत्री तीर्थ अपने स्थानीय क्षेत्र में जो आयोजन कर रहा है और देशभर में फैले हुए जिज्ञासुओं, साधकों, तपस्वियों तथा सिद्ध पुरुषों के उपयोग से जो कार्य करने में संलग्न है वह स्वर्ण युग का पूर्ण संकेत है। प्रभु की इच्छा एवं प्रेरणा को विश्व की एक महान आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह शुभ आरम्भ हुआ है। इसका अन्त कितना महान है इसकी कल्पना करनी तो आज भी कठिन होगी।
गायत्री तपोभूमि का निर्माण हो गया। इसमें जिन लोगों का जितना सहयोग, सद्भाव श्रम एवं धन लगा है वह निश्चित रूप से धन्य हुआ है क्योंकि यह चारों ही दान वहीं सफल होते हैं जहाँ उनका सदुपयोग होता है। कार्य की महत्ता, श्रेष्ठता एवं सात्विकता के अनुरूप ही उसमें लगा हुआ दान सफल माना जाता है। इस तीर्थ की उपयोगिता में जिस प्रकार सन्देह की गुंजाइश नहीं उसी प्रकार इसमें लगा हुए सहयोग की सफलता में कोई सन्देह नहीं है। इस तीर्थ की स्थापना एवं उद्घाटन का समारोह जिस असाधारण पवित्रता के आध्यात्मिक वातावरण में हुआ वह एक शुभ लक्षण है। ऐसे शुभ सुयोग मानवी प्रयत्नों से नहीं दैवी प्रेरणा से ही उपलब्ध होते हैं। प्रभु तेरी इच्छा पूर्ण हो इस भावना के साथ विश्व कल्याण के इस महान कार्य को पूरा करना चाहिए।
मंत्र लेखन यज्ञ
गायत्री मन्त्र लेखन यज्ञ चालू रहेगा। जिन सज्जनों ने गत वर्ष इस यज्ञ में भाग लिया है उनसे प्रार्थना है कि लेखन कार्य इस वर्ष भी चालू रखें और इस बात का प्रयत्न करें कि लेखन कार्य में कम से कम दो नये साधकों को सम्मिलित कर सकें। इससे मन को वश में करने में बड़ी सहायता मिलती है साथ ही जप की अपेक्षा पुण्य फल भी अनेक गुना अधिक होता है।
सामूहिक यज्ञ आयोजन
अगला विशेष कार्य सामूहिक हवन करने का है। गत वर्ष गायत्री संस्था के सदस्यों द्वारा सहस्राँशु ब्रह्मयज्ञ के अंतर्गत 125 करोड़ जप, 125 लाख आहुतियों का हवन 125 हजार उपवास, 24 करोड़ गायत्री मन्त्र लेखन का कार्यक्रम पूरा किया था। इस वर्ष 125 करोड़ आहुतियों का हवन करना है।
गायत्री प्रेमियों को अपने-अपने स्थानों में एक वर्ष के लिए यह कार्यक्रम आरम्भ करना चाहिए। जहाँ सुविधा हो सके वहाँ प्रतिदिन का और जहाँ सुविधा न हो वहाँ साप्ताहिक कार्यक्रम रखना चाहिए। रविवार विशेष उत्तम है पर सुविधानुसार अन्य दिन भी रखा जा सकता है। अकेला व्यक्ति 24 आहुतियों का हवन भी कर सकता है।
हवन का कार्यक्रम कुछ विशेष कठिन व खर्चीला नहीं है। 2 रु. के लगभग खर्च में 108 आहुतियों का हवन हो सकता है। साल भर में 100 रु. के लगभग खर्च पड़ेगा। इसे एक व्यक्ति न उठा सके तो बारी बारी कई व्यक्तियों के यहाँ किया जा सकता है अथवा किसी सम्मिलित स्थान पर सामूहिक सहयोग से हवन हो सकता है। इसमें सभी गायत्री प्रेमी एकत्रित हों। आरम्भ में सन्ध्या फिर प्रार्थना फिर हवन करें अन्त में आरती एवं कीर्तन किया जाय। यज्ञान्त में पंचामृत आदि का प्रसाद वितरण कर दिया जाय। गायत्री की महत्ता सम्बन्धी प्रवचन हों या गायत्री साहित्य की पुस्तकें पढ़कर सुनाई जायं।
हवन सम्बन्धी विस्तृत जानकारी और विधि अगले अंक में छाप दी जायेगी। तब तक गायत्री प्रेमियों को इस आयोजन के लिए तैयारी करनी चाहिए। स्थान-स्थान पर यज्ञ समितियां बनें और देश भर में पुनः यज्ञमय वातावरण उत्पन्न किया जाय।
समय दान
केवल अकेले एकान्त में थोड़ी बहुत साधना करने की अपेक्षा अनेक व्यक्तियों को गायत्री उपासना के महत्व को समझाना एवं उपासना के मार्ग पर लगा देना अधिक महत्वपूर्ण है। थोड़े से व्यक्ति आत्म लाभ कर लें या मुक्ति प्राप्त कर लें इसमें केवल उन थोड़े से व्यक्तियों का ही लाभ है पर यदि अनेक व्यक्ति सन्मार्ग गामी हों तो संसार के गन्दे वातावरण को ही बदल सकते हैं। इसलिए गायत्री प्रेमियों को अपनी साधना के साथ साथ गायत्री प्रचार के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। जिसके प्रयत्न से लोग सन्मार्ग गामी होते हैं उस प्रयत्नकर्ता को भी विशेष पुण्य-फल प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्य फल, अपनी थोड़ी सी एकान्त साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है। हमारी प्रार्थना है कि प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपना कुछ न कुछ समय इस कार्य में लगाकर गायत्री माता को श्रम एवं समय का दान करे। धन दान की अपेक्षा समय दान का मूल्य अनेक गुना अधिक होता है।
सेवा के लिए आत्म समर्पण
जो सज्जन अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं तथा जिन्हें कमाने की चिन्ता नहीं है ऐसे लोगों को अपना आत्म कल्याण करने तथा संसार की आध्यात्मिक सेवा करने के लिए अपने को लगा देना चाहिए। ऐसे लोगों की सेवाओं का गायत्री तपोभूमि में स्वागत किया जायगा।
बढ़े चलो निज-पथ पर, राही! चले चलो तुम, वीर सिपाही!
बढ़ता जाता अपने पथ पर, जगतीतल का कण-कण अविरल। बहती जाती जीवन-धारा, मग में करती कल-कल, कल-कल।
परिवर्तन के छाया-पट पर, रंग बदलता क्षण-क्षण, पल-पल। नभ में निशि भर दीप जलाता, झिलमिल झिलमिल-तारामण्डल।
तुम भी अपने निश्चित पथ पर, बढ़े चलो हे वीर सिपाही! बढ़े चलो निज पथ पर, राही! चले चलो तुम, वीर सिपाही!
मानवता के पथ पर चलकर, जग को राह दिखाओ, आओ। जलकर दीपक सदृश अँधेरे में प्रकाश फैलाओ, आओ।
बनो दीन-दुखियों के सेवक, पतितों को अपनाओ, आओ। रक्खो निज-आदर्श विश्व में, प्रेम-शान्ति सरसाओ, आओ।
दृढ़ संकल्प-कवच को पहिने बढ़े चलो, तुम वीर सिपाही! बढ़े चलो निज-पथ पर, राही! चले चलो तुम, वीर सिपाही!
आज परीक्षा के इस युग में, वीरों का परखा जाना है। कौन निकलता स्वर्ण, कौन पीतल है, यह देखा जाना है।
आज वीर सैनिक दल ने फिर, पहिना केसरिया बाना है। आज स्वाभिमानी मानव को, जौहर अपना दिखाना है।
चलो, बेधड़क चलो, परीक्षा-रणस्थली की ओर, सिपाही! बढ़े चलो निज पथ पर, राही! चले चलो तुम, वीर सिपाही!
आज चलो जन-जन के मन में, मानवता की क्रान्ति मचाने। आज चलो मानव-हृदयों में, सहृदयता का भाव जगाने।
आज चलो जग से शोषण, अत्याचारों को मार भगाने। आज चलो फिर जगतीतल पर, निर्मल शान्ति-ध्वजा फहराने।
लिये खड़ी जयमाल विजय श्री, डरो न किंचित वीर सिपाही! बढ़े चलो निज पथ पर, राही! चले चलो तुम, वीर सिपाही!
*समाप्त*
(मुकुन्दलाल ‘सुकुल’ उर्द अध्या., सतना)