(1) इस अंक के साथ अखण्ड ज्योति के अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा समाप्त हो जाता है। इस लिए ग्राहकों से प्रार्थना है कि अपना चन्दा ढाई रुपये मनी आर्डर से तुरन्त भेज दें।
(2) अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपती हैं जितने उसके ग्राहक होते हैं। देर से चन्दा भेजने का परिणाम यह होता है कि पिछले अंक समाप्त हो जाने पर ग्राहकों की फाइलें अधूरी रह जाती हैं। पिछले अंक समाप्त हो जाने पर वे किसी भी मूल्य पर उपलब्ध नहीं हो पाते।
(3) इस वर्ष सरकार ने बी. पी. खर्च और पोस्टेज बहुत बढ़ा दिया है। इसलिए अखंड ज्योति की वी. पी. भेजने में 1 रु.) अतिरिक्त खर्च पड़ता है। मनीआर्डर फीस समेत 2॥) की अपेक्षा 3 रु.) की वी. पी. पहुँचती है। इसलिए अखण्ड ज्योति की वी. पी. मँगाने में प्रत्यक्ष ही दोनों ओर की हानि है। पाठकों से प्रार्थना है कि वी. पी. की प्रतीक्षा न करे। चन्दा मनीआर्डर से ही भेजें।
(4) अधूरे वर्ष के चन्दे का हिसाब रखने में हमें बहुत भारी अड़चन पड़ती है। इसलिए जिन सदस्यों का चन्दा बीच के किसी मास में समाप्त होता है उनसे प्रार्थना है कि सन् 54 के जितने मास का चन्दा शेष हो उसे भी भेज कर अपना हिसाब जनवरी से दिसम्बर तक का ही कर लें।
(5) जनवरी 54 का अंक “यज्ञ अंक” होगा। इसमें यज्ञ की वैज्ञानिक गवेषणा और विवेचना रहेगी। ऐसी अलभ्य सामग्री अब तक कहीं से भी प्रकाशित नहीं हुई है। यह अंक संग्रहणीय और अवलोकनीय ही होगा।
(6) गत वर्षों में अखण्ड-ज्योति अपना कागज छपाई और टिकट खर्च स्वयं पूरा कर लेती थी। सम्पादन, दफ्तर, क्लर्क आदि का खर्च तो अखण्ड ज्योति के हिसाब में एक पाई का भी जोड़ा नहीं जाता। इस वर्ष तिरंगा कवर लगाने के कारण प्रति ग्राहक पीछे प्रायः सात पैसे का नुकसान रहता है। अर्थात् कागज छपाई और टिकट की लागत 2 रु. आई है। यदि ग्राहक संख्या इतनी ही रही तो यह घाटा अगले वर्ष भी रहेगा। जो पाठक अखण्ड ज्योति से सचमुच प्यार करते हों उनसे प्रार्थना है कि अपना सब कुछ समय खर्च करके कुछ नये ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करें ताकि यह सद्ज्ञान प्रसार की ‘अखण्ड ज्योति’ ठीक प्रकार जलती रहे।
(7) यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर हर महीने ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती है। अंक न पहुँचने का कारण डाक की गड़बड़ी ही होती है। जो अंक न पहुँचे उसकी सूचना उसी महीने देनी चाहिए ताकि दुबारा वह भेजा जा सके। कई महीने बाद सुधि लेने से पुराने अंक समाप्त हो जाते हैं तब उन्हें भेजना सम्भव नहीं रहता। इसी प्रकार पता बदलने की सूचना भी तुरन्त देनी चाहिए नहीं तो पिछले पते पर अंक जाते रहते हैं। पत्र व्यवहार में अपना ग्राहक नम्बर लिखना और उत्तर आवश्यक हो तो जबावी पत्र भेजना न भूलना चाहिए।
-व्यवस्थापक “अखण्ड-ज्योति”
(श्री विश्व बन्धु शास्त्री)
मेरे मन में है, एक चुभन, ‘मैं क्या हूँ?’ मेरे मन में है, एक जलन ‘मैं क्या हूँ?,
मैं देख रहा हूँ, अगर मर रहा देखो- मेरे मन में है, एक तपन, ‘मैं क्या हूँ?’
मैं पास पास दिन-रात रहूँ, ‘क्या जानूँ?’ मैं कूल पास सरि-सरिस बहूँ, ‘क्या जानू?’
मैं मूल समीप वितान लताओं का हूँ- मैं पुण्य-पास सुख-वास बहूँ, ‘क्या जानू?’
है एक पेड़ के वासी, दोनों प्राणी। हैं एक नाम के नामी दोनों प्राणी॥
हैं एक, मगर अन्तर है थोड़ा सा ही- है अन्तरीय महदन्तर की आधानी॥
मैं जानूँ - तू हो जावे मैं ‘क्या जानूं?’ मैं मानूँ- तू हो जावे मैं ‘क्या जानूं?’
मेरी चिर-साध जभी हो जावे पूरी। मैं पाऊँ तू, ‘तू मैं, फिर ‘मैं, क्या जानूं?’
(डॉ. शिवरतन लाल त्रिपाठी)
योगात्संप्राप्यते ज्ञानं योगो धर्मस्य लक्षमणम्। योगः परं तपो ज्ञेयस्तस्माद्योगं समभ्यसेत॥1॥ नचतीव्रेण तपसान् स्वाध्यायैर्न चेत्यया। गतिं गन्तुँ द्विजाः शक्ता योगात्संप्राप्नुवन्तियाम्॥2॥
अत्रि सं
भावार्थ- योग से ज्ञान प्राप्त होता है, योग ही धर्म का लक्षण है, और योग ही परम तप है, इसलिए योग का अभ्यास करना चाहिए॥1॥ कड़ी तीव्र तपस्या, सर्वदा शास्त्रों के अध्ययन से जो गति नहीं मिलती है वह द्विजों को योगाभ्यास से मिल जाती है॥2॥
विदुर नीति में भी कहा है- “योगेन रक्ष्यते धर्मों विद्या योगेन रक्ष्यते” योग से विद्या और धर्म रक्षित होते हैं। फिर कहा है कि संसार के ताप से तपे हुए मनुष्यों को योग ही परम औषधि है “भव तापेन तप्तानाँ योगहि परमौषधम्”।
यजुर्वेद में कहा है कि -
सीरा युञ्जन्ति कवयो-युगा वितन्वते पृथक् धीरा देवेषु सुम्न्या।
य.अ. 12 मं. 67
अर्थ- (कवयः) जो विद्वान योगी लोग और (धीराः) ध्यान करने वाले हैं वे (सीरा सुञ्जन्ति) यथायोग्य विभाग से नाड़ियों में अपने आत्मा से परमेश्वर की धारणा करते हैं (युगः) जो योग युक्ति कर्मों में तत्पर रहते हैं (वितन्वते) अपने ज्ञान और आनन्द को विस्तृत करते हैं (देवेषुसुम्न्या) वे विद्वानों के बीच में प्रशंसित होकर परमानन्द को प्राप्त करते हैं। गीता में कहा है-
वेदषु यज्ञेषु तपः सुचैव, दानेषु यत्युण्यफलं प्रदिष्टम। अत्येति तत्सवंमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
गी.अ. 8 श्लोक 28
भावार्थ- योगी पुरुष इस रहस्य को तत्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दाना दिकों के करने में जो पुण्यफल कहा है उस सबको छलाँग जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि-
तपस्विभ्योऽधिको योगी, ज्ञानिभ्योऽपिमतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी, तरमाद्योगी भवार्जुन॥
भावार्थ- योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ और शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है इससे हे अर्जुन! तू योगी हो।
गी.अ. 6 श्लोक 46
योग भ्रष्ट पुरुष पुनर्जन्म मैं भी योगरत होता है। यदि योगी, योग को यथावत पूर्ण करने से पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो, तो उसका योग निष्फल नहीं जाता। जैसा कि भगवान कृष्ण जी ने कहा है-
प्राप्य पुण्यकृताँ लोकानुषित्वा शाश्वती समाः।
शुचीनाँ श्रीमताँ गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
अ.गी.अ. 6 श्लोक 41
अर्थ- योग भ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक वास करके शुद्धाचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।
अथवा योगिनामेव कुले भवित धीमताम।
एतद्धि दुर्लभतरंलोके जन्म यदीदृशम॥
भ.गी.अ. 6 श्लोक 42
अर्थ- वैराग्यवान् पुरुष उन लोकों अर्थात् लोगों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है परन्तु इस प्रकार का जो जन्म है सो संसार में निःसन्देह अति दुर्लभ है। इस विषय का वेदोक्त प्रमाण भी लिखते हैं-
विधेमते परमे जन्मन्नम्ने विधे मस्तोमेरैवरेसधस्थे।
यस्म द्योरुदारिथा यजेतं प्रत्वेहवीं षिजुहुरेस्ससिद्धे॥
यजु. अ. 17 मं. 75
भावार्थ- इस संसार में योग के संस्कार से युक्त जीव का पवित्र भाव से जन्म होता है, इस तरह संस्कार की प्रबलता से योग ही के जानने की चाहना करने वाले होते हैं। सब योगीजन जैसे अग्नि ईंधन को जलाता है वैसे ही समस्त दुख, अशुद्धि भाव को योग से जलाते हैं। इस मन्त्र से पुनर्जन्म भी सिद्ध होता है।
योग साधन की प्रधान सामग्री
ब्रह्मा विद्या के जिज्ञासु मुमुक्षु (स्त्री हो या पुरुष) सभी को योगाभ्यास करना उचित है। पूर्ण योगी होने के निमित्त उसको निम्नलिखित सामग्री बलपूर्वक प्राप्त करना चाहिए। श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा यह योग साधन सामग्री हैं। इसी के द्वारा पुरुष पूर्ण योगी होता है।
(1) ‘श्रद्धा’- परमात्मा में विश्वास पूर्वक दृढ़ भक्ति और प्रेमभाव तथा लोक और परलोक के विषयों में तृष्णा रहित योग में होने वाली रुचि को श्रद्धा कहते हैं।
(2) ‘वीर्य’- श्रद्धालु तथा विवेक के अर्थी पुरुष का योग सम्पादन के लिए जो उत्साह है उसको वीर्य कहते हैं।
(3) ‘स्मृति’- उत्साह वाले पुरुष को वेद अनुमान तथा अचार्य्योदेश से जाने हुए योग साधनों में होने वाले स्मारक का नाम स्मृति है।
(4) समाधि- समाहित चित्त अर्थात् चित्त की सावधानता तथा एकाग्रता समाधि कहलाती है।
(5) ‘प्रज्ञा’- निर्मल बुद्धि जिससे कठिन विषय भी शीघ्र समझ में आ सके तथा उससे किसी प्रकार का संशय (शंका) वा भ्रान्ति न रहे, ऐसी विमल ज्ञान कारिणी बुद्धि को प्रज्ञा जानो। इन उक्त पाँचों साधनों का अभ्यास करके मुमुक्षु जिज्ञासु योगीपने की योग्यता स्वरूप सामग्री प्राप्त करें। यहाँ श्रद्धा आदि उपायों का परस्पर कार्य करण भाव है। अर्थात् प्रथम श्रद्धा से वीर्य, वीर्य से स्मृति, स्मृति से समाधि और समाधि से ‘प्रज्ञा’ एवं प्रज्ञा से पर-वैराग्य (तृष्णा का त्याग करना) तथा परवैराग्य असम्ज्ञात समाधि होती है। उक्त श्रद्धा आदि साधनों वाले, योगियों के मध्य में जिनको शीघ्र असम्प्रज्ञात समाधि का लाभ होता है। पातंजलि महर्षि ने योगदर्शन में कहा है- “तीव्र संवेगानामासन्नः” पा. समाधि पा. सू. 21॥ अर्थात् तीव्र वैराग्य वाले योगियों को शीघ्र समाधि तथा फल कैवल्य (मोक्ष) का लाभ होता है।
(श्री. श्रीप्रकाश जी)
संगठित समाज में रहने वाले हर एक व्यक्ति के लिए जिम्मेदार रहना, अर्थात् हर काम में अपनी जिम्मेदारी अनुभव कर इस प्रकार से आचरण करना जिससे किसी को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से धोखा न हो, अत्यावश्यक है। बिना जिम्मेदारी के साथ प्रत्येक व्यक्ति का आचरण हुए कोई भी संगठित समाज कायम नहीं रह सकता। जिस प्रकार एक पेंच के ढीला पड़ जाने से सारी मशीन का कार्य रुक जाने का भय उपस्थित हो जाता है, उसी प्रकार कोई एक गैर जिम्मेदार आदमी सारे समाज में तहलका मचा सकता है। यदि हर आदमी को हर दूसरे की तरफ से यह विश्वास रहे कि वह अपने काम को ठीक तौर से करता रहेगा, तो समाज में कोई गड़बड़ी पैदा नहीं हो सकती। तभी समाज भी सुचारु रूप से चल सकता है। पर जब गैर जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न हो जाता है, जब एक दूसरे की तरफ से विश्वास उठ जाता है, तब समाज का ढाँचा टूटने लगता है। ऐसी अवस्था में यदि हमें संगठित समाज में रहना मंजूर हैं, तो हमें जिम्मेदार बनना पड़ेगा- अपनी जिम्मेदारी को हर क्षण अनुभव करते रहना पड़ेगा और उसके अनुरूप आचरण करना पड़ेगा।
बात हमें छोटी-सी मालूम पड़ती है और छोटी है भी, पर अन्य बहुत-सी छोटी छोटी बातों की तरह इसका पालन कठिन है और अधिकतर लोग चूकते ही रहते हैं। जिम्मेदारी शब्द की विवेचना करने से दो-तीन बातें स्पष्ट होती हैं। जो पुरुष जिम्मेदार कहा जा सकता है अर्थात् जो जिम्मेदारी के भाव से पूर्ण समझा जा सकता है, वह ऐसा पुरुष है जो अपना काम अच्छी तरह से जानता है। हर आदमी को इस संसार में कोई न कोई काम, समाज का उपयुक्त अंग बने रहने के लिए उठाना ही पड़ता है। जब तक कोई व्यक्ति अपना काम अच्छी तरह न जानेगा, तब तक वह जिम्मेदारी नहीं उठा सकता। हर व्यक्ति को अपने कार्य विशेष की तफसील अच्छी तरह जाननी चाहिए। तब वह उस कार्य के सम्बन्ध में जिम्मेदारी ले सकता है। अर्थात् वह समाज को यह विश्वास दिला सकता है कि यदि यह काम मेरे सुपुर्द किया जाय तो मैं इसे अच्छी तरह कर दूँगा। जब किसी को अपने काम का ज्ञान नहीं हो तब वह उसे कर ही कैसे सकता है।
जिम्मेदार आदमी के लिए दूसरी बात यह है कि जो कुछ वादा, छोटा या बड़ा वह करता है उसे वह पूरा करता है अर्थात् समाज को यह विश्वास दिलाता है कि मेरे ऊपर पूरा भरोसा किया जा सकता है। वह अपनी बात का सदा पालन करता है। अगर ऐसा विश्वास समाज के विभिन्न अंगों को एक-दूसरे के प्रति न रहे तो समाज विघटित हो जायगा। समाज के संगठन की दृढ़ता इसी पर निर्भर करती है कि उसके भिन्न भिन्न अंग जितने ही अधिक विश्वसनीय होते हैं उतना ही वह समाज अधिक सुसंगठित और सुदृढ़ रहता है। जिम्मेदारी का यह भी एक अंग है कि जो आदमी जिम्मेदारी उठाकर उसे पूरा न करे वह किसी न किसी प्रकार के दण्ड का भागी हो। यदि जिम्मेदारी पूरी न करने से भी अपनी कोई हानि न हो अर्थात् किसी न किसी रूप से अपने को दण्ड न मिले, तो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है और एक प्रकार से समाज का द्रोही बन जाता है। जिम्मेदारी का गुण केवल तथाकथित बड़े लोगों के लिए ही आवश्यक नहीं है। वह तो सभी के लिए बहुत जरूरी है। यदि आज भारतीय समाज में इतनी अव्यवस्था देख पड़ती है, तो इसका यही कारण है कि हम लोगों का आचरण ऐसा है कि कोई किसी पर विश्वास नहीं कर सकता। हम वायदे बहुत जल्द कर देते हैं, पर उन्हें जल्द ही भूल जाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम एक दूसरे के प्रति जानबूझकर बेईमानी करना चाहते हैं या किसी को धोखा देना चाहते हैं। पर तुम जिम्मेदारी की बारीकी को न समझकर उसे महत्व ही नहीं देते। इसका परिणाम बड़ा भीषण होता है। पर इसकी उपेक्षा कर हम अपने समाज का कुछ भी सुधार नहीं कर पा रहे हैं और जिस प्रकार के बन्धन में एक-दूसरे से बँधे रहना चाहिए वह ढीला होता जा रहा है।
हम प्रायः नित्य ही देखते हैं कि लोग जिम्मेदारी बहुत जल्द उठा लेते हैं। कितने ही लोग राह चलते फिरते हैं। उनसे कुछ बात होती है। वह झट कह देते हैं कि अमुक चीज भेज दूँगा, या अमुक सूचना दे दूँगा, या अमुक काम कर दूँगा। ऐसे अवसर पर जिससे यह बात कही जाती है उसको यह विश्वास करने का अधिकार है कि कहने वाला अपनी बात पूरी करेगा। पर हम सबको ही यह अनुभव है कि वह तात्कालिक सन्तोष देने मात्र के लिए ऐसी बातें कहता हैं। सम्भवतः उसे पूरा करने की उसकी भावना नहीं होती। कम से कम वह पूरा तो करता ही नहीं। जब यह स्थिति साधारण सी हो गई है तो सुनने वालों को भी कोई विश्वास नहीं रहता कि कहने वाला अपने वचन के अनुसार काम पूरा करेगा। और यदि वह कर देता है तो वास्तव में हमें आश्चर्य होता है। जिस पर भी ऐसे पुरुष के लिए हमारे मन में कोई आदर का भाव नहीं पैदा होता और अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने वाला आदमी साधारणतः ‘सनकी’ समझा जाता है। राह चलते की बात को छोड़कर यदि हम पेशेवर लोगों का व्यवहार देखें तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो जायगी। वकील, डॉक्टर, शिक्षक, राजकर्मचारी, व्यापारी, मजदूर, धोबी, भंगी, दर्जी आदि कोई काम उठाकर जिम्मेदारी के साथ उसका पालन न करें तो अवश्य आफत मच जाय, जैसी कि हमारे समाज में मची ही रहती है। क्योंकि पेशे वाले लोग भी अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते, अर्थात् वे अपना-अपना काम ठीक तौर से नहीं जानते और साथ ही यथासमय उसे उचित प्रकार से पूरा भी नहीं करते। हम सब एक दूसरे को दोष देते रहते हैं पर अपना दोष नहीं देखते और इस कारण अपना काम ठीक तौर से नहीं करते। इस प्रकार सारे समाज को हम खराब किये हुए हैं।
हमारी कुछ ऐसी मनोवृत्ति हो गई है कि हम जिम्मेदार होना कोई आवश्यक गुण नहीं मानते जिसके कारण हम बहुत सी बातें ऐसी बर्दास्त करते हैं जो समाज के लिए घातक होता है और जिन्हें दूसरे देशों में कोई भी व्यक्ति बर्दास्त करने के लिए तैयार नहीं होगा। यही कारण है कि हमारे यहाँ जो जिम्मेदारी पूरी नहीं करता उसके लिए कोई दण्ड व्यवस्था नहीं है। जो अपना वादा पूरा नहीं करता उसके कारण उसकी कोई हानि हो तो वह अपनी चाल छोड़ देगा। पेशेवर आदमी कहने को तो कहता है कि मेरे ऊपर विश्वास करो, मेरी जिम्मेदारी पर काम छोड़ दो, पर ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो वास्तव में अपनी जिम्मेदारी ठीक तौर से समझकर पूरी करते हैं। जब जिम्मेदारी पूरी न करने से उन्हें सजा नहीं मिलती और सजा उलटे उसको मिल जाती है जो उनकी बात में आ जाता है, तो स्थिति वास्तव में भयानक होती है। शिक्षक पढ़ाने की जिम्मेदारी लेकर, डॉक्टर दवा देने की जिम्मेदारी लेकर, वकील मुकदमा लड़ने की जिम्मेदारी लेकर अगर उसे पूरा नहीं करता तो जैसी स्थिति है उसमें उसकी कोई हानि नहीं होती- विद्यार्थी, मुवक्किल अथवा गरीब ही मारा जाता है। शिक्षक, वकील और डॉ. अपना पुरस्कार पा ही जाते हैं, चाहे विद्यार्थी, मुवक्किल और गरीब का कुछ काम हो या न हो। सरकारी कर्मचारियों के सम्बन्ध में तो यह बात और भी जोरों से लागू होती है। दर्जी, धोबी, भंगी आदि की शिकायत तो सबको ही रहती है। इसको क्या दोहराया जाय।
(पं. श्रीलालबीरामजी शुक्र, एम. ए.)
मैत्री- भावना का अभ्यास मनुष्य की द्वेषात्मक मनोवृत्ति के संस्कारों का विनाशक है। इसके द्वारा मनुष्य को मानसिक और शारीरिक- दोनों प्रकार का स्वास्थ्य-लाभ होता है। मैत्री-भावना के अभ्यास के ग्यारह लाभ बौद्ध ग्रन्थों में बतायें गये हैं। उनमें से मुख्य लाभ सुख की नींद सोना और प्रसन्नचित्त रहना तथा सभी का प्रिय होना है। हम जैसे विचार दूसरे लोगों के पास अनाचाय भेजते हैं। मैत्री भावना से प्रेरित होकर जो विचार दूसरे व्यक्ति के पास भेजे जाते हैं, वे उसका अवश्य लाभ करते हैं। ऐसे विचार हमारा लाभ भी करते हैं। यदि हम दूसरे लोगों को हृदय से प्यार करते हैं तो दूसरे लोग भी हमें हृदय से प्यार करने लगते हैं। मनुष्य के मन के आन्तरिक भाव किसी न किसी प्रकार प्रकाशित हो जाते हैं। अप्रकाशित होने की अवस्था में भी वे हमारे अनुकूल अथवा प्रतिकूल सृष्टि का निर्माण करते हैं।
मैत्री-भावना के अभ्यास के कई प्रकार हैं। जब किसी व्यक्ति के विषय में चर्चा की जाय, तब उसके विषय में उदार विचार ही प्रकट किये जायं। किसी व्यक्ति के विषय में हमारे आन्तरिक विचार उसके विचारों और आवरण को प्रभावित करते हैं। अतएव किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में प्रकाशित किए गए विचारों को व्यर्थ न समझना चाहिए। ऐसे विचार भी आचरण को प्रभावित करते हैं- चाहें वे प्रकाशित रूप से तब तक पहुँचे अथवा नहीं। हम दूसरे व्यक्तियों के विषय में जैसी चर्चा करते हैं, दूसरे की निन्दा करना अमैत्री-भाव का अभ्यास है। वह एक प्रकार ही हिंसा है। अतएव निन्दा को पाप माना गया है। जितना नुकसान किसी मनुष्य का उसका धन चुराकर किया जा सकता है, उससे कहीं अधिक नुकसान उसकी निन्दा से होता है। कितने रोजगारियों का रोजगार उनके नाम पर ही चलता है। उनकी किसी प्रकार निन्दा करना उन्हें आर्थिक हानि पहुँचाना है। इसी प्रकार समाज के कार्यकर्त्ताओं की काम में सफलता उनकी ख्याति पर निर्भर करती है। अतएव किसी व्यक्ति की निन्दा सुनने अथवा करने में भाग न लेना और उसके विषय में कुछ भली ही चर्चा करना मैत्री-भावना अभ्यास का एक रूप है।
मैत्री-भावना के अभ्यास का सामान्य रूप सबके प्रति शुभ कामना करना है। जिस व्यक्ति के प्रति हमारे मन में द्वेष-भावना है, उसके प्रति विशेष रूप से शुभ कामना करना उचित है। अपने मित्र के प्रति सभी लोग शुभ कामना करते रहते हैं, पर अपने शत्रु के प्रति विरला ही व्यक्ति शुभ कामना करता है। मनुष्य की दूसरे लोगों से शत्रुता अथवा मित्रता उसकी स्वार्थ-सिद्धि पर निर्भर करती है। जो हमारे स्वार्थ में साधक होते हैं, उन्हें हम मित्र के रूप में देखते हैं और जिन लोगों से हमारे स्वार्थ में बाधा प्रतीत होती है, उन्हें हम शत्रु रूप में देखते हैं। यदि हम अपने स्वार्थ को अलग करके किसी व्यक्ति की ओर देखे तो हम उसे न शत्रु पायेंगे और न मित्र। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी हमें मैत्री-भावना का अभ्यास करना चाहिए।
मैत्री-भावना का अभ्यास सोते समय करना सर्वोत्तम है। सोते समय के विचार मनुष्य के आन्तरिक मन को प्रभावित करते हैं। उनसे उसके स्वभाव का परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार के अभ्यास से उन गुणों का चरित्र में आविर्भाव होता है, जिनका अन्यथा आना असम्भव दिखाई देता है। सोते समय के मैत्री-भावना के विचारों से ही मनुष्य के स्वास्थ्य में सुधार होता है। अभद्र कल्पनाओं का विनाश भी इसी प्रकार होता है।
मैत्री-भावना के अभ्यास का एक रूप अपनी सहायता की आशा रखने वाले व्यक्ति की सहायता करना है। संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिन्हें हमारी सहायता अथवा सेवा की आवश्यकता है। इनकी सहायता और सेवा करना हमारा धर्म है। जो व्यक्ति संसार के कल्याण की भावना मन में लाते हैं, पर अपनी थैली से एक भी पैसा गरीब, दीन दुखियों की सहायता के लिए नहीं निकालते, वे अपने प्रति सच्चे नहीं हैं। ऐसे व्यक्तियों के सद्भाव निकम्मे होते हैं। त्याग ही हमारे भावों की सच्चाई की कसौटी है। यदि हम मैत्री भावना को सच्चा मानते हैं तो उसके अनुसार हमें अपना आचरण भी बनाना होगा। मनुष्य का जैसा आचरण होता है, उसके आन्तरिक विचार भी वैसे ही होते है जिस प्रकार विचारों का प्रभाव आचरण पर पड़ता है। आचरण और विचार एक दूसरे के सापेक्ष हैं।
मनुष्य दूसरे लोगों की सहायता धन से अथवा शारीरिक सेवा से कर सकता है। बीमार की सेवा करना मैत्री भावना के अभ्यास का एक रूप है। बुद्ध भगवान ने कहा है कि जो बीमार की सेवा करता है, वह मेरी ही सेवा करता है। रोगी व्यक्ति की सेवा से एक ओर रोगी व्यक्ति का मानसिक लाभ होता है और दूसरी ओर सेवा करने वाले का भी मानसिक लाभ होता है। जिस व्यक्ति को किसी प्रकार की बीमारी है, वह उसी प्रकार की बीमारी से पीड़ित जब किसी दूसरे व्यक्ति की सेवा करने लगता है, तब अपनी बीमारी से मुक्त होने लगता है।
कितने ही लोग सदा अपने आपके विषय में चिन्तित रहते हैं। वे जितना ही अधिक अपनी स्थिति को सुधारने की चेष्टा करते हैं, उनकी स्थिति उतनी ही और भी बिगड़ती जाती है। ऐसे व्यक्ति यदि अपने विषय में चिन्ता करना छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति की दयनीय दशा को सुलझाने में लग जायें तो वे अपनी दयनीय अवस्था से भी मुक्त हो सकते हैं। विचार करने से ही हमारे दुःख बढ़ते हैं। उन पर विचार न करने से बहुत से दुःख अपने आप ही शान्त हो जाते हैं। जिस व्यक्ति को दूसरों के दुःखों के विषय में सोचने से फुरसत नहीं मिलती, उसे अपने दुःख दुःख रूप ही नहीं दिखाई देते। वे जीवन की प्रयोगशाला के एक अंग बन जाते हैं। वह इन दुखों से आनन्द की ही प्राप्ति करता है।
मैत्री भावना के अभ्यास का एक परिष्कृत रूप सद्विचारों का निर्माण है। संसार में सद्विचारों के अभाव में कितने ही लोग दुखी हैं। यदि उनके विचारों में परिवर्तन हो जाय तो उनके दुखों का अन्त हो जाय। हमारे सद्विचार उन्हीं लोगों का सबसे अधिक लाभ करते हैं, जो हमें जानते हैं और जो सदा हमारे संपर्क में आते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी मानसिक उलझन में पड़ जाता है, तब उसे सहायता देना हमारा धर्म है। इस प्रकार की सहायता से उसमें उत्साह की वृद्धि हो जाती है। सच्चे मन से जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करना चाहता है, उसे सहायता करने का मार्ग मिल जाता है। निराशायुक्त लोगों को सद्विचार द्वारा सहायता देना और उनके मन में नई आशा का संचार करना समाज की सबसे बड़ी सेवा है। आशावादी मनुष्य ही संसार का कोई कल्याण कर सकता है। कितने ही लोगों को पत्र लिखकर कितनों को बातचीत के द्वारा और कितनों को लेखों और पुस्तकों के द्वारा अपने विचारों से लाभ पहुँचाया जा सकता है। ये मैत्री भावना के अभ्यास के कुछ प्रकार हैं।
(श्री हरिचन्द्र जोशी, प्रयाग)
मनुष्य जीवन में सफलता, असफलता, सुख, दुःख, जय, अजय, सभी कुछ उसकी मनोदशा, पर अवलंबित है। मानव जो कुछ भी इच्छा करता है वह उसे प्राप्त कर सकता है परन्तु उसके साथ आत्मविश्वास की नितान्त आवश्यकता होती है और जिस कार्य में आत्म विकास का अभाव होता है वह कार्य असफल होता है। मनुष्य के मन में बहुत सी सूक्ष्म क्रियाएं निरन्तर कार्यान्वित रहती हैं जो उसका भविष्य निर्माण किया करती हैं। अगर मानव उन क्रियाओं को उचित रूप से व्यवस्थित करे तो जीवन में बहुत कुछ गुणवत्ता से ही उपलब्ध कर सकता है।
मनुष्य के मन के कुछ विचार विशेष रूप से कार्यान्वित होते रहते हैं और उन्हीं के आधार पर उसकी मुखाकृति का निर्माण होता रहता है। मनुष्य चाहे जैसी मुखाकृति का निर्माण कर सकता है। उसके लिए मन में विशेष प्रकार के विचार का परिपालन करना आवश्यक होता है। आप जिस प्रकार की परिस्थिति अपने लिये उपयुक्त समझते हैं उसी प्रकार की मुखाकृति बनाने का प्रयत्न कीजिए अपने सम्मुख एक दर्पण लीजिए और तदुपरान्त हृदय में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार लाने का प्रयत्न कीजिए। आप देखेंगे कि आपकी मुखाकृति में उसी तरह परिवर्तन हो रहा है जिस तरह कि विचारों में। अब ध्यानपूर्वक देखिए कि किस विचार का स्मरण करने से आपकी मुख मुद्रा सुन्दर प्रतीत होती है बस उसी विचार को नोट कर लीजिए। उसके उपरान्त उसी विचार को बार बार स्मरण करिए, और उसी विचार-धारा से सम्बन्धित पुस्तकों का अध्ययन करिए, उन्हीं विचारों पर वार्तालाप करिए, तात्पर्य यह है कि उस प्रकार के विचार में आप निमग्न हो जाइए। आप देखेंगे कि कुछ दिनों उपरान्त आपकी मुख मुद्रा में परिवर्तन होना प्रारम्भ हो गया है और बहुत शीघ्र आपकी मनोवाँछित मुखाकृति विनिर्मित हो गई है। उदाहरणार्थ आप निम्नाँकित विचार प्रयोग में लाना चाहते हैं- “यह जीवन खुशी का है इसलिए मैं हर समय आनन्दमय रहता हूँ।” बस जैसे ही यह विचार मन में प्रवेश किया वैसे ही आपकी मुखमुद्रा पर कुछ आनन्द व खुशी की धूमिल रेखाएँ अंकित हो जावेंगी। आपके मुख मंडल पर खुशी व आनंद की झलक आ जावेगी, मुखाकृति सुन्दर दृष्टिगोचर होगी। इस प्रकार की विचारधारा को बार-बार दुहराने के कुछ ही समय में सुन्दर मुखाकृति का आगमन हो जाता है। इस विचार का प्रतिफल केवल मुखाकृति परिवर्तन तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि करीब-2 पूर्ण जीवन पथ ही बदल देता है।
खुशी व आनन्द की विचार-धारा द्वारा आप अपने हृदय में नव-उत्साह का संचार अनुभव करेंगे। प्रत्येक कार्य आप उत्साह से करेंगे इससे आपको खुशी व आनन्द प्राप्त होगा और उन घटना चक्रों का आपके जीवन में अन्त हो जावेगा जिससे आप कष्ट अनुभव करते हैं और अगर कष्टदायक घटना आपके जीवन में घटित होगी तो भी आप दुःख अनुभव नहीं करेंगे। साथ ही साथ जीवन की बहुत सी असफलताएँ नष्ट हो जावेंगी और सफलताओं की संख्या में अभिवृद्धि होगी।
किसी मनुष्य की विचार-धारा के अनुकूल ही उसके आस पास का वातावरण निर्माण होता है। वैसे ही मित्र मिलते हैं वैसी ही परिस्थितियाँ निर्माण होती हैं। अगर आप यह निरन्तर विचार किया करते हैं कि मैं सत्पुरुष बनूँगा तो आपके गुण, कर्म, स्वभाव वैसे ही बनने लगेंगे और एक दिन ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जायेगी कि आप अपने लक्ष को प्राप्त करके रहेंगे। परन्तु इन विचारों के साथ साथ आत्म-विश्वास और क्रियाशीलता नितान्त आवश्यक है। इनके बिना अभीष्ट सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।
भले और बुरे, विद्वान और मूर्ख, निर्धन और धनी व्यक्ति उनकी मुख-मुद्रा द्वारा आसानी से पहचान लिए जाते हैं क्योंकि उनके विचारों में उतनी ही भिन्नता होती है जितनी कि उनके बाह्य रूप में। अगर आप अपने विचारों का स्तर सुविकसित व्यक्तियों के बराबर ले आवेंगे तो आपकी मुखाकृति की भी वैसी ही झलक आवेगी। वह प्रस्फुटित होगी, प्रारम्भ होगी और फलतः कुछ ही दिनों में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जावेंगी जो आपको श्रेष्ठ पुरुष बनाकर ही छोड़ेंगी। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य के विचारों में पदार्थ को खींचने की शक्ति विद्यमान रहती है। अतः आप जिस तरह के विचार रखेंगे उसी तरह के पदार्थ आपकी ओर अपने आप आकर्षित होते रहेंगे। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में इतनी उन्नति की है कि उन्होंने विचारों के चित्र तक ले लिए हैं। विचारों की शक्ति महान है इसके द्वारा मनुष्य संसार में बहुत कुछ कर सकता है परन्तु स्मरण रखिए उसके साथ साथ कर्म की भी आवश्यकता है। विचार शक्ति उन्नति का सही मार्ग प्रदर्शन कर उसमें सफलता प्रदान करा सकती है परन्तु कर्म तो मनुष्य को करना ही पड़ेगा।
विचार-शक्ति विश्व की एक महान शक्ति है। इस शक्ति द्वारा मनुष्य बहुत कुछ कर सकता है। सिकन्दर ने आधा विश्व किस शक्ति से जीता? नेपोलियन वीर पुरुष क्यों कहलाया? चन्द्रगुप्त का साम्राज्य कैसे फैला? विचार शक्ति ने ही इन मनुष्यों को इतना कर गुजरने का अवसर किया। उनकी सफलता उनके आत्म विश्वास और पुरुषार्थ में सन्निहित थी। जिस सफलता को मनुष्य संसार में महान बनाना चाहते हैं उन्हें अपनी विचार शक्ति को सुन्दर व सुसंगठित बनाकर आत्म-विश्वास एवं पुरुषार्थ से संसार में उन्नति करने होंगे।
साधन, परिस्थितियाँ, सुविधाएँ तथा दूसरों की सहायताएँ बहुधा लोगों को ऊँचा उठाती हैं पर इनका उपलब्ध होना उसी के लिए सम्भव है जिसकी मनोभूमि अनुकूल हो। अविचारी व्यक्ति को उपरोक्त बातें यदि पैतृक परिस्थितियों के कारण सहज ही मिल जायं तो भी वह उनसे समुचित लाभ नहीं उठा सकता। अनेकों अमीरों के लड़के बाप दादों की कमाई हुई लक्ष्मी तथा प्रतिष्ठा का लाभ नहीं उठा पाते और अपनी मूर्खता से थोड़े ही दिनों में उसे बरबाद कर देते हैं। इसके विपरीत अनेकों ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो निर्धन एवं साधक हीन परिस्थितियों में जन्म लेकर भी अपनी मानसिक प्रतिभा के द्वारा अनुकूल वातावरण उत्पन्न करते हैं और उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचते हैं।
यह निश्चित है कि विचार शक्ति से सुसम्पन्न मनुष्य हीन परिस्थितियों में न रहेगा, वह अनेक कठिनाइयों और बाधाओं के होते हुए भी ऊपर उठेगा। प्रतिकूलताएँ अनुकूलता से बदलेंगी और उस दिशा में दिन दिन प्रगति होगी जो उसने अपने लिए चुनी है। दिशा चाहे अच्छी हो चाहे बुरी, प्रगति विचार शक्ति पर ही निर्भर है। यदि हम विचारों का महत्व भली प्रकार समझलें और आत्म विश्वास तथा पुरुषार्थ के साथ उसे कार्य रूप में परिणित करना आरम्भ कर दें तो निस्संदेह हमारी उन्नति के अवरुद्ध मार्ग स्वयं ही खुल सकते हैं।
भिक्षुओं! क्या मैं अकेला ही इस ज्ञानानन्द का अनुभव करूं? भावी संतान को जब ज्ञात होगा कि सिद्धार्थ ने अपूर्व ज्ञान लाभ किया था और उसने वह किसी दूसरे को नहीं दिया तो वे मुझे क्या कहेंगे? जाओ, चारों दिशाओं में जाकर संतप्त-हृदय संसारी जनों को धर्म का उपदेश कहो। सब अकेले अकेले एक एक मार्ग से जाना, कहीं दो आदमी एक साथ न जायं।
प्रपूरय धर्मशंखं, प्रताडय धर्मदुन्दुभिं। प्रसारय धर्मध्यजाँ, धर्मं कुरु, धर्मं कुरु॥
-धर्म का शंख फूँक दो, धर्म का डंका बजा दो, अखिल विश्व में धर्मध्वजा फहरा दो। धर्म करो, धर्म करो, धर्म करो!!!
भिक्षुओं! सुनो, यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की निन्दा करे, तो क्या तुम लोग कुपित और खिन्न हो जाओगे और इसकी जाँच भी न करोगे कि उन लोगों के कहने में क्या सच बात है और क्या झूँठ? तो इसमें तुम्हारी ही हानि होगी। तुम लोगों को सच और झूँठ बात का पूरा पता लगाना चाहिए कि क्या यह बात ठीक नहीं है? क्या वह बात हम लोगों में बिलकुल नहीं है?
भिक्षुओं! और यदि कोई मेरी, धर्म की या संघ की प्रशंसा करे, तो तुम लोगों को न आनन्दित न प्रसन्न और न हर्षोत्फुल्ल हो जाना चाहिए। यदि कोई प्रशंसा करे, तो तुम लोगों को सच और झूँठ बात का पूरा पता लगाना चाहिए कि क्या यह बात ठीक है? यह बात हम लोगों में है और यथार्थ में है? और देखो, तुम स्वयं किसी की निन्दा न करो। सबको उचित सम्मान दो। यह कभी न भूलो कि-
येचा बुद्धा अतीता च येच बुद्धा अनागता। पच्चुप्पन्ना च ये बुद्धा अहं वन्दामि सब्बदा॥
वो भी भूतकाल में बुद्ध (जागृत) रहे है, जो वर्तमान काल में बुद्ध हैं और जो भविष्य में बुद्ध होंगे, मैं उन सबको प्रणाम करता हूँ।
“प्रेरितो! ईश्वर की आत्मा का समावेश मुझ में है। क्योंकि उसने निर्धनों को शुभसंदेश की शिक्षा देने की मुझे दीक्षा दी है। उसने कैदियों के लिये छुटकारे की घोषणा कर देने के लिए मुझे भेजा है और इसलिए भी मुझे भेजा है कि मैं अंधों को फिर से दृष्टि प्रदान करूं, पीड़ितों को छुटकारा दूँ’ तथा सर्वपूज्य प्रभु के राज्य की घोषणा कर दूँ।”
विश्वपिता के सुपुत्रों! चलते चलते प्रचार कर कहो कि, स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। तुमने मुफ्त में पाया है मुफ्त में दो। अपने बटुओं में न सोना, न रुपया, न ताँबा रखना। मार्ग के लिये न झोली रखो, न कुरते, न जूते, न लाठी लो, क्योंकि मजदूर को अपना भोजन मिलना चाहिये।
देखो, मैं तुझको भेड़ों की नाइ भेड़ियों के बीच भेजता हूँ, सो साँपों की नाइ बुद्धिमान और कबूतरों की नाइ भोले बनो। पर लोगों से चौकस रहो, क्योंकि वे तुम्हें महासभाओं में सौंपेंगे और अपनी पंचायतों में तुम्हें कोड़े मारेंगे। जब वे तुम्हें सौंपे तो यह चिन्ता न करना कि किसी रीति से या क्या करोगे। क्योंकि जो कुछ तुमको कहना होगा, वह उसी घड़ी तुम्हें बता दिया जावेगा। क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो पर तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलने वाला है। मेरे नाम के कारण सब लोग तुमसे बैर करेंगे, पर जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा। चेला अपने गुरु से बड़ा नहीं। जब उन्होंने घर के स्वामी को शैतान कहा तो उसके घर वालों को क्यों न कहेंगे? सो उनसे न डरना, क्योंकि कुछ ढ़का नहीं जो खोला न जायेगा और न कुछ छिपा है जो माना न जायेगा। माँगों तो तुम्हें दिया जायेगा, ढूंढ़ो तो तुम पाओगे। लो मैं तुमसे अंधेरे में कहता हूँ, उसे उजाले से कहो और जो कानों कान सुनते हो उसे होठों पर से प्रचार करो।
जो शरीर का घात करते हैं पर आत्मा का घाव नहीं करते, उनसे न डरना, पर उसी से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में डाल सकता है। जो अपना प्राण बचाता है वह उसे खोयेगा और जो मेरे इस कार्य के कारण अपना प्राण खोता है वह उसे बचायेगा। जिसके हृदय में मेरे अनुकरण की इच्छा हो, उसे चाहिए कि अपने जीवन को सर्वथा विस्मृत कर दे और अपनी सूली उठाकर निर्भयतापूर्वक मेरे पीछे चले। तुम सुन चुके हो कि कहा गया था कि अपने पड़ौसी से प्रेम रखना और अपने बैरी से बैर। पर मैं तुम से कहता हूँ कि अपने बैरियों से भी प्रेम रखना और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करना। इससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर सूर्य उदय करता है और धर्मियों और अधर्मियों-दोनों पर मेंह बरसाता है। वैद्य की आवश्यकता भले-चंगों के लिये नहीं, बीमार के लिये है। तुम जाकर इसका अर्थ सीखो कि मैं दया चाहता हूँ, बलिदान नहीं। क्योंकि मैं धर्मात्माओं को नहीं, बल्कि पापियों को पश्चाताप के लिये बुलाने आया हूँ।
चौकस रहो, तुम मनुष्यों के सामने दिखाने के लिए अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो अपने स्वर्गीय पिता से कुछ फल न पाओगे। इसलिये जब तू दान करे तो अपने आगे तुरही न फुँकवा ओर जब तू प्रार्थना करे तो वह दाँभिकों के समान न हो। तुम इस रीति से प्रार्थना करना- “हे हमारे स्वर्गीय पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाये, तेरा राज्य आये। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती हो वैसी पृथ्वी पर भी सुफलित हो। हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे और जैसा हमने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही हमारे अपराधों को क्षमा कर और हमें परीक्षा में न ला, बल्कि बुराई से बचा।”
तुम यह चिन्ता भी न करना कि क्या खायेंगे और क्या पियेंगे? तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें यह सब वस्तुएँ चाहियें। परन्तु पहले उसके राज्य और धर्म की खोज करो, फिर ये सब चीजें मिल जायेंगी, तो कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल अपनी चिन्ता आप करेगा। आज का दुःख ही आज के लिये बहुत है।
यह चिन्ता भी न करो कि हमारा प्रचार सफल ही क्यों न रहा? देखो, एक बोने वाला बीज बोने निकला। बोते हुए कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और पक्षियों ने आकर उन्हें चुग लिया। कुछ पथरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्हें बहुत मिट्टी न मिलने से वे जल्द उग आये पर सूरज निकलने पर वे जल गए और जड़ न पकड़ने से सुख गये। कुछ झाड़ियों में गिरे और झाड़ियों ने बढ़कर उन्हें दबा डाला। पर कुछ अच्छी भूमि पर गिरे और फल लाये, कोई सौगुना, कोई साठ गुना, कोई तीन गुना। जिसके कान हो वह सुन ले।
धन्य है वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य है वे जो शोकानुभव करते हैं, क्योंकि वे शाँति पायेंगे। धन्य है वे जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे। धन्य है वे जो धर्म के भूखे-प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किये जायेंगे। धन्य है वे जो दया तंत्र हैं, क्योंकि उन पर दया की जायेगी। धन्य है वे जो दिल से विशुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर का दर्शन करेंगे। धन्य है वे जो मेल कराने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे। धन्य है वे जो धर्मप्रचार के कारण सतायें जाते हैं, क्योंकि स्वर्गीय राज्य उन्हीं का है।
- महात्मा ईसा मसीह
ऐ संदेशवाहकों! तुम सब एक ही महान जाति के सदस्य हो। धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है पथभ्रष्टता से बचने का- सन्मार्ग पर चलने का आदेश प्रकट हो चुका है। जो चाहे मोमिन (सदाचारी) बने और जो चाहे काफिर (दुराचारी) बने। यदि तुम्हारा परमेश्वर चाहता तो संसार में जितने लोग हैं, सब ईमान ले जाते। क्या तुम लोगों को मजबूर करेंगे कि वे मोमिन हो जायें? मगर, सचाई का प्रचार करने के लिए तो सबको प्रयत्न करना चाहिए। अपने ईश्वर के मार्ग की ओर लोगों को बुद्धिमत्ता और उपदेशपूर्वक बुलाओ तथा उनके साथ समुचित रूप से धार्मिक वार्तालाप करो।
यदि इन लोगों ने तुम्हें झुठलाया तो तुमसे पहिले भी बहुत से देवदूत झुठलाये जा चुके हैं जो कि चमत्कार, संदेश और दिव्य किताबें लेकर आये थे। तुम उसी प्रकार धैर्य धारण करो जिस प्रकार तुमसे पूर्व के आदर्शवादी देवदूतों ने धैर्य धारण किया और इनके लिए जल्दी न करो। तुम हिम्मत न हारो और चिन्ता न करो, यदि तुम आचारवान हो तो तुम्हारा सिर ऊँचा रहेगा।
गुरुपुत्रों! आज से एक गुरुदेव ही तुम्हारे पिता, जातिवर्ण और देवता है। आप सब चार वर्णों के लोग भाई भाई हैं- एक ही धर्म के हैं। सब पृथक् पृथक् धर्म मार्गों को छोड़िये और एक ही प्रेम के मार्ग पर पैर धरिये। अपने आपको किसी दूसरे से बड़ा न समझे। खालसा धर्म के आप सब भाई बन कर रहें। याद रखिये मौत पहले बनी है और शरीर पीछे। मौत आयेगी अवश्य एक दिन, इसलिए मत डरो मौत से। सदा तैयार रहो मौत के लिए। रूह और तलवार के अमृत कुण्ड से नया जन्म पाओ। नया जन्म लिये बिना, यह मुर्दा कौम अब जी नहीं सकती है। खालसा! प्रजा इस समय मृतक समान खोई हुई है, राजा लोग ईर्ष्या में फँसे पड़े हैं। यदि आप जो सब भाग रहे हैं, अब न उठे तो सृष्टि मर मिटेगी और यदि आप अब अपने सिंहनाद के साथ गरज पड़े तो सारी दुष्टता विलय जायगी, मुर्दे जी उठेंगे और वह समय आयेगा जब तुम्हारे कारनामों को सब जगत सराहेगा।
-गुरु गोविन्द सिंह जी
अब एकान्त में ही संकीर्तन करते रहने से काम नहीं चलेगा। अब हमें नगर-नगर और घर घर में हरिनाम का प्रचार करना होगा। परन्तु याद रहे, प्रचार करते समय पात्रापात्र अथवा छोटे बड़े का कुछ भी ख्याल न कर पण्डित से लेकर मूर्ख तक सबको समभाव से स्थान देना ही उचित हैं। भगवान् पतितपावन है, इसे कभी न भूलो।
-श्री चैतन्य महाप्रभु
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
जब मन में पुरानी दुखद स्मृतियाँ सजग हों, तो उन्हें भुला देने में ही श्रेष्ठता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है, जितना अच्छी बात का स्मरण करना। जब खेत में घास फूस उग आती है, तो आप उसे उखाड़ फेंकते हैं। घृणित, क्रोधी, ईर्ष्यालु, व्यथाजनक स्मृतियाँ उन्हीं कंटकों की तरह हैं, जो अन्तःकरण रूपी उद्यान की पवित्रता को नष्ट करती हैं। उत्पादक शक्ति का क्षय कर देती हैं। हम घृणित चिन्ता जनक अनुभूतियों को पुनः पुनः यादकर अपने चहुँ ओर एक मानसिक नरक निर्मित कर उसी में दुखी पीड़ित होते हैं।
बुद्धिमानी इसी में है कि इन दुखद प्रसंगों की ओर से मन हटा लिया जाय। जब हम उस ओर से मनोवृत्ति हटा लेंगे, तो निश्चय ही हमारा इस नरक से साथ छूट जायगा। विस्मृति का प्रभाव बड़ा मंगलदायक है। ज्यों ही हम पीड़ा, दुख और वेदना की स्मृतियों को कल्पित मचों से अपना सम्बन्ध तोड़ते हैं, त्यों ही हम अन्धकार से प्रकाश की ओर चलना प्रारम्भ कर देते हैं। जब तक मनुष्य का मन व्यथा, पीड़ा रोग, कष्ट, भव आदि से परिपूर्ण रहता है, तब तक उसका पौरुष प्रकट नहीं होता है। उसकी दैवी कल्याणकारी शक्ति पंगु बनी रहती है।
पं. रामलला पहाड़ा का मत माननीय है, “जब जब आपके मन में अनिष्ट भाव प्रकट हों, तब उनको हटाना और भुलाना ही बुद्धिमानी का कार्य है। दुर्बलता, दीन हीनता, भय और कष्ट को भुलाना कठिन है, परन्तु ईश्वर का स्मरण सरल है.... यदि हम कल्पित बन्धनों को तोड़ डालें, तो ईश्वर सहायता देगा। उसके प्रति मन फेरते ही वह अद्भुत एवं अदृश्य रीति से सहायता करता है। हमें इसका कुछ ज्ञान भी नहीं होने पाता।”
अमेरिका के एक प्रमुख डॉक्टर ‘मेडिकल टाक’ नामक पत्र में लिखते हैं कि “वर्षों के अनुभव के बाद मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि दुःख और चिन्ता दूर करने के लिए ‘भूल जाओ’ से बढ़कर कोई दवा नहीं है।” अपने लेख में वे लिखते हैं-
“यदि तुम शरीर से; मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो, तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।”
नित्य प्रति के जीवन में छोटी मोटी चिन्ताओं को लेकर झींकते मत रहो। उन्हें भूल जाओ। उन्हें पोसो मत। अपने अव्यक्त या अन्तःस्थल में पालकर मत रखो। उन्हें अन्दर से निकाल फेंको और भूल जाओ। उन्हें स्मृति से मिटा दो।
माना कि किसी ‘अपने’ ने ही तुम्हें चोट पहुँचाई। तुम्हारा दिल दुखाया है। सम्भव है जान बुझकर उसने ऐसा नहीं किया है, और मान लो कि जानबूझकर ही उसने ऐसा किया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़ बुन में लगे रहोगे? इस चिन्तित मन की अवस्था से क्या तुम्हारे मन का बोझ हलका होगा? अरे भाई, उन कष्टदायक अप्रिय प्रसंगों को भुला दो। उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कार्यों में मन को केंद्रीभूत कर दो। पुरानी कटु स्मृतियों को लेकर चिन्ताओं का जाल मत बुनने लगो। अपनी पीड़ाओं, दुःख तकलीफों को भूलो। कौन ऐसा है, जिसे दुख तकलीफें नहीं है। भूल जाओ, उधर से चित्त हटा लो, चिन्ता से आंखें फेरकर आशा की ओर लगाओ कटुता से मन मोड़ लो।
दूसरों के प्रति तुम्हारे मन में घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, दुर्भाव आदि के जो घाव हैं, उनमें भीतर मवाद भर रहा है, और यह तुम्हारे ही शरीर, मन, प्राण में भयंकर मानसिक विष उत्पन्न कर रहा है। क्यों इस जहर से आत्म हत्या करते हो? जीवन का आनन्द क्यों नहीं लेते? फिर क्यों न इन तमाम बातों को अपने दिल से निकाल फेंको, हृदय से बहा डालो। तुम देखोगे कि जो जीवन के उज्ज्वल पक्षों पर स्थिर रहने से तुम्हारे भीतर ऐसी पवित्रता, ऐसी सफाई आयेगी कि तुम्हारा शरीर और मन पूर्णतः स्वस्थ और निर्बल हो जायगा.... इन वेदनाओं के विषय में पुनःपुनः सोचकर क्यों अपने हाथों अपनी हत्या कर रहे हो? शायद तुम इन बातों को नहीं जानते। इसलिए तो कहता हूँ- चिन्ताओं को भूल जाओ, कटु अनुभूतियों को विस्मृत कर दो।
और बड़े बड़े संकट, विपत्ति, दुख के समय क्या करें? यदि हमारे ऊपर दुःखों का पर्वत टूटा हो, विपत्ति में बिजली गिर पड़ी हो, किसी ने हमारे सत्यानाश की युक्तियाँ सोची हों, और कोई हमारा परम प्रिय व्यक्ति हमें तड़पता हुआ छोड़कर मृत्यु के मुख में समा गया हो- ऐसे अवसरों पर जब हमारा घाव गहरा और मर्मान्तक है, हम क्या करें? क्या उन्हें भी भूल जायें, विस्मृत कर डालें? हाँ हाँ, उन्हें भी भूल जाओ। धीरे धीरे ही सही, किन्तु विस्मृत कर दो उन्हें भी। इसी में तुम्हारी भलाई है। भविष्य में इससे तुम अधिक से अधिक सुख पाओगे शान्ति पाओगे।
और मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ, सच मानो कि दुखों का भार उतार डालना कतई मुश्किल नहीं है। बड़ा ही आसान है। शुरू शुरू में आदत डालने में कुछ समय लगेगा, संभव है कुछ कठिनाई भी हो, लेकिन आदत पड़ जाने पर बात की बात में तुम बड़ी से बड़ी चिन्ता को चुटकियों पर उड़ा दोगे और इस प्रकार भूल जाने या भुला देने में तुम इतने अभ्यस्त हो जाओगे कि जीवन को दुखमय और विषाक्त कर देने वाली तमाम बातें तुम्हारे सामने आते ही काफूर हो जायेंगी।
भूलना सीखो। यदि शरीर का स्वास्थ्य और मन की शान्ति अभीष्ट है तो भूलना सीखो। चिन्ता से मुक्ति पाने का सर्वोच्च उपाय दुखों को भूलना ही है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा, बी.ए.एल.एल.बी.)
मनुष्य के दैनिक व्यवहार में ऐसी अनेक भूलें हैं, जिनसे उनका जीवन विषाक्त बनता है और व्यवहार में कटुता उत्पन्न होती है। सर्वप्रथम भूल यह है कि हम दूसरों को बरबस अपनी तरह विश्वास, मत, स्वभाव एवं नियमों के अनुसार कार्य करने और जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं। मान लीजिये, आप घर के सबसे बड़े सदस्य हैं। आप सुशिक्षित सुरुचिपूर्ण व्यक्तित्व के व्यक्ति हैं। अपने नीचे के व्यक्तियों का सुधार करने उन्हें अपने मतानुसार ढालने को बाध्य करते हैं, किन्तु आप देखते हैं कि आपकी बातें नहीं मानी जाती, थोड़े बहुत आचरण सुधारने के अतिरिक्त आपके मत को कोई नहीं सुनता। तर्कपूर्ण और उत्तम होते हुए भी इन सूचनाओं की अवहेलना की जाती है। चूँकि आपकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता, आप मन में दुखी अतृप्त से रहते हैं। मन भारी भारी सा रहता है। दूसरों को बरबस सुधार डालने, अपने विचार या दृष्टिकोण को जबरदस्ती थोपने की भूल कदापि न करें। आप बाह्य जोर डालकर, डरा धमकाकर अथवा अन्य ऊपरी उपायों से अपने परिवार, आफिस स्कूल या ग्राहकों के स्वभावों को नहीं बदल सकते।
स्मरण रखिए, मनुष्यों के स्वभाव, रुचि, दृष्टिकोण, रहने सहने के ढंग और विचार पद्धतियाँ भिन्न भिन्न हैं। आप जैसे हैं, वैसा दूसरा कोई नहीं है। सबका आन्तरिक वातावरण एवं मानसिक संस्थान पृथक-पृथक है। जन्म से एक ही परिवार में रहने वाले भाई-भाई या बहिन-बहिन में हर बात की पृथकता है, जीवन के भिन्न-भिन्न आदर्श हैं। आत्म विश्वास या मानसिक विकास के स्तर भी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही निर्धारित करता है। एक स्तर से विकास का दूसरा स्तर पार करने में पृथक समय लगेगा अतः मनोवैज्ञानिक मार्ग यह है कि आप दूसरों को प्रेममय संदेश भाव ही देते रहें, पर उनके निश्चय में, कार्य व्यापार में पूर्ण स्वतन्त्रता हो। बन्धन द्वारा मानव की प्रतिभा तथा मौलिकता का ह्रास होता है। अधिक नियन्त्रण से मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। जबरदस्ती करने से दूसरे व्यक्ति में विरोध की भावना उत्पन्न होती है। सुधारक एवं जिसका सुधार दृष्ट है- दोनों का जीवन रसहीन हो जाता है और इनके विरोध में क्रोध, असन्तोष एवं उत्तेजना का जन्म होता है। मनुष्य की यह प्रकृति है कि वह नियन्त्रण एवं बन्धन के विरुद्ध बगावत करता है, पर प्रेममय संकेत, मुस्कराते हुए सुझाव स्वीकार कर लेता है।
स्मरण रखिए, मनुष्य अपनी सहज वृत्तियों के बल पर साँसारिक जीवन व्यतीत करता है। उसके अन्तःकरण में जो आदतें प्रारम्भ से बनी हैं, उन्हें पूरा करने, वैसे ही रहने, खाने पीने में आनन्द का अनुभव करता है। हम में से प्रत्येक के आनन्द प्राप्त करने के ढंग भिन्न भिन्न हैं। हमारा बन्धन और नियन्त्रण उसके आन्तरिक जीवन में बाँधा उपस्थित करता है।
नील नामक मनोवैज्ञानिक ने बच्चों के लिए “फ्रीडम स्कूल” (अर्थात् स्कूल में छोटे बच्चों को पूर्ण स्वतन्त्रता देकर केवल प्रेममय संकेत द्वारा शिक्षण) की योजना रखी है। उनके अनुसार बच्चे जैसे चाहे रहें, पढ़े या न पढ़ें, कक्षाओं में जायें या न जायें, उनका वृत्तियाँ दिलचस्पी उत्पन्न कर आत्म विश्वास की और लगाई जायें। उन्हें अपने आप, कम से कम बाधा उत्पन्न कर शिक्षित होने दिया जाय। यदा कदा प्रेममय संकेत दे दिये जाया करें। इस योजना के परिणाम बड़े सफल रहे हैं। अनुचित बन्धन, डाट फटकार, मारपीट, जुरमानों से बचकर बच्चों में आत्मविश्वास की रुचि उत्पन्न हुई है। केवल उत्साहवर्द्धक संकेतों से उनमें खुशी अपने कार्य अच्छी तरह समाप्त करने की आदतों का विकास हुआ है।
मनुष्य का अनुभव ही सर्वोत्तम शिक्षक है। हम अपने कटु मृदु अनुभवों के आधार पर स्वयं ज्ञान प्राप्त करते हैं। विश्व के संकट धीरे-धीरे मनुष्य को जो ज्ञान प्रदान करते हैं, यह ठोस स्थायी ज्ञान हैं। जिस व्यक्ति का सुधार करना है, उसे परोक्ष रूप से उसकी गलती का अनुभव कराइए, प्रेमपूर्ण संकेत दीजिए पर सावधान! बन्धन या अनुचित नियन्त्रण दबाव मत आने दीजिए। वास्तव में हम स्वयं अपने अनुभव से, नाना टक्करें खा खाकर बातें सीखते हैं।
अनेक व्यक्ति स्वयं अर्जित बल पर ही जीवन-निर्माण कर सकते हैं। यदि इन्हें साधारण स्कूलों में पढ़ाया जाता, तो सम्भव था, वे इतने स्थायी विद्वान न बन पाते। उनकी शिक्षा में किसी बन्धन या नियन्त्रण ने कार्य नहीं किया। शेक्सपीयर किसी स्कूल में नहीं पढ़े थे। उपन्यासकार डिकिन्स के विषय में कहा जाता है कि लन्दन की गलियाँ उसकी विश्वविद्यालय थी। रविन्द्रनाथ ठाकुर जैसे महान कवियों के व्यक्तित्व का ज्ञान उनके वैयक्तिक अनुभवों के बल पर हुआ था। प्रकृति देवी के साक्षात संसर्ग में आये और उसी के द्वारा उन्हें संसार का वह अनुभव प्राप्त हुआ, जिसके द्वारा उनकी ईश्वर प्रदत्त सर्वतोमुखी प्रतिभा विकसित हो सकी। मनुष्य एक जीवित पिंड है। इसे कोई नर साँचे में नहीं डाल सकता। उसकी वैयक्तिक रुचि और अंतःप्रेरणा के आधार पर ही उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।
स्वतन्त्रता मनुष्य की सुषुप्त आन्तरिक शक्तियों को जागृत करती है, बन्धन और नियन्त्रण उसका ह्रास करता है। प्रत्येक व्यक्ति का आन्तरिक जीवन स्वभाव, आदतें, रुचि, संस्कार ही उसके जीवन का ध्रुव तारा है। फूल के समान उसे स्वयं मौलिकता से खिलने, विकसित होने दीजिए। चतुर माली की तरह प्यार से उसे दुलराइये, प्रोत्साहित कीजिए, प्रेममय संकेत दीजिए किन्तु सावधान! दूसरे को अपने स्वभाव या रुचि के अनुसार जीवन व्यतीत करने को बाध्य मत कीजिए। बन्धन और नियन्त्रण उसकी कार्य शक्तियों को पंगु कर देगा।
आप स्वयं जैसा चाहें कार्य करें, जैसे चाहें जीवन व्यतीत करें, खाएँ पीएँ, किन्तु दूसरों को उनके स्वभाव एवं आदत के अनुसार जीने दीजिए। दूसरों के आनन्द प्राप्त करने के तरीके पृथक-पृथक हैं। उन्हें इतना अवसर दीजिए कि वे अपने ढंग से जीवन का मजा लूट सकें, स्वच्छन्द वायु में विचरण कर सकें, जहाँ चाहें फिर सकें, उठ, बैठ, खेल, खा सकें। यदि इसमें कुछ भी परिवर्तन की इच्छा है, तो प्रेममय सुझाव के रूप में एक मित्र की तरह अपना संकेत आने दीजिए।
संक्षेप में दूसरों को सुधारकर अपने स्वभाव, रुचि, शिक्षा, उन्नति या आदर्शों के अनुकूल बना लेने की कोशिश करने की मूर्खता मत कीजिए। बरबस सुधार थोपने से न सुधार होता है, न आपका ही मन प्रसन्न रहता है। प्रत्युत दूसरा व्यक्ति मित्र से शत्रु बन जाता है।
रजनीश के ये शब्द कितने मार्मिक हैं ‘तू अपने रास्ते पर चल और दूसरों को अपनी राह चलने दें... व्यर्थ हस्तक्षेप कर झगड़ा न कर। सभी को आँखें मिली है और अपना रास्ता हर एक स्वयं चुन सकता है। रास्तों के लिए झगड़ा जंगली दिनों का सूचक है। मुहम्मद कहा करते थे कि ठीक रास्ता गलत रास्ते से अपने आप साफ होता है। उसके लिए जबरदस्ती या जिद की जरूरत नहीं है।”
कुछ व्यक्तियों की यह धारणा है कि व्यक्तिगत उन्नति दूसरों के अधिकारों को कुचलने, अपहरण करने, अपने से नीचे वालों को व्यक्तिगत हानि पहुँचाने या दबाने, धमकाने, डाँटने फटकारने से प्राप्त होती है।’ यदि हम अमुक व्यक्ति को दबाये रखेंगे, तो अवश्य परोक्ष रूप में हमारी उन्नति हो जायगी, अमुक व्यक्ति हमारी उन्नति में बाधक है, अमुक हमारी चुगल करता, दोष निकालता, मानहानि करता अथवा अवनति का कारण है। अतः हमें अपनी उन्नति न देखकर पहले अपने प्रतिपक्षियों को रोके रखना चाहिए।” ऐसा सोचना और दूसरों पर अपनी असफलताओं का कारण मानना, भयंकर भूल है।
दूसरों को अपनी अवनति या पीछे पड़े रहने का दोषी मत बनाइये, उन पर अपनी असफलताएँ या दुर्बलतायें मत थोपिए, दूसरों के अधिकारों को दबाने से उनको व्यर्थ ही हानि पहुँच जायेगी और स्वयं आपको कुछ व्यक्तिगत लाभ न होगा। सम्भव है, हानि पहुँचने वालों में आपके कोई हितैषी मित्र सुहृदय हों, जो आपके अनुचित व्यवहार से क्रुद्ध होकर उल्टे हानि पहुँचाएँ।
व्यक्तिगत उन्नति की आधारशिला मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विशेषताएं ही हैं। दूसरों को दबाना, चुगली करना या कुचलना तो आपकी ईर्ष्या, क्रोध एवं उत्तेजना की प्रक्रियाएँ हैं। जो व्यक्ति इस तुच्छ दमन के कार्य में लगा रहता है, उल्टे उसकी ही एकत्रित शक्तियों का क्षय हो जाता है। अन्दर ही अन्दर ईर्ष्या की अग्नि सुलगती रहकर समस्त मौलिकता, साइंस एवं नवोत्साह को मार डालती है। अपनी अच्छी बुरी अवस्था के जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। दूसरों पर व्यर्थ कलंक कालिमा पोतने की भूल कदापि न करें। स्वयं अपनी उन्नति करें, दूसरों को अपने मार्ग का कंटक कदापि न समझें।
जो गलतियाँ, प्रतिकूलताएँ, खराबियाँ, हानि दूर नहीं की जा सकतीं, जो तीर हाथ से निकल चुका है, जिसके बारे में आप बेबस हैं, उस पर बैठे-बैठे चिंता करना, पछताना, आत्मग्लानि के शिकार रहना बार-बार घूम फिरकर उसी का शोक बनाते रहना एक भयंकर भूल है। इस चिंता की आदत को त्याग देना ही श्रेष्ठ है।
तनिक सोचिए, यदि आपका मित्र परिवार का कोई सदस्य स्वर्गवासी हो गया है, तो अब उसके विषय में चिंतित होने से क्या लाभ? आपके पुत्र-पुत्री का पत्र काफी दिनों से नहीं आया है, आप कई पत्र भी लिख चुके हैं पर उत्तर नदारद! अब आप क्या करें? तार दे दीजिए, साथ ही एक लम्बा पत्र लिख दीजिए। बस, अब चिंता छोड़ दीजिए। आपने अपना-सा सब कुछ कर दिया अब व्यर्थ की चिंता से क्या लाभ?
चिंता छोड़िये, कहने का तात्पर्य यह नहीं कि आप प्रयत्न न करें। आप पूरी कोशिश कर डालिये, कोशिश में कोई कसर मत छोड़िये, इसके उपरांत चिंता छोड़ दीजिए। जो विधि का विधान बदला नहीं जा सकता, जो सुधार की सीमा के बाहर है, उस पर व्यर्थ चिंतित होने से क्या लाभ? चिंता में फँसकर व्यर्थ शक्ति क्षय करने की भूल मत कीजिए।
मरा हुआ व्यक्ति चिंता से वापस नहीं आयेगा। व्यापार में हुई आर्थिक हानि या हारा हुआ मुकदमा चिंता से नहीं जीता जा सकता। घर से भागा हुआ लड़का कलपने, रोने, पीटने से वापस नहीं आ सकेगा। चोरी हुआ माल चिंता से पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। गिरता हुआ स्वास्थ्य चिंता से और भी जल्दी गिरता जायगा। परीक्षा में फेल होकर आत्महत्या करने से क्या पास हो सकेंगे? कदापि नहीं। घर में छोटे बड़े झगड़े टंटे हर एक के यहाँ चलते हैं जो समय पाकर स्वयं ठीक हो जाते हैं। जहाँ आपका कोई बस नहीं, उन बातों पर व्यर्थ चिंतित होना एक भूल है।
जिद्दीपन सर्वथा त्याज्य है।
चरित्र में दृढ़ता अपने कार्य के प्रति लग्न बहुत उत्तम गुण है, जिद्दीपन से अपने ही मत, विचार या आदर्शों पर डटे रहना एक भूल है। जिस गुण की सर्वाधिक आवश्यकता है, वह चरित्र की परिस्थितियों के अनुकूल लचक अर्थात् परिवर्तित हो जाना है। आपका अफसर न जाने किस प्रकृति का व्यक्ति हो उसकी धारणाएँ भी विभिन्न हो सकती हैं। यदि आप लचक कर अपने को उसके अनुसार ढाल सकें, अपने को बदल कर अपना काम निकाल सकें जिद न करें, तो आप व्यवहार कुशल हैं। काँच लचक नहीं सकता, टेढ़ा होते ही टूट जाता है। बेंत लचकीला होने से हर स्थिति में कामयाब होता है। संसार में काँच की तरह दृढ़ रहने से आप टूटेंगे, इधर उधर पूरे संसार में असफल, जिद्दी, सनकी कहे जायेंगे। बेंत की तरह लचकीले, परिस्थिति के अनुसार ढलने का गुण धारण कर आप सर्वत्र प्रेम तथा आदर के पात्र बनेंगे। हो सकता है, बाद में आपके व्यक्तिगत मत या धारणाएं भी दूसरे स्वीकार कर लें, किन्तु पहले तो आपकी लचक ही आपकी सहायक होगी।
जिद्दी और अड़ियल स्वभाव के मत बनिये। विद्वान भी जिद्द से सनकी कहलाता है। आज आप जिस बात पर जिद्द कर रहे हैं, कल सम्भव है वह आपको स्वयं ही गलत प्रतीत होने लगे। यदि आप लचक कर कुछ दूसरों की सुनें, तो उसका सार तत्व ग्रहण कर सकेंगे और अपनी विचारधारा को मजबूत बना सकेंगे।
जब हम चरित्र में लचक धारण करने को कहते हैं, तो हमारा तात्पर्य यह नहीं कि आप दूसरों के गलत त्रुटिपूर्ण अतर्कपूर्ण मन्तव्य को स्वीकार कर ही लें। आप कुछ देर के लिए उसके सामने उसका मन्तव्य स्वीकार कर लीजिए पर कीजिए अपने मन की बात। इससे दूसरे व्यक्ति के अहंभाव की रक्षा हो जायगी और वह आपका मित्र बन जायगा।
एक व्यक्ति ने एक विद्वान की पुस्तक की पाण्डुलिपि में कुछ गलतियाँ निकाली और उन्हें सुधारने को कहा। विद्वान ने उस व्यक्ति के समक्ष काटकर उसके अनुसार लिख लिया। वह प्रसन्न हो उठा पर उसके चले जाने के उपरान्त पुनः ज्यों का त्यों कर दिया। जरा सी लचक से वह व्यक्ति भी प्रसन्न हो उठा, विद्वान का कुछ न बिगड़ा।
(ले. श्री स्वामी रामानन्द संन्यासी काशी)
काले वर्षतु पर्जन्यः पृथिवी शश्य शालिनी। देशेऽयं क्षोभ रहितः साधवः सन्तुनिर्भया॥
अनादि काल से समाज दो भागों में विभक्त होता चला आता है। एक विभाग निवृत्तिशीलों का है और दूसरा प्रवृत्ति परायणों का या यों कह लीजिए कि- एक दल त्यागियों का और दूसरा संग्रहियों का। वास्तव में संसार में आवश्यकता दोनों की है। संग्रही प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग कर और कराकर दुनिया की कमी को पूर्ण करता हुआ लोगों को सर्व कर्म करण समर्थ बनाता है और त्यागी साँसारिक पदार्थों की अनित्यता, असारता आदि बोधन करता हुआ मनुष्य को यह उपदेश देता है कि जिन पदार्थों से तू लाभ ले रहा है ये सब जिसकी सत्ता स्फूर्ति से तेरे उपयोग में आने की सामर्थ्य रखते हैं तुझे उस तत्व का अनुसन्धान करना चाहिए। अब मानव! तू यदि इन्हीं को सब कुछ मान बैठेगा तो तेरी बिगड़ी कुछ भी न बन सकेगी ये पदार्थ तेरे काम आ सकते हैं, किन्तु तेरे सब काम इन्हीं की सहायता से पूर्ण हो जायेंगे यह बात नहीं है इत्यादि।’ उक्त त्यागी समाज में साधु सन्त महात्माओं की गिनती है और संग्रही- समाज में गृहस्थाश्रमियों की गणना है।
पूर्व का संग्रही मनुष्य बाद में जब त्यागी याने साधु हो जाता है तो वह उस दशा में अपने अनुभव से लोगों को जो आदेश देता है, उससे प्रवृत्ति परायण प्राणियों को साँसारिक व्यवहार वहन करने में बड़ी सहायता प्रदान कर सकता है। इसलिए साधु समाज पहले और अब भी अपने अमूल्य- सामाजिक आवश्यक उपदेशों से जनता जनार्दन की सहायता सेवा पथ प्रदर्शकता आदि कर सकता है। महाभारत से पूर्व लोग विज्ञाधर्मज्ञ विद्वान थे, जनता पढ़ी लिखी थी, समझदार थी। उस समय साधु लोग स्वयं आदर्श बनकर तपश्चर्या द्वारा जनता को शीतोष्ण आदि द्वन्द्व सहन करने की शिक्षा देते हुए उसके जीवन को तपोमय बनाने का यत्न किया करते थे और महाभारत के अवांछनीय समय के बाद शास्त्रीय शिक्षा दीक्षा से रहित लोगों को उपदेश कथा पाठ प्रवृत्ति से लाभान्वित करते रहे तथा करते हैं।
इस समय मैं परम प्राचीन घटनाओं का उल्लेख न करता हुआ उस समय के बाद की बात कहना चाहता हूँ जिस समय अर्वली के पहाड़ों से उतर कर सुजला सुफला शश्य श्यामला भारत भूमि, दुदन्ति विदेशियों द्वारा आक्रान्त हुई थी। उस समय समर्थ सन्त रामदास की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी ने मिटती हुई हिन्दू जाति को अमिट बना दिया था। पंजाब के गुरुओं ने आर्य सभ्यता के (बुझते हुए) प्रदीप को बुझने से बचाया था। आचार्य शंकर ने विनाशोन्मुख वैदिक विज्ञान की नौका डूबने से बचा ली थी। आचार्य रामानुज ने हिंसा की पाप सब प्रवृत्ति को उखाड़कर फेंक देने में बड़ी तत्परता दिखाई थी। रामानन्द मुनी ने तपश्चर्या और कबीर दास ने समन्वय की दीक्षा से हिन्दू जाति के देह में प्राणवायु का संचार कर दिया था। स्वामी विवेकानन्द की ज्ञान, सेवा, और उपासना रूप स्कन्धत्रयी ने देश विदेशों में हिन्दू जाति का मस्तक ऊँचा कर दिया। रामतीर्थ के वेदान्त ने लोगों को शेर नर बना देने में बड़ी सहायता दी। नामदेव-ज्ञानेश्वर, दयानन्द, नारायण, दाढू, गुरुनानक, गौराँग आदि सन्तों ने समय समय पर लोगों का जो उपकार किया है उसको न्यूनाधिक रूप से प्रायः सब लोग जानते हैं। कहाँ तक कहें साधू समाज ने हिन्दू जाति के विशाल वृक्ष को समय समय पर अपनी तपश्चर्या, त्याग, ज्ञान तथा उपदेश प्रभृति जल, खाद आदि से सिंचन आदि संस्कृत करने में कोई बात उठा नहीं रखी।
आज भी नगर नगर गाँव गाँव में - साधु लोग हिन्दू जाति को सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और पारमार्थिक प्रभृति सभी कार्यों में सहयोग तथा सहायता दे रहे हैं, रामकृष्ण मिशन के उद्योग से कलकत्ते से हुए ‘सर्व धर्म - सम्मेलन, में ऐसे ऐसे संन्यासी महात्मा दिखाई दिये जो भारत के बाहर विदेशों में ज्ञान, भक्ति हिन्दू सभ्यता का धुँआधार प्रचार प्रसार कर रहे हैं और जो यहाँ धार्मिक तथा नैतिक प्रचार कर रहे हैं उनकी नामावली मात्र लिखने बैठूँ तो एक ग्रन्थ तैयार हो जायगा।
साधुओं का काम आध्यात्मिक सहायता देना है, जिसकी आजकल के डावाँडोल जमाने में बड़ी आवश्यकता है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अस्तेय, सत्य, भाषण और मादक द्रव्य निषेध का उपदेश देकर आज भी साधु समाज हिन्दू जाति की बहुत बड़ी मदद कर रहा है। जो साधु लोग उक्त नियम के विरुद्ध आचरण करते पावें, हम उनको ऐसा समझते हैं जैसे चन्द्रमा के काले दाग।
आजकल की अन्याय जातियाँ विपुल धन-राशि व्यय करके अपने उपदेश के द्वारा जनता में स्वसिद्धान्त का प्रचार करती हैं। किन्तु हिन्दू जाति के सौभाग्य से अनादि काल से त्यागी संयमी परिव्राजक एक समुदाय ही स्वतन्त्र बना हुआ है, जो प्रचार को अपना ध्येय लक्ष्य कर्तव्य मानता हुआ आज तक उस काम को बड़ी तत्परता से सर अंजाम दे रहा है, हिन्दू जाति के ये पुश्तैनी प्रचारक यद्यपि बहुत कम हैं पर आर्य सभ्यता के बड़े बड़े दुर्गम स्थानों में प्रचार करने में कुछ कोर कसर नहीं रखते।
‘साधु’ सज्जन उनको भी कहते हैं चाहे यह गृहस्थ हो किन्तु साधु शब्द उक्त विरक्त का ही अटल में बोधक है। कुछ गुणादि सादृश्यात वह गृहस्थाश्रमी पुरुषों में भी प्रयुक्त होने लगा होगा।
अन्त में मैं कहकर अपना लेख समाप्त करता हूँ कि- हिन्दू जाति की नस नस को आध्यात्मिकता से आत्मज्ञान से आप्यायमान करने वाले साधुजनों से हिन्दू जाति को भी लाभ है, जो हित है वह यह या उस जैसा हित साधन और किसी से भी नहीं है, परन्तु यह हित साधन सच्चे साधुओं से ही हो सकता है। दुर्भाग्य से आज सच्चे साधु कम ही दृष्टिगोचर होते हैं फिर भी उसका सर्वथा अभाव नहीं समझ लेना चाहिए। साधु पुरुष किसी भी राष्ट्र की सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को सुरक्षित रखना, बढ़ाना और पोषण करना प्रत्येक राष्ट्र और धर्म से प्रेम करने वाले का कर्तव्य है।
(श्री परिपूर्णानन्द वर्मा)
संसार में ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो अपना कल्याण न चाहता हो। यह बात दूसरी है कि ‘कल्याण’ का अर्थ ही हम गलत लगाते हों और यह न जान पाते हों कि वास्तविक कल्याण किस चीज में किस दशा में है। इसी अज्ञान का परिणाम है कि चोर या डाकू अपने निन्दनीय कार्य में भी कल्याण की गन्ध पाकर ही प्रवृत्त होता है। वेश्या अपने गन्दे पेशे को अपने सुख का हेतु समझती है और झूठ भी यही सोचकर बोला जाता है कि इससे कल्याण होगा। माया, ममता, मोह- सभी अवगुण इसी भ्रमित भावना के परिणाम हैं। इसीलिये यदि हम अपना सच्चा कल्याण चाहते हैं तो हमें यही जानना जरूरी है कि कल्याण है क्या वस्तु, वास्तविक कल्याण किस चीज में है?
मोटे तौर पर यही समझा जाता है कि जिस चीज से सुख मिले, वही कल्याण कर है। पर सुख भी तो कई प्रकार का होता है। शारीरिक सुख तो क्षणिक है। विषय-भोग में समय चुटकी बजाते बीत जाता है ओर यह अनुभव होने लगता है कि शरीर का सुख एक प्रकार से नहीं मिल सकता। बचपन में यदि खिलौना और मिठाई से सुख मिलता है तो जवानी में स्त्री से, धन से इच्छाएं पूरी होती हैं। बुढ़ापा आते आते सुख के क्रम और साधन में गुरुतर परिवर्तन हो जाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि सब सुख सामने हो पर इच्छा न होने पर भी एक अप्रत्यक्ष शक्ति उनसे छीनकर प्राणहीन कर देता है। और जिस शरीर को सुखी बनाने के लिए आत्मा का सौदा कर डाला, वही साथ छोड़ देता है। यही नहीं अपने द्वारा जिन जिनको सुखी बनाने की चेष्टा की, वही लोग हमारे मुर्दा शरीर को तुरन्त जलाकर उसकी राख पानी में फेंककर, दो घण्टे में ही हमसे छुट्टी पा जाते है। तब फिर ऐसी अनिश्चितता में भी क्या सुख माना जा सकता हैं। स्त्री, पुत्र, धन - जब सभी विमुख हो जाने वाले हैं तो यह अपने कैसे हुए? और जो अपने नहीं, वह सुखदायक कैसे कहा जाय? भर्तृहरि ने तो साफ कह दिया-
भोगे रोगमयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं, मौने दैन्यभयं वले रिपुभयं रुपे जराया भयम्।
शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं, सर्व वस्तु मयान्वितं भुवि नृणाँ वैराग्यमेवामयम्॥
‘भोग में रोग का, कुलीनता में मर्यादा के लोप होने का, धनी को राजा से धन छिन जाने का, मौन रहने में दीनता का, बलवान को शत्रु का, रूपवान को बुढ़ापे का, शास्त्र ज्ञाता को शास्त्रार्थ में पराजित होने का, गुणी को दुष्ट का तथा शरीर को मृत्यु का भय बना रहता है। सभी साँसारिक वस्तुएं भय से युक्त हैं, केवल वैराग्य की स्थिति ही भय रहित है।’
ऐसी नश्वरता के बीच में केवल एक ही सत्य है, एक ही सार वस्तु है और वह टैनिशन जैसे महा कवि के शब्दों में भगवान हैं। टैनिशन कहते हैं-
वही भगवान चिरन्तन है, अमर है और सबको प्यार करता है। एक ही ईश्वर है, उसका एक महान नियम, एक महान तत्व है, उसी की सुदूर दैवी घटना की ओर- चिरशान्ति की ओर समूची रचना चली जा रही है।’
ऐसे चिरंतन भगवान को न जानना ही अपना सबसे बड़ा अकल्याण है। ‘सादी’ का बड़ी सुन्दर युक्ति है कि ‘मैं भगवान से डरता हूँ और उसके बाद उससे डरता हूँ जो ईश्वर से नहीं डरता। जो ईश्वर को नहीं मानता, वह ‘भगवान से शत्रुता करता है और ईश्वर का बैरी, मनुष्य जाति का बैरी है।’ बेफन के इस कथन में जितनी सच्चाई है, उतनी ही दूरदर्शिता भी है। भगवान का न मानने वाला मनुष्य जाति के मर्म को समझ ही नहीं सकता। ‘बेली’ ने इसीलिए लिखा है कि ‘संसार में यदि कोई वस्तु जानने योग्य है तो वह भगवान है और दूसरी अपनी आत्मा।’ पैनिन ने ईश्वर के लिए बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखा है- ‘जिस संसार में हम रहते हैं, उसका कोई प्रारम्भ तो रहा ही होगा। बिना प्रारम्भ के विकास नहीं होता। बिना कारण के ‘प्रारम्भ’ नहीं होता। बिना प्रज्ञा के कारण नहीं बनता। वह ‘प्रज्ञा’ अनन्त और महान रही होगी। वह महान सदैव महान था और रहेगा- वही महान भगवान है।’ इस महान को देखने के लिए एमर्सन ने साफ लिखा है कि ‘प्रकृति का आवरण (पर्दा) बहुत ही झीना है। ईश्वर की सत्ता चारों ओर से प्रस्फुटित हो रही है। मैकसेन ने कहा है- ‘ईश्वर के निकट रहो, फिर तुम्हें सभी अन्य वस्तुएँ असत्य ज्ञात होंगी।’
भगवान की- विशेष व्याख्या अनावश्यक है। जिसे वेद ‘नेति-नेति’ कहकर अपनी व्याख्या समाप्त कर देते हैं, उसकी व्याख्या हम क्या करें। मैंने जान बुझकर ऊपर विदेशियों द्वारा की गयी उसकी व्याख्या लिखी है। हमारी शास्त्रीय व्याख्या तो अथाह है इससे ज्यादा उसके विषय में क्या कहा जा सकता है कि-
ऐर्श्वयस्य समग्रस्य भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्चो भगवानिति॥
‘जिसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य हो और जो प्राणियों के आने जाने तथा ज्ञान-अज्ञान को भी जानता हो, उसे ‘भगवान’ कहना चाहिए।
उसी भगवान को जानना महाधर्म है और इस धर्म का पालन ही एकमात्र कल्याणकारी है। धर्म कोई संकुचित वस्तु नहीं है। यह कोई तर्क की बात भी नहीं है। धर्म तर्क से परे है। रेव.डा. हैरीएमर्सन फ्रास्डिक ने लिखा है- धर्म, संगीत, धार्मिक क्रिया-कलाप, प्रेम, अच्छाई, इत्यादि किसी भी वस्तु में ऐसी कोई बात नहीं है जो बुद्धिगम्य न हो। पर, जब तक संसार में सूर्य का प्रकाश है, हम इन वस्तुओं की महत्ता को तभी प्राप्त कर सकेंगे जब बुद्धि की सीमा को मान जायेंगे।
आजकल बुद्धिवाद का जोर है। पर बिना धर्म के बुद्धि कैसी सामाजिक हो जाती है, इसका निरूपण दार्शनिक बन ने किया है। वे लिखते हैं कि - ‘हृदय में धर्म का प्रदीप बिना जलाये बुद्धि का संस्कार केवल सम्य पाशविकता और छिपा हुआ जंगलीपन ही रहा जाता है। जब आदमी ‘ईश्वर के प्रति ही सच्चा’ न रहा हो तो वह मनुष्य के प्रति सच्चा कैसे हो सकता है? प्रसिद्ध वैज्ञानिक एच.डी. वेल्स लिखते हैं कि- ‘संसार में आदि तथा अन्तिम वस्तु धर्म है।’ आज धर्म के प्रति इतनी शत्रुता केवल इसीलिए है कि वह स्वयं बुराइयों का शत्रु है। बुरे को बुरा दीखता है। प्रसिद्ध पादरी डीन इंगे ने तो साफ कह दिया है कि जो व्यक्ति जैसा होगा, उसे भगवान वैसे ही देख पड़ेंगे और जिसको भगवान जैसे दिखायी देंगे, वह संसार के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा।
लोग भूल से कह बैठते हैं कि धन ही समस्त सुख का मूल है। एपिक्यूरस ने साफ कह दिया है कि ‘संसार का वैभव महान सम्पत्ति में नहीं, कम से कम आवश्यकताओं में है। धन तो कामना को प्रज्ज्वलित कर संसार को विषैला कर देता है। त्याग सन्तोष का जनक है। रेग्ल्डस ने ठीक लिखा है कि जितना कम पैसा होगा, उतनी ही कम चिन्ता होगी। धन कमाना, प्राप्त करना सरल नहीं है। उसकी रक्षा करना उससे भी कठिन है। प्रसिद्ध धनु कुबेर रायचाइल्ड का यह कथन बड़ा कीमती है।
धन- यौवन इत्यादि से लाभ ही क्या जबकि-
कफन लपेट कै सुलायो रथी पे अन्त। चूर होके खोपड़ी मसान में पड़ी रही॥
संसार का विकट सत्य मृत्यु है। कुछ भी कीजिये, इसके पाश से कोई बच नहीं सकता। बेकन के शब्दों में ‘मनुष्य के लिए मर जाना उतना ही स्वाभाविक है, जितना उसका जन्म लेना, और जिस प्रकार बच्चे को पैदा होने के समय कष्ट होता है, वैसा ही स्वाभाविक कष्ट मृत्यु के समय भी होता है।’
जब मृत्यु जैसी सत्य वस्तु को भी इन्सान भूल सकता है, तब उसका कल्याण किस प्रकार सम्भव है। ब्लेयर के शब्दों में- ‘जो लोग अपने धर्म में मरते हैं, भविष्य के सुख स्वप्नों के अन्धकार में पड़ें हुए हैं और जिन्होंने यहाँ से विदा होकर जिस संसार में जाना है, उसके लिए कोई तैयारी ही नहीं की है उनके सामने जब मृत्यु आकर खड़ी हो जाती होगी तो उन्हें कैसा घातक दुःख होता होगा।’
मरने से कौन नहीं डरता- किसे दुख नहीं होता! शेक्सपीयर नामक संसार प्रसिद्ध नाटककार का कथन है कि ‘राह चलते एक कीड़े को यदि हम पैर से कुचल देते हैं तो उसे मरने से उतना ही दुःख होता है, जितना बड़े से बड़े आदमी को!’ पर यह भी सत्य है कि जो मृत्यु को केवल पुराना वस्त्र बदलना ही समझता है और भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन को ध्यान में रखता है कि-
वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्लाति नरोऽपाराणि।
उसके लिए मृत्यु का भय नहीं है। लाँगफेलो कहते हैं कि ‘मृत्यु तो है ही नहीं। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह स्थान परिवर्तन मात्र है। यह शरीर ही नश्वर है -बस!’ एच.डब्ल्यू. बीचर ने बहुत ठीक कहा है कि ‘जिस प्रकार पहले फूल लगता है और जब यह झड़ जाता है, तब उसके स्थान पर फल या बीज उत्पन्न होते है, उसी प्रकार यह मृत्यु है जो नवीन रूप को जन्म देती है।’
इसलिए शरीर को नश्वर समझते हुए उससे मोह करना या उस पर घमण्ड करना नादानी और अज्ञान है। जो इस अज्ञान में नहीं पड़ता, उसी का कल्याण होता है। हमारा कल्याण इसी में है कि हम किसी से भी राग-द्वेष न कर अपने धन-बल या दारिद्रय पर भी सुख-दुख करना छोड़ दें और जीवन को उस एक उद्देश्य की सिद्धि का साधन समझें, जिसके लिए भगवान शंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-
एकं ज्ञानं नित्यमाद्यन्तशून्यं नान्यंन् किश्चिद् वर्तते वस्तु सत्यम। यद्भेदोऽस्मिन्निन्द्रियोपाधिना वै ज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव॥
‘एक नित्य, आदि-अन्तरहित ज्ञान सत्य है। ज्ञान के सिवा अन्य कोई वस्तु सत्य नहीं है। इन्द्रियरूप उपाधि के कारण इस संसार में जो विभिन्नता दीख पड़ती है वह भी ज्ञान में ही भासती है।
इस ज्ञान का उपार्जन करना ही हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है और उसे प्राप्त करने के लिए सद्गुरु की तलाश करनी चाहिए। इसके अभाव में ही सब अनर्थ होते हैं। शिवसंहिता में स्पष्ट लिखा है-
अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते। द्विवधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमावे पर्यवस्यति॥ यद् भूतं यच्च भाव्यं व मूर्तामूत तथैव च। सर्वमेव जगदिंद निवृत्तं परमात्मनि॥
‘परमात्मा संसार से भिन्न नहीं है। किसी वस्तु में भेद नहीं है और जो भेद प्रतीत होता है, वह भ्रम है। जो हुआ है और जो होगा, जो मूर्तिवान है और जो अमूर्त है- वह सब परमात्मा में ज्ञान से भासता है।’ ऐसा परम ज्ञान हो जाने से सब भेद भाव छूट जाता है। सारी वस्तुएं ईश्वरमय हो जाती हैं और मन का मोह नष्ट हो जाता है।
ऐसे ज्ञान के उपार्जन में ही हमारा महा कल्याण है।
(श्री. राधेश्याम दीक्षित, बी.ए. एल.एल.बी. लखनऊ)
प्रत्येक मनुष्य अपनी उन्नति का इच्छुक रहता है। मनुष्य ने जो भी साधन आज तक बनाये हैं वह कम से कम उन्नति के ही दृष्टिकोण से निर्धारित किये हैं चाहे उनसे उन्नति हुई हो और चाहे न हुई हो। परिवार, समाज, जाति, राज्य, राष्ट्रीयता, और अन्तर्राष्ट्रीयता, साम्यवाद, लोकतंत्र, गणतन्त्र, इत्यादि सभी वाद ओर तन्त्र उन्नति उन्नति चिल्लाते हैं। गत युद्ध ही को देख लीजिए जर्मनी, इटली, जापान भी उन्नति के लिए लड़े तथा अमेरिका और इंग्लैण्ड भी उन्नति के लिए लड़े। आज भी एक हड़ताल करने वाला मजदूर भी उन्नति के लिए लड़ता है तथा रुपया बटोरने वाला मिल मालिक भी। इस सबका स्पष्ट अर्थ यही है कि सब अपनी अपनी हाँकते हैं। दूसरे की ओर ध्यान नहीं देते या दूसरे शब्दों में एक विश्वव्यापी और व्यापक दृष्टिकोण से ब्यौरेवार समस्याओं को सुलझाने के बजाय एक ‘वाद’ अथवा सामान्य सिद्धान्त को ही सार्वजनिक और सार्वपारिस्थितिक बनाने की चेष्टा करते हैं।
व्यक्ति का उत्थान उसी क्षण से आरम्भ हो जाता है जिस क्षण से वह आत्मोन्नति के विचारों की सुदृढ़ धारणा अपने हृदय में अंकित कर लेता है। उसको अपनी कमी का आभास हो जाता है और वह उसकी पूर्ति के लिए सक्रिय हो जाता है।
संसार में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परिस्थिति विशेष होती है। अपनी परिस्थिति से किसी किसी को इतना संघर्ष करना पड़ता है कि प्राणान्त ही हो जाता है। ऐसे ही लोगों के उदाहरणों को देकर लोग कहते हैं कि मनुष्य स्वयं कुछ कर ही क्या सकता है। जैसे उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के कूबड़ निकला है और उसके फेफड़े तथा हृदय कमजोर हैं किन्तु वह सैनिक बनना चाहता है। कोई धन हीन विद्वान है वह कोई ग्रन्थ लिखना चाहता है, लोग विभिन्न विषम परिस्थितियों का वर्णन करते हैं। आत्मोन्नति चाहने वाले व्यक्ति को सर्व प्रथम अपने लक्ष्य की स्पष्टता निर्धारित करनी चाहिए। लक्ष्य निर्धारित करते समय उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति सब कुछ नहीं हो सकता। एक ही व्यक्ति एक उच्च कोटि का सैनिक तथा साथ ही साथ उच्च कोटि का नर्तक नहीं बन सकता। मनुष्य को अपनी योग्यताओं के अनुकूल अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।
हमारा लक्ष्य चाहे जो भी हो हमें जीवन से तीन प्रश्नों को किसी न किसी प्रकार सुलझाना ही पड़ता है।
जिस समाज में हम उत्पन्न हुए हैं अथवा जिस समाज में हम रहते हैं, अथवा रहना चाहते हैं, हमें अपने को उसके अनुकूल बनाना ही पड़ेगा।
जीवन यापन के लिए हमें कोई न कोई व्यवसाय अथवा वृत्ति अन्य किसी अर्थकारी साधना का अवलम्ब ग्रहण करना पड़ता है।
जीवन की भावनात्मक वृत्तियों तथा प्रवृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए कुछ न कुछ कार्य करना पड़ता है। इस शीर्षक के अंतर्गत विवाह तथा प्रेम की समस्या आती है।
यदि कोई व्यक्ति यह चाहे कि उसके जीवन में कोई संघर्ष न हो, उसे कोई समस्या न सुलझानी पड़े, सभी चीजें उसके अनुकूल हो जायं और वह अपने को परिस्थिति के अनुकूल न बनाये तो ऐसे मनुष्य के लिए जीवन भार हो जायेगा, वह स्वयं अपने जीवन से खीझने लगेगा, वह स्वयं के लिए अभिशाप हो जायेगा और दूसरों के लिए अभूतपूर्व समस्याएं उत्पन्न करेगा।
छोटे बच्चे, पागलों, कुछ प्रकार के रोगियों, तथा अतीव वृद्ध व्यक्तियों को छोड़कर प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन के विषय में सोचकर प्रगति की ओर अग्रसर हो सकता है, यह दूसरी बात है कि उसे आशानुकूल सफलता न प्राप्त हो। यहाँ पर यह कहना अशंसंकितयडडडडडडडडड न होगा कि सफलता तथा उन्नति मापने के लिए स्पष्ट मापदण्ड नहीं हैं। भवभूति गैलीलियो सुकरात इत्यादि व्यक्तियों को उनके जीवन के बाद ही सफलता मिली। प्रश्न यह है कि यदि व्यक्ति स्वयं अपने जीवन से संतुष्ट, आनन्दित, तथा प्रसन्न है और अपने कार्य को वह मनसा वाचा कर्मणा लोक हितकारी समझता है तो उसके जीवन को हम सफल तथा उन्नत कह सकते हैं।
संसार में अपने गुणों तथा परिस्थितियों के कारण मनुष्य के हाथ में बड़ी शक्ति अर्जित हो जाती है। लोग सेनापति, तानाशाह, शासक, लक्ष्मीपति, नेता इत्यादि न जाने क्या क्या बन जाते हैं। उनकी तनिक सी त्रुटि से सहस्रों मनुष्यों का प्राणान्त हो जाता है। सैकड़ों देश बन बिगड़ जाते हैं, और आज विज्ञान के युग में तो हिटलर जैसी तानाशाही मनोवृत्ति से सारे संसार का जीवन ही डावाँडोल हो सकता है।
अब एक प्रमुख प्रश्न यह उठता है कि क्या हम ऐसे जीवन को सफल और उन्नत कह सकते हैं जिसमें कोई व्यक्ति स्वयं अपने जीवन से संतुष्ट रहकर अपने कार्यों को लोकहित कारी मानकर अपना जीवन यापन करता है किन्तु उसका जीवन दूसरों के लिए कंटकाकीर्ण हो जाता है। पागल खाने में बहुत से ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो अपने कार्यों को अतीव लोक हितकारी समझते हैं जो अपने जीवन से संतुष्ट रहते हैं तथापि यह सर्वविदित ही है कि पागल खाने में रहने वाले ये व्यक्ति उन्नत नहीं कहे जा सकते।
पागल व्यक्ति में तथा सामान्य तथा उन्नति शील व्यक्ति में क्या अन्तर माना जाय? पागल व्यक्ति अपने विरोधियों की भावना को नहीं समझता। वह उनका विश्लेषण नहीं कर सकता किन्तु सामान्य तथा उन्नति शील व्यक्ति अपने विरोधियों की भावना को पूर्ण रूप से समझता है और समय समय पर वह उनसे सहमत भी हो सकता है और कभी कभी तो यह उन विरोधियों के साथ सम्मिलित भी हो सकता है। विरोधियों के प्रति सहिष्णुता तथा उनकी मनोवृत्ति को समझना उन्नति तथा प्रगति का परिचायक है। विरोधियों के प्रति असहिष्णुता से ही विक्षिप्तता का आरम्भ होता है। यहाँ पर प्रयुक्त विरोधी शब्द में और शत्रु शब्द में अन्तर है।
किन्तु वस्तु में दोष होने से उसका विरोध किया जाता है। किन्तु शत्रुता तो उस स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति का परिणाम है जो बिना गुण दोष पर विचार किये ही अपने विपक्षी के उन्मूलन में कटिबद्ध हो जाती है।
संसार में कौन सा कार्य उचित अथवा कौन सा कार्य अनुचित? इसके लिए कोई नियम नहीं बताया जा सकता। औचित्य और अनौचित्य का प्रश्न सारे मानव समाज से सम्बद्ध है और बिना व्यापक मानवीय दृष्टिकोण के इस प्रश्न पर विचार ही नहीं किया जा सकता। प्रत्येक कार्य के औचित्य अथवा अनौचित्य का प्रश्न एक ब्यौरे की चीज है और प्रत्येक प्रश्न पर अलग से ही विचार करना चाहिए।
उन्नति क्या है और अवनति क्या है इस सम्बन्ध में लोगों के दृष्टिकोण भिन्न भिन्न हैं। एक विषमान रोगी, स्वार्थी, मनुष्य की उन्नति और एक आत्म ज्ञानी परमार्थ प्रिय व्यक्ति की उन्नति का मापदण्ड एक दूसरे से विरुद्ध होता है। एक जिस बात को उन्नति मानता है उसी को दूसरा अवनति कहता है। ऐसी दशा में यह जानना कठिन हो जाता है कि वास्तविकता क्या है।
विचारकों और विद्वानों के अनुभवों से यह पता चलता है कि रुपया पैसा बढ़ना कोई उन्नति नहीं, वरन् अनेक आपत्तियों की जननी है, इससे व्यक्ति का निज का तथा समाज का अहित ही होता है इसलिए हमारे पूर्वज धन संचय होने पर उसे दान आदि शुभ कार्यों में खर्च करते रहते थे। स्वास्थ्य की उन्नति, विद्या की उन्नति, अनुभवों की उन्नति, सन्मित्रों की संख्या की उन्नति, योग्यताओं और गुणों की उन्नति इन्हें संसार की ऐसी उन्नतियों में कहा जा सकता है जिनसे अच्छे परिणाम की आशा की जा सकती है।
सबसे बड़ी उन्नति आत्मिक उन्नति है। सद्भावनाओं की, शुभ संकल्पों की, उच्च चरित्र की और आदर्श निष्ठा की सम्पत्ति ऐसी है जिसे पाकर मनुष्य सच्चा धनी बनता है। दया, प्रेम, करुणा, मैत्री, सेवा, उदारता, संयम तथा सच्चाई जिसके मन में बढ़ने लगे समझना चाहिए कि वह वास्तविक उन्नति की ओर अग्रसर हो रहा है।
ईश्वर भक्ति, सब में परमात्मा को देखना, अपने में ईश्वर की झाँकी करना यह उन्नति का सर्वोच्च शिखर है। आत्मा में परमात्मा का दर्शन करने वाले मनुष्य जीवन को सब प्रकार सफल और पूर्ण उन्नतिशील कहा जा सकता है।
(श्री हीरालाल जी)
रोग शब्द से ही लोग दहल जाते हैं लेकिन रोग होने पर डरने की नहीं बल्कि खुश होने की जरूरत है। रोग बेचारा निस्वार्थी मित्र बन कर चेतावनी देता है कि संभल जाओ शरीर में विकार उत्पन्न हो गया है। यदि रोग की इस चेतावनी से अपने को सम्भाल लेते हैं तो आगे वाली मुसीबत से छुटकारा पा जाते हैं लेकिन यदि हम उसकी अवहेलना करते हैं तो प्रकृति हमें दुहरी सजा देती है, क्योंकि और दरबार में तो खुशामद चल भी जाती है लेकिन प्रकृति के यहाँ तो इसकी जरा भी गुँजाइश नहीं है। वहाँ तो जो अपने को, प्रकृति के चरणों में समर्पण करके उसके इशारे पर चलता है उसकी वह मदद और रक्षा हर प्रकार से करती है।
रोग के कारण के बारे में तो जिनसे पूछिये वह कुछ न कुछ तो कह ही सकता है पर वैज्ञानिक ढंग से छानबीन करने पर उसमें अनेक प्रश्न उपस्थित हो जायेंगे कि रोग का कारण क्या है? उससे छुटकारा कैसे पाया जा सकता है आदि प्रश्नों का भी हल होना आवश्यक है।
किसी का तो कहना है कि शरीर संस्थान में किसी भी प्रकार का व्यक्तिक्रम होना ही रोग है और किसी का कहना है कि जिस चीज से शरीर की स्वाभाविक गति में किसी प्रकार की रुकावट पैदा हो, रोग है। चाहे वह किसी विशेष कारण वा प्राकृतिक जीवन के कारण हुआ हो।
स्वास्थ्य क्या है?
जिस काम के करने में किसी प्रकार की तकलीफ न हो, श्रम से जो न उकताए, मन में काम करने के प्रति उत्साह बना रहे और मन प्रसन्न रहे और मुख पर आशा की झलक हो यही शरीर के स्वाभाविक स्वास्थ्य की पहचान है। मनुष्य स्वाभाविक दशा में बिना किसी प्रकार की कठिनाई के साँस ले सकें, आँख की ज्योति और श्रवण शक्ति ठीक हो, फेफड़े ठीक-ठीक ऑक्सीजन को लेकर नाइट्रोजन को बाहर निकालते हों, आदमी के सभी निकास के मार्ग-त्वचा, गुदा, फेफड़े ठीक अपने कार्य को करते हों, न तो कब्ज ही हो और न पतले दस्त की ही शिकायत हो, और पेट, आँत और गुदा में किसी प्रकार प्रवाह या मरोड़ न हो बल्कि प्रत्येक अंग ठीक ठीक काम करें और जो चीज इन स्वाभाविक क्रियाओं से दूर ले जाती है वही रोग है?
हम जब किसी रोगी से उसकी बीमारी के बारे में प्रश्न करते हैं तो वह कहता है कि मैं बीमार हूँ लेकिन उसे इसका क्या ज्ञान कि किस रोग से क्यों पीड़ित है लेकिन जब किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाइए तो वह इसे श्वाँस संस्थान का रोग बतायेगा।
बच्चा जब जोर जोर से चिल्लाकर अपना कान उँगलियों से खोदने लगता है तो बच्चे की माँ से पूछने पर वह उत्तर देती है कि बच्चे के कान में दर्द है।
इसी प्रकार हर एक आदमी चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान रोग के लक्षणों को रोग समझता है कि मैंने रोग के बारे में ठीक उत्तर दिया है। लेकिन वहाँ बुद्धि तुरन्त कह देती है कि यह सब रोग नहीं बल्कि रोग के लक्षण मात्र हैं। रोगी को चिकित्सा के लिए रोग क्यों हुआ, कैसे हुआ जान लेना बहुत आवश्यक है।
बीमार कौन होता है?
हम सभी लोग जानते हैं कि ऐसा ही आदमी बीमार पड़ता है जिसका जीवन नियमित नहीं है और प्रकृति के साथ पूरा पूरा सहयोग नहीं कर रहा है। सोते समय उसके कमरे बन्द रहते हैं, खाने बैठता है तो पेट को खूब पूड़ी कचौड़ी से भर लेता है कि खाने के बाद तुरन्त चलना फिरना दुश्वार हो जाता है। व्यायाम नहीं करता, माँस मछली तथा शराब आदि अनेक भारी चीजों का सेवन करता है जिनका शरीर से निकास होना दुश्वार हो जाता है। जब उस भोजन से पैदा हुआ दूषित पदार्थ शरीर से बाहर नहीं निकल पाता तो एक एक करके त्वचा, गुर्दे और फेफड़े के शिथिल पड़ जाने से शरीर की स्वाभाविक गति में कमी आ जाती है। वह अपना काम ठीक ठीक नहीं कर पाता जीतेजी मुर्दे की तरह जिन्दगी बिताता है। ऐसे आदमी को ‘रोगी’ कहकर पुकारते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर में एकत्र हुआ दूषित पदार्थ न निकलने के कारण ही जवानी में ही बुढ़ापे से बदतर हालत हो जाती है।
जीवन के लिए अनेक चीज घातक भी हैं लेकिन बुद्धिमानों का काम है वह जीवन में ऐसे रास्तों को अख़्तियार करें कि जिस रास्ते पर चलने से जीवन में रोग देखने को न सुनने को न मिले। यदि हम अपने नित्य के रहन-सहन, खान-पान पर रोजाना एक सरसरी नजर डाल लिया करें और देखें कि हम प्रकृति से कहाँ अलग हो रहे हैं, बस वहीं रुककर प्रकृति के पीछे पीछे चलना शुरू कर दें तो स्वास्थ्य खराब ही न हो? और जब हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा तो रोग की गुँजाइश ही कहाँ?
सुन्दर स्वास्थ्य के सामने रोग का उसी प्रकार पता नहीं चलता जिस प्रकार सूर्य निकलते ही अँधेरे का।
रोग के प्रकार
रोग का अन्वेषण करने पर मालूम होता है कि रोग दो प्रकार के हैं-
(1) किसी भी अचानक घटना- आग लगने, पेड़ पर से गिरने, ऊँचे घर पर से गिरने, किसी सवारी पर से गिरने, पानी से डूबने से, पाले पत्थर पड़ जाने आदि के कारण रोग हो जाता है।
(2) रोग शरीर से गन्दगी निकालने का प्रयास मात्र है।
दवाओं के जन्मदाताओं का कहना है कि रोग का शरीर के तरल तत्व में ही स्थान है। रक्त अशुद्ध होने के कारण ही रोग पैदा होता है। रोग हजारों शक्ल में पैदा होता है और उसमें हजारों ही लक्षण हैं और उन्हीं लक्षणों के अनुसार ही डाक्टरों ने रोग का विभाजन किया है, लेकिन प्रकृति का पुजारी प्राकृतिक चिकित्सक तो रोग एक-वह रक्त की अशुद्धता से पैदा होता है- रोग का कारण एक और दूसरी दवा भी एक ही मानता है कि हम गलत आहार बिहार के कारण बीमार पड़ते हैं, उसे ठीक कर लेने पर स्वस्थ रहना जन्मसिद्ध अधिकार है।
रक्त दूषित होने के अनेक कारण हैं लेकिन संक्षेप में यह जान लेना आवश्यक है कि रक्त जानने वाले यन्त्रों में किसी प्रकार की अस्वाभाविकता आ जाने से अपना काम जब ठीक ठीक नहीं कर पाते तो रक्त अशुद्ध हो जाता है और साथ ही रक्त में विष पैदा हो जाता है जिसके फलस्वरूप निकास द्वार उस दूषित द्रव्य को बाहर निकालने से असमर्थ हो जाते हैं और उसी समय रोग की घण्टी बज जाती है कि सावधान हो जाओ!
अब तो यह मालूम हो गया है कि रोग शरीर से विष निकालने का प्रकृति का एक प्रयास मात्र है। दुश्मन के बदले यह चेतावनी देकर और विष को शरीर से बाहर निकाल कर सच्चे साथी का काम करता है।
रक्त के अशुद्ध हो जाने पर यदि रोग द्वारा चेतावनी न दी जाय तो वह यों ही मर जायगा लेकिन रोग की घण्टी बजने से वह सावधान होकर अपने को सम्भालने की कोशिश करता है कि उसे अब अपने जीवन के गलत आहार विहार को छोड़कर प्रकृति की शरण आना चाहिए। वह सोचने लगता है कि जीवन में अब अस्वाभाविकता आ गई है और इसका एकमात्र उपाय है सम्भलना। जब हम आरम्भ में ही प्रकृति की चेतावनी पर ध्यान दे देते हैं तो रोग का कारण शीघ्र ही समूल नष्ट हो जाता है नहीं तो दिन प्रतिदिन बुरी हालत हो जाती है और तेजी से हम मौत के नजदीक पहुँच जाते हैं। यही नहीं मर कर भी अपना रोग अपनी सन्तान को दे जाते हैं और वह खानदानी रोग बन जाता है।
मनुष्य जीवन में सद्बुद्धि का महत्व सब से अधिक है। किसी की अन्तरात्मा में सत तत्व अधिक हो तभी उसी विचारधारा और कार्य प्रणाली मानवोचित हो सकती है। यदि उसके अन्तस्थल में दुर्बुद्धि भरी हुई हो तो वह जो कुछ भी सोचेगा, जो कुछ भी करेगा वह सब उसके अपने लिए तथा समस्त संसार के लिए अशुभ परिणाम ही उत्पन्न करेगा। आज पढ़ाई लिखाई की बहुत बढ़ोतरी हो रही है और कमाई करने के भी उपाय निकाले जा रहे हैं। यह सब उचित और आवश्यक भी है। परन्तु जब तक मनुष्य की अन्तरात्मा में सत् प्रेरणा न हो, उसकी स्वाभाविक अभिरुचि शुभ दिशा में न हो तो यह पढ़ाई, कमाई, चतुराई, शक्ति, सत्ता आदि कितनी भी बढ़े उससे शैतानी को ही बल मिलेगा। बिना पढ़ा, भूखा नंगा, अशक्त, असंगठित, बदमाश कितनी बुराई कर सकता है उसकी अपेक्षा यदि वह शिक्षित, धनी, गिरोह बन्द, चतुर हो तो अनेक गुने भयंकर उत्पात कर सकता है। आज दुर्भाग्य से ऐसे ही पथ प्रदर्शक, एवं शासक, संसार को प्राप्त हैं। फलस्वरूप दुनिया अशान्ति, संघर्ष, त्रास, अनीति, चिन्ता एवं पतन की सर्वनाशी सड़क पर द्रुत गति से दौड़ी जा रही है।
इस प्रवाह को रोकने के लिए मनुष्य के अन्तस्तल के उस मूल उद्गम स्थल का स्पर्श करना होगा जिसमें तनिक सा परिवर्तन होते ही विचार पद्धति एवं कार्य प्रणाली में भारी हेर फेर हो जाता है। रेलवे की लाइनों को इधर उधर बदलने के लिए स्टेशनों पर ‘केंची’ होती है। इसमें एक लाइन को जरा सा इधर उधर हटा दिया जाय तो उस पर दौड़ने वाली रेल की दिशा बदल जाती है। इस कैंची के परिवर्तन से एक ही समय एक ही साथ चलना आरम्भ करने वाली रेलों में से एक रेल कलकत्ता जा पहुँचती है दूसरी बम्बई। दोनों के अन्तिम स्थान में सैकड़ों मीलों का अन्तर पड़ जाता है। मनुष्य के अन्तरात्मा में भी एक ऐसी ही केंची है जो यदि मूल मान्यताओं ने थोड़ा हेर फेर कर दें तो मनुष्य के बाह्य जीवन की सारी रूप रेखा ही बदल जाती है।
यों मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी अनेक प्रयत्न होते रहते हैं भाषणों और लेखों द्वारा भी ऐसे ही प्रचार बहुत होते रहते हैं पर देखा जाता है कि उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। कारण कि- उन प्रयत्नों का प्रभाव अन्तस्तल में अवस्थित जीवन दिशा बदलने वाली केंची तक नहीं होता। उस अदृश्य गहन स्तल का स्पर्श स्थूल उपकरणों से होता भी नहीं। उसके लिए सूक्ष्म औजारों और प्रयत्नों की जरूरत पड़ती है।
गायत्री उपासना एक ऐसा विज्ञान सम्मत अनुभूत, परीक्षित, रामबाण उपाय है जो मनुष्य के अत्यन्त ही सूक्ष्म एवं गहन अन्तस्तल पर प्रभाव डालता है, केंची काटकर जीवन दिशा बदलता है, दृष्टिकोण में, भावना में, लक्ष्य में, इच्छा में, अभिरुचि में परिवर्तन उपस्थित करता है। जो कार्य सैकड़ों उपदेश सुनने और हजारों लेख पढ़ने से भी सम्भव नहीं है वह इस ऋषियों द्वारा निरन्तर परीक्षित गायत्री उपासना द्वारा सहज भी सम्भव हो सकता है। इसी लिए गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्व माना गया है। वह सद्बुद्धि की देवी है। आत्मा में सद्प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाय तो जीवन में उपस्थित सभी अमंगलों का शोक सन्तापों का, सरलतापूर्वक निवारण हो सकता है। मानव का वास्तविक, ठोस, चिरस्थायी लाभ उपार्जन, स्वार्थ साधन जितना गायत्री द्वारा हो सकता है, उतना और किसी उपाय द्वारा नहीं हो सकता। इस सुदृढ़ तथ्य के कारण ही गायत्री उपासना पर इतना अधिक जोर दिया जाता है।
गायत्री का महत्व अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्य भली प्रकार जानते हैं। ऋषियों के, महात्माओं के, सिद्ध पुरुषों के दिव्य अनुभवों को छोड़ भी दें तो हम लोग स्वयं अपने अपने जीवनों में जो असाधारण दिव्य अनुभव कर चुके हैं, उसके आधार पर हम लोगों की अत्यन्त दृढ़ मान्यता है कि आत्म कल्याण के पुण्य परमार्थ के विश्व हित के जितने भी उपाय हैं उनमें गायत्री माता की शरणागति एक उत्कृष्ट साधन है। इसलिए हम सब सदैव इस बात के लिए प्रयत्न शील रहते हैं, कि भारतीय संस्कृति की मूलभूत आधार शिला, अनन्त आर्य विद्याओं की उद्गम स्थली गायत्री माता की भारत भूमि की पुनः प्रतिष्ठा हो और हम अपने प्राचीन गौरव, बल, वैभव, को पुनः प्राप्त करें।
‘गायत्री माता की दिव्य शक्ति से अधिक लोग लाभ उठावें” यह इच्छा प्रत्येक सच्चे गायत्री भक्त के मन में रहनी चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं तो माता से बहुत कुछ माँगते हैं किन्तु उसके लिए कुछ नहीं करते ऐसे स्वार्थी लोग सकाम उपासना द्वारा थोड़ा लाभ भले हो उठालें पर उन्हें माता का सच्चे प्रेम, वात्सल्य एवं अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। जो अपने भौतिक लाभों को नहीं माता की महिमा बढ़ाने के लिए श्रम करते हैं वस्तुतः वे ही सच्चे त्यागी मातृभक्त हैं। हम अपने को ऐसा ही मातृभक्त सिद्ध करना चाहते हैं और गायत्री प्रचार की पुनीत साधना में संलग्न हैं।
लोग गायत्री उपासना को तभी अपना सकते हैं जब जानकारी हो। पूरे परिचय के अभाव में तो हीरा भी काँच जैसा तिरस्कृत होता है, नेत्र विहीन के लिए चन्द्रमा की कोई महत्ता नहीं। यदि अनायास ही किसी को गायत्री उपासना के लिए कहा जाय तो उसकी समझ में इसकी उपयोगिता न आवेगी, कुछ टूटा फूटा करने भी लगा तो उसका मन न लगेगा। पर यदि उसे इस विद्या की पूरी जानकारी हो जाय उसके लाभ, महत्व, विज्ञान, विधान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन एवं तत्व ज्ञान का पूरा पता चल जाय, तो वह बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही इस सन्मार्ग पर श्रद्धा और दृढ़तापूर्वक प्रवृत्त होता है। अपना आत्म कल्याण करता है और जिसने उसे ज्ञान दान किया या दिलाया था उसके लिए पुण्य रूप बनता है। इसलिए हम लोगों की गायत्री साधना की प्रधान श्रद्धाँजलि “गायत्री प्रचार” है। इन गुलदस्ते को पाकर माता अन्य किसी की साधना की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होती है।
नारद जी सब ऋषियों से बड़े माने जाते हैं, भगवान के घर में उनका सदैव आना जाना रहता था। कोई शंका होती थी तो वे विष्णु भगवान के पास सीधे दौड़ जाते थे। यह सौभाग्य और किसी ऋषि को प्राप्त न था। भगवान की सर्व अधिक प्रिय जिस साधना को और कोई ऋषि न कर सका वह था “भगवद् भक्ति का प्रचार।” नारद जी अपनी मुक्ति आदि की चिन्ता में अन्य ऋषियों की भाँति जप तप नहीं करते थे। उन्हें अपनी नहीं भगवद् भक्ति के प्रचार की चिन्ता थी। एक क्षण मात्र का विश्राम लिए बिना वे निरन्तर इसी प्रचार तप से संलग्न रहते थे और यहाँ से वहाँ भगवान का गुणानुवाद करते हुए भी भ्रमण करते रहते थे।
हम अखण्ड ज्योति परिवार एवं गायत्री संस्था के सदस्यों ने भी नारद जी के चरण चिन्हों पर चलने का व्रत लिया हुआ है। हमारा यह व्रत साधन संसार की किसी भी अन्य साधना से अधिक उत्कृष्ट है। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द प्रभृति आत्माएं इसी प्रचार मार्ग में आपका जीवन लगा चुकी हैं। शुकदेव, व्याग्र, शौनिक आदि के जीवन भी इसी दिशा में लगे थे। हम लोग अब तक इस दिशा में तत्परतापूर्वक बढ़ते रहे हैं। अब इस सम्बन्ध में एक विशेष आयोजन आरम्भ किया जा रहा है।
मकर संक्रान्ति ज्ञानदान का प्रधान त्यौहार है। धार्मिक प्रकृति के लोग इस दिन पंचांग या अन्य कोई छोटी बड़ी पुस्तकें दान करते हैं क्योंकि इस शुभ अवसर पर पुस्तक दान का महात्म्य बहुत भारी माना गया है। मकर की संक्रान्ति से लेकर कुम्भ की संक्रान्ति होने तक का एक महीना मुहूर्त शाखा ज्योतिष विद्या एवं गृह की पृथ्वी पर आने वाली किरणों के प्रभाव ‘विज्ञान के अनुसार ऐसा शुभ है कि इस समय में की हुई ज्ञान चर्चा अत्यधिक सफल रहती है। इसी आधार पर प्रयोग हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, वृन्दावन के कुम्भ मेले होते हैं। इन मेलों का उद्देश्य सामूहिक रूप से ज्ञान प्रसार करना था। सन्त महात्मा अपनी कुटियों और नियामत साधनाओं को छोड़कर पैदल यात्रा करते हुए कुम्भ मेले में पहुँचते थे। सन्तों का आपसी विचार विनिमय होता था। लाखों की संख्या में जनता वहाँ पहुँचकर ज्ञान लाभ तथा तीर्थ यात्रा का पुण्य करती थी। आज उन मेलों का ढंग बिगड़ गया है तो भी मूल कारण और उद्देश्य वही है।
इस वर्ष प्रयाग (इलाहाबाद) का कुम्भ मेला है। मकर संक्रान्त (14 जनवरी गुरुवार) से प्रारम्भ होकर 14 फरवरी रविवार तक रहेगा। इस महीने में गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए एक विशद ‘अनुज्ञान’ करेगा। ‘अनुष्ठान’ में जप प्रधान है ‘अनुज्ञान’ में ज्ञानदान प्रधान है। जिस प्रकार सवा लख जप का एक अनुष्ठान होता है वैसे ही संचालन व्यक्तियों को गायत्री विद्या की जानकारी कराने का हमारा संकल्प है। वह सामूहिक संकल्प है। जैसे पिता के कर्ज में और लाभ कमाने में उसके बेटे भी शामिल माने जाते हैं। कानूनी रूप से सम्मिलित समझे जाते हैं उसी प्रकार संस्था द्वारा किये गये इस संकल्प में सभी सदस्य भागीदार हैं। इसका श्रेय और पुण्य हम सभी का है इसलिए इसे पूर्ण करना भी हम सभी का कर्तव्य और उत्तरदायित्व है।
उपर्युक्त एक मास में संचालन नये व्यक्तियों को गायत्री विद्या की समुचित जानकारी कराने का संकल्प पूर्ण करने के लिए संस्था की ओर से एक अत्यन्त ही सस्ता, आकर्षक एवं महत्वपूर्ण प्रकाशन किया गया है। पाँच पाँच पैसा मूल्य की आठ पुस्तकें इसी अवसर के लिए छापी गई हैं। (1) गायत्री की गुप्त शक्ति, (2) गायत्री से बुद्धि विकास, (3) सुख शान्ति दायिनी गायत्री, (4) गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ, (5) स्त्रियों की गायत्री साधना, (6) गायत्री उपासना कैसे करें, (7) गायत्री का अर्थ सन्देश (8) गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध। यह आठ पुस्तकें छापी गई हैं। पुस्तक साइज के 16 पृष्ठ तिरंगे चित्ताकर्षक मुखपृष्ठ इन सबके हैं। पाँच पैसा मूल्य लगभग लागत मात्र है। केवल दस आने का यह सैट साधारणतः गायत्री विद्या का आवश्यक ज्ञान, विधान, महत्व, लाभ, विज्ञान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन, तत्वज्ञान एवं साधन की बहुत कुछ जानकारी करा देता है। हम लोग मिलकर इस साहित्य को अपने अपने क्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में फैलाने का प्रयत्न करें।
गायत्री संस्था के प्रत्येक सदस्य को कुम्भ पर्व के अवसर पर आयोजित इस महान ‘अनुज्ञान’ में भाग लेना चाहिए। तीस दिन में प्रति दिन एक सैट के हिसाब से साधारणतया तीस सैट प्रचारित कर देने का प्रयत्न कर चाहिए। थोड़ा साहस और प्रयत्न करने वालों के लिए यह कुछ भी कठिन नहीं है। साधारण दुकानदार प्रतिदिन दर्जनों ग्राहकों को पटाते हैं, और रोज बहुत पैसे की बिक्री करते हैं। तो क्या एक ग्राहक रोज पा लेना या दस आने रोज की इतनी सस्ती और सुन्दर वस्तु बेच देना कुछ कठिन होगा नहीं, निश्चय पूर्वक थोड़ा मनोबल रखने वालों के लिए यह बहुत ही सरल बात है! हम चाहते हैं कि जहाँ। तक हो सके यह सैट बेचे जायं। क्योंकि विक्रय के लिए दूसरों को कुछ समझाना भी पड़ता है, समझाने वालों को जो समय खर्च करना पड़ता है, और वस्तु अधिकारी लोगों के ही हाथ में पहुँचती है, यह दोनों ही बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक महीने में 18 रु. का ऐसा अद्भुत साहित्य बेच देना बहुत सरल है। प्रतिभावान और मनस्वी लोग तो इससे कई गुना कार्य कर सकते हैं।
जिनको कम अवसर हों वे चाहे थोड़ा ही कार्य करें पर करें अवश्य। बिल्कुल न करने से कम करना ही उत्तम है। आठ सैट (80 पुस्तक) 6 रु. की मँगाई जा सकती हैं। इतना बेचने की तो समय या प्रयत्न भी अधिक नहीं लगेगा। इसमें से भी यदि कुछ बिकने से बच जाय तो उसे वितरण करने में भी बहुत भारी बोझ नहीं है। जहाँ बहुत ही असुविधा है वहाँ कई सदस्य मिलकर केवल 6 रु. की पुस्तक मँगाकर भी कुछ न करने के दोष से बच सकते हैं। स्मरण रहे 6 रु. से कम मूल्य की पार्सल न भेजा जायगा क्योंकि छोटे पार्सलों में कई बार मूल्य की बराबर तक पोस्टेज लग जाता है।
अपनी श्रद्धानुसार इस साहित्य को दान करना या भेंट उपहार में देना भी उत्तम है। पर देते समय बेगार नहीं भुगतनी चाहिए। जिस किसी के सिर पर अनावश्यक रद्दी की तरह फेंक देने से कुछ लाभ नहीं। जिनमें धार्मिक प्रवृत्ति के अंकुर पहले से हों उन्हीं को देना उचित है। केवल ब्राह्मणों को ही यह पुस्तकें दान की जाय ऐसी कोई बात नहीं। अपने रिश्तेदार, कुटुम्बी, मित्र, व्यवसाय, सहयोगी, परिचित लोगों को सबसे पहले देना उचित है। जिन्हें देना हो, उन्हें गायत्री विद्या के सम्बन्ध में कुछ मौखिक रूप से भी समझना चाहिये। यह आवश्यक नहीं कि अपने ग्राम या नगर में ही सब पुस्तकें दी जायें। दूरस्थ लोगों को डाक से बुक पोस्ट द्वारा भेजनी चाहिए और अलग से एक एक कार्ड भी उन्हें तद्विषयक जानकारी तथा प्रेरणा के लिए देना चाहिए इस प्रकार दूरस्थ प्रदेशों में भी प्रचार कार्य किया जाना चाहिए।
अनेक व्यक्ति दिवाली पर, वर्ष आरम्भ होने के अवसर पर कैलेन्डर, शुभकामना सन्देश उपहार आदि भेजते हैं। अपने जन्म दिन, बालकों के जन्म दिन, पूर्वजों या प्रियजनों के श्राद्ध, पुत्रजन्म, विवाह, पदवृद्धि, परीक्षा में उत्तीर्णता, मुकदमें की सफलता, प्रतिभोज, कथा, कीर्तन, सभा, सम्मेलन, व्रत, अनुष्ठान, तीर्थ यात्रा, त्यौहार आदि अवसरों पर कुछ दान करते, उपहार देते या गायत्री सैट दिये जाये तो कितना उत्तम हो। अन्न दान की अपेक्षा ज्ञानदान का महत्व असंख्य गुना अधिक है। किसी को भोजन करा देने की अपेक्षा उसे ज्ञानामृत पिला देने का फल बहुत अधिक है।
कई गायत्री उपासक मिलकर एक मण्डली के रूप में अपने नगर के धार्मिक व्यक्तियों के पास इस साहित्य को बेचने जावें। जैसे कि गाँधी जयन्ती पर चर्खा संघ व काँग्रेस के कार्यकर्ता खादी बेचने घर घर जाया करते हैं। ऐसे परमार्थिक कार्यों में संकोच या झिझक करना अथवा अपनी हेठी समझनी भूल है।
इस एक महीने में प्रतिदिन एक नये व्यक्ति से गायत्री सम्बन्धी चर्चा करने का नियम बना लिया जाय तो तीस व्यक्तियों में प्रचार हो सकता है। जिनके पास गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें हैं वे अपनी पुस्तकें इस मास तक नये पढ़ने वाले ढूंढ़कर उन्हें पढ़ाते रहें। इस कार्य में आने जाने की, समझाने की तथा कभी कभी पुस्तकें फटने या गुप्त होने की भी आशंका रहती है, इतने पर भी यह सब करना ही उचित है। जिन्हें सुविधा हो वे अपने समीपवर्ती नगरों में भी इस उद्देश्य के लिए यात्राएं करनी चाहिए। नौकरी पेशा वाले या व्यवसायी लोग अपनी छुट्टी का दिन इस प्रयोजन के लिए लगा दिया करें तो एक महीने में इस अवधि में चार पूरे दिन भी लगा सकते हैं।
इस एक मास में कम से कम एक सामूहिक प्रचार आयोजित करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गोष्ठी, आदि का आयोजन स्थानीय सुविधा के अनुसार करना चाहिए। जो दिन सुविधा का हो वही रखना चाहिए। साधारणतः बसन्त पंचमी इसके लिए विशेष उपयुक्त है। हमारी इच्छा है कि कुछ व्यक्ति अपना जीवन ही गायत्री प्रचार के लिए लगा दें। प्राचीन काल में अनेक ऋषि मुनि लोक हित के लिए अपना जीवन दान करते थे और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को, लोभ, मोह तथा स्वार्थ की तिलाँजलि देकर परमार्थिक उद्देश्यों के लिए अपना जीवन दान कर देते थे। आज तो सभी को अपनी अपनी पड़ी है कोई कोठी बँगले खरीद रहा है तो कोई ऋद्धि या स्वर्ग मुक्ति के लिए संलग्न है। ऐसे लोग ढूंढ़े नहीं मिलते जो अपनी बात को ताक पर उठाकर रखदें और नारदजी की भाँति अपने इष्ट का मान एवं महत्व बढ़ाने में संलग्न हों। हम लोगों से कोई ऐसे सच्चे लोग हैं या नहीं, अभी तक इस प्रश्न का ठोस उत्तर नहीं दिया जा सकता है। जिन्हें साहस हो वे बढ़कर आगे आवें, गायत्री प्रचार में अपना शेष जीवन लगावें। उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था अटकी न पड़ी रहेगी। जिनमें इस सम्बन्ध में अभिरुचि हो हमसे पत्र व्यवहार करलें।
जिनके पीछे पारिवारिक बहुत झंझट नहीं है, जिनके ऊपर गृहस्थों के अधिक उत्तरदायित्व नहीं है। तथा जो आलस्य रहित, कर्मनिष्ठ है, जिनकी वाणी ज्ञान प्रसार करने की योग्यता से युक्त है ऐसे धर्म परायण व्यक्ति अपने जीवन को गायत्री माता के चरणों में अर्पण करके अपने को सब प्रकार धन्य बना सकते हैं।
महा अनुज्ञान, हमारा सच्चा कुम्भ मेला है। इस वर्ष यह पर्व है जो 12 वर्ष बाद आता है। हम लोग अपने अपने घरों, ग्रामों और नगरों में गायत्री प्रचार के आयोजनों द्वारा सच्चे रूप में कुम्भ पर्व मनावेंगे। इस अवसर पर हम लोगों को ‘महा अनुज्ञान’ पूर्ण करना है। सवालक्ष व्यक्तियों तक अपनी माता का संदेश पहुँचाना है। हम में से एक भी ऐसा न रहे जो अपनी सुविधा और सामर्थ्य अनुसार किसी न किसी प्रकार इस आयोजन में भाग न लें और इसे सफल बनाने में कोई भी योगदान न करे। हमारा विश्वास है कि संस्था का एक भी परिजन ऐसा न होगा जो इस पुण्य आयोजन में भाग लेने के महत्व की उपेक्षा करे। माता हम सबको साहस, बल और उत्साह प्रदान करें।
कुम्भ स्नान के लिए लाखों व्यक्ति बहुत किराया खर्च करके जाते हैं वहाँ भी बहुत दान पुण्य करते हैं। हमारे परिवार के सदस्य भी इस अवसर पर निष्क्रिय न रहें वे कुम्भ स्नान के मूल उद्देश्य के अनुसार अपना कार्यक्रम बनावें। सर्वोत्तम ज्ञान गायत्री ज्ञान को अपने निकटवर्ती क्षेत्र में दीपक बनकर प्रकाशित करें। जिनकी सामर्थ्य हो वे कुम्भ में आगत साधु-महात्माओं में तथा बद्रीनाथ आदि तीर्थों के तीर्थ यात्रियों में गायत्री साहित्य अपनी ओर से वितरण करा सकते हैं। वितरण करने की व्यवस्था हम अपने विश्वस्त आदमियों द्वारा भी करा सकते हैं।
ब्रज की पावन भूमि जहाँ पर प्रगट हुये गिरधारी,
प्रहरी गोवर्धन अभिसिंचित करती यमुना प्यारी,
रस के कलश सदृश नित अम्बर जिस पर उमड़ा रहता,
कुंज कुंज में घूम प्रलय है अपनी बातें कहता,
फूल फूल पत्ते पत्ते की पागल प्रेम कहानी।
लिखता रहता सरसी रुह से कालिंदी का पानी॥
जिसकी रज को चूम अनेकों रसिक बने दीवाने,
भक्ति तूलिका पाकर मन के भाव बन गये गाने,
सहसा बनी विरक्ति हृदय की चिर सिंचित अभिलाषा,
कृष्ण चन्द्र के दर्शन हित मन चातक अब भी प्यासा,
नटवर तुम्हें प्राप्त करने को व्याकुल है विकलता।
तुम्हें मनाने अलंकार से सजकर आई कविता॥
मथुरा ब्रज की मुकट भूमि का अरुण विभव सुखदाई,
जिसके रंग मंच पर आई द्वापर की तरुणाई,
जिसने बतलाया कि पाप पर सदा पुण्य जीता है,
सदा दंभ का घर मानव की ममता से रीता है,
जिसने लिखी अतीत पटल पर भरत भूमि की गाथा।
झुक जाता जिसके पदरज के आगे कवि का माया॥
गीता का आदर्श जहाँ पर मूर्तिमान हो बोला,
दमन दैत्य को ग्रस लेने को चंडी ने मुँह खोला,
यहाँ कृष्ण का चक्र सुदर्शन सर्वप्रथम था घूमा,
यही विजय की श्री को पौरुष ने पहले था चूमा,
यहाँ सदा ही रहे भूमि के स्वामी बन संन्यासी।
राजनीति हो गई यहाँ पर सत्य धर्म की दासी॥
कृष्ण भक्ति के सरस काव्य ने यहीं प्राण पाया है,
सूरदास ने यहीं बैठ निज गीतों को गाया है,
कृष्ण भक्त कवियों ने खोली यहीं भाव मंजूषा,
मध्यकाल के अन्धकार ने पाई पावन ऊषा,
अंकित अब भी काव्य जगत में रास रंग की बातें।
जिन्हें स्वच्छ रखती भक्तों के नयनों की बरसातें॥
*समाप्त*
(श्री शिवशंकर मिश्रा, एम.ए.)